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अध्याय एक: ऋषियों के प्रश्न

1.1जन्माद्यस्य यतोन्वयादितरतश्चार्थष्वभिज्ञ: स्वराट्‌तेने ब्रह्म हदा य आदिकवयेमुह्न्ति यत्सूरय: ।तेजोवारिमृदां यथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोमृषाधाम्ना स्वेन सदा निरस्तकुहक॑ सत्यं परं धीमहि

ॐ-हे प्रभु; नमः--नमस्कार है; भगवते-- भगवान्‌ को; वासुदेवाय--वासुदेव ( वसुदेव-पुत्र ) या आदि भगवान्‌श्रीकृष्ण को; जन्म-आदि--उत्पत्ति, पालन तथा संहार; अस्य-- प्रकट ब्रह्माण्डों का; यत:--जिनसे; अन्वयात्‌- प्रत्यक्षरूप से; इतरत:--अ प्रत्यक्ष रूप से; च--तथा; अर्थैषु--उद्देश्यों में; अभिज्ञ:--पूर्ण रूप से अवगत; स्व-राट्‌--पूर्णरूप सेस्वतन्त्र; तेने-- प्रदान किया; ब्रह्म-- वैदिक ज्ञान; हृदा--हृदय की चेतना; यः--जो; आदि-कवये--प्रथम सर्जित जीव केलिए; मुहान्ति--मोहित होते हैं; यत्‌--जिनके विषय में; सूरय:--बड़े-बड़े मुनि तथा देवता; तेज:--अग्नि; वारि--जल;मृदाम्‌--पृथ्वी; यथा--जिस प्रकार; विनिमय:--क्रिया-प्रतिक्रिया; यत्र--जहाँ पर; त्रि-सर्ग: --सृष्टि के तीन गुण,सृष्टिकारी शक्तियाँ; अमृषा--सत्यवत्‌; धाम्ना--समस्त दिव्य सामग्री के साथ; स्वेन--अपने से; सदा--सदैव; निरस्त--अनुपस्थिति के कारण त्यक्त; कुहकम्‌--मोह को; सत्यम्‌--सत्य को; परम्--परम; धीमहि--मैं ध्यान करता हूँ।

हे प्रभु, हे वसुदेव-पुत्र श्रीकृष्ण, हे सर्वव्यापी भगवान्‌, मैं आपको सादर नमस्कारकरता हूँ।

मैं भगवान्‌ श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ, क्योंकि वे परम सत्य हैं और व्यक्तब्रह्माण्डों की उत्पत्ति, पालन तथा संहार के समस्त कारणों के आदि कारण हैं।

वे प्रत्यक्षतथा अप्रत्यक्ष रूप से सारे जगत से अवगत रहते हैं और वे परम स्वतंत्र हैं, क्योंकि उनसे परेअन्य कोई कारण है ही नहीं।

उन्होंने ही सर्वप्रथम आदि जीव ब्रह्माजी के हृदय में वैदिकज्ञान प्रदान किया।

उन्हीं के कारण बड़े-बड़े मुनि तथा देवता उसी तरह मोह में पड़ जाते हैं,जिस प्रकार अग्नि में जल या जल में स्थल देखकर कोई माया के द्वारा मोहग्रस्त हो जाताहै।

उन्हीं के कारण ये सारे भौतिक ब्रह्माण्ड, जो प्रकृति के तीन गुणों की प्रतिक्रिया केकारण अस्थायी रूप से प्रकट होते हैं, वास्तविक लगते हैं जबकि ये अवास्तविक होते हैं।

अतः मैं उन भगवान्‌ श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ, जो भौतिक जगत के भ्रामक रूपों से सर्वथा मुक्त अपने दिव्य धाम में निरन्तर वास करते हैं।

मैं उनका ध्यान करता हूँ, क्योंकि वेही परम सत्य हैं।

" धर्म: प्रोज्मितकैतवोत्र परमो निर्मत्सराणां सतांवेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिवदं तापत्रयोन्मूलनम्‌ ।

श्रीमद्धागवते महामुनिकृते कि वा परैरी श्र:सद्यो हृद्यवरुध्यतेउत्र कृतिभि: शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात्‌

धर्म:--धार्मिकता; प्रोज्झित--पूर्ण रूप से अस्वीकृत; कैतव:--सकाम विचार से प्रच्छन्न; अत्र--यहाँ; परम:--सर्वोच्च;निर्मत्सराणाम्‌--शतप्रतिशत शुद्ध हृदय वालों के; सताम्‌-भक्तों को; वेद्यम्--जानने योग्य; वास्तवम्‌--वास्तविक;अतन्र--यहाँ; वस्तु--वस्तु, चीज; शिवदम्‌--कल्याण; ताप-त्रय--तीन प्रकार के कष्ट; उन्मूलनम्‌--समूल नष्ट करना;श्रीमतू--सुन्दर; भागवते-- भागवत पुराण में; महा-मुनि--महामुनि ( व्यासदेव ) द्वारा; कृते--संग्रह किया गया, रचनाकी गई; किम्‌--क्या है; वा--आवश्यकता; परैः--अन्य; ईश्वर: --परमे श्वर; सद्य: -- तुरन्त; हृदि--हृदय में;अवरूुध्यते--हृढ़ हो गया; अत्र--यहाँ; कृतिभि:--पवित्र व्यक्तियों द्वारा; शुश्रूषुभि:--संस्कार द्वारा; ततू-क्षणात्‌--अविलम्ब।

यह भागवत पुराण, भौतिक कारणों से प्रेरित होने वाले समस्त धार्मिक कृत्यों को पूर्णरूप से बहिष्कृत करते हुए, सर्वोच्च सत्य का प्रतिपादन करता है, जो पूर्ण रूप से शुद्धहृदय वाले भक्तों के लिए बोधगम्य है।

यह सर्वोच्च सत्य वास्तविकता है जो माया से पृथक्‌होते हुए सबों के कल्याण के लिए है।

ऐसा सत्य तीनों प्रकार के संतापों को समूल नष्टकरने वाला है।

महामुनि व्यासदेव द्वारा ( अपनी परिपक्वावस्था में ) संकलित यहसौंदर्यपूर्ण भागवत ईश्वर-साक्षात्कार के लिए अपने आप में पर्याप्त है।

तो फिर अन्य किसीशास्त्र की क्या आवश्यकता है? जैसे जैसे कोई ध्यानपूर्वक तथा विनीत भाव से भागवत केसन्देश को सुनता है, वैसे वैसे ज्ञान के इस संस्कार ( अनुशीलन ) से उसके हृदय में परमेश्वरस्थापित हो जाते हैं।

" निगमकल्पतरोगलितं फलं शुकमुखादमृतद्रवसंयुतम्‌ ।

पिबत भागवतं रसमालयं मुहुरहो रसिका भुवि भावुका:

निगम--वैदिक साहित्य; कल्प-तरो:--कल्पतरु का; गलितम्‌--पूर्णत रूप से परिपक्व; फलमू--फल; शुक--श्रीमद्भागवत के मूल वक्ता श्रील शुकदेव गोस्वामी के; मुखात्--होठों से; अमृत--अमृत; द्रब--तरल अतएवं सरलतासे निगलने योग्य; संयुतम्‌--सभी प्रकार से पूर्ण; पिबत--पान करो; भागवतम्‌-- भगवान्‌ के साथ चिर सम्बन्ध केविज्ञान से युक्त ग्रन्थ को; रसमू--रस ( जो आस्वाद्य है वह ); आलयम्‌--मुक्ति प्राप्त होने तक या मुक्त अवस्था में भी;मुहुः--सदैव; अहो--हे; रसिका:--रस का पूर्ण ज्ञान रखने वाले रसिक जन; भुवि--पृथ्वी पर; भावुका:--पदु तथाविचारवान ।

हे विज्ञ एवं भावुक जनों, वैदिक साहित्य रूपी कल्पवृक्ष के इस पक्‍व फलश्रीमद्भागवत को जरा चखो तो।

यह श्री शुकदेव गोस्वामी के मुख से निस्सृत हुआ है,अतएव यह और भी अधिक रुचिकर हो गया है, यद्यपि इसका अमृत-रस मुक्त जीवों समेतसमस्त जनों के लिए पहले से आस्वाद्य था।

" नैमिषेडनिमिषक्षेत्रे ऋषय: शौनकादय: ।

सत्र स्वर्गाय लोकाय सहख्लसममासत

नैमिषे--नैमिषारण्य नामक जंगल में; अनिमिष-क्षेत्रे--विष्णु को ( जो पलक नहीं मारते ) विशेष रूप से प्रिय स्थल में;ऋषय: --ऋषिगण; शौनक-आदय: --शौनक आदि; सत्रम्‌-यज्ञ; स्वर्गाय--स्वर्ग में जिनकी महिमा का गायन होता हैऐसे भगवान्‌ के लिए; लोकाय--तथा भक्तों के लिए जो सदैव भगवान्‌ के सम्पर्क में रहते हैं; सहस्त्र--एक हजार;समम्‌-वर्ष; आसत--सम्पन्न किया।

एक बार नैमिषारण्य के वन में एक पवित्र स्थल पर शौनक आदि महान ऋषिगण भगवान्‌ तथा उनके भक्तों को प्रसन्न करने के लिए एक हजार वर्षों तक चलने वाले यज्ञ को सम्पन्न करने के उद्देश्य से एकत्र हुए।

" त एकदा तु मुनय: प्रारतहुताग्नय: ।

सत्कृतं सूतमासीनं पप्रच्छुरिदमादरात्‌ू

ते--वे ( मुनिगण ) ; एकदा--एक दिन; तु--लेकिन; मुनय:--मुनिगण; प्रात: --प्रातःकाल; हुत-- जलाकर; हुत-अग्नय:--यज्ञ की अग्नि; सत्‌-कृतम्‌-- आदर समेत; सूतम्‌-- श्री सूत गोस्वामी को; आसीनम्‌--बैठा कर; पप्रच्छु:--पूछा; इृदम्‌--इस पर ( निम्नलिखित ); आदरात्‌--आदरपूर्वक ।

एक दिन यज्ञाग्नि जलाकर अपने प्रातःकालीन कृत्यों से निवृत्त होकर तथा श्रील सूत गोस्वामी को आदरपूर्वक आसन अर्पण करके ऋषियों ने सम्मानपूर्वक निम्नलिखित विषयों पर प्रश्न पूछे।

" ऋषय ऊचु:त्वया खलु पुराणानि सेतिहासानि चानघ ।

आख्यातान्यप्यधीतानि धर्मशास्त्राणि यान्युत

ऋषय:--ऋषियों ने; ऊचु:--कहा; त्वया--आपके द्वारा; खलु--निश्चय ही; पुराणानि--परिपूरक वेदों को जिनमेंरोचक कथाएँ हैं; स-इतिहासानि--इतिहासों समेत; च--तथा; अनघ--समस्त पापों से मुक्त; आख्यातानि--कहा गया;अपि--यद्यपि; अधीतानि--सुपठित; धर्म-शास्त्राणि -- प्रगतिशील जीवन के लिए सही निर्देश देने वाले शास्त्र ग्रन्थ;यानि--ये सब; उत--व्याख्या की गई।

मुनियों ने कहा : हे पूज्य सूत गोस्वामी, आप समस्त प्रकार के पापों से पूर्ण रूप सेमुक्त हैं।

आप धार्मिक जीवन के लिए विख्यात समस्त शास्त्रों एवं पुराणों के साथ-साथ इतिहासों में निपुण हैं, क्योंकि आपने समुचित निर्देशन में उन्हें पढ़ा है और उनकी व्याख्या भी की है।

" यानि वेदविदां श्रेष्ठो भगवान्‌ बादरायण: ।

अन्ये च मुनयः सूत परावरविदो विदु:

यानि--वह सब; वेद-विदाम्‌--वेदों के पंडित; श्रेष्ठ: --ज्येष्ठतम, वयोवृद्ध; भगवान्‌--ईश्वर के अवतार; बादरायण:--व्यासदेव; अन्ये-- अन्य; च--तथा; मुनयः--मुनिगण; सूत--हे सूत गोस्वामी; परावर-विदः--विद्वानों में जो भौतिकतथा आध्यात्मिक ज्ञान से परिचित होता है; विदुः--ज्ञाता

है सूत गोस्वामी, आप ज्येष्ठतम विद्वान एवं वेदान्ती होने के कारण ईश्वर के अवतारव्यासदेव के ज्ञान से अवगत हैं और आप उन अन्य मुनियों को भी जानते हैं जो सभी प्रकारके भौतिक तथा आध्यात्मिक ज्ञान में निष्णात हैं।

हे सूत गोस्वामी, आप ज्येष्ठतम विद्वान एवं वेदान्ती होने के कारण ईश्वर के अवतारव्यासदेव के ज्ञान से अवगत हैं और आप उन अन्य मुनियों को भी जानते हैं जो सभी प्रकारके भौतिक तथा आध्यात्मिक ज्ञान में निष्णात हैं।

" वेत्थ त्वं सौम्य तत्सर्व॑ तत्त्वतस्तदनुग्रहात्‌ ।

ब्रूयु: स्निग्धस्य शिष्यस्य गुरवो गुह्ममप्युत

वेत्थ--पूर्ण रूप से निष्णात्‌; त्वमू--आप; सौम्य--शुद्ध तथा सरल व्यक्ति; तत्--वह; सर्वम्‌--समस्त; तत्त्वतः--वास्तव में; तत्‌--उनका; अनुग्रहात्‌--अनुग्रह से; ब्रूयु:--कहेंगे; स्निग्धस्य--विनीत; शिष्यस्य--शिष्य का; गुरव:--गुरुजन; गुहाम्‌-गुप्त, रहस्य; अपि उत--से युक्त ।

इससे भी अधिक, चूँकि आप विनीत हैं, आपके गुरुओं ने एक सौम्य शिष्य जानकरआप पर सभी तरह से अनुग्रह किया है अतः आप हमें वह सब बतायें जिसे आपने उनसेवैज्ञानिक ढंग से सीखा है।

" तत्र तत्राझ्लसायुष्मन्‌ भवता यद्विनिश्चितम्‌ ।

पुंसामेकान्तत: श्रेयस्तन्न: शंसितुमहसि

तत्र--वहाँ; तत्र--वहाँ; अज्ञसा--सहज; आयुष्मन्‌--दीर्घ जीवन का आशीर्वाद पाये; भवता--आपके द्वारा; यत्‌--जोकुछ; विनिश्चितम्--निश्चित किया; पुंसामू--जनसामान्य के लिए; एकान्ततः--नितान्त; श्रेयः --परम कल्याण; तत्‌--उस; नः--हमको; शंसितुमू--समझाने के लिए; अहसि--योग्य हो

अतएव, दीर्घायु की कृपा प्राप्त आप सरलता से समझ में आने वाली विधि से हमेंसमझाइये कि आपने जन साधारण के समग्र एवं परम कल्याण के लिए क्या निश्चय किया है?"

प्रायेणाल्पायुष: सभ्य कलावस्मिन्‌ युगे जना: ।

मन्दा: सुमन्दमतयो मन्दभाग्या ह्युपद्रुता:

१०

प्रायेण-- प्रायः; अल्प--न्यून; आयुष:--आयु, जीवन अवधि; सभ्य--विद्वत्समाज का सदस्य; कलौ--कलियुग में;अस्मिन्--यहाँ पर; युगे--युग में; जना:--लोग, जनता; मन्दा:--आलसी; सुमन्द-मतय:--पथ भ्रष्ट; मन्द- भाग्या: --अभागे; हि--और तो और; उपद्गुता:--विचलितहे विद्वान, कलि के इस लौह-युग में लोगों की आयु न्यून है।

वे झगड़ालू, आलसी,पथशभ्रष्ट, अभागे होते हैं तथा साथ ही साथ सदैव विचलित रहते हैं।

शास्त्रों के अनेक विभाग हैं और उन सबमें अनेक नियमित कर्मों का उल्लेख है,जिनके विभिन्न प्रभागों को वर्षों तक अध्ययन करके ही सीखा जा सकता है।

अतः हे साधु,कृपया आप इन समस्त शास्त्रों का सार चुनकर समस्त जीवों के कल्याण हेतु समझायें,जिससे उस उपदेश से उनके हृदय पूरी तरह तुष्ट हो जायँ।

" भूरीणि भूरिकर्माणि श्रोतव्यानि विभागश: ।

अतः साधोअत्र यत्सारं समुद्धृत्य मनीषया ।

ब्रूहि भद्राय भूतानां येनात्मा सुप्रसीदति

११

भूरीणि--बहुमुखी; भूरि--अनेक; कर्माणि--कर्म, कर्तव्य; श्रोतव्यानि--सीखने योग्य; विभागश:--विषयानुसार;अतः--अतएव; साधो--हे साधु; अत्र--यहाँ पर; यत्‌-- जो कुछ; सारम्‌--निष्कर्ष; समुद्धृत्य--चुनाव करके;मनीषया--अपने ज्ञान के अनुसार सर्वश्रेष्ठ; बरृहि--कृपा करके बताएँ; भद्राय--कल्याण के लिए; भूतानाम्‌ू--जीवों के;येन--जिससे; आत्मा--आत्मा; सुप्रसीदति--पूर्ण रूप से प्रसन्न हो जाती है।

शास्त्रों के अनेक विभाग हैं और उन सबमें अनेक नियमित कर्मों का उल्लेख है, जिनके विभिन्न प्रभागों को वर्षो तक अध्ययन करके ही सीखा जा सकता है।

अतः हे साधु,कृपया आप इन समस्त शास्त्रों का सार चुनकर समस्त जीवों के कल्याण हेतु समझायें,जिससे उस उपदेश से उनके हृदय पूरी तरह तुष्ट हो जायँ।

" सूत जानासि भद्रं ते भगवान्‌ सात्वतां पति: ।

देवक्यां वसुदेवस्य जातो यस्य चिकीर्षया

१२

सूत--हे सूत गोस्वामी; जानासि--आप जानते हो; भद्गम्‌ ते--आपका कल्याण हो; भगवान्‌-- भगवान्‌; सात्वताम्‌--शुद्ध भक्तों का; पति:--रक्षक; देवक्याम्‌--देवकी के गर्भ में; बसुदेवस्य--वसुदेव से; जात:--उत्पन्न; यस्य--जिसकेउद्देश्य से; चिकीर्षया--सम्पन्न करने हेतु।

हे सूत गोस्वामी, आपका कल्याण हो।

आप जानते हैं कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्‌देवकी के गर्भ से वसुदेव के पुत्र के रूप में किस प्रयोजन से प्रकट हुए।

" तन्न: शुश्रूषमाणानामर्हस्यड्भानुवर्णितुम्‌ ।

यस्यावतारो भूतानां क्षेमाय च भवाय च

१३

तत्‌--वे; नः--हमको; शुश्रूषमाणानाम्‌--जो प्रयलशील हैं; अहंसि--करना चाहिए; अड्भ--हे सूत गोस्वामी;अनुवर्णितुम्‌--पूर्ववर्ती आचार्यों का अनुगमन करते हुए व्याख्या करने के लिए; यस्य--जिसका; अवतार:--अवतार;भूतानाम्‌--जीवों के; क्षेमाय--कल्याण के लिए; च--तथा; भवाय--उन्नति के लिए; च--तथा।

हे सूत गोस्वामी, हम भगवान्‌ तथा उनके अवतारों के विषय में जानने के लिए उत्सुकहैं।

कृपया हमें पूर्ववर्ती आचार्यों द्वारा दिये गये उपदेशों को बताइये, क्योंकि उनके वाचनश्रवण तथा कहने सुनने दोनों से ही मनुष्य का उत्कर्ष होता है।

" आपन्न: संसृति घोरां यन्नाम विवशो गृणन्‌ ।

ततः सद्यो विमुच्येत यद्विभेति स्वयं भयम्‌

१४

आपतन्न:--फँसे हुए; संसृतिम्‌--जन्म-मृत्यु के चक्कर में; घोराम्‌--अत्यन्त उलझे; यत्‌--जो; नाम--परम नाम; विवश: --अनजाने में; गृणन्‌--उच्चारण करते हुए; ततः--उससे; सद्य:--तुरन्त; विमुच्येत--मुक्त हो जाता है; यत्‌--जो;बिभेति--डरता है; स्वयम्‌--स्वयं; भयम्‌--साक्षात्‌ भय ।

जन्म तथा मृत्यु के जाल में उलझे हुए जीव, यदि अनजाने में भी कृष्ण के पवित्र नामका उच्चारण करते हैं, तो तुरन्त मुक्त हो जाते हैं, क्योंकि साक्षात्‌ भय भी इससे ( नाम से )भयभीत रहता है।

" यत्पादसंश्रया: सूत मुनय: प्रशमायना: ।

सद्यः पुनन्त्युपस्पृष्टा: स्वर्धुन्यापोडनुसेवया

१५

यत्‌--जिसके; पाद--चरणकमल; संश्रया:--शरणागत; सूत--हे सूत गोस्वामी; मुन॒यः--बड़े-बड़े मुनिगण;प्रशमायना:--परमे श्वर की भक्ति में लीन; सद्यः--तुरन्‍्त; पुनन्ति--पवित्र हो जाते हैं; उपस्पृष्टा:--केवल संगति से;स्वर्धुनी--पवित्र गंगा का; आप:--जल; अनुसेवया--उपयोग में लाने से ।

हे सूत गोस्वामी, जिन महान ऋषियों ने पूर्ण रूप से भगवान्‌ के चरणकमलों की शरणग्रहण कर ली है, वे अपने सम्पर्क में आने वालों को तुरन्त पवित्र कर देते हैं, जबकि गंगाजल दीर्घकाल तक उपयोग करने के बाद ही पवित्र कर पाता है।

" को वा भगवतस्तस्य पुण्यश्लोकेड्यकर्मण: ।

शुद्धिकामो न श्रुणुयाद्यत: कलिमलापहम्‌

१६

कः--कौन; वा--बल्कि; भगवत:-- भगवान्‌ का; तस्य--उनका; पुण्य--पुण्यात्मा; इलोक-ईड्य--स्तुतियों द्वारापूजनीय; कर्मण:--कर्म; शुद्धि-काम:--समस्त पापों से उद्धार की इच्छा करने वाला; न--नहीं; श्रुणुयात्‌--सुनता है;यशः--यश; कलि--कलह के युग का; मल-अपहम्‌--शुद्धि करने वालाइस कलहप्रधान युग के पापों से उद्धार पाने का इच्छुक ऐसा कौन है, जो भगवान्‌ केपुण्य यशों को सुनना नहीं चाहेगा ?"

तस्य कर्माण्युदाराणि परिगीतानि सूरिभि: ।

ब्रूहि न: श्रद्धानानां लीलया दधत: कला:

१७

तस्य--उनके ; कर्माणि--दिव्य कर्म; उदाराणि--उदार; परिगीतानि-- प्रसारित; सूरिभि: --महात्माओं द्वारा; ब्रूहि--कृपया कहें; नः--हमसे; श्रद्धानानामू--आदरपूर्वक ग्रहण करने के लिए उद्यत; लीलया--लीलाओं से; दधत: -- धारणकिये हुए; कला;:--अवतार।

उनके दिव्य कर्म अत्यन्त उदार तथा अनुग्रहपूर्ण हैं और नारद जैसे महान्‌ विद्वान मुनिउनका गायन करते हैं।

अतः कृपया हमें उनके अपने विविध अवतारों में सम्पन्न साहसिकलीलाओं के विषय में बतायें, क्योंकि हम सुनने के लिए उत्सुक हैं।

" अथाख्याहि हरेर्धीमन्नवतारकथा: शुभा: ।

लीला विदधत: स्वैरमीश्वरस्यात्ममायया

१८

अथ--अतः; आख्याहि--वर्णन करें; हरेः-- भगवान्‌ के; धीमन्‌--हे बुद्धिमान; अवतार--अवतार; कथा: --कथाएँ;शुभाः--शुभ, कल्याणप्रद; लीला--साहसिक कार्य; विदधत:--सम्पन्न; स्वैरमू--लीलाएँ; ईश्वरस्थ--परम नियन्ता की;आत्म--निजी, अपनी; मायया--शक्तियों से।

हे बुद्धिमान सूतजी, कृपा करके हमसे भगवान्‌ के विविध अवतारों की दिव्य लीलाओंका वर्णन करें।

परम नियन्ता भगवान्‌ के ऐसे कल्याणप्रद साहसिक कार्य तथा उनकीलीलाएँ उनकी अन्तरंगा शक्तियों द्वारा सम्पन्न होते हैं।

" वयं तु न वितृष्याम उत्तमश्लोकविक्रमे ।

यच्छुण्वतां रसज्ञानां स्वादु स्वादु पदे पदे

१९

वयम्‌--हम; तु--लेकिन; न--नहीं; वितृप्याम: --तृप्त हो जाएँगे; उत्तम-शलोक--भगवान्‌, जिनका यशोगान दिव्यइलोकों से किया जाता है; विक्रमे--साहसिक कार्य; यत्‌--जो; श्रृण्वताम्‌--निरन्तर सुनने से; रस--रस के; ज्ञानामू--भिज्ञों को; स्वादु--स्वाद लेते हुए; स्वादु--सुस्वादु, स्वादिष्ट; पदे पदे--पग पग परहम उन भगवान्‌ की दिव्य लीलाओं को सुनते थकते नहीं, जिनका यशोगान स्तोत्रोंतथा स्तुतियों से किया जाता है।

उनके साथ दिव्य सम्बन्ध के लिए जिन्होंने अभिरुचिविकसित कर ली है, वे प्रतिक्षण उनकी लीलाओं के श्रवण का आस्वादन करते हैं।

" कृतवान्‌ किल कर्माणि सह रामेण केशव: ।

अतिमर्त्यानि भगवान्‌ गूढ: कपटमानुष:

२०

कृतवान्--किये गये; किल--कौन-कौन से; कर्माणि--कार्य; सह--सहित; रामेण--बलराम; केशव: -- श्रीकृष्ण ने;अतिमर्त्यानि--अलौकिक; भगवान्‌-- भगवान्‌; गूढ:--प्रच्छन्न; कपट--ऊपर से; मानुष: --मनुष्य ।

भगवान्‌ श्रीकृष्ण ने बलराम सहित मनुष्य की भाँति क्रीड़ाएँ कीं और इस प्रकार सेप्रच्छन्न रह कर उन्होंने अनेक अलौकिक कृत्य किये।

" कलिमागतमाज्ञाय क्षेत्रेडस्मिन्‌ वैष्णवे वयम्‌ ।

आसीना दीर्घसत्रेण कथायां सक्षणा हरे:

२१

'कलिम्‌--कलियुग ( कलहप्रिय लौह युग ) ; आगतम्‌--आया हुआ; आज्ञाय--जानकर; क्षेत्रे-- भूभाग में; अस्मिन्‌--इस; वैष्णवे--विशेष रूप से भगवान्‌ के भक्तों के लिए; वयम्‌--हम; आसीना: --बैठे हुए; दीर्घ--दीर्घकालीन;सत्रेण--यज्ञ द्वारा; कथायाम्‌--शब्दों में; स-क्षणा: --अपने अवकाश के समय; हरेः--भगवान्‌ के |.

यह भलीभाँति जानकर कि कलियुग का प्रारम्भ हो चुका है, हम इस पवित्र स्थल मेंभगवान्‌ का दिव्य सन्देश सुनने के लिए तथा इस प्रकार यज्ञ सम्पन्न करने के लिए दीर्घ॑सत्रमें एकत्र हुए हैं।

" वं न: सन्दर्शितो धात्रा दुस्तरं निस्तितीर्षताम्‌ ।

कलिं सत्त्वहरं पुंसां कर्णधार इवार्णवम्‌

२२

त्वमू--आपने; न: --हम सबों को; सन्दर्शित:--मिलाया है; धात्रा-- भाग्य से; दुस्तरम्‌--दुल॑ध्य; निस्तितीर्षताम्‌-- पारकरने की इच्छा करने वालों के लिए; कलिम्‌ू--कलियुग को; सत्त्व-हरम्‌--अच्छे गुणों को हरण करने वाला; पुंसामू--मनुष्य का; कर्ण-धार: --कप्तान; इब--सहश; अर्णवम्‌-- समुद्र |.

हम मानते हैं कि दैवी इच्छा ने हमें आपसे मिलाया है, जिससे मनुष्यों के सत्त्त का नाश करने वाले उस कलि रूप दुर्लध्य सागर को तरने की इच्छा रखने वाले हम सब आपको नौका के कप्तान के रूप में ग्रहण कर सकें।

" ब्रृहि योगेश्वरे कृष्णे ब्रह्मण्ये धर्मवर्मणि ।

स्वां काष्टामधुनोपेते धर्म: क॑ शरणं गत:

२३

ब्रूहि--कृपया कहें; योग-ईश्वर--समस्त योग शक्तियों के स्वामी; कृष्णे--भगवान्‌ कृष्ण; ब्रह्मण्ये--परम सत्य; धर्म--धर्म; वर्मणि--रक्षक; स्वाम्--अपना; काष्टाम्‌-- धाम; अधुना--इस समय; उपेते--चले गये; धर्म:--धर्म; कम्‌--किसकी; शरणम्‌--शरण में; गतः--गया हुआ।

चूँकि परम सत्य, योगेश्वर, श्रीकृष्ण अपने निज धाम के लिए प्रयाण कर चुके हैं,अतएव कृपा करके हमें बताएँ कि अब धर्म ने किसका आश्रय लिया है?"

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