← चैतन्य चरितामृत की सूची

अध्याय आठ: लेखक को कृष्ण और गुरु का आदेश प्राप्त होता है

वन्दे चैतन्य-देवं तं भगवन्तं यदिच्छया ।।प्रसभं नय॑ते चित्रं लेख-रङ्गे जड़ोऽप्ययम् ॥

१॥

मैं उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु को नमस्कार करता हूँ, जिनकी इच्छा से मैं नाचते हुए कुत्ते के समान बन गया हूँ और मूर्ख होते हुए भी मैंने सहसा श्रीचैतन्य-चरितामृत लिखने का कार्य अपने हाथों में लिया है।

जय जय श्री कृष्ण-चैतन्य गौरचन्द्र ।। जय जय परमानन्द जय नित्यानन्द ॥

२॥

मैं गौरसुन्दर नाम से विख्यात श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करता हूँ। मैं सदैव प्रसन्न रहने वाले नित्यानन्द प्रभु को भी सादर नमस्कार करता हूँ।

जय जयाद्वैत आचार्य कृपामय ।जय जय गदाधर पण्डित महाशय ॥

३ ॥

मैं अद्वैत आचार्य को सादर नमस्कार करता हूँ, जो अत्यन्त कृपालु हैं। साथ ही मैं महान् विद्वान महापुरुष गदाधर पण्डित को भी नमस्कार करता हूँ।

जय जय श्रीवासादि यत भक्त-गण । प्रणत हइया वन्दों सबार चरण ॥

४॥

मैं श्रीवास ठाकुर तथा महाप्रभु के अन्य सारे भक्तों को सादर नमस्कार करता हूँ। मैं उनके सामने गिरकर प्रणाम करता हूँ और उनके चरणकमलों की पूजा करता हूँ।

मूक कवित्व करे ग्राँसबार स्मरणे ।पङ् गिरि लङ्घ, अन्ध देखे तारा-गणे ॥

५॥

पंचतत्त्व के चरणकमलों का स्मरण करने से गूंगी व्यक्ति कवि बन सकता है, लंगड़ा पर्वतों को पार कर सकता है और अंधा व्यक्ति आकाश के तारों को देख सकता है।

ए-सब ना माने ग्रेइ पण्डित सकल ।ता-सबार विद्या-पाठ भेक-कोलाहल ॥

६॥

ऐसे तथाकथित पण्डित, जो श्रीचैतन्य-चरितामृत के इन कथनों पर विश्वास नहीं करते, उनके द्वारा शिक्षा का अनुशीलन मेढ़कों की जोरदार टर्र-टर्र के समान है।

एइ सब ना माने येबा करे कृष्ण-भक्ति ।।कृष्ण-कृपा नाहि तारे, नाहि तार गति ॥

७॥

जो पंचतत्त्व की महिमा को स्वीकार नहीं करता और फिर भी कृष्णभक्ति का दिखावा करता है, उसे न तो कृष्ण की कृपा प्राप्त हो सकती है, न ही वह अपने चरम लक्ष्य की ओर आगे बढ़ सकता है।

पूर्वे ट्रैछे जरासन्ध-आदि राज-गण ।।वेद-धर्म करि' करे विष्णुर पूजन ॥

८॥

प्राचीनकाल में जरासंध ( कंस का ससुर ) जैसे राजाओं ने वैदिक अनुष्ठानों का कड़ाई से पालन किया और इस तरह विष्णु की पूजा की।

कृष्ण नाहि माने, ताते दैत्य करि' मानि । चैतन्य ना मानिले तैछे दैत्य तारे जानि ॥

९॥

जो कृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् नहीं स्वीकार करता, वह निश्चय ही असुर है। इसी तरह जो श्री चैतन्य महाप्रभु को उन्हीं भगवान् कृष्ण के रूप में नहीं स्वीकार करता, उसे भी असुर ही समझना चाहिए।

मोरे ना मानिले सब लोक हबे नाश ।।इथि लागि' कृपाई प्रभु करिल सन्यास ॥

१०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने विचार किया, जब तक लोग मुझे स्वीकार नहीं करेंगे, वे विनष्ट हो जायेंगे। इसलिए कृपालु महाप्रभु ने संन्यास ग्रहण किया।

सन्यासि-बुद्ध्ये मोरे करिबे नमस्कार ।तथापि खण्डिबे दुःख, पाइबे निस्तार ॥

११॥

यदि कोई व्यक्ति मुझे एक सामान्य संन्यासी मानकर भी नमस्कार करता है, तो उसके सांसारिक दुःख घट जायेंगे और अन्ततः उसे मुक्ति प्राप्त होगी।

हेन कृपामय चैतन्य ना भजे ग्रेइ जन ।सर्वोत्तम हइलेओ तारे असुरे गणन ॥

१२॥

जो व्यक्ति दयालु भगवान्, चैतन्य महाप्रभु का सम्मान नहीं करता या उनकी पूजा नहीं करता, उसे असुर समझना चाहिए, भले ही उसे मानव समाज में कितना ही प्रतिष्ठित क्यों न माना जाता हो।

अतएव पुनः कहों ऊर्ध्व-बाहु हो ।चैतन्य-नित्यानन्द भज कुतर्क छाड़िया ॥

१३ ॥

इसलिए मैं अपनी भुजाएँ उठाकर फिर कहता हूँ कि हे मित्रों, झूठे तर्को को छोड़कर श्री चैतन्य तथा नित्यानन्द की पूजा करो! यदि वा तार्किक कहे,—तर्क से प्रमाण ।।तर्क-शास्त्रे सिद्ध ग्रेइ, सेइ सेव्यमान ॥

१४॥

तर्कशास्त्री कहते हैं, जब तक तर्क द्वारा ज्ञान प्राप्त न कर लिया जाए, तब तक भला कोई आराध्य देव के बारे में निश्चय कैसे कर सकता है? श्री-कृष्ण-चैतन्य-दया करह विचार ।विचार करिते चित्ते पाबे चमत्कार ॥

१५ ॥

यदि आप सचमुच तर्क में रुचि रखते हैं, तो इसका प्रयोग श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा पर कीजिये। यदि आप ऐसा करेंगे, तो पायेंगे कि यह अत्यन्त अद्भुत है।

बहु जन्म करे यदि श्रवण, कीर्तन ।तबु त' ना पाय कृष्ण-पदे प्रेम-धन ॥

१६॥

यदि कोई हरे कृष्ण महामन्त्र के जप में दस अपराध करता रहता है, तो वह चाहे अनेक जन्मों तक पवित्र नाम का जप करने का प्रयास क्यों न करे, उसे भगवत्प्रेम प्राप्त नहीं हो सकेगा, जो इस जप का चरम लक्ष्य है।

ज्ञानतः सु-लभा मुक्तिभुक्तिर्यज्ञादि-पुण्यतः ।।सेयं साधन-साहस्त्रैर्हरि-भक्तिः सु-दुर्लभा ॥

१७॥

दार्शनिक ज्ञान के अनुशीलन से मनुष्य अपनी आध्यात्मिक स्थिति को समझ सकता है और इस तरह मुक्ति पा सकता है; यज्ञ तथा पुण्यकर्मों को सम्पन्न करके मनुष्य उच्चतर ग्रहमण्डल में इन्द्रियतृप्ति प्राप्त कर सकता है, किन्तु भगवान् की भक्तिमयी सेवा इतनी दुर्लभ है कि ऐसे हजारों यज्ञ करके भी यह प्राप्त नहीं की जा सकती।

कृष्ण ग्रदि छुटे भक्ते भुक्ति मुक्ति दिया । कभु प्रेम-भक्ति ना देन राखेन लुकाइया ॥

१८॥

यदि भक्त भगवान् से भौतिक इन्द्रियतृप्ति या मुक्ति चाहता है, तो कृष्ण उसे तुरन्त दे देते हैं, किन्तु शुद्ध भक्ति को वे छिपाकर रखते हैं।

राजन्पतिर्गुरुरलं भवतां ग्रदूनांदैवं प्रियः कुल-पतिः क्व च किङ्करो वः ।। अस्त्वेवमङ्ग भगवान्भजतां मुकुन्दोमुक्तिं ददाति कर्हिचित्स्म न भक्ति-ग्रोगम् ॥

१९॥

[ महर्षि नारद ने कहा हे महाराज युधिष्ठिर, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण आपकी सहायता के लिए सदैव तत्पर रहते हैं। वे आपके स्वामी,गुरु, ईश्वर, प्रिय मित्र तथा आपके परिवार के मुखिया हैं। फिर भी वे कभी-कभी आपके दास या आज्ञापालक का कार्य करना स्वीकार कर लेते हैं। आप अत्यन्त भाग्यशाली हैं, क्योंकि यह सम्बन्ध केवल भक्तियोग द्वारा ही सम्भव हो पाता है। भगवान् मुक्ति तो सरलता से दे सकते हैं, किन्तु वे किसी को भक्तियोग आसानी से नहीं प्रदान करते, क्योंकि वे उस प्रक्रिया से भक्त के साथ बँध जाते हैं।

हेन प्रेम श्री-चैतन्य दिला ग्रथा तथा ।।जगाइ माधाइ पर्यन्त–अन्येर का कथा ॥

२०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस कृष्ण-प्रेम को यत्र-तत्र, सर्वत्र, यहाँ तक कि जगाइ तथा माधाइ जैसे सर्वाधिक पतितों को भी मुक्तहस्त होकर प्रदान किया है। तो भला उन सबके विषय में क्या कहा जाए, जो पहले से पवित्र तथा उन्नत हैं? स्वतन्त्र ईश्वर प्रेम-निगूढ़-भाण्डार।।बिलाइल ग्रारे तारे, ना कैल विचार ॥

२१॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में श्री चैतन्य महाप्रभु पूर्णतया स्वतन्त्र हैं। अतएव वे अत्यन्त गुह्य रूप से संचित वरदान भगवत्प्रेम को बिना भेद-भाव के हर एक को वितरित कर सकते हैं।

अद्यापिह देख चैतन्य-नाम येइ लय ।कृष्ण-प्रेमे पुलकाश्रु-विह्वल से हये ॥

२२॥

चाहे कोई अपराधी हो या निर्दोष, यदि श्रीकृष्ण चैतन्य प्रभु नित्यानन्द का कीर्तन कोई अभी भी करता है, तो वह भावविभोर हो उठता है और उसकी आँखों में आँसू आ जाते हैं।

‘नित्यानन्द' बलिते हुये कृष्ण-प्रेमोदय ।। आउलाय सकल अङ्ग, अश्रु-गङ्गा वय ॥

२३ ॥

नित्यानन्द प्रभु का नाम लेने से ही मनुष्य में कृष्ण-प्रेम जागृत हो जाता है। इस प्रकार उसके सारे अंगप्रत्यंग भावातिरेक से व्याकुल हो उठते हैं और उसकी आँखों से गंगा की धारा के समान अश्रु बहने लगते हैं। कृष्ण-नाम' करे अपराधेर विचार । कृष्ण बलिले अपराधीर ना हय विकार ॥

२४॥

हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन करते समय अपराधों पर विचार किया जाता है। इसलिए केवल हरे कृष्ण का कीर्तन करने से कोई भावदशा को प्राप्त नहीं होता।

तदश्म-सारं हृदयं बतेदं । । यद्गृह्यमाणैर्हरि-नामधेयैः । न विक्रियेताथ ग्रदा विकारो ।नेत्रे जलं गात्र-रुहेषु हर्षः ॥

२५॥

यदि हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करते हुए किसी का हृदय परिवर्तित नहीं होता, उसके नेत्रों से अश्रु नहीं बहते, उसका शरीर कंपित नहीं होता, न ही उसे रोमांच होता है, तो यह समझना चाहिए कि उसका पय लोहे के समान कठोर है। ऐसा भगवन्नाम के चरणकमलों पर अपराधों के कारण होता है।

'एक' कृष्ण-नामे करे सर्व-पाप नाश ।। प्रेमेर कारण भक्ति करेन प्रकाश ॥

२६॥

निरपराध होकर हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने मात्र से सारे पाप-कर्म दूर हो जाते हैं और भगवत्प्रेम की कारणस्वरूपा शुद्ध भक्ति प्रकट होती है।

प्रेमेर उदये हय प्रेमेर विकार ।स्वेद-कम्प-पुलकादि गद्गदाश्रुधार ॥

२७॥

जब किसी में सचमुच भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति जागृत होती है, तो इससे शरीर में स्वेद, कम्पन, हृदय का स्पन्दन, वाणी का अवरोध तथा आँखों में अश्रु जैसे रूपान्तरण उत्पन्न होते हैं।

अनायासे भव-क्षय, कृष्णेर सेवन ।। एक कृष्ण-नामेर फले पाई एत धन ॥

२८॥

हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने के फलस्वरूप मनुष्य के आध्यात्मिक जीवन में इतनी अधिक उन्नति होती है कि उसके भौतिक जीवन का अन्त तथा भगवत्प्रेम की प्राप्ति एक साथ होते हैं। कृष्ण का पवित्र नाम इतना शक्तिशाली है कि केवल एक नाम के उच्चारण से उसे ये दिव्य सम्पत्ति सहज ही उपलब्ध हो जाती है।

हेन कृष्ण-नाम यदि लय बहु-बार । तबु यदि प्रेम नहे, नहे अश्रुधार ॥

२९॥

तबे जानि, अपराध ताहाते प्रचुर ।।कृष्ण-नाम-बीज ताहे ना करे अङ्कुर ॥

३०॥

। यदि भगवान् के पवित्र नाम का बारम्बार जप करते रहने पर भी मनुष्य में भगवान् के प्रति प्रेम विकसित नहीं होता और उसकी आँखों में अश्रु प्रकट नहीं होते, तो इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि जप में उसके अपराधों के फलस्वरूप कृष्ण-नाम का बीज अंकुरित नहीं हो रहा है।

चैतन्य-नित्यानन्दे नाहि एसब विचार ।नाम लेते प्रेम देन, वहे अश्रुधार ॥

३१॥

किन्तु यदि कोई थोड़ी भी श्रद्धा के साथ भगवान् चैतन्य तथा नित्यानन्द के पवित्र नामों का कीर्तन करता है, तो वह सारे अपराधों से तुरन्त ही मुक्त हो जाता है। इस तरह वह ज्योंही हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करता है, त्योंही उसे भगवत्प्रेम की भावविभोरता का अनुभव होता है।

स्वतन्त्र ईश्वर प्रभु अत्यन्त उदार ।ताँरै ना भजिले कभु ना हय निस्तार ॥

३२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु स्वतन्त्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और वे अत्यन्त दयालु हैं। उनकी पूजा किये बिना किसी को मुक्ति नहीं मिल सकती।

ओरे मूढ़ लोक, शुन चैतन्य-मङ्गल ।चैतन्य-महिमा ग्राते जानिबे सकल ॥

३३ ॥

अरे मूर्खा, जरा श्री चैतन्य-मंगल तो पढ़ो! इस ग्रंथ को पढ़कर तुम श्री चैतन्य महाप्रभु की सारी महिमाओं को समझ सकते हो।

कृष्ण-लीला भागवते कहे वेद-व्यास ।।चैतन्य-लीलार व्यास वृन्दावन-दास ॥

३४॥

। जिस तरह व्यासदेव ने श्रीमद्भागवत में कृष्ण की सारी लीलाओं का संकलन किया है, उसी तरह ठाकुर वृन्दावन दास ने चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का वर्णन किया है।

वृन्दावन-दास कैल'चैतन्य-मङ्गल' ।।याँहार श्रवणे नाशे सर्व अमङ्गल ॥

३५॥

ठाकुर वृन्दावन दास ने श्री चैतन्य-मंगल की रचना की, जिसके सुनने से सारे अमंगल नष्ट हो जाते हैं।

चैतन्य-निताइर ग्राते जानिये महिमा ।ग्राते जानि कृष्ण-भक्ति-सिद्धान्तेर सीमा ॥

३६॥

। श्री चैतन्य मंगल पढ़कर मनुष्य श्री चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु की सारी महिमाओं या सत्य को समझ सकता है और भगवान् कृष्ण की भक्ति के चरम निष्कर्ष तक पहुँच सकता है।

भागवते व्रत भक्ति-सिद्धान्तेर सार।लिखियाछेन इँहा जानि' करिया उद्धार ॥

३७॥

श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने श्री-चैतन्य-मंगल (जो बाद में श्रीचैतन्य-भागवत कहलाया) में श्रीमद्भागवत से प्रामाणिक उद्धरण देते हुए भक्ति के निष्कर्ष और सार प्रस्तुत किये हैं।

‘चैतन्य-मङ्गल' शुने ग्रदि पाषण्डी, ग्रवन ।सेह महा-वैष्णव हय ततक्षण ॥

३८॥

। यदि बड़ी से बड़ा नास्तिक भी चैतन्य मंगल को सुने, तो वह तुरन्त महान् भक्त बन जाता है।

मनुष्ये रचिते नारे ऐछे ग्रन्थ धन्य ।वृन्दावन-दास-मुखे वक्ता श्री-चैतन्य ॥

३९॥

इस पुस्तक का विषय इतना भव्य है कि लगता है मानो श्री वृन्दावन दास ठाकुर की रचना के माध्यम से साक्षात् श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं बोल रहे हों।

वृन्दावन-दास-पदे कोटि नमस्कार ।ऐछे ग्रन्थ करि' तेंहो तारिला संसार ॥

४०॥

मैं वृन्दावन दास ठाकुर के चरणकमलों पर कोटि-कोटि प्रणाम करता हूँ। उनके अतिरिक्त अन्य कोई व्यक्ति सभी पतितात्माओं के उद्धार के लिए ऐसा अद्भुत ग्रंथ नहीं लिख सकता था।

नारायणी–चैतन्येर उच्छिष्ट-भाजने ।ताँर गर्भे जन्मिला श्री-दास-वृन्दावन ॥

४१॥

नारायणी सदा चैतन्य महाप्रभु का जूठन खाया करती थी। श्रील वृन्दावन दास ठाकुर उसी की कोख से जन्मे थे।

ताँर कि अद्भुत चैतन्य-चरित-वर्णन ।ग्राहार श्रवणे शुद्ध कैल त्रिभुवन ॥

४२॥

अहा! चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का कैसा ही अद्भुत वर्णन उन्होंने दिया है। तीनों लोकों में जो भी उसे सुनता है, वह शुद्ध (पवित्र) हो जाता है।

अतएव भज, लोक, चैतन्य-नित्यानन्द ।। खण्डिबे संसार-दुःख, पाबे प्रेमानन्द ॥

४३॥

हर एक से मेरा आग्रह है कि चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु द्वारा दी गई भक्ति-विधि को अपनायें और इस तरह भौतिक संसार के दुःखों से मुक्त होकर भगवान् की प्रेमाभक्ति प्राप्त करें।

वृन्दावन-दास कैल'चैतन्य-मङ्गल' ।।ताहाते चैतन्य-लीला वर्णिल सकल ॥

४४॥

श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने चैतन्य-मंगल लिखा है और उसमें चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का पूरी तरह विस्तार से वर्णन किया है।

सूत्र करि' सब लीला करिल ग्रन्थन ।पाछे विस्तारिया ताहार कैल विवरण ॥

४५ ॥

उन्होंने सर्वप्रथम संक्षेप में महाप्रभु की लीलाएँ दी हैं और बाद में उनका विस्तार से वर्णन किया है।

चैतन्य-चन्द्रेर लीला अनन्त अपार ।वर्णिते वर्णिते ग्रन्थ हइल विस्तार ॥

४६॥

चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अनन्त तथा अगाध हैं, अतएव इन सबका वर्णन करने से यह ग्रंथ विशालकाय बन गया है।

विस्तार देखिया किछु सङ्कोच हैल मन ।।सूत्र-धृत कोन लीला ना कैल वर्णन ॥

४७॥

उन्हें इसे इतमा विस्तृत देखकर बाद में उन्हें लगा कि उनमें से कुछ का वर्णन ठीक-ठीक नहीं हो पाया है।

नित्यानन्द-लीला-वर्णने हइल आवेश ।चैतन्येर शेष-लीला रहिल अवशेष ॥

४८॥

उन्होंने नित्यानन्द प्रभु की लीलाओं का भावमय वर्णन किया है, किन्तु चैतन्य महाप्रभु की अन्त्य-लीलाएँ अनकही रह गईं।

सेइ सब लीलार शुनिते विवरण ।।वृन्दावन-वासी भक्तेर उत्कण्ठित मन ॥

४९॥

वृन्दावन के सारे भक्त इन लीलाओं को सुनने के लिए अत्यन्त उत्सुक रहते थे।

वृन्दावने कल्प-द्रुमे सुवर्ण-सदन ।महा-योगपीठ ताहाँ, रत्न-सिंहासन ॥

५०॥

। वृन्दावन नामक महान् तीर्थस्थल में कल्पवृक्ष के नीचे रत्नों से जड़ित एक सुनहला सिंहासन है।

ताते वसि' आछे सदा व्रजेन्द्र-नन्दन ।'श्री-गोविन्द-देव' नाम साक्षात्मदन ॥

५१॥

उस सिंहासन पर नन्द महाराज के पुत्र श्री गोविन्ददेव विराजमान हैं, जो दिव्य कामदेव हैं।

राज-सेवा हय ताँहा विचित्र प्रकार ।दिव्य सामग्री, दिव्य वस्त्र, अलङ्कार ॥

५२॥

वहाँ पर गोविन्द देव की नाना प्रकार से राजसी सेवा की जाती है। उनके वस्त्र, आभूषण तथा साज-सामग्री सभी दिव्य हैं।

सहस्र सेवक सेवा करे अनुक्षण ।सहस्र-वदने सेवा ना ग्राय वर्णन ॥

५३॥

गोविन्दजी के उस मन्दिर में हजारों सेवक भक्ति-भाव से सदैव भगवान् की सेवा में लगे रहते हैं। हजारों मुखों से भी इस सेवा का वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है।

सेवार अध्यक्ष---श्री-पण्डित हरिदास ।।ताँर ग्रशः-गुण सर्व-जगते प्रकाश ॥

५४॥

उस मन्दिर के मुख्य सेवक श्री हरिदास पण्डित हैं। उनके गुण तथा उनका यश सारे जगत् में प्रसिद्ध है।

सुशील, सहिष्णु, शान्त, वदान्य, गम्भीर ।मधुर-वचन, मधुर-चेष्टा, महा-धीर ॥

५५॥

वे सुशील, सहनशील, शान्त, वदान्य, गम्भीर, मृदुभाषी तथा अत्यन्त धीर थे।

सबार सम्मान-कर्ता, करेन सबार हित ।। कौटिल्य-मात्सर्य-हिंसा ना जाने ताँर चित ॥

५६॥

वे सबको सम्मान देते थे और सबकी भलाई के लिए कार्य करते थे। उनके मन में कूटनीति, ईष्र्या तथा द्वेष लेशमात्र भी नहीं थे।

कृष्णेर ये साधारण सद्गुण पञ्चाश। से सब गुणेर ताँर शरीरे निवास ॥

५७॥

उनके शरीर में भगवान् कृष्ण के पचास गुण विद्यमान थे।

ग्रस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः । हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणामनो-रथेनासति धावतो बहिः ॥

५८॥

यदि किसी में कृष्ण के प्रति अविचल भक्तिमयी श्रद्धा है, तो उसमें कृष्ण तथा सारे देवताओं के सद्गुण धीरे-धीरे प्रकट होते रहते हैं। किन्तु जिसमें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति भक्ति नहीं होती, उसमें सुयोग्यता नहीं होती, क्योंकि वह मनोकल्पना द्वारा भगवान् के बाह्य रूप भौतिक जगत् में लगा रहता है।

पण्डित-गोसाजिर शिष्य--अनन्त आचार्य ।कृष्ण-प्रेममय-तनु, उदार, सर्व-आर्य ॥

५९ ॥

अनन्त आचार्य गदाधर पण्डित के शिष्य थे। उनका शरीर सदैव भगवत्प्रेम में निमग्न रहता था। वे उदार थे और सभी प्रकार से उन्नत थे।

ताँहार अनन्त गुण के करु प्रकाश ।। ताँर प्रिय शिष्य इँह–पण्डित हरिदास ॥

६०॥

अनन्त आचार्य समस्त सद्गुणों के आगार थे। उनके बड़प्पन का अनुमान कोई नहीं लगा सकता। पण्डित हरिदास उन्हीं के प्रिय शिष्य थे।

चैतन्य-नित्यानन्दे ताँर परम विश्वास ।चैतन्य-चरिते ताँर परम उल्लास ॥

६१॥

पण्डित हरिदास को चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु में प्रगाढ़ श्रद्धा थी। अतएव उनकी लीलाओं तथा गुणों को जानने से उन्हें परम तुष्टि होती थी।

वैष्णवेर गुण-ग्राही, ना देखये दोष ।काय-मनो-वाक्ये करे वैष्णव-सन्तोष ॥

६२॥

वे वैष्णवों के सद्गुणों को सदैव स्वीकार करते थे और उनमें वे कोई दोष नहीं पाते थे। वे वैष्णवों को तुष्ट करने में ही अपना तन-मन लगाते थे।

निरन्तर शुने तेंहो 'चैतन्य-मङ्गल' ।ताँहार प्रसादे शुनेन वैष्णव-सकल ॥

६३ ॥

वे सदैव चैतन्य मंगल का पाठ सुनते थे और उनकी कृपा से अन्य सारे वैष्णव भी इसे सुना करते थे।

कथाय सभा उज्वल करे ग्रेन पूर्ण-चन्द्र ।निज-गुणामृते बाड़ाय वैष्णव-आनन्द ॥

६४॥

वे चैतन्य मंगल पढ़कर सारी वैष्णव सभा को पूर्ण चन्द्रमा की भाँति आलोकित करते थे और अपने गुणों के अमृत से उनके दिव्य आनन्द को वर्धित करते थे।

तेहो अति कृपा करि' आज्ञा कैला मोरे ।।गौराङ्गेर शेष-लीला वणिबार तरे ॥

६५॥

उन्होंने अपनी अहैतुकी कृपा से मुझे श्री चैतन्य महाप्रभु की अन्तिम लीलाओं को लिखने का आदेश दिया।

काशीश्वर गोसाजिर शिष्य–गोविन्द गोसाजि ।गोविन्देर प्रिय-सेवक ताँर सम नात्रि ॥

६६॥

वृन्दावन में भगवान् गोविन्द की सेवा में लगे पुरोहित गोविन्द गोसांई काशीश्वर गोसांई के शिष्य थे। गोविन्द अर्चाविग्रह को उनसे बढ़कर कोई अन्य सेवक प्रिय न था।

ग्रादवाचार्य गोसाजि श्री-रूपेर सङ्गी ।।चैतन्य-चरिते तेंहो अति बड़ रङ्गी ॥

६७॥

श्रील रूप गोस्वामी के नित्य पार्षद श्री यादवाचार्य गोसांई भी चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं को सुनने तथा उनका कीर्तन करने में अत्यन्त उत्साह दिखलाते थे।

पण्डित-गोसाजिर शिष्य---भुगर्भ गोसात्रि ।गौर-कथा विना आर मुखे अन्य नाइ ॥

६८॥

पण्डित गोसांई के शिष्य भूगर्भ गोसांई चैतन्य महाप्रभु सम्बन्धी कथाओं में सदैव लगे रहते थे। उसके अतिरिक्त वे और कुछ भी नहीं जानते थे।

ताँर शिष्य-गोविन्द पूजक चैतन्य-दास ।मुकुन्दानन्द चक्रवर्ती, प्रेमी कृष्णदास ॥

६९॥

इनके शिष्यों में से थे, गोविन्द अर्चाविग्रह के पुजारी चैतन्यदास, मुकुन्दानन्द चक्रवर्ती तथा महाभागवत कृष्णदास।

आचार्य-गोसाजिर शिष्य चक्रवर्ती शिवानन्द । निरवधि ताँर चित्ते चैतन्य-नित्यानन्द ॥

७० ॥

अनन्त आचार्य के शिष्यों में से शिवानन्द चक्रवर्ती हुए, जिनके हृदय में चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु निरन्तर वास करते थे।

आर व्रत वृन्दावने बैसे भक्त-गण ।शेष-लीला शुनिते सबार हैल मन ॥

७१॥

इनके अतिरिक्त वृन्दावन में अन्य अनेक महान् भक्त थे। वे सभी चैतन्य महाप्रभु की अन्तिम लीलाओं को सुनने के इच्छुक थे।

मोरे आज्ञा करिला सबे करुणा करिया ।ताँ-सबार बोले लिखि निर्लज्ज हइया ॥

७२।। इन सभी भक्तों ने कृपा करके मुझे श्री चैतन्य महाप्रभु की अन्तिम लीलाओं के सम्बन्ध में लिखने का आदेश दिया। यद्यपि मैं निर्लज्ज हूँ, किन्तु उन्हीं के आदेश से मैंने यह चैतन्य-चरितामृत लिखने का प्रयास किया है।

वैष्णवेर आज्ञा पाळा चिन्तित-अन्तरे । मदन-गोपाले गेलाँ आज्ञा मागिबारे ॥

७३॥

वैष्णवों की आज्ञा प्राप्त करने के बाद, लेकिन अपने मन में चिन्तित होने के कारण मैं वृन्दावन के मदनमोहन मन्दिर में उनकी भी आज्ञा लेने के लिए गया।

दरशन करि कैलें चरण वन्दन ।गोसाजि-दास पूजारी करे चरण-सेवन ॥

७४॥

। जब मैं मदनमोहन के मन्दिर में दर्शन करने गया, तो पुजारी गोसांई दास भगवान् के चरणों की सेवा कर रहे थे। मैंने भी भगवान् के चरणकमलों पर प्रार्थना की।

प्रभुर चरणे यदि आज्ञा मागिल ।। प्रभु-कण्ठ हैते माला खसिया पड़िल ॥

७५ ॥

जब मैंने भगवान् से आज्ञा माँगी, तो तुरन्त ही उनके गले से एक माला खिसककर नीचे आ गई।

सब वैष्णव-गण हरि-ध्वनि दिल । गोसाञि-दास आनि' माला मोर गले दिल ॥

७६ ॥

ज्योंही यह घटना घटी तो वहाँ पर खड़े सारे वैष्णवजनों ने जोर से ‘हरिबोल!' की हर्षध्वनि की और पुजारी गोसांई दास ने वह माला लाकर मेरे गले में डाल दी।

आज्ञा-माला पाञा आमार हइल आनन्द ।ताहाङिकरिनु एइ ग्रन्थेर आरम्भ ॥

७७॥

इस माला को भगवान् के आदेश के रूप में पाकर मैं अत्यधिक प्रसन्न हुआ और तुरन्त ही मैंने वहीं पर यह ग्रंथ लिखना प्रारम्भ कर दिया।

एइ ग्रन्थ लेखाय मोरे ‘मदन-मोहन' ।। आमार लिखन ग्रेन शुकेर पठन ॥

७८ ॥

वास्तव में श्रीचैतन्य चरितामृत मेरा लिखा हुआ नहीं है, अपितु श्री मदनमोहन द्वारा लिखाया गया है। मेरा लिखना तो तोते जैसा दोहराना (पुनरावृत्ति) है।

सेइ लिखि, मदन-गोपाल ये लिखाय ।।काष्ठेर पुत्तली येन कुहके नाचाये ॥

७९॥

जिस प्रकार जादूगर कठपुतली को नचाता है, उसी प्रकार मदनगोपाल मुझे जो-जो आदेश देते हैं, मैं वही लिखता हूँ।

कुलाधिदेवता मोर--मदन-मोहन । झॉर सेवक-रघुनाथ, रूप, सनातन ॥

८०॥

मैं मदनमोहन को अपने कुलदेवता के रूप में स्वीकार करता हूँ, जिनकी उपासना करने वालों में रघुनाथ दास गोस्वामी, श्री रूप गोस्वामी तथा सनातन गोस्वामी शामिल हैं।

वृन्दावन-दासेर पाद-पद्म करि' ध्यान । ताँर आज्ञा लञा लिखि ग्राहाते कल्याण ॥

८१॥

तब मैंने श्रील वृन्दावन दास ठाकुर के चरणकमलों पर प्रार्थना करके उनकी अनुमति माँगी और उनकी अनुमति पा लेने के बाद मैंने यह मंगलमय ग्रंथ लिखने का प्रयास किया है।

चैतन्य-लीलाते 'व्यास' वृन्दावन-दास ।तर कृपा विना अन्ये ना हय प्रकाश ॥

८२॥

श्रील वृन्दावन दास ठाकुर चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के प्रामाणिक लेखक हैं। अतएव उनकी कृपा के बिना इन लीलाओं का वर्णन नहीं किया जा सकता।

मूर्ख, नीच, क्षुद्र मुजि विषय-लालस ।।वैष्णवाज्ञा-बले करि एतेक साहस ॥

८३॥

मैं मूर्ख, निम्न कुल में उत्पन्न तथा क्षुद्र हूँ और सदा ही भौतिक भोग की इच्छा करता हूँ। फिर भी वैष्णवों की आज्ञा के कारण मैं इस दिव्य ग्रंथ को लिखने के लिए अत्यन्त उत्साहित हूँ।

श्री-रूप-रघुनाथ-चरणेर एइ बल ।याँर स्मृते सिद्ध हय वाञ्छित-सकल ॥

८४॥

श्री रूप गोस्वामी तथा रघुनाथदास गोस्वामी के चरणकमल ही मेरे बल के स्रोत हैं। उनके चरणकमलों के स्मरण से मनुष्य की सारी इच्छाएँ पूरी हो सकती हैं।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

८५ ॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों पर प्रार्थना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की आकांक्षा करते हुए मैं, कृष्णदास उनके चरणचिह्नों का अनुगमन करते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

TO TOP

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← चैतन्य चरितामृत की सूची