अध्याय उन्नीस: भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु का अकल्पनीय व्यवहार
वन्दे तं कृष्ण-चैतन्यं मातृ-भक्त-शिरोमणिम् । प्रलप्य मुख-सङ्घर्षी मधूद्याने ललास यः ॥
१॥
मातृभक्तों के शिरोमणि श्री चैतन्य महाप्रभु उन्मत्त की तरह बोलते तथा दीवालों पर अपना मुख रगड़ते थे। प्रेमावेश से अभिभूत होकर वे कभी-कभी अपनी लीला सम्पन्न करने के लिए जगन्नाथ-वल्लभ उद्यान में चले जाते थे। मैं उन्हें सादर नमस्कार करता हूँ।
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत आचार्य की जय हो! तथा चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! एई-मते महाप्रभु कृष्ण-प्रेमावेशे । उन्माद-प्रलाप करे रात्रि-दिवसे ॥
३ ॥
इस तरह कृष्ण-प्रेम के आवेश में श्री चैतन्य महाप्रभु उन्मत्त की तरह व्यवहार करते और रात-दिन पागल की तरह बोलते रहते।
प्रभुर अत्यन्त प्रिय पण्डित--जगदानन्द ।ग्राहार चरित्रे प्रभु पायेन आनन्द ॥
४॥
जगदानन्द पण्डित श्री चैतन्य महाप्रभु के अत्यन्त प्रिय भक्त थे। महाप्रभु को उनके कार्यों से अत्यधिक आनन्द मिलता था।
प्रति-वत्सर प्रभु ताँरे पाठान नदीयाते ।विच्छेद-दु:खिता जानि' जननी आश्वासिते ॥
५॥
उनके वियोग में अपनी माता को अत्यन्त दुःखी जानकर महाप्रभु जगदानन्द पण्डित को प्रतिवर्ष नवद्वीप भेजा करते कि वे जाकर उन्हें सान्त्वना दें।
नदीया चलह, मातारे कहिह नमस्कार ।। आमार नामे पाद-पद्म धरिह ताँहार ॥
६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगदानन्द पण्डित से कहा, आप नदिया जाओ और मेरी माता से मेरा नमस्कार कहना। मेरी ओर से उनके चरणकमलों का स्पर्श करना।
कहिह ताँहारे–‘तुमि करह स्मरण ।। नित्य आसि' आमि तोमार वन्दिये चरण ॥
७॥
मेरी ओर से उनसे कहना, ‘कृपया स्मरण रखें कि मैं प्रतिदिन यहाँ आकर आपके चरणकमलों की वन्दना करता हूँ।
ये-दिने तोमार इच्छा कराइते भोजन ।। से-दिने आसि' अवश्य करिये भक्षण ॥
८ ॥
यदि किसी दिन आप मुझे भोजन कराना चाहती हैं, मैं निश्चय ही आकर आप जो कुछ देती हैं, उसे स्वीकार करता हूँ।
तोमार सेवा छाड़ि' आमि करिलँ सन्यास ।‘बाउल' हा आमि कैलँ धर्म-नाश ॥
९॥
मैंने आपकी सेवा करना छोड़कर संन्यास व्रत धारण कर लिया है। इस तरह मैं उन्मत्त हो गया हूँ और मैंने धर्म के सिद्धान्तों को नष्ट कर दिया एइ अपराध तुमि ना ल-इह आमारे ।तोमार अधीन आमिपुत्र से तोमार ॥
१०॥
हे माता, कृपया आप इसे अपराध के रूप में न लें, क्योंकि मैं आपका पुत्र हूँ और पूर्णतया आप पर आश्रित हूँ।
नीलाचले आछि आमि तोमार आज्ञाते ।। यावत् जीब, तावतामि नारिब छाड़िते ॥
११ ॥
मैं आपके आदेशानुसार यहाँ नीलाचल, जगन्नाथपुरी में रह रहा हूँ। जब तक मैं जीवित हूँ, तब तक मैं यह स्थान नहीं छोडूंगा।
गोप-लीलाय पाइला ग्रेइ प्रसाद-वसने । मातारे पाठान ताहा पुरीर वचने ॥
१२ ॥
परमानन्द पुरी की आज्ञा का पालन करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी माता के पास वह प्रसाद-वस्त्र भेजा, जिसे भगवान जगन्नाथ ने अपनी गोपलीला के बाद छोड़ दिया था।
जगन्नाथेर उत्तम प्रसाद आनिया व्रतने । मातारे पृथक् पाठान्, आर भक्त-गणे ॥
१३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु यत्नपूर्वक जगन्नाथ जी का उत्तम कोटि का प्रसाद ले आये और उन्होंने इसे अलग-अलग थैलियों में अपनी माता तथा नदिया के भक्तों के लिए भेजा।
मातृ-भक्त-गणेर प्रभु हुन शिरोमणि ।।सन्यास करिया सदा सेवेन जननी ॥
१४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु समस्त मातृ-भक्तों में सर्वश्रेष्ठ हैं। उन्होंने संन्यास व्रत लेने के बाद भी अपनी माता की सेवा की।
जगदानन्द नदीया गिया मातारे मिलिला ।प्रभुर त निवेदने, सकल कहिला ॥
१५॥
इस तरह जगदानन्द पण्डित नदिया लौट आये और जब वे शचीमाता से मिले, तो उन्होंने उनसे महाप्रभु का नमस्कार कहा।
आचार्यादि भक्त-गणे मिलिला प्रसाद दिया। माता-ठाजि आज्ञा ल-इला मासेक रहिया ॥
१६॥
इसके बाद वे अद्वैत आचार्य इत्यादि अन्य सारे भक्तों से मिले और उन्हें जगन्नाथ जी का प्रसाद दिया। एक मास रहने के बाद उन्होंने शची माता से विदा होने की आज्ञा माँगी।
आचार ठाजि गिया आज्ञा मागिला ।आचार्य-गोसाञि प्रभुरे सन्देश कहिला ॥
१७॥
जब अद्वैत आचार्य के पास जाकर उन्होंने लौट जाने की अनुमति माँगी, तो अद्वैत प्रभु ने श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए एक सन्देश दिया।
तरजा-प्रहेली आचार्य कहेन ठारे-ठोरे । प्रभु मात्र बुझेन, केह बुझिते ना पारे ॥
१८॥
अद्वैत आचार्य ने द्विअर्थी भाषा में एक गीत लिखा था, जिसका आशय श्री चैतन्य महाप्रभु तो समझ सकते थे, किन्तु अन्य लोग नहीं समझ सकते थे।
प्रभुरे कहिह आमार कोटि नमस्कार ।एइ निवेदन ताँर चरणे आमार ॥
१९॥
इस गीत में अद्वैत प्रभु ने सर्वप्रथम श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में करोड़ों बार नमस्कार किया था। तत्पश्चात् उन्होंने उनके चरणकमलों में यह निवेदन किया था।
बाउलके कहिह,—लोक है-इल बाउल ।बाउलके कहिह,——हाटे ना विकाय चाउल ॥
२०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु, जो कि बावले की तरह अभिनय कर रहे हैं, उनसे कृपया यह कहना कि यहाँ हर व्यक्ति उन्हीं की तरह बावला हो गया है। कृपया उनसे यह भी कहना कि बाजार में अब चावल की कोई मांग नहीं है।
बाउलके कहिह,—काये नाहिक आउल ।।बाउलके कहिह,—इहा कहियाछे बाउल ॥
२१ ॥
और उन्हें कहना कि जो लोग भावावेश में बावले हैं, वे अब भौतिक जगत् में रुचि नहीं रखते। श्री चैतन्य महाप्रभु से यह भी कहना कि प्रेम में बावले हुए व्यक्ति (अद्वैत प्रभु) ने ये शब्द कहे हैं।
एत शुनि' जगदानन्द हासिते लागिला ।नीलाचले आसि' तबे प्रभुरे कहिला ॥
२२ ॥
अद्वैत आचार्य के वचन सुनकर जगदानन्द पण्डित हँसने लगे और जब वे जगन्नाथपुरी या नीलाचल लौटकर आये, तो उन्होंने चैतन्य महाप्रभु को सब सूचित कर दिया।
तरजा शुनि' महाप्रभु ईषत् हासिला ।। ताँर ग्रेइ आज्ञा' बलि' मौन धरिला ॥
२३ ॥
अद्वैत आचार्य से द्विअर्थी गीत सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु चुपकेचुपके हँसने लगे और उन्होंने कहा, यह उनका आदेश है। तब वे मौन हो गये।
जानियाओ स्वरूप गोसाञि प्रभुरे पुछिल ।‘एइ तरजार अर्थ बुझिते नारिल' ॥
२४॥
स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने रहस्य जानते हुए भी महाप्रभु से पूछा, इस गीत का क्या अर्थ है? मैं इसे समझ नहीं सका।
प्रभु कहेन,---'आचार्य हय पूजक प्रबल ।।आगम-शास्त्रेर विधि-विधाने कुशल ॥
२५ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, अद्वैत आचार्य भगवान् के महान् आराधक हैं और वे वैदिक साहित्य में निर्देशित विधि-विधानों में अत्यन्त पारंगत हैं।
उपासना लागि' देवेर करेन आवाहन । पूजा लागि' कत काल करेन निरोधन ॥
२६॥
अद्वैत आचार्य भगवान् को आने तथा पूजित होने के लिए आमन्त्रित करते हैं। वे पूजा करने के लिए अर्चाविग्रह को कुछ समय तक रखते हैं।
पूजा-निर्वाहण हैले पाछे करेन विसर्जन ।। तरजार ना जानि अर्थ, किबा ताँर मन ॥
२७॥
पूजा पूरी हो जाने पर वे अर्चाविग्रह को अन्यत्र भेज देते हैं। मैं न तो इस गीत का अर्थ जानता हूँ, न ही यह जानता हूँ कि अद्वैत प्रभु के मन में क्या है।
महा-योगेश्वर आचार्य–तरजाते समर्थ ।।आमिह बुझिते नारि तरजार अर्थ' ॥
२८॥
अद्वैत आचार्य महान् योगी हैं। उन्हें कोई नहीं समझ सकता। वे गीत लिखने में इतने पटु हैं कि मैं भी नहीं समझ पाता।
शुनिया विस्मित ह-इला सब भक्त-गण ।स्वरूप-गोसाञि किछु है-इला विमन ॥
२९॥
यह सुनकर सारे भक्त चकित हो गये, किन्तु स्वरूप दामोदर गोस्वामी तो विशेष रूप से कुछ-कुछ खिन्न हो गये।
सेइ दिन हैते प्रभुर आर दशा ह-इल । कृष्णेर विच्छेद-दशा द्विगुण बाड़िल ॥
३०॥
उस दिन से श्री चैतन्य महाप्रभु की भावदशा विशेष रूप से बदल गई। कृष्ण से वियोग की उनकी भावना द्विगुणित हो उठी।
उन्माद-प्रलाप-चेष्टा करे रात्रि-दिने । राधा-भावावेशे विरह बाड़े अनुक्षणे ॥
३१॥
चूँकि श्रीमती राधारानी के भावावेश में महाप्रभु की विरह- भावना प्रतिक्षण बढ़ती गई, अतः दिन तथा रात दोनों ही समय उनके कार्य उग्र तथा अविवेकपूर्ण होने लगे।
आचम्बिते स्फुरे कृष्णेर मथुरा-गमन । उद्धृर्णा-दशा हैल उन्मादे-लक्षण ॥
३२॥
एकाएक श्री चैतन्य महाप्रभु के भीतर भगवान् कृष्ण के मथुरा गमन का दृश्य उदय हो आया और वे उद्भूर्णा नामक उन्माद के लक्षण प्रदर्शित करने लगे।
रामानन्देर गला धरि' करेन प्रलापन । स्वरूपे पुछेन मानि' निज-सखी-गण ॥
३३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु उन्मत्त की तरह रामानन्द राय का गला पकड़कर बोलने लगे और स्वरूप दामोदर को अपनी गोपी सखी मानकर उनसे प्रश्न पूछने लगे।
पूर्वे ग्रेन विशाखारे राधिका पुछिला ।सेइ श्लोक पड़ि' प्रलाप करिते लागिला ॥
३४॥
जिस तरह श्रीमती राधारानी ने अपनी निजी सखी विशाखा से पूछा था, उसी तरह श्री चैतन्य महाप्रभु भी वही श्लोक पढ़कर उन्मत्त की तरह बोलने लगे।
क्व नन्द-कुल-चन्द्रमाः क्व शिखि-चन्द्रकालङ्कतिः | क्व मन्द्र-मुरली-रवः क्व नु सुरेन्द्र-नील-द्युतिः ।। क्व रास-रस-ताण्डवी क्व सखि जीव-रक्षौषधिर्निधिर्मम सुहृत्तमः क्व बत हन्त हा धिग्विधिम् ॥
३५॥
हे प्रिय सखी, कहाँ हैं वे कृष्ण, जो कि महाराज नन्द के कुलरूपी सागर से उदय होने वाले चन्द्रमा की तरह हैं? कहाँ हैं वे कृष्ण, जिनका सिर मोर पंख से सुशोभित है? कहाँ हैं वे? कहाँ हैं वे कृष्ण, जिनकी वंशी इतना गम्भीर स्वर उत्पन्न करती है? ओह! कहाँ हैं वे कृष्ण, जिनकी शारीरिक कान्ति इन्द्रनील मणि के समान है? कहाँ है वे कृष्ण, जो रास नृत्य में इतने निपुण हैं? ओह! कहाँ हैं वे, जो मेरे प्राण बचा सकते हैं? कृपा करके मुझे बतलाओ कि अपने जीवन के कोष तथा सर्वोत्कृष्ट मित्र कृष्ण को कहाँ पा सकती हूँ? उनसे विरह का अनुभव करती हुई मैं अपने भाग्य के निर्माता विधाता को धिक्कारती हूँ।'
व्रजेन्द्र-कुल-दुग्ध-सिन्धु, कृष्ण ताहे पूर्ण इन्दु,जन्मि' कैला जगत् उजोर । कान्त्यमृत ग्रेबा पिये, निरन्तर पिया जिये,व्रज-जनेर नयन-चकोर ॥
३६॥
महाराज नन्द का परिवार दुग्ध सागर की तरह है, जिसमें से भगवान् कृष्ण समग्र ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करने वाले पूर्ण चन्द्रमा के समान उदित हुए हैं। व्रजवासियों के नेत्र उन चकोर पक्षियों के समान हैं, जो उनकी शारीरिक द्युति के अमृत का निरन्तर पान करते हैं और इस तरह शान्तिपूर्वक जीवन बिताते हैं।
सखि हे, कोथा कृष्ण, कराह दरशन क्षणेके ग्राहार मुख, ना देखिले फाटे बुक, ।शीघ्र देखाह, ना रहे जीवन ॥
३७॥
हे प्रिय सखी, कहाँ हैं कृष्ण? कृपया मुझे उनका दर्शन करने दो। यदि क्षण भर भी मैं उनका मुख नहीं देखती, तो मेरा हृदय फटने लगता है। कृपया मुझे तुरन्त ही उन्हें दिखलाओ, अन्यथा मैं जीवित नहीं रह सकती।
एइ व्रजेर रमणी, कामार्क-तप्त-कुमुदिनी,निज-करामृत दिया दान । प्रफुल्लित करे येइ, काहाँ मोर चन्द्र सेइ,देखाह, सखि, राख मोर प्राण ॥
३८ ॥
वृन्दावन की स्त्रियाँ कामवासनाओं के सूर्य से तप्त कुमुदिनियों के तुल्य हैं। किन्तु चन्द्रमा तुल्य कृष्ण उन्हें अपने हाथों का अमृत प्रदान करके प्रफुल्लित बनाते हैं। हे प्रिय सखी, अब मेरा वह चन्द्रमा कहाँ है? मुझे उसका दर्शन कराकर मेरा जीवन बचा लो! काहाँ से चूड़ार ठाम, शिखि-पिछेर उड़ान,नव-मेघे ग्रेन इन्द्र-धनु ।। पीताम्बर–तड़ियुति, मुक्ता-माला—बक-पाँति,नवाम्बुद जिनि' श्याम-तनु ॥
३९॥
हे प्रिय सखी, कहाँ है वह सुन्दर मुकुट, जिसके ऊपर मोरपंख नवीन बादलों में इन्द्रधनुष जैसा लगता है? वह पीताम्बर कहाँ है, जो बिजली के समान चमकता है? और कहाँ है वह मोतियों का गले का हार, जिसके मोती आकाश में उड़ रहे बगुलों की पंक्ति के समान लगते हैं? कृष्ण का श्यामल शरीर श्याम रंग के नये बादलों को पराजित करने वाला है।
एक-बार ग्रार नयने लागे, सदा तार हृदये जागे, कृष्णा-तनु—येन आम्र-आठा ।। नारी-मने पैशे हाय, ग्नत्ने नाहि बाहिराय, तनु नहे,—सेया-कुलेर काँटा ॥
४० ॥
यदि किसी व्यक्ति की आँखें एक बार भी कृष्ण के सुन्दर शरीर को बन्दी बना लेती हैं, तो वह उसके हृदय के भीतर सदैव प्रमुख बना रहता है। कृष्ण का शरीर आम वृक्ष के रस के समान है, क्योंकि जब यह स्त्रियों के मनों में प्रवेश करता है, तो महान् प्रयत्न करने पर भी यह बाहर नहीं आता। इस तरह कृष्ण का अद्वितीय शरीर सेया बेर वृक्ष के काँटे के समान है।
जिनिया तमाल-द्युति, इन्द्रनील-सम कान्ति, से कान्तिते जगत्माताय ।। शृङ्गार-रस-सार छानि', ताते चन्द्र-ज्योत्स्ना सानि', | जानि विधि निरमिला ताय ॥
४१॥
कृष्ण की शारीरिक द्युति इन्द्रनीलमणि के समान चमकीली है और वह तमालवृक्ष की कान्ति को पराजित करने वाली है। उनके शरीर की कान्ति सारे जगत् को पागल बना देती है, क्योंकि विधाता ने माधुर्य प्रेम के रस के सार को परिष्कृत करके उसे चाँदनी से मिलाकर पारदर्शी बना दिया है।
काहाँ से मुरली-ध्वनि, नवाभ्र-गर्जित जिनि',जगताकर्षे श्रवणे याहार ।। उठि' धाय व्रज-जन, तृषित चातक-गण,आसि' पिये कान्त्यमृत-धार ॥
४२ ॥
कृष्ण की वंशी की गहरी ध्वनि नवीन बादलों की गर्जना को पराजित कर देती है और सारे जगत् के कानों को आकृष्ट करती है। इस तरह वृन्दावन के निवासी जब उठते हैं, तब वे तृषित पपीहों की तरह कृष्ण की शारीरिक कान्ति के अमृत की धारा को पीकर उस ध्वनि का पीछा करते हैं।
मोर सेइ कला-निधि, प्राण-रक्षा-महौषधि,सखि, मोर तेंहो सुहृत्तम ।। देह जीये ताँहा विने, धिक् एइ जीवने, विधि करे एत विड़म्बन! ॥
४३॥
कृष्ण कला तथा संस्कृति के आगार हैं और वे वह रामबाण औषधि हैं, जो मेरे जीवन को बचाती है। हे सखी, चूँकि मैं अपने मित्रों में से सर्वोत्तम मित्र के बिना जीवित हूँ, अतएव मैं अपनी आयु को धिक्कारती हूँ। मैं सोचती हूँ कि विधाता ने मुझे कई तरह से ठगा है।
'ये-जन जीते नाहि चाय, तारे केने जीयाय',विधि-प्रति उठे क्रोध-शोक । विधिरे करे भर्सन, कृष्णे देन ओलाहन,पड़ि' भागवतेर एक श्लोक ॥
४४। भला विधाता उस व्यक्ति को क्यों जीने देता है, जो जीना नहीं चाहता? इस विचार से श्री चैतन्य महाप्रभु में क्रोध तथा शोक उत्पन्न हो गया। तब उन्होंने श्रीमद्भागवत का एक श्लोक पढ़ा, जो विधाता को धिक्कारता है और कृष्ण के प्रति आक्षेप लगाता है।
अहो विधातस्तव न क्वचिद्दयासंयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिनः । तांश्चाकृतार्थान्वियुनक्ष्यपार्थकं विचेष्टितं तेऽर्भक-चेष्टितं यथा ॥
४५ ॥
हे विधाता, तुममें तनिक भी दया नहीं है! तुम पहले तो मैत्री तथा स्नेह के द्वारा देहधारी जीवों को पास-पास लाते हो, किन्तु इसके पूर्व कि उनकी इच्छाएँ पूरी हों, तुम उन्हें विलग कर देते हो। तुम्हारे कार्यकलाप बच्चों के मूर्खतापूर्ण खिलवाड़ों जैसे हैं।'
ना जानिस् प्रेम-मर्म, व्यर्थ करिस् परिश्रम, | तोर चेष्टा–बालक-समाने । तोर ग्नदि लाग् पाइये, तबे तोरे शिक्षा दिये,एमन ग्रेन ना करिस् विधान ॥
४६॥
हे विधाता, तुम प्रेम-व्यापार के मर्म को नहीं जानते, इसलिए तुमहमारे प्रयासों को व्यर्थ बना देते हो। यह तुम्हारे बचपने को बतलाता है। यदि हम तुम्हें पकड़ पायें, तो ऐसा पाठ पढ़ायें कि तुम फिर कभी ऐसी व्यवस्था न करो।
अरे विधि, तुइ बड़-इ निठुर अन्योन्य दुर्लभ जन, प्रेमे कराञ सम्मिलन, ।‘अकृतार्थान्' केने करिस् दूर? ॥
४७॥
रे क्रूर विधाता! तुम बड़े ही निष्ठुर हो, क्योंकि तुम ऐसे लोगों में प्रेम उत्पन्न करते हो, जो विरले ही एक दूसरे के सम्पर्क में आते हैं। और जब तुम उन्हें मिलाते हो, तो इसके पूर्व कि उनकी इच्छाएँ पूरी हों, उन्हें पुनः दूर दूर कर देते हो।
अरे विधि अकरुण, देखाञी कृष्णानन,नेत्र-मन लोभाइला मोर ।। क्षणेके करिते पान, काड़ि' निला अन्य स्थान,पाप कैलि दत्त-अपहार' ॥
४८॥
रे विधाता, तुम कितने निर्दय हो! तुम कृष्ण का सुन्दर मुख प्रकट करते हो और मन तथा आँखों को लुभाते हो, किन्तु वे क्षणभर भी उस अमृत का पान नहीं कर पाते कि तुम कृष्ण को दूसरे स्थान पर भगा देते हो। यह बहुत बड़ा पाप है, क्योंकि इस तरह से तुम दान दी हुई वस्तु को छीन लेते हो।
‘अक्रूर करे तोमार दोष, आमाय केने कर रोष',इहा ग्रदि कह दुराचार' ।। तुइ अक्रूर-मूर्ति धरि', कृष्ण निलि चुरि करि',अन्येर नहे ऐछे व्यवहार । ४९ ।। ऐ दुराचारी विधाता! यदि तुम हमसे कहो कि, 'अक्रूर ही सचमुच दोषी है; तुम मुझ पर क्यों क्रोधित हो? तो मैं तुमसे कहती हूँ, ‘रे विधाता, तुम्हीं ने अक्रूर का रूप धारण करके कृष्ण को चुरा लिया है। अन्य कोई व्यक्ति ऐसा व्यवहार नहीं करता।
आपनार कर्म-दोष, तोरे किबा करि रोष, तोय-मोय सम्बन्ध विदूर।। ये आमार प्राण-नाथ, एकत्र रहि याँर साथ, सेइ कृष्ण ह-इला निठुर! ॥
५०॥
किन्तु यह तो मेरे ही भाग्य का दोष है। मैं तुम पर व्यर्थ ही आक्षेप क्यों करूँ? तुम्हारे तथा मेरे बीच कोई घनिष्ठता नहीं है। किन्तु कृष्ण तो मेरे प्राण तथा आत्मा हैं। हम एक साथ रहने वाले हैं, किन्तु वे ही हैं, जो अब इतने क्रूर बन गये हैं।
सब त्यजि' भजि याँरे, सेइ आपन-हाते मारे,नारी-वधे कृष्णेर नाहि भय ।। ताँर लागि' आमि मरि, उलटि' ना चाहे हरि, | क्षण-मात्रे भाङ्गिल प्रणय ॥
५१॥
जिनके लिए मैंने अपना सब कुछ त्याग दिया, वे ही मुझे अपने हाथों से मार रहे हैं। कृष्ण को स्त्रियों का वध करते हुए कोई डर नहीं लगता। निस्सन्देह, मैं उन पर मर रही हूँ, किन्तु वे मेरी ओर मुड़कर देखते तक नहीं। उन्होंने क्षणभर में हमारे प्रेम व्यापार को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया है।
कृष्णे केने करि रोष, आपन दुर्दैव-दोष, पाकिल मोर एइ पाप-फल । ये कृष्ण–मोर प्रेमाधीन, तारे कैल उदासीन,एइ मोर अभाग्य प्रबल ॥
५२॥
फिर भी, मैं कृष्ण पर क्यों रुष्ट होऊँ? यह तो मेरे अपने दुर्भाग्य का दोष है। मेरे पापकर्मों का फल पक चुका है, इसलिए वे कृष्ण जो सदैव मेरे प्रेम के वश में रहते थे, अब मेरे प्रति उदासीन हैं। इसका अर्थ यही है। कि मेरा दुर्भाग्य अत्यन्त प्रबल है।
एइ-मत गौर-राय, विषादे करे हाय हाय, | ‘हा हा कृष्ण, तुमि गेला कति?' ।। गोपी-भाव हृदये, तार वाक्ये विलापये,‘गोविन्द दामोदर माधवेति' ॥
५३॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु विरह भाव में शोक करते, हाय, हाय! हे कृष्ण, आप कहाँ चले गये हैं? श्री चैतन्य महाप्रभु अपने हृदय में गोपियों के भावों को अनुभव करते हुए हे गोविन्द! हे दामोदर! हे माधव! जैसे उनके शब्दों से अपनी पीड़ा व्यक्त करते।
तबे स्वरूप-राम-राय, करि' नाना उपाय,महाप्रभुर करे आश्वासन । गायेन सङ्गम-गीत, प्रभुर फिराइला चित, प्रभुर किछु स्थिर हैल मने ॥
५४॥
तब स्वरूप दामोदर तथा रामानन्द राय ने महाप्रभु को सान्त्वना देने के लिए तरह-तरह के उपाय किये। उन्होंने मिलाप के गीत गाये, जिनसे उनका हृदय परिवर्तित हुआ और उनका मन शान्त हो गया।
एइ-मत विलपिते अर्ध-रात्रि गेल ।।गम्भीराते स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे शोयाइल ॥
५५॥
इस तरह से श्री चैतन्य महाप्रभु को विलाप करते-करते आधी रात बीत गई। तब स्वरूप दामोदर ने उन्हें गम्भीरा नामक कमरे में सुला दिया।
प्रभुरे शोयाजा रामानन्द गेला घरे ।।स्वरूप, गोविन्द शुइला गम्भीरार द्वारे ॥
५६॥
जब महाप्रभु को सुला दिया गया, तो रामानन्द राय अपने घर चले गये और स्वरूप दामोदर तथा गोविन्द गम्भीरा के दरवाजे पर लेट गये।
प्रेमावेशे महाप्रभुर गर-गर मन । नाम-सङ्कीर्तन करि' करेन जागरण ॥
५७ ।। श्री चैतन्य महाप्रभु का मन आध्यात्मिक आनन्द से अभिभूत था, इसलिए वे हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करते हुए सारी रात जागते रहे।
विरहे व्याकुल प्रभु उद्वेगे उठिला ।। गम्भीरार भित्त्ये मुख घषिते लागिला ॥
५८॥
भावावेश में श्री चैतन्य महाप्रभु सारी रात दीवालों पर अपना मुख रगड़ते रहे और गों गों का विचित्र शब्द निकालते रहे, जिसे स्वरूप दामोदर दरवाजे से सुन सकते थे।
मुखे, गण्डे, नाके क्षत ह-इल अपार । भावावेशे ना जानेन प्रभु, पड़े रक्त-धार ॥
५९॥
उनके मुँह, नाक तथा गालों में हुए अनेक घावों से रक्त निकलने लगा, किन्तु अपने भावावेश के कारण महाप्रभु को इसका पता नहीं चल पाया।
सर्व-रात्रि करेन भावे मुख सङ्घर्षण । गों-गों-शब्द करेन,—स्वरूप शुनिला तखन ॥
६० ॥
कृष्ण से विरह का अनुभव करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु इतने किंकर्तव्यमूढ़ हो गये कि वे उस महान् चिन्ता में उठ खड़े हुए और गम्भीरा की दीवालों पर अपना मुख रगड़ने लगे।
दीप ज्वालि' घरे गेला, देखि' प्रभुर मुख ।।स्वरूप, गोविन्द ढूँहार हैल बेड़ दुःख ॥
६१॥
तब दीपक जलाकर स्वरूप दामोदर तथा गोविन्द ने उस कमरे में प्रवेश किया। जब उन्होंने महाप्रभु का चेहरा देखा, तो दोनों ही अत्यन्त दुःखी हो गये।
प्रभुरे शय्याते आनि' सुस्थिर कराइला ।। ‘काँहे कैला एई तुमि?' स्वरूप पुछिला ॥
६२॥
वे महाप्रभु को उनके बिस्तर पर ले आये, उन्हें शान्त किया और तब पूछा, आपने अपने साथ यह क्या कर रखा है? प्रभु कहेन,–उद्वेगे घरे ना पारि रहिते । द्वार चाहि' बुलि' शीघ्र बाहिर है-इते ॥
६३ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, मैं इतने उद्वेग में था कि मैं कमरे में ठहर नहीं सकता था। मैं बाहर जाना चाहता था, इसलिए दरवाजे की खोज में कमरे में इधर-उधर घूमने लगा।
द्वार नाहि' पाा मुख लागे चारि-भिते ।क्षत हय, रक्त पड़े, ना पाई ग्राइते ॥
६४॥
दरवाजा न ढूँठ सकने के कारण मैं अपना मुँह चारों दीवारों पर पटकता रहा। इससे मेरा मुँह घायल हो गया और रक्त बहने लगा, फिर भी मैं बाहर न जा सका।
उन्माद-दशाय प्रभुर स्थिर नहे मन ।ग्रेड करे, येइ बोले सब,—उन्माद-लक्षण ॥
६५॥
उन्माद की इस अवस्था में श्री चैतन्य महाप्रभु का मन अस्थिर था। वे जो भी कहते या करते, वह सब उन्माद का लक्षण था।
स्वरूप-गोसाजि तबे चिन्ता पाइला मने । भक्त-गण लळा विचार कैला आर दिने ॥
६६॥
स्वरूप दामोदर अत्यधिक चिन्तित थे, किन्तु तभी उनके मन में एक विचार आया। अगले दिन, उन्होंने अन्य भक्तों से मिलकर इस पर विचार किया।
सब भक्त मेलि' तबे प्रभुरे साधिल ।।शङ्कर-पण्डिते प्रभुर सङ्गे शोयाइल ॥
६७ ॥
परस्पर विचार-विमर्श करने के बाद सबों ने श्री चैतन्य महाप्रभु से विनती की कि वे अपने साथ उस कमरे में शंकर पंडित को भी लेटने दें।
प्रभु-पाद-तले शङ्कर करेने शयन ।प्रभु ताँर उपर करेन पाद-प्रसारण ॥
६८ ॥
इस तरह शंकर पंडित श्री चैतन्य महाप्रभु के पाँवों के पास लेटता और महाप्रभु अपने पाँव शंकर के शरीर पर रखते।
‘प्रभु-पादोपाधान' बलि' ताँर नाम ह-इल ।पूर्वे विदुरे ग्रेन श्री-शुक वर्णिल ॥
६९ ॥
शंकर प्रभु-पादोयधान अर्थात् श्री चैतन्य महाप्रभु का तकिया के नाम से प्रसिद्ध हुए। वे विदुर के समान थे, जैसाकि शुकदेव गोस्वामी इसके पूर्व उनका वर्णन कर चुके हैं।
इति ब्रुवाणं विदुरं विनीतं | सहस्र-शीर्णश्चरणोपधानम् ।। प्रहृष्ट-रोमा भगवत्कथायांप्रणीयमानो मुनिरभ्यचष्ट ॥
७० ॥
जब भगवान् कृष्ण के चरणों के रखने के स्थान रूप विनीत विदुर जी मैत्रेय से इस प्रकार कह चुके, तो मैत्रेय ने बोलना प्रारम्भ किया। भगवान् कृष्ण विषयक कथाओं की चर्चा से उत्पन्न दिव्य आनन्द के कारण उनको रोमांच हो आया।
शङ्कर करेन प्रभुर पाद-सम्वाहन । घुमाञा पड़ेन, तैछे करेन शयन ॥
७१॥
शंकर श्री चैतन्य महाप्रभु के पाँव दबाते, किन्तु पाँव दबाते-दबाते सोने लगते और इस प्रकार लेट जाते।
उघाड़-अङ्गे पड़िया शङ्कर निद्रा ग्राय ।। प्रभु उठि' आपन-काँथा ताहारे जड़ाय ॥
७२॥
वे शरीर को बिना ढ़के ही सोते रहते और श्री चैतन्य महाप्रभु जगकर उन पर अपनी रजाई डाल देते।
निरन्तर घुमाय शङ्कर शीघ्र-चेतन । वसि' पाद चापि' करे रात्रि-जागरण ॥
७३॥
शंकर पंडित सदा सो तो जाते थे, किन्तु शीघ्र ही जागकर बैठ जाते और पुनः श्री चैतन्य महाप्रभु के पाँव दबाने लगते। इस तरह वे पूरी रात जागते रहते।
ताँर भये नारेन प्रभु बाहिरे ग्राइते । ताँर भये नारेन भित्त्ये मुखाब्ज घषिते ॥
७४॥
शंकर के भय से श्री चैतन्य महाप्रभु न तो अपना कमरा छोड़ते, न ही अपने कमल सदृश मुँह को दीवालों पर रगड़ते।
एइ लीला महाप्रभुर रघुनाथ-दास । गौराङ्ग-स्तव-कल्पवृक्षे करियाछे प्रकाश ॥
७५ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की इस लीला का बहुत ही सुन्दर वर्णन रघुनाथ दास गोस्वामी ने अपनी पुस्तक 'गौराङ्ग स्तव कल्पवृक्ष' में किया है।
स्वकीयस्य प्राणार्बुद-सदृश-गोष्ठस्य विरहात्प्रलापानुन्मादात्सततमति कुर्वन्विकल-धीः ।दधद्भित्तौ शश्वद्वदन-विधु-घर्षेण रुधिरं | क्षतोत्थं गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥
७६ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु अपने प्राणतुल्य वृन्दावन अनेक मित्रों के विरह के कारण उन्मत की तरह बातें करते। उनकी बुद्धि विकृत हो गई थी। वे दिन-रात अपने चन्द्रमा सदृश मुखड़े को दीवालों पर रगड़ते, जिससे घावों से रक्त बहता रहता। ऐसे श्री चैतन्य महाप्रभु मेरे हृदय में उदित हों और मुझे प्रेम से उन्मत्त कर दें।
एइ-मत महाप्रभु रात्रि-दिवसे ।।प्रेम-सिन्धु-मग्न रहे, कभु डुबे, भासे ॥
७७॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु रात-दिन कृष्ण के प्रेम रूपी सिन्धु में मग्न रहते। कभी वे डूबे रहते और कभी तैरते रहते।
एक-काले वैशाखेर पौर्णमासी-दिने ।रात्रि-काले महाप्रभु चलिला उद्याने ॥
७८ ॥
एक बार वैशाख (अप्रैल-मई) मास की पूर्णमासी की रात में श्री चैतन्य महाप्रभु एक उद्यान में गये।
‘जगन्नाथ-वल्लभ' नाम उद्यान-प्रधाने ।।प्रवेश करिला प्रभु ला भक्त-गणे ॥
७९॥
महाप्रभु अपने भक्तों सहित जगन्नाथ-वल्लभ नामक सुन्दरतम उद्यान में प्रविष्ट हुए।
प्रफुल्लित वृक्ष-वल्ली,—ग्रेन वृन्दावन ।शुक, शारी, पिक, भृङ्ग करे आलापन ॥
८० ॥
इस उद्यान में फूलों से लदे वृक्ष तथा लताएँ वृन्दावन जैसे ही थे। भौंरे, शुक, शारी एवं पिक पक्षी एक दूसरे से बातें कर रहे थे।
पुष्प-गन्ध लञा वहे मलय-पवन ।।'गुरु' हा तरु-लताय शिखाय नाचन ॥
८१॥
मन्द पवन सुगन्धित पुष्पों की गन्ध लेकर बह रही थी। यह पवन गुरु बनकर सारे वृक्षों तथा लताओं को नृत्य सिखा रही थी।
पूर्ण-चन्द्र-चन्द्रिकाये परम उज्ज्वल ।तरु-लतादि ज्योत्स्नाय करे झलमल ॥
८२॥
पूर्ण चन्द्रमा के तेज से प्रकाशित सारे वृक्ष तथा लताएँ प्रकाश में झलमला रहे थे।
छ्य ऋतु-गण ग्राहाँ वसन्त प्रधान ।।देखि' आनन्दित हैला गौर भगवान् ॥
८३॥
ऐसा लग रहा था मानो वहाँ पर छहों ऋतुएँ, विशेषतया वसन्त ऋतु, उपस्थित हों। उस उद्यान को देखकर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए।
ललित-लवङ्ग-लता पद गाओयाजा ।। नृत्य करि' बुलेन प्रभु निज-गण लञा ॥
८४॥
इस वातावरण में महाप्रभु ने अपने संगियों से 'ललित लवंगलता' से प्रारम्भ होने वाला 'गीत गोविन्द' का श्लोक गाने को कहा और वे स्वयं नृत्य करने लगे तथा उनके साथ चारों ओर घूमने लगे।
प्रति-वृक्ष-वल्ली ऐछे भ्रमिते भ्रमिते ।। अशोकेर तले कृष्णे देखेन आचम्बिते ॥
८५॥
इस तरह वे प्रत्येक वृक्ष तथा लता के चारों ओर घूमते हुए अशोक वृक्ष के नीचे आये और सहसा उन्होंने भगवान् कृष्ण को देखा।
कृष्ण देखि' महाप्रभु धाबा चलिला ।।आगे देखि' हासि' कृष्ण अन्तर्धान ह-इला ॥
८६॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण को देखा, तो वे तेजी से दौड़ने लगे, किन्तु कृष्ण स्मितहास्य करते हुए अदृश्य हो गये।
आगे पाइला कृष्णे, तरै पुनः हाराजा ।भूमेते पड़िला प्रभु मूर्च्छित हा ॥
८७॥
पहले कृष्ण को पाने तथा उसके बाद पुनः उन्हें खो देने से श्री चैतन्य महाप्रभु अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े।
कृष्णेर श्री-अङ्ग-गन्धे भरिछे उद्याने ।सेइ गन्ध पाञा प्रभु हैला अचेतने ॥
८८ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य शरीर की सुगन्ध से सारा उद्यान भर गया। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस सुगन्ध को सँघा, तो वे तुरन्त अचेत हो गये।
निरन्तर नासाय पशे कृष्ण-परिमले ।। गन्ध आस्वादिते प्रभु ह-इला पागल ॥
८९॥
किन्तु कृष्ण के शरीर की सुगन्ध उनके नथुनों में निरन्तर प्रवेश कर रही थी और महाप्रभु उसका आस्वादन करने के लिए उन्मत्त हो रहे थे।
कृष्ण-गन्ध-लुब्धा राधा सखीरे ये कहिला । सेइ श्लोक पड़ि' प्रभु अर्थ करिला ॥
९०॥
श्रीमती राधारानी ने अपनी गोपी सखियों से एक बार बतलाया कि वे किस तरह कृष्ण के शरीर की दिव्य सुगन्ध के लिए लालायित हो रही हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसी श्लोक को पढ़ा और उसका अर्थ स्पष्ट किया।
कुरङ्ग-मद-जिद्वपुः-परिमलोर्मि-कृष्टाङ्गनःस्वकाङ्ग-नलिनाष्टके शशि-युताब्ज-गन्ध-प्रथः । मदेन्दुवर-चन्दनागुरु-सुगन्धि-चर्चार्चित:स मे मदन मोहनः सखि तनोति नासा-स्पृहाम् ॥
९१॥
कृष्ण के दिव्य शरीर की सुगन्ध कस्तूरी की सुगन्ध को भी पराजित करने वाली और समस्त स्त्रियों के मनों को आकृष्ट करने वाली है। उनके शरीर के कमल समान आठ अंग कमल के साथ कपूर की मिश्रित सुगन्ध को वितरित करते हैं। उनके शरीर पर कस्तूरी, कपूर, चन्दन तथा अगुरु जैसी सुगन्धित वस्तुओं का लेप लगा हुआ है। हे सखी, ऐसे भगवान्, जो कि मदनमोहन भी कहे जाते हैं, सदैव मेरे नथुनों की इच्छा को वर्धित करते हैं।
कस्तूरिका-नीलोत्पल, तार येइ परिमल,ताहा जिनि' कृष्ण-अङ्ग-गन्ध । व्यापे चौद्द-भुवने, करे सर्व आकर्षणे, नारी-गणेर आङ्खि करे अन्ध ॥
९२ ॥
कृष्ण के शरीर की सुगन्ध कस्तूरी तथा नीलकमल के फूलों की सुगन्ध को पराजित करने वाली है। चौदहों लोकों में फैलकर यह हर एक को आकृष्ट करती है और समस्त स्त्रियों के नेत्रों को अन्धा बनाती है।
सखि हे, कृष्ण-गन्ध जगत्माताय नारीर नासाते पशे, सर्व-काल ताहाँ वैसे, ।कृष्ण-पाश धरि लञा ग्राय ॥
९३॥
हे प्रिय सखी, कृष्ण के शरीर की सुगन्ध सारे जगत् को मोहित करती है। विशेषतया स्त्रियों के नथुनों में प्रविष्ट होकर यह वहीं पर रुकजाती है। इस तरह यह उन्हें बन्दी बनाकर बलपूर्वक कृष्ण के पास ले आती है।
नेत्र-नाभि, वदन, कर-युग चरण,एइ अष्ट-पद्म कृष्ण-अङ्गे।। कर्पूर-लिप्त कमल, तार ट्रैछे परिमल, सेइ गन्ध अष्ट-पद्म-सङ्गे ॥
९४॥
कृष्ण की आँखें, नाभि तथा मुँह, हाथ तथा पैर-ये उनके शरीर पर आठ कमलपुष्पों के समान हैं। इन आठों कमलों से कपूर तथा कमल की मिली-जुली सुगन्ध निकलती है। यह सुगन्ध उनके शरीर से सम्बन्धित हैं।
हेम-कीलित चन्दन, ताहा करि' घर्षण,ताहे अगुरु, कुङ्कुम, कस्तूरी ।। कर्पूर-सने चर्चा अङ्गे, पूर्व अङ्गेर गन्ध सङ्गे,मिलि' तारे ग्रेन कैल चुरि ॥
९५॥
जब चन्दन को अगुरु, कुंकुम, कस्तूरी तथा कपूर के साथ मिलाकर कृष्ण के शरीर पर लेप किया जाता है, तो यह कृष्ण की मूल शारीरिक सुगन्ध के साथ मिल जाता है और उसे आच्छादित करता प्रतीत होता है।
हरे नारीर तनु-मन, नासा करे घूर्णन,खसाय नीवि, छुटाय केश-बन्ध । करिया आगे बाउरी, नाचाय जगत् नारी,हेन डाकातिया कृष्णाङ्ग-गन्ध ॥
९६ ।। कृष्ण के दिव्य शरीर की सुगन्ध इतनी आकर्षक है कि यह सारीस्त्रियों के शरीरों तथा मनों को मोह लेती है। यह उनके नथुनों को भ्रमित करती है, उनके कटिबन्धों तथा केशों को शिथिल बनाती है और उन्हें उन्मत्त करती है। विश्वभर की स्त्रियाँ इसके प्रभाव में आ जाती हैं, इसीलिए कृष्ण के शरीर की सुगन्ध एक डाकू के समान है।
सेइ गन्ध-वश नासा, सदा करे गन्धेर आशा, कभु पाय, कभु नाहि पाय ।। पाइले पिया पेट भरे, पिङपिङतबु करे,ना पाइले तृष्णाय मरि' ग्राय ॥
९७॥
इसके पूर्ण प्रभाव में आकर नथुने इसके लिए निरन्तर लालायित रहते हैं, यद्यपि वे कभी इसे प्राप्त कर पाते है, तो कभी नहीं भी कर पाते। किन्तु जब वे इसे पाते हैं, तो जी भरकर पान करते हैं, यद्यपि वे और अधिक की चाह करते हैं। किन्तु यदि वे नहीं पाते, तो तृष्णा के मारे मर जाते हैं।
मदन-मोहन-नाट, पसारि गन्धेर हाट,जगन्नारी-ग्राहके लोभाय । विना-मूल्ये देय गन्ध, गन्ध दिया करे अन्ध,घर ग्राइते पथ नाहि पाय ॥
९८॥
अभिनेता मदनमोहन ने सुगन्ध की दूकान खोल रखी है और यह सुगन्ध विश्वभर की स्त्रियों को ग्राहक के रूप में आकृष्ट करती है। वे इस सुगन्ध को नि:शुल्क बाँटते हैं, किन्तु यह सारी स्त्रियों को इस तरह अन्धा बना देती है कि वे घर लौटने का मार्ग तक ढूंढ नहीं पातीं।
एइ-मत गौरहरि, गन्धे कैल मन चुरि,भृङ्ग-प्राय इति-उति धाय ।। ग्राय वृक्ष-लता-पाशे, कृष्ण स्फुरे सेइ आशे,कृष्ण ना पाय, गन्ध-मात्र पाय ॥
९९ ॥
इस तरह कृष्ण के शरीर की सुगन्ध ने श्री चैतन्य महाप्रभु का मन चुरालिया, जिससे वे भौंरे की तरह इधर-उधर दौड़ने लगे। वे वृक्षों तथा लताओं के पास इस आशा से दौड़ जाते कि भगवान् कृष्ण प्रकट होंगे, किन्तु उनको केवल कृष्ण के शरीर की सुगन्ध ही प्राप्त हो पाती।
स्वरूप-रामानन्द गाय, प्रभु नाचे, सुख पाय,एइ-मते प्रातःकाल हैल ।। स्वरूप-रामानन्द-राय, करि नाना उपाय, महाप्रभुर बाह्य-स्फूर्ति कैल ॥
१००॥
।स्वरूप दामोदर तथा रामानन्द राय दोनों ही महाप्रभु के लिए गाने लगे और महाप्रभु नृत्य करने लगे। वे प्रातः होने तक सुख का आनन्द लेते रहे। तब महाप्रभु को दोनों पार्षदों ने महाप्रभु की बाह्य चेतना जगाने के लिए उपाय सोचा।
मातृ-भक्ति, प्रलापन, भित्त्ये मुख-घर्षण,कृष्ण-गन्ध-स्फूर्ये दिव्य-नृत्य ।।एइ चारि-लीला-भेदे, गाइल एइ परिच्छेदे,कृष्णदास रूप-गोसाजि-भृत्य ॥
१०१॥
इस तरह श्रील रूप गोस्वामी का दास मैं, कृष्णदास, ने इस अध्याय में महाप्रभु की चार प्रकार की लीलाओं का गान किया है-महाप्रभु की मातृभक्ति, उनके पागलपन के शब्द, रात में दीवालों पर उनका मुख रगड़ना तथा भगवान् कृष्ण की सुगन्ध प्रकट होने पर उनका नृत्य करना।
एइ-मत महाप्रभु पाञा चेतन ।स्नान करि' कैल जगन्नाथ-दरशन ॥
१०२॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु को फिर से बाह्य चेतना आ गई। तब उन्होंने स्नान किया और वे भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करने गये।
अलौकिक कृष्ण-लीला, दिव्य-शक्ति तार ।। तर्केर गोचर नहे चरित्र ग्नाहार ॥
१०३॥
भगवान् कृष्ण की लीलाएँ अलौकिक तथा दिव्य शक्ति से ओतप्रोत हैं। ऐसी लीलाओं की विशेषता है कि वे तर्क की परिधि में नहीं आतीं।
एइ प्रेम सदा जागे ग्राहार अन्तरे । ण्डितेह तार चेष्टा बुझिते ना पारे । १०४॥
जब किसी के हृदय में कृष्ण का दिव्य प्रेम जागृत होता है, तब बड़े से बड़ा विद्वान भी उस व्यक्ति के कार्यकलापों को नहीं समझ सकता।
धन्यस्यायं नवः प्रेमा यस्योन्मीलति चेतसि ।। अन्तर्वाणीभिरप्यस्य मुद्रा सुष्ठ सु-दुर्गमा ॥
१०५॥
जिस महान् व्यक्ति के हृदय में भगवत्प्रेम का उदय हुआ हो, उसके कार्यों तथा लक्षणों को बड़े से बड़ा विद्वान भी नहीं समझ सकता।
अलौकिक प्रभुर चेष्टा’, ‘प्रलाप' शुनिया । तर्क ना करिह, शुन विश्वास करिया ॥
१०६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यकलाप, विशेषतया उन्मत्त की तरह उनका बोलना निस्सन्देह असामान्य हैं। अतएव जो भी इन लीलाओं को सुने, उसे चाहिए कि संसारी तर्क न करे। उसे इन लीलाओं का पूरी श्रद्धापूर्वक श्रवण मात्र करना चाहिए।
इहार सत्यत्वे प्रमाण श्री-भागवते । श्री-राधार प्रेम-प्रलाप 'भ्रमर-गीता'ते ॥
१०७॥
इन बातों के सत्य होने की प्रामाणिकता 'श्रीमद्भागवत' में प्राप्त है। दशम दसवें के 'भ्रमर गीत' नामक अध्याय में श्रीमती राधारानी कृष्ण के प्रेमावेश में उन्मत्त जैसी बातें करती हैं।
महिषीर गीत ग्रेन 'दशमे र शेषे । पण्डिते ना बुझे तार अर्थ-विशेषे ॥
१०८॥
श्रीमद्भागवत के दसवें स्कन्ध के अन्त में वर्णित द्वारका की रानियों के गीत विशेष अर्थपूर्ण हैं। उन्हें बड़े-बड़े पंडित भी नहीं समझ पाते।
महाप्रभु-नित्यानन्द, दोंहार दासेर दास ।। ग्रारे कृपा करेन, तार हय इथे विश्वास ॥
१०९॥
यदि कोई व्यक्ति श्री चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु के दासों का दास बन जाता है और उनकी कृपा प्राप्त कर लेता है, तो वह इन सारी बातों पर विश्वास कर सकता है।
श्रद्धा करि, शुन इहा, शुनिते महा-सुख । खण्डिबे आध्यात्मिकादि कुतर्कादि-दुःख ॥
११०॥
इन कथाओं को श्रद्धापूर्वक सुनने का प्रयास करो, क्योंकि इनके सुनने में भी परम आनन्द होता है। इसे सुनने से शरीर, मन तथा अन्य जीवों से सम्बन्धित सारे कष्ट नष्ट हो जायेंगे और उसी के साथ मिथ्या तर्को का दुःख भी दूर हो जायेगा।
चैतन्य-चरितामृत—नित्य-नूतन ।शुनिते शुनिते जुड़ाय हृदय-श्रवण ॥
१११॥
श्री चैतन्य चरितामृत नित्य नवीन है। इसको बार-बार सुनने से मनुष्य के हृदय तथा कान शान्त होते हैं।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे ग्रार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
११२॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए उनके चरणचिह्नों पर चलकर, मैं कृष्णदास, श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
