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अध्याय छह: श्री अद्वैत आचार्य की महिमा

वन्दे तं श्रीमदद्वैता-चार्यमद्भुत-चेष्टितम् । ग्रस्य प्रसादादज्ञोऽपि तत्स्वरूपं निरूपयेत् ॥

१॥

मैं श्री अद्वैत आचार्य को सादर नमस्कार करता हूँ, जिनके सारे कार्यकलाप अद्भुत हैं। उनकी कृपा से मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति भी उनके गुणों का वर्णन कर सकता है।

जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! नित्यानन्द प्रभु की जय हो! । अद्वैत आचार्य की जय हो! और श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो! पञ्च श्लोके कहिल श्री-नित्यानन्द-तत्त्व ।।श्लोक-द्वये कहि अद्वैताचार्येर महत्त्व ।। ३ ॥

मैंने पाँच श्लोकों में श्री नित्यानन्द प्रभु के तत्त्व का वर्णन किया है। अब अगले दो श्लोकों में मैं श्री अद्वैत आचार्य की महिमा का वर्णन करूंगा।

महा-विष्णुर्जगत्कर्ता मायया ग्नः सृजत्यदः । तस्यावतार एवायमद्वैताचार्य ईश्वरः ॥

४॥

भगवान् अद्वैत आचार्य महाविष्णु के अवतार हैं, जिनका मुख्य कार्य है माया द्वारा जगत् की सृष्टि करना।

अद्वैतं हरिणाद्वैतादाचा भक्ति-शंसनात् । भक्तावतारमीशं तमद्वैताचार्यमाश्रये ॥

५॥

वे भगवान् हरि से अभिन्न हैं, अतएव वे अद्वैत कहलाते हैं और वे भक्ति सम्प्रदाय का प्रसार करते हैं, अतः वे आचार्य कहलाते हैं। वे भगवान् हैं और भगवान् के भक्त-अवतार हैं, इसलिए मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ।

अद्वैत-आचार्य गोसाञि साक्षातीश्वर । याँहार महिमा नहे जीवेर गोचर ॥

६ ॥

महा-विष्णु सृष्टि करेन जगदादि कार्य ।ताँर अवतार साक्षातद्वैत आचार्य ॥

७॥

ब्रह्माण्डों की सृष्टि का सारा कार्य महाविष्णु करते हैं। श्री अद्वैत आचार्य उनके प्रत्यक्ष अवतार हैं।

ये पुरुष सृष्टि-स्थिति करेन मायाय ।अनन्त ब्रह्माण्ड सृष्टि कोन लीलाय ॥

८॥

वे ही पुरुष अपनी बहिरंगा शक्ति से सृजन और पालन करते हैं। वे अपनी लीलाओं के रूप में असंख्य ब्रह्माण्डों की सृष्टि करते हैं।

इच्छाय अनन्त मूर्ति करेन प्रकाश । एक एक मूर्ते करेन ब्रह्माण्डे प्रवेश ॥

९॥

वे अपनी इच्छा से अपने आपको असंख्य रूपों में प्रकट करते हैं और इन रूपों के द्वारा वे प्रत्येक ब्रह्माण्ड में प्रवेश करते हैं।

से पुरुषेर अंश—अद्वैत, नाहि किछु भेद ।। शरीर-विशेष ताँर--नाहिक विच्छेद ॥

१०॥

श्री अद्वैत आचार्य उन पुरुष के अंश हैं, अतएव वे उनसे भिन्न नहीं हैं। निस्सन्देह, श्री अद्वैत आचार्य पृथक् नहीं, अपितु उन पुरुष के अन्य रूप हैं।

सहाय करेन ताँर लइया ‘प्रधान' ।। कोटि ब्रह्माण्ड करेन इच्छाय निर्माण ॥

११ ॥

( अद्वैत आचार्य) पुरुष की लीलाओं में सहायक बनते हैं, जिनकी भौतिक शक्ति तथा जिनकी इच्छा से वे असंख्य ब्रह्माण्डों का निर्माण करते हैं।

जगत्मङ्गल अद्वैत, मङ्गल-गुण-धाम ।।मङ्गल-चरित्र सदा, 'मङ्गल' याँर नाम ॥

१२॥

श्री अद्वैत आचार्य सारे जगत् के लिए मंगलकारी हैं, क्योंकि वे समस्त मंगल गुणों के आगार हैं। उनके लक्षण, कार्य तथा नाम सदैव मंगलकारी है। कोटि अंश, कोटि शक्ति, कोटि अवतार ।एत ला सृजे पुरुष सकल संसार ॥

१३॥

महाविष्णु अपने कोटि-कोटि अंशों, शक्तियों तथा अवतारों से सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि करते हैं।

माया यैछे दुइ अंश--‘निमित्त', ‘उपादान' । माया–‘निमित्त'-हेतु, उपादान–प्रधान' ॥

१४॥

पुरुष ईश्वर ऐछे द्वि-मूर्ति हइया ।। विश्व-सृष्टि करे ‘निमित्त' 'उपादान' लञा ॥

१५ ॥

। जिस प्रकार बहिरंगा शक्ति के दो भाग होते हैं-निमित्त तथा उपादान; माया निमित्त कारण और प्रधान उपादान कारण है। उसी तरह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु भी निमित्त तथा उपादान कारणों के आधार पर भौतिक जगत् की सृष्टि करने के लिए दो स्वरूप धारण करते हैं।

आपने पुरुष-विश्वेर 'निमित्त'-कारण । अद्वैत-रूपे उपादान' हन नारायण ॥

१६॥

स्वयं भगवान् विष्णु भौतिक जगत् के निमित्त कारण हैं और श्री अद्वैत के रूप में नारायण उपादान या भौतिक कारण हैं।

‘निमित्तांशे' करे तेंहो मायाते ईक्षण ।। ‘उपादान' अद्वैत करेन ब्रह्माण्ड-सृजन ॥

१७॥

भगवान् विष्णु अपने निमित्त अंश के रूप में भौतिक शक्ति के ऊपर दृष्टिपात करते हैं और श्री अद्वैत उपादान कारण के रूप में भौतिक जगत् की सृष्टि करते हैं।

यद्यपि साङ्ख्य माने, ‘प्रधान'–कारण ।जड़ हइते कभु नहे जगत्सृजन ॥

१८॥

। यद्यपि सांख्य दर्शन मानता है कि भौतिक अवयव ही कारण हैं, किन्तु जगत् की सृष्टि कभी भी मृत पदार्थ से नहीं होती।

निज सृष्टि-शक्ति प्रभु सञ्चारे प्रधाने ।।ईश्वरेर शक्त्ये तबे हये त' निर्माणे ॥

१९॥

भगवान् अपनी सृजन शक्ति द्वारा भौतिक अवयवों को संचारित करते हैं। इसके बाद भगवान् की शक्ति से सृष्टि-कार्य सम्पन्न होता है।

अद्वैत-रूपे करे शक्ति-सञ्चारण ।।अतएव अद्वैत हयेन मुख्य कारण ॥

२०॥

। अद्वैत के रूप में वे भौतिक अवयवों ( उपादानों) में सृजन शक्ति का संचार करते हैं। अतएव अद्वैत ही सृष्टि के मूल कारण हैं।

अद्वैत-आचार्य कोटि-ब्रह्माण्डेर कर्ता ।आर एक एक मूर्ये ब्रह्माण्डेर भर्ता ॥

२१॥

श्री अद्वैत आचार्य कोटि-कोटि ब्रह्माण्डों के स्रष्टा हैं और अपने विस्तार ( गर्भोदकशायी विष्णु) द्वारा वे प्रत्येक ब्रह्माण्ड का पालन करते है।

सेइ नारायणेर मुख्य अङ्ग–अद्वैत ।।‘अङ्ग'-शब्दे अंश करि' कहे भागवत ॥

२२॥

श्री अद्वैत नारायण के मुख्य अंग हैं। श्रीमद्भागवत' में “अंग” को ही भगवान् का “पूर्ण अंश' कहा गया है।

नारायणस्त्वं न हि सर्व-देहिनाम्आत्मास्यधीशाखिल-लोक-साक्षी । नारायणोऽङ्गं नर-भू-जलायनात्तच्चापि सत्यं न तवैव माया ॥

२३॥

हे समस्त प्रभुओं के प्रभु, आप समस्त सृष्टि को देखने वाले हैं। आप हर एक को प्राणों से प्रिय हैं। इसलिए क्या आप मेरे पिता नारायण नहीं हैं?'नारायण' वे हैं, जिनका आवास नर ( गर्भोदकशायी विष्णु ) से उत्पन्न जल में है और वही नारायण आपके पूर्ण अंश हैं। आपके सारे पूर्ण अंश दिव्य हैं। वे परम पूर्ण हैं और माया द्वारा रचित नहीं हैं।

ईश्वरेर 'अङ्ग' अंश चिदानन्द-मय ।मायार सम्बन्ध नाहि' एइ श्लोके कय ॥

२४॥

यह श्लोक बतलाता है कि भगवान् के सारे अंग तथा पूर्ण अंश आध्यात्मिक हैं। उनका भौतिक शक्ति (माया) से कोई सम्बन्ध नहीं है।

‘अंश' ना कहिया, केने कह ताँरे ‘अङ्ग' ।। 'अंश' हैते ‘अङ्ग' झाते हय अन्तरङ्ग ॥

२५॥

तब श्री अद्वैत को अंश न कहकर अंग क्यों कहा गया? इसका कारण है कि 'अंग' अधिक घनिष्ठता का सूचक है।

महा-विष्णुर अंश—अद्वैत गुण-धाम ।ईश्वरे अभेद, तेञि 'अद्वैत' पूर्ण नाम ॥

२६॥

समस्त सद्गु णों के आगार श्री अद्वैत महाविष्णु के प्रमुख अंग हैं। उनका पूरा नाम अद्वैत है, क्योंकि वे सभी प्रकार से उन भगवान् से अभिन्न हैं।

पूर्वे ग्रैछे कैल सर्व-विश्वेर सृजन ।।अवतरि' कैल एबे भक्ति-प्रवर्तन ॥

२७॥

जिस तरह पूर्वकाल में उन्होंने ब्रह्माण्डों की रचना की थी, उसी तरह अब वे भक्ति-पथ का सूत्रपात करने के लिए अवतरित हुए हैं।

जीव निस्तारिल कृष्ण-भक्ति करि' दान ।। गीता-भागवते कैल भक्तिर व्याख्यान ॥

२८॥

उन्होंने सारे जीवों को कृष्ण-भक्ति का उपहार देकर उनका उद्धार किया। उन्होंने भक्ति के प्रकाश में 'भगवद्गीता' तथा 'श्रीमद्भागवत की व्याख्या की।

भक्ति-उपदेश विनु ताँर नाहि कार्य ।। अतएव नाम है 'अद्वैत आचार्य' ॥

२९॥

उनके पास भक्ति की शिक्षा देने के अतिरिक्त अन्य कोई कार्य नहीं है, अतएव उनका नाम अद्वैत आचार्य है।

वैष्णवेर गुरु तेंहो जगतेर आग्ने । दुइ-नाम-मिलने हैल 'अद्वैत-आचार्य' ॥

३०॥

। उनके पार्षदों के शारीरिक रूप भी भगवान् जैसे होते हैं। उन सबके चार हाथ होते हैं और वे नारायण की तरह पीताम्बर धारण करते हैं।

कमल-नयनेर तेंहो, य़ाते 'अङ्ग' 'अंश' । ‘कमलाक्ष' करि धरे नाम अवतंस ॥

३१ ॥

। चूँकि वे कमलनयन परमेश्वर के अंग या अंश हैं, इसलिए उनका नाम कमलाक्ष भी है।

ईश्वर-सारूप्ये पाय पारिषद-गण । चतुर्भुज, पीत-वास, ग्रैछे नारायण ॥

३२॥

वे समस्त भक्तों के गुरु हैं और संसार के सबसे आदरणीय व्यक्ति हैं। इन दोनों नामों के योग से उनका नाम अद्वैत आचार्य है।

अद्वैत-आचार्य—ईश्वरेर अंश-वर्य । ताँर तत्त्व-नाम-गुण, सकलि आश्चर्य ॥

३३॥

श्री अद्वैत आचार्य परमेश्वर के प्रमुख अंग हैं। उनके तत्त्व, नाम तथा गुण-सभी अद्भुत हैं।

ग्राँहार तुलसी-जले, झाँहार हुङ्कारे ।।स्व-गण सहिते चैतन्येर अवतारे ॥

३४॥

उन्होंने कृष्ण की पूजा तुलसीदल तथा गंगाजल से की और उच्च स्वर से उन्हें पुकारा। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु अपने निजी पार्षदों सहित पृथ्वी पर अवतरित हुए।

ग्राँर द्वारा कैल प्रभु कीर्तन प्रचार ।झाँर द्वारा कैल प्रभु जगनिस्तार ॥

३५ ॥

उन्हीं (अद्वैत आचार्य ) के द्वारा श्री चैतन्य महाप्रभु ने संकीर्तन आन्दोलन का प्रसार किया और उन्हीं के द्वारा उन्होंने संसार का उद्धार किया।

आचार्य गोसाजिर गुण-महिमा अपार ।जीव-कीट कोथाय पाइबेक तार पार ॥

३६॥

अद्वैत आचार्य की महिमा तथा उनके गुण असीम हैं। तो फिर क्षुद्र जीव उनको पार कैसे पा सकते हैं? आचार्य गोसाजि चैतन्येर मुख्य अङ्ग ।आर एक अङ्ग ताँर प्रभु नित्यानन्द ॥

३७॥

श्री अद्वैत आचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु के मुख्य अंग हैं। उनके दूसरे अंग नित्यानन्द प्रभु हैं।

प्रभुर उपाङ्ग–श्रीवासादि भक्त-गण ।।हस्त-मुख-नेत्र-अङ्ग चक्राद्यत्र-सम ॥

३८॥

श्रीवास आदि भक्तगण उनके लघु अंग हैं। वे उनके हाथ, मुँह, आँखें तथा चक्र एवं अन्य अस्त्रों की तरह हैं।

ए-सब लइया चैतन्य-प्रभुर विहार ।।ए-सब लइया करेन वाञ्छित प्रचार ॥

३९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने इन सबके साथ अपनी लीलाएँ कीं और उनको साथ लेकर उन्होंने अपने वांछित उद्देश्य का प्रचार किया।

माधवेन्द्र-पुरीर इँहो शिष्य, एइ ज्ञाने ।।आचार्य-गोसाजिरे प्रभु गुरु करि' माने ॥

४०॥

चैतन्य महाप्रभु यह सोचकर कि वे ( श्री अद्वैत आचार्य ) श्री माधवेन्द्र पुरी के शिष्य हैं, उन्हें अपने गुरु के समान आदर देते हुए उनकी आज्ञा का पालन करते हैं।

लौकिक-लीलाते धर्म-मर्यादा-रक्षण ।स्तुति-भक्त्ये करेन ताँर चरण वन्दन ॥

४१॥

धर्म के सिद्धान्तों की मर्यादा बनाये रखने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु स्तुति तथा भक्ति के साथ श्री अद्वैत आचार्य के चरणकमलों की वन्दना करते हैं।

चैतन्य-गोसाजिके आचार्य करे 'प्रभु'-ज्ञान ।। आपनाके करेन ताँर 'दास'-अभिमान ॥

४२॥

। किन्तु श्री अद्वैत आचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु को अपना स्वामी मानते हैं और अपने आपको चैतन्य महाप्रभु का दास मानते हैं।

सेइ अभिमान-सुखे आपना पासरे ।।‘कृष्ण-दास' हओ-जीवे उपदेश करे ॥

४३॥

वे उसी भाव के हर्ष में अपने आपको भूल जाते हैं और सभी जीवों को शिक्षा देते हैं कि, “तुम सभी लोग श्री चैतन्य महाप्रभु के दास हो।

कृष्ण-दास-अभिमाने ग्रे आनन्द-सिन्धु ।।कोटी-ब्रह्म-सुख नहे तार एक बिन्दु ॥

४४॥

श्रीकृष्ण के प्रति दास्य भाव आत्मा में ऐसा आनन्द-सागर उत्पन्न कर देता है कि यदि ब्रह्म से एकाकार होने के सुख को एक करोड़ गुना कर दिया जाये, तो भी वह इसकी एक बूंद की समानता नहीं कर सकता।

मुजि ग्रे चैतन्य-दास आर नित्यानन्द ।।दास-भाव-सम नहे अन्यत्र आनन्द ।। ४५ ॥

वे कहते हैं, श्री नित्यानन्द और मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के सेवक हैं। अन्यत्र कहीं भी ऐसा सुख नहीं है, जैसा इस सेवा-भाव में मिलता है।

परम-प्रेयसी लक्ष्मी हृदये वसति । तेहो दास्य-सुख मागे करिया मिनति ॥

४६ ।। यद्यपि भगवान् के वक्षस्थल पर उनकी परम प्रेयसी लक्ष्मीदेवी निवास करती हैं, किन्तु फिर भी उनकी यही याचना रहती है कि उन्हें उनके चरणों की सेवा का आनन्द प्राप्त होता रहे।

दास्य-भावे आनन्दित पारिषद-गण । विधि, भव, नारद आर शुक, सनातन ॥

४७॥

भगवान् कृष्ण के सारे पार्षद (संगी ), यथा ब्रह्मा, शिव, नारद, शुक तथा सनातन कुमार दास्यभाव में अत्यधिक प्रसन्न रहते हैं।

नित्यानन्द अवधूत सबाते आगल ।।चैतन्येर दास्य-प्रेमे हइला पागल ।। ४८ ॥

विचरण करने वाले अवधूत साधु श्री नित्यानन्द भगवान् चैतन्य के समस्त पार्षदों में अग्रणी हैं। वे भगवान् चैतन्य की सेवा के आनन्द में पागल हो गये।

श्रीवास, हरिदास, रामदास, गदाधर । मुरारि, मुकुन्द, चन्द्रशेखर, वक्रेश्वर ॥

४९॥

ए-सब पण्डित-लोक परम-महत्त्व ।। चैतन्येर दास्ये सबाय करये उन्मत्त ॥

५०॥

श्रीवास, हरिदास, रामदास, गदाधर, मुरारि, मुकुन्द, चन्द्रशेखर तथा वक्रेश्वर सभी अत्यन्त यशस्वी हैं और महान् पण्डित हैं, किन्तु भगवान् चैतन्य के प्रति दास्यभाव उन्हें उन्मत्त बनाये रखता है।

एइ मत गाय, नाचे, करे अट्टहास ।के उपदेशे,---‘हओ चैतन्येर दास' ।। ५१ ।। इस तरह वे सभी पागलों की तरह नाचते, गाते और हँसते हैं तथा सभी को यही उपदेश देते हैं, श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेमी दास बनो।

चैतन्य-गोसाजि मोरे करे गुरु ज्ञान ।।तथापिह मोर हय दास-अभिमान ॥

५२॥

श्री अद्वैत आचार्य सोचते हैं, चैतन्य महाप्रभु मुझे अपना गुरु मानते हैं, तो भी मैं अपने आपको उनका दास मात्र अनुभव करता हूँ।

कृष्ण-प्रेमेर एइ एक अपूर्व प्रभाव ।।गुरु-सम-लघुके कराय दास्य-भाव ॥

५३॥

कृष्ण-प्रेम का यही एक अपूर्व प्रभाव है कि यह गुरुजनों, समवयस्कों तथा कनिष्ठजनों को भगवान् कृष्ण के प्रति सेवा भाव से प्रेरित करता है।

इहार प्रमाण शुन–शास्त्रेर व्याख्यान ।महदनुभव य़ाते सुदृढ़ प्रमाण ॥

५४॥

इसके प्रमाण के लिए प्रामाणिक शास्त्रों में वर्णित उदाहरणों का श्रवण करें, जिनकी पुष्टि महात्माओं की अनुभूति द्वारा भी होती है।

अन्येर का कथा, व्रजे नन्द महाशय ।। तार सम 'गुरु' कृष्णेर आर केह नय ॥

५५॥

शुद्ध-वात्सल्ये ईश्वर-ज्ञान नाहि तार ।।ताहाकेइ प्रेमे कराय दास्य-अनुकार ॥

५६॥

व्रज में कृष्ण के लिए नन्द महाराज से बढ़कर कोई अधिक पूज्य गुरुजन नहीं है, क्योंकि अपने दिव्य पितृप्रेम के कारण उन्हें इसका ज्ञान ही नहीं है कि उनके पुत्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। फिर भी यह प्रेम उन्हें अपने आपको कृष्ण का दास होने का अनुभव कराता है; औरों का तो क्या कहना? तेंहो रति-मति मागे कृष्णेर चरणे ।।ताहार श्री-मुख-वाणी ताहाते प्रमाणे ॥

५७॥

वे भी भगवान् कृष्ण के चरणकमलों में अनुरक्ति और भक्ति के लिए प्रार्थना करते हैं, जैसाकि स्वयं उनके मुख से निकले शब्द इसके साक्षी हैं।

शुन उद्धव, सत्य, कृष्ण-आमार तनय । तेहो ईश्वर–हेन यदि तोमार मने लय ॥

५८ ॥

तथापि ताँहाते रहु मोर मनो-वृत्ति । तोमार ईश्वर-कृष्णे हौक मोर मति ॥

५९॥

हे उद्धव, कृपया सुनो। यह सच है कि कृष्ण मेरा पुत्र है, किन्तु फिर भी यदि तुम सोचते हो कि वह ईश्वर है, तो भी उसके लिए मैं अपने पुत्र का भाव ही रखेंगा। अतएव मेरी प्रार्थना है कि मेरा मन तुम्हारे भगवान् कृष्ण के प्रति अनुरक्त हो।

मनसो वृत्तयो नः स्युः कृष्ण-पादाम्बुजाश्रयाः ।। वाचोऽभिधायिनीर्नाम्नां कायस्तत्प्रह्वणादिषु ॥

६०॥

हमारे मन तुम्हारे भगवान् कृष्ण के चरणों में अनुरक्त हों, हमारी जिह्वाएँ उनके पवित्र नामों का कीर्तन करें और हमारे शरीर उनके समक्ष दण्डवत् प्रणाम करें।

कर्मभिर्भाग्यमाणानां यत्र क्वापीश्वरेच्छया ।।मङ्गलाचरितैर्दानै रतिर्नः कृष्ण ईश्वरे ॥

६१॥

हम ईश्वर की इच्छा से अपने कर्मवश भौतिक ब्रह्माण्ड में जहाँ भी भ्रमण करें, हमारे पुण्यकर्म भगवान् कृष्ण के प्रति हमारी अनुरक्ति को बढ़ाते रहें।

श्रीदामादि व्रजे व्रत सखार निचय ।ऐश्वर्य-ज्ञान-हीन, केवल-सख्य-मय ।। ६२ ॥

भगवान् कृष्ण के वृन्दावन के मित्र, जिनमें श्रीदामा मुख्य हैं, उनके प्रति शुद्ध सख्य प्रेम रखते हैं। उन्हें भगवान् के ऐश्वर्यों का कोई ज्ञान नहीं हैं।

कृष्ण-सङ्गे युद्ध करे, स्कन्धे आरोहण ।।तारा दास्य-भावे करे चरण-सेवन ॥

६३ ॥

यद्यपि वे भगवान् से लड़ते हैं और उनके कन्धों पर चढ़ जाते हैं, किन्तु दास्यभाव में वे उनके चरणकमलों की पूजा करते हैं।

पाद-संवाहनं चक्रुः केचित्तस्य महात्मनः ।।अपरे हत-पाप्मानो व्यजनैः समवीजयन् ॥

६४॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण के कुछ मित्र उनके पाँव दबाते थे और अन्य मित्र, जिनके पाप-कर्मफल नष्ट हो चुके थे, अपने हाथ में पंखा लेकर उन पर पंखा झलते थे।

कृष्णेर प्रेयसी व्रजे व्रत गोपी-गण ।। ग्राँर पद-धूलि करे उद्धव प्रार्थन ॥

६५॥

याँ-सबार उपरे कृष्णेर प्रिय नाहि आन ।ताँहार आपनाके करे दासी-अभिमान ।। ६६॥

यहाँ तक कि वृन्दावन में भगवान् कृष्ण की प्रेयसी गोपियाँ भी, जिनके चरणों की धूल की कामना श्री उद्धव ने की थी और जिनसे बढ़कर कृष्ण को अन्य कोई भी प्रिय नहीं है, अपने आपको कृष्ण की दासियाँ मानती हैं।

व्रज-जनार्ति-हन्वीर योषितांनिज-जन-स्मय-ध्वंसन-स्मित ।। भज सखे भवत्किङ्करीः स्म नो । जल-रुहाननं चारु दर्शय ॥

६७॥

हे प्रभु, हे वृन्दावन के निवासियों के कष्टों के हर्ता! हे समस्त स्त्रियों के नायक! अपनी मृदु मधुर मुस्कान से अपने भक्तों के गर्व को नष्ट करने वाले हे भगवान्! हे सखे! हम आपकी दासियाँ हैं। कृपया हमारी इच्छापूर्ति करें और हमें अपने आकर्षक कमलमुख का दर्शन प्रदान करें।

अपि बत मधु-पुर्यामाग्र-पुत्रोऽधुनास्तेस्मरति स पितृ-गेहान्सौम्य बन्धूंश्च गोपान् । क्वचिदपि स कथां नः किङ्करिणां गृणीतेभुजमगुरु-सुगन्धं मूर्त्यधास्यत्कदा नु ॥

६८॥

। । हे उद्धव यह सचमुच दुःख की बात है कि कृष्ण मथुरा में वास कर रहे हैं। क्या उन्हें अपने पिता के घरेलु कार्यों, अपने मित्रों तथा ग्वालबालों की याद आती है? हे महात्मा! क्या वे कभी हम दासियों के विषय में बात करते हैं? वे कब हमारे मस्तकों को अपने अगुरु-सुगन्धित हाथ से स्पर्श करेंगे? ताँ-सबार कथा रहु,-–श्रीमती राधिका । सबा हैते सकलांशे परम-अधिका॥

६९॥

तेहो याँर दासी हैञा सेवेन चरण ।।झाँर प्रेम-गुणे कृष्ण बद्ध अनुक्षण ॥

७० ॥

अन्य गोपियों का तो कहना ही क्यो, यहाँ तक कि श्रीमती राधिका, जो उन सबमें हर प्रकार से श्रेष्ठ हैं और जिन्होंने अपने प्रेम-गुणों द्वारा श्रीकृष्ण को सदा के लिए बाँध लिया है, उनकी दासी के रूप में उनकी चरण-सेवा करती हैं।

हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महा-भुज । दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्निधिम् ॥

७१ ॥

हे नाथ! हे मेरे पति! हे परम प्रिय! हे बलिष्ठ भुजाओं वाले! आप कहाँ हैं? आप कहाँ हैं? हे सखे, अपनी दासी के समक्ष आप प्रकट क्यों नहीं होते, जो आपकी अनुपस्थिति के कारण अत्यन्त दुःखी है? द्वारकाते रुक्मिण्यादि व्रतेक महिषी । ताँहाराओ आपनाके माने कृष्ण-दासी ॥

७२॥

। द्वारकाधाम में रुक्मिणी इत्यादि सारी रानियाँ भी अपने आपको भगवान् कृष्ण की दासियाँ मानती हैं।

चैद्याय मार्पयितुमुद्यत-कार्मुकेषु राजस्वजेय-भट-शेखरिताघ्रि-रेणुः । निन्ये मृगेन्द्र इव भागमजावि-यूथात्तच्छ्री-निकेत-चरणोऽस्तु ममार्चनाय ॥

७३॥

जब जरासन्ध तथा अन्य राजा अपने अपने धनुष-बाण उठाये मुझे शिशुपाल को दान रूप देने को उद्यत थे, तो उन्होंने मुझे उनके बीच से बलपूर्वक उसी प्रकार खींच लिया, जिस प्रकार सिंह अपना भाग भेड़ों और बकरियों के बीच में से ले जाता है। अतः उनके चरणकमलों की धूलि अजेय सैनिकों का ताज है। वे चरणकमल जो लक्ष्मीजी के आश्रय हैं, मेरी पूजा के अभीष्ट बनें।

तपश्चरन्तीमाज्ञाय स्व-पाद-स्पर्शनाशया । सख्योपेत्याग्रहीत्पाणिं साहं तद्गृह-मार्जनी ॥

७४॥

यह जानते हुए कि मैं उनके चरणकमलों का स्पर्श पाने के लिए तपस्या कर रही हूँ, वे अपने मित्र अर्जुन के साथ आये और उन्होंने मेरा पाणिग्रहण किया। फिर भी मैं श्रीकृष्ण के घर का फर्श बुहारने में लगी हुई मात्र एक दासी हूँ। आत्मारामस्य तस्येमा वयं वै गृह-दासिकाः ।।सर्व-सङ्ग-निवृत्त्याव्द्धा तपसा च बभूविमे ॥

७५ ॥

हम अपनी तपस्या तथा सारी आसक्तियों के त्याग से, अपने में ही सन्तुष्ट रहने वाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण के घर की दासियाँ बन पाई हैं।

आनेर कि कथा, बलदेव महाशय ।। याँर भाव—शुद्ध-सख्य-वात्सल्यादि-मयं ॥

७६॥

औरों की बात छोड़िये, यहाँ तक कि भगवान् बलदेव भी शुद्ध सख्य तथा वात्सल्य-प्रेम जैसी भावनाओं से पूर्ण हैं।

तेहो आपनाके करेन दास-भावना ।।कृष्ण-दास-भाव विनु आछे कोन जना ॥

७७ ॥

वे भी अपने आपको भगवान् कृष्ण का दास समझते हैं। निस्सन्देह, ऐसा कौन होगा जो भगवान् कृष्ण का दास होने का यह भाव न रखती हो? सहस्र-वदने →हो शेष-सङ्कर्षण ।दश देह धरि' करे कृष्णेर सेवन ॥

७८ ॥

वे जो शेष रूपी संकर्षण हैं, वे अपने हजारों मुखों से, दस रूपों को प्रकट करके श्रीकृष्ण की सेवा करते हैं।

अनन्त ब्रह्माण्डे रुद्र-सदाशिवेर अंश । गुणावतार तेंहो, सर्व-देव-अवतंस ॥

७९ ॥

सदाशिव के विस्ताररूप रुद्र, जो असंख्य ब्रह्माण्डों में प्रकट होते हैं। और अनन्त ब्रह्माण्डों में देवताओं के अलंकार हैं, वे एक गुणावतार भी हैं।

तेंहो करेन कृष्णेर दास्य-प्रत्याश ।निरन्तर कहे शिव, 'मुञि कृष्ण-दास' ॥

८०॥

वे भी भगवान् कृष्ण के दास ही बनने की कामना करते हैं। श्री सदाशिव हमेशा यही कहते हैं, मैं भगवान् कृष्ण का दास हूँ।

कृष्ण-प्रेमे उन्मत्त, विह्वल दिगम्बर ।कृष्ण-गुण-लीला गाय, नाचे निरन्तर ॥

८१॥

कृष्ण के प्रेम में उन्मत्त होकर वे विह्वल बन जाते हैं और बिना वस्त्र के निरन्तर नृत्य करते रहते हैं तथा भगवान् कृष्ण के गुणों एवं उनकी लीलाओं के विषय में गाते रहते हैं।

पिता-माता-गुरु-सखा-भाव केने नय ।। कृष्ण-प्रेमेर स्वभावे दास्य-भाव से करय ॥

८२ ॥

सारे भाव, चाहे वे पिता के, माता के, गुरु के या मित्र के हों, दास्यभाव से पूरित हैं। कृष्ण-प्रेम का यही स्वभाव है।

एक कृष्ण-सर्व-सेव्य, जगतीश्वर ।। आर व्रत सब, ताँर सेवकानुचर ॥

८३॥

ब्रह्माण्ड के एकमात्र स्वामी भगवान् कृष्ण सबके द्वारा सेव्य होने के योग्य हैं। निस्सन्देह, प्रत्येक व्यक्ति उनके दासों का दास होने के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।

सेइ कृष्ण अवतीर्ण–चैतन्य-ईश्वर । अतएव आर सब, ताँहार किङ्कर ॥

८४॥

। वे भगवान् कृष्ण ही चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए हैं। अतएव सारे लोग उनके दास हैं।

केह माने, केह ना माने, सब ताँर दास । ये ना माने, तार हय सेइ पापे नाश ॥

८५॥

कुछ लोग उन्हें स्वीकार करते हैं और कुछ नहीं करते, तो भी सारे लोग उनके दास हैं। जो उन्हें स्वीकार नहीं करता, वह अपने पापकर्मों से विनष्ट हो जायेगा।

चैतन्येर दास मुञि, चैतन्येर दास ।।चैतन्येर दास मुञि, ताँर दासेर दास ॥

८६॥

मैं चैतन्य महाप्रभु का दास हूँ, मैं चैतन्य महाप्रभु का दास हूँ। मैं चैतन्य महाप्रभु का दास हूँ और उनके दासों का दास हूँ।

एत बलि' नाचे, गाय, हुङ्कार गम्भीर ।।क्षणेके वसिला आचार्य है सुस्थिर ॥

८७॥

यह कहकर अद्वैत प्रभु नाचते हैं तथा जोर-जोर से गाते हैं। फिर अगले क्षण वे चुप होकर बैठ जाते हैं।

भक्त-अभिमान मूल श्री-बलरामे ।। सेइ भावे अनुगत ताँर अंश-गणे ।।८८॥

निस्सन्देह, दास्य भाव के उद्गम भगवान् बलराम हैं। उनके बाद के सारे अंश इसी परमानन्द भाव से प्रभावित होते हैं।

ताँर अवतार एक श्री-सङ्कर्षण । भक्त बलि' अभिमान करे सर्व-क्षण ॥

८९॥

उनके एक अवतार स्वरूप भगवान् संकर्षण अपने आपको उनका नित्ये दास मानते हैं।

ताँर अवतार आन श्री-ग्रुत लक्ष्मण । श्री-रामेर दास्य तिंहो कैल अनुक्षण ॥

९०॥

उनके दूसरे अवतार लक्ष्मण जो अतीव सुन्दर एवं ऐश्वर्ययुक्त हैं, सदैव भगवान् राम की सेवा करते हैं।

सङ्कर्षण-अवतार कारणाब्धि-शायी ।।ताँहार हृदये भक्त-भाव अनुयायी ॥

९१॥

कारण सागर में शयन करने वाले भगवान् विष्णु, भगवान् संकर्षण के अवतार हैं, फलतः उनके हृदय में भक्त होने का भाव सदैव विद्यमान रहता है।

ताँहार प्रकाश-भेद, अद्वैत-आचार्य ।काय-मनो-वाक्ये ताँर भक्ति सदा कार्य ॥

९२ ॥

अद्वैत आचार्य उनके पृथक् विस्तार हैं। वे सदैव मन, वचन तथा कर्म से उनकी भक्ति में मग्न रहते हैं।

वाक्ये कहे, ‘मुजि चैतन्येर अनुचर' ।मुजि ताँर भक्त–मने भावे निरन्तर ॥

९३॥

वे अपनी वाणी से घोषित करते हैं, मैं भगवान् चैतन्य का दास हूँ।” इस तरह अपने मन में वे सदैव सोचते हैं, मैं उनका भक्त हूँ।

जले-तुलसी दिया करे कायाते सेवन ।।भक्ति प्रचारिया सब तारिला भुवन ॥

९४॥

उन्होंने गंगाजल तथा तुलसीदल अर्पित करके अपने शरीर से भगवान् की पूजा की और भक्ति के प्रचार द्वारा सारे ब्रह्माण्ड का उद्धार किया।

पृथिवी धरेन येइ शेष-सङ्कर्षण ।काय-व्यूह करि' करेन कृष्णेर सेवन ॥

९५ ॥

अपने फनों पर सारे ब्रह्माण्डों को धारण करने वाले शेष संकर्षण भगवान् कृष्ण की सेवा करने के लिए अपना विस्तार विविध शरीरों में करते हैं।

एइ सब हय श्री कृष्णेर अवतार ।निरन्तर देखि सबार भक्तिर आचार ॥

९६॥

ये सभी भगवान् कृष्ण के अवतार हैं, फिर भी हम उन्हें सदैव भक्तों की तरह कार्य करते हुए पाते हैं।

ए-सबाके शास्त्रे कहे 'भक्त-अवतार' । ‘भक्त-अवतार'-पद उपरि सबार ॥

९७॥

शास्त्र उन्हें भक्त-अवतार कहते हैं। ऐसे अवतार का पद अन्य सबके ऊपर है।

एक-मात्र 'अंशी'–कृष्ण, 'अंश'–अवतार ।अंशी अंशे देखि ज्येष्ठ-कनिष्ठ-आचार ॥

९८॥

। भगवान् कृष्ण समस्त अवतारों के उद्गम हैं और अन्य सभी उनके अंश या अंशावतार हैं। हम देखते हैं कि पूर्ण तथा अंश क्रमशः ज्येष्ठ तथा कनिष्ठ की तरह व्यवहार करते हैं।

ज्येष्ठ-भावे अंशीते हय प्रभु-ज्ञान ।कनिष्ठ-भावे आपनाते भक्त-अभिमान ॥

९९ ॥

जब वे अपने आपको स्वामी मानते हैं, तब समस्त अवतारों के उद्गम में ज्येष्ठ भाव होता है और जब वे अपने आपको भक्त मानते हैं, तब उनमें कनिष्ठ भाव होता है।

कृष्णेर समता हैते बड़ भक्त-पद ।।आत्मा हैते कृष्णेर भक्त हय प्रेमास्पद ॥

१००॥

भक्त होना भगवान् कृष्ण की समता से बढ़कर है, क्योंकि भक्तगण भगवान् कृष्ण को अपने से भी अधिक प्रिय हैं।

आत्मा हैते कृष्ण भक्ते बड़ करि' माने । इहाते बहुत शास्त्र-वचन प्रमाणे ॥

१०१॥

भगवान् कृष्ण अपने भक्तों को अपने से भी बढ़कर मानते हैं। इस सन्दर्भ में शास्त्रों में प्रचुर प्रमाण प्राप्त होते हैं।

न तथा मे प्रिय-तम आत्म-योनिर्न शङ्करः ।। न च सङ्कर्षणो न श्रीवात्मा च ग्रथा भवान् ॥

१०२॥

हे उद्धव! तुम्हारे समान मुझे न ब्रह्मा, न शंकर, न संकर्षण, न लक्ष्मी, न स्वयं मैं ही प्रिय हूँ।

कृष्ण-साम्ये नहे ताँर माधुर्यास्वादन ।।भक्त-भावे करे ताँर माधुर्घ चर्वण ॥

१०३ ॥

जो अपने आपको कृष्ण के समकक्ष मानते हैं, वे भगवान् कृष्ण की मधुरता का आस्वादन नहीं कर सकते। इसका आस्वादन तो केवल दास्य भाव के माध्यम से किया जा सकता है।

शास्त्रेर सिद्धान्त एई,—विज्ञेर अनुभव।मूढ़-लोक नाहि जाने भावेर वैभव ॥

१०४॥

प्रामाणिक शास्त्रों का यह निष्कर्ष अनुभवी भक्तों की अनुभूति भी है। किन्तु मूर्ख तथा धूर्त लोग भक्तिमय भावों के इस ऐश्वर्य को नहीं समझ सकते।

भक्त-भाव अङ्गीकरि' बलराम, लक्ष्मण । अद्वैत, नित्यानन्द, शेष, सङ्कर्षण ॥

१०५ ।। कृष्णेर माधुर्य-रसामृत करे पान ।सेइ सुखे मत्त, किछु नाहि जाने आन ॥

१०६॥

। बलदेव, लक्ष्मण, अद्वैत आचार्य, भगवान् नित्यानन्द, भगवान् शेष तथा संकर्षण अपने आपको भगवान् के भक्त तथा दास मानकर भगवान् कृष्ण के दिव्य आनन्द के अमृत-रस का आस्वादन करते हैं। वे सभी इसी सुख से उन्मत्त रहते हैं और इसके अतिरिक्त दूसरा कुछ भी नहीं जानते।

अन्येर आछुक्काग्रे, आपने श्रीकृष्ण ।आपन-माधुर्घ-पाने हइला सतृष्ण ॥

१०७॥

औरों की तो बात ही क्या, स्वयं भगवान् कृष्ण भी अपने माधुर्य का आस्वादन करने के इच्छुक रहते हैं।

स्वा-माधुर्य आस्वादिते करेन व्रतन ।भक्त-भाव विनु नहे ताहा आस्वादन ॥

१०८॥

वे अपने माधुर्य का आस्वादन खुद करना चाहते हैं, किन्तु भक्त के भाव को स्वीकार किये बिना वे ऐसा नहीं कर सकते।

भक्त-भाव अङ्गीकरि' हैला अवतीर्ण ।।श्री कृष्णा-चैतन्य-रूपे सर्व-भावे पूर्ण ॥

१०९॥

अतएव भगवान् कृष्ण ने भक्त के भाव को स्वीकार किया और सभी प्रकार से पूर्ण भगवान् चैतन्य के रूप में अवतरित हुए।

नाना-भक्त-भावे करेन स्व-माधुर्य पान ।पूर्वे करियाछि एइ सिद्धान्त व्याख्यान ॥

११०॥

वे भक्त के विविध भावों के माध्यम से अपनी माधुरी का आस्वादन करते हैं। मैंने पहले ही इस सिद्धान्त की व्याख्या कर दी है।

अवतार-गणेर भक्त-भावे अधिकार ।भक्त-भाव हैते अधिक सुख नाहि आर ।। १११॥

सारे अवतारों को भक्तों का भाव पाने का अधिकार है। इससे बढ़कर अन्य कोई आनन्द नहीं है।

मूल भक्त-अवतार श्री-सङ्कर्षण । भक्त-अवतार हँहि अद्वैते गणन ॥

११२॥

मूल भक्त-अवतार संकर्षण हैं। श्री अद्वैत की गिनती ऐसे ही अवतारों में की जाती है।

अद्वैत-आचार्य गोसाजिर महिमा अपार ।झाँहार हुङ्कारे कैल चैतन्यावतार ॥

११३॥

श्री अद्वैत आचार्य की महिमाएँ अपार हैं, क्योंकि उनकी निष्ठावान हुंकार से ही इस पृथ्वी पर भगवान् श्री चैतन्य का अवतरण हो सका।

सङ्कीर्तन प्रचारिया सब जगत्तारिल ।अद्वैत-प्रसादे लोक प्रेम-धन पाइल ॥

११४॥

उन्होंने संकीर्तन के प्रचार द्वारा ब्रह्माण्ड का उद्धार किया। इस तरह श्री अद्वैत की कृपा से ही संसार के लोगों को भगवत्प्रेम रूपी खजाना प्राप्त हुआ।

अद्वैत-महिमा अनन्त के पारे कहिते ।।सेइ लिखि, येइ शुनि महाजन हैते ॥

११५॥

भला अद्वैत आचार्य की असीम महिमाओं का वर्णन कौन कर सकता है? यहाँ मैं वही लिख रहा हूँ, जैसा मैंने महापुरुषों से जाना है।

आचार्य-चरणे मोर कोटि नमस्कार ।।इथे किछु अपराध ना लबे आमार ॥

११६॥

मैं श्री अद्वैत आचार्य के चरणकमलों पर करोड़ों बार नमस्कार करता हूँ। कृपया इसमें अपराध न मानें।

तोमार महिमा-कोटि-समुद्र अगाध ।।ताहार इयत्ता कहि,——ए बड़ अपराध ॥

११७॥

आपकी महिमाएँ करोड़ों समुद्रों के समान अगाध हैं। इसकी माप की बात करना अवश्य ही महा-अपराध है।

जय जय जय श्री-अद्वैत आचार्य ।जय जय श्री-चैतन्य, नित्यानन्द आर्म्य ॥

११८॥

श्री अद्वैत आचार्य की जय हो, जय हो! श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्रेष्ठ श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो, जय हो! दुइ श्लोके कहिल अद्वैत-तत्त्व-निरूपण ।पञ्च-तत्त्वेर विचार किछु शुन, भक्त-गण ॥

११९॥

इस तरह मैंने दो श्लोकों में अद्वैत आचार्य के तत्त्व का वर्णन किया है। हे भक्तों! अब पंचतत्त्वों के विषय में सुनिये।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

१२०॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों पर प्रार्थना करते हुए, सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए मैं, कृष्णदास, उनके चरणचिह्नों पर चलते हुए श्री चैतन्य-चरितामृत कह रहा हूँ।

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