अध्याय सत्रह: भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु के शारीरिक परिवर्तन
लिख्यते श्रील-गौरेन्दोरत्यद्भुतमलौकिकम् ।। यैर्दृष्टं तन्मुखाच्छुत्वा दिव्योन्माद-विचेष्टितम् ।। १ ।। मैं भगवान् गौरचन्द्र की दिव्य लीलाओं तथा आध्यात्मिक उन्माद के विषय में लिखने का प्रयास कर रहा हूँ, जो कि अत्यन्त अद्भुत तथा असामान्य हैं। मैं उनके विषय में लिखने का साहस इसलिए कर रहा हूँ, क्योंकि मैंने उनके मुखों से सुना है, जिन्होंने महाप्रभु के कार्यों को स्वयं देखा है।
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।।जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैतचन्द्र की जय हो! महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो! एइ-मत महाप्रभु रात्रि-दिवसे ।।उन्मादेर चेष्टा, प्रलाप करे प्रेमावेशे ॥
३॥
भावमग्न श्री चैतन्य महाप्रभु दिन-रात उन्मत्त की तरह कार्य करते और बोलते रहते।
एक-दिन प्रभु स्वरूप-रामानन्द-सङ्गे।।अर्ध-रात्रि गोडाइला कृष्ण-कथा-रङ्गे ॥
४॥
एक बार स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा रामानन्द राय के संग में श्री पैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण लीलाओं के विषय में बातें करते-करते आधी रात बिता दी।
ग्रबे ग्रेइ भाव प्रभुर करये उदय ।भावानुरूप गीत गाय स्वरूप-महाशय ॥
५॥
जब वे कृष्ण के विषय में बातें करते, तो स्वरूप दामोदर गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य भावों के अनुरूप गीत गाया करते।
विद्यापति, चण्डीदास, श्री-गीत-गोविन्द ।।भावानुरूप श्लोक पड़ेन राय-रामानन्द ॥
६॥
रामानन्द राय विद्यापति तथा चण्डीदास की पुस्तकों से, और विशेष रूप से जयदेव गोस्वामी कृत 'गीतगोविन्द' से श्लोक उद्धृत करते, जो श्री चैतन्य महाप्रभु के भावों को बढ़ावा देते।
मध्ये मध्ये आपने प्रभु श्लोक पड़िया ।।श्लोकेर अर्थ करेन प्रभु विलाप करिया ॥
७ ॥
बीच बीच में श्री चैतन्य महाप्रभु भी कोई श्लोक पढ़ देते। तब से शोक करते हुए इसकी व्याख्या करते।
एई-मते नाना-भावे अर्ध-रात्रि हैल ।।गोसाजिरे शयन कराइ' हे घरे गेल ॥
८ ॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने नाना प्रकार के भावों का अनुभव करते करते आधी रात बिता दी। अन्त में, महाप्रभु को उनके बिस्तर पर लिटाकर स्वरूप दामोदर तथा रामानन्द राय दोनों अपने अपने घर चले गये।
गम्भीरार द्वारे गोविन्द करिला शयन ।।सब-रात्रि प्रभु करेन उच्च-सङ्कीर्तन ॥
९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु का निजी सेवक गोविन्द उनके कमरे के दरवाजे पर लेट गया और महाप्रभु रात भर उच्च स्वर से हरे कृष्ण महामन्त्र का शीर्तन करते रहे।
आचम्बिते शुनेन प्रभु कृष्ण-वेणु-गान । भावावेशे प्रभु ताहाँ करिला प्रयाण ॥
१०॥
सहसा श्री चैतन्य महाप्रभु को कृष्ण की वंशी की ध्वनि सुनाई पड़ी। अतः भावावेश में वे कृष्ण का दर्शन करने के लिए चल पड़े।
तिन-द्वारे कपाट ऐछे आछे त’ लागियो । भावावेशे प्रभु गेला बाहिर ही ॥
११॥
तीनों दरवाजे हमेशा की तरह बन्द कर दिये गये थे, किन्तु फिर भी भति भावावेश में श्री चैतन्य महाप्रभु कमरे के बाहर निकल आये और घर को छोड़ दिया।
सिंह-द्वार-दक्षिणे आछे तैलङ्गी-गाभी-गण ।।ताहाँ ग्राइ' पड़िला प्रभु हा अचेतन ॥
१२॥
वे सिंहद्वार की दक्षिणी ओर की गोशाला में गये और तैलंग जिले की गायों के बीच अचेत होकर गिर पड़े।
एथा गोविन्द महाप्रभुर शब्द ना पाजा ।।स्वरूपेरे बोलाइल कपाट खुलिया ॥
१३॥
इस बीच श्री चैतन्य महाप्रभु का कोई शब्द न सुनकर गोविन्द ने तुरन्त स्वरूप दामोदर को बुलाया और दरवाजे खोले।
तबे स्वरूप-गोसाञि सङ्गे ला भक्त-गण ।देउटि ज्वालिया करेन प्रभुर अन्वेषण ॥
१४॥
तब स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने दीपक जलाया और वे श्री चैतन्य महाप्रभु को खोजने के लिए सारे भक्तों समेत बाहर चले गये।
इति-उति अन्वेषिया सिंह-द्वारे गेला ।। गाभी-गण-मध्ये ग्राइ' प्रभुरे पाइला ॥
१५ ॥
इधर-उधर हूँढने के बाद अन्त में वे सब सिंहद्वार के निकट गोशाला में पहुँचे। वहाँ उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु को गायों के बीच अचेत लेटे हुए पाया।
पेटेर भितर हस्त-पद-कूर्मेर आकार ।। मुखे फेन, पुलकाङ्ग, नेत्रे अश्रु-धार ॥
१६॥
उनके हाथ तथा पाँव उनके पेट के भीतर प्रवेश कर गये थे, मानो कछुवे के अंग हों। उनके मुख से झाग निकल रहा था, उनके शरीर भर में फुसियाँ निकल आई थीं और उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
अचेतन पड़ियाछेन,—ग्रेन कुष्माण्ड-फल ।। बाहिरे जड़िमा, अन्तरे आनन्द-विह्वल ॥
१७॥
जब महाप्रभु वहाँ अचेत पड़े थे, तब उनका शरीर एक बड़े कुम्हड़े जैसा लग रहा था। बाहर से वे पूर्णतया जड़ थे, किन्तु भीतर ही भीतर वे अपार दिव्य आनन्द का अनुभव कर रहे थे।
गाभी सब चौदिके शुङ्के प्रभुर श्री-अङ्ग ।।दूर कैले नाहि छाड़े प्रभुर श्री-अङ्ग-सङ्ग ॥
१८॥
महाप्रभु के चारों ओर सारी गौवें उनके दिव्य शरीर को सँघ रही थीं। जब भक्तों ने उन्हें रोकना चाहा, तो उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य शरीर का संग त्याग करना नहीं चाहा।
अनेक करिला ग्रन, ना हय चेतन ।। प्रभुरे उठाञा घरे आनिला भक्त-गण ॥
१९॥
भक्तों ने नाना प्रकार से महाप्रभु को उठाना चाहा, किन्तु उनकी चेतना लौट नहीं आई। इसलिए उन सबों ने उन्हें उठा लिया और घर लौटा ले आये।
उच्च करि' श्रवणे करे नाम-सङ्कीर्तन ।।अनेक-क्षणे महाप्रभु पाइला चेतन ॥
२०॥
सारे भक्त महाप्रभु के कान में उच्च स्वर से हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन करने लगे, तो काफी देर बाद श्री चैतन्य महाप्रभु को फिर से चेतना प्राप्त हुई। चेतन है-इले हस्त-पाद बाहिरे आइल ।पूर्ववत् ग्रथा-योग्य शरीर ह-इल ॥
२१॥
जब उन्हें चेतना आई, तब उनके हाथ पाँव उनके शरीर से बाहर निकल आये और उनका सारा शरीर पूर्ववत् हो गया।
उठिया वसिलेन प्रभु, चाहेन इति-उति ।। स्वरूपे कहेन,–तुमि आमा आनिला कति? ॥
२२॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु उठ खड़े हुए और फिर से बैठ गये। इधर-उधर देखकर उन्होंने स्वरूप दामोदर से पूछा, तुम मुझे कहाँ ले आये हो? वेणु-शब्द शुनि' आमि गेलाङवृन्दावन । देखि,—गोष्ठे वेणु बाजाय व्रजेन्द्र-नन्दन ॥
२३॥
वंशी की ध्वनि सुनकर मैं वृन्दावन चला गया और वहाँ पर मैंने देखा कि महाराज नन्द के पुत्र श्रीकृष्ण गोचौरण भूमि में अपनी वंशी त्यजा रहे हैं।
सङ्केत-वेणु-नादे राधा आनि' कुञ्ज-घरे ।।कुबेरे चलिला कृष्ण क्रीड़ा करिबारे ॥
२४॥
अपनी वंशी की ध्वनि के संकेत से वे श्रीमती राधारानी को एक कुंज में ले आये। फिर वे उनके साथ लीला करने के लिए कुंज के भीतर चले गये।
ताँर पाछे पाछे आमि करिनु गमन ।। ताँर भूषा-ध्वनिते आमार हरिल श्रवण ॥
२५॥
मेरे कान उनके आभूषणों की ध्वनि से मुग्ध हो गये और मैंने कृष्ण के पीछे-पीछे कुंज में प्रवेश किया।
गोपी-गण-सह विहार, हास, परिहास । कण्ठ-ध्वनि-उक्ति शुनि' मोर कर्णोल्लास ॥
२६॥
मैंने देखा कि कृष्ण तथा गोपियाँ हास-परिहास करते हुए सभी प्रकार की क्रीड़ा का आनन्द ले रहे थे। उनकी कण्ठध्वनि सुनकर मेरे कानों का उल्लास बढ़ गया।
हेन-काले तुमि-सब कोलाहल करि' ।। आमा इँहा लञा आइला बलात्कार करि' ॥
२७॥
तभी तुम सब कोलाहल करते हुए मुझे बलपूर्वक यहाँ ले आये।
शुनिते ना पाइनु सेइ अमृत-सम वाणी ।।शुनिते ना पाइनु भूषण-मुरलीर ध्वनि ॥
२८॥
चूँकि तुम लोग मुझे यहाँ लौटा ले आये, इसलिए मैं न तो कृष्ण एवं गोपियों की अमृतमयी वाणी सुन पाया, न ही मैं उनके आभूषणों या मुरली की ध्वनि सुन सका।
भावावेशे स्वरूपे कहेन गद्गद-वाणी ।। ‘कर्ण तृष्णाय मरे, पड़ रसायन, शुनि' ॥
२९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अत्यन्त भावावेश में स्वरूप दामोदर से अवरुद्ध वाणी में कहा, मेरे कान तृष्णा के कारण मर रहे हैं। कृपा करके इस तृष्णा को बुझाने के लिए कुछ सुनाओ और मुझे सुनने दो।
स्वरूप-गोसाञि प्रभुर भाव जानिया ।।भागवतेर श्लोक पड़े मधुर करिया ॥
३०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के ऊर्मिपूर्ण भाव को जानकर स्वरूप दामोदर ने मधुर स्वर में श्रीमद्भागवत' से निम्नलिखित श्लोक सुनाया।
का स्त्रयङ्ग ते कल-पदामृत-वेणु-गीतसम्मोहितार्य-चरितान्न चलेत्रि-लोक्याम् ।। त्रैलोक्य-सौभगमिदं च निरीक्ष्य रूपं ।यद्गो-द्विज-द्रुम-मृगाः पुलकान्यबिभ्रन् ॥
३१॥
( गोपियों ने कहा :) 'हे कृष्ण, तीनों लोकों में ऐसी कौन स्त्री है, जो आपकी अद्भुत वंशी से निकले मधुर गीतों की लय से मोहित न हो जाय? इस तरह ऐसी कौन होगी, जो सतीत्व के मार्ग से च्युत नहीं हो जायेगी? आपको सौन्दर्य तीनों लोकों में अत्यन्त उत्कृष्ट है। आपकी सुन्दरता को देखकर गौवें, पक्षी, पशु, तथा जंगल के वृक्ष भी हर्ष से स्तम्भित हो जाते हैं।'
शुनि' प्रभु गोपी-भावे आविष्ट ह-इला ।भागवतेर श्लोकेर अर्थ करिते लागिला ॥
३२॥
यह श्लोक सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु गोपी-भाव से अभिभूत हो गये और उसकी व्याख्या करने लगे।
हैल गोपी-भावावेश, कैल रासे परवेश,कृष्णेर शुनि' उपेक्षा-वचन ।कृष्णेर मुख-हास्य-वाणी, त्यागे ताहा सत्य मानि', रोषे कृष्णे देन ओलाहन ॥
३३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, गोपियाँ भावावेश में रासनृत्य की स्थली में प्रविष्ट हुईं, किन्तु कृष्ण से उपेक्षा तथा उदासीनता के शब्द सुनकर वे समझ गईं कि कृष्ण उनका परित्याग करने वाले हैं। इसलिए वे उन्हें क्रोध में उलाहना देने लगीं।
नागर, कह, तुमि करिया निश्चय एइ त्रिजगत् भरि', आछे व्रत ग्रोग्या नारि, ।तोमार वेणु काहाँ ना आकर्षय? ॥
३४॥
उन्होंने कहा, हे प्रियतम, जरा हमारे एक प्रश्न का उत्तर तो दो। इस ब्रह्माण्ड में कौन ऐसी तरुणी है, जो आपकी वंशी की ध्वनि से आकृष्ट नहीं होती? कैला जगते वेणु-ध्वनि, सिद्ध-मन्त्रा योगिनीदूती हा मोहे नारी-मन । महोत्कण्ठा बाड़ा, आर्य-पथ छाड़ा,आनि' तोमाय करे समर्पण ॥
३५॥
जब आप अपनी वंशी बजाते हो, तब यह ध्वनि मन्त्रोच्चारण-कला में पटु योगिनी के जैसी दूती का सा कार्य करती है। यह दूती ब्रह्माण्ड की सारी स्त्रियों को विमोहित करती है और उन्हें आपकी ओर आकृष्ट करती है। तब वह उनकी उत्कण्ठा को बढ़ाकर अपने से बड़ों की आज्ञा मानने के विधान का परित्याग करवाती है। अन्त में वह उन्हें बलपूर्वक आपके पास माधुर्य-प्रेम में आत्म समर्पण कराने लाती है।
धर्म छाड़ाय वेणु-द्वारे, हाने कटाक्ष-काम-शरे,लज्जा, भय, सकल छाड़ाय ।। एबे आमाय करि' रोष, कहि' पति-त्यागे 'दोष',धार्मिक हा धर्म शिखाय! ॥
३६॥
आपकी वंशी की ध्वनि हमें काम के बाणों से बलात् बेधने वाली आपकी चितवन के साथ मिलकर हमें धार्मिक जीवन के विधिविधानों की उपेक्षा करने के लिए प्रेरित करती है। इस तरह हम कामेच्छाओं से उत्तेजित होकर सारी लज्जा तथा भय त्यागकर आपके पास आती हैं। किन्तु अब आप हमसे रूठे हुए हो। आप हमारे द्वारा धार्मिक सिद्धान्तों का उल्लंघन किये जाने से तथा अपने अपने घरों तथा पतियों को छोड़ने पर हममें दोष निकाल रहे हो। जब आप हमें धार्मिक सिद्धान्तों का उपदेश देते हो, तो हम निरुपाय हो जाती हैं।
अन्य-कथा, अन्य-मन, बाहिरे अन्य आचरण,एई सब शठ-परिपाटी ।। तुमि जान परिहास, हय नारीर सर्व-नाशे,छाड़ एइ सबै कुटीनाटी ॥
३७॥
हम जानती हैं कि यह आपकी सुनियोजित चाल है। आपको ऐसा परिहास करना आता है, जिससे स्त्रियों का सर्वनाश हो जाता है, किन्तु हम समझ सकती हैं कि आपके वास्तविक मन, वचन तथा व्यवहार सर्वथा भिन्न हैं। इसलिए आप कृपया इन चातुर्यपूर्ण चालों को छोड़ दो।
वेणु-नाद अमृत-घोले, अमृत-समान मिठा बोले,अमृत-समान भूषण-शिञ्जित ।। तिन अमृते हरे कोण, हरे मन, हरे प्राण,केमने नारी धरिबेक चित? ॥
३८॥
आपकी वंशी की ध्वनि की अमृतमय छाछ, आपके मधुर शब्दों का अमृत तथा आपके आभूषणों की अमृत तुल्य ध्वनि-ये तीनों हमारे कानों, मनों तथा प्राणों को आकृष्ट करने के लिए मिल जाते हैं। इस तरह आप हमें मार डाल रहे हो।
एत कहि' क्रोधावेशे, भावेर तरङ्गे भासे,उत्कण्ठा-सागरे डुबे मन ।। राधार उत्कण्ठा-वाणी, पड़ि' आपने वाखानि,कृष्ण-माधुर्घ करे आस्वादन ॥
३९॥
चूँकि श्री चैतन्य महाप्रभु प्रेम की तरंगों में तैर रहे थे, अतः उन्होंने ये शब्द रोष की मुद्रा में कहे। उत्कण्ठा के सागर में डूबकर उन्होंने उसी भाव को व्यक्त करने वाला श्रीमती राधारानी द्वारा कहा हुआ श्लोक सुनाया। तब उन्होंने स्वयं इस श्लोक की व्याख्या की और कृष्ण की मधुरता का आस्वादन किया।
नदज्जलद-निस्वनः श्रवण-कर्षि-सच्छिञ्जितःसनर्म-रस-सूचकाक्षर-पदार्थ-भयुक्तिकः । रमादिक-वराङ्गना-हृदय-हारि-वंशी-कलःस मे मदन-मोहनः सखि तनोति कर्ण-स्पृहाम् ॥
४० ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, हे सखी, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण की वाणी आकाश में गर्जन करने वाले बादल के समान गम्भीरहै। वे अपने आभूषणों की रुनझुन से गोपियों के कानों को और अपनी वंशी की ध्वनि से लक्ष्मी देवी तक को तथा अन्य सुन्दरियों को आकृष्ट करते हैं। मदनमोहन नाम से विख्यात वे भगवान्, जिनके परिहास के वचन अनेक संकेत तथा गम्भीर अर्थ रखते हैं, मेरे कानों की कामेच्छाओं को वर्धित कर रहे हैं।'
कण्ठेर गम्भीर ध्वनि, नवधन-ध्वनि जिनि', यार गुणे कोकिल लाजाय ।। तार एक श्रुति-कणे, डुबाय जगतेर काणे, | पुनः कोण बाहुड़ि' ना आय ॥
४१ ।। कृष्ण की गम्भीर वाणी नवीन उमड़े बादलों से भी अधिक गर्जन करने वाली है और उनका मधुर गीत कोयल की मधुर वाणी को भी पराजित करने वाला है। निस्सन्देह, उनका गीत इतना मधुर है कि उसकी ध्वनि को एक कण भी सारे जगत् को आप्लावित कर सकता है। यदि ऐसा कण किसी के कान में प्रवेश करता है, तो वह तुरन्त ही समस्त अन्य प्रकार के श्रवण से विहीन हो जाता है।
कह, सखि, कि करि उपाय? कृष्णेर से शब्द-गुणे, हरिले आमार काणे, ।।एबे ना पाय, तृष्णाय मरि' प्राय ॥
४२॥
हे सखी, मुझे बताओ कि मैं क्या करूँ। मेरे कानों को कृष्ण की ध्वनि के गुणों ने लूट लिया है। किन्तु अब मैं यह दिव्य ध्वनि नहीं सुन पा रही और मैं उसके बिना मृतप्राय हूँ।
नूपुर-किङ्किणी-ध्वनि, हंस-सारस जिनि',कङ्कण-ध्वनि चटके लाजाय । एक-बार येइ शुने, व्यापि रहे' तार काणे,अन्य शब्द से-काणे ना ग्राय ॥
४३॥
कृष्ण के नूपुरों की ध्वनि हंस तथा सारस के गीतों का भीअतिक्रमण कर जाती है और उनके कंगनों की ध्वनि चटक पक्षी के गाने को भी लजा देती है। यदि एक बार भी इन ध्वनियों को कानों में प्रविष्ट होने दिया जाय, तो फिर अन्य कुछ भी सुनना सहन नहीं हो सकता।
से श्री-मुख-भाषित, अमृत हैते परामृत,स्मित-कर्पूर ताहाते मिश्रित । शब्द, अर्थ,—दुइ-शक्ति, नाना-रस करे व्यक्ति,प्रत्यक्षर-नर्म-विभूषित ॥
४४॥
कृष्ण की वाणी अमृत से भी कहीं अधिक मीठी होती है। उनका प्रत्येक हर्षित शब्द अर्थपूर्ण होता है और जब उनकी वाणी उनकी कपूर जैसी हँसी से मिल जाती है, तो इस तरह से कृष्ण के शब्दों से उत्पन्न ध्वनि तथा उसका गम्भीर अर्थ विविध दिव्य रसों को उत्पन्न करते हैं।
से अमृतेर एक-कण, कर्ण-चकोर-जीवन,कर्ण-चकोर जीये सेइ आशे । भाग्य-वशे कभु पाय, अभाग्ये कभु ना पाय,ना पाइले मरये पियासे ॥
४५ ॥
उस दिव्य आनन्दमय अमृत का एक कण कान का प्राण है, जो चकोर पक्षी की तरह उस अमृत का आस्वादन करने की आशा में जीवित रहता है। भाग्यवश यह पक्षी कभी तो उसका आस्वादन कर सकता है, किन्तु कभी-कभी दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं कर पाता, इसलिए वह तृष्णा से मरणासन्न हो जाता है।
ग्रेबा वेणु-कल-ध्वनि, एक-बार ताहा शुनि',जगन्नारी-चित्त आउलाय ।। नीवि-बन्ध पड़े खसि', विना-मूले हय दासी, बाउली हा कृष्ण-पाशे धाय ॥
४६॥
कृष्ण की वंशी की दिव्य ध्वनि विश्वभर की स्त्रियों के हृदयों को विचलित करती है, चाहे वे उसे एक बार ही क्यों न सुनें। इस तरह उनके कमरबन्ध ढीले पड़ जाते हैं और ये स्त्रियाँ कृष्ण की निशुल्क दासियाँ बन जाती हैं। निस्सन्देह, वे बावली स्त्रियों की तरह कृष्ण की ओर दौड़ती हैं।
ग्रेबा लक्ष्मी-ठाकुराणी, तेंहो ये काकली शुनि',| कृष्ण-पाश आइसे प्रत्याशाय ।। ना पाय कृष्णेर सङ्ग, बाड़े तृष्णा-तरङ्ग,तप करे, तबु नाहि पाय ॥
४७॥
कृष्ण की वंशी की ध्वनि सुनकर लक्ष्मीजी भी उनकी संगति की बहुत बड़ी आशा बाँधकर उनके पास आती हैं, किन्तु तो भी उन्हें वह संगति नहीं मिल पाती। जब उनकी संगति की तृष्णा की लहरें बढ़ती हैं, तो लक्ष्मीजी तपस्या करती हैं, किन्तु तो भी वे उनको नहीं मिल पातीं।।
एइ शब्दामृत चारि, झार हय भाग्य भारि,सेइ कर्णे इहा करे पान ।। इहा येइ नाहि शुने, से कोण जन्मिल केने, काणाकड़ि-सम सेइ काण ॥
४८॥
जो अत्यन्त भाग्यवान है, वही इन अमृत तुल्य चार प्रकार के शब्दों को सुन सकता है-कृष्ण के शब्द, उनकी नुपूरों तथा कंगनों की रुनझुन, उनकी वाणी तथा उनकी वंशी की ध्वनि। यदि वह इन ध्वनियों को नहीं सुन सकता, तो उसके कान छोटे शंख के छेद के समान व्यर्थ हैं।
करिते ऐछे विलाप, उठिल उद्वेग, भाव,मने काहो नाहि आलम्बन ।। उद्वेग, विषाद, मति, औत्सुक्य, त्रास, धृति, स्मृति,नाना-भावेर ह-इल मिलन ॥
४९॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु इस तरह विलाप कर रहे थे, तो उनके मन में उद्वेग तथा भाव का उदय हुआ, जिससे वे अति चंचल हो उठे। उनमें अनेक दिव्य भावों का मिश्रण हो रहा था यथा उद्वेग, विषाद, मति, उत्सुकता, त्रास, धृति तथा स्मृति इत्यादि।
भाव-शाबल्ये राधार उक्ति, लीला-शुके हैल स्फूर्ति,सेइ भावे पड़े एक श्लोक । उन्मादेर सामर्थ्य, सेइ श्लोकेर करे अर्थे, येइ अर्थ नाहि जाने लोक ॥
५०॥
इन भावों के समन्वय से बिल्वमंगल ठाकुर ( लीला शुक) के मन में श्रीमती राधारानी के एक कथन का उदय हुआ। अब श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसी भाव में उस श्लोक को सुनाया और उन्माद के बल पर उन्होंने उसका अर्थ बतलाया, जो सामान्य लोगों को ज्ञात नहीं है।
किमिह कृणुमः कस्य ब्रूमः कृतं कृतमाशया।कथयत कथामन्यां धन्यामहो हृदये शयः ।। मधुर-मधुर-स्मेराकारे मनोनयनोत्सवे | कृपण-कृपणा कृष्ण तृष्णा चिरं बत लम्बते ॥
५१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, “हाय, मैं क्या करूँ? मैं किससे कहूँ? मैंने कृष्ण से मिलने की आशा में जो कुछ किया है, उसे अब समाप्त हो जाने दो। कृपया अब कोई शुभ बात कहो, किन्तु कृष्ण के विषय में मत कहो। हाय, कृष्ण तो मेरे हृदय में कामदेव की तरह पड़े हुए हैं, तो फिर मैं उनके विषय में बातें करना कैसे बन्द कर दें? मैं कृष्णा को भूल नहीं सकती, जिनकी हँसी स्वयं मधुरता से भी अधिक मधुर है और जो मेरे मन तथा आँखों को आनन्द देने वाले हैं। हाय, कृष्ण के लिए मेरी अगाध तृष्णा प्रति क्षण बढ़ती जा रही है!' एइ कृष्णेर विरहे, उद्वेगे मन स्थिर नहे,प्राप्त्युपाय-चिन्तन ना ग्राय ।। येबा तुमि सखी-गण, विषादे बाउल मन,कारे पुछों, के कहे उपाय? ॥
५२॥
कृष्ण के विरह से उत्पन्न चिन्ता ने मुझे अधीर बना दिया है और मैं उनसे मिलने का कोई उपाय नहीं सोच पा रही। हे सखियों, तुम भी विषादसे बावली हो रही हो। अतएव अब मुझे कौन बतायेगा कि उन्हें कैसे खोजा जाय? हा हा सखि, कि करि उपाय! काँहा करों, काहाँ ग्राङ, काहाँ गेले कृष्ण पाङ ।कृष्ण विना प्राण मोर याय ॥
५३॥
हे प्रिय सखियों, मैं कृष्ण को कैसे पा सकेंगी? मैं क्या करूँ? मैं कहाँ जाऊँ? मैं उनसे कहाँ मिल सकती हूँ? कृष्ण के न मिलने से मेरे प्राण निकल रहे हैं।
क्षणे मन स्थिर हय, तबे मने विचारय,बलिते ह-इल भावोद्गम ।। पिङ्गलार वचन-स्मृति, कराइल भाव-मति,ताते करे अर्थ-निर्धारण ॥
५४॥
एकाएक श्री चैतन्य महाप्रभु शान्त हो गये और अपनी मनोदशा पर विचार करने लगे। उन्हें पिंगला के शब्द स्मरण हो आये और इससे उनके मन में भावावेश का उदय हुआ, जिसने उन्हें बोलने के लिए प्रेरित किया। इस तरह वे इस श्लोक का अर्थ बतलाने लगे।
देखि एई उपाये, कृष्ण-आशा छाड़ि' दिये,आशा छाड़िले सुखी हय मन ।। छाड़' कृष्ण-कथा अधन्य, कह अन्य-कथा धन्य,य़ाते हय कृष्ण-विस्मरण ॥
५५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, यदि मैं कृष्ण से मिलने की आशात्याग दें, तो मैं सुखी रहूँगा। इसलिए हम कृष्ण विषयक इस अति महिमाहीन चर्चा को बन्द करें। अच्छा हो कि हम महिमामण्डित कथाओं के विषय में बातें करें और कृष्ण को भूल जायें।
कहितेइ ह-इल स्मृति, चित्ते हैल कृष्ण-स्फूर्ति,सखीरे कहे हा विस्मिते ।। यारे चाहि छाड़िते, सेइ शुजा आछे चित्ते, कोन रीते ना पारि छाड़िते ॥
५६॥
इस तरह बोलते हुए श्रीमती राधारानी को सहसा कृष्ण का स्मरण हो आया। निस्सन्देह, वे उनके हृदय के भीतर प्रकट हुए। अत्यन्त चकित होकर उन्होंने अपनी सखियों से कहा, मैं जिस पुरुष को भूलना चाहती हूँ, वह तो मेरे हृदय में स्थित है।
राधा-भावेर स्वभाव आन, कृष्णे कराय‘काम’-ज्ञान,काम-ज्ञाने त्रास हैल चित्ते ।कहे ये जगत्मारे, से पशिल अन्तरे, एई वैरी ना देय पासरिते ॥
५७॥
श्रीमती राधारानी के भाव ने उन्हें यह सोचने के लिए भी बाध्य किया कि कृष्ण कामदेव हैं और इस ज्ञान से वे भयभीत हो उठीं। उन्होंने कहा, यह कामदेव, जिसने सारे जगत् को जीतकर मेरे हृदय में प्रवेश किया है, मेरा सबसे बड़ा शत्रु है, क्योंकि वह मुझे उन्हें भूलने की अनुमति नहीं देता।
औत्सुक्येर प्रावीण्ये, जिति' अन्य भाव-सैन्ये, उदय हैल निज-राज्य-मने । मने ह-इल लालस, ना हय आपन-वश,दुःखे मने करेन भर्सने ॥
५८ ॥
तब महान् उत्सुकता ने भाव के अन्य सारे सैनिकों को जीत लिया और श्रीमती राधारानी के मनोराज्य में ऐसी इच्छा उत्पन्न हुई, जो वश में नहीं आ रही थी। तब अत्यन्त दुःखी होकर, उन्होंने अपने ही मन की भर्त्सना की।
मन मोर वाम-दीन, जल विना ग्रेन मीन,कृष्ण विना क्षणे मरि' झाये । मधुर-हास्य-वदने, मन-नेत्र-रसायने, कृष्ण-तृष्णा द्विगुण बाड़ाय ॥
५९ ॥
यदि मैं कृष्ण के विषय में न सोचूं, तो मेरा दीन मन क्षणभर में मर जायेगा, जिस तरह जल के बाहर आने पर मछली मर जाती है। किन्तु जब मैं कृष्ण के मधुर हास्ययुक्त मुख को देखती हूँ, तो मेरा मन तथा मेरी आँखें इतनी प्रसन्न हो जाती हैं कि उनके देखने के लिए मेरी इच्छा पुनः द्विगुणित हो जाती है।
हा हा कृष्ण प्राण-धन, हा हा पद्म-लोचन,हा हा दिव्य सद्गुण-सागर! ।हा हा श्याम–सुन्दर, हा हा पीताम्बर-धर,हा हा रास-विलास नागर ॥
६०॥
हाय! मेरे जीवन की निधि कृष्ण कहाँ हैं? वे कमलनेत्र कहाँ हैं? हाय! वे समस्त दिव्य गुणों के दिव्य सागर कहाँ हैं? हाय! वे सुन्दर साँवले रंग वाले और पीताम्बर धारण किये हुए युवक कहाँ हैं? हाय! रासनृत्य के नायक कहाँ हैं? काहाँ गेले तोमा पाइ, तुमि कह, ताहाँ ग्राइ,एत कहि' चलिला धाज्ञा ।। स्वरूप उठि' कोले करि', प्रभुरे आनिल धरि',निज-स्थाने वसाइला लैजा ॥
६१॥
मैं कहाँ जाऊँ? मैं आपको कहाँ पा सकता हूँ? कृपया मुझे बताओ मैं वहीं जाऊँगा। इस तरह कहते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु दौड़ने लगे। किन्तु स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने खड़े होकर उन्हें पकड़ लिया औरअपनी गोद में उठा लिया। तब स्वरूप दामोदर उन्हें उनके स्थान पर लौटा ले आये और उन्हें बैठा दिया।
क्षणेके प्रभुर बाह्य हैल, स्वरूपेरे आज्ञा दिल,स्वरूप, किछु कर मधुर गान ।। स्वरूप गाय विद्यापति, गीत-गोविन्द-गीति,शुनि' प्रभुर जुड़ाइल काण ॥
६२॥
सहसा श्री चैतन्य महाप्रभु की बाह्यचेतना जाग्रत हुई और उन्होंने स्वरूप दामोदर गोस्वामी से कहा, हे प्रिय स्वरूप, कोई मधुर गीत गाओ। जब महाप्रभु ने स्वरूप दामोदर को गीत गोविन्द के तथा विद्यापति रचित गीत गाते सुना, तो उनके कर्ण तृप्त हो गये।
एइ-मत महाप्रभु प्रति-रात्रि-दिने । उन्माद चेष्टित हय प्रलाप-वचने ॥
६३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु इसी तरह प्रत्येक रात और दिन उन्मत्त हो उठते और एक पागल की तरह बातें करते।
एक-दिने व्रत हय भावेर विकार ।। सहस्त्र-मुखे वर्ण मंदि, नाहि पाय पार ॥
६४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु को एक दिन में जितने भाव-विकारों का अनुभव होता, उसका पूरा पूरा वर्णन हजार मुखों वाले अनन्तदेव भी नहीं कर सकते।
जीव दीन कि करिबे ताहार वर्णन? । शाखा-चन्द्र-न्याय करि' दिग्दरशन ॥
६५॥
मुझ जैसा दीन प्राणी उन विकारों का वर्णन कैसे कर सकता है? मैं तो केवल उनका संकेत कर सकता हूँ, जिस तरह वृक्ष की शाखाओं के बीच से चन्द्रमा को दिखलाया जा रहा हो।
इहा येइ शुने, तार जुड़ाय मन-काण । अलौकिक गूढ़-प्रेम-चेष्टा हय ज्ञान ।। ६६॥
किन्तु यह वर्णन उस व्यक्ति के मन तथा कानों को तुष्ट करेगा, जो इसे सुनेगा और वह कृष्ण के गहन प्रेम के इन असामान्य कार्यकलापों को समझ सकेगा।
अद्भुत निगूढ़ प्रेमेर माधुर्य-महिमा ।। आपनि आस्वादि' प्रभु देखाइला सीमा ॥
६७॥
कृष्ण के लिए प्रेमावेश अद्भुत तथा निगूढ़ है। उस प्रेम के महिमामय माधुर्य का स्वयं आस्वादन करके श्री चैतन्य महाप्रभु ने हमें इसकी चरम सीमा दिखलाई है।
अद्भुत-दयालु चैतन्य–अद्भुत-वदान्य! ।। ऐछे दयालु दाता लोके नाहि शुनि अन्य ॥
६८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु अद्भुत कृपालु एवं अद्भुत वदान्य हैं। हमने इस जगत् में उन जैसे दयालु तथा दानी अन्य किसी के बारे में नहीं सुना है।
सर्व-भावे भज, लोक, चैतन्य-चरण ।ग्राहा हैते पाइबा कृष्ण-प्रेमामृत-धन ॥
६९ ॥
हे संसार के लोगों, श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की सभी प्रकार से पूजा करो। केवल इसी विधि से तुम उन्मत कृष्ण-प्रेम के अमृतमय कोष को प्राप्त कर सकोगे।
एइ त कहिलँ'कूर्माकृति'-अनुभाव ।उन्माद-चेष्टित ताते उन्माद-प्रलाप ॥
७० ॥
इस तरह मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु के कूर्म जैसे बनने के विकार का वर्णन किया है। उस भाव में वे उन्मत्त की तरह बातें और कार्य करते थे।
एइ लीला स्व-ग्रन्थे रधुनाथ-दास ।।गौराङ्ग-स्तव-कल्पवृक्षे कैराछेन प्रकाश ॥
७१॥
श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी ने अपनी पुस्तक 'गौराङ्गस्तव कल्पवृक्ष में इस लीला का भलीभाँति वर्णन किया है।
अनुद्धाट्य द्वार-त्रयमुरु च भित्ति-त्रयमहोविलड्छ्योच्चैः कालिङ्गिक-सुरभि-मध्ये निपतितः । तनूद्यत्सङ्कोचात्कमठ इव कृष्णोरु-विरहाद्विराजनगौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥
७२ ॥
कितनी विचित्र बात है! श्री चैतन्य महाप्रभु ने तीन सुदृढ़तापूर्वक बन्द किए हुए दरवाजों को बिना खोले ही अपना घर छोड़ दिया। तब उन्होंने तीन ऊँची दीवालें लाँधी और बाद में वे कृष्ण-विरह की प्रबल अनुभूति के कारण तैलंग जिले की गौवों के बीच में गिर गये और अपने शरीर के सारे अंगों को कछुवे की तरह भीतर समेट लिया। इस तरह प्रकट होने वाले श्री चैतन्य महाप्रभु मेरे हृदय में उदित होकर मुझे उन्मत्त बनाते हैं।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
७३॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए तथा उनके चरणचिह्नों पर चलकर मैं कृष्णदास श्री चैतन्य चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
