अध्याय चौदह: भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की कृष्ण से अलगाव की भावनाएँ
कृष्ण-विच्छेद-विभ्रान्त्या मनसा वपुषा धिया ।।यद् यद्व्यधत्त गौराङ्गस्तल्लेशः कथ्यतेऽधुना ॥
१॥
अब मैं श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा मन, बुद्धि तथा शरीर से सम्पन्न कार्यकलापों के अत्यल्प अंश का वर्णन करूंगा, जब वे कृष्ण के तीव्र विरह भाव से मोहग्रस्त हो गये।
जय जय श्री-चैतन्य स्वयं भगवान् । जय जय गौरचन्द्र भक्त-गण-प्राण ॥
२॥
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! अपने भक्तों । के प्राण स्वरूप गौरचन्द्र की जय हो! जय जय नित्यानन्द चैतन्य-जीवन ।। जयाद्वैताचार्य जय गौर-प्रियतम ॥
३ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के जीवन रूप श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री तन्य महाप्रभु के अत्यन्त प्रिय अद्वैत आचार्य की जय हो! जय स्वरूप, श्रीवासादि प्रभु-भक्त-गण ।। शक्ति देह',–करि ग्रेन चैतन्य-वर्णन ॥
४॥
स्वरूप दामोदर तथा श्रीवास ठाकुर इत्यादि सारे भक्तों की जय हो! आप लोग मुझे श्री चैतन्य महाप्रभु के चरित्र का वर्णन करने की शक्ति प्रदान करें।
प्रभुर विरहोन्माद-भाव गम्भीर ।बुझिते ना पारे केह, यद्यपि हय 'धीर' ॥
५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के कृष्णविरह के दिव्य उन्माद का भाव अत्यन्त गम्भीर तथा रहस्यमय है। कोई कितना ही प्रबुद्ध तथा विद्वान ( धीर) क्यों न हो, वह इसे समझ नहीं सकता।
बुझिते ना पारि ग्राहा, वर्णिते के पारे? ।सेइ बुझे, वर्णे, चैतन्य शक्ति देन ग्राँरै ॥
६॥
भला कोई इन अगाध विषयों का वर्णन कैसे कर सकता है? यह तभी सम्भव है, जब श्री चैतन्य महाप्रभु उसे शक्ति प्रदान करें।
स्वरूप-गोसाजि आर रघुनाथ-दास ।।एइ दुइर कड़चाते ए-लीला प्रकाश ॥
७॥
स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा रघुनाथ दास गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु के इन समस्त दिव्य कार्यकलापों को अपनी स्मरणिका में लिपिबद्ध किया है।
से-काले ए-दुइ रहेन महाप्रभुर पाशे । आर सब कड़चा-कर्ता रहेन दूर-देशे ॥
८॥
उन दिनों स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा रघुनाथ दास गोस्वामी ही श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ रहते थे, जबकि अन्य सारे टीकाकार उनसे बहुत दूर रहते थे।
क्षणे क्षणे अनुभवि' एइ दुइ-जन ।। सङ्क्षेपे बाहुल्ये करेन कड़चा-ग्रन्थन ॥
९॥
इन दो महापुरुषों ( स्वरूप दामोदर तथा रघुनाथ दास गोस्वामी ) ने महाप्रभु के क्षण-क्षण के कार्यकलापों को लिपिबद्ध किया है। उन्होंने अपनी स्मरणिकाओं में इन कार्यकलापों का संक्षेप तथा विस्तृत-दोनों ही का वर्णन किया है।
स्वरूप‘सूत्र-कर्ता', रघुनाथ--‘वृत्तिकार' । तार बाहुल्य वर्णि–पाँजि-टीका-व्यवहार ॥
१० ॥
स्वरूप दामोदर ने संक्षेप में लिखा, जबकि रघुनाथ दास गोस्वामी ने विस्तृत वर्णन लिखे। अब मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यकलापों का वर्णन अधिक विस्तार से करूँगा, मानो दबी हुई रुई को धुना जा रहा हो।
ताते विश्वास करि' शुन भावेर वर्णन ।। ह-इबे भावेर ज्ञान, पाइबा प्रेम-धन ॥
११॥
कृपया श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेम-भावों का यह वर्णन श्रद्धापूर्वकसुनें। इस तरह आप उनके प्रेमावेश को जान सकेंगे और अन्त में भगवत्प्रेम प्राप्त करेंगे।
कृष्ण मथुराय गेले, गोपीर ये दशा हैल ।। कृष्ण-विच्छेदे प्रभुर से दशा उपजिल ॥
१२॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु को कृष्ण का विरह संतप्त करता, तो उनकी दशा वैसी ही हो जाती, जैसी कि कृष्ण के मथुरा जाने पर वृन्दावान में गोपियों की हो गई थी।
उद्धव-दर्शने झैछे राधार विलाप । क्रमे क्रमे हैल प्रभुर से उन्माद-विलाप ॥
१३॥
उद्धव के वृन्दावन आने पर श्रीमती राधारानी का शोक क्रमशः श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य उन्माद का अंग बन गया।
राधिकार भावे प्रभुर सदा 'अभिमान' । सेइ भावे आपनाके हय 'राधा'-ज्ञान ॥
१४॥
उद्धव से मिलते समय श्रीमती राधारानी के जो भाव थे, श्री चैतन्य महाप्रभु के वही भाव हो गये। महाप्रभु अपने आपको सदैव राधारानी के स्थान पर कल्पित करते और कभी-कभी सोचते कि वे ही स्वयं श्रीमती राधारानी हैं।
दिव्योन्मादे ऐछे हय, कि इहा विस्मय? ।।अधिरूढ़-भावे दिव्योन्माद-प्रलाप होय ॥
१५ ॥
दिव्य उन्माद की अवस्था ऐसी है। इसे समझना कठिन क्यों है? जब कोई कृष्ण-प्रेम में अत्यधिक उन्नति कर जाता है, तो वह दिव्य रूप से उन्मत्त होकर, उन्मत्त की तरह बातें करता है।
एतस्य मोहनाख्यस्य | गतिं कामप्युपेयुषः भ्रमाभा कापि वैचित्रीदिव्योन्माद इतीर्यते उद्भूर्णा-चित्र-जल्पाद्यास्तद्भेदा बहवो मताः ॥
१६॥
जब मोहन भाव की क्रमशः वृद्धि होती है, तब यह भ्रम के समान हो जाता है। तब वैचित्री अर्थात् आश्चर्य की अवस्था प्राप्त होती है, जो दिव्य उन्माद को जागृत करती है। दिव्योन्माद के अनेक विभागों में से उद्भूर्णा तथा चित्रजल्प दो हैं।
एक-दिन महाप्रभु करियाछेन शयन ।कृष्ण रास-लीला करे,—देखिला स्वपन ॥
१७॥
एक दिन श्री चैतन्य महाप्रभु जब विश्राम कर रहे थे, तब उन्होंने स्वप्न देखा कि कृष्ण रास नृत्य कर रहे हैं।
त्रिभङ्ग-सुन्दर-देह, मुरली-वदन ।पीताम्बर, वने-माला, मदन-मोहन ॥
१८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने देखा कि भगवान् कृष्ण खड़े हैं और उनका सुन्दर शरीर तीन स्थानों से मुड़ा है और वे अपने अधरों पर मुरली धारण किये हुए हैं। पीतवस्त्र तथा वन्य फूलों की माला पहने वे कामदेव को भी मोहित करने वाले दिख रहे थे।
मण्डली-बन्धे गोपी-गण करेन नर्तन ।।मध्ये राधा-सह नाचे व्रजेन्द्र-नन्दन ॥
१९॥
गोपियाँ एक वृत्त में नृत्य कर रही थीं और इस वृत्त के बीच में महाराज नन्द के पुत्र कृष्ण, राधारानी के साथ नृत्य कर रहे थे।
देखि' प्रभु सेइ रसे आविष्ट हैला ।‘वृन्दावने कृष्ण पाइनु'–एइ ज्ञान कैला ॥
२०॥
यह देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु रास नृत्य के दिव्य रस से अभिभूत हो गये और उन्होंने सोचा,अब मैं कृष्ण के साथ वृन्दावन में हूँ।
प्रभुर विलम्ब देखि' गोविन्द जागाइला । जागिले ‘स्वप्न'-ज्ञान हैल, प्रभु दुःखी हैला ॥
२१॥
जब गोविन्द ने देखा कि महाप्रभु अभी तक नहीं जागे हैं, तो उसने उन्हें जगाया। यह जानकर कि वे मात्र स्वप्न देख रहे थे, महाप्रभु कुछ-कुछ दुःखी हुए।
देहाभ्यासे नित्य-कृत्य करि' समापन ।। काले ग्राइ' कैला जगन्नाथ दरशन ॥
२२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने नित्य कृत्य सम्पन्न किये और ठीक समय पर वे मन्दिर में भगवान् जगन्नाथजी का दर्शन करने गये।
यावत् काल दर्शन करेन गरुडेर पार्छ ।प्रभुर आगे दर्शन करे लोक लाखे लाखे ॥
२३॥
जब उन्होंने गरुड़ स्तम्भ के पीछे से भगवान् जगन्नाथ का दर्शन किया, तब उनके सामने लाखों लोग अर्चाविग्रह का दर्शन कर रहे थे।
उड़िया एक स्त्री भीड़े दर्शन ना पाजा ।।गरुड़े चड़ि' देखे प्रभुर स्कन्धे पद दिया ॥
२४॥
भीड़ के कारण भगवान् जगन्नाथ का दर्शन न कर पाने के कारण एक उड़िया स्त्री सहसा श्री चैतन्य महाप्रभु के कन्धे पर अपना पाँव रखकर गरुड़ स्तम्भ पर चढ़ गई।
देखिया गोविन्द आस्ते-व्यस्ते स्त्रीके वर्जिली ।तारे नामाइते प्रभु गोविन्दे निषेधिला ॥
२५॥
यह देखकर चैतन्य महाप्रभु के निजी सहायक गोविन्द ने शीघ्रता से उसे वहाँ से नीचे उतारा। किन्तु इसके लिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोविन्द की भर्त्सना की।
'आदि-वस्या' एइ स्त्रीरे ना कर वर्जन ।।करुक यथेष्ट जगन्नाथ दरशन ॥
२६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोविन्द से कहा, रे आदिवस्या ( असभ्य पुरुष ), इस स्त्री को गरुड़-स्तम्भ पर चढ़ने से मना मत करो। उसे जी भरकर जगन्नाथजी का दर्शन करने दो।
आस्ते-व्यस्ते सेइ नारी भूमेते नामिला ।।महाप्रभुरे देखि' ताँर चरण वन्दिला ॥
२७॥
किन्तु जब उस स्त्री को ज्ञात हुआ, तो वह तुरन्त भूमि पर उतर आई और श्री चैतन्य महाप्रभु को देखकर उसने तुरन्त ही क्षमा करने के लिए उनके चरणकमलों पर याचना की।
तार आर्ति देखि' प्रभु कहिते लागिला । एत आर्ति जगन्नाथ मोरे नाहि दिला! ॥
२८ ॥
उस स्त्री की उत्सुकता को देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा। जगन्नाथ जी ने मुझे इतनी उत्सुकता प्रदान नहीं की।
जगन्नाथे आविष्ट इहार तनु-मन-प्राणे ।मोर स्कन्धे पद दियाछे, ताहो नाहि जाने ॥
२९॥
उसने पूरी तरह से अपना शरीर, मन तथा प्राण भगवान् जगन्नाथ में निमग्न कर दिया है। इसलिए उसे पता नहीं चला कि उसने मेरे कन्धे पर अपना पाँव रखा है।
अहो भाग्यवती एइ, वन्दि इहार पाय ।इहार प्रसादे ऐछे आर्ति आमार वा हय ॥
३०॥
ओह! यह स्त्री कितनी भाग्यशालिनी है! मैं उसके चरणों की वन्दना करता हूँ कि वह जगन्नाथ जी का दर्शन करने की अपनी महान् उत्सुकता मुझे प्रदान करे।
पूर्वे आसि' ग्रबे कैला जगन्नाथ दरशन ।जगन्नाथे देखे साक्षात् व्रजेन्द्र-नन्दन ॥
३१॥
इसके पूर्व श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ जी को साक्षात् महाराज नन्द के पुत्र कृष्ण के रूप में देखते आ रहे थे।
स्वप्नेर दर्शनावेशे तद्रूप हैल मन । ग्राहाँ ताहाँ देखे सर्वत्र मुरली-वदन ॥
३२॥
उस दृश्य में पूर्णतया मग्न होकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोपियों का भाव धारण कर लिया था, यहाँ तक कि वे जहाँ भी देखते, उन्हें होठों पर अपनी मुरली रखे कृष्ण खड़े दिखाई देते।
एबे ग्रदि स्त्रीरे देखि' प्रभुर बाह्य हैल ।जगन्नाथ-सुभद्रा-बलरामेर स्वरूप देखिल ॥
३३॥
उस स्त्री को देखने के बाद महाप्रभु की बाह्य चेतना लौट आई और उन्होंने भगवान जगन्नाथ, सुभद्रा तथा बलराम जी के मूल अर्चाविग्रह रूपों को देखा।
कुरुक्षेत्रे देखि' कृष्णे ऐछे हैल मन ।। ‘काहाँ कुरुक्षेत्रे आइलाङ, काहाँ वृन्दावन?' ॥
३४॥
जब उन्होंने अर्चाविग्रहों को देखा, तो उन्होंने सोचा कि वे कृष्ण को कुरुक्षेत्र में देख रहे हैं। उन्होंने सोचा, क्या मैं कुरुक्षेत्र में आ गया हूँ? न्दावन कहाँ है? प्राप्त-रल हाराजा ऐछे व्यग्र ह-इलो । विषण्ण हा प्रभु निज-वासा आइला ॥
३५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु उसी तरह अत्यधिक व्याकुल हो उठे, जिस तरह तुरन्त प्राप्त किये रत्न के खो जाने से कोई व्यक्ति व्याकुल हो उठता है। तब वे अत्यधिक खिन्न हो गये और घर लौट आये।
भूमिर उपर वसि' निज-नखे भूमि लिखे । अश्रु-गङ्गा नेत्रे वहे, किछुइ ना देखे ॥
३६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु भूमि पर बैठकर अपने नाखूनों से भूमि कुरेदने लगे। आँसुओं से उनके नेत्र अन्धे हो चले-ये आँसू उनके नेत्रों से गंगा नदी के समान प्रवाहित हो रहे थे।
‘पाइलँ वृन्दावन-नाथ, पुनः हाराइलें ।के मोर निलेक कृष्ण? काहाँ मुइ आइनु'? ॥
३७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैंने वृन्दावन के स्वामी कृष्ण को पाया तो सही, किन्तु उन्हें फिर से खो दिया। मेरे कृष्ण को किसने ले लिया? मैं कहाँ आ गया हूँ? स्वप्नावेशे प्रेमे प्रभुर गर गर मन ।। बाह्य हैले हयग्रेन हाराइल धन ॥
३८॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने रास नृत्य का स्वप्न देखा, तब वे दिव्य आनन्द में पूर्णतया मग्न थे, किन्तु जब उनका स्वप्न टूटा, तो उन्हें लगा कि उनका एक अमूल्य रत्न खो गया है।
उन्मत्तेर प्राय प्रभु करेन गान-नृत्य ।। देहेर स्वभावे करेन स्नान-भोजन-कृत्य ॥
३९॥
इस तरह दिव्य उन्माद के आनन्द में सदैव मग्न श्री चैतन्य महाप्रभु कीर्तन और नृत्य करते। वे खाने तथा स्नान करने जैसी शारीरिक आवश्यकताओं को स्वभाववश पूरा कर लेते।
रात्रि हैले स्वरूप-रामानन्दे लजा ।। आपन मनेर भाव कहे उघाड़िया ॥
४०॥
रात्रि के समय श्री चैतन्य महाप्रभु अपने मन के भावों को स्वरूप दामोदर तथा रामानन्द राय के सामने व्यक्त करते थे।
प्राप्त-प्रणष्टाच्युत-वित्त आत्माययौ विषादोज्झित-देह-गेहः । गृहीत-कापालिक-धर्मको मेवृन्दावनं सेन्द्रिय-शिष्य-वृन्दः ॥
४१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, पहले मेरे मन ने कृष्ण रूपी रत्न को जैसे-कैसे प्राप्त किया, किन्तु पुनः उसे खो दिया। इसलिए उसने शोक के कारण मेरे शरीर और घर को छोड़कर कापालिक योगी के धर्म को स्वीकार कर लिया है। तब मेरा मन मेरी इन्द्रियाँ रूपी अपने शिष्यों के साथ वृन्दावन चला गया।
प्राप्त-रत्न हारा, तार गुण सडरिया,महाप्रभु सन्तापे विह्वल ।। राय-स्वरूपेर कण्ठ धरि', कहे 'हाहा हरि हरि',धैर्य गेल, ह-इला चपल ॥
४२ ॥
अपने प्राप्त किये हुए रत्न को खोकर श्री चैतन्य महाप्रभु उसके गुणों का स्मरण करके शोक से विह्वल हो गये। तब रामानन्द राय तथा स्वरूप दामोदर गोस्वामी के गले लगकर वे रो पड़े, हाय! मेरे हरि कहाँ हैं? हर कहाँ हैं? अन्त में वे चंचल हो उठे और उनका सारा धैर्य जाता रहा।
शुन, बान्धव, कृष्णेर माधुरी ग्रार लोभे मोर मन, छाड़ि' लोक-वेद-धर्म, ।ोगी हा ह-इल भिखारी ॥
४३॥
उन्होंने कहा, हे बन्धुओं, कृपया कृष्ण की मधुरता के विषय में सुनो। उस मधुरता के लिए महती इच्छा के कारण मेरे मन ने सारे सामाजिक तथा वैदिक धर्म के सिद्धान्तों को त्याग दिया है और उसने योगी की तरह भिखारी की वृत्ति अपना ली है।
कृष्ण-लीला-मण्डल, शुद्ध शङ्ख-कुण्डल,गड़ियाछे शुक कारिकर । सेइ कुण्डल काणे परि', तृष्णा-लाउ-थाली धरि',अशा-झुलि कान्धेर उपर ॥
४४॥
अत्यन्त शुभ कारीगर शुकदेव गोस्वामी द्वारा निर्मित कृष्ण की रासलीला का वृत्त, शंख से बने एक कुण्डल की ही तरह शुद्ध है। मेरे घन रूपी योगी ने उस कुण्डल को अपने कान में धारण कर रखा है। उसने एक लौकी से मेरी तृष्णाओं का कमण्डल बना लिया है और मेरी आशाओं का झोला अपने कन्धे पर टाँग लिया है।
चिन्ता-कान्था उढ़ि गाय, धूलि-विभूति-मलिन-काय,'हाहा कृष्ण' प्रलाप-उत्तर ।। उद्वेग द्वादश हाते, लोभेर झुलनि माथे, भिक्षाभावे क्षीण कलेवर ॥
४५ ॥
मेरा मन रूपी योगी चिन्ता की फटी गुदड़ी धूल तथा राख से सने अपने गन्दे शरीर में धारण करता है। उसके एकमात्र शब्द हैं, ‘हाय।। कृष्ण!' वह अपनी कलाई में दुःख की बारह चूड़ियाँ धारण करता है। और अपने सिर पर लोभ की पगड़ी बाँधता है। कुछ न खाने के कारण वह अत्यन्त क्षीण है।
व्यास, शुकादि योगि-गण, कृष्ण आत्मा निरञ्जन, व्रजे ताँर व्रत लीला-गण ।। भागवतादि शास्त्र-गणे, करियाछे वर्णने,सेइ तर्जा पड़े अनुक्षण ॥
४६॥
मेरा मन रूपी योगी सदैव कृष्ण की वृन्दावन लीलाओं की कविता तथा व्याख्याओं को पढ़ता है। श्रीमद्भागवत तथा अन्य शास्त्रों में व्यासदेव तथा शुकदेव गोस्वामी जैसे महान् सन्त योगीजनों ने भगवान् कृष्ण का वर्णन परमात्मा के रूप में किया है, जो सारे भौतिक कल्मष से परे हैं।
दशेन्द्रिये शिष्य करि', 'महा-बाउल' नाम धरि', शिष्य लञा करिल गमन ।। मोर देह स्व-सदन, विषय-भोग महा-धन,सब छाड़ि' गेला वृन्दावन ॥
४७॥
मेरे मन रूपी योगी ने महा-बाउल नाम ग्रहण किया है और मेरी दस 'इन्द्रियों को अपना शिष्य बना लिया है। इस तरह मेरा मन मेरे शरीर रूपी घर को तथा भौतिक भोग के महान् कोष को छोड़कर वृन्दावन चला गया ।
वृन्दावने प्रजा-गण, व्रत स्थावर-जङ्गम,वृक्ष-लता गृहस्थ-आश्रमे ।। तार घरे भिक्षाटन, फल-मूल-पत्राशन, एई वृत्ति करे शिष्य-सने ॥
४८॥
वह वृन्दावन में अपने शिष्यों के साथ द्वार-द्वार भीख माँगता है। वह चर तथा अचर दोनों ही तरह के निवासियों से-नागरिकों, वृक्षों तथा लताओं से भीख माँगता है। इस तरह वह फल, मूल तथा पत्तों पर जीवन निर्वाह करता है।
कृष्ण-गुण-रूप-रस, गन्ध, शब्द, परश,से सुधा आस्वादे गोपी-गण ।। ता-सबार ग्रास-शेषे, आनि' पञ्चेन्द्रिय शिष्ये, से भिक्षाय राखेन जीवन ॥
४९॥
व्रजभूमि की गोपियाँ सदा कृष्ण के गुणों, उनके सौन्दर्य, उनकी मधुरता, उनकी सुगन्ध, उनकी वंशी की ध्वनि तथा उनके शरीर-स्पर्श के अमृत का आस्वादन करती हैं। मेरे मन के पाँच शिष्य, मेरी ज्ञानेन्द्रियाँ उसे अमृत के शेष को गोपियों से एकत्र करके मेरे मन रूपी योगी के पास लाती हैं। इन्द्रियाँ उसी शेष को खाकर अपना जीवन धारण करती हैं।
शून्य-कुञ्ज-मण्डप-कोणे, योगाभ्यास कृष्ण-ध्याने,ताहाँ रहे ला शिष्य-गण ।। कृष्ण आत्मा निरञ्जन, साक्षात् देखिते मन,ध्याने रात्रि करे जागरण ॥
५०॥
एक एकान्त उद्यान में कृष्ण अपनी लीलाओं का आनन्द लेते हैं और उस उद्यान के मण्डप के एक कोने में मेरा मन रूपी योगी अपने शिष्यों सहित योगाभ्यास करता है। वह योगी कृष्ण का प्रत्यक्ष दर्शन करने के लिए रातभर जागता रहता है और कृष्ण का ध्यान करता है, जो कि परमात्मा हैं और प्रकृति के तीन गुणों से अकलुषित रहते हैं।
मन कृष्ण-वियोगी, दुःखे मन हैल योगी,से वियोगे दश दशा हय ।। से दशाय व्याकुल हा, मन गेल पलाजा,शून्य मोर शरीर आलय ॥
५१॥
जब मेरे मन ने कृष्ण-संग खो दिया और वह उन्हें नहीं देख पाया, तो वह अत्यधिक दुःखी हो गया और उसने योग धारण कर लिया। कृष्ण के वियोग की शून्यता में उसे दस दिव्य विकारों का अनुभव हुआ। इन विकारों से चलायमान होकर मेरा मन अपने निवासस्थान मेरे शरीर को छोड़कर भाग गया है। इस प्रकार मैं पूर्णतया समाधि में हूँ।
कृष्णेर वियोगे गोपीर दश दशा हय । सेइ दश दशा हय प्रभुर उदय ॥
५२॥
जब गोपियों को कृष्ण के वियोग का अनुभव हुआ, तब उन्होंने दस प्रकार के शारीरिक विकारों का अनुभव किया। वे ही लक्षण श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में प्रकट हो गये।
चिन्तात्र जागरोद्वेगौ तानवं मलिनाङ्गता । प्रलापो व्याधिरुन्मादो मोहो मृत्युर्दशा दश ॥
५३॥
कृष्ण वियोग से उत्पन्न दस शारीरिक विकार हैं-चिन्ता, जागरण, उद्वेग, कृशता, मलिनता, प्रलाप, व्याधि, उन्माद, मोह तथा मृत्यु।
एइ दश-दशाय प्रभु व्याकुल रात्रि-दिने । कभु कोन दशा उठे, स्थिर नहे मने ॥
५४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु इन दस दशाओं से रात-दिन व्याकुल रहते थे। जब भी ऐसे लक्षण उत्पन्न होते, उनका मन अस्थिर हो उठता।
एत कहि' महाप्रभु मौन करिला ।। रामानन्द-राय श्लोक पड़िते लागिला ॥
५५॥
इस तरह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु मौन हो गये। तब रामानन्द राय विविध श्लोक सुनाने लगे।
स्वरूप-गोसाजि करे कृष्ण-लीला गान ।दुइ जने किछु कैला प्रभुर बाह्य ज्ञान ॥
५६॥
रामानन्द राय ने ' श्रीमद्भागवत' से कई श्लोक सुनाये और स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने कृष्ण लीलाओं का गायन किया। इस तरह उन दोनों ने महाप्रभु की बाह्य चेतना लौटाई।
एइ-मत अर्ध-रात्रि कैला निर्मापण । भितर-प्रकोष्ठे प्रभुरे कराइला शयन ॥
५७॥
इस प्रकार आधी रात बीत जाने पर रामानन्द राय तथा स्वरूप दामोदर स्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु को भीतरी कमरे में शय्या पर लिटाया।
रामानन्द-राय तबे गेला निज घरे ।स्वरूप-गोविन्द ढूँहे शुइलेन द्वारे ॥
५८॥
तब रामानन्द राय घर लौट आये और स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा गोविन्द श्री चैतन्य महाप्रभु के कमरे के दरवाजे के सामने लेट गये।
सब रात्रि महाप्रभु करे जागरण ।उच्च करि' कहे कृष्ण-नाम-सङ्कीर्तन ॥
५९ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु सारी रात उच्च स्वर से हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन करते हुए जागते रहे।
शब्द ना पाञा स्वरूप कपाट कैला दूरे ।। तिन-द्वार देओया आछे, प्रभु नाहि घरे! ॥
६० ॥
कुछ देर बाद स्वरूप दामोदर को श्री चैतन्य महाप्रभु का जप करना नहीं सुनाई पड़ा। जब वे कमरे के भीतर गये, तो उन्होंने देखा कि तीनों दरवाजों पर ताले लगे हैं, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु वहाँ नहीं हैं।
चिन्तित ह-इल सबे प्रभुरे ना देखियो । प्रभु चाहि' बुले सबे देउटी ज्वालिया ॥
६१॥
जब सारे भक्तों ने देखा कि महाप्रभु अपने कमरे में नहीं हैं, तो वे अत्यन्त चिन्तित हो उठे। वे दीपक जलाकर उन्हें ढूँढ़ने के लिए इधरउधर घूमने लगे।
सिंह-द्वारेर उत्तर-दिशाय आछे एक ठाजि ।। तार मध्ये पड़ि' आछेन चैतन्य-गोसाजि ॥
६२ ॥
कुछ देर ढूँढ़ने के बाद उन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु सिंहद्वार से उत्तर की शा में एक कोने में लेटे मिले।
देखि' स्वरूप-गोसाजि-आदि आनन्दित हैला ।प्रभुर दशा देखि' पुनः चिन्तिते लागिला ॥
६३॥
पहले तो उन्हें देखकर स्वरूप दामोदर गोस्वामी इत्यादि सारे भक्त आनन्दित हो गये, किन्तु जब उन्होंने उनकी दशा देखी, तो वे चिन्तित हो उठे।
प्रभु पड़ि' आछेन दीर्घ हात पाँच-छय ।अचेतन देह, नासाय श्वास नाहि वय ॥
६४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु अचेत लेटे थे और उनका शरीर लम्बा होकर पाँच-छह हाथ का हो गया था। उनके नथुनों से श्वास नहीं निकल रही थी।
एक एक हस्त-पाद दीर्घ तिन तिन-हात । अस्थि-ग्रन्थि भिन्न, चर्म आछे मात्र तात ॥
६५॥
हस्त, पाद, ग्रीवा, कटि, अस्थि सन्धि व्रत । एक एक वितस्ति भिन्न हाछे तत ॥
६६ ॥
उनके हाथ तथा पाँव तीन-तीन हाथ लम्बे हो गये थे। उनके अलगअलग हुए जोड़ों को केवल चमड़ी बाँधे थी। जीवन-सूचक, महाप्रभु का शारीरिक तापमान, अत्यन्त कम था। उनके हाथ, पाँव, गरदन तथा कमर के सारे जोड़ कम से कम छः इंच अलग हो चुके थे।
चर्म-मात्र उपरे, सन्धि आछे दीर्घ हा ।दुःखित है-इला सबे प्रभुरे देखिया ॥
६७॥
ऐसा प्रतीत होता था मानो उनके लम्बायमान जोड़ों को केवल चमड़ी ढके हुए थी। महाप्रभु की दशा देखकर सारे भक्त दुःखी हुए।
मुखे लाला-फेन प्रभुर उत्तान-नयान ।। देखिया सकल भक्तेर देह छाड़े प्राण ॥
६८ ॥
जब उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के मुँह को लार तथा झाग से भरा तथा आँखों को उलटी हुई देखा, तो वे सभी मृतप्राय हो गये।
स्वरूप-गोसाजि तबे उच्च करिया । प्रभुर काणे कृष्ण-नाम कहे भक्त-गण ला ॥
६९॥
जब उन्होंने यह सब देखा, तो स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा अन्य सारे भक्त महाप्रभु के कान में जोर-जोर से कृष्ण नाम का उच्चारण करने लगे।।
बहु-क्षणे कृष्ण-नाम हृदये पशिला ।।‘हरि-बोल' बलि' प्रभु गर्जिया उठिला ॥
७० ॥
जब वे इस तरह देर तक उच्चारण करते रहे, तब कृष्ण का पवित्र नाम श्री चैतन्य महाप्रभु के हृदय में प्रविष्ट हुआ और वे हरि बोल की गर्जना करते हुए सहसा उठ गये।
चेतन पाइते अस्थि-सन्धि लागि । पूर्व-प्राय यथावत् शरीर ह-इल ॥
७१ ॥
जैसे ही महाप्रभु की बाह्य चेतना लौट आई, उनके सारे जोड़ सिकुड़ गये और उनका सारा शरीर सामान्य हो गया।
एइ लीला महाप्रभुर रघुनाथ-दास ।। ‘गौराङ्ग-स्तव-कल्पवृक्षे' करियाछे प्रकाश ॥
७२॥
श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी ने इन लीलाओं का विस्तृत वर्णन अपनी पुस्तक 'गौरांग स्तव कल्पवृक्ष' में किया है।
क्वचिन्मिश्रावासे व्रज-पति-सुतस्योरु-विरहात्श्लथच्छी-सन्धित्वाद्दधदधिक-दैर्ध्य भुज-पदोः । लुठभूमौ काक्वा विकल-विकलं गद्गद-वचारुदन्श्री-गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥
७३॥
कभी-कभी श्री चैतन्य महाप्रभु काशी मिश्र के घर में कृष्ण के वियोग का अनुभव करते हुए अत्यधिक दुःखी होते। उनके दिव्य शरीर के जोड़ ढीले पड़ जाते और उनके हाथ-पाँव लम्बे हो जाते। भूमि पर लोटते हुए महाप्रभु अवरुद्ध वाणी से व्यथा के कारण विलाप करते और अत्यन्त शोक संतप्त होकर रोते। श्री चैतन्य महाप्रभु का यह दृश्य मेरे हृदय में उदित होकर मुझे उन्मत्त बनाता है।
सिंह-द्वारे देखि' प्रभुर विस्मय ह-इला ।‘काँहा कर कि'–एइ स्वरूपे पुछिला ॥
७४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु अपने आपको सिंहद्वार के सामने पाकर अत्यधिक चकित हुए। उन्होंने स्वरूप दामोदर गोस्वामी से पूछा, मैं कहाँ हूँ? मैं यहाँ क्या कर रहा हूँ? स्वरूप कहे,–उठ, प्रभु, चल निज-घरे ।तथाई तोमारे सब करिमु गोचरे' ॥
७५ ॥
स्वरूप दामोदर ने कहा, हे प्रभु, कृपया उठिये। चलिये, आपके स्थान पर चलें। जो कुछ हुआ है, वहीं मैं आपको सब कुछ बतला दूंगा।
एत बलि' प्रभुरे धरि' घरे ला गेला ।ताँहार अवस्था सब कहते लागिला ॥
७६ ॥
इस तरह सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु को सहारा देते हुए उन्हें उनके घर लौटा ले गये। तब उन्होंने जो कुछ हुआ था सब बतलाया।
शुनि' महाप्रभु बड़ हैला चमत्कार । प्रभु कहे,–'किछु स्मृति नाहिक आमार ॥
७७॥
सिंहद्वार के निकट लेटे हुए अपनी दशा का वर्णन सुनकर श्री चैतन्य माप्रभु अत्यधिक आश्चर्यचकित हुए। उन्होंने कहा, मुझे इनमें से किसी भी बात को स्मरण नहीं है।
सबे देखि—हये मोर कृष्ण विद्यमान ।। विद्युत्प्राय देखा दिया हय अन्तर्धान' ॥
७८ ॥
मुझे केवल इतना ही स्मरण है कि मैंने अपने कृष्ण को देखा, किन्तु मात्र एक क्षण के लिए। वे मेरे समक्ष प्रकट हुए और फिर बिजली की तरह तुरन्त अन्तर्धान हो गये।
हेन-काले जगन्नाथेर पाणि-शङ्ख बाजिला । स्नान करि' महाप्रभु दरशने गेला ॥
७९॥
उसी समय सबों ने जगन्नाथ मन्दिर में शंख बजने की ध्वनि सुनी। श्री । चैतन्य महाप्रभु ने तुरन्त स्नान किया और जगन्नाथ जी का दर्शन करने चले गये।
एइ त कहिलँ प्रभुर अद्भुत विकार ।।ग्राहार श्रवणे लोके लागे चमत्कार ॥
८० ॥
इस तरह से मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर के असामान्य विकारों का वर्णन किया है। जब लोग इसके विषय में सुनते हैं, तो वे अत्यन्त चकित होते हैं।
लोके नाहि देखि ऐछे, शास्त्रे नाहि शुनि ।।हेन भाव व्यक्त करे न्यासि-चूड़ामणि ॥
८१॥
न तो किसी ने अन्यत्र ऐसे शारीरिक परिवर्तन देखे हैं, न ही शास्त्रों में उनके विषय में किसी ने पढ़ा है। फिर भी परम संन्यासी श्री चैतन्य प्रभु ने इन दिव्य लक्षणों को प्रकट किया।
शास्त्र-लोकातीत येइ ग्रेई भाव हय ।।इतर-लोकेर ताते ना हय निश्चय ॥
८२॥
इन भावों का शास्त्रों में वर्णन नहीं हुआ है और वे सामान्य लोगों के लिए अचिन्त्य हैं। इसलिए सामान्य लोग उनमें विश्वास नहीं करते।
रघुनाथ-दासेर सदा प्रभु-सङ्गे स्थिति ।।ताँर मुखे शुनि' लिखि करिया प्रतीति ॥
८३॥
रघुनाथ दास गोस्वामी लगातार श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ रहते थे। मैंने उनसे जो कुछ सुना है, उसे ही मैं लिख रहा हूँ। यद्यपि सामान्य लोग म लीलाओं में विश्वास नहीं करते, किन्तु मैं उनमें पूरी तरह से विश्वास करता हूँ।
एक-दिन महाप्रभु समुद्रे झाइते ।।‘चटक'-पर्वत देखिलेन आचम्बिते ॥
८४॥
एक दिन जब श्री चैतन्य महाप्रभु समुद्र स्नान करने जा रहे थे, तब उन्होंने सहसा बालू का टीला देखा, जिसका नाम चटक पर्वत था।
गोवर्धन-शैल-ज्ञाने आविष्ट ह-इला ।।पर्वत-दिशाते प्रभु धाज्ञा चलिला ॥
८५ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु को इस बालू के टीले में गोवर्धन पर्वत का भ्रम हो गया और वे उसकी ओर दौड़ने लगे।
हन्तायमद्रिरबला हरि-दास-वर्यो ।यद्राम-कृष्ण-चरण-स्परश-प्रमोदः । मानं तनोति सह-गो-गणयोस्तयोर्यत्पानीय-सूयवस-कन्दर-कन्द-मूलैः ॥
८६॥
( श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा :)‘समस्त भक्तों में यह गोवर्धन पर्वत सर्व श्रेष्ठ है! हे मित्रों, यह पर्वत कृष्ण तथा बलराम एवं उनके बछड़ों, गायों तथा ग्वाल मित्रों की सभी प्रकार की आवश्यकताओं को पूरा करता है। यह पीने के लिए जल, अत्यन्त कोमल घास, गुफाएँ, फल, फूल, वनस्पतियाँ प्रदान करता है। इस तरह यह पर्वत भगवान् को नमस्कार भरता है। कृष्ण तथा बलराम के चरणकमलों का स्पर्श पाकर यह अत्यन्त र्षित प्रतीत होता है।
एइ श्लोक पड़ि' प्रभु चलेन वायु-वेगे ।गोविन्द धाइल पाछे, नाहि पाय लागे ॥
८७॥
यह श्लोक का उच्चारण करते हुए महाप्रभु वायु के वेग से उस बालू के टीले की ओर दौड़ने लगे। गोविन्द उनके पीछे-पीछे दौड़ा, किन्तु वह उनके पास नहीं पहुँच सका।
फुकार पड़िल, महा-कोलाहल ह-इल ।।ग्रेई ग्राहाँ छिल सेइ उठिया धाइल ॥
८८ ॥
पहले एक भक्त जोर से चिल्लाया और फिर जब सारे भक्त उठकर महाप्रभु के पीछे दौड़ने लगे, तो कोलाहल होने लगा।
स्वरूप, जगदानन्द, पण्डित-गदाधर । रामाइ, नन्दाइ, आर पण्डित शङ्कर ॥
८९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के पीछे दौड़ने वाले कुछ अन्य भक्तगण थेस्वरूप दामोदर गोस्वामी, जगदानन्द पण्डित, गदाधर पण्डित, रामाइ, नन्दाइ तथा शंकर पण्डित।
पुरी-भारती-गोसाजि आइला सिन्धु-तीरे ।भगवानाचार्य खञ्ज चलिला धीरे धीरे ॥
९०॥
परमानन्द पुरी तथा ब्रह्मानन्द भारती भी समुद्रतट की ओर गये और गान् आचार्य जो कि लँगड़े थे, उनके पीछे धीरे-धीरे चल रहे थे।
प्रथमे चलिला प्रभु,—येन वायु-गति ।।स्तम्भ-भाव पथे हैल, चलिते नाहि शक्ति ॥
९१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु वायु की गति से दौड़ रहे थे, किन्तु सहसा भावावेश में वे स्तम्भित हो गये, जिससे आगे चल पाने की उनकी सारी भक्ति जाती रही।
प्रति-रोम-कूपे मांस व्रणेर आकार । तार उपरे रोमोद्गम-कदम्बे-प्रकार ॥
९२॥
उनका हर रोमकूप फुसियों की तरह फूट पड़ा और उनके शरीर के माल खड़े हो गये, जो कदम्ब के फूलों जैसे प्रतीत होने लगे।
प्रति-रोमे प्रस्वेद पड़े रुधिरेर धार ।।कण्ठे घर्घर, नाहि वर उच्चार ॥
९३॥
उनके शरीर के हर रोमकूप से रक्त तथा पसीना लगातार बहने लगा। वे एक शब्द भी नहीं बोल सकते थे; वे अपने गले से केवल घर्राहट का शब्द उत्पन्न कर रहे थे।
दुइ नेत्रे भरि' अश्रु वहये अपार ।।समुद्रे मिलिला ग्रेन गङ्गा-यमुना-धार ॥
९४॥
महाप्रभु की आँखे भर आईं और उनसे अपार अश्रु बहने लगे, मानो गंगा तथा यमुना नदियाँ समुद्र में मिल रही हों।
वैवर्ये शङ्ख-प्राय श्वेत हैल अङ्ग ।तबे कम्प उठे,—ग्रेन समुद्रे तरङ्ग ॥
९५ ॥
उनका सम्पूर्ण शरीर विवर्ण होकर श्वेत शंख के रंग का हो गया और घे काँपने लगे, मानों समुद्र में लहरें उठ रही हों।
काँपिते काँपिते प्रभु भूमेते पड़िला ।तबे त' गोविन्द प्रभुर निकटे आइला ।। ९६॥
इस तरह काँपते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु भूमि पर गिर पड़े। तब गोविन्द उनके पास पहुँचा।
करङ्गेर जले करे सर्वाङ्ग सिञ्चन ।बहिर्वास लञा करे अङ्ग संवीजन ॥
९७॥
गोविन्द ने करंग (कमंडल ) से महाप्रभु के सारे शरीर पर जल छिड़का और तब उनके ही उत्तरीय से वह श्री चैतन्य महाप्रभु पर पंखा मलने लगा।
स्वरूपादि-गण ताहाँ आसिया मिलिला । प्रभुर अवस्था देखि' कान्दिते लागिला ॥
९८॥
जब स्वरूप दामोदर तथा अन्य भक्त उस स्थान पर पहुँचे और उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु की अवस्था देखी, तो वे रोने लगे।
प्रभुर अङ्गे देखे अष्ट-सात्त्विक विकार । आश्चर्य सात्त्विक देखि' हैला चमत्कार ॥
९९॥
महाप्रभु के शरीर में आठों प्रकार के दिव्य सात्त्विक विकार दृष्टिगोचर हो रहे थे। ऐसा दृश्य देखकर सारे भक्त आश्चर्यचकित हुए।
उच्च सङ्कीर्तन करे प्रभुर श्रवणे ।शीतल जले करे प्रभुर अङ्ग सम्मार्जने ॥
१००॥
भक्तों ने श्री चैतन्य महाप्रभु के निकट उच्च स्वर से हरे कृष्ण मन्त्र या कीर्तन प्रारम्भ कर दिया और उनके शरीर को शीतल जल से लाया।
एइ-मत बहु-बार कीर्तन करिते ।।‘हरि-बोल' बलि' प्रभु उठे आचम्बिते ॥
१०१॥
जब भक्तगण देर तक इसी तरह कीर्तन करते रहे, तब श्री चैतन्य महाप्रभु हरि बोल कहते हुए सहसा उठ खड़े हुए।
सानन्दे सकल वैष्णव बले ‘हरि' ‘हरि' ।उठिल मङ्गल-ध्वनि चतुर्दिक्भरि' ॥
१०२॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु उठ खड़े हुए, तो सारे वैष्णवों ने प्रसन्नतावश उच्च स्वर से हरि! हरि! का कीर्तन किया। यह शुभ ध्वनि सभी दिशाओं में भर गई।
उठि' महाप्रभु विस्मित, इति उति चाय ।ये देखिते चाय, ताहा देखिते ना पाय ॥
१०३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु विस्मित होकर खड़े हो गये और कुछ देखने के उद्देश्य से इधर-उधर देखने लगे। किन्तु वे उसे न देख पाये।
'वैष्णव' देखिया प्रभुर अर्ध-बाह्य ह-इल ।।स्वरूप-गोसाजिरे किछु कहिते लागिल ॥
१०४॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने सारे वैष्णवों को देखा, तो उनकी आंशिक बाह्य चेतना लौट आई और वे स्वरूप दामोदर से बोले।
गोवर्धन हैते मोरे के इहाँ आनिल?।।पाञा कृष्णोर लीला देखिते ना पाइल ॥
१०५॥
भी चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मुझे गोवर्धन पर्वत से यहाँ पर कौन ले या? मैं तो कृष्ण की लीलाएँ देख रहा था, किन्तु अब मैं उन्हें नहीं देख सकता। इहाँ हैते आजि मुइ गेनु गोवर्धने ।देखों, यदि कृष्ण करेन गोधने-चारणे ॥
१०६ ।। आज मैं यहाँ से गोवर्धन पर्वत पर यह देखने गया था कि क्या कृष्ण वहाँ अपनी गौवें चरा रहे हैं? गोवर्धने चड़ि' कृष्ण बाजाइला वेणु ।गोवर्धनेर चौदिके चरे सब धेनु ।। १०७॥
मैंने कृष्ण को गोवर्धन पर्वत पर चढ़ते और चर रही गौवों से घिरे उन्हें अपनी बाँसुरी बजाते देखा।
वेणु-नाद शुनि' आइला राधा-ठाकुराणी ।। सब सखी-गण-सङ्गे करिया साजनि ॥
१०८ ॥
कृष्ण की बाँसुरी की ध्वनि सुनकर श्रीमती राधारानी अपनी सारी गोपी-सखियों के साथ उनसे मिलने वहाँ पर आईं। वे सब सुन्दर वस्त्र धारण किये थीं।
राधा ला कृष्ण प्रवेशिला कन्दराते । सखी-गण कहे मोरे फूल उठाइते ॥
१०९॥
जब कृष्ण तथा श्रीमती राधारानी एकसाथ गुफा में प्रविष्ट हो गये, तब अन्य गोपियों ने मुझसे कुछ फूल तोड़ने को कहा।
हेन-काले तुमि-सब कोलाहल कैला ।। ताहाँ हैते धरि' मोरे इहाँ लञा आइला ॥
११०॥
तभी तुम सबों ने कोलाहल किया और मुझे तुम वहाँ से इस स्थान में आये।
केने वा आनिला मोरे वृथा दुःख दिते । पात्री कृष्णेर लीला, ना पाइनु देखिते ॥
१११॥
तुम लोग मुझे व्यर्थ की पीड़ा देकर यहाँ क्यों ले आये? मुझे कृष्ण की लीलाओं का दर्शन करने का अवसर मिला था, किन्तु मैं उन्हें देख पाया।
एत बलि' महाप्रभु करेन क्रन्दन ।।ताँर दशा देखि' वैष्णवे करेन रोदन ॥
११२ ॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु रोने लगे। जब समस्त वैष्णवों ने उनकी यह दशा देखी, तो वे भी रोने लगे।
हेन-काले आइला पुरी, भारती,—दुइ-जन ।।मुँहे देखि' महाप्रभुर ह-इल सम्भ्रम ॥
११३॥
उसी समय परमानन्द पुरी तथा ब्रह्मानन्द भारती आये। उन्हें देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु में कुछ-कुछ आदर का भाव जाग्रत हुआ।
निपट्ट-बाह्य ह-इले प्रभु मुँहारे वन्दिला ।। महाप्रभुरे दुइ-जन प्रेमालिङ्गन कैला ॥
११४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की पूर्ण बाह्य चेतना लौट आई और उन्होंने तुरन्त ही उन दोनों की वन्दना की। तब उन दोनों गुरुजनों ने स्नेहपूर्वक महाप्रभु का आलिंगन किया।
प्रभु कहे,–'मुँहे केने आइला एत दूरे'? । पुरी-गोसाजि कहे,–'तोमार नृत्य देखिबारे ॥
११५॥
भी चैतन्य महाप्रभु ने पुरी गोस्वामी तथा ब्रह्मानन्द भारती से कहा, आप दोनों इतनी दूर क्यों आये? पुरी गोस्वामी ने उत्तर दिया, तुम्हारा न देखने के लिए।
लज्जित ह-इला प्रभु पुरीर वचने । समुद्र-घाट आइला सब वैष्णव-सने ॥
११६॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह सुना, तो वे कुछ लज्जित हुए। तब वे समस्त वैष्णवों के साथ समुद्र-स्नान करने गये।
स्नान करि' महाप्रभु घरेते आइला ।। सबा ला महा-प्रसाद भोजन करिला ॥
११७॥
समुद्र-स्नान के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु समस्त भक्तों के साथ अपने घर लौट आये। तब सबों ने जगन्नाथजी को अर्पित किये गये भोजन का शेष ग्रहण किया।
एइ त कहिलॆ प्रभुर दिव्योन्माद-भाव ।। ब्रह्माओ कहिते नारे ग्राहार प्रभाव ॥
११८॥
इस तरह मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य उन्माद भावों का वर्णन किया है। यहाँ तक कि ब्रह्माजी भी उनके प्रभाव का वर्णन नहीं कर सकते।
‘चटक'-गिरि-गमन-लीला रघुनाथ-दास । ‘गौराङ्ग-स्तव-कल्पवृक्षे' करियाछेन प्रकाश ॥
११९॥
रघुनाथ दास गोस्वामी ने अपनी पुस्तक 'गौराङ्ग स्तव कल्पवृक्ष' में चटक पर्वत नामक बालू के टीले की ओर भागने की श्री चैतन्य महाप्रभु की लीला का अत्यन्त रोचक वर्णन किया है।
समीपे नीलाद्रेश्चटक-गिरि-राजस्य कलनाद्अये गोष्ठे गोवर्धन-गिरि-पतिं लोकितुमितः । व्रजन्नस्मीत्युक्त्वा प्रमद इव धावन्नवधृतो | गणैः स्वैगराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥
१२०॥
जगन्नाथ पुरी के निकट चटक पर्वत नामक एक विशाल बालू का होला है। इस पर्वत को देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, ओह! मैं गोवर्धन पर्वत देखने के लिए व्रज भूमि जाऊँगा! तब वे उसकी ओर पागल की तरह दौड़ने लगे और सारे वैष्णव उनके पीछे दौड़े। यह दृश्य मेरे हृदय में उदित होता है और मुझे उन्मत्त बना देता है।
एबे प्रभु व्रत कैला अलौकिक-लीला ।।के वर्णिते पारे सेइ महाप्रभुर खेला? ॥
१२१॥
भला ऐसा कौन है, जो श्री चैतन्य महाप्रभु की समस्त असामान्य लीलाओं का सही-सही वर्णन कर सके? ये सब मात्र उनके खेल हैं।
सङ्क्षेपे कहिया करि दिक् दरशन ।येइ इहा शुने, पाय कृष्णेर चरण ॥
१२२॥
मैंने उनकी दिव्य लीलाओं का संकेत करने के उद्देश्य से ही उनका संक्षिप्त वर्णन किया है। तो भी जो कोई उन्हें सुनेगा, वह निश्चित रूप से भगवान् कृष्ण के चरणकमलों की शरण प्राप्त करेगा।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे ग्रार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
१२३ ॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए तथा उनके चरणचिह्नों पर चलकर, मैं कृष्णदास श्री चैतन्य चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
