अध्याय तेरह: जगदानंद पंडित और रघुनाथ भट्ट गोस्वामी के साथ लीलाएँ
कृष्ण-विच्छेद-जाता क्षीणे चापि मनस्तनू । दधाते फुल्लतां भावैर्यस्य तं गौरमाश्रये ॥
१॥
मैं गौरचन्द्र महाप्रभु के चरणकमलों की शरण ग्रहण करता हूँ। कृष्ण-विरह की पीड़ा के कारण उनका मन क्षीण हो गया और शरीर अत्यन्त दुबला हो गया। किन्तु जब उन्हें भगवान् का प्रेमावेश होता, तो वे पुनः पूरी तरह प्रफुल्लित हो उठते।
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द । जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री भाचार्य की जय हो! तथा महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! हेन-मते महाप्रभु जगदानन्द-सङ्गे।।नाना-मते आस्वादय प्रेमेर तरङ्गे ॥
३॥
इस तरह जगदानन्द पण्डित के संग में श्री चैतन्य महाप्रभु नाना प्रकार शुद्ध प्रेम-सम्बन्धों को आस्वादन करते।
कृष्ण-विच्छेदे दुःखे क्षीण मन-काय ।।भावावेशे प्रभु कभु प्रफुल्लित हय ॥
४॥
कृष्ण के विरह के दुःख से महाप्रभु का मन क्षीण हो गया और शरीर दुर्बल पड़ गया, किन्तु जब उन्हें भावावेश होता, तब वे पुनः प्रफुल्लित तथा स्वस्थ हो जाते।
कलार शरलाते, शयन, अति क्षीण काय ।। शरलाते हाड़ लागे, व्यथा हय गाय ॥
५॥
चूँकि वे अत्यन्त दुर्बल थे, अतएव जब वे केले की शुष्क छाल पर शयन करते, तो उससे उनकी हड्डियों में पीड़ा होती थी।
देखि' सब भक्त-गण महा-दुख पाय ।। सहिते नारे जगदानन्द, सृजिला उपाय ॥
६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु को पीड़ा में देखकर सारे भक्त अत्यन्त दुःखी होते। वे इसे सहन न कर पाते। तब जगदानन्द पण्डित ने एक युक्ति निकाली।
सूक्ष्म वस्त्र आनि' गौरिक दिया राङ्गाइला । शिमुलीर तूला दिया ताहा पूराइला ॥
७॥
कुछ महीन वस्त्र ले आये और उसे गेरू से रँग दिया। फिर उसके र सेमल की रुई भर दी।
एक तूली-बालिस गोविन्देर हाते दिला ।।‘प्रभुरे शोयाइह इहाय'–ताहारे कहिला ॥
८॥
इस तरह उन्होंने एक रजाई तथा तकिया बनवा दिया और फिर यह इते हुए उसे गोविन्द को दे दिया, महाप्रभु को इसी पर लेटने को कहना।
स्वरूप-गोसाबिके कहे जगदानन्द ।।'आजि आपने ग्राञा प्रभुरे कराइह शयन' ॥
९॥
जगदानन्द ने स्वरूप दामोदर गोस्वामी से कहा, आज आप स्वयं श्री पैतन्य महाप्रभु से शय्या पर लेटने के लिए आग्रह करें।
शयनेर काले स्वरूप ताहाङिहिला । तूली-बालिस देखि' प्रभु क्रोधाविष्ट ह-इला ॥
१० ॥
जब महाप्रभु के सोने का समय हुआ, तो स्वरूप दामोदर पास ही रुके रहे, किन्तु जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने रजाई तथा तकिया देखा, तो वे तुरन्त अत्यधिक क्रोधित हो उठे।
गोविन्देरे पुछेन,--‘इहा कराइल को जन?' । जगदानन्देर नाम शुनि' सङ्कोच हैल मन ॥
११॥
महाप्रभु ने गोविन्द से पूछा, इसे किसने बनवाया? जब गोविन्द ने जगदानन्द पण्डित का नाम लिया तो श्री चैतन्य महाप्रभु कुछ-कुछ। भयभीत हो उठे।
गोविन्देरे कहि' सेइ तूलि दूर कैला ।। कलार शरला-उपर शयन करिला ॥
१२ ॥
गोविन्द से रजाई तथा तकिया हटाने के लिए कहकर महाप्रभु केले शुष्क छाल पर लेट गये।
स्वरूप कहे, तोमार इच्छा, कि कहिते पारि? । शय्या उपेक्षिले पण्डित दुःख पाबे भारी' ॥
१३॥
स्वरूप दामोदर ने महाप्रभु से कहा, हे प्रभु, मैं आपकी परम इच्छा खंडन नहीं कर सकता, किन्तु यदि आप यह बिस्तर स्वीकार नहीं ते, तो जगदानन्द पण्डित को अत्यधिक दुःख होगा।
प्रभु कहेन,–खाट एक आनह पाड़िते ।। जगदानन्द चाहे आमाय विषय भुञ्जाइते ॥
१४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, तुम मेरे लेटने के लिए एक पारपाई भी ले आओ। जगदानन्द पण्डित चाहता है कि मैं भौतिक सुख का भोग करूँ।
सन्यासी मानुष आमार भूमिते शयन ।आमारे खाट-तूलि-बालिस मस्तक-मुण्डन ॥
१५॥
मैं संन्यासी हूँ, इसलिए मुझे भूमि पर लेटना चाहिए। चारपाई, रजाई या तकिया का प्रयोग करना मेरे लिए अत्यन्त लज्जास्पद होगा।
स्वरूप-गोसाजि आसि' पण्डिते कहिला ।शुनि' जगदानन्द मने महा-दुःख पाइला ॥
१६॥
जब स्वरूप दामोदर लौटकर आये और जगदानन्द पण्डित को सारी घटनाएँ बतलाईं, तो उनको अतीव दुःख हुआ।
स्वरूप-गोसाजि तबे सृजिला प्रकार ।कदलीर शुष्क-पत्र आनिला अपार ॥
१७॥
तब स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने एक अन्य युक्ति निकाली। उन्होंने पहले पर्याप्त मात्रा में केले की सूखी पत्तियाँ प्राप्त कीं।
नखे चिरि' चिरि' ताहा अति सूक्ष्म कैला ।प्रभुर बहिर्वास दुइते से सब भरिला ॥
१८॥
तब उन्होंने अपने नाखूनों से इन पत्तियों को अत्यन्त महीन रेशों में चीर लिया और श्री चैतन्य महाप्रभु के दो बाह्य वस्त्रों (उत्तरीय) को इन रेशों से भर दिया।
एइ-मत दुइ कैला ओड़न-पाड़ने ।।अङ्गीकार कैला प्रभु अनेक ग्रतने ॥
१९॥
इस तरह स्वरूप दामोदर ने बिस्तर तथा तकिया बना दिया और भक्तों | के काफी प्रयास के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें स्वीकार कर लिया।
ताते शयन करेन प्रभु,—देखि' सबे सुखी ।। जगदानन्द–भितरे क्रोध बाहिरे महा-दुःखी ॥
२०॥
सारे लोग महाप्रभु को उस शय्या पर लेटते देखकर सुखी थे, किन्तु जगदानन्द भीतर से नाराज थे और बाहर से अत्यन्त दुःखी लग रहे थे।
पूर्वे जगदानन्देर इच्छा वृन्दावन ग्राइते ।। प्रभु आज्ञा ना देन ताँरै, ना पारे चलिते ॥
२१॥
पहले जब जगदानन्द पण्डित वृन्दावन जाना चाहते थे, तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें अनुमति नहीं दी थी, अतएव वे जा नहीं पाये थे।
भितरेर क्रोध-दुख प्रकाश ना कैल । मथुरा ग्राइते प्रभु-स्थाने आज्ञा मागिल ॥
२२॥
अब, अपने क्रोध तथा दुःख को छिपाते हुए जगदानन्द पण्डित ने से मथुरा जाने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु से अनुमति माँगी।
प्रभु कहे,मथुरा ग्राइबा आमाय क्रोध करि' ।।आमाय दोष लागाजा तुमि ह-इबा भिखारी ॥
२३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अत्यन्त स्नेहपूर्वक कहा, यदि मथुरा जाते प आप मुझ पर क्रुद्ध रहोगे, तो आप मात्र भिखारी बन जाओगे और निन्दा करोगे।
जगदानन्द कहे प्रभुर धरिया चरण ।पूर्व हैते इच्छा मोर ग्राइते वृन्दावन ॥
२४॥
तब महाप्रभु के चरण पकड़कर जगदानन्द पण्डित ने कहा, मैं र्पकाल से वृन्दावन जाने की इच्छा करता रहा हूँ।
प्रभु-आज्ञा नाहि, ताते ना पारि ग्राइते ।। एबे आज्ञा देह', अवश्य ग्राइमु निश्चिते ॥
२५॥
मैं आपकी आज्ञा के बिना नहीं जा सका। अब आप मुझे आज्ञा के और मैं निश्चित रूप से वहाँ जाऊँगा।
प्रभु प्रीते ताँर गमन ना करेन अङ्गीकार । तेहो प्रभुर ठाञि आज्ञा मागे बार बार ॥
२६ ॥
जगदानन्द पण्डित के प्रति स्नेह के कारण ही श्री चैतन्य महाप्रभु जाने देने की अनुमति नहीं दे रहे थे, किन्तु जगदानन्द पण्डित बारम्बार हठ कर रहे थे कि महाप्रभु जाने की अनुमति दे दें।
स्वरूप-गोसाजिरे पण्डित कैला निवेदन । पूर्व हैते वृन्दावन ग्राइते मोर मन ॥
२७॥
तब जगदानन्दने स्वरूप दामोदर गोस्वामी से निवेदन किया, काल से मैं वृन्दावन जाना चाह रहा हूँ।
प्रभु-आज्ञा विना ताहाँ ग्राइते ना पारि ।एबे आज्ञा ना देन मोरे, ‘क्रोधे ग्राह' बलि ॥
२८॥
किन्तु मैं महाप्रभु की अनुमति के बिना वहाँ नहीं जा सकता था और भी वे अनुमति देने से मना करते हैं। वे कहते हैं, तुम इसलिए जाना ते हो, क्योंकि तुम मुझ पर क्रुद्ध हो।'
सहजेइ मोर ताहाँ ग्राइते मन हय ।प्रभु-आज्ञा लञा देह', करिये विनय ॥
२९॥
वृन्दावन जाने की मेरी सहज इच्छा है, अतएव आप उनसे अनुमति देने के लिए विनयपूर्वक अनुरोध करें।
तबे स्वरूप-गोसात्रि कहे प्रभुर चरणे ।जगदानन्देर इच्छा बड़ ग्राइते वृन्दावने ॥
३०॥
तत्पश्चात् स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में यह निवेदन किया, जगदानन्द पण्डित वृन्दावन जाने के लिए अत्यन्त इच्छुक हैं।
तोमार ठाजि आज्ञा तेंहो मागे बार बार । आज्ञा देह', मथुरा देखि' आइसे एक-बार ॥
३१॥
वे बारम्बार आपसे अनुमति के लिए याचना कर रहे हैं, अतएव कृपा करके उन्हें मथुरा जाने और फिर लौट आने की आज्ञा दे दें।
आइरे देखिते ग्रैछे गौड़-देशे ग्राय ।तैछे एक-बार वृन्दावन देखि' आय” ॥
३२॥
आपने उन्हें शचीमाता को मिलने बंगाल जाने की अनुमति दी थी; की तरह आप उन्हें वृन्दावन जाने और तब यहाँ लौट आने की अनुमति भकते हैं।
स्वरूप-गोसाजिर बोले प्रभु आज्ञा दिला । जगदानन्दे बोलाजा तौरै शिखाइला ॥
३३॥
स्वरूप दामोदर गोस्वामी के अनुरोध पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगदानन्द पण्डित को जाने की अनुमति दे दी। महाप्रभु ने उन्हें बुलाया और इस प्रकार निर्देश दिये।
वाराणसी पर्यन्त स्वच्छन्दे ग्राइबा पथे ।आगे सावधाने ग्राइबा क्षत्रियादि-साथे ॥
३४॥
आप वाराणसी तक बिना किसी उपद्रव का सामना किये जा सकते है, किन्तु वाराणसी के आगे आप क्षत्रियों के साथ मार्ग से यात्रा करते हुए सतर्क रहना।
केवल गौड़िया पाइले 'बाटपाड़' करि' बान्धे ।। सब लुटि' बाँधि' राखे, ग्राइते विरोधे ॥
३५॥
जैसे ही ये लुटेरे मार्ग पर किसी बंगाली को अकेले यात्रा करते देखते हैं, वे उसकी हर वस्तु ले लेते हैं, उसे बन्दी बना लेते हैं और जाने नहीं देते हैं।
मथुरा गेले सनातन-सङ्गेइ रहिबा । मथुरार स्वामी सबेर चरण वन्दिबा ॥
३६॥
तुम मथुरा पहुँचकर सनातन गोस्वामी के साथ रहना और वहाँ मस्त प्रमुख जनों के चरणकमलों में नमस्कार करना।
दूरे रहि' भक्ति करिह सङ्गे ना रहिबा ।। ताँ-सबार आचार-चेष्टा ल-इते नारिबा ॥
३७॥
मथुरा के निवासियों से आप स्वच्छन्द होकर मत मिलना-जुलना, दूर से ही उनको सम्मान प्रदर्शित करना। चूँकि आप भक्ति के भिन्न स्तर पर हो, अतएव आप उनके आचार-व्यवहार को नहीं अपना सकते।
सनातन-सङ्गे करिह वन दरशन ।। सनातनेर सङ्ग ना छाड़िबा एक-क्षण ॥
३८॥
आप सनातन गोस्वामी के साथ वृन्दावन के बारहों वनों का दर्शन करना। उनका साथ एक क्षण के लिए भी मत छोड़ना।
शीघ्र आसिह, ताहाँ ना रहिह चिर-काल ।। गोवर्धने ना चड़िह देखिते ‘गोपाल' ॥
३९ ॥
आप वृन्दावन में थोड़े ही समय तक रहना और फिर जितना जल्दी हो सके लौट आना। हाँ, और आप गोपाल अर्चाविग्रह का दर्शन करने के लिए गोवर्धन पर्वत पर मत चढ़ना।
आमिह आसितेछि,—कहिह सनातने ।। आमार तरे एक-स्थान ग्रेन करे वृन्दावने ॥
४०॥
सनातन गोस्वामी को सूचित करना कि मैं दूसरी बार वृन्दावन आ रहा हूँ और वह मेरे ठहरने के लिए एक स्थान का प्रबन्ध कर रखे।
एत बलि' जगदानन्दे कैला आलिङ्गन ।। जगदानन्द चलिला प्रभुर वन्दिया चरण ॥
४१॥
यह कहकर महाप्रभु ने जगदानन्द पण्डित का आलिंगन किया। जगदानन्द ने भी महाप्रभु के चरणकमलों की वन्दना की और फिर वे वृन्दावन के लिए चल पड़े।
सब भक्त-गण-ठाञि आज्ञा मागिला । वन-पथे चलि' चलि' वाराणसी आइला ॥
४२॥
उन्होंने सारे भक्तों से आज्ञा माँगी और तब प्रस्थान किया। जंगल के रास्ते से होते हुए वे शीघ्र ही वाराणसी पहुँच गये।
तपन-मिश्र, चन्द्रशेखर,—दोंहारे मिलिला ।। ताँर ठाञि प्रभुर कथा सकल-इ शुनिला ॥
४३॥
जब वे वाराणसी में तपन मिश्र तथा चन्द्रशेखर से मिले, तो उन दोनों ने उनसे श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ सुनीं।
मथुराते आसि' मिलिला सनातने ।।दुइ-जनेर सङ्गे पँहे आनन्दित मने ॥
४४॥
अन्त में जगदानन्द पण्डित मथुरा पहुँचे, जहाँ वे सनातन गोस्वामी से मले। वे एक दूसरे को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए।
सनातन कराइला ताँरै द्वादश वन दरशन ।। गोकुले रहिला हे देखि' महावन ॥
४५॥
जब सनातन गोस्वामी जगदानन्द को वृन्दावन के बारहों वन दिखला के, जिनमें महावन अन्तिम था, तब वे दोनों गोकुल में रहे।
सनातनेर गोफाते हे रहे एक-ठाजि ।पण्डित पाक करेन देवालये ग्राइ' ॥
४६॥
जगदानन्द पण्डित सनातन गोस्वामी की गुफा में रुके तो थे, किन्तु अपना भोजन पास के मन्दिर में जाकर पकाते।
सनातन भिक्षा करेन स्राइ' महावने । कभु देवालये, कभु ब्राह्मण-सदने ॥
४७॥
सनातन गोस्वामी महावन के आसपास द्वार-द्वार जाकर भिक्षा माँगते थे। कभी वे किसी मन्दिर में जाते और कभी किसी ब्राह्मण के घर जाते।
सनातन पण्डितेर करे समाधान । महावने देन आनि मागि' अन्न-पान ॥
४८॥
सनातन गोस्वामी जगदानन्द पण्डित की सारी आवश्यकताएँ पूरी करते। वे महावन के आसपास भिक्षा माँगते और जगदानन्द पण्डित के खाने-पीने की सारी वस्तुएँ ले आते।
एक-दिन सनातने पण्डित निमन्त्रिला । नित्य-कृत्य करि' तेह पाक चड़ाइला ॥
४९॥
एक दिन जगदानन्द पण्डित ने सनातन को पास के मन्दिर में भोजन भरने के लिए निमन्त्रित किया। नित्य कर्म समाप्त करके उन्होंने भोजन काना प्रारम्भ किया।
मुकुन्द सरस्वती' नाम सन्यासी महाजने ।।एक बहिर्वास तेंहो दिल सनातने ॥
५०॥
इसके पूर्व मुकुन्द सरस्वती नामक एक महान् संन्यासी ने सनातन गोस्वामी को एक बहिर्वास (उत्तरीय) दिया था।
सनातन सेइ वस्त्र मस्तके बान्धिया ।जगदानन्देर वासा-द्वारे वसिला आसिया ॥
५१॥
सनातन गोस्वामी इस वस्त्र को अपने सिर पर बाँधकर जगदानन्द पण्डित के द्वार पर जाकर बैठ गये।।
रातुल वस्त्र देखि' पण्डित प्रेमाविष्ट ह-इला ।‘महाप्रभुर प्रसाद' जानि' ताँहारे पुछिला ॥
५२॥
लाल वस्त्र को श्री चैतन्य महाप्रभु का उपहार समझकर जगदानन्द पण्डित प्रेमाविष्ट हो गये। अतः उन्होंने सनातन गोस्वामी से पूछा।
काहाँ पाइला तुमि एइ रातुल वसन? ।‘मुकुन्द-सरस्वती' दिल, कहे सनातन ॥
५३॥
जगदानन्द ने पूछा, सिर में बँधा हुआ यह लाल वस्त्र आपको कहां से मिला? सनातन गोस्वामी ने उत्तर दिया, इसे मुकुन्द सरस्वती ने मुझे दिया है।
शुनि' पण्डितेर मने क्रोध उपजिल ।।भातेर हाण्डि हाते ला मारिते आइल ॥
५४॥
यह सुनकर जगदानन्द पण्डित तुरन्त क्रुद्ध हो उठे और सनातन गोस्वामी को मारने के उद्देश्य से उन्होंने अपने हाथ में भोजन पकाने की हण्डिया उठा ली।
सनातन ताँरै जानि' लज्जित ह-इला ।। बलिते लागिला पण्डित हाण्डि चुलाते धरिला ॥
५५॥
किन्तु सनातन गोस्वामी जगदानन्द पण्डित को अच्छी तरह जानते है, इसलिए वे कुछ-कुछ लज्जित हुए। इसलिए जगदानन्द पण्डित ने वह हण्डिया चूल्हे पर रख दी और तब इस प्रकार कहा।
तुमि महाप्रभुर हओ पार्षद-प्रधान । तोमा-सम महाप्रभुर प्रिय नाहि आन ॥
५६॥
आप तो श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रधान पार्षदों में से हैं। निस्सन्देह, उन्हें आपसे बढ़कर कोई अन्य प्रिय नहीं है।
अन्य सन्यासीर वस्त्र तुमि धर शिरे । को ऐछे हय,—इहा पारे सहिबारे? ॥
५७॥
फिर भी आपने दूसरे संन्यासी द्वारा दिये हुए वस्त्र को अपने सिर पर बाँध लिया है। ऐसे व्यवहार को भला कौन सह सकता है? सनातन कहे साधु पण्डित-महाशय! ।। तोमा-सम चैतन्येर प्रिय केह नय ॥
५८॥
सनातन गोस्वामी ने कहा, हे जगदानन्द पण्डित, आप महान् पण्डित साधु हो। आपसे बढ़कर महाप्रभु को कोई दूसरा प्रिय नहीं है।
ऐछे चैतन्य-निष्ठा योग्य तोमाते ।। तुमि ना देखाइले इहा शिखिब के-मते? ॥
५९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रति यह श्रद्धा आपको बिल्कुल शोभा देती है। जब तक आप इसे प्रदर्शित नहीं करोगे, तो भला मैं ऐसी श्रद्धा कैसे सकता हूँ? ग्राहा देखिबारे वस्त्र मस्तके बान्धिल। सेई अपूर्व प्रेम एइ प्रत्यक्ष देखिल ॥
६० ॥
इस वस्त्र को अपने सिर पर बाँधने का उद्देश्य आज पूरा हो गया, क्योंकि मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रति आपके असाधारण प्रेम को प्रत्यक्ष लिया है।
रक्त-वस्त्र'वैष्णवेर' परिते ना युयाय ।। कोन प्रवासीरे दिमु, कि काय उहाय? ॥
६१॥
यह केसरिया वस्त्र वैष्णव के पहनने के लिए अनुपयुक्त है, अतएव मेरे लिए इसका कोई उपयोग नहीं है। मैं इसे किसी अज्ञात व्यक्ति को दे दूंगा ।
पाक करि' जगदानन्द चैतन्ये समर्पिला । दुइ-जन वसि' तबे प्रसाद पाइला ॥
६२॥
जब जगदानन्द पण्डित भोजन बना चुके, तो उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु को भोजन अर्पित किया। तब वे तथा सनातन गोस्वामी दोनों और प्रसाद पाने लगे।
प्रसाद पाइ अन्योन्ये कैला आलिङ्गन ।। चैतन्य-विरहे मुँहे करिला क्रन्दन ॥
६३ ॥
प्रसाद पाने के बाद उन्होंने एक दूसरे का आलिंगन किया और चैतन्य भु से विरह के कारण दोनों रोने लगे।
एइ-मत मास दुइ रहिला वृन्दावने ।। चैतन्य-विरह-दुःख ना ग्राय सहने ॥
६४॥
इस तरह उन्होंने वृन्दावन में दो मास बिता दिये। अन्त में वे श्री चैतन्य महाप्रभु के विरह से उत्पन्न दुःख को और अधिक नहीं सह पाये।
महाप्रभुर सन्देश कहिला सनातने ।। 'आमिह आसितेछि, रहिते करिह एक-स्थाने' ॥
६५ ॥
इसलिए जगदानन्द पण्डित ने महाप्रभु का यह सन्देश सनातन गोस्वामी को दिया, मैं भी वृन्दावन आ रहा हूँ। कृपया मेरे ठहरने के लिए स्थान की व्यवस्था कर रखो।
जगदानन्द-पण्डित तबे आज्ञा मागिला ।।सनातन प्रभुरे किछु भेट-वस्तु दिला ॥
६६॥
जब सनातन गोस्वामी ने जगदानन्द को जगन्नाथ पुरी लौट जाने की अनुमति दे दी, तो उन्होंने महाप्रभु के लिए जगदानन्द को कुछ उपहार दिये।
रास-स्थलीर वालु आर गोवर्धनेर शिला ।।शुष्क पक्क पीलु-फल आर गुञ्जा-माला ॥
६७॥
उपहार में रासलीला स्थल की थोड़ी-सी बालू, गोवर्धन पर्वत की एक शिला, पके हुए पीलु के सूखे फल तथा घुघचियों की माला थी।
जगदानन्द-पण्डित चलिला सबै लजा। व्याकुल हैला सनातन ताँरै विदाय दिया ॥
६८ ॥
न तरह ये सारे उपहार लेकर जगदानन्द पण्डित अपनी यात्रा पर चल पड़े। किन्तु विदा करने के बाद सनातन गोस्वामी अत्यन्त क्षुब्ध थे।
प्रभुर निमित्त एक-स्थान मने विचारिल ।। द्वादशादित्य-टिलाय एक ‘मठ' पाइल ॥
६९ ॥
उसके कुछ समय बाद ही सनातन गोस्वामी ने एक ऐसा स्थान चुन या, जहाँ वृन्दावन में अपने प्रवास के समय श्री चैतन्य महाप्रभु ठहर सके। यह ऊँचाई पर स्थित एक मन्दिर था, जिसका नाम द्वादशादित्य ला था।
सेइ स्थान राखिला गोसाजि संस्कार करिया । मठेर आगे राखिला एक छाउनि बान्धिया ॥
७० ॥
सनातन गोस्वामी ने उस मन्दिर को अत्यन्त स्वच्छ तथा ठीक-ठाक कराकर रख दिया। इसके सामने उन्होंने एक छोटी सी झोपड़ी बनवा दी।
शीघ्र चलि' नीलाचले गेला जगदानन्द ।।भक्त सह गोसाजि हैली परम आनन्द ॥
७१ ॥
तभी तेजी से यात्रा करते हुए जगदानन्द पण्डित शीघ्र ही जगन्नाथ पुरी पहुँच गये, जिससे श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके भक्तों को आनन्द हुआ।
प्रभुर चरण वन्दि' सबारे मिलिला ।।महाप्रभु ताँरै दृढ़ आलिङ्गन कैला ॥
७२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की वन्दना करने के बाद जगदानन्द पण्डित हर एक से मिले। तब महाप्रभु ने जगदानन्द का गाढ़ आलिंगन किया।
सनातनेर नामे पण्डित दण्डवत् कैला ।रास-स्थलीर धूलि आदि सब भेट दिला ॥
७३॥
जगदानन्द पण्डित ने सनातन गोस्वामी की ओर से भी महाप्रभु को कार किया। तब उन्होंने महाप्रभु को रासलीला स्थल की धूल तथा भेटें दीं।
सब द्रव्य राखिलेन, पीलु दिलेन बाँटिया ।। वृन्दावनेर फले' बलि' खाइलो रूष्ट हा ॥
७४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने पीलु फलों के अतिरिक्त सारी भेटें रख लीं और पीलु फलों को भक्तों में बाँट दिया। चूंकि ये फल वृन्दावन से आये थे, इसलिए हरएक ने परम सुखपूर्वक उन्हें खाया।
ये केह जाने, आँटि चुषिते लागिल ।। ये ना जाने गौड़िया पीलु चावाजा खाइल ॥
७५ ॥
जो भक्त पीलु फलों से परिचित थे, उन्होंने बीज को चूसना शुरू कर दिया, किन्तु बंगाली भक्त, जो यह नहीं जानते थे कि ये क्या हैं, उन्होंने बीजों को चबाकर निगल लिया।
मुखे तार झाल गेल, जिह्वा करे ज्वाला ।।वृन्दावनेर ‘पीलु' खाइते एइ एक लीला ॥
७६॥
जिन लोगों ने बीज चबा लिये थे, उनकी जीभें मिर्च जैसे तीते स्वाद से जलने लगीं। इस तरह वृन्दावन से लाये गये पीलु फलों को खाना श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए एक लीला हो गई।
जगदानन्देर आगमने सबार उल्लास ।एइ-मते नीलाचले प्रभुर विलास ।। ७७॥
जब जगदानन्द पण्डित वृन्दावन से लौट आये, तो हर व्यक्ति प्रफुल्लित था। इस तरह जगन्नाथ पुरी में निवास करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने लीलाओं का आनन्द लिया।
एक-दिन प्रभु ग्रमेश्वर-टोटा ग्राइते ।। सेइ-काले देव-दासी लागिला गाइते ॥
७८॥
एक दिन जब महाप्रभु यमेश्वर के मन्दिर जा रहे थे, तब एक स्त्री गायिका ( देवदासी) ने जगन्नाथ मन्दिर में गाना प्रारम्भ किया।
गुजरी-रागिणी ला सुमधुर स्वरे । 'गीत-गोविन्द'-पद गाय जग-मन हरे ॥
७९ ॥
उसने अत्यन्त मधुर स्वर में गुज्जरी रागिनी गायी और चूँकि इसका विषय जयदेव गोस्वामी कृत 'गीतगोविन्द' था, इसलिए गाने ने सारे जगत् के ध्यान को आकृष्ट कर लिया।
दूरे गान शुनि' प्रभुर ह-इल आवेश ।। स्त्री, पुरुष, के गाय,—ना जाने विशेष ॥
८०॥
दूर से गाने को सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु तुरन्त भावाविष्ट हो गये। वे यह नहीं जान पाये कि कोई पुरुष गा रहा है या स्त्री गा रही है।
तारे मिलिबारे प्रभु आवेशे धाइला ।।पथे ‘सिजेर बाड़ि' हय, फुटिया चलिला ॥
८१॥
जैसे महाप्रभु उस गाने वाले से मिलने के लिए भावावेश में दौड़े, उनके शरीर में कैंटीली झाड़ियाँ चुभ गईं।
अङ्गे काँटा लागिल, किछु ना जानिला! ।। आस्ते-व्यस्ते गोविन्द ताँर पाछेते धाइला ॥
८२॥
गोविन्द बहुत तेजी से महाप्रभु के पीछे दौड़ा। महाप्रभु को काँटे चुभने से कोई पीड़ा नहीं हो रही थी।
धाजा यायेन प्रभु, स्त्री आछे अल्प दूरे । स्त्री गाय' बलि' गोविन्द प्रभुरे कैला कोले ॥
८३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु तेजी से दौड़ रहे थे और वह स्त्री कुछ ही दूरी पर । तभी गोविन्द ने महाप्रभु को अपनी बाँहों में पकड़ लिया और वह चिल्लाया, यह एक स्त्री गा रही है।
स्त्री-नाम शुनि' प्रभुर बाह्य ह-इला । पुनरपि सेइ पथे बाहुड़ि' चलिला ॥
८४॥
ज्योंही महाप्रभु ने स्त्री शब्द सुना, वे बाह्यरूप से सचेत हो उठे। और वे लौट पड़े।
प्रभु कहे,–गोविन्द, आजि राखिला जीवन ।।स्त्री-परश हैले आमार ह-इत मरण ॥
८५॥
उन्होंने कहा, हे गोविन्द, तुमने मेरा जीवन बचा लिया। यदि मैं स्त्री का शरीर छू लेता, तो अवश्य ही मर गया होता।
ए-ऋण शोधिते आमि नारिमु तोमार ।।गोविन्द कहे,—जगन्नाथ राखेन मुइ को छार'? ॥
८६॥
मैं कभी भी तुम्हारे ऋण को चुका नहीं सकेंगा। गोविन्द ने उत्तर दिया, भगवान् जगन्नाथ ने आपको बचाया है। मैं तो तुच्छ हूँ।
प्रभु कहे,–गोविन्द, मोर सङ्गे रहिबा ।।ग्राहाँ ताहाँ मोर रक्षाय सावधान है-इबा ॥
८७॥
भी चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, हे गोविन्द, तुम हमेशा मेरे साथ ना। कहीं भी और सब जगह खतरा है, इसलिए तुम अत्यन्त सावधानी मेरी रक्षा करना।
एत बलि' लेउटि' प्रभु गेला निज-स्थाने । शुनि' महा-भय ह-इल स्वरूपादि-मने ॥
८८ ॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु घर लौट आये। जब स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा उनके अन्य सेवकों ने इस घटना के बारे में सुना, तो वे अत्यधिक भयभीत हो उठे।
एथा तपन-मिश्र-पुत्र रघुनाथ-भट्टाचार्य ।।प्रभुरे देखिते चलिला छाड़ि' सर्व कार्य ॥
८९॥
इस बीच तपन मिश्र के पुत्र रघुनाथ भट्टाचार्य ने अपना सारा कामकाज त्यागकर श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने की इच्छा से अपना घर छोड़ दिया।
काशी हैते चलिला तेंहो गौड़-पथ दिया ।सङ्गे सेवक चले ताँर झालि वहिया ॥
९०॥
साथ में सामान ढोने वाले एक नौकर को लेकर रघुनाथ भट्ट वाराणसी से चले और बंगाल से होकर जाने वाले मार्ग से यात्रा करने लगे।
पथे तारे मिलिला विश्वास-रामदास ।।विश्वास-खानार कायस्थ तेंहो राजार विश्वास ॥
९१॥
बंगाल में वे रामदास विश्वास से मिले, जो कायस्थ जाति का था। वह राजा के सचिवों में से एक था।
सर्व-शास्त्रे प्रवीण, काव्य-प्रकाश-अध्यापक । परम-वैष्णव, रघुनाथ-उपासक ॥
९२॥
रामदास विश्वास समस्त प्रामाणिक शास्त्रों में प्रवीण था। वह काव्यप्रकाश' नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ का अध्यापक था और उन्नत भक्त | रघुनाथ ( भगवान् रामचन्द्र) के उपासक के रूप में विख्यात था।
अष्ट-प्रहर राम-नाम जपेन रात्रि-दिने । सर्व त्यजि' चलिला जगन्नाथ-दरशने ॥
९३ ॥
रामदास ने सब कुछ त्याग दिया था और वह भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करने जा रहा था। यात्रा करते हुए वह दिन के चौबीसों घण्टे भगवान् राम के पवित्र नाम का जप करता रहता था।
रघुनाथ-भट्टर सने पथेते मिलिला ।।भट्टर झालि माथे करि' वहिया चलिला ॥
९४॥
जब वह रास्ते में रघुनाथ भट्ट से मिला, तो उसने रघुनाथ का सामान अपने सिर पर रख लिया और उसे उठा ले चला।
नाना सेवा करि' करे पाद-सम्वाहन ।ताते रघुनाथेर हय सङ्कुचित मन ॥
९५ ॥
रामदास अनेक प्रकार से रघुनाथ भट्ट की सेवा करता, यहाँ तक कि वह उनके पाँव भी दबाता। रघुनाथ भट्ट को यह सारी सेवा लेते संकोच होता।
तुमि बड़ लोक, पण्डित, महा-भागवते ।सेवा ना करिह, सुखे चल मोर साथे ॥
९६॥
उन्होंने कहा, आप एक सम्मानित भद्र व्यक्ति, विद्वान पण्डित तथा महान् भक्त हैं। कृपया आप मेरी सेवा करने का प्रयास न करें। बस, मेरे नाथ प्रसन्न भाव में चलें।
रामदास कहे,–आमि शूद्र अधम!।‘ब्राह्मणेर सेवा',—एइ मोर निज-धर्म ॥
९७॥
रामदास ने उत्तर दिया, मैं शूद्र हूँ, पतित हूँ। ब्राह्मण की सेवा करना | मेरा कर्तव्य तथा धर्म है।
सङ्कोच ना कर तुमि, आमि तोमार 'दास' ।।तोमार सेवा करिले हय हृदये उल्लास ॥
९८॥
इसलिए कृपया संकोच न करें। मैं आपका दास हूँ और जब मैं आपकी सेवा करता हूँ, तो मेरा हृदय प्रफुल्लित हो उठता है।
एत बलि' झालि वहेन, करेन सेवने ।।रघुनाथेर तारक-मन्त्र जपेन रात्रि-दिने ॥
९९॥
इस तरह रामदास रघुनाथ भट्ट का सामान उठाए चलता रहा और निष्ठापूर्वक उसकी सेवा करता रहा। वह रात-दिन भगवान् रामचन्द्र के पवित्र नाम का निरन्तर जप करता रहा।
एइ-मते रघुनाथ आइला नीलाचले ।प्रभुर चरणे या मिलिला कुतूहले ॥
१००॥
इस तरह यात्रा करते हुए रघुनाथ भट्ट शीघ्र ही जगन्नाथपुरी आ गये। वहाँ वे परम हर्ष के साथ श्री चैतन्य महाप्रभु से मिले और उनके चरणकमलों में गिर पड़े।
दण्ड-परणाम करि' भट्ट पड़िला चरणे ।प्रभु 'रघुनाथ' जानि कैला आलिङ्गने ॥
१०१॥
रघुनाथ भट्ट श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणों में दण्ड की तरह गिर पड़े। तब महाप्रभु ने यह भलीभाँति जानते हुए कि वे कौन हैं, उनका आलिंगन किया।
मिश्र आर शेखरेर दण्डवत् जानाइला ।महाप्रभु ताँ-सबार वार्ता पुछिला ॥
१०२॥
रघुनाथ ने तपन मिश्र तथा चन्द्रशेखर की ओर से श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार किया और महाप्रभु ने भी उनके विषय में समाचार पूछा।
भाल है-इल आइला, देखकमल-लोचन' ।आजि आमार एथा करिबा प्रसाद भोजन ॥
१०३ ॥
महाप्रभु ने कहा, अच्छा हुआ कि तुम यहाँ आये हो। अब जाकर कमललोचन भगवान् जगन्नाथ को दर्शन करो। आज तुम मेरे यहाँ प्रसाद पण करोगे।
गोविन्देरे कहि' एक वासा देओयाइला । स्वरूपादि भक्त-गण-सने मिलाइला ॥
१०४॥
महाप्रभु ने गोविन्द से रघुनाथ भट्ट के ठहरने के लिए प्रबन्ध करने को कहा और तब उनका परिचय स्वरूप दामोदर गोस्वामी इत्यादि सारे भक्तों से कराया।
एई-मत प्रभु-सङ्गे रहिला अष्ट-मास ।। दिने दिने प्रभुर कृपाय बाड़ये उल्लास ॥
१०५॥
इस तरह रघुनाथ भट्ट लगातार आठ महीनों तक श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ रहे और महाप्रभु की कृपा से उन्हें प्रतिदिन अधिकाधिक दिव्य सुख का अनुभव होता रहा।
मध्ये मध्ये महाप्रभुर करेन निमन्त्रण । घर-भात करेन, आर विविध व्यञ्जन ॥
१०६॥
वे कुछ समय पर विविध सब्जियों के साथ चावल पकाते और श्री तन्य महाप्रभु को अपने घर आमन्त्रित करते।
रघुनाथ-भट्ट–पाके अति सुनिपुण ।। ग्रेइ रान्धे, सेइ हय अमृतेर सम ॥
१०७॥
रघुनाथ भट्ट दक्ष रसोइया थे। वे जो भी पकाते वह अमृत का सा बाद देता।
परम सन्तोषे प्रभु करेन भोजन ।। प्रभुर अवशिष्ट-पात्र भट्टर भक्षण ॥
१०८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु उनके द्वारा बनाये गये भोजन को परम सन्तोष के साथ ग्रहण करते। जब महाप्रभु तुष्ट हो जाते, तब रघुनाथ भट्ट उनका शेष ग्रहण करते।
रामदास यदि प्रथम प्रभुरे मिलिला । महाप्रभु अधिक ताँरे कृपा ना करिला ॥
१०९॥
जब रामदास विश्वास श्री चैतन्य महाप्रभु से मिला, तो महाप्रभु ने उस पर कोई विशेष कृपा नहीं दर्शाई, यद्यपि यह उनकी प्रथम भेंट थी।
अन्तरे मुमुक्षु तेंहो, विद्या-गर्ववान् ।। सर्व-चित्त-ज्ञाता प्रभु–सर्वज्ञ भगवान् ॥
११०॥
अन्तर से रामदास विश्वास निर्विशेषवादी था, जो भगवान् से तादात्म्य चाहता था और अपनी विद्या के प्रति उसे बहुत अहंकार था। सर्वज्ञ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् होने के कारण श्री चैतन्य महाप्रभु किसी के भी हृदय की बात समझ सकते हैं और इस तरह वे इन सारी बातों को जानते थे।
रामदास कैला तबे नीलाचले वास । पट्टनायक-गोष्ठीके पड़ाय' काव्य-प्रकाश' ।। १११॥
तब रामदास विश्वास ने नीलाचल में ही अपना आवास बना लिया। महपट्टनायक परिवार ( भवानन्द राय के वंशजों ) को 'काव्यप्रकाश पाने लगा।
अष्ट-मास रहि' प्रभु भट्ट विदाय दिला ।। ‘विवाह ना करिह' बलि' निषेध करिला ॥
११२॥
आठ मास बाद, जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने रघुनाथ भट्ट को विदा किया, तो महाप्रभु ने उनसे विवाह करने के लिए स्पष्ट रूप से मना किया। महाप्रभु ने कहा, विवाह मत करना।
वृद्ध माता-पितार ग्राइ' करह सेवन ।। वैष्णव-पाश भागवत कर अध्ययन ॥
११३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने रघुनाथ भट्ट से कहा, जब तुम अपने घर लौटोगे, तो अपने वृद्ध माता-पिता की सेवा करना, जो कि भक्त हैं और तुम किसी शुद्ध वैष्णव से, जिसने भगवत् साक्षात्कार किया हो, श्रीमद्भागवत का अध्ययन करना।"
पुनरपि एक-बार आसिह नीलाचले ।।एत बलि' कण्ठ-माला दिला ताँर गले ॥
११४॥
अन्त में श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, नीलाचल (जगन्नाथ पुरी ) फिर से आना। यह कहकर महाप्रभु ने अपनी कण्ठी-माला रघुनाथ भट्ट के गले में डाल दी।
आलिङ्गन करि' प्रभु विदाय तारे दिला । प्रेमे गर गर भट्ट कान्दिते लागिला ॥
११५॥
इसके बाद महाप्रभु ने उनका आलिंगन किया और उन्हें विदा किया। प्रेम से विह्वल होकर तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के आसन्न विछोह के कारण रघुनाथ भट्ट रोने लगे।
स्वरूप-आदि भक्त-ठाजि आज्ञा मागिया । वाराणसी आइला भट्ट प्रभुर आज्ञा पाञा ॥
११६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु से तथा स्वरूप दामोदर आदि सारे भक्तों से आज्ञा लेकर रघुनाथ भट्ट वाराणसी लौट गये।
चारि-वत्सर घरे पिता-मातार सेवा कैला । वैष्णव-पण्डित-ठात्रि भागवत पड़िला ॥
११७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेशानुसार वे लगातार चार वर्षों तक अपने माता-पिता की सेवा करते रहे। उन्होंने एक स्वरूपसिद्ध वैष्णव से नियमित रूप से 'श्रीमद्भागवत' का अध्ययन भी किया।
पिता-माता काशी पाइले उदासीन हो । पुनः प्रभुर ठाञि आइला गृहादि छाड़िया ॥
११८॥
जब उनके माता पिता का काशी (वाराणसी) में देहान्त हो गया, तो वे विरक्त हो गये। अतएव अपने घर के सारे सम्बन्धों को त्यागकर वे श्री चैतन्य महाप्रभु के पास लौट आये।
पूर्ववत् अष्ट-मास प्रभु-पाश छिला । अष्ट-मास रहि' पुनः प्रभु आज्ञा दिला ॥
११९॥
पहले की तरह रघुनाथ लगातार आठ महीने श्री चैतन्य महाप्रभु के पास रुके। तब महाप्रभु ने उन्हें यह आदेश दिया।
आमार आज्ञाय, रघुनाथ, ग्राह वृन्दावने । ताहाँ ग्राञा रह रूप-सनातन-स्थाने ॥
१२०॥
हे रघुनाथ, मेरी आज्ञानुसार तुम वृन्दावन जाओ। वहाँ रूप तथा नातन गोस्वामियों के संरक्षण में रहना।
भागवत पड़, सदा लह कृष्ण-नाम ।। अचिरे करिबेन कृपा कृष्ण भगवान् ॥
१२१॥
तुम वृन्दावन जाकर चौबीसों घण्टे हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन करना तथा निरन्तर श्रीमद्भागवत पढ़ना। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण शीघ्र ही तुम पर कृपा करेंगे।
एत बलि' प्रभु तारे आलिङ्गन कैला ।प्रभुर कृपाते कृष्ण-प्रेमे मत्त हैला ॥
१२२॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने रघुनाथ भट्ट का आलिंगन किया और महाप्रभु की कृपा से रघुनाथ में कृष्ण-प्रेम जागृत हो उठा।
चौद्द-हात जगन्नाथेर तुलसीर माला । छुटा-पान-विड़ा महोत्सवे पाजाछिला ॥
१२३॥
एक उत्सव में श्री चैतन्य महाप्रभु को कुछ सादे पान तथा चौदह हाथ लम्बी तुलसी की माला दी गई थी। यह माला जगन्नाथ जी की पहनी हुई थी।
सेइ माला, छुटा पान प्रभु ताँरे दिला ।‘इष्ट-देव' करि' माला धरिया राखिला ॥
१२४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने वह माला तथा पान रघुनाथ भट्ट को दे दिये, जिन्होंने इन्हें आराध्य देव की तरह स्वीकार किया और सुरक्षित रख लिया।
प्रभुर ठाजि आज्ञा लञा गेला वृन्दावने ।। आश्रय करिला आसि' रूप-सनातने ॥
१२५॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु से आज्ञा लेकर रघुनाथ भट्ट वृन्दावन के लिए अल पड़े। वहाँ पहुँचकर वे रूप तथा सनातन गोस्वामियों के संरक्षण में रहने लगे।
रूप-गोसाजिर सभाय करेन भागवत-पठन । भागवत पड़िते प्रेमे आउलाय ताँर मन ॥
१२६॥
जब रघुनाथ भट्ट रूप तथा सनातन की संगति में श्रीमद्भागवत पढ़ते, तो वे कृष्ण-प्रेम से अभिभूत हो उठते।
अश्रु, कम्प, गद्गद प्रभुर कृपाते । नेत्र कण्ठ रोधे बाष्प, ना पारे पड़िते ॥
१२७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से उनमें प्रेमावेश के लक्षण-अश्रु, कम्प तथा वाणी अवरोध-प्रकट होने लगते। उनकी आँखें आँसू से भर जातीं, उनका कंठ रुद्ध हो जाता और इस कारण वे श्रीमद्भागवत नहीं सुना पाते थे।
पिक-स्वर-कण्ठ, ताते रागेर विभाग ।। एक-श्लोक पड़िते फिराय तिन-चारि राग ॥
१२८॥
उनकी वाणी कोयल की वाणी के समान मीठी थी और वे श्रीमद्भागवत के प्रत्येक श्लोक को तीन-चार अलग रागों में सुना सकते थे। इस तरह उनका वाचन सुनने में अत्यन्त मधुर लगता।
कृष्णेर सौन्दर्य-माधुर्य ग्रबे पड़े, शुने । प्रेमेते विह्वल तबे, किछुइ ना जाने ॥
१२९॥
जब वे कृष्ण के सौन्दर्य और माधुर्य का पाठ करते या सुनते, तब वे बि से विह्वल हो उठते और सब कुछ भूल जाते।
गोविन्द-चरणे कैला आत्म-समर्पण ।गोविन्द-चरणारविन्द याँर प्राण-धन ॥
१३०॥
इस तरह रघुनाथ भट्ट पूर्णरूपेण भगवान् गोविन्द के चरणकमलों में समर्पित हो गये और उनके चरणकमल ही उनके जीवनाधार बन गये।
निज शिष्ये कहि' गोविन्देर मन्दिर कराइला ।वंशी, मकर कुण्डलादि' भूषण' करि' दिला ॥
१३१॥
फलस्वरूप रघुनाथ भट्ट ने अपने शिष्यों से गोविन्द के लिए मन्दिर बनवाने का आदेश दिया। उन्होंने वंशी तथा मकराकृति वाले कान के कुण्डल जैसे विविध आभूषण गोविन्द के लिए तैयार किये।
ग्राम्य-वार्ता ना शुने, ना कहे जिह्वाय ।। कृष्ण-कथा-पूजादिते अष्ट-प्रहर ग्राय ॥
१३२॥
रघुनाथ भट्ट न तो इस भौतिक जगत् की कोई वार्ता सुनते, न उसके विषय में कहते। वे केवल कृष्ण की वार्ता करते और अहर्निश कृष्ण की पूजा करते।
वैष्णवेर निन्द्य-कर्म नाहि पाड़े काणे । सबे कृष्ण भजन करे,—एइ-मात्र जाने ॥
१३३॥
वे न तो वैष्णव की निन्दा सुनते, न ही किसी वैष्णव के दुराचार की बात सुनते। वे केवल इतना ही जानते कि हर कोई कृष्ण की सेवा में लगा हुआ है। इसके अतिरिक्त वे और कुछ नहीं समझते थे।
महाप्रभुर दत्त माला मननेर काले । प्रसाद-कड़ार सह बान्धि लेन गले ॥
१३४॥
जब रघुनाथ भट्ट गोस्वामी कृष्ण के स्मरण में मग्न होते, तो वे श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा दी गई तुलसी माला तथा जगन्नाथ जी के प्रसाद को निकालते, उन्हें एक साथ बाँधकर गले में पहन लेते।
महाप्रभुर कृपाय कृष्ण-प्रेम अनर्गल ।।एइ त कहिलें ताते चैतन्य-कृपा-फल ॥
१३५ ॥
इस तरह मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा का वर्णन किया है, जिससे रघुनाथ भट्ट गोस्वामी निरन्तर कृष्ण-प्रेम में विह्वल रहते थे।
जगदानन्देर कहिलें वृन्दावन-गमन ।। तार मध्ये देव-दासीर गान-श्रवण ॥
१३६॥
महाप्रभुर रघुनाथे कृपा-प्रेम-फल ।।एक-परिच्छेदे तिन कथा कहिलै सकल ॥
१३७॥
इस अध्याय में मैंने तीन कथाएँ कही हैं-जगदानन्द पण्डित का वृन्दावन जाना, श्री चैतन्य महाप्रभु का जगन्नाथ मन्दिर में देवदासी का गायन सुनना तथा श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से रघुनाथ भट्ट गोस्वामी द्वारा कृष्ण-प्रेम को प्राप्त करना।
ये एई-सकल कथा शुने श्रद्धा करि' । ताँरे कृष्ण-प्रेम-धन देन गौरहरि ॥
१३८ ॥
जो कोई इन कथाओं को श्रद्धा तथा प्रेम से सुनता है, उसको श्री बैतन्य महाप्रभु ( गौरहरि) कृष्ण-प्रेम प्रदान करते हैं।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे ग्रार आश ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
१३९ ॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए उनके चरणचिह्नों पर चलकर मैं कृष्णदास श्री चैतन्य चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
