अध्याय बारह: भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु और जगदानंद पंडित के बीच प्रेमपूर्ण व्यवहार
श्रूयतां श्रूयतां नित्यं गीयतां गीयतां मुदा ।।चिन्त्यतां चिन्त्यतां भक्ताश्चैतन्य-चरितामृतम् ॥
१॥
हे भक्तों, श्री चैतन्य महाप्रभु का दिव्य जीवन तथा उनके गुण अत्यन्त सुखपूर्वक नित्य ही सुने, गाये तथा ध्यान किये जाँय।
जय जय श्री-चैतन्य जय दयामय ।जय जय नित्यानन्द कृपा-सिन्धु जय ॥
२॥
सर्व दयामय श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! कृपा के सागर नित्यानन्द प्रभु की जय हो! जयाद्वैत-चन्द्र जय करुणा-सागर ।।जय गौर-भक्त-गण कृपा-पूर्णान्तर ॥
३॥
कृपा के सागर अद्वैत आचार्य की जय हो! श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो, जिनके हृदय सदैव कृपा से पूरित रहते हैं! अतःपर महाप्रभुर विषण्ण-अन्तर ।कृष्णेर वियोग-दशा स्फुरे निरन्तर ॥
४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु का मन सदैव खिन्न रहता था, क्योंकि उनमें निरन्तर कृष्ण-विरह का भाव प्रकट हो रहा था।
‘हाही कृष्ण प्राण-नाथ व्रजेन्द्र-नन्दन! ।।काहाँ ग्राङकाहाँ पाङ, मुरली-वदन!' ॥
५॥
महाप्रभु क्रन्दन करते रहते, हे मेरे प्रभु कृष्ण, हे मेरे प्राणेश्वर! हे महाराज नन्द के पुत्र, मैं कहाँ जाऊँ? मैं आपको कहाँ पाऊँ? हे अपने मुख पर मुरली रखकर बजाने वाले भगवान्! रात्रि-दिन एइ दशा स्वस्ति नाहि मने । कष्टे रात्रि गोडाय स्वरूप-रामानन्द-सने ॥
६॥
दिन-रात उनकी ऐसी ही दशा थी। मन की शान्ति न पाने के कारण वे स्वरूप दामोदर तथा रामानन्द राय के साथ बहुत कठिनाई से रात बिताते थे।
एथा गौड़-देशे प्रभुर व्रत भक्त-गण ।। प्रभु देखिबारे सबे करिला गमन ॥
७॥
तभी सारे भक्त अपने घरों से श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने बंगाल से यात्रा पर निकले।
शिवानन्द-सेन आर आचार्य-गोसाजि ।नवद्वीपे सब भक्त हैला एक ठाजि ॥
८॥
शिवानन्द सेन, अद्वैत आचार्य इत्यादि सारे भक्त नवद्वीप में एकत्र हुए।
कुलीन-ग्राम-वासी आर ग्रत खण्ड-वासी ।एकत्र मिलिला सब नवद्वीपे आसि' ॥
९॥
कुलीनग्राम तथा खण्ड गाँव के निवासी भी नवद्वीप में एकत्र हुए।
नित्यानन्द-प्रभुरे यद्यपि आज्ञा नाइ ।।तथापि देखिते चलेन चैतन्य-गोसाजि ॥
१०॥
चूँकि नित्यानन्द प्रभु बंगाल में प्रचार कर रहे थे, इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें आदेश दे रखा था कि वे जगन्नाथपुरी न आयें, किन्तु उस वर्ष वे महाप्रभु के दर्शन हेतु टोली के साथ चले गये।
श्रीवासादि चारि भाइ, सङ्गेते मालिनी ।आचार्य्यरत्नेर सङ्गे ताँहार गृहिणी ॥
११॥
श्रीवास ठाकुर भी अपने तीन भाइयों तथा अपनी पत्नी मालिनी के साथ थे। इसी प्रकार आचार्यरत्न भी अपनी पत्नी के साथ थे।
शिवानन्द-पत्नी चले तिन-पुत्र लबा । राघव-पण्डित चले झालि साजा ॥
१२॥
शिवानन्द सेन की पत्नी भी अपने तीन पुत्रों सहित आईं। राघव पण्डित भी अपने सुप्रसिद्ध भोजन के थैले लेकर उनके साथ हो लिये।
दत्त, गुप्त, विद्यानिधि, आर ग्रत जन ।। दुइ तिन शत भक्त करिला गमन ॥
१३॥
वासुदेव दत्त, मुरारि गुप्त, विद्यानिधि तथा अन्य अनेक भक्त श्री महाप्रभु के दर्शनार्थ गये। कुल मिलाकर दो-तीन सौ की संख्या थी। शचीमाता देखि' सबे ताँर आज्ञा लञा । आनन्दे चलिला कृष्ण-कीर्तन करिया ॥
१४॥
सब भक्त सर्वप्रथम शचीमाता से मिले और उनसे अनुमति ली। तब परम सुखपूर्वक वे भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करते हुए थपुरी के लिए रवाना हुए।
शिवानन्द-सेन करे घाटी-समाधान ।। सबारे पालन करि' सुखे ला ग्रान ॥
१५॥
शिवानन्द सेन ने विभिन्न स्थानों ( घाटी) पर पथ-कर चुकता किया। उन्होंने सारे भक्तों का पालन-पोषण करते हुए परम सुखपूर्वक उन सबों का मार्गदर्शन किया।
सबार सब कार्य करेन, देन वास-स्थान ।।शिवानन्द जाने उड़िया-पथेर सन्धान ॥
१६॥
शिवानन्द सेन हर एक की देखभाल करते और हर भक्त को ठहरने का स्थान देते थे। वे उड़ीसा जाने वाले सारे मार्गों को जानते थे।
एक-दिन सब लोक घाटियाले राखिला ।।सबा छाड़ा शिवानन्द एकला रहिला ॥
१७॥
एक दिन जब कर संग्रह करनेवाला इस टोली की छानबीन कर रहा था तो सारे भक्तों को निकल जाने दिया गया, किन्तु कर अदा करने के शिवानन्द सेन पीछे रह गये।
सबे गिया रहिला ग्राम-भितर वृक्ष-तले ।शिवानन्द विना वास-स्थान नाहि मिले ॥
१८॥
पह टोली एक गाँव में पहुँची और एक पेड़ के नीचे प्रतीक्षा करने गी, क्योंकि शिवानन्द सेन के अतिरिक्त अन्य कोई उनके रहने के लिए न की व्यवस्था नहीं कर सकता था।
नित्यानन्द-प्रभु भोखे व्याकुल हो ।शिवानन्दे गालि पाड़े वासा ना पाञा ॥
१९॥
इस बीच नित्यानन्द प्रभु को काफी भूख लग आई, जिससे वे प्याकुल हो उठे। चूंकि उन्हें अभी तक रहने के लिए उपयुक्त स्थान नहीं मिल पाया था, अतएव वे शिवानन्द सेन को गाली देने लगे।
‘तिन पुत्र मरुक शिवार, एखन ना आइल ।भोखे मरि' गेनु, मोरे वासा ना देओयाइल' ॥
२०॥
उन्होंने शिकायत की, शिवानन्द सेन ने मेरे रहने के लिए व्यवस्था नहीं की और मैं इतना भूखा हूँ कि मर सकता हूँ। चूँकि वह नहीं आया है, अतएव मैं उसके तीनों पुत्रों को मरने का शाप देता हूँ।
शुनि' शिवानन्देर पत्नी कान्दिते लागिला ।। हेन-काले शिवानन्द घाटी हैते आइला ॥
२१॥
यह शाप सुनकर शिवानन्द सेन की पत्नी रोने लगीं। तभी शिवानन्द सेन घाटी से लौट आये।
शिवानन्देर पत्नी ताँरे कहेन कान्दिया ।। पुत्रे शाप दिछेन गोसाञि वासा ना पात्रा' ॥
२२ ॥
उनकी पत्नी ने रोते हुए बतलाया, नित्यानन्द प्रभु ने हमारे पुत्रों को भरने का शाप दे दिया है, क्योंकि उन्हें रहने का स्थान नहीं मिल पाया।
तेंहो कहे,बाउलि, केने मरिस् कान्दिया? ।मरुक आमार तिन पुत्र ताँर बालाइ ला ॥
२३॥
शिवानन्द सेन ने उत्तर दिया, अरी पगली, तुम व्यर्थ क्यों रो रही हो? नित्यानन्द प्रभु को जो असुविधा हमारे कारण हुई है, उसके लिए हमारे तीनों पुत्रों को मरने दो।
एत बलि' प्रभु-पाशे गेला शिवानन्द ।उठि' ताँरै लाथि माइला प्रभु नित्यानन्द ॥
२४॥
यह कहकर शिवानन्द सेन नित्यानन्द प्रभु के पास गये, जिन्होंने उठकर उन पर पाद-प्रहार किया।
आनन्दित हैला शिवाइ पाद-प्रहार पाना । शीघ्र वासा-घर कैला गौड़-धरे गिया ॥
२५॥
पाद-प्रहार से अत्यधिक प्रसन्न होकर शिवानन्द सेन ने तुरन्त एक ग्वाले के घर में नित्यानन्द प्रभु के आवास की व्यवस्था कर दी।
चरणे धरिया प्रभुरे वासाय ला गेला । वासा दिया हृष्ट हज कहिते लागिला ॥
२६॥
शिवानन्द सेन ने नित्यानन्द प्रभु के चरणकमल पकड़े और वह उन्हें उनके निवासस्थान पर ले गये। उन्हें कमरा देने के बाद अत्यन्त प्रसन्न होकर शिवानन्द सेन ने इस प्रकार कहा।
आजि मोरे भृत्य करि' अङ्गीकार कैला । येमन अपराध भृत्येर, योग्य फल दिला ॥
२७॥
आज आपने मुझे अपने सेवक के रूप में स्वीकार किया है और मेरे अपराध के लिए उचित दण्ड भी दिया है।
‘शास्ति'-छले कृपा कर,—ए तोमार 'करुणा' ।त्रिजगते तोमार चरित्र बुझे कोन् जना? ॥
२८ ॥
हे प्रभु, आपके द्वारा दिया गया दण्ड आपकी अहैतुकी कृपा है। नों लोकों में ऐसा कौन है, जो आपके वास्तविक चरित्र को समझ कै? ब्रह्मार दुर्लभ तोमार श्री-चरण-रेणु ।हेन चरण-स्पर्श पाइल मोर अधम तनु ॥
२९॥
आपके चररकमलों की धूल ब्रह्मा तक को प्राप्य नहीं है। फिर भी आपके चरणकमलों ने मेरे अधम शरीर का स्पर्श किया है।
आजि मोर सफल हैल जन्म, कुल, कर्म । आजि पाइनु कृष्ण-भक्ति, अर्थ, काम, धर्म ॥
३०॥
आज मेरा जन्म, मेरा परिवार तथा मेरे कर्म सभी सफल हो गये। आज मैंने धर्म, अर्थ, काम तथा अन्ततः भगवान् कृष्ण की भक्ति प्राप्त की है।
शुनि' नित्यानन्द-प्रभुर आनन्दित मन ।। उठि' शिवानन्दे कैला प्रेम-आलिङ्गन ॥
३१॥
जब नित्यानन्द प्रभु ने यह सुना, तो वे अत्यधिक प्रसन्न हुए। उन्होंने उठकर अत्यन्त प्रेमवश शिवानन्द का आलिंगन कर लिया।
आनन्दित शिवानन्द करे समाधान । आचार्यादि-वैष्णवेरे दिलो वासा-स्थान ॥
३२॥
नित्यानन्द प्रभु के व्यवहार से अत्यधिक प्रसन्न होकर शिवानन्द सेन अद्वैत आचार्य इत्यादि सारे वैष्णवों के लिए निवासस्थान की व्यवस्था ने में लग गये।
नित्यानन्द-प्रभुर सब चरित्र--‘विपरीत' ।क्रुद्ध हञा लाथि मारि' करे तार हित ॥
३३॥
नित्यानन्द प्रभु का विपरीत स्वभाव उनकी विशेषता है। जब वे क्रुद्ध कर किसी पर पाद-प्रहार करते हैं, तो वस्तुतः वह उसके हित में होता है।
शिवानन्देर भागिना,—श्रीकान्त-सेन नाम ।मामार अगोचरे कहे करि' अभिमान ॥
३४॥
शिवानन्द सेन के भाँजे श्रीकान्त ने अपने आपको अपमानित अनुभव किया और जब उसके मामा नहीं थे, तब उसने इस विषय पर टिप्पणी की।
चैतन्येर पारिषद मोर मातुलेर ख्याति ।। 'ठाकुराली' करेन गोसाञि, ताँरे मारे लाथि ॥
३५॥
मेरे मामा श्री चैतन्य महाप्रभु के संगियों में से एक हैं, किन्तु नित्यानन्द प्रभु उन पर पाद-प्रहार करके अपनी श्रेष्ठता दिखाना चाहते हैं।
एत बलि' श्रीकान्त, बालक आगे चलि' ग्रान । सङ्ग छाड़ि' आगे गेला महाप्रभुर स्थान ॥
३६॥
यह कहकर श्रीकान्त, जो कि अभी बच्चा था, अपनी टोली छोड़कर अकेले ही चैतन्य महाप्रभु के निवासस्थान पर चला गया।
पेटाङ्गि-गाय करे दण्डवत् नमस्कार । गोविन्द कहे, ‘श्रीकान्त, आगे पेटाङ्गि उतार' ॥
३७॥
जब श्रीकान्त ने महाप्रभु को नमस्कार किया, तो वह अपनी कमीज तथा कोट पहने था। इसलिए गोविन्द ने उससे कहा, हे श्रीकान्त, सर्वप्रथम अपने कपड़ों को उतार डालो।
प्रभु कहे,– श्रीकान्त आसियाछे पाञा मनो-दुःख । किछु ना बलिह, करुक, ग्राते इहार सुख ॥
३८॥
जब गोविन्द श्रीकान्त को सावधान कर रहा था, तब महाप्रभु ने कहा, उसे तंग मत करो। श्रीकान्त जो चाहे सो करने दो, क्योंकि वह यहाँ अत्यन्त दुःखी मानसिक अवस्था में आया है।
वैष्णवेर समाचार गोसाजि पुछिला । एके एके सबार नाम श्रीकान्त जानाइला ॥
३९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रीकान्त से समस्त वैष्णवों के विषय में पृछा और उस बालक ने सबों का नाम लेकर उनके विषय में महाप्रभु को सूचित किया।
‘दुःख पाजा आसियाछे'–एइ प्रभुर वाक्य शुनि' । जानिला 'सर्वज्ञ प्रभु'–एत अनुमानि' ॥
४०॥
जब श्रीकान्त सेन ने महाप्रभु को यह कहते सुना कि, वह दुःखी है, तो वह समझ गया कि महाप्रभु सर्वज्ञ हैं।
शिवानन्दे लाथि मारिला,—इही ना कहिला । एथा सब वैष्णव-गण आसिया मिलिला ॥
४१॥
इसलिए जब उसने वैष्णवों का हाल बतलाया, तब उसने नित्यानन्द प्रभु द्वारा शिवानन्द सेन पर पाद-प्रहार किये जाने का उल्लेख नहीं किया। बीच सारे भक्त आ गये और महाप्रभु से मिलने गये।
पूर्ववत् प्रभु कैला सबार मिलन ।।स्त्री-सब दूर ह-इते कैला प्रभुर दरशन ॥
४२॥
भी चैतन्य महाप्रभु ने पहले के वर्षों की तरह उन सभी का स्वागत पा। किन्तु स्त्रियों ने दूर से महाप्रभु का दर्शन किया।
वासा-घर पूर्ववत् सबारे देओयाइला । महाप्रसाद-भोजने सबारे बोलाइला ॥
४३॥
महाप्रभु ने फिर से सारे भक्तों के लिए निवासीय कमरों का प्रबन्ध किया और उसके बाद जगन्नाथजी का प्रसाद पाने के लिए सबों को पुलाया।
शिवानन्द तिन-पुत्रे गोसाजिरे मिलाइला ।शिवानन्द-सम्बन्धे सबाय बहु-कृपा कैला ॥
४४॥
शिवानन्द सेन ने श्री चैतन्य महाप्रभु से अपने तीनों पुत्रों का परिचय कराया। चूंकि वे उनके पुत्र थे, इसलिए महाप्रभु ने इन बालकों पर अत्यधिक कृपा प्रदर्शित की।
छोट-पुत्रे देखि' प्रभु नाम पुछिला ।‘परमानन्द-दास'-नाम सेन जानाइला ॥
४५ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने शिवानन्द सेन के सबसे छोटे पुत्र का नाम पूछा, तो शिवानन्द सेन ने उसका नाम परमानन्द दास बतलाया।
पूर्वे ग्रबे शिवानन्द प्रभु-स्थाने आइला । तबे महाप्रभु ताँरै कहिते लागिला ॥
४६॥
ए-बार तोमार ग्रेइ ह-इबे कुमार ।। ‘पुरी-दास' बलि' नाम धरिह ताहार ॥
४७॥
एक बार जब शिवानन्द सेन श्री चैतन्य महाप्रभु से उनके स्थान पर ले थे, तब महाप्रभु ने उनसे कहा था, जब तुम्हें यह पुत्र जन्मे, तो का नाम पुरी दास रखना।
तबे मायेर गर्ने हय सेइ त' कुमार ।।शिवानन्द घरे गेले, जन्म हैल तार ॥
४८॥
तब यह पुत्र शिवानन्द की पत्नी के गर्भ में था और जब वे घर लौटे, य पुत्र उत्पन्न हुआ।
प्रभु-आज्ञाय धरिला नाम-'परमानन्द-दास' ।‘पुरी-दास' करि' प्रभु करेन उपहास ॥
४९॥
महाप्रभु की आज्ञा के अनुसार बच्चे का नाम परमानन्द दास रखा गया और महाप्रभु ने हँसी-हँसी में उसे पुरी दास कहा।
शिवानन्द झबे सेइ बालके मिलाइला ।।महाप्रभु पादाङ्गुष्ठ तार मुखे दिला ॥
५०॥
जब शिवानन्द सेन ने इस बालक का परिचय श्री चैतन्य महाप्रभु से कराया, तब महाप्रभु ने उसके मुँह में अपना अँगूठा डाल दिया।
शिवानन्देर भाग्य-सिन्धु के पाइबे पार? ।याँर सब गोष्ठीके प्रभु कहे 'आपनार' ॥
५१॥
शिवानन्द सेन के सौभाग्य रूपी सागर को कोई लाँघ नहीं सकता, क्योंकि महाप्रभु शिवानन्द के समस्त परिवार को अपना मानते थे।
तबे सब भक्त लञा करिला भोजन । गोविन्देरे आज्ञा दिला करि आचमन ॥
५२॥
महाप्रभु ने अन्य सारे भक्तों के साथ भोजन किया और हाथ-मुँह ने के बाद गोविन्द को यह आज्ञा दी।
शिवानन्देर 'प्रकृति', पुत्र—ग्रावतेथाय ।। आमार अवशेष-पात्र तारा ब्रेन पाय ॥
५३॥
उन्होंने कहा, जब तक शिवानन्द सेन की पत्नी तथा उसके पुत्र जगन्नाथपुरी में रुकें, उन्हें मेरे भोजन का शेष दिया जाय।
नदीया-वासी मोदक, तार नाम-‘परमेश्वर' । मोदक वेचे, प्रभुर वाटीर निकट तार घर ॥
५४॥
नदिया के निवासी परमेश्वर नाम के एक हलवाई ( मोदक) थे, जो भी चैतन्य महाप्रभु के घर के समीप रहते थे। बालक-काले प्रभु तार घरे बार बार ग्रा' न ।दुग्ध, खण्ड मोदक देय, प्रभु ताहा खा' न ॥
५५॥
जब महाप्रभु बालक थे, तब वे परमेश्वर मोदक के घर बारम्बार जाते थे। वह हलवाई उन्हें दूध तथा मिठाइयाँ देता और महाप्रभु उन्हें खाते थे।
प्रभु-विषये स्नेह तार बालक-काल हैते ।से वत्सर सेह आइल प्रभुरे देखिते ॥
५६॥
परमेश्वर मोदक बाल्यकाल से ही महाप्रभु के प्रति स्नेहिल थे और वे भी इस वर्ष जगन्नाथपुरी महाप्रभु के दर्शनार्थ आये थे।
‘परमेश्वरा मुञि' बलि' दण्डवत् कैल ।तारे देखि' प्रभु प्रीते ताहारे पुछिल ॥
५७॥
उन्होंने महाप्रभु को नमस्कार करके कहा, मैं वही परमेश्वर हूँ। देखकर महाप्रभु ने उनसे अत्यन्त स्नेह के साथ प्रश्न पूछे।
‘परमेश्वर कुशल हओ, भाल हैल, आइला' ।।‘मुकुन्दार माता आसियाछे' सेह प्रभुरे कहिला ॥
५८ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, हे परमेश्वर, आपको मंगल हो। अच्छा आ कि आप यहाँ आये हो। तब परमेश्वर ने महाप्रभु को बतलाया, मुकुन्द की माता भी आई है।
मुकुन्दार मातार नाम शुनि' प्रभु सङ्कोच हैला ।तथापि ताहार प्रीते किछु ना बलिला ॥
५९॥
मुकुन्दार माता का नाम सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु को संकोच हुआ, किन्तु परमेश्वर के स्नेहवश उन्होंने कुछ नहीं कहा।
प्रश्रय-पागल शुद्ध-वैदग्धी ना जाने ।अन्तरे सुखी हैला प्रभु तार सेइ गुणे ॥
६० ॥
घनिष्ठता के कारण कभी-कभी सामान्य शिष्टाचार का उल्लंघन हो जाता है। अतएव परमेश्वर ने अपने सरल तथा स्नेहमय आचरण से वास्तव में महाप्रभु के अन्तर को सुखी बनाया।
पूर्ववत् सबा ला गुण्डिचा-मार्जन ।।रथ-आगे पूर्ववत् करिला नर्तन ॥
६१॥
सारे भक्तों ने गुण्डिचा मन्दिर-मार्जन में भाग लिया और रथयात्रा में के समक्ष उसी तरह नृत्य किया, जिस तरह उन्होंने पहले किया था।
चातुर्मास्य सब यात्रा कैला दरशन ।मालिनी-प्रभृति प्रभुरे कैला निमन्त्रण ॥
६२॥
भक्तों ने चार महीनों तक सारे उत्सव मनाये। मालिनी इत्यादि पत्नियों । श्री चैतन्य महाप्रभु को भोजन के लिए निमन्त्रण भेजा।
प्रभुर प्रिय नाना द्रव्य आनियाछे देश हैते ।।सेइ व्यञ्जन करि' भिक्षा देन घर-भाते ॥
६३॥
भक्तगण अपने साथ बंगाल से नाना प्रकार के बंगाली भोजन ले आये थे, जो श्री चैतन्य महाप्रभु को पसन्द थे। उन्होंने अपने घरों में विविध अन्न तथा तरकारियाँ भी पकाई और उन्हें महाप्रभु को दिया।
दिने नाना क्रीड़ा करे ला भक्त-गण ।।रात्र्ये कृष्ण-विच्छेदे प्रभु करेन रोदन ॥
६४॥
दिन में श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों के साथ विविध कार्यों में लगे रहते, किन्तु रात्रि में कृष्ण के महान् विरह का अनुभव करते हुए अश्रु बहाते।
एइ-मत नाना-लीलाय चातुर्मास्य गेल ।।गौड़-देशे ग्राइते तबे भक्ते आज्ञा दिल ॥
६५॥
। इस तरह महाप्रभु ने नाना प्रकार की लीलाओं में वर्षाऋतु के चार मास व्यतीत किये और तब बंगाली भक्तों को अपने-अपने घर लौट जाने की आज्ञा दी।
सब भक्त करेन महाप्रभुर निमन्त्रण ।।सर्व-भक्ते कहेन प्रभु मधुर वचन ॥
६६॥
बंगाल के सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु को नियमित रूप से भोजन के लिए आमन्त्रित करते रहते और महाप्रभु उनसे अत्यन्त मधुर शब्द कहते।
प्रति-वर्षे आइस सबे आमारे देखते ।। आसिते ग्राइते दुःख पाओ बहु-मते ॥
६७॥
महाप्रभु ने कहा, तुम सब लोग प्रतिवर्ष मुझे मिलने आते रहते हो। यहाँ आने तथा लौटने में तुम लोगों को अवश्य ही भारी कष्ट होता होगा।
तोमा-सबार दुःख जानि' चाहि निषेधिते ।। तोमा-सबार सङ्ग-सुखे लोभ बाड़े चित्ते ॥
६८॥
'मैं तुम लोगों को ऐसा करने से मना कर देता, किन्तु मुझे तुम लोगों भी मंगति इतनी अच्छी लगती है कि तुम लोगों की संगति करने की मेरी इच्छा बढ़ती ही जाती है।
नित्यानन्दे आज्ञा दिलॆ गौड़ेते रहिते । आज्ञा लङ्घि' आइला, कि पारि बलिते? ॥
६९॥
मैंने श्री नित्यानन्द प्रभु को बंगाल न छोड़ने का आदेश दिया था, किन्तु वे आज्ञा का उल्लंघन करके मेरे दर्शनार्थ आये हैं। भला मैं क्या कह सकता हूँ? आइलेन आचार्य-गोसाजि मोरे कृपा करि' ।। प्रेम-ऋणे बद्ध आमि, शुधिते ना पारि ॥
७० ॥
अद्वैत आचार्य भी मुझ पर अपनी अहैतुकी कृपा के कारण यहाँ आये हैं। मैं उनके स्नेहिल व्यवहार के लिए उनका ऋणी हूँ। मेरे लिए इस ऋण से उऋण हो पाना असम्भव है।
मोर लागि' स्त्री-पुत्र गृहादि छाड़िया ।। नाना दुर्गम पथ लङ्घि' आइसेन धाज्ञा ॥
७१॥
सारे भक्त यहाँ मेरे लिए आते हैं। वे अपने घरों तथा परिवारों को छोड़कर यहाँ शीघ्र पहुँचने के लिए अत्यन्त दुर्गम रास्तों से होकर यात्रा करते हैं।
आमि एइ नीलाचले रहि ये वसिया ।।परिश्रम नाहि मोर तोमा सबार लागिया ॥
७२॥
मुझको कोई थकावट या कष्ट नहीं होता, क्योंकि मैं तो यहाँ भोलाघल, जगन्नाथ पुरी में ही रहता हूँ और कहीं भी नहीं जाता। यह तो प सबों की कृपा है।
सन्यासी मानुष मोर, नाहि कोन धन ।।कि दिया तोमार ऋण करिमु शोधन? ॥
७३॥
मैं संन्यासी हूँ और मेरे पास धन नहीं है। भला तुमने मुझ पर जो कृपा दिखलाई है, उसका ऋण मैं कैसे चुकता कर सकता हूँ? देह-मात्र धन तोमाय कैलूं समर्पण ।।ताहाँ विकाइ, याहाँ वेचिते तोमार मन ॥
७४॥
मेरे पास केवल यह शरीर है, अतएव मैं इसे तुम्हें समर्पित करता हूँ। अब तुम चाहो, तो इसे कहीं भी बेच सकते हो। यह तुम्हारी सम्पत्ति है।
प्रभुर वचने सबार द्रवी-भूत मन ।अझोर-नयने सबे करेन क्रन्दन ॥
७५॥
जब सारे भक्तों ने श्री चैतन्य महाप्रभु के इन मधुर वचनों को सुना, तो उनके हृदय द्रवित हो उठे और वे लगातार अश्रु बहाने लगे।
प्रभु सबार गला धरि' करेन रोदन ।कान्दिते कान्दिते सबाय कैला आलिङ्गन ॥
७६॥
अपने भक्तों को पकड़कर महाप्रभु ने सबों का आलिंगन किया और होने लगे।
सबाइ रहिल, केह चलिते नारिले ।।आर दिन पाँच-सात एइ-मते गेल ॥
७७॥
उन्हें न छोड़ पाने के कारण वे सभी वहीं रहे और इस तरह पाँच-सात न और बीत गये।
अद्वैत अवधूत किछु कहे प्रभु-पाय ।सहजे तोमार गुणे जगत् विकाय ॥
७८॥
अद्वैत प्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु ने महाप्रभु के चरणकमलों में ये शब्द निवेदित किये, आपके दिव्य गुणों के कारण सारा जगत् सहज रूप से आपके प्रति कृतज्ञ है।
आबार ताते बान्ध'–ऐछे कृपा-वाक्य-डोरे ।।तोमा छाड़ि' केबा काहाँ ग्राइबारे पारे? ॥
७९॥
फिर भी आप अपने मधुर वचनों से अपने भक्तों को फिर से बाँध लेते हैं। ऐसी अवस्था में कौन कहीं भी जा सकता है? तबे प्रभु सबाकारे प्रबोध करिया ।सबारे विदाय दिला सुस्थिर हा ॥
८०॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन सबों को शान्त किया और हर एक को विदा किया।
नित्यानन्दे कहिला--तुमि ना आसिह बार-बार ।तथाई आमार सङ्ग ह-इबे तोमार ॥
८१॥
महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु से विशेष अनुरोध किया, आपको यहाँ पर बारम्बार नहीं आना चाहिए। बंगाल में आपको मेरा संग प्राप्त होगा।
चले सब भक्त-गण रोदन करिया ।।महाप्रभु रहिला घरे विषण्ण हा ॥
८२॥
भी चैतन्य महाप्रभु के भक्तों ने रोते-रोते यात्रा शुरू की, जबकि भु अपने आवास में खिन्न होकर रहे।
निज-कृपा-गुणे प्रभु बान्धिला सबारे ।महाप्रभुर कृपा-ऋण के शोधिते पारे? ॥
८३॥
महाप्रभु ने अपनी दिव्य कृपा से हर एक को बाँध लिया। श्री चैतन्य महाप्रभु की इस कृपा के ऋण को कौन चुका सकता है? ग्रारे ग्रैछे नाचाय प्रभु स्वतन्त्र ईश्वर ।ताते ताँरै छाड़ि' लोक प्राय देशान्तर ॥
८४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु पूर्णरूपेण स्वतन्त्र परमेश्वर हैं। वे हर एक को अपनी इच्छानुसार नचाते हैं। इसलिए सारे भक्त उनका साथ छोड़कर देश के विभिन्न भागों में अपने-अपने घर लौट गये।
काष्ठेर पुतली ग्रेन कुहके नाचाय ।। ईश्वर-चरित्र किछु बुझन ना ग्राय ॥
८५॥
जिस तरह काठ की पुतली नचाने वाले की इच्छानुसार नाचती है,। उसी तरह हर कार्य भगवान् की इच्छा से सम्पन्न होता है। भला पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के चरित्र को कौन समझ सकता है? पूर्व-वर्षे जगदानन्द 'आई' देखिबारे ।। प्रभु-आज्ञा लञा आइला नदीया-नगरे ॥
८६॥
पिछले वर्ष महाप्रभु के आदेश का पालन करते हुए जगदानन्द पण्डित शचीमाता को मिलने नदिया शहर लौट आये थे।
आइर चरण ग्राइ' करिला वन्दन ।।जगन्नाथेर वस्त्र-प्रसाद कैला निवेदन ॥
८७॥
जब वे आये, तो उन्होंने उनके चरणकमलों की वन्दना की और तब जगन्नाथजी के वस्त्र तथा प्रसाद दिये।
प्रभुर नामे मातारे दण्डवत् कैला ।।प्रभुर विनति-स्तुति मातारे कहिला ॥
८८॥
उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु की ओर से शचीमाता को नमस्कार किया और उनसे भगवान् चैतन्य महाप्रभु की सारी विनती तथा प्रार्थना कही।
जगदानन्दे पाजा माता आनन्दित मने ।।तेहो प्रभुर कथा कहे, शुने रात्रि-दिने ॥
८९ ॥
जगदानन्द के आने से शचीमाता अत्यधिक आनन्दित हुईं। जब वे चैतन्य महाप्रभु के विषय में बतलाते, तो वे रात-दिन सुनतीं।
जगदानन्द कहे,---माता, कोन कोन दिने ।तोमार एथा आसि' प्रभु करेन भोजने ॥
९० ॥
जगदानन्द पण्डित ने कहा, हे माता, कभी-कभी महाप्रभु यहाँ आते। हैं और आप जो भोजन देती हैं, उसे पूरा खा जाते हैं।
भोजन करिया कहे आनन्दित हा ।माता आजि खाओयाइला आकण्ठ पूरिया ॥
९१ ॥
भोजन करने के बाद महाप्रभु कहते हैं, 'आज मेरी माता ने मुझे गले तक भरकर खिला दिया है।
आमि ग्राइ' भोजन करि---माता नाहि जाने । साक्षाते खाइ आमि' तेंहो 'स्वप्न' हेन माने ॥
९२॥
मैं वहाँ जाता हूँ और मेरी माता जो भोजन देती हैं उसे खाता हूँ, किंतु वे यह समझ नहीं पातीं कि मैं प्रत्यक्ष रूप से खा रहा हूँ। वे सोचती कि यह सपना है।
माता कहे,कत रान्धि उत्तम व्यञ्जन ।।निमाजि इहाँ खाय, इच्छा हय मोर मन ॥
९३॥
शचीमाता ने कहा, मैं चाहती हूँ कि निमाइ मेरे द्वारा पकाई सारी सुन्दर सब्जियाँ खाये। यही मेरी इच्छा है।
निमात्रि खाजाछे,—ऐछे हय मोर मन ।।पाछे ज्ञान होय, मुञि देखिनु ‘स्वपन' ॥
९४॥
मैं कभी-कभी सोचती हूँ कि निमाइ उन्हें खा चुका है, किन्तु बाद में सोचती हूँ कि मैं तो केवल सपना देख रही थी।
एइ-मत जगदानन्द शचीमाता-सने । चैतन्येर सुख-कथा कहे रात्रि-दिने ॥
९५ ॥
इस तरह जगदानन्द पण्डित तथा शचीमाता रात-दिन श्री चैतन्य महाप्रभु के सुख के विषय में बातें करते।
नदीयार भक्त-गणे सबारे मिलिला । जगदानन्दे पाञा सबे आनन्दित हैला ॥
९६ ॥
जगदानन्द पण्डित नदिया में अन्य सारे भक्तों से मिले। भक्त उन्हें वहाँ उपस्थित पाकर अत्यन्त आनन्दित हुए।
आचार्य मिलिते तबे गेला जगदानन्द । जगदानन्दे पात्र हैल आचार्य आनन्द ॥
९७॥
के बाद जगदानन्द पण्डित अद्वैत आचार्य से मिलने गये। वे भी मिलकर अत्यन्त आनन्दित हुए।
वासुदेव, मुरारि-गुप्त जगदानन्दे पाजा ।।आनन्दे राखिला घरे, ना देन छाड़िया ॥
९८॥
बासुदेव दत्त तथा मुरारि गुप्त जगदानन्द पण्डित को मिलकर इतने हुए कि उन्होंने उन्हें अपने घरों में रखा और उन्हें जाने नहीं दिया।
चैतन्येर मर्म-कथा शुने ताँर मुखे ।।आपना पासरे सबै चैतन्य-कथा-सुखे ॥
९९ ॥
उन्होंने जगदानन्द पण्डित के मुख से श्री चैतन्य महाप्रभु की गोपनीय कथाएँ सुनीं और महाप्रभु के विषय में सुनने के महा सुख में वे अपने आप को भूल गये।
जगदानन्द मिलिते ग्राय ग्रेइ भक्त-घरे ।। सेइ सेइ भक्त सुखे आपना पासरे ॥
१००॥
जब भी जगदानन्द पण्डित किसी भक्त के घर मिलने जाते, तो वह भक्त परम सुख में तुरन्त ही अपने आपको भूल जाता।
चैतन्येर प्रेम-पात्र जगदानन्द धन्य ।। ग्रारे मिले सेइ माने,–'पाइलें चैतन्य' ॥
१०१॥
जगदानन्द पंडित की जय हो! उन पर श्री चैतन्य महाप्रभु की इतनी कृपा है कि जो भी उनसे मिलता है, वह सोचता है, अब मुझे साक्षात् श्री चैतन्य महाप्रभु की संगति मिल गई है।
शिवानन्द-सेन-गृहे ग्राजा रहिला ।। ‘चन्दनादि तैल ताहाँ एक-मात्रा कैला ॥
१०२॥
जगदानन्द पण्डित कुछ काल के लिए शिवानन्द सेन के घर में रहे। तभी उन दोनों ने लगभग सोलह सेर चन्दन को सुगन्धित तेल तैयार किया।
सुगन्धि करिया तैल गागरी भरिया ।नीलाचले ला आइला ग्नतन करिया ॥
१०३॥
उन्होंने सुगन्धित तेल से एक मिट्टी का बड़ा घड़ा भरा और जगदानन्द पण्डित बड़े यत्न से उसे नीलाचल, जगन्नाथ पुरी ले आये।
गोविन्देर ठाजि तैल धरिया राखिला ।प्रभु-अङ्गे दिह' तैल गोविन्दे कहिला ॥
१०४॥
इस तेल को गोविन्द की निगरानी में रख दिया गया और जगदानन्द ने उससे अनुरोध किया, इस तेल को महाप्रभु के शरीर में मल दिया करना।
तबे प्रभु-ठात्रि गोविन्द कैल निवेदन । ‘जगदानन्द चन्दनादि-तैल आनियाछेन ॥
१०५॥
इसलिए गोविन्द ने श्री चैतन्य महाप्रभु से कहा, जगदानन्द पण्डित कुछ सुगन्धित चन्दन का तेल लाये हैं।
ताँर इच्छा,—प्रभु अल्प मस्तके लागाय । पित्त-वायु-व्याधि-प्रकोप शान्त हा ग्राय ॥
१०६॥
यह उनकी इच्छा है कि आप अपने सिर पर थोड़ा-सा तेल लगाएँ।। इससे पित्त तथा वायु के कारण जो रक्त चाप है, वह काफी कम हो जायेगा।
एक-कलस सुगन्धि तैल गौड़ेते करिया ।। इहाँ आनियाछे बहु यतन करिया ॥
१०७॥
उन्होंने बंगाल में एक बड़ा घड़ा तेल तैयार किया है और इसे वे बड़े से यहाँ ले आये हैं।
प्रभु कहे,----सन्यासीर नाहि तैले अधिकार । ताहाते सुगन्धि तैल,—परम धिक्कार! ॥
१०८॥
महाप्रभु ने उत्तर दिया, संन्यासी को तेल से, वह भी विशेषतया इस प्रकार के सुगन्धित तेल से, कोई प्रयोजन नहीं होता। इसे तुरन्त यहाँ से जाओ।
जगन्नाथे देह' तैल, दीप ग्रेन चले । तार परिश्रम हैब परम-सफले ॥
१०९॥
यह तेल जगन्नाथ मन्दिर में दे दो, जहाँ इसे दीपकों में जलाया जा सके। इस तरह से तेल बनाने का जगदानन्द का परिश्रम पूरी तरह सफल हो जायेगा।
एइ कथा गोविन्द जगदानन्देरे कहिल ।।मौन करि' रहिल पण्डित, किछु ना कहिल ॥
११०॥
जब गोविन्द ने यह समाचार जगदानन्द पण्डित से कहा, तो जगदानन्द मौन रह गये तथा एक शब्द भी नहीं बोले।
दिन दश गेले गोविन्द जानाइल आर-बार ।पण्डितेर इच्छा, तैल प्रभु करे अङ्गीकार' ॥
१११॥
जब दस दिन बीत गये, तो गोविन्द ने पुनः श्री चैतन्य महाप्रभु से कहा, जगदानन्द पण्डित की इच्छा है कि आप तेल स्वीकार कर लें।
शुनि' प्रभु कहे किछु सक्रोध वचन ।मर्दनिया एक राख करिते मर्दन! ॥
११२॥
जब महाप्रभु ने यह सुना, तो उन्होंने क्रोध में आकर कहा, तो एक तेल मालिश करने वाला भी क्यों नहीं रख लेते, जो मेरी मालिश किया करें।
एई सुख लागि' आमि करिहुँ सन्यास! ।।आमार 'सर्व-नाश'—तोमा-सबार ‘परिहास' ॥
११३॥
क्या मैंने ऐसे सुख के लिए संन्यास लिया है? इस तेल को स्वीकार करने से मेरा सर्वनाश हो जायेगा और तुम सभी हँसोगे।
पथे ग्राइते तैल-गन्ध मोर ग्रेइ पाबे । ‘दारी सन्यासी' करि' आमारे कहिबे ॥
११४॥
यदि रास्ते से गुजरते हुए किसी व्यक्ति ने मेरे सिर के इस तेल को सँघा, तो मुझे दारी संन्यासी ( ऐसा तान्त्रिक संन्यासी जो स्त्रियाँ रखता है) सोचेगा।
शुनि प्रभुर वाक्य गोविन्द मौन करिला । प्रातः-काले जगदानन्द प्रभु-स्थाने आइला ॥
११५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के ये शब्द सुनकर गोविन्द मौन रहा। अगले दिन प्रातःकाल जगदानन्द, महाप्रभु से मिलने गये।
प्रभु कहे,–पण्डित, तैल आनिला गौड़ ह-इते ।। आमि त' सन्यासी, तैल ना पारि ल-इते ॥
११६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगदानन्द पण्डित से कहा, हे पण्डित, आप लिए बंगाल से कुछ तेल लाये हैं, किन्तु संन्यासी होने के कारण मैं ने स्वीकार नहीं कर सकता।
जगन्नाथे देह' ला दीप ग्रेन ज्वले । तोमार सकल श्रम ह-इबे सफले ॥
११७॥
यह तेल जगन्नाथ मन्दिर में दे दीजिये, जिससे इसे दीपकों में जलाया जा सके। इस तरह तेल बनाने का आपको श्रम सफल हो जायेगा।
पण्डित कहे,‘के तोमारे कहे मिथ्या वाणी ।।आमि गौड़ हैते तैल कभु नाहि आनि' ॥
११८॥
जगदानन्द पण्डित ने कहा, आपसे ये झूठी कहानियाँ कौन कहता । है? मैं तो बंगाल से तेल कभी नहीं लाया।
एत बलि' घर हैते तैल-कलस ला । प्रभुर आगे आङ्गिनाते फेलिला भाङ्गिया ॥
११९॥
यह कहकर जगदानन्द पण्डित ने तेल का घड़ा कमरे से निकाला और श्री चैतन्य महाप्रभु के सामने इसे आँगन में फेंक दिया और तोड डाला।
तैल भाङ्गि' सेइ पथे निज-घर गिया ।। शुइया रहिला घरे कपाट खिलिया ॥
१२०॥
घड़ा तोड़ देने के बाद जगदानन्द पण्डित अपने घर लौट आये, भीतर से दरवाजा बन्द कर लिया और लेट गये।
तृतीय दिवसे प्रभु ताँर द्वारे ग्राजा ।।‘उठह' पण्डित' करि' कहेन डाकिया ॥
१२१॥
तीन दिन बाद श्री चैतन्य महाप्रभु उनके कमरे के दरवाजे के पास गये र कहा, “हे जगदानन्द पण्डित, कृपया उठो।
‘आजि भिक्षा दिबा आमाय करिया रन्धने ।मध्याह्ने आसिब, एबे ग्राइ दरशने' ॥
१२२॥
मैं चाहता हूँ कि आज आप स्वयं मेरे लिए दोपहर का भोजन बनाये। अभी मैं दर्शन करने मन्दिर जा रहा हूँ। मैं दोपहर को लौहूँगा।
एत बलि' प्रभु गेला, पण्डित उठिला ।।स्नान करि' नाना व्यञ्जन रन्धन करिला ॥
१२३॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु यह कहकर चले गये, तो जगदानन्द पण्डित अपने बिस्तर से उठे, स्नान किया और तरह-तरह की सब्जियाँ बनाने लगे।
मध्याह्न करिया प्रभु आइला भोजने । पाद प्रक्षालन करि' दिलेन आसने ॥
१२४॥
अपने दोपहर के कृत्य पूरे करके महाप्रभु भोजन करने आये। जगदानन्द पण्डित ने महाप्रभु के पाँव धोये और उन्हें बैठने के लिए आसन दिया।
सघृत शाल्यन्न कला-पाते स्तूप कैला।।कलार डोङ्गा भरि' व्यञ्जन चौदिके धरिला ॥
१२५॥
उन्होंने घी डालकर महीन चावल पकाया था और उसे केले के पत्ते पर ऊँचाई तक ढेर बनाकर रख दिया था। साथ ही केले की छाल से बने दोने में तरह तरह की सब्जियाँ थीं, जिन्हें उन्होंने चारों ओर रख दिया था।
अन्न-व्यञ्जनोपरि तुलसी-मञ्जरी ।। जगन्नाथेर पिठा-पानी आगे आने धरि' ॥
१२६॥
चावल तथा सब्जियों के ऊपर तुलसी की मंजरियाँ थीं और महाप्रभु के सामने रोट, खीर तथा जगन्नाथजी का अन्य प्रसाद था।
प्रभु कहे,–द्वितीय-पाते बाड़' अन्न-व्यञ्जन ।। तोमाय आमाये आजि एकत्र करिब भोजन ॥
१२७॥
महाप्रभु ने कहा, एक दूसरा पत्तल बिछाकर उसमें चावल तथा सब्जियाँ रख लो, जिससे आज आप और मैं दोनों साथ-साथ भोजन करेंगे।
हस्त तुलि' रहेन प्रभु, ना करेन भोजन ।तबे पण्डित कहेन किछु सप्रेम वचन ॥
१२८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु अपना हाथ ऊपर उठाये रहे और उन्होंने तब तक भोजन नहीं किया, जब तक जगदानन्द पण्डित ने स्नेह और प्रेम युक्त निम्नलिखित वचन नहीं कहे।
आपने प्रसाद लह, पाछे मुजि ले-इमु ।। तोमार आग्रह आमि केमने खण्डिमु॥
१२९॥
कृपया आप पहले प्रसाद ग्रहण करें मैं बाद में खाऊँगा। मैं आपके आग्रह को नहीं टालँगा।
तबे महाप्रभु सुखे भोजने वसिला ।। व्यञ्जनेर स्वाद पाञा कहिते लागिला ॥
१३०॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रसन्नतापूर्वक भोजन ग्रहण किया। जब वे सब्जियों का स्वाद ले चुके, तो पुनः कहने लगे।
क्रोधावेशेर पाकेर हय ऐछे स्वाद! ।एइ त' जानिये तोमाय कृष्णेर 'प्रसाद' ॥
१३१॥
आप जब क्रोध में भी भोजन पकाते हो, तब भी वह अत्यन्त स्वादिष्ट आता है। इससे पता चलता है कि कृष्ण आप से कितने प्रसन्न हैं।
आपने खाइबे कृष्ण, ताहार लागिया ।तोमार हस्ते पाक कराय उत्तम करिया ॥
१३२॥
चूँकि कृष्ण स्वयं भोजन करेंगे, इसलिए वे आपसे इतना अच्छा भोजन बनवाते हैं।
ऐछे अमृत-अन्न कृष्णे कर समर्पण ।।तोमार भाग्येर सीमा के करे वर्णन? ॥
१३३॥
आप ऐसा अमृततुल्य अन्न कृष्ण को अर्पित करते हो। भला आपके सौभाग्य की सीमा का कौन अनुमान लगा सकता है? पण्डित कहे,–ये खाइबे, सेइ पाक-कर्ता ।। आमि-सब केवल-मात्र सामग्री-आहर्ता ॥
१३४॥
जगदानन्द पण्डित ने उत्तर दिया, जो खाने वाला है, उसी ने इसे पकाया है। जहाँ तक मेरा सम्बन्ध है, मैं तो केवल सामग्री जुटाता हूँ।
पुनः पुनः पण्डित नाना व्यञ्जन परिवेशे । भये किछु ना बलेन प्रभु, खायेन हरिषे ॥
१३५॥
जगदानन्द पण्डित महाप्रभु को तरह तरह की सब्जियाँ परोसते गये। महाप्रभु ने डर के मारे कुछ नहीं कहा, अपितु वे प्रसन्नतापूर्वक खाते रहे।
आग्रह करिया पण्डित कराइला भोजन ।आर दिन हैते भोजन हैल दश-गुण ॥
१३६।। जगदानन्द पण्डित ने आग्रह करके महाप्रभु को इतना खिला दिया कि अन्य दिनों की अपेक्षा उन्होंने दसगुना अधिक भोजन किया।
बार-बार प्रभु उठिते करेन मन ।।सेइ-काले पण्डित परिवेशे व्यञ्जन ॥
१३७॥
महाप्रभु बारम्बार उठने का मन करते, किन्तु जगदानन्द पण्डित उन्हें और सब्जियाँ खिलाते जाते।
किछु बलिते नारेन प्रभु, खायेन तरासे ।।ना खाइले जगदानन्द करिबे उपवासे ॥
१३८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु उनको अधिक खिलाने से मना नहीं कर पाये। वे खाते गये और डरते रहे कि यदि वे खाना बन्द कर देंगे, तो जगदानन्द उपवास करेंगे।
तबे प्रभु कहेन करि' विनय-सम्मान ।‘दश-गुण खाओयाइला एबे कर समाधान' ॥
१३९॥
अन्त में महाप्रभु ने आदरपूर्वक निवेदन किया, हे जगदानन्द, मैं जितना खाने का अभ्यस्त हूँ, उससे दस गुना अधिक भोजन आपने करा दिया। अब तो बन्द करो।
तबे महाप्रभु उठि' कैला आचमन ।।पण्डित आनिल, मुखवास, माल्य, चन्दन ॥
१४०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु उठ खड़े हुए और उन्होंने अपने हाथ-मुँह धोये।। तभी जगदानन्द पण्डित मसाले (मुख शुद्धि), माला तथा चन्दन लेप ले आये।
चन्दनादि लञा प्रभु वसिला सेइ स्थाने ।'आमार आगे आजि तुमि केरह भोजने' ॥
१४१॥
चन्दन लेप तथा माला स्वीकार करने के बाद महाप्रभु बैठ गये और । बोले, अब आप मेरे सामने भोजन करो।
पण्डित कहे,–प्रभु ग्राइ' करुन विश्राम ।।मुइ, एबे ल-इब प्रसाद करि' समाधान ॥
१४२ ॥
जगदानन्द ने उत्तर दिया, हे प्रभु, आप जाकर आराम करें। मैं कुछ प्रबन्ध कर लूं, तब प्रसाद ग्रहण करूंगा।
रसुइर कार्य कैराछे रामाइ, रघुनाथ ।।इँहा सबाय दिते चाहि किछु व्यञ्जन-भात ॥
१४३॥
रामाइ पण्डित तथा रघुनाथ भट्ट ने रसोई का कार्य किया है। मैं उन्हें कुछ अन्न तथा सब्जियाँ देना चाहता हूँ।
प्रभु कहेन,-- गोविन्द, तुमि इहाङिहिबा ।पण्डित भोजन कैले, आमारे कहिबा ॥
१४४॥
तब महाप्रभु ने गोविन्द से कहा, तुम यहीं रहो। जब पण्डित भोजन कर चुके, तो आकर मुझे बताना।
एत कहि' महाप्रभु करिला गमन ।गोविन्देरे पण्डित किछु कहेन वचन ॥
१४५ ॥
जब महाप्रभु यह कहकर चले गये, तो जगदानन्द पण्डित गोविन्द से बोले।
तुमि शीघ्र ग्राह करिते पाद-सम्वाहने ।कहिह,–'पण्डित एबे वसिल भोजने' ॥
१४६॥
तुरन्त जाओ और महाप्रभु के पैर दबाओ। तुम उनसे कह सकते हो, चण्डित अभी-अभी अपना भोजन करने बैठा है।'
तोमारे प्रभुर ‘शेष' राखिमु धरिया ।। प्रभु निद्रा गेले, तुमि खाइह आसिया ॥
१४७॥
मैं तुम्हारे लिए महाप्रभु के भोजन का कुछ शेष रख दूंगा। जब वे को जाँय, तो आकर अपना भोजन ले लेना।
रामाइ, नन्दाइ आर गोविन्द, रघुनाथ । सबारे बाँटिया दिला प्रभुर व्यञ्जन-भात ॥
१४८ ॥
इस तरह जगदानन्द पण्डित ने महाप्रभु के शेष प्रसाद को रामाई, भन्दाइ, गोविन्द तथा रघुनाथ भट्ट में वितरित कर दिया।
आपने प्रभुर ‘शेष' करिला भोजन ।। तबे गोविन्देरे प्रभु पाठाइला पुनः ॥
१४९॥
उन्होंने स्वयं भी श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा छोड़े गये भोजन का शेष खाया। तब महाप्रभु ने फिर गोविन्द को भेजा।
देखे,—जगदानन्द प्रसाद पाय कि ना पाय । शीघ्र आसि' समाचार कहिबे आमाय ॥
१५०॥
महाप्रभु ने उससे कहा, जाओ और देखो कि जगदानन्द पण्डित खा रहे हैं कि नहीं। फिर तुरन्त लौटकर मुझे बताओ।
गोविन्द आसि' देखि' कहिल पण्डितेर भोजन । तबे महाप्रभु स्वस्त्ये करिल शयन ॥
१५१॥
यह देखकर कि जगदानन्द पण्डित सचमुच खा रहे हैं, गोविन्द ने महाप्रभु को सूचित किया। तब वे शान्त हुए और सो गये।
जगदानन्दे-प्रभुते प्रेम चले एइ-मते ।सत्यभामा-कृष्ण चैछे शुनि भागवते ॥
१५२॥
जगदानन्द पण्डित तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच ऐसा स्नेहयुक्त -व्यवहार उसी तरह चलता रहा, जो कि 'श्रीमद्भागवत' में कथित पभामा तथा कृष्ण के बीच के प्रेम व्यवहार के ही समान था।
जगदानन्देर सौभाग्येर के कहिबे सीमा?।जगदानन्देर सौभाग्येर तेह से उपमा ॥
१५३॥
भला जगदानन्द पण्डित के भाग्य की सीमा का अनुमान कौन लगा प्रकता है? वे स्वयं ही अपने महान् सौभाग्य के उदाहरण हैं।
जगदानन्देर 'प्रेम-विवर्त' शुने ग्रेइ जन ।। प्रेमेर ‘स्वरूप' जाने, पाय प्रेम-धन ॥
१५४॥
जो कोई भी जगदानन्द पण्डित तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच के प्रेम-व्यवहार के विषय में सुनता है या जगदानन्द की पुस्तक ‘प्रेमविवर्त' को पढ़ता है, वह समझ सकता है कि प्रेम क्या है। यही नहीं, उसे कृष्ण का प्रेमावेश प्राप्त होता है।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।। चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
१५५॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए, तथा र उनकी कृपा की कामना करते हुए उनके चरणचिह्नों पर चलकर, भणदास श्री चैतन्य चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ। इस प्रकार श्रीचैतन्य-चरितामृत अन्त्यलीला के अन्र्तगत श्री चैतन्य प्रभु एवं जगदानन्द पण्डित का प्रेम व्यवहार नामक बारहवें अध्याय का वेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ।
