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अध्याय ग्यारह: हरिदास ठाकुर का निधन

नमामि हरिदासं तं चैतन्यं तं च तत्प्रभुम् ।संस्थितामपि ग्रन्मूर्ति स्वाङ्के कृत्वा ननर्त यः ॥

१॥

मैं हरिदास ठाकुर तथा उनके स्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करता हूँ, जिन्होंने हरिदास ठाकुर के शरीर को अपनी गोद में लेकर नृत्य किया।

जय जय श्री-चैतन्य जय दयामय । जयाद्वैत-प्रिय नित्यानन्द-प्रिय जय ।।२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो, जो अत्यन्त दयालु हैं और जो अद्वैत आचार्य तथा नित्यानन्द प्रभु को अत्यन्त प्रिय हैं।

जय श्रीनिवासेश्वर हरिदास-नाथ ।। जय गदाधर-प्रिय स्वरूप-प्राण-नाथ ॥

३॥

श्रीनिवास ठाकुर के प्रभु की जय हो! हरिदास ठाकुर के स्वामी की जय हो! गदाधर पण्डित के प्रिय स्वामी की जय हो! स्वरूप दामोदर के प्राणनाथ की जय हो! जय काशी-प्रिय जगदानन्द-प्राणेश्वर ।जय रूप-सनातन-रघुनाथेश्वर ॥

४॥

काशी मिश्र के परम प्रिय श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! वे जगदानन्द के प्राणनाथ हैं और रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी तथा रघुनाथ दास गोस्वामी के प्रभु हैं।

जय गौर-देह कृष्ण स्वयं भगवान् ।कृपा करि' देह' प्रभु, निज-पद-दान ॥

५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य स्वरूप की जय हो, जो स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण हैं! हे प्रिय प्रभु, आप अपनी अहैतुकी कृपा द्वारा मुझे अपने चरणकमलों में शरण दीजिये।

जय नित्यानन्द-चन्द्र जय चैतन्येर प्राण ।।तोमार चरणारविन्दे भक्ति देह' दान ॥

६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के प्राणाधार श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! हे प्रभु, आप मुझे अपने चरणकमलों की भक्ति में लगा लें।

जय जयाद्वैत-चन्द्र चैतन्येर आर्य ।। स्व-चरणे भक्ति देह' जयाद्वैताचार्य ॥

७॥

उन अद्वैत आचार्य की जय हो, जिन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु उनकी आयु तथा आदरशीलता के कारण श्रेष्ठ मानते हैं। कृपया मुझे अपने चरणकमलों की भक्ति में लगाएँ।

जय गौर-भक्त-गण, गौर याँर प्राण । सब भक्त मिलि' मोरे भक्ति देह दान ॥

८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो, क्योंकि महाप्रभु उनके जीवन और प्राण हैं। कृपया आप सभी मुझे भक्ति का दान दें।

जय रूप, सनातन, जीव, रघुनाथ ।। रघुनाथ, गोपाल, छय मोर नाथ ॥

९॥

रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी, जीव गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी, रघुनाथ भट्ट गोस्वामी तथा गोपाल भट्ट गोस्वामी-वृन्दावन के इन छः गोस्वामियों की जय हो। ये सब मेरे स्वामी हैं।

ए-सब प्रसादे लिखि चैतन्य-लीला-गुण । ग्रैछे तैछे लिखि, करि आपन पावन ॥

१०॥

मैं महाप्रभु की लीलाओं तथा गुणों की यह कथा श्री चैतन्य महाप्रभु एवं उनके भक्तों की कृपा से लिख रहा हूँ। मैं नहीं जानता कि किस तरह धित रीति से लिखें, किन्तु इस वर्णन को लिखकर मैं अपने आपको शुद्ध कर रहा हूँ।

एइ-मत महाप्रभुरे नीलाचले वास । सङ्गे भक्त-गण लञा कीर्तन-विलास ॥

११॥

इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु अपने निजी भक्तों के साथ जगन्नाथपुरी में रहे और उन्होंने हरे कृष्ण महामन्त्र के संकीर्तन का आनन्द लिया।

दिने नृत्य-कीर्तन, ईश्वर-दरशन । राने राय-स्वरूप-सने रस-आस्वादन ॥

१२ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु दिन में नृत्य, कीर्तन तथा जगन्नाथ मन्दिर का दर्शन करने में लगे रहते। रात में वे अपने अत्यन्त विश्वस्त भक्तों, यथा रामानन्द राय तथा स्वरूप दामोदर गोस्वामी के साथ श्रीकृष्ण की लीलाओं के दिव्य रस का अमृत आस्वादन करते। एई-मत महाप्रभुर सुखे काल ग्राय ।।कृष्णेर विरह-विकार अङ्गे नाना हय ॥

१३॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु सुखपूर्वक अपने दिन नीलाचल अर्थात् जगन्नाथपुरी में बिता रहे थे। कृष्ण से विरह के कारण उनके शरीर में अनेक दिव्य लक्षण प्रकट होते थे।

दिने दिने बाड़े विकार, रात्र्ये अतिशय । चिन्ता, उद्वेग, प्रलापादि ग्रत शास्त्रे कय ॥

१४॥

दिन प्रतिदिन ये लक्षण बढ़ते गये और रात में ये और भी अधिक बढ़ जाते। ये सारे लक्षण-यथा दिव्य चिन्ता, उद्वेग तथा उन्मत सा प्रलाप उसी रूप में विद्यमान थे, जैसाकि शास्त्रों में उनका वर्णन हुआ है।

स्वरूप गोसाञि, आर रामानन्द-राय । रात्रि-दिने करे दोंहे प्रभुर सहाय ॥

१५ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के प्रमुख सहायक स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा रामानन्द राय दिन-रात महाप्रभु के साथ रहते।

एक-दिन गोविन्द महा-प्रसाद ला ।हरिदासे दिते गेला आनन्दित हा ॥

१६॥

एक दिन श्री चैतन्य महाप्रभु का निजी सेवक गोविन्द बहुत ही । आनन्दित होकर जगन्नाथजी का प्रसाद देने हरिदास ठाकुर के पास गया।

देखे,—हरिदास ठाकुर करियाछे शयन ।।मन्द मन्द करितेछे सङ्ख्या -सङ्कीर्तन ॥

१७॥

जब गोविन्द हरिदास ठाकुर के पास पहुँचा, तो उसने देखा कि वे अपनी पीठ के बल लेटे हैं और धीरे-धीरे जपमाला में जप कर रहे हैं।

गोविन्द कहे,–'उठ आसि' करह भोजन' ।हरिदास कहे,—आजि करिमु लङ्घन ॥

१८ ॥

गोविन्द ने कहा, कृपया उठकर अपना महाप्रसाद ग्रहण करें। हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, आज मैं उपवास रखेंगा।

सङ्ख्या -कीर्तन पूरे नाहि, के-मते खाइब?।। महा-प्रसाद आनियाछ, के-मते उपेक्षिब? ॥

१९॥

मैंने अभी अपना जप पूर्ण नहीं किया है। तो फिर मैं कैसे खा सकता हूँ, किन्तु तुम तो महाप्रसाद लाये हो। भला मैं उसकी कैसे उपेक्षा करूं? एत बलि' महाप्रसाद करिला वन्दन । एक रञ्च लञा तार करिला भक्षण ॥

२० ॥

यह कहकर उन्होंने महाप्रसाद को नमस्कार किया और उसमें से रेषभर लेकर ग्रहण कर लिया।

आर दिन महाप्रभु ताँर ठाञि आइला ।सुस्थ हओ, हरिदास–बलि' ताँरै पुछिला ॥

२१॥

अगले दिन श्री चैतन्य महाप्रभु हरिदास के स्थान पर गये और उनसे पूछा, हरिदास, तुम ठीक तो हो? नमस्कार करि' तेंहो कैला निवेदन ।।शरीर सुस्थ हय मोर, असुस्थ बुद्धि-मन ॥

२२॥

हरिदास ने महाप्रभु को नमस्कार किया और उत्तर दिया, मेरा शरीर तो स्वस्थ है, किन्तु मेरा मन और बुद्धि ठीक नहीं हैं।

प्रभु कहे,–'को व्याधि, कह त' निर्णय?' । तेंहो कहे,–'सङ्ख्या -कीर्तन ना पूरय' ॥

२३॥

भी चैतन्य महाप्रभु ने पुनः पूछा, क्या तुम बता सकते हो कि तुम्हारा रोग क्या है? हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, मेरा रोग यही है कि मैं अपनी जप संख्या पूरी नहीं कर पा रहा हूँ।

प्रभु कहे,–वृद्ध ह-इला 'सङ्ख्या ' अल्प कर । सिद्ध-देह तुमि, साधने आग्रह केने कर? ॥

२४॥

महाप्रभु ने कहा, चूँकि अब तुम वृद्ध हो गये हो, अतः नित्य जप ये जाने की नाम संख्या घटा सकते हो। तुम तो पहले से मुक्त हो, तएव तुम्हें कठोरता से नियमों का पालन करने की आवश्यकता नहीं हैं।

लोक निस्तारिते एइ तोमार 'अवतार' ।नामेर महिमा लोके करिला प्रचार ॥

२५॥

इस अवतार में तुम्हारी भूमिका सामान्य लोगों का उद्धार करने की है। तुमने इस जगत् में पवित्र नाम की महिमा का पर्याप्त प्रचार किया है।

एबे अल्प सङ्ख्या करि' कर सङ्कीर्तन । हरिदास कहे,–शुन मोर सत्य निवेदन ॥

२६॥

महाप्रभु ने अन्त में कहा, इसलिए, अब हरे कृष्ण महामन्त्र की जप संख्या कम करो। हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, आप कृपया मेरे पास्तविक निवेदन को सुनें।

हीन-जाति जन्म मोर निन्द्य-कलेवर ।। हीन-कर्मे रत मुजि अधम पामर ॥

२७॥

मैं निम्न कुल में उत्पन्न हुआ और मेरा शरीर अत्यन्त गर्हित है। मैं सदैव निम्न कार्यों में लगा रहा हूँ। इसलिए मैं सबसे नीच तथा गर्हित व्यक्ति हूँ।

अदृश्य, अस्पृश्य मोरे अङ्गीकार कैला ।रौरव ह-इते काड़ि' मोरे वैकुण्ठे चड़ाइला ॥

२८॥

मैं न देखने योग्य तथा अछूत हूँ, किन्तु आपने मुझे अपने सेवक के रूप में स्वीकार किया है। इसका अर्थ हुआ कि आपने मुझे नारकीय । स्थिति से उद्धार किया है और वैकुण्ठ पद पर पहुँचाया है।

स्वतन्त्र ईश्वर तुमि हओ इच्छामय ।।जगत् नाचाओ, यारे भैछे इच्छा हय ॥

२९॥

हे प्रभु, आप पूर्णतः स्वतन्त्र ईश्वर हैं। आप अपनी स्वतन्त्र इच्छा से कार्य करते हैं। आप अपनी इच्छानुसार सारे जगत् को नचाते हैं तथा काम में लगाते हैं।

अनेक नाचाइला मोरे प्रसाद करिया । विप्रेर श्राद्ध-पात्र खाइनु ‘म्लेच्छ' हा ॥

३०॥

हे प्रभु, अपनी कृपा से आपने मुझे नाना प्रकार से नचाया है। दाहरणार्थ, मुझे श्राद्ध पात्र दिलाया, जो कि उत्तम ब्राह्मण को दिया जाना चाहिए था। मैंने उसमें भोजन किया, यद्यपि मेरा जन्म मांसाहारियों कुल में हुआ था।

एक वाञ्छा हय मोर बहु दिन हैते ।।लीला सम्वरिबे तुमि लय मोर चित्ते ॥

३१॥

दीर्घकाल से मेरी एक इच्छा रही है। हे प्रभु, मेरे विचार से आप अत्यन्त शीघ्र इस भौतिक जगत् से अपनी लीला समाप्त कर देंगे।

सेई लीला प्रभु मोरे कभु ना देखाइबा ।। आपनार आगे मोर शरीर पाड़िबा ॥

३२॥

मैं चाहता हूँ कि आप अपनी लीला का यह अन्तिम अध्याय मुझे नहीं दिखलायें। इसके पूर्व कि वह समय आये, मैं चाहता हूँ कि मेरा शरीर आपके सामने धराशायी हो जाय।

हृदये धरिमु तोमार कमल चरण । नयने देखिमु तोमार चाँद वदन ॥

३३॥

मैं आपके कमलवत् चरणों को अपने हृदय में धारण करना चाहता हूँ और आपके चन्द्रमा सदृश मुखमण्डल का दर्शन करना चाहता हूँ।

जिह्वाय उच्चारिमु तोमार कृष्ण-चैतन्य'-नाम । एइ-मत मोर इच्छा, छाड़िमु पराण ॥

३४॥

मेरी इच्छा है कि मैं अपनी जीभ से आपका 'श्रीकृष्णचैतन्य' नाम उच्चारण करूं। कृपया मुझे इस तरह से अपना शरीर छोड़ने दें।

मोर एइ इच्छा यदि तोमार प्रसादे हय । एइ निवेदन मोर कर, दयामय ॥

३५॥

हे अत्यन्त दयालु प्रभु, यदि आपकी कृपा से ऐसा हो सके, तो कृपया मेरी इच्छा पूरी करें।

एइ नीच देह मोर पड़क तव आगे । एइ वाञ्छा-सिद्धि मोर तोमातेइ लागे ॥

३६॥

इस नीच देह को आपके सामने गिर जाने दें। आप मेरी सारी इच्छाओं की पूर्णता को सम्भव बना सकते हैं।

प्रभु कहे,–हरिदास, ग्रे तुमि मागिबे ।।कृष्ण कृपामय ताहा अवश्य करिबे ॥

३७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, हे हरिदास, कृष्ण इतने दयामय हैं कि तुम जो भी चाहते हो, उसे वे अवश्य पूरा करेंगे।

किन्तु आमार ग्रे किछु सुख, सब तोमा लञा ।तोमार ग्रोग्य नहे,—ग्राबे आमारे छाड़िया ॥

३८ ॥

किन्तु मेरा जो भी सुख है, वह तुम्हारी संगति के कारण है। यह तुम्हारे लिए उपयुक्त नहीं है कि तुम चले जाओ और मुझे अकेला छोड़ जाओ।

चरणे धरि' कहे हरिदास,_ना करिह 'माया'।अवश्य मो-अधमे, प्रभु, कर एइ'दया' ॥

३९॥

हरिदास ठाकुर ने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों को पकड़कर कहा, हे प्रभु, कृपया आप माया उत्पन्न न करें। यद्यपि मैं अत्यन्त पतित है किन्तु आप मुझ पर यह दया अवश्य दिखलायें।

मोर शिरोमणि कत कत महाशय ।।तोमार लीलार सहाय कोटि-भक्त हय ॥

४०॥

हे प्रभु, ऐसे अनेक सम्मानित व्यक्ति एवं करोड़ों भक्त हैं, जो मेरे सिर पर बैठने योग्य हैं। वे सभी आपकी लीला में सहायक हैं।

आमा-हेन यदि एक कीट मरि' गेल ।एक पिपीलिका मैले पृथ्वीर काहाँ हानि हैल? ॥

४१॥

हे प्रभु, यदि मुझ जैसा कोई तुच्छ कीट मर भी जाय, तो कौन सी हानि है? यदि एक चींटी मरती है, तो भौतिक जगत् की कौन सी हानि हो जाती है? भकत-वत्सल' प्रभु, तुमि, मुइ' भक्ताभास' ।अवश्य पूराबे, प्रभु, मोर एइ आश ॥

४२॥

हे प्रभु, आप सदैव अपने भक्तों के प्रति स्नेहिल रहते हैं। मैं तो एक कृत्रिम भक्त हूँ, फिर भी मैं चाहता हूँ कि आप मेरी इच्छा पूरी करें। यही मेरी आशा है।

मध्याह्न करिते प्रभु चलिला आपने ।ईश्वर देखिया कालि दिबेन दरशने ॥

४३।। चूँकि दोपहर के कृत्य करने शेष थे, अतएव श्री चैतन्य महाप्रभु वहाँ से विदा होने के लिए उठ खड़े हुए। किन्तु यह तय हुआ कि अगले दिन वे भगवान जगन्नाथ का दर्शन करने के बाद हरिदास ठाकुर को देखने आयेंगे।

तबे महाप्रभु ताँरै करि' आलिङ्गन ।मध्याह्न करिते समुद्रे करिला गमन ॥

४४॥

उनका आलिंगन करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु अपने दोपहर के कृत्य करने चले गये और स्नान करने हेतु समुद्र गये।

प्रातः-काले ईश्वर देखि सब भक्त ला ।। हरिदासे देखते आइला शीघ्र करिया ॥

४५ ॥

अगले दिन प्रातःकाल जगन्नाथ मन्दिर जाने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु अपने अन्य सारे भक्तों के साथ तेजी से हरिदास ठाकुर को देखने आये।

हरिदासेर आगे आसि' दिला दरशन ।। हरिदास वन्दिला प्रभुर आर वैष्णव-चरण ॥

४६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु तथा अन्य भक्त हरिदास ठाकुर के समक्ष आये। हरिदास ठाकुर ने श्री चैतन्य महाप्रभु तथा समस्त वैष्णवों के चरणकमलों में नमस्कार किया।

प्रभु कहे,–'हरिदास, कह समाचार' । हरिदास कहे,'प्रभु, ग्रे कृपा तोमार' ॥

४७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, हे हरिदास, क्या समाचार है? हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, हे प्रभु, आप मुझ पर जो भी कृपा करें।

अङ्गने आरम्भिला प्रभु महा-सङ्कीर्तन ।।वक्रेश्वर-पण्डित ताहाँ करेन नर्तन ॥

४८॥

यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुरन्त आंगन में महान् संकीर्तन प्रारम्भ कर दिया। इसमें वक्रेश्वर पण्डित प्रमुख नर्तक थे।

स्वरूप-गोसाञि आदि ग्रत प्रभुर गण ।।हरिदासे बेड़ि' करे नाम-सङ्कीर्तन ॥

४९॥

स्वरूप दामोदर गोस्वामी इत्यादि श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों में हरिदास ठाकुर को घेर लिया और संकीर्तन प्रारम्भ कर दिया।

रामानन्द, सार्वभौम, सबार अग्रेते ।।हरिदासेर गुण प्रभु लागिला कहिते ॥

५०॥

रामानन्द राय तथा सार्वभौम भट्टाचार्य जैसे सारे महान् भक्तों के समक्ष भी चैतन्य महाप्रभु हरिदास ठाकुर के पवित्र गुणों का वर्णन करने लगे।

हरिदासेर गुण कहिते प्रभु ह-इला पञ्च-मुख ।कहिते कहिते प्रभुर बाड़े महा-सुख ॥

५१॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु हरिदास ठाकुर के दिव्य गुणों का वर्णन करने लगे, तो ऐसा प्रतीत हो रहा था मानों उनके पाँच मुख हों। उन्होंने जितना ही अधिक वर्णन किया, उनका सुख उतना ही बढ़ता गया।

हरिदासेर गुणे सबार विस्मित हय मन । सर्व-भक्त वन्दे हरिदासेर चरण ॥

५२॥

हरिदास ठाकुर के दिव्य गुणों को सुनकर वहाँ उपस्थित सारे भक्त आश्चर्यचकित हो गये। उन सबों ने हरिदास ठाकुर के चरणकमलों की वन्दना की।

हरिदास निजाग्रेते प्रभुरे वसाइला ।निज-नेत्र दुइ भृङ्ग–मुख-पद्ये दिला ॥

५३॥

हरिदास ठाकुर ने श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने समक्ष बैठाया और तब भौंरों के तुल्य अपने दोनों नेत्र महाप्रभु के मुखमण्डल पर टिका दिये।

स्व-हृदये आनि' धरिल प्रभुर चरण । सर्व-भक्त-पद-रेणु मस्तक-भूषण ॥

५४॥

उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों को अपने हृदय पर धारण किया और तब समस्त भक्तों के चरणों की धूलि लेकर अपने मस्तक पर लगाई। 'श्री-कृष्ण-चैतन्य' शब्द बलेन बार बार । प्रभु-मुख-माधुरी पिये, नेत्रे जल-धार ॥

५५॥

उन्होंने श्रीकृष्ण चैतन्य के पवित्र नाम का बारम्बार उच्चारण किया। जब उन्होंने महाप्रभु के मुख की मधुरता का पान किया, तो उनके नेत्रों से लगातार अश्रु बहने लगे।

‘श्रीकृष्ण-चैतन्य' शब्द करिते उच्चारण ।नामेर सहित प्राण कैल उत्क्रामण ॥

५६॥

श्रीकृष्ण चैतन्य का नाम उच्चारण करते-करते उन्होंने प्राण त्याग दिये और अपना शरीर छोड़ दिया।

महा-योगेश्वर-प्राय देखि' स्वच्छन्दे मरण ।'भीष्मेर निर्माण' सबार ह-इल स्मरण ॥

५७॥

हरिदास ठाकुर की अद्भुत इच्छा-मृत्यु देखकर हर व्यक्ति को भीष्म के मरण का स्मरण हो आया, क्योंकि यह मृत्यु महान् योगी की मृत्यु जैसी थी।

‘हरि' 'कृष्ण'-शब्दे सबे करे कोलाहल ।प्रेमानन्दे महाप्रभु ह-इला विह्वल ॥

५८॥

जब सबों ने ‘हरि' तथा 'कृष्ण' के पवित्र नामों का कीर्तन किया, तो कोलाहल मच गया। श्री चैतन्य महाप्रभु प्रेमानन्द से विह्वल हो उठे।

हरिदासेर तनु प्रभु कोले लैल उठा।अङ्गने नाचेन प्रभु प्रेमाविष्ट हा ॥

५९॥

महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर के शरीर को उठाकर अपनी गोद में ले लिया और वे अत्यन्त प्रेमावेश में आकर आँगन में नृत्य करने लगे।

प्रभुर आवेशे अवश सर्व-भक्त-गण ।प्रेमावेशे सबे नाचे, करेन कीर्तन ॥

६० ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेमावेश के कारण सारे भक्त निरुपाय थे और ये भी प्रेमावेश में नृत्य तथा सामूहिक कीर्तन करने लगे।

एइ-मते नृत्य प्रभु कैला कत-क्षण ।स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे कराइल सावधान ॥

६१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु कुछ समय तक इसी तरह नृत्य करते रहे और तब स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने ठाकुर हरिदास के शरीर के लिए अन्य क्रियाओं के विषय में उन्हें सूचित किया।

हरिदास-ठाकुरे तबे विमाने चड़ाना ।समुद्रे ला गेला तबे कीर्तन करिया ॥

६२॥

तब हरिदास ठाकुर के शरीर को एक वाहन पर चढ़ाया गया, जो विमान जैसा था और सामूहिक कीर्तन के साथ उसे समुद्र ले जाया गया।

आगे महाप्रभु चलेन नृत्य करिते करिते ।।पाछे नृत्य करे वक्रेश्वर भक्त-गण-साथे ॥

६३ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु शोभायात्रा के आगे आगे नृत्य कर रहे थे और वक्रेश्वर पण्डित अन्य भक्तों के साथ उनके पीछे-पीछे कीर्तन करते हुए नृत्य कर रहे थे।

हरिदासे समुद्र-जले स्नान कराइला ।एइ‘महा-तीर्थ' ह-इला ॥

६४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर के शरीर को समुद्र में स्नान भराया और घोषित किया, आज से यह समुद्र महान् तीर्थस्थल बन गया हैं। हरिदासेर पादोदक पिये भक्त-गण ।।हरिदासेर अङ्गे दिला प्रसाद-चन्दन ॥

६५॥

हर एक ने उस जल को पिया, जो हरिदास ठाकुर के चरणों का स्पर्श फिर चुका था और सबों ने जगन्नाथ जी के चन्दन प्रसाद का हरिदास ठाकुर के शरीर पर लेप किया।

डोर, कड़ार, प्रसाद, वस्त्र अङ्गे दिला ।वालुकार गर्त करि' ताहे शोयाइला ॥

६६॥

बालू में गड्डा खोदकर उसमें हरिदास ठाकुर का शरीर रख दिया गया। तब भगवान जगन्नाथ का प्रसाद-यथा उनकी रेशमी रस्सियाँ, चन्दन लेप, भोजन तथा वस्त्र-उनके शरीर के ऊपर रखा गया।

चारि-दिके भक्तगण करेन कीर्तन ।।वक्रेश्वर-पण्डित करेन आनन्दे नर्तन ।। ६७॥

भक्तों ने शरीर के चारों ओर सामूहिक कीर्तन किया और वक्रेश्वर पण्डित ने आनन्दित होकर नृत्य किया।

‘हरि-बोल' ‘हरि-बोल' बले गौरराय ।।आपनि श्री-हस्ते वालु दिला ताँर गाय ॥

६८ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने दिव्य हाथों से हरिदास ठाकुर के शरीर को ‘हरि बोल' ‘हरि बोल' कीर्तन करते हुए बालू से ढक दिया।

ताँरै वालु दिया उपरे पिण्डा बाँधाइला ।।चौदिके पिण्डेर महा आवरण कैला ।। ६९॥

भक्तों ने हरिदास ठाकुर के शरीर को बालू से ढककर उसी स्थान पर एक चबूतरा बना दिया। इस चबूतरे को चारों ओर से चारदीवारी द्वारा सुरक्षित कर दिया गया।

ताहा बेड़ि' प्रभु कैला कीर्तन, नर्तन ।।हरि-ध्वनि-कोलाहले भरिल भुवन ॥

७० ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस चबूतरे के चारों ओर नृत्य और कीर्तन किया और जब हरिनाम का कोलाहल हुआ, तो सारा ब्रह्माण्ड उस शब्द से भर गया।

तबे महाप्रभु सबै भक्त-गण-सङ्गे।।समुद्रे करिला स्नान-जल-केलि रङ्गे ॥

७१॥

संकीर्तन के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने भक्तों के साथ समुद्र में तैरकर तथा हर्षित होकर जलक्रीड़ा करके स्नान किया।

हरिदासे प्रदक्षिण करि' आइल सिंह-द्वारे ।।हरि-कीर्तन-कोलाहल सकल नगरे ॥

७२॥

हरिदास ठाकुर की समाधि की प्रदक्षिणा करके श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ मन्दिर के सिंहद्वार पर गये। सारे नगर ने संकीर्तन में भाग लिया। और कोलाहल से सारा नगर गुंजायमान हो उठा।

सिंह-द्वारे आसि' प्रभु पसारिर ठाङि।आँचल पातिया प्रसाद मागिला तथाइ ॥

७३॥

सिंहद्वार पर पहुँचकर श्री चैतन्य महाप्रभु वहाँ के सारे दूकानदारों से वस्त्र फैलाकर प्रसाद माँगने लगे।

‘हरिदास-ठाकुरेर महोत्सवेर तरे ।प्रसाद मागिये भिक्षा देह' त' आमारे' ॥

७४॥

महाप्रभु ने कहा, मैं हरिदास ठाकुर के देहावसान के सम्मानार्थ उत्सव के लिए प्रसाद माँग रहा हूँ। कृपया मुझे भिक्षा दें।

शुनिया पसारि सब चाङ्गड़ा उठा। प्रसाद दिते आसे तारा आनन्दित हा ॥

७५ ॥

यह सुनकर सारे दूकानदार तुरन्त ही बड़ी-बड़ी टोकरियों में प्रसाद भरकर ले आये और प्रसन्नतापूर्वक श्री चैतन्य महाप्रभु को दिया।

स्वरूप-गोसात्रि पसारिके निषेधिल । चाङ्गड़ा ला पसारि पसारे वसिल ॥

७६॥

किन्तु स्वरूप दामोदर ने दूकानदारों को रोका और वे अपनी दूकानों | मैं लौटकर अपनी-अपनी टोकरी लेकर बैठ गये।

स्वरूप-गोसाञि प्रभुरे घर पाठाइला । चारि वैष्णव, चारि पिछाड़ी सङ्गे राखिला ॥

७७॥

स्वरूप दामोदर ने श्री चैतन्य महाप्रभु को उनके निवासस्थान पर भिजवा दिया और अपने साथ चार वैष्णव तथा चार बोझा ढोने वाले नौकरों को रख लिया।

स्वरूप-गोसाजि कहिलेन सब पसारिरे ।। एक एक द्रव्येर एक एक पुञ्जा देह' मोरे ॥

७८ ॥

स्वरूप दामोदर ने सारे दूकानदारों से कहा, मुझे हर टोकरी में से चार चार अंजुली प्रसाद दे दो।

एई-मते नाना प्रसाद बोझा बान्धाज्ञा । लजा आइला चारि जनेर मस्तके चड़ाजा ॥

७९॥

इस तरह कई तरह के प्रसाद एकत्र कर लिये गये, उन्हें विभिन्न लियों में बाँधा गया और चार नौकरों के सिरों पर रखाकर ले जाया गया ।

वाणीनाथ पट्टनायक प्रसाद आनिला । काशी-मिश्र अनेक प्रसाद पाठाइला ॥

८०॥

इस तरह न केवल स्वरूप दामोदर गोस्वामी प्रसाद लाये, अपितु णीनाथ पट्टनायक तथा काशी मिश्र ने भी प्रचुर मात्रा में प्रसाद भेजा।

सब वैष्णवे प्रभु वसाइला सारि सारि ।।आपने परिवेशे प्रभु लजा जना चारि ॥

८१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने सारे भक्तों को पंक्तियों में बैठाया और चार अन्य पक्तियों के साथ वे स्वयं उस प्रसाद का वितरण करने लगे।

महाप्रभुर श्री-हस्ते अल्प ना आइसे ।एक-एक पाते पञ्च-जनार भक्ष्य परिवेशे ॥

८२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु का अल्प मात्रा में प्रसाद लेने का अभ्यास नहीं था। अतएव हर पत्तल में वे इतना रख देते थे, जो पाँच व्यक्तियों के लिए पर्याप्त होता।

स्वरूप कहे,--प्रभु, वसि' करह दर्शन ।।आमि इँहा-सबा ला करि परिवेशन ॥

८३॥

स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु से अनुरोध किया, कृपया बैठ जायें और देखें। मेरी सहायता करने वाले इन लोगों के द्वारा मैं यह प्रसाद वितरित किये देता हूँ।

स्वरूप, जगदानन्द, काशीश्वर, शङ्कर ।।चारि-जन परिवेशन करे निरन्तर ॥

८४॥

स्वरूप दामोदर, जगदानन्द, काशीश्वर तथा शंकर-इन चार लियों ने लगातार प्रसाद का वितरण किया।

प्रभु ना खाइले केह ना करे भोजन ।प्रभुरे से दिने काशी-मिश्रेर निमन्त्रण ॥

८५॥

सारे बैठे हुए भक्त तब तक प्रसाद नहीं ग्रहण कर रहे थे, जब तक महाप्रभु प्रसाद नहीं पा लेते। किन्तु उस दिन काशी मिश्र ने महाप्रभु को नियन्त्रित कर रखा था।

आपने काशी-मिश्र आइला प्रसाद ला ।प्रभुरे भिक्षा कराइला आग्रह करिया ॥

८६॥

इसलिए काशी मिश्र स्वयं वहाँ गये और उन्होंने बड़े मनोयोग से श्री । पैतन्य महाप्रभु को प्रसाद दिया तथा उन्हें खिलाया।

पुरी-भारतीर सङ्गे प्रभु भिक्षा कैला । सकल वैष्णव तबे भोजन करिला ॥

८७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु परमानन्द पुरी तथा ब्रह्मानन्द भारती के साथ बैठ गये और उन्होंने प्रसाद ग्रहण किया। जब वे खाने लगे, तो सारे वैष्णव भी खाने लगे।

आकण्ठ पूराजा सबाय कराइला भोजन । देह' देह' बलि' प्रभु बलेन वचन ॥

८८॥

हर एक ने जी भरकर भोजन किया, क्योंकि श्री चैतन्य महाप्रभु परोसने वालों से कहे जा रहे थे,उन्हें और दो, और दो।

भोजन करिया सबे कैला आचमन । सबारे पराइली प्रभु माल्य-चन्दन ॥

८९॥

जब सारे भक्तों ने प्रसाद ग्रहण करना बन्द कर दिया और अपने अपने थि तथा मुँह धो चुके, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने हर एक को फूल माला तथा चन्दन लेप से अलंकृत किया।

प्रेमाविष्ट हा प्रभु करेन वर-दान ।शुनि' भक्त-गणेर जुड़ाय मनस्काम ॥

९०॥

प्रेमावेश से अभिभूत होकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने सारे भक्तों को आशीर्वाद दिया, जिसे सबों ने बड़े ही सन्तोष के साथ सुना।

हरिदासेर विजयोत्सव ये कैल दर्शन । ये इहाँ नृत्य कैल, ग्रे कैल कीर्तन ॥

९१॥

ग्रे ताँरै वालुका दिते करिल गमन ।। तार मध्ये महोत्सवे ग्रे कैल भोजन ॥

९२॥

अचिरे ह-इबे ता-सबार'कृष्ण-प्राप्ति' ।हरिदास-दरशने हय ऐछे ‘शक्ति' ॥

९३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह आशीर्वाद दिया, जिस किसी ने श्री हरिदास ठाकुर के विजय उत्सव को देखा है, जिस किसी ने यहाँ कीर्तन और नृत्य किया है, जिस किसी ने हरिदास ठाकुर के शरीर पर बालू डाली है तथा जिस किसी ने प्रसाद ग्रहण उत्सव में भाग लिया है, उसे शीघ्र ही कृष्ण की कृपा प्राप्त होगी। हरिदास ठाकुर के दर्शन में ऐसी अद्भुत शक्ति है।

कृपा करि' कृष्ण मोरे दियाछिला सङ्ग ।।स्वतन्त्र कृष्णेर इच्छा,—कैला सङ्ग-भङ्ग ॥

९४॥

कृष्ण ने मुझ पर कृपा करके हरिदास ठाकुर की संगति प्रदान की। स्वतन्त्र इच्छा के होने के कारण कृष्ण ने अब वह संगति छुड़ा दी है।

हरिदासेर इच्छा झबे ह-इल चलिते । आमार शकति ताँरे नारिल राखिते ॥

९५॥

जब हरिदास ठाकुर ने यह भौतिक जगत् छोड़ना चाहा, तो उन्हें रोक पाना मेरी शक्ति के बाहर था।

इच्छा-मात्रे कैला निज-प्राण निष्क्रामण ।पूर्वे ग्रेन शुनियाछि भीष्मेर मरण ॥

९६॥

हरिदास ठाकुर केवल अपनी इच्छा से अपना प्राण छोड़कर उसी तर चले गये, जिस तरह पूर्वकाल में भीष्म ने अपनी इच्छा से देह त्याग किया था, जैसाकि हमने शास्त्र में सुना है।

हरिदास आछिल पृथिवीर 'शिरोमणि' ।। ताही विना रत्न-शून्या है-इल मेदिनी ॥

९७॥

हरिदास ठाकुर इस पृथ्वी के मुकुटमणि थे। उनके बिना अब यह जगत् उस मूल्यवान रत्न से शून्य हो गया है।

जय जय हरिदास' बलि' कर हरि-ध्वनि । एत बलि' महाप्रभु नाचेन आपनि ॥

९८॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने सबों से कहा, हरिदास ठाकुर की जय' बोलो और पवित्र हरिनाम का कीर्तन करो। यह कहकर वे स्वयं नृत्य करने लगे।

सबे गाय,-जय जय जय हरिदास ।। नामेर महिमा ग्रेह करिला प्रकाश ॥

९९॥

हर व्यक्ति कीर्तन करने लगा, हरिदास ठाकुर की जय हो, जिन्होंने भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन की महिमा को प्रकाशित किया है।

तबे महाप्रभु सब भक्ते विदाय दिला ।।हर्ष-विषादे प्रभु विश्राम करिला ॥

१००॥

तत्पश्चात् श्री चैतन्य महाप्रभु ने सारे भक्तों को विदा किया और स्वयं भी सुख तथा दुःख की मिश्रित भावनाओं में डूबे विश्राम करने लगे।

एइ त कहिलँ हरिदासेर विजय ।ग्राहार श्रवणे कृष्णे दृढ़-भक्ति हय ॥

१०१॥

इस तरह मैंने हरिदास ठाकुर के गौरवमय महाप्रयाण का वर्णन किया है। जो भी इस कथा को सुनता है, वह निश्चय ही कृष्ण की भक्ति में अपने मन को दृढ़ करेगा।

चैतन्येर भक्त-वात्सल्य इहातेइ जानि । भक्त-वाञ्छा पूर्ण कैला न्यासि-शिरोमणि ॥

१०२॥

हरिदास ठाकुर के महाप्रयाण की घटना से तथा श्री चैतन्य महाप्रभु ने जिस यत्न के साथ उसको मनाया, उससे यह समझा जा सकता है कि महाप्रभु अपने भक्तों के प्रति कितने वत्सल हैं। यद्यपि वे संन्यासियों में सर्वोच्च हैं, किन्तु उन्होंने हरिदास ठाकुर की इच्छा पूर्ण की।

शेष-काले दिलो ताँरै दर्शन-स्पर्शन । ताँरे कोले करि' कैला आपने नर्तन ।।१०३ ॥

हरिदास ठाकुर की अन्तिम अवस्था में श्री चैतन्य महाप्रभु अपना संग देते रहे और उन्हें अपना स्पर्श करने की अनुमति देते रहे। तत्पश्चात् हरिदास के शरीर को अपनी गोद में लेकर महाप्रभु ने नर्तन किया।

आपने श्री-हस्ते कृपाय ताँरै वालु दिला ।। आपने प्रसाद मागि' महोत्सव कैला ॥

१०४॥

अपनी अहैतुकी कृपा से महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर के शरीर को बालू से स्वयं ढका और दूकानदारों से स्वयं भिक्षा माँगी। तत्पश्चात् उन्होंने म ठाकुर के महाप्रयाण का महोत्सव मनाया।

महा-भागवत हरिदास–परम-विद्वान् ।। ए सौभाग्य लागि' आगे करिला प्रयाण ॥

१०५॥

हरिदास ठाकुर न केवल सर्वोच्च भगवद्भक्त थे, अपितु वे एक महान् परम विद्वान भी थे। यह तो उनका परम सौभाग्य था कि उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के सामने प्रयाण किया।

चैतन्य-चरित्र एइ अमृतेर सिन्धु ।।कर्ण-मन तृप्त करे यार एक बिन्दु ॥

१०६॥

भी चैतन्य महाप्रभु का जीवन तथा उनके गुण अमृत के समुद्र के है, जिसकी एक बूंद मन तथा कर्णो को तृप्त कर सकती है।

भव-सिन्धु तरिबारे आछे ग्रार चित्त ।।श्रद्धा करि' शुन सेइ चैतन्य-चरित्र ॥

१०७॥

अतः भवसागर को पार करने के इच्छुक व्यक्ति को श्रद्धापूर्वक श्री तन्य महाप्रभु के जीवन तथा गुणों के विषय में श्रवण करना चाहिए।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे ग्रार आश ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

१०८॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए उनके चरणचिह्नों पर चलकर मैं कृष्णदास श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

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