अध्याय दस: श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों से प्रसाद स्वीकार करते हैं
वन्दे श्रीकृष्ण-चैतन्यं भक्तानुग्रह-कातरम् । येन केनापि सन्तुष्टं भक्त-दत्तेन श्रद्धया ॥
१॥
मैं उन श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करता हूँ, जो अपने भक्तों द्वारा श्रद्धा तथा प्रेम से प्रदान की गई किसी भी वस्तु को स्वीकार करके सदैव प्रसन्न होते हैं और उन पर कृपावृष्टि करने के लिए सदैव उद्यत रहते हैं।
जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द । जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैतचन्द्र की जय हो! श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो! वर्षान्तरे सब भक्त प्रभुरे देखिते ।।परम-आनन्दे सबे नीलाचल ग्राइते ॥
३॥
अगले वर्ष सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु के दर्शन हेतु जगन्नाथपुरी (नीलाचल) जाने के लिए अत्यन्त प्रसन्न थे।
अद्वैताचार्य-गोसाञि—सर्व-अग्रगण्य ।।आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, श्रीवास आदि धन्य ॥
४॥
अद्वैत आचार्य गोसांई ने बंगाल की टोली का नेतृत्व किया। उनके पीछे आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, श्रीवास ठाकुर तथा अन्य महिमामंडित भक्त थे।
यद्यपि प्रभुर आज्ञा गौड़े रहिते ।।तथापि नित्यानन्द प्रेमे चलिला देखिते ॥
५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु को बंगाल में रहने का आदेश दिया था, किन्तु फिर भी प्रेमाविष्ट होने के कारण भगवान् नित्यानन्द भी उनसे मिलने चले गये।
अनुरागेर लक्षण एइ,–'विधि' नाहि माने ।ताँर आज्ञा भाङ्गे ताँर सङ्गेर कारणे ॥
६॥
निस्सन्देह, यह सच्चे स्नेह का लक्षण ही है कि मनुष्य पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आदेश को, विधि-विधानों की परवाह न करते हुए उनसे सान्निध्य प्राप्त करने के लिए तोड़ता है।
रासे ग्रैछे घर ग्राइते गोपीरे आज्ञा दिला ।।ताँर आज्ञा भाङ्गि' ताँर सङ्गे से रहिला ॥
७॥
रास नृत्य के समय कृष्ण ने सारी गोपियों से घर लौट जाने के लिए कहा, किन्तु गोपियों ने उनकी आज्ञा की अवहेलना की और वे उनकी संगति पाने के लिए वहीं रुकी रहीं।
आज्ञा-पालने कृष्णोर ग्रैछे परितोष ।प्रेमे आज्ञा भाङ्गिले हय कोटि-सुख-पोष ॥
८॥
यदि कोई कृष्ण की आज्ञा का पालन करता है, तो वे निश्चित रूप से प्रसन्न होते हैं, किन्तु यदि कोई व्यक्ति प्रेमानन्द के कारण उनकी आज्ञा भंग करता है, तो उन्हें करोड़ों गुना सुख प्राप्त होता है।
वासुदेव-दत्त, मुरारि-गुप्त, गङ्गादास । श्रीमान् सेन, श्रीमान् पण्डित, अकिञ्चन कृष्णदास ॥
९॥
मुरारि, गरुड़-पण्डित, बुद्धिमन्त-खाँन । सञ्जय-पुरुषोत्तम, पण्डित-भगवान् ॥
१०॥
शुक्लाम्बर, नृसिंहानन्द आर व्रत जन ।। सबाइ चलिला, नाम ना याय लिखन ॥
११॥
जगन्नाथपुरी जाने के लिए वासुदेव दत्त, मुरारि गुप्त, गंगादास, श्रीमान् सेन, श्रीमान् पण्डित, अकिंचन कृष्णदास, मुरारि गुप्त, गरुड़ पण्डित, बुद्धिमन्त खान, संजय पुरुषोत्तम, भगवान् पण्डित, शुक्लाम्बर ब्रह्मचारी, नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी तथा अन्य कई भक्त साथ हो लिये। उन सबों के नाम गिना पाना असम्भव है।
कुलीन-ग्रामी, खण्ड-वासी मिलिला आसिया ।शिवानन्द-सेन चलिला सबारे लञा ॥
१२॥
कुलीन ग्राम तथा खण्ड के निवासी भी आकर साथ हो लिये। शिवानन्द सेन ने नेतृत्व संभाला और उन सभी की देखभाल करनी प्रारम्भ कर दी।
राघव-पण्डित चले झालि साजाइया । दमयन्ती यत द्रव्य दियाछे करिया ॥
१३॥
राघव पण्डित अपनी बहन दमयन्ती द्वारा तैयार किये गये स्वादिष्ट भोजन से भरे कई थैले लेकर आये।
नाना अपूर्व भक्ष्य-द्रव्य प्रभुर ग्रोग्य भोग ।वत्सरेक प्रभु ग्राहा करेन उपयोग ॥
१४॥
दमयन्ती ने श्री चैतन्य महाप्रभु के खाने के योग्य नाना प्रकार के अद्वितीय भोजन तैयार किये, जिन्हें महाप्रभु एक वर्ष तक खाते रहे।
आम्र-काशन्दि, आदा-काशन्दि झाल-काशन्दि नाम । नेम्बु-आदा आम्र-कोलि विविध विधान ॥
१५॥
आम्सि, आम-खण्ड, तैलाम्र, आम-सत्ता ।। यत्न करि' गुण्डा करि' पुराण सुकुता ॥
१६॥
राघव पण्डित के थैलों में जो अचार तथा मसाले थे, उनमें से कुछ के नाम इस प्रकार हैं-आम्रकाशन्दि, आदा काशन्दि, झाल काशन्दि, नेम्बु आदा, आम्रकोलि, आम्सि, आमखण्ड, तैलाग्र तथा आमसत्ता। दमयन्ती ने बड़े मनोयोग से सूखी तीती सब्जियों को चूर्ण कर दिया था।
‘सुकुता' बलि' अवज्ञा ना करिह चित्ते ।। सुकुताय ने सुख प्रभुर, ताहा नहे पञ्चामृते ॥
१७ ॥
सुकुता नाम सुनकर अवहेलना न करें, क्योंकि यह तीता व्यंजन है। श्री चैतन्य महाप्रभु को इस सुकुता को खाने में पंचामृत ( दूध, चीनी, घी, शहद तथा दही का मिश्रण) के पीने से भी अधिक सुख मिलता था।
भाव-ग्राही महाप्रभु स्नेह-मात्र लय ।। सुकुता पाता काशन्दिते महा-सुख पाय ॥
१८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, इसलिए वे प्रत्येक वस्तु से भाव ग्रहण कर लेते हैं। उन्होंने अपने प्रति दमयन्ती के स्नेह को स्वीकार किया; इसीलिए उन्हें सुकुता की सूखी तीती पत्तियों तथा काशन्दि (खट्टा मसाला) से भी महान् आनन्द प्राप्त हुआ।
‘मनुष्य'-बुद्धि दमयन्ती करे प्रभुर पाय । गुरु-भोजने उदरे कभु 'आम' हा ग्राय ॥
१९॥
श्री चैतन्य महप्रभु के प्रति सहज प्रेम होने से दमयन्ती महाप्रभु को सामान्य मनुष्य मानती थी। इसलिए उसने सोचा कि अधिक खाने से महाप्रभु बीमार पड़ जायेंगे और उनके उदर में आँव हो जायेगी।
सुकुता खाइले सेइ आम ह-इबेक नाश । एइ स्नेह मने भावि' प्रभुर उल्लास ॥
२०॥
निष्ठावान स्नेह के कारण उसने सोचा कि इस सुकुता को खाने से महाप्रभु का रोग ठीक हो जायेगा। दमयन्ती के इन स्नेहिल विचारों को सोचकर महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न थे।
प्रियेण सङ्ग्रथ्य विपक्ष-सन्निधान्उपाहितां वक्षसि पीवर-स्तनी । स्त्रजं न काचिद्विजहौ जलाविलावसन्ति हि प्रेम्णि गुणा न वस्तुनि ॥
२१॥
एक प्रेमी ने माला गूंथी और अपनी प्रेमिका की सौतों की उपस्थिति में ही उसके गले में वह माला डाल दी। उसके स्तन उठे हुए थे और वह अत्यन्त सुन्दर थी, किन्तु उसने उस कीचड़ से सनी माला को अस्वीकार नहीं किया, क्योंकि उसका मूल्य भौतिक वस्तुओं में नहीं अपितु उसमें निहित प्रेम में था।
धनिया-मौहरीर तण्डुल गुण्डा करिया ।। नाडू बान्धियाछे चिनि-पाक करिया ॥
२२ ॥
दमयन्ती ने धनिया तथा सौंफ के बीजों को चूर्ण किया, उन्हें चीनी के साथ पकाया और फिर उनसे छोटे-छोटे लड्डु बना दिये।
शुण्ठि-खण्ड नाड़, आर आम-पित्त-हरे ।। पृथक् पृथक् बान्धि' वस्त्रेर कुथली भितर ॥
२३ ॥
उसने अत्यधिक पित्त से उत्पन्न आँव को दूर करने के लिए सूखी अदरक के साथ मिठाई के लड्डू बनाये। उसने इन सारे पकवानों को अलग-अलग छोटी छोटी कपड़े की थैलियों में भरा।
कोलि-शुण्ठि, कोलि-चूर्ण, कोलि-खण्ड आर ।कत नाम ल-इब, शत-प्रकार आचार' ॥
२४॥
उसने सैकड़ों प्रकार के मसाले तथा अचार बनाये। उसने कोलिशुण्ठि, कोलिचूर्ण, कोलिखण्ड तथा अनेक अन्य पकवान भी बनाये। मैं कितनों का नाम गिनाऊँ? नारिकेल-खण्ड नाड़, आर नाड़ गङ्गा-जल ।।चिर-स्थायी खण्ड-विकार करिला सकले ॥
२५ ।। उसने लड्डु जैसी अनेक मिठाइयाँ बनाईं। कुछ चूर्णित नारियल से बनाई गई थीं और दूसरी मिठाइयाँ गंगाजल के समान सफेद दिख रही थीं। इस तरह उसने अनेक प्रकार की टिकाऊ मिश्री की मिठाइयाँ बनाईं।
चिर-स्थायी क्षीर-सार, मण्डादि-विकार । अमृत-कर्पूर आदि अनेक प्रकार ॥
२६॥
उसने लम्बे समय तक टिकनेवाला पनीर, दूध तथा मलाई की अनेक मिठाइयाँ तथा अमृत कर्पूर जैसी कई मिठाइयाँ बनाईं।
शालिकाचुटि-धान्येर 'आतप' चिड़ा करि' ।। नूतन-वस्त्रेर बड़ कुथली सब भरि' ॥
२७॥
उसने महीन, बिना उबाले शालि धान से चिउड़ा बनाया और उसे नए कपड़े की बनी एक बड़ी थैली में भर दिया।
कतेक चिड़ा हुडुम्करि' घृतेते भाजिया ।चिनि-पाके नाडु कैला कर्पूरादि दिया ॥
२८॥
उसने कुछ चिउड़े को भूनकर घी में तला और चीनी के शीरे में पकाकर कुछ कपूर मिलाकर उसके लड्डू बना लिये।
शालि-धान्येर तण्डुल-भाजा चूर्ण करिया । घृत-सिक्त चूर्ण कैला चिनि-पाक दिया ॥
२९॥
कर्पूर, मरिच, लवङ्ग, एलाचि, रसवास ।। चूर्ण दिया नाडु कैला परम सुवास ॥
३०॥
उसने महीन चावल को भूनकर उसका चूर्ण बनाया और उसे घी से सिक्त करके चीनी के शीरे में पका दिया। तत्पश्चात् उसने कपूर, काली मिर्च, लौंग, इलायची तथा अन्य मसाले डाले और छोटे-छोटे लड्डू बना लिये, जो अत्यन्त स्वादिष्ट तथा सुगन्धित थे।
शालि-धान्येर ख-इ पुनः घृतेते भाजिया ।।चिनि-पाक उखड़ा कैला कर्पूरादि दिया ॥
३१॥
उसने महीन धान के चावल को भूना, घी में तला, चीनी के शीरे में पकाया और कुछ में कपूर मिलाकर उखड़ा या मुडूकि बना लिया।
फुट्कलाइ चूर्ण करि' घृते भाजाइल ।।चिनि-पाके कर्पूरादि दिया नाडु कैल ॥
३२॥
एक अन्य प्रकार की मिठाई बनाने के लिए भूने हुए मटर को चूर्ण करके घी में तलकर चीनी में पकाया गया। फिर उसमें कपूर मिलाकर लड्डू बना लिये गये।
कहिते ना जानि नाम ए-जन्मे ग्राहार। ऐछे नाना भक्ष्य-द्रव्य सहस्र-प्रकार ॥
३३॥
मैं जन्म भर भी गिनाऊँ, तो इन सारे खाद्य पदार्थों का नाम नहीं ले सर्केगा। दमयन्ती ने सैकड़ों हजारों चीजें प्रस्तुत कीं।
राघवेर आज्ञा, आर करेन दमयन्ती ।।मुँहार प्रभुते स्नेह परम-भकति ॥
३४॥
दमयन्ती ने अपने भाई राघव पण्डित के आदेश से ये सारी चीजें तैयार की थीं। इन दोनों का श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रति असीम स्नेह था और वे भक्ति में बहुत उन्नत थे।
गङ्गा-मृत्तिका आनि' वस्त्रेते छानिया ।।पाँपड़ि करिया दिला गन्ध-द्रव्य दिया ॥
३५ ॥
दमयन्ती ने गंगा की मिट्टी ली, उसे सुखाया, चूर्ण किया, महीन कपड़े से छाना, उसमें सुगन्धित द्रव्य मिलाये और उसके छोटे-छोटे गोले बना लिये।
पातल मृत्पात्रे सन्धानादि भरि' ।।आर सब वस्तु भरे वस्त्रेर कुथली ॥
३६॥
मसालों तथा ऐसे ही पदार्थों को मिट्टी के पतले बर्तनों में और शेष सभी वस्तुओं को कपड़े की छोटी-छोटी थैलियों में भरा।
सामान्य झालि हैते द्विगुण झालि कैला ।। पारिपाटि करि' सब झालि भराइला ॥
३७॥
दमयन्ती ने छोटी थैलियों से दुगने आकार के थैले बनाये और तब बड़ी सावधानी से उसने इन बड़े थैलों में सारी छोटी थैलियाँ भर दीं।
झालि बान्धि' मोहर दिल आग्रह करिया । तिन बोझारि झालि वहे क्रम करिया ॥
३८॥
तब उसने सारे थैलों को लपेटकर हर थैले को ध्यानपूर्वक बन्द कर दिया। इन थैलों को तीन वाहक क्रमानुसार वहन करके ले गये।
सङ्क्षेपे कहिलॆ एइ झालिर विचार । 'राघवेर झालि' बलि' विख्याति ग्राहार ॥
३९॥
नरेन्द्र सरोवर के जल में नाव पर आरूढ़ होकर भगवान् गोविन्द ने अपने सारे भक्तों के साथ जल-लीला की।
झालिर उपर मुन्सिब' मकरध्वज-कर ।प्राण-रूपे झालि राखे हा तत्पर ॥
४० ॥
इन सारे थैलों का निरीक्षक मकरध्वज-कर था, जो इन्हें अपने प्राणों के समान ध्यानपूर्वक रखता था।
एइ-मते वैष्णव सब नीलाचले आइला ।दैवे जगन्नाथेर से दिन जल-लीला ॥
४१॥
इस तरह बंगाल के सारे वैष्णव जन जगन्नाथपुरी गये। संयोगवश वे उस दिन पहुँचे थे, जिस दिन भगवान जगन्नाथ जल-लीला करते हैं।
नरेन्द्रेर जले ‘गोविन्द' नौकाते चड़िया । जल-क्रीड़ा करे सब भक्त-गण लञा ॥
४२॥
इस तरह मैंने संक्षेप में उन थैलों का वर्णन किया, जो 'राघव की झालि' नाम से प्रसिद्ध हैं।
सेइ-काले महाप्रभु भक्त-गण-सङ्गे।। नरेन्द्रे आइला देखिते जल-केलि-रङ्गे ॥
४३॥
तब नरेन्द्र सरोवर में भगवान जगन्नाथ की आनन्दमय जल-क्रीड़ा देखने के लिए अपने निजी संगियों सहित श्री चैतन्य महाप्रभु आये।
सेइ-काले आइला सब गौड़ेर भक्त-गण ।। नरेन्द्रेते प्रभु-सङ्गे ह-इल मिलन ॥
४४॥
उसी समय बंगाल के सारे भक्त उस सरोवर में पहुँचे और महाप्रभु से मिले।
भक्त-गण पड़े आसि' प्रभुर चरणे ।उठा प्रभु सबारे कैला आलिङ्गने ॥
४५ ॥
सारे भक्त तुरन्त ही श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणों पर गिर पड़े और महाप्रभु ने प्रत्येक को उठाकर सभी का आलिंगन किया।
गौड़ीया-सम्प्रदाय सब करेन कीर्तन ।प्रभुर मिलने उठे प्रेमेर क्रन्दन ॥
४६॥
बंगाल के सारे भक्तों से युक्त गौड़ीय सम्प्रदाय ने संकीर्तन प्रारम्भ किया। जब वे महाप्रभु से मिले, तो वे प्रेमवश उच्च स्वर से क्रन्दन करने लगे।
जल-क्रीड़ा, वाद्य, गीत, नर्तन, कीर्तन ।।महा-कोलाहल तीरे, सलिले खेलन ॥
४७॥
जल-क्रीड़ा के कारण किनारे पर वाद्य, गायन, कीर्तन, नर्तन तथा अत्यधिक कोलाहल के होने से अत्यधिक उल्लास था।
गौड़ीया-सङ्कीर्तने आर रोदन मिलिया । महा-कोलाहल हैल ब्रह्माण्ड भरिया ॥
४८॥
गौड़ीय वैष्णवों के कीर्तन तथा क्रन्दन से महान् कोलाहल उत्पन्न हुआ, जिसने समूचे ब्रह्माण्ड को पूरित कर दिया।
सब भक्त लञा प्रभु नामिलेन जले ।।सबा ला जल-क्रीड़ा करेन कुतूहले ।। ४९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने भक्तों के साथ जल में प्रवेश किया और अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वे उनके साथ जल-क्रीड़ा करने लगे।
प्रभुर एइ जल-क्रीड़ा दास-वृन्दावन ।।चैतन्य-मङ्गले' विस्तारि' करियाछेन वर्णन ॥
५०॥
वृन्दावन दास ठाकुर ने 'चैतन्य मंगल' (अब चैतन्य भागवत नाम से विख्यात ) में महाप्रभु की जल-क्रीड़ा का बहुत विस्तार से वर्णन किया ।
पुनः इहाँ वर्णिले पुनरुक्ति हय ।व्यर्थ लिखन हय, आर ग्रन्थ बाड़य ॥
५१॥
यहाँ पर महाप्रभु के कार्यकलापों का फिर से वर्णन करने से कोई लाभ नहीं होगा। यह केवल पुनरुक्ति होगी और इससे पुस्तक का आकार बढ़ जायेगा।
जल-लीला करि' गोविन्द चलिला आलय ।निज-गण लञा प्रभु गेला देवालय ॥
५२॥
जल-लीला समाप्त करने के बाद भगवान् गोविन्द अपने आवास लौट गये। तब श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों को साथ लेकर मन्दिर गये।
जगन्नाथ देखि' पुनः निज-घरे आइला ।प्रसाद आनाजा भक्त-गणे खाओयाइला ॥
५३॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ मन्दिर होकर अपने निवासस्थान लौट आये, तो उन्होंने पर्याप्त मात्रा में जगन्नाथ जी का प्रसाद मँगवाया, जिसे उन्होंने अपने भक्तों में बाँट दिया, जिससे कि वे भरपेट खा सकें।
इष्ट-गोष्ठी सबा ला कत-क्षण कैला । निज निज पूर्व-वासाय सबाय पाठाइला ॥
५४॥
भक्तों से कुछ समय तक बातें करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन सबों से अपने-अपने उन्हीं डेरों में स्थान ग्रहण करने के लिए कहा, जिनमें वे पिछले वर्ष रह चुके थे।
गोविन्द-ठाजि राघव झालि समर्पिला ।भोजन-गृहेर कोणे झालि गोविन्द राखिला ॥
५५॥
राघव पण्डित ने खाद्य सामग्री के थैले गोविन्द को सौंप दिये, जिसने उन्हें भोजन-कक्ष के एक कोने में रख दिये।
पूर्व-वत्सरेर झालि आजाड़ करिया ।। द्रव्य भरिबारे राखे अन्य गृहे लञा ॥
५६॥
गोविन्द ने पिछले वर्ष के थैलों को ठीक से खाली किया और उन्हें अन्य कमरे में दूसरी वस्तुओं से भरे जाने के लिए रख लिया।
आर दिन महाप्रभु निज-गण लञा ।जगन्नाथ देखिलेन शय्योत्थाने ग्राञा ॥
५७॥
अगले दिन भगवान् जगन्नाथ के प्रातःकाल जगने के समय पर श्री चैतन्य महाप्रभु अपने निजी भक्तों के साथ भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करने गये।
बेड़ा-सङ्कीर्तन तहाँ आरम्भ करिला ।सात-सम्प्रदाय तबे गाइते लागिला ॥
५८ ॥
भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने बेड़ा संकीर्तन (गोलाकार संकीर्तन) प्रारम्भ किया। उन्होंने सात टोलियाँ बनाई और वे कीर्तन करने लगीं।
सात-सम्प्रदाये नृत्य करे सात जन ।अद्वैत आचार्य, आर प्रभु-नित्यानन्द ॥
५९॥
सातों टोलियों में से हर एक में अद्वैत आचार्य अथवा नित्यानन्द प्रभु जैसा मुख्य नर्तक था।
वक्रेश्वर, अच्युतानन्द, पण्डित-श्रीवास ।। सत्यराज-खाँन, आर नरहरि-दास ॥
६० ॥
अन्य टोलियों के नर्तक थे-वक्रेश्वर पण्डित, अच्युतानन्द, पण्डित श्रीवास, सत्यराज खान तथा नरहरि दास।
सात-सम्प्रदाये प्रभु करेन भ्रमण ।। ‘मोर सम्प्रदाये प्रभु'–ऐछे सबार मन ॥
६१॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु निरीक्षण करते हुए एक टोली से दूसरी में विचरण करते, तो प्रत्येक टोली के व्यक्ति यही सोचते कि, महाप्रभु हमारी टोली में हैं।
सङ्कीर्तन-कोलाहले आकाश भेदिल ।।सब जगन्नाथ-वासी देखिते आइल ॥
६२॥
सामूहिक कीर्तन से इतनी तुमुल ध्वनि हुई कि उससे आकाश भर गया। जगन्नाथपुरी के सारे निवासी कीर्तन देखने के लिए आये।
राजा आसि' दूरे देखे निज-गण ला ।राज-पत्नी सब देखे अट्टाली चड़िया ॥
६३॥
राजा भी अपने निजी सहायकों समेत वहाँ आया और दूर से देखता रहा। सारी रानियों ने महल की अटारियों से देखा।
कीर्तन-आटोपे पृथिवी करे टलमल ।।‘हरि-ध्वनि' करे लोक, हैल कोलाहल ॥
६४॥
कीर्तन की तेज ध्वनि से समस्त जगत् काँपने लगा। जब सबों ने हरिनाम का कीर्तन किया, तो उससे तुमुल ध्वनि उत्पन्न हुई।
एइ-मत कत-क्षण कराइला कीर्तन ।।आपने नाचिते तबे प्रभुर हैल मन ॥
६५॥
इस तरह महाप्रभु ने कुछ देर तक तो कीर्तन करवाया, किन्तु तब उन्हें स्वयं नृत्य करने की इच्छा हुई।
सात-दिके सात-सम्प्रदाय गाय, बाजाय ।मध्ये महा-प्रेमावेशे नाचे गौर-राय ॥
६६॥
सातों टोलियाँ सात दिशाओं में कीर्तन करने लगीं तथा मृदंग बजाने लगीं और श्री चैतन्य महाप्रभु बीचों-बीच अत्यधिक प्रेमावेश में नृत्य करने लगे।
उड़िया-पद महाप्रभुर मने स्मृति हैल । स्वरूपेरे सेइ पद गाइते आज्ञा दिल ॥
६७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु को उड़िया भाषा की एक पंक्ति याद आई और उन्होंने इसे स्वरूप दामोदर को गाने का आदेश दिया।
जगमोहन-परि-मुण्डा ग्राउ ॥
६८ ॥
जगमोहन नामक कीर्तन कक्ष में मेरा सिर जगन्नाथ के चरणों पर गिरे।
एइ पदे नृत्य करेन परम-आवेशे । सब-लोक चौदिके प्रभुर प्रेम-जले भासे ॥
६९॥
केवल इस पंक्ति के कारण श्री चैतन्य महाप्रभु बड़े प्रेमावेश में नृत्य कर रहे थे। उनके चारों ओर के लोग उनके आँसुओं के जल में तैरने लगे।
‘बोल्’ ‘बोल्’ बलेन प्रभु श्री-बाहु तुलिया ।। हरि-ध्वनि करे लोक आनन्दे भासिया ॥
७० ॥
दिव्य आनन्द में तैरते हुए महाप्रभु ने अपनी दोनों बाहें उठाते हुए कहा, कीर्तन करो! कीर्तन करो'! दिव्य आनन्द में तैरते हुए लोग हरिनाम का कीर्तन करके प्रत्युत्तर देने लगे।
प्रभु पड़ि' मूर्छा ग्राय, श्वास नाहि आर।। आचम्बिते उठे प्रभु करिया हुङ्कार ॥
७१।। महाप्रभु मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े और उनकी श्वास भी नहीं चल रही थी। किन्तु वे सहसा उच्च ध्वनि ( हुंकार) करते उठ खड़े हुए।
सघन पुलक,—ग्रेन शिमुलेर तरु ।कभु प्रफुल्लित अङ्ग, कभु हय सरु ॥
७२॥
उनके शरीर के रोएँ खड़े हो गये, मानो शिमुल वृक्ष के काँटे हों। कभी उनका शरीर फूला हुआ दिखता, तो कभी अत्यन्त दुबला-पतला दिखता।
प्रति रोम-कूपे हय प्रस्वेद, रक्तोद्गम ।।‘जज' ‘गग' ‘परि’ ‘मुमु’--गद्गद वचन ॥
७३॥
उनके शरीर के प्रत्येक रोमकूप से पसीना आ रहा था और रक्त निकल रहा था; उनकी वाणी लड़खड़ा रही थी। वे पंक्ति का ठीक से उच्चारण नहीं कर पा रहे थे। वे केवल जज गग परि मुमु ही उच्चारित कर पा रहे थे।
एक एक दन्त येन पृथक् पृथक् नड़े।ऐछे नड़े दन्त,—ग्नेन भूमे खसि' पड़े ॥
७४॥
उनके सारे दाँत हिलने लगे, मानो एक दूसरे से अलग हों। ऐसा लग रहा था मानों वे सब भूमि पर गिर पड़ेंगे।
क्षणे क्षणे बाड़े प्रभुर आनन्द-आवेश ।।तृतीय प्रहर ह-इल, नृत्य नहे शेष ॥
७५ ॥
उनका दिव्य आनन्द प्रति क्षण बढ़ता गया। अतः दोपहर के बाद भी उनको नृत्य समाप्त नहीं हुआ।
सब लोकेर उथलिल आनन्द-सागर ।सब लोक पासरिल देह-आत्म-घर ।। ७६ ॥
दिव्य आनन्द का सागर उफन चला और वहाँ पर उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति अपना शरीर, मन तथा घर भूल गया।
तबे नित्यानन्द प्रभु सृजिला उपाय ।क्रमे-क्रमे कीर्तनीया राखिल सबाय ॥
७७॥
तब नित्यानन्द प्रभु ने कीर्तन को समाप्त करने की विधि ढूंढ निकाली। उन्होंने धीरे-धीरे सारे कीर्तनियों को रोक दिया।
स्वरूपेर सङ्गे मात्र एक सम्प्रदाय ।।स्वरूपेर सङ्गे सेह मन्द-स्वर गाय ॥
७८॥
केवल एक टोली स्वरूप दामोदर के साथ कीर्तन करती रही। वह भी अत्यन्त मन्द स्वर से कीर्तन कर रही थी।
कोलाहल नाहि, प्रभुर किछु बाह्य हैल।।तबे नित्यानन्द सबार श्रम जानाइल ॥
७९ ॥
जब कोलाहल नहीं हो रहा था, तो श्री चैतन्य महाप्रभु की बाह्य चेतना लौटी। तब नित्यानन्द प्रभु ने उन्हें कीर्तनियों तथा नर्तकों की थकान के बारे में सूचित किया।
भक्त-श्रम जानि' कैला कीर्तन समापन । सबा लञा आसि' कैला समुद्रे स्नपन ॥
८० ॥
भक्तों की थकान समझकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने संकीर्तन रोक दिया। तब उन्होंने सबों के साथ समुद्र में स्नान किया।
सब लञा प्रभु कैला प्रसाद भोजन ।। सबारे विदाय दिला करिते शयन ॥
८१॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन सबों के साथ प्रसाद लिया और उनसे अपने-अपने निवासस्थान पर लौट जाने तथा आराम करने के लिए कहा।
गम्भीरार द्वारे करेन आपने शयन । गोविन्द आसिया करे पाद-सम्वाहन ॥
८२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु गम्भीरा के द्वार पर लेट गये और गोविन्द वहाँ आकर महाप्रभु के पाँव दबाने लगा।
सर्व-काल आछे एई सुदृढ़ 'नियम' । ‘प्रभु यदि प्रसाद पाञा करेन शयन ॥
८३॥
गोविन्द आसिया करे पाद-सम्वाहन ।तबे ग्राइ' प्रभुर ‘शेष' करेन भोजन' ॥
८४॥
यह दीर्घकाल से चला आ रहा स्थायी नियम था कि भोजन के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु विश्राम करने के लिए लेट जाते और गोविन्द आकर उनके पाँव दबाता। तब गोविन्द श्री चैतन्य महाप्रभु का शेष प्रसाद ग्रहण करता था।
सब द्वार गुड़ि' प्रभु करियाछेन शयन ।भितरे ग्राइते नारे, गोविन्द करे निवेदन ॥
८५॥
इस बार जब महाप्रभु लेटे, तो उन्होंने पूरा द्वार घेर लिया। इससे गोविन्द कमरे के भीतर न प्रवेश कर सका, अतएव उन्होंने निम्न प्रार्थना की।
‘एक-पाश हओ, मोरे देह' भितर ग्राइते'। प्रभु कहे, ‘शक्ति नाहि अङ्ग चालाइते' ॥
८६॥
गोविन्द ने कहा, कृपया एक ओर करवट ले लें। मुझे कमरे में प्रवेश करने दें। किन्तु महाप्रभु ने उत्तर दिया, अपना शरीर हिलानेडुलाने की मुझमें शक्ति नहीं है।
बार बार गोविन्द कहे एक-दिक् ह-इते । प्रभु कहे,–'अङ्ग आमि नारि चालाइते' ॥
८७॥
गोविन्द ने बारम्बार अनुरोध किया, किन्तु महाप्रभु ने उत्तर दिया, मैं अपना शरीर हिला-डुला नहीं सकता।
गोविन्द कहे,--‘करिते चाहि पाद-सम्वाहन' । प्रभु कहे,—कर वा ना कर, येइ लय तोमार मन' ॥
८८॥
गोविन्द ने बारम्बार अनुरोध किया, मैं आपके पाँव दबाना चाहता हूँ, किन्तु महाप्रभु ने कहा, चाहे दबाओ या न दबाओ यह सब तुम्हारे मन पर निर्भर है।
तबे गोविन्द बहिर्वास ताँर उपरे दिया । भितर-घरे गेला महाप्रभुरे लङ्घिया ॥
८९॥
तब गोविन्द ने महाप्रभु के शरीर पर चादर डाल दी और इस तरह वह उन्हें लाँघकर कमरे में प्रवेश कर गया।
पाद-सम्वाहन कैल, कटि-पृष्ठ चापिल ।मधूर-मर्दने प्रभुर परिश्रम गेल ॥
९०॥
गोविन्द ने हमेशा की तरह महाप्रभु के पाँव दबाये। उसने महाप्रभु की कमर तथा पीठ हल्के से दबाई और इस तरह महाप्रभु की थकान दूर हो गई।
सुखे निद्रा हैल प्रभुर, गोविन्द चापे अङ्ग । दण्ड-दुइ ब-इ प्रभुर हैला निद्रा-भङ्ग ॥
९१॥
जब गोविन्द ने उनका शरीर दबाया, तो महाप्रभु लगभग ४५ मिनट तक अच्छी तरह सोये और तब उनकी नींद टूटी।
गोविन्दे देख़िया प्रभु बले क्रुद्ध हुआ । 'आजि केने एत-क्षण आछिस् वसिया? ॥
९२॥
जब महाप्रभु ने गोविन्द को अपनी बगल में बैठे देखा, तो वे कुछ नाराज हुए और पूछा, तुम आज इतनी देर तक यहाँ क्यों बैठे रहे हो? मोर निद्रा हैले केने ना गेला प्रसाद खाइते?' ।। गोविन्द कहे—'द्वारे शुइला, ग्राइते नाहि पथे' ॥
९३॥
महाप्रभु ने पूछा, मेरे सो जाने के बाद तुम प्रसाद ग्रहण करने क्यों नहीं गये? गोविन्द ने उत्तर दिया, आप द्वार रोककर लेटे हुए थे और जाने के लिए कोई रास्ता न था।
प्रभु कहे,–'भितरे तबे आइला केमने? । तैछे केने प्रसाद लैते ना कैला गमने?' ॥
९४॥
महाप्रभु ने पूछा, तुमने कमरे में प्रवेश कैसे किया? उसी तरह से तुम भोजन करने बाहर क्यों नहीं गये? गोविन्द कहे मने–आमार 'सेवा' से 'नियम' ।अपराध ह-उक, किबा नरके गमन ॥
९५॥
गोविन्द ने मन ही मन उत्तर दिया, मेरा कर्तव्य तो सेवा करना है, चाहे मुझे अपराध करना पड़े या नरक जाना पड़े।
'सेवा' लागि' कोटि 'अपराध' नाहि गणि ।। स्व-निमित्त 'अपराधाभासे' भय मानि ॥
९६ ॥
यदि महाप्रभु की सेवा के लिए मुझे करोड़ों अपराध करने पड़े, तो भी मैं बुरा नहीं मानूंगा, किन्तु मैं अपने लिए एक अपराध की झलक से भी अत्यधिक डरता हूँ।
एत सब मने करि' गोविन्द रहिला ।। प्रभु ने पुछिला, तार उत्तर ना दिला ॥
९७॥
इस तरह सोचकर गोविन्द मौन रहा। उसने महाप्रभु के प्रश्न का कोई उत्तर नहीं दिया।
प्रत्यह प्रभुर निद्राय ग्रान प्रसाद ल-इते ।। से दिवसेर श्रम देखि’ लागिला चापिते ॥
९८॥
गोविन्द का अभ्यास था कि वह तब भोजन करता, जब महाप्रभु सोये होते। किन्तु उस दिन महाप्रभु की थकावट देखकर गोविन्द उनके शरीर को दबाता रहा।
ग्राइतेह पथ नाहि, ग्राइबे केमने?।।महा-अपराध हय प्रभुर लङ्घने ॥
९९ ॥
चूंकि जाने के लिए कोई रास्ता न था, अतः वह कैसे जाता? जब सने महाप्रभु के शरीर को लाँधने का सोचा, तो उसे लगा कि यह बहुत अपराध है।
एइ सब हय भक्ति-शास्त्र-सूक्ष्म मर्म ।चैतन्येर कृपाय जाने एइ सब धर्म ॥
१०० ॥
भक्ति में ये सब शिष्टाचार की सूक्ष्म बातें हैं। जिसने श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा प्राप्त की है, केवल वही इन तत्त्वों को समझ सकता हैं।
भक्त-गुण प्रकाशिते प्रभु बड़ रङ्गी । एइ सब प्रकाशिते कैला एत भङ्गी ॥
१०१॥
महाप्रभु अपने भक्तों के उच्च गुणों को प्रकट करने में अत्यधिक रुचि रखते हैं और यही कारण है कि उन्होंने इस घटना को घटने दिया।
सङ्क्षेपे कहिलें एई परि-मुण्डा-नृत्य । अद्यापिह गाय ग्राहा चैतन्येर भृत्य ॥
१०२॥
इस तरह मैंने जगन्नाथ मन्दिर के सभा भवन में श्री चैतन्य महाप्रभु के नृत्य करने का संक्षिप्त वर्णन किया है। श्री चैतन्य महाप्रभु के सेवक अब भी इस नृत्य का गुणगान करते हैं।
एइ-मत महाप्रभु लञा निज-गण। गुण्डिचा-गृहेर कैला क्षालन, मार्जन ॥
१०३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने हमेशा की तरह अपने निजी संगियों के साथ गुण्डिचा मन्दिर की धुलाई तथा सफाई की।
पूर्ववत् कैला प्रभु कीर्तन, नर्तन ।पूर्ववत् टोटाय कैला वन्य-भोजन ॥
१०४।। महाप्रभु ने पहले की ही तरह नृत्य और कीर्तन किया और तब बगीचे में भोजन किया।
पूर्ववत् रथ-आगे करिला नर्तन ।।हेरा-पञ्चमी-यात्रा कैला दरशन ॥
१०५॥
उन्होंने पहले ही की तरह जगन्नाथजी के रथ के आगे नृत्य किया और हेरा पंचमी उत्सव मनाया।
चारि-मास वर्षाय रहिला सब भक्त-गण ।जन्माष्टमी आदि ग्रात्रा कैला दरशन ॥
१०६॥
बंगाल से आये सारे भक्त वर्षा-ऋतु के चार महीने तक जगन्नाथपुरी में रहे और उन्होंने कृष्ण जन्माष्टमी तथा अन्य अनेक उत्सव मनाये।
पूर्वे यदि गौड़ ह-इते भक्त-गण आइल । प्रभुरे किछु खाओयाइते सबार इच्छा हैल ॥
१०७॥
पहले जब बंगाल से सारे भक्त आये थे, तो उनकी इच्छा थी कि श्री चैतन्य महाप्रभु को खाने के लिए कोई न कोई वस्तु दें।
केह कोन प्रसाद आनि' देय गोविन्द-ठात्रि । ‘इहा ग्रेन अवश्य भक्षण करेन गोसाजि' ॥
१०८॥
हर भक्त कोई न कोई प्रसाद लाता। वह इसे इस विनती के साथ गोविन्द को सौंपता कि, कृपया ऐसा करें कि महाप्रभु इस प्रसाद को अवश्य खायें।
केह पैड़, केह नाडु, केह पिठा-पाना । बहु-मूल्य उत्तम-प्रसाद-प्रकार ग्नार नाना ॥
१०९॥
कोई पैड़ ( नारियल का एक व्यंजन ), तो कोई लड्डु, तथा कोई पिष्टक ( पिठा) तथा खीर ले आया। यह प्रसाद तरह-तरह का था और बहुमूल्य था।
‘अमुकेइ दियाछे' गोविन्द करे निवेदन । ‘धरि' राख' बलि' प्रभु ना करेन भक्षण ॥
११०॥
गोविन्द प्रसाद को श्री चैतन्य महाप्रभु के सामने रखता और कहता, इसे अमुक भक्त ने दिया है। किन्तु महाप्रभु उसे वास्तव में खाते नहीं थे। वे केवल इतना ही कहते, इसे कमरे में रख दो।
धरिते धरिते घरेर भरिल एक कोण ।।शत-जनेर भक्ष्य ग्रत हैल सञ्चयन ॥
१११॥
गोविन्द इस खाद्य सामग्री को संचित करता रहा, अतः जल्दी ही कमरे का एक कोनी भर गया। यह सामग्री कम से कम एक सौ लोगों के भोजन के लिए पर्याप्त थी।
गोविन्देरे सबे पुछे करिया ग्रतन ।।‘आमा-दत्त प्रसाद प्रभुरे कि कराइला भक्षण? ॥
११२॥
सारे भक्त अत्यन्त उत्सुकता से गोविन्द से पूछते, क्या आपने मेरे द्वारा लाया हुआ प्रसाद श्री चैतन्य महाप्रभु को दिया? काहाँ किछु कहि' गोविन्द करे वञ्चन ।आर दिन प्रभुरे कहे निर्वेद-वचन ॥
११३ ॥
जब भक्तगण गोविन्द से पूछते, तो उसे उनसे झूठ बोलना पड़ता। इसलिए एक दिन उसने निराश होकर महाप्रभु से कहा।
आचार्मादि महाशय करिया ग्रतने ।तोमारे खाओयाइते वस्तु देन मोर स्थाने ॥
११४॥
अद्वैत आचार्य इत्यादि अनेक सम्माननीय भक्त आपके लिए तरहतरह का भोजन मुझे सौंपने के लिए बड़ा प्रयास करते हैं।
तुमि से ना खाओ, ताँरा पुछे बार बार ।कत वञ्चना करिमु, केमने आमार निस्तार? ॥
११५॥
आप उसे नहीं खाते हैं, किन्तु वे मुझसे बारम्बार पूछते रहते हैं। मैं कब तक उन्हें ठगता रहूँगा? मैं इस उत्तरदायित्व से कब छुटकारा पा सर्केगा? प्रभु कहे,–'आदि-वस्या' दुःख काँहे माने? ।केबा कि दियाछे, ताहा आनह एखाने ॥
११६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, तुम मूर्ख की तरह क्यों इतने दुःखी हो? उन लोगों ने तुम्हें जो दिया है, उसे मेरे पास ले आओ।
एत बलि' महाप्रभु वसिला भोजने । नाम धरि धरि' गोविन्द करे निवेदने ॥
११७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु खाने बैठ गये। तब गोविन्द उन्हें एक-एक करके मारे पकवान देने लगा और साथ ही देने वाले का नाम भी बताता गया।
आचार्येर एइ पैड़, पाना-सर-यूपी । एइ अमृत-गुटिका, मण्डा, कर्पूर-कूपी ॥
११८॥
पैड़, खीर, मलाई के बने रोट तथा अमृत गुटिका, मण्डा एवं कपूर जा पात्र-ये सारी वस्तुएँ अद्वैत आचार्य द्वारा दी गई हैं।
श्रीवास-पण्डितेर एइ अनेक प्रकार । पिठा, पाना, अमृत-मण्डा पद्म-चिनि आर ॥
११९॥
इसके बाद श्रीवास पण्डित द्वारा दी गई खाद्य सामग्रियाँ हैं-रोट, मलाई, अमृतमण्डा तथा पद्मचिनि।
आचार्यरत्नेर एइ सब उपहार । आचार्यनिधिर एइ, अनेक प्रकार ॥
१२०॥
ये सारे उपहार आचार्यरत्न के हैं और ये तरह-तरह के उपहार आचार्य निधि द्वारा दिये गये हैं।
वासुदेव-दत्तेर एई मुरारि-गुप्तेर आर ।। बुद्धिमन्त-खाँनेर एइ विविध प्रकार ॥
१२१॥
ये नाना प्रकार की खाद्य वस्तुएँ वासुदेव दत्त, मुरारि गुप्त तथा पुद्धिमन्त खान द्वारा दी गई हैं।
श्रीमान् सेन, श्रीमान् पण्डित, आचार्य-नन्दन ।ताँ-सबार दत्त एई करह भोजन ॥
१२२॥
ये उपहार श्रीमान सेन, श्रीमान पण्डित तथा आचार्य नन्दन द्वारा दिये गये हैं। कृपया इन सबों को खायें।
कुलीन-ग्रामेर एइ आगे देख व्रत ।खण्ड-वासी लोकेर एइ देख तत ॥
१२३॥
ये वस्तुएँ कुलीनग्राम के निवासियों द्वारा बनाई हुई हैं और इन वस्तुओं को खण्ड के निवासियों ने बनाई हैं।
ऐछे सबार नाम लञा प्रभुर आगे धरे ।।सन्तुष्ट हा प्रभु सब भोजन करे ॥
१२४॥
इस तरह गोविन्द ने महाप्रभु के सामने भोजन रखते हुए हर एक का नाम लिया। अत्यन्त सन्तुष्ट होकर महाप्रभु सारी वस्तुएँ खाने लगे।
यद्यपि मासेकेर वासि मुकुता नारिकेल ।। अमृत-गुटिकादि, पानादि सकल ॥
१२५ ॥
तथापि नूतन-प्राय सब द्रव्येर स्वाद ।‘वासि’ विस्वाद नहे सेइ प्रभुर प्रसाद ॥
१२६॥
मुकुता नारिकेल, अमृत गुटिका, अनेक प्रकार के मीठे पेय तथा अन्य पदार्थ कम से कम एक मास पहले के बने हुए थे। यद्यपि वे पुराने थे, किन्तु बेस्वाद या बासी नहीं हुए थे। निस्सन्देह, वे सभी ताजे बने रहे थे। यही श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा है।
शत-जनेर भक्ष्य प्रभु दण्डेके खाइला! ।। ‘आर किछु आछे?' बलि' गोविन्दे पुछिला ॥
१२७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अल्पकाल में ही सौ लोगों के लिए पर्याप्त भोजन खा लिया। तब उन्होंने गोविन्द से पूछा, क्या अब भी कोई चीज बची है? गोविन्द बले,–'राघवेर झालि मात्र आछे' ।प्रभु कहे,‘आजि रहु, ताहा देखिमु पाछे' ॥
१२८॥
गोविन्द ने उत्तर दिया, अब केवल राघव के थैले बचे हैं। महाप्रभु कहा, आज उन्हें रहने दो। मैं उन्हें बाद में देखेंगा।
आर दिन प्रभु यदि निभृते भोजन कैला ।।राघवेर झालि खुलि' सकल देखिला ॥
१२९॥
अगले दिन जब महाप्रभु एकान्त स्थान में भोजन कर रहे थे, तब ने राघव के थैले खोले और एक-एक करके उनके भीतर देखा।
सब द्रव्येर किछु किछु उपयोग कैला।।स्वादु, सुगन्धि देखि' बहु प्रशंसिला ॥
१३०॥
उन्होंने उनमें से हर वस्तु को थोड़ा-थोड़ा चखा और उनके स्वाद तथा गन्ध की प्रशंसा की।
वत्सरेक तरे आर राखिला धरिया ।भोजन-काले स्वरूप परिवेशे खसाझा ॥
१३१॥
फिर बचे विभिन्न प्रकार के प्रसाद को वर्ष भर खाने के लिए रख दिया गया। जब श्री चैतन्य महाप्रभु भोजन करते, तब स्वरूप दामोदर गोस्वामी इसे थोड़ा-थोड़ा करके परोसते।
कभु रात्रि-काले किछु करेन उपयोग ।।भक्तेर श्रद्धार द्रव्य अवश्य करेन उपभोग ॥
१३२॥
कभी-कभी महाप्रभु इसमें से कुछ भाग को रात में खाते। महाप्रभु अपने भक्तों द्वारा श्रद्धा तथा प्रेम से प्रस्तुत की गई वस्तुओं का निश्चय ही भोग करते हैं।
एइ-मत महाप्रभु भक्त-गण-सङ्गे ।चातुर्मास्य गोडाइला कृष्ण-कथा-रङ्गे ॥
१३३॥
इस तरह महाप्रभु ने अपने भक्तों के साथ कृष्ण कथा की चर्चा करते हुए चातुर्मास की सारी अवधि सुखपूर्वक बिताई।
मध्ये मध्ये आचादि करे निमन्त्रण । घरे भात रान्धे आर विविध व्यञ्जन ॥
१३४॥
समय-समय पर अद्वैत आचार्य तथा अन्य भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु को घर में पकाया चावल तथा नाना प्रकार की सब्जियाँ खाने के लिए निमन्त्रित करते रहते।
मरिचेर झाल, आर मधुराम्ल आर ।। आदा, लवण, लेम्बु, दुग्ध, दधि, खण्ड-सार ॥
१३५॥
शाक दुइ-चारि, आर सुकुतार झोल ।निम्ब-वार्ताकी, आर भृष्ट-पटोल ॥
१३६ ।। उन्होंने काली मिर्च से बनी तीखी वस्तुएँ, मीठे तथा खट्टे व्यंजन, अदरक, नमकीन, नींबू, दूध, दही, पनीर, दो-चार तरह की शाकसब्जियाँ, सुकुता से बना सूप, नीम के फूलों से मिश्रित बैंगन तथा तला हुआ पटोल खाने को दिया।
भृष्ट फुल-बड़ी, आर मुद्ग-डालि-सूप । विविध व्यञ्जन रान्धे प्रभुर रुचि-अनुरूप ॥
१३७॥
उन्होंने फुलबड़ी, मूंग की दाल तथा अनेक तरकारियाँ दीं, जो माप्रभु के स्वाद के अनुकूल पकाई गई थीं।
जगन्नाथेर प्रसाद आने करिते मिश्रित ।।काहाँ एका ग्रायेन, काहाँ गणेर सहित ॥
१३८॥
वे इन खाद्यान्नों के साथ जगन्नाथजी का प्रसाद मिला देते। जब श्री पैतन्य महाप्रभु निमन्त्रण स्वीकार करते, तो कभी वे अकेले जाते और कभी अपने संगियों के साथ जाते।
आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, नन्दन, राघव । श्रीवास-आदि ग्रत भक्त, विप्र सब ॥
१३९॥
आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, नन्दन आचार्य, राघव पण्डित तथा श्रीवास जैसे सारे के सारे भक्त ब्राह्मण जाति के थे।
एइ-मत निमन्त्रण करेन ग्रत्न करि ।। वासुदेव, गदाधर-दास, गुप्त-मुरारि ॥
१४०॥
कुलीन-ग्रामी, खण्ड-वासी, आर व्रत जन । जगन्नाथेर प्रसाद आनि' करे निमन्त्रण ॥
१४१॥
वे महाप्रभु को निमन्त्रण दिया करते। वासुदेव दत्त, गदाधर दास, मुरारि गुप्त, कुलीन ग्राम तथा खण्ड ग्राम के वासी एवं अन्य अनेक भक्त, जो ब्राह्मण जाति के नहीं थे, भगवान् जगन्नाथ को अर्पित भोजन खरीदी। करते और तब श्री चैतन्य महाप्रभु को निमन्त्रित किया करते।
शिवानन्द-सेनेर शुन निमन्त्रणाख्यान ।। शिवानन्देर बड़-पुत्रेर चैतन्य-दास' नाम ॥
१४२ ॥
अब शिवानन्द सेन द्वारा महाप्रभु को दिये गये निमन्त्रण के बारे में सुनें। उनके ज्येष्ठ पुत्र का नाम चैतन्य दास था।
प्रभुरे मिलाइते ताँरै सङ्गेइ आनिला ।। मिलाइले, प्रभु ताँर नाम त’ पुछिला ॥
१४३ ॥
जब शिवानन्द सेन अपने पुत्र चैतन्य दास को महाप्रभु से परिचय कराने के लिए लाये, तब महाप्रभु ने उनसे उनका नाम पूछा।
‘चैतन्य-दास' नाम शुनि' कहे गौर-राय ।। ‘किबा नाम थराजाछ, बुझन ना ग्राय' ॥
१४४॥
जब महाप्रभु ने सुना कि उसका नाम चैतन्य दास है, तो उन्होंने कहा, तुमने इसका कैसा नाम रखा है? इसे समझना बहुत कठिन है।
सेन कहे,—‘ग्ने जानिहुँ, सेइ नाम धरिल' ।। एत बलि' महाप्रभुरे निमन्त्रण कैल ॥
१४५ ॥
शिवानन्द सेन ने उत्तर दिया, उसका जो नाम रखा गया है, वह मेरे भीतर से उत्पन्न हुआ। तब उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु को भोजन के लिए निमन्त्रित किया।
जगन्नाथेर बहु-मूल्य प्रसाद आनाइला । भक्त-गणे लञा प्रभु भोजने वसिला ॥
१४६॥
शिवानन्द सेन भगवान् जगन्नाथ का बहुमूल्य प्रसाद खरीद लाये थे। उसे वे भीतर ले आये और श्री चैतन्य महाप्रभु को दिया, जो अपने संगियों सहित प्रसाद पाने के लिए बैठ गये।।
शिवानन्देर गौरवे प्रभु करिला भोजन ।। अति-गुरु-भोजने प्रभुर प्रसन्न नहे मन ॥
१४७॥
शिवानन्द सेन की महिमा के कारण श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनके आग्रह पर सभी प्रकार के प्रसाद को भोजन किया। किन्तु महाप्रभु आवश्यकता से अधिक खा गये, जिससे उनका मन असन्तुष्ट था।
आर दिन चैतन्य-दास कैला निमन्त्रण। प्रभुर 'अभीष्ट' बुझि' आनिला व्यञ्जन ॥
१४८ ॥
अगले दिन शिवानन्द सेन के पुत्र चैतन्य दास ने महाप्रभु को निमन्त्रणदिया। किन्तु वह महाप्रभु के मन को समझ चुके थे, इसलिए उन्होंने भिन्न प्रकार के भोजन की व्यवस्था की।
दधि, लेम्बु, आदा, आर फुल-बड़ा, लवण ।।सामग्री देखिया प्रभुर प्रसन्न हैल मन ॥
१४९॥
उन्होंने दही, नींबू, अदरक, मुलायम बड़े तथा नमक लाकर दिया। यह प्रबन्ध देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए।
प्रभु कहे, एइ बालक आमार मत जाने ।सन्तुष्ट ह-इलाँ आमि इहार निमन्त्रणे ॥
१५० ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, यह बालक मेरा मन जानता है। अतएव उसका निमन्त्रण स्वीकार करने से मैं अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ।
एत बलि' दधि-भात करिला भोजन । चैतन्य-दासेरे दिला उच्छिष्ट-भाजन ॥
१५१॥
यह कहकर महाप्रभु ने चावल और दही को मिला लिया और चैतन्य दास को अपने भोजन का शेष दिया।
चारि-मास एइ-मत निमन्त्रणे याय । कोन कोन वैष्णव 'दिवस' नाहि पाय ॥
१५२ ॥
इस तरह भक्तों के आमन्त्रण स्वीकार करते हुए चातुर्मास बीत गया। किन्तु निमन्त्रणों की बाढ़ के कारण कुछ वैष्णवों को खाली दिन न मिल सका, जब वे महाप्रभु को बुला सकते।
गदाधर-पण्डित, भट्टाचार्य सार्वभौम ।। इँहा सबार आछे भिक्षार दिवस-नियम ॥
१५३॥
गदाधर पण्डित तथा सार्वभौम भट्टाचार्य ने तो वे तिथियाँ तय कर दी थीं, जब प्रति मास श्री चैतन्य महाप्रभु उनका निमन्त्रण स्वीकार करते।।
गोपीनाथाचार्य, जगदानन्द, काशीश्वर । भगवान्, रामभद्राचार्य, शङ्कर, वक्रेश्वर ।। १५४॥
मध्ये मध्ये घर-भाते करे निमन्त्रण । अन्येर निमन्त्रणे प्रसादे कौड़ि दुइ-पण ॥
१५५ ॥
गोपीनाथ आचार्य, जगदानन्द, काशीश्वर, भगवान्, रामभद्राचार्य, शंकर तथा वक्रेश्वर-ये सभी ब्राह्मण थे, जिन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु को निमन्त्रण दिया और घर पर पकाया भोजन प्रदान किया, जबकि अन्य भक्त दो पण का जगन्नाथजी का प्रसाद खरीदकर महाप्रभु को निमन्त्रित करते।
प्रथमे आछिल 'निर्बन्ध' कौड़ि चारि-पण ।रामचन्द्र-पुरी-भये घाटाइला निमन्त्रण ॥
१५६॥
पहले जगन्नाथ प्रसाद का मूल्य चार पण कौड़ियाँ था, किन्तु जब रामचन्द्र पुरी वहाँ था, तब यह मूल्य कम करके आधा हो गया था।
चारि-मास रहि' गौड़ेर भक्ते विदाय दिला ।नीलाचलेर सङ्गी भक्त सङ्गेइ रहिला ॥
१५७॥
बंगाल से आये भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ चार महीनों तक | लगातार रहे और तब महाप्रभु ने उन्हें विदा दी। बंगाली भक्तों के चले जाने पर जो भक्त जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु के साथ रहने वाले थे, वे उनके साथ रहे।
एइ त कहिलें प्रभुर भिक्षा-निमन्त्रण ।भक्त-दत्त वस्तु ग्रैछे कैला आस्वादन ॥
१५८॥
इस तरह मैंने इसका वर्णन किया है कि महाप्रभु ने किस-किस तरह। अपने भक्तों के निमन्त्रण स्वीकार किये और उनके द्वारा अर्पित प्रसाद का आस्वादन किया।
तार मध्ये राघवेर झालि-विवरण ।तार मध्ये परि-मुण्डा-नृत्य-कथन ॥
१५९॥
उस कथा के बीच में राघव पण्डित के भोजन की थैलियों एवं जगन्नाथ मन्दिर में नृत्य का वर्णन आया है।
श्रद्धा करि' शुने ग्रेइ चैतन्येर कथा ।चैतन्य-चरणे प्रेम पाइबे सर्वथा ॥
१६० ॥
जो व्यक्ति श्रद्धा तथा प्रेमपूर्वक श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के विषय में सुनता है, वह निश्चय ही श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों के प्रति आनन्दमय प्रेम को प्राप्त करेगा।
शुनिते अमृत-सम जुड़ाय कर्ण-मन ।।सेइ भाग्यवान्, ग्रेड करे आस्वादन ॥
१६१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यकलापों की कथाएँ सुनने में अमृत-तुल्य हैं। वे कानों तथा मन दोनों को तुष्ट करने वाली हैं। जो भी इन कार्यकलापों के अमृत का आस्वादन करता है, वह निश्चय ही बड़ा भाग्यशाली है।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे झार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
१६२॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा उनकी कृपा की सदैव कामना करते हुए, उनके चरणचिह्नों पर चलकर में कृष्णदास श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
