अध्याय छह: श्री चैतन्य महाप्रभु और रघुनाथ दास गोस्वामी की मुलाकात
कृपा-गुणैर्यः कुगृहान्ध-कूपाद्उधृत्य भङ्ग्या रघुनाथ-दासम् ।न्यस्य स्वरूपे विदधेऽन्तरङ्गंश्री-कृष्ण-चैतन्यममुं प्रपद्ये ॥
१॥
कृष्ण-चैतन्यम्-भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु को; अमुम्-उनको; प्रपद्ये-मैं प्रणाम करता हूँ। श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु ने अपनी अहैतुकी कृपा रूपी रस्सी से रघुनाथदास गोस्वामी को घृणित पारिवारिक जीवन रूपी अन्धे कुएँ से उद्धार करने के लिए युक्ति का प्रयोग किया। उन्होंने रघुनाथ दास गोस्वामी को स्वरूप दामोदर गोस्वामी के संरक्षण में रखकर अपना निजी संगी बनाया। मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ।"
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द । जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत आचार्य की जय हो! और श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो!" एइ-मत गौरचन्द्र भक्त-गण-सङ्गे।। नीलाचले नाना लीला करे नाना-रङ्गे ॥
३॥
इस तरह भगवान् गौरचन्द्र ने अपने संगियों के साथ जगन्नाथपुरी में नाना प्रकार की दिव्य आनन्ददायिनी लीलाएँ सम्पन्न कीं।"
ग्रद्यपि अन्तरे कृष्ण-वियोग बाधये ।।बाहिरे ना प्रकाशय भक्त-दुःख-भये ॥
४॥
। यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु को कृष्ण के विछोह की पीड़ा होती थी, किन्तु वे अपनी भावनाओं को बाह्य रूप से प्रकट नहीं करते थे, क्योंकि उन्हें भय था कि भक्तगण दुःखी होंगे।"
उत्कट विरह-दुःख ग्रबे बाहिराय ।तबे ग्रे वैकल्य प्रभुर वर्णन ना ग्राय ॥
५॥
जब कृष्ण के विछोह से उत्पन्न गहन दुःख को महाप्रभु प्रकट करते, तो उनमें जो विकार आते, उनका वर्णन नहीं किया जा सकता।"
रामानन्देर कृष्ण-कथा, स्वरूपेर गान ।विरह-वेदनाय प्रभुर राखये पराण ॥
६॥
। जब महाप्रभु को कृष्ण के विछोह की तीव्र पीड़ा का अनुभव होता, तब एकमात्र श्री रामानन्द राय द्वारा कही गई कृष्ण कथा तथा स्वरूप दामोदर के मधुर गीत उन्हें जीवित रखते।"
दिने प्रभु नाना-सङ्गे हय अन्य मन ।।रात्रि-काले बाड़े प्रभुर विरह-वेदन ॥
७॥
दिन के समय विविध भक्तों की संगति होने से महाप्रभु का मन कुछ दूसरी ओर लगा रहता, किन्तु रात में कृष्ण-विरह की पीड़ा तेजी से बढ़ जाती।"
ताँर सुख-हेतु सङ्गे रहे दुइ जना ।।कृष्ण-रस-श्लोक-गीते करेन सान्त्वना ॥
८॥
दो व्यक्ति रामानन्द राय तथा स्वरूप दामोदर गोस्वामी महाप्रभु के साथ रहते, जो उनकी तुष्टि हेतु कृष्णलीला विषयक विविध श्लोक सुनाकर तथा उपयुक्त गीत गाकर उनको शान्त रखते।"
सुबल ट्रैछे पूर्वे कृष्ण-सुखेर सहाय ।गौर-सुख-दान-हेतु तैछे राम-राय ॥
९॥
पूर्वकाल में जब भगवान् कृष्ण स्वयं उपस्थित थे, तब उनका एक ग्वाल मित्र सुबल उन्हें तब सुख देता, जब वे राधारानी का विरह अनुभव करते। उसी तरह रामानन्द राय श्री चैतन्य महाप्रभु को सुख देने में सहायक बनते।"
पूर्वे ट्रैछे राधार ललिता सहाय-प्रधान ।।तैछे स्वरूप-गोसाञि राखे महाप्रभुर प्राण ॥
१०॥
पूर्वकाल में जब श्रीमती राधारानी कृष्ण-वियोग की पीड़ा का अनुभव करतीं, तब उनकी नित्य सखी ललिता अनेक प्रकार से सहायता करके उन्हें जीवित रखतीं। उसी तरह जब श्री चैतन्य महाप्रभु को राधारानी के भाव आते, तब स्वरूप दामोदर गोस्वामी उनका जीवन बनाये रखने में उनकी सहायता करते।।"
एइ दुइ जनार सौभाग्य कहन ना ग्राय ।। प्रभुर 'अन्तरङ्ग' बलि' याँरे लोके गाय ॥
११॥
रामानन्द राय तथा स्वरूप दामोदर गोस्वामी के सौभाग्य का वर्णन कर पाना अत्यन्त कठिन है। वे श्री चैतन्य महाप्रभु के घनिष्ठ विश्वसनीय मित्रों के रूप में विख्यात थे।"
एइ-मत विहरे गौर लञा भक्त-गण ।।रघुनाथ-मिलन एबे शुन, भक्त-गण ॥
१२॥
इस तरह महाप्रभु अपने भक्तों के साथ जीवन का आनन्द लेते थे। हे श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों, अब सुनो कि रघुनाथ दास गोस्वामी किस तरह महाप्रभु से मिले।"
पूर्वे शान्तिपुरे रघुनाथ ग्रबे आइला । महाप्रभु कृपा करि' तौरै शिखाइला ॥
१३॥
जब गृहस्थ जीवन के समय रघुनाथ दास श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने शान्तिपुर गये, तब महाप्रभु ने अपनी अहैतुकी कृपावश उन्हें योग्य शिक्षाएँ दीं।"
प्रभुर शिक्षाते तेंहो निज-घरे ग्राय ।। मर्कट-वैराग्य छाड़ि' हैला 'विषयि-प्राय' ॥
१४॥
तथाकथित वैरागी बनने के स्थान पर रघुनाथ दास महाप्रभु के उपदेशों का अनुसरण करते हुए अपने घर लौटे और विषयी-व्यक्ति की तरह कार्य करने लगे।"
भितरे वैराग्य, बाहिरे करे सर्व-कर्म । देखिया त' माता-पितार आनन्दित मन ॥
१५॥
रघुनाथ दास अपने गृहस्थ जीवन से भी भीतर से पूरी तरह विरक्त थे, किन्तु उन्होंने अपने वैराग्य को बाहर प्रकट नहीं किया। उल्टे वे सामान्य व्यापारी की तरह कार्य करते रहे। यह देखकर उनके माता-पिता सन्तुष्ट थे।"
'मथुरा हैते प्रभु आइला', वाती अबे पाइलाप्रभु-पाश चलिबारे उद्योग करिला ॥
१६॥
जब उन्हें यह सन्देश मिला कि श्री चैतन्य महाप्रभु मथुरापुरी से लौट आये हैं, तो रघुनाथ दास ने महाप्रभु के चरणों तक जाने का प्रयास किया।"
हेन-काले मुलुकेर एक म्लेच्छ अधिकारी ।सप्तग्राम-मुलुकेर से हय चौधुरी' ॥
१७॥
उस समय एक मुसलमान अधिकारी सप्तग्राम से कर वसूलता था।"
हिरण्य-दास मुलुक निल 'मक्ररि' करिया । तार अधिकार गेल, मरे से देखियो । १८॥
जब रघुनाथ दास के ताऊ हिरण्य दास ने कर वसूलने के लिए सरकार से समझौता किया, तो मुसलमान चौधुरी या कर संग्राहक अपना पद खोने के कारण उससे अत्यधिक ईष्र्या करने लगा।"
बार लक्ष देय राजाय, साधे बिश लक्ष । से 'तुरुक्' किछु नी पाञआ हैल प्रतिपक्ष ॥
१९॥
हिरण्यदास बीस लाख रुपये एकत्र करते थे, अतएव उन्हें सरकार को पन्द्रह लाख रूपये देने चाहिए थे। किन्तु वे केवल बारह लाख रुपये देते थे और इस तरह तीन लाख रुपये अधिक लाभ उठाते थे। यह देखकर मुसलमान चौधुरी जो कि तुर्क था उनका प्रतिद्वन्द्वी बन गया।"
राज-घरे कैफियत् दिया उजीरे आनिल ।हिरण्य-दास पलाइल, रघुनाथेरे बान्धिल ॥
२०॥
सरकारी खजाने को गुप्त हिसाब भेजकर चौधुरी कार्यकारी मन्त्री को ले आया। हिरण्यदास को पकड़ने के उद्देश्य से चौधुरी आया, किन्तु वे घर छोड़ चुके थे। अतएव चौधुरी ने रघुनाथ दास को बन्दी बना लिया।"
प्रति-दिन रघुनाथे करये भर्त्सना ।।‘बाप-ज्येठारे आन', नहे पाइबा ग्रातना ॥
२१॥
प्रतिदिन वह मुसलमान रघुनाथ दास की भर्त्सना करता और उनसे कहता, अपने पिता तथा उसके बड़े भाई ( ताऊ) को ले आओ, अन्यथा तुम्हें दण्ड दिया जायेगा।"
मारिते आनये यदि देखे रघुनाथे । मन फिरि' ग्राय, तबे ना पारे मारिते ॥
२२॥
चौधुरी उन्हें पीटना चाहता था, किन्तु जब वह रघुनाथ के मुख की ओर देखता, तो उसका मन बदल जाता और वह उन्हें पीट नहीं पाता था।"
विशेषे कायस्थ-बुद्ध्ये अन्तरे करे डर ।। मुखे तर्जे गर्जे, मारिते समय अन्तर ॥
२३ ॥
निस्सन्देह, वह चौधुरी रघुनाथ दास से भयभीत था, क्योंकि रघुनाथ दास कायस्थ जाति के थे। यद्यपि चौधुरी उसे मुख से डाँटता-डपटता था, किन्तु उन्हें पीटने से डरता था।"
तबे रघुनाथ किछु चिन्तिला उपाय ।विनति करिया कहे सेइ म्लेच्छ पाय ॥
२४॥
जब यह हो रहा था, तो रघुनाथ दास ने इसका समाधान निकालने की एक युक्ति सोची। अतः उन्होंने मुसलमान चौधरी के चरणों पर यह अनुनय किया।"
आमार पिता, ज्येठा हय तोमार दुइ भाई ।भाइ–भाइये तोमरा कलह कर सर्वदाइ ॥
२५ ॥
हे महोदय, मेरे पिता तथा उनके बड़े भाई ( ताऊ) दोनों ही आपके भाई हुए। सारे भाई किसी न किसी बात के लिए सदैव झगड़ते आये हैं।"
कभु कलह, कभु प्रीतिइहार निश्चय नाई ।।कालि पुनः तिन भाइ हइबा एक-ठाञि ॥
२६॥
“कभी भाई-भाई परस्पर लड़ते हैं, तो कभी मैत्रीपूर्ण व्यवहार करते हैं। इसका कोई निश्चय नहीं कि ऐसे बदलाव कब आ जाए। इस तरह मुझे पूरा विश्वास है कि आज आप लड़ रहे हैं, किन्तु कल आप तीनों भाई शान्ति से एक स्थान पर बैठे होंगे।"
आमि त्रैछे पितार, तैछे तोमार बालक ।आमि तोमार पाल्य, तुमि आमार पालक ॥
२७॥
जिस तरह मैं अपने पिता का पुत्र हूँ, उसी तरह आपका भी हूँ। मैं । आपके आश्रित हूँ और आप मेरे पालनकर्ता हैं।"
पालक हा पाल्येरे ताड़िते ना मुयाय ।। तुमि सर्व-शास्त्र जान 'जिन्दा-पीर'-प्राय’ ॥
२८॥
‘पालनकर्ता के लिए शोभा नहीं देता कि अपने द्वारा पाले जाने वाले व्यक्ति को दण्ड दे। आप सभी शास्त्रों में निपुण हैं। निस्सन्देह, आप एक जीवन्त सन्त के समान हैं।"
एत शुनि' सेइ म्लेच्छेर मन आई हैल । दाड़ि वाहि' अश्रु पड़े, काँदिते लागिल ॥
२९॥
रघुनाथ दास की याचनापूर्ण वाणी सुनकर उस मुसलमान का हृदय पिघल गया। वह रोने लगा और उसके आँसू उसकी दाढ़ी से लुढ़क पड़े।"
म्लेच्छ बले, आजि हैते तुमि–मोर 'पुत्र' ।।आजि छाड़ाइमु तोमा' करि' एक सूत्र ॥
३०॥
मुसलमान चौधरी ने रघुनाथ दास से कहा, “आज से तुम मेरे पुत्र हुए। मैं आज तुम्हें किसी न किसी तरह छुड़ाकर रहूँगा।"
उजिरे कहिया रघुनाथे छाड़ाइल ।। प्रीति करि' रघुनाथे कहिते लागिल ॥
३१॥
मन्त्री को सूचित करके चौधुरी ने रघुनाथ दास को छोड़ दिया और तब उनसे अत्यन्त स्नेहपूर्वक कहने लगा।"
तोमार ज्येठा निर्बुद्धि अष्ट-लक्ष खाय ।। आमि-भाग, आमारे किछु दिबारे युयाय ॥
३२॥
। उसने कहा, “तुम्हारे पिता का बड़ा भाई ( तुम्हारा ताऊ) कम बुद्धि वाला है। वह आठ लाख रुपयों का भोग करता है, किन्तु क्योंकि मैं उसका भागीदार हूँ, अतएव उसे उसका कुछ हिस्सा मुझे भी देना चाहिए।"
ग्राह तुमि, तोमार ज्येठारे मिलाह आमारे । ग्रे-मते भाल हय करुन, भार दिलँ ताँरे ॥
३३॥
। “अब तुम जाकर मेरे तथा अपने ताऊ के बीच भेंट कराओ। वह जो भला समझता हो वही करे। मैं पूरी तरह उसके निर्णय पर आश्रित रहूँगा।"
रघुनाथ आसि' तबे ज्येठारे मिलाइल । म्लेच्छ-सहित वश कैल सब शान्त हैल ॥
३४॥
रघुनाथ दास ने अपने ताऊ तथा चौधरी की भेंट का प्रबन्ध किया। उन्होंने कलह का समाधान कर दिया और सब शान्त हो गया।"
एइ-मत रघुनाथेर वत्सरेक गेल ।। द्वितीय वत्सरे पलाइते मन कैल ॥
३५॥
इस तरह रघुनाथ दास ने पूरा एक वर्ष अच्छे व्यापारी प्रबन्धक के रूप में बिताया, किन्तु अगले वर्ष उन्होंने पुनः घर छोड़ने का निश्चय किया।"
रात्रे उठि' एकेला चलिला पलाजा ।।दूर हैते पिता तारे आनिल धरिया ॥
३६॥
एक रात वे अकेले उठे और चल पड़े, किन्तु उनके पिता ने दूर स्थान पर उन्हें पकड़ लिया और वे उन्हें लौटा ले आये।"
एइ-मते बारे बारे पलाय, धरि आने ।तबे ताँर माता कहे ताँर पिता सने ॥
३७॥
यह प्रायः प्रतिदिन का व्यापार बन गया था। रघुनाथ घर से भाग जाते और उनके पिता उन्हें फिर लौटा ले आते। तब रघुनाथ दास की माता ने उनके पिता (अपने पति ) से कहा।"
पुत्र ‘बातुल' हइल, इहाय राखह बान्धिया’ ।। ताँर पिता कहे तारे निर्विण हा ॥
३८॥
माताने कहा, 'हमारा पुत्र पागल हो गया है। उसे रस्सी से बाँधकर रखो।' उनके पिता अत्यन्त दुःखी होकर अपनी पत्नी से बोले।"
इन्द्र-सम ऐश्वर्य, स्त्री अप्सरा-सम ।। ए सब बान्धिते नारिलेक ग्राँर मन ॥
३९॥
“हमारे पुत्र रघुनाथ दास के पास स्वर्ग के राजा इन्द्र के जैसा ऐश्वर्य है और उसकी पत्नी अप्सरा जैसी सुन्दर है। फिर भी यह सब उसके मन को बाँध नहीं सका।"
दड़िर बन्धने ताँरे राखिबा के-मते ? । जन्म-दाता पिता नारे 'प्रारब्ध' खण्डाइते ॥
४० ॥
“तो फिर हम इस बालक को रस्सियों से बाँधकर घर पर कैसे रख सकते हैं? किसी के पिता के लिए भी यह सम्भव नहीं है कि किसी के विगत कर्मों के फल को निरस्त कर दे।"
चैतन्य-चन्द्रेर कृपा हाछे इँहारे ।चैतन्य-चन्द्रेर ‘बातुल' के राखिते पारे? ॥
४१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस पर पूर्ण कृपा की है। चैतन्यचन्द्र के पागल को घर पर कौन रख सकता है? तबे रघुनाथ किछु विचारिलो मने ।।नित्यानन्द-गोसाजिर पाश चलिला आर दिने ॥
४२॥
तब रघुनाथ दास ने अपने मन में कुछ विचार किया और अगले दिन वे नित्यानन्द गोसांई के पास गये।।"
पानिहाटि-ग्रामे पाइला प्रभुर दरशन । कीर्तनीया सेवक सङ्गे आर बहु-जन ॥
४३॥
पानिहाटि गाँव में रघुनाथ दास की भेंट नित्यानन्द प्रभु से हुई, जिनके साथ अनेक कीर्तन करने वाले, सेवक तथा अन्य लोग थे।"
गङ्गा-तीरे वृक्ष-मूले पिण्डार उपरे ।। वसियाछेन–ग्रेन कोटी सूर्योदय करे ॥
४४॥
गंगानदी के तट पर एक वृक्ष के नीचे एक शिला पर बैठे हुए नित्यानन्द प्रभु करोड़ों उदय होते सूर्यों के समान तेज युक्त प्रतीत हो रहे थे।"
तले उपरे बहु-भक्त हाछे वेष्टित । देखि' प्रभुर प्रभाव रघुनाथ विस्मित ॥
४५ ॥
उन्हें घेरकर भूमि पर अनेक भक्त बैठे हुए थे। नित्यानन्द प्रभु के प्रभाव को देखकर रघुनाथ दास आश्चर्यचकित हो गये।"
दण्डवत् हा सेई पड़िला कत-दूरे ।।सेवक कहे,–'रघुनाथ दण्डवत् करे' ॥
४६॥
रघुनाथ दास ने दूर स्थान पर ही दण्ड की तरह गिरकर नमस्कार किया और नित्यानन्द प्रभु के सेवक ने इंगित किया, ‘रघुनाथ दास आपको नमस्कार कर रहा है।"
शुनि' प्रभु कहे,’चोरा दिलि दरशन ।।आय, आय, आजि तोर करिमु दण्डन’ ॥
४७॥
यह सुनकर नित्यानन्द प्रभु ने कहा, ‘तुम चोर हो। अब तुम मुझे मिलने आये हो। यहाँ आओ, यहाँ आओ। आज मैं तुम्हें दण्ड दूंगा! प्रभु बोलाय, तेहो निकटे ना करे गमन । आकर्षिया ताँर माथे प्रभु धरिला चरण ॥
४८॥
प्रभु ने उन्हें बुलाया, किन्तु रघुनाथ दास उनके निकट नहीं गये। तब प्रभु ने उन्हें बलपूर्वक पकड़ लिया और उनके सिर पर अपना चरणकमल रख दिया।"
कौतुकी नित्यानन्द सहजे दयामय ।। रघुनाथे कहे किछु ही सदय ॥
४९॥
नित्यानन्द प्रभु स्वभाव से अत्यन्त दयालु तथा विनोदी थे। दयालु होने के कारण वे रघुनाथ दास से इस प्रकार बोले।"
निकटे ना आइस, चोरा, भाग' दूरे दूरे ।। आजि लाग्पाञाछि, दण्डिमु तोमारे ॥
५०॥
तुम चोर की भाँति हो, क्योंकि पास आने के बदले तुम दूर रहते हो। अब चूँकि मैंने तुम्हें पकड़ लिया है, इसलिए तुम्हें दण्ड दूंगा।"
दधि, चिड़ा भक्षण कराह मोर गणे’ ।। शुनि' आनन्दित हैल रघुनाथ मने ॥
५१॥
तुम उत्सव मनाओ और मेरे सभी संगियों को दही तथा चिउड़ा खिलाओ।‘ यह सुनकर रघुनाथ दास अत्यधिक प्रसन्न हुए।"
सेइ-क्षणे निज-लोक पाठाइला ग्रामे ।। भक्ष्य-द्रव्य लोक सब ग्राम हैते आने ॥
५२॥
रघुनाथ दास ने तुरन्त ही अपने आदमियों को समस्त प्रकार की खाद्य वस्तुएँ खरीदकर लाने के लिए गाँव में भेजा।"
चिड़ा, दधि, दुग्ध, सन्देश, आर चिनि, कला ।सबै द्रव्य आनाजा चौदिके धरिला ॥
५३॥
रघुनाथ दास चिउड़ा, दही, दूध, मिठाइयाँ, चीनी, केले तथा अन्य खाद्य सामग्रियाँ ले आये और उन्हें चारों ओर रख दिया।"
‘महोत्सव'-नाम शुनि' ब्राह्मण-सज्जन ।आसिते लागिल लोक असङ्ख्य-गणन ॥
५४॥
ज्योंही लोगों ने सुना कि उत्सव होने जा रहा है, त्योंही सभी प्रकार के ब्राह्मण तथा अन्य सज्जन पधारने लगे। इस तरह से असंख्य लोग इकडे हो गये।"
आर ग्रामान्तर हैते सामग्री आनिल ।।शत दुइ-चारि होल्ना ताँहा आनाइल ॥
५५॥
भीड़ बढ़ती देखकर रघुनाथ दास ने अन्य गाँवों से और खाद्य पदार्थ मँगाने का प्रबन्ध किया। वे दो-चार सौ बड़े गोल मिट्टी के घड़े भी ले आये।"
बड़ बड़ मृत्कुण्डिका आनाइल पाँच साते ।एक विप्र प्रभु लागि' चिड़ा भिजाय ताते ॥
५६॥
उन्होंने पाँच-सात बड़े-बड़े मिट्टी के पात्र भी मंगवाये और एक ब्राह्मण इन पात्रों में नित्यानन्द प्रभु की तुष्टि हेतु चिउड़ा भिगोने लगा।"
एक-ठाजि तप्त-दुग्धे चिड़ा भिजाजा ।।अर्धेक छानिल दधि, चिनि, कला दिया ॥
५७॥
एक स्थान पर इन बड़े पात्रों में गर्म दूध में चिउड़ा भिगोया गया। तब आधा चिउड़ा दही, चीनी तथा केलों के साथ मिलाया गया।"
आर अर्धेक घनावृत-दुग्धेते छानिल ।। चाँपा-कला, चिनि, घृत, कर्पूर ताते दिल ॥
५८॥
आधे भाग को गाढ़े दूध में तथा विशेष प्रकार के केले में, जो चाँपाकला कहलाता है, मिलाया गया। तब चीनी, घी तथा कपूर डाला गया।"
धुति परि' प्रभु यदि पिण्डाते वसिला । सात-कुण्डी विप्र ताँर आगेते धरिला ॥
५९॥
जब नित्यानन्द प्रभु अपनी वस्त्र बदल चुके और चबूतरे पर बैठ गये, तब वह ब्राह्मण उनके सामने सात बड़े-बड़े पात्र ले आया।"
चबुतरा-उपरे ग्रत प्रभुर निज-गणे ।। बड़ बड़ लोक वसिला मण्डली-रचने ॥
६० ॥
इस चबूतरे पर श्री नित्यानन्द प्रभु के सभी सर्वाधिक प्रमुख संगी तथा साथ ही अन्य बड़े लोग उनके चारों ओर एक गोलाकार में बैठ गये।"
रामदास, सुन्दरानन्द, दास-गदाधर ।मुरारि, कमलाकर, सदाशिव, पुरन्दर ॥
६१॥
इनमें रामदास, सुन्दरानन्द, गदाधर दास, मुरारि, कमलाकर, सदाशिव तथा पुरन्दर सम्मिलित थे।"
धनञ्जय, जगदीश, परमेश्वर-दास ।महेश, गौरीदास, होड़-कृष्णदास ॥
६२॥
धनंजय, जगदीश, परमेश्वर दास, महेश, गौरीदास तथा होड़ कृष्णदास भी उसमें थे।"
उद्धारण दत्त आदि ग्रत निज-गण ।उपरे वसिला सब, के करे गणन? ॥
६३॥
इसी तरह उद्धारण दत्त ठाकुर तथा नित्यानन्द प्रभु के अन्य निजी संगी उनके साथ उस चबूतरे के ऊपर बैठे। उन सब की गणना कोई नहीं कर सकता था।"
शुनि' पण्डित भट्टाचार्य व्रत विप्र आइला ।मान्य करि' प्रभु सबारे उपरे वसाइला ॥
६४॥
उत्सव के विषय में सुनकर सभी प्रकार के विद्वान, ब्राह्मण तथा पुरोहित वहाँ आये। भगवान् नित्यानन्द ने उन सबका सम्मान किया और अपने साथ चबूतरे पर बैठाया।"
दुइ दुइ मृत्कुण्डिका सबार आगे दिल । एके दुग्ध-चिड़ा, आरे दधि-चिड़ा कैल ॥
६५॥
हर एक को दो दो मिट्टी के पात्र दिये गये। एक में चिउड़ा के साथ गाढ़ा दूध रखा था और दूसरे में दही के साथ चिउड़ा था।"
आर व्रत लोक सब चौतरा-तलाने ।। मण्डली-बन्धे वसिला, तार ना हय गणने ॥
६६॥
अन्य सारे लोग चबूतरे के चारों ओर मण्डली बनाकर बैठे। कोई यह नहीं गिन सका कि कुल कितने लोग थे।"
एकेक जनारे दुइ दुइ होल्ना दिल ।। दधि-चिड़ा दुग्ध-चिड़ा, दुइते भिजाइल ॥
६७॥
हर एक को दो दो मिट्टी के पात्र दिये गये-एक में दही में भिगोया चिउड़ा था और दूसरे में गाढ़े दूध में भिगोया चिउड़ा था।"
कोन कोन विप्र उपरे स्थान ना पाञी । दुइ होल्नाय चिड़ा भिजाय गङ्गा-तीरे गिया ॥
६८ ॥
कुछ ब्राह्मण जिन्हें चबूतरे पर स्थान नहीं मिल पाया, अपने दो-दो मिट्टी के पात्र लेकर गंगा के किनारे चले गये और वहीं अपना चिउड़ा भिगोया।"
तीरे स्थान ना पाञा आर कत जन ।। जले नामि' दधि-चिड़ा करये भक्षण ॥
६९॥
अन्य लोग जिन्हें गंगा के किनारे भी स्थान नहीं मिल सका, वे जल में प्रवेश कर गये और वहीं दोनों प्रकार का चिउड़ा खाने लगे।"
केह उपरे, केह तले, केह गङ्गा-तीरे ।बिश-जन तिन-ठाञि परिवेशन करे ॥
७० ॥
इस तरह कुछ तो चबूतरे के ऊपर बैठे, कुछ चबूतरे के नीचे और कुछ गंगा के किनारे बैठे और उन सबको भोजन बाँटने वाले बीस व्यक्तियों द्वारा दो-दो पात्र दिये गये।"
हेन-काले आइला तथा राघव पण्डित ।।हासिते लागिला देखि' हा विस्मित ॥
७१॥
उसी समय राघव पण्डित वहाँ आ गये। वह स्थिति को देखकर अत्यन्त आश्चर्य से हँसने लगे।"
नि-सक्ड़ि नाना-मत प्रसाद आनिल ।।प्रभुरे आगे दिया भक्त-गणे बाँटि दिल ॥
७२॥
वे अपने साथ घी में पकाये हुए अनेक प्रकार के पकवान लाए थे, जिन्हें उन्होंने नित्यानन्द प्रभु को भेंट किया। यह प्रसाद पहले नित्यानन्द प्रभु के समक्ष रखा गया और तब भक्तों में वितरित कर दिया गया।"
प्रभुरे कहे,–तोमा लागि' भोग लागाइल । तुमि इहाँ उत्सव कर, घरे प्रसाद रहिल’ ॥
७३॥
राघव पण्डित ने नित्यानन्द प्रभु से कहा, “हे महोदय, मैं आपके लिए पहले ही भोजन अर्चाविग्रह को अर्पित कर चुका हूँ, किन्तु आप यहाँ उत्सव में लगे हैं, इसलिए भोजन अछूता पड़ा है।"
प्रभु कहे,–ए-द्रव्य दिने करिये भोजन । राये तोमार घरे प्रसाद करिमु भक्षण ॥
७४॥
नित्यानन्द प्रभु ने उत्तर दिया, दिन में मुझे यह सारा भोजन खाने दो और रात में मैं तुम्हारे घर पर भोजन करूंगा।"
गोप-जाति आणि बहु गोप-गण सङ्गे।।आमि सुख पाइ एई पुलिन-भोजन-रङ्गे’ ॥
७५ ॥
। ‘मैं ग्वालों की जाति का हूँ, इसलिए सामान्यतया मेरे साथ अनेक ग्वाल संगी रहते हैं। जब हम नदी के रेतीले तट पर इस तरह के वन्यभोजन में एकसाथ खाते हैं, तो मैं प्रसन्न होता हूँ।"
राघवे वसा दुइ कुण्डी देओयाइला ।। राघव द्विविध चिड़ा ताते भिजाइला ॥
७६ ॥
नित्यानन्द प्रभु ने राघव पण्डित को बैठाया और उन्हें भी दो पात्र दिलाए। इनमें दो प्रकार के चिउड़े भिगोये हुए थे।"
सकल-लोकेर चिड़ा पूर्ण ग्रबे हइल । ध्याने तबे प्रभु महाप्रभुरे आनिल ॥
७७॥
जब हर एक को चिउड़ा परोसा जा चुका, तो नित्यानन्द प्रभु ध्यान में श्री चैतन्य महाप्रभु को ले आये।।"
महाप्रभु आइला देखि निताइ उठिला ।। ताँरे ला सबार चिड़ा देखिते लागिला ॥
७८॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु आये, तो नित्यानन्द प्रभु उठ खड़े हुए। तब उन्होंने देखा कि किस तरह अन्य लोग दही तथा घनीभूत दूध के साथ चिउड़ा का आनन्द ले रहे हैं।"
सकल कुण्डीर, होल्नार चिड़ार एक एक ग्रास ।। महाप्रभुर मुखे देन करि' परिहास ॥
७९॥
श्री नित्यानन्द प्रभु ने प्रत्येक पात्र से चिउड़े का एक ग्रास लिया और उसे परिहास वश श्री चैतन्य महाप्रभु के मुँह में ढूंस दिया।"
हासि' महाप्रभु आर एक ग्रास लञा ।।ताँर मुखे दिया खाओयाय हासिया हासिया ॥
८०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी हँसते-हँसते भोजन का एक कौर लिया, उसे नित्यानन्द प्रभु के मुँह में डाल दिया और नित्यानन्द को खिलाते समय हँसने लगे।"
कि करिया बेड़ाय,—इहा केह नाहि जाने ।।महाप्रभुर दर्शन पाय कोन भाग्यवाने ॥
८२॥
जब नित्यानन्द प्रभु घूम रहे थे, तब वे क्या कर रहे थे यह कोई नहीं समझ सका। किन्तु कुछ लोग जो बड़े भाग्यशाली थे, यह देख सके कि श्री चैतन्य महाप्रभु भी वहाँ उपस्थित थे।"
एइ-मत निताइ बुले सकल मण्डले ।दाण्डाजा रङ्ग देखे वैष्णव सकले ॥
८१॥
इस तरह नित्यानन्द प्रभु भोजन करने वालों की सभी मंडलियों में से होकर घूम रहे थे और वहाँ पर खड़े सारे वैष्णव यह कौतुक देख रहे थे।"
तबे हासि' नित्यानन्द वसिला आसने ।चारि कुण्डी आरोया चिड़ा राखिला डाहिने ॥
८३॥
। तब नित्यानन्द प्रभु हँसे और बैठ गये। उन्होंने अपने दाहिनी ओर चार पात्र रखे जिनका चिउड़ा उबले चावल से नहीं बनाया गया था।"
आसन दिया महाप्रभुरे ताहाँ वसाइला ।दुइ भाइ तबे चिड़ा खाइते लागिला ॥
८४॥
। नित्यानन्द प्रभु ने श्री चैतन्य महाप्रभु को स्थान दिया और उन्हें बैठाया। तब दोनों भाई एकसाथ चिउड़ा खाने लगे।"
देखि' नित्यानन्द-प्रभु आनन्दित हैला ।कत कत भावावेश प्रकाश करिला ॥
८५ ॥
अपने साथ चैतन्य महाप्रभु को खाते देखकर नित्यानन्द प्रभु अत्यधिक प्रसन्न हुए और उन्होंने नाना प्रकार के भावावेश प्रदर्शित किये।"
आज्ञा दिला,‘हरि बलि' करह भोजन' ।।‘हरि' ‘हरि'-ध्वनि उठि' भरिल भुवन ॥
८६॥
श्री नित्यानन्द प्रभु ने आज्ञा दी, सभी लोग हरिनाम का कीर्तन करते हुए भोजन करें।‘ ‘हरि, हरि’ की ध्वनि की गूंज से तुरन्त ही सारा ब्रह्माण्ड भर गया।"
‘हरि' ‘हरि' बलि' वैष्णव करये भोजन ।पुलिन-भोजन सबार हइल स्मरण ॥
८७॥
जब सारे वैष्णव हरि, हरि बोलकर भोजन कर रहे थे, तो उन्हें स्मरण हो आया कि किस तरह कृष्ण तथा बलराम अपने ग्वालबाल । साथियों के साथ यमुना के तट पर भोजन करते थे।"
नित्यानन्द महाप्रभु कृपालु, उदार ।।रघुनाथेर भाग्ये एत कैला अङ्गीकार ॥
८८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु अत्यन्त दयालु तथा उदार हैं। यह तो रघुनाथदास का सौभाग्य था कि उन्होंने ये सब व्यवहार स्वीकार कर लिए।"
नित्यानन्द-प्रभाव-कृपा जानिबे को जन? ।महाप्रभु आनि' कराय पुलिन-भोजन ॥
८९॥
नित्यानन्द प्रभु के प्रभाव तथा कृपा को कौन समझ सकता है? वे इतने शक्तिशाली हैं कि उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु को गंगा तट पर चिउड़ा खाने आने के लिए प्रेरित किया।"
श्री रामदासादि गोप प्रेमाविष्ट हैला ।गङ्गा-तीरे ‘यमुना-पुलिन' ज्ञान कैला ॥
९०॥
श्री रामदास इत्यादि जितने ग्वालबाल अन्तरंग भक्त थे, वे प्रेमावेश में डूब गये। वे गंगा के तट को यमुना का तट समझ बैठे।"
महोत्सव शुनि' पसारि नाना-ग्राम हैते ।।चिड़ा, दधि, सन्देश, कला आनिल वेचिते ॥
९१॥
जब अनेक अन्य गाँव के दुकानदारों ने महोत्सव के बारे में सुना, तो वे चिउड़ा, दही, सन्देश, मिठाई तथा केला बेचने के लिए वहाँ आ गये।"
ग्रत द्रव्य ला आइसे, सब मूल्य करि' लय ।।तार द्रव्य मूल्य दिया ताहारे खाओयाय ॥
९२॥
जैसे ही वे सभी प्रकार की भोज्य सामग्री लेकर आये, रघुनाथदास ने सारी की सारी खरीद ली। उन्होंने उन्हें उनके सामान का मूल्य चुकता किया और बाद में वही भोजन उन्हें खिला दिया।"
कौतुक देखिते आइल ग्नत व्रते जन । सेइ चिड़ा, दधि, कला करिल भक्षण ॥
९३॥
जो भी यह देखने के लिए आया कि ये कैसे कुतूहलवर्धक कार्य हो । रहे हैं, उन्हें भी चिउड़ा, दही तथा केला खिलाया गया।"
भोजन करि' नित्यानन्द आचमन कैला ।।चारि कुण्डीर अवशेष रघुनाथे दिला ॥
९४॥
नित्यानन्द प्रभु ने भोजन करने के बाद हाथ तथा मुख धोये और रघुनाथ दास को चार पात्रों में बचा हुआ भोजन दिया।"
आर तिन कुण्डिकाय अवशेष छिले । ग्रासे-ग्रासे करि' विप्र सब भक्ते दिल ॥
९५॥
भगवान् नित्यानन्द के तीन अन्य बड़े पात्रों में भोजन बचा रहा, जिसे एक ब्राह्मण ने सारे भक्तों को एक-एक ग्रास देकर बाँट दिया।"
पुष्प-माला विप्र आनि' प्रभु-गले दिल ।।चन्दन आनिया प्रभुर सर्वाङ्गे लेपिल ॥
१६॥
। तब एक ब्राह्मण एक फूल की माला ले आया, उसने उसे नित्यानन्द प्रभु के गले में डाल दी और उनके सारे शरीर में चन्दन का लेप किया।"
सेवक ताम्बूल लजा करे समर्पण ।।हासिया हासिया प्रभु करये चर्वण ॥
९७॥
जब नौकर पान ले आया और नित्यानन्द प्रभु को भेंट किया, तो प्रभु हँसने लगे और पान चबाने लगे।"
माला-चन्दन-ताम्बूल शेष ग्रे आछिल । श्री-हस्ते प्रभु ताहा सबकारे बाँटि' दिल ॥
९८॥
नित्यानन्द प्रभु ने अपने हाथों से सारे भक्तों में बची हुई फूलमालाएँ, चन्दन लेप तथा पान बाँट दिये।"
आनन्दित रघुनाथ प्रभुर ‘शेष' पाञा ।। आपनार गण-सह खाइला बॉटिया ॥
९९॥
नित्यानन्द प्रभु के बचे भोजन का शेष पाकर अत्यन्त प्रसन्न रघुनाथ दास ने कुछ तो खाया और शेष अपने निजी संगियों में बाँट दिया।"
एइ त कहिलॆ नित्यानन्देर विहार ।। ‘चिड़ा-दधि-महोत्सव'-नामे ख्याति यार ॥
१०० ॥
इस तरह मैंने चिड़ा-दही महोत्सव के सम्बन्ध में नित्यानन्द प्रभु की लीलाओं का वर्णन किया है।"
प्रभु विश्राम कैला, यदि दिन-शेष हैल । राघव-मन्दिरे तबे कीर्तन आरम्भिल ॥
१०१॥
नित्यानन्द प्रभु ने दिन में आराम किया और जब दिन का अन्त हो गया, तो वे राघव पण्डित के मन्दिर गये और वहाँ भगवान् के पवित्र नाम का संकीर्तन करना प्रारम्भ कर दिया।"
भक्त सब नाचात्रा नित्यानन्द-राय ।। शेषे नृत्य करे प्रेमे जगत् भासाय ॥
१०२ ॥
सर्वप्रथम नित्यानन्द प्रभु ने सारे भक्तों को नाचने के लिए प्रेरित किया और अन्त में वे स्वयं भी नाचने लगे। इस तरह उन्होंने सारे जगत् को प्रेमावेश से आप्लावित कर दिया।"
महाप्रभु ताँर नृत्य करेन दरशन । सबे नित्यानन्द देखे, ना देखे अन्य-जन ॥
१०३ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु श्री नित्यानन्द प्रभु का नृत्य देख रहे थे। नित्यानन्द प्रभु तो इसे देख सके, किन्तु अन्य लोग नहीं देख पाये।"
नित्यानन्देर नृत्य,—येन ताँहार नर्तने ।। उपमा दिबार नाहि ए-तिन भुवने ॥
१०४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के नृत्य की तरह नित्यानन्द प्रभु के नृत्य की तुलना इन तीनों जगतों से किसी भी वस्तु से नहीं की जा सकती।"
नृत्येर माधुरी केबा वर्णिबारे पारे । महाप्रभु आइसे येइ नृत्य देखिबारे ॥
१०५॥
नित्यानन्द प्रभु के नृत्य की मधुरता का वर्णन उचित प्रकार से कोई नहीं कर सकता। श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं चलकर इसे देखने आते हैं।"
नृत्य करि' प्रभु ग्रबे विश्राम करिला ।।भोजनेर लागि' पण्डित निवेदन कैला ॥
१०६॥
नृत्य के बाद जब नित्यानन्द प्रभु विश्राम कर चुके, तो राघव पण्डित ने उनसे निवेदन किया कि वे रात्रि का भोजन कर लें।"
भोजने वसिला प्रभु निज-गण ली ।महाप्रभुर आसन डाहिने पातिया ॥
१०७॥
नित्यानन्द प्रभु अपने निजी संगियों के साथ भोजन करने बैठ गये और श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए अपने दाहिनी ओर आसन बना दिया।"
महाप्रभु आसि' सेइ आसने वसिल ।।देखि' राघवेर मने आनन्द बाड़िल ॥
१०८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु वहाँ पर आये और अपने आसन पर बैठ गये। यह देखकर राघव पण्डित को अत्यधिक आनन्द हुआ।"
दुइ भाइ-आगे प्रसाद आनिया धरिला ।सकल वैष्णवे पिछे परिवेशन कैला ॥
१०९॥
राघव पण्डित दोनों भाइयों के समक्ष प्रसाद ले आये और उसके बाद अन्य सभी वैष्णवों को प्रसाद वितरित किया।"
नाना-प्रकार पिठा, पायस, दिव्य शाल्यन्न ।अमृत निन्दये ऐछे विविध व्यञ्जन ॥
११०॥
उसमें तरह-तरह की मिठाईयाँ, खीर तथा उत्तम पकाए चावल थे, जो अमृत के भी स्वाद को मात करने वाले थे। कई प्रकार की सब्जियाँ भी थीं।"
राघव-ठाकुरेर प्रसाद अमृतेर सार ।।महाप्रभु ग्राहा खाइते आइसे बार बार ॥
१११॥
राघव पण्डित द्वारा तैयार किया गया तथा अर्चाविग्रह को भेंट किया गया भोजन अमृत के सार के तुल्य था। श्री चैतन्य महाप्रभु ऐसा प्रसाद खाने के लिए वहाँ बारम्बार आये।"
पाक करि' राघव ग्रबे भोग लागाये ।महाप्रभुर लागि' भोग पृथक्बाड़ये ॥
११२॥
। जब राघव पण्डित भोजन पकाने के बाद उसे अर्चाविग्रह को अर्पित करते, तब वे श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए अलग भोग लगाते।"
प्रति-दिन महाप्रभु करेन भोजन ।मध्ये मध्ये प्रभु ताँरै देन दरशन ॥
११३॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु प्रतिदिन राघव पण्डित के घर भोजन करते। कभी-कभी वे राघव पण्डित को अपना दर्शन पाने का अवसर प्रदान करते।"
दुई भाइरे राघव आनि' परिवेशे ।यत्न करि' खाओयाय, ना रहे अवशेषे ॥
११४॥
राघव पण्डित प्रसाद लाकर दोनों भाइयों को देते और बड़ी ही सावधानी से उन्हें खिलाते। वे सारा प्रसाद खा जाते, जिससे कोई शेष नहीं बचता था।"
कत उपहार आने, हेन नाहि जानि ।।राघवेर घरे रान्धे राधा-ठाकुराणी ॥
११५ ॥
। वे इतने सारे प्रसाद ले आते कि लोग उन्हें ठीक से जान नहीं पाते थे। निस्सन्देह, यह सच था कि परम माता राधारानी स्वयं आकर राघव पण्डित के घर भोजन पकातीं।"
दुर्वासार ठात्रि तेंहो पाछेन वर ।अमृत हइते पाक ताँर अधिक मधुर ॥
११६॥
। श्रीमती राधारानी को दुर्वासा मुनि से यह वर मिला था कि वे जो कुछ भी पकायेंगी, वह अमृत से भी अधिक मधुर होगा। उनकी पाक विद्या का यह विशेष गुण है।"
सुगन्धि सुन्दर प्रसाद-माधुर्येर सार । दुइ भाइ ताहा खाजा सन्तोष अपार ॥
११७॥
यह भोजन सुगन्धित एवं देखने में सुहावना होता और समस्त मधुरता का सार होता। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु दोनों भाई परम सन्तोष के साथ भोजन करते।"
भोजने वसिते रघुनाथे कहे सर्व-जन ।।पण्डित कहे,—इँह पाछे करिबे भोजन' ॥
११८॥
वहाँ पर उपस्थित सारे भक्तों ने रघुनाथ दास से प्रार्थना की कि वे बैठकर प्रसाद ग्रहण करें, किन्तु राघव पण्डित ने उन्हें बताया कि, वे बाद में प्रसाद ग्रहण करेंगे।"
भक्त-गण आकण्ठ भरिया करिल भोजन । ‘हरि' ध्वनि करि' उठि' कैला आचमन ॥
११९॥
। सारे भक्तों ने इतना प्रसाद खाया कि उनके गले तक भोजन भर गया। तत्पश्चात् हरि के पवित्र नाम का उच्चारण करते हुए सभी उठ खड़े हुए। और सबने अपने-अपने हाथ-मुँह धोये।"
भोजन करि' दुई भाइ कैला आचमन ।। राघव आनि' पराइला माल्य-चन्दन ॥
१२० ॥
भोजन के बाद दोनों भाइयों ने हाथ-मुँह धोये। तब राघव पण्डित फूल की मालाएँ तथा चन्दन लेप ले आये और उन्हें सुसज्जित किया।"
बिड़ा खाओयाइला, कैला चरण वन्दन । भक्त-गणे दिला बिड़ा, माल्य-चन्दन ॥
१२१॥
राघव पण्डित ने उन्हें पान का बीड़ा खिलाया और उनके चरणकमलों की वन्दना की। उन्होंने भक्तों को भी पान, फूल-मालाएँ तथा चन्दन लेप दिया।"
राघवेर कृपा रघुनाथेर उपरे ।। दुइ भाइएर अवशिष्ट पात्र दिला ताँरै ॥
१२२ ॥
रघुनाथ दास के ऊपर विशेष कृपालु होने के कारण राघव पण्डित ने उन्हें दोनों भाइयों द्वारा छोड़े गये उच्छिष्ट की थालियाँ दीं।"
कहिला,–‘चैतन्य गोसाजि करियाछेन भोजन ।।ताँर शेष पाइले, तोमार खण्डिल बन्धन’ ॥
१२३॥
उन्होंने कहा, श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह भोजन किया है। यदि तुम उनके शेष को ग्रहण करोगे, तो तुम अपने परिवार के बन्धन से छूट जाओगे।"
भक्त-चित्ते भक्त-गृहे सदा अवस्थान ।।कभु गुप्त, कभु व्यक्त, स्वतन्त्र भगवान् ॥
१२४॥
। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सदैव या तो भक्त के हृदय में या उसके घर में निवास करते हैं। यह बात कभी छिपी रहती है और कभी प्रकट होती है, क्योंकि पूर्ण शुरुषोत्तम भगवान् पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हैं।"
सर्वत्र व्यापक' प्रभुर सदा सर्वत्र वास । इहाते संशय यार, सेइ याय नाश ॥
१२५ ॥
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सर्वव्यापी हैं, अतएव वे सर्वत्र निवास करते हैं। जो इसमें सन्देह करता है, उसका विनाश हो जाता है।"
प्राते नित्यानन्द प्रभु गङ्गा-स्नान करिया ।।सेइ वृक्ष-मूले वसिला निज-गण लबा ॥
१२६॥
. प्रातः काल गंगा स्नान करने के बाद नित्यानन्द प्रभु अपने संगियों के साथ उसी वृक्ष के नीचे बैठ गये, जहाँ वे पहले बैठ चुके थे।"
रघनाथ आसि' कैला चरण वन्दन । राघव-पण्डित-द्वारा कैला निवेदन ॥
१२७॥
रघुनाथ दास ने वहाँ जाकर नित्यानन्द प्रभु के चरणकमलों की पूजा की। उन्होंने राघव पण्डित के द्वारा अपनी इच्छा निवेदित की।"
अधम, पामर मड़ हीन जीवाधम ।मोर इच्छा हय–पाङ चैतन्य-चरण ॥
१२८॥
मैं मनुष्यों में अधम, अत्यन्त पापी, पतित तथा तिरस्कृत हूँ। तो भी मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण पाने का इच्छुक हूँ।"
वामन हा ग्रेन चान्द धरिबारे चाय । अनेक ग्रन कैनु, ताते कभु सिद्ध नय ॥
१२९॥
चाँद पकड़ने के इच्छुक किसी बौने की तरह मैंने अनेक बार भरसक प्रयत्न किये, किन्तु कभी सफल नहीं हुआ।"
व्रत-बार पलाइ आमि गृहादि छाड़िया ।। पिता, माता दुइ मोरे राखये बान्धिया ॥
१३०॥
। “जितनी बार मैंने भाग जाना और अपने घरेलू सम्बन्ध तोड़ देना चाहा, उतनी बार मेरे पिता तथा माता ने दुर्भाग्यवश मुझे बाँधकर रखा।"
तोमर कृपा विना केह'चैतन्य' ना पाय ।।तुमि कृपा कैले ताँरे अधमेह पाय ॥
१३१॥
“आपकी कृपा के बिना कोई भी श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण प्राप्त नहीं कर सकता, किन्तु यदि आप कृपालु हों, तो अधम से अधम व्यक्ति भी उनके चरणकमलों की शरण पा सकता है।"
अयोग्य मुइ निवेदन करिते करि भय ।।मोरे ‘चैतन्य' देह' गोसाजि हा सदय ॥
१३२॥
रघुनाथ दास की यह याचना सुनकर नित्यानन्द प्रभु हँसे और सारे भक्तों से बोले, 'रघुनाथ दास के भौतिक सुख का स्तर स्वर्ग के राजा इन्द्र के सुख के तुल्य है।"
मोर माथे पद धरि' कर प्रसाद ।।निर्विघ्ने चैतन्य पाड़ कर आशीर्वाद’ ॥
१३३॥
आप मेरे सिर पर अपने चरण रखकर मुझे यह आशीर्वाद दें कि मैं बिना कठिनाई के श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण प्राप्त कर सकें। मैं आपसे इसी आशीर्वाद के लिए प्रार्थना करता हूँ।"
शुनि' हासि' कहे प्रभु सब भक्त-गणे ।। “इहार विषय-सुख–इन्द्र-सुख-समे ॥
१३४॥
यद्यपि मैं अयोग्य हूँ और यह याचना करते हुए अत्यधिक भयभीत हूँ, तो भी मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप मुझे श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में शरण प्रदान करके मेरे प्रति विशेष कृपालु हों।"
चैतन्य-कृपाते सेह नाहि भाय मने ।। सबे आशीर्वाद कर—पाउक चैतन्य-चरणे ॥
१३५॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु की रघुनाथ दास पर कृपा होने से, इतना भौतिक सुख प्राप्त होने पर भी उसे यह अच्छा नहीं लगता। इसलिए तुम सारे लोग उस पर कृपालु होकर उसे आशीर्वाद दो कि वह शीघ्र ही श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण प्राप्त करे।"
कृष्ण-पाद-पद्म-गन्ध ग्रेइ जन पाय ।। ब्रह्मलोक-आदि-सुख ताँरै नाहि भाय’ ॥
१३६॥
जो व्यक्ति कृष्ण के चरणकमलों की सुगन्ध का अनुभव करता है, वह सर्वोच्च लोक ब्रह्मलोक में प्राप्त सुख को भी कोई महत्त्व प्रदान नहीं करता। तो फिर स्वर्गिक सुख की क्या बात है? यो दुस्त्यजान्दार-सुतान्सुहृद्राज्यं हृदि-स्पृशः ।। जहौ युवैव मल-वदुत्तम-श्लोक-लालसः ॥
१३७॥
“पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण की कृपा प्राप्त करने के इच्छुक लोगों द्वारा उनकी उत्तम स्तुतियाँ की जाती हैं। इसलिये वे उत्तमश्लोक कहलाते हैं। भगवान् कृष्ण का सान्निध्य प्राप्त करने के लिए अत्यन्त उत्सुक होने के कारण राजा भरत ने युवावस्था में ही अपनी अत्यन्त आकर्षक पत्नी, स्नेहिल बच्चों, प्रिय मित्रों तथा ऐश्वर्ययुक्त साम्राज्य का उसी तरह परित्याग कर दिया, जिस तरह मल को त्याग दिया जाता है।"
तबे रघुनाथे प्रभु निकटे बोलाइला । ताँर माथे पद धरि' कहते लागिला ॥
१३८॥
तब नित्यानन्द प्रभु ने रघुनाथ दास को अपने पास बुलाया, उनके सिर पर अपने चरण रखे और उनसे बोले।"
तुमि ग्रे कराइला एइ पुलिन-भोजन ।। तोमाय कृपा करि' गौर कैला आगमन ॥
१३९॥
हे रघुनाथ दास, चूँकि तुमने गंगा नदी के तट पर इस भोजन की व्यवस्था की है, इसलिए श्री चैतन्य महाप्रभु तुम पर मात्र अपनी कृपा दिखाने के लिए यहाँ आये।"
कृपा करि' कैला चिड़ा-दुग्ध भोजन ।।नृत्य देखि' रात्र्ये कैला प्रसाद भक्षण ॥
१४०॥
अपनी अहैतुकी कृपा से उन्होंने चिउड़ा तथा दूध खाया। तत्पश्चात् रात में भक्तों का नृत्य देखने के बाद उन्होंने भोजन किया।"
तोमा उद्धारिते गौर आइला आपने ।छुटिल तोमार व्रत विघ्नादि-बन्धने ॥
१४१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु गौरहरि तुम्हारा उद्धार करने के लिए स्वयं यहाँ आये। अब समझ लो कि तुम्हारे बन्धन के सारे अवरोध दूर हो गये।"
स्वरूपेर स्थाने तोमा करिबे समर्पणे ।।‘अन्तरङ्ग' भृत्य बलि' राखिबे चरणे ॥
१४२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु तुम्हें स्वीकार कर लेंगे और अपने सचिव स्वरूप दामोदर के अधीन तुम्हें रख देंगे। इस तरह तुम उनके सर्वश्रेष्ठ विश्वस्त अन्तरंग सेवकों में से एक बन जाओगे और श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण प्राप्त करोगे।"
निश्चिन्त हा ग्राह आपन-भवन । अचिरे निर्विघ्ने पाबे चैतन्य-चरण’ ॥
१४३॥
इस तरह आश्वस्त होकर तुम अपने घर लौट जाओ। तुम शीघ्र ही, बिना किसी अवरोध के श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण प्राप्त करोगे।"
सब भक्त-द्वारे ताँरे आशीर्वाद कराइला ।ताँ-सबार चरण रघुनाथ वन्दिला ॥
१४४॥
श्री नित्यानन्द प्रभु ने समस्त भक्तों से रघुनाथ दास को आशीर्वाद दिलवाया और रघुनाथ दास ने उन सबके चरणकमलों की सादर वन्दना की।"
प्रभु-आज्ञा लञा वैष्णवेर आज्ञा लइला ।।राघव-सहिते निभृते मुक्ति करिला ॥
१४५॥
नित्यानन्द प्रभु से तथा उसके बाद अन्य सारे वैष्णवों से आज्ञा लेकर रघुनाथ दास ने राघव पण्डित से गुप्त मन्त्रणा की।"
झुक्ति करि' शत मुद्रा, सोणा तोला-साते ।निभृते दिला प्रभुर भाण्डारीर हाते ॥
१४६॥
। राघव पण्डित से परामर्श लेकर उन्होंने चुपके से नित्यानन्द प्रभु के खजांची के हाथ में एक सौ स्वर्णमुद्राएँ तथा लगभग सात तोला सोना दे। दिया।"
ताँरै निषेधिला, ’प्रभुरे एबे ना कहिबा ।।निज-घरे झाबेन ग्रबे तबे निवेदिबा ॥
१४७॥
। रघुनाथ दास ने खजांची को मना कर दिया कि इसके विषय में अभी नित्यानन्द प्रभु से मत कहना, किन्तु जब वे अपने घर चले जाएँ, तब इस भेंट के बारे में उन्हें बता देना।"
तबे राघव-पण्डित ताँरे घरे ला गेला ।ठाकुर दर्शन कराञा माला-चन्दन दिला ॥
१४८॥
तत्पश्चात् राघव पण्डित रघुनाथ दास को अपने घर ले गये। उन्हें अर्चाविग्रह का दर्शन कराने के बाद उन्होंने रघुनाथ दास को एक माला तथा कुछ चन्दन लेप दिया।"
अनेक 'प्रसाद' दिला पथे खाइबारे ।।तबे पुनः रघुनाथ कहे पण्डितेरे ॥
१४९॥
। उन्होंने रघुनाथ दास को रास्ते में खाने के लिए बहुत सारा प्रसाद दिया। तब रघुनाथ दास ने पुनः राघव पण्डित से कहा।"
प्रभुर सङ्गे ग्रत महान्त, भृत्य, आश्रित जन ।।पूजिते चाहिये आमि सबार चरण ॥
१५०॥
मैं नित्यानन्द प्रभु के समस्त महान् भक्तों, सेवकों तथा आश्रित जनों की पूजा के रूप में उनको कुछ धन देना चाहता हूँ।"
बिश, पञ्च-दश, बार, दश, पञ्च हय ।।मुद्रा देह' विचारि' यार व्रत स्रोग्य हय ॥
१५१ ॥
आप जिसे जिस योग्य समझो, उनमें से हर एक को बीस, पन्द्रह, बारह, दस या पाँच मुद्राएँ दे दो।"
सब लेखी करिया राघव-पाश दिला ।।ग्राँर नामे व्रत राघव चिठि लेखाइला ॥
१५२॥
रघुनाथ दास ने दी जाने वाली राशि का विवरण प्रस्तुत किया और उसे राघव पण्डित को दे दिया, जिसने एक सूची बनाई कि प्रत्येक भक्त को कितनी कितनी राशि दी जानी है।"
एक-शत मद्रा आर सोणा तोला-द्वय ।।पण्डितेर आगे दिल करिया विनय ॥
१५३॥
रघुनाथ दास ने अत्यन्त विनयपूर्वक राघव पण्डित के समक्ष अन्य सारे भक्तों को देने के लिए एक सौ स्वर्ण मुद्राएँ तथा लगभग दो तोला सोना रख दिया।"
ताँर पद-धूलि ला स्वगृहे आइला ।।नित्यानन्द-कृपा पाञा कृतार्थ मानिला ॥
१५४॥
राघव पण्डित के चरणों की धूल लेने के बाद रघुनाथ दास अपने घर लौट आये और नित्यानन्द प्रभु के प्रति अतीव कृतज्ञता प्रकट की कि उन्होंने अपना कृपापूर्ण आशीर्वाद प्रदान किया है।"
सेइ हैते अभ्यन्तरे ना करेन गमन ।।बाहिरे दुर्गा-मण्डपे यात्रा करेन शयन ॥
१५५ ॥
उसी दिन से वे घर के भीतरी भाग में नहीं गये। उल्टे वे दुर्गामण्डप में सोने लगे।"
ताँहा जागि' रहे सब रक्षक-गण ।।पलाइते करेन नाना उपाय चिन्तन ॥
१५६॥
किन्तु रखवाले उनकी पूरी चौकसी रखते थे। रघुनाथ दास अनेक उपाय सोचते जिससे वे उनकी निगरानी से भाग निकलें।"
हेन-काले गौड़-देशेर सब भक्त-गण ।। प्रभुरे देखिते नीलाचले करिला गमन ॥
१५७।। उसी समय बंगाल के सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने जगन्नाथ पुरी जा रहे थे।ताँ-सबार सङ्गे रघुनाथ ग्राइते ना पारे ।
प्रसिद्ध प्रकट सङ्ग, तबहिं धरा पड़े ॥
१५८॥
। रघुनाथ दास उनके साथ नहीं जा सकते थे, क्योंकि वे इतने प्रसिद्ध थे कि यदि वह उनके साथ जाते तो पकड़ लिए जाते।"
एइ-मत चिन्तिते दैवे एक-दिने । बाहिरे देवी-मण्डपे करियाछेन शयने ॥
१५९॥
दण्ड-चारि रात्रि ग्रबे आछे अवशेष ।।यदुनन्दन-आचार्य तबे करिला प्रवेश ॥
१६०॥
इस प्रकार रघुनाथ दास ने गम्भीरतापूर्वक विचार किया कि किस तरह भाग निकला जाए और एक रात जब वह दुर्गामण्डप में सो रहे थे, तो पुरोहित यदुनन्दन आचार्य घर के भीतर गये। तब केवल चार दण्ड रात्रि शेष थी।"
वासुदेव-दत्तेर तेह हय अनुगृहीत' ।।रघुनाथेर 'गुरु' तेहो हय 'पुरोहित' ॥
१६१॥
यदुनन्दन आचार्य रघुनाथ दास के पुरोहित और गुरु थे। यद्यपि वे ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न थे, किन्तु उन्होंने वासुदेव दत्त की कृपा स्वीकार की थी।"
अद्वैत-आचार्येर तेह शिष्य अन्तरङ्ग' ।।आचार्य-आज्ञाते माने- चैतन्य प्राण-धन' ॥
१६२॥
यदुनन्दन आचार्य ने प्रामाणिक रूप से अद्वैत आचार्य से दीक्षा ली थी। इस तरह वे श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने जीवन और प्राण मानते थे।"
अङ्गने आसिया तेंहो ग्नबे दाण्डाइला ।।रघुनाथ आसि' तबे दण्डवत् कैला ॥
१६३ ॥
जब यदुनन्दन आचार्य रघुनाथदास के घर में जाकर आँगन में खड़े हुए, तो रघुनाथ दास वहाँ गये और उन्होंने उनके चरणों में गिरकर नमस्कार किया।"
ताँर एक शिष्य ताँर ठाकुरेर सेवा करे।सेवा छाड़ियाछे, तारे साधिबार तरे ॥
१६४॥
यदुनन्दन आचार्य का एक शिष्य अर्चाविग्रह की पूजा करता आ रहा था, किन्तु उसने वह सेवा छोड़ दी थी। यदुनन्दन आचार्य चाहते थे कि रघुनाथ दास उसे वही सेवा पुनः करने के लिए प्रेरित करें।"
रघुनाथे कहे,–‘तारे करह साधन । सेवा ग्रेन करे, आर नाहिक ब्राह्मण ॥
१६५॥
यदुनन्दन आचार्य ने रघुनाथ दास से अनुरोध किया, ‘तुम उस ब्राह्मण को फिर से सेवा करने के लिए प्रेरित करके लाओ, क्योंकि सेवा करने के लिए अन्य कोई ब्राह्मण नहीं है।"
एत कहि' रघुनाथे लबा चलिला । रक्षक सबै शेष-रात्रे निद्राय पड़िली ॥
१६६॥
यह कहकर यदुनन्दन आचार्य ने रघुनाथ दास को अपने साथ ले लिया और दोनों बाहर चले गये। उस समय तक सारे पहरेदार गहरी नींद में सोये हुए थे, क्योंकि रात का अन्तिम प्रहर था।"
आचार घर इहार पूर्व-दिशाते ।। कहिते शुनिते मुँहे चले सेइ पथे ॥
१६७॥
रघुनाथ दास के घर से पूर्व की ओर यदुनन्दन आचार्य का घर था। वे दोनों घर की ओर जाते हुए एक दूसरे से बातें करते गये।"
अर्ध-पथे रघुनाथ कहे गुरुर चरणे ।। आमि सेइ विप्रे साधि' पाठाइमु तोमा स्थाने ॥
१६८॥
आधी दूर जाकर रघुनाथ दास ने अपने गुरु के चरणों में निवेदन किया, “मैं उस ब्राह्मण के घर जाऊँगा, उसे लौट आने के लिए प्रेरित करूँगा तथा उसे आपके घर भेज दूंगा।"
तुमि सुखे घरे ग्राह–मोरे आज्ञा हय ।। एइ छले आज्ञा मागि' करिला निश्चय ॥
१६९॥
आप निश्चिन्त होकर घर जा सकते हैं। आपकी आज्ञानुसार मैं उस ब्राह्मण को मना लाऊँगा।इस निवेदन के साथ उनकी अनुमति लेकर रघुनाथ दास ने चले जाने का निश्चय किया।"
सेवक रक्षक आर केह नाहि सङ्गे।।पलाइते आमार भाल एइत प्रसङ्गे ॥
१७०॥
रघुनाथ दास ने सोचा, भाग जाने का यह सबसे अच्छा अवसर है, क्योंकि इस समय मेरे साथ न तो कोई नौकर है, न ही पहरेदार।"
एत चिन्ति' पूर्व-मुखे करिला गमन ।।उलटिया चाहे पाछे,——नाहि कोन जन ॥
१७१॥
इस तरह सोचते हुए वे पूर्व की दिशा में तेजी से बढ़ते गये। कभीकभी वे घूमकर पीछे देख लेते, किन्तु कोई उनका पीछा नहीं कर रहा था।"
श्री-चैतन्य-नित्यानन्द-चरण चिन्तिया ।।पथ छाड़ि' उपपथे ग्रायेन धाज्ञा ॥
१७२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु के चरणकमलों का ध्यान करते हुए उन्होंने आम रास्ता छोड़ दिया और गौण रास्ते से होकर, जो सामान्यतः उपयोग में नहीं लिया जाता था, शीघ्रता से आगे बढ़ने लगे।"
ग्रामे-ग्रामेर पथ छाड़ि' ग्राय वने वने ।। काय-मनो-वाक्ये चिन्ते चैतन्य-चरणे ॥
१७३॥
वे एक गाँव से दूसरे गाँव के आम रास्ते को छोड़ते हुए अपने प्राणों तथा मन से श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों का ध्यान करते हुए जंगलों से होते हुए आगे चलते गये।"
पञ्च-दश-क्रोश-पथ चलि' गेला एक-दिने । सन्ध्या-काले रहिला एक गोपेर बाथाने ॥
१७४।। वे एक दिन में लगभग तीस मील चले और शाम को उन्होंने एक ग्वाले की गोशाला में विश्राम किया।"
उपवासी देखि' गोप दुग्ध आनि' दिला ।। सेइ दुग्ध पान करि' पड़िया रहिला ॥
१७५ ॥
जब उस ग्वाले ने देखा कि रघुनाथ दास उपवास कर रहे हैं, तो उसने उन्हें कुछ दूध दिया। रघुनाथ दास ने वह दूध पिया और रात भर विश्राम करने के लिए वहाँ लेट गये।"
एथा ताँर सेवक रक्षक ताँरे ना देखियो । ताँर गुरु-पाशे वार्ता पुछिलेन गिया ॥
१७६ ॥
रघुनाथ दास के घर में जब नौकर तथा पहरेदार ने उन्हें नहीं देखा, तो तुरन्त ही वे उनके गुरु यदुनन्दन आचार्य के पास उनके विषय में पूछने गये।"
तेह कहे, आज्ञा मागि' गेला निज-घर' ।। ‘पलाइल रघुनाथ'—उठिल कोलाहल ॥
१७७॥
यदुनन्दन आचार्य ने कहा, वह मुझसे आज्ञा माँगकर घर लौट गया। इस तरह वहाँ कोलाहल उठने लगा, क्योंकि हर व्यक्ति चिल्ला रहा था कि, “अब रघुनाथ भाग गया है।"
ताँर पिता कहे,–‘गौड़ेर सब भक्त-गण ।। प्रभु-स्थाने नीलाचले करिला गमन ॥
१७८॥
रघुनाथ दास के पिता ने कहा, “अब बंगाल के सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने जगन्नाथपुरी गये हैं।"
सेइ-सङ्गे रघुनाथ गेल पलाजा ।। दश जन ग्राह, तारे आनह धरिया ॥
१७९॥
। रघुनाथ दास उन्हीं के साथ भाग गया है। दस व्यक्ति तुरन्त उसे पकड़ने के लिए जायें और उसे लौटा ले आयें।"
शिवानन्दे पत्री दिल विनय करिया ।।‘आमार पुत्रेरे तुमि दिबा बाहुड़िया' ॥
१८०॥
रघुनाथ दास के पिता ने शिवानन्द सेन के नाम एक चिट्ठी लिखी और उनसे अत्यन्त विनयपूर्वक अनुरोध किया, कृपया मेरे पुत्र को लौटाकर भेज दें।"
झाङ्करा पर्यन्त गेल सेइ दश जने ।।झाङ्कराते पाइल गिया वैष्णवेर गणे ॥
१८१॥
झाँकरा में दसों व्यक्ति वैष्णवों की एक टोली के साथ हो गये, जो नीलाचल जा रही थी।"
पत्री दिया शिवानन्दे वार्ता पुछिल ।।शिवानन्द कहे,–'तेह एथा ना आइल' ॥
१८२ ॥
। उन लोगों ने वह चिट्ठी देकर शिवानन्द सेन से रघुनाथ दास के विषय में पूछा, किन्तु शिवानन्द सेन ने उत्तर दिया कि, ‘वह यहाँ नहीं आया।
बाहुड़िया सेइ दश जन आइल घर ।ताँर माता-पिता हइल चिन्तित अन्तर ॥
१८3॥
दसों लोग घर लौट आये। रघुनाथ दास के माता-पिता अत्यधिक चिन्तित हो उठे।"
एथा रघुनाथ-दास प्रभाते उठिया ।।पूर्व-मुख छाड़ि' चले दक्षिण-मुख हा ॥
१८४॥
रघुनाथ दास, जो ग्वाले के घर में विश्राम कर रहे थे, प्रात:काल जल्दी जगे और पूर्व दिशा में जाने के स्थान पर उन्होंने अपना मुँह दक्षिण की ओर मोड़ा और आगे बढ़ने लगे।"
छत्रभोग पार हा छाड़िया सराण ।।कुग्राम दिया दिया करिल प्रयाण ॥
१८५॥
। छत्रभोग पार करने के बाद वे आम रास्ते से न जाकर ऐसे रास्ते से गये, जो एक गाँव से दूसरे गाँव होकर जाता था।"
भक्षण अपेक्षा नाहि, समस्त दिवस गमन ।।क्षुधा नाहि बाधे, चैतन्य-चरण-प्राप्त्ये मन ॥
१८६॥
भोजन की परवाह न करके वे सारा दिन चलते रहते। भूख बाधक न थी, क्योंकि उनका मन श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण पाने पर केन्द्रित था।"
कभु चर्वण, कभु रन्धन, कभु दुग्ध-पान ।। ग्रबे ग्रेड मिले, ताहे राखे निज प्राण ॥
१८७॥
। कभी वे चबैना चबाते, कभी वे भोजन पकाते और कभी दूध पी लेते। इस तरह जहाँ वे जाते, उन्हें जो कुछ भी मिल जाता उसी से प्राणों की रक्षा करते।"
बार दिने चलि' गेला श्री-पुरुषोत्तम ।। पथे तिन-दिन मात्र करिला भोजन ॥
१८८॥
वे बारह दिनों में जगन्नाथपुरी पहुँचे, किन्तु रास्ते में उन्होंने तीन दिन ही भोजन किया।"
स्वरूपादि सह गोसाजि आछेन वसिया ।। हेन-काले रघुनाथ मिलिल आसिया ॥
१८९।। जब रघुनाथ दास श्री चैतन्य महाप्रभु से मिले, तब महाप्रभु स्वरूप दामोदर इत्यादि अपने संगियों के साथ बैठे हुए थे।"
अङ्गनेते दूरे रहि' करेन प्रणिपात ।। मुकुन्द-दत्त कहे,–'एइ आइल रघुनाथ' ॥
१९०॥
आँगन में कुछ दूर रुककर उन्होंने दण्डवत् प्रणाम किया। तब मुकुन्द दत्त ने कहा, यह रघुनाथ आ गया।"
प्रभु कहेन,'आइस', तेहो धरिला चरण ।। उठि' प्रभु कृपाय तौरै कैला आलिङ्गन ॥
१९१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने ये शब्द सुनते ही तुरन्त रघुनाथ दास का स्वागत किया। उन्होंने कहा, यहाँ आओ। तब रघुनाथ दास ने उनके चरणकमल पकड़ लिए, किन्तु महाप्रभु खड़े हो गये और अपनी अहैतुकी कृपा से उनका आलिंगन कर लिया।"
स्वरूपादि सब भक्तेर चरण वन्दिला ।। प्रभु-कृपा देखि' सबे आलिङ्गन कैला ॥
१९२॥
रघुनाथ दास ने स्वरूप दामोदर गोस्वामी इत्यादि सारे भक्तों के चरणकमलों की वन्दना की। उन्होंने भी, यह देखकर कि रघुनाथ दास पर महाप्रभु ने विशेष कृपा की है, उनका आलिंगन किया।"
प्रभु कहे,कृष्ण-कृपा बलिष्ठ सबा हैते ।। तोमारे काड़िल विषय-विष्ठा-गर्त हैते ॥
१९३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, भगवान् कृष्ण की कृपा सबसे प्रबल होती है। इसलिए भगवान् ने तुम्हें भौतिकतावादी जीवन की खाई से उबार लिया है, जो उस छेद के समान है, जिसमें लोग मल त्याग करते हैं।"
रघुनाथ मने कहे,--‘कृष्ण नाहि जानि ।। तव कृपा काड़िल आमा,--एइ आमि मानि' ॥
१९४॥
। रघुनाथ दास ने अपने मन में उत्तर दिया, मैं नहीं जानता कि कृष्ण कौन हैं। हे प्रभु, मैं तो केवल इतना जानता हूँ कि आपकी कृपा ने मुझे पारिवारिक जीवन से बचा लिया है।"
प्रभु कहेन,–तोमार पिता-ज्येठा दुइ जने ।। चक्रवर्ती-सम्बन्धे हाम 'आजा' करि' माने ॥
१९५॥
महाप्रभु ने आगे कहा, तुम्हारे पिता तथा ताऊ दोनों ही मेरे नाना (मातामह) नीलाम्बर चक्रवर्ती के भाई जैसे हैं। अतएव मैं उन्हें अपना नाना ( आजा ) मानता हूँ।"
चक्रवर्तीर दुहे हय भ्रातृ-रूप दास । अतएव तारे आमि करि परिहास ॥
१९६॥
चूँकि तुम्हारे पिता तथा ताऊ नीलाम्बर चक्रवर्ती के छोटे भाई हैं, अतएव मैं इस तरह से परिहास कर सकता हूँ।"
तोमार बाप-ज्येठा—विषय-विष्ठा-गर्तेर कीड़ा ।।सुख करि' माने विषय-विषेर महा-पीड़ा ॥
१९७॥
हे रघुनाथ दास, तुम्हारे पिता तथा ताऊ भौतिक भोग रूपी नाली के मल-कीटों के तुल्य हैं, क्योंकि जिसे वे सुख मानते हैं, वह भौतिक भोग के विष का महान् रोग है।"
यद्यपि ब्रह्मण्य करे ब्राह्मणेर सहाय ।। ‘शद्ध-वैष्णव' नहे, हये 'वैष्णवेर प्राय' ॥
१९८॥
यद्यपि तुम्हारे पिता तथा ताऊ ब्राह्मणों को दान देते हैं और उनकी बहुत सहायता करते हैं, किन्तु तो भी वे शुद्ध वैष्णव नहीं हैं। हाँ, वे प्रायः वैष्णवों जैसे हैं।"
तथापि विषयेर स्वभाव-—करे महा-अन्ध । सेइ कर्म कराय, ग्राते हय भव-बन्ध ॥
१९९॥
जो लोग भौतिकतावादी जीवन के प्रति आसक्त होते हैं और आध्यात्मिक जीवन के प्रति अन्धे बने रहते हैं, वे इस तरह कर्म करते हैं। कि अपने कर्मों की क्रिया-प्रतिक्रिया के फलस्वरूप जन्म-मृत्यु के चक्र में बँध जाते हैं।"
हेन ‘विषय' हैते कृष्ण उद्धारिला तोमा' ।।कहन ना ग्राय कृष्ण-कृपार महिमा ।। २००॥
। भगवान् कृष्ण ने तुम्हें स्वेच्छा से ऐसे गर्हित भौतिकतावादी जीवन से उबार लिया है। इसलिए भगवान् कृष्ण की अहैतुकी कृपा को व्यक्त नहीं किया जा सकता। ।"
रघुनाथेर क्षीणता-मालिन्य देखिया ।।स्वरूपेरे कहेन प्रभु कृपाई-चित्त हा ॥
२०१॥
रघुनाथ दास को दुर्बल तथा मैला कुचैला देखकर, क्योंकि उन्होंने बारह दिनों तक यात्रा की थी और उपवास रखा था, श्री चैतन्य महाप्रभु का हृदय अहैतुकी कृपा से द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वरूप दामोदर से कहा।"
तिन रघुनाथ'-नाम हय आमार गणे।।‘स्वरूपेर रघु'–आजि हैते इहार नामे ॥
२०३॥
। अब मेरे संगियों में तीन रघुनाथ हैं। आज से यह रघुनाथ, स्वरूपेर रघु( स्वरूप दामोदर का रघु) कहलाएगा।"
एइ रघुनाथे आमि सँपिनु तोमारे ।।पुत्र-भृत्य-रूपे तुमि कर अङ्गीकारे ॥
२०२॥
उन्होंने कहा, हे प्रिय स्वरूप, मैं इस रघुनाध दास को तुम्हें सौंपता हूँ। तुम इसे कृपया अपने पुत्र अथवा दास के रूप में स्वीकार करो।"
एत कहि' रघुनाथेर हस्त धरिला ।। स्वरूपेर हस्ते तौरै समर्पण कैला ॥
२०४॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने रघुनाथ दास का हाथ पकड़ लिया और उसे स्वरूप दामोदर गोस्वामी के हाथों में सौंप दिया।"
स्वरूप कहे,---‘महाप्रभुर ग्रे आज्ञा हैल' ।। एत कहि' रघुनाथे पुनः आलिङ्गिल । २०५॥
स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने यह कहते हुए रघुनाथ दास को स्वीकार किया कि, हे प्रभु, आपकी जो भी आज्ञा हो वह स्वीकार्य है। तब उन्होंने रघुनाथ दास का फिर से आलिंगन किया।"
चैतन्येर भक्त-वात्सल्य कहिते ना पारि ।।गोविन्देरे कहे रघुनाथे दया करि' ॥
२०६॥
मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के अपने भक्तों के प्रति वात्सल्य को ठीक से व्यक्त नहीं कर सकता। रघुनाथ दास के ऊपर दयालु होकर महाप्रभु ने गोविन्द से इस प्रकार कहो।।"
पथे इँह करियाछे बहुत लङ्घन ।।कत-दिन कर इहार भाले सन्तर्पण ॥
२०७॥
। रघुनाथ दास ने रास्ते में कई दिनों तक उपवास किया है और अनेक कष्ट उठाये हैं। इसलिए कुछ दिनों तक इसकी ठीक से देखभाल करो, जिससे वह जी भरकर खा सके।"
रघुनाथे कहे- यात्रा, कर सिन्धु-स्नान ।। जगन्नाथ देखि' आसि' करह भोजन ॥
२०८॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने रघुनाथ दास से कहा, “जाकर समुद्र में स्नान करो। उसके बाद मन्दिर में भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करो और फिर यहाँ आकर भोजन करो।"
एत बलि' प्रभु मध्याह्न करिते उठिला ।। रघुनाथ-दास सब भक्तेरे मिलिला ॥
२०९॥
। यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु उठे और अपना दोपहर का कृत्य करने चले गये। रघुनाथ वहाँ पर उपस्थित सारे भक्तों से मिले।"
रघुनाथे प्रभुर कृपा देखि, भक्त-गण । विस्मित हा करे ताँर भाग्य-प्रशंसन ॥
२१०॥
रघुनाथ दास पर श्री चैतन्य महाप्रभु की अहैतुकी कृपा देखकर सारे भक्त आश्चर्यचकित रह गये और उन्होंने उनके सौभाग्य की प्रशंसा की।"
रघुनाथ समुद्रे या स्नान करिला ।। जगन्नाथ देखि' पुनः गोविन्द-पाश आइला ॥
२११॥
रघुनाथ दास ने समुद्र में स्नान किया और जगन्नाथजी के दर्शन किये। तब वे श्री चैतन्य महाप्रभु के निजी सेवक गोविन्द के पास लौट आये।"
प्रभुर अवशिष्ट पात्र गोविन्द ताँरे दिला । आनन्दित हा रघुनाथ प्रसाद पाइला ॥
२१२॥
गोविन्द ने रघुनाथ को श्री चैतन्य महाप्रभु की पत्तल में बचा शेष खाने को दिया, जिन्होंने उस प्रसाद को परम सुखपूर्वक ग्रहण किया।"
एइ-मत रहे तेह स्वरूप-चरणे । गोविन्द प्रसाद ताँरे दिल पञ्च दिने ॥
२१३॥
रघुनाथ दास स्वरूप दामोदर गोस्वामी की देखभाल में रहे और गोविन्द पाँच दिनों तक उन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु का शेष देता रहा।"
आर दिन हैते ‘पुष्प-अञ्जलि' देखियो । सिंह-द्वारे खाड़ा रहे भिक्षार लागिया ॥
२१४॥
। छठे दिन से रघुनाथ दास सिंह द्वार पर खड़े होकर पुष्प-अंजलि उत्सव के बाद, जिसमें भगवान् को फूल अर्पित किये जाते हैं, भिक्षा मांगना शुरू किया।"
जगन्नाथेर सेवक ग्रत-‘विषयीर गण' ।। सेवा सारि' रात्र्ये करे गृहेते गमन ॥
२१५॥
जगन्नाथ जी के अनेक सेवक, जो विषयी कहलाते हैं, अपना नियत कार्य पूरा होने के बाद रात में अपने घर लौटते हैं।"
सिंह-द्वारे अन्नार्थी वैष्णवे देखिया ।।पसारिर ठाजि अन्न देन कृपा त' करिया ॥
२१६॥
यदि वे किसी वैष्णव को सिंह द्वार पर खड़े होकर भिक्षा माँगते देखते हैं, तो कृपा करके उसे कुछ खाने के लिए दुकानदार से दिलाने की व्यवस्था करा देते हैं।"
एड-मत सर्व-काल आछे व्यवहारे ।निष्किञ्चन भक्त खाड़ा हय सिंह-द्वार ॥
२१७॥
इस तरह यह सदा से रीति है कि जिस भक्त के पास कोई दूसरा सहारा नहीं होता, वह सेवकों से भिक्षा पाने के लिए सिंहद्वार पर खड़ा रहता है।"
सर्व-दिन करेन वैष्णव नाम-सङ्कीर्तन ।।स्वच्छन्दे करेन जगन्नाथ दरशन ॥
२१८॥
इस तरह एक पूर्णरूपेण आश्रित वैष्णव सारा दिन भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करता है और पूर्ण स्वतन्त्र होकर जगन्नाथजी के दर्शन करता है।"
केह छत्रे मागि' खाय, ग्रेबा किछु पाय ।।केह रात्रे भिक्षा लागि' सिंह-द्वारे रय ॥
२१९॥
यह प्रथा है कि कुछ वैष्णव दानशालाओं ( छत्रों, लंगरों) से भिक्षा माँगकर जो भी मिलता है खाते हैं, जबकि अन्य लोग सिंहद्वार पर रात्रि के समय खड़े होकर सेवकों से भिक्षा माँगते हैं।"
महाप्रभुर भक्त-गणेर वैराग्य प्रधान ।।ग्राहा देखि' प्रीत हुन गौर-भगवान् ॥
२२०॥
वैराग्य ही मूलभूत सिद्धान्त है, जो श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों का जीवनाधार है। यह वैराग्य देखकर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य अत्यधिक तुष्ट होते हैं।"
प्रभुरे गोविन्द कहे,-रघुनाथ 'प्रसाद' ना लय । रात्र्ये सिंह-द्वारे खाड़ा ही मागि' खाय’ ॥
२२१॥
गोविन्द ने श्री चैतन्य महाप्रभु से कहा, “अब रघुनाथ यहाँ से प्रसाद नहीं लेता। अब वह सिंहद्वार पर खड़ा रहता है, जहाँ खाने के लिए वह भिक्षा माँग लेता है।"
शुनि' तुष्ट हञा प्रभु कहिते लागिल । भाल कैल, वैरागीर धर्म आचरिल ॥
२२२॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह सुना, तो वे अत्यधिक तुष्ट हुए। उन्होंने कहा, ‘रघुनाथ दास ने बहुत अच्छा किया है। उसने वैरागी के लिए उपयुक्त कर्म किया है।"
वैरागी करिबे सदा नाम-सङ्कीर्तन । मागिया खात्रा करे जीवन रक्षण ॥
२२३॥
वैरागी को सदैव भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करना चाहिए। उसे भिक्षा माँगकर खाना चाहिए और इस तरह अपना जीवन-निर्वाह करना चाहिए।"
वैरागी हा ग्रेबा करे परापेक्षा ।। कार्य-सिद्धि नहे, कृष्ण करेन उपेक्षा ॥
२२४॥
वैरागी ( संन्यासी) को अन्यों पर आश्रित नहीं रहना चाहिए। यदि वह ऐसा करता है, तो वह असफल होगा और कृष्ण द्वारा उपेक्षित होगा।"
वैरागी हा करे जिह्वार लालस ।। परमार्थ याय, आर हय रसेर वश ॥
२२५॥
यदि वैरागी अपनी जीभ के लिए विभिन्न प्रकार का भोजन चखने के लिए उत्सुक रहता है, तो उसका आध्यात्मिक जीवन समाप्त हो जायेगा और वह अपनी जीभ के स्वाद का गुलाम बन जायेगा।"
वैरागीर कृत्य-सदा नाम-सङ्कीर्तन ।। शाक-पत्र-फल-मूले उदरभरण ॥
२२६॥
वैरागी का कर्तव्य है कि वह सदैव हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन करे। उसे शाक, पत्ती, फल तथा कन्द जो भी मिल जाये, उसी से वह अपने उदर की तृप्ति करे।"
जिह्वार लालसे ग्रेइ इति-उति धाय ।। शिश्नोदर-परायण कृष्ण नाहि पाय’ ॥
२२७॥
जो अपनी जीभ का दास है और जो इस प्रकार इधर-उधर घूमता रहता है एवं अपने जननांग तथा पेट के प्रति समर्पित होता है, वह कृष्ण को नहीं पा सकता।"
आर दिन रघुनाथ स्वरूप-चरणे ।। आपनार कृत्य लागि' कैला निवेदने ॥
२२८॥
अगले दिन रघुनाथ दास ने अपने कर्तव्य के विषय में स्वरूप दामोदर के चरणकमलों में निवेदन किया।"
कि लागि' छाड़ाइलो घर, ना जानि उद्देश ।कि मोर कर्तव्य, प्रभु कर उपदेश ॥
२२९॥
उन्होंने कहा, मैं नहीं जानता कि मैंने गृहस्थ जीवन क्यों छोड़ा है? मेरा कर्तव्य क्या है? कृपया मुझे उपदेश दें।"
प्रभुर आगे कथा-मात्र ना कहे रघुनाथ ।। स्वरूप-गोविन्द-द्वारा कहाय निज-बात् ॥
२३०॥
रघुनाथ दास कभी भी महाप्रभु के समक्ष एक शब्द भी नहीं कहते। अपितु, वे स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा गोविन्द के माध्यम से महाप्रभु को अपनी इच्छाएँ सूचित करते।।"
प्रभुर आगे स्वरूप निवेदिला आर दिने ।रघुनाथ निवेदय प्रभुर चरणे ॥
२३१ ।। अगले दिन स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु से निवेदन किया, ‘रघुनाथ दास को आपके चरणों में यह कहना है कि कि मोर कर्तव्य, मुजि ना जानि उद्देश ।।आपनि श्री-मुखे मोरे कर उपदेश ॥
२३२॥
। मैं अपना कर्तव्य अथवा जीवन-लक्ष्य नहीं जानता। इसलिए आप कृपया अपने दिव्य मुख से मुझे उपदेश दें।"
हासि' महाप्रभु रघुनाथेरे कहिल ।।तोमार उपदेष्टा करि' स्वरूपेरे दिल ॥
२३३॥
। हँसते हुए महाप्रभु ने रघुनाथ दास से कहा, मैंने पहले ही स्वरूप दामोदर गोस्वामी को तुम्हारे उपदेशक के रूप में नियुक्त कर दिया है।"
‘साध्य'-'साधन'-तत्त्व शिख इँहार स्थाने ।आमि तत नाहि जानि, इँहो व्रत जाने ॥
२३४॥
। तुम उनसे अपने कर्तव्य तथा उसे सम्पन्न करने की विधि सीख सकते हो। मैं उनके जितना नहीं जानता।।"
तथापि आमार आज्ञाय श्रद्धा यदि हय । आमार एइ वाक्ये तबे करिह निश्चय ॥
२३५॥
“फिर भी यदि तुम श्रद्धा तथा प्रेमपूर्वक मुझसे उपदेश लेना चाहते हो, तो तुम निम्नलिखित शब्दों से अपने कर्तव्य निश्चित कर सकते हो।"
ग्राम्य-कथा ना शुनिबे, ग्राम्य-वार्ता ना कहिले । भाल ना खाइबे आर भाल ना परिबे ॥
२३६॥
न तो सामान्य लोगों की तरह बोलो और न वे जो कहें उसे सुनो। तुम न तो स्वादिष्ट भोजन करो, न ही सुन्दर वस्त्र पहनो।"
अमानी मानद हा कृष्ण-नाम सदा लबे ।। व्रजे राधा-कृष्ण-सेवा मानसे करिबे ॥
२३७॥
कभी सम्मान की आशा मत करो, किन्तु अन्यों को सम्मान दो। सदैव भगवान् कृष्ण के पवित्र नाम का जप करो और अपने मन में वृन्दावनवासी राधा तथा कृष्ण की सेवा करो।"
एइ त' सङ्क्षेपे आमि कैलँ उपदेश ।।स्वरूपेर ठात्रि इहार पाइबे विशेष ॥
२३८॥
। मैंने संक्षेप में तुम्हें अपना उपदेश दे दिया है। अब तुम इनके विषय में स्वरूप दामोदर से विस्तार में जान सकोगे।।"
तृणादपि सु-नीचेन तरोरिव सहिष्णुना ।। अमानिना मान-देन कीर्तनीयः सदा हरि: ॥
२३९॥
। जो अपने आपको घास से भी तुच्छ समझता है, जो वृक्ष से भी अधिक सहिष्णु है और जो निजी सम्मान की आशा नहीं रखता, बल्कि अन्यों को सम्मान देने के लिए उद्यत रहता है, वह सदैव सरलतापूर्वक भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन कर सकता है।"
एत शुनि' रघुनाथ वन्दिला चरण ।। महाप्रभु कैला ताँरै कृपा-आलिङ्गन ॥
२४० ॥
यह सुनकर रघुनाथ दास ने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की वन्दना की और महाप्रभु ने कृपापूर्वक उनका आलिंगन किया।"
पुनः समर्पिला ताँरै स्वरूपेर स्थाने ।।‘अन्तरङ्ग-सेवा' करे स्वरूपेर सने ॥
२४१॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु ने पुनः उन्हें स्वरूप दामोदर को सौंप दिया। इस प्रकार रघुनाथ दास स्वरूप दामोदर गोस्वामी के साथ अत्यन्त गुह्य सेवा करने लगे।"
हेन-काले आइला सब गौड़ेर भक्त-गण ।।पूर्ववत् प्रभु सबाय करिला मिलन ॥
२४२॥
इस बार बंगाल से सारे भक्त आये और पहले ही की तरह श्री चैतन्य महाप्रभु उन सबसे प्रेमपूर्वक मिले।"
सबा लञा कैला प्रभु गुण्डिचा-मार्जन ।।सबा ला कैला प्रभु वन्य-भोजन ॥
२४३ ॥
पहले की ही तरह उन्होंने भक्तों के साथ मिलकर गुण्डिचा मन्दिर की सफाई की और बगीचे में वन भोज किया।"
रथ-यात्राय सबा लञा करिला नर्तन ।देखि' रघुनाथेर चमत्कार हैल मन ॥
२४४॥
महाप्रभु ने पुनः रथयात्रा उत्सव के समय भक्तों के साथ नृत्य किया। यह देखकर रघुनाथ दास आश्चर्यचकित हो गये।"
रघुनाथ-दास ग्रबे सबारे मिलिला ।अद्वैत-आचार्य तौरै बहु कृपा कैला ॥
२४५ ॥
। जब रघुनाथ दास सभी भक्तों से मिले, तो अद्वैत आचार्य ने उन पर महती कृपा प्रदर्शित की।"
शिवानन्द-सेन ताँरे कहेन विवरण ।।तोमा लैते तोमार पिता पाठाइल दश जन ॥
२४६॥
। वे शिवानन्द सेन से भी मिले, जिन्होंने उन्हें बताया कि, “तुम्हारे पिता ने तुम्हें लेने के लिए दस व्यक्ति भेजे थे।"
तोमारे पाठाइते पत्री पाठाइल मोरे ।।झाङ्करा हइते तोमा ना पाळा गेल घरे ॥
२४७॥
। उन्होंने मुझे एक चिट्ठी लिखी कि मैं तुम्हें लौटा हूँ, किन्तु जब उन दस व्यक्तियों को तुम्हारे विषय में कोई सूचना नहीं मिली, तो वे झाँकरा से घर लौट गये। ।"
चारि मास रहि' भक्त-गण गौड़े गेला ।।शुनि' रघुनाथेर पिता मनुष्य पाठाइला ॥
२४८ ॥
जब बंगाल के सारे भक्त जगन्नाथपुरी में चार मास रुककर घर लौटे, तो रघुनाथ दास के पिता ने उनके आगमन के विषय में सुना। इसलिए उन्होंने शिवानन्द सेन के पास एक व्यक्ति को भेजा।"
से मनुष्य शिवानन्द-सेनेरे पुछिल ।। महाप्रभुर स्थाने एक ‘वैरागी' देखिल ॥
२४९॥
। उस आदमी ने शिवानन्द सेन से पूछा, “क्या आपने श्री चैतन्य महाप्रभु के निवासस्थान पर किसी वैरागी को देखा है? गोवर्धनेर पुत्र तेंहो, नाम-‘रघुनाथ' ।नीलाचले परिचय आछे तोमार साथ? ॥
वह व्यक्ति गोवर्धन मजुमदार का पुत्र रघुनाथ दास है। क्या नीलाचल में उससे आपकी भेंट हुई?" शिवानन्द कहे, “तेहो हय प्रभुर स्थाने ।। परम विख्यात तेंहो, केबा नाहि जाने ॥
२५१॥
। शिवानन्द सेन ने उत्तर दिया, हाँ, महोदय, रघुनाथ दास श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ है और अत्यन्त विख्यात व्यक्ति है। उसे कौन नहीं जानता? स्वरूपेर स्थाने तारे करियाछेन समर्पण ।। प्रभुर भक्त-गणेर तेहो हय प्राण-सम ॥
२५२ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसे स्वरूप दामोदर के संरक्षण में रख दिया है। रघुनाथ दास तो महाप्रभु के सभी भक्तों का प्राण बन चुका है।"
रात्रि-दिन करे तेहो नाम-सङ्कीर्तन ।। क्षण-मात्र नाहि छाड़े प्रभुर चरण ॥
२५३ ॥
वह दिन-रात हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करता है। वह क्षण भर के लिए भी श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण नहीं छोड़ता।"
परम वैराग्य तार, नाहि भक्ष्य-परिधान ।। त्रैछे तैछे आहार करि' राखये पराण ॥
२५४॥
वह सर्वोपरि संन्यास आश्रम में है। वह खाने या पहनने की परवाह नहीं करता। वह जैसे-कैसे भोजन करता है और अपना जीवन यापन करता है।"
दश-दण्ड रात्रि गेले 'पुष्पाञ्जलि' देखियो ।सिंह-द्वारे खड़ा हय आहार लागिया ॥
२५५ ॥
वह दस दण्ड (चार घण्टे ) रात बीत जाने पर पुष्पांजलि देख लेने के बाद सिंहद्वार पर खड़ा होकर खाने के लिए भिक्षा माँगता है।"
केह यदि देय, तबे करये भक्षण ।। कभु उपवास, कभु करये चर्वण ॥
२५६॥
। यदि कोई कुछ दे देता है, तो वह खा लेता है। कभी-कभी वह उपवास करता है और कभी वह चबैना चबाकर रह जाता है।"
एत शुनि' सेइ मनुष्य गोवर्धन-स्थाने ।। कहिल गिया सब रघुनाथ-विवरणे ॥
२५७॥
यह सुनकर वह सन्देशवाहक गोवर्धन मजुमदार के पास लौट गया और उसने रघुनाथ दास के बारे में उसे सब कुछ बतला दिया।"
शुनि' ताँर माता पिता दुःखित हइल ।। पुत्र-ठाजि द्रव्य-मनुष्य पाठाइते मन कैल ।। २५८ ॥
संन्यास आश्रम में रघुनाथ दास के व्यवहार को वर्णन सुनकर उसके माता-पिता अत्यन्त दुःखी थे। इसलिए उन्होंने उसकी सुविधा के लिए कुछ सामान देकर कुछ आदमी भेजने का निश्चय किया।"
चारि-शत मुद्रा, दुइ भृत्य, एक ब्राह्मण ।। शिवानन्देर ठाञि पाठाइल तत-क्षण ॥
२५९॥
रघुनाथ दास के पिता ने तुरन्त शिवानन्द सेन के पास चार सौ मुद्राएँ, दो नौकर तथा एक ब्राह्मण भेज दिया।"
शिवानन्द कहे,-‘तुमि सब य़ाइते नारिबा । आमि ग्राइ ग्रबे, आमार सङ्गे ग्राइबा ॥
२६०॥
शिवानन्द सेन ने उन सबसे बतलाया, ‘तुम लोग सीधे जगन्नाथपुरी नहीं जा सकते। जब मैं वहाँ जाऊँ, तब तुम लोग मेरे साथ चल सकते हो।"
एबे धर ग्राह, ग्रबे आमि सब चलिमु । तबे तोमा सबाकारे सङ्गे ला झामु ॥
२६१॥
अभी घर जाओ। जब हम सभी जायेंगे, तब तुम सबको अपने साथ ले लेंगे।
एइ त' प्रस्तावे श्री-कवि-कर्णपूर ।रघुनाथ-महिमा ग्रन्थे लिखिला प्रचुर ॥
२६२॥
इस घटना का वर्णन करते हुए महान् कवि श्री कविकर्णपूर ने अपने ग्रन्थ' श्री चैतन्य चन्द्रोदय नाटक' में रघुनाथ दास के महिमामय कार्यों के विषय में विस्तार से लिखा है।"
आचार्यो यदुनन्दनः सु-मधुरः श्री-वासुदेव-प्रियस् ।तच्छिष्यो रघुनाथ इत्यधिगुणः प्राणाधिको मादृशाम् । श्री-चैतन्य-कृपातिरेक-सतत-स्निग्धः स्वरूपानुगो ।वैराग्यैक-निधिर्न कस्य विदितो नीलाचले तिष्ठताम् ।। २६३॥
रघुनाथ दास अत्यन्त विनीत तथा कांचनपल्ली निवासी वासुदेव दत्त को अत्यधिक प्रिय यदुनन्दन आचार्य के शिष्य हैं। अपने दिव्य गुणों के कारण रघुनाथ दास श्री चैतन्य महाप्रभु के हम सभी भक्तों को सदैव प्राणों से भी अधिक प्रिय हैं। उन पर श्री चैतन्य महाप्रभु की अत्यधिक कृपा है, इसलिए वे सदैव अत्यन्त प्रिय हैं। वे संन्यास आश्रम के लिए उत्तम आदर्श प्रस्तुत करने वाले हैं और स्वरूप दामोदर गोस्वामी के ये अत्यन्त प्रिय अनुयायी वैराग्य के सागर हैं। नीलाचल ( जगन्नाथपुरी ) के निवासियों में ऐसा कौन होगा जो उन्हें भलीभाँति न जानता हो? यः सर्व-लोकैक-मनोऽभिरुच्यासौभाग्य-भूः काचिदकृष्ट-पच्या ।। यत्रायमारोपण-तुल्य-कालंतत्प्रेम-शाखी फलवानतुल्यः ॥
२६४॥
चूंकि वे सारे भक्तों को अत्यन्त मनोहर लगते हैं, इसलिए रघुनाथ दास गोस्वामी आसानी से सौभाग्य की उर्वर भूमि बन गये, जो श्री चैतन्य महाप्रभु का बीज बोने के लिए उपयुक्त थी। उसी समय यह बीज बो दिया गया और यह श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेम रूपी अद्वितीय वृक्ष के रूप में बढ़कर फल उत्पन्न करने लगा।"
शिवानन्द ग्रैछे सेइ मनुष्ये कहिला ।।कर्णपूर सेइ-रूपे श्लोक वणिला ॥
२६५॥
। इन श्लोकों में महाकवि कवि-कर्णपूर वही जानकारी देते हैं, जो शिवानन्द सेन ने रघुनाथ दास के पिता के सन्देशवाहक को दी थी।"
वर्षान्तरे शिवानन्द चले नीलाचले ।रघुनाथेर सेवक, विप्र ताँर सङ्गे चले ॥
२६६॥
अगले वर्ष जब शिवानन्द सेन हमेशा की तरह जगन्नाथपुरी जाने लगे, तो रघुनाथ के नौकर तथा उनका रसोइया ब्राह्मण उनके साथ चल पड़े।"
सेइ विप्र भृत्य, चारि-शत मुद्रा लञा ।।नीलाचले रघुनाथे मिलिला आसिया ॥
२६७॥
वे सेवक तथा वह ब्राह्मण अपने साथ चार सौ मुद्रा जगन्नाथपुरी ले आये और वहाँ रघुनाथ दास से मिले।"
रघुनाथ-दास अङ्गीकार ना करिल ।। द्रव्य लञा दुई-जन ताहाङि रहिल ॥
२६८॥
रघुनाथ दास ने अपने पिता द्वारा भेजा गया धन तथा आदमी स्वीकार नहीं किये। इसलिए एक नौकर तथा वह ब्राह्मण दोनों ही धन लेकर वहीं रुके रहे।"
तबे रघुनाथ करि' अनेक ग्रतन ।।मासे दुइ-दिन कैला प्रभुर निमन्त्रण ॥
२६९॥
उसी समय रघुनाथ दास ने प्रतिमास दो दिन अपने घर पर श्री चैतन्य महाप्रभु को बड़े ध्यान से निमन्त्रित करना शुरू किया।"
दुइ निमन्त्रणे लागे कौड़ि अष्ट-पण ।।ब्राह्मण-भृत्य-ठाजि करेन एतेक ग्रहण ॥
२७० ॥
इन दोनों अवसरों पर ६४० कौड़ियाँ खर्च होतीं। इसलिए वे उस नौकर तथा ब्राह्मण से इतनी ही राशि लेते।"
एइ-मत निमन्त्रण वर्ष दुइ कैला ।पाछे रघुनाथ निमन्त्रण छाड़ि' दिला ॥
२७१ ॥
इस तरह रघुनाथ दास श्री चैतन्य महाप्रभु को दो वर्षों तक आमन्त्रित करते रहे, किन्तु दूसरे वर्ष के अन्त में उन्होंने यह बन्द कर दिया।"
मास-दुइ ग्रबे रघुनाथ ना करे निमन्त्रण ।। स्वरूपे पुछिला तबे शचीर नन्दन ॥
२७२ ॥
। जब रघुनाथ दास ने लगातार दो मास तक महाप्रभु को आमन्त्रित नहीं किया, तो शचीपुत्र महाप्रभु ने स्वरूप दामोदर से पूछा।"
'रघु केने आमाय निमन्त्रण छाड़ि' दिल?' ।।स्वरूप कहे,–मने किछु विचार करिल ॥
२७३॥
महाप्रभु ने पूछा, रघुनाथ दास ने मुझे निमन्त्रण देना क्यों बन्द कर दिया है?’ स्वरूप दामोदर ने उत्तर दिया, उसने मन में फिर से कुछ सोचा होगा।"
विषयीर द्रव्य लञा करि निमन्त्रण। प्रसन्न ना हय इहाय जानि प्रभुर मन ॥
२७४॥
मैं भौतिकतावादी व्यक्तियों से सामग्री लेकर श्री चैतन्य महाप्रभु को आमन्त्रित करता हूँ। मैं जानता हूँ कि इससे महाप्रभु का मन प्रसन्न नहीं होता।"
मोर चित्त द्रव्य लइते ना हय निर्मल । एइ निमन्त्रणे देखि,–'प्रतिष्ठा'-मात्र फल ॥
२७५ ॥
मेरा मन मलिन है, क्योंकि मैं यह सारा सामान उन लोगों से लेता हूँ जो केवल धन में रुचि रखने वाले हैं। इसलिए ऐसे निमन्त्रण से मैं कुछ भौतिक यश ही प्राप्त करता हूँ।"
उपरोधे प्रभु मोर मानेन निमन्त्रण ।। ना मानिले दुःखी हइबेक मूर्ख जन ॥
२७६॥
मेरे अनुरोध पर श्री चैतन्य महाप्रभु निमन्त्रण स्वीकार कर लेते हैं, क्योंकि वे जानते हैं कि यदि वे निमन्त्रण स्वीकार नहीं करते, तो मुझ जैसा मूर्ख व्यक्ति दुःखी होगा।'
एत विचारिया निमन्त्रण छाड़ि' दिल’ ।।शुनि' महाप्रभु हासि' बलिते लागिल ॥
२७७॥
स्वरूप दामोदर ने यह कहकर समाप्त किया कि, इन सारी बातों पर विचार करके उसने आपको आमन्त्रित करना बन्द कर दिया है। यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु हँसे और कहने लगे।"
विषयीर अन्न खाइले मलिन हय मन ।। मलिन मन हैले नहे कृष्णेर स्मरण ॥
२७८ ॥
जब कोई किसी भौतिकतावादी द्वारा भेंट किया हुआ भोजन खाता है, तो उसका मन कलुषित हो जाता है और जब मन कलुषित हो जाता है, तो मनुष्य ठीक से कृष्ण का चिन्तन नहीं कर पाता।।"
विषयीर अन्न हय 'राजस' निमन्त्रण ।।दाता, भोक्ता पुँहार मलिन हय मन ॥
२७९॥
जब कोई व्यक्ति रजोगुण से दूषित किसी व्यक्ति का आमन्त्रण स्वीकार कर लेता है, तो भोजन देने वाला तथा उस भोजन को स्वीकार करने वाला दोनों ही मानसिक रूप से कलुषित हो जाते हैं।"
इँहार सङ्कोचे आमि एत दिन निल ।।भाल हैल–जानिया आपनि छाड़ि दिल ॥
२८० ॥
रघुनाथ दास की उत्सुकता के कारण मैंने अनेक दिनों तक उसका निमन्त्रण स्वीकार किया। यह अच्छा हुआ कि रघुनाथ दास ने यह जानते हुए अब इस रीति को स्वयं त्याग दिया है।"
कत दिने रघुनाथ सिंह-द्वार छाड़िला ।। छत्रे ग्राइ' मागिया खाइते आरम्भ करिला ॥
२८१॥
कुछ दिनों के बाद रघुनाथ दास ने सिंहद्वार पर खड़े होना बन्द कर दिया और उसके स्थान पर वे अन्नछत्र से भिक्षा माँगकर खाने लगे।"
गोविन्द-पाश शुनि' प्रभु पुछेन स्वरूपेरे ।। 'रघु भिक्षा लागि' ठाड़ केने नहे सिंह-द्वारे'? ॥
२८२॥
। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोविन्द से यह समाचार सुना, तो उन्होंने स्वरूप दामोदर से पूछा, “अब भिक्षा माँगने के लिए रघुनाथ दास सिंहद्वार पर क्यों नहीं खड़ा होता? ।"
स्वरूप कहे,–सिंह-द्वारे दु:ख अनुभविया । छत्रे मागि' खाय मध्याह्न-काले गिया ॥
२८३॥
स्वरूप दामोदर ने उत्तर दिया, रघुनाथ दास को सिंहद्वार पर खड़े होने से दुःख होता था। इसलिए वह अब दोपहर के समय अन्नछत्र में भिक्षा माँगने जाता है।"
प्रभु कहे,---'भाल कैल, छाड़िल सिंह-द्वार ।। सिंह-द्वारे भिक्षा-वृत्ति–वेश्यार आचार ॥
२८४॥
यह समाचार सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, उसने बहुत अच्छा किया कि सिंहद्वार पर खड़ा होना बन्द कर दिया। ऐसी भिक्षावृत्ति वेश्या के आचरण के समान है।"
तथा हि–किमर्थमयमागच्छति, अयं दास्यति, अनेन दत्तमयमपरः । समेत्ययं दास्यति, अनेनापि न दत्तमन्यः समेष्यति, स दास्यति इत्यादि ॥
२८५॥
यह व्यक्ति आ रहा है। वह मुझे कुछ देगा। इस व्यक्ति ने मुझे पिछली रात में कुछ दिया था। अब एक दूसरा व्यक्ति इधर आ रहा है। वह मुझे कोई वस्तु दे सकता है। अभी जो व्यक्ति इधर से निकला, उसने मुझे कुछ नहीं दिया, किन्तु दूसरा व्यक्ति आयेगा और वह मुझे कुछ देगा।‘ संन्यास आश्रम में ऐसा व्यक्ति अपनी उदासीनता त्याग देता है और इस या उस व्यक्ति के दान पर आश्रित रहता है। इस तरह सोचते हुए वह वेश्या की वृत्ति ग्रहण कर लेता है।"
छत्रे याइ ग्रथा-लाभ उदर-भरण । अन्य कथा नाहि, सुखे कृष्ण-सङ्कीर्तन’ ॥
२८६॥
यदि कोई व्यक्ति निःशुल्क भोजन देने वाले लंगर में जाकर जो भी मिले उससे पेट भरता है, तो अवांछित बातों का अवसर नहीं रह जाता और वह शान्तिपूर्वक हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन कर सकता है।"
एत बलि' ताँरे पुनः प्रसाद करिला ।। ‘गोवर्धनेर शिला', ‘गुञ्जा-माला' ताँरे दिला ॥
२८७॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोवर्धन पर्वत की एक शिला तथा गुंजामाला ( छोटे शंखों की एक माला ) देकर रघुनाथ दास पर पुनः कृपा की।"
शङ्करानन्द-सरस्वती वृन्दावन हैते आइला । तेह सेइ शिला-गुञ्जा-माला लञा गेला ॥
२८८॥
पिछली बार जब शंकरानन्द सरस्वती वृन्दावन से आये थे, तो अपने साथ गोवर्धन पर्वत से एक शिला तथा गुंजामाला ( छोटे-छोटे शंखों की माला ) लाये थे।"
पार्थे गाँथा गुञ्जा-माला, गोवर्धन-शिला ।। दुइ वस्तु महाप्रभुर आगे आनि' दिला ॥
२८९॥
उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु को वे दोनों वस्तुएँ-शंखों की माला तथा गोवर्धन पर्वत की शिला-दी थीं।"
दुइ अपूर्व-वस्तु पाञा प्रभु तुष्ट हैला ।। स्मरणेर काले गले परे गुञ्जा-माला ॥
२९०॥
इन दो असामान्य वस्तुओं को पाकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यधिक सुखी थे। वे जप करते समय उस माला को अपने गले में डाल लिया करते थे।"
गोवर्धन-शिला प्रभु हृदये-नेत्रे धरे ।। कभु नासाय घ्राण लय, कभु शिरे करे ॥
२९१॥
महाप्रभु इस शिला को कभी अपने हृदय पर रखते तो कभी अपनी आँखों से लगाते। कभी वे अपनी नाक से इसे सँघते और कभी इसे अपने सिर पर रखते।"
नेत्र-जले सेइ शिला भिजे निरन्तर ।शिलारे कहेन प्रभु-कृष्ण-कलेवर' ॥
२९२ ॥
गोवर्धन पर्वत की यह शिला महाप्रभु के नेत्रों से निकलने वाले अश्रुओं से सदैव भीगी रहती थी। श्री चैतन्य महाप्रभु कहा करते, यह शिला साक्षात् कृष्ण का शरीर है।"
एइ-मत तिन-वत्सर शिला-माला धरिला ।तुष्ट हा शिला-माला रघुनाथे दिला ॥
२९३ ॥
वे उस शिला तथा माला को तीन वर्षों तक अपने पास रखे रहे। तब रघुनाथ दास के आचरण से अत्यधिक प्रसन्न होकर महाप्रभु ने इन दोनों को उन्हें दे दिया।"
प्रभु कहे,--'एइ शिला कृष्णेर विग्रह ।।इँहार सेवा कर तुमि करिया आग्रह ॥
२९४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने रघुनाथ दास को यह उपदेश दिया, ‘यह शिला भगवान् कृष्ण का दिव्य स्वरूप है। इस शिला की पूजा अतीव उत्सुकता से करना।"
एइ शिलार कर तुमि सात्त्विक पूजन ।। अचिरात् पाबे तुमि कृष्ण-प्रेम-धन ॥
२९५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, “तुम आदर्श ब्राह्मण की तरह सत्त्वगुणी भाव से इस शिला की पूजा करो, क्योंकि ऐसी पूजा से तुम निश्चय ही अविलम्ब कृष्ण का भावमय प्रेम प्राप्त कर सकोगे।"
एक कुंजा जल आर तुलसी-मञ्जरी ।। सात्त्विक-सेवा एइ–शुद्ध-भावे करि ॥
२९६॥
ऐसी पूजा के लिए एक लोटा पानी तथा तुलसी वृक्ष की कुछ मंजरियों की आवश्यकता पड़ती है। यदि परम शुद्धि के साथ इसे सम्पन्न किया जाए, तो यह सत्त्वगुणी पूजा है।"
दुइ-दिके दुइ-पत्र मध्ये कोमल मञ्जरी ।। एइ-मत अष्ट-मञ्जरी दिबे श्रद्धा करि ॥
२९७॥
तुम्हें चाहिए कि तुम श्रद्धा तथा प्रेम के साथ तुलसी की आठ कोमल मंजरियाँ भेंट चढ़ाओ। और इन आठों में प्रत्येक ओर दो तुलसी की पत्तियाँ हों।"
श्री-हस्ते शिला दिया एइ आज्ञा दिला ।।आनन्दे रघुनाथ सेवा करिते लागिला ॥
२९८॥
इस तरह यह परामर्श देकर कि किस तरह पूजा की जाए, श्री चैतन्य महाप्रभु ने रघुनाथ दास को अपने दिव्य हाथ से गोवर्धन शिला प्रदान की। महाप्रभु की आज्ञा के अनुसार ही रघुनाथ दास परम प्रसन्नतापूर्वक शिला की पूजा करने लगे।"
एक-वितस्ति दुइ-वस्त्र, पिंड़ा एक-खानि ।।स्वरूप दिलेन कुँजो आनिबारे पानि ॥
२९९ ॥
स्वरूप दामोदर ने रघुनाथ दास को लगभग छह-छह इंच लम्बे दो वस्त्र, एक लकड़ी का पीढ़ा तथा जल रखने के लिए एक पात्र दिया।"
एइ-मत रघुनाथ करेन पूजन ।। पूजा-काले देखे शिलाय 'व्रजेन्द्र-नन्दन' ॥
३००॥
इस तरह रघुनाथ दास ने गोवर्धन शिला को पूजना प्रारम्भ कर दिया और जब वे पूजा करते, तो उस शिला में वे नन्द महाराज के पुत्र साक्षात् । पृर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण का दर्शन करते।"
‘प्रभुर स्वहस्त-दत्त गोवर्धन-शिला' ।। एइ चिन्ति' रघुनाथ प्रेमे भासि' गेला ॥
३०१॥
यह सोचकर कि यह गोवर्धन शिला उन्हें किस तरह स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु के हाथों से प्राप्त हुई है, रघुनाथ दास सदैव प्रेमावेश से अभिभूत होते रहते।"
जल-तुलसीर सेवाय ताँर व्रत सुखोदय ।। षोड़शोपचार-पूजाय तत सुख नय ॥
३०२॥
केवल जल तथा तुलसी अर्पित करने से रघुनाथ दास को जितना दिव्य आनन्द मिला, उतना सोलह प्रकार की पूजा सामग्रियों से भी अर्चाविग्रह की पूजा करके प्राप्त नहीं किया जा सकता।"
एइ-मत कत दिन करेन पूजन ।। तबे स्वरूप-गोसान्नि ताँरै कहिला वचन ॥
३०३॥
। जब रघुनाथ दास कुछ दिनों तक गोवर्धन शिला की पूजा कर चुके, तो एक दिन स्वरूप दामोदर ने उनसे इस प्रकार कहा।"
अष्ट-कौड़िर खाजा-सन्देश कर समर्पण ।।श्रद्धा करि' दिले, सेइ अमृतेर सम’ ॥
३०४॥
तुम इस गोवर्धन शिला को आठ कौड़ियों के मूल्य की सर्वोत्तम खाजा तथा सन्देश मिठाइयाँ अर्पित करो। यदि तुम श्रद्धा तथा प्रेम से इन्हें अर्पित करोगे, तो वे अमृत तुल्य बन जायेंगी।"
तबे अष्ट-कौड़िर खाजा करे समर्पण ।। स्वरूप-आज्ञाय गोविन्द ताहा करे समाधान ॥
३०५॥
तत्पश्चात् रघुनाथ दास खाजा नाम की कीमती मिठाई का भोग लगाने लगे, जिसकी पूर्ति स्वरूप दामोदर की आज्ञा के अनुसार गोविन्द करता था।"
रघुनाथ सेइ शिला-माला ग्रबे पाइला । गोसाजिर अभिप्राय एइ भावना करिला ॥
३०६॥
जब रघुनाथ दास को श्री चैतन्य महाप्रभु से शिला तथा शंखों की माला प्राप्त हुई, तब वे महाप्रभु की आन्तरिक इच्छा समझ गये थे। अतः उन्होंने इस प्रकार सोचा।"
शिला दिया गोसाञि समर्पिला 'गोवर्धने' ।।गुञ्जा-माला दिया दिला 'राधिका-चरणे' ॥
३०७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह गोवर्धन शिला देकर मुझे गोवर्धन पर्वत के निकट स्थान दिया है और शंख की माला देकर उन्होंने मुझे श्रीमती राधारानी के चरणकमलों में शरण दी है।"
आनन्दे रघुनाथेर बाह्य विस्मरण ।।काय-मने सेविलेन गौराङ्ग-चरण ॥
३०८॥
। रघुनाथ दास के आनन्द की कोई सीमा न थी। वे सारी बाह्य वस्तुएँ भूलकर अपने तन तथा मन से श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की सेवा करने लगे।"
अनन्त गुण रघुनाथेर के करिबे लेखा? ।। रघुनाथेर नियम,--ग्रेन पाषाणेर रेखा ॥
३०९॥
भला रघुनाथ दास के असंख्य दिव्य गुणों की गणना कौन कर सकता है? उनके कठोर नियम पत्थर पर लकीर के समान थे।"
साढ़े सात प्रहर ग्राय कीर्तन-स्मरणे । आहार-निद्रा चारि दण्ड सेह नहे कोन दिने ॥
३१०॥
रघुनाथ दास चौबीस घंटों में से बाईस घंटे से अधिक हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करने में तथा भगवान् के चरणकमलों का स्मरण करने में बिताते। वे डेढ़ घंटे से भी कम समय खाने तथा सोने में बिताते और किसी-किसी दिन तो वह भी सम्भव नहीं हो पाता था।"
वैराग्येर कथा ताँर अद्भुत-कथन ।। आजन्म ना दिल जिह्वाय रसेर स्पर्शन ॥
३११॥
। उनके वैराग्य से सम्बन्धित कथाएँ अद्भुत हैं। उन्होंने जीवन भर अपनी जीभ की तृप्ति नहीं होने दी।"
छिण्डा कानि काँथा विना ना परे वसन । सावधाने प्रभुर कैला आज्ञार पालन ॥
३१२॥
उन्होंने पहनने के लिए एक छोटे से फटे वस्त्र तथा लपेटने के लिए गुदड़ी के अतिरिक्त किसी वस्तु का स्पर्श नहीं किया। इस तरह उन्होंने श्री। चैतन्य महाप्रभु की आज्ञा का कठोरता के साथ पालन किया।"
प्राण-रक्षा लागि' येबा करेन भक्षण । ताहा खाजा आपनाके कहे निर्वेद-वचन ॥
३१३॥
वे जो भी खाते, शरीर तथा प्राण की रक्षा मात्र के लिए होता था और जब वे खाने बैठते, तो अपनी भर्सना इन शब्दों में करते।"
आत्मानं चेद्विजानीयात्परं ज्ञान-धुताशयः ।।किमिच्छन्कस्य वा हेतोर्देहं पुष्णाति लम्पटः ॥
३१४॥
यदि किसी का हृदय पूर्ण ज्ञान द्वारा शुद्ध हो चुका है और उसने परम ब्रह्म कृष्ण को समझ लिया है, तो उसे हर वस्तु प्राप्त हो जाती है। भला ऐसे व्यक्ति को अपने भौतिक शरीर का अच्छी तरह पोषण करने का प्रयास करते हुए लम्पट की तरह क्यों कार्य करना चाहिए? प्रसादान्न पसारिर व्रत ना विकाय ।। दुइ-तिन दिन हैले भात सड़ि' ग्राय ॥
३१५॥
भगवान जगन्नाथ का प्रसाद दुकानदारों द्वारा बेचा जाता है। जो नहीं बिक पाता वह दो-तीन दिनों बाद सड़ जाता है।"
सिंह-द्वारे गाभी-आगे सेइ भात डारे ।। सड़ा-गन्धे तैलङ्गी-गाइ खाइते ना पारे ॥
३१६॥
। सारा सड़ा भोजन सिंहद्वार पर तैलंग गौओं के सामने फेंक दिया जाता है। उसकी सड़न की गन्ध के कारण गौवें तक इसे नहीं खा सकतीं।"
सेइ भात रघुनाथ रात्रे घरे आनि' ।।भात पाखालिया फेले घरे दिया बहु पानि ॥
३१७॥
रात में रघुनाथ दास सड़ा चावल एकत्र करते और घर लाकर उसे प्रचुर पानी से धोते थे।"
भितरेर दृढ़ ग्रेइ माजि भात पाय ।।लवण दिया रघुनाथ सेइ अन्न खाय ॥
३१८॥
। तब वे चावल के कड़े भीतरी भाग को नमक मिलाकर खाते।"
एक-दिन स्वरूप ताहा करिते देखिला ।।हासिया ताहार किछु मागिया खाइला ॥
३१९॥
एक दिन स्वरूप दामोदर ने रघुनाथ दास का यह कृत्य देख लिया, अतः वे हँसे और उस भोजन में से थोड़ा सा अंश माँगकर स्वयं उन्होंने खाया।"
स्वरूप कहे,–‘ऐछे अमृत खाओ निति-निति ।।आमा-सबाय नाहि देह',—कि तोमार प्रकृति?’ ॥
३२०॥
स्वरूप दामोदर ने कहा तुम प्रतिदिन ऐसा अमृत खाते हो, किन्तु हमें कभी नहीं देते। तुम्हारा स्वभाव कैसा है?" गोविन्देर मुखे प्रभु से वार्ता शुनिला।आर दिन आसि' प्रभु कहिते लागिला ॥
३२१॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस बात का समाचार गोविन्द के मुख से सुमा, तो वे अगले दिन वहाँ गये और इस प्रकार बोले।
‘काँहा वस्तु खाओ सबे, मोरे ना देह' केने?'। एत बलि' एक ग्रास करिला भक्षणे ॥
३२२॥
तुम कौन सी अच्छी वस्तुएँ खा रहे हो? तुम मुझे कोई वस्तु क्यों नहीं देते? यह कहकर उन्होंने बलपूर्वक एक ग्रास ले लिया और खाने लगे।
आर ग्रास लैते स्वरूप हातेते धरिला ।। ‘तव ग्रोग्य नहे' बलि' बले काड़ि' निला ॥
३२३॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु दूसरा ग्रास उठा रहे थे, तब स्वरूप दामोदर ने उनका हाथ पकड़ लिया और बोले, “यह आपके योग्य नहीं है। इस तरह उन्होंने उस भोजन को बलपूर्वक ले लिया।"
प्रभु बले,--'निति-निति नाना प्रसाद खाइ ।। ऐछे स्वाद आर कोन प्रसादे ना पाइ ॥
३२४॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, ‘निस्सन्देह, मैं हररोज तरह-तरह के प्रसाद खाता हूँ, किन्तु मैंने कभी ऐसा उत्तम प्रसाद नहीं खाया, जैसाकि रघुनाथ खा रहा है।"
एई-मत महाप्रभु नाना लीला करे ।।रघुनाथेर वैराग्य देखि सन्तोष अन्तरे ॥
३२५॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगन्नाथपुरी में अनेक लीलाएँ कीं। वे रघुनाथ दास को संन्यास आश्रम में कठिन तपस्या करते देखकर अत्यधिक तुष्ट थे।"
महा-सम्पद्दावादपि पतितमुधृत्य कृपया ।स्वरूपे यः स्वीये कुजनमपि मां न्यस्य मुदितः ।। उरो-गुञ्जा-हारं प्रियमपि च गोवर्धन-शिलांददौ मे गौराङ्गो हृदय उदयन्मां मदयति ॥
३२७॥
यद्यपि मैं पतित, अति अधम हूँ, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी कृपा से महान् भौतिक ऐश्वर्य की प्रज्वलित दावाग्नि से मुझे उबार लिया है। उन्होंने परम प्रसन्नतापूर्वक मुझे अपने निजी संगी स्वरूप दामोदर को सौंप दिया। महाप्रभु ने मुझे अपने वक्षस्थल पर पड़ी हुई गुंजामाला तथा गोवर्धन शिला दी, यद्यपि ये वस्तुएँ उन्हें अतीव प्रिय थीं। ऐसे श्री चैतन्य महाप्रभु मेरे हृदय के भीतर उदय होकर मुझे उन्मत्त बना देते हैं।"
आपन-उद्धार एइ रघुनाथ-दास ।।‘गौराङ्ग-स्तव-कल्प-वृक्षे' करियाछेन प्रकाश ॥
३२६॥
रघुनाथ दास ने 'गौराङ्गस्तवकल्पवृक्ष' नामक अपनी कविता में अपने उद्धार का वर्णन किया है।"
एइ त कहिलॆ रघुनाथेर मिलन ।इहा येइ शुने पाय चैतन्य-चरण ॥
३२८॥
इस तरह मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु से रघुनाथ दास की भेंट का वर्णन किया है। जो कोई इस घटना के विषय में सुनता है, वह श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों को प्राप्त करता है।"
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश । ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
३२९॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा उनकी कृपा की कामना करते हुए उनके चरणचिह्नों पर चलकर मैं कृष्णदास श्री चैतन्य चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।"
