अध्याय पांच: प्रद्युम्न मिश्र को रामानंद राय से निर्देश कैसे प्राप्त हुए
वैगुण्य-कीट-कलितः पैशुन्य-व्रण-पीड़ितः ।। दैन्यार्णवे निमग्नोऽहं चैतन्य-वैद्यमाश्रये ॥
१॥
मैं भौतिक कर्म के कीटों से दंशित और द्वेष के फोड़ों से पीड़ित हैं। इसलिए दीनता के सागर में गिरकर मैं महान् वैद्य श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण ग्रहण करता हूँ।"
जय जय शची-सुत श्री-कृष्ण-चैतन्य ।। जय जय कृपा-मय नित्यानन्द धन्य ॥
२॥
शची माता के पुत्र श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! निस्सन्देह, वे सर्वाधिक यशस्वी तथा कृपामय हैं।"
जयाद्वैत कृपा-सिन्धु जय भक्त-गण । जय स्वरूप, गदाधर, रूप, सनातन ॥
३॥
मैं कृपा के सागर अद्वैत प्रभु को तथा स्वरूप दामोदर गोस्वामी, गदाधर पण्डित, श्री रूप गोस्वामी तथा श्री सनातन गोस्वामी जैसे समस्त भक्तों को सादर नमस्कार करता हूँ।"
एक-दिन प्रद्युम्न-मिश्र प्रभुर चरणे ।।दण्डवत् करि' किछु करे निवेदने ॥
४॥
एक दिन प्रद्युम्न मिश्र नाम का एक भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु के पास आया और उन्हें दण्डवत् प्रणाम करके अत्यन्त विनीत भाव से कुछ निवेदन करने लगा।"
शुन, प्रभु, मुजि दीन गृहस्थ अधम!।।कोन भाग्ये पाछों तोमार दुर्लभ चरण ॥
५॥
उसने कहा, “हे प्रभु, कृपया मेरी बात सुनें । मैं मनुष्यों में सबसे नीच, कृपण गृहस्थ हूँ, किन्तु अपने सौभाग्य से मैंने किसी तरह आपके दुर्लभ चरणकमलों की शरण प्राप्त की है।"
कृष्ण-कथा शुनिबारे मोर इच्छा हय ।। कृष्ण-कथा कह मोरे हा सदय ॥
६॥
मैं निरन्तर कृष्ण विषयक कथाएँ सुनना चाहता हूँ। कृपया मेरे ऊपर दयालु होइए और मुझे कृष्ण के विषय में कुछ बतलाइये।"
प्रभु कहेन,–कृष्ण-कथा आमि नाहि जानि । सबे रामानन्द जाने, ताँर मुखे शुनि ॥
७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, मैं कृष्ण विषयक कथाएँ नहीं जानता। मेरे विचार से एकमात्र रामानन्द राय उन्हें जानते हैं, क्योंकि मैं उन्हीं से ये कथाएँ सुनता हूँ।"
भाग्ये तोमार कृष्ण-कथा शुनिते हय मन ।रामानन्द-पाश स्राइ' करह श्रवण ॥
८॥
। यह तो तुम्हारा सौभाग्य है कि कृष्ण विषयक कथाएँ सुनने के लिए तुम्हारी रुचि हुई है। तुम्हारे लिए सबसे अच्छा यही होगा कि तुम रामानन्द राय के पास जाओ और उनसे इन कथाओं के विषय में सुनो।"
कृष्ण-कथाय रुचि तोमार—बड़ भाग्यवान् ।यार कृष्ण-कथाय रुचि, सेइ भाग्यवान् ॥
९॥
मैं देख रहा हूँ कि तुममें कृष्ण विषयक कथा सुनने के प्रति रुचि उत्पन्न हुई है। इसलिए तुम अत्यन्त भाग्यशाली हो। न केवल तुमने, अपितु जिस किसी ने ऐसी रुचि उत्पन्न कर ली है, वही परम भाग्यशाली माना जाता है।"
धर्मः स्वनुष्ठितः पुंसां विष्वक्सेन-कथासु यः ।।नोत्पादयेद् यदि रतिं श्रम एव हि केवलम् ॥
१०॥
“जो व्यक्ति वर्णाश्रम प्रणाली के अनुसार विधि-विधानों को उचित रीति से सम्पन्न करता है, किन्तु कृष्ण के प्रति सुप्त अनुराग को विकसित नहीं करता अथवा कृष्ण के विषय में सुनने तथा कीर्तन करने के प्रति रुचि उत्पन्न नहीं करता, वह व्यर्थ ही श्रम करता है।"
तबे प्रद्युम्न-मिश्र गेला रामानन्देर स्थाने ।रायेर सेवक ताँरै वसाइल आसने ॥
११॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के द्वारा इस प्रकार मन्त्रणा दिये जाने पर प्रद्युम्न मिश्र रामानन्द राय के घर गया। वहाँ उनके नौकर ने उसे बैठने के लिए समुचित आसन दिया।"
दर्शन ना पाबा मिश्र सेवके पुछिल ।रायेर वृत्तान्त सेवक कहिते लागिल ॥
१२॥
रामानन्द राय का तुरन्त दर्शन न पाकर प्रद्युम्न मिश्र ने नौकर से पूछताछ की, जिसने श्री रामानन्द राय की कार्य-व्यस्तता के सम्बन्ध में बताया।"
दुइ देव-कन्या हय परम-सुन्दरी ।।नृत्य-गीते सुनिपुणा, वयसे किशोरी ॥
१३॥
दो नर्तकी कन्याएँ हैं, जो अतीव सुन्दर हैं। वे अत्यन्त तरुणावस्था में हैं और नाचने-गाने में अति दक्ष हैं।
सेइ मुँहे ला राय निभृत उद्याने ।निज-नाटक-गीतेर शिखाय नर्तने ॥
१४॥
श्रील रामानन्द राय इन दोनों कन्याओं को अपने उद्यान के एकान्त स्थान में ले गये हैं, जहाँ वे स्वरचित नाटक के लिए लिखे गये गीतों के अनुसार उन्हें नृत्य का प्रशिक्षण दे रहे हैं तथा निर्देशन कर रहे हैं।"
तुमि इहाँ वसि' रह, क्षणेके आसिबेन । तबे ग्रेइ आज्ञा देह, सेइ करिबेन ॥
१५॥
कृपया यहाँ बैठ जायें और कुछ क्षणों तक प्रतीक्षा करें। उनके आते ही आप जो आदेश देंगे वे करेंगे।"
तबे प्रद्युम्न-मिश्र ताहाँ रहिल वसिया ।रामानन्द निभृते सेइ दुइ-जन ला ॥
१६॥
जब प्रद्युम्न मिश्र वहाँ बैठा हुआ था, तब रामानन्द राय दो कन्याओं को एकान्त स्थान में ले गये।"
स्व-हस्ते करेन तार अभ्यङ्ग-मर्दन ।।स्व-हस्ते करान स्नान, गात्र सम्मार्जन ॥
१७॥
श्री रामानन्द राय ने अपने हाथों से उनके शरीर में तेल से मालिश की और जल से स्नान कराया। निस्सन्देह, रामानन्द राय ने अपने हाथों से उनके सारे शरीर को साफ किया।"
स्व-हस्ते परान वस्त्र, सर्वाङ्ग मण्डन ।।तबु निर्विकार राय-रामानन्देर मन ॥
१८॥
यद्यपि उन्होंने दोनों तरुणियों को वस्त्र पहनाए तथा उनके शरीरों को अपने हाथ से सजाया, किन्तु वे निर्विकार रहे। ऐसा है श्री रामानन्द राय का मन।"
काष्ठ-पाषाण-स्पर्शे हय ग्रैछे भाव ।तरुणी-स्पर्शे रामानन्देर तैछे ‘स्वभाव' ॥
१९॥
उन तरुणियों को स्पर्श करते समय वे काठ या पत्थर का स्पर्श करने वाले व्यक्ति के समान थे, क्योंकि उनका शरीर तथा मन दोनों अप्रभावित थे।"
सेव्य-बुद्धि आरोपिया करेन सेवन ।स्वाभाविक दासी-भाव करेन आरोपण ॥
२० ॥
श्रील रामानन्द राय ऐसा इसलिए करते थे, क्योंकि वे अपने आपको अपनी स्वाभाविक स्थिति में गोपियों की दासी के रूप में मानते थे। इस तरह यद्यपि वे बाहर से पुरुष प्रतीत होते थे, किन्तु अन्तःकरण से अपनी मूल आध्यात्मिक स्थिति में वे अपने आपको दासी रूप में और दोनों कन्याओं को गोपियाँ मानते थे।"
महाप्रभुर भक्त-गणेर दुर्गम महिमा ।ताहे रामानन्देर भाव-भक्ति-प्रेम-सीमा ॥
२१॥
नुवाद श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों की महानता को समझ पाना अत्यधिक कठिन है। इन सबमें श्री रामानन्द राय अनोखे हैं, क्योंकि उन्होंने यह दिखला दिया कि कोई अपने प्रेमावेश ( भाव-प्रेम) को किस तरह चरम सीमा ( पराकाष्ठा ) तक पहुँचा सकता है।"
तबे सेइ दुइ-जने नृत्य शिखाइला ।गीतेर गूढ़ अर्थ अभिनय कराइला ॥
२२॥
रामानन्द राय ने दोनों लड़कियों को नाचने तथा नाटकीय अभिनयों द्वारा उनके गीतों के गूढ़ अर्थ को व्यक्त करने का निर्देशन दिया।"
सञ्चारी, सात्त्विक, स्थायि-भावेर लक्षण । मुखे नेत्रे अभिनय करे प्रकटन ॥
२३॥
उन्होंने उन दोनों को संचारी, सात्त्विक तथा स्थायी भावों के लक्षणों को मुख, नेत्र तथा शरीर के अन्य भागों की गतियों द्वारा व्यक्त करना सिखाया।"
भाव-प्रकटन-लास्य राय ने शिखाय ।। जगन्नाथेर आगे हे प्रकट देखाये ॥
२४॥
। स्त्री सुलभ नृत्य भंगिमाओं के माध्यम से रामानन्द राय द्वारा प्रशिक्षित दोनों तरुणियों ने इन भावाभिव्यक्तियों को भगवान जगन्नाथ के समक्ष हूबहू प्रदर्शित किया।"
तबे सेइ दुइ-जने प्रसाद खाओयाइला ।निभृते मुँहारे निज-घरे पाठाइला ॥
२५॥
तब रामानन्द राय ने दोनों तरुणियों को प्रचुर प्रसाद खिलाया और किसी को प्रकट किये बिना उन दोनों को उनके घर भेज दिया।"
प्रति-दिन राय ऐछे कराय साधन ।को जाने क्षुद्र जीव काँहा ताँर मन? ॥
२६॥
प्रतिदिन वे उन दोनों देवदासियों को नृत्य सिखाते। जिन क्षुद्र जीवों के मन सदैव भौतिक इन्द्रियतृप्ति में लीन रहते हों, भला उनमें से ऐसा कौन होगा, जो श्री रामानन्द राय के मनोभाव को समझ सकता था?" मिश्रेर आगमन राये सेवक कहिली । शीघ्र रामानन्द तबे सभाते आइला ॥
२७॥
जब नौकर ने रामानन्द राय को प्रद्युम्न मिश्र के आगमन की सूचना दी, तो वे तुरन्त ही सभाकक्ष गये।"
मिश्रेरे नमस्कार करे सम्मान करिया । निवेदन करे किछु विनीत हा ॥
२८॥
उन्होंने प्रद्युम्न मिश्र को सादर नमस्कार किया और तब अत्यन्त विनीत होकर इस प्रकार कहा।
बहु-क्षण आइला, मोरे केह ना कहिल । तोमार चरणे मोर अपराध हइल ॥
२९॥
। हे महोदय, आप काफी समय पहले यहाँ आये, किन्तु किसी ने मुझे सूचित नहीं किया। इसलिए मैं निश्चित रूप से आपके चरणकमलों पर अपराधी हूँ।"
तोमार आगमने मोर पवित्र हैल घर ।आज्ञा कर, क्या करों तोमार किङ्कर ॥
३० ॥
आपके आने से मेरा सम्पूर्ण घर पवित्र हो गया है। कृपया मुझे आदेश दें। मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ? मैं आपका सेवक हूँ।"
मिश्र कहे,–‘तोमा देखिते हैल आगमने ।आपना पवित्र कैलँ तोमार दरशने ॥
३१॥
प्रद्युम्न मिश्र ने उत्तर दिया, मैं तो केवल आपका दर्शन करने आया था। अब मैंने आपका दर्शन करके अपने आपको पवित्र कर लिया है।"
अतिकाल देखि' मिश्र किछु ना कहिल । विदाय हइया मिश्र निज-घर गेल ॥
३२॥
यह देखकर कि काफी देर हो चुकी है, उसने रामानन्द राय से कुछ भी नहीं कहा। प्रत्युत उसने विदा ली और अपने घर लौट गया।"
आर दिन मिश्र आइल प्रभु-विद्यमाने ।प्रभु कहे,—कृष्ण-कथा शुनिला राय-स्थाने'? ॥
३३॥
अगले दिन जब प्रद्युम्न मिश्र श्री चैतन्य महाप्रभु की उपस्थिति में आया, तो महाप्रभु ने पूछा, ‘क्या तुमने श्री रामानन्द राय से कृष्ण के विषय में कथाएँ सुनीं? ।"
तबे मिश्र रामानन्देर वृत्तान्त कहिला ।।शुनि' महाप्रभु तबे कहिते लागिला ॥
३४॥
तब प्रद्युम्न मिश्र ने श्री रामानन्द राय के कार्यकलापों का वर्णन किया। इन्हें सुनने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु बोलने लगे।"
आमि त' सन्यासी, आपनारे विरक्त करि' मानि । दर्शन रहु दूरे, 'प्रकृतिर' नाम ग्रदि शुनि ॥
३५॥
तबहिं विकार पाय मोर तनु-मन ।।प्रकृति-दर्शने स्थिर हय को जन? ॥
३६॥
। उन्होंने कहा, मैं एक संन्यासी हूँ और मैं निश्चित रूप से अपनेआपको विरक्त मानता हूँ। किन्तु स्त्री को देखने की बात तो दूर रही, यदि मैं स्त्री का नाम भी सुनता हूँ, तो मैं अपने तन तथा मन में विकार का अनुभव करता हूँ। इसलिए स्त्री के दर्शन से कौन अविचलित रह सकता है? यह बहुत कठिन है।
रामानन्द रायेर कथा शुन, सर्व-जन । कहिबार कथा नहे, ग्राही आश्चर्य-कथन ॥
३७॥
सभी लोग कृपया रामानन्द राय के विषय में इन बातों को सुनो; यद्यपि वे इतनी अद्भुत तथा असामान्य हैं कि उन्हें कहा नहीं जाना चाहिए।"
एके देव-दासी, आर सुन्दरी तरुणी ।।तार सब अङ्ग-सेवा करेन आपनि ॥
३८॥
दोनों पेशेवर नर्तकियाँ सुन्दरी तथा तरुणियाँ हैं, फिर भी श्री रामानन्द राय उनके शरीरों में अपने हाथ से तेल की मालिश करते हैं।"
स्नानादि कराय, पराय वास-विभूषण ।।गुह्य अङ्गेर हय ताहा दर्शन-स्पर्शन ॥
३९॥
। “वे स्वयं ही उन्हें नहलाते हैं और आभूषणों से विभूषित करते हैं। इस तरह वे स्वाभाविक रूप से उनके शरीरों के गुप्तांगों को देखते तथा छूते हैं।"
तबु निर्विकार राय-रामानन्देर मन । नाना-भावोद्गार तारे कराय शिक्षण ॥
४०॥
“तो भी, रामानन्द राय के मन में कभी विकार नहीं आता, यद्यपि वे उन कन्याओं को यह सिखाते हैं कि भाव के सारे लक्षणों को शरीर द्वारा किस तरह व्यक्त किया जाए।"
निर्विकार देह-मन काष्ठ-पाषाण-सम! ।। आश्चर्य, तरुणी-स्पर्शे निर्विकार मन ॥
४१॥
उनका मन काठ या पत्थर की तरह स्थिर है। निस्सन्देह, यह आश्चर्यजनक है कि जब वे ऐसी तरुणियों का स्पर्श करते हैं, तो भी उनका मन कभी चलायमान नहीं होता।"
एक रामानन्देर हय एइ अधिकार । ताते जानि अप्राकृत-देह ताँहार ॥
४२॥
‘ऐसे कार्यों पर एकमात्र रामानन्द राय का जन्मसिद्ध अधिकार है, क्योंकि मैं समझ सकता हूँ कि उनका शरीर भौतिक नहीं, अपितु पूरी तरह आध्यात्मिक हो चुका है।"
ताँहार मनेर भाव तेह जाने मात्र ।ताहा जानिबारे आर द्वितीय नाहि पात्र ॥
४३॥
एकमात्र वे ही अपने मन की स्थिति को समझ सकते हैं, अन्य कोई नहीं।"
किन्तु शास्त्र-दृष्ट्ये एक करि अनुमान ।श्री-भागवत-शास्त्र ताहाते प्रमाण ॥
४४॥
“किन्तु मैं शास्त्र के निर्देशों के अनुसार अनुमान कर सकता हूँ। वैदिक शास्त्र श्रीमद्भागवत इस विषय में प्रत्यक्ष साक्ष्य प्रस्तुत करता है।"
व्रज-वधू-सङ्गे कृष्णेर रासादि-विलास । ग्रेइ जन कहे, शुने करिया विश्वास ॥
४५ ॥
हृद्-रोग-काम ताँर तत्काले हय क्षय ।। तिन-गुण-क्षोभ नहे, ‘महा-धीर' हय ॥
४६॥
जब कोई कृष्ण की लीलाओं, यथा गोपियों के साथ उनके रासनृत्य को अत्यन्त श्रद्धापूर्वक सुनता या कहता है, तो उसके हृदय की कामवासनाएँ तथा भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से उत्पन्न क्षोभ तुरन्त ही नष्ट हो जाते हैं और वह धीर तथा शान्त बन जाता है।"
उज्ज्वल मधुर प्रेम-भक्ति सेइ पाय ।।आनन्दे कृष्ण-माधुग्ने विहरे सदाय ॥
४७॥
कृष्ण के दिव्य, तेजस्वी, मधुर प्रेम का आस्वादन करते हुए ऐसा व्यक्ति कृष्ण की लीलाओं की मधुरता के दिव्य आनन्द को चौबीसों घण्टे भोग सकता है।"
विक्रीड़ितं व्रज-वधूभिरिदं च विष्णोःश्रद्धान्वितोऽनुशृणुयादथ वर्णयेद् यः । भक्तिं परां भगवति प्रतिलभ्य कामं हृद्-रोगमाश्वपहिनोत्यचिरेण धीरः ॥
४८॥
एक दिव्य रूप से धीर व्यक्ति, जो गोपियों के साथ कृष्ण के रासनृत्य की लीलाओं के विषय में किसी स्वरूपसिद्ध व्यक्ति से श्रद्धा तथा प्रेमपूर्वक निरन्तर श्रवण करता है या जो कोई इनका वर्णन करता है, वह परम पुरुष भगवान् के चरणकमलों में पूर्ण दिव्य भक्ति प्राप्त कर सकता है। इस तरह भौतिक कामेच्छाएँ, जो कि समस्त भौतिकतावादी व्यक्तियों के हृदय का रोग है, उसके लिए तुरन्त ही पूर्णतः विनष्ट हो जाती है।"
ग्रे शुने, ग्रे पड़े, ताँर फल एतादृशी । सेइ भावाविष्ट ग्रेइ सेवे अहर्निशि ॥
४९॥
ताँर फल कि कहिमु, कहने ना ग्राय ।।नित्य-सिद्ध सेइ, प्राय-सिद्ध ताँर काय ॥
५०॥
श्रील रूप गोस्वामी के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए यदि दिव्य पद को प्राप्त व्यक्ति कृष्ण की रासलीला के विषय में सुनता और कहता है तथा अपने मन में भगवान् की दिन-रात सेवा करते हुए कृष्ण के विचारों में सदा डूबा रहता है, तो उसे जो फल मिलेगा उसके विषय में मैं क्या कहूँ? यह आध्यात्मिक रूप से इतना महान् है कि शब्दों द्वारा इसे व्यक्त नहीं किया जा सकता। ऐसा व्यक्ति भगवान् का नित्यमुक्त संगी होता है और उसका शरीर पूर्णतया आध्यात्मिक होता है। यद्यपि वह भौतिक नेत्रों को दिखता है, किन्तु वह आध्यात्मिक पद को प्राप्त रहता है और उसके सारे कार्यकलाप आध्यात्मिक होते हैं। कृष्ण की इच्छा से ऐसे भक्त को आध्यात्मिक शरीर प्राप्त हुआ समझा जाता है।"
रागानुग-मार्गे जानि रायेर भजन ।। सिद्ध-देह-तुल्य, ताते 'प्राकृत' नहे मन ॥
५१॥
श्रील रामानन्द राय भगवान् के रागानुग प्रेम (स्वतःस्फूर्त प्रेम) के मार्ग पर स्थित हैं। अतः वे अपने आध्यात्मिक शरीर में हैं और उनका मन भौतिक रूप से प्रभावित नहीं है।"
आमिह रायेर स्थाने शुनि कृष्ण-कथा ।शुनिते इच्छा हय ग्नदि, पुनः ग्राह तथा ॥
५२॥
मैं भी रामानन्द राय से कृष्ण विषयक कथाएँ सुनता हूँ। यदि तुम ऐसी कथाएँ सुनना चाहते हो, तो उनके पास पुनः जाओ।"
मोर नाम लइह,-'तेहो पाठाइला मोरे ।।तोमार स्थाने कृष्ण-कथा शुनिबार तरे' ॥
५३॥
“तुम उनके समक्ष यह कहकर मेरा नाम ले सकते हो कि, उन्होंने आपसे कृष्ण के विषय में सुनने के लिए मुझे भेजा है।'" शीघ्र ग्रह, ग्रावत्तेहो आछेन सभाते’।एत शुनि' प्रद्युम्न-मिश्र चलिला तुरिते ॥
५४॥
जब तक वे सभाकक्ष में हैं, तुम दल्दी से जाओ। यह सुनकर प्रद्युम्न मिश्र तुरन्त चला गया।"
राय-पाश गेल, राय प्रणति करिल ।‘आज्ञा कर, ग्रे लागि' आगमन हैल' ॥
५५॥
प्रद्युम्न मिश्र रामानन्द राय के पास गया, जिन्होंने उन्हें सादर नमस्कार किया और कहा, कृपया आज्ञा दें। आप किस कार्य से आये हैं?" मिश्र कहे,—‘महाप्रभु पाठाइला मोरे ।।तोमार स्थाने कृष्ण-कथा शुनिबार तरे' ॥
५६॥
प्रद्युम्न मिश्र ने उत्तर दिया, श्री चैतन्य महाप्रभु ने मुझे आपसे कृष्णकथाएँ सुनने के लिए भेजा है।"
शुनि' रामानन्द राय हैला प्रेमावेशे ।।कहिते लागिला किछु मनेर हरिषे ॥
५७॥
यह सुनकर रामानन्द राय प्रेमानन्द में मग्न हो गये और अतीव दिव्य हर्षपूर्वक बोलने लगे।"
प्रभुर आज्ञाय कृष्ण-कथा शुनिते आइला एथा ।इहा वइ महा-भाग्य आमि पाब कोथा?’ ॥
५८॥
आप श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश का पालन करते हुए कृष्ण के विषय में सुनने के लिए आये हैं। यह मेरा परम सौभाग्य है। भला और किस तरह मैं ऐसा अवसर पा सकता था?" एत कहि तारे ला निभृते वसिला । ‘कि कथा शुनिते चाह?' मिश्रेरे पुछिला ॥
५९॥
यह कहकर श्री रामानन्द राय प्रद्युम्न मिश्र को एकान्त स्थान में ले गये और उससे पूछा, आप मुझसे किस तरह की कृष्ण-कथा सुनना चाहते हैं?" तेहो कहे,–ग्रे कहिला विद्यानगरे । सेइ कथा क्रमे तुमि कहिबा आमारे ॥
६०॥
। प्रद्युम्न मिश्र ने उत्तर दिया, “कृपया मुझसे वही कथाएँ कहें, जो आपने विद्यानगर में कही थीं।"
आनेर कि कथा, तुमि-प्रभुर उपदेष्टा! ।। आमि त' भिक्षुक विप्र, तुमि मोर पोष्टा ॥
६१॥
। आप तो श्री चैतन्य महाप्रभु के भी उपदेशक हैं, अन्यों की क्या कही जाए। मैं तो एक भिखारी ब्राह्मण हूँ और आप मेरे पालनकर्ता हैं।"
भाल, मन्द–किछु आमि पुछिते ना जानि ।।‘दीन' देखि' कृपा करि' कहिबा आपनि’ ॥
६२॥
मैं नहीं जानता कि कैसे पूछना चाहिए, क्योंकि मैं नहीं जानता कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है। मुझे अल्प ज्ञान वाला देखकर आप अपनी इच्छा से जो मेरे लिए अच्छा हो वही कहें।"
तबे रामानन्द क्रमे कहिते लागिला ।कृष्ण-कथा-रसामृत-सिन्धु उथलिला ॥
६३॥
' तत्पश्चात् रामानन्द राय ने क्रम से कृष्ण-कथाएँ कहनी शुरू कर दीं। इस तरह उन कथाओं के दिव्य रस का सागर उफनने लगा।"
आपने प्रश्न करि' पाछे करेन सिद्धान्त ।। तृतीय प्रहर हैल, नहे कथा-अन्त ॥
६४॥
वे स्वयं प्रश्न करते और फिर निर्णयात्मक कथनों से उनका उत्ता देते। जब दोपहर हो गई, तो भी कथाओं का अन्त नहीं हुआ।"
वक्ता श्रोता कहे शुने हुँहे प्रेमावेशे । आत्म-स्मृति नाहि, काहाँ जानिब दिन-शेषे ॥
६५॥
वक्ता तथा श्रोता प्रेमावेश में बोलते तथा सुनते रहे। इस तरह वे अपने शरीर की सुधि-बुध खो बैठे। तो फिर वे दिन के अन्त को कैसे सम पाते?" सेवक कहिल,–'दिन हैल अवसान' । तबे राय कृष्ण-कथार करिला विश्राम ॥
६६॥
सेवक ने उन्हें बतलाया कि, “दिन ढल चुका है। तब रामानन्द राय ष्ण विषयक अपनी कथाएँ समाप्त कीं।"
बहु-सम्मान करि' मिश्रे विदाय दिला ।।‘कृतार्थ हइलाङ' बलि' मिश्र नाचिते लागिला ॥
६७॥
। रामानन्द राय ने प्रद्युम्न मिश्र का अत्यधिक सम्मान किया और उसे वा किया। प्रद्युम्न मिश्र ने कहा, ‘मैं अत्यधिक तुष्ट हूँ।‘ तब वह नाचने लगा।"
घरे गिया मिश्र कैल स्नान, भोजन ।सन्ध्या-काले देखिते आइल प्रभुर चरण ॥
६८॥
। घर लौटकर प्रद्युम्न मिश्र ने स्नान और भोजन किया। शाम को वह चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों का दर्शन करने आया।"
प्रभुर चरण वन्दे उल्लसित-मने ।। प्रभु कहे,—कृष्ण-कथा हइल श्रवणे'? ॥
६९॥
। उसने अत्यधिक प्रसन्नता से श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की पूजा की। महाप्रभु ने पूछा, 'क्या तुमने कृष्ण-कथाएँ सुनीं ?" मिश्र कहे,’प्रभु, मोरे कृतार्थ करिला । कृष्ण-कथामृतार्णवे मोरे डुबाइला ॥
७० ॥
प्रद्युम्न मिश्र ने कहा, “हे प्रभु, आपने मुझे आपका अत्यन्त कृतज्ञ बना दिया है, क्योंकि आपने कृष्ण-कथा के अमृत-सागर में मुझे डुबो दिया हैं।"
रामानन्द राय-कथा कहिले ना हय । ‘मनुष्य' नहे राय, कृष्ण-भक्ति-रस-मय ॥
७१॥
मैं रामानन्द राय की कथाओं का ठीक-ठीक वर्णन नहीं कर सकता, क्योंकि वे कोई सामान्य मनुष्य नहीं हैं। वे कृष्ण की भक्ति में पूर्णतया निमग्न हैं।"
आर एक कथा राय कहिला आमारे ।। ‘कृष्ण-कथा-वक्ता करि' ना जानिह मोरे ॥
७२॥
एक अन्य बात भी रामानन्द राय ने मुझसे कही है। तुम मुझे इन कृष्ण-कथाओं का वक्ता मत मानना।"
मोर मुखे कथा कहेन आपने गौरचन्द्र ।। ग्रैछे कहाय, तैछे कहि,—ग्रेन वीणा-यन्त्र ॥
७३॥
मैं जो भी कहता हूँ, वह श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं बोलते हैं। मैं एक वीणा की तरह हूँ। वे मुझसे जो कहलवाते हैं, उसका ही मैं उच्चारण करता हूँ।"
मोर मुखे कहाय कथा, करे परचार ।पृथिवीते के जानिबे ए-लीला ताँहार?' ॥
७४॥
इस तरह महाप्रभु कृष्णभावनामृत सम्प्रदाय का प्रचार करने के लिए मेरे मुख से बोलते हैं। इस संसार में ऐसा कौन है, जो महाप्रभु की इस लीला को समझ सकेगा?" ग्रे-सब शुनिहुँ, कृष्ण-रसेर सागर ।।ब्रह्मादि-देवेर ए सब ना हय गोचर ॥
७५ ॥
मैंने रामानन्द राय से जो कुछ सुना है, वह कृष्ण-कथाओं के अमृत सागर के तुल्य है। यहाँ तक कि ब्रह्मादि देवता भी इन कथाओं को नहीं समझ पाते।"
हेन 'रस' पान मोरे कराइला तुमि ।जन्मे जन्मे तोमार पाय विकाइलाङ आमि ॥
७६ ॥
“हे प्रभु, आपने कृष्ण-कथा का यह दिव्य अमृत मुझे पिलाया है। अतएव मैं जन्म-जन्मान्तर के लिए आपके चरणकमलों में बिक गया" प्रभु कहे,–रामानन्द विनयेर खनि ।आपनार कथा पर-मुण्डे देन आनि' ॥
७७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, रामानन्द राय समस्त विनयशीलता की खान हैं। इसलिए उन्होंने अपने शब्दों को दूसरे की बुद्धि पर आरोपित कर दिया है।"
महानुभवेर एइ सहज ‘स्वभाव' हय ।आपनार गुण नाहि आपने कहय ॥
७८॥
जो लोग भक्ति में उन्नत होते हैं, उनका यह सहज स्वभाव है।। अपने सद्गुणों का स्वयं बखान नहीं करते।"
रामानन्द-रायेर एई कहिलु गुण-लेश ।।प्रद्युम्न मिश्रेरे भैछे कैला उपदेश ॥
७९॥
मैंने रामानन्द राय के दिव्य गुणों के अंश मात्र का क्र्मान किया है, जो प्रद्युम्न मिश्र को उपदेश देते समय प्रकट हुए।"
‘गृहस्थ' हा नहे राय षडू-वर्गेर वशे ।।‘विषयी' हा सन्यासीरे उपदेशे ॥
८०॥
यद्यपि रामानन्द राय गृहस्थ थे, किन्तु वे छः प्रकार के शारीरिक परिवर्तनों के वशीभूत नहीं थे। यद्यपि ऊपर से वे धन-सम्पत्ति में आसक्त पक्ति प्रतीत होते थे, किन्तु उन्होंने संन्यासियों तक को उपदेश दिया।"
एइ-सब गुण ताँर प्रकाश करिते ।।मिश्रेरे पाठाइला ताहाँ श्रवण करिते ॥
८१॥
श्री रामानन्द राय के दिव्य गुणों के प्रदर्शनार्थ ही श्री चैतन्य महाप्रभु में प्रद्युम्न मिश्र को उनसे कृष्ण विषयक चर्चाएँ सुनने के लिए भेजा था।"
भक्त-गुण प्रकाशिते प्रभु भाल जाने ।नाना-भङ्गीते गुण प्रकाशि' निज-लाभ माने ॥
८२॥
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु अच्छी तरह जानते हैं कि अपने भक्तों के गुणों को किस तरह प्रकट किया जाए। इसलिए वे एक चित्रकार की भाँति इसे अनेक प्रकारों से प्रदर्शित करते हैं और इसे वे निजी लाभ मानते हैं।"
आर एक 'स्वभाव' गौरेर शुन, भक्त-गण ।ऐश्वर्य-स्वभाव गूढ़ करे प्रकटन ॥
८३ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु का एक अन्य गुण भी है। हे भक्तों, ध्यानपूर्वक सुनो कि वे किस तरह अपना ऐश्वर्य तथा गुण प्रकट करते हैं, यद्यपि वे अत्यधिक गूढ़ होते हैं।"
सन्यासी पण्डित-गणेर करिते गर्व नाश ।। नीच-शूद्र-द्वारा करेन धर्मेर प्रकाश ॥
८४॥
। तथाकथित संन्यासियों एवं पण्डितों के मिथ्या अभिमान को नष्ट करने के लिए वे शूद्र या निम्न कुल के व्यक्ति द्वारा भी वास्तविक धर्म का प्रचार करते हैं।"
‘भक्ति', 'प्रेम', 'तत्त्व' कहे राये करि’ ‘वक्ता' । आपनि प्रद्युम्न-मिश्र-सह हय' श्रोता' ॥
८५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने निम्न कुलजन्मा गृहस्थ रामानन्द राय को वक्ता बनाकर भक्ति, प्रेम तथा परम सत्य के विषय में प्रचार किया। फिर स्वयं । उच्च ब्राह्मण संन्यासी श्री चैतन्य महाप्रभु तथा शुद्ध ब्राह्मण प्रद्युम्न । मिश्र-दोनों रामानन्द राय के श्रोता बने।"
हरिदास-द्वारा नाम-माहात्म्य-प्रकाश । सनातन-द्वारा भक्ति-सिद्धान्त-विलास ॥
८६॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान् के पवित्र नाम की महिमा हरिदास ठाकुर के माध्यम से प्रकट की, जो मुसलमान परिवार में उत्पन्न हुए थे। इसी तरह उन्होंने सनातन गोस्वामी के माध्यम से भक्ति का सार प्रकट किया, जो लगभग मुसलमान बनाये जा चुके थे।"
श्री-रूप-द्वारा व्रजेर प्रेम-रस-लीला । के बुझिते पारे गम्भीर चैतन्येर खेला? ॥
८७॥
महाप्रभु ने श्रील रूप गोस्वामी के माध्यम से वृन्दावन के प्रेम तथा उसकी दिव्य लीलाओं को भी प्रकट किया। इन सब पर विचार करने पर भला कौन ऐसा है, जो श्री चैतन्य महाप्रभु की गम्भीर योजनाओं को समझ सकता है?" श्री-चैतन्य-लीला एइ–अमृतेर सिन्धु ।त्रिजगत् भासाइते पारे ग्रार एक बिन्दु ॥
८८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यकलाप अमृत के सिन्धु के समान हैं। इस । सिन्धु की एक बूंद भी तीनों लोकों को आप्लावित कर सकती है।"
चैतन्य-चरितामृत नित्य कर पान ।। ग्राहा हैते ‘प्रेमानन्द', 'भक्ति-तत्त्व-ज्ञान' ॥
८९॥
हे भक्तों, श्री चैतन्य-चरितामृत तथा श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के अमृत का नित्य ही पान करो, क्योंकि ऐसा करने से मनुष्य दिव्य आनन्द में डूब सकता है और भक्ति के पूर्ण ज्ञान को प्राप्त कर सकता" एइ-मत महाप्रभु भक्त-गण लञा ।।नीलाचले विहरये भक्ति प्रचारिया ॥
९०॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने संगियों, अपने शुद्ध भक्तों के साथ जगन्नाथ पुरी (नीलाचल) में नाना प्रकार से भक्ति सम्प्रदाय का प्रचार करते हुए दिव्य आनन्द का आस्वादन किया।"
बङ्ग-देशी एक विप्र प्रभुर चरिते ।।नाटक करि' ला आइल प्रभुके शुनाइते ॥
९१॥
। बंगाल में रहने वाले एक ब्राह्मण ने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरित्र के विषय में एक नाटक लिखा और उसकी पाण्डुलिपि लेकर महाप्रभु को। सुनाने के लिए आया।"
भगवानाचार्य-सने तार परिचय ।ताँरै मिलि' ताँर घरे करिल आलय ॥
९२॥
यह ब्राह्मण श्री चैतन्य महाप्रभु के एक भक्त भगवान् आचार्य का परिचित था। अतएव जगन्नाथ पुरी में उनसे मिलने के बाद वह ब्राह्मण भगवान् आचार्य के घर में रहने लगा।"
प्रथमे नाटक तेंहो ताँरै शुनाइल ।ताँर सङ्गे अनेक वैष्णव नाटक शुनिल ॥
९३II । पहले तो उस ब्राह्मण ने भगवान् आचार्य को वह नाटक सुनाया और तब अनेक भक्तों ने भगवान् आचार्य के साथ उसे सुना।"
सबेई प्रशंसे नाटक ‘परम उत्तम' ।।महाप्रभुरे शुनाइते सबार हैल मन ॥
९४॥
सारे वैष्णवों ने यह कहकर नाटक की प्रशंसा की कि यह बहुत ही अच्छा है। उन्होंने यह भी इच्छा व्यक्त की कि श्री चैतन्य महाप्रभु भी यह नाटक सुनें।"
गीत, श्लोक, ग्रन्थ, कवित्व—येइ करि' आने । प्रथमे शुनाय सेइ स्वरूपेर स्थाने ॥
९५॥
यह प्रथा थी कि जो कोई भी श्री चैतन्य महाप्रभु के विषय में कोई गीत, श्लोक, ग्रन्थ या कविता लिखता, तो सुनाने के लिए उसे सर्वप्रथम स्वरूप दामोदर गोस्वामी के पास लाना पड़ता।"
स्वरूप-ठाजि उत्तरे ग्रदि, ला, ताँर मन । तबे महाप्रभु-ठात्रि कराय श्रवण ॥
९६॥
यदि स्वरूप गोस्वामी हाँ कर देते, तो वह श्री चैतन्य महाप्रभु को सुनने के लिए प्रस्तुत किया जाता।"
'रसाभास' हय यदि सिद्धान्त-विरोध' । सहिते ना पारे प्रभु, मने हय क्रोध ॥
९७॥
यदि इसका संकेत होता कि दिव्य रसों की व्याप्ति इस तरह हुई है, जो भक्ति सिद्धान्त के विरुद्ध हैं, तो श्री चैतन्य महाप्रभु इसे सहन नहीं कर पाते थे और अत्यन्त क्रुद्ध होते थे।"
अतएवं प्रभु किछु आगे नाहि शुने ।। एई मर्यादा प्रभु करियाछे नियमे ॥
९८॥
इसलिए जब तक स्वरूप दामोदर पहले सुन न लें, तब तक श्री चैतन्य महाप्रभु उसे नहीं सुनते। महाप्रभु ने इस शिष्टाचार या मर्यादा को नियम बना दिया था।"
स्वरूपेर ठाजि आचार्य कैला निवेदन । एक विप्र प्रभुर नाटक करियाछे उत्तम ॥
१९॥
भगवान् आचार्य ने स्वरूप दामोदर गोस्वामी से निवेदन किया, “एक उत्तम ब्राह्मण ने श्री चैतन्य महाप्रभु के विषय में एक नाटक प्रस्तुत किया है, जो अत्युत्तम रीति से लिखा हुआ प्रतीत होता है।"
आदौ तुमि शुन, यदि तोमार मन माने ।।पाछे महाप्रभुरे तबे कराइमु श्रवणे ॥
१०० ॥
पहले आप सुन लें और यदि आपका मन इसे स्वीकार करे, तो मैं श्री चैतन्य महाप्रभु से इसे सुनने के लिए प्रार्थना करूं।"
स्वरूप कहे, तुमि ‘गोप' परम-उदार ।।ग्रे-से शास्त्र शुनिते इच्छा उपजे तोमार ॥
१०१॥
स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने उत्तर दिया, “हे भगवान् आचार्य, तुम अत्यन्त उदार ग्वाले हो। कभी-कभी तुम्हारे भीतर किसी भी प्रकार की कविता को सुनने की इच्छा जागृत हो जाती है।"
‘ग्रद्वा-तद्वा' कविर वाक्ये हय 'रसाभास' । सिद्धान्त-विरुद्ध शुनिते ना हय उल्लास ॥
१०२॥
। “तथाकथित कवियों की रचनाओं में सामान्यतया दिव्य रसों का अतिक्रमण ( रसाभास) की सम्भावना रहती है। इस तरह जब रस सिद्धान्तों के विरुद्ध हो जाते हैं, तो ऐसी कविता को सुनना कोई भी पसन्द नहीं करता।"
'रस', ‘रसाभास' ग्रार नाहिक विचार ।। भक्ति-सिद्धान्त-सिन्धु नाहि पाय पार ॥
१०३॥
जिस कवि को दिव्य रसों का तथा उनके अतिक्रमण का ज्ञान नहीं होता, वह भक्ति के सिद्धान्त रूपी सागर को पार नहीं कर सकता।"
'व्याकरण' नाहि जाने, ना जाने ‘अलङ्कार' । ‘नाटकालङ्कार'-ज्ञान नाहिक ग्राहार ॥
१०४॥
कृष्ण-लीला वर्णिते ना जाने सेइ छार! ।। विशेषे दुर्गम एइ चैतन्य-विहार ॥
१०५॥
“जो कवि व्याकरण के नियमों को नहीं जानता, जो अलंकारों, विशेषतया नाटक में प्रयुक्त अलंकारों को नहीं जानता और जो यह नहीं जानता कि श्रीकृष्ण की लीलाओं को किस तरह प्रस्तुत किया जाए, उसे धिक्कार है। इतना ही नहीं, श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ समझने में विशेष रूप से कठिन हैं।"
कृष्ण-लीला, गौर-लीला से करे वर्णन ।। गौर-पाद-पद्म याँर हय प्राण-धन ॥
१०६॥
जिसने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों को अपने प्राण-धन के रूप में स्वीकार कर लिया है, वही भगवान् कृष्ण या श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का वर्णन कर सकता है।"
ग्राम्य-कविर कवित्व शुनिते हय ‘दुःख' । विदग्ध-आत्मीय-वाक्य शुनिते हय 'सुख' ॥
१०७॥
। “जिस व्यक्ति को दिव्य ज्ञान नहीं है और जो पुरुष तथा स्त्री के पारस्परिक सम्बन्धों के विषय में लिखता है, उसकी कविता सुनकर केवल दुःख होता है; जबकि प्रेम में डूबे भक्त के शब्दों को सुनकर परम सुख उत्पन्न होता है।"
रूप ग्रैछे दुइ नाटक करियाछे आरम्भे ।शुनिते आनन्द बाड़े ग्रार मुख-बन्धे ॥
१०८॥
रूप गोस्वामी ने नाटक रचना का मानक स्थापित किया है। यदि भक्तगण उनके दो नाटकों के आमुख अंशों को सुनते हैं, तो उनसे उनके आनन्द में वृद्धि होती है।"
भगवानाचार्य कहे,'शुन एक-बार । तुमि शुनिले भाल-मन्द जानिबे विचार' ॥
१०९॥
स्वरूप दामोदर द्वारा इस तरह समझाने के बाद भी भगवान् आचार्य ने अनुरोध किया, कृपया एक बार तो यह नाटक सुन लीजिये। यदि आप सुनेंगे, तो विचार कर सकेंगे कि यह अच्छा है या बुरा।"
दुइ तिन दिन आचाख्न आग्रह करिल ।।ताँर आग्रहे स्वरूपेर शुनिते इच्छा हइल ॥
११०॥
भगवान् आचार्य ने लगातार दो-तीन दिनों तक स्वरूप दामोदर गोस्वामी से काव्य सुनने के लिए आग्रह किया। उनके बारम्बार अनुरोधों से स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने बंगाल के ब्राह्मण द्वारा रचित काव्य को सुनने की इच्छा व्यक्त की।"
सबा ला स्वरूप गोसाबि शुनिते वसिला ।तबे सेइ कवि नान्दी-श्लोक पड़िला ॥
१११॥
स्वरूप दामोदर गोस्वामी काव्य सुनने के लिए अन्य भक्तों के साथ बैठ गये और तब कवि ने परिचयात्मक श्लोक (नान्दी श्लोक) पढ़ना प्रारम्भ किया।"
विकच-कमल-नेत्रे श्री-जगन्नाथ-संज्ञेकनक-रुचिरिहात्मन्यात्मतां यः प्रपन्नः । प्रकृति-जड़मशेषं चेतयन्नाविरासीत् ।स दिशतु तव भव्यं कृष्ण-चैतन्य-देवः ॥
११२॥
। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने सुनहरा वर्ण धारण कर लिया है और जगन्नाथ नामक शरीर के आत्मा बन गये हैं, जिनके विकसित कमलनेत्र अतीव विस्तृत हैं। इस तरह वे जगन्नाथ पुरी में प्रकट हुए हैं और उन्हों ने जड़ पदार्थ को चेतन बना दिया है। वे श्रीकृष्ण चैतन्यदेव तुम सबको सौभाग्य प्रदान करें।"
श्लोक शुनि' सर्व-लोक ताहारे बाखाने । स्वरूप कहे,–'ऐइ श्लोक करह व्याख्याने' ॥
११३॥
जबे उपस्थित लोगों ने यह श्लोक सुना, तो सबने कवि की प्रशंसा की, किन्तु स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने उससे अनुरोध किया कि, कृपया इस श्लोक की व्याख्या करें।"
कवि कहे,—जगन्नाथ—सुन्दर-शरीर ।चैतन्य-गोसाञि—शरीरी महा-धीर ॥
११४॥
कवि ने कहा, जगन्नाथजी अत्यन्त सुन्दर शरीर हैं और श्री चैतन्य महाप्रभु जो कि अत्यन्त धीर हैं, उस शरीर के स्वामी हैं।"
सहजे जड़-जगतेर चेतन कराइते ।नीलाचले महाप्रभु हैला आविर्भूते ॥
११५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु यहाँ नीलाचल (जगन्नाथ पुरी) में सम्पूर्ण जड़ भौतिक जगत् को आध्यात्मिक बनाने के लिए प्रकट हुए हैं।"
शुनिया सबार हैल आनन्दित-मन ।।दुःख पाञा स्वरूप कहे सक्रोध वचन ॥
११६॥
यह सुनकर वहाँ पर उपस्थित सारे लोग अत्यन्त प्रसन्न थे। किन्तु 15 स्वरूप दामोदर, जो कि अकेले ही अत्यन्त दुःखी थे, अत्यन्त क्रोध सेबोले।"
आरे मूर्ख, आपनार कैलि सर्व-नाश! ।।दुइ त' ईश्वरे तोर नाहिक विश्वास ॥
११७॥
उन्होंने कहा, तुम मूर्ख हो। तुमने अपने सर्वनाश को अपने आप बुलाया है, क्योंकि तुम्हें न तो दो भगवानों-जगन्नाथ तथा श्री चैतन्य महाप्रभु-का ज्ञान है, न ही उनमें तुम्हारी श्रद्धा है।"
पूर्णानन्द-चित्स्वरूप जगन्नाथ-राय । ताँरे कैलि जड़-नश्वर-प्राकृत-काय!! ॥
११८॥
भगवान जगन्नाथ सम्पूर्ण आध्यात्मिक हैं और दिव्य आनन्द से परिपूर्ण हैं, किन्तु तुमने उनकी तुलना जड़ नाशवान शरीर से की है, जो भगवान् की निष्क्रिय बहिरंगा शक्ति से बना है।"
पूर्ण-घडू-ऐश्वर्य चैतन्य—स्वयं भगवान् । तौरे कैलि क्षुद्र जीव स्फुलिङ्ग-समान!! ॥
११९॥
तुमने श्री चैतन्य महाप्रभु को, जो कि छः ऐश्वर्यों से युक्त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, सामान्य जीव के स्तर को कहा है। उन्हें परम अग्नि के रूप में न जानकर तुमने उन्हें एक स्फुलिंग के रूप में मान लिया है।"
दुइ-ठाजि अपराधे पाइबि दुर्गति! ।। अतत्त्व-ज्ञ'तत्त्व' वर्णे, तार एइ रीति! ॥
१२०॥
स्वरूप दामोदर ने आगे कहा,चूँकि तुमने भगवान् जगन्नाथ तथा भी चैतन्य महाप्रभु के प्रति अपराध किया है, अतएव तुम्हें नरक की प्राप्ति होगी। तुम यह भी नहीं जानते कि परम सत्य का वर्णन किस तरह किया जाता है, तो भी तुमने ऐसा करने का प्रयास किया है। इसलिए हैं धिक्कार है।"
आर एक करियाछ परम ‘प्रमाद!। देह-देहि--भेद ईश्वरे कैले 'अपराध'! ॥
१२१॥
तुम पूर्णतया भ्रम में हो, क्योंकि तुमने भगवान् (जगन्नाथ अथवा श्री चैतन्य महाप्रभु ) के शरीर तथा आत्मा में भेद किया है। यह एक महान् अपराध है।"
ईश्वरेर नाहि कभु देह-देहि-भेद । हैस्वरूप, देह, चिदानन्द, नाहिक विभेद ॥
१२२॥
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के शरीर तथा आत्मा में कभी भी कोई न्तर नहीं होता। उनका स्वरूप तथा उनका शरीर आनन्दमय आध्यात्मिक शक्ति से बना होता है ( चिदानन्द )। उनमें कोई अन्तर नहीं होता।"
देह-देहि-विभागोऽयं नेश्वरे विद्यते क्वचित्’ ॥
१२३ ॥
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के शरीर तथा आत्मा में कभी भी कोई अन्तर नहीं होता।'" आनन्द-मात्रमविकल्पमविद्ध-वर्चः ।। पश्यामि विश्व-सृजमेकमविश्वमात्मन्भूतेन्द्रियात्मक-मदस्त उपाश्रितोऽस्मि ॥
१२४॥
तद्वा इदं भुवन-मङ्गल मेङ्गलायध्याने स्म नो दरशितं त उपासकानाम् । तस्मै नमो भगवतेऽनुविधेम तुभ्यंयोऽनादृतो नरक-भाग्भिरसत्प्रसङ्गैः ॥
१२५ ॥
हे मेरे प्रभु, मैं आपके इस शाश्वत आनन्द तथा ज्ञानमय रूप से श्रेष्ठ अन्य कोई रूप नहीं देखता हूँ। आध्यात्मिक आकाश में आपकी निर्विशेष ब्रह्मज्योति में न तो समय-समय पर कोई परिवर्तन होता है और न आपकी अन्तरंगा शक्ति में कोई ह्रास पाया जाता है। मैं आपके प्रति आत्मसमर्पण करता हूँ, क्योंकि यद्यपि मुझे अपने भौतिक शरीर और इन्द्रियों पर अभिमान है, किन्तु आप पूरे ब्रह्माण्ड की सृष्टि के कारण हैं। फिर भी आपको जड़ पदार्थ स्पर्श नहीं करता। आपका यह वर्तमान स्वरूप अथवा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा विस्तारित कोई अन्य रूप समस्त ब्रह्माण्डों के लिए समान रूप से मंगलकारी है। चूंकि आपने अपने इस शाश्वत व्यक्तिगत रूप को प्रकट किया है, जिसका आपके भक्त ध्यान करते हैं, इसलिए मैं आपको सादर नमन करता हूँ। जिन लोगों के भाग्य में नरक जाना निश्चित हो चुका है, वे लौकिक विषयों के चिन्तन में तल्लीन रहने के कारण आपके निजी रूप की उपेक्षा करते हैं।"
नातः परं परम यद्भवतः स्वरूपम्।ह्लादिन्या सम्विदाश्लिष्टः सच्चिदानन्द-ईश्वरः ।स्वाविद्या संवृतो जीवः सङ्क्लेश-निकराकरः ॥
१२७॥
परम नियन्ता, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सदैव दिव्य आनन्द से पूरित रहते हैं और ह्लादिनी तथा सम्वित् नामक शक्तियों से युक्त होते हैं। किन्तु बद्धजीव सदैव अविद्या से आवृत रहता है और जीवन के तीन क्लेशों से चिन्तित रहता है। इस तरह वह सभी प्रकार के क्लेशों का आगार होता हैं।"
काहाँ ‘पूर्णानन्दैश्वर्य' कृष्ण 'मायेश्वर'!।काहाँ ' क्षुद्र' जीव 'दुःखी', ‘मायार किङ्कर'! ॥
१२६॥
कहाँ दिव्य आनन्द से पूर्ण, छः पूर्ण आध्यात्मिक ऐश्वर्यों से युक्त तथा भौतिक शक्ति के स्वामी परम सत्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण और कहाँ क्षुद्र बद्धजीव, जो सदैव दुःखी रहता है और भौतिक शक्ति का दास है।"
शुनि' सभा-सदेर चित्ते हैल चमत्कार ।‘सत्य कहे गोसाजि, मुँहार करियाछे तिरस्कार' ॥
१२८॥
यह व्याख्या सुनकर सभा के सारे सदस्य आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने स्वीकार किया कि, स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने वास्तविक सत्य कहा है। बंगाल के इस ब्राह्मण ने भगवान जगन्नाथ तथा श्री चैतन्य महाप्रभु का गलत वर्णन करके अपराध किया है।"
शुनिया कविर हैल लज्जा, भय, विस्मय ।। हंस-मध्ये बक ट्रैछे किछु नाहि कय ॥
१२९॥
जब बंगाली कवि ने स्वरूप दामोदर गोस्वामी की यह भर्सना सुनी, तो वह लज्जित, भयभीत तथा आश्चर्यचकित हुआ। निस्सन्देह, हंसों के बीच में बगुले की तरह होने से वह कुछ भी नहीं कह सका।"
तार दुःख देखि, स्वरूप सदय-हृदय ।।उपदेश कैला तारे ग्रैछे हित' हय ॥
१३०॥
कवि के दुःख को देखकर अत्यन्त दयालु स्वरूप दामोदर गोस्वामी । ने उसे उपदेश दिया, जिससे उसे कुछ लाभ मिल सके।"
ग्राह, भागवत पड़ वैष्णवेर स्थाने ।। एकान्त आश्रय कर चैतन्य-चरणे ॥
१३१॥
उन्होंने कहा, यदि तुम श्रीमद्भागवत समझना चाहते हो, तो तुम्हें किसी स्वरूपसिद्ध वैष्णव के पास जाकर उससे सुनना चाहिए। तुम ऐसा तब कर सकते हो, जब तुम श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में पूरी तरह से शरण ग्रहण करते हो।"
चैतन्येर भक्त-गणेर नित्य कर 'सङ्ग' । तबेत जानिबा सिद्धान्त-समुद्र-तरङ्ग ॥
१३२॥
स्वरूप दामोदर ने आगे कहा, श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों की नियमित रूप से संगति करो, तभी तुम भक्ति के समुद्र की तरंगों को समझ सकोगे।"
तबेत पाण्डित्य तोमार हइबे सफल ।।कृष्णेर स्वरूप-लीला वर्णिबा निर्मल ॥
१३३॥
जब तुम श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके भक्तों के सिद्धान्तों का पालन करोगे, तभी तुम्हारी विद्या सफल होगी। तभी तुम भौतिक कल्मष के बिना कृष्ण की दिव्य लीलाओं के विषय में लिख सकोगे।"
एइ श्लोक करियाछ पाजा सन्तोष ।।तोमार हृदयेर अर्थे मुँहाय लागे ‘दोष' ॥
१३४॥
यद्यपि तुमने इस परिचयात्मक श्लोक की रचना पूर्ण सन्तोषपूर्वक की है, किन्तु जिस अर्थ को तुमने व्यक्त किया है, वह जगन्नाथजी तथा श्री चैतन्य महाप्रभु दोनों के प्रति अपराध से दूषित है।"
तुमि ग्रैछे-तैछे कह, ना जानिया रीति । सरस्वती सेइ-शब्दे करियाछे स्तुति ॥
१३५॥
“तुमने नियमों को न जानते हुए अनाप-शनाप लिखा है, किन्तु देवी सरस्वती ने तुम्हारे शब्दों का उपयोग भगवान् को अपनी स्तुति भेंट करने के लिए कर लिया है।"
ग्रैछे इन्द्र, दैत्यादि करे कृष्णेर भर्सन ।सेइ-शब्दे सरस्वती करेन स्तवन ॥
१३६॥
कभी-कभी असुर तथा स्वर्ग का राजा इन्द्र तक कृष्ण की भर्सना करते थे, किन्तु माता सरस्वती ने उनके शब्दों का लाभ उठाकर भगवान् की स्तुति की।"
वाचालं बालिशं स्तब्धं अज्ञं पण्डित-मानिनम् । कृष्णं मर्त्यमुपाश्रित्य गोपा मे चक्रुरप्रियम् ॥
१३७॥
[ इन्द्र ने कहा : ‘यह कृष्ण एक सामान्य मनुष्य है और वह वाचाल, बचकाना, उद्धत तथा अज्ञानी है, यद्यपि वह अपने आपको बहुत विद्वान मानता है। वृन्दावन के ग्वालों ने उसको स्वीकार करके मेरा अपमान किया है। यह बात मुझे बिल्कुल अच्छी नहीं लगी।"
ऐश्व-मदे मत्त इन्द्र, ग्रेन मातोयाल । बुद्धि-नाश हैल, केवल नाहिक साम्भाल ॥
१३८॥
‘स्वर्ग का राजा इन्द्र अपने स्वर्ग के ऐश्वर्य से अति गर्वित होकर पागल की तरह बन गया। इस तरह बुद्धि से रहित होकर वह कृष्ण के विषय में अनाप-शनाप बोलने से अपने आपको रोक न सका।"
इन्द्र बले,–मुञि कृष्णेर करियाछि निन्दन’ ।तार-इ मुखे सरस्वती करेन स्तवन ।। १३९ ॥
इस प्रकार इन्द्र ने सोचा, 'मैंने ठीक ही कृष्ण की भर्त्सना की और उसकी निन्दा की।' किन्तु विद्या की देवी सरस्वती ने इस अवसर का लाभ कृष्ण की स्तुति करने में उठाया।"
'वाचाल' कहिये-‘वेद-प्रवर्तक' धन्य ।‘बालिश'तथापि 'शिशु-प्राय' गर्व-शून्य ॥
१४० ॥
वाचाल' शब्द का प्रयोग ऐसे व्यक्ति के लिए किया जाता है, जो वैदिक प्रमाण के अनुसार बोल सकता है और 'बालिश' शब्द का अर्थ है 'अबोध।' कृष्ण ने वैदिक ज्ञान का प्रवचन किया, फिर भी वे अपने आपको सदैव गर्वशून्य, अबोध बालक के रूप में प्रस्तुत करते हैं।"
वन्द्याभावे 'अनम्र''स्तब्ध'-शब्दे कय । ग्राहा हैते अन्य विज्ञ' नाहिसे 'अज्ञ' हय ॥
१४१॥
‘जब नमस्कार ग्रहण करने वाला कोई न हो, तो वह 'अनम्र' कहलाता है, अर्थात् वह जो किसी अन्य को नमस्कार नहीं करता।'स्तब्ध का यही अर्थ है। और चूँकि कृष्ण से बढ़कर कोई पण्डित नहीं है, इसलिए वे 'अज्ञ' कहे जा सकते हैं, जो यह सूचित करता है कि उनसे कुछ भी अज्ञात नहीं है।"
‘पण्डितेर मान्य-पात्र-—हय‘पण्डित-मानी' । तथापि भक्त-वात्सल्ये 'मनुष्य' अभिमानी ॥
१४२॥
पण्डित-मानी' शब्द का प्रयोग यह सूचित करने के लिए किया जा सकता है कि विद्वान पण्डित भी कृष्ण का आदर करते हैं। तो भी, अपने भक्तों के प्रति स्नेह के कारण कृष्ण सामान्य व्यक्ति की तरह प्रकट होते हैं, इसलिए उन्हें 'मर्त्य' कहा जा सकता है।"
जरासन्ध कहे, ‘कृष्ण–पुरुष-अधम । तोर सङ्गे ना झुझिमु, ग्राहि बन्धु-हन्’ ॥
१४३ ॥
असुर जरासन्ध ने यह कहकर कृष्ण की भर्त्सना की कि, 'तुम मनुष्यों में अधम हो। मैं तुमसे युद्ध नहीं करूंगा, क्योंकि तुमने अपने ही सम्बन्धियों का वध किया है।'" ग्राहा हैते अन्य पुरुष-सकल---‘अधम' ।।सेइ हय ‘पुरुषाधम' सरस्वतीर मन ॥
१४४॥
माता सरस्वती ‘पुरुषाधम' का अर्थ पुरुषोत्तम लगाती हैं-वह जिसके अधीन सारे मनुष्य हैं।"
‘बान्धे सबारे–ताते अविद्या ‘बन्धु' हय । ‘अविद्या-नाशक'‘बन्धु-हन्'-शब्दे कय ॥
१४५ ॥
। अविद्या या माया को ‘बन्धु' कहा जा सकता है, क्योंकि इस भौतिक जगत् में वह हर एक को बाँधती है। इसलिए ‘बन्धु-हन्' शब्द का प्रयोग करके माता सरस्वती कहना चाहती हैं कि कृष्ण माया के नाशकर्ता हैं।"
एइ-मत शिशुपाल करिल निन्दन ।। सेइ-वाक्ये सरस्वती करेन स्तवन ॥
१४६॥
इसी तरह शिशुपाल ने भी कृष्ण की निन्दा की, किन्तु विद्या की देवी सरस्वती ने उसी के शब्दों द्वारा कृष्ण की स्तुति की।"
तैछे एड श्लोके तोमार अर्थे ‘निन्दा' आइसे ।। सरस्वतीर अर्थ शुन, ग्राते ‘स्तुति' भासे ॥
१४७॥
इसी तरह यद्यपि तुम्हारे अर्थ के अनुसार तुम्हारा श्लोक निन्दापरक है, किन्तु माता सरस्वती इसका लाभ भगवान् की स्तुति करने में उठाती हैं।"
जगन्नाथ हन कृष्णेर 'आत्म-स्वरूप' ।।किन्तु इहाँ दारु-ब्रह्मस्थावर-स्वरूप ॥
१४८॥
भगवान् जगन्नाथ एवं कृष्ण में कोई अन्तर नहीं है, किन्तु यहाँ पर भगवान् जगन्नाथ काष्ठ में प्रकट होने वाले परम पुरुष के रूप में स्थिर हैं। इसलिए वे गति नहीं करते।"
तांहा-सह आत्मता एक-रूप हो ।कृष्ण एक-तत्त्व-रूप-दुइ रूप हा ॥
१४९॥
इस तरह भगवान् जगन्नाथ तथा श्री चैतन्य महाप्रभु दो दिखते हुए भी एक हैं, क्योंकि दोनों ही कृष्ण हैं, जो केवल एक हैं।"
संसार-तारण-हेतु ग्रेइ इच्छा-शक्ति ।।ताहार मिलन करि' एकता ग्रैछे प्राप्ति ॥
१५० ॥
दोनों में समस्त संसार का उद्धार करने की परम इच्छा मिलती है और इसलिए भी वे एक ही हैं।"
सकल संसारी लोकेर करिते उद्धार ।गौर-जङ्गम-रूपे कैला अवतार ॥
१५१॥
संसार के समस्त दूषित लोगों का उद्धार करने के लिए वही कृष्ण अवतरित हुए हैं और श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में विचरण कर रहे हैं।"
जगन्नाथेर दर्शने खण्डाय संसार । सब-देशेर सब-लोक नारे आसिबार ॥
१५२॥
भगवान जगन्नाथ का दर्शन करने से मनुष्य भौतिक अस्तित्व से । छूट जाता है, किन्तु न तो सारे देशों के सारे लोग जगन्नाथ पुरी आ सकते । हैं, न ही उनको प्रवेश दिया जा सकता है।"
श्री-कृष्ण-चैतन्य-प्रभु देशे देशे ग्राजा ।। सब-लोके निस्तारिला जङ्गम-ब्रह्म हा ॥
१५३॥
किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं या अपने प्रतिनिधियों द्वारा एक देश से दूसरे देश में जाते हैं। इस तरह वे गतिशील ब्रह्म की तरह संसार के समस्त लोकों का उद्धार करते हैं।"
सरस्वतीर अर्थ एइ कहिलॆ विवरण । एहो भाग्य तोमार ऐछे करिले वर्णन ॥
१५४॥
इस तरह मैंने माता सरस्वती द्वारा इच्छित अर्थ की व्याख्या की है। यह तुम्हारा परम सौभाग्य है कि तुमने इस तरह भगवान् जगन्नाथ तथा श्री चैतन्य महाप्रभु का वर्णन किया है।"
कृष्णे गालि दिते करे नाम उच्चारण । सेइ नाम हय तार 'मुक्तिर' कारण ॥
१५५॥
कभी-कभी ऐसा होता है कि जो व्यक्ति कृष्ण की भर्त्सना करना चाहता है, वह पवित्र नाम का उच्चारण करता है और इस तरह वह नाम उसकी मुक्ति का कारण बन जाता है।"
तबे सेइ कवि सबार चरणे पड़िया ।। सबार शरण लैल दन्ते तृण ला ॥
१५६॥
स्वरूप दामोदर गोस्वामी द्वारा इस उचित व्याख्या को सुनकर बंगाली कवि समस्त भक्तों के चरणों पर गिर पड़ा और अपने मुँह में तिनका दबाकर उसने सबकी शरण ग्रहण की।"
तबे सब भक्त तारे अङ्गीकार कैला ।। तार गुण कहि' महाप्रभुरे मिलाइला ॥
१५७॥
। तब सारे भक्तों ने उसकी संगति स्वीकार की। उसके विनीत स्वभाव की बातें करते हुए उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु से उसका परिचय कराया।"
सेइ कवि सर्व त्यजि' रहिला नीलाचले । गौर-भक्त-गणेर कृपा के कहिते पारे? ॥
१५८॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों की कृपा से उस बंगाली कवि ने अन्य सारे कार्य त्याग दिये और वह उनके साथ जगन्नाथ पुरी में रहने लगा। भला श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों की कृपा को कौन बतला सकता है?" एइ त कहिलॆ प्रद्युम्न-मिश्र-विवरण ।। प्रभुर आज्ञाय कैल कृष्ण-कथार श्रवण ॥
१५९ ॥
इस प्रकार मैंने प्रद्युम्न मिश्र की कथा का और जिस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु की आज्ञा के अनुसार उसने रामानन्द राय द्वारा कही गई कृष्ण । विषयक वार्ताएँ सुनीं, उसका वर्णन किया है।"
तार मध्ये कहिलॆ रामानन्देर महिमा ।आपने श्री-मुखे प्रभु वर्णे याँर सीमा ॥
१६०॥
इसी कथा के बीच में मैंने श्री रामानन्द राय के यशस्वी गुणों का वर्णन किया है, जिनके माध्यम से श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं कृष्ण-प्रेम की सीमाओं का वर्णन किया है।"
प्रस्तावे कहिलँ कविर नाटक-विवरण ।।अज्ञ हा श्रद्धाय पाइल प्रभुर चरण ॥
१६१॥
इस कथा के मध्य मैंने बंगाली कवि के नाटक के विषय में भी कहा है। यद्यपि वह अज्ञानी था, किन्तु अपनी श्रद्धा तथा दीनता के कारण उसने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण प्राप्त की।"
श्री-कृष्ण-चैतन्ये-लीला-अमृतेर सार ।।एक-लीला-प्रवाहे वहे शत-शत धार ॥
१६२ ॥
श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अमृत की सार हैं। उनकी एक लीला की धारा से सैकड़ों-हजारों शाखाएँ बहती हैं।"
श्रद्धा करि' एइ लीला येइ पड़े, शुने ।।गौर-लीला, भक्ति-भक्त-रस-तत्त्व जाने ॥
१६३ ॥
जो व्यक्ति श्रद्धा तथा प्रेमपूर्वक इन लीलाओं को पढ़ता तथा सुनता है, वह भक्ति, भक्त तथा श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के दिव्य रसों के सत्य को समझ सकता है।"
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
१६४॥
श्रीरूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलकर श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।"
