← चैतन्य चरितामृत की सूची

अध्याय दो: कनिष्ठ हरिदास की ताड़ना

वन्देऽहं श्री-गुरोः श्री-युत-पद-कमलं श्री-गुरूवैष्णवांश्श्री-रूपं साग्रजातं सह-गण-रघुनाथान्वितं तं स-जीवम् । साद्वैतं सावधूतं परिजन-सहितं कृष्ण-चैतन्य-देवं श्री-राधा-कृष्ण-पादान्सह-गण-ललिता-श्री-विशाखान्वितांश्च ॥

१॥

मैं अपने गुरु तथा भक्ति-मार्ग के अन्य सारे उपदेशकों के चरणकमलों में सादर नमस्कार करता हूँ। मैं सारे वैष्णवों को तथा श्रील रूप गोस्वामी, श्रील सनातन गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी, जीव गोस्वामी तथा उनके साथियों समेत छहो गोस्वामियों को सादर नमस्कार करता हूँ। मैं श्री अद्वैत आचार्य प्रभु, श्री नित्यानन्द प्रभु, श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्रीवासे ठाकुर आदि उनके सारे भक्तों को सादर नमस्कार करता हूँ। तत्पश्चात् मैं भगवान् श्रीकृष्ण, श्रीमती राधारानी तथा ललिता, विशाखा आदि समस्त गोपियों को सादर नमस्कार करता हूँ।"

जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत आचार्य की जय हो! तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो!" सर्व-लोक उद्धारिते गौर-अवतार । निस्तारेर हेतु तार त्रिविध प्रकार ॥

३॥

अपने श्री चैतन्य महाप्रभु के अवतार में भगवान् श्रीकृष्ण तीनों लोक के-ब्रह्मलोक से लेकर पाताललोक तक के सारे जीवों का उद्धार करने के लिए अवतरित हुए। उन्होंने तीन प्रकार से उनका उद्धार किया।"

साक्षात्दर्शन, आर ग्रोग्य-भक्त-जीवे ।। 'आवेश' करये काहाँ, काहाँ ' आविर्भावे ॥

४॥

महाप्रभु ने कुछ स्थानों पर पतितात्माओं से प्रत्यक्ष मिलकर, अन्य स्थानों पर किसी शुद्ध भक्त में शक्ति संचार करके तथा और स्थानों पर उनके समक्ष प्रकट होकर उनका उद्धार किया।

‘साक्षात्दर्शने' प्राय सब निस्तारिला ।। नकुल-ब्रह्मचारीर देहे 'आविष्ट' हइला ॥

५॥

प्रद्युम्न-नृसिंहानन्द आगे कैला'आविर्भाव' । ‘लोक निस्तारिब',--एइ ईश्वर-स्वभाव ॥

६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रायः समस्त पतितात्माओं का उद्धार उनसे प्रत्यक्ष भेंट करके किया। उन्होंने नकुल ब्रह्मचारी जैसे महान् भक्तों के शरीर में प्रवेश करके तथा नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी जैसों के समक्ष प्रकट होकर अन्यों का उद्धार किया। मैं पतितात्माओं का उद्धार करूंगा यह कथन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के स्वभाव का सूचक है।"

साक्षात्दर्शने सब जगत् तारिला । एक-बार ये देखिली, से कृतार्थ हइला ॥

७॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु साक्षात् विद्यमान थे, तब संसार का जो भी व्यक्ति उनसे एक बार भी मिलता था, वह पूर्णतया सन्तुष्ट हो जाता था और आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत बन जाता था।"

गौड़-देशेर भक्त-गण प्रत्यब्द आसिया । पुनः गौड़-देशे ग्राय प्रभुरे मिलिया ॥

८॥

प्रतिवर्ष भक्तगण श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने के लिए बंगाल से जगन्नाथ पुरी जाया करते थे और उनसे मिलने के बाद वे बंगाल लौट जाते थे।"

आर नाना-देशेर लोक आसि' जगन्नाथ । चैतन्य-चरण देखि' हइल कृतार्थ ॥

९॥

इसी तरह भारत के विभिन्न प्रान्तों से जो लोग जगन्नाथ पुरी जाते, वे श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों का दर्शन करके पूर्णतया सन्तुष्ट हो जाते।।"

सप्त-द्वीपेर लोक आर नव-खण्ड-वासी । देव, गन्धर्व, किन्नर मनुष्य-वेशे आसि' ॥

१०॥

ब्रह्माण्ड-भर से, जिसमें सातों द्वीप, नवों खण्ड, देव-लोक, गन्धर्व लोक तथा किन्नर लोक सम्मिलित हैं, लोग मनुष्यों के रूप में वहाँ जाते।"

प्रभुरे देखिया ग्राय 'वैष्णव' हा । कृष्ण बलि' नीचे सब प्रेमाविष्ट हा ॥

११॥

वे सभी महाप्रभु के दर्शन पाकर वैष्णव बन गये। इस तरह भगवत्प्रेम में उन लोगों ने हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन किया और नृत्य किया।"

एड-मत दर्शने त्रिजगत् निस्तारि । ये केह आसिते नारे अनेक संसारी ॥

१२॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रत्यक्ष भेंट करके तीनों लोकों का उद्धार किया। किन्तु कुछ लोग नहीं जा सके क्योंकि वे भौतिक कार्यकलापों में फंसे हुए थे।"

ता-सेबा तारिते प्रभु सेइ सब देशे ।।ग्रोग्य-भक्त जीव-देहे करेन 'आवेशे' ॥

१३॥

ब्रह्माण्ड के उन भागों के लोगों का उद्धार करने के लिए, जो उनसे भेंट नहीं कर पाये, श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं शुद्ध भक्तों के शरीर में प्रवेश किया।"

सेइ जीवे निज-भक्ति करेन प्रकाशे ।।ताहार दर्शने 'वैष्णव' हय सर्व-देशे ॥

१४॥

इस तरह उन्होंने जीवों ( अपने शुद्ध भक्तों) में अपनी इतनी भक्ति प्रकट करके उन्हें आविष्ट कर दिया कि अन्य सारे देशों के लोग उन्हें देखकर भक्त बन गये।"

एइ-मत आवेशे तारिल त्रिभुवन ।।गौड़े भैछे आवेश, करि दिग्दरशन ॥

१५ ॥

। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने न केवल अपनी निजी उपस्थिति से, अपितु अन्यों को शक्त्याविष्ट करके भी तीनों लोकों का उद्धार किया। मैं संक्षेप में वर्णन करूंगा कि किस तरह उन्होंने बंगाल में एक जीव को शक्त्याविष्ट किया।"

आम्बुया-मुलुके हय नकुल-ब्रह्मचारी ।।परम-वैष्णव तेहो बड़ अधिकारी ॥

१६॥

आम्बुया प्रान्त में नकुल ब्रह्मचारी नाम के एक व्यक्ति थे, जो पूर्णतया शुद्ध भक्त थे और भक्ति में अत्यन्त उन्नत थे।"

गौड़-देशेर लोक निस्तारिते मन हैल ।।नकुल-हृदये प्रभु' आवेश' करिल ॥

१७॥

बंगाल के सभी लोगों का उद्धार करने की इच्छा से श्री चैतन्य महाप्रभु ने नकुल ब्रह्मचारी के हृदय में प्रवेश किया।"

ग्रह-ग्रस्त-प्राये नकुल प्रेमाविष्ट हा ।।हासे, कान्दे, नाचे, गाय उन्मत्त हा ॥

१८॥

। नकुल ब्रह्मचारी भूतप्रेत से सताये हुए व्यक्ति के समान बन गये। इस तरह वे कभी हँसते, तो कभी रोते, कभी नाचते और कभी पागल व्यक्ति की तरह गाते।"

अश्रु, कम्प, स्तम्भ, स्वेद, सात्त्विक विकार ।।निरन्तर प्रेमे नृत्य, सघन हुङ्कार ॥

१९॥

। वे निरन्तर दिव्य प्रेम के शारीरिक विकार प्रकट करते। इस तरह वे रोते, काँपते, स्तम्भित होते, पसीने से लथपथ होते, भगवत्प्रेम के वशीभूत होकर नाचते और बादल जैसी ध्वनि उत्पन्न करते।"

तैछे गौर-कान्ति, तैछे सदा प्रेमावेश ।।ताहा देखिबारे आइसे सर्व गौड़-देश ॥

२०॥

उनका शरीर श्री चैतन्य महाप्रभु जैसी कान्ति से चमकता था और वे भगवत्प्रेम में वैसी ही तल्लीनता प्रदर्शित करते थे। इन लक्षणों को देखने के लिए बंगाल के सारे प्रान्तों से लोग आते थे।"

झारे देखे तारे कहे,–'कह कृष्ण-नाम' ।।ताँहार दर्शने लोक हय प्रेमोद्दाम ॥

२१॥

। जिससे भी वे मिलते, उससे हरे कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करने को कहते। इस तरह लोग उन्हें देखकर भगवत्प्रेम से अभिभूत हो जाते।"

चैतन्येर आवेशे हय नकुलेर देहे ।। शुनि' शिवानन्द आइला करिया सन्देहे ॥

२२॥

। जब शिवानन्द सेन ने सुना कि श्री चैतन्य महाप्रभु नकुल ब्रह्मचारी के शरीर में प्रविष्ट हुए हैं, तो वे अपने मन में शंकालु होकर वहाँ गये।"

परीक्षा करिते ताँर ग्नबे इच्छा हैल ।। बाहिरे रहिया तबे विचार करिल ॥

२३॥

नकुल ब्रह्मचारी की प्रामाणिकता की परीक्षा करने की इच्छा से वे इस प्रकार सोचते हुए बाहर ही खड़े रहे।"

आपने बोलान मोरे, इहा यदि जानि ।। आमार इष्ट-मन्त्र जानि' कहेन आपनि ॥

२४॥

तबे जानि, इँहाते हय चैतन्य-आवेशे’ ।।एत चिन्ति' शिवानन्द रहिला दूर-देशे ॥

२५॥

। यदि नकुल ब्रह्मचारी मुझे अपने आप बुलाता है और मेरा इष्ट मन्त्र जान लेता है, तो मैं समझेंगा कि वह श्री चैतन्य महाप्रभु की उपस्थिति से आवेशित है। इस तरह सोचते हुए वे कुछ दूरी पर रुके रहे।"

असङ्ख्य लोकेर घटा,—केह आइसे ग्राय ।लोकेर सङ्कट्टे केह दर्शन ना पाय ॥

२६॥

वहाँ लोगों की बड़ी भीड़ थी। कुछ लोग आ रहे थे और कुछ जा रहे थे। निस्सन्देह, उस विशाल भीड़ में कुछ लोग नकुल ब्रह्मचारी का दर्शन तक नहीं कर सके।"

आवेशे ब्रह्मचारी कहे,–'शिवानन्द आछे दूरे ।जन दुइ चारि ग्राह, बोलाह ताहारे' ॥

२७॥

नकुल ब्रह्मचारी ने अपनी आवेशित अवस्था में कहा, शिवानन्द कुछ दूरी पर रुका हुआ है। तुम में से दो-चार लोग जाकर उसे बुला लाओ।"

चारि-दिके धाय लोके ‘शिवानन्द' बलि ।।शिवानन्द कोन्, तोमाय बोलाय ब्रह्मचारी ॥

२८॥

। इस तरह लोग चारों दिशाओं में इस तरह पुकारते हुए इधर-उधर दौड़ने लगे, “शिवानन्द! जो भी शिवानन्द हो, कृपया आ जाओ। नकुल ब्रह्मचारी तुम्हें बुला रहे हैं।"

शुनि', शिवानन्द सेन ताँहा शीघ्र आइल ।नमस्कार करि' ताँर निकटे वसिल ॥

२९॥

। उनकी बुलाने की आवाज सुनकर शिवानन्द सेन तुरन्त वहाँ गये, उन्होंने नकुल ब्रह्मचारी को नमस्कार किया और वे उनके निकट बैठ गये।"

ब्रह्मचारी बले, तुमि करिला संशय ।। एक-मना हा शुन ताहार निश्चय ॥

३०॥

नकुल ब्रह्मचारी ने कहा, मैं जानता हूँ कि तुम्हें संशय है। अब इसका प्रमाण अत्यन्त ध्यान से सुनो।"

‘गौर-गोपाल मन्त्र तोमार चारि अक्षर।।अविश्वास छाड़, येइ करियाछ अन्तर ॥

३१॥

तुम चार अक्षरों वाला गौर गोपाल मन्त्र का जप करते हो। अब तुम अपने मन के भीतर बसने वाले संशय को त्याग दो।"

तबे शिवानन्देर मने प्रतीति हइल । अनेक सम्मान करि' बहु भक्ति कैल ॥

३२॥

इस पर शिवानन्द सेन ने अपने मन में पूर्ण विश्वास उत्पन्न कर लिया कि नकुल ब्रह्मचारी श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा आविष्ट है। तब शिवानन्द सेन ने उसका आदर किया तथा भक्तिमयी सेवा की।"

एइ-मत महाप्रभुर अचिन्त्य प्रभाव । एबे शुन प्रभुर ग्रैछे हय' आविर्भाव' ॥

३३॥

इस तरह से श्री चैतन्य महाप्रभु की अचिन्त्य शक्तियों को समझना चाहिए। अब जिस तरह से उनका आविर्भाव होता है, उसे सुनिये।"

शचीर मन्दिरे, आर नित्यानन्द-नर्तने । श्रीवास-कीर्तने, आर राघव-भवने ॥

३४॥

एइ चारि ठाबि प्रभुर सदा 'आविर्भाव' ।।प्रेमाकृष्ट हय,—प्रभुर सहज स्वभाव ॥

३५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु सदैव चार स्थानों में प्रकट हुए-ये हैं-माता शची के घरेलू मन्दिर में, श्री नित्यानन्द प्रभु के नृत्य करने के स्थानों में, सामूहिक कीर्तन के समय श्रीवास पण्डित के घर में तथा राघव पण्डित के घर में। वे अपने भक्तों के प्रेम के प्रति आकर्षित होने के कारण प्रकट हुए। यही उनका सहज स्वभाव है।"

नृसिंहानन्देर आगे आविर्भूत हञा ।।भोजन करिला, ताहा शुन मन दिया ॥

३६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी के समक्ष प्रकट हुए और उन्होंने उसका दिया भोजन ग्रहण किया। कृपया इसके विषय में ध्यान लगाकर सुनें।"

शिवानन्देर भागिना श्रीकान्त-सेन नाम ।प्रभुर कृपाते तेंहो बड़ भाग्यवान् ॥

३७॥

शिवानन्द सेन का एक भांजा था, जिसका नाम श्रीकान्त सेन था, जो श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से अत्यन्त भाग्यशाली था।"

एक वत्सर तेहो प्रथम एकेश्वर ।।प्रभु देखिबारे आइला उत्कण्ठा-अन्तर ॥

३८ ॥

एक वर्ष श्रीकान्त सेन महाप्रभु का दर्शन करने की अतीव उत्सुकता से अकेले ही जगन्नाथ पुरी आया।"

महाप्रभु तारे देखि' बड़ कृपा कैला । मास-दुइ तेहो प्रभुर निकटे रहिला ॥

३९॥

। श्रीकान्त सेन को देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस पर अहैतुकी कृपा की। श्रीकान्त सेन जगन्नाथ पुरी में लगभग दो महीने तक श्री चैतन्य महाप्रभु के पास रहा।"

तबे प्रभु ताँरे आज्ञा कैला गौड़े ग्राइते ।।भक्त-गणे निषेधिह एथाके आसिते ॥

४०॥

जब वह बंगाल लौटने वाला था, तो महाप्रभु ने उससे कहा, “इस वर्ष बंगाल के भक्तों को जगन्नाथ पुरी आने से मना कर देना।"

ए-वत्सर ताँहा आमि ग्राइमु आपने ।ताहाइ मिलिमु सब अद्वैतादि सने ॥

४१॥

इस वर्ष मैं स्वयं बंगाल जाऊँगा और वहाँ अद्वैत आचार्य इत्यादि सारे भक्तों से मिलूंगा।"

शिवानन्दे कहिह,—आमि एइ पौष-मासे ।।आचम्बिते अवश्य आमि ग्राइब ताँर पाशे ॥

४२॥

तुम शिवानन्द सेन को यह बता देना कि इस पौष (दिसम्बरजनवरी ) मास में मैं अवश्य ही उसके घर जाऊँगा।"

जगदानन्द हय ताहाँ, तेहो भिक्षा दिबे ।।सबारे कहिह,—ए वत्सर केह ना आसिबे’ ॥

४३॥

। वहाँ पर जगदानन्द हैं। वे मुझे भोजन की भिक्षा देंगे। उन सबसे कहना कि इस वर्ष कोई भी जगन्नाथ पुरी न आये।"

श्रीकान्त आसिया गौड़े सन्देश कहिल ।।शुनि' भक्त-गण-मने आनन्द हइल ॥

४४॥

जब श्रीकान्त सेन ने बंगाल लौटकर यह सन्देश दिया, तो सारे भक्तों के मन अतीव प्रसन्न हो गये।"

चलितेछिला आचार्य, रहिला स्थिर हो । शिवानन्द, जगदानन्द रहे प्रत्याशी करिया ॥

४५ ॥

अद्वैत आचार्य अन्य भक्तों के साथ जगन्नाथ पुरी जाने ही वाले थे, किन्तु यह सन्देश सुनकर वे रुक गये। शिवानन्द सेन तथा जगदानन्द भी श्री चैतन्य महाप्रभु के आगमन की प्रतीक्षा करते रुके रहे।"

पौष-मासे आइल मुँह सामग्री करिया ।। सन्ध्या-पर्यन्त रहे अपेक्षा करिया ॥

४६॥

जब पौष मास आया, तो शिवानन्द तथा जगदानन्द दोनों ने महाप्रभु के स्वागत के लिए सभी प्रकार की सामग्री एकत्र की। वे प्रतिदिन सन्ध्या समय तक महाप्रभु के आने की प्रतीक्षा किया करते।"

एइ-मत मास गेल, गोसाजि ना आइला । जगदानन्द, शिवानन्द दुःखित हइला ॥

४७॥

जब महीना बीत गया, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु नहीं आये, तो जगदानन्द तथा शिवानन्द अत्यधिक दुःखी हुए।"

आचम्बिते नृसिंहानन्द ताहाङि आइला । मुँहे तारे मिलि' तबे स्थाने वसाइला ॥

४८॥

मुँहे दुःखी देखि' तबे कहे नृसिंहानन्द ।। ‘तोमा इँहाकारे केने देखि निरानन्द?' ॥

४९॥

एकाएक नृसिंहानन्द आये। जगदानन्द तथा शिवानन्द ने उन्हें अपने निकट बैठाने का प्रबन्ध किया। उन दोनों को इतने दुःखी देखकर नृसिंहानन्द ने पूछा, मैं आप दोनों को निराश क्यों देख रहा हूँ? तबे शिवानन्द ताँरे सकल कहिला ।

'आसिब आज्ञा दिला प्रभु केने ना आइला?' ॥

५०॥

तब शिवानन्द सेन ने उनसे कहा, श्री चैतन्य महाप्रभु ने वचन दिया था कि वे आयेंगे। तो फिर वे क्यों नहीं आये?" शुनि' ब्रह्मचारी कहे,–'करह सन्तोषे ।। आमि त' आनिब ताँरे तृतीय दिवसे' ॥

५१॥

यह सुनकर नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी ने उत्तर दिया, तुम लोग सन्तोष रखो। मैं तुम दोनों को विश्वास दिलाता हूँ कि आज से तीसरे दिन मैं उन्हें यहाँ ले आऊँगा।"

ताँहार प्रभाव-प्रेम जाने दुइ-जने ।।आनिबे प्रभुरे एबे निश्चय कैला मने ॥

५२॥

शिवानन्द तथा जगदानन्द नृसिंहानन्द के प्रभाव तथा भगवत्प्रेम को जानते थे। इसलिए अब वे आश्वस्त हो गये कि वे निश्चय ही श्री चैतन्य महाप्रभु को ले आयेंगे।"

‘प्रद्युम्न ब्रह्मचारी–ताँर निज-नाम ।‘नृसिंहानन्द' नाम ताँर कैला गौर-धाम ॥

५३॥

उनका असली नाम प्रद्युम्न ब्रह्मचारी था। उनका नृसिंहानन्द नाम स्वयं भगवान् गौरसुन्दर ने रखा था।"

दुइ दिन ध्यान करि' शिवानन्देरे कहिल ।।पाणिहाटि ग्रामे आमि प्रभुरे आनिल ॥

५४॥

दो दिनों तक ध्यान करने के बाद नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी ने शिवानन्द को बतलाया, “मैं अब श्री चैतन्य महाप्रभु को पाणिहाटि नामक गाँव तक ले आया हूँ।"

कालि मध्याह्ने तेहो आसिबेन तोमार घरे ।।पाक-सामग्री आनह, आमि भिक्षा दिमु ताँरे ॥

५५॥

। “वे कल दोपहर में आपके घर आयेंगे। इसलिए भोजन बनाने की सारी सामग्री ले आयें। मैं स्वयं भोजन बनाऊँगा और उन्हें भोजन दूंगा।

तबे ताँरे एथा आमि आनिब सत्वर ।।निश्चय कहिलाङ, किछु सन्देह ना करे ॥

५६॥

इस प्रकार से मैं उन्हें शीघ्र ही यहाँ ले आऊँगा। आप आश्वस्त रहो। कि मैं सच कह रहा हूँ। आप सन्देह मत करो।"

ग्रे चाहिये, ताहा कर हवा तत्पर ।।अति त्वराय करिब पाक, शुन अतःपर ॥

५७॥

आप तुरन्त सारी सामग्री लाओ, क्योंकि मैं तुरन्त रसोई पकाना शुरू करना चाहता हूँ। मैं जो कहता हूँ वह कृपया करें।"

पाक-सामग्री आन, आमि याहा चाइ' । ।ये मागिल, शिवानन्द आनि' दिला ताई ॥

५८॥

नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी ने शिवानन्द से कहा, मैं जो भी भोजन-सामग्री चाहता हूँ, कृपया आप ले आयें। इस तरह उन्होंने जो भी माँगा, शिवानन्द सेन तुरन्त ले आये।।"

प्रातः काल हैते पाक करिला अपार ।।नाना व्यञ्जन, पिठा, क्षीर नाना उपहार ॥

५९॥

प्रात:काल शीघ्र ही शुरू करके नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी ने अनेक प्रकार के भोजन तैयार किये, जिनमें सब्जियाँ, रोटियाँ, खीर तथा अन्य पकवान थे।"

जगन्नाथेर भिन्न भोग पृथक्वाड़िल ।। चैतन्य प्रभुरागि' आर भोग कैल ॥

६०॥

भोजन पकाने के बाद वे जगन्नाथ तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए अलग-अलग भोग ले आये।"

इष्ट-देव नृसिंह लागि' पृथक्वाड़िल ।। तिन-जने समर्पिया बाहिरे ध्यान कैल ॥

६१॥

उन्होंने अपने आराध्य देव नृसिंहदेव का भी अलग से भोग लगाया। इस तरह उन्होंने समस्त भोजन को तीन भोगों में बाँट दिया। तब मन्दिर के बाहर वे महाप्रभु का ध्यान करने लगे।"

देखे, शीघ्र आसि' वसिला चैतन्य-गोसाजि । तिन भोग खाइला, किछु अवशिष्ट नाइ ॥

६२॥

उन्होंने ध्यान में देखा कि श्री चैतन्य महाप्रभु तेजी से आये, बैठ गये और तीनों भोग खा गये, कुछ भी शेष नहीं बचा।"

आनन्दे विह्वल प्रद्युम्न, पड़े अश्रु-धार ।। हाहा किबा कर' बलि' करये फुत्कार ॥

६३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को सारा भोजन खाते देखकर प्रद्युम्न ब्रह्मचारी दिव्य आनन्द से विभोर हो गये। उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। फिर भी उन्होंने यह कहकर व्याकुलता व्यक्त की, हाय हाय! मेरे प्रिय प्रभु, आप यह क्या कर रहे हैं? आप तो सबका भोजन खाये जा रहे हैं।"

‘जगन्नाथे-तोमाय ऐक्य, खाओ ताँर भोग ।। नृसिंहेर भोग केने कर उपयोग? ॥

६४॥

हे प्रभु, आप तथा जगन्नाथ एक हैं, इसलिए उनका भोग आप खायें तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। किन्तु आप भगवान् नृसिंहदेव के भोग को क्यों हाथ लगा रहे हैं?" नृसिंहेर हैल जानि आजि उपवास ।। ठाकुर उपवासी रहे, जिये कैछे दास?' ॥

६५॥

मैं सोचता हूँ कि नृसिंहदेव आज कुछ भी नहीं खा सके, इसलिए ये उपवास कर रहे हैं। यदि स्वामी उपवास करें, तो सेवक कैसे जीवित रह सकता है?" भोजन देखि' यद्यपि ताँर हृदये उल्लास ।।नृसिंह लक्ष्य करि' बाह्ये किछु करे दुःखाभास ॥

६६॥

यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु को सारी वस्तुएँ खाते देखकर नृसिंह ब्रहाचारी को अपने हृदय में प्रसन्नता हुई, किन्तु भगवान् नृसिंहदेव के लिए उन्होंने ऊपर से निराशा व्यक्त की।"

स्वयं भगवान् कृष्ण-चैतन्य-गोसाजि । जगन्नाथ-नृसिंह-सह किछु भेद नाइ ॥

६७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। अतः उनमें, भगवान् जगन्नाथ तथा भगवान् नृसिंहदेव में कोई अन्तर नहीं है।"

इहा जानिबारे प्रद्युम्नेर गूढ़ हैत मन ।। ताहा देखाइला प्रभु करिया भोजन ॥

६८॥

प्रद्युम्न ब्रह्मचारी इस बात को जान लेने के लिए अत्यधिक उत्सुक थे। अतएव श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक प्रत्यक्ष निदर्शन द्वारा उनके समक्ष यह प्रकट किया।"

भोजन करिया प्रभु गेला पाणिहाटि । सन्तोष पाइला देखि' व्यञ्जन-परिपाटी ॥

६९॥

सारा भोग खा लेने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु पाणिहाटि के लिए धल दिये। वहाँ पर राघव के घर में तैयार किये गये नाना प्रकार के व्यंजनों को देखकर वे अत्यधिक सन्तुष्ट हुए।

शिवानन्द कहे,–'केने करह फुत्कार?'। तेह कहे, देख तोमार प्रभुर व्यवहार ॥

७० ॥

शिवानन्द ने नृसिंहानन्द से कहा, आप असन्तोष क्यों व्यक्त कर रहे हो? नृसिंहानन्द ने उत्तर दिया, जरा अपने प्रभु श्री चैतन्य महाप्रभु का आचरण तो देखो!" तिन जनार भोग तेहो एकेला खाइला ।। जगन्नाथ-नृसिंह उपवासी हइला ॥

७१।। उन्होंने अकेले ही तीनों विग्रहों के भोग खा लिए। इसके कारण जगन्नाथजी तथा नृसिंहदेव दोनों भूखे रहे।"

शुनि शिवानन्देर चित्ते हइल संशय ।।किबा प्रेमावेशे कहे, किबा सत्य हय ॥

७२॥

जब शिवानन्द सेन ने यह कथन सुना, तो उन्हें सन्देह हुआ कि नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी जो कह रहे हैं, वह प्रेमाविष्ट होने के कारण कह रहे हैं या वास्तव में यह सच है।"

तबे शिवानन्दे किछु कहे ब्रह्मचारी । ।‘सामग्री आन नृसिंह लागि पुनः पाक करि' ॥

७३॥

अनुवादे जब शिवानन्द सेन इस तरह संशयग्रस्त थे, तो नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी ने उनसे कहा, और भोजन-सामग्री लाओ। मुझे भगवान् नृसिंहदेव के लिए फिर से भोजन पकाने दो।"

तबे शिवानन्द भोग-सामग्री आनिला ।।पाक करि' नृसिंहेर भोग लागाइला ॥

७४॥

तब शिवानन्द सेन पुनः भोजन बनाने की सामग्री ले आये और प्रद्युम्न ब्रह्मचारी ने पुनः भोजन पकाया तथा नृसिंहदेव को भोजन अर्पित किया।"

वर्षान्तरे शिवानन्द ला भक्त-गण ।।नीलाचले देखे ग्राञा प्रभुर चरण ॥

७५॥

अगले वर्ष शिवानन्द अन्य सारे भक्तों के साथ श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों का दर्शन करने जगन्नाथ पुरी गये।"

एक-दिन सभाते प्रभु बात चालाइला ।।नृसिंहानन्देर गुण कहते लागिला ॥

७६ ॥

एक दिन समस्त भक्तों के सामने महाप्रभु ने नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी से सम्बन्धित ये बातें चलाईं और उनके दिव्य गुणों की वे प्रशंसा करने लगे।"

‘गत-वर्ष पौषे मोरे कराइल भोजन ।। कभु नाहि खाइ ऐछे मिष्टान्न-व्यञ्जन' ॥

७७॥

महाप्रभु ने कहा, पिछले साल पौष महीने में, जब नृसिंहानन्द ने मुझे खाने के लिए तरह-तरह की मिठाइयाँ तथा सब्जियाँ दीं, तो वे इतनी उत्तम थीं कि इसके पूर्व मैंने ऐसे व्यंजन कभी नहीं खाये थे।"

शुनि' भक्त-गण मने आश्चर्य मानिल ।। शिवानन्देर मने तबे प्रत्यय जन्मिल ॥

७८॥

यह सुनकर सारे भक्त आश्चर्यचकित रह गये और शिवानन्द को विश्वास हो गया कि यह घटना सही थी।"

एइ-मत शची-गृहे सतत भोजन ।। श्रीवासेर गृहे करेन कीर्तन-दर्शन ॥

७९॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु शचीमाता के मन्दिर में प्रतिदिन भोजन करते थे और श्रीवास ठाकुर के घर भी जाते थे, जब कीर्तन होता था।"

नित्यानन्देर नृत्य देखेन आसि' बारे बारे ।‘निरन्तर आविर्भाव' राघवेर घरे ॥

८० ॥

इसी तरह जब नित्यानन्द प्रभु नृत्य करते थे, तब वे सदैव उपस्थित हते थे और वे नियमित रूप से राघव के घर में प्रकट होते थे।"

प्रेम-वश गौर-प्रभु, ग्राहाँ प्रेमोत्तम ।।प्रेम-वश हआ ताहा देन दरशन ॥

८१॥

महाप्रभु गौरसुन्दर अपने भक्तों के प्रेम से अत्यधिक प्रभावित रहते हैं। भलिए जहाँ भी भगवान् की शुद्ध भक्ति होती है, वहाँ महाप्रभु ऐसे प्रेम के वशीभूत होकर स्वयं प्रकट होते हैं और उनके भक्त उनका दर्शन करते शिवानन्देर प्रेम-सीमा के कहिते पारे?।।झाँर प्रेमे वश प्रभु आइसे बारे बारे ॥

८२॥

शिवानन्द सेन के प्रेम व्यवहार से प्रभावित होकर श्री चैतन्य महाप्रभु बारम्बार आये। इसलिए उनके प्रेम की सीमा का अनुमान भला कौन लगा सकता है?" एइ त कहिलु गौरेर 'आविर्भाव' ।इहा येइ शुने, जाने चैतन्य-प्रभाव ॥

८३॥

इस तरह मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु के आविर्भाव का वर्णन किया है। जो भी इन घटनाओं के विषय में सुनता है, वह महाप्रभु के दिव्य ऐश्वर्य को समझ सकता है।"

पुरुषोत्तमे प्रभु-पाशे भगवानाचार्य ।।परम वैष्णव तेंहो सुपण्डित आग्ने ॥

८४॥

जगन्नाथ पुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु की संगति में भगवान् आचार्य रहते थे, जो निश्चय ही भद्र, विद्वान तथा महान् भक्त थे।"

सख्य-भावाक्रान्त-चित्त, गोप-अवतार ।स्वरूप-गोसाजि-सह सख्य-व्यवहार ॥

८५॥

वे ईश्वर के साथ सख्य भाव में निमग्न रहते थे। वे ग्वालबाल के अवतार थे और स्वरूप दामोदर गोस्वामी के साथ उनका व्यवहार अत्यन्त मैत्रीपूर्ण था।"

एकान्त-भावे आश्रियाछेन चैतन्य-चरण ।मध्ये मध्ये प्रभुर तेंहो करेन निमन्त्रण ॥

८६॥

उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की पूरी तरह से शरण ले रखी थी। कभी-कभी वे महाप्रभु को अपने घर पर भोजन करने के लिए निमन्त्रित करते थे।"

घरे भात करि' करेन विविध व्यञ्जन । एकले गोसाजि लञा कराने भोजन ॥

८७॥

भगवान् आचार्य अपने घर में नाना प्रकार के चावल तथा सब्ज़ियाँ तैयार करते और महाप्रभु को अकेले खिलाने के लिए अपने घर पर ले आते।"

ताँर पिता 'विषयी' बड़ शतानन्द-खाँन ।। ‘विषय-विमुख' आचार्य‘वैराग्य-प्रधान' ॥

८८॥

भगवान् आचार्य के पिता का नाम शतानन्द खान था, जो दक्ष राजनीतिज्ञ थे; जबकि भगवान् आचार्य की राजप्रबन्ध में तनिक भी रुचि नहीं थी। निस्सन्देह, वे प्रायः वैरागी थे।"

‘गोपाल-भट्टाचार्य' नाम ताँर छोट-भाइ ।।काशीते वेदान्त पड़ि' गेला ताँर ठात्रि ॥

८९॥

भगवान् आचार्य के भाई ने, जिसका नाम गोपाल भट्टाचार्य था, बनारस में वेदान्त दर्शन का अध्ययन किया था और अब वह भगवान् आचार्य के घर लौट आया था।

आचार्य ताहारे प्रभु-पदे मिलाइला ।।अन्तर्यामी प्रभु चित्ते सुख ना पाइला ॥

९०॥

भगवान् आचार्य अपने भाई को श्री महाप्रभु से भेंट कराने ले गये, किन्तु महाप्रभु यह जानकर कि गोपाल भट्टाचार्य मायावादी दार्शनिक है, उससे मिलकर अधिक प्रसन्न नहीं हुए।"

स्वरूप गोसाजिरे आचार्य कहे आर दिने । ‘वेदान्त पड़िया गोपाल आइसाछे एखाने ॥

९२ ॥

। भगवान् आचार्य ने स्वरूप दामोदर से कहा, मेरा छोटा भाई गोपाल वेदान्त दर्शन का अध्ययन समाप्त करके मेरे घर लौट आया है।"

आचार्य-सम्बन्धे बाह्ये करे प्रीत्याभासे ।। कृष्ण-भक्ति विना प्रभुर ना हय उल्लास ॥

९१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को ऐसे व्यक्ति से मिलकर कोई सुख नहीं मिलता है, जो कृष्ण को शुद्ध भक्त न हो। अतएव महाप्रभु को गोपाल भट्टाचार्य से मिलकर कोई प्रसन्नता नहीं हुई, क्योंकि वह मायावादी पण्डित था। तो भी वह भगवान् आचार्य से सम्बन्धित था, अतएव श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसे देखकर बाह्य रूप से प्रसन्नता व्यक्त की।"

सबे मेलि' आइस, शुनि 'भाष्य' इहार स्थाने' ।।प्रेम-क्रोध करि' स्वरूप बलय वचने ॥

९३ ॥

भगवान् आचार्य ने स्वरूप दामोदर से गोपाल से वेदान्त पर भाष्य सुनने के लिए अनुरोध किया। किन्तु स्वरूप दामोदर प्रेमवश कुछ क्रुद्ध होकर इस तरह बोले।।"

बुद्धि भ्रष्ट हैल तोमार गोपालेर सङ्गे।।मायावाद शुनिबारे उपजिल रङ्गे ॥

९४॥

तुमने गोपाल की संगति में अपनी बुद्धि खो दी है, अतएव तुम मायावाद दर्शन सुनने के लिए इच्छुक हो।

वैष्णव हा ग्रेबा शारीरक-भाष्य शुने ।। सेव्य-सेवक-भाव छाड़ि' आपनारे 'ईश्वर' माने ॥

९५॥

जब कोई वैष्णव वेदान्त-सूत्र पर शारीरक भाष्य नामक मायावादी टीका सुनता है, तो वह इसे कृष्णभावनाभावित प्रवृत्ति को त्याग देता है। कि भगवान् स्वामी हैं और जीव उनका सेवक है। इसके स्थान पर वह अपने आपको ही भगवान् मानने लगता है।"

महा-भागवत ग्रेइ, कृष्ण प्राण-धन यार ।।मायावाद-श्रवणे चित्त अवश्य फिरे ताँर ॥

१६॥

मायावाद दर्शन ऐसा वाक्जाल प्रस्तुत करता है कि बड़े से बड़ा भक्त जिसने कृष्ण को अपना जीवन तथा आत्मा के रूप में स्वीकार कर लिया है, अपना निर्णय बदल देता है जब वह वेदान्त-सूत्र पर मायावाद भाष्य पढ़ता है।"

आचार्य कहे,–'आमा सबार कृष्ण-निष्ठ-चित्ते ।। आमा सबार मन भाष्य नारे फिराइते' ॥

९७॥

। स्वरूप दामोदर की आपत्ति के बावजूद भगवान् आचार्य कहते रहे, हम सभी अपने तन तथा मन से भगवान् कृष्ण के चरणकमलों पर स्थिर हैं। अतएव शारीरक भाष्य हमारे मनों को नहीं बदल सकता।"

स्वरूप कहे, तथापि मायावाद-श्रवणे ।।‘चित्, ब्रह्म, माया, मिथ्या'–एइ-मात्र शुने ॥

९८॥

स्वरूप दामोदर ने उत्तर दिया, तो भी जब हम मायावाद दर्शन सुनते हैं, तो हम यही सुनते हैं कि ब्रह्म ज्ञान है और माया का ब्रह्माण्ड मिथ्या है, किन्तु हम कोई आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त नहीं करते।"

जीवाज्ञान-कल्पित ईश्वरे, सकल-इ अज्ञान ।।ग्राहार श्रवणे भक्तेर फाटे मन प्राण ॥

१९॥

मायावादी दार्शनिक यह स्थापना करने का प्रयास करता है कि जीव मात्र काल्पनिक है और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् माया के अधीन हैं। इस तरह की टीका सुनकर भक्त का हृदय तथा जीवन विदीर्ण हो जाता है।"

लज्जा-भय पात्रा आचार्य मौन हइला ।। आर दिन गोपालेरे देशे पाठाइला ॥

१०० ॥

इस प्रकार अत्यन्त लज्जित तथा भयभीत भगवान् आचार्य मौन रहे। अगले दिन उन्होंने गोपाल भट्टाचार्य से अपने जिले में लौट जाने के लिए कहा।"

एक-दिन आचार्य प्रभुरे कैला निमन्त्रण ।।घरे भात करि' करे विविध व्यञ्जन ॥

१०१॥

। एक दिन भगवान् आचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने घर पर भोजन करने के लिए आमन्त्रित किया। इस तरह वे चावल तथा विविध प्रकार की सब्जियाँ तैयार करने लगे।"

‘छोट-हरिदास' नाम प्रभुर कीर्तनीया ।।ताहारे कहेन आचार्य डाकिया आनिया ॥

१०२॥

‘छोटा हरिदास' नामक एक भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए गाना गाता था। भगवान् आचार्य ने उसे अपने घर बुलाया और उससे इस प्रकार कहा।"

‘मोर नामे शिखि-माहितिर भगिनी-स्थाने गिया ।शुक्ल-चाउल एक मान आनह मागिया' ॥

१०३ ॥

तुम शिखि माहिति की बहन के पास जाओ। मेरे नाम पर उससे एक मान सफेद चावल माँगकर यहाँ ले आओ।"

माहितिर भगिनी सेइ, नाम--माधवी-देवी । वृद्धा तपस्विनी आर परमा वैष्णवी ॥

१०४॥

शिखि माहिति की बहन का नाम माधवीदेवी था। वह वृद्धा थी जो सदैव तपस्या करती थी। वह भक्ति में बहुत उन्नत थी।

प्रभु लेखा करे ग्रारे--राधिकार 'गण' । जगतेर मध्ये ‘पात्र'—साड़े तिन जन ॥

१०५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनका श्रीमती राधारानी की एक पूर्व संगिनी के रूप में स्वीकार किया था। सारे संसार में उनके कुल साढ़े तीन घनिष्ठ भक्त थे।"

स्वरूप गोसाञि, आर राय रामानन्द ।।शिखि-माहिति–तिन, ताँर भगिनी--अर्ध-जन ॥

१०६॥

ये तीन भक्त थे-स्वरूप दामोदर गोस्वामी, रामानन्द राय तथा शिखि माहिति और आधा व्यक्ति था शिखि माहिति की बहिन।"

ताँर ठाजि तण्डुल मागि' आनिल हरिदास ।तण्डुल देखि' आचार अधिक उल्लास ॥

१०७॥

। जब छोटा हरिदास उससे चावल माँगकर भगवान् आचार्य के पास ले आया, तो वे इसकी गुणवत्ता देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए।"

स्नेहे रान्धिल प्रभुर प्रिय ग्रे व्यञ्जन ।। देउल प्रसाद, आदा-चाकि, लेम्बु-सलवण ॥

१०८॥

भगवान् आचार्य ने बड़े ही स्नेह के साथ तरह-तरह की सब्जियाँ तथा अन्य पकवान पकाए, जो श्री चैतन्य महाप्रभु को प्रिय थे। उन्होंने जगन्नाथजी का प्रसाद तथा पिसी सोंठ तथा नींबू और नमक जैसे पाचकव्यंजन भी प्राप्त किये।"

मध्याह्ने आसिया प्रभु भोजने वसिला ।।शाल्यन्न देखि' प्रभु आचार्ये पुछिला ॥

१०९॥

दोपहर में जब श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान् आचार्य की भिक्षा पाने आये, तो उन्होंने सर्वप्रथम उत्तम चावल की प्रशंसा की और फलस्वरूप उनसे पूछा।"

उत्तम अन्न एत तण्डुल काँहाते पाइला? ।आचार्य कहे,—माधवी-पाश मागिया आनिला ॥

११०॥

महाप्रभु ने पूछा, तुमने ऐसा बढ़िया चावल कहाँ से प्राप्त किया?’ भगवान आचार्य ने उत्तर दिया, मैंने माधवीदेवी से माँगकर प्राप्त किया है।"

प्रभु कहे,–'को ग्राइ' मागिया आनिल?'।छोट-हरिदासेर नाम आचार्य कहिल ॥

१११॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा कि चावल माँगकर कौन लाया है? तो भगवान् आचार्य ने छोटे हरिदास के नाम का उल्लेख किया।"

अन्न प्रशंसिया प्रभु भोजन करिला ।।निज-गृहे आसि' गोविन्देरे आज्ञा दिला ॥

११२ ॥

चावल के गुण की प्रशंसा करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रसाद ग्रहण किया। फिर अपने निवासस्थान लौटकर उन्होंने अपने निजी सहायक गोविन्द को यह आदेश दिया।"

‘आजि हैते एइ मोर आज्ञा पालिबा ।।छोट हरिदासे इहाँ आसिते ना दिबा' ॥

११३॥

आज के बाद छोटे हरिदास को यहाँ मत आने देना।"

द्वार माना हैल, हरिदास दुःखी हैल मने ।कि लागिया द्वार-माना केह नाहि जाने ॥

११४॥

जब छोटे हरिदास ने सुना कि उसे श्री चैतन्य महाप्रभु के पास न जाने का आदेश हुआ है, तो वह अत्यन्त दुःखी हुआ। कोई नहीं जान सका कि उसे न आने का आदेश क्यों दिया गया।"

तिन-दिन हैल हरिदास करे उपवास ।।स्वरूपादि आसि, पुछिला महाप्रभुर पाश ॥

११५॥

हरिदास ने लगातार तीन दिनों तक उपवास किया। तब स्वरूप दामोदर गोस्वामी तथा अन्य अन्तरंग भक्तगण श्री चैतन्य महाप्रभु के पास उनसे पूछने पहुँचे।"

कोनपराध, प्रभु, कैल हरिदास?।।कि लागिया द्वार-माना, करे उपवास? ॥

११६॥

छोटे हरिदास ने कौन-सा महान् अपराध किया है? उसे आपके द्वार तक आने से मना क्यों किया गया है? अब वह तीन दिनों से उपवास कर रहा है।"

प्रभु कहे,_वैरागी करे प्रकृति सम्भाषण ।देखिते ना पारों आमि ताहार वदन ॥

११७॥

महाप्रभु ने उत्तर दिया, मैं उस व्यक्ति को मुँह नहीं देख सकता, जो वैराग्य स्वीकार करने पर भी एक स्त्री से घुल-मिलकर बातें करता हो।"

दुर्वार इन्द्रिय करे विषय-ग्रहण ।। दारवी प्रकृति हरे मुनेरपि मन ॥

११८॥

“इन्द्रियाँ अपनी भोग-वस्तुओं से इतनी दृढ़ता से आकर्षित होती हैं। कि स्त्री की काठ की मूर्ति भी निश्चित रूप से बड़े से बड़े सन्त पुरुष के मन को भी आकृष्ट कर लेती है।"

मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा ना विविक्तासनो भवेत् ।। बलवानिन्द्रिय-ग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ।। ११९॥

“व्यक्ति को अपनी माता, बहन या पुत्री से सटकर नहीं बैठना चाहिए, क्योंकि इन्द्रियाँ इतनी बलवान होती हैं कि वे बड़े से बड़े ज्ञानी को भी आकृष्ट कर सकती हैं।"

क्षुद्र-जीव सब मर्कट-वैराग्य करिया ।।इन्द्रिय चराजा बुले ‘प्रकृति' सम्भाषिया ॥

१२०॥

ऐसे अनेक सम्पत्ति-रहित क्षुद्र व्यक्ति हैं, जो बन्दरों जैसा वैराग्य स्वीकार करते हैं। वे इन्द्रियतृप्ति में लगे रहने तथा स्त्रियों से घनिष्ठतापूर्वक बातें करने के लिए इधर-उधर घूमते हैं।"

एत कहि' महाप्रभु अभ्यन्तरे गेला ।।गोसाजिर आवेश देखि' सबे मौन हैला ॥

१२१॥

यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु अपने कमरे में चले गये। उन्हें इस तरह क्रोध की मुद्रा में देखकर सारे भक्त मौन हो गये।"

आर दिने सबे मेलि' प्रभुर चरणे ।।हरिदास लागि, किछु कैला निवेदने ॥

१२२॥

अगले दिन सारे भक्त छोटे हरिदास की ओर से निवेदन करने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में पहुँचे।"

अल्प अपराध, प्रभु करह प्रसाद ।। एबे शिक्षा हइल ना करिबे अपराध ॥

१२३॥

उन्होंने कहा, हरिदास ने छोटा-सा अपराध किया है, इसलिए हे , उस पर कृपालु हों। अब उसे पर्याप्त शिक्षा मिल चुकी है। भविष्य में वह ऐसा अपराध नहीं करेगा।"

प्रभु कहे,_मोर वश नहे मोर मन ।। प्रकृति-सम्भाषी वैरागी ना करे दर्शन ॥

१२४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मेरा मन मेरे वश में नहीं है। यह मन ऐसे व्यक्ति को संन्यास आश्रम में नहीं देखना चाहता, जो स्त्रियों से घुलमिलकर बातें करता हो।"

निज कार्ये ग्राह सबे, छाड़ वृथा कथा ।।पुनः यदि कह आमा ना देखिबे हेथा’ ॥

१२५ ॥

। तुम सभी अपने-अपने कार्य पर जाओ। इस व्यर्थ की बात को शेड़ो। यदि तुम लोगों ने फिर से इस तरह बात की, तो मैं चला जाऊँगा और तुम लोग मुझे और यहाँ नहीं देख पाओगे।"

एत शुनि' सबे निज-कर्णे हस्त दिया ।निज निज कार्ये सबे गेल त उठिया ॥

१२६॥

यह सुनकर सारे भक्तों ने अपने हाथों से अपने कान बन्द कर लिए। और उठकर वे अपने-अपने कार्यों पर चले गये।"

महाप्रभु मध्याह्न करिते चलि, गेला ।बुझन ना ग्राय एइ महाप्रभुर लीला ॥

१२७॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने भी अपना दोपहर का कृत्य करने के लिए वह स्थान छोड़ दिया। कोई उनकी लीलाओं को समझ नहीं सका।।"

आर दिन सबे परमानन्द-पुरी-स्थाने ।‘प्रभुके प्रसन्न कर'- कैला निवेदने ॥

१२८॥

अगले दिन सारे भक्त श्री परमानन्द पुरी के पास गये और उन्होंने उनसे प्रार्थना की कि वे महाप्रभु को शान्त करें।"

तबे पुरी-गोसाजि एका प्रभु-स्थाने आइला । नमस्करि' प्रभु ताँरै सम्भ्रमे वसाइला ॥

१२९॥

इसके बाद परमानन्द पुरी अकेले ही श्री चैतन्य महाप्रभु के स्थान पर गये। महाप्रभु ने नमस्कार करने के बाद उन्हें अपनी बगल में बड़े ही आदर से बैठाया।"

पुछिला,—कि आज्ञा, केने हैल आगमन? ।। ‘हरिदासे प्रसाद लागि' कैला निवेदन ॥

१३०॥

महाप्रभु ने पूछा, आपका क्या आदेश है? आप यहाँ किस कार्य से आये हैं ? तब परमानन्द पुरी ने अपनी विनती निवेदित की कि महाप्रभु छोटे हरिदास पर कृपा करें।"

शुनिया कहेन प्रभु,_शुनह, गोसाजि ।। सब वैष्णव ला तुमि रह एइ ठाजि ॥

१३१॥

यह विनती सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, हे प्रभु, कृपया आप मेरी बात सुनें। आपके लिए अच्छा होगा कि आप सारे वैष्णवों समेत यहीं रहें।"

मोरे आज्ञा हय, मुजि ग्राङ आलालनाथ ।। एकले रहिब ताहाँ, गोविन्द-मात्र साथ ॥

१३२॥

कृपया आप मुझे आलालनाथ जाने की अनुमति दें। मैं वहाँ अकेला रहूँगा, केवल गोविन्द मेरे साथ जायेगा।‘" एत बलि' प्रभु यदि गोविन्दे बोलाइला ।।पुरीरे नमस्कार करि' उठिया चलिला ॥

१३३॥

यह कहकर महाप्रभु ने गोविन्द को बुलाया। परमानन्द पुरी को नमस्कार करके वे उठे और जाने लगे।"

आस्ते-व्यस्ते पुरी-गोसाजि प्रभु आगे गेला । अनुनय करि' प्रभुरे घरे वसाइला ॥

१३४॥

। परमानन्द पुरी अत्यन्त शीघ्रतापूर्वक उनके सामने गये और अत्यन्त दीनतापूर्वक उन्हें अपने कमरे में बैठने के लिए मनाया।"

तोमार ये इच्छा, कर, स्वतन्त्र ईश्वर । केबा कि बलिते पारे तोमार उपर? ॥

१३५॥

परमानन्द पुरी ने कहा, हे चैतन्य महाप्रभु, आप स्वतन्त्र पुरुषोत्तम भगवान् हैं। आप जो चाहें सो कर सकते हैं। आपके ऊपर कौन कुछ कह सकता है?" लोक-हित लागि' तोमार सब व्यवहार ।।आमि सब ना जानि गम्भीर हृदय तोमार ॥

१३६॥

आपके सारे कार्य जनसमान्य के लाभ हेतु हैं। हम उन्हें नहीं समझ सकते, क्योंकि आपके मनोभाव अत्यन्त गहरे तथा गम्भीर हैं।"

एत बलि' पुरी-गोसाजि गेला निज-स्थाने ।हरिदास-स्थाने गेला सब भक्त-गणे ॥

१३७॥

यह कहकर परमानन्द पुरी अपने घर चले गये। तब सारे भक्त छोटे हरिदास को मिलने गये।"

स्वरूप-गोसाजि कहे,–शुन, हरिदास ।सबे तोमार हित वाञ्छि, करह विश्वास ॥

१३८॥

स्वरूप दामोदर गोसांई ने कहा, हरिदास, हमारी बात सुनो, क्योंकि हम सब तुम्हारा भला चाहते हैं। इस पर विश्वास करो।"

प्रभु हठे पड़ियाछे स्वतन्त्र ईश्वर ।। कभु कृपा करिबेन स्राते दयालु अन्तर ॥

१३९॥

इस समय श्री चैतन्य महाप्रभु रुष्ट हैं। वे स्वतन्त्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। किन्तु कभी न कभी वे अवश्य कृपालु होंगे, क्योंकि वे हृदय से अत्यन्त दयालु हैं।"

तुमि हठ कैले ताँर हठ से बाड़िबे ।। स्नान भोजन कर, आपने क्रोध झाबे ॥

१४०॥

महाप्रभु हठ कर रहे हैं और यदि तुम भी हठ करोगे, तो उनका हठ बढ़ेगा। तुम्हारे लिए अच्छा होगा कि तुम स्नान करो और प्रसाद पाओ। समय आने पर उनका क्रोध स्वतः दमित हो जायेगा।"

एत बलि तारे स्नान भोजन कराजा ।। आपन भवन आइला तारे आश्वासिया ॥

१४१॥

यह कहकर स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने हरिदास को स्नान करने तथा प्रसाद लेने के लिए राजी कर लिया। इस तरह उसे आश्वस्त करके वे अपने घर लौट आये।"

प्रभु यदि ग्रान जगन्नाथ-दरशने ।। दूरे रहि' हरिदास करेन दर्शने ॥

१४२॥

। जब श्री चैतन्य महाप्रभु मन्दिर में भगवान जगन्नाथ का दर्शन करने जाते, तो हरिदास दूर ही रहता और वहीं से उनका दर्शन करता।"

महाप्रभु—कृपा-सिन्धु, के पारे बुझिते ?।।प्रिय भक्ते दण्ड करेन धर्म बुझाइते ॥

१४३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु कृपा के सागर हैं। उन्हें कौन समझ सकता है? जब वे अपने भक्तों को दण्ड देते हैं, तो वे ऐसा जान-बूझकर धर्म के सिद्धान्तों या कर्तव्य की पुनस्र्थापना करने के लिए करते हैं।"

देखि' त्रास उपजिल सब भक्त-गणे ।। स्वप्ने-ह छाड़िल सबे स्त्री-सम्भाषणे ॥

१४४॥

जब सब भक्तों ने इस उदाहरण को देख लिया, तो उनके मन में भय उत्पन्न हो गया। इसलिए उन सबने स्वप्न में भी स्त्रियों से बातें करना त्याग दिया।"

एइ-मते हरिदासेर एक वत्सर गेल । तबु महाप्रभुर मने प्रसाद नहिल ॥

१४५ ॥

इस तरह छोटे हरिदास का पूरा एक वर्ष बीत गया, फिर भी उसके प्रति श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा का कोई नामोनिशान न था।"

रात्रि अवशेषे प्रभुरे दण्डवत् हञा ।। प्रयागेते गेल कारेह किछु ना बलिया ॥

१४६ ।। इस तरह एक रात के अन्त में, छोटे हरिदास ने श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करके किसी से कुछ कहे बिना ही प्रयाग के लिए प्रस्थान किया।"

प्रभु-पद-प्राप्ति लागि' सङ्कल्प करिल ।त्रिवेणी प्रवेश करि' प्राण छाड़िल ॥

१४७॥

छोटे हरिदास ने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में शरण पाने के लिए संकल्प किया। इस तरह प्रयाग में गंगा-यमुना के संगम त्रिवेणी में गहरे जल में प्रवेश करके उसने अपने प्राण त्याग दिये।"

सेइ-क्षणे दिव्य-देहे प्रभु-स्थाने आइला ।प्रभु-कृपा पात्रा अन्तर्धानेइ रहिला ॥

१४८॥

इस तरह आत्महत्या करने के तुरन्त बाद वह अपने आध्यात्मिक शरीर में श्री चैतन्य महाप्रभु के पास गया और उनकी कृपा प्राप्त की। किन्तु वह तब भी अदृश्य रहा।।"

गन्धर्व-देहे गान करेन अन्तर्धाने ।।रात्र्ये प्रभुरे शुनाय गीत, अन्ये नाहि जाने ॥

१४९॥

गन्धर्व जैसी दिव्य देह में छोटा हरिदास अदृश्य होते हुए भी रात में श्री चैतन्य महाप्रभु को गीत गाकर सुनाता था, किन्तु महाप्रभु के अतिरिक्त अन्य कोई यह नहीं जानता था।"

एक-दिन महाप्रभु पुछिला भक्त-गणे ।‘हरिदास काँहा? तारे आनह एखाने' ॥

१५०॥

। एक दिन श्री चैतन्य महाप्रभु ने भक्तों से पूछा, हरिदास कहाँ है? अब तुम उसे यहाँ ला सकते हो।"

सबे कहे,---हरिदास वर्ष पूर्ण दिने ।रात्रे उठि काँहा गेला, केह नाहि जाने ॥

१५१॥

सभी भक्तों ने उत्तर दिया, एक वर्ष पूरा होने पर एक रात को छोटा हरिदास उठा और चला गया। कोई नहीं जानता कि वह कहाँ गया।"

शुनि' महाप्रभु ईषत् हासिया रहिला ।सब भक्त-गण मने विस्मय हइला ।। १५२ ॥

भक्तों को शोक करते हुए देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु मंद मंद मुस्कुरा रहे थे। इस तरह सारे भक्त अत्यन्त विस्मित थे।"

एक-दिन जगदानन्द, स्वरूप, गोविन्द ।। काशीश्वर, शङ्कर, दामोदर, मुकुन्द ॥

१५३॥

समुद्र-स्नाने गेला सबे, शुने कथो दूरे । हरिदास गायेन, ग्रेन डाकि' कण्ठ-स्वरे ॥

१५४॥

एक दिन जगदानन्द, स्वरूप, गोविन्द, काशीश्वर, शंकर, दामोदर तथा मुकुन्द-सभी समुद्र में स्नान करने गये। वे दूर से हरिदास को गाते हुए सुन सके, मानो वह उन्हें अपनी मूल आवाज से बुला रहा हो।

मनुष्य ना देखे–मधुर गीत-मात्र शुने ।।गोविन्दादि सबे मेलि' कैल अनुमाने ॥

१५५ कोई उसे देख नहीं सका, किन्तु वे सब उसे मधुर स्वर में गाते सुन सके। इसलिए गोविन्द इत्यादि सभी भक्तों ने यह अनुमान लगाया।"

‘विषादि खाजा हरिदास आत्म-घात कैल ।सेइ पापे जानि 'ब्रह्म-राक्षस' हैल ॥

१५६॥

“हरिदास ने विष पीकर आत्महत्या कर ली होगी और इस पापकर्म के कारण ही अब वह ब्रह्म-राक्षस बन गया है।"

आकार ना देखि, मात्र शुनि तार गान' ।।स्वरूप कहेन,–‘एइ मिथ्या अनुमान ॥

१५७॥

उन्होंने कहा, हम उसका भौतिक रूप नहीं देख पा रहे हैं, किन्तु फिर भी उसका मधुर गाना सुन रहे हैं। अतएव वह प्रेत बन गया होगा। किन्तु स्वरूप दामोदर ने आपत्ति की, यह झूठा अनुमान है।"

आजन्म कृष्ण-कीर्तन, प्रभुर सेवन ।। प्रभु-कृपा-पात्र, आर क्षेत्रेर मरण ॥

१५८॥

। “छोटे हरिदास ने आजीवन हरे कृष्ण मन्त्र का जप किया और परम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा की। इतना ही नहीं, वह महाप्रभु को अत्यन्त प्रिय था और उसका तीर्थस्थान में देहान्त हुआ है।"

दुर्गति ना हय तार, सद्गति से हय ।।प्रभु-भङ्गी एइ, पाछे जानिबा निश्चय ॥

१५९॥

हरिदास का पतन नहीं हुआ होगा। उसे अवश्य ही मुक्ति मिली होगी। यह तो श्री चैतन्य महाप्रभु की लीला है। इसे तुम सब बाद में समझोगे।"

प्रयाग हइते एक वैष्णव नवद्वीप आइल ।।हरिदासेर वार्ता तेंहो सबारे कहिल ॥

१६०॥

एक भक्त प्रयाग से नवद्वीप लौटा और उसने हर एक को छोटे हरिदास की आत्महत्या का विस्तृत विवरण दिया।"

ग्रैछे सङ्कल्प, ग्रैछे त्रिवेणी प्रवेशिल ।। शुनि', श्रीवासादिर मने विस्मय ह-ल ॥

१६१॥

उसने बताया कि किस तरह हरिदास ने संकल्प किया और फिर वह गंगा-यमुना के संगम में जल में प्रविष्ट हुआ। ये बातें विस्तार से सुनकर श्रीवास ठाकुर तथा अन्य भक्त अत्यधिक चकित हुए।"

वर्षान्तरे शिवानन्द सब भक्त लजा । प्रभुरे मिलिला आसि' आनन्दित हा ॥

१६२।। वर्ष के अन्त में शिवानन्द सेन पहले की तरह अन्य भक्तों के साथ जगन्नाथ पुरी आये और परम सुख का अनुभव करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु से मिले।"

‘हरिदास काँहा?' यदि श्रीवास पुछिला ।। स्व-कर्म-फल-भुक्पुमान्–प्रभु उत्तर दिला ॥

१६३॥

। जब श्रीवास ठाकुर ने श्री चैतन्य महाप्रभु से पूछा, “छोटा हरिदास कहाँ है? तो महाप्रभु ने उत्तर दिया, मनुष्य को अपने सकाम कर्मों का फल अवश्य मिलता है।"

तबे श्रीवास तार वृत्तान्त कहिल । ग्रैछे सङ्कल्प, ग्रैछे त्रिवेणी प्रवेशिल ॥

१६४॥

। तब श्रीवास ठाकुर ने हरिदास के निर्णय तथा गंगा-यमुना के संगम में उसके जल में प्रवेश करने का विस्तार से वर्णन किया।"

शुनि' प्रभु हासि' कहे सुप्रसन्न चित्त ।। ‘प्रकृति दर्शन कैले एइ प्रायश्चित्त' ॥

१६५ ॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने विस्तारपूर्वक बातें सुनीं, तो वे प्रसन्न मुद्रा में हँसे और बोले, यदि कोई स्त्रियों को वासनापूर्ण दृष्टि से देखता है, तो प्रायश्चित्त की यही एकमात्र विधि है।"

स्वरूपादि मिलि' तबे विचार करिला । त्रिवेणी–प्रभावे हरिदास प्रभु-पद पाइला ॥

१६६ ।। तब स्वरूप दामोदर गोस्वामी इत्यादि सारे भक्तों ने यह निष्कर्ष निकाला कि चूंकि हरिदास ने गंगा तथा यमुना नदियों के संगम पर आत्महत्या की है, अतः उसे अन्ततोगत्वा श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण प्राप्त हुई होगी।"

एइ-मत लीला करे शचीर नन्दन ।।ग्राहा शुनि' भक्त-गणेर युड़ाय कर्ण-मन ॥

१६७॥

इस तरह शचीनन्दन श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी लीलाएँ करते हैं, जो कि शुद्ध भक्तों के कर्मों और मनों को महान् सन्तोष देती हैं।"

आपन कारुण्य, लोके वैराग्य-शिक्षण ।स्व-भक्तेर गाढ़-अनुराग-प्रकटीकरण ।। १६८॥

। यह घटना श्री चैतन्य महाप्रभु की करुणा, उनकी यह शिक्षा कि संन्यासी को अपने संन्यास आश्रम में ही रहना चाहिए तथा उनके श्रद्धालु भक्तों द्वारा उनके प्रति अनुभव किये जाने वाले अगाध अनुराग को प्रकट करती है।"

तीर्थेर महिमा, निज भक्ते आत्मसात् ।।एक लीलाय करेन प्रभु कार्य पाँच-सात ॥

१६९॥

। यह तीर्थस्थानों की महिमा को भी प्रदर्शित करती है तथा दिखलाती है कि किस तरह महाप्रभु अपने श्रद्धालु भक्त को स्वीकार करते हैं। इस तरह महाप्रभु ने एक लीला करके पाँच-सात उद्देश्यों को पूरा किया।"

मधुर चैतन्य-लीला—समुद्र-गम्भीर । लोके नाहि बुझे, बुझे ग्रेड 'भक्त' 'धीर' ॥

१७० ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अमृत तुल्य हैं और समुद्र के समान गहरी हैं। सामान्य लोग उन्हें नहीं समझ सकते, किन्तु धीर भक्त इन्हें समझ सकता है।"

विश्वास करिया शुन चैतन्य-चरित । तर्क ना करिह, तर्के हबे विपरीत ॥

१७१॥

कृपया श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं को श्रद्धा तथा विश्वासपूर्वक सुनिये। तर्क मत कीजिये, क्योंकि तर्क से विपरीत फल प्राप्त होगा।"

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।। चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

१७२॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए मैं कृष्णदास उनके पदचिह्नों पर चलकर श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।"

TO TOP

← पिछला अध्याय · अगला अध्याय →

← चैतन्य चरितामृत की सूची