अन्त्य लीला: अध्याय एक: श्रील रूप गोस्वामी की भगवान से दूसरी मुलाकात
पङ्गं लङ्घयते शैलं मूकमावर्तयेच्छुतिम् ।।यत्कृपा तमहं वन्दे कृष्ण-चैतन्यमीश्वरम् ॥
१॥
मैं श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करता हूँ, जिनकी कृपा से लँगड़ा व्यक्ति भी पर्वत को लाँघ सकता है और पूँगा व्यक्ति वैदिक साहित्य का उच्चारण कर सकता है।
दुर्गमे पथि मेऽन्धस्य स्खलत्पाद-गतेर्मुहुः ।।स्व-कृपा-यष्टि-दानेन सन्तः सन्त्ववलम्बनम् ॥
२॥
मेरा मार्ग अत्यन्त कठिन है। मैं अन्धा हूँ और मेरे पैर बारम्बार फिसल रहे हैं। इसलिए सन्तजन कृपया मुझे अपनी कृपारूपी लाठी का सहारा दें।
श्री-रूप, सनातन भट्ट-रघुनाथ ।श्री-जीव, गोपाल-भट्ट, दास-रघुनाथ ॥
३॥
एइ छय गुरुर करों चरण वन्दन ।ग्राहा हैते विघ्न-नाश, अभीष्ट-पूरण ॥
४॥
मैं श्री रूप, सनातन, भट्ट रघुनाथ, श्री जीव, गोपाल भट्ट तथा दास रघुनाथ-इन छह गोस्वामियों के चरणकमलों की वन्दना करता हूँ, जिससे मेरे इस ग्रन्थ के लेखन की सारी बाधाएँ नष्ट हो जाएँ और मेरी वास्तविक इच्छा पूरी हो सके। जयतां सुरतौ पङ्गोर्मम मन्द-मतेर्गती ।।मत्सर्वस्व-पदाम्भोजौ राधा-मदन-मोहनौ ॥
५॥
परम कृपालु राधा तथा मदनमोहन की जय हो। मैं लँगड़ा तथा मूर्ख हूँ, फिर भी वे मेरे निर्देशक हैं और उनके चरणकमल मेरे लिए सब कुछ हैं।"
देव्यिद्-वृन्दारण्य-कल्प-दुमाधःश्रीमद्-रत्नागार-सिंहासन-स्थौ ।। श्रीमद-राधा-श्रील-गोविन्द-देवौप्रेष्ठालीभिः सेव्यमानौ स्मरामि ॥
६॥
। वृन्दावन में रत्नों के मन्दिर में, कल्पवृक्ष के नीचे, श्री श्री राधागोविन्द उनके अत्यन्त अन्तरंग पार्षदों द्वारा सेवित हैं और देदीप्यमान सिंहासन पर आसीन हैं। मैं उन्हें सादर नमस्कार करता हूँ।"
श्रीमान् रास-रसारम्भी वंशीवट-तट-स्थितः । कर्षन् वेणु-स्वनैर्गोपीर्गोपी-नाथः श्रियेऽस्तु नः ॥
७॥
रासनृत्य के दिव्य रस के प्रवर्तक श्री श्रील गोपीनाथ वंशीवट के किनारे खड़े हैं और अपनी सुविख्यात वंशी की ध्वनि से गोपियों का ध्यान आकृष्ट करते हैं। वे सभी हमारा मंगल करें।"
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत आचार्य की जय हो! तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो!" मध्य-लीला सङ्क्षेपेते करिलँ वर्णन ।अन्त्य-लीला-वर्णन किछु शुन, भक्त-गण ॥
९॥
मैंने मध्य लीला के अंतर्गत श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का संक्षेप में वर्णन किया है । अब मई उनकी अंतिम लीलाओं के विषय में वर्णन करने का प्रयास करूंगा, जो अन्त्य लीला कहलाती हैं। मध्य-लीला-मध्ये अन्त्य-लीला-सूत्र-गण ।पूर्व-ग्रन्थे सङ्क्षेपेते करियाछि वर्णन ॥
१०॥
मैंने मध्य-लीला के अन्तर्गत श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं को संक्षेप में वर्णन किया है। अब मैं उनकी अन्तिम लीलाओं के विषय में वर्णन करने का प्रयास करूंगा, जो अन्त्य लीला कहलाती हैं।"
आमि जरा-ग्रस्त, निकटे जानिया मरण । अन्त्य कोनो कोनो लीला करियाछि वर्णन ॥
११॥
अब मैं वृद्धावस्था के कारण प्रायः अक्षम हूँ और जानता हूँ कि किसी भी क्षण मेरी मृत्यु हो सकती है। इसलिए मैं अन्त्य-लीला के कुछ अंशों का पहले ही वर्णन कर चुका हूँ। मैंने मध्य-लीला के अन्तर्गत अन्त्य-लीला का सूत्रों के रूप में संक्षिप्त वर्णन किया है।"
पूर्व-लिखित ग्रन्थ-सूत्र-अनुसारे । येइ नाहि लिखि, ताहा लिखिये विस्तारे ॥
१२॥
। इसके पूर्वलिखित सूत्रों के अनुसार मैंने जो कुछ उल्लेख नहीं किया, उसका विस्तार से वर्णन करूंगा।"
वृन्दावन हैते प्रभु नीलाचले आइला । स्वरूप-गोसाजि गौड़े वार्ता पाठाइला ॥
१३॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन से जगन्नाथ पुरी लौटे, तो स्वरूप दामोदर गोसांई ने तुरन्त ही महाप्रभु के आने का समाचार बंगाल के भक्तों को भेज दिया।"
शुनि' शची आनन्दित, सब भक्त-गण ।। सबे मिलि' नीलाचले करिला गमन ॥
१४॥
यह समाचार सुनकर माता शची तथा नवद्वीप के अन्य सारे भक्त परम प्रसन्न थे और वे सभी मिलकर नीलाचल (जगन्नाथ पुरी) के लिए चल पड़े।"
कुलीन-ग्रामी भक्त आर व्रत खण्ड-वासी ।। आचार्य शिवानन्द सने मिलिला सबे आसि' ॥
१५॥
इस तरह कुलीन ग्राम तथा श्रीखण्ड के सारे भक्त एवं अद्वैत आचार्य एकसाथ शिवानन्द सेन से मिलने आये।"
शिवानन्द करे सबार घाटि समाधान ।।सबारे पालन करे, देय वासा-स्थान ॥
१६॥
शिवानन्द सेन ने यात्रा की व्यवस्था की। उन्होंने हर एक का भरणपोषण किया और हर एक को निवासस्थान दिया।"
एक कुकुर चले शिवानन्द-सने ।भक्ष्य दिया लञा चले करिया पालने ॥
१७॥
जगन्नाथ पुरी जाते समय शिवानन्द सेन ने अपने साथ एक कुत्ते को चलने दिया। वे उसे खाने को भोजन देते थे और उसका भरण-पोषण करते थे।"
एक-दिन एक-स्थाने नदी पार हैते ।।उड़िया नाविक कुकुर ना चड़ाय नौकाते ॥
१८॥
एक दिन जब शिवानन्द को नदी पार करनी थी, तो एक उड़िया नाविक ने कुत्ते को नाव पर नहीं चढ़ने दिया।"
कुकुर रहिला,—शिवानन्द दुःखी हैला ।दश पण कड़ि दिया कुक्करे पार कैला ॥
१९॥
। शिवानन्द दुःखी थे कि कुत्ता पीछे छूट रहा है, इसलिए उन्होंने कुत्ते को नदी पार ले जाने के लिए दस पण कौड़ियाँ उस नाविक को दीं।"
एक-दिन शिवानन्दे घाटियाले राखिला । कुकुरके भात दिते सेवक पासरिला ॥
२०॥
एक दिन जब एक शुल्क संग्राहक ने शिवानन्द को रोक लिया, तो उनका नौकर उस कुत्ते को पकाया चावल ( भात) देना भूल गया।"
रात्रे आसि' शिवानन्द भोजनेर काले । ‘कुकुर पाजाछे भात?'–सेवके पुछिले ॥
२१॥
रात में, जब शिवानन्द सेन लौटे और भोजन कर रहे थे, तो उन्होंने अपने नौकर से पूछा कि कुत्ते को भोजन मिला या नहीं।"
कुकुर नाहि पाय भात शुनि' दुःखी हैला ।। कुकुर चाहिते दश-मनुष्य पाठाइला ॥
२२॥
। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनकी अनुपस्थिति में कुत्ते को भोजन नहीं दिया गया, तो वे अत्यन्त दुःखी हुए। तब उन्होंने तुरन्त उस कुत्ते को ढूंढने के लिए दस व्यक्ति भेजे।।"
चाहिया ना पाइल कुक्कर, लोक सब आइला । दुःखी हा शिवानन्द उपवास कैला ॥
२३॥
जब लोग असफल होकर लौट आये, तो शिवानन्द सेन अत्यन्त दुःखी हुए और उस रात उन्होंने उपवास किया।"
प्रभाते कुकुर चाहि' काँहा ना पाइल।। सकल वैष्णवेर मने चमत्कार हैल ॥
२४॥
। उन्होंने प्रातःकाल कुत्ते की खोज की, किन्तु वह कहीं नहीं मिला। इससे सारे वैष्णव अत्यन्त चकित हुए।"
उत्कण्ठाय चलि' सबे आइला नीलाचले ।पूर्ववत् महाप्रभु मिलिला सकले ॥
२५॥
। इस प्रकार वे सभी अत्यन्त चिन्तित होकर जगन्नाथ पुरी पैदल आये, जहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु सदा की तरह उनसे मिले।"
सबा ला केला जगन्नाथ दरशन ।सबा ला महाप्रभु करेन भोजन ॥
२६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु उनके साथ भगवान् का दर्शन करने मन्दिर में गये और उस दिन उन्होंने सभी भक्तों के साथ भोजन भी किया।"
पूर्ववत् सबारे प्रभु पाठाइला वासा-स्थाने ।प्रभु-ठाजि प्रातः-काले आइला आर दिने ॥
२७॥
पहले की ही तरह महाप्रभु ने उन सबको आवासीय कक्ष दिये और अगले दिन प्रातःकाल सारे भक्त महाप्रभु को मिलने आये।"
आसिया देखिल सबे सेइ त कुक्करे । प्रभु-पाशे वसियाछे किछु अल्प-दूरे ॥
२८॥
जब सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु के स्थान पर आये, तो उन्होंने उसी कुत्ते को महाप्रभु से कुछ ही दूरी पर बैठा हुआ देखा।प्रसाद नारिकेल-शस्य देन फेलाजा ।।'राम' 'कृष्ण' ‘हरि' कह—बलेन हासिया ॥
२९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु उस कुत्ते के सामने हरे नारियल के गूदे का प्रसाद फेंक रहे थे। अपने ढंग से हँसते हुए, वे कुत्ते से कह रहे थे, “राम, 'कृष्ण' तथा हरि' नाम का उच्चारण करो।"
शस्य खाय कुकुर, 'कृष्ण' कहे बार बार। देखिया लोकेर मने हैल चमत्कार ॥
३०॥
कुत्ते को हरे नारियल का शस्य खाते और बारम्बार ‘कृष्ण’, ‘कृष्ण’ का उच्चारण करते देखकर वहाँ उपस्थित सारे भक्त अत्यधिक आश्चर्यचकित हुए।"
शिवानन्द कुकुर देखि' दण्डवत्कैला ।दैन्य करि' निज अपराध क्षमाइला ॥
३१॥
जब शिवानन्द ने कुत्ते को उस तरह बैठे तथा कृष्ण-नाम का उच्चारण करते देखा, तो उन्होंने अपनी सहज दीनतावश तुरन्त ही कुत्ते को दण्डवत प्रणाम किया, जिससे उसके प्रति किये गये अपराध क्षमा हो जाएँ।"
आर दिन केह तार देखा ना पाइला ।।सिद्ध-देह पाजा कुकुर वैकुण्ठेते गेला ॥
३२॥
अगले दिन किसी ने उस कुत्ते को नहीं देखा, क्योंकि उसे आध्यात्मिक शरीर प्राप्त हो चुका था और वह वैकुण्ठ चला गया था।"
ऐछे दिव्य-लीला करे शचीर नन्दन ।कुकुरके कृष्ण कहाञा करिला मोचन ॥
३३॥
शची माता के पुत्र श्री चैतन्य महाप्रभु की दिव्य लीलाएँ ऐसी ही हैं। उन्होंने एक कुत्ते तक को हरे कृष्ण महामन्त्र का उच्चारण करने के लिए प्रेरित करके उसका उद्धार कर दिया।"
एथा प्रभु-आज्ञाय रूप आइला वृन्दावन ।। कृष्ण-लीला-नाटक करते हैल मन ॥
३४॥
इस बीच श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेशानुसार श्रील रूप गोस्वामी वृन्दावन लौट आये। उन्होंने भगवान् कृष्ण की लीलाओं से सम्बन्धित नाटक लिखने की इच्छा की।"
वृन्दावने नाटकेर आरम्भ करिला । मङ्गलाचरण नान्दी-श्लोक' तथाइ लिखिला ॥
३५॥
वृन्दावन में रूप गोस्वामी ने एक नाटक लिखना प्रारम्भ किया। विशेषतया उन्होंने मर्गलाचरण सूचक नान्दी श्लोक की रचना की।"
पथे चलि' आइसे नाटकेर घटना भाविते ।।कड़चा करिया किछु लागिला लिखिते ॥
३६॥
गौड़देश जाते हुए रूप गोस्वामी सोच रहे थे कि नाटक की घटना को किस तरह लिखा जाए। इस तरह उन्होंने कुछ टिप्पणियाँ बना ली थीं और लिखना भी प्रारम्भ कर दिया।"
एइ-मते दुइ भाइ गौड़-देशे आइला ।।गौड़े आसि' अनुपमेर गङ्गा-प्राप्ति हैला ॥
३७॥
इस तरह रूप तथा अनुपम दोनों भाई बंगाल पहुँचे, किन्तु जब वे वहाँ पहुँच गये, तो अनुपम का देहान्त हो गया।"
रूप-गोसाजि प्रभु-पाशे करिला गमन ।प्रभुरे देखिते ताँर उत्कण्ठित मन ॥
३८॥
तब रूप गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने के लिए प्रस्थान किया, क्योंकि वे उनके दर्शन के लिए अत्यन्त उत्सुक थे।"
अनुपमेर लागि' ताँर किछु विलम्ब हइल ।भक्त-गण-पाश आइला, लाग्ना पाइल ॥
३९॥
अनुपम के देहान्त के कारण कुछ देरी हो गई थी, इसलिए जब रूप गोस्वामी भक्तों से मिलने बंगाल गये, तो वे उनसे सम्पर्क नहीं कर पाये, क्योंकि वे पहले ही चले गये थे।"
उड़िया-देशे ‘सत्यभामा-पुर'-नामे ग्राम ।। एक रात्रि सेइ ग्रामे करिला विश्राम ॥
४०॥
उड़ीसा प्रान्त में सत्यभामापुर नामक एक गाँव है। श्रील रूप गोस्वामी ने जगन्नाथ पुरी जाते समय उसी गाँव में एक रात विश्राम किया।"
रात्रे स्वप्ने देखे,—एक दिव्य-रूपा नारी ।सम्मुखे आसिया आज्ञा दिला बहु कृपा करि' ॥
४१॥
सत्यभामापुर में विश्राम करते समय उन्होंने स्वप्न देखा कि एक दिव्य सुन्दरी स्त्री उनके समक्ष आई और कृपा करके उन्हें यह आदेश दिया।"
आमार नाटक पृथक् करह रचन ।आमार कृपाते नाटक हैबे विलक्षण ॥
४२॥
। उसने कहा, तुम मेरे ऊपर एक अलग नाटक लिखो। मेरी कृपा से यह अद्वितीय सुन्दर होगा।"
स्वप्न देखि' रूप-गोसाजि करिला विचार ।सत्यभामार आज्ञा–पृथक् नाटक करिबार ॥
४३॥
इस स्वप्न के बाद श्रील रूप गोस्वामी ने विचार किया, यह तो सत्यभामा का आदेश है कि मैं उनके लिए एक अलग नाटक लिखें।"
व्रज-पुर-लीला एकत्र करियाछि घटना ।। दुई भाग करि' एबे करिमु रचना ॥
४४॥
मैंने भगवान् कृष्ण द्वारा वृन्दावन तथा द्वारका में सम्पन्न सारी लीलाओं को एक ही पुस्तक में संकलित किया है। अब मुझे उन्हें दो नाटकों में विभाजित करना होगा।"
भाविते भाविते शीघ्र आइला नीलाचले । आसि' उत्तरिला हरिदास-वासा-स्थले ॥
४५॥
। इस तरह विचारमग्न होकर वे शीघ्र ही जगन्नाथ पुरी पहुँच गये। वहाँ आकर वे हरिदास ठाकुर की कुटिया में जा पहुँचे।।"
हरिदास-ठाकुर ताँरै बहु-कृपा कैला । ‘तुमि आसिबे,—मोरे प्रभु ये कहिला' ॥
४६॥
हरिदास ठाकुर ने प्रेम तथा कृपावश श्रील रूप गोस्वामी को बतलाया, “श्री चैतन्य महाप्रभु ने पहले ही मुझे सूचित कर दिया है कि तुम यहाँ आओगे।"
‘उपल-भोग' देखि हरिदासेरे देखिने । प्रतिदिन आइसेन, प्रभु आइला आचम्बिते ॥
४७॥
जगन्नाथ मन्दिर में उपल भोग उत्सव देखने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु नियमित रूप से प्रतिदिन हरिदास को मिलने आते थे। अतः वे सहसा वहाँ आ पहुँचे।"
रूप दण्डवत करे.-हरिदास कहिला ।हरिदासे मिलि' प्रभु रूपे आलिङ्गिला ॥
४८॥
जब महाप्रभु वहाँ आये, तो रूप गोस्वामी ने तुरन्त उन्हें नमस्कार किया। हरिदास ने महाप्रभु को सूचित किया, यह रूप गोस्वामी आपको नमस्कार कर रहा है, और महाप्रभु ने उनका आलिंगन किया।"
हरिदास-रूपे लञा प्रभु वसिला एक-स्थाने ।। कुशल-प्रश्न, इष्ट-गोष्ठी कैला कत-क्षणे ॥
४९॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु हरिदास तथा रूप गोस्वामी के पास बैठ गये। उन सबने एक-दूसरे से कुशल समाचार पूछे और तब कुछ समय तक परस्पर बातें करते रहे।
सनातनेर वार्ता यबे गोसाञि पछिल । रूप कहे,–'तार सङ्गे देखा ना हइल ॥
५०॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी के विषय में पूछा, तो रूप गोस्वामी ने उत्तर दिया, उनसे मेरी भेंट नहीं हुई।"
आमि गङ्गा-पथे आइलाङ, तिंहो राज-पथे ।।अतएव आमार देखा नहिल ताँर साथे ॥
५१॥
मैं गंगा-तट के मार्ग से आया हूँ, जबकि सनातन गोस्वामी सार्वजनिक मार्ग से आये हैं। इसलिए हम एक-दूसरे से मिल नहीं पाये।प्रयागे शुनिलँ, तेंहो गेला वृन्दावने ।।अनुपमेर गङ्गा-प्राप्ति कैल निवेदने ॥
५२॥
। मैंने प्रयाग में सुना कि वे पहले ही वृन्दावन चले गये हैं। इसके बाद रूप गोस्वामी ने अनुपम के देहान्त के विषय में महाप्रभु को जानकारी" रूपे ताहाँ वासा दिया गोसाञि चलिला ।। गोसाजिर सङ्गी भक्त रूपेरे मिलिला ॥
५३॥
। वहाँ रूप गोस्वामी को आवासीय कक्ष देकर श्री चैतन्य महाप्रभु चले गये। तब महाप्रभु के सारे भक्तों ने श्रील रूप गोस्वामी से भेंट की।"
आर दिन महाप्रभु सब भक्त ला ।रूपे मिलाइला सबाय कृपा त’ करिया ॥
५४॥
। अगले दिन, चैतन्य महाप्रभु रूप गोस्वामी से फिर मिले और कृपा करके अपने सारे भक्तों को उनसे परिचय कराया।
सबार चरण रूप करिला वन्दन ।कृपा करि' रूपे सबे कैला आलिङ्गन ॥
५५॥
श्रील रूप गोस्वामी ने उन सबके चरणकमलों पर सादर नमस्कार किया और सारे भक्तों ने अत्यन्त कृपा करके उनका आलिंगन किया।"
‘अद्वैत नित्यानन्द, तोमरा दुइ-जने' ।।प्रभु कहे रूपे कृपा कर काय-मने ॥
५६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अद्वैत आचार्य तथा नित्यानन्द प्रभु से कहा, आप दोनों को पूरे हृदय से रूप गोस्वामी पर कृपा करनी चाहिए।"
तोमा-हुँहार कृपाते इँहार हउ तैछे शक्ति ।झाते विवरित पारेन कृष्ण-रस-भक्ति ॥
५७ आप दोनों की कृपा से रूप गोस्वामी इतना शक्तिशाली हो जाये कि वह भक्ति के दिव्य रस का वर्णन कर सके।"
गौड़िया, उड़िया, ग्रत प्रभुर भक्त-गण ।सबार हइल रूप स्नेहेर भाजन ॥
५८॥
इस तरह रूप गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों के स्नेह और प्रेम के पात्र बन गये, जिनमें बंगाल से आये हुए तथा उड़ीसा में रहने वाले भक्त सम्मिलित थे।"
प्रतिदिन आसि' रूपे करेन मिलने । मन्दिरे ये प्रसाद पान, देन दुइ जने ॥
५९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु प्रतिदिन रूप गोस्वामी से मिलने जाते और मन्दिर से जो भी प्रसाद पाते, उसे वे रूप गोस्वामी तथा हरिदास ठाकुर को दे देते।।"
इष्ट-गोष्ठी मुँहा सने करि' कत-क्षण ।। मध्याह्न करिते प्रभु करिला गमन ॥
६०॥
। फिर महाप्रभु उन दोनों से कुछ देर तक बातें करते और तब दोपहर के नित्य कर्म करने के लिए चले जाते।"
एइ-मत प्रतिदिन प्रभुर व्यवहार । प्रभु-कृपा पाञा रूपेर आनन्द अपार ॥
६१॥
। इस तरह प्रतिदिन उनके साथ चैतन्य महाप्रभु का व्यवहार चलता रहा। इस प्रकार महाप्रभु की दिव्य कृपा पाकर श्रील रूप गोस्वामी को अपार आनन्द हुआ।"
भक्त-गण ला कैला गुण्डिचा मार्जन ।। आइटोटा आसि' कैला वन्य-भोजन ॥
६२ ।। । अपने सारे भक्तों को साथ लेकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने गुण्डिचा मन्दिर की सफाई तथा धुलाई की और बाद में आइटोटा नामक बगीचे में गये और वहीं पर वन्य-भोजन के रूप में उन्होंने प्रसाद ग्रहण किया।"
प्रसाद खाय, ‘हरि' बले सर्व-भक्त-जन ।।देखि' हरिदास-रूपेर हरषित मन ॥
६३ ॥
। जब हरिदास ठाकुर तथा रूप गोस्वामी ने देखा कि सारे भक्त प्रसाद ग्रहण कर रहे हैं तथा हरि के पवित्र नाम का उच्चारण कर रहे हैं, तो वे दोनों अत्यन्त प्रसन्न हुए।गोविन्द-द्वारा प्रभुर शेष-प्रसाद पाइला ।।
प्रेमे मत्त दुइ-जन नाचिते लागिला ॥
६४॥
जब उन्होंने गोविन्द के हाथों से श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रसाद का अवशेष प्राप्त किया, तो उन्होंने उसको सादर ग्रहण किया और तब दोनों ही भावविभोर होकर नाचने लगे।"
आर दिन प्रभु रूपे मिलिया वसिला । सर्वज्ञ-शिरोमणि प्रभु कहिते लागिला ॥
६५॥
। अगले दिन जब श्री चैतन्य महाप्रभु श्रील रूप गोस्वामी को मिलने गये, तब सर्वज्ञ महाप्रभु इस प्रकार बोले।"
‘कृष्णेरे बाहिर नाहि करिह व्रज हैते ।।व्रज छाड़ि' कृष्ण कभु ना ग्रान काहाँते ॥
६६॥
कृष्ण को वृन्दावन से बाहर ले जाने का प्रयास मत करो, क्योंकि वे कभी भी अन्यत्र नहीं जाते।।"
कृष्णोऽन्यो यदु-सम्भूतो यः पूर्णः सोऽस्त्यतः परः । वृन्दावनं परित्यज्य स क्वचिन्नैव गच्छति ॥
६७॥
। यदुकुमार नाम से विख्यात कृष्ण वासुदेव कृष्ण हैं। वे उन कृष्ण से भिन्न हैं, जो नन्द महाराज के पुत्र हैं। यदुकुमार कृष्ण अपनी लीलाएँ मथुरा तथा द्वारका नगरों में प्रकट करते हैं, किन्तु नन्द महाराज के पुत्र कृष्ण कभी भी वृन्दावन नहीं छोड़ते।"
एत कहि' महाप्रभु मध्याह्न चलिला । रूप-गोसाजि मने किछु विस्मय हइला ॥
६८॥
यह कहकर चैतन्य महाप्रभु दोपहर के कृत्य करने चले गये और श्रील रूप गोस्वामी आश्चर्यचकित से रह गये।"
पृथक् नाटक करिते सत्यभामा आज्ञा दिल । जानिलु, पृथक् नाटक करिते प्रभु-आज्ञा हैल ॥
६९॥
श्रील रूप गोस्वामी ने सोचा, सत्याभामा ने मुझे अलग-अलग दो नाटक लिखने का आदेश दिया है। अब मैं समझा कि इस आदेश की पुष्टि श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा हो गई है।"
पूर्वे दुइ नाटक छिल एकत्र रचना ।। दुइ-भाग करि एबे करिमु घटना ॥
७० ॥
। पहले मैंने दो नाटकों को एक ही रचना के रूप में लिखा। अब मैं इसे विभाजित करूँगा और उन घटनाओं का वर्णन दो अलग ग्रन्थों में करूंगा।"
दुइ 'नान्दी' 'प्रस्तावना', दुइ 'संघटना' ।पृथक्करिया लिखि करिया भावना ॥
७९॥
मैं दो अलग-अलग नान्दी और दो अलग-अलग प्रस्तावनाएँ लिखेंगा। मैं इस विषय में गम्भीरता से विचार करके घटनाओं का दो अलग-अलग वर्गों में वर्णन करूंगा।"
रथ-यात्राय जगन्नाथ दर्शन करिला ।।रथ-अग्रे प्रभुर नृत्य-कीर्तन देखिला ॥
७२॥
रथयात्रा उत्सव के समय रूप गोस्वामी ने भगवान जगन्नाथ के दर्शन किये। उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु को रथ के आगे नाचते और कीर्तन करते भी देखा।"
प्रभुर नृत्य-श्लोक शुनि' श्री-रूप-गोसानि ।।सेइ श्लोकार्थ लञा श्लोक करिला तथाई ॥
७३॥
जब रूप गोस्वामी ने उस उत्सव में श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा उच्चारित एक श्लोक सुना, तो उन्होंने तुरन्त ही उसी विषय से सम्बन्धित एक अन्य श्लोक रच दिया।"
पूर्वे सेइ सब कथा करियाछि वर्णन ।तथापि कहिये किछु सङ्क्षेपे कथन ॥
७४॥
मैं पहले ही इन घटनाओं का वर्णन कर चुका हूँ, तो भी मैं संक्षेप में कुछ और कहना चाहता हूँ।"
सामान्य एक श्लोक प्रभु पड़ेन कीर्तने ।।केने श्लोक पड़े इहा केह नाहि जाने ॥
७५ ॥
सामान्यतया रथ के सामने नृत्य तथा कीर्तन करते समय श्री चैतन्य महाप्रभु एक श्लोक का पाठ किया करते थे। किन्तु कोई यह नहीं जानता कि वे उस विशेष श्लोक को क्यों पढ़ते थे।"
सबे एका स्वरूप गोसाजि श्लोकेर अर्थ जाने ।श्लोकानुरूप पद प्रभुके करान आस्वादने ॥
७६ ॥
। एकमात्र स्वरूप दामोदर गोस्वामी उस अभिप्राय को जानते थे, जिसके हेतु महाप्रभु वह श्लोक सुनाया करते थे। महाप्रभु के मनोभाव के अनुसार स्वरूप दामोदर गोस्वामी अन्य श्लोक उद्धृत करते थे, जिससे महाप्रभु रस का आस्वादन कर सकें।"
रूप-गोसाजि प्रभुर जानिया अभिप्राय ।।सेइ अर्थे श्लोक कैला प्रभुरे ग्रे भाय ॥
७७॥
किन्तु रूप गोस्वामी महाप्रभु के उद्देश्य को समझ गये और उन्होंने एक दूसरा श्लोक रचा, जो श्री चैतन्य महाप्रभु को अच्छा लगा।"
यः कौमार-हरः स एव हि वरस्ता एव चैत्र-क्षपोस्।ते चोन्मीलित-मालती-सुरभयः प्रौढ़ाः कदम्बानिलाः ।। सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरत-व्यापार-लीला-विधौ ।रेवा-रोधसि वेतसी-तरु-तले चेतः समुत्कण्ठते ॥
७८ ॥
। जिस व्यक्ति ने मेरी युवावस्था में मेरा हृदय चुराया था, अब पुनः वह मेरा स्वामी है। ये चैत्र मास की चाँदनी से पूर्ण वही रातें हैं। मालती फूलों की वही सुगन्ध है और कदम्ब के वन से वही मधुर मन्द वायु बह रही है। घनिष्ठ सम्बन्ध में, मैं भी वही प्रेमिका हूँ, फिर भी मेरा मन यहाँ प्रसन्न नहीं है। मैं रेवा के तट पर वेतसी वृक्ष के नीचे उसी स्थान पर लौट जाने के लिए उत्सुक हूँ। यही मेरी इच्छा है।"
प्रियः सोऽयं कृष्णः सह-चरि कुरु-क्षेत्र-मिलितस्।तथाहं सा राधा तदिदमुभयोः सङ्गम-सुखम् ।। तथाप्यन्तः-खेलन्मधुर-मुरली-पञ्चम-जुषे ।मनो मे कालिन्दी-पुलिन-विपिनाय स्पृहयति ॥
७९ ॥
हे प्रिय सखी, अब मैं इस कुरुक्षेत्र में अपने अत्यन्त पुराने तथा प्रिय मित्र कृष्ण से मिली हूँ। मैं वही राधारानी हूँ और हम अब मिल रहे हैं। यह अत्यन्त सुहावना है, किन्तु तो भी मैं यमुना-तट के वन के वृक्षों के नीचे जाना चाहती हूँ। मैं वृन्दावन के जंगल के भीतर उनकी मधुर वंशी से पंचम स्वर निकलते सुनना चाहती हूँ।"
ताल-पत्रे श्लोक लिखि' चालेते राखिला ।। समुद्र-स्नान करिबारे रूप-गोसाजि गेला ॥
८०॥
ताड़ के एक पत्ते पर इस श्लोक को लिखने के बाद रूप गोस्वामी ने इसे अपनी कुटिया की छत में कहीं रख दिया और वे समुद्र-स्नान करने चले गये।।"
हेन-काले प्रभु आइला ताँहारे मिलिते ।। चाले श्लोक देखि प्रभु लागिला पड़िते ॥
८१॥
उसी समय श्री चैतन्य महाप्रभु उनसे वहाँ मिलने आये और जब उन्होंने छत में रखे ताड़-पत्र को देखा और उन्हें श्लोक दिखाई दिया, तो वे उसे पढ़ने लगे।"
श्लोक पड़ि' प्रभु सुखे प्रेमाविष्ट हैला । हेन-काले रूप-गोसाजि स्नान करि' आइला ॥
८२॥
यह श्लोक पढ़कर श्री चैतन्य महाप्रभु आनन्दमय प्रेम से अभिभूत हो गये। उसी समय समुद्र-स्नान करके रूप गोस्वामी लौटे।"
प्रभु देखि' दण्डवत्प्राङ्गणे पड़िला । प्रभु ताँरै चापड़ मारि' कहते लागिला ॥
८३॥
महाप्रभु को देखकर श्री रूप गोस्वामी नमस्कार करने के लिए आँगन में दंड की तरह गिर पड़े। महाप्रभु ने प्रेम से उन्हें एक हल्की चपत लगाई और इस प्रकार बोले।"
‘गूढ़ मोर हृदय तुञि जानिला केमने?' ।। एत कहि' रूपे कैला दृढ़ आलिङ्गने ॥
८४॥
मेरा हृदय अत्यन्त गोपनीय है। तुमने किस तरह मेरे मन को जान लिया?’ यह कहकर उन्होंने रूप गोस्वामी का गाढ़ आलिंगन किया।"
सेइ श्लोक लञा प्रभु स्वरूपे देखाइला ।।स्वरूपेर परीक्षा लागि' ताँहारे पुछिला ॥
८५॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु ने वह श्लोक ले लिया और उसे स्वरूप दामोदर को परीक्षा करने के लिए" दिखलाया। तब उन्होंने उनसे पूछा।‘मोर अन्तरवार्ता रूप जानिल केमने?'। स्वरूप कहे_जानि, कृपा करियाछ आपने ॥
८६॥
। रूप गोस्वामी किस तरह मेरे मन को समझ सका? महाप्रभु ने पूछा। स्वरूप दामोदर ने उत्तर दिया, मेरी समझ में तो यही आता है कि आपने पहले ही उस पर अपनी अहैतुकी कृपा प्रदान कर दी है।"
अन्यथा ए अर्थ कार नाहि हय ज्ञान ।। तुमि पूर्वे कृपा कैला, करि अनुमान ॥
८७॥
अन्यथा इस अर्थ को कोई नहीं समझ सकता था। इसलिए मेरा अनुमान है कि आपने इसके पूर्व उस पर अपनी अहैतुकी कृपा कर दी है।"
प्रभु कहे,’इँहो आमाय प्रयागे मिलिल । योग्य-पात्र जानि इँहाय मोर कृपा त' हइल ॥
८८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, रूप गोस्वामी मुझसे प्रयाग में मिला था। उसे उपयुक्त व्यक्ति जानकर मैंने स्वभावतः उस पर अपनी कृपा कर दी थी।"
तबे शक्ति सञ्चारि' आमि कैलँ उपदेश । तुमिह कहिओ इहाँय रसेर विशेष ॥
८९॥
तब मैंने उसे अपनी दिव्य शक्ति भी प्रदान की। अब तुम भी उसे, विशेष करके दिव्य रसों के विषय में उपदेश दो।"
स्वरूप कहे–य़ाते एइ श्लोक देखिलँ।तुमि करियाछ कृपा, तबँहि जानिलु ॥
९०॥
स्वरूप दामोदर ने कहा, जैसे ही मैंने इस श्लोक की अद्वितीय रचना देखी, मैं तुरन्त समझ गया कि आपने उसे अपनी विशेष कृपा प्रदान की फलेन फल-कारणमनुमीयते ॥
९१॥
परिणाम देखकर उस परिणाम के कारण को समझा जा सकता है।"
स्वर्गापगा-हेम-मृणालिनीनां नाना-मृणालाग्र-भुजो भजामः ।अन्नानुरूपां तनुरूप-ऋद्धिंकार्यं निदानाद्धि गुणानधीते ॥
९२॥
। स्वर्ग में बहने वाली गंगा नदी सुनहरे कमल के फूलों से पूर्ण है और उस लोक के निवासी हम फूलों के डंठलों को खाते हैं। इसीलिए हम अन्य किसी लोक के निवासियों की अपेक्षा अधिक सुन्दर हैं। यह कार्य-कारण नियम के फलस्वरूप है, क्योंकि यदि सत्त्वगुणी भोजन किया जाता है, तो सत्त्वगुण उसके शरीर का सौन्दर्य बढ़ा देता है।"
चातुर्मास्य रहि' गौड़े वैष्णव चलिला ।। रूप-गोसाञि महाप्रभुर चरणे रहिला ॥
९३॥
चातुर्मास्य के चार महीनों ( श्रावण, भाद्र, आश्विन तथा कार्तिक ) के बाद बंगाल के सारे वैष्णव अपने-अपने घर लौट गये, किन्तु श्रील रूप गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण में जगन्नाथ पुरी में ही रहे।"
एक-दिन रूप करेन नाटक लिखन । आचम्बिते महाप्रभुर हैल आगमन ॥
९४॥
। एक दिन जब रूप गोस्वामी अपनी पुस्तक लिख रहे थे, तब श्री चैतन्य महाप्रभु वहाँ सहसा प्रकट हुए।"
सम्भ्रमे बँडै उठि' दण्डवत् हैला ।।मुँहे आलिङ्गिया प्रभु आसने वसिला ॥
९५॥
जैसे ही हरिदास ठाकुर तथा रूप गोस्वामी ने महाप्रभु को आते देखा, वे दोनों खड़े हो गये और वे उन्हें सादर नमस्कार करने के लिए दण्डवत् भूमि पर गिर गये। श्री चैतन्य महाप्रभु ने दोनों का आलिंगन किया और बैठ गये।"
‘क्या पॅथि लिख?' बलि' एक-पत्र निला ।। अक्षर देखिया प्रभु मने सुखी हैला ॥
९६॥
महाप्रभु ने पूछा, तुम किस तरह की पुस्तक लिख रहे हो? उन्होंने एक ताड़-पत्र उठाया, जो पाण्डुलिपि का पन्ना था और जब महाप्रभु ने सुन्दर हस्तलिपि देखी, तो उनका मन अतीव प्रसन्न हो गया।"
श्री-रूपेर अक्षर ग्रेन मुकुतार पाँति ।प्रीत हा करेन प्रभु अक्षरेर स्तुति ॥
९७॥
इस तरह प्रसन्न होकर महाप्रभु ने यह कहते हुए लिखावट की प्रशंसा की, “रूप गोस्वामी की हस्तलिपि मोतियों की पंक्तियों की तरह है।"
सेइ पत्रे प्रभु एक श्लोक ग्ने देखिला ।। पड़ितेइ श्लोक, प्रेमे आविष्ट हुइला ॥
९८॥
उस हस्तलिपि को पढ़ते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस पृष्ठ पर एक श्लोक देखा और ज्योंही उन्होंने उसे पढ़ा, वे भावमय प्रेम से अभिभूत हो गये।"
तुण्डे ताण्डविनी रतिं वितनुते तुण्डावली-लब्धये ।कर्ण-कोड़-कड़म्बिनी घटयते कर्णार्बुदेभ्यः स्पृहाम् ।। चेतः-प्राङ्गण-सङ्गिनी विजयते सर्वेन्द्रियाणां कृतिंनो जाने जनिता कियद्भिरमृतैः कृष्णेति वर्ण-द्वयी ॥
९९ ॥
मैं नहीं जानता हूँ कि 'कृष्ण' के दो अक्षरों ने कितना अमृत उत्पन्न किया है। जब कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण किया जाता है, तो यह मुख के भीतर नृत्य करता प्रतीत होता है। तब हमें अनेकानेक मुखों की इच्छा होने लगती है। जब वही नाम कानों के छिद्रों में प्रविष्ट होता है, तो हमारी इच्छा करोड़ों कानों के लिए होने लगती है। और जब यह नाम हृदय के आँगन में नृत्य करता है, तब यह मन की गतिविधियों को जीत लेता है, जिससे सारी इन्द्रियाँ जड़ हो जाती हैं।"
श्लोक शुनि हरिदास हइला उल्लासी ।नाचिते लागिला श्लोकेर अर्थ प्रशंसि' ॥
१०० ॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह श्लोक पढ़ा, तो हरिदास ठाकुर उस ध्वनि को सुनकर अत्यन्त प्रफुल्लित हो उठे तथा इसके अर्थ की प्रशंसा करते हुए नाचने लगे।"
कृष्ण-नामेर महिमा शास्त्र-साधु-मुखे जानि ।नामेर माधुरी ऐछे काहाँ नाहि शुनि ॥
१०१॥
। भगवान् के नाम के सौन्दर्य तथा उसकी दिव्य स्थिति को भक्तों के मुख से प्रामाणिक शास्त्रों का श्रवण करके सीखना होता है। हम अन्यत्र कहीं भी भगवान् के पवित्र नाम की मधुरता को नहीं सुन सकते।"
तबे महाप्रभु हे करि' आलिङ्गन । मध्याह्न करिते समुद्रे करिला गमन ॥
१०२॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास तथा रूप गोस्वामी दोनों का आलिंगन किया और दोपहर के कृत्य करने के लिए समुद्र की ओर चले गये।"
आर दिन महाप्रभु देखि' जगन्नाथ । सार्वभौम-रामानन्द-स्वरूपादि-साथ ॥
१०३॥
सबे मिलि' चलि आइला श्री-रूपे मिलिते ।पथे ताँर गुण सबारे लागिला कहिते ॥
१०४॥
अगले दिन हमेशा की तरह भगवान जगन्नाथ के मन्दिर जाने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु सार्वभौम भट्टाचार्य, रामानन्द राय तथा स्वरूप दामोदर से मिले। तब वे सभी मिलकर श्रील रूप गोस्वामी के पास गये और रास्ते में महाप्रभु ने उनके गुणों की अत्यधिक प्रशंसा की।"
दुइ श्लोक कहि' प्रभुर हैल महा-सुख । निज-भक्तेर गुण कहे हञा पञ्च-मुख ॥
१०५॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने दो महत्त्वपूर्ण श्लोक सुनाए, तो उन्हें परम सुख हुआ। इस तरह वे अपने भक्त की प्रशंसा करने लगे मानो उनके पाँच मुख हों।।"
सार्वभौम-रामानन्दे परीक्षा करिते ।। श्री-रूपेर गुण मुँहारे लागिला कहिते ॥
१०६॥
सार्वभौम भट्टाचार्य तथा रामानन्द की परीक्षा लेने के लिए ही उनके समक्ष महाप्रभु श्री रूप गोस्वामी के दिव्य गुणों की प्रशंसा करने लगे।
‘ईश्वर-स्वभाव'––भक्तेर ना लेय अपराध ।। अल्प-सेवा बहु माने आत्म-पर्यन्त प्रसाद ॥
१०७॥
स्वभावतः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपने शुद्ध भक्त के किसी अपराध को गम्भीरता से नहीं लेते। भक्त जो भी स्वल्प सेवा करता है, उसे भगवान् इतनी बड़ी सेवा के रूप में स्वीकार करते हैं कि वे अपने आपको भी अर्पित करने के लिए प्रस्तुत रहते हैं, अन्य वरदानों के बारे में क्या कहा जाए।"
भृत्यस्य पश्यति गुरूनपि नापराधान् ।सेवां मनागपि कृतां बहुधाभ्युपैति ।। आविष्करोति पिशुनेष्वपि नाभ्यसूयां ।शीलेन निर्मल-मतिः पुरुषोत्तमोऽयम् ॥
१०८॥
परम भगवान् पुरुषोत्तम के नाम से विख्यात हैं और सबसे महान् हैं। उनका मन निर्मल है। वे इतने दयालु हैं कि यदि उनका सेवक कोई बड़ा अपराध भी कर दे, तो वे उसे गम्भीरता से नहीं लेते। हाँ, यदि उनका सेवक छोटी-सी भी सेवा करता है, तो भगवान् उसे बहुत बड़ी सेवा के रूप में स्वीकार करते हैं। यदि कोई ईष्र्यालु व्यक्ति भगवान् की निन्दा भी करता है, तो वे उसके प्रति कभी क्रोध प्रकट नहीं करते। ऐसे हैं उनके महान् गुण।"
भक्त-सङ्गे प्रभु आइला, देखि' दुइ जन ।। दण्डवत् हा कैला चरण वन्दन ॥
१०९॥
। जब हरिदास ठाकुर तथा रूप गोस्वामी ने देखा कि श्री चैतन्य महाप्रभु अपने अन्तरंग भक्तों के साथ आये हैं, तो उन दोनों ने तुरन्त भूमि पर दण्ड की तरह गिरकर उनके चरणकमलों की वन्दना की।"
भक्त-सङ्गे कैला प्रभु मुँहारे मिलन ।। पिण्डाते वसिला प्रभु लजा भक्त-गण ॥
११०॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके निजी भक्त रूप गोस्वामी तथा हरिदास ठाकुर से मिले। तब महाप्रभु अपने भक्तों के साथ एक चबूतरे पर बैठ गये।"
रूप हरिदास हे वसिला पिण्डा-तले । सबार आग्रहे ना उठिला पिण्डार उपरे ॥
१११॥
। रूप गोस्वामी तथा हरिदास ठाकुर उस चबूतरे के नीचे बैठे, जहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु बैठे थे। यद्यपि सभी लोग उनसे महाप्रभु तथा उनके पार्षदों की बराबरी में बैठने का आग्रह कर रहे थे, किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया।"
‘पूर्व-श्लोक पड़, रूप,' प्रभु आज्ञा कैला । लज्जाते ना पड़े रूप मौन धरिला ॥
११२॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने रूप गोस्वामी को पहले वाला श्लोक पढ़ने का आदेश दिया, तो अत्यधिक लज्जावश रूप गोस्वामी ने इसे नहीं पढ़ा, अपितु चुप रहे।"
स्वरूप-गोसाजि तबे सेइ श्लोक पड़िल ।।शुनि' सबाकार चित्ते चमत्कार हैल ॥
११३॥
तब स्वरूप गोस्वामी ने वह श्लोक सुनाया और जब सारे भक्तों ने इसे सुना, तो उनके मन आश्चर्यचकित हो उठे।"
प्रियः सोऽयं कृष्णा: सह-चरि कुरु-क्षेत्र-मिलितस्तथाहं सा राधा तदिदमुभयो: सङ्गम-सुखम् । तथाप्यन्तः-खेलन्मधुर-मुरली-पञ्चम-जुषे ।मनो मे कालिन्दी-पुलिन-विपिनाय स्पृहयति ॥
११४॥
। हे सखी, अब मैं इस कुरुक्षेत्र में अपने पुराने तथा प्रिय मित्र कृष्ण से मिली हूँ। मैं वही राधारानी हूँ और अब हम मिल रहे हैं। यह अत्यन्त सुहावना है, किन्तु फिर भी मैं यमुना-तट के वन के वृक्षों के नीचे जाना चाहती हूँ। मैं वृन्दावन के जंगल के भीतर उनकी मधुर वंशी से पंचम स्वर निकलते सुनना चाहती हूँ।"
राय, भट्टाचार्य बले,_तोमार प्रसाद विने ।।तोमार हृदय एइ जानिल केमने ॥
११५॥
यह श्लोक सुनकर रामानन्द राय तथा सार्वभौम भट्टाचार्य दोनों ने चैतन्य महाप्रभु से कहा, आपकी विशेष कृपा के बिना यह रूप गोस्वामी किस तरह आपके मन को समझ सकता था?" आमाते सञ्चारि' पूर्वे कहिला सिद्धान्त ।। ये सब सिद्धान्ते ब्रह्मा नाहि पाय अन्त ॥
११६॥
श्रील रामानन्द राय ने स्वीकार किया कि इसके पूर्व श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनके हृदय को वह शक्ति प्रदान कर दी थी, जिससे कि वे उच्च तथा निर्णायक कथन को व्यक्त कर सकें, जिस तक ब्रह्माजी तक की पहुँच नहीं है।"
ताते जानि–पूर्वे तोमार पाजाछे प्रसाद ।।ताहा विना नहे तोमार हृदयानुवाद ॥
११७॥
उन्होंने कहा, यदि आपने पहले उस पर कृपा न की होती, तो उसके लिए आपके आन्तरिक भावों को व्यक्त कर पाना सम्भव न हो पाता।"
प्रभु कहे,–कह रूप, नाटकेर श्लोक ।।ग्रे श्लोक शुनिले लोकेर ग्राय दुःख-शोक ॥
११८॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, हे प्रिय रूप, तुम अपने नाटक का वह श्लोक सुनाओ, जिसे सुनने पर सारे लोगों के दुःख तथा शोक भाग जाते हैं।"
बार बार प्रभु यदि तारे आज्ञा दिल ।।तबे सेइ श्लोक रूप-गोसाजि कहिल ॥
११९॥
जब महाप्रभु उसी के लिए बारम्बार आदेश देते रहे, तब रूप गोस्वामी ने वह श्लोक, जो आगे आया है, सुनाया।"
तुण्डे ताण्डविनी रतिं वितनुते तुण्डावली-लब्धये ।कर्ण-क्रोड़-कड़म्बिनी घटयते कर्णार्बुदेभ्यः स्पृहाम् ।। चेत:-प्राङ्गण-सङ्गिनी विजयते सर्वेन्द्रियाणां कृतिं ।नो जाने जनिता कियद्भिरमृतैः कृष्णेति वर्ण-द्वयी ॥
१२०॥
मैं नहीं जानता हूँ कि ‘कृष्ण’ शब्द के दो अक्षरों ने कितना अमृत उत्पन्न किया है। जब कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण किया जाता है, तब यह मुख के भीतर नृत्य करता प्रतीत होता है। तब हमें अनेकानेक मुखों की इच्छा होने लगती है। जब वही नाम कानों के छिद्रों में प्रविष्ट होता है, तब हमारी इच्छा करोड़ों कानों के लिए होने लगती है। और जब यह पवित्र नाम हृदय के आँगन में नृत्य करता है, तब यह मन की गतिविधियों को जीत लेता है, जिससे सारी इन्द्रियाँ जड़ हो जाती है।
ग्रत भक्त-वृन्द आर रामानन्द राय ।। श्लोक शुनि' सबार हइल आनन्द-विस्मय ॥
१२१॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों ने, विशेष रूप से श्री रामानन्द राय ने यह श्लोक सुना, तो वे दिव्य आनन्द से पूरित हो गये और आश्चर्यचकित रह गये।"
सबे बले,–'नाम-महिमा शुनियाछि अपार ।एमन माधुर्य केह नाहि वर्णे आर' ॥
१२२॥
। सबने स्वीकार किया कि यद्यपि उन्होंने भगवान् के पवित्र नाम की महिमा विषयक अनेक कथन सुन रखे हैं, किन्तु उन्होंने रूप गोस्वामी का जैसा मधुर वर्णन कभी नहीं सुना।।"
राय कहे,–कोन् ग्रन्थ कर हेन जानि?।।ग्राहार भितरे एइ सिद्धान्तेर खनि? ॥
१२३॥
। रामानन्द राय ने पूछा, तुम किस तरह का नाटक लिख रहे हो? हम समझ सकते हैं कि यह निष्कर्ष रूप सिद्धान्तों की खान है।"
स्वरूप कहे,—'कृष्ण-लीलार नाटक करिते ।व्रज-लीला-पुर-लीला एकत्र वर्णिते ॥
१२४॥
स्वरूप दामोदर ने श्रील रूप गोस्वामी की ओर से उत्तर दिया, उसने भगवान् कृष्ण की लीलाओं पर नाटक लिखना चाहा था। उसने एक ही पुस्तक में वृन्दावन लीलाओं तथा द्वारका एवं मथुरा की लीलाओं का वर्णन करने की योजना बनाई थी।"
आरम्भियाछिला, एबे प्रभु-आज्ञा पाजा ।। दुइ नाटक करितेछे विभाग करिया ॥
१२५॥
उसने इस तरह से प्रारम्भ किया, किन्तु अब श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेशानुसार वह इसे दो भागों में विभाजित करके दो नाटक लिख रहा है--एक मथुरा तथा द्वारका की लीलाओं से सम्बन्धित और दूसरा वृन्दावन लीलाओं से सम्बन्धित।"
वृन्दावन लीलाओं से सम्बन्धित।विदग्ध-माधव आर ललित-माधव ।। दुई नाटके प्रेम-रस अदभुत सब ॥
१२६॥
ये नाटक विदग्ध माधव तथा ललित माधव कहलाते हैं। इन दोनों में भगवत्प्रेम-रस का अद्भुत वर्णन हुआ है।"
राय कहे,_नान्दी-श्लोक पड़ देखि, शुनि? ।।श्री-रूप श्लोक पड़े प्रभु-आज्ञा मानि' ॥
१२७॥
रामानन्द राय ने कहा,कृपया तुम विदग्ध माधव का नान्दी श्लोक सुनाओ, जिससे मैं सुन सकें और परीक्षा कर सकें। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु का आदेश होने पर श्री रूप गोस्वामी ने श्लोक सुनाया (१.१)।"
सुधानां चान्द्रीणामपि मधुरिमोन्माद-दमनीदधाना राधादि-प्रणय-घन-सारैः सुरभिताम् ।समन्तात्सन्तापोद्गम-विषम-संसार-सरणीप्रणीतां ते तृष्णां हरतु हरि-लीला-शिखरिणी ॥
१२८॥
श्रीकृष्ण की लीलाएँ भौतिक जगत् में व्याप्त कष्टों को कम करें और अनावश्यक इच्छाओं को समाप्त करें। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की लीलाएँ शिखरिणी के समान हैं, जो दही तथा मिश्री का मिश्रण है। वे चन्द्रमा पर उत्पन्न अमृत के गर्व को भी नीचा दिखाने वाली हैं, क्योंकि वे श्रीमती राधारानी तथा गोपियों के सघन प्रेम-व्यवहार की मधुर सुगन्धि को व्याप्त करने वाली हैं।"
राय कहे,–'कह इष्ट-देवेर वर्णन' ।। प्रभुर सङ्कोचे रूप ना करे पठन ॥
१२९॥
रामानन्द राय ने कहा, अब कृपया अपने आराध्य श्रीविग्रह की महिमा का वर्णन सुनाओ। किन्तु रूप गोस्वामी संकोच कर रहे थे, क्योंकि श्री चैतन्य महाप्रभु उपस्थित थे।"
प्रभु कहे,--'कह, केने कर सङ्कोच-लाजे? ।। ग्रन्थेर फल शुनाइबा वैष्णव-समाजे?’ ॥
१३०॥
किन्तु महाप्रभु ने यह कहते हुए रूप गोस्वामी को प्रोत्साहित किया, तुम संकोच क्यों कर रहे हो? तुम इसे सुनाओ, जिससे भक्तगण तुम्हारे ग्रन्थ के शुभ फल को सुन सकें।"
तबे रूप-गोसाञि यदि श्लोक पड्रिल ।। शुनि' प्रभु कहे,–'एइ अति स्तुति हैल' ॥
१३१॥
जब रूप गोस्वामी ने उनका श्लोक सुनाया, तो चैतन्य महाप्रभु ने इसको अस्वीकृत कर दिया, क्योंकि इसमें उनकी निजी महिमा का वर्णन था। उन्होंने यह मत व्यक्त किया कि यह अतिशयोक्तिपूर्ण कथन है।"
समर्पयितुमुन्नतोज्वल-रसां स्व-भक्ति-श्रियम् ।। हरिः पुरट-सुन्दर-द्युति-कदम्ब-सन्दीपितः।सदा हृदय-कन्दरे स्फुरतु वः शची-नन्दनः ॥
१३२॥
“परम भगवान्, जो कि श्रीमती शचीदेवी के पुत्र के रूप में सुविख्यात हैं, आपके हृदय के अन्तरतम प्रदेश में स्थित हों। पिघले सोने की द्युति से देदीप्यमान, वे अपनी अहैतुकी कृपा से कलियुग में वह प्रदान करने के लिए अवतरित हुए हैं, जो अन्य अवतारों ने कभी नहीं दियावे भक्ति का सर्वाधिक उच्च रस अर्थात् माधुर्य-प्रेम-रस प्रदान करने के लिए अवतरित हुए हैं।"
सब भक्त-गण कहे श्लोक शुनिया ।।कृतार्थ करिला सबाय श्लोक शुनाजा ॥
१३३॥
उपस्थित समस्त भक्तों ने इस श्लोक की इतनी अधिक प्रशंसा की कि उन्होंने उनके दिव्य उच्चारण के लिए रूप गोस्वामी के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त की।"
राय कहे,–को आमुखे पात्र-सन्निधान? ।।रूप कहे,-काल-साम्ये ‘प्रवर्तक' नाम ॥
१३४॥
रामानन्द राय ने पूछा, तुमने पात्रों के समूह का परिचय किस तरह कराया है? रूप गोस्वामी ने उत्तर दिया, सारे पात्र प्रवर्तक शीर्षक के अन्तर्गत उपयुक्त समय पर एकत्र होते हैं।"
आक्षिप्तः काल-साम्येन प्रवेशः स्यात्प्रवर्तकः ॥
१३५॥
जब उपयुक्त समय आने पर पात्रों का प्रवेश होता है, तो यह प्रवेश प्रवर्तक कहलाता है।"
सोऽयं वसन्त-समयः समियाय यस्मिन्पूर्णं तमीश्वरमुपोढ़-नवानुरागम् । गूढ़-ग्रहा रुचिरया सह राधयासौरङ्गाय सङ्गमयिता निशि पौर्णमासी ॥
१३६॥
वसन्त ऋतु आ चुकी थी तथा उस ऋतु के पूर्ण चन्द्रमा ने सभी प्रकार से पूर्ण भगवान् को रात में सुन्दरी राधारानी से मिलने के नवीन आकर्षण से प्रेरित किया, जिससे उनकी लीलाओं का सौन्दर्य बढ़ सके।"
राय कहे,_प्ररोचनादि कह देखि, शुनि? ।। रूप कहे,_महाप्रभुर श्रवणेच्छा जानि ॥
१३७॥
रामानन्द राय ने कहा, कृपया तुम मुझे प्ररोचना भाग सुनाओ, जिससे मैं सुन सकें तथा परीक्षा कर सकें। श्री रूप ने उत्तर दिया, मैं सोचता हूँ कि श्री चैतन्य महाप्रभु की प्ररोचना सुनने की इच्छा है।"
भक्तानामुदगादनर्गल-धियां वर्गो निसर्गाज्वलः ।शीलैः पल्लवितः स बल्लव-वधू-बन्धोः प्रबन्धोऽप्यसौ । लेभे चत्वरतां च ताण्डव-विधेर्वृन्दाटवी-गर्भ-भूर्मन्ये मद्विध-पुण्य-मण्डल-परीपाकोऽयमुन्मीलति ॥
१३८॥
इस समय उपस्थित भक्तगण निरन्तर भगवान् के विषय में सोचते रहते हैं, अतएव वे बहुत उच्च हैं। विदग्ध माधव नामक यह ग्रन्थ भगवान् कृष्ण की लीलाओं का काव्यात्मक अलंकारों के विभूषणों के साथ चित्रण करता है। वृन्दावन के भीतरी भूभाग गोपियों के साथ कृष्ण के नृत्य के लिए उपयुक्त मंच प्रस्तुत करते हैं। इसलिए मैं सोचता हूँ कि हम जैसे लोग, जिन्होंने भक्ति में आगे बढ़ने का प्रयास किया है, उनके पुण्यकर्म अब परिपक्व हो चुके हैं।"
अभिव्यक्ता मत्तः प्रकृति-लघु-रूपादपि बुधाविधात्री सिद्धार्थान्हरि-गुण-मयी वः कृतिरियम् ।। पुलिन्देनाप्यग्निः किमु समिधमुन्मथ्य जनितो ।हिरण्य-श्रेणीनामपहरति नान्तः-कलुषताम् ॥
१३९॥
हे विद्वान भक्तों, मैं स्वभाव से अज्ञान तथा दीन हूँ। फिर भी यद्यपि मुझसे यह विदग्ध माधव निकला है, तो भी यह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के दिव्य गुणों के वर्णन से भरा पड़ा है। इसलिए क्या ऐसा ग्रन्थ जीवन के उच्चतम लक्ष्य प्राप्ति को पूरा नहीं करा सकेगा? यद्यपि इसके काठ को निम्न श्रेणी का व्यक्ति भी जला सकता है, तो भी यह अग्नि सोने को शुद्ध कर सकती है। इसी तरह यद्यपि मैं स्वभाव से अत्यन्त नीच हूँ, फिर भी यह ग्रन्थ स्वर्ण जैसे भक्तों के हृदयों के भीतर की धूल को स्वच्छ करने में सहायता कर सकता है।"
राय कहे, कह देखि प्रेमोत्पत्ति-कारण?।। पूर्व-राग, विकार, चेष्टा, काम-लिखन? ॥
१४०॥
तब रामानन्द राय ने कृष्ण तथा गोपियों के मध्य प्रेम-व्यापार के कारणों के विषय में, यथा पूर्व-राग, प्रेम-विकार, प्रेम-चेष्टा तथा कृष्ण के लिए गोपियों के प्रेम के जागृत होने को प्रकट करने वाले पत्रों के आदान-प्रदान के विषय में पूछा।"
क्रमे श्री-रूप-गोसाजि सकलि कहिल ।। शुनि' प्रभुर भक्त-गणेर चमत्कार हैल ॥
१४१॥
श्रील रूप गोस्वामी ने क्रमशः रामानन्द राय द्वारा पूछी गई हर बात बता दी। उनकी व्याख्या सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्त आश्चर्यचकित रह गये।।"
एकस्य श्रुतमेव लुम्पति मतिं कृष्णेति नामाक्षरंसान्द्रोन्माद-परम्परामुपनयत्यन्यस्य वंशी-कलः ।।एष स्निग्ध-घन-द्युतिर्मनसि मे लग्नः पटे वीक्षणात्कष्टं धिक्पुरुष-त्रये रतिरभून्मन्ये मृतिः श्रेयसी ॥
१४२॥
( कृष्ण के प्रति पहले के अनुराग-पूर्व-राग का अनुभव करते हुए राधारानी ने सोचा :) 'चूंकि मैंने कृष्ण नामक व्यक्ति का नाम सुन रखा है, इसलिए मेरी सद्बुद्धि नष्ट हो चुकी है। फिर, एक दूसरा व्यक्ति भी है, जो अपनी वंशी इस तरह बजाता है कि उसकी ध्वनि सुनकर मेरे हृदय में गहन उन्माद उत्पन्न होता है। यही नहीं, एक अन्य व्यक्ति भी है, जिसके प्रति मेरा मन अनुरक्त हो उठता है जब मैं उसके चित्र में उसका सुन्दर बिजली जैसा तेज देखती हूँ। इसलिए मैं सोचती हूँ कि मुझे धिक्कार है, क्योंकि मैं एकसाथ तीन व्यक्तियों पर आसक्त हूँ। इसके लिए मेरे लिए मर जाना ही श्रेयस्कर होगा।"
इयं सखि सु-दुःसाध्या राधा-हृदय-वेदना ।।कृता यत्र चिकित्सापि कुत्सायां पर्यवस्यति ॥
१४३॥
हे प्रिय सखी, श्रीमती राधारानी के हृदय की इन वेदनाओं को ठीक कर पाना अत्यन्त कठिन है। यदि इसका कोई उपचार भी किया जाए, तो अपयश ही हाथ लगेगा।'" धरि-अ पड़िच्छन्द-गुणं सुन्दर मह मन्दिरे तुमं वससि ।। तह तह रुन्धसि बलि-अंजह जह च-इदा पलाएम्हि ॥
१४४॥
हे अतीव सुन्दर, तुम्हारे चित्र की कलात्मक सुन्दरता ने मेरे मन के भीतर छाप छोड़ दी है। चूंकि अब तुम मेरे मन के भीतर बसे हुए हो, इसलिए मैं तुम्हारी छाप के कारण उद्विग्न होकर जहाँ कहीं भी भागना चाहती हूँ, हे मित्र, मैं पाती हूँ कि तुम मेरा रास्ता रोक रहे हो।'
अग्रे वीक्ष्य शिखण्ड-खण्डमचिरादुत्कम्पमालम्बतेगुञ्जानां च विलोकनान्मुहुरसौ सास्त्रं परिक्रोशति ।। नो जाने जनयन्नपूर्व-नटन-क्रीड़ा-चमत्कारितां ।बालायाः किल चित्त-भूमिमविशत्कोऽयं नवीन-ग्रहः ॥
१४५ ॥
। अपने समक्ष मोर-पंख को देखकर यह बाला एकाएक काँपने लगती है। जब कभी यह गुंजा की माला देखती है, तो अश्रुपात करती है। और उच्च स्वर से क्रन्दन करती है। मैं नहीं जानती हूँ कि इस बेचारी बाला के हृदय में किस तरह का नवीन भाव प्रवेश कर गया है। इसने इसे नर्तक की नाचने की प्रवृत्ति से ओतप्रोत कर दिया है, जिससे रंगमंच पर अद्भुत अद्वितीय नृत्य उत्पन्न होता रहता है।'" अकारुण्यः कृष्णो यदि मयि तवागः कथमिदंमुधा मा रोदीमें कुरु परमिमामुत्तर-कृतिम् ।। तमालस्य स्कन्धे विनिहित-भुज-वल्लरिरियंयथा वृन्दारण्ये चिरमविचला तिष्ठति तनुः ॥
१४६॥
। ( श्रीमती राधारानी ने अपनी नित्य संगिनी विशाखा से कहा :) 'हे प्रिय सखी, यदि कृष्ण मेरे प्रति क्रूर हैं, तो तुम्हे रोने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसमें तुम्हारा कोई दोष नहीं होगा। तब मुझे मरना होगा, किन्तु बाद में तुम मेरे लिए एक काम करना-मेरे अन्तिम संस्कार में, मेरे शरीर तमाल वृक्ष पर उसी तरह रखना, जिस तरह मेरी भुजाएँ लताओं के समान तमाल वृक्ष का आलिंगन करती रहें, जिससे मैं अविचल भाव से वृन्दावन में सदा-सदा के लिए रह सकती हैं। यही मेरी अन्तिम विनती है।"
राय कहे,–कह देखि भावेर स्वभाव? । रूप कहे,----ऐछे हय कृष्ण-विषयक 'भाव ॥
१४७॥
रामानन्द राय ने पूछा, भावात्मक प्रेम के क्या लक्षण हैं? रूप गोस्वामी ने उत्तर दिया, कृष्ण विषयक भावात्मक प्रेम का यह स्वभाव है :" पीड़ाभिर्नव-कालकूट-कटुता-गर्वस्य निर्वासनोनिस्यन्देन मुदां सुधा-मधुरिमाहङ्कार-सङ्कोचनः ।। प्रेमा सुन्दरि नन्द-नन्दन-परो जागर्ति यस्यान्तरेज्ञायन्ते स्फुटमस्य वक़-मधुरास्तेनैव विक्रान्तयः ॥
१४८॥
। हे सुन्दरी, यदि कोई नन्द महाराज के पुत्र भगवान् कृष्ण के प्रति भगवत्प्रेम उत्पन्न कर लेता है, तो इस प्रेम के सारे कटु तथा मधुर प्रभाव उसके हृदय में प्रकट हो जायेंगे। ऐसा भगवत्प्रेम दो तरह से कार्य करता है। भगवत्प्रेम के विषैले प्रभाव सर्प के गहन तथा ताजे विष को परास्त कर देते हैं। फिर भी इसके साथ ही दिव्य आनन्द होता है, जो नीचे बहकर सर्प के विषैले प्रभावों को तथा अपने सिर पर अमृत डालने से प्राप्त सुख को भी परास्त कर देता है। यह दोहरा प्रभावशाली अनुभव होता हैएकसाथ विषैला तथा अमृतमय।"
राय कहे,_कह सहज-प्रेमेर लक्षण ।।रूप-गोसात्रि कहे,_साहजिक प्रेम-धर्म ॥
१४९॥
रामानन्द राय ने आगे पूछा, भगवत्प्रेम के उदय होने के स्वाभाविक लक्षण क्या हैं? रूप गोस्वामी ने उत्तर दिया, “ये भगवत्प्रेम के स्वाभाविक लक्षण हैं :" स्तोत्रं यत्र तटस्थतां प्रकटयच्चित्तस्य धत्ते व्यथानिन्दापि प्रमदं प्रयच्छति परीहास-श्रियं बिभ्रती ।। दोषेण क्षयितां गुणेन गुरुतां केनाप्यनातन्वती ।प्रेम्णः स्वारसिकस्य कस्यचिदियं विक्रीड़ति प्रक्रिया ॥
१५०॥
जब कोई अपनी प्रिया से अपनी प्रशंसा सुनता है, तो वह बाहर से उदासीन बना रहता है, किन्तु अपने हृदय में पीड़ा का अनुभव करता है। जब वह अपनी प्रिया को अपने ऊपर दोषारोपण करते सुनता है, तो वह उन्हें परिहास मानता है और आनन्द लेता है। जब वह अपनी प्रेमिका में दोष देखता है, तो इससे उसका प्रेम घटता नहीं, न ही प्रेमिका के सद्गुण उसके सहज स्नेह को बढ़ा पाते हैं। इस तरह स्वाभाविक प्रेम सभी परिस्थितियों में चलता रहता है। इसी तरह स्वाभाविक भगवत्प्रेम हृदय के । भीतर कार्य करता है।'" श्रुत्वा निष्ठुरतां ममेन्दु-वदना प्रेमाङ्करं भिन्दती । स्वान्ते शान्ति-धुरां विधाय विधुरे प्रायः पराञ्चिष्यति । किं वा पामर-काम-कार्मुक-परित्रस्ता विमोक्ष्यत्यसून् ।हा मौग्ध्यात्फलिनी मनोरथ-लता मृद्वी मयोन्मूलिता ॥
१५१॥
मेरी क्रूरता सुनकर चन्द्रमुखी राधारानी अपने दुःखी हृदय में किसी न किसी तरह का धैर्य धारण कर सकती है। किन्तु तब वह मेरे विरुद्ध हो सकती है अथवा उग्र कामदेव के धनुष द्वारा उत्पन्न वासनामयी इच्छाओं से भयभीत होकर वह अपना जीवन भी त्याग सकती है। हाय! मैंने उसकी इच्छारूपी कोमल लता को, जिसमें फल आने ही वाले थे, मूर्खतापूर्वक उखाड़ दिया है।'" यस्योत्सङ्ग-सुखाशया शिथिलता गुर्वी गुरुभ्यस्त्रपा प्राणेभ्योऽपि सुहत्तमाः सखि तथा यूयं परिक्लेशिताः ।।धर्मः सोऽपि महान्मया न गणितः साध्वीभिरध्यासितोधिग्धैर्यं तदुपेक्षितापि यदहं जीवामि पापीयसी ॥
१५२ ॥
हे सखी, उनकी संगति तथा आलिंगन के सुख की इच्छा से मैंने अपने गुरुजनों तक की उपेक्षा की और उनके समक्ष अपनी लज्जा तथा गम्भीरता को शिथिल कर दिया। इसके अतिरिक्त, यद्यपि तुम मेरी सर्वोत्तम सखी हो और मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्रिय हो, किन्तु मैंने तुम्हें इतना कष्ट पहुँचाया है। निस्सन्देह, मैंने अपने पतिव्रता व्रत को भी ताक पर रख दिया, जिसका सर्वोच्च भद्र महिलाएँ पालन करती हैं। हाय! यद्यपि वह इस समय मेरी उपेक्षा कर रहे हैं, मैं इतनी पापिन हूँ कि अभी भी जीवित हैं। इसलिए मुझे अपने तथाकथित धैर्य को धिक्कारना चाहिए।'" गृहान्तः खेलन्त्यो निज-सहज-बाल्यस्य बलनाद्अभद्रं भद्रं वा किमपि हि न जानीमहि मनाक् ।वयं नेतुं युक्ताः कथमशरणां कामपि दशांकथं वा न्याय्या ते प्रथयितुमुदासीन-पदवी ॥
१५३॥
मैं अपने घर में क्रीड़ाओं में व्यस्त थी और बचपन की अबोधता के कारण अच्छा-बुरा नहीं जानती थी। इसलिए क्या आपके लिए यह उचित है कि आपने पहले हमें अपनी ओर इस तरह आकृष्ट किया और फिर हमारी उपेक्षा की? अब आप हमसे उदासीन हो। क्या आप सोचते हो कि यह उचित है?' अन्तः क्लेश-कलङ्किताः किल वयं यामोऽद्य याम्यां पुरींनायं वञ्चन-सञ्चय-प्रणयिनं हास तथाप्युज्झति ।। अस्मिन्सम्पुटिते गभीर-कपटैराभीर-पल्ली-विटेहा मेधाविनि राधिके तव कथं प्रेमा गरीयानभूत् ॥
१५४॥
हमारे हृदय दुःखमय परिस्थितियों से इतने दूषित हैं कि हम निश्चित रूप से यमराज के लोक जा रही हैं। फिर भी, कृष्ण अपनी सुन्दर प्रेममयी मुस्कान नहीं त्यागते, जो ठगी की चालों से पूर्ण है। हे श्रीमती राधारानी, तुम बड़ी बुद्धिमान हो। तुमने किस तरह पड़ोस के ग्वालों के धोखेबाज लम्पट के प्रति इतना अधिक प्रेम विकसित कर लिया?'"
हित्वा दूरे पथि धव-तरोरन्तिकं धर्म-सेतोर्भङ्गोदग्रा गुरु-शिखरिणं रंहसा लड्यन्ती । लेभे कृष्णार्णव नव-रसा राधिका-वाहिनी त्वांवाग्वीचीभिः किमिव विमुखी-भावमस्यास्तनोषि ॥
१५५ ॥
हे कृष्ण, तुम समुद्र के तुल्य हो। श्रीमती राधारानी रूपी नदी काफी दूर से-अपने पति रूपी वृक्ष को पीछे छोड़ती, सामाजिक बन्धन के पुल को तोड़ती और वरिष्ठ जनों रूपी शिखरों को बलपूर्वक पार करती हुईतुम तक पहुँची है। तुम्हारे प्रेम की नई उमंगों के कारण यहाँ आकर उस नदी ने अब तुम्हारी शरण प्राप्त की है, किन्तु तुम हो कि उसे प्रतिकूल शब्दों की लहरों से वापस करने का प्रयास कर रहे हो। यह कैसा है कि तुम ऐसा विमुख मनोभाव फैला रहे हो?" राय कहे,–वृन्दावन, मुरली-नि:स्वन । कृष्ण, राधिकार कैछे करियाछ वर्णन? ॥
१५६॥
श्रील रामानन्द राय ने आगे पूछा, तुमने वृन्दावन, दिव्य वंशी की ध्वनि तथा कृष्ण एवं राधिका के सम्बन्ध का वर्णन किस तरह किया है?" कह, तोमार कवित्व शुनि' हय चमत्कार ।। क्रमे रूप-गोसात्रि कहे करि' नमस्कार ॥
१५७॥
कृपया मुझे यह सब बतलाओ, क्योंकि तुम्हारी कवित्व-शक्ति अद्भुत है। रूप गोस्वामी रामानन्द राय को नमस्कार करके उनके प्रश्नों का क्रमशः उत्तर देने लगे।"
सु-गन्धौ माकन्द-प्रकर-मकरन्दस्य मधुरेविनिस्यन्दे वन्दी-कृत-मधुप-वृन्दं मुहुरिदम् ।। कृतान्दोलं मन्दोन्नतिभिरनिलैश्चन्दन-गिरेर् ।ममानन्दं वृन्दा-विपिनमतुलं तुन्दिलयति ॥
१५८॥
नव विकसित आम्र की मंजरियों से रिसती हुई मीठी सुगन्धित मधु पुनः पुनः भौरों के समूहों को आकृष्ट कर रही है और यह वन चन्दन-वृक्षों से पूर्ण मलय पर्वत से आने वाली मन्द गतिमान वायु से कम्पित हो रहा है। इस तरह यह वृन्दावन विपिन मेरे दिव्य आनन्द को वर्धित कर रहा है।"
वृन्दावनं दिव्य-लता-परीतं ।लताश्च पुष्प-स्फुरिताग्र-भाजः ।। पुष्पाणि च स्फीत-मधु-व्रतानि ।मधु-व्रताश्च श्रुति हारि-गीताः ॥
१५९॥
हे प्रिय मित्र, देखो तो, यह वृन्दावन का जंगल किस तरह दिव्य लताओं तथा वृक्षों से परिपूर्ण है। लताओं के सिरों पर फूल लदे हैं और उन्मत्त भौंरे उनके चारों ओर गुनगुना रहे हैं-ऐसे गुनगुनाते गीत कान को अच्छे लगते हैं और वैदिक स्तोत्रों को भी मात कर जाते हैं।"
क्वचिद्धी-गीतं क्वचिदनिल-भड़ी-शिशिरताक्वचिद्वल्ली-लास्यं क्वचिदमल-मल्ली-परिमलः । क्वचिद्धारा-शाली करक-फल-पाली-रस-भरोहृषीकाणां वृन्दं प्रमदयति वृन्दावनमिदम् ॥
१६०॥
हे प्रिय मित्र, यह वृन्दावन का वन हमारी इन्द्रियों को विविध रूपों से बड़ा आनन्द प्रदान करता है। कहीं भौंरों के झुण्ड गा रहे हैं, तो कहीं मन्द वायु सारे वातावरण को शीतल कर रही है। कहीं लताएँ एवं वृक्षों की टहनियाँ नाच रही हैं, मल्लिका पुष्प अपनी सुगन्ध बिखेर रहे हैं और अनार के फल निरन्तर प्रचुर रस की धार बहा रहे हैं।'" परामृष्टाङ्गष्ठ-त्रयमसित-रत्नैरुभयतो ।वहन्ती सङ्कीर्णो मणिभिररुणैस्तत्परिसरौ । तयोर्मध्ये हीरोज्वल-विमल-जाम्बूनद-मयीकरे कल्याणीयं विहरति हरेः केलि-मुरली ॥
१६१॥
कृष्ण की लीला वंशी तीन अंगुल लम्बी है और यह इन्द्रनील रत्नों से जटित है। वंशी के छोरों पर अरुण रत्न (पन्ना) लगे हैं, जो सुन्दर ढंग से चमचमा रहे हैं, दोनों छोरों के बीच वंशी सोने के पत्तर से मढ़ी है तथा हीरों से दमक रही है। यह शुभ वंशी, कृष्ण को सुहावनी लगती है तथा उनके हाथ में दिव्य आभा से दमक रही है।'" सद्वंशतस्तव जनिः पुरुषोत्तमस्यपाणौ स्थितिर्मुरलिके सरलासि जात्या । कस्मात्त्वया सखि गुरोर्विषमा गृहीता।गोपाङ्गना-गण-विमोहन-मन्त्र-दीक्षा ॥
१६२॥
हे मेरी प्रिय सखी मुरली, ऐसा प्रतीत होता है कि तुम अत्यन्त उत्तम परिवार में उत्पन्न हुई हो, क्योंकि तुम्हारा निवासस्थान श्रीकृष्ण के हाथों में है। जन्म से तुम सीधी-सादी हो और तनिक भी कुटिल नहीं हो। तो फिर तुमने इस खतरनाक मन्त्र में दीक्षा क्यों ली, जो एकत्र हुई गोपियों को मोहित करता है?'"
सखि मुरलि विशाल-च्छिद्र-जालेन पूर्णा लघुरति-कठिना त्वं ग्रन्थिला नीरसासि ।। तदपि भजसि शश्वच्चुम्बनानन्द-सान्द्रहरि-कर-परिरम्भं केन पुण्योदयेन ॥
१६३॥
हे मेरी प्रिय सखी वंशी, तुम अनेक छिद्रों या दोषों से युक्त हो। तुम हल्की, कठोर, रसहीन तथा गाँठों से भरी हो। किन्तु किस तरह के पुण्यकर्मों ने तुम्हें भगवान् द्वारा चुम्बित होने तथा उनके हाथों द्वारा आलिंगित होने के लिए प्रवृत्त किया है?" रुन्धन्नम्बु-भृतश्चमत्कृति-परं कुर्वन्मुहुस्तुम्बुरुंध्यानादन्तरयन्सनन्दन-मुखान्विस्मापयन्वेधसम् ।। औत्सुक्यावलिभिर्बलिं चटुलयन्भोगीन्द्रमाघूर्णयन् । भिन्दन्नण्ड-कटाह-भित्तिमभितो बभ्राम वंशी-ध्वनिः ॥
१६४॥
। कृष्ण की वंशी की दिव्य ध्वनि ने वर्षा के बादलों की गति रोक दी, गन्धर्वो को आश्चर्यचकित कर दिया, और सनक तथा सनन्दन जैसे महान् सन्त पुरुषों के ध्यान को चलायमान कर दिया। इसने ब्रह्मा के भीतर आश्चर्य उत्पन्न कर दिया, इसने गहन उत्सुकता उत्पन्न कर दी जिससे बलि महाराज का मन चंचल हो उठा जो अन्यथा दृढ़ता से स्थित थे, लोकों को धारण करने वाले महाराज अनन्त को चारों ओर चक्कर लगवाया और यह ब्रह्माण्ड के कठिन आवरणों को भेद गई। इस तरह कृष्ण के हाथों की वंशी की ध्वनि ने अद्भुत स्थिति उत्पन्न कर दी।"
अयं नयन-दण्डित-प्रवर-पुण्डरीक-प्रभः ।प्रभाति नव-जागुड़-द्युति-विड़म्बि-पीताम्बरः ।। अरण्यज-परिष्क्रिया-दमित-दिव्य-वेशादरो ।हरिन्मणि-मनोहर-द्युतिभिरुज्वलाङ्गो हरिः ॥
१६५ ॥
कृष्ण की आँखों की सुन्दरता श्वेत कमल की सुन्दरता को मात कर जाती है। उनका पीताम्बर कुंकुम के नवीन अलंकरणों की चमक को मात करता है तथा उनके चुने हुए जंगली फूलों के गहने सर्वश्रेष्ठ वस्त्रों की लालसा को दमित कर देते हैं। उनका शारीरिक सौन्दर्य मरकत मणि से भी अधिक मन को आकृष्ट करने वाली द्युति से युक्त है।'" जङ्वाधस्तट-सङ्गि-दक्षिण-पदं किञ्चिद्विभुग्न-त्रिकं ।साचि-स्तम्भिते-कन्धरं सखि तिरः-सञ्चारि-नेत्राञ्चलम् । वंशीं कुद्मलिते दधानमधरे लोलाङ्गुली-सङ्गतां ।रिङ्गभू-भ्रमरं वराङ्गि परमानन्दं पुरः स्वी-कुरु ॥
१६६ ॥
हे अतीव सुन्दर सखी, तुम अपने समक्ष खड़े दिव्य आनन्द से पूर्ण परम भगवान् को स्वीकार करो। उनकी आँखों की कोरें इधर-उधर घूमती हैं और उनकी भौंहें उनके कमल-मुख पर भौंरों के समान धीरे-धीरे गति करती हैं। वे अपने वामपद के घुटने के नीचे दक्षिण पद रखकर खड़े हैं, उनके शरीर का मध्य भाग तीन स्थानों से टेड़ा ( त्रिभंगी ) है। उनकी ग्रीवा शालीनतापूर्ण ढंग से एक ओर झुकी हुई है। वे अपनी वंशी को अपने कली जैसे बन्द होठों पर रखे हैं और उनकी अँगुलियाँ उन पर इधरउधर चल रही हैं।"
कुल-वर-तनु-धर्म-ग्राव-वृन्दानि भिन्दन् ।सु-मुखि निशित-दीर्घापाङ्ग-टङ्क-च्छटाभिः ।। युगपदयमपूर्वः कः पुरो विश्वकर्मा ।मरकत-मणि-लक्षैर्गोष्ठ-कक्षां चिनोति ॥
१६७॥
हे सुमुखी, हमारे समक्ष खड़ा यह कौन रचनाकार है? वह अपनी प्रेममयी चितवनों की तेज छैनियों से अनेक स्त्रियों के पतिव्रत धर्म रूपी कठोर पत्थरों को भेद रहा है और उसी के साथ वह अपने शरीर की कान्ति से, जो असंख्य मरकत मणियों की चमक का अतिक्रमण करने वाली है, अपनी लीलाओं के लिए गोपनीय मिलन-कक्ष का निर्माण कर रहा है।"
महेन्द्र-मणि-मण्डली-मद-विड़म्बि-देह-द्युतिर्व्रजेन्द्र-कुल-चन्द्रमाः स्फुरति कोऽपि नव्यो युवा ।। सखि स्थिर-कुलाङ्गना-निकर-नीवि-बन्धार्गलच्छिदा-करण-कौतुकी जयति यस्य वंशी-ध्वनिः ॥
१६८॥
हे प्रिय सखी, यह नवयुवक श्रीकृष्ण, जोकि नन्द महाराज के कुल का चन्द्रमा है, इतना सुन्दर है कि वह मूल्यवान मणियों के गुच्छे के सौन्दर्य को भी परास्त करने वाला है। उसकी वंशी की ध्वनि की जय हो, क्योंकि यह चतुराईपूर्वक साध्वी स्त्रियों के धैर्य का भंग करता है और जिससे उनके कटिबन्ध तथा कसे हुए वस्त्र ढीले हो जाते हैं।"
बलादक्ष्णोर्लक्ष्मीः कवलयति नव्यं कुवलयंमुखोल्लास: फुल्लं कमल-वनमुल्लङ्घयति च ।। दशां कष्टामष्टापदमपि नयत्याङ्गिक-रुचिर् ।विचित्रं राधायाः किमपि किल रूपं विलसति ॥
१६९॥
। श्रीमती राधारानी की आँखों का सौन्दर्य नये खिले नीले कमलों के सौन्दर्य को बलपूर्वक निगल जाता है और उनके मुख की सुन्दरता, पूरी तरह खिले कमलों के समूचे वनों का भी अतिक्रमण कर जाती है। उनके शरीर की कान्ति स्वर्ण को भी कष्टप्रद स्थिति में डालती प्रतीत होती है। इस तरह श्रीमती राधारानी का अद्भुत, अद्वितीय सौन्दर्य वृन्दावन में उदित हो रहा है।"
विधुरेति दिवा विरूपतां । शत-पत्रं बत शर्वरी-मुखे । इति केन सदा श्रियोज्वलंतुलनामर्हति मत्प्रियाननम् ॥
१७० ॥
“यद्यपि चन्द्रमा का तेज रात्रि के प्रारम्भ में चमकीला रहता है, किन्तु दिन में वह मन्द पड़ जाता है। इसी तरह यद्यपि दिन के समय कमल सुन्दर लगता है, किन्तु रात्रि में वह बन्द हो जाता है। किन्तु हे मित्र, मेरी प्रियतमा श्रीमती राधारानी का मुख, चाहे दिन हो या रात, सदा सुन्दर तथा तेजयुक्त रहता है। इसलिए उसके मुख की तुलना किससे की जा सकती है?'प्रमद-रस-तरङ्ग-स्मेर-गण्ड-स्थलायाः" स्मर-धनुरनुबन्धि-भू-लता-लास्य-भाजः । मद-कल-चल-भृङ्गी-भ्रान्ति-भङ्गीं दधानोहृदयमिदमदाश्नीत्यक्ष्मलाक्ष्याः कटाक्षः ॥
१७१॥
जब श्रीमती राधारानी मुस्कुराती है, तो प्रसन्नता की लहरें उसके गालों पर बहने लगती हैं और उसकी तिरछी भौंहें कामदेव के धनुष के समान नृत्य करने लगती हैं। उसकी चितवन इतनी मोहक है कि यह मदोन्मत्त चंचल नृत्य करते भौंरे के तुल्य लगती है। उस भौंरे ने मेरे हृदय रूपी कोश को डस लिया है।"
राय कहे,–तोमार कवित्व अमृतेर धार ।। द्वितीय नाटकेर कह नान्दी-व्यवहार ॥
१७२॥
। श्रील रूप गोस्वामी द्वारा सुनाए गये इन श्लोकों को सुनकर श्रील रामानन्द राय ने कहा, तुम्हारी कविता की अभिव्यक्ति अमृत की निरन्तर वर्षा के तुल्य है। कृपया तुम मुझे अपने दूसरे नाटक का प्रस्तावनात्मक अंश सुनाओ।"
रूप कहे,काहाँ तुमि सूर्योपम भास ।।मुञि कोन् क्षुद्र,—ग्रेन खद्योत-प्रकाश ॥
१७३॥
। श्रील रूप गोस्वामी ने कहा, आपकी तेजस्वी सूर्य प्रकाश के समान उपस्थिति में, मैं जुगनू के प्रकाश के समान नगण्य हूँ।
तोमार आगे धार्म्य एइ मुख-व्यादान ।।एत बलि' नान्दी-श्लोक करिला व्याख्यान ॥
१७४॥
आपके समक्ष मुख खोलना तक मेरे लिए धृष्टता होगी। यह कहकर उन्होंने ललित माधव का प्रारम्भिक श्लोक सुनाया।"
सुर-रिपु-सुदृशामुरोज-कोकान् । मुख-कमलानि च खेदयन्नखण्डः ।। चिरमखिल-सुहृच्चकोर-नन्दी ।दिशतु मुकुन्द-यशः-शशी मुदं वः ॥
१७५ ॥
मुकुन्द की सुन्दर चन्द्रमा तुल्य महिमा असुरों की पत्नियों के कमल समान मुखों को तथा ज्योतिर्मान चक्रवाक पक्षियों के तुल्य उनके उठे स्तनों को पीड़ा पहुँचाती है। किन्तु यही महिमा उनके भक्तों को, जोकि चकोर पक्षियों के तुल्य हैं, आनन्द प्रदान करने वाली है। वह महिमा आप सबको सदैव आनन्द प्रदान करे।"
‘द्वितीय नान्दी कह देखि?'–राय पुछिला ।सङ्कोच पाञा रूप पड़िते लागिला ॥
१७६ ॥
जब श्रील रामानन्द राय ने द्वितीय नान्दी श्लोक के विषय में आगे पूछताछ की, तो श्रील रूप गोस्वामी थोड़ा हिचकिचाये, किन्तु तो भी उन्होंने पढ़ना शुरू किया।"
निज-प्रणयितां सुधामुदयमाप्नुवन् यः क्षितौ ।किरत्यलमुरी-कृत-द्विजे-कुलाधिराज-स्थितिः । स लुञ्चित-तमस्ततिर्मम शची-सुताख्यः शशी ।वशी-कृत-जगन्मनाः किमपि शर्म विन्यस्यतु ॥
१७७।। चन्द्रमा सदृश पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, जोकि शचीनन्दन कहलाते हैं, अपना भक्तिमय प्रेम वितरित करने के लिए अब पृथ्वी पर प्रकट हुए हैं। वे ब्राह्मण समुदाय के सम्राट हैं। वे अज्ञान के समस्त अन्धकार को भगा सकते हैं और विश्व के हर एक व्यक्ति के मन को वश में कर सकते हैं। वह उदीयमान चन्द्रमा हम सबको सौभाग्य प्रदान करे।"
शुनिया प्रभुर यदि अन्तरे उल्लास । बाहिरे कहेन किछु करि' रोषाभास ॥
१७८ ॥
। यद्यपि इस श्लोक को सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु भीतर से अत्यन्त प्रसन्न थे, किन्तु बाहर से वे ऐसा बोले मानो क्रुद्ध हों।"
काँहा तोमार कृष्ण-रस-काव्य-सुधा-सिन्धु । तार मध्ये मिथ्या केने स्तुति-क्षार-बिन्दु’ ॥
१७९॥
कृष्ण-लीला-रस विषयक तुम्हारे उच्च कोटि के काव्यात्मक वर्णन अमृत के सागर के समान हैं। किन्तु तुमने मेरे विषय में मिथ्या स्तुति क्यों रख दी है? यह अरुचिकर अम्ल की एक बूंद के समान है।"
राय कहे,–रूपेर काव्य अमृतेर पूर ।।तार मध्ये एक बिन्दु दियाछे कर्पूर ॥
१८०॥
। श्रील रामानन्द राय ने आपत्ति की, यह तो अम्ल नहीं है। यह तो वह कपूर का कण है, जिसे उसने अपनी उच्च काव्याभिव्यक्ति के अमृत में रख दिया है।"
प्रभु कहे,– राय, तोमार इहाते उल्लास ।।शुनितेइ लज्जा, लोके करे उपहास ॥
१८१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मेरे प्रिय रामानन्द राय, तुम इन काव्याभिव्यक्तियों को सुनकर हर्षित हो, किन्तु मैं इन्हें सुनकर लज्जित हूँ, क्योंकि सामान्य लोग इस श्लोक की विषय-वस्तु के बारे में हँसी उड़ायेंगे।"
राय कहे,–लोकेर सुख इहार श्रवणे । अभीष्ट-देवेर स्मृति मङ्गलाचरणे ॥
१८२॥
रामानन्द राय ने कहा, उपहास के स्थान पर सामान्य लोग ऐसी कविता सुनकर परम आनन्द का अनुभव करेंगे, क्योंकि आराध्य विग्रह की प्रारम्भिक स्मृति सौभाग्य प्रदान करती है।"
राय कहे,_कोन् अङ्गे पात्रेर प्रवेश? ।तबे रूप-गोसाञि कहे ताहार विशेष ॥
१८३॥
रामानन्द राय ने पूछा, अभिनेता किस शैली उपविभाग ( अंग ) से प्रवेश करते हैं? रूप गोस्वामी तब इसी विषय पर विशेष रूप से बोलने लगे।"
नटता किरात-राजेनिहत्य रङ्ग-स्थले कला-निधिना । समये तेन विधेयं ।गुणवति तारा-कर-ग्रहणम् ॥
१८४॥
असभ्य लोगों के शासक (कंस ) का वध करने के बाद मंच पर नृत्य करते हुए समस्त कलाओं के स्वामी भगवान् कृष्ण उपयुक्त समय पर श्रीमती राधारानी के साथ पाणिग्रहण स्वीकार करेंगे, जो सभी दिव्य गुणों से युक्त हैं।'" ‘उद्घात्यक' नाम एइ'आमुख'–‘वीथी' अङ्ग ।तोमार आगे कहि–इहा धार्चेर तरङ्ग ॥
१८५॥
यह प्रस्तावना शास्त्रीय रीति से उद्घात्यक कहलाती है और सम्पूर्ण दृश्य वीथी कहलाता है। आप नाटकीय अभिव्यक्ति में इतने पटु हैं कि आपके समक्ष मेरा हर कथन धृष्टता के सागर से उठने वाली तरंग के समान है।"
पदानि त्वगतार्थानि तदर्थ-गतये नराः ।।योजयन्ति पदैरन्यैः स उद्धात्यक उच्यते ॥
१८६॥
किसी अस्पष्ट शब्द की व्याख्या करने के लिए लोग सामान्यतया इसे अन्य शब्दों से जोड़ते हैं। ऐसा प्रयास उद्घात्यक कहलाता है।"
राय कहे,—कह आगे अङ्गेर विशेष ।श्री-रूप कहेन किछु सङ्क्षेप-उद्देश ॥
१८७॥
। जब रामानन्द राय ने श्रील रूप गोस्वामी से नाटक के विभिन्न अंगों के विषय में और अधिक बोलने के लिए कहा, तो श्रील रूप गोस्वामी ने संक्षेप में ललित माधव से उद्धरण दिये।"
हरिमुद्दिशते रजो-भरः ।पुरतः सङ्गमयत्यमुं तमः ।। व्रज-वाम-दृशां न पद्धतिः ।प्रकटा सर्व-दृशः श्रुतेरपि ॥
१८८॥
* मार्ग पर गौवों तथा बछड़ों से उठी धूल एक तरह का अँधेरा उत्पन्न करती है, जो यह बताता है कि कृष्ण गोचारण-भूमि से घर लौट रहे हैं। यही नहीं, संध्याकालीन अँधेरा गोपियों को कृष्ण से मिलने के लिए उद्दीप्त करता है। इस तरह कृष्ण तथा गोपियों की लीलाएँ एक प्रकार के दिव्य अँधेरे से ढक जाती हैं, इसलिए वेदों के सामान्य विद्वानों के लिए देख पाना असम्भव हो जाता है।'" ह्रियमवगृह्य गृहेभ्यः कर्षतिराधां वनाय या निपुणा ।। सा जयति निसृष्टार्थावर-वंशज-काकली दूती ॥
१८९॥
भगवान् कृष्ण की प्रामाणिक दूती वंशी की मधुर ध्वनि की जय हो, क्योंकि वह कुशलतापूर्वक श्रीमती राधारानी की लज्जा को दूर करती है और उन्हें अपने घर से वन के लिए आकृष्ट करती है।'" सह-चरि निरातङ्कः कोऽयं युवा मुदिर-द्युतिर्व्रज-भुवि कुतः प्राप्तो माद्यन्महँ-गज-विभ्रमः ।अहह चटुलैरुत्सर्पद्भिर्टगञ्चल-तस्करैर् ।मम धृति-धनं चेतः-कोषाद्विलुण्ठयतीह यः ॥
१९०॥
। हे प्रिय सखी, यह निडर युवक कौन है? यह बिजली से युक्त बादल की तरह तेजवान है और अपनी लीलाओं में उन्मत्त हाथी की तरह विचरण करता है। यह वृन्दावन में कहाँ से आया है? हाय, यह अपने चंचल हावभावों तथा आकर्षक चितवनों से मेरे हृदय की तिजोरी से धैर्य रूपी खजाना लूट रहा है।"
विहार सुर-दीर्घिका मम मनः-करीन्द्रस्य याविलोचन-चकोरयोः शरदमन्द-चन्द्र-प्रभा । उरोऽम्बर-तटस्य चाभरण-चारु-तारावलीमयोन्नत-मनोरथैरियमलम्भि सा राधिका ॥
१९१॥
। श्रीमती राधारानी गंगा है, जिसमें मेरा मन रूपी हाथी विहार करता है। वह मेरे नेत्र रूपी चकोरों के लिए शरदकालीन पूर्ण चन्द्रमा है। वह चमचमाता आभूषण मेरे वक्षस्थल रूपी आकाश के किनारे तारों की चमकीली तथा सुन्दर सजावट है। आज मैंने श्रीमती राधारानी को अपने । मन की उन्नत अवस्था के कारण प्राप्त कर लिया है।"
एत शुनि' राय कहे प्रभुर चरणे ।।रूपेर कवित्व प्रशंसि' सहस्र-वदने ॥
१९२॥
यह सुनकर श्रील रामानन्द राय ने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणों पर श्रील रूप गोस्वामी के कवित्व की अति श्रेष्ठता का निवेदन किया और उसकी इस तरह प्रशंसा करने लगे मानो उनके हजार मुख हों।"
कवित्व ना हय एइ अमृतेर धार ।।नाटक-लक्षण सब सिद्धान्तेर सार ॥
१९३॥
श्रील रामानन्द राय ने कहा, यह काव्य-प्रस्तुति नहीं, यह तो अमृत की निरन्तर वर्षा है। निस्सन्देह, यह समस्त सिद्धान्तों का सार है, जो नाटकों के रूप में प्रकट हुआ है।"
प्रेम-परिपाटी एइ अद्भुत वर्णन ।शुनि' चित्त-कर्णेर हय आनन्द-घूर्णन ॥
१९४॥
। रूप गोस्वामी द्वारा किये गये अद्भुत वर्णन प्रेम-व्यवहारों को व्यक्त करने के लिए सर्वोत्तम व्यवस्था है। उन्हें सुनकर हर व्यक्ति के हृदय तथा कान दिव्य आनन्द के भंवर में निमग्न हो जायेंगे।"
किं काव्येन कवेस्तस्य किं काण्डेन धनुष्मतः ।।परस्य हृदये लग्नं न घूर्णयति यच्छिरः ॥
१९५॥
धनुर्धर के तीर अथवा कवि की कविता का क्या लाभ, यदि वे हृदय में प्रवेश तो करते हैं, किन्तु सिर को चकरा नहीं देते ?' तोमार शक्ति विना जीवेर नहे एइ वाणी ।।तुमि शक्ति दिया कहाओ,-हेन अनुमानि ॥
१९६॥
। आपकी कृपा के बिना किसी सामान्य जीव के लिए इस तरह की काव्य रचना कर पाना असम्भव होगा। मेरा अनुमान है कि आपने उसे यह शक्ति प्रदान की है।"
प्रभु कहे,_प्रयागे इहार हइल मिलन ।इहार गुणे इहाते आमार तुष्ट हैल मन ॥
१९७॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, मैं श्रील रूप गोस्वामी से प्रयाग में मिला था। उसने अपने गुणों के कारण मुझे आकृष्ट और तुष्ट किया था।।"
मधुर प्रसन्न इहार काव्य सालङ्कार ।। ऐछे कवित्व विनु नहे रसेर प्रचार ॥
१९८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रील रूप गोस्वामी की दिव्य कविता के रूपकों तथा अन्य साहित्यिक अलंकारों की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि ऐसे काव्य लक्षणों ( कवित्व) के बिना दिव्य रसों का प्रचार करने की सम्भावना नहीं है।"
सबे कृपा करि' इँहारे देह' एइ वर ।।व्रज-लीला-प्रेम-रस ग्रेन वेर्णे निरन्तर ॥
१९९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने समस्त निजी संगियों से रूप गोस्वामी को आशीर्वाद देने के लिए विनती की जिससे वे वृन्दावन-लीलाओं का निरन्तर वर्णन कर सकें, क्योंकि ये परम भगवान् के भावात्मक प्रेम से परिपूर्ण हैं।"
इँहार ग्रे ज्येष्ठ-भ्राता, नाम 'सनातन' ।।पृथिवीते विज्ञ-वर नाहि ताँर सम ॥
२०० श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, श्रील रूप गोस्वामी का बड़ा भाई जिसका नाम सनातन गोस्वामी है, इतना विवेकी तथा विद्वान पण्डित है। कि उसकी समता कोई नहीं कर सकता।
तोमार ग्रैछे विषय-त्याग, तैछे ताँर रीति ।। दैन्य-वैराग्य-पाण्डित्येर ताँहातेइ स्थिति ॥
२०१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय से कहा, सनातन गोस्वामी का भौतिक सम्बन्धों से विच्छेद तुम्हारे ही जैसा है। दीनता, वैराग्य तथा पाण्डित्य उसमें एकसाथ पाये जाते हैं।"
एइ दुइ भाइये आमि पाठाइलें वृन्दावने ।शक्ति दिया भक्ति-शास्त्र करिते प्रवर्तने ॥
२०२॥
मैंने इन दोनों भाइयों को वृन्दावन जाकर भक्ति साहित्य का विस्तार करने के लिए शक्ति प्रदान की।"
राय कहे,– ईश्वर तुमि ग्रे चाह करिते । काष्ठेर पुतली तुमि पार नाचाइते ॥
२०३॥
श्रील रामानन्द राय ने श्री चैतन्य महाप्रभु को उत्तर दिया, हे प्रभु, आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। आप चाहें तो एक काठ की पुतली को भी नचा सकते हैं।"
मोर मुखे ये सब रस करिला प्रचारणे ।। सेइ रस देखि एइ इहार लिखने ॥
२०४॥
। मैं देख रहा हूँ कि आपने मेरे मुख के माध्यम से जिस दिव्य रस से सम्बन्धित सत्य की स्थापना की है, वह सब श्रील रूप गोस्वामी की रचनाओं में विवेचित है।"
भक्ते कृपा-हेतु प्रकाशिते चाह व्रज-रस ।। यारे कराओ, सेइ करिबे जगत् तोमार वश ॥
२०५॥
अपने भक्तों पर अहैतुकी कृपा के कारण आप वृन्दावन की दिव्य लीलाओं का वर्णन कराना चाहते हैं। जिस किसी को भी ऐसा करने की शक्ति प्राप्त हो जाए, वह सारे जगत् को आपके वश में ला सकता है।
तबे महाप्रभु कैला रूपे आलिङ्गन ।। तारै कराइला सबार चरण वन्दन । २०६॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने रूप गोस्वामी का आलिंगन किया और उनसे वहाँ उपस्थित सारे भक्तों के चरणकमलों की वन्दना करने के लिए कहा।"
अद्वैत-नित्यानन्दादि सब भक्त-गण।कृपा करि' रूपे सबे कैला आलिङ्गन ॥
२०७॥
अद्वैत आचार्य, नित्यानन्द प्रभु तथा अन्य सारे भक्तों ने रूप गोस्वामी का आलिंगन करके उन पर अपनी अहैतुकी कृपा प्रदर्शित की।"
प्रभु-कृपा रूपे, आर रूपेर सद्गुण ।।देखि' चमत्कार हैल सबाकार मन ॥
२०८॥
श्रील रूप गोस्वामी पर श्री चैतन्य महाप्रभु की विशेष कृपा तथा उनके व्यक्तिगत गुणों को देखकर सारे भक्त आश्चर्यचकित रह गये।।"
तबे महाप्रभु सब भक्त ला गेला ।।हरिदास-ठाकुर रूपे आलिङ्गन कैला ॥
२०९॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु अपने सारे भक्तों सहित चले गये, तो हरिदास ठाकुर ने भी श्रील रूप गोस्वामी का आलिंगन किया।"
हरिदास कहे, तोमार भाग्येर नाहि सीमा ।।ये सब वर्णिला, इहार के जाने महिमा? ॥
२१०॥
हरिदास ठाकुर ने उनसे कहा, तुम्हारे सौभाग्य की कोई सीमा नहीं है। तुमने जो वर्णन किया है उसकी महिमा कोई नहीं समझ सकता।"
श्री-रूप कहेन,_आमि किछुइ ना जानि ।।येइ महाप्रभु कहान, सेइ कहि वाणी ॥
२११॥
श्रील रूप गोस्वामी ने कहा, मैं कुछ नहीं जानता। मैं केवल वे ही दिव्य शब्द बोल सकता हूँ, जिन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु मुझसे कहलवाते हैं।"
हृदि यस्य प्रेरणया ।प्रवर्तितोऽहं वराक-रूपोऽपि ।। तस्य हरेः पद-कमलं ।वन्दे चैतन्य-देवस्य ॥
२१२॥
यद्यपि मैं सब से नीच व्यक्ति हूँ और मुझमें कुछ ज्ञान नहीं है, किन्तु महाप्रभु ने कृपा करके मुझे भक्ति के विषय में दिव्य ग्रन्थ लिखने की प्रेरणा दी है। इसलिए मैं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में नमस्कार करता हूँ, जिन्होंने मुझे इन ग्रन्थों को लिखने का अवसर प्रदान किया है।"
एइ-मत दुइ-जन कृष्ण-कथा-रङ्गे।।सुखे काल गोङार्य रूप हरिदास-सङ्गे ॥
२१३॥
इस तरह भगवान् कृष्ण की लीलाओं के विषय में विचार-विमर्श करते हुए श्रील रूप गोस्वामी ने हरिदास ठाकुर के संग परम सुख में अपना समय बिताया।"
चारि मास रहि' सब प्रभुर भक्तगण ।। गोसाजि विदाय दिला, गौड़े करिला गमन ॥
२१४॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों ने उनके साथ चार मास बिताये। तब महाप्रभु ने उन सबको विदा किया और वे बंगाल लौट गये।"
श्री-रूप प्रभु-पदे नीलाचले रहिला । दोल-यात्रा प्रभु-सङ्गे आनन्दे देखिला ॥
२१५॥
किन्तु श्रील रूप गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में रुके रहे और जब दोलयात्रा उत्सव मनाया गया, तो उन्होंने महाप्रभु के साथ इसे परम सुखपूर्वक देखा।
दोल अनन्तरे प्रभु रूपे विदाय दिला । अनेक प्रसाद करि शक्ति सञ्चारिला ॥
२१६॥
। जब दोलयात्रा उत्सव समाप्त हो गया, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने रूप गोस्वामी को भी विदा कर दिया। महाप्रभु ने उन्हें शक्ति प्रदान की और उन पर सभी प्रकार की कृपा अर्पित की।"
वृन्दावने ग्राह' तुमि, रहिह वृन्दावने । एकबार इहाँ पाठाइह सनातने ॥
२१७॥
महाप्रभु ने कहा, अब तुम वृन्दावन जाओ और वहीं रुको। तुम अपने बड़े भाई सनातन को यहाँ भेज सकते हो।"
व्रजे याइ रस-शास्त्र करिह निरूपण । लुप्त-तीर्थ सब ताहाँ करिह प्रचारण ॥
२१८॥
जब तुम वृन्दावन जाओ तो वहाँ रुकना, दिव्य साहित्य का प्रचार करना और विलुप्त पवित्र स्थलों को प्रकाशित करना।"
कृष्ण-सेवा, रस-भक्ति करिह प्रचार ।। आमिह देखिते ताहाँ ग्राइमु एकबार ॥
२१९॥
भगवान् कृष्ण की सेवा स्थापित करना और भगवान् कृष्ण की भक्ति के रसों का प्रचार करना। मैं भी एक बार पुनः वृन्दावन जाऊँगा।"
एत बलि' प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गन ।। रूप गोसाजि शिरे धरे प्रभुर चरण ॥
२२०॥
इस तरह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने रूप गोस्वामी का आलिंगन किया। तब उन्होंने अपने सिर पर महाप्रभु के चरणकमल रखे।"
प्रभुर भक्त-गण-पाशे विदाय लइला ।। पुनरपि गौड़-पथे वृन्दावने आइला ॥
२२१॥
श्रील रूप गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों से विदा ली और वे बंगाल के रास्ते होकर वृन्दावन लौट आये।"
एइ त कहिलाङपुनः रूपेर मिलन ।। इहा येइ शुने, पाय चैतन्य-चरण ॥
२२२॥
। इस तरह मैंने श्रील रूप गोस्वामी तथा श्री चैतन्य महाप्रभु की द्वितीय भेंट का वर्णन किया है। जो भी इस घटना को सुनता है, वह निश्चय ही श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण प्राप्त करेगा।"
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे झार आश ।। चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
२२३॥
। श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए और सदैव उनकी कृपा की आकांक्षा करते हुए, मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलकर, श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।"
