अध्याय बाईसवां: भक्ति सेवा की प्रक्रिया
वन्दे श्री-कृष्ण-चैतन्य-देवं तं करुणार्णवम् ।। कलावष्यति-गूढ़ेयं भक्तिर्येन प्रकाशिता ॥
१॥
मैं श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करता हूँ। वे दिव्य करुणा के सागर हैं। यद्यपि भक्ति का विषय अत्यन्त गुह्य है, फिर भी उन्होंने इस कलह के युग कलियुग में भी उसे इतनी सुन्दरता से प्रकट किया है।
जय जय श्री कृष्ण-चैतन्य नित्यानन्द । जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! नित्यानन्द प्रभु की जय हो! अद्वैतचन्द्र की जय हो! श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! एइत कहिलॆ सम्बन्ध-तत्त्वेर विचार ।वेद-शास्त्रे उपदेशे, कृष्ण-—एक सार ॥
३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, 'मैंने अनेक प्रकार से कृष्ण के साथ मनुष्य के सम्बन्ध का वर्णन किया है। यही समस्त वेदों का विषय है। कृष्ण सारे कार्यकलापों के केन्द्र हैं।
एबे कहि, शुन, अभिधेय-लक्षण ।ग्राहा हैते पाइ कृष्ण, कृष्ण-प्रेम-धन ॥
४॥
अब मैं भक्ति के लक्षणों के विषय में कहूँगा, जिसके द्वारा मनुष्य कृष्ण का आश्रय तथा उनकी दिव्य प्रेममयी सेवा को प्राप्त कर सकता है।
कृष्ण-भक्ति-अभिधेय, सर्व-शास्त्रे कय ।अतएव मुनि-गण करियाछे निश्चय ॥
५॥
मनुष्य के सारे कार्यकलाप केवल भगवान् कृष्ण की भक्ति पर केन्द्रित होने चाहिए। यही सारे शास्त्रों का निर्णय है और सारे सन्त पुरुषों ने यही निष्कर्ष निकाला है।
श्रुतिर्माता पृष्टा दिशति भवदाराधन-विधिंग्रथा मातुर्वाणी स्मृतिरपि तथा वक्ति भगिनी । पुराणाद्या ग्रे वा सहज-निवहास्ते तदनुगाअतः सत्यं ज्ञातं मुर-हर भवानेव शरणम् ॥
६॥
जब वेदमाता ( श्रुति ) से प्रश्न किया गया कि किसकी पूजा की ए, तो उसने कहा कि आप ही एकमात्र आराध्य प्रभु हैं। इसी तरह त शास्त्रों के उपसिद्धान्त स्मृतिशास्त्र भी बहिन-तुल्य वही आदेश देते भातुल्य पुराण अपनी माता के पदचिह्नों पर चलते हैं। हे मुर असुर शत्रु, निष्कर्ष यह है कि आप ही एकमात्र आश्रय हैं। मैंने इसे तत्त्वतः लिया है।'
अद्वय-ज्ञान-तत्त्व कृष्ण-स्वयं भगवान् । ‘स्वरूप-शक्ति' रूपे ताँर हय अवस्थान ॥
७॥
कृष्ण अद्वय परम सत्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। यद्यपि वे एक किन्तु अपनी लीलाओं के लिए उनके विभिन्न स्वांश तथा शक्तियाँ हैं।
स्वांश-विभिन्नांश-रूपे हजा विस्तार ।अनन्त वैकुण्ठ-ब्रह्माण्डे करेन विहार ॥
८॥
कृष्ण अपना विस्तार अनेक रूपों में करते हैं। इनमें से कुछ स्वांश हैं और कुछ विभिन्नांश हैं। इस तरह वे आध्यात्मिक तथा भौतिक दोनों जगतों में लीलाएँ करते हैं। आध्यात्मिक जगत् तो वैकुण्ठ लोक हैं और भौतिक जगत् विशाल ब्रह्माण्ड समूह हैं, जिनकी अध्यक्षता ब्रह्मा करते। हैं।
स्वांश-विस्तार-चतुयूंह, अवतार-गण ।।विभिन्नांश जीव ताँर शक्तिते गणन ॥
९॥
उनके स्वांश विस्तार वैकुण्ठ लोक से इस भौतिक जगत् में अवतरित होते हैं-यथा चतुयूंह, जिसमें संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध या वासुदेव आते हैं। सारे जीव विभिन्नांश हैं। यद्यपि वे कृष्ण के अंश है, किन्तु उनकी गणना उनकी भिन्न शक्तियों में की जाती है।
सेइ विभिन्नांश जीव-दुइ त' प्रकार । एक---‘नित्य-मुक्त', एक–'नित्य-संसार' ॥
१०॥
जीवों की दी कोटियाँ हैं। कुछ नित्यमुक्त हैं और कुछ नित्यबद्ध हैं।"
‘नित्य-मुक्त'—नित्य कृष्ण-चरणे उन्मुख ।‘कृष्ण-पारिषद' नाम, भुल्ले सेवा-सुख ॥
११॥
जो नित्यमुक्त हैं, वे कृष्णभावनामृत के प्रति सदैव सचेष्ट रहते हैं और वे भगवान् कृष्ण के चरणों की प्रेममयी दिव्य सेवा करते हैं। उन्हें कृष्ण के नित्य संगी मानने चाहिए। वे कृष्ण-सेवा का दिव्य आनन्द लगातार प्राप्त करते रहते हैं।
‘नित्य-बद्ध'–कृष्ण हैते नित्य-बहिर्मुख ।‘नित्य-संसार', भुझे नरकादि दुःख ॥
१२ ॥
नित्यमुक्त भक्तों से भिन्न ऐसे बद्धजीव हैं, जो भगवान् की सेवा से प्रदेव विमुख रहते हैं। वे इस भौतिक जगत् में निरन्तर बद्ध रहते हैं और उहे विभिन्न शरीर धारण करने के कारण नारकीय अवस्था में दुःख भोगना पड़ता है।
सेइ दोषे माया-पिशाची दण्ड करे तारे ।आध्यात्मिकादि ताप-त्रय तारे जारि' मारे ॥
१३॥
कृष्णभावनामृत का विरोध करने के कारण बद्धजीव को बाह्य शक्ति, मायारूपी पिशाचिनी दण्ड देती है। इस तरह वह तीन प्रकार के कष्ट भोगने के लिए तैयार रहता है-शरीर तथा मन द्वारा दिये गये कष्ट, अन्य जीवों के शत्रुभाव से उत्पन्न कष्ट तथा देवताओं द्वारा उत्पन्न प्राकृतिक उत्पात।
काम-क्रोधेर दास हा तार लाथि खाय ।। भ्रमिते भ्रमिते ग्रदि साधु-वैद्य पाय ॥
१४॥
ताँर उपदेश-मन्त्रे पिशाची पलाय । कृष्ण-भक्ति पाय, तबे कृष्ण-निकट ग्राय ॥
१५ ॥
इस तरह बद्धजीव कामवासनाओं का दास बन जाता है और जब वे वासनाएँ पूरी नहीं होतीं तो वह क्रोध का दास बन जाता है और माया की लात खाता रहता है। वह इस ब्रह्माण्ड में घूमते-घूमते दैववश यदि किसी भक्तवैद्य की संगति पा लेता है, तो उसके निर्देशों तथा मन्त्रों से मायारूपी डायन भाग जाती है। इस तरह बद्धजीव भगवान् कृष्ण की भक्ति के सम्पर्क में आता है, जिससे वह भगवान् के और निकट पहुँच सकता है।
कामादीनां कति न कतिधा पालिता दुर्निदेशास् | तेषां जाता मयि न करुणा न त्रपा नोपशान्तिः । उत्सृज्यैतानथ ग्रदु-पते साम्प्रतं लब्ध-बुद्धिस्त्वामायातः शरणमभयं मां नियुक्ष्वात्म-दास्ये ॥
१६॥
हे प्रभु, कामवासनाओं के अवांछित आदेशों की कोई सीमा नहीं है। यद्यपि मैंने इन इच्छाओं की इतनी सेवा की है, किन्तु उन्होंने मुझ पर रंच-भर भी दया नहीं दिखलाई। उनकी सेवा करने में न तो मुझे लज्जा आई, न ही मैंने कभी उन्हें त्यागने की इच्छा की। किन्तु हे प्रभु, हे यदुवंश के शिरोमणि, हाल ही में मेरी बुद्धि जाग्रत हुई है और अब मैं उनका परित्याग कर रहा हूँ। अपनी दिव्य बुद्धि के कारण मैं अब इन अवांछित इच्छाओं का पालन करने से मना करता हूँ और अब आपके अभय चरणकमलों में शरण लेने के लिए आया हूँ। कृपया मुझे अपनी निजी सेवा में लगा लीजिये और मेरी रक्षा कीजिये।
कृष्ण-भक्ति हय अभिधेय-प्रधान ।भक्ति-मुख-निरीक्षक कर्म-ग्रोग-ज्ञान ॥
१७॥
कृष्ण की भक्ति ही जीव का मुख्य कार्य है। यद्यपि बद्धजीव की मुक्ति के विविध साधन हैं, यथा कर्म, ज्ञान, योग तथा भक्ति, किन्तु ये सब भक्ति पर आश्रित हैं।
एइ सब साधनेर अति तुच्छ बल ।।कृष्ण-भक्ति विना ताहा दिते नारे फल ॥
१८॥
भक्ति के बिना आत्म-साक्षात्कार के अन्य सारे साधन दुर्बल तथातुच्छ हैं। कृष्ण की भक्ति किये बिना, ज्ञान तथा योग से वांछित फल प्राप्त नहीं हो सकता।
नैष्कर्म्यमप्यच्युत-भाव-वर्जितं ।न शोभते ज्ञानमलं निरञ्जनम् । कुतः पुनः शश्वदभद्रमीश्वरेन चार्पितं कर्म ग्रदप्यकारणम् ॥
१९॥
जब शुद्ध ज्ञान समस्त भौतिक आकर्षण से परे होता है, किन्तु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् (कृष्ण) को समर्पित नहीं होता, तो यह भौतिक मल से रहित होते हुए भी अधिक सुन्दर नहीं लगता। तो फिर सकाम कर्मों का ज्या लाभ, जो प्रारम्भ से कष्टप्रद और क्षणिक हैं, यदि वे भगवान् की भक्तिमयी सेवा में काम नहीं आते ? भला वे किस तरह अत्यन्त आकर्षक हो सकते हैं? तपस्विनो दान-परा ग्रशस्विनोमनस्विनो मन्त्र-विदः सु-मङ्गलाः ।।क्षेमं न विन्दन्ति विना यदर्पणंतस्मै सुभद्र-श्रवसे नमो नमः ॥
२०॥
जो लोग कठोर तपस्या करते हैं, जो दान में अपना सर्वस्व दे डालते हैं, जो अपने पुण्यकर्म के लिए प्रसिद्ध हैं, जो ध्यान तथा ज्ञान में लगे हैं। और जो वैदिक मन्त्रों का उच्चारण करने में अत्यन्त पटु हैं, वे यदि अपने कर्मों को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा में समर्पित नहीं करते, तो वे कोई शुभ फल नहीं प्राप्त कर पाते, भले ही वे पुण्यकर्मों में क्यों न लगे हों। अतएव मैं उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को बारम्बार सादर नमस्कार करता हूँ, जिनकी महिमा सदैव कल्याणप्रद है।'
केवल ज्ञान 'मुक्ति' दिते नारे भक्ति विने ।।कृष्णोन्मुखे से मुक्ति हय विना ज्ञाने ॥
२१॥
भक्ति के बिना कोरा ज्ञान मुक्ति दिलाने में समर्थ नहीं है। दूसरी ओर यदि कोई भगवद्भक्ति में लगता है, तो वह ज्ञान के बिना भी मुक्ति प्राप्त कर सकता है।
श्रेयः-सृतिं भक्तिमुदस्य ते विभो | क्लिश्यन्ति ये केवल-बोध-लब्धये ।। तेषामसौ क्लेशल एव शिष्यतेनान्यद् यथा स्थूल-तुषावघातिनाम् ॥
२२॥
हे प्रभु, आपकी भक्ति एकमात्र शुभ मार्ग है। यदि कोई केवल ज्ञान के लिए या यह समझकर कि ये सारे जीव आत्माएँ हैं और यह जगत् मिथ्या है, इसका परित्याग कर देता है, तो उसे बहुत कष्ट भोगना पड़ता है। मात्र कष्टप्रद तथा अशुभ कर्म ही उसके हाथ लगते हैं। उसका प्रयास चावल से रहित भूसी को पीटने जैसा है। उसका प्रयास निष्फल हो जाता है।'
दैवी ह्येषा गुण-मयी मम माया दुरत्यया ।।मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥
२३॥
भौतिक प्रकृति के तीन गुणों वाली मेरी इस दैवी शक्ति का अतिक्रमण कर पाना कठिन है। किन्तु जो मेरी शरण में आ चुके हैं, वे इसे आसानी से पार कर सकते हैं।'
‘कृष्ण-नित्य-दासजीव ताहा भुलि' गेल ।एइ दोषे माया तार गलाय बान्धिल ॥
२४॥
जीव माया की जंजीर द्वारा गले से बँधा हुआ है, क्योंकि वह यह भूल गया है कि वह कृष्ण का नित्य दास है।
ताते कृष्ण भजे, करे गुरुर सेवन ।।माया-जाल छुटे, पाय कृष्णेर चरण ॥
२५॥
यदि बद्धजीव भगवान् की सेवा में लगता है और साथ ही अपने गुरु की आज्ञा का पालन करता है और उनकी सेवा करता है, तो वह माया के जाल से छूट सकता है और कृष्ण के चरणकमलों में शरण पाने के योग्य हो सकता है।
चार वर्णाश्रमी व्रदि कृष्ण नाहि भजे ।स्वकर्म करिते से रौरवे पड़ि' मजे ॥
२६ ॥
वर्णाश्रम संस्था के अनुयायी चारों वर्षों ( ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र) तथा चारों आश्रमों ( ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास) के विधि-विधानों को मानते हैं। यदि वे इन विधानों का पलन करते हैं, किन्तु भगवान् कृष्ण की भक्तिमयी सेवा नहीं करते, तो वे भौतिक जीवन की नारकीय अवस्था में जा गिरते हैं।
मुख-बाहूरु-पादेभ्यः पुरुषस्याश्रमैः सह ।।चत्वारो जज्ञिरे वर्णा गुणैर्विप्रादयः पृथक् ॥
२७॥
ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण प्रकट हुए। इसी तरह उनकी बाँहों से । क्षत्रिय उत्पन्न हुए, उनकी कमर से वैश्य निकले और उनके पाँवों से शूद्र | निकले। ये चारों वर्ण तथा इनके चार आश्रम ( ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास ) मिलकर मानव समाज को पूर्ण बनाते हैं।
ग्र एषां पुरुषं साक्षादात्म-प्रभवमीश्वरम् ।।न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाभ्रष्टाः पतन्त्यधः ॥
२८॥
यदि कोई व्यक्ति चारों वर्गों तथा आश्रमों में अपना औपचारिक स्थान बनाये रखता है, किन्तु भगवान् विष्णु की पूजा नहीं करता, तो बह अपने अहंकारपूर्ण उच्च स्थान से गिर जाता है और नारकीय स्थिति को प्राप्त होता है।
ज्ञानी जीवन्मुक्त-दशा पाइनु करि' माने । वस्तुतः बुद्धि 'शुद्ध' नहे कृष्ण-भक्ति विने ॥
२९॥
मायावादी सम्प्रदाय के ऐसे अनेक तर्कवादी ज्ञानी हैं, जो अपने आपको मुक्त मानते हैं और अपने आपको नारायण कहते हैं। किन्तु जब तक वे कृष्ण-भक्ति में नहीं लगते, तब तक उनकी बुद्धि निर्मल नहीं होती।
ग्रेऽन्येऽरविन्दाक्ष विमुक्त-मानिनस्त्वय्यस्त-भावादविशुद्ध-बुद्धयः । आरुह्य कृच्छेण परं पदं ततःपतन्त्यधोऽनादृत-युष्मदछ्यः ॥
३० ॥
हे कमलनेत्र, जो अपने आपको इस जीवन में मुक्त मानते हैं, किन्तु आपकी भक्ति नहीं करते, वे अवश्य ही अशुद्ध बुद्धि वाले हैं। यद्यपि वे कठिन तपस्या करते हैं और उच्च आध्यात्मिक पद अर्थात् निराकार ब्रह्मसाक्षात्कार का पद प्राप्त करते हैं, किन्तु वे पुनः नीचे गिरते जाते हैं, क्योंकि वे आपके चरणकमलों की पूजा करने की उपेक्षा करते हैं।
कृष्ण सूर्य-सम; माया हय अन्धकार । ग्राहाँ कृष्ण, ताहाँ नाहि मायार अधिकार ॥
३१॥
कृष्ण सूर्य के समान हैं और माया अन्धकार के समान है। जहाँ कहीं सूर्य-प्रकाश है, वहाँ अन्धकार नहीं हो सकता। ज्योंही भक्त कृष्णभावनामृत अपनाता है, त्योंही माया का अन्धकार ( बहिरंगा शक्ति का प्रभाव) तुरन्त नष्ट हो जाता है।
विलज्जमानया ग्रस्य स्थातुमीक्षा-पथेऽमुया ।।विमोहिता विकत्थन्ते ममाहमिति दुर्धियः ॥
३२॥
कृष्ण की बहिरंगा मोहक शक्ति, जो माया कहलाती है, कृष्ण के समक्ष खड़े होने में हमेशा उसी तरह लज्जित होती है, जिस तरह अन्धकार सूर्य-प्रकाश के समक्ष रहने में लजित होता है। किन्तु माया उन अभागे व्यक्तियों को मोहग्रस्त कर लेती है, जिनमें बुद्धि नहीं होती। बस वे केवल यही शेखी मारते हैं कि यह भौतिक संसार उनका है और वे इसके भोक्ता हैं।
‘कृष्ण, तोमार हङ’ यदि बले एक-बार ।। माया-बन्ध हैते कृष्ण तारे करे पार ॥
३३॥
यदि कोई गम्भीरता तथा निष्ठा के साथ यह कहता है कि, 'हे कृष्ण! पापि इस भौतिक संसार में मैंने आपको इतने वर्षों से भुला दिया था, किन्तु आज मैं आपकी शरण ग्रहण कर रहा हूँ। मैं आपका निष्ठावान दास हूँ। कृपया मुझे अपनी सेवा में लगा लें, तो वह तुरन्त माया के पाश से मुक्त हो जाता है।
सकृदेव प्रपन्नो ग्रस्तवास्मीति च ग्राचते ।। अभयं सर्वदा तस्मै ददाम्येतद्व्रतं मम ॥
३४॥
यह मेरा व्रत है कि यदि कोई यह कहकर एक बार भी मेरे शरणागत होता है कि, हे प्रभु! आज से मैं आपका हूँ और अभय के लिए मुझसे प्रार्थना करता है, तो मैं उस व्यक्ति को तुरन्त अभय प्रदान करता हूँ और वह उस समय से सदैव सुरक्षित रहता है।'
भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी ‘सुबुद्धि' यदि हय । गाढ़-भक्ति-स्रोगे तबे कृष्णेरे भजय ॥
३५॥
जीव कुसंगति के कारण भौतिक सुख, मोक्ष अथवा भगवान् के शेष पहलू से तादात्म्य चाहता है यो भौतिक शक्ति के लिए योग ना में लग जाता है। यदि ऐसा व्यक्ति वास्तव में बुद्धिमान बन जाता है, तो वह भगवान् श्रीकृष्ण की गहन भक्ति में लगकर कृष्णभावनामृत जो अंगीकार करता है।
अकामः सर्व-कामो वा मोक्ष-काम उदार-धीः ।।तीव्रण भक्ति-योगेन या परम् ॥
३६॥
चाहे कोई सब कुछ चाहता हो या कुछ न चाहता हो, अथवा भगवान् से तादात्म्य चाहता हो, वह तभी बुद्धिमान होता है, जब वह दिव्य प्रेमाभक्ति द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण की पूजा करता है।
अन्य-कामी य़दि करे कृष्णेर भजन ।।ना मागितेह कृष्ण तारे देन स्व-चरण ॥
३७॥
जो लोग भौतिक सुख चाहते हैं या परम सत्य में समा जाना चाहते हैं, यदि वे भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति में अपने आपको लगाते हैं, तो उन्हें तुरन्त कृष्ण के चरणकमलों में शरण प्राप्त हो जाती है, भले ही वे इसकी याचना न करें। अतः कृष्ण अत्यन्त दयामय हैं।
कृष्ण कहे,–'आमा भजे, मागे विषय-सुख ।। अमृत छाड़ि' विष मागे,—एइ बड़ मूर्ख ॥
३८॥
कृष्ण कहते हैं, यदि कोई मेरी दिव्य प्रेमाभक्ति में लगता है, किन्तु साथ ही भौतिक भोग या ऐश्वर्य चाहता है, तो वह महामूर्ख है। निस्सन्देह, वह उस व्यक्ति के समान है, जो अमृत छोड़कर विष पीता है।
आमि—विज्ञ, एई मूर्ख ‘विषय' केने दिब? ।स्व-चरणामृत दिया ‘विषय' भुलाइब ॥
३९॥
चूँकि मैं अत्यन्त बुद्धिमान हूँ, अतः मैं इस मूर्ख को भौतिक सम्पन्नता क्यों हूँ? इसके बदले में मैं इसे अपने चरणकमलों की शरण का अमृत लेने के लिए प्रेरित करूँगा और इसके भ्रामक भौतिक भोग की कामना को भुलवा दूंगा।'
सत्यं दिशत्यर्थितमर्थितो नृणांनैवार्थ-दो ग्रत्पुनरर्थिता व्रतः । स्वयं विधत्ते भजतामनिच्छताम्इच्छा-पिधानं निज-पाद-पल्लवम् ॥
४० ॥
जब भी कृष्ण से किसी इच्छा को पूरी करने की विनती की जाती है, तो वे उसे अवश्य पूरी करते हैं, किन्तु वे ऐसा वर नहीं देते, जिसको भोग करने के बाद भी पुनः पुनः माँगने की आवश्यकता पड़े। जब किसी की अन्य इच्छाएँ रहती हैं, किन्तु साथ ही वह भगवान् की सेवा में लगा । रहता है, तो कृष्ण उसे बलपूर्वक अपने चरणकमलों में शरण देते हैं, जहाँ वह अन्य सारी इच्छाओं को भूल जाता है।'
काम लागि' कृष्ण भजे, पाय कृष्ण-रसे ।।काम छाड़ि' ‘दास' हैते हय अभिलाषे ॥
४१॥
जब कोई अपनी इन्द्रियों की तुष्टि हेतु भगवान् कृष्ण की भक्ति मेंलगता है, किन्तु उसके विपरीत उसे कृष्ण की सेवा करने का स्वाद मिल जाता है, तो वह अपनी भौतिक इच्छाओं को छोड़कर स्वेच्छा से कृष्ण फा सनातन सेवक बन जाता है।
स्थानाभिलाषी तपसि स्थितोऽहंत्वां प्राप्तवान्देव-मुनीन्द्र-गुह्यम् । काचं विचिन्वन्नपि दिव्य-रत्नं ।स्वामिन्कृतार्थोऽस्मि वरं न ग्राचे ॥
४२ ॥
[ जब ध्रुव महाराज को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् वर दे रहे थे, तब उन्होंने कहा था : , 'हे प्रभु, चूंकि मैं ऐश्वर्ययुक्त भौतिक पद की खोज में था, इसलिए मैं कठिन तपस्या कर रहा था। अब तो मैंने आपको पा लिया है, जिन्हें बड़े-बड़े देवता, मुनि तथा राजा भी बड़ी कठिनाई से प्राप्त कर पाते हैं। मैं तो एक काँच का टुकड़ा हूँढ रहा था, किन्तु इसके बदले मुझे बहुमूल्य रत्न मिल गया है। अतएव मैं इतना सन्तुष्ट हूँ कि अब मैं आपसे कोई वर नहीं चाहता।'
संसार भ्रमिते कोन भाग्ये केह तरे ।। नदीर प्रवाहे ग्रेन काष्ठ लागे तीरे ॥
४३॥
बद्धजीव ब्रह्माण्ड के विभिन्न लोकों में भ्रमण करते हुए कई योनियों में प्रवेश करते रहते हैं। सौभाग्यवश इनमें से कोई एक किसी न किसी प्रकार अज्ञान के सागर से मुक्त हो सकता है, जैसे किसी बहती नदी में अनेक बड़ी लकड़ियों में से सहसा कोई एक किनारे तक पहुँच जाए।
मैवं समाधमस्यापि स्यादेवाच्युत-दर्शनम् ।। ह्रियमाण: काल-नद्या क्वचित्तरति कश्चन ॥
४४॥
यह सोचना मेरा भ्रम था कि, चूँकि मैं इतना पतित हूँ, इसलिए हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के दर्शन का कभी अवसर नहीं मिल सकगा। प्रत्युत संयोगवश मुझ जैसा पतित व्यक्ति भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का दर्शन कर सकता है। यद्यपि मनुष्य कालरूपी नदी की तरंगों में बहता रहता है, किन्तु अन्ततः वह किनारे तक पहुँच सकता है।'
कोन भाग्ये कारो संसार क्षयोन्मुख हय ।साधु-सङ्गे तबे कृष्णे रति उपजय ॥
४५ ॥
भाग्यवश ही मनुष्य अज्ञान के सागर को पार करने के योग्य बनता है और जब उसके भौतिक अस्तित्व की अवधि घटती है, तो उसे शुद्ध भक्तों की संगति करने का अवसर प्राप्त हो सकता है। ऐसी संगति से कृष्ण के प्रति उसका आकर्षण जाग्रत हो जाता है।
भवापवर्गो भ्रमतो ग्रदा भवेज् ।जनस्य तर्छच्युत सत्समागमः ।। सत्सङ्गमो ग्रर्हि तदैव सद्गतौ ।परावरेशे त्वयि जायते रतिः ॥
४६॥
हे प्रभु! हे अच्युत परम पुरुष! जब पूरे ब्रह्माण्ड में भ्रमण करने वाला व्यक्ति भौतिक संसार से मुक्ति पाने का पात्र बनता है, तो उसे भक्तों की संगति करने का अवसर प्राप्त होता है। जब वह भक्तों की संगति करता है, तो आपके प्रति उसका आकर्षण जाग्रत होता है। आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, सर्वोत्तम भक्तों के चरम गन्तव्य हैं और ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं।'
कृष्ण यदि कृपा करे कोन भाग्यवाने ।गुरु-अन्तर्रामि-रूपे शिखाय आपने ॥
४७॥
कृष्ण प्रत्येक जीव के हृदय में चैत्य गुरु अर्थात् अन्त:करण में स्थित गुरु के रूप में स्थित हैं। जब वे किसी भाग्यशाली बद्धजीव पर दयालु होते हैं, तो वे उसे भीतर से परमात्मा के रूप में और बाहर से गुरु के रूप में भक्ति में प्रगति करने का उपदेश देते हैं।
नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश ।ब्रह्मायुषापि कृतमृद्ध-मुदः स्मरन्तः । ग्रोऽन्तर्बहिस्तनु-भृतामशुभं विधुन्वन्आचार्य-चैत्य-वपुषा स्व-गतिं व्यनक्ति ॥
४८॥
हे प्रभु, दिव्य कवि तथा अध्यात्म विज्ञान में पटु व्यक्ति भी आपसे पूरी तरह अपनी कृतज्ञता व्यक्त नहीं कर पाये, यद्यपि उन्हें ब्रह्मा जितनीदीर्घायु दी गई थी, क्योंकि आप दो रूपों में-बाह्य रूप में आचार्य की तरह और अन्तःकरण में परमात्मा की तरह-देहधारी जीव को अपने पास आने के निमित्त निर्देश देकर उनका उद्धार करने के लिए प्रकट होते हैं।'
साधु-सङ्गे कृष्ण-भक्त्ये श्रद्धा यदि हय ।।भक्ति-फल 'प्रेम' हय, संसार ग्राय क्षय ॥
४९॥
भक्त की संगति करने से कृष्ण-भक्ति में श्रद्धा जाग्रत होती है। भक्ति के कारण मनुष्य का सुप्त कृष्ण-प्रेम जाग्रत होता है और इस तरह उसका भौतिक बद्ध जीवन समाप्त हो जाता है।
ग्रदृच्छया मत्कथादौ जात-श्रद्धस्तु यः पुमान् ।। न निर्विण्णो नाति-सक्तो भक्ति-योगोऽस्य सिद्धि-देः ॥
५०॥
यदि कोई किसी तरह से मेरी कथा के प्रति आकृष्ट होता है और भगवद्गीता में दी गईं मेरी शिक्षाओं में श्रद्धा रखता है और यदि मनुष्य में भौतिक वस्तुओं के प्रति झूठी आसक्ति नहीं है और साथ ही वह भौतिक जगत् में अधिक आसक्त नहीं होता है, तो मेरे प्रति उसका सुप्त प्रेम भक्ति आरा जाग्रत हो उठेगा।'
महत्कृपा विना कोन कर्मे 'भक्ति' नय । कृष्ण-भक्ति दूरे रहु, संसार नहे क्षय ॥
५१॥
शुद्ध भक्त की कृपा बिना किसी को भक्ति-पद प्राप्त नहीं हो सकता। कृष्ण-भक्ति की बात जाने दें, मनुष्य भवबन्धन तक से नहीं छूट सकता।
रहूगणैतत्तपसा न यातिन चेन्यया निर्वपणाद्गृहाद्वी ।। न च्छन्दसा नैव जलाग्नि-सूर्यैर् ।विना महत्पाद-रजोऽभिषेकम् ॥
५२॥
हे राजा रहूगण, शुद्ध भक्त ( महाजन या महात्मा ) के चरणकमलों की धूल अपने सिर पर धारण किये बिना मनुष्य भक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। केवल कठिन तपस्या करने से, अर्चाविग्रह की भव्य पूजा करने से या संन्यास अथवा गृहस्थाश्रम के नियमों का कठोरता से पालन करने से अथवा वेदों का अध्ययन करने से, जल में डूबे रहने या आग अथवा फड़ी धूप में खुला बैठने से भक्ति प्राप्त नहीं की जा सकती।'
नैषां मतिस्तावदुरुक्रमाग्निस्पृशत्यनर्थापगमो प्रदर्थः ।महीयसां पाद-रजोऽभिषेकंनिष्किञ्चनानां न वृणीत यावत् ॥
५३॥
जब तक मानव-समाज महात्माओं के–वे भक्त जिनका भौतिक सम्पत्ति से कोई लगाव नहीं होता-उनके चरणकमलों की धूल को स्वीकार नहीं करता, तब तक मानव जाति भगवान् कृष्ण के चरणकमलों की ओर अपना ध्यान नहीं ले जा सकती। वे चरणकमल भौतिक जीवन के समस्त अवांछित कष्टों को दूर करने वाले हैं।
‘साधु-सङ्ग', 'साधु-सङ्ग'---सर्व-शास्त्रे कय ।लव-मात्र साधु-सङ्गे सर्व-सिद्धि हय ॥
५४॥
सारे शास्त्रों का निर्णय है कि शुद्ध भक्त के साथ क्षण-भर की संगति से ही मनुष्य सारी सफलता प्राप्त कर सकता है।
तुलयाम लवेनापि न स्वर्गं नापुनर्भवम् ।भगवत्सङ्गि-सङ्गस्य मर्यानां किमुताशिषः ॥
५५॥
भगवद्भक्त के साथ क्षण-भर की संगति के मूल्य की तुलना जब स्वर्ग-प्राप्ति या भौतिक बन्धन से मुक्ति से नहीं की जा सकती, तो भौतिक सम्पति के रूप में सांसारिक वरदान के विषय में क्या कहा जाए, जो उन लोगों के लिए है जिन्हें एक न एक दिन मरना ही है।'
कृष्ण कृपालु अर्जुनेरे लक्ष्य करिया ।। जगतेरे राखियाछेन उपदेश दिया ॥
५६॥
कृष्ण इतने दयालु हैं कि अर्जुन को लक्षित करते हुए अपने उपदेशों के द्वारा उन्होंने सारे जगत् को संरक्षण प्रदान किया है।
सर्व-गुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।। इष्टोऽसि मे दृढ़मिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥
५७ ॥
मन्मना भव मद्भक्तो मयाजी मां नमस्कुरु ।। मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥
५८ ॥
चूँकि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र हो, इसलिए मैं तुम्हें मेरे सर्वोत्कृष्ट उपदेश के रूप में ज्ञान के सर्वाधिक गुह्य अंश को बतला रहा हूँ। इसे असे सुनो, क्योंकि यह तुम्हारे लाभ के लिए है। सदैव मेरा चिन्तन करो और मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे ही नमस्कार करो। इस तरह तुम निश्चित रूप से मेरे पास आओगे। मैं तुम्हें यह वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मेरे प्रिय मित्र हो।'
पूर्व आज्ञा, वेद-धर्म, कर्म, योग, ज्ञान ।सब साधि' शेषे एइ आज्ञा बलवान् ॥
५९॥
| यद्यपि कृष्ण पहले ही वैदिक अनुष्ठान करने, वेदों में वर्णित सकाम कर्म करने, योगाभ्यास करने तथा ज्ञान का अनुशीलन करने की क्षमता बतला चुके थे, किन्तु ये अन्तिम उपदेश अत्यन्त बलवान हैं और अन्य सबसे ऊपर हैं।
एइ आज्ञा-बले भक्तेर 'श्रद्धा' यदि हये ।सर्व-कर्म त्याग करि' से कृष्ण भजय ॥
६० ॥
यदि भक्त को इस आदेश की शक्ति में श्रद्धा है, तो वह अपने सारे कार्यकलापों को त्यागकर भगवान् कृष्ण की पूजा करता है।
तावत्कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत ग्रोवता ।।मत्कथा-श्रवणादौ वा श्रद्धा ग्रावन्न जायते ॥
६१॥
जब तक मनुष्य सकाम कर्म से तृप्त नहीं हो जाता और श्रवणं कीर्तनं विष्णोः द्वारा भक्ति के प्रति रुचि जाग्रत नहीं कर लेता, तब तक उसे वेदोक्त विधानों के अनुसार कर्म करना पड़ता है।'
'श्रद्धा'-शब्दे—विश्वास कहे सुदृढ़ निश्चय ।कृष्ण भक्ति कैले सर्व-कर्म कृत हय ॥
६२॥
कृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति करने पर मनुष्य स्वतः सारे गौण कर्म सम्पन्न कर लेता है, ऐसा सुदृढ़ निश्चयश्रद्धा कहलाता है। ऐसी श्रद्धा भक्तिमय सेवा को सम्पन्न करने के लिए अनुकूल सिद्ध होती है।
ग्रथा तरोर्मूल-निषेचनेन ।तृष्यन्ति तत्स्कन्ध-भुजोपशाखाः ।। प्राणोपहाराच्च ग्रथेन्द्रियाणांतथैव सर्वार्हणमच्युतेन्या ॥
६३ ॥
वृक्ष की जड़ में पानी डालने से तना, डालियाँ तथा टहनियाँ स्वतः तुष्ट हो जाते हैं। इसी तरह उदर को भोजन देने से प्राण का पोषण होता है, जिससे सारी इन्द्रियाँ तुष्ट हो जाती हैं। इसी प्रकार कृष्ण की पूजा करने से तथा उनकी सेवा करने से सारे देवता तुष्ट हो जाते हैं।'
श्रद्धावान् जन हय भक्ति-अधिकारी ।।‘उत्तम', 'मध्यम', 'कनिष्ठ'श्रद्धा-अनुसारी ॥
६४॥
श्रद्धावान भक्त सचमुच ही भगवान् की प्रेममयी सेवा के लिए सुपात्र है। भक्त की श्रद्धा के अनुसार ही उसकी गणना सर्वोच भक्त, मध्यम भक्त या कनिष्ठ भक्त के रूप में की जाती है।
शास्त्र-युक्त्ये सुनिपुण, दृढ़-श्रद्धा याँर।। ‘उत्तम-अधिकारी' सेइ तारये संसार ॥
६५॥
जो व्यक्ति तर्क तथा प्रामाणिक शास्त्रों में निपुण है और जिसे कृष्ण में दृढ़ श्रद्धा है, उसकी गणना सर्वोच्च भक्त के रूप में की जाती है। वह सारे संसार का उद्धार कर सकता है।
शास्त्रे युक्तौ च निपुणः सर्वथा दृढ़-निश्चयः ।।प्रौढ़-श्रद्धोऽधिकारी ग्रः स भक्तावुत्तमो मतः ॥
६६॥
जो तर्क तथा प्रामाणिक शास्त्रों को समझने में निपुण है और जिसका निश्चय दृढ़ होता है तथा जिसकी अगाध श्रद्धा होती है, जो अंधी नहीं होती, उसे उत्तम भक्त माना जाता है।
शास्त्र-युक्ति नाहि जाने दृढ़, श्रद्धावान् ।‘मध्यम-अधिकारी' सेइ महा-भाग्यवान् ॥
६७॥
जो प्रामाणिक शास्त्रों पर आधारित तर्क में अधिक दक्ष नहीं है, किन्तु दृढ़ श्रद्धा से युक्त है, वह द्वितीय श्रेणी का ( मध्यम ) भक्त माना जाता है। उसे भी अत्यन्त भाग्यशाली मानना चाहिए।
ग्रः शास्त्रादिष्वनिपुणः श्रद्धावान्स तु मध्यमः ॥
६८ ॥
जो शास्त्रीय तर्क को भलीभाँति नहीं जानता, किन्तु जिसमें दृढ़ श्रद्धा होती है, वह मध्यम या द्वितीय श्रेणी का भक्त कहलाता है।'
ग्राहार कोमल श्रद्धा, से 'कनिष्ठ' जन ।।क्रमे क़मे तेहो भक्त हइबे 'उत्तम' ॥
६९॥
जिसकी श्रद्धा कोमल एवं लचकदार होती है, वह कनिष्ठ भक्त कहलाता है। किन्तु विधि का क्रमशः पालन करने से वह प्रथम कोटि (उत्तम) के भक्त-पद को प्राप्त कर लेता है।
ग्रो भवेत्कोमल-श्रद्धः स कनिष्ठो निगद्यते ॥
७०।। जिसकी श्रद्धा अत्यन्त प्रबल नहीं होती, और जिसने अभी शुरूआत =ी है, उसे नया कनिष्ठ) भक्त समझना चाहिए।'
रति-प्रेम-तारतम्ये भक्त–तर-तम ।एकादश स्कन्धे तार करियाछे लक्षण ॥
७१॥
भक्त को उसकी अनुरक्ति तथा प्रेम के अनुसार श्रेष्ठतर अथवा मेष्ठतम माना जाता है। श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कन्ध में निम्नलिखित लक्षण निश्चित किये गये हैं।
सर्व-भूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः । भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥
७२॥
भक्ति में उन्नत व्यक्ति हर वस्तु के भीतर आत्माओं के आत्मा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण को देखता है। फलस्वरूप वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप को समस्त कारणों का कारण के रूप में देखता है और यह समझता है कि सारी वस्तुएँ उन्हीं में स्थित हैं।
ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च ।। प्रेम-मैत्री-कृपोपेक्षा ग्रः करोति स मध्यमः ॥
७३॥
मध्यम भक्त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति प्रेम प्रदर्शित करता है, सभी भक्तों के प्रति मैत्रीभाव रखता है और नये भक्तों तथा अज्ञानी व्यक्तियों पर अत्यन्त कृपालु रहता है। जो लोग भक्ति से ईष्र्या रखते हैं, उनकी वह उपेक्षा करता है।
अर्चायामेव हरये पूजां ग्रः श्रद्धयेहते । न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥
७४॥
प्राकृत अथवा भौतिकतावादी भक्त शास्त्रों का जानबुझकर अध्ययन नहीं करता और न शुद्ध भक्ति के वास्तविक स्तर को समझने का प्रयास करता है। फलतः वह उन्नत भक्तों के प्रति समुचित आदर प्रदर्शित नहीं करता। किन्तु वह चाहे तो अपने गुरु से या परिवार से सीखी हुई पूजा की विधि विधान का पालन कर सकता है। उसे भौतिक स्तर पर ही माना जाना चाहिए, यद्यपि वह भक्ति में प्रगति करने के लिए प्रयत्नशील रहता है। ऐसा व्यक्ति भक्तप्राय (नया भक्त) या भक्ताभास होता है, क्योंकि उसे वैष्णव दर्शन से थोड़ा ज्ञान प्राप्त हो जाता है।'
सर्व महा-गुण-गण वैष्णव-शरीरे ।कृष्ण-भक्ते कृष्णेर गुण सकलि सञ्चारे ॥
७५ ॥
वैष्णव वह है, जिसने समस्त उत्तम दिव्य गुण विकसित कर लिए हों। कृष्ण-भक्त में कृष्ण के सारे सद्गुण क्रमशः विकसित होते हैं।
ग्रस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चनासर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः । हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा ।मनो-रथेनासति धावतो बहिः ॥
७६ ॥
कृष्ण में जिस व्यक्ति की अविचल भक्तिमयी श्रद्धा होती है, उस व्यक्ति में कृष्ण तथा देवताओं के समस्त सद्गुण सदा प्रकट होते हैं। किन्तु जिसमें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति भक्ति नहीं होती, उसमें कोई सद्गुण नहीं होते, क्योंकि वह उस भौतिक जगत् में मानसिक कल्पना में लगा रहता है, जो भगवान् का बाह्य लक्षण है।
सेइ सब गुण हय वैष्णव-लक्षण । सब कहा ना ग्राय, करि दिग्दरशन ॥
७७॥
ये सारे दिव्य गुण शुद्ध वैष्णवों के लक्षण हैं और इनकी पूरी व्याख्या नहीं की जा सकती, किन्तु मैं इनमें से कुछ महत्त्वपूर्ण गुणों को इंगित करने का प्रयास करूंगा।
कृपालु, अकृत-द्रोह, सत्य-सार सम । निदोष, वदान्य, मृदु, शुचि, अकिञ्चन ॥
७८ ॥
सर्वोपकारक, शान्त, कृष्णैक-शरण ।। अकाम, अनीह, स्थिर, विजित-घडू-गुण ॥
७९॥
मित-भुक्, अप्रमत्त, मानद, अमानी । गम्भीर, करुण, मैत्र, कवि, दक्ष, मौनी ॥
८०॥
भक्तगण सदैव कृपालु, विनीत, सत्यवादी, सबके प्रति समभाव रखने वाले, निर्दोष, उदार, मृदु तथा स्वच्छ होते हैं। उनके पास भौतिक सम्पत्ति नहीं होती और वे हर एक के लिए उपकार का कार्य करते हैं। वे शान्त, कृष्ण के शरणागत तथा इच्छारहित होते हैं। वे भौतिक उपलब्धियों के प्रति उदासीन रहते हैं और भक्ति में स्थिर रहते हैं। वे छः दुर्गुणों-काम, क्रोध, लोभ इत्यादि--पर पूरा नियन्त्रण रखते हैं। वे आवश्यकता अनुसार खाते हैं और उन्मत्तता से अप्रभावित होते हैं। वे दूसरों का आदर करने वाले, गम्भीर, दयालु तथा झूठी प्रतिष्ठा से रहित होते हैं। वे मैत्रीपूर्ण, कवि, दक्ष तथा मौन होते हैं।
तितिक्षवः कारुणिकाः सुहृदः सर्व-देहिनाम् । अजातशत्रवः शान्ताः साधवः साधु-भूषणाः ॥
८१ ॥
भक्तगण सदैव सहिष्णु तथा दयालु होते हैं। वे प्रत्येक जीव के शुभचिन्तक होते हैं। वे शास्त्रों के आदेशों का पालन करते हैं और उनका कोई शत्रु नहीं होता, इसलिए वे अत्यन्त शान्त होते हैं। ये भक्तों के आभूषण हैं।'
महत्सेवां द्वारमाहुर्विमुक्तेस्तमो-द्वार योषिता सङ्गि-सङ्गम् । महान्तस्ते सम-चित्ताः प्रशान्ताविमन्यवः सुहृदः साधवो ग्रे ॥
८२॥
समस्त शास्त्रों तथा महापुरुषों का यह निर्णय है कि शुद्ध भक्त की सेवा करने से मुक्ति-पथ प्राप्त होता है। किन्तु भौतिक भोग तथा स्त्रियों पर आसक्त रहने वाले भौतिकतावादी लोगों की संगति करने से अन्धकार का पथ प्राप्त होता है। जो वास्तव में भक्त हैं, वे विशाल-हृदय वाले, सबके प्रति समभाव रखने वाले तथा अत्यन्त शान्त होते हैं। वे कभी कोधित नहीं होते और सारे जीवों से मैत्री-भाव रखते हैं।'
कृष्ण-भक्ति-जन्म-मूल हय 'साधु-सङ्ग' ।कृष्ण-प्रेम जन्मे, तेहो पुनः मुख्य अङ्ग ॥
८३॥
कृष्ण-भक्ति का मूल कारण महान् भक्तों की संगति है। कृष्ण के प्रति सुप्त प्रेम के जाग्रत हो जाने पर भी भक्तों की संगति अत्यावश्यक है।
भवापवर्गो भ्रमतो ग्रदा भवेजजनस्य तर्हच्युत सत्समागमः ।।सत्सङ्गमो झर्हि तदैव सद्गतौपरावरेशे त्वयि जायते रतिः ॥
८४॥
हे प्रभु! हे अच्युत परम पुरुष! जब कोई व्यक्ति ब्रह्माण्डों में घूमते घूमते भौतिक संसार से मोक्ष पाने के योग्य बनता है, तब उसे भक्तों की संगति करने का अवसर प्राप्त होता है। जब वह भक्तों की संगति करता है, तब आपके प्रति उसका आकर्षण जाग्रत होता है। आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, सर्वोत्कृष्ट भक्तों के सर्वोच्च लक्ष्य तथा ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं।'
अत आत्यन्तिकं क्षेमं पृच्छामो भवतोऽनघाः ।।संसारेऽस्मिन्क्षणार्थोऽपि सत्सङ्गः सेवधिर्नृणाम् ॥
८५॥
| हे भक्तों! समस्त पापों से मुक्त तुम सब लोगों! मैं तुम सबसे उसके विषय में पूछता हूँ, जो सारे जीवों के लिए परम कल्याणकारी है। इस भौतिक जगत् में शुद्ध भक्त के साथ आधे क्षण की संगति भी मानव समाज के लिए सबसे बड़ा खजाना है।'
सतां प्रसङ्गान्मम वीर्य-संविदोभवन्ति हृत्कर्ण-रसायनाः कथाः । तज्जोषणादाश्वपवर्ग-वर्मनिश्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥
८६॥
आध्यात्मिक रूप से बलशाली भगवत्-सन्देश की समुचित चर्चा केबल भक्तों के समाज में हो सकती है और उनके संग में श्रवण करना अत्यन्त प्रिय लगता है। यदि भक्तों से सुना जाता है, तो दिव्य अनुभव का भार्ग तुरन्त खुल जाता है और क्रमशः दृढ़ श्रद्धा उत्पन्न होती है, जो भालान्तर में आकर्षण तथा भक्ति में बदल जाती है।
असत्सङ्ग-त्याग,—एइ वैष्णव-आचार । ‘स्त्री-सङ्गी'—एक असाधु, कृष्णभक्त' आर ॥
८७॥
वैष्णव को सामान्य लोगों की संगति से हमेशा बचना चाहिए। सामान्य लोग बुरी तरह से भौतिकता में, विशेषतया स्त्रियों में आसक्त रहते हैं। वैष्णवों को उन लोगों की भी संगति से बचना चाहिए, जो कृष्ण भक्त नहीं हैं।
सत्यं शौचं दया मौनं बुद्धिहः श्रीर्घशः क्षमा ।। शमो दमो भगश्चेति ग्रसङ्गाद् ग्राति सक्षयम् ॥
८८॥
तेष्वशान्तेषु मूढेषु खण्डितात्मस्वसाधुषु ।। सङ्गं न कुर्याच्छोच्येषु ग्रोषिक्रीड़ा-मृगेषु च ॥
८९॥
न तथास्य भवेन्मोहो बन्धश्चान्य-प्रसङ्गतः ।। ग्रोषित्सङ्गाद् यथा पुंसो ग्रथा तत्सङ्गि-सङ्गतः ॥
९० ॥
संसारी लोगों की संगति से मनुष्य सत्य, शौच, दया, गम्भीरता, आध्यात्मिक बुद्धि, लज्जा, तपस्या, यश, क्षमा, मन का संयम, इन्द्रिय निग्रह, ऐश्वर्य तथा समस्त अवसरों से विहीन हो जाता है। मनुष्य को कभी भी ऐसे निरे मूर्ख की संगति नहीं करनी चाहिए, जो आत्म-साक्षात्कार के ज्ञान से रहित हो और जो स्त्रियों के हाथ का पशु के समान खिलौना बना हुआ हो। अन्य किसी वस्तु से आसक्ति के फलस्वरूप उत्पन्न मोह तथा अन्धन उतना खतरनाक नहीं होता, जितना कि स्त्री या स्त्रियों पर अत्यन्त अनुरक्त रहने वाले पुरुषों की संगति करने से होता है।'
वरं हुत-बह-ज्वाला-पञ्जरान्तर्व्यवस्थितिः । न शौरि-चिन्ता-विमुख-जन-संवास-वैशसम् ॥
९१ ॥
पिंजरे के भीतर बन्दी होने तथा जलती अग्नि के द्वारा घिर जाने जैसे कष्टों को सहन कर लेना कृष्णभावना से विहीन लोगों की संगति करने से श्रेयस्कर है। ऐसी संगति महान् विपदापूर्ण है।
मा द्राक्षीः क्षीण-पुण्यान् क्वचिदपि भगवद्भक्ति-हीनान् मनुष्यान् ॥
१२॥
जो लोग कृष्णभावनामृत से विहीन होने के कारण पुण्यकर्मों से । रहित हैं, उनको देखना तक नहीं चाहिए।'
एत सब छाड़ि' आर वर्णाश्रम-धर्म ।।अकिञ्चन हा लय कृष्णैक-शरण ॥
९३॥
मनुष्य को बुरी संगति त्यागकर तथा चारों वर्गों और चारों आश्रमों विधानों की भी उपेक्षा करके बिना किसी द्विधा के पूर्ण विश्वास के Nथ भगवान् कृष्ण की एकमात्र शरण ग्रहण करनी चाहिए। कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य को सभी भौतिक आसक्ति का त्याग करना चाहिए।'
सर्व-धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।अहं त्वां सर्व-पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥
९४॥
| यदि तुम सारे धार्मिक तथा वृत्तिपरक कर्तव्यों को त्यागकर मुझ, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शरण ग्रहण करते हो, तो मैं तुम्हें जीवन के सारे पापमय फलों से सुरक्षा प्रदान करूंगा। तुम चिन्ता मत करो।'
भक्त-वत्सल, कृतज्ञ, समर्थ, वदान्य ।हेन कृष्ण छाड़ि' पण्डित नाहि भजे अन्य ॥
९५ ॥
कृष्ण अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त कृपालु हैं। वे सदैव अत्यधिक कृतज्ञ तथा उदार हैं और समस्त क्षमताओं से युक्त हैं। विद्वान व्यक्ति अन्य किसी की पूजा करने के लिए कृष्ण को नहीं छोड़ते।।
कः पण्डितस्त्वदपरं शरणं समीयाद्भक्त-प्रियादृत-गिरः सुहृदः कृतज्ञात् । सर्वान्ददाति सुहृदो भजतोऽभिकामान् ।आत्मानमप्युपचयापचयौ न यस्य ॥
९६॥
हे प्रभु, आप अपने भक्तों के प्रति अत्यन्त वत्सल हैं। आप सत्यनिष्ठ या कृतज्ञ मित्र भी हैं। भला ऐसा कौन विद्वान व्यक्ति होगा, जो आपको पागकर अन्य किसी की शरण ग्रहण करेगा? आप अपने भक्तों की सारी ईछाएँ पूर्ण करते हैं, यहाँ तक कि कभी-कभी आप उन्हें अपने आपको भी दे देते हैं। फिर भी ऐसे कार्य से न आप में वृद्धि होती है, न कमी आती हैं।
विज्ञ-जनेर हय यदि कृष्ण-गुण-ज्ञान ।। अन्य त्यजि', भजे, ताते उद्धव-प्रमाण ॥
९७॥
जब कोई अनुभवी व्यक्ति कृष्ण तथा उनके दिव्य गुणों का वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तो वह स्वाभाविक रूप से अन्य कार्यों को त्याग देता है और भगवान् की सेवा करने लगता है। उद्धव इसका प्रमाण देते हैं।
अहो बकी ग्रं स्तन-काल-कूटं | जिघांसयापाययदप्यसाध्वी । लेभे गतिं धात्र्युचितां ततोऽन्यंकं वा दयालुं शरणं व्रजेम ॥
९८॥
यह कैसा अद्भुत है कि बकासुर की बहन पूतना अपने स्तनों में घातक विष का लेप करके और स्तनपान कराकर कृष्ण को मारना चाहती थी। फिर भी भगवान् कृष्ण ने उसे अपनी माता के रूप में स्वीकार किया और इस तरह उसने कृष्ण की माता के योग्य गति प्राप्त की। तो मैं उन कृष्ण के अतिरिक्त और किसकी शरण ग्रहण करूँ, जो सर्वाधिक दयालु हैं?' शरणागतेर, अकिञ्चनेर—एकइ लक्षण ।।तार मध्ये प्रवेशये 'आत्म-समर्पण' ॥
९९॥
भक्त दो प्रकार के होते हैं-अकिंचन, जो पूर्णतया सन्तुष्ट और मस्त भौतिक कामनाओं से मुक्त होते हैं और वे जो भगवान् केणकमलों में पूर्णतया शरणागत होते हैं। उनके गुण एक-से होते हैं, जन्तु जो कृष्ण के चरणकमलों में शरणागत हैं, उनमें एक दिव्य गुण और पाया जाता है-वह है आत्मसमर्पण का गुण।
आनुकूल्यस्य सङ्कल्पः प्रातिकूल्यस्य वर्जनम् रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्त्वे वरणं तथा ।आत्म-निक्षेप-कार्पण्ये षडू-विधा शरणागतिः ॥
१०० ॥
शरणागति के छह विभाग ये हैं-भक्ति के अनुकूल बातों को स्वीकार करना, प्रतिकूल बातों का बहिष्कार करना, कृष्ण द्वारा संरक्षण पर पूर्ण विश्वास होना, भगवान् को संरक्षक या स्वामी के रूप में स्वीकार करना, पूर्ण आत्मसमर्पण तथा दीनता।
तवास्मीति वदन्वाचा तथैव मनसा विदन् । तत्स्थानमाश्रितस्तन्वा मोदते शरणागतः ॥
१०१॥
जिसका शरीर पूर्णतया समर्पित है, वह उस पवित्र स्थान की शरण लेता है, जहाँ कृष्ण ने उनकी लीलाएँ की थीं। वह भगवान् से प्रार्थना फरता है, हे प्रभु, मैं आपका हूँ। वह इसे मन से जानकर आध्यात्मिक आनन्द का अनुभव करता है।'
शरण लञा करे कृष्णे आत्म-समर्पण। कृष्ण तारे करे तत्काले आत्म-सम ॥
१०२॥
जब इस तरह भक्त कृष्ण के चरणकमलों में पूरी तरह आत्मसमर्पण कर देता है, तो कृष्ण उसे अपने अन्तरंग पार्षदों में से एक के रूप में स्वीकार कर लेते हैं।
मर्यो यदा त्यक्त-समस्त-कर्मा | निवेदितात्मा विचिकीर्षितो मे । तदामृतत्वं प्रतिपद्यमानोमयात्म-भूयाय च कल्पते वै ॥
१०३॥
जन्म तथा मृत्यु का शिकार बनने वाला जीव जब सारे भौतिक कार्यों को त्याग देता है, मेरे आदेश का पालन करने में अपना जीवन अर्पित कर देता है और मेरे आदेशों के अनुसार कर्म करता है, तो वह अमरत्व को प्राप्त करता है। इस तरह वह मेरे साथ प्रेम-रस का विनिमय करने से प्राप्त आध्यात्मिक आनन्द को भोगने के लिए उपयुक्त बन जाता है।'
एबे साधन-भक्ति-लक्षण शुन, सनातन । ग्राहा हैते पाइ कृष्ण-प्रेम-महा-धन ॥
१०४॥
हे सनातन, अब कृपया भक्ति सम्पन्न करने के विधानों के विषय में सुनो इस विधि से मनुष्य भगवत्प्रेम की सर्वोच्च पूर्णता प्राप्त कर सकता जो सर्वाधिक वांछित महाधन है।
कृति-साध्या भवेत्साध्य-भावा सा साधनाभिधा । नित्य-सिद्धस्य भावस्य प्राकट्यं हृदि साध्यता ॥
१०५॥
जिस दिव्य भक्ति से कृष्ण-प्रेम प्राप्त किया जाता है, यदि उसे इन्द्रियों से सम्पन्न किया जाता है, तो वह साधन भक्ति कहलाती है। ऐसी कि हर जीव के हृदय के भीतर निरन्तर स्थित रहती है। इस सनातन त का उदय ही साधन भक्ति द्वारा साध्य होने वाला फल है।'
श्रवणादि-क्रिया–तार ‘स्वरूप'-लक्षण । ‘तटस्थ'-लक्षणे उपजाय प्रेम-धन ॥
१०६ ॥
श्रवण, कीर्तन, स्मरण इत्यादि आध्यात्मिक कार्यकलाप भक्ति के स्वाभाविक लक्षण हैं। इसका तटस्थ लक्षण यह है कि इससे कृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेम उत्पन्न होता है।
नित्य-सिद्ध कृष्ण-प्रेम ‘साध्य' कभु नय ।श्रवणादि-शुद्ध-चित्ते करये उदय ॥
१०७॥
कृष्ण के प्रति शुद्ध प्रेम जीवों के हृदयों में नित्य स्थापित रहता है। यह ऐसी वस्तु नहीं है, जिसे किसी अन्य स्रोत से प्राप्त किया जाए। जब श्रवण तथा कीर्तन से हृदय शुद्ध हो जाता है, तब यह प्रेम स्वाभाविक रूप से जाग्रत हो उठता है।
एइ त साधन-भक्ति–दुइ त' प्रकार ।एक 'वैधी भक्ति', 'रागानुगा-भक्ति' आर ॥
१०८॥
साधन भक्ति की दो विधियाँ हैं। एक है वैधी भक्ति तथा दूसरी रागानुगा भक्ति।
राग-हीन जन भजे शास्त्रेर आज्ञाय ।‘वैधी भक्ति' बलि' तारे सर्व-शास्त्रे गाय ॥
१०९॥
जिन्हें रागानुगा भक्ति प्राप्त नहीं हुई, वे शास्त्रों में वर्णित विधानों के अनुसार प्रामाणिक गुरु के मार्गदर्शन में भक्ति करते हैं। शास्त्रों के अनुसार ऐसी भक्ति वैधी भक्ति कहलाती है।
तस्माद्भारत सर्वात्मा भगवान्हरिरीश्वरः ।।श्रोतव्यः कीर्तितव्यश्च स्मर्तव्यश्वेच्छताभयम् ॥
११०॥
हे भरतवंशी, महाराज परीक्षित! जो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् मनुष्य के हृदय में परमात्मा रूप में स्थित हैं, जो परम नियन्ता हैं और जो सारे जीवों के कष्टों को सदा दूर करने वाले हैं, उनका प्रामाणिक स्रोत से । अषण, उनकी महिमा का गायन तथा उनका स्मरण उन लोगों द्वारा सदैव किया जाना चाहिए, जो निर्भय बनना चाहते हैं।'
मुख-बाहूरु-पादेभ्यः पुरुषस्याश्रमैः सह ।। चत्वारो जज्ञिरे वर्णा गुणैर्विप्रादयः पृथक् ॥
१११॥
ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण-वर्ण प्रकट हुए। इसी तरह उनकी बाहुओं से क्षत्रिय उत्पन्न हुए, उनकी कमर से वैश्य प्रकट हुए और उनके पैरों से शूद्र उत्पन्न हुए। ये चारों वर्ण तथा उनके आध्यात्मिक आश्रम ( ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा संन्यास ) मिलकर मानव-समाज को पूर्ण बनाते है।
ग्र एषां पुरुषं साक्षादात्म-प्रभवमीश्वरम् ।। न भजन्त्यवजानन्ति स्थानाद्भ्रष्टाः पतन्त्यधः ॥
११२ ॥
यदि कोई व्यक्ति चारों वर्षों तथा आश्रमों में केवल औपचारिक स्थिति बनाये रखता है, किन्तु परम भगवान् विष्णु की पूजा नहीं करता, तो वह अपने गर्वित स्थान से गिरकर नरक में जा पहुँचता है।'
स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित् ।।सर्वे विधि-निषेधाः स्युरेतयोरेव किङ्कराः ॥
११३॥
कृष्ण ही भगवान् विष्णु के उद्गम हैं। उनका सतत स्मरण करना हिए और किसी भी समय उन्हें भूलना नहीं चाहिए। शास्त्रों में उल्लिखित सारे नियम तथा निषेध इन्हीं दोनों नियमों के अधीन होने पाहिए।'
विविधाङ्ग साधन-भक्तिर बहुत विस्तार ।सङ्क्षेपे कहिये किछु साधनाङ्ग-सार ॥
११४॥
मैं भक्ति के विविध साधनांगों के विषय में कुछ कहूँगा, जिनका विस्तार अनेक प्रकार से हुआ है। मैं मुख्य साधनांगों के विषय में संक्षेप में कहना चाहता हूँ।
गुरु-पादाश्रय, दीक्षा, गुरुर सेवन ।।सद्धर्म-शिक्षा-पृच्छा, साधु-मार्गानुगमन ॥
११५ ॥
साधन भक्ति के मार्ग में निम्नलिखित अंगों का पालन करना चाहिए -( १ ) एक प्रामाणिक गुरु की शरण ग्रहण करनी चाहिए। सौ से दीक्षा ली जाए।(३) उसी की सेवा की जाए।(४) गुरु 7 ग्रहण की जाए और भक्ति की शिक्षा के लिए प्रश्न किये जाएँ। पूर्ववर्ती आचार्यों के पदचिह्नों का अनुगमन किया जाए तथा गुरु ये गये निर्देशों का पालन किया जाए।
कृष्ण-प्रीत्ये भोग-त्याग, कृष्ण-तीर्थे वास ।यावन्निर्वाह-प्रतिग्रह, एकादश्युपवास ॥
११६॥
अगले अंग इस प्रकार हैं-(६) कृष्ण की तुष्टि के लिए सर्वस्व भाग करने के लिए प्रस्तुत रहना तथा कृष्ण की तुष्टि के लिए हीबस्तु को स्वीकार करना। (७) जहाँ कृष्ण हों-यथा वृन्दावन, पा कृष्ण मन्दिर में-वहीं रहना । (८) जीविका-निर्वाह के लिए पक हो उतना ही धन कमाना (९) एकादशी के दिन उपवास रखना।
धात्र्यश्वत्थ-गो-विप्र-वैष्णव-पूजन ।। सेवा-नामापराधादि दूरे विसर्जन ॥
११७॥
( १०) मनुष्य को चाहिए कि वह धात्री वृक्षों, बरगद वृक्षों, गौवों, ब्राह्मणों तथा भगवान् विष्णु के भक्तों की पूजा करे।(११) उसे भक्ति तथा पवित्र नाम के विरुद्ध अपराधों से बचना चाहिए।
अवैष्णव-सङ्ग-त्याग, बहु-शिष्य ना करिब ।। बहु-ग्रन्थ-कलाभ्यास-व्याख्यान वर्जिब ॥
११८॥
बारहवाँ अंग है अभक्तों की संगति त्याग देना। (१३) मनुष्य को असंख्य शिष्य नहीं बनाने चाहिए। (१४) मात्र प्रमाण देने तथा टीका करने के उद्देश्य से अनेक शास्त्रों का अधूरा अध्ययन नहीं करना चाहिए।
हानि-लाभे सम, शोकादिर वश ना हइब ।। अन्य-देव, अन्य-शास्त्र निन्दा ना करिब ॥
११९॥
( १५) भक्त को चाहिए कि वह हानि तथा लाभ को समान माने। (१६) भक्त को शोक से अभिभूत नहीं होना चाहिए।(१७) भक्त । न तो देवताओं की पूजा करनी चाहिए, न ही उनका अनादर करना। चाहिए। इसी तरह भक्त को चाहिए कि वह न तो अन्य शास्त्रों का अध्ययन करे, न उनकी आलोचना करे।
विष्णु-वैष्णव-निन्दा, ग्राम्य-वार्ता ना शुनिब ।।प्राणि-मात्रे मनो-वाक्ये उद्वेग ना दिब ॥
१२०॥
(१८) भक्त को भगवान् विष्णु या उनके भक्तों की निन्दा कभी नहीं सुननी चाहिए। (१९) भक्त को समाचार-पत्र अथवा स्त्री-पुरुषों की प्रेम-कथाओं वाली पुस्तकें या इन्द्रियों को अच्छे लगने वाले विषयों को पढ़ने या सुनने से बचना चाहिए। (२०) भक्त को चाहिए कि मन या वचन से किसी जीव को न सताये, भले ही वह कितना ही तुच्छ क्यों न हो।
श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पूजन, वन्दन । परिचर्या, दास्य, सख्य, आत्म-निवेदन ॥
१२१॥
भक्ति में प्रतिष्ठित व्यक्ति के लिए करणीय कर्म इस प्रकार हैं| भवण, (२) कीर्तन, (३) स्मरण, (४) पूजन, (५) वन्दन, सेवा, (७) दास्य-भाव को स्वीकार करना, (८) मित्र बनना तथा ३) पूर्णतया समर्पण करना।
अग्रे नृत्य, गीत, विज्ञप्ति, दण्डवन्नति ।।अभ्युत्थान, अनुव्रज्या, तीर्थ-गृहे गति ॥
१२२॥
भक्त को चाहिए कि वह (१०) अर्चाविग्रह के समक्ष नृत्य करे, ११) उनके समक्ष गाये, (१२) उनसे मन की बात कहे, (१३) उनको मस्कार करे, (१४) उनके तथा गुरु के समक्ष खड़ा होकर सम्मान ताये, (१५) उनका अथवा गुरु का अनुगमन करे तथा (१६) विभिन्न पार्थस्थानों में जाये या मन्दिर में अर्चाविग्रह का दर्शन करने जाये।
परिक्रमा, स्तव-पाठ, जप, सङ्कीर्तन ।।धूप-माल्य-गन्ध-महाप्रसाद-भोजन ॥
१२३॥
भक्त को चाहिए कि वह (१७) मन्दिर की परिक्रमा को, (१८) स्तव-पाठ करे, (१९) मन्द स्वर में जप करे, (२०) सामूहिक कीर्तन करे, (२१) अर्चाविग्रह पर चढ़ी धूप तथा फूलों की माला को सुध तथा (२२) अर्चाविग्रह पर चढ़ाये गये भोजन का शेष ग्रहण करे।
आरात्रिक-महोत्सव-श्रीमूर्ति-दर्शन । निज-प्रिय-दान, ध्यान, तदीय-सेवन ॥
१२४॥
उसे चाहिए कि (२३) आरती तथा उत्सवों में सम्मिलित हो, (२४) अर्चाविग्रह का दर्शन करे, (२५) अपनी प्रिय वस्तु अर्चाविग्रह पर चढ़ाये, (२६) अर्चाविग्रह का ध्यान करे तथा (२७-३०) भगवान से सम्बन्धित लोगों की सेवा करे।
‘तदीय'—तुलसी, वैष्णव, मथुरा, भागवत । एइ चारिर सेवा हय कृष्णेर अभिमत ॥
१२५॥
तदीय का अर्थ है, तुलसी-दल, कृष्ण के भक्त, कृष्ण का स्थान (मथुरा) तथा वैदिक ग्रन्थ श्रीमद्भागवत। कृष्ण यह देखने लिए अत्यन्त उत्सुक रहते हैं कि उनका भक्त तुलसी, वैष्णव, मथुरा भागवत की सेवा करे।
कृष्णार्थे अखिल-चेष्टा, तत्कृपावलोकन ।। जन्म-दिनादि-महोत्सव ला भक्त-गण ॥
१२६॥
(३१) भक्त को चाहिए कि वह कृष्ण के लिए सारी चेष्टाएँ करे। (३२) उनकी कृपा के लिए लालायित रहे। (३३) भक्तों के साथ | मिलकर विभिन्न उत्सवों में-यथा कृष्ण जन्माष्टमी या रामचन्द्र के जन्मोत्सव में भाग ले।
सर्वथा शरणापत्ति, कार्तिकादि-व्रत ।‘चतुःषष्टि अङ्ग' एइ परम-महत्त्व ॥
१२७॥
(३४) भक्त को चाहिए कि सभी प्रकार से कृष्ण की शरण में जाये।( ३५ ) कार्तिक व्रत जैसे विशेष व्रत रखे। भक्ति के चौंसठ का ? में से ये कुछ महत्त्वपूर्ण बातें हैं।
साधु-सङ्ग, नाम-कीर्तन, भागवत-श्रवण ।।मथुरा-वास, श्री-मूर्तिर श्रद्धाय सेवन ॥
१२८॥
मनुष्य को चाहिए कि वह भक्तों की संगति करे, भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करे, श्रीमद्भागवत सुने, मथुरा में वास करे तथा श्रद्धा सम्मानपूर्वक अर्चाविग्रह की पूजा करे।
सकल-साधन-श्रेष्ठ एइ पञ्च अङ्ग ।कृष्ण-प्रेम जन्माय एइ पाँचेर अल्प सङ्ग ॥
१२९॥
भक्ति के ये पाँच अंग सर्व अंगों में श्रेष्ठ हैं। यदि इन पाँचों को थोड़ा सा भी सम्पन्न किया जाए, तो कृष्ण-प्रेम जाग्रत होता है।
श्रद्धा विशेषतः प्रीतिः श्री-मूर्तेरध्रि-सेवने ॥
१३०॥
अर्चाविग्रह के चरणकमलों की पूजा पूर्ण श्रद्धा तथा प्रेम मग करनी चाहिए।
श्रीमद्भागवतार्थानामास्वादो रसिकैः सह ।। सजातीयाशये स्निग्धे साधौ सङ्गः स्वतो वरे ॥
१३१॥
शुद्ध भक्तों की संगति में श्रीमद्भागवत के अर्थ का आस्वादन करना चाहिए। उसे अपने से अधिक उन्नत तथा अपने ही जैसे भगवत्प्रेमी भक्तों की संगति करनी चाहिए।
नाम-सङ्कीर्तनं श्रीमन्मथुरा-मण्डले स्थितिः ॥
१३२॥
भक्त को भगवान् के पवित्र नाम का सामूहिक कीर्तन करना चाहिए और वृन्दावन में निवास करना चाहिए।'
दुरूहाद्भुत-वीर्येऽस्मिन्श्रद्धा दूरेऽस्तु पञ्चके । यत्र स्वल्पोऽपि सम्बन्धः सद्धियां भाव-जन्मने ॥
१३३॥
इन पाँचों सिद्धान्तों की शक्ति अद्भुत और समझ पानी कठिन है। अपराधरहित श्रद्धाविहीन व्यक्ति भी उनसे थोड़ा भी सम्बन्धित होने पर कृष्ण के प्रति सुप्त प्रेम को जाग्रत कर सकता है।
'एक' अङ्ग साधे, केह साधे 'बहु' अङ्ग ।‘निष्ठा' हैले उपजय प्रेमेर तरङ्ग ॥
१३४॥
ऐसे अनेक भक्त हैं, जो भक्ति की नौ विधियों में से केवल एक का पालन करते हैं, तो भी उन्हें चरम सफलता प्राप्त होती है। महाराज अम्बरीष जैसे भक्तगण नवों विधियों का सदैव पालन करते हैं और वे भी चरम सफलता प्राप्त करते हैं।
'एक' अङ्गे सिद्धि पाइल बहु भक्त-गण । अम्बरीषादि भक्तेर 'बहु' अङ्ग-साधन ॥
१३५॥
जब कोई व्यक्ति भक्ति में स्थिर हो जाता है, तो चाहे वह भक्ति की बिधि को सम्पन्न करे या अनेक विधियों को, उसमें भगवत्प्रेम की में जाग्रत हो ही जाती हैं।
श्री-विष्णोः श्रवणे परीक्षिदभवद्वैयासकिः कीर्तने ।प्रह्लादः स्मरणे तदध्रि-भजने लक्ष्मीः पृथुः पूजने । अक्रूरस्त्वभिवन्दने कपि-पतिर्दास्येऽथ सख्येऽर्जुनःसर्व-स्वात्म-निवेदने बलिरभूत्कृष्णाप्तिरेषां परा ॥
१३६॥
महाराज परीक्षित ने भगवान् कृष्ण के चरणकमलों की शरण केवल विष्णु के विषय में सुनकर प्राप्त की। यही उनकी चरम सिद्धि थी। शुकदेव गोस्वामी ने केवल श्रीमद्भागवत सुनाकर पूर्णता प्राप्त की। प्रह्लाद महाराज ने भगवान् का स्मरण करके पूर्णता प्राप्त की। लक्ष्मी ने महाविष्णु के दिव्य चरण दबाकर पूर्णता प्राप्त की। महाराज पृथु ने अर्चाविग्रह की पूजा करके तथा अक्रूर ने भगवान् की स्तुति करके पूर्णता प्राप्त की। वज्राँगजी ( हनुमान) ने भगवान् रामचन्द्र की सेवा करके तथा अर्जुन ने कृष्ण का सखा बनकर पूर्णता प्राप्त की। बलि महाराज ने कृष्ण के चरणकमलों पर अपना सर्वस्व अर्पित करके पूर्णता प्राप्त की।
स वै मनः कृष्ण-पदारविन्दयोर्वचांसि वैकुण्ठ-गुणानुवर्णने ।। करौ हरेर्मन्दिर-मार्जनादिषु ।श्रुतिं चकाराच्युत-सत्कथोदये ॥
१३७॥
मुकुन्द-लिङ्गालय-दर्शने दृशौ ।तद्धृत्य-गात्रे-स्परशेऽङ्ग-सङ्गमम् ।। घ्राणं च तत्पाद-सरोज-सौरभे | श्रीमत्तुलस्या रसनां तदर्पिते ॥
१३८॥
पादौ हरेः क्षेत्र-पदानुसर्पणे ।शिरो हृषीकेश-पदाभिवन्दने । कामं च दास्ये न तु काम-काम्ययाग्रथोत्तम:श्लोक-जनाश्रया रतिः ॥
१३९॥
महाराज अम्बरीष सदैव अपने मन को कृष्ण के चरणकमला । अपनी वाणी को आध्यात्मिक जगत् तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् । वर्णन करने में, अपने हाथों को भगवान् का मन्दिर बुहारने तथा धोने में अपने कानों को परमेश्वर की कथाएँ सुनने में, अपनी आँखों को मार में स्थापित भगवान् कृष्ण के अर्चाविग्रह का दर्शन करने में, अपने शरीर को वैष्णवों के चरणकमलों का स्पर्श करने में तथा उनका आलिग करने में, अपने नथुनों को कृष्ण के चरणकमलों पर चढ़ी तुलसी पत्तियों की गन्ध सँघने में, अपनी जीभ को कृष्ण को अर्पित भोजन आस्वादन करने में, अपने पाँवों को वृन्दावन या मथुरा जैसे तीर्थस्थान तक या भगवान् के मन्दिर तक जाने में और अपने सिर को भगवान । चरणकमलों का स्पर्श में करने तथा उनकी स्तुति करने में और अपने इच्छाओं को भगवान् की निष्ठापूर्ण सेवा करने में लगाया। इस त महाराज अम्बरीष ने अपनी सारी इन्द्रियों को भगवान् की दिव्य प्रेमाभा में लगाया। फलस्वरूप उन्होंने अपनी सुप्त भगवत्सेवा लालसा को जाम किया।
काम त्यजि' कृष्ण भजे शास्त्र-आज्ञा मानि' ।।देव-ऋषि-पित्रादिकेर कभु नहे ऋणी ॥
१४०॥
कोई व्यक्ति प्रामाणिक शास्त्रों के आदेशानुसार समस्त भौतिक को त्यागकर कृष्ण की प्रेमाभक्ति में पूरी तरह लग जाता है, तो ओं, ऋषियों, मुनियों या पूर्वजों से उऋण हो जाता है।
देवर्षि-भूताप्त-नृणां पितृणांन किङ्करो नायमृणी च राजन् ।सर्वात्मना यः शरणं शरण्यंगतो मुकुन्दं परिहृत्य कर्तम् ॥
१४१॥
जिस व्यक्ति ने सारे भौतिक कर्तव्यों का परित्याग करके सबको शरण देने वाले मुकुन्द के चरणकमलों में शरण ग्रहण कर ली है, वह देवताओं, ऋषियों, सामान्य जीवों, सम्बन्धियों, मित्रों, मनुष्यों या दिवंगत पूर्वजों का ऋणी नहीं रह जाता।'
विधि-धर्म छाड़ि' भजे कृष्णेर चरण ।। निषिद्ध पापाचारे तार कभु नहे मन ॥
१४२ ॥
यद्यपि शुद्ध भक्त वर्णाश्रम के सारे नियमों का पालन नहीं करता, किन्तु वह कृष्ण के चरणकमलों की पूजा करता है। इसलिए उसमें स्वाभाविक रूप से पाप करने की प्रवृत्ति नहीं होती।
अज्ञाने वा हय यदि ‘पाप’ उपस्थित ।कृष्ण ताँरै शुद्ध करे, ना कराये प्रायश्चित्त ॥
१४३॥
किन्तु यदि संयोगवश कोई भक्त पापकर्म में लिप्त हो जाता है, तो कृष्ण उसे शुद्ध कर लेते हैं। उसे विधिवत् प्रायश्चित्त नहीं करना पड़ता।
स्व-पाद-मूलं भजत: प्रियस्यत्यक्तान्य-भावस्य हरिः परेशः । विकर्म ग्नच्चोत्पतितं कथञ्चिद्धुनोति सर्वं हृदि सन्निविष्टः ॥
१४४॥
जिसने सब कुछ त्यागकर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हरि के णकमलों में शरण ले ली है, वह कृष्ण को अत्यन्त प्रिय होता है। यदि गवश वह किसी पापकर्म में लिप्त हो जाता है, तो प्रत्येक हृदय में त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् उसके पापों को सरलता से दूर कर देते है।
ज्ञान-वैराग्यादि-भक्तिर कभु नहे 'अङ्ग' ।अहिंसा-यम-नियमादि बुले कृष्ण-भक्त-सङ्ग ॥
१४५ ॥
भक्ति के लिए ज्ञान तथा त्याग का मार्ग आवश्यक नहीं है। हाँ, कुछ सद्गुण-यथा अहिंसा तथा मन और इन्द्रिय का नियन्त्रणगवान् कृष्ण के भक्त में स्वतः आ जाते हैं।
तस्मान्मद्भक्ति-युक्तस्य योगिनो वै मदात्मनः ।।न ज्ञानं न च वैराग्यं प्रायः श्रेयो भवेदिह ॥
१४६॥
जो मेरी भक्ति में पूरी तरह से लगा हुआ है, जिसका मन मेरे भक्तियोग में स्थिर है, उसके लिए तार्किक ज्ञान तथा शुष्क वैराग्य का मार्ग अधिक लाभप्रद नहीं होता।
एते न ह्यद्भुता व्याध तवाहिंसादयो गुणाः ।।हरि-भक्तो प्रवृत्ता ये न ते स्युः पर-तापिनः ॥
१४७॥
हे व्याध, तुमने जो अहिंसा जैसा सद्गुण अपना रखा है, वह | आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि जो भगवान् की भक्ति में लगे हुए हैं, वे ईर्ष्यावश अन्यों को कष्ट नहीं देना चाहते।'
वैधी-भक्ति-साधनेर कहिलॆ विवरण ।। रागानुगा-भक्तिर लक्षण शुन, सनातन ॥
१४८॥
हे सनातन, मैं वैधी भक्ति के विषय में विस्तार से बतला चुका हूँ। अब मुझसे स्वतःस्फूर्त रागानुगा भक्ति तथा उसके लक्षणों के विषय में सुनो।
रागात्मिका-भक्ति–'मुख्या' व्रज-वासि-जने ।तार अनुगत भक्तिर 'रागानुगा'-नामे ॥
१४९॥
वृन्दावन के मूल निवासी कृष्ण से रागात्मिका भक्ति द्वारा जुड़े हुए हैं। ऐसी रागात्मिका भक्ति की कोई बराबरी नहीं कर सकता। जब कोई भक्त वृन्दावन के भक्तों के चरणचिह्नों का अनुसरण करता है, तो उसकी भक्ति रागानुगा ( स्वतःस्फूर्त ) भक्ति कहलाती है।
इष्टे स्वारसिकी रागः परमाविष्टता भवेत् । तन्मयी ग्रा भवेद्भक्तिः सात्र रागात्मिकोदिता ॥
१५०॥
जब भक्त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् में अनुरक्त हो जाता है, तब उसकी प्रेम करने की सहज प्रवृत्ति भगवान् के चिन्तन में पूर्ण रूप से मिमग्न हो जाती है। यह दिव्य अनुराग कहलाता है और इस अनुराग के अनुसार की गई भक्ति रागात्मिका भक्ति अर्थात् स्वतःस्फूर्त भक्तिमयी सेवा कहलाती है।'
इष्टे गाढ़-तृष्णा' रागेर स्वरूप-लक्षण । इष्टे 'आविष्टता'—एइ तटस्थ-लक्षण ॥
१५१॥
रागात्मिका प्रेम का मूल लक्षण है पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति प्रगाढ़ अनुराग। भगवान् में तल्लीनता तटस्थ लक्षण है।
रागमयी-भक्तिर हय 'रागात्मिका' नाम ।ताहा शुनि' लुब्ध हय कोने भाग्यवान् ॥
१५२॥
इस तरह जो भक्ति राग (प्रगाढ़ आसक्ति) से युक्त होती है, वह रागात्मिका कहलाती है। यदि कोई भक्त ऐसी स्थिति को प्राप्त होता है, तो वह परम भाग्यशाली माना जाता है।
लोभे व्रज-वासीर भावे करे अनुगति ।।शास्त्र-युक्ति नाहि माने रागानुगार प्रकृति ॥
१५३॥
यदि कोई व्यक्ति ऐसी दिव्य चेतना के वशीभूत होकर वृन्दावनवासियों के चरणचिह्नों का अनुसरण करता है, तो वह शास्त्रों के आदेशों या तर्कों की परवाह नहीं करता। यही राग का मार्ग है।
विराजन्तीमभिव्यक्तां व्रज-वासि-जनादिषु । रागात्मिकामनुसृता ग्रा सा रागानुगोच्यते ॥
१५४॥
वृन्दावन के निवासियों में स्वतःस्फूर्त प्रेम में की जाने वाली भक्ति की जीवन्त अभिव्यक्ति तथा प्राकट्य देखा जाता है। जो भक्ति वृन्दावनवासियों की भक्ति के अनुरूप होती है, वह रागानुगा भक्ति अर्थात् स्वतःस्फूर्त प्रेम जाग्रत होने पर सम्पन्न होने वाली भक्ति कहलाती है।'
तत्तद्भावादि-माधुर्ये श्रुते धीर्घदपेक्षते ।। नात्र शास्त्रं न युक्तिं च तल्लोभोत्पत्ति-लक्षणम् ॥
१५५ ॥
जब कोई स्वरूपसिद्ध उन्नत भक्त वृन्दावन के भक्तों के कार्योंशान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा माधुर्य रसों-के विषय में सुनता है, तो वह इनमें से किसी एक की ओर उन्मुख हो जाता है और उसकी बुद्धि उसी ओर आकृष्ट हो जाती है। निस्सन्देह, वह उस विशेष भक्ति की ओर लुब्ध हो जाता है। जब ऐसा लोभ उत्पन्न हो जाता है, तो उसकी बुद्धि शास्त्र के आदेश, या तर्क पर आश्रित नहीं रहती।'
बाह्य, अन्तर,—इहार दुइ त’ साधन । ‘बाह्ये' साधक-देहे करे श्रवण-कीर्तन ॥
१५६॥
'मने' निज-सिद्ध-देह करिया भावन।रात्रि-दिन करे व्रजे कृष्णेर सेवन ॥
१५७॥
रागानुगा भक्ति बाह्य तथा आन्तरिक, इन दो विधियों से सम्पन्न की जा सकती है। जब उन्नत भक्त स्वरूपसिद्ध होता है, तो वह बाहर से कनिष्ठ जैसा बना रहता है और श्रवण तथा कीर्तन जैसे समस्त शास्त्रीय आदेशों का पालन करता रहता है। किन्तु वह अपनी मूल शुद्ध स्वरूपसिद्ध स्थिति में, अपने मन में विशिष्ट विधि से वृन्दावन में कृष्ण की सेवा करता है। वह चौबीसों घण्टे कृष्ण की सेवा में लगा रहता है।
सेवा साधक-रूपेण सिद्ध-रूपेण चात्र हि । तद्भाव-लिप्सुना काय़ व्रज-लोकानुसारतः ॥
१५८ ॥
रागानुगा भक्ति की ओर उन्मुख उन्नत भक्त (साधक) को वृन्दावन में कृष्ण के पार्षद-विशेष के कार्यों का अनुगमन करना चाहिए। उसे बाहर से वैधी भक्त की तरह भक्ति करने के साथ-साथ अपनी स्वरूपसिद्ध अवस्था में अन्दर ही अन्दर सेवा करनी चाहिए। इस तरह उसे बाहर तथा भीतर दोनों ही रूप में भक्ति करनी चाहिए।'
निजाभीष्ट कृष्ण-प्रेष्ठ पाछेत' लागिया ।।निरन्तर सेवा करे अन्तर्मना हा ॥
१५९ ॥
वस्तुतः कृष्ण को वृन्दावनवासी अत्यन्त प्रिय हैं। यदि कोई रागानुगा भक्ति करना चाहता है, तो उसे वृन्दावनवासियों का अनुसरण करना चाहिए और अपने मन में निरन्तर कृष्ण-सेवा करनी चाहिए।
कृष्णं स्मरन् जनं चास्य प्रेष्ठं निज-समीहितम् ।। तत्तत्कथा-रतश्चासौ कुर्याद्वासं व्रजे सदा ॥
१६०॥
भक्त को चाहिए कि वह अपने अन्तर में सदैव कृष्ण का चिन्तन करे और ऐसे प्रिय भक्त को चुने जो वृन्दावन में कृष्ण का सेवक हो। उसे उस सेवक की कथाओं के विषय में तथा कृष्ण के साथ उसके प्रेममय सम्बन्ध के विषयों का सदैव चिन्तन करना चाहिए और उसे वृन्दावन में निवास करना चाहिए। हाँ, यदि कोई शरीर से वृन्दावन नहीं जा सकता, तो उसे मानसिक रूप से वहाँ रहना चाहिए।'
दास-सखा-पित्रादि-प्रेयसीर गण। राग-मार्गे निज-निज-भावेर गणन ॥
१६१॥
कृष्ण-भक्त अनेक प्रकार के होते हैं-कुछ दास, कुछ मित्र, कुछ माता-पिता तथा कुछ प्रेयसी रूप में। जो भक्त इनमें से अपनी इच्छानुसार किसी भी रागवृत्ति में स्थित होते हैं, उन्हें रागमार्ग में प्रवृत्त माना जाता है।
न कहिँचिन्मत्पराः शान्त-रूपेनड्क्ष्यन्ति नो मेऽनिमिषो लेढ़ि हेतिः । येषामहं प्रिय आत्मा सुतश्च ।सखी गुरुः सुहृदो दैवमिष्टम् ॥
१६२ ॥
हे माता देवहूति! हे शान्ति की प्रतीक! मेरा कालचक्र रूपी शस्त्र उन लोगों का विनाश नहीं करता, जिन्हें मैं अत्यन्त प्रिय हैं, जिनके लिए मैं परमात्मा, पुत्र, मित्र, गुरु, हितचिन्तक, पूज्य देव तथा इच्छित लक्ष्य हूँ। चूंकि भक्तगण सदैव मुझ में अनुरक्त रहते हैं, अतः वे काल के दूतों द्वारा कभी विनष्ट नहीं होते।'
पति-पुत्र-सुहृद्भ्रातृ-पितृवन्मित्रवद्धरिम् ।।ये ध्यायन्ति सदोद्युक्तास्तेभ्योऽपीह नमो नमः ॥
१६३॥
मैं उन लोगों को बारम्बार नमस्कार करता हूँ, जो पूर्ण पुरुषोत्तम गवान् का ध्यान उत्सुकतापूर्वक पति, पुत्र, सखा, भाई, पिता या घनिष्ठ के रूप में करते हैं।'
एइ मत करे येबा रागानुगा-भक्ति। कृष्णेर चरणे ताँर उपजय ‘प्रीति' ॥
१६४॥
यदि कोई भगवान् की रागानुगा भक्ति में प्रवृत्त होता है, तो भगवान् कृष्ण के चरणकमलों के लिए उसका स्नेह बढ़ जाता है।
प्रीत्यङ्करे ‘रति', 'भाव' हय दुइ नाम । ग्राहा हैते वश हुन श्री-भगवान् ॥
१६५ ॥
स्नेह के बीज में आसक्ति होती है, जिसके दो नाम हैं-रति तथा भाव। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ऐसी आसक्ति के वशीभूत हो जाते हैं।
ग्राहा हैते पाइ कृष्णेर प्रेम-सेवन ।।एइत' कहिलू ‘अभिधेय'-विवरण ॥
१६६॥
जिस विधि से भगवान् की प्रेमाभक्ति प्राप्त की जा सकती है, उसका विस्तृत वर्णन मैंने अभिधेय नामक भक्ति के सम्पन्न करने के रूप में किया है।
अभिधेय, साधन-भक्ति एबे कहिलँ सनातन ।सङ्क्षेपे कहिलँ, विस्तार ना ग्राय वर्णन ॥
१६७॥
हे सनातन, मैंने साधन-भक्ति का संक्षिप्त वर्णन किया है, जो ण-प्रेम प्राप्त करने का साधन है। इसका विस्तार से वर्णन नहीं किया सकता।
अभिधेय साधन-भक्ति शुने ग्रेइ जन ।अचिरात्पाय सेइ कृष्ण-प्रेम-धन ॥
१६८॥
जो भी साधन-भक्ति की विधि को सुनता है, वह शीघ्र ही कृष्ण के परणकमलों में प्रेमपूर्वक शरण प्राप्त करता है।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
१६९॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा उनकी कृपा की सदैव कामना करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ। | इस तरह श्रीचैतन्य-चरितामृत की मध्यलीला के बाइसवें अध्याय । भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ जिसमें भक्ति करने का वर्णन हुआ है।
