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अध्याय बीस:भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी को परम सत्य के विज्ञान का निर्देश दिया

वन्देऽनन्ताद्भुतैश्वर्यं श्री-चैतन्य महाप्रभुम् । नीचोऽपि यत्प्रसादात्स्याद्भक्ति-शास्त्र-प्रवर्तकः ॥

१॥

मैं उन श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर नमस्कार करता हूँ, जिनके पास भवन्त अद्भुत ऐश्वर्य है। उनकी कृपा से नीच से नीच व्यक्ति भी भक्ति के विज्ञान का प्रसार कर सकता है।

जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! अद्वैत आचार्य की जय हो तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो! एथा गौड़े सनातन आछे बन्दि-शाले ।श्री-रूप-गोसाञीर पत्री आइल हेन-काले ॥

३॥

जब सनातन गोस्वामी बंगाल में बन्दी थे, तब उन्हें श्रील रूप गोस्वामी का पत्र मिला।

पत्री पाञा सनातन आनन्दित हैला ।। यवन-रक्षक-पाश कहिते लागिला ॥

४॥

जब सनातन गोस्वामी को रूप गोस्वामी की यह चिट्ठी मिली, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे तुरन्त मांसाहारी ( यवन) जेल अधीक्षक के पास गये और उससे इस तरह बोले।

तुमि एक जिन्दा-पीर महा-भाग्यवान् । केताब-कोरोण-शास्त्रे आछे तोमार ज्ञान ॥

५॥

सनातन गोस्वामी ने मुस्लिम जेलर से कहा-हे महोदय, आप सन्त पुरुष हैं और बड़े ही भाग्यशाली हैं। आप कुरान तथा अन्य शास्त्रों के ज्ञान पूर्णतया अवगत हैं।

एक बन्दी छाड़े ग्रदि निज-धर्म देखियो ।संसार हइते तारे मुक्त करेन गोसाजा ॥

६॥

यदि कोई व्यक्ति बद्धजीव या बन्दी व्यक्ति को धार्मिक नियमों के अनुसार मुक्त कर देता है, तो भगवान् उसे भी भवबन्धन से मुक्त कर देते हैं।

पूर्वे आमि तोमार करियाछि उपकार ।तुमि आमा छाड़ि' कर प्रत्युपकार ॥

७॥

सनातन गोस्वामी ने आगे कहा, इसके पूर्व मैंने आपके लिए बहुत कुछ किया है। अब मैं संकट में हूँ। कृपया मुझे बन्धनमुक्त करके उस उपकार का बदला चुकायें।

पाँच सहस्र मुद्रा तुमि कर अङ्गीकार ।पुण्य, अर्थ, दुइ लाभ हड्बे तोमार ॥

८॥

ये रही पाँच हजार स्वर्ण मुद्राएँ। कृपया इन्हें स्वीकार करें। मुझे मुक्त करने से आपको पुण्य मिलेगा और भौतिक लाभ भी होगा। इस तरह आपको एक साथ दोहरा लाभ होगा।

तबे सेइ ग्रवन कहे, शुन, महाशय ।तोमारे छाड़िब, किन्तु करि राज-भय ॥

९॥

इस प्रकार सनातन गोस्वामी ने जेल-अधीक्षक को विश्वास दिलाया। उसने उत्तर दिया, हे महोदय, कृपया मेरी बात सुनें। मैं आपको छोड़ने के लिए तैयार हूँ, किन्तु मुझे सरकार का डर लग रहा है।

सनातन कहे,–तुमि ना कर राज-भय । दक्षिण गियाछे ग्रदि लेउटि' आओयय ॥

१०॥

ताँहारे कहिओ सेइ बाह्य-कृत्ये गेल ।।गङ्गार निकट गङ्गा देखि' झाँप दिल ॥

११॥

सनातन ने कहा, कोई भय नहीं है। नवाब दक्षिण गया हुआ है। यदि वह लौटकर आता है, तो उससे कहना कि सनातन गंगा नदी के तट पर शौच के लिए गया और गंगा को देखते ही वह उसमें कूद पड़ा।

अनेक देखिल, तार लागे ना पाइल।दाडुका-सहित डुबि काहाँ वहि' गेल ॥

१२॥

उससे कहना कि, 'मैं काफी देर तक उसे ढूंढता रहा, किन्तु उसको तनिक भी पता न चली। वह अपनी हथकड़ियों समेत कूद पड़ा, अतएव वह डूब गया और लहरों में बह गया।'

किछु भय नाहि, आमि ए-देशे ना रेब ।।दरवेश हा आमि मक्काके ग्राइब ॥

१३॥

आपको डरने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि मैं इस देश में नहीं रहूँगा। मैं साधु बनकर पवित्र नगरी मक्का जाऊँगा।

तथापि ग्रवन-मन प्रसन्न ना देखिला ।सात-हाजार मुद्रा तार आगे राशि कैला ॥

१४॥

सनातन गोस्वामी ने देखा कि उस मांसभक्षक का मन अभी भी प्रसन्न नहीं था। तब उन्होंने उसके आगे सात हजार स्त्रैण मुद्राओं की राशि लगा दी।

लोभ हइल झवनेर मुद्रा देखियो ।रात्रे गङ्गा-पार कैल दाडुका काटिया ॥

१५ ॥

जब मांसभक्षक ने मुद्राएँ देखीं, तो वह उनके प्रति आकृष्ट हो गया। वह सहमत हो गया और उस रात उसने सनातन की बेड़ियाँ काट दीं और उन्हें गंगा पार करने दिया।

गड़-द्वार-पथ छाड़िला, नारे ताहाँ ग्राइते ।।रात्रि-दिन चलि' आइला पातड़ा-पर्वते ॥

१६॥

इस तरह सनातन गोस्वामी छूट तो गये, किन्तु वे किले के रास्ते से होकर नहीं जा पाये। वे रात-दिन चलकर अन्त में पातड़ा पहाड़ी-क्षेत्र में पहुँचे।

तथा एक भौमिक हय, तार ठाजि गेला ।‘पर्वत पार कर आमा'—विनति करिला ॥

१७॥

पातड़ा पहुँचकर वे एक जमींदार से मिले और उन्होंने उससे विनती की कि वह उन्हें इस पहाड़ी इलाके को पार करा दे।

सेइ भूजार सङ्गे हय हात-गणिता ।।भूआर काणे कहे सेइ जानि' एइ कथा ॥

१८॥

उस समय उस जमींदार के यहाँ एक ज्योतिषी टिका हुआ था। सनातन के बारे में जानकर जमींदार के कान में वह इस प्रकार फुसफुसाया।

'इँहार ठाञि सुवर्णेर अष्ट मोहर हय' ।।शुनि' आनन्दित भू सनातने कये ॥

१९॥

उस ज्योतिषी ने कहा, इस व्यक्ति सनातन के पास आठ स्वर्ण मुद्राएँ (मोहरें ) हैं। यह सुनकर वह जमींदार बहुत प्रसन्न हुआ और सनातन से इस प्रकार बोला।

रात्र्ये पर्वत पार करिब निज-लोक दिया । भोजन करह तुमि रन्धन करिया ॥

२०॥

जमींदार ने कहा, मैं मेरे लोगों के साथ आपको रात में पर्वत के उस पार भिजवा दूंगा। अभी आप अपना भोजन पकायें और खायें।

एत बलि' अन्न दिल करिया सम्मान ।। सनातन आसि' तबे कैल नदी-स्नान ॥

२१॥

यह कहकर जमींदार ने सनातन गोस्वामी को पकाने के लिए अन्न दिया। तब सनातन नदी के किनारे गये और उन्होंने वहाँ स्नान किया।

दुइ उपवासे कैला रन्धन-भोजने । राज-मन्त्री सनातन विचारिला मने ॥

२२॥

चूँकि सनातन दो दिनों से उपवास कर रहे थे, अतः उन्होंने भोजन पकाया और खाया किन्तु नवाब का मन्त्री रह चुकने के कारण वे स्थिति पर विचार करने लगे।

‘एइ भूजा केने मोरे सम्मान करिल?' ।एत चिन्ति' सनातन ईशाने पुछिल ॥

२३ ॥

नवाब का मन्त्री रहने के कारण सनातन सारी कूटनीति समझते थे। अतः उन्होंने सोचा, यह जमींदार मेरा इतना सम्मान क्यों कर रहा है? यह सोचकर उन्होंने अपने सेवक ईशान से पूछा।

‘तोमार ठाजि जानि किछु द्रव्य आछय' ।ईशान कहे,–'मोर ठाजि सात मोहर हय' ॥

२४॥

सनातन ने अपने सेवक से पूछा, ईशान, मेरी समझ में तुम्हारे पास कुछ बहुमूल्य वस्तुएँ हैं। ईशान ने कहा, हाँ, मेरे पास सात स्वर्ण मुद्राएँ (मोहरें ) हैं।

शुनि' सनातन तारे करिला भर्सन । ‘सङ्गे केने आनियाछ एइ काल-ग्रम?' ॥

२५॥

यह सुनकर सनातन गोस्वामी ने अपने सेवक की भर्सना यह कहते हुए की, तुम यह मृत्यु की घण्टी क्यों अपने साथ लाये हो? तबे सेइ सात मोहर हस्तेते करिया ।। भूआर काछे ग्राञा कहे मोहर धरिया ॥

२६॥

तत्पश्चात् सनातन गोस्वामी सातों स्वर्ण मुद्राएँ अपने हाथ में लेकर जमींदार के पास गये और उसके समक्ष मुद्राएँ रखकर इस प्रकार बोले।

एइ सात सुवर्ण मोहर आछिल आमार। इहा ला धर्म देखि' पर्वत कर पार ॥

२७॥

मेरे पास ये सात स्वर्ण मुद्राएँ हैं। कृपया इन्हें लीजिये और धर्म समझकर मुझे यह पर्वतीय प्रदेश पार करा दीजिये।

राज-बन्दी आमि, गड़-द्वार ग्राइते ना पारि ।।पुण्य हबे, पर्वत आमा देह' पार करि ॥

२८॥

मैं सरकारी बन्दी हूँ और मैं किले के परकोटे के रास्ते से नहीं जा सकता। यदि आप यह धन ले लें और मुझे यह पर्वतीय प्रदेश पार करा दें, तो आपको बड़ा पुण्य होगा।

भूञा हासि' कहे,–आमि जानियाछि पहिले ।अष्ट मोहर हय तोमार सेवक-आँचले ॥

२९॥

जमींदार ने हँसते हुए कहा, तुम्हारे देने के पूर्व ही मैं जानता था कि तुम्हारे सेवक के पास आठ स्वर्ण मुद्राएँ हैं।

तोमा मारि' मोहर लइताम आजिकार रात्र्ये ।। भाल हैल, कहिला तुमि, छुटिलाङपाप हैते ॥

३०॥

आज रात को ही मैं तुम्हें जान से मारकर तुम्हारी मुद्राएँ ले लेता। यह तो अच्छा हुआ कि तुमने स्वेच्छा से उन्हें लाकर मुझे सौंप दिया। अब मैं इस पापकर्म से बच गया।

सन्तुष्ट हइलाङआमि, मोहर ना लइब ।। पुण्य लागि' पर्वत तोमा' पार करि' दिब ॥

३१॥

मैं तुम्हारे आचरण से अत्यन्त सन्तुष्ट हूँ। मैं ये स्वर्ण मुद्राएँ नहीं लूंगा, परन्तु मैं केवल पुण्य-लाभ हेतु तुम्हें यह पर्वतीय प्रदेश पार करा दूंगा।

गोसात्रि कहे,–केह द्रव्य लइबे आमा मारि' । आमार प्राण रक्षा कर द्रव्य अङ्गीकरि ॥

३२॥

सनातन गोस्वामी ने कहा, यदि आप इन मुद्राओं को स्वीकार नहीं करेंगे, तो इनके लिए मुझे कोई दूसरा मार डालेगा। अतः अच्छा यही होगा कि आप इन मुद्राओं को स्वीकार करके मेरी प्राण-रक्षा करें।

तबे भूजा गोसान्निर सङ्गे चारि पाइक दिल ।। रात्र्ये राज्ये वन-पथे पर्वत पार कैल ॥

३३॥

इस समझौते के बाद जमींदार ने सनातन गोस्वामी को चार रक्षक दिये जो उनके साथ जा सकें। वे सभी रात-भर जंगल के रास्ते से होकर चलते रहे और उन्हें पर्वतीय क्षेत्र के पार ले गये।

तबे पार हा गोसाजि पुछिला ईशाने ।जानि,—शेष द्रव्य किछु आछे तोमा स्थाने ॥

३४॥

पर्वत पार करने के बाद सनातन गोस्वामी ने अपने सेवक से कहा, ईशान, मेरी समझ में तुम्हारे पास अब भी कुछ स्वर्ण मुद्राएँ होंगी।

ईशान कहे,–एक मोहर आछे अवशेष । गोसात्रि कहे, मोहर लञा ग्राह' तुमि देश ॥

३५॥

ईशान ने उत्तर दिया, अब भी एक स्वर्ण मुद्रा मेरे पास है। तब सनातन गोस्वामी ने कहा, यह मुद्रा लेकर तुम अपने घर लौट जाओ।

तारे विदाय दिया गोसाजि चलिला एकला ।हाते करोया, छिंड़ा कान्था, निर्भय हइला ॥

३६॥

ईशान को विदा करने के बाद सनातन गोस्वामी हाथ में जलपात्र लेकर अकेले ही चल पड़े। फटी-पुरानी रजाई ओढ़े वे अपनी सारी चिन्ताओं से मुक्त हो गये।

चलि' चलि' गोसाञि तबे आइला हाजिपुरे ।। सन्ध्या-काले वसिला एक उद्यान-भितरे ॥

३७॥

चलते चलते सनातन गोस्वामी अन्ततः हाजीपुर नामक स्थान पर पहुँचे। उन्होंने वह सन्ध्या एक बगीचे के भीतर बैठकर बिताई।

सेइ हाजिपुरे रहे–श्रीकान्त तार नाम । गोसाजिर भगिनी-पति, करे राज-काम ॥

३८॥

हाजीपुर में श्रीकान्त नाम का एक व्यक्ति रहता था, जो सनातन गोस्वामी का बहनोई था। वह वहाँ सरकारी नौकरी करता था।

तिन लक्ष मुद्रा राजा दियाछे तार स्थाने । घोड़ा मूल्य ला पाठाय पात्सार स्थाने ॥

३९॥

श्रीकान्त के पास तीन लाख स्वर्ण मुद्राएँ थीं, जो उसे राजा से घोड़े खरीदने के लिए मिली थीं। इस तरह श्रीकान्त घोड़े खरीद-खरीदकर राजा के पास भेजता रहता था।

टुङ्गि उपर वसि' सेइ गोसाजिरे देखिल । राये एक-जन-सङ्गे गोसाञि-पाश आइल ॥

४०॥

ऊँचे चबूतरे पर बैठे हुए श्रीकान्त ने सनातन गोस्वामी को देखा। अतः उस रात वे वहाँ अपने साथ एक सेवक को लेकर सनातन गोस्वामी से मिलने गया।

दुइ-जन मिलि' तथा इष्ट-गोष्ठी कैल ।। बन्धन-मोक्षण-कथा गोसाञि सकलि कहिल ॥

४१॥

जब वे दोनों मिले तो बहुत बातें हुईं। सनातन गोस्वामी ने विस्तार से अपने बन्दी होने और मुक्ति की बातें बताईं।

तेंहो कहे,–दिन-दुइ रह एइ-स्थाने ।।भद्र हओ, छाड़' एइ मलिन वसने ॥

४२॥

तब श्रीकान्त ने सनातन गोस्वामी से कहा, यहाँ पर कम-से-कम दो दिन रुकिये और भद्र पुरुषों की तरह वस्त्र पहनिये। इन गन्दे वस्त्रों को त्याग दीजिये।

गोसात्रि कहे,'एक-क्षण इहा ना रहिब ।गङ्गा पार करि' देह' ए-क्षणे चलिब ॥

४३॥

सनातन गोस्वामी ने उत्तर दिया, मैं यहाँ पर एक क्षण भी नहीं रुकेंगा। कृपया मुझे गंगा पार करा दें। मैं तुरन्त चला जाऊँगा।

ग्रल करि' तेहो एक भोट-कम्बल दिल ।गङ्गा पार करि' दिल–गोसाजि चलिल ॥

४४॥

श्रीकान्त ने बड़ी सावधानी से उन्हें एक ऊनी कम्बल दिया और गंगा पार जाने में उनकी सहायता की। इस तरह सनातन गोस्वामी फिर चल पड़े।

तबे वाराणसी गोसाञि आइला कत-दिने ।शुनि आनन्दित हइला प्रभुर आगमने ॥

४५ ॥

कुछ दिनों बाद सनातन गोस्वामी वाराणसी आ पहुँचे। वहाँ पर श्री चैतन्य महाप्रभु के आगमन के विषय में सुनकर वे अत्यन्त प्रसन्न हुए।"

चन्द्रशेखरेर घरे आसि' द्वारेते वसिला ।।महाप्रभु जानि' चन्द्रशेखरे कहिला ॥

४६॥

तब सनातन गोस्वामी चन्द्रशेखर के घर गये और उनके दरवाजे के पास बैठ गये। श्री चैतन्य महाप्रभु जान गये कि क्या हो रहा है, अतः वे चन्द्रशेखर से बोले।

‘द्वारे एक 'वैष्णव' हय, बोलाह ताँहारे ।चन्द्रशेखर देखे–‘वैष्णव' नाहिक द्वारे ॥

४७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, तुम्हारे दरवाजे पर एक भक्त है। कृपया उसे अन्दर बुला लाओ। बाहर जाने पर चन्द्रशेखर को अपने दरवाजे पर कोई वैष्णव नहीं दिखा।

'द्वारेते वैष्णव नाहि'—प्रभुरे कहिल ।‘केह हय' करि' प्रभु ताहारे पुछिल ॥

४८॥

जब चन्द्रशेखर ने महाप्रभु को बतलाया कि उनके दरवाजे पर कोई वैष्णव नहीं है, तो महाप्रभु ने पूछा, क्या तुम्हारे दरवाजे पर कोई भी है? तेहो कहे,——एक दरवेश' आछे द्वारे ।।‘ताँरै आन' प्रभुर वाक्ये कहिल ताँहारे ॥

४९॥

चन्द्रशेखर ने उत्तर दिया, वहाँ एक मुसलमान फकीर है। महाप्रभु ने तुरन्त कहा, कृपया उसे यहाँ ले आओ। तब चन्द्रशेखर ने अपने द्वार पर अभी तक बैठे हुए सनातन गोस्वामी से कहा।

‘प्रभु तोमाय बोलाय, आइस, दरवेश!' । शुनि' आनन्दे सनातन करिला प्रवेश ॥

५० ॥

हे मुसलमान फकीर, कृपया अन्दर आइये। महाप्रभु आपको बुला रहे हैं। यह आदेश सुनकर सनातन गोस्वामी अत्यन्त आनन्दित हुए और चन्द्रशेखर के घर में प्रविष्ट हुए।

ताँहारे अङ्गने देखि' प्रभु धाबा आइला ।ताँरै आलिङ्गन करि' प्रेमाविष्ट हैला ॥

५१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु सनातन गोस्वामी को आँगन में आये हुए देखते ही तेजी से उनके पास गये और उनका आलिंगन किया और स्वयं प्रेमावेश से भावविभोर हो गये।

प्रभु-स्पर्शे प्रेमाविष्ट हइला सनातन । ‘मोरे ना छुडिह' कहे गद्गद-वचन ॥

५२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु का द्वारा स्पर्श पाते ही सनातन गोस्वामी भी प्रेमाविष्ट हो गये। उन्होंने रुद्ध वाणी में कहा, हे प्रभु, आप मेरा स्पर्श न करें।

दुइ-जने गलागलि रोदन अपार ।। देखि' चन्द्रशेखरेर हुइल चमत्कार ॥

५३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु तथा सनातन गोस्वामी गले लगकर अत्यधिक रोने लगे। यह देखकर चन्द्रशेखर अत्यधिक चकित हुए।

तबे प्रभु ताँर हात धरि' ला गेला । पिण्डार उपरे आपन-पाशे वसाइला ॥

५४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु चन्द्रशेखर का हाथ पकड़कर भीतर ले गये और उन्हें अपनी बगल में एक ऊँचे आसन पर बिठाया।

श्री-हस्ते करेन ताँर अङ्ग सम्मार्जन ।।तेंहो कहे,‘मोरे, प्रभु, ना कर स्पर्शन' ॥

५५॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु अपने दिव्य हाथों से सनातन गोस्वामी का शरीर साफ करने लगे, तो सनातन गोस्वामी ने कहा, हे प्रभु, कृपया मेरा स्पर्श न करें।

प्रभु कहे,_तोमा स्पर्शि आत्म पवित्रते ।भक्ति-बले पार तुमि ब्रह्माण्ड शोधिते ॥

५६॥

महाप्रभु ने उत्तर दिया, मैं अपने आपको पवित्र बनाने के लिए ही तुम्हारा स्पर्श कर रहा हूँ, क्योंकि तुम अपनी भक्ति के बल से सारे ब्रह्माण्ड को शुद्ध कर सकते हो।

भवद्विधा भागवतास्तीर्थ-भूताः स्वयं प्रभो ।।तीर्थी-कुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तः-स्थेन गदा-भृता ॥

५७॥

आप जैसे सन्त स्वयं तीर्थस्थान होते हैं। अपनी पवित्रता के कारण वे भगवान् के नित्य पार्षद होते हैं; अतः वे तीर्थस्थलों को भी पवित्र कर सकते हैं।

न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्व-पचः प्रियः ।। तस्मै देयं ततो ग्राह्य स च पूज्यो यथा ह्यहम् ॥

५८॥

भगवान् कृष्ण ने कहा : ‘भले ही कोई व्यक्ति संस्कृत वैदिक साहित्य का कितना ही प्रकाण्ड पण्डित क्यों न हो, जब तक वह भक्ति में शुद्ध न हो, वह तब तक मेरा भक्त नहीं माना जाता। किन्तु भले ही कोई व्यक्ति चण्डाल परिवार में जन्मा हो, वह भी मुझे अत्यन्त प्रिय है, यदि वह शुद्ध भक्त है और सकाम कर्म या मानसिक तर्क को भोगने की इच्छा से रहित है। निस्सन्देह, उसका सभी तरह से आदर होना चाहिए और वह जो भी भेंट करे उसे स्वीकार करना चाहिए। ऐसे भक्त मेरे समान ही पूज्य हैं।'

विप्रादिद्व-षडू-गुण-ग्रुतादरविन्द-नाभपादारविन्द-विमुखात्-श्वपचं वरिष्ठम् । मन्ये तदर्पित-मनो-वचनेहितार्थप्राणं पुनाति स कुलं न तु भूरि-मानः ॥

५९ ॥

भले ही ब्राह्मण परिवार में जन्म लेकर कोई बारहों ब्राह्मण-गुणों से युक्त क्यों न हो, किन्तु यदि वह कमल समान नाभि वाले भगवान् कृष्ण के चरणकमलों में भक्ति नहीं रखता, तो वह उस चण्डाल के भी तुल्य नहीं है, जिसने भगवान् की सेवा में अपना मन, वचन, कर्म, सम्पत्ति तथा जीवन समर्पित कर दिया है। केवल ब्राह्मण परिवार में जन्म लेना या ब्राह्मण गुणों से सम्पन्न होना पर्याप्त नहीं है। उसे भगवान् का शुद्ध भक्त होना चाहिए। यदि श्वपच या चण्डाल भक्त होता है, तो वह न केवल अपना, अपितु अपने पूरे परिवार का उद्धार करता है, जबकि कोई ब्राह्मण यदि भक्त न होकर केवल ब्राह्मण-गुणों से सम्पन्न होता है, तो वह अपने आपको भी शुद्ध नहीं कर पाता, अपने परिवार को शुद्ध करना तो दूर रहा।'

तोमा देखि, तोमा स्पर्शि, गाइ तोमार गुण ।।सर्वेन्द्रिय-फल, एइ शास्त्र-निरूपण ॥

६० ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु कहते गये, तुम्हें देखकर, तुम्हें स्पर्श करके तथा तुम्हारे दिव्य गुणों का गान करके कोई भी व्यक्ति इन्द्रिय के सारे कार्यों के उद्देश्य को पूर्ण बना सकता है। यह प्रामाणिक शास्त्रों का निर्णय है।

अक्ष्णोः फलं त्वादृश-दर्शनं हितनोः फलं त्वादृश-गोत्र-सङ्गः । जिह्वा-फलं त्वादृश-कीर्तनं हि | सु-दुर्लभा भागवता हि लोके ॥

६१॥

हे वैष्णव, आप जैसे व्यक्ति का दर्शन करना दृष्टि की पूर्णता है। आपके चरणकमलों का स्पर्श करना स्पर्शेन्द्रिय की पूर्णता है। आपके सद्गुणों का गान करना जीभ का वास्तविक कार्य है, क्योंकि भौतिक जगत् में भगवान् का शुद्ध भक्त खोज पाना अतीव कठिन है।

एत कहि कहे प्रभु, शुन, सनातन ।। कृष्ण-बड़ दयामय, पतित-पावन ॥

६२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, हे सनातन, कृपया मुझसे सुनो। कृष्ण अत्यन्त दयालु हैं और सभी पतितात्माओं के उद्धारक हैं।

महा-रौरव हैते तोमा करिला उद्धार । कृपार समुद्र कृष्ण गम्भीर अपार ॥

६३॥

हे सनातन, कृष्ण ने तुम्हें जीवन के सबसे गहरे नरक, महारौरव से बचा लिया है। वे दया के सागर हैं और उनकी लीलाएँ अत्यन्त गम्भीर हैं।

सनातन कहे,‘कृष्ण आमि नाहि जानि ।आमार उद्धार-हेतु तोमार कृपा मानि' ॥

६४॥

सनातन ने उत्तर दिया, मैं कृष्ण को नहीं जानता। जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं तो एकमात्र आपकी कृपा से बन्दी-गृह से मुक्त किया जा सका हूँ।

'केमने छुटिला' बलि प्रभु प्रश्न कैला ।आद्योपान्त सब कथा तेंहो शुनाइला ॥

६५॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी से पूछा, तुम बन्दी-गृह से किस तरह छूटे? अतः सनातन ने आदि से लेकर अन्त तक सारी कथा कह सुनाई।

प्रभु कहे,–तोमार दुइ–भाइ प्रयागे मिलिला । रूप, अनुपम हे वृन्दावन गेला ॥

६६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैं तुम्हारे दो भाइयों, रूप तथा अनुपम से प्रयाग में मिला था। अब वे वृन्दावन चले गये हैं।

तपन-मिश्रेरे आर चन्द्रशेखरेरे । प्रभु-आज्ञाय सनातन मिलिला दोंहारे ॥

६७ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश से सनातन गोस्वामी तपन मिश्र तथा चन्द्रशेखर दोनों से मिले।

तपन-मिश्र तबे तौरे कैला निमन्त्रण । प्रभु कहे,–'क्षौर कराह, ग्राह, सनातन' ॥

६८॥

तब तपन मिश्र ने सनातन गोस्वामी को निमन्त्रण दिया और श्री चैतन्य महाप्रभु ने सनातन से कहा कि वे अपने बाल कटवा दें।

चन्द्रशेखरेरे प्रभु कहे बोलाजा ।।‘एइ वेष दूर कर, ग्राह इँहारे लञा' ॥

६९॥

इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने चन्द्रशेखर को बुलाकर उनसे कहा कि सनातन गोस्वामी को अपने साथ ले जाएँ। उन्होंने उनसे यह भी कहा कि सनातन की यह वेशभूषा भी उतार दें।

भद्र कराळा ताँरै गङ्गा-स्नान कराइल ।।शेखर आनिया ताँरै नूतन वस्त्र दिल ॥

७० ॥

तब चन्द्रशेखर ने सनातन गोस्वामी को भद्र पुरुष की तरह बना दिया। उन्होंने उन्हें गंगास्नान कराया और बाद में उन्हें नये कपड़े दिये।

सेइ वस्त्र सनातन ना कैल अङ्गीकार । शुनिया प्रभुर मने आनन्द अपार ॥

७१॥

चन्द्रशेखर ने सनातन गोस्वामी को नये वस्त्र दिये, किन्तु सनातन ने उन्हें स्वीकार नहीं किया। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह समाचार सुना, तो उन्हें अपार आनन्द हुआ।

मध्याह्न करिया प्रभु गेला भिक्षा करिबारे ।। सनातने ला गेला तपन-मिश्रेर घरे ॥

७२ ॥

दोपहर में स्नान करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु तपन मिश्र के घर भोजन करने गये। वे अपने साथ सनातन गोस्वामी को भी लेते गये।

पाद-प्रक्षालन करि' भिक्षाते वसिला ।।‘सनातने भिक्षा देह'—मिश्रेरे कहिला ॥

७३॥

अपने पाँव धोने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु भोजन करने बैठ गये। उन्होंने तपन मिश्र से कहा कि सनातन गोस्वामी को भी भोजन प्रदान करें।

मिश्र कहे,–'सनातनेर किछु कृत्य आछे।तुमि भिक्षा कर, प्रसाद ताँरै दिब पाछे' ॥

७४॥

तब तपन मिश्र ने कहा, सनातन को अभी कुछ कार्य करने हैं, अतः वे अभी भोजन नहीं कर सकते। भोजन समाप्त हो लेने पर मैं सनातन को शेष प्रसाद दूंगा।

भिक्षा करि' महाप्रभु विश्राम करिल ।।मिश्र प्रभुर शेष-पात्र सनातने दिल ।। ७५ ॥

भोजन करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने थोड़ा आराम किया। तपन मिश्र ने चैतन्य महाप्रभु द्वारा छोड़ा गया भोजन सनातन गोस्वामी को दिया।

मिश्र सनातने दिला नूतन वसन ।वस्त्र नाहि निला, तेहो कैल निवेदन ॥

७६ ॥

जब तपन मिश्र ने सनातन को नया वस्त्र दिया, तो उन्होंने नहीं लिया। अपितु उन्होंने इस प्रकार कहा।

मोरे वस्त्र दिते ग्रदि तोमार हय मन ।।निज परिधान एक देह' पुरातन ॥

७७॥

| यदि आप मुझे कोई वस्त्र देना ही चाहते हैं, तो कृपया मुझे अपना पहना हुआ कोई पुराना वस्त्र दे दें।

तबे मिश्र पुरातन एक धुति दिल ।। तेहो दुइ बहिर्वास-कौपीन करिल ॥

७८ ॥

जब तपन मिश्र ने सनातन को एक पुरानी धोती दी, तो सनातन ने उसे फाड़कर दो अंगोछे तथा एक कौपीन बना लिया।

महाराष्ट्रीय द्विजे प्रभु मिलाइला सनातने ।। सेइ विप्र ताँरे कैल महा-निमन्त्रणे ॥

७९॥

जब चैतन्य महाप्रभु ने महाराष्ट्रीय ब्राह्मण का सनातन से परिचय कराया, तो उस ब्राह्मण ने तुरन्त ही सनातन गोस्वामी को पूर्ण भोजन का निमन्त्रण दिया।

सनातन, तुमि ग्रावत् काशीते रहिबा ।तावत् आमार घरे भिक्षा ये करिबा ॥

८० ।। उस ब्राह्मण ने कहा, हे प्रिय सनातन, तुम जब तक काशी में रहो, तब तक मेरे ही घर पर भोजन करो।

सनातन कहे,–आमि माधुकरी करिब ।।ब्राह्मणेर घरे केने एकत्र भिक्षा लब? ।। ८१॥

सनातन ने उत्तर दिया, मैं माधुकरी की विधि अपनाऊँगा। मैं किसी ब्राह्मण के घर में पूरा भोजन क्यों स्वीकार करूं? सनातनेर वैराग्ये प्रभुर आनन्द अपार । भोट-कम्बल पाने प्रभु चाहे बारे बारे ॥

८२॥

सनातन गोस्वामी को संन्यास के सिद्धान्तों का दृढ़ता से पालन करते देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु को अपार आनन्द हुआ। किन्तु वे बारम्बार उस ऊनी कम्बल को देख रहे थे, जिसे सनातन गोस्वामी ने ओढ़ रखा था।

सनातन जानिल एइ प्रभुरे नी भाय । भोट त्याग करिबारे चिन्तिला उपाय ॥

८३॥

चूँकि श्री चैतन्य चैतन्य महाप्रभु इस कीमती ऊनी कम्बल को बारम्बार देख रहे थे, अतः सनातन गोस्वामी समझ गये कि यह महाप्रभु यो पसन्द नहीं आ रहा है, अतएव वे इसे त्यागने के उपाय पर विचार करने लगे।

एत चिन्ति' गेला गङ्गाय मध्याह्न करिते ।।एक गौड़िया कान्था धुञा दियाछे शुकाइते ॥

८४॥

| यह सोचते हुए सनातन स्नान करने गंगा नदी के किनारे गये। वहाँ उन्होंने देखा कि बंगाल के एक साधु ने अपनी गुदड़ी धोकर सूखाने के लिए फैला रखी है।

तारे कहे,---ओरे भाइ, कर उपकारे । एई भोट ला एइ काँथा देह' मोरे ॥

८५॥

तब सनातन ने उस बंगाली साधु से कहा, अरे भाई, मुझ पर एक उपकार करो। इस ऊनी कम्बल के बदले अपनी गुदड़ी मुझे दे दो।

सेइ कहे,_रहस्य कर प्रामाणिक हजा? ।।बहु-मूल्य भोट दिबा केन काँथा लञा? ॥

८६॥

साधु ने उत्तर दिया, हे महाशय, आप तो सम्मानित भद्र व्यक्ति हैं। आप मुझसे परिहासे क्यों कर रहे हैं? मेरी फटी गुदड़ी से आप अपना कीमती कंबल क्यों बदलना चाहेंगे? तेहो कहे,--रहस्य नहे, कहि सत्य-वाणी ।।भोट लह, तुमि देह' मोरे काँथा-खानि ॥

८७॥

सनातन ने कहा, मैं परिहास नहीं कर रहा हूँ; मैं सच कह रहा हूँ। कृपया अपनी फटी गुदड़ी के बदले यह कम्बल ले लें।

एत बलि' काँथा लइल, भोट ताँरे दिया ।गोसाजिर ठाडि आइला काँथा गले दिया ॥

८८॥

। यह कहकर सनातन गोस्वामी ने कम्बल को गुदड़ी से बदल लिया। फिर वे अपने कन्धे में वह गुदड़ी डाले श्री चैतन्य महाप्रभु के पास लौट आये।

प्रभु कहे,--‘तोमार भोट-कम्बल कोथा गेल?'। प्रभु-पदे सब कथा गोसात्रि कहिले ॥

८९॥

जब सनातन गोस्वामी लौटे तो महाप्रभु ने पूछा, तुम्हारा ऊनी कम्बल कहाँ है? तब सनातन ने महाप्रभु से सारी कहानी कह सुनाई।

प्रभु कहे,–इहा आमि करियाछि विचार । विषय-रोग खण्डाइल कृष्ण ग्रे तोमार ॥

९०॥

से केने राखिबे तोमार शेष विषय-भोग?।। रोग खण्डि' सद्-वैद्य ना राखे शेष रोग ॥

९१॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैं पहले ही इस विषय पर विचार | कर चुका हूँ। चूँकि भगवान् कृष्ण अत्यन्त दयालु हैं, अतएव उन्होंने भौतिक वस्तुओं के प्रति तुम्हारी आसक्ति को खण्डित कर दिया है। भला कृष्ण तुम्हें भौतिक आसक्ति का अन्तिम चिह्न भी क्यों रखने देते? रोग को नष्ट करने के बाद अच्छा वैद्य रोग के किसी भाग को बचा रहने नहीं देता।

तिन मुद्रार भोट गाय, माधुकरी ग्रास ।धर्म-हानि हय, लोक करे उपहास ॥

९२ ॥

माधुकरी का अभ्यास तथा बहुमूल्य कम्बल ओढ़ना पारस्परिक विरोधी हैं। ऐसा करने से मनुष्य अपनी आध्यात्मिक शक्ति खो देता है और वह हँसी का पात्र बन जाता है।

गोसाञि कहे, ये खण्डिल कुविषय-भोग ।। ताँर इच्छाय गेल मोर शेष विषय-रोग ॥

९३॥

सनातन गोस्वामी ने उत्तर दिया, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने मुझे इस भौतिक संसार के पापमय जीवन से बचा लिया है। उनकी इच्छानुसार भौतिक आकर्षण का मेरा अन्तिम चिह्न भी अब चला गया है।

प्रसन्न हो प्रभु ताँरे कृपा कैल ।ताँर कृपाय प्रश्न करिते ताँर शक्ति हैल ॥

९४॥

सनातन गोस्वामी से प्रसन्न होकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें अपनी अहैतुकी कृपा प्रदान की। भगवान् की कृपा से सनातन गोस्वामी ने उनसे प्रश्न करने की आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त की।

पूर्वे ट्रैछे राय-पाशे प्रभु प्रश्न कैला ।। ताँर शक्त्ये रामानन्द ताँर उत्तर दिला ॥

९५॥

इहाँ प्रभुर शक्त्ये प्रश्न करे सनातन ।आपने महाप्रभु करे तत्त्व'-निरूपण ॥

९६ ॥

इसके पूर्व श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय से आध्यात्मिक प्रश्न पूछे थे, जिनका रामानन्द राय ने महाप्रभु की अहैतुकी कृपा से सही-सही उत्तर दिया था। अब श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से सनातन गोस्वामी महाप्रभु से प्रश्न पूछ रहे थे और स्वयं महाप्रभु ने सत्य का प्रतिपादन किया।

कृष्ण-स्वरूप-माधुर्यैश्वर्य-भक्ति-रसाश्रयम् ।तत्त्वं सनातनायेशः कृपयोपदिदेश सः ॥

९७॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं सनातन गोस्वामी को भगवान् कृष्ण के वास्तविक स्वरूप के सम्बन्ध में बताया। उन्होंने भगवान् के माधुर्य प्रेम, उनके निजी ऐश्वर्य तथा भक्ति-रस के विषय में भी बतलाया। महाप्रभु ने ये सारे तत्त्व अपनी अहैतुकी कृपावश सनातन गोस्वामी को बतलाये।

तबे सनातन प्रभुर चरणे धरिया ।। दैन्य विनति करे दन्ते तृण लबा ॥

९८॥

अपने मुँह में एक तिनका रखकर तथा शीश झुकाकर सनातन गोस्वामी ने महाप्रभु के चरणकमल पकड़ लिए और विनीत होकर इस प्रकार कहा।

नीच जाति, नीच-सङ्गी, पतित अधम ।।कुविषय-कूपे पड़ि' गोडाइनु जनमः ॥

९९ ॥

मैं निम्न परिवार में जन्मा था और मेरे संगी भी निम्नवर्ग के लोग हैं। मैं स्वयं पतित और अधम हूँ। निस्सन्देह, मैंने अपना सारा जीवन पापमय भौतिकता के कुएँ में गिरकर बिताया है।

आपनार हिताहित किछुइ ना जानि! ।। ग्राम्य-व्यवहारे पण्डित, ताइ सत्य मानि ॥

१०० ॥

मैं नहीं जानता कि मेरे लिए क्या लाभप्रद है और क्या हानिप्रद है। फिर भी सामान्य व्यवहार में लोग मुझे विद्वान पंडित मानते हैं और मैं भी अपने आपको ऐसा ही सोचता हूँ।

कृपा करि' यदि मोरे करियाछ उद्धार । आपन-कृपाते कह 'कर्तव्य' आमार ॥

१०१॥

आपने अपनी अहैतुकी कृपा द्वारा भौतिकतावादी मार्ग से मेरा उद्धार कर दिया है। अब उसी अहैतुकी कृपा से आप मुझे मेरे कर्तव्य के विषय में बतलायें।

‘के आमि', 'केने आमाय जारे ताप-त्रय' ।। इहा नाहि जानि–'केमने हित हय' ॥

१०२॥

मैं कौन हूँ? तीनों ताप मुझे निरन्तर कष्ट क्यों देते हैं? यदि मैं यह नहीं जानता, तो फिर मैं किस प्रकार लाभान्वित हो सकता हूँ? ‘साध्य'-‘साधन'-तत्त्व पुछिते ना जानि ।। कृपा करि' सब तत्त्व कह त' आपनि ॥

१०३ ॥

वास्तविकता तो यह है कि मैं नहीं जानता कि जीवन के लक्ष्य तथा उसे प्राप्त करने की विधि के विषय में किस तरह पूछू। आप मुझ पर कृपा करके इन तत्त्वों को मुझे बतलायें।

प्रभु कहे,---कृष्ण-कृपा तोमाते पूर्ण हय ।सब तत्त्व जान, तोमार नाहि ताप-त्रय ॥

१०४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, तुम पर भगवान् कृष्ण की पूरी कृपा है, जिसके कारण तुम्हें ये सारी बातें ज्ञात हैं। तुम्हारे लिए तीनों तापों का अस्तित्व नहीं है।

कृष्ण-शक्ति धर तुमि, जान तत्त्व-भाव ।जानि' दाढ्य लागि' पुछे,—साधुर स्वभाव ॥

१०५॥

चूँकि तुम्हें कृष्ण की शक्ति प्राप्त है, अतएव तुम इन बातों को जानते हो। किन्तु प्रश्न करना तो साधु का स्वभाव है। यद्यपि साधु इनबातों को जानता है, किन्तु अपने में दृढ़ता लाने के लिए वह प्रश्न करता हैं।

अचिरादेव सर्वार्थः सिध्यत्येषामभीप्सितः ।।सद्धर्मस्यावबोधाय येषां निर्बन्धिनी मतिः ॥

१०६ ॥

जो लोग अपनी आध्यात्मिक चेतना जगाने के लिए उत्सुक हैं, जिन लोगों के पास अविचल बुद्धि है और जो विचलित नहीं होते, वे अवश्य ही अति शीघ्र जीवन का इच्छित लक्ष्य प्राप्त करते हैं।

ग्रोग्य-पात्र हओ तुमि भक्ति प्रवर्ताइते ।क्रमे सब तत्त्व शुन, कहिये तोमाते ॥

१०७॥

तुम भक्ति सम्प्रदाय का प्रसार करने के लिए योग्य हो। अतएव एक-एक करके मुझसे सारे तत्त्वों के विषय में सुनो। मैं तुम्हें उनके बारे में बतलाऊँगा।

झालीतिक कृत्र डिन-बेकद्र ‘ङि' इग्न ॥

७०।। जीवेर 'स्वरूप' हय—कृष्णेर 'नित्य-दास' । कृष्णेर 'तटस्था-शक्ति' ‘भेदाभेद-प्रकाश' ॥

१०८॥

सूर्याश-किरण, शैछे अग्नि-ज्वाला-चय । स्वाभाविक कृष्णेर तिन-प्रकार 'शक्ति' हय ॥

१०९॥

कृष्ण का सनातन सेवक होना जीव की वैधानिक स्थिति है, क्योंकि जीव कृष्ण की तटस्था शक्ति है और वह भगवान् से एक ही समय उसी तरह अभिन्न और भिन्न है, जिस तरह सूर्य-प्रकाश या अग्नि का एक कण। कृष्ण की शक्ति के तीन प्रकार हैं।

एक-देश-स्थितस्याग्नेन्र्योत्स्ना विस्तारिणी ग्रथा ।परस्य ब्रह्मणः शक्तिस्तथेदमखिलं जगत् ॥

११० ॥

जिस तरह एक स्थान पर रखी अग्नि का प्रकाश सर्वत्र फैलता है, उसी तरह परब्रह्म अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शक्तियाँ इस ब्रह्माण्ड-भर में फैली हुई हैं।'

कृष्णेर स्वाभाविक तिन-शक्ति-परिणति ।चिच्छक्ति, जीव-शक्ति, आर माया-शक्ति ॥

१११॥

भगवान् कृष्ण के स्वभावतः तीन शक्ति-रूपान्तर हैं। इनके नाम हैं-आध्यात्मिक शक्ति, जीव शक्ति तथा माया शक्ति।

विष्णु-शक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथा परा ।।अविद्या-कर्म-संज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥

११२॥

मूल रूप से कृष्ण की शक्ति आध्यात्मिक है और जीव शक्ति भी आध्यात्मिक है। किन्तु एक शक्ति और भी है, जिसे माया कहते हैं, जो सकाम कर्मों से बनी होती है। यही भगवान् की तीसरी शक्ति है।'

शक्तयः सर्व-भावानामचिन्त्य-ज्ञान-गोचराः यतोऽतो ब्रह्मणस्तास्तु सर्गाद्या भाव-शक्तयः ।।भवन्ति तपतां श्रेष्ठ पावकस्य ग्रथोष्णता ॥

११३॥

सारी सृजनात्मक शक्तियाँ परम अद्वय सत्य में विद्यमान रहती हैं। सामान्य व्यक्ति के लिये यह अचिन्त्य होती है। ये अचिन्त्य शक्तियाँ सृजन, पालन तथा संहार की विधि में कार्य करती हैं। हे श्रेष्ठ तपस्वी, जिस तरह अग्नि में दो शक्तियाँ-ऊष्मा तथा प्रकाश-होती हैं, उसी तरह यह अचिन्त्य शक्तियाँ परम सत्य के स्वाभाविक गुण हैं।'

ग्रया क्षेत्र-ज्ञ-शक्तिः सा वेष्टिता नृप सर्व-गा ।।संसार-तापानखिलानवाप्नोत्यत्र सन्ततान् ।। ११४॥

हे राजन, क्षेत्रज्ञ शक्ति तो जीव है। यद्यपि उसे भौतिक जगत् अथवा आध्यात्मिक जगत् में रहने की सुविधा प्राप्त है, किन्तु वह भौतिक अस्तित्व के तीन तापों को भोगता है, क्योंकि उसे अविद्या शक्ति प्रभावित करती रहती है, जो उसकी वैधानिक स्थिति को आच्छादित कर देती है।

तया तिरोहितत्वाच्च शक्तिः क्षेत्र-ज्ञ-संज्ञिता । सर्व-भूतेषु भू-पाल तारतम्येन वर्तते ॥

११५॥

अविद्या के प्रभाव से आच्छादित यह जीव विभिन्न भौतिक स्थिति में विविध रूपों में विद्यमान रहता है। हे राजा, इस तरह वह कम या अधिक मात्रा में भौतिक शक्ति के प्रभाव से मुक्त होता रहता है।

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि में पराम् ।। जीव-भूतां महा-बाहो ग्रयेदं धाते जगत् ॥

११६ ॥

हे महाबाहु अर्जुन, इस अपरा शक्ति के अतिरिक्त मेरी एक परा शक्ति भी है, जो जीवों से बनी है, जो कि नि:कृष्ट भौतिक शक्ति के स्रोतों का शोषण कर रहे हैं।

कृष्ण भुलि' सेई जीव अनादि-बहिर्मुख । अतएव माया तारे देय संसार-दुःख ॥

११७॥

जीव अनन्त काल से कृष्ण को भूलकर बाह्य रूप द्वारा आकृष्ट होता रहा है, अतः माया उसे इस भौतिक संसार में सभी प्रकार के दुःख देती रहती है।

कभु स्वर्गे उठाय, कभु नरके डुबाय ।।दण्ड्य-जने राजा ग्रेन नदीते चुबाय ॥

११८॥

भौतिक अवस्था में जीव कभी उच्चतर ग्रह-मण्डलों में तथा भौतिक समृद्धि तक ऊपर उठा दिया जाता है, तो कभी नरक में डुबो दिया जाता है। उसकी अवस्था ठीक उस अपराधी जैसी है, जिसे राजा पानी में बारम्बार डुबोये और निकाले जाने का दण्ड देता है।

भयं द्वितीयाभिनिवेशतः स्याद्ईशादपेतस्य विपर्ययोऽस्मृतिः । तन्माययातो बुध आभजेत्तं | भक्त्यैकयेशं गुरु-देवतात्मा ॥

११९॥

जब जीव कृष्ण से भिन्न ऐसी भौतिक शक्ति द्वारा आकृष्ट होता है, तब वह भय द्वारा ग्रस्त हो जाता है। भौतिक शक्ति द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से अलग होने के कारण जीवन के प्रति उनकी दृष्टि बदल जाती है। दूसरे शब्दों में, वह कृष्ण का नित्य दास होने के बदले कृष्ण का प्रतियोगी बन जाता है। इसे विपर्ययोऽस्मृतिः कहते हैं। इस भूल को निरस्त करने के लिए वास्तव में विद्वान तथा उन्नत व्यक्ति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा अपने गुरु, आराध्य देवता तथा जीवन के स्रोत के रूप में करता है। इस तरह वह अनन्य भक्ति की विधि से भगवान् की पूजा करता है।'

साधु-शास्त्र-कृपाय यदि कृष्णोन्मुख हय ।सेइ जीव निस्तरे, माया ताहारे छाड़ये ॥

१२०॥

यदि कोई बद्धजीव किसी ऐसे साधु पुरुष की कृपा सेकृष्णभावनाभावित हो जाता है, जो उसे शास्त्रों का उपदेश देता रहता है। और उसे कृष्णभावनाभावित होने में सहायता देता है, तो वह बद्धजीव माया के पाश से मुक्त हो जाता है, क्योंकि माया उसे छोड़ देती है।

दैवी ह्येषा गुण-मयी मम माया दुरत्यया ।।मामेव ग्रे प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते ॥

१२१॥

भौतिक प्रकृति के तीन गुणों से युक्त मेरी इस दैवी शक्ति का अतिक्रमण करना कठिन है। किन्तु जिन्होंने मेरी शरण ले रखी है, वे इसे आसानी से पार कर सकते हैं।'

माया-मुग्ध जीवेर नाहि स्वतः कृष्ण-ज्ञान ।।जीवेरे कृपाय कैला कृष्ण वेद-पुराण ॥

१२२॥

बद्धजीव अपने खुद के प्रयत्न से अपनी कृष्णभावना को जाग्रत नहीं कर सकता। किन्तु भगवान् कृष्ण ने अहैतुकी कृपावश वैदिक साहित्य तथा इसके पूरक पुराणों का सृजन किया।

‘शास्त्र-गुरु-आत्म'-रूपे आपनारे जानान । ‘कृष्ण मोर प्रभु, त्राता'—जीवेर हय ज्ञान ॥

१२३॥

कृष्ण आत्मविस्मृत बद्धजीव को वैदिक ग्रन्थों, स्वरूपसिद्ध गुरु तथा परमात्मा के माध्यम से शिक्षा देते हैं। जीव इनके द्वारा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को उनके यथार्थ रूप में समझ सकता है और यह समझ सकता है कि भगवान् कृष्ण उसके सनातन स्वामी तथा माया के पाश से उद्धार करने वाले हैं। इस तरह वह अपने बद्ध जीवन का वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सकता है और मुक्ति प्राप्त करने का उपाय जान सकता है।

वेद-शास्त्र कहे-‘सम्बन्ध', 'अभिधेय', 'प्रयोजन' ।‘कृष्ण' प्राप्य सम्बन्ध, ‘भक्ति' प्राप्त्येर साधन ॥

१२४॥

वैदिक ग्रन्थ कृष्ण के साथ जीव के सनातन सम्बन्ध के विषय में जानकारी देते हैं। यही सम्बन्ध कहलाता है। जीव द्वारा इस सम्बन्ध की । जानकारी तथा तदनुसार कर्म करना अभिधेय कहलाता है। भगवद्धाम लौट जाना जीवन का चरम लक्ष्य है, जिसे प्रयोजन कहते हैं।

अभिधेय-नाम 'भक्ति', 'प्रेम'-प्रयोजन । पुरुषार्थ-शिरोमणि प्रेम महा-धन ॥

१२५॥

भक्ति अथवा भगवान् की तुष्टि के लिए इन्द्रियों से काम करना अभिधेय कहलाता है, क्योंकि इससे मनुष्य का मूल भगवत्प्रेम विकसित हो सकता है, जो जीवन का लक्ष्य है। यह लक्ष्य जीव का सर्वोच्च हित है और सबसे बड़ा धन है। इस तरह भगवान् के प्रति दिव्य प्रेमाभक्ति प्राप्त होती है।

कृष्ण-माधुर्य-सेवानन्द-प्राप्तिर कारण ।कृष्ण-सेवा करे, आर कृष्ण-रस-आस्वादन ॥

१२६॥

जब किसी को कृष्ण के साथ घनिष्ठ सम्बन्ध होने का दिव्य आनन्द प्राप्त हो जाता है, तो वह उनकी सेवा करता है और कृष्णभावनामृत-रस का आस्वादन करता है।

इहाते दृष्टान्त-—भैछे दरिद्रेर घरे ।'सर्वज्ञ' आसि' दुःख देखि पुछये ताहारे ॥

१२७॥

निम्नलिखित दृष्टान्त प्रस्तुत किया जा सकता है। एक बार एक निर्धन व्यक्ति के घर एक विद्वान ज्योतिषी आया और उसकी दुःखी दशा देखकर उसने पूछा।

‘तुमि केने दुःखी, तोमार आछे पितृ-धन ।। तोमारे ना कहिल, अन्यत्र छाड़िल जीवन ॥

१२८॥

ज्योतिषी ने पूछा, 'तुम दुःखी क्यों हो? तुम्हारा पिता अत्यन्त धनवान था, किन्तु अन्यत्र मरने के कारण उसने अपनी सम्पत्ति के बारे में तुम्हें नहीं बताया।'

सर्वज्ञेर वाक्ये करे धनेर उद्देशे । ऐछे वेद-पुराण जीवे 'कृष्ण' उपदेशे ॥

१२९॥

जिस तरह सर्वज्ञ ज्योतिषी के शब्दों से निर्धन व्यक्ति के खजाने का पता चला, उसी तरह जब कोई यह जिज्ञासा करता है कि वह दुःखी अवस्था में क्यों है, तो वैदिक ग्रन्थ उसे कृष्णभावनामृत के विषय में उपदेश देते हैं।

सर्वज्ञेर वाक्ये मूल-धन अनुबन्ध ।सर्व-शास्त्रे उपदेशे, 'श्री-कृष्ण'–सम्बन्ध ॥

१३०॥

ज्योतिषी के शब्दों से उस खजाने से निर्धन व्यक्ति का सम्बन्ध स्थापित हुआ। उसी तरह वैदिक साहित्य हमें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण के साथ अपने वास्तविक सम्बन्ध के विषय में उपदेश देता है।

‘बापेर धन आछे' ज्ञाने धन नाहि पाय ।तबे सर्वज्ञ कहे तारे प्राप्तिर उपाय ॥

१३१॥

वह निर्धन व्यक्ति अपने पिता के धन के प्रति आश्वस्त होकर भी उसे केवल ऐसे ज्ञान के बल पर प्राप्त नहीं कर सकता था। इसीलिए ज्योतिषी को वह साधन बताना पड़ा, जिससे वह उस खजाने को वास्तव में पा सके।

'एइ स्थाने आछे धन'-यदि दक्षिणे खुदिबे ।।‘भीमरुल-बरुली' उठिबे, धन ना पाइबे ॥

१३२॥

ज्योतिषी ने कहा, 'खजाना इस स्थान में है, किन्तु यदि तुम दक्षिण दिशा में खोदोगे, तो बर्र तथा मधुमक्खियाँ निकलेंगी और तुम अपना खजाना नहीं पा सकोगे।

‘पश्चिमे' खुदिबे, ताहा 'ग्रक्ष' एक हय ।।से विघ्न करिबे,–धने हात ना पड़य ॥

१३३॥

यदि तुम पश्चिम दिशा में खोदोगे, तो वहाँ एक प्रेत है। वह ऐसा विघ्न उत्पन्न करेगा कि तुम उस खजाने को हाथ भी नहीं लगा सकोगे।

‘उत्तरे' खुदिले आछे कृष्ण 'अजगरे ।धन नाहि पाबे, खुदिते गिलिबे सबारे ॥

१३४॥

यदि तुम उत्तर दिशा में खोदोगे, तो वहाँ एक विशाल काला साँप है। यदि तुमने खजाना खोदने का प्रयास किया, तो वह तुम्हें निगल जायेगा।

पूर्व-दिके ताते माटी अल्प खुदिते । धनेर झारि पड़िबेक तोमार हातेते ॥

१३५ ॥

किन्तु यदि तुम पूर्व की ओर थोड़ी-सी भी मिट्टी खोदोगे, तो तुरन्त ही खजाने का पात्र तुम्हारे हाथों में आ जायेगा।

ऐछे शास्त्र कहे,--कर्म, ज्ञान, योग त्यजि' ।‘भक्त्ये' कृष्ण वश हय, भक्त्ये ताँरे भजि ॥

१३६॥

प्रामाणिक शास्त्रों का निर्णय है कि मनुष्य को कर्म, ज्ञान तथा योग का परित्याग करके भक्ति को ग्रहण करना चाहिए, जिससे कृष्ण पूर्णतया तुष्ट हो सकें।

न साधयति मां ग्रोगो न साङ्ख्यं धर्म उद्धव ।। न स्वाध्यायस्तपस्त्यागो ग्रथा भक्तिर्ममोर्जिता ॥

१३७॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण ने कहा : ‘हे उद्धव, न तो अष्टांग योग से, न निर्विशेष अद्वैतवाद से, न परम सत्य के विश्लेषणात्मक अध्ययन से, न वेदों के अध्ययन से, न तपस्या से, न दान से, न संन्यास ग्रहण करने से कोई व्यक्ति मुझे उतना ही तुष्ट कर सकता है, जितना कि वह मेरी अनन्य भक्ति करके कर सकता है।

भक्त्याहमेकया ग्राह्यः श्रद्धयात्मा प्रियः सताम् ।।भक्तिः पुनाति मन्निष्ठा श्व-पाकानपि सम्भवात् ॥

१३८॥

भक्तों तथा साधुओं को अत्यन्त प्रिय होने के कारण मुझे अविचल श्रद्धा तथा भक्ति द्वारा प्राप्त किया जाता है। यह भक्तियोग, जो मेरे प्रति अनुरक्ति को क्रमशः बढ़ाता है, चंडाल तक को शुद्ध करने वाला है। अर्थात् भक्तियोग के माध्यम से हर व्यक्ति आध्यात्मिक पद तक ऊपर उठ सकता है।'

अतएव भक्ति'-कृष्ण-प्राप्त्येर उपाय।‘अभिधेय' बलि' तारे सर्व-शास्त्रे गाय ॥

१३९॥

निष्कर्ष यह है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तक पहुँचने का एकमात्र उपाय भक्ति है। इसीलिए इस विधि को अभिधेय कहते हैं। यही सभी प्रामाणिक शास्त्रों का निर्णय है।

धन पाइले त्रैछे सुख-भोग फल पाय ।सुख-भोग हैते दुःख आपनि पलाय ॥

१४०॥

जब मनुष्य सचमुच धनी बन जाता है, तब वह स्वभावतः सारे सुखों का भोग करने लगता है। जब वह सुखी मुद्रा में होता है, तो सारी दु:खद दशाएँ स्वतः दूर हो जाती हैं। इसके लिए किसी बाह्य प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती।

तैछे भक्ति-फले कृष्णे प्रेम उपजय । प्रेमे कृष्णास्वाद हैले भव नाश पाय ॥

१४१॥

इसी तरह भक्ति के फलस्वरूप मनुष्य का सुप्त कृष्ण-प्रेम जाग्रत हो उठता है। जब मनुष्य भगवान् कृष्ण की संगति का आस्वादन कर सकने के योग्य हो जाता है, तब यह भौतिक संसार, जन्म तथा मृत्यु का चक्र, समाप्त हो जाता है।

दारिद्रय़-नाश, भव-क्षय,—प्रेमेर 'फल' नय ।।प्रेम-सुख-भोग–मुख्य प्रयोजन हय ॥

१४२॥

भगवत्प्रेम का लक्ष्य न तो भौतिक दृष्टि से धनी बनना है, न ही भवबन्धन से मुक्त होना है। वास्तविक लक्ष्य तो भगवान् की भक्तिमय सेवा में स्थित होकर दिव्य आनन्द भोगना है।

वेद-शास्त्रे कहे सम्बन्ध, अभिधेय, प्रयोजन ।। कृष्ण, कृष्ण-भक्ति, प्रेम,---तिन महा-धन ॥

१४३॥

वैदिक ग्रन्थों में कृष्ण आकर्षण के केन्द्रबिन्दु हैं और उनकी सेवा करना हमारा कर्म है। हमारे जीवन का चरम लक्ष्य कृष्ण-प्रेम प्राप्त करना वही है। अतएव कृष्ण, कृष्ण की सेवा तथा कृष्ण-प्रेम-ये जीवन के तीन महाधन हैं।

वेदादि सकल शास्त्रे कृष्ण–मुख्य सम्बन्ध । ताँर ज्ञाने आनुषङ्गे ग्राय माया-बन्ध ॥

१४४॥

वेद इत्यादि सारे प्रामाणिक शास्त्रों के आकर्षण के केन्द्रीय बिन्दु कृष्ण हैं। जब कृष्ण विषयक पूर्ण ज्ञान की अनुभूति हो जाती है, तो माया का बन्धन स्वतः टूट जाता है।

व्यामोहाय चराचरस्य जगतस्ते ते पुराणागमास्तां तामेव हि देवतां परमिकां जल्पन्तु कल्पावधि । सिद्धान्ते पुनरेक एव भगवान् विष्णुः समस्तागर्मव्यापारेषु विवेचन-व्यतिकरं नीतेषु निश्चीयते ॥

१४५ ॥

वैदिक शास्त्र तथा पुराण अनेक प्रकार के हैं। उनमें से प्रत्येक में विशेष देवताओं का वर्णन प्रमुख देवताओं के रूप में पाया जाता है। यह समस्त चर तथा अचर प्राणियों में मोह उत्पन्न करने के लिए है। उन्हें निरन्तर ऐसी ही कल्पनाओं में लगे रहने दो। किन्तु जब इन सारे वैदिक शास्त्रों का सामूहिक विश्लेषण किया जाता है, तब निष्कर्ष यही निकलता है कि भगवान् विष्णु ही एकमात्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।'

ख्य-गौण-वृत्ति, किंवा अन्वय-व्यतिरेके ।। वेदेर प्रतिज्ञा केवल कहये कृष्णके ॥

१४६॥

जब कोई व्यक्ति व्याख्या द्वारा, अथवा शाब्दिक अर्थ के द्वारा वैदिक शास्त्रों को स्वीकार करता है, तब वैदिक ज्ञान की अन्तिम घोषणा प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से भगवान् कृष्ण को ही इंगित करती है।

किं विधत्ते किमाचष्टे किमनूद्य विकल्पयेत्इत्यस्या हृदयं लोके नान्यो मद्वेद कश्चन मां विधत्तेऽभिधत्ते मां विकल्प्यापोह्यते ह्यहम्।।४७।।एतावान्सर्व-वेदार्थः शब्द आस्थाय मां भिदाम्माया-मात्रमनूद्यान्ते प्रतिषिध्य प्रसीदति ।।४८।। भगवान् कृष्ण ने कहा : ‘सारे वैदिक शास्त्रों का प्रयोजन क्या है? उनका लक्ष्य किस पर केन्द्रित होता है? सारे चिन्तन का लक्ष्य कौन है? इन बातों को मेरे अतिरिक्त कोई नहीं जानता। अब तुम यह जान लो कि ये सारे कार्य मेरा ही वर्णन करने के लिए एवं मुझे प्राप्त करने के लिए हैं। वैदिक साहित्य का उद्देश्य विभिन्न मानसिक चिन्तनों द्वारा मुझे जानना है, चाहे वह अप्रत्यक्ष ज्ञान हो या शाब्दिक अर्थ द्वारा हो। हर व्यक्ति मेरे विषय में तर्क करता है। मुझमें और माया में अन्तर करना यही सारे वैदिक ग्रन्थों का सार है। मनुष्य माया पर विचार करने पर मुझे समझ पाता है। इस तरह वह वेदों के विषय में तर्क करने से मुक्त हो जाता है और अन्तिम निष्कर्ष के रूप में मेरे पास आता है और तब तुष्ट होता है।'

कृष्णेर स्वरूप-अनन्त, वैभव–अपार । चिच्छक्ति, माया-शक्ति, जीव-शक्ति आर ॥

१४९॥

कृष्ण का दिव्य स्वरूप अनन्त है और उनका ऐश्वर्य अपार है। वे अन्तरंगा, बहिरंगा तथा तटस्था शक्तियों के स्वामी हैं।

वैकुण्ठ, ब्रह्माण्ड-गण-शक्ति-कार्य हय ।।स्वरूप-शक्ति शक्ति-कार कृष्ण समाश्रय ।। १५०॥

भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही जगत् कृष्ण की क्रमशः बहिरंगा तथा अन्तरंगा शक्तियों के रूपान्तर हैं। अतएव भौतिक तथा आध्यात्मिक सृष्टियों के मूल स्रोत कृष्ण ही हैं।

दशमे दशमं लक्ष्यमाश्रिताश्रय-विग्रहम् ।।श्री कृष्णाख्यं परं धाम जगद्धाम नमामि तत् ॥

१५१॥

श्रीमद्भागवत का दसवाँ स्कन्ध दसवें लक्ष्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को बतलाने वाला है, जो समस्त शरणागतों के आश्रय हैं। वे श्रीकृष्ण नाम से विख्यात हैं और समस्त ब्रह्माण्डों के परम स्रोत हैं। मैं उन्हें सादर नमस्कार करता हूँ।

कृष्णेर स्वरूप-विचार शुन, सनातन । अद्वय-ज्ञान-तत्त्व, व्रजे व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

१५२॥

हे सनातन, अब मुझसे भगवान् कृष्ण के सनातन स्वरूप के विषय में सुनो। वे द्वैत भाव से रहित परम अद्वय सत्य हैं, किन्तु वे वृन्दावन में नन्द महाराज के पुत्र रूप में रहते हैं।

सर्व-आदि, सर्व-अंशी, किशोर-शेखर । चिदानन्द-देह, सर्वाश्रय, सर्वेश्वर ॥

१५३। कृष्ण प्रत्येक वस्तु के आदि स्रोत हैं और हर वस्तु के सर्वाश हैं। वे सर्वोत्कृष्ट किशोर रूप में प्रकट होते हैं और उनका सारा शरीर आध्यात्मिक आनन्द से बना हुआ है। वे हर वस्तु के आश्रय तथा हर एक के स्वामी हैं।

ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द-विग्रहः ।। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्व-कारण-कारणम् ॥

१५४॥

गोविन्द नाम से विख्यात कृष्ण परम नियन्ता हैं। उनका शरीर सनातन, आनन्दमय तथा आध्यात्मिक है। वे सबके उद्गम हैं। उनका अन्य कोई उद्गम नहीं है, क्योंकि वे समस्त कारणों के मुख्य कारण हैं।'

स्वयं भगवान् कृष्ण, ‘गोविन्द' पर नाम ।सर्वैश्वर्य पूर्ण ग्राँर गोलोक—नित्य-धाम ॥

१५५ ॥

आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तो श्रीकृष्ण हैं। उनका मूल नाम गोविन्द है। वे समस्त ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं और उनका सनातन धाम गोलोक वृन्दावन कहलाता है।

एते चांश-कलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम् ।इन्द्रारि-व्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे ॥

१५६॥

ईश्वर के ये सारे अवतार पुरुष-अवतार के या तो पूर्ण अंश हैं यापूर्ण अंश के अंश हैं। किन्तु कृष्ण स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। जब संसार इन्द्र के शत्रुओं द्वारा पीड़ित होता है, तब प्रत्येक युग में वे अपने इन विभिन्न रूपों द्वारा संसार की रक्षा करते हैं।'

ज्ञान, योग, भक्ति,—तिन साधनेर वशे ।।ब्रह्म, आत्मा, भगवान् त्रिविध प्रकाशे ॥

१५७॥

परम अद्वय सत्य को समझने की तीन प्रकार की आध्यात्मिक विधियाँ हैं-ज्ञान, योग तथा भक्ति परम सत्य इन तीनों विधियों से क्रमशः ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् रूप में प्रकट होते हैं।

वदन्ति तत्तत्त्व-विदस्तत्त्वं यज्ञानमद्वयम् ।ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥

१५८ ॥

परम सत्य को जानने वाले विद्वान अध्यात्मवेत्ता इस अद्वय वस्तु को ब्रह्म, परमात्मा या भगवान् कहते हैं।'

ब्रह्म–अङ्ग-कान्ति ताँर, निर्विशेष प्रकाशे । सूर्य ग्रेन चर्म-चक्षे ज्योतिर्मय भासे ॥

१५९॥

निर्विशेष ब्रह्मज्योति की अभिव्यक्ति, जिसमें विविधता नहीं होती, कृष्ण के शारीरिक तेज की किरणें हैं। यह सूर्य के समान है। जब सूर्य को सामान्य आँखों से देखा जाता है, तो इसमें एकमात्र प्रकाश ही दिखता हैं।

ग्रस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्ड-कोटिकोटिष्वशेष-वसुधादि-विभूति-भिन्नम् ।। तद् ब्रह्म निष्कलमनन्तमशेष-भूतंगोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि ॥

१६० ॥

मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ, जो महान् शक्ति से सम्पन्न हैं। उनके दिव्य स्वरूप का देदीप्यमान तेज निर्विशेष ब्रह्म है, जो परम, पूर्ण तथा असीम है और जो करोड़ों ब्रह्माण्डों में असंख्य विविध लोकों को उनके विभिन्न ऐश्वर्यों समेत प्रदर्शित करते हैं।'

परमात्मा हो, तेंहो कृष्णेर एक अंश ।। आत्मार 'आत्मा' हय कृष्ण सर्व-अवतंस ॥

१६१॥

परमात्मा उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के पूर्ण अंश हैं, जो समस्त जीवों के आदि आत्मा हैं। कृष्ण ही परमात्मा के आदि स्रोत हैं।

कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम् ।जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया ॥

१६२ ॥

तुम कृष्ण को समस्त आत्माओं (जीवों) के आदि आत्मा जानो। वे अपनी अहैतुकी कृपावश सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के लाभ हेतु सामान्य मानव के रूप में प्रकट हुए हैं। उन्होंने अपनी अन्तरंगा शक्ति के बल पर ही ऐसा किया है।'

अथ वा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन । विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥

१६३॥

किन्तु हे अर्जुन, इस विस्तृत ज्ञान की आवश्यकता ही क्या है? मैं तो अपने एक अंश से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हूँ और इसको धारण करता हूँ।

‘भक्त्ये' भगवानेर अनुभव–पूर्ण-रूप ।। एक-इ विग्रहे ताँर अनन्त स्वरूप ॥

१६४॥

एकमात्र भक्ति द्वारा मनुष्य भगवान् के उस दिव्य रूप को समझ सकता है, जो सभी प्रकार से पूर्ण है। यद्यपि उनका स्वरूप एक है, किन्तु अपनी परम इच्छा से वे इसका विस्तार असंख्य रूपों में कर सकते हैं।

स्वयं-रूप, तदेकात्म-रूप, आवेश—नाम । प्रथमेइ तिन-रूपे रहेन भगवान् ॥

१६५ ॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् तीन प्रधान रूपों में विद्यमान रहते हैंस्वयं-रूप, तदेकात्म-रूप तथा आवेश-रूप।

‘स्वयं-रूप' ‘स्वयं-प्रकाश'–दुइ रूपे स्फूर्ति ।। स्वयं-रूपे—एक 'कृष्ण' व्रजे गोप-मूर्ति ॥

१६६ ॥

भगवान् का आदि रूप ( स्वयं-रूप ) दो रूपों में प्रदर्शित होता है-स्वयं-रूप तथा स्वयं-प्रकाश। अपने आदि स्वयं-रूप में कृष्ण वृन्दावन में ग्वालबाल के रूप में देखे जाते हैं।

'प्राभव-वैभव'-रूपे द्विविध प्रकाशे ।।एक-वपु बहु रूप ग्रैछे हैल रासे ॥

१६७॥

अपने आदि रूप में कृष्ण प्राभव तथा वैभव इन दो स्वरूपों में प्रकट होते हैं। वे अपने एक आदि रूप को अनेक रूपों में विस्तार कर लेते हैं, जैसाकि उन्होंने रासलीला नृत्य के अवसर पर किया था।

महिषी-विवाहे हैल बहु-विध मूर्ति ।‘प्राभव प्रकाश'–एई शास्त्र-परसिद्धि ॥

१६८॥

जब भगवान् ने द्वारका में १६,१०८ पलियों से विवाह किया, तब उन्होंने अपने आपको अनेक रूपों में विस्तार किया। ये विस्तार तथा रासनृत्य के अवसर पर हुए विस्तार शास्त्रों के निर्देशानुसार प्राभव-प्रकाश कहलाते हैं।

सौभर्यादि-प्राय सेइ काय-व्यूह नय ।।काय-व्यूह हैले नारदेर विस्मय ना हय ॥

१६९ ॥

भगवान् कृष्ण के ये प्राभव-प्रकाश सौभरि मुनि के विस्तारों जैसे नहीं हैं। यदि ऐसा होता, तो नारद उन्हें देखकर विस्मित न हुए होते।

चित्रं बतैतदेकेन वपुषा युगपत्पृथक् ।।गृहेषु द्वि-अष्ट-साहस्रं स्त्रिय एक उदावहत् ॥

१७० ॥

यह विचित्र बात है कि अद्वय कृष्ण ने सोलह हजार रानियों से विवाह करने के लिए उन्हीं के घरों में अपना विस्तार एक जैसे सोलह हजार रूपों में कर लिया।'

सेइ वपु, सेइ आकृति पृथक् यदि भासे । भावावेश-भेदे नाम 'वैभव-प्रकाशे' ॥

१७१॥

यदि एक रूप या शरीर विभिन्न भावों के अनुसार भिन्न-भिन्न प्रकट हो, तो यह वैभव-प्रकाश कहलाता है।

अनन्त प्रकाशे कृष्णेर नाहि मूर्ति-भेद ।।आकार-वर्ण-अस्त्र-भेदे नाम-विभेद ॥

१७२॥

जब भगवान् अपना विस्तार असंख्य रूपों में करते हैं, तब इन रूपों में कोई भेद नहीं होता, किन्तु विभिन्न लक्षणों, वर्ण तथा अस्त्रों में भिन्नता के कारण उनके नाम भिन्न-भिन्न होते हैं।

अन्ये च संस्कृतात्मानो विधिनाभिहितेन ते ।ग्रजन्ति त्वन्मयास्त्वां वै बहु-मूक-मूर्तिकम् ॥

१७३ ॥

विभिन्न वैदिक शास्त्रों में इन विभिन्न रूपों की पूजा करने के विधि-विधान नियत किये गये हैं। जब मनुष्य इन विधि-विधानों से शुद्ध हो जाता है, तब वह आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा करता है। यद्यपि आप अनेक रूपों में प्रकट होते हैं, किन्तु आप एक हैं।'

वैभव-प्रकाश कृष्णेर—श्री-बलराम ।वर्ण-मात्र-भेद, सब–कृष्णेर समान ॥

१७४॥

कृष्ण के वैभव-रूप का प्रथम प्राकट्य श्री बलरामजी हैं। श्री बलराम तथा कृष्ण के शरीरों के रंग भिन्न हैं, अन्यथा बलराम सभी प्रकार से कृष्ण के समान ही हैं।

वैभव-प्रकाश प्रैछे देवकी-तनुज । द्विभुज-स्वरूप कभु, कभु हय चतुर्भुज ॥

१७५ ॥

वैभव-प्रकाश का एक उदाहरण है देवकी के पुत्र। उनके कभी दो हाथ होते हैं तो कभी चार हाथ।

ग्रे-काले द्विभुज, नाम वैभव-प्रकाश ।। चतुर्भुज हैले, नाम–प्राभव-प्रकाश ॥

१७६ ॥

जब भगवान् द्विभुज रहते हैं, तो वे वैभव-प्रकाश कहलाते हैं और जब वे चतुर्भुज होते हैं तो प्राभव-प्रकाश कहलाते हैं।

स्वयं-रूपेर गोप-वेश, गोप-अभिमान । वासुदेवेर क्षत्रिय-वेश, 'आमि–क्षत्रिय'-ज्ञान ॥

१७७॥

स्वयं-रूप ( अपने मूल रूप ) में भगवान् ग्वालबाल के वेश में रहते हैं और अपने आपको ग्वालबाल मानते हैं। जब वे वसुदेव तथा देवकी के पुत्र के रूप में प्रकट होते हैं, तब उनका वेश तथा उनकी चेतना एक क्षत्रिय अर्थात् योद्धा जैसे होते हैं।

सौन्दर्य, ऐश्वर्य, माधुर्य, वैदग्ध्य-विलास ।व्रजेन्द्र-नन्दने इहा अधिक उल्लास ॥

१७८॥

जब योद्धा-वासुदेव के सौन्दर्य, ऐश्वर्य, माधुर्य तथा बौद्धिक लीलाओं की तुलना नन्द महाराज के पुत्र ग्वालबाल कृष्ण से की जाती है, तब देखा जाता है कि कृष्ण के लक्षण अधिक सुहावने लगते हैं।

गोविन्देर माधुरी देखि' वासुदेवेर क्षोभ ।।से माधुरी आस्वादिते उपजय लोभ ॥

१७९॥

निस्सन्देह, गोविन्द की माधुरी देखकर वासुदेव में क्षोभ उत्पन्न होता है और तब उस माधुरी का आस्वादन करने के लिए उनमें दिव्य लोभ उत्पन्न होता है।

उद्गीर्णाद्भुत-माधुरी-परिमलस्याभीर-लीलस्य मेंद्वैतं हन्त समीक्षयन्मुहुरसौ चित्रीयते चारणः । चेतः केलि-कुतूहलोत्तरलितं सत्यं सखे मामकं ।यस्य प्रेक्ष्य स्वरूपतां व्रज-वधू-सारूप्यमन्विच्छति ॥

१८० ॥

हे मित्र, यह अभिनेता मेरे द्वितीय रूप जैसा लगता है। यह चित्र की भाँति आश्चर्यजनक आकर्षक माधुरी तथा सुगन्धि से ओतप्रोत ग्वालबाल की तरह मेरी लीलाएँ प्रदर्शित करता है, जो व्रजबालाओं को अत्यन्त प्रिय हैं। जब मैं इस प्रदर्शन को देखता हूँ, तो मेरा मन उत्तेजित हो उठता है। ऐसी लीलाओं के लिए मेरी भी इच्छा होने लगती है और इच्छा होती है। कि मुझे भी व्रजबालाओं जैसा ही रूप प्राप्त हो जाए।

मथुराय ग्रैछे गन्धर्व-नृत्य-दरशने ।।पुनः द्वारकाते ग्रैछे चित्र-विलोकने ॥

१८१॥

एक बार जब वासुदेव ने मथुरा में गन्धर्व-नृत्य देखा, तो कृष्ण के प्रति वासुदेव को आकर्षण का अनुभव हुआ। दूसरी बार द्वारका में हुआ, जब वासुदेव कृष्ण का चित्र देखकर चकित हो गये थे।

अपरिकलित-पूर्वः कश्चमत्कार-कारीस्फुरतु मम गरीयानेष माधुर्य-पूरः । अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य ग्रं लुब्ध-चेताःसरभसमुपभोक्तुं कामये राधिकेव ॥

१८२॥

वह कौन है, जो मुझसे भी बढ़कर ऐसी प्रभूत माधुरी प्रकट कर रहा है, जिसका अनुभव इसके पूर्व कभी नहीं किया गया और जो सबको चकित करने वाली है? हाय! इस सौन्दर्य को देखकर मेरा मन भी मोहित हो रहा है और मैं स्वयं श्रीमती राधारानी के समान इसका आनन्द उठाने के लिए इच्छुक हूँ।'

सेइ वपु भिन्नाभासे किछु भिन्नाकार ।। भावावेशाकृति-भेदे ‘तदेकात्म' नाम ताँर ॥

१८३॥

जब वह शरीर किंचित् भिन्न रूप में प्रकट होता है और इसके स्वरूप भाव तथा रूप में किंचित् भिन्न होते हैं, तो वह तदेकात्म कहलाता है।

तदेकात्म-रूपे 'विलास', ‘स्वांश'दुइ भेद । विलास, स्वांशेर भेदे विविध विभेद ॥

१८४॥

तदेकात्म-रूप के अन्तर्गत विलास ( लीला-विस्तार) तथा स्वांश ( व्यक्तिगत विस्तार) दो भेद हैं। लीला (विलास ) तथा स्वांश के अनुसार विविध विभेद हैं।

प्राभव-वैभव-भेदे विलास-द्विधाकार । विलासेर विलास-भेद–अनन्त प्रकार ॥

१८५॥

पुनः विलास रूपों को दो श्रेणियों में बाँटा गया है-प्राभव तथा वैभव। इन रूपों के विलासों के भी अंसख्य भेद हैं।

प्राभव-विलास वासुदेव, सङ्कर्षण ।।प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, मुख्य चारि-जन ॥

१८६॥

मुख्य चतुयूँहों के नाम हैं वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध। ये प्राभव-विलास कहलाते हैं।

व्रजे गोप-भाव रामेर, पुरे क्षत्रिय-भावन ।।वर्ण-वेश-भेद, ताते ‘विलास' ताँर नाम ॥

१८७॥

| कृष्ण के आदि रूप जैसे ही रूप वाले बलराम वृन्दावन में एक ग्वालबाल हैं और वे अपने आपको द्वारका के क्षत्रिय वंश के एक सदस्य भी मानते हैं। इस तरह उनका रंग तथा वेश भिन्न है और वे कृष्ण के लीला-रूप कहलाते हैं।

वैभव-प्रकाशे आर प्राभव-विलासे ।। एक-इ मूर्ये बलदेव भाव-भेदे भासे ॥

१८८॥

श्री बलराम कृष्ण के वैभव-प्रकाश रूप हैं। वे वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध के मूल चतुयूंह में भी प्रकट होते हैं। ये भिन्न भावों वाले प्राभव-विलास विस्तार हैं।

आदि-चतुयूंह–इँहार केह नाहि सम ।अनन्त चतुयूंह-गणेर प्राकट्य-कारण ॥

१८९ ॥

चतुयूंह का प्रथम विस्तार अद्वितीय है। उनकी कोई तुलना ही नहीं है। ये चतुयूंह-रूप अनन्त चतुयूंह-रूपों के स्रोत हैं।

कृष्णेर एइ चारि प्राभव-विलास ।द्वारका-मथुरा-पुरे नित्य इँहार वास ॥

१९०॥

भगवान् कृष्ण के ये चार प्राभव-विलास रूप द्वारका तथा मथुरा में शाश्वत निवास करते हैं।

एइ चारि हैते चब्बिश मूर्ति परकाश ।अस्त्र-भेदे नाम-भेद-वैभव-विलास ॥

१९१॥

एक मूल चतुयूँह से चौबीस रूप प्रकट होते हैं। वे अपने चारों हाथों में धारण किये जाने वाले अस्त्रों कि स्थिति के अनुसार भिन्न होते हैं। वे वैभव-विलास कहलाते हैं।

पुनः कृष्ण चतुर्व्यह लञा पूर्व-रूपे ।परव्योम-मध्ये वैसे नारायण-रूपे ॥

१९२॥

भगवान् कृष्ण पुनः विस्तार करते हैं और परव्योम अर्थात् आध्यात्मिक आकाश में वे अपने मूल चतुयूंह रूपों के विस्तार के साथ अपने चतुर्भुजी नारायण रूप में पूर्णरूपेण स्थित हैं।

ताँहा हैते पुनः चतुर्व्यह-परकाश ।आवरण-रूपे चारि-दिके ग्राँर वासे ॥

१९३॥

इस तरह मूल चतुयूंह रूप पुनः द्वितीय चतुयूंह रूप में प्रकट होते हैं। इन द्वितीय चतुयूँहों के आवास चारों दिशाओं को आच्छादित करते हैं।

चारि-जनेर पुनः पृथक तिन तिन मूर्ति ।।केशवादि ग्राहा हैते विलासेर पूर्ति ॥

१९४॥

इन चतुयूँहों का पुनः तीन बार विस्तार होता है, जिनमें केशव आदि आते हैं। यह विलास-रूपों की पूर्ति है।

चक्रादि-धारण-भेदे नाम-भेद सब । वासुदेवेर मूर्ति केशव, नारायण, माधव ॥

१९५॥

चतुयूंह में से प्रत्येक रूप के तीन विस्तार होते हैं और वे अस्त्र धारण करने की स्थिति के अनुसार विभिन्न नाम वाले होते हैं। वासुदेव के विस्तार हैं केशव, नारायण तथा माधव।

सङ्कर्षणेर मूर्ति–गोविन्द, विष्णु, मधुसूदन ।। ए अन्य गोविन्द नहे व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

१९६॥

संकर्षण के विस्तार हैं गोविन्द, विष्णु तथा मधुसूदन। ये गोविन्द मूल गोविन्द से भिन्न हैं, क्योंकि ये महाराज नन्द के पुत्र नहीं हैं।

प्रद्युम्नेर मूर्ति—त्रिविक्रम, वामन, श्रीधर ।। अनिरुद्धेर मूर्ति–हृषीकेश, पद्मनाभ, दामोदर ॥

१९७॥

प्रद्युम्न के विस्तार हैं त्रिविक्रम, वामन तथा श्रीधर। इसी तरह अनिरुद्ध के विस्तार हृषीकेश, पद्मनाभ तथा दामोदर हैं।

द्वादश-मासेर देवता---ए-बार जन ।मार्गशीर्षे–केशव, पौषे–नारायण ॥

१९८॥

ये बारहों बारह महीनों के प्रधान देवता हैं। केशव अग्रहायण मास के और नारायण पौष मास के प्रधान देवता हैं।

माघेर देवता-माधव, गोविन्द–फाल्गुने ।चैत्रे विष्णु, वैशाखे–श्री-मधुसूदन ॥

१९९॥

माघ मास के प्रधान देवता माधव हैं और फाल्गुन के गोविन्द हैं। विष्णु चैत्र मास के और मधुसूदन वैशाख मास के प्रधान देवता हैं।

ज्यैष्ठे–त्रिविक्रम, आषाढ़े-वामन देवेश ।श्रावणे-श्रीधर, भाद्रे—देव हृषीकेश ॥

२००॥

ज्येष्ठ मास के प्रधान देवता त्रिविक्रम हैं, आषाढ़ के देवता वामन हैं, श्रावण मास के श्रीधर तथा भाद्र मास के हृषीकेश हैं।

आश्विने--पद्मनाभ, कार्तिके दामोदर ।‘राधा-दामोदर' अन्य व्रजेन्द्र-कोडर ॥

२०१॥

आश्विन मास के प्रधान देवता पद्मनाभ हैं और कार्तिक मास के दामोदर हैं। ये दामोदर वृन्दावन के नन्द महाराज के पुत्र राधा-दामोदर से भिन्न हैं।

द्वादश-तिलक-मन्त्र एइ द्वादश नाम ।आचमने एइ नामे स्पर्श तत्तत्स्थान ॥

२०२॥

शरीर के बारह स्थानों पर तिलक लगाते समय विष्णु के इन बारह नामों वाले मन्त्र का उच्चारण करना होता है। नित्य पूजा के बाद जल से आचमन करते समय इन नामों का उच्चारण करते हुए शरीर के प्रत्येक अंग का स्पर्श करना चाहिए।

एइ चारि-जनेर विलास-मूर्ति आर अष्ट जन । ताँ सबार नाम कहि, शुन सनातन ॥

२०३॥

वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध से आठ और विलास-रूप आते हैं। हे सनातन, मैं उनके नामों का उल्लेख करता हूँ। उन्हें सुनो।

पुरुषोत्तम, अच्युत, नृसिंह, जनार्दन । हरि, कृष्ण, अधोक्षज, उपेन्द्र,—अष्ट-जन ॥

२०४॥

ये आठ विलास ( लीला-विस्तार) हैं–पुरुषोत्तम, अच्युत, नृसिंह, जनार्दन, हरि, कृष्ण, अधोक्षज तथा उपेन्द्र।

वासुदेवेर विलास दुइ–अधोक्षज, पुरुषोत्तम । सङ्कर्षणेर विलास उपेन्द्र, अच्युत दुइ-जन ॥

२०५॥

इन आठ विस्तारों में से दो तो वासुदेव के विलास हैं। उनके नाम हैं अधोक्षज तथा पुरुषोत्तम संकर्षण के दो विलास हैं उपेन्द्र तथा अच्युत ।

प्रद्युम्नेर विलास-नृसिंह, जनार्दन ।।अनिरुद्धेर विलास–हरि, कृष्ण दुइ-जन ॥

२०६॥

| प्रद्युम्न के विलास ( लीला-विस्तार ) हैं नृसिंह तथा जनार्दन एवं अनिरुद्ध के विलास हैं हरि तथा कृष्ण।

एइ चब्बिश मूर्ति--प्राभव-विलास प्रधान ।अस्त्र-धारण-भेदे धरे भिन्न भिन्न नाम ॥

२०७॥

ये चौबीसों रूप भगवान् के मुख्य प्राभव-विलास हैं। इनके नाम हाथों में धारण किये गये अस्त्रों की स्थिति के अनुसार भिन्न-भिन्न होते हैं। इँहार मध्ये ग्राहार हय आकार-वेश-भेद ।।सेइ सेइ हय विलास-वैभव-विभेद ॥

२०८॥

इन समस्त रूपों में जो रूप वेश तथा आकार में भिन्न होते हैं, वे वैभव-विलास कहलाते हैं।

पद्मनाभ, त्रिविक्रम, नृसिंह, वामन ।हरि, कृष्ण आदि हय 'आकार' विलक्षण ॥

२०९॥

इनमें से पद्मनाभ, त्रिविक्रम, नृसिंह, वामन, हरि, कृष्ण इत्यादि के शारीरिक रूप भिन्न-भिन्न हैं।

कृष्णेर प्राभव-विलास--वासुदेवादि चारि जन ।। सेइ चारि-जनार विलास–विंशति गणन ॥

२१०॥

वासुदेव तथा अन्य तीन विस्तार भगवान् कृष्ण के प्रत्यक्ष प्राभवविलास हैं। इन चतुयूंह रूपों के बीस विलास विस्तार हैं।

इँहा-सबार पृथक् वैकुण्ठ-परव्योम-धामे । पूर्वादि अष्ट-दिके तिन तिन क्रमे ॥

२११॥

ये सारे रूप आध्यात्मिक आकाश धाम में भिन्न-भिन्न वैकुण्ठ लोकों के अधिष्ठाता हैं, जो पूर्व दिशा से क्रमशः प्रारम्भ होते हैं। आठों दिशाओं में प्रत्येक में तीन भिन्न रूप होते हैं।

यद्यपि परव्योम सबाकार नित्य-धाम । तथापि ब्रह्माण्डे कारो काँहो सन्निधान ॥

२१२॥

यद्यपि इन सबका परव्योम में सनातन निवासस्थान है, किन्तु इनमें से कुछ भौतिक ब्रह्माण्डों में स्थित हैं।

परव्योम-मध्ये नारायणेर नित्य-स्थिति। परव्योम-उपरि कृष्णलोकेर विभूति ॥

२१३॥

परव्योम में नारायण का नित्य निवासस्थान है। इस परव्योम के ऊपरी भाग में कृष्णलोक है, जो समस्त ऐश्वर्यों से परिपूर्ण है।

एक 'कृष्णलोक' हय त्रिविध-प्रकार । गोकुलाख्य, मथुराख्य, द्वारकाख्य आर ॥

२१४॥

कृष्णलोक तीन विभागों में बँटा है-गोकुल, मथुरा तथा द्वारका।

मथुराते केशवेर नित्य सन्निधान ।। नीलाचले पुरुषोत्तम जगन्नाथ' नाम ॥

२१५॥

भगवान् केशव का नित्य निवास मथुरा में है और भगवान् पुरुषोत्तम, जो जगन्नाथ नाम से विख्यात हैं, नीलाचल में नित्य निवास करते हैं।

प्रयागे माधव, मन्दारे श्री-मधुसूदन ।आनन्दारण्ये वासुदेव, पद्मनाभ जनार्दन ॥

२१६॥

प्रयाग में भगवान् बिन्दु माधव के रूप में स्थित हैं और मन्दार पर्वत में मधुसूदन रूप में। वासुदेव, पद्मनाभ तथा जनार्दन ये तीनों आनन्दारण्य में निवास करते हैं।

विष्णु-काञ्चीते विष्णु, हरि रहे, मायापुरे ।ऐछे आर नाना मूर्ति ब्रह्माण्ड-भितरे ॥

२१७॥

विष्णुकांची में भगवान् विष्णु हैं, मायापुर में भगवान् हरि हैं तथा सारे ब्रह्माण्ड में नाना प्रकार के अनेक रूप हैं।

एइ-मत ब्रह्माण्ड-मध्ये सबार 'परकाश' ।।सप्त-द्वीपे नव-खण्डे याँहार विलास ॥

२१८॥

इस ब्रह्माण्ड के भीतर भगवान् विभिन्न आध्यात्मिक स्वरूपों में स्थित हैं। ये सात द्वीपों के नव खण्डों में विद्यमान हैं। इस तरह उनकी लीलाएँ चलती रहती हैं।

सर्वत्र प्रकाश ताँर—भक्ते सुख दिते ।। जगतेर अधर्म नाशि' धर्म स्थापिते ॥

२१९॥

भगवान् अपने भक्तों को प्रसन्न करने के लिए ही सारे ब्रह्माण्डों मेंविभिन्न रूपों में स्थित हैं। इस तरह भगवान् अधर्म का विनाश करते हैं। और धर्म की स्थापना करते हैं।

इँहार मध्ये कारो हय अवतारे' गणन ।ग्रैछे विष्णु, त्रिविक्रम, नृसिंह, वामन ॥

२२०॥

इन रूपों में से कुछ को अवतार माना जाता है। उदाहरणार्थ भगवान् विष्णु, भगवान् त्रिविक्रम, भगवान् नृसिंह तथा भगवान् वामन।

अस्त्र-धृति-भेद-नाम-भेदेर कारण ।चक्रादि-धारण-भेद शुन, सनातन ॥

२२१॥

हे सनातन, अब मुझसे सुनो कि किस तरह विभिन्न विष्णु-मूर्तियाँ अपने-अपने अस्त्र यथा चक्र इत्यादि धारण करती हैं, एवं किस तरह अपने हाथों में धारण किए गये अस्त्रों के अनुसार उनके नाम पड़ते हैं।

दक्षिणाधो हस्त हैते वामाधः पर्युन्त ।।चक्रादि अस्त्र-धारण-गणनार अन्त ॥

२२२ ।। गणना करने की विधि यह है कि निचले दायें हाथ से प्रारम्भ करके क्रमशः ऊपरी दाहिने हाथ, ऊपरी बाएँ हाथ तथा निचले बाएँ हाथ तक बढ़े। भगवान् विष्णु का नाम उनके हाथों में धारण किये गये अस्त्रों के क्रम के अनुसार होता है।

सिद्धार्थ-संहिता करे चब्बिश मूर्ति गणन ।।तार मते कहि आगे चक्रादि-धारण ॥

२२३॥

सिद्धार्थ-संहिता के अनुसार भगवान् विष्णु के चौबीस रूप हैं। सर्वप्रथम मैं उसी ग्रन्थ के अनुसार चक्र से आरम्भ करके उन अस्त्रों की स्थिति का वर्णन करूंगा।

वासुदेव-गदा-शङ्ख-चक्र-पद्म-धर ।।सङ्कर्षण—गदा-शङ्ख-पद्म-चक्र-कर ॥

२२४॥

भगवान् वासुदेव अपने निचले दाहिने हाथ में गदा, ऊपरी दाएँ हाथ में शङ्ख, ऊपरी बाएँ हाथ में चक्र तथा निचले बाएँ हाथ में कमल का फूल धारण करते हैं। संकर्षण अपने निचले दाहिने हाथ में गदा, ऊपरी दाएँ हाथ में शंख, ऊपरी बाएँ हाथ में कमल का फूल तथा निचले बाएँ हाथ में चक्र धारण करते हैं।

प्रद्युम्नचक्र-शङ्ख-गदा-पद्म-धर ।अनिरुद्ध–चक्र-गदा-शङ्ख-पद्म-कर ॥

२२५ ॥

प्रद्युम्न चक्र, शंख, गदा तथा कमल धारण करते हैं और अनिरुद्ध चक्र, गदा, शंख तथा कमल धारण करते हैं।

परव्योमे वासुदेवादि निज निज अस्त्र-धर ।ताँर मत कहि, ग्रे-सब अस्त्र-कर ॥

२२६॥

परव्योम में वासुदेव आदि अंश अपने-अपने क्रम से अस्त्रों को धारण करते हैं। उनका वर्णन करने के लिए मैं सिद्धार्थ-संहिता के मत को दुहरा रहा हूँ।

श्री-केशव--पद्म-शङ्ख-चक्र-गदा-धर ।नारायण शङ्ख-पद्म-गदा-चक्र-धर ॥

२२७॥

भगवान् केशव पद्म, शंख, चक्र तथा गदा धारण करते हैं। भगवान् नारायण शंख, पद्म, गदा तथा चक्र धारण करते हैं।

श्री-माधव-गदा-चक्र-शङ्ख-पद्म-कर ।। श्री गोविन्द-चक्र-गदा-पद्म-शङ्खधर ॥

२२८॥

भगवान् माधव अपने हाथों में गदा, चक्र, शंख तथा कमल धारण करते हैं। भगवान् गोविन्द चक्र, गदा, पद्म तथा शंख धारण करते हैं।

विष्णु-मूर्ति-गदा-पद्म-शङ्ख-चक्र-कर ।मधुसूदन- चक्र-शङ्ख-पद्म-गदा-धर ॥

२२९ ।। भगवान् विष्णु अपने हाथों में गदा, पद्म, शंख तथा चक्र लिये रहते हैं। भगवान् मधुसूदन चक्र, शंख, पद्म तथा गदा धारण करते हैं।

त्रिविक्रम पद्म-गदा-चक्र-शङ्ख-कर ।श्री-वामन-शङ्ख-चक्र-गदा-पदा-धर ॥

२३० ।। भगवान् त्रिविक्रम अपने हाथों में कमल, गदा, चक्र तथा शंख लिये रहते हैं। भगवान् वामन शंख, चक्र, गदा तथा कमल धारण करते हैं।

श्रीधर-पद्म-चक्र-गदा-शङ्ख-कर ।। हृषीकेश-गदा-चक्र-पद्म-शङ्खधर ॥

२३१॥

भगवान् श्रीधर के हाथों में कमल, चक्र, गदा तथा शंख रहते हैं। भगवान् हृषीकेश अपने हाथों में गदा, चक्र, कमल तथा शंख धारण करते हैं।

पद्मनाभ-शङ्ख-पद्म-चक्र-गदा-कर । दामोदर—पद्म-चक्र-गदा-शङ्ख-धर ॥

२३२॥

भगवान् पद्मनाभ शंख, कमल, चक्र तथा गदा लिये रहते हैं। भगवान् दामोदर कमल, चक्र, गदा तथा शंख धारण करते हैं।

पुरुषोत्तम-चक्र-पद्म-शङ्ख-गदा-धर ।।श्री-अच्युत-गदा-पद्म-चक्र-शङ्खधर ॥

२३३ ।। भगवान् पुरुषोत्तम चक्र, पद्म, शंख तथा गदा धारण करते हैं। भगवान् अच्युत गदा, कमल, चक्र तथा शंख धारण करते हैं।

श्री-नृसिंह-चक्र-पद्म-गदा-शङ्खधर ।। जनार्दन–पद्म-चक्र-शङ्ख-गदा-कर ॥

२३४॥

भगवान् नृसिंह चक्र, पद्म, गदा तथा शंख धारण करते हैं। भगवान् जनार्दन अपने हाथों में कमल, चक्र, शंख तथा गदा लिये रहते हैं।

श्री-हरि-शङ्ख-चक्र-पद्म-गदा-कर । श्री कृष्ण शङ्ख-गदा-पद्म-चक्र-कर ।।२३५ ।। श्री हरि अपने हाथों में शंख, चक्र, पद्म तथा गदा लिये रहते हैं। भगवान् श्रीकृष्ण अपने हाथों में शंख, गदा, कमल तथा चक्र धारण करते हैं।

अधोक्षज–पद्म-गदा-शङ्ख-चक्र-कर।। उपेन्द्र शङ्ख-गदा-चक्र-पद्म-कर ॥

२३६ ॥

भगवान् अधोक्षज अपने हाथों में कमल, गदा, शंख तथा चक्र लिये रहते हैं। भगवान् उपेन्द्र अपने हाथों में शंख, गदा, चक्र तथा कमल धारण करते हैं।

हयशीर्ष-पञ्चरात्रे कहे षोल-जन ।। तार मते कहि एबे चक्रादि-धारण ॥

२३७॥

हयशीर्ष पंचरात्र के अनुसार सोलह पुरुष हैं। मैं अब उस मत का वर्णन करूंगा कि वे किस तरह अस्त्रों को धारण किये रहते हैं।

केशव-भेदे पद्म-शङ्ख-गदा-चक्र-धर । माधव-भेदे चक्र-गदा-शङ्ख-पद्म-कर ॥

२३८।। केशव को कमल, शंख, गदा तथा चक्र धारण किये भिन्न बतलाया जाता है और माधव को हाथों में चक्र, गदा, शंख तथा कमल धारण करने वाले अस्त्रों के अनुसार प्रस्तुत किया जाता है।

नारायण-भेदे नाना अस्त्र-भेद-धर ।इत्यादिक भेद एई सब अस्त्र-कर ॥

२३९॥

हयशीर्ष पंचरात्र के अनुसार नारायण तथा अन्यों को भी विभिन्न हाथों में धारण करने वाले अस्त्रों के अनुसार प्रस्तुत किया जाता है।

‘स्वयं भगवान्', आर 'लीला-पुरुषोत्तम' ।एइ दुइ नाम धरे व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

२४०॥

आदि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण, जो महाराज नन्द के पुत्र हैं, उनके दो नाम हैं। एक है स्वयं भगवान् तथा दूसरा है लीला पुरुषोत्तम।

पुरीर आवरण-रूपे पुरीर नव-देशे ।।नव-व्यूह-रूपे नव-मूर्ति परकाशे ॥

२४१॥

भगवान् कृष्ण द्वारका पुरी को उसके रक्षक के रूप में घेरे रहते हैं। वे पुरी के नौ विभिन्न स्थानों में नौ भिन्न-भिन्न रूपों में अपना विस्तार करते हैं।

चत्वारो वासुदेवाद्या नारायण-नृसिंहको ।हयग्रीवो महाक्रोड़ो ब्रह्मा चेति नवोदिताः ॥

२४२॥

जिन नौ पुरुषों का उल्लेख हुआ है वे हैं-वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न, अनिरुद्ध, नारायण, नृसिंह, हयग्रीव, वराह तथा ब्रह्मा।'

प्रकाश-विलासेर एइ कैलँ विवरण ।।स्वांशेर भेद एबे शुन, सनातन ॥

२४३॥

मैं विलासों तथा प्रकाशों का वर्णन कर चुका हूँ। अब मुझसे विभिन्न स्वांशों के विषय में सुनो।

सङ्कर्षण, मत्स्यादिक,दुइ भेद ताँर ।।सङ्कर्षण–पुरुषावतार, लीलावतार आर ॥

२४४॥

प्रथम स्वांश ( व्यक्तिगत विस्तार) संकर्षण हैं और अन्य सभी अवतार हैं, मत्स्य इत्यादि। संकर्षण पुरुष अथवा विष्णु के विस्तार हैं। मत्स्य जैसे अवतार विभिन्न युगों में विशिष्ट लीलाओं के लिए प्रकट होते हैं।

अवतार हय कृष्णेर षडू-विध प्रकार ।।पुरुषावतार एक, लीलावतार आर ॥

२४५ ॥

कृष्ण के छह तरह के अवतार होते हैं। एक तो विष्णु के अवतार ( पुरुषावतार) हैं और दूसरे अवतार विभिन्न लीलाओं को सम्पन्न करने के लिए ( लीलावतार) हैं।

गुणावतार, आर मन्वन्तरावतार ।ग्रुगावतार, आर शक्त्यावेशावतार ॥

२४६॥

फिर गुण-अवतार (जो भौतिक गुणों का नियन्त्रण करते हैं), मन्वन्तर-अवतार (जो प्रत्येक मनु के शासन में प्रकट होते हैं), युगअवतार ( विभिन्न युगों में अवतार लेने वाले ) तथा शक्त्यावेश अवतार ( शक्ति संचारित जीवों के अवतार ) हैं।

बाल्य, पौगण्ड हय विग्रहेर धर्म ।एत-रूपे लीला करेन व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

२४७॥

अर्चाविग्रह की विशिष्ट अवस्थाएँ हैं-बाल्य तथा पौगण्ड। महाराज नन्द के पुत्र श्रीकृष्ण ने शिशु तथा बालक के रूप में अपनी लीलाएँ सम्पन्न कीं।

अनन्त अवतार कृष्णेर, नाहिक गणन ।शाखा-चन्द्र-न्याय करि दिग्दरशन ॥

२४८॥

कृष्ण के अवतार असंख्य हैं और उनकी गणना कर पाना सम्भव नहीं है। हम चन्द्रमा तथा वृक्ष की शाखाओं का उदाहरण देकर केवल उनका संकेत कर सकते हैं।

अवतारा हासङ्ख्येया हरेः सत्त्व-निधेर्द्विजाः । यथाऽविदासिनः कुल्याः सरसः स्युः सहस्रशः ॥

२४९॥

हे विद्वान ब्राह्मणों, जिस प्रकार विशाल जलाशयों से लाखों छोटेछोटे झरने नीकलते हैं, उसी तरह से समस्त शक्तियों के आगार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री हरि से असंख्य अवतार प्रकट होते हैं।

प्रथमेइ करे कृष्ण 'पुरुषावतार' ।सेइत पुरुष हय त्रिविध प्रकार ॥

२५० ॥

प्रारम्भ में कृष्ण स्वयं पुरुष-अवतारों अर्थात् विष्णु-अवतारों के रूप में अवतरित होते हैं। ये तीन प्रकार के हैं।

विष्णोस्तु त्रीणि रूपाणिपुरुषाख्यान्यथो विदुः एकं तु महतः स्रष्ट ।द्वितीयं त्वण्ड-संस्थितम् तृतीयं सर्व-भूत-स्थंतानि ज्ञात्वा विमुच्यते विष्णु के तीन रूप हैं, जो पुरुष कहलाते हैं। प्रथम महाविष्णु हैं, जो सम्पूर्ण भौतिक शक्ति ( महत्) के स्रष्टा हैं, द्वितीय गर्भोदकशायी विष्णु हैं, जो प्रत्येक ब्रह्माण्ड में स्थित हैं तथा तृतीय क्षीरोदकशायी विष्णु हैं, जो प्रत्येक प्राणी के हृदय में रहते हैं। जो इन तीनों को जान लेता है, वह माया के बन्धन से छूट जाता है।'

अनन्त-शक्ति-मध्ये कृष्णेर तिन शक्ति प्रधान । ‘इच्छा-शक्ति', 'ज्ञान-शक्ति', 'क्रिया-शक्ति' नाम ॥

२५२॥

कृष्ण की शक्तियाँ अनन्त हैं, जिनमें से तीन प्रमुख हैं-ये हैं। इच्छाशक्ति, ज्ञानशक्ति तथा क्रियाशक्ति।

इच्छा-शक्ति-प्रधान कृष्ण-इच्छाय सर्व-कर्ता । ज्ञान-शक्ति-प्रधान वासुदेव अधिष्ठाता ।। २५३ ॥

इच्छाशक्ति के प्रधान भगवान् कृष्ण हैं, क्योंकि उनकी परम इच्छा से ही हर वस्तु का अस्तित्व है। इच्छा के लिए ज्ञान की आवश्यकता है। और वह ज्ञान वासुदेव के माध्यम से व्यक्त होता है।

इच्छा-ज्ञान-क्रिया विना ना हय सृजन । तिनेर तिन-शक्ति मेलि' प्रपञ्च-रचन ॥

२५४॥

विचार, अनुभव, इच्छा, ज्ञान तथा क्रिया के बिना सृजन सम्भव नहीं है। परम इच्छा, ज्ञान और क्रिया के मेल से विराट् जगत् की रचना होती हैं।

क्रिया-शक्ति-प्रधान सङ्कर्षण बलराम ।प्राकृताप्राकृत-सृष्टि करेन निर्माण ॥

२५५ ॥

भगवान् संकर्षण बलराम हैं। वे क्रियाशक्ति के अधिष्ठाता होने के कारण भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों जगतों की सृष्टि करते हैं।

अहङ्कारेर अधिष्ठाता कृष्णेर इच्छाय ।। गोलोक, वैकुण्ठ सृजे चिच्छक्ति-द्वाराय ॥

२५६॥

आदि संकर्षण ( भगवान् बलराम ) भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों ही सृष्टियों के कारण हैं। वे अहंकार के अधिष्ठाता हैं। वे कृष्ण की इच्छा से तथा आध्यात्मिक शक्ति के बल पर आध्यात्मिक जगत् का सृजन करते हैं जिसमें गोलोक वृन्दावन तथा वैकुण्ठ लोक सम्मिलित हैं।

यद्यपि असृज्य नित्य चिच्छक्ति-विलास ।। तथापि सङ्कर्षण-इच्छाय ताहार प्रकाश ॥

२५७॥

यद्यपि आध्यात्मिक जगत् के सृजन का प्रश्न नहीं उठता, तो भी आध्यात्मिक जगत् संकर्षण की परम इच्छा से ही प्रकट होता है। यह आध्यात्मिक जगत् नित्य आध्यात्मिक शक्ति के विलास का धाम है।

सहस्र-पत्रं कमलं गोकुलाख्यं महत्पदम् ।तत्कर्णिकारं तब्द्धाम तदनन्तांश-सम्भवम् ॥

२५८॥

परम धाम तथा लोक गोकुल एक हजार पंखुड़ियों वाले कमल के फूल जैसा लगता है। इस कमल की कर्णिका भगवान् कृष्ण का धाम है। यह कमल जैसे आकार वाला परम धाम भगवान् अनन्त की इच्छा से उत्पन्न होता है।'

माया-द्वारे सृजे तेहो ब्रह्माण्डेर गण ।।जड़-रूपा प्रकृति नहे ब्रह्माण्ड-कारण ॥

२५९॥

वे ही भगवान् संकर्षण भौतिक शक्ति (माया) के द्वारा सारे ब्रह्माण्डों का सृजन करते हैं। जड़ रूप भौतिक शक्ति, जिसे आधुनिक भाषा में प्रकृति कहा जाता है, भौतिक ब्रह्माण्ड का कारण नहीं है।

जड़ हैते सृष्टि नहे ईश्वर-शक्ति विने । ताहातेइ सङ्कर्षण करे शक्तिर आधाने ॥

२६०॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की शक्ति के बिना जड़ पदार्थ विराट् जगत् का सृजन नहीं कर सकता। इसकी शक्ति भौतिक शक्ति से उत्पन्न नहीं होती, किन्तु संकर्षण द्वारा प्रदत्त होती है।

ईश्वरेर शक्त्ये सृष्टि करये प्रकृति ।लौह ग्रेन अग्नि-शक्त्ये पाय दाह-शक्ति ॥

२६१॥

अकेला जड़ पदार्थ किसी वस्तु का सृजन नहीं कर सकता। भौतिक शक्ति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के बल पर सृष्टि करती है। लोहे में खुद में जलाने की कोई शक्ति नहीं होती, किन्तु जब इसी लोहे को अग्नि में रखा जाता है, तब यह जलाने की शक्ति प्राप्त कर लेता है।

एतौ हि विश्वस्य च बीज-योनी | रामो मुकुन्दः पुरुषः प्रधानम् । अन्वीय भूतेषु विलक्षणस्यज्ञानस्य चेशात इमौ पुराणौ ॥

२६२॥

बलराम तथा कृष्ण इस भौतिक जगत् के मूल, निमित्त एवं भौतिक कारण हैं। वे महाविष्णु तथा भौतिक शक्ति के रूप में भौतिक तत्त्वों में प्रविष्ट होते हैं और नाना शक्तियों द्वारा विविधता उत्पन्न करते हैं। इस तरह वे समस्त कारणों के कारण ।'

सृष्टि-हेतु येइ मूर्ति प्रपञ्चे अवतरे ।सेइ ईश्वर-मूर्ति 'अवतार' नाम धरे ॥

२६३॥

भगवान् का वह रूप, जो सृष्टि करने के हेतु भौतिक जगत् में अवतरित होता है, अवतार कहलाता है।

मायातीत परव्योमे सबार अवस्थान ।।विश्वे अवतरि' धरे 'अवतार' नाम ॥

२६४॥

भगवान् कृष्ण के सारे विस्तार वास्तव में आध्यात्मिक आकाश के निवासी हैं। किन्तु जब वे भौतिक जगत् में अवतरित होते हैं, तो अवतार कहे जाते हैं।

सेइ माया अवलोकिते श्री-सङ्कर्षण ।पुरुष-रूपे अवतीर्ण हइला प्रथम ॥

२६५ ॥

भौतिक शक्ति (माया) पर दृष्टिपात करने तथा उसे शक्ति प्रदान करने के लिए भगवान् संकर्षण सर्वप्रथम भगवान् महाविष्णु के रूप में अवतरित होते हैं।

जगृहे पौरुषं रूपं भगवान्महदादिभिः ।।सम्भूतं षोड़श-कलमादौ लोक-सिसृक्षया ॥

२६६॥

सृष्टि के प्रारम्भ में भगवान् ने भौतिक सृष्टि की समस्त सामग्री केसाथ अपना विस्तार पुरुष अवतार के रूप में किया। सर्वप्रथम उन्होंने सृष्टि करने के लिए सोलह प्रमुख शक्तियाँ उत्पन्न कीं। ऐसा उन्होंने भौतिक ब्रह्माण्डों को प्रकट करने के लिए किया।'

आद्योऽवतारः पुरुषः परस्य ।कालः स्वभावः सदसन्मनश्च ।। द्रव्यं विकारो गुण इन्द्रियाणि ।विराट्स्वराट्स्थास्नु चरिष्णु भूम्नः ॥

२६७ ॥

भगवान् के प्रथम अवतार हैं कारणाब्धिशायी विष्णु ( महाविष्णु), जो सनातन काल, आकाश, कारण तथा कार्य, मन, तत्त्व, भौतिक अहंकार, प्रकृति के गुण, इन्द्रिय-समूह, भगवान् का विराट् रूप, गर्भोदकशायी विष्णु तथा सारे चर एवं अचर जीवों के स्वामी हैं।'

सेइ पुरुष विरजाते करेन शयन ।कारणाब्धिशायी' नाम जगत्कारण ॥

२६८।। वे आदि भगवान्, जिनका नाम संकर्षण है, सर्वप्रथम उस विरजा नदी में शयन करते हैं, जो भौतिक जगत् तथा आध्यात्मिक जगत् के बीच में सीमा का कार्य करती है। कारणाब्धिशायी विष्णु के रूप में वे भौतिक सृष्टि के आदि कारण हैं।

कारणाब्धि-पारे मायार नित्य अवस्थिति । विरजार पारे परव्योमे नाहि गति ॥

२६९॥

विरजा अर्थात् कारण सागर आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों के बीच की सीमा है। इस सागर के एक तट पर भौतिक शक्ति ( माया) स्थित है, किन्तु यह दूसरे किनारे पर प्रवेश नहीं कर सकती, जहाँ आध्यात्मिक आकाश है।

प्रवर्तते यत्र रजस्तमस्तयोःसत्त्वं च मिश्रं न च काल-विक्रमः । न यत्र माया किमुतापरे हरेर्अनुव्रता ग्रत्र सुरासुरार्चिताः ॥

२७०॥

आध्यात्मिक जगत् में न तो रजोगुण है, न तमोगुण, न ही इन दोनों का मिश्रण है। न ही वहाँ मिश्रित सत्त्व है, न काल या स्वयं माया का प्रभाव है। यहाँ केवल भगवान् के शुद्ध भक्त भगवान् के संगी बनकर रहते हैं, जिनकी पूजा देवता तथा असुर दोनों करते हैं।'

मायार ये दुइ वृत्ति'माया' आर 'प्रधान' ।।'माया' निमित्त-हेतु, विश्वेर उपादान ‘प्रधान' ॥

२७१।। माया के दो कार्य हैं। इनमें से एक माया कहलाता है और दूसरा प्रधान। माया सूचक है निमित्त कारण की और प्रधान उन उपादानों ( सामग्री ) का सूचक है, जिनसे विराट् जगत् की सृष्टि होती है।

सेइ पुरुष माया-पाने करे अवधान ।। प्रकृति क्षोभित करि' करे वीर्येर आधान ॥

२७२॥

जब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् भौतिक शक्ति पर दृष्टि डालते हैं, तो वह क्षुब्ध हो जाती है। उस समय भगवान् उसमें जीव रूपी अपना मूल वीर्य प्रविष्ट कर देते हैं।

स्वाङ्ग-विशेषाभास-रूपे प्रकृति-स्पर्शन ।जीव-रूप 'बीज' ताते कैला समर्पण ॥

२७३ ॥

जीवरूपी बीजों से गर्भित करने के लिए भगवान् भौतिक शक्ति का प्रत्यक्ष स्पर्श नहीं करते, अपितु वे अपने विशेष कार्यकारी विस्तार द्वारा भौतिक प्रकृति का स्पर्श करते हैं। इस तरह सारे जीव, जो उनके अंश रूप हैं, भौतिक प्रकृति में गर्भित हो जाते हैं।"

दैवात्क्षुभित-धर्मिण्यां स्वस्यां ग्रोनौ परः पुमान् । आधत्त वीर्यं सासूत महत्तत्त्वं हिरण्मयम् ॥

२७४॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने अनन्तकाल में तीन गुणों वाली भौतिक प्रकृति को उत्तेजित करके उसके गर्भ में असंख्य जीवों के रूप में अपना वीर्य स्थापित किया। इस तरह भौतिक प्रकृति ने सम्पूर्ण भौतिक शक्ति को जन्म दिया, जो हिरण्मय महत् तत्त्व के नाम से जानी जाती है, जिसका अर्थ है, विश्व-सृष्टि का मूल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व।

काल-वृत्त्या तु मायायां गुण-मय्यामधोक्षजः ।।पुरुषेणात्म-भूतेन वीर्घमाधत्त वीर्यवान् ॥

२७५ ॥

कालक्रम में पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् ( महावैकुण्ठनाथ) ने अपने स्वांश विस्तार ( महाविष्णु) द्वारा भौतिक प्रकृति के गर्भ के भीतर जीवरूपी वीर्य स्थापित किया।'

तबे महत्तत्त्व हैते त्रिविध अहङ्कार ।ग्राहा हैते देवतेन्द्रिय-भूतेर प्रचार ॥

२७६॥

सर्वप्रथम समग्र भौतिक शक्ति ( महत् तत्त्व) प्रकट होती है, जिससे तीन प्रकार के अहंकार प्रकट होते हैं और ये ही वे मूल स्रोत हैं, जिनसे सभी देवता (नियन्त्रण करने वाले अधिष्ठाता ), इन्द्रियाँ तथा भौतिक तत्त्व विस्तार करते हैं।

…verse… सर्व तत्त्व मिलि' सृजिल ब्रह्माण्डेर गण ।अनन्त ब्रह्माण्ड, तार नाहिक गणन ॥

२७७॥

विभिन्न तत्त्वों को मिलाकर भगवान् ने सारे ब्रह्माण्डों का सृजन किया। इन ब्रह्माण्डों की संख्या अनन्त है, उन्हें गिन पाना सम्भव नहीं है।

इँहो महत्स्रष्टा पुरुष–‘महा-विष्णु' नाम । अनन्त ब्रह्माण्ड ताँर लोम-कूपे धाम ॥

२७८ ॥

भगवान् विष्णु का प्रथम रूप महाविष्णु कहलाता है। वे ही समग्र भौतिक शक्ति महत् तत्त्व के आदि स्रष्टा हैं। अनन्त ब्रह्माण्ड उनके शरीर के रोमकूपों से उत्पन्न होते हैं।

गवाक्षे उड़िया ग्रैछे रेणु आसे ग्राय ।। पुरुष-निश्वास-सह ब्रह्माण्ड बाहिराय ॥

२७९॥

पुनरपि निश्वास-सह ग्राय अभ्यन्तर । अनन्त ऐश्वर्य ताँर, सब माया-पार ॥

२८० ॥

जब महाविष्णु श्वास छोड़ते हैं, तो ये सारे ब्रह्माण्ड उस वायु में तैरते माने जाते हैं। ये उन सूक्ष्म कणों की भाँति हैं, जो सूर्य-प्रकाश में तैरते हैं। और परदे के छेदों से होकर आते-जाते रहते हैं। इस तरह ये सारे ब्रह्माण्ड महाविष्णु के उच्छ्वास से उत्पन्न होते हैं और जब महाविष्णु श्वास लेते हैं, तो वे सबै पुनः उनके शरीर के भीतर चले जाते हैं। महाविष्णु का असीम ऐश्वर्य पूर्णतया भौतिक धारणा के परे है।

यस्यैक-निश्वसित-कालमथावलम्ब्यजीवन्ति लोम-विल-जा जगदण्ड-नाथाः । विष्णुर्महान्स इह ग्रस्य कला-विशेषो।| गोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि ॥

२८१॥

सारे ब्रह्मा तथा भौतिक संसार के अन्य स्वामी महाविष्णु के रोमकूपों से प्रकट होते हैं और उनके एक निश्वास की अवधि तक जीवित रहते हैं। मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ, क्योंकि महाविष्णु उनके पूर्ण अंश ( स्वांश) के अंश हैं।

समस्त ब्रह्माण्ड-गणेर इँहो अन्तर्यामी ।।कारणाब्धिशायी-----सब जगतेर स्वामी ॥

२८२॥

महाविष्णु सारे ब्रह्माण्डों के परमात्मा हैं। कारण सागर में शयन करने वाले वे सारे भौतिक जगतों के स्वामी हैं।

एइत कहिलें प्रथम पुरुषेर तत्त्व ।। द्वितीय पुरुषेर एबे शुनह महत्त्वं ॥

२८३॥

इस प्रकार मैंने प्रथम पुरुष, महाविष्णु की व्याख्या की है। अब मैं द्वितीय पुरुष की महिमा का वर्णन करूंगा।

सेइ पुरुष अनन्त-कोटि ब्रह्माण्ड सृजिया ।।एकैक-मूर्ये प्रवेशिला बहु मूर्ति हा ॥

२८४॥

अनन्त ब्रह्माण्डों की सृष्टि करने के बाद महाविष्णु ने अपना विस्तार असंख्य रूपों में कर लिया और उनमें से हर एक में प्रवेश किया।

प्रवेश करिया देखे, सब––अन्धकार ।रहिते नाहिक स्थान, करिला विचार ॥

२८५ ॥

जब महाविष्णु अनन्त ब्रह्माण्डों में से हर एक में प्रविष्ट हो गये, तो उन्होंने देखा कि वहाँ चारों ओर अँधेरा ही अँधेरा है और रहने के लिए कोई स्थान नहीं है। अतः वे इस स्थिति पर विचार करने लगे।

निजाङ्ग-स्वेद-जले ब्रह्माण्डार्ध भरिल ।।सेइ जले शेष-शय्याय शयन करिल ॥

२८६ ॥

तब भगवान् ने अपने शरीर से पसीना उत्पन्न किया, जिसके जल से आधे ब्रह्माण्ड को भर दिया। तब वे उस जल में भगवान् शेष की शय्या पर लेट गये।

ताँर नाभि-पद्म हैते उठिल एक पद्म ।।सेइ पद्मे हइल ब्रह्मार जन्म-सद्म ॥

२८७॥

तब उन गर्भोदकशायी विष्णु की नाभि से एक कमल का फूल निकल आया और वही फूल ब्रह्मा का जन्मस्थान बना।

सेइ पद्म-नाले हइल चौद्द भुवन ।।तेंहो ‘ब्रह्मा' हा सृष्टि करिल सृजन ॥

२८८ ॥

उस कमल फूल के डंठल से चौदह लोक उत्पन्न हुए। तब वे ब्रह्मा बने और उन्होंने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की रचना की।

‘विष्णु'-रूप ही करे जगत्पालने ।गुणातीत विष्णु-स्पर्श नाहि माया-सने ॥

२८९॥

इस प्रकार अपने विष्णु रूप से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सम्पूर्ण भौतिक जगत् का पालन करते हैं। चूंकि वे सदैव भौतिक गुणों से परे हैं, अतः भौतिक प्रकृति (माया) कभी-भी उनका स्पर्श नहीं कर सकती।

‘रुद्र'-रूप धरि करे जगत्संहार ।सृष्टि, स्थिति, प्रलय हय इच्छाय याँहार ॥

२९०॥

वे अपने रुद्र (शिव) रूप में इस भौतिक जगत् का संहार करते हैं। दूसरे शब्दों में, उनकी इच्छा से ही सम्पूर्ण जगत् का सृजन, पालन और संहार होता है।

ब्रह्मा, विष्णु, शिव ताँर गुण-अवतार ।सृष्टि-स्थिति-प्रलयेर तिनेर अधिकार ॥

२९१॥

ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव-ये तीनों उनके भौतिक गुणों के अवतार हैं। क्रमशः सृष्टि, पालन और संहार इन तीनों पुरुषों के अधिकार में है।

हिरण्यगर्भ-अन्तर्यामी–गर्भोदकशायी ।।‘सहस्त्र-शीर्षादि' करि' वेदे याँरे गाइ ॥

२९२ ॥

गर्भोदकशायी विष्णु, जो कि इस ब्रह्माण्ड में हिरण्यगर्भ तथा अन्तर्यामी-अर्थात् परमात्मा के नाम से जाने जाते हैं, उनकी महिमा का गायन वेदों में ‘सहस्रशीर्षा' शब्द से प्रारम्भ होने वाले स्तोत्र द्वारा किया जाता है।

एइ त' द्वितीय-पुरुष–ब्रह्माण्डेर ईश्वर ।।मायार' आश्रय' हय, तबु माया-पार ॥

२९३ ॥

द्वितीय पुरुष गर्भोदकशायी विष्णु प्रत्येक ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं।और बहिरंगा शक्ति (माया) के आश्रय हैं। तो भी वे माया के स्पर्श से परे रहते हैं।

तृतीय-पुरुष विष्णु-गुण-अवतार' ।।दुड़ अवतार-भितर गणना ताँहार ॥

२९४॥

विष्णु के तृतीय अंश क्षीरोदकशायी विष्णु हैं, जो सत्त्वगुण के अवतार हैं। इनकी गणना दो प्रकार के अवतारों (पुरुष-अवतार तथा गुणावतार) में की जाती है।

विराट्यष्टि-जीवेर तेहो अन्तर्यामी ।क्षीरोदकशायी तेहो—पालन-कर्ता, स्वामी ॥

२९५ ।। ये क्षीरोदकशायी विष्णु भगवान् के विराट् रूप हैं और प्रत्येक जीव के भीतर के परमात्मा हैं। वे क्षीरोदकशायी कहलाते हैं, क्योंकि वे क्षीरसागर में शयन करते हैं। वे ब्रह्माण्ड के पालक तथा स्वामी हैं।

पुरुषावतारेर एइ कैलँ निरूपण ।लीलावतार एबे शुन, सनातन ॥

२९६ ॥

हे सनातन, मैं विष्णु के तीन पुरुष अवतारों का स्पष्ट वर्णन कर चुका हूँ। अब मुझसे लीलावतारों के विषय में सुनो।

लीलावतार कृष्णेर ना ग्राय गणन ।प्रधान करिया कहि दिग्दरशन ॥

२९७॥

भगवान् कृष्ण के असंख्य लीलावतारों की गणना कोई भी नहीं कर सकता, किन्तु मैं मुख्य-मुख्य अवतारों का वर्णन करूंगा।

मत्स्य, कूर्म, रघुनाथ, नृसिंह, वामन ।वराहादि–लेखा याँर ना ग्राय गणन ॥

२९८ ॥

कुछ लीलावतार इस प्रकार हैं-मत्स्यावतार, कूर्मावतार, भगवान्रामचन्द्र, भगवान् नृसिंह, भगवान् वामन तथा भगवान् वराह। इनका कोई अन्त नहीं है।

मत्स्याश्व-कच्छप-नृसिंह-वराह-हंसराजन्य-विप्र-विबुधेषु कृतावतारः ।। त्वं पासि नस्त्रि-भुवनं च तथाधुनेश ।भारं भुवो हर ग्रदूत्तम वन्दनं ते ॥

२९९॥

हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, हे यदुकुल श्रेष्ठ, हम आपसे ब्रह्माण्ड के भारी भार को कम करने के लिए प्रार्थना कर रहे हैं। आपने पूर्वकाल में मत्स्य, अश्व ( हयग्रीव), कच्छप, सिंह (नृसिंह), शूकर (वराह) तथा हंस के रूप में भी अवतरित होकर इस भार को कम किया है। आप भगवान् रामचन्द्र, परशुराम तथा वामन के रूप में भी अवतरित हुए हैं। आपने सदैव इस तरह से हम देवताओं तथा ब्रह्माण्ड की रक्षा की है। कृपया अब भी वैसा ही करते रहें।'

लीलावतारेर कैलँ दिग्दरशन ।गुणावतारेर एबे शुन विवरण ॥

३०० ॥

मैंने लीलावतारों के कुछ उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। अब मैं गुणावतारों का वर्णन करूंगा। कृपया सुनें।

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, तिन गुण अवतार ।त्रि-गुण अङ्गीकरि' करे सृष्ट्यादि-व्यवहार ॥

३०१॥

इस भौतिक जगत् में तीन प्रकार के कार्य हैं। इसमें हर वस्तु उत्पन्न होती है, वह कुछ काल तक रहती है और अन्त में नष्ट हो जाती है। अतएव भगवान् तीनों गुणों-सतो, रजो तथा तमो गुणों के नियन्ता के रूप में अवतरित होते हैं और इस तरह इस भौतिक जगत् का व्यवहार चलता रहता है।

भक्ति-मिश्र-कृत-पुण्ये कोन जीवोत्तम । रजो-गुणे विभावित करि' ताँर मन ॥

३०२ ॥

भक्ति-मिश्रित पूर्व पुण्यकर्मों के फलस्वरूप उत्तम जीव अपने चित्त में रजोगुण से प्रभावित होता है।

गर्भोदकशायि-द्वारा शक्ति सञ्चारि' । व्यष्टि सृष्टि करे कृष्ण ब्रह्मा-रूप धरि' ॥

३०३॥

ऐसे भक्त को गर्भोदकशायी विष्णु शक्ति प्रदान करते हैं। इस तरह ब्रह्मा के रूप में कृष्ण का अवतार, पूरे ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण रचना करता है।

ब्रह्मा य एष जगदण्ड-विधान-कर्ता | गोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि ।। ३०४।। सूर्य अपना तेज रत्न में प्रकट करता है, यद्यपि रत्न पत्थर होता है। इसी प्रकार भगवान् गोविन्द पुण्यात्मा जीव में अपनी विशेष शक्ति प्रकट करते हैं। इस तरह वह जीव ब्रह्मा बनता है और ब्रह्माण्ड के कार्य को सँभालता है। मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ।

कोन कल्पे यदि ग्रोग्य जीव नाहि पाये । आपने ईश्वर तबे अंशे 'ब्रह्मा' हय ॥

३०५ यदि किसी एक कल्प में उपयुक्त जीव ब्रह्मा का पदभार सँभालनेके लिए उपलब्ध नहीं होता, तो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् स्वयं अपना विस्तार करके ब्रह्मा बन जाते हैं।

यस्याध्रि-पङ्कज-रजोऽखिल-लोक-पालैर् | मौल्युत्तमैधृतमुपासित-तीर्थ-तीर्थम् ।। ब्रह्मा भवोऽहमपि ग्रस्य कलाः कलायाः | श्रीश्चद्वहेम चिरमस्य नृपासनं क्व ।। ३०६॥

भगवान् कृष्ण के लिए सिंहासन का क्या मूल्य है? उनके चरणकमलों की धूलि को विभिन्न लोकों के स्वामी अपने मुकुट-युक्त सिरों पर धारण करते हैं। वह धूलि तीर्थस्थानों को पवित्र बनाती है और कृष्ण के स्वांश के अंशरूप, ब्रह्मा, शिव, लक्ष्मी तथा मैं स्वयं, उस धूलि को नित्य अपने सिरों पर धारण करते हैं।'

निजांश-कलाय कृष्ण तमोगुण अङ्गीकरि' ।संहारार्थे माया-सङ्गे रुद्र-रूप धरि ॥

३०७॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण अपने एक पूर्ण अंश का विस्तार करते हैं और तमोगुण को स्वीकार करते हुए इस जगत् का संहार करने के लिए रुद्र-रूप धारण करते हैं।

माया-सङ्ग-विकारी रुद्र–भिन्नाभिन्न रूप ।।जीव-तत्त्व नहे, नहे कृष्णेर ‘स्वरूप' ॥

३०८॥

रुद्र, शिवजी के विविध रूप हैं, जो माया की संगति से उत्पन्न रूपान्तर हैं। यद्यपि रुद्र जीव-तत्त्व नहीं हैं, फिर भी उन्हें कृष्ण का स्वांश नहीं माना जा सकता।

दुग्ध ग्रेन अम्ल-योगे दधि-रूप धरे ।दुग्धान्तर वस्तु नहे, दुग्ध हैते नारे ॥

३०९॥

जब दूध में जामन डाल दिया जाता है, तो वह दही में परिवर्तित हो । जाता है। इस तरह दही दूध ही है, किन्तु फिर भी वह दूध नहीं है।

क्षीरं ग्रथा दधि विकार-विशेष-योगात्सञ्जायते न हि ततः पृथगस्ति हेतोः । ग्रः शम्भुतामपि तथा समुपैति कार्याद् | गोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि ॥

३१०॥

जामन मिलाने से दूध दही में बदल जाता है, किन्तु वास्तव में वैधानिक दृष्टि से वह दूध के अतिरिक्त और कुछ नहीं होता। इसी तरह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द भौतिक व्यवहार हेतु शिव (शम्भु) का रूप धारण करते हैं। मैं उन भगवान् के चरणकमलों की वन्दना करता हूँ।'

शिव'–माया-शक्ति-सङ्गी, तमो-गुणावेश ।।मायातीत, गुणातीत 'विष्णु'–परमेश ॥

३११॥

शिवजी माया के संगी हैं, इसलिए वे तमोगुण में डूबे रहते हैं। किन्तु भगवान् विष्णु माया से तथा माया के गुणों से परे हैं। इसलिए वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।

शिवः शक्ति-मुक्तः शश्वत् त्रि-लिङ्गो गुण-संवृतः ।। वैकारिकस्तैजसश्च तामसश्चेत्यहं त्रिधा ॥

३१२॥

शिवजी के विषय में सच बात तो यह है कि वे सदैव तीन भौतिक आवरणों-वैकारिक, तैजस तथा तामस-से आवृत रहते हैं। भौतिक प्रकृति के इन तीनों गुणों के कारण वे बहिरंगा शक्ति माया तथा अहंकार का सदैव संग करते हैं।'

हरिर्हि निर्गुणः साक्षात्पुरुषः प्रकृतेः परः ।। स सर्व-दृगुपद्रष्टा तं भजन्निर्गुणो भवेत् ॥

३१३॥

श्री हरि अर्थात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् भौतिक प्रकृति की पहुँच के बाहर स्थित हैं, अतएव वे दिव्य परम पुरुष हैं। वे सारी वस्तुओं के बाहर और भीतर देख सकते हैं, अतएव वे सभी जीवों के परम दृष्टा हैं। जो व्यक्ति उनके चरणकमलों की शरण में जाता है और उनकी पूजा करता है, उसे भी दिव्य पद प्राप्त होता है।'

पालनार्थ स्वांश विष्णु-रूपे अवतार ।। सत्त्व-गुण द्रष्टा, ताते गुण-माया-पार ॥

३१४॥

ब्रह्माण्ड का पालन करने हेतु भगवान् कृष्ण अपने स्वांश विष्णु रूप में अवतरित होते हैं। वे सतोगुण के निर्देशक हैं, अतएव वे भौतिक शक्ति से परे हैं।

स्वरूप—ऐश्वर्य-पूर्ण, कृष्ण-सम प्राय ।कृष्ण अंशी, तेंहो अंश, वेदे हेन गाय ॥

३१५ ॥

भगवान् विष्णु स्वांश श्रेणी में आते हैं, क्योंकि उनमें कृष्ण जैसे ही ऐश्वर्य होते हैं। कृष्ण आदि पुरुष हैं और भगवान् विष्णु उनके स्वांश हैं। समस्त वेदों का यही मत है।

दीपार्चिरेव हि दशान्तरमभ्युपेत्यदीपायते विवृत-हेतु-समान-धर्मा । यस्तादृगेव हि च विष्णुतया विभातिगोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि ॥

३१६॥

“जब एक दीपक अपनी लौ का विस्तार दूसरे दीपक में करता है, और फिर उसे भिन्न स्थान में रख दिया जाता है, तब वह अलग से जलता है और इसका प्रकाश मूल दीपक जैसा ही शक्तिमान होता है। इसी तरह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द अपना विस्तार विभिन्न विष्णु रूपों में करते हैं, जो समान रूप से प्रकाशमान, शक्तिमान तथा ऐश्वर्यवान होते हैं। मैं उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ।'

ब्रह्मा, शिव—आज्ञाकारी भक्त-अवतार ।।पालनार्थे विष्णु कृष्णेर स्वरूप-आकार ॥

३१७॥

निष्कर्ष यह है कि ब्रह्माजी तथा शिवजी भक्त अवतार हैं, जो आदेशों का पालन करते हैं। किन्तु भगवान् विष्णु पालक हैं और वे भगवान् कृष्ण के निजी स्वरूप हैं।

सृजामि तन्नियुक्तोऽहं हरो हरति तद्वशः ।।विश्वं पुरुष-रूपेण परिपाति त्रि-शक्ति-धृक् ॥

३१८ ॥

[ ब्रह्माजी ने कहा : ‘पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने मुझे सृजन करने के लिए नियुक्त किया है। शिवजी उनके आदेशों का पालन करते हुए हर वस्तु का संहार करते हैं। क्षीरोदकशायी विष्णु के रूप में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवन प्रकृति के सरे कार्यों को चलते हैं। इस तरह भौतिक प्रकृति के तीनो गुणों के अधीक्षक भगवन विष्णु हैं।

मन्वन्तरावतार एबे शुन, सनातन । असङ्ख्य गणन ताँर, शुनह कारण ॥

३१९॥

हे सनातन, अब मन्वन्तर अवतारों के बारे में सुनो। वे असंख्य हैं और उनकी गणना कोई नहीं कर सकता। जरा, उनके स्रोत के विषय में सुनो।

ब्रह्मार एक-दिने हय चौद्द मन्वन्तर । चौद्द अवतार ताहाँ करेन ईश्वर ॥

३२० ॥

ब्रह्मा के एक दिन में चौदह मनु बदलते हैं और इनमें से प्रत्येक मनु के शासनकाल में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का एक अवतार प्रकट होता है चौद्द एक दिने, मासे चारि-शत बिश ।ब्रह्मार वत्सरे पञ्च-सहस्र चल्लिश ॥

३२१॥

ब्रह्मा के एक दिन में १४ मन्वन्तर अवतार होते हैं, अर्थात् एक मास में ४२० और एक वर्ष में ५०४० अवतार होते हैं।

शतेक वत्सर हुय'जीवन' ब्रह्मार। पञ्च-लक्ष चारि-सहस्त्र मन्वन्तरावतार ॥

३२२॥

ब्रह्मा के एक सौ वर्ष के जीवन में कुल ५,०४,००० मन्वन्तरअवतार होते हैं।

अनन्त ब्रह्माण्डे ऐछे करह गणन।।महा-विष्णु एक-श्वासे ब्रह्मार जीवन ॥

३२३ ।। यहाँ पर केवल एक ब्रह्माण्ड के मन्वन्तर अवतारों की संख्या दी गई है। अतः असंख्य ब्रह्माण्डों में कितने मन्वन्तर अवतार होंगे, इसकी केवल कल्पना ही की जा सकती है। इतने सारे ब्रह्माण्ड तथा ब्रह्मा महाविष्णु के एक श्वास-काल तक ही विद्यमान रहते हैं।

महा-विष्णुर निश्वासेर नाहिक पर्यन्त ।एक मन्वन्तरावतारेर देख लेखार अन्त ॥

३२४॥

महाविष्णु के निश्वासों की कोई सीमा नहीं है। जरा देखो न, केवल मन्वन्तर अवतारों को बतलाना या लिखना कितना दुष्कर है।

स्वायंभुवे 'यज्ञ', स्वारोचिषे 'विभु' नाम ।औत्तमे ‘सत्यसेन', तामसे ‘हरि' अभिधान ॥

३२५॥

स्वायंभुव मन्वन्तर में अवतार का नाम यज्ञ है। स्वारोचिष मन्वन्तर में उनका नाम विभु है। औत्तम मन्वन्तर में उनका नाम सत्यसेन है तथा तामस मन्वन्तर में उनका नाम हरि है।

रैवते 'वैकुण्ठ', चाक्षुषे ‘अजित', वैवस्वते 'वामन' ।।सावयें ‘सार्वभौम', दक्ष-सावर्ये 'ऋषभ' गणन ॥

३२६॥

रैवत मन्वन्तर में अवतार का नाम वैकुण्ठ है और चाक्षुष मन्वन्तर में उनका नाम अजित है। वैवस्वत मन्वन्तर में उसका नाम वामन है और सावर्ण्य मन्वन्तर में उनका नाम सार्वभौम तथा दक्षसावर्ण्य मन्वन्तर में उनका नाम ऋषभ है।

ब्रह्म-सावर्ये 'विष्वक्सेन', 'धर्मसेतु' धर्म-सावर्ये ।।रुद्र-सावर्ये ‘सुधामा', ‘योगेश्वर' देव-सावयें ॥

३२७॥

ब्रह्म सावर्ण्य मन्वन्तर में अवतार का नाम विष्वक्सेन है, धर्म सावर्य मन्वन्तर में धर्मसेतु, रुद्रसावण्र्य मन्वन्तर में सुधामा तथा देवसावण्र्य में उनका नाम योगेश्वर है।

इन्द्र-सावर्ये 'बृहद्भानु' अभिधान ।एइ चौद्द मन्वन्तरे चौद्द 'अवतार' नाम ॥

३२८॥

इन्द्रसावर्ण्य मन्वन्तर में अवतार का नाम बृहद्भानु है। इन चौदह मन्वन्तरों में चौदह अवतारों के ये ही नाम हैं।

मुगावतार एबे शुन, सनातन ।सत्य-त्रेता-द्वापर-कलि-मुंगेर गणन ॥

३२९॥

हे सनातन, अब मुझसे युग-अवतारों के विषय में सुनो। सर्वप्रथम युग चार हैं-सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग तथा कलियुग।

शुक्ल-रक्त-कृष्ण-पीत-क्रमे चारि वर्ण ।।चारि वर्ण धरि' कृष्ण करेन युग-धर्म ॥

३३०॥

चारों युगों-सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलियुग में भगवान् चार रंगों में अवतरित होते हैं। ये रंग क्रमशः श्वेत, लाल, काले तथा पीले हैं। ये रंग विभिन्न युगों में अवतारों के हैं।

आसन्वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृहृतोऽनु-युगं तनूः ।शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः ॥

३३१॥

इस बालक के पहले तीन रंग रह चुके हैं, जो विभिन्न युगों के लिए संस्तुत रंगों के अनुसार थे। पहले वह श्वेत, लाल तथा पीला था, किन्तु अब उसने श्याम रंग धारण किया है।'

कृते शुक्लश्चतुर्बाहुर्जटिलो वल्कलाम्बरः ।।कृष्णाजिनोपवीताक्षान्बिभ्रद्दण्ड-कमण्डलू ॥

३३२॥

| सत्ययुग में भगवान् का शरीर श्वेत रंग का था, उनके चार हाथ थे तथा सिर पर जटाजूट था। वे वृक्ष की छाल पहने थे और काला मृगचर्म धारण किये थे। वे उपवीत (जनेऊ) पहने थे और गले में रुद्राक्ष की माला धारण किये थे। वे दण्ड तथा कमण्डलु लिये थे और ब्रह्मचारी थे।'

त्रेतायां रक्त-वर्णोऽसौ चतुर्बाहुस्त्रि-मेखलः । हिरण्य-केशस्त्रय्यात्मा खुक्तुवाद्युपलक्षणः ॥

३३३॥

त्रेतायुग में भगवान् का शरीर रक्त-वर्ण का था और उनकी चार भुजाएँ थीं। उनके उदर में तीन विशिष्ट रेखाएँ थीं और उनके केश सुनहरे थे। उनका स्वरूप वैदिक ज्ञान को प्रकट करने वाला था और वे यज्ञ के चम्मच चुक्-खुवा आदि चिह्नों को धारण किये हुए थे।

सत्य-युगे धर्म-ध्यान कराय‘शुक्ल'-मूर्ति धरि' ।।कर्दमके वर दिला ग्रेहो कृपा करि' ॥

३३४॥

शुक्ल अवतार के रूप में भगवान् ने धर्म तथा ध्यान की शिक्षा दी। उन्होंने कर्दम मुनि को आशीर्वाद दिया और इस तरह उन्होंने अपनी अहैतुकी कृपा प्रदर्शित की।

कृष्ण-'ध्यान' करे लोक ज्ञान-अधिकारी ।त्रेतार धर्म ‘यज्ञ' कराय 'रक्त'-वर्ण धरि' ।। ३३५॥

सत्ययुग में लोग सामान्यतया आध्यात्मिक ज्ञान में अग्रसर होते थे और कृष्ण का सहज ही ध्यान कर सकते थे। त्रेतायुग में लोगों का वृत्तिपरक कार्य बड़े-बड़े यज्ञ को सम्पन्न करना था। भगवान् ने रक्तवर्ण धारण करके इसे प्रोत्साहित किया।

‘कृष्ण-पदार्चन' हय द्वापरेर धर्म ।'कृष्ण'-वर्णे कराये लोके कृष्णार्चन-कर्म ॥

३३६ ॥

द्वापर युग में लोगों का वृत्तिपरक कार्य कृष्ण के चरणकमलों का पूजन करना था। अतएव भगवान् कृष्ण ने श्याम वर्ण धारण करके लोगों को प्रोत्साहित किया कि वे उनकी पूजा करें।

द्वापरे भगवान्श्यामः पीत-वासा निजायुधः ।।श्री-वत्सादिभिरकैश्च लक्षणैरुपलक्षितः ॥

३३७॥

द्वापर युग में भगवान् श्याम-वर्ण के साथ प्रकट होते हैं। वे पीताम्बर धारण किये रहते हैं। वे अपने आयुध लिये रहते हैं तथा कौस्तुभ मणि एवं श्रीवत्स चिह्न से सुशोभित रहते हैं। उनके लक्षणों का वर्णन इस रूप में किया जाता है।

नमस्ते वासुदेवाय नमः सङ्कर्षणाय च ।।प्रद्युम्नायानिरुद्धाय तुभ्यं भगवते नमः ॥

३३८ ॥

मैं उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ, जिन्होंने वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध रूप में अपना विस्तार किया।

एइ मन्त्रे द्वापरे करे कृष्णार्चन । ‘कृष्ण-नाम-सङ्कीर्तन' कलि-युगेर धर्म ॥

३३९॥

इस मन्त्र से लोग द्वापर युग में कृष्ण की पूजा करते हैं। कलियुग में लोगों का वृत्तिपरक कर्म है कृष्ण के पवित्र नाम का सामूहिक कीर्तन करना।

‘पीत'-वर्ण धरि' तबे कैला प्रवर्तन ।।प्रेम-भक्ति दिला लोके ला भक्त-गण ॥

३४० ॥

अपने निजी भक्तों के साथ पीत ( सुनहला ) वर्ण धारण करके भगवान् कृष्ण कलियुग में हरिनाम संकीर्तन अर्थात् हरे कृष्ण मन्त्र के कीर्तन का प्रचार करते हैं। इस तरह वे सामान्य जनता को कृष्ण-प्रेम लाकर देते हैं।

धर्म प्रवर्तन करे व्रजेन्द्र-नन्दन ।प्रेमे गाय नाचे लोक करे सङ्कीर्तन ॥

३४१॥

नन्द महाराज के पुत्र भगवान् कृष्ण ने कलियुग के वृत्तिपरक कार्य ( धर्म ) को स्वयं प्रवर्तन किया। वे कीर्तन करते हैं, भावावेश में नाचते हैं और इस तरह समस्त जगत् सामूहिक संकीर्तन करता है।

कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्र-पार्षदम् । यज्ञैः सङ्कीर्तन-प्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥

३४२॥

कलियुग में बुद्धिमान व्यक्ति कृष्ण-नाम का निरन्तर गान करने वाले भगवान् के अवतार की पूजा करने के लिए संकीर्तन करते हैं। यद्यपि उनका वर्ण श्याम नहीं है, किन्तु वे साक्षात् कृष्ण हैं। उनके साथ उनके पार्षद, सेवक, अस्त्र तथा विश्वस्त संगी रहते हैं।'

आर तिन-युगे ध्यानादिते येइ फल हय ।कलि-युगे कृष्ण-नामे सेइ फल पाय ॥

३४३ ॥

अन्य तीन युगों में सत्य, त्रेता तथा द्वापर में लोग विभिन्न प्रकार के आध्यात्मिक कार्य करते हैं। इस प्रकार से उन्हें जो फल मिलता है, उसे कलियुग में वे केवल हरे कृष्ण महामंत्र का कीर्तन करके प्राप्त कर सकते हैं।

कलेर्दोष-निधे राजन्नस्ति ह्येको महान्गुणः ।। कीर्तनादेव कृष्णस्य मुक्त-बन्धः परं व्रजेत् ॥

३४४॥

हे राजन्, यद्यपि कलियुग दोषों से भरा है, किन्तु फिर भी इस युग में एक उत्तम गुण है। वह यह है कि हरे कृष्ण महामन्त्र के कीर्तन मात्र से मनुष्य भवबन्धन से मुक्त हो सकता है और दिव्य धाम को प्राप्त कर सकता है।'

कृते ग्रयायतो विष्णुं त्रेतायां यजतो मखैः ।।द्वापरे परिचय़यां कलौ तद्धरि-कीर्तनात् ॥

३४५ ॥

| सत्ययुग में विष्णु का ध्यान करने से, त्रेतायुग में यज्ञ करने से तथा द्वापर युग में भगवान् के चरणकमलों की सेवा करने से जो फल प्राप्त होता है, उसे कलियुग में हरे कृष्ण महामन्त्र के कीर्तन द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।

ध्यायन्कृते यजन् यज्ञैत्रेतायां द्वापरेऽर्चयन् । ग्रदाप्नोति तदाप्नोति कलौ सङ्कीर्घ्य केशवम् ॥

३४६॥

सत्ययुग में ध्यान करने से, त्रेतायुग में यज्ञ करने से या द्वापर युग में कृष्ण के चरणकमलों की पूजा करने से जो फल प्राप्त होता है, उसे कलियुग में केवल केशव के गुणगान द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है।

कलि सभाजयन्त्यार्या गुण-ज्ञाः सार-भागिनः ।। ऋत्र सङ्कीर्तनेनैव सर्व-स्वार्थोऽभिलभ्यते ॥

३४७॥

जो लोग उन्नत और अत्यन्त योग्य हैं तथा जीवन के सार में रुचि रखते हैं, वे कलियुग के सद्गुणों को जानते हैं। ऐसे लोग कलियुग की पूजा करते हैं, क्योंकि इस युग में हरे कृष्ण महामन्त्र के कीर्तन मात्र से मनुष्य आत्म-ज्ञान में प्रगति कर सकता है और जीवन का लक्ष्य प्राप्त कर सकता है।'

पूर्ववत् लिखि स्रबे गुणावतार-गण । असङ्ख्य सङ्ख्या ताँर, ना हय गणन ॥

३४८॥

जैसाकि मैंने गुणावतारों का वर्णन करते हुए बतलाया था, उसी तरह इन अवतारों को भी असंख्य समझना चाहिए, क्योंकि किसी के भी द्वारा इनकी गणना नहीं की जा सकती।

चारि-मुगावतारे एइ त' गणन ।शुनि' भङ्गि करि' ताँरै पुछे सनातन ॥

३४९॥

इस तरह मैंने चारों युगों के अवतारों का विवरण प्रस्तुत किया है। यह सब सुनकर सनातन गोस्वामी ने महाप्रभु को अप्रत्यक्ष रूप से इंगित किया।

राज-मन्त्री सनातन-बुद्ध्ये बृहस्पति ।।प्रभुर कृपाते पुछे असङ्कोच-मति ॥

३५० ॥

सनातन गोस्वामी नवाब हुसेन शाह के अधीन एक मन्त्री थे और वे निस्सन्देह स्वर्ग के प्रमुख पुरोहित बृहस्पति जैसे ही बुद्धिमान थे। भगवान् की असीम कृपा के फलस्वरूप सनातन गोस्वामी ने बिना किसी संकोच के महाप्रभु से पूछा।

‘अति क्षुद्र जीव मुञि नीच, नीचाचार । केमने जानिब कलिते कोनवतार?' ॥

३५१॥

सनातन गोस्वामी ने कहा : मैं अत्यन्त क्षुद्र जीव हूँ। मैं नीच हूँ और मेरा आचरण नीच है। भला मैं कैसे जान सकता हूँ कि कलियुग में कौन अवतार है? प्रभु कहे,–अन्यावतार शास्त्र-द्वारे जानि ।।कलिते अवतार तैछे शास्त्र-वाक्ये मानि ॥

३५२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, जिस तरह अन्य युगों के अवतार को शास्त्रों के आदेशानुसार स्वीकार किया जाता है, इस कलियुग में ईश्वर के अवतार को उसी तरह स्वीकार किया जाना चाहिए।

सर्वज्ञ मुनिर वाक्य शास्त्र-‘परमाण' ।। आमा-सया जविर हय शास्त्र-द्वारा 'ज्ञान' ॥

३५३ ।। सर्वज्ञ महामुनि व्यासदेव द्वारा रचित वैदिक ग्रन्थ सारे आध्यात्मिक अस्तित्व के प्रमाण हैं। इन्हीं प्रामाणिक शास्त्रों के द्वारा सारे बद्धजीव ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं।

अवतार नाहि कहे- आमि अवतार' ।। मुनि सब जानि' करे लक्षण-विचार ॥

३५४॥

ईश्वर का वास्तविक अवतार यह कभी नहीं कहता कि, 'मैं ईश्वर हूँ या 'मैं ईश्वर का अवतार हूँ।' महामुनि व्यासदेव ने यह सब जानते हुए पहले से शास्त्रों में अवतारों के लक्षण अंकित कर दिये हैं।

ग्रस्यावतारा ज्ञायन्ते शरीरेष्वशरीरिणः । तैस्तैरतुल्यातिशयैर्वीर्यैर्देहिष्वसङ्गतैः ॥

३५५॥

भगवान् का शरीर भौतिक नहीं होता, फिर भी वे अपने दिव्य शरीर में अवतार के रूप में मनुष्यों के बीच आते हैं। अतः यह समझना अत्यन्त कठिन है कि कौन अवतार है। वे कुछ तो अपने अद्वितीय शौर्य से तथा कुछ उन असाधारण कार्यों से, जो देहधारी जीवों के लिए असम्भव हैं, जाने जाते हैं कि वे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अवतार हैं।

‘स्वरूप'-लक्षण, आर 'तटस्थ-लक्षण' । एइ दुइ लक्षणे 'वस्तु' जाने मुनि-गण ॥

३५६॥

बड़े-बड़े मुनि किसी वस्तु को दो लक्षणों से जान पाते हैं-स्वरूपलक्षणों तथा तटस्थ लक्षणों से।

आकृति, प्रकृति, स्वरूप, स्वरूप-लक्षण ।कार्य-द्वारा ज्ञान,——एई तटस्थ-लक्षण ॥

३५७॥

आकृति (शारीरिक लक्षण), प्रकृति ( स्वभाव) तथा रूप-ये निजी लक्षण हैं। प्रभु के कार्यकलापों का ज्ञान तटस्थ लक्षण प्रस्तुत करता है।

भागवतारम्भे व्यासे मङ्गलाचरणे ।‘परमेश्वर' निरूपिल एइ दुइ लक्षणे ॥

३५८ ॥

श्रीमद्भागवत के मंगलाचरण में श्रील वेदव्यास ने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का वर्णन इन्हीं लक्षणों द्वारा किया है।

जन्माद्यस्य व्रतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्वराट्तेने ब्रह्म हुदा य़ आदि-कवये मुह्यन्ति यत्सूरयः । तेजो-वारि-मृदां ग्रथा विनिमयो यत्र त्रिसर्गोऽमृषाधाम्ना स्वेन सदा निरस्त-कुहकं सत्यं परं धीमहि ॥

३५९॥

हे प्रभु, हे वसुदेव-पुत्र श्रीकृष्ण, हे सर्वव्यापी भगवान्, मैं आपको सादर नमस्कार करता हूँ। मैं भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ, क्योंकि वे परम सत्य हैं और व्यक्त ब्रह्माण्डों की उत्पत्ति, पालन तथा संहार के समस्त कारणों के आदि कारण हैं। वे प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से सारे प्राकट्यों से अवगत रहते हैं और वे परम स्वतन्त्र हैं, क्योंकि उनसे परे अन्य कोई कारण है ही नहीं। उन्होंने ही सर्वप्रथम आदि जीव ब्रह्माजी के हृदय में वैदिक ज्ञान प्रदान किया। उन्हीं के कारण बड़े-बड़े मुनि तथा देवता उसी तरह मोह में पड़ जाते हैं, जिस प्रकार अग्नि में जल या जल में स्थल देखकर कोई माया के द्वारा मोहग्रस्त हो जाता है। उन्हीं के कारण ये सारे भौतिक ब्रह्माण्ड, जो प्रकृति के तीन गुणों की प्रतिक्रिया के कारण अस्थायी रूप से प्रकट होते हैं, वास्तविक लगते हैं जबकि ये अवास्तविक होते हैं। अतः मैं उन भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ, जो भौतिक जगत के भ्रामक रूपों से सर्वथा मुक्त अपने दिव्य धाम में निरन्तर वास करते हैं। मैं उनका ध्यान करता हूँ, क्योंकि वे ही परम सत्य हैं।'

एई श्लोके ‘परं'-शब्दे 'कृष्ण'-निरूपण ।।‘सत्यं' शब्द कहे ताँर स्वरूप-लक्षण ॥

३६० ।। श्रीमद्भागवत के इस मंगलाचरण में ‘परम्' शब्द पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण का सूचक है और 'सत्यम्' शब्द उनके स्वरूप-लक्षण को बतलाता है।

विश्व-सृष्ट्यादि कैल, वेद ब्रह्माके पड़ाइल ।।अर्थाभिज्ञता, स्वरूप-शक्त्ये माया दूर कैल ।। ३६१॥

इसी श्लोक में यह भी कहा गया है कि भगवान् इस विराट् जगत् के स्रष्टा, पालक तथा संहारक हैं और उन्होंने ब्रह्मा को वेदों का ज्ञान प्रदान करके ब्रह्माण्ड की रचना करने के लिए प्रेरित किया। यह भी कहा गया है कि भगवान् को पूर्ण प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष ज्ञान है, वे भूत, वर्तमान तथा भविष्य को जानने वाले हैं और उनकी निजी शक्ति माया से अलग है ।

एइ सब कार्यताँर तटस्थ-लक्षण ।अन्य अवतार ऐछे जाने मुनि-गण ॥

३६२ ।। ये सारे कार्यकलाप ही उनके तटस्थ-लक्षण हैं। महान् मुनि लोग स्वरूप तथा तटस्थ लक्षणों के संकेतों से ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के अवतारों को जान पाते हैं। कृष्ण के सारे अवतारों को इसी तरह से समझना होगा।

अवतार-काले हय जगते गोचर । एई दुई लक्षणे केह जानये ईश्वर ॥

३६३ ॥

भगवान् के अवतार प्रकट होने के समय जगत-भर में विख्यात हो जाते हैं, क्योंकि लोग अवतार के मुख्य लक्षण, जिन्हें स्वरूप तथा तटस्थ कहा जाता है, जानने के लिए शास्त्रों को देखते हैं। इस तरह ये अवतार मुनियों द्वारा जाने जाते हैं।

सनातन कहे, झाते ईश्वर-लक्षण । पीत-वर्ण, कार्य-प्रेम-दान-सङ्कीर्तन ॥

३६४॥

सनातन गोस्वामी ने कहा, जिस पुरुष में भगवान् के लक्षण पाये जाते हैं, उसका रंग पीला है। उसके कार्यकलापों में भगवत्प्रेम वितरण तथा भगवन्नाम का कीर्तन सम्मिलित हैं।

कलि-काले सेइ ‘कृष्णावतार' निश्चय ।सुदृढ़ करिया कह, ग्राउक संशय ॥

३६५ ॥

इस युग में कृष्ण के अवतार का संकेत इन्हीं लक्षणों से मिलता है। कृपया इसकी पुष्टि अवश्य करें, जिससे मेरे सारे सन्देह दूर हो सकें।

प्रभु कहे,- चतुरालि छाड़, सनातन ।शक्त्यावेशावतारेर शुन विवरण ॥

३६६ ।। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, हे सनातन, तुम अपनी चतुराई छोड़ो। अब तुम शक्त्यावेश अवतार का विवरण समझने का प्रयत्न करो।

शक्त्यावेशावतार कृष्योर असङ्ख्य गणन । दिग्दरशन करि मुख्य मुख्य जन ॥

३६७॥

भगवान् कृष्ण के शक्त्यावेश अवतार असंख्य हैं। मैं उनमें से मुख्यमुख्य अवतारों का वर्णन करता हूँ।

शक्त्यावेश दुइ-रूप-‘मुख्य', 'गौण' देखि । साक्षात्शक्त्ये 'अवतार', आभासे 'विभूति' लिखि ॥

३६८॥

शक्त्यावेश अवतार दो प्रकार के हैं-मुख्य तथा गौण। मुख्य वे हैं, जिन्हें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सीधे शक्ति प्रदान करते हैं और वे अवतार कहलाते हैं। गौण वे हैं, जिन्हें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अप्रत्यक्ष रूप से शक्ति प्रदान करते हैं और तब वे विभूति कहलाते हैं।

‘सनकादि', 'नारद', 'पृथु' 'परशुराम' ।। जीव-रूप 'ब्रह्मार' आवेशावतार-नाम ॥

३६९ ॥

कुछ शक्त्यावेश अवतार इस प्रकार हैं-चार कुमार, नारद, महाराज पृथु तथा परशुराम। जब किसी जीव को ब्रह्मा जैसा कार्य करने के लिए शक्ति प्रदान की जाती है, तब वह भी शक्त्यावेश अवतार माना जाता है।

वैकुण्ठे ‘शेष'–धरा धरये 'अनन्त' ।।एइ मुख्यावेशावतार–विस्तारे नाहि अन्त ॥

३७० ॥

वैकुण्ठ लोक में भगवान् शेष तथा भौतिक जगत् में अपने फनों पर असंख्य लोकों को धारण करने वाले भगवान् अनन्त-ये दोनों मुख्य शक्त्यावेश अवतार हैं। अन्यों को गिनने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनकी संख्या अनन्त है।

सनकाद्ये 'ज्ञान'-शक्ति, नारदे शक्ति ‘भक्ति' । ब्रह्माय 'सृष्टि'-शक्ति, अनन्ते 'भू-धारण'-शक्ति ॥

३७१॥

चारों कुमारों में ज्ञानशक्ति निहित की गई थी और नारद में भक्ति की शक्ति निहित की गई थी। सृजन करने की शक्ति ब्रह्माजी में निहित की गई थी तथा असंख्य लोकों को धारण करने की शक्ति भगवान् अनन्त में निहित की गई थी।

शेषे 'स्व-सेवन'-शक्ति, पृथुते 'पालन' । परशुरामे 'दुष्ट-नाशक-वीर्घ-संञ्चारण' ॥

३७२॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने व्यक्तिगत सेवा करने की शक्ति भगवान् शेष को प्रदान की और पृथ्वी पर शासन करने की शक्ति राजा पृथु को। भगवान् परशुराम को सारे दुष्टों तथा धूर्ते का वध करने की शक्ति प्राप्त हुई थी।

ज्ञान-शक्त्यादि-कलया यत्राविष्टो जनार्दनः ।।त आवेशा निगद्यन्ते जीवा एव महत्तमाः ॥

३७३ ॥

जब-जब भगवान् अपनी विविध शक्तियों के अंश रूप में किसी में विद्यमान रहते हैं, तब वह जीव शक्त्यावेश अवतार कहलाता है।

‘विभूति' कहिये ग्रैछे गीता-एकादशे ।जगत्व्यापिल कृष्ण-शक्त्याभासावेशे ॥

३७४॥

जैसाकि भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में बताया गया है, कृष्ण ने सारे ब्रह्माण्ड में अपना विस्तार विभूति नामक अपनी विशिष्ट शक्तियों के माध्यम से अनेक पुरुषों में किया है।

यद् यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूजितमेव वा ।।तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽश-सम्भवम् ॥

३७५ ॥

यह जान लो कि समस्त ऐश्वर्यशाली सुन्दर, यशस्वी तथा महिमायुक्त सृष्टियाँ मेरे तेज के स्फुलिंग मात्र से प्रकट होती हैं।

अथ वा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।।विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥

३७६ ॥

किन्तु हे अर्जुन, इस समस्त विस्तृत ज्ञान की क्या आवश्यकता है? मैं तो अपने एक अंश-मात्र से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त हूँ और इसको आश्रय देता हूँ।

एइत कहिलँ शक्त्यावेश-अवतार ।।बाल्य-पौगण्ड-धर्मेर शुनह विचार ॥

३७७॥

इस तरह मैं विशेष रूप से शक्त्याविष्ट अवतारों का वर्णन कर चुका हूँ। अब मुझसे कृष्ण के बाल्यकाल, पौगण्ड तथा युवावस्था (किशोर) के लक्षणों को सुनो।

किशोर-शेखर-धर्मी व्रजेन्द्र-नन्दन ।प्रकट-लीला करिबारे ग्रबे करे मन ॥

३७८ ॥

महाराज नन्द के पुत्र के रूप में भगवान् कृष्ण स्वभावतः आदर्श किशोर ( युवक ) हैं। वे इस अवस्था में अपनी लीलाएँ प्रकट करना चाहते हैं।

आदौ प्रकट कराय माता-पिता–भक्त-गणे । पाछे प्रकट हय जन्मादिक-लीला-क्रमे ॥

३७९॥

स्वयं प्रकट होने के पूर्व भगवान् अपने कुछ भक्तों को अपने माता, पिता तथा घनिष्ठ संगियों के रूप में प्रकट होने देते हैं। इसके बाद वे इस तरह प्रकट होते हैं, मानो जन्म ले रहे हों और फिर बढ़कर क्रमशः शिशु तथा किशोर बनते हैं।

वयसो विविधत्वेऽपि सर्व-भक्ति-रसाश्रयः ।। धर्मी किशोर एवात्र नित्य-लीला-विलासवान् ॥

३८० ॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् नित्य लीला-विलास करते हैं और वे सभी प्रकार की भक्ति के आश्रय हैं। यद्यपि उनकी अवस्थाएँ विविध हैं, किन्तु इनमें किशोर अवस्था (युवा-पूर्व ) सर्वोत्तम है।'

पूतना-वधादि व्रत लीला क्षणे क्षणे ।।सब लीला नित्य प्रकट करे अनुक्रमे ॥

३८१॥

जब भगवान् कृष्ण प्रकट होते हैं, तो वे क्षण क्षण अपनी लीलाएँ प्रकट करते हैं-यथा पूतना-वध इत्यादि। ये सारी लीलाएँ एक के बाद एक शाश्वत रूप से प्रदर्शित की जाती हैं।

अनन्त ब्रह्माण्ड, तार नाहिक गणन । कोन लीला कोन ब्रह्माण्डे हय प्रकटन ॥

३८२॥

कृष्ण की क्रमिक लीलाएँ क्षणानुक्षण अनन्त ब्रह्माण्डों में से किसीन-किसी में प्रकट होती रहती हैं। इन ब्रह्माण्डों को गिन पाना सम्भव नहीं है, किन्तु तो भी इनमें से किसी-न-किसी ब्रह्माण्ड में भगवान् की कोईन-कोई लीला प्रकट होती रहती है।

एइ-मत सब लीला—येन गङ्गा-धार ।से-से लीला प्रकट करे व्रजेन्द्रकुमार ।। ३८३॥

इस तरह भगवान् की लीलाएँ बहते गंगाजल के समान हैं। ये नन्द महाराज के पुत्र द्वारा इस प्रकार प्रकट की जाती हैं।

क्रमे बाल्य-पौगण्ड-कैशोरता-प्राप्ति ।रास-आदि लीला करे, कैशोरे नित्य-स्थिति ॥

३८४॥

भगवान् कृष्ण बाल्यकाल, पौगण्ड तथा किशोरावस्था की लीलाएँ प्रकट करते हैं। जब वे किशोर हो जाते हैं, तो वे अपना रासनृत्य तथा अन्य लीलाएँ करने के लिए शाश्वत रूप से विद्यमान रहते हैं।

‘नित्य-लीला' कृष्णेर सर्व-शास्त्रे कय ।। बुझिते ना पारे लीला केमने 'नित्य' हय ॥

३८५॥

समस्त प्रामाणिक शास्त्रों में कृष्ण की नित्य लीलाओं का वर्णन मिलता है। किन्तु कोई यह नहीं समझ सकता कि ये लीलाएँ किस तरह से सनातन रूप से चली आती हैं।

दृष्टान्त दिया कहि तबे लोक यदि जाने । कृष्ण-लीला नित्य, ज्योतिश्चक्र-प्रमाणे ॥

३८६॥

मैं एक दृष्टान्त देता हूँ, जिससे लोग भगवान् कृष्ण की सनातन लीलाओं को समझ सकें। इसका एक उदाहरण राशिचक्र में देखा जा सकता है।

ज्योतिश्चक्रे सूर्य ग्रेन फिरे रात्रि-दिने । सप्त-द्वीपाम्बुधि लङ्घि' फिरे क्रमे क्रमे ॥

३८७॥

सूर्य रात-दिन राशिचक्र से होकर घूमता है और सात द्वीपों के मध्य के सागरों को बारी-बारी से पार करता है।

रात्रि-दिने हय षष्टि-दण्ड-परिमाण । तिन-सहस्र छय-शत 'पल' तार मान ॥

३८८॥

- वैदिक ज्योतिष गणना के अनुसार सूर्य साठ दण्डों में चक्कर पूरा करता है, और यह तीन हजार छह सौ पलों में विभाजित है।

सूर्योदय हैते षष्टि-पल-क्रमोदय । सेइ एक दण्ड, अष्ट दण्डे ‘प्रहर' हय ॥

३८९॥

सूर्य क्रमशः साठ पलों में उदय होता है। साठ पल एक दण्ड के बराबर होते हैं और आठ दण्ड का एक प्रहर होता है।

एक-दुइ-तिन-चारि प्रहरे अस्त हय ।।चारि-प्रहर रात्रि गेले पुनः सूर्योदय ॥

३९०॥

रात और दिन आठ प्रहरों में विभाजित हैं। चार प्रहर दिन के हैं तो चार प्रहर रात के। आठ प्रहर के बाद सूर्य पुनः उदय होता है।

ऐछे कृष्णेर लीला-मण्डल चौद्द-मन्वन्तरे ।।ब्रह्माण्ड-मण्डल व्यापि क्रमे क्रमे फिरे ।। ३९१॥

सूर्य की ही तरह कृष्ण की लीलाओं का कक्ष है। ये लीलाएँ एक के बाद एक प्रकट होती हैं। चौदह मन्वन्तरों में यह कक्ष समस्त ब्रह्माण्ड तक विस्तार करता है और क्रमशः फिर से लौट आता है। इस तरह कृष्ण अपनी लीलाओं के माध्यम से एक एक करके सारे ब्रह्माण्डों में विचरण करते हैं।

सओयाशत वत्सर कृष्णेर प्रकट-प्रकाश ।ताहा ग्रैछे व्रज-पुरे करिला विलास ॥

३९२॥

कृष्ण किसी एक ब्रह्माण्ड में १२५ वर्षों तक रहते हैं और अपनी लीलाओं का आनन्द वृन्दावन तथा द्वारका दोनों में लेते हैं।

अलात-चक्र-प्राय सेइ लीला-चक्र फिरे ।।सब लीला सब ब्रह्माण्डे क्रमे उदय करे ॥

३९३॥

उनकी लीलाओं का चक्र अग्निचक्र के समान है। इस तरह से कृष्ण एक एक करके अपनी लीलाएँ हर ब्रह्माण्ड में प्रकट करते हैं।

जन्म, बाल्य, पौगण्ड, कैशोर प्रकाश ।।पूतना-वधादि करि' मौषलान्त विलास ॥

३९४॥

कृष्ण के जन्म, बाल्यकाल, पौगण्ड तथा किशोरावस्था की लीलाएँ पूतना-वध से लेकर मौषल-लीला, अर्थात् यदु-वंश के नाश तक प्रकट होती हैं। ये सारी लीलाएँ प्रत्येक ब्रह्माण्ड में चक्कर लगाती रहती हैं।

कोन ब्रह्माण्डे कोन लीलार हय अवस्थान । ताते लीला 'नित्य' कहे आगम-पुराण ॥

३९५ ॥

चूंकि कृष्ण की सारी लीलाएँ लगातार घटित होती रहती हैं, अतएव प्रत्येक क्षण कोई लीला किसी-न-किसी ब्रह्माण्ड में विद्यमान रहती है। फलतः वेद तथा पुराण इन्हें नित्य लीला कहते हैं।

गोलोक, गोकुल-धाम–'विभु' कृष्ण-सम । कृष्णेच्छाय ब्रह्माण्डे-गणे ताहार सङ्क्रम ॥

३९६॥

गोलोक नामक आध्यात्मिक धाम, जो सुरभि गौवों की चारण भूमि है, कृष्ण के ही समान शक्तिशाली तथा ऐश्वर्यमय है। कृष्ण की इच्छा से मूल गोलोक तथा गोकुल धाम उनके साथ-साथ सारे ब्रह्माण्डों में प्रकट होते हैं।

अतएव गोलोक-स्थाने नित्य विहार ।। ब्रह्माण्ड-गणे क्रमे प्राकट्य ताहार ॥

३९७॥

कृष्ण की नित्य लीलाएँ मूल गोलोक-वृन्दावन ग्रह में निरन्तर चलती रहती हैं। यही लीलाएँ भौतिक जगत् में प्रत्येक ब्रह्माण्ड में क्रमशः प्रकट होती हैं।

व्रजे कृष्ण- सर्वैश्वर्य-प्रकाशे ‘पूर्णतम' ।।पुरी-द्वये, परव्योमे–‘पूर्णतर’, ‘पूर्ण' ॥

३९८॥

आध्यात्मिक आकाश ( वैकुण्ठ) में कृष्ण पूर्ण होते हैं। मथुरा तथा द्वारका में वे और अधिक पूर्ण ( पूर्णतर) होते हैं, किन्तु अपना सारा ऐश्वर्य प्रकट करने के कारण वे वृन्दावन, व्रज में सर्वाधिक पूर्ण ( पूर्णतम ) होते हैं।

हरिः पूर्णतमः पूर्ण-तरः पूर्ण इति त्रिधा ।श्रेष्ठ-मध्यादिभिः शब्दैर्नाट्ये ग्रः परिपठ्यते ॥

३९९॥

नाट्य ग्रन्थों में इसे पूर्ण, पूर्णतर तथा पूर्णतम कहा गया है। इस तरह भगवान् कृष्ण अपने आपको पूर्ण, पूर्णतर तथा पूर्णतम-इन तीन प्रकारों से प्रकट करते हैं।

प्रकाशिताखिल-गुणः स्मृतः पूर्णतमो बुधैः ।।असर्व-व्यञ्जकः पूर्ण-तरः पूर्णोऽल्प-दर्शकः ॥

४०० ॥

जब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपने समस्त गुणों को प्रदर्शित नहीं करते होते, तब वे पूर्ण कहलाते हैं। जब वे सारे गुणों को अपूर्ण रूप से प्रकट करते हैं, तब वे पूर्णतर कहलाते हैं। जब वे सारे गुणों को पूरी तरह से प्रकट करते हैं, तब वे पूर्णतम कहलाते हैं। भक्तियोग के समस्त विद्वानों का यह कथन है।"

कृष्णस्य पूर्णतमता व्यक्ताभूगोकुलान्तरे ।।पूर्णता पूर्णतरता द्वारका-मथुरादिषु ॥

४०१॥

कृष्ण के पूर्णतम गुण वृन्दावन में और उनके पूर्ण तथा पूर्णतर गुण द्वारका तथा मथुरा में प्रकट होते हैं।'

एइ कृष्ण-व्रजे 'पूर्णतम' भगवान् ।आर सब स्वरूप‘पूर्णतर' ‘पूर्ण' नाम ॥

४०२॥

वृन्दावन में भगवान् कृष्ण, पूर्णतम भगवान् हैं। अन्यत्र उनके विस्तार या तो पूर्ण हैं या पूर्णतर हैं।

सङ्क्षेपे कहिलै कृष्णेर स्वरूप-विचार ।'अनन्त' कहिते नारे इहार विस्तार ॥

४०३॥

इस तरह मैंने कृष्ण के दिव्य स्वरूपों के प्राकट्य का संक्षिप्त वर्णन किया है। यह विषय इतना विस्तृत है कि भगवान् अनन्त भी पूर्णरूप से इसका वर्णन नहीं कर सकते।

अनन्त स्वरूप कृष्णेर नाहिक गणने ।शाखा-चन्द्र-न्याये करि दिग्दरशन ॥

४०४॥

इस प्रकार कृष्ण के दिव्य रूपों का अनन्त विस्तार हुआ है। कोई भी उनकी गणना नहीं कर सकता। मैंने जो कुछ बतलाया है, वह मात्र एक झलक है। यह उसी तरह है, जैसाकि किसी वृक्ष की शाखाओं में से होकर चाँद को दिखलाना।

इहा येइ शुने, पड़े, सेइ भाग्यवान् ।कृष्णेर स्वरूप-तत्त्वेर हय किछु ज्ञान ॥

४०५॥

जो भी कृष्ण के शरीर के विस्तारों के इन विवरणों को सुनता है। या सुनाता है, वह निश्चित रूप से अत्यन्त भाग्यवान है। यद्यपि इसे समझ पाना बहुत कठिन है, किन्तु इससे कृष्ण के शरीर के विभिन्न स्वरूपों का कुछ न कुछ ज्ञान प्राप्त हो जाता है।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

४०६॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए, सदैव उनकी कृपा का इच्छुक, मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों का अनुगमन करते हुए श्री चैतन्य-चरितामृत कह रहा हूँ।

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