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अध्याय उन्नीस: भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु श्रील रूप गोस्वामी को निर्देश देते हैं

वृन्दावनीयां रस-केलि-वार्ताकालेन लुप्तां निज-शक्तिमुत्कः ।। सञ्चार्य रूपे व्यतनोत्पुनः स ।प्रभुर्विधौ प्रागिव लोक-सृष्टिम् ॥

१॥

इस विराट् जगत् की सृष्टि करने के पूर्व भगवान् ने ब्रह्मा के हृदय में प की विस्तृत जानकारी प्रकाशित की और वैदिक ज्ञान प्रकट किया। .ओक उसी तरह से महाप्रभु ने भगवान् कृष्ण की वृन्दावन-लीलाओं को पुनर्जीवित करने के लिए रूप गोस्वामी के हृदय को आध्यात्मिक शक्ति प्रचारित किया। श्रील रूप गोस्वामी इस शक्ति से वृन्दावन में कृष्ण भी उन लीलाओं को पुनरुज्जीवित कर सके, जो प्रायः विस्मृत हो चुकी है। इस तरह उन्होंने सारे विश्व में कृष्णभावनामृत का विस्तार किया।

जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! नित्यानन्द प्रभु की जय हो! अद्वैतचन्द्र की जय हो तथा महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो! श्री-रूप-सनातन रहे रामकेलि-ग्रामे ।।प्रभुरे मिलिया गेला आपन-भवने ॥

३॥

रामकेलि गाँव में श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने के बाद रूप तथा सनातन दोनों भाई अपने अपने घर लौट गये।

दुइ-भाइ विषय-त्यागेर उपाय सृजिल ।बहु-धन दियो दुइ ब्राह्मणे वरिल ।।४॥

दोनों भाइयों ने एक उपाय सोचा जिससे वे अपने भौतिक कार्यकलापों को त्याग सकें। इसके लिए उन्होंने दो ब्राह्मण नियुक्त किये और उन्हें प्रचुर धन दिया।

कृष्ण-मन्त्रे कराइल दुइ पुरश्चरण ।।अचिरात्पाइबारे चैतन्य-चरण ॥

५॥

ब्राह्मणों ने धार्मिक कृत्य सम्पन्न किया और कृष्ण के पवित्र नाम का उच्चारण किया, जिससे दोनों भाइयों को शीघ्र ही श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में शरण प्राप्त हो सके।

श्री-रूप-गोसाजि तबे नौकाते भरिया ।।आपनार घरे आइला बहु-धन लञा ॥

६॥

इसी समय श्री रूप गोस्वामी अपने साथ नावों में प्रचुर मात्रा में धन लेकर घर लौटे।

ब्राह्मण-वैष्णवे दिला तार अर्ध-धने ।।एक चौठि धन दिला कुटुम्ब-भरणे ॥

७॥

श्रील रूप गोस्वामी ने घर लाये गये धन का बँटवारा कर दिया। होंने पचास प्रतिशत धन ब्राह्मणों तथा वैष्णवों को दान में दे दिया और पधीस प्रतिशत अपने सम्बन्धियों को दिया।

दण्ड-बन्ध लागि' चौठि सञ्चय करिला ।भाल-भाल विप्र-स्थाने स्थाप्य राखिला ॥

८॥

उन्होंने अपनी चौथाई सम्पत्ति एक सम्मानित ब्राह्मण के पास रख दी। इसे उन्होंने अपनी निजी सुरक्षा के लिए रखा, क्योंकि उन्हें आशंका थी। कि वे कहीं कोई कानूनी झंझट में न फंस जायें।

गौड़े राखिल मुद्रा दश-हाजारे ।सनातन व्यय करे, राखे मुदि-घरे ॥

९॥

उन्होंने दस हजार सिक्के एक स्थानीय बंगाली बनिये के यहाँ जमा कर दिये थे, जिनका खर्च बाद में श्री सनातन गोस्वामी ने किया।

श्री-रूप शुनिल प्रभुर नीलाद्रि-गमन ।।वन-पथे ग्राबेन प्रभु श्री-वृन्दावन ॥

१०॥

श्री रूप गोस्वामी ने सुना कि श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथपुरी लौट गये हैं और जंगल से होकर वृन्दावन जाने की तैयारी कर रहे हैं।

रूप-गोसाञि नीलाचले पाठाइल दुइ-जन ।प्रभु ग्रबे वृन्दावन करेन गमन ॥

११॥

श्रील रूप गोस्वामी ने यह पता करने के लिए दो व्यक्ति जगन्नाथपुरी भेजे कि श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन के लिए कब प्रस्थान करेंगे।

शीघ्र आसि' मोरे ताँर दिबा समाचार ।शुनिया तदनुरूप करिब व्यवहार ॥

१२॥

श्री रूप गोस्वामी ने दोनों व्यक्तियों से कहा, तुम लोग जल्दी लौटकर मुझे बताओ कि वे कब प्रस्थान करेंगे तब मैं समुचित व्यवस्था करूंगा।

एथा सनातन-गोसाञि भावे मने मन ।।राजा मोरे प्रीति करे, से–मोर बन्धन ॥

१३॥

गौड़देश में रहते हुए सनातन गोस्वामी सोच रहे थे, नवाब मुझसे अत्यन्त प्रसन्न है। मेरा निश्चित रूप से कर्तव्य बनता है।

कोन मते राजा यदि मोरे क्रुद्ध हय ।।तबे अव्याहति हय, करिलँ निश्चय ॥

१४॥

यदि नवाब किसी तरह मुझसे नाराज हो जाए, तो मुझे मुक्ति मिल सकती है। यही मेरा निश्चय है।

अस्वास्थ्येर छद्म करि' रहे निज-घरे । राज-कार्य छाड़िला, ना ट्राय राज-द्वारे ॥

१५॥

स्वास्थ्य खराब होने का बहाना करके सनातन गोस्वामी घर पर ही रहे। इस तरह उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और राजदरबार नहीं गये।

लोभी कायस्थ-गण राज-कार्य करे। आपने स्वगृहे करे शास्त्रेर विचारे ॥

१६ ॥

उनके लोभी क्लर्क तथा सचिवालय के कर्मचारी सरकारी कामकाज पूरा कर लेते, किन्तु सनातन घर पर रहते और शास्त्रों की चर्चा करते राहते।

भट्टाचार्य पण्डित बिश त्रिश लळा । भागवत विचार करेन सभाते वसिया ॥

१७॥

श्री सनातन गोस्वामी बीस-तीस विद्वान ब्राह्मणों की सभा में श्रीमद्भागवत पर चर्चा चलाते थे।

आर दिन गौड़ेश्वर, सङ्गे एक-जन ।। आचम्बिते गोसाजि-सभाते कैल आगमन ॥

१८॥

एक दिन जब सनातन गोस्वामी विद्वान ब्राह्मणों की सभा में श्रीमद्भागवत का अध्ययन कर रहे थे, तब बंगाल का नवाब तथा एक अन्य व्यक्ति सहसा वहाँ आ गये।

पात्साह देखिया सबे सम्भ्रमे उठिला ।। सम्भ्रमे आसन दिया राजारे वसाइला ॥

१९॥

ज्योंही सभी ब्राह्मणों तथा सनातन गोस्वामी ने नवाब को आते देखा, ने सभी खड़े हो गये और उन्होंने आदरपूर्वक उसे बैठने के लिए आसन दिया।

राजा कहे,—तोमार स्थाने वैद्य पाठाइलें ।।वैद्य कहे,—व्याधि नाहि, सुस्थ ये देखिलॆ ॥

२०॥

नवाब ने कहा, मैंने तुम्हारे पास मेरा वैद्य भेजा था। उसने सूचना दी। है कि तुम्हें कोई रोग नहीं है। उसके विचार से तुम पूर्ण स्वस्थ हो।

आमार किछु कार्य, सब तोमा लजा ।।कार्य छाड़ि' रहिला तुमि घरेते वसिया ॥

२१॥

मैं अनेकानेक कार्यों को पूरा करने के लिए तुम पर निर्भर हूँ, किन्तु तुम हो कि अपना सरकारी काम-काज छोड़कर घर पर बैठे रहते हो।

मोर व्रत कार्य-काम, सब कैला नाश ।। कि तोमार हृदये आछे, कह मोर पाश ॥

२२॥

तुमने मेरा सारा कामकाज बिगाड़ दिया है। आखिर तुम चाहते क्या । हो? कृपया मुझसे साफ साफ कहो।

सनातन कहे,—नहे आमा हैते काम ।। आर एक-जन दिया कर समाधान ॥

२३ ।। सनातन गोस्वामी ने उत्तर दिया, अब आप मुझसे किसी प्रकार के कार्य की आशा न करें। कृपा करके किसी दूसरे व्यक्ति को ढूंढ लें, जो अपकी व्यवस्था देख सके।

तबे क्रुद्ध हन्ना राजा कहे आर-बार ।तोमार 'बड़ भाइ' करे दस्यु-व्यवहार ॥

२४॥

सनातन गोस्वामी से नाराज होकर नवाब ने कहा, 'तुम्हारा बड़ा भाई लुटेरे जैसा व्यवहार कर रहा है। ' जीव-बहु मारि' कैल चाक्ला सब नाश ।एथा तुमि कैला मोर सर्व कार्य नाश ॥

२५॥

तुम्हारे बड़े भाई ने अनेक जीवों का वध करके समूचे बंगाल को नष्ट कर दिया है। अब तुम मेरी सारी योजनाओं को नष्ट कर रहे हो।

सनातन कहे,—तुमि स्वतन्त्र गौड़ेश्वर ।ये ग्रेइ दोष करे, देह' तार फल ॥

२६॥

सनातन गोस्वामी ने कहा, आप बंगाल के सर्वोच्च शासक हैं और पर्णतया स्वतन्त्र हैं। जब भी कोई व्यक्ति त्रुटि करता है, आप उसे उसी के हिसाब से दण्ड देते हैं।

एत शुनि' गौड़ेश्वर उठि' घरे गेला ।। पलाइब बलि' सनातनेरे बान्धिला ॥

२७॥

यह सुनकर बंगाल का नवाब उठ खड़ा हुआ और वह अपने घर लौट गया। उसने सनातन गोस्वामी को बन्दी बनाये जाने का आदेश दिया, जिससे वे कहीं जा न सकें।

हेन-काले गेल राजा उड़िया मारिते ।। सनातने कहे, तुमि चल मोर साथे ॥

२८॥

उस समय नवाब उड़ीसा प्रान्त पर आक्रमण करने जा रहा था और उसने सनातन गोस्वामी से कहा, तुम मेरे साथ चलो।

तेंहो कहे,—ग्राबे तुमि देवताय दुःख दिते ।मोर शक्ति नाहि, तोमार सङ्गे ग्राइते ॥

२९॥

सनातन गोस्वामी ने उत्तर दिया, आप तो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को कष्ट देने उड़ीसा जा रहे हैं। इसीलिए मैं आपके साथ जाने में अशक्त हूँ। तबे ताँरे बान्धि' राखि' करिला गमन ।।एथा नीलाचल हैते प्रभु चलिला वृन्दावन ॥

३०॥

नवाब ने फिर से सनातन गोस्वामी को बन्दी बनाया और जेल में शल दिया। उस समय श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी से वृन्दावन के ला चल पड़े।

तबे सेइ दुइ चर रूप-ठात्रि आइल ।।‘वृन्दावन चलिला प्रभु'-आसिया कहिल ॥

३१॥

दो व्यक्तियों ने, जो महाप्रभु के प्रस्थान का पता लगाने जगन्नाथ पुरी गये थे, लौटकर रूप गोस्वामी को सूचित किया कि महाप्रभु पहले ही वृन्दावन के लिए चल चुके हैं।

शुनिया श्री-रूप लिखिल सनातन-ठाजि । ‘वृन्दावन चलिला श्री-चैतन्य-गोसात्रि ॥

३२॥

इन दोनों सन्देशवाहकों से यह सन्देश पाकर रूप गोस्वामी ने तुरन्त सनातन गोस्वामी को यह पत्र लिखा कि श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन के लिए चल चुके हैं।

आमि-दुइ-भाइ चलिलाङताँहारे मिलिते ।।तुमि ग्रैछे तैछे छुटि' आइस ताहाँ हैते ॥

३३॥

श्रील रूप गोस्वामी ने सनातन गोस्वामी को अपने पत्र में लिखा, हम दोनों भाई श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने के लिए प्रस्थान करने वाले हैं। तुम भी किसी तरह छूटकर हमसे मिलो।

दश-सहस्र मुद्रा तथा आछे मुदि-स्थाने ।। ताहा दिया कर शीघ्र आत्म-विमोचने ॥

३४॥

रूप गोस्वामी ने श्रील सनातन गोस्वामी को यह भी सूचित किया, मैं वहाँ एक बनिये के पास दस हजार मुद्राएँ छोड़ आया हूँ। तुम उस धन का उपयोग अपने आपको जेल से छुड़ाने में करो।

भैछे तैछे छुटि' तुमि आइस वृन्दावन' ।। एत लिखि' दुइ-भाइ करिला गमन ॥

३५॥

किसी तरह से छूटकर वृन्दावन आओ। यह लिखकर दोनों भाई ( रूप गोस्वामी तथा अनुपम ) श्री चैतन्य महाप्रभु को मिलने चले गये।

अनुपम मल्लिक, ताँर नाम-'श्री-वल्लभ' ।। रूप-गोसाजिर छोट-भाइ–परम-वैष्णव ॥

३६॥

रूप गोस्वामी का छोटा भाई महान् भक्त था, जिसका सच्चा नाम श्री वल्लभ था; किन्तु उसका नाम अनुपम मल्लिक रख दिया गया था।

ताँहा लेजा रूप-गोसाजि प्रयागे आइला ।। महाप्रभु ताहाँ शुनि' आनन्दित हैला ॥

३७॥

श्रील रूप गोस्वामी तथा अनुपम मल्लिक प्रयाग गये और यह समाचार सुनकर अत्यधिक प्रसन्न हुए कि श्री चैतन्य महाप्रभु वहीं पर हैं।

प्रभु चलियाछेन बिन्दु-माधव-दरशने ।। लक्ष लक्ष लोक आइसे प्रभुर मिलने ॥

३८॥

प्रयाग में श्री चैतन्य महाप्रभु बिन्दुमाधव मन्दिर में दर्शन करने गये और लाखों लोग उनसे मिलने मात्र के लिए उनके पीछे पीछे चल रहे थे।

केह कान्दे, केह हासे, केह नाचे, गाय ।। 'कृष्ण' 'कृष्ण' बलि' केह गड़ागड़ि ग्राय ॥

३९ ॥

महाप्रभु के पीछे चलने वालों में से कुछ लोग रो रहे थे, कुछ हँस रहे थे, कुछ नाच और गा रहे थे। उनमें से कुछ कृष्ण! कृष्ण! पुकारकर भूमि पर लोट रहे थे।

गङ्गा-यमुना प्रयाग नारिल डुबाइते ।।प्रभु डुबाइल कृष्ण-प्रेमेर वन्याते ॥

४० ॥

प्रयाग, गंगा तथा यमुना-इन दो नदियों के संगम पर स्थित है। पपि ये नदियाँ अपने जल से प्रयाग को जलमग्न नहीं कर सकी थीं, जन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण-प्रेम की लहरों से पूरे भूभाग को अनावित कर दिया।

भिड़ देखि' दुइ भाइ रहिला निर्जने ।। प्रभुर आवेश हैल माधव-दरशने ॥

४१॥

बड़ी भीड़ देखकर दोनों भाई एकान्त स्थान पर खड़े रहे। उन्होंने देखा कि श्री चैतन्य महाप्रभु बिन्दु माधव का दर्शन पाकर प्रेमाविष्ट हो गये।

प्रेमावेशे नाचे प्रभु हरि-ध्वनि करि' ।। ऊर्ध्व-बाहु करि' बले—बल 'हरि' ‘हरि' ॥

४२ ॥

महाप्रभु हरि नाम का उच्च स्वर से कीतर्न कर रहे थे। प्रेमावेश में नाचते हुए और अपनी भुजाएँ उठाते हुए उन्होंने हर एक से हरि! हरि! बोलने के लिए कहा।

प्रभुर महिमा देखि' लोके चमत्कार । प्रयागे प्रभुर लीला नारि वर्णिबार ॥

४३॥

हर व्यक्ति श्री चैतन्य महाप्रभु की महानता देखकर अत्यन्त विस्मित प्रा। मैं महाप्रभु की प्रयाग-लीलाओं का ठीक-ठीक वर्णन नहीं कर सकता।

दाक्षिणात्य-विप्र-सने आछे परिचय ।।सेइ विप्र निमन्त्रिया निल निजालय ॥

४४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की दक्षिण भारत के एक ब्राह्मण से जान-पहचान हो गई थी और उस ब्राह्मण ने उन्हें भोजन के लिए निमन्त्रित किया। वह में अपने घर ले गया।

विप्र-गृहे आसि' प्रभु निभृते वसिला ।श्री-रूप-वल्लभ मुँहे आसिया मिलिला ॥

४५॥

जय महाप्रभु उस दाक्षिणात्य ब्राह्मण के घर एकान्त में बैठे थे, तब रूप गोस्वामी तथा श्री वल्लभ ( अनुपम मल्लिक) उनसे भेंट करने वाले आये।

दुइ-गुच्छ तृण बँहे दशने धरिया । प्रभु देखि' दूरे पड़े दण्डवत् ही ॥

४६॥

दूर से महाप्रभु को देखकर दोनों भाइयों ने अपने दाँतों में तिनकों । दो गुच्छे दबा लिए और उन्हें नमस्कार करने के लिए भूमि पर दण्ड । समान गिर पड़े।

नाना श्लोक पड़ि' उठे, पड़े बार बार । प्रभु देखि' प्रेमावेश हइल मुँहार ॥

४७॥

दोनों भाई प्रेमाविष्ट हो गये और अनेक संस्कृत श्लोक पढ़ते ।। बारम्बार उठते और गिरते।

श्री-रूपे देखिया प्रभुर प्रसन्न हैल मन ।।‘उठ, उठ, रूप, आइस', बलिला वचन ॥

४८॥

भी चैतन्य महाप्रभु श्रील रूप गोस्वामी को देखकर अत्यधिक प्रसन्न होंने उनसे कहा, उठो! उठो! हे प्रिय रूप! मेरे पास आओ।

कृष्णेर करुणा किछु ना ग्राय वर्णने ।विषय-कूप हैते काड़िले तोमा दुइ-जने ॥

४९॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, कृष्ण की कृपा का वर्णन कर ना सम्भव नहीं है, क्योंकि उन्होंने तुम दोनों को भौतिक भोग के कुएँ से बाहर निकाल लिया है।

न मेऽभक्तश्चतुर्वेदी मद्भक्तः श्व-पचः प्रियः।।तस्मै देयं ततो ग्राह्यं स च पूज्यो ग्रथा ह्यहम् ॥

५०॥

( भगवान् कृष्ण ने कहा :) 'कोई भले ही संस्कृत वैदिक साहित्य का बहुत बड़ा विद्वान क्यों न हो, यदि उसकी भक्ति शुद्ध नहीं है, तो वह मेरा भक्त नहीं माना जा सकता। भले ही कोई व्यक्ति चण्डाल परिवार में जन्मा हो, वह भी मुझे अत्यन्त प्रिय है, यदि वह मेरा शुद्ध भक्त है, जिसमें सकाम कर्म या मानसिक तर्कवितर्क को भोगने की कोई इच्छा नहीं है। उसे सभी प्रकार से सम्मान दिया जाना चाहिए और वह जो कुछ भी दे, उसे स्वीकार करना चाहिए। ऐसा भक्त मेरे ही समान पूजनीय है।

एइ श्लोक पड़ि' मुँहारे कैला आलिङ्गन ।कृपाते वँहार माथाय धरिला चरण ॥

५१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह श्लोक पढ़कर दोनों भाइयों का आलिंगन किया और अहैतुकी कृपा करके उनके सिरों पर अपने पाँव रखे।

प्रभु-कृपा पाना मुँहे दुइ हात गुड़ि' । दीन हा स्तुति करे विनय आचरि' ॥

५२॥

महाप्रभु की अहैतुकी कृपा पाकर दोनों भाइयों ने हाथ जोड़े और यन्त दीन-भाव से महाप्रभु की निम्नलिखित स्तुति की।

नमो महा-वदन्याय कृष्ण-प्रेम-प्रदाय ते ।। कृष्णाय कृष्ण-चैतन्य-नाम्ने गौर-त्विषे नमः ॥

५३॥

हे परम दयालु अवतार! आप स्वयं कृष्ण हैं, जो श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट हुए हैं। आपने श्रीमती राधारानी का गौरवर्ण धारण किया है और आप कृष्ण के शुद्ध प्रेम का उदारता से वितरण कर रहे हैं। हम आपको सादर नमस्कार करते हैं।

ग्रोऽज्ञान-मत्तं भुवनं दयालुर् । उल्लाघयन्नप्यकरोत्प्रमत्तम् ।। स्व-प्रेम-सम्पत्सुधयाद्भुतेहं।श्री-कृष्ण-चैतन्यममुं प्रपद्ये ॥

५४॥

हम उन दयालु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को सादर नमस्कार करते हैं, जिन्होंने अज्ञान से मदोन्मत्त तीनों लोकों को बदल डाला है और उन्हें भगवत्प्रेम के कोष के अमृत से उन्मत्त बनाकर रुग्ण अवस्था से उनकी रक्षा की है। हम उन भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य की शरण ग्रहण करते हैं, जिनके कार्यकलाप अद्भुत हैं।

तबे महाप्रभु ताँरै निकटे वसाइला ।‘सनातनेर वार्ता कह'–ताँहारे पुछिला ॥

५५॥

इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें अपनी बगल में बैठाया और उनसे पूछा, सनातन का क्या समाचार है? रूप कहेन,--तेहो बन्दी हय राज-घरे ।। तुमि ग्रदि उद्धार', तबे हइबे उद्धारे ॥

५६॥

भी रूप गोस्वामी ने उत्तर दिया, सनातन को हुसेन शाह की सरकार ने अब बन्दी बना लिया है। यदि आप कृपा करके उसे बचायें, तो वह उस बन्धन से छूट सकता है।

प्रभु कहे,—सनातनेर हाछे मोचन ।।अचिरात् आमा-सह हइबे मिलन ॥

५७॥

भी चैतन्य महाप्रभु ने तुरन्त कहा, सनातन उसके कारागार से छूट का है और वह शीघ्र ही आकर मुझसे मिलेगा।

मध्याह्न करिते विप्र प्रभुरे कहिला ।।रूप-गोसाञि से-दिवस तथाञि रहिला ॥

५८ ॥

तब ब्राह्मण ने श्री चैतन्य महाप्रभु से प्रार्थना की कि वे भोजन ग्रहण १५ दिन रूप गोस्वामी भी वहीं रहे।

भट्टाचार्य दुइ भाइये निमन्त्रण कैल ।। प्रभुर शेष प्रसाद-पात्र दुइ-भाई पाइल ॥

५९॥

बलभद्र भट्टाचार्य ने दोनों भाइयों को भी भोजन करने को कहा। उन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु की थाल से बचा हुआ भोजन प्रदान किया गया।

त्रिवेणी-उपर प्रभुर वासा-घर स्थान ।।दुइ भाइ वासा कैल प्रभु-सन्निधान ॥

६० ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने गंगा तथा यमुना के संगम के निकट त्रिवेणी नामक स्थान में अपना निवासस्थान चुना। रूप गोस्वामी तथा श्री वल्लभ दोनों भाइयों ने महाप्रभु के निकट ही अपना निवासस्थान चुना।

से-काले वल्लभ-भट्ट रहे आड़ाइल-ग्रामे ।। महाप्रभु आइला शुनि' आइल ताँर स्थाने ॥

६१॥

उस समय श्री वल्लभ भट्ट आड़ाइल ग्राम में रह रहे थे। जब उन्होंने सुना कि श्री चैतन्य महाप्रभु आये हैं, तो वे उनका दर्शन करने उनके स्थान पर गये।

तेहो दण्डवत्कैल, प्रभु कैला आलिङ्गन ।।दुइ जने कृष्ण-कथा हैल कत-क्षण ॥

६२ ॥

नभ भट्टाचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु को नमस्कार किया और प्रभु ने उनका आलिंगन किया। इसके बाद कुछ समय तक वे कृष्णराओं के विषय में विचार-विमर्श करते रहे।

कृष्ण-कथाय प्रभुर महा-प्रेम उथलिल । भट्टर सङ्कोचे प्रभु सम्वरण कैल ॥

६३ ॥

अब वे कृष्ण-कथा के विषय में बातें कर रहे थे, तब श्री चैतन्य महाप्रभु को अत्यधिक प्रेमावेश का अनुभव हुआ, किन्तु उन्होंने अपना रोका, क्योंकि वल्लभ भट्ट के समक्ष उन्हें संकोच हो रहा था।

अन्तरे गर-गर प्रेम, नहे सम्वरण ।। देखि' चमत्कार हैल वल्लभ-भट्टर मन ॥

६४।। यध्यपि महाप्रभु ने बाहर से अपने आपको रोका, किन्तु उनके भीतर भीतर प्रेमावेश उमड़ने लगा। उसको रोक पाना सम्भव नहीं था। भ भट्ट यह पहचानकर आश्चर्यचकित थे।

तबे भट्ट महाप्रभुरे निमन्त्रण कैला । महाप्रभु दुइ-भाइ ताँहारे मिलाइला ॥

६५॥

इसके बाद वल्लभ भट्ट ने श्री चैतन्य महाप्रभु को भोजन पर बुलाया और महाप्रभु ने रूप तथा वल्लभ दोनों भाइयों का उनसे परिचय करवाया।

दुइ–भाइ दूर हैते भूमिते पड़िया ।।भट्टे दण्डवत्कैला अति दीन हा ॥

६६॥

रूप गोस्वामी तथा श्री वल्लभ दोनों भाइयों ने अत्यधिक दीनतावश दूर से ही भूमि पर गिरकर वल्लभ भट्ट को प्रणाम किया।

भट्ट मिलिबारे स्नाय, हे पलाय दूरे ।।‘अस्पृश्य पामर मुञि, ना कुँइह मोरे' ॥

६७॥

जब वल्लभ भट्टाचार्य उनकी ओर बढ़े, तो वे और दूर चले गये। रूप गोस्वामी ने कहा, मैं अछूत और अत्यन्त पापी हूँ। कृपा करके मुझे न छएँ ।

भट्टर विस्मय हैल, प्रभुर हर्ष मन ।।भट्टेरे कहिला प्रभु ताँर विवरण ॥

६८॥

इस पर वल्लभ भट्टाचार्य को अत्यधिक आश्चर्य हुआ। किन्तु श्री बैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न थे; अतएव उन्होंने रूप गोस्वामी का यह विवरण उन्हें दिया।

‘इँहो ना स्पर्शह, हो जाति अति-हीन!।वैदिक, ग्राज्ञिक तुमि कुलीन प्रवीण!' ॥

६९॥

भी चैतन्य महाप्रभु ने कहा, उसे मत छुएँ, क्योंकि वह अत्यन्त निम्न आति का है। आप तो वैदिक नियमों के अनुयायी हैं और अनेक यज्ञों को सपन्न करने में अत्यन्त अनुभवी हैं। आप तो कुलीन भी हैं।

दूँहार मुखे निरन्तर कृष्ण-नाम शुनि'।भट्ट कहे, प्रभुर किछु इङ्गित-भङ्गी जानि' ॥

७० ॥

दोनों भाइयों को कृष्ण-नाम का निरन्तर जप करते सुनकर वल्लभ भट्टाचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु के संकेतों को समझ सके।

‘इँहार मुखे कृष्ण-नाम करिछे नर्तन ।एइ-दुइ 'अधम' नहे, हय 'सर्वोत्तम' ॥

७१॥

वल्लभ भट्टाचार्य ने कहा, जब ये दोनों निरन्तर कृष्ण-नाम का जीर्तन जप रहते हैं, तो फिर ये अस्पृश्य कैसे हो सकते हैं? उल्टे, ये जनम हैं।

अहो बत श्व-पचोऽतो गरीयान् ।जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम् । तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुरा।ब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ग्ने ते ॥

७२॥

तब वल्लभ भट्टाचार्य ने यह श्लोक सुनाया, हे प्रभु, जिस व्यक्ति की जीभ पर आपका पवित्र नाम सदा रहता है, वह दीक्षित ब्राह्मण से भी बढ़कर होता है। भले ही वह चण्डाल कुल में क्यों न उत्पन्न हुआ हो और भौतिक दृष्टि से अत्यन्त नीच व्यक्ति हो, फिर भी वह यशस्वी है। या भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन का अद्भुत प्रभाव है। अतः निष्कर्ष यह निकलता है कि जो भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करता है, उसे वेदोक्त सारे तप तथा यज्ञ सम्पन्न किया हुआ मान लेना चाहिए। वह पहले से सारे तीर्थों में स्नान कर चुका होता है। वह सारे वेदों का अध्ययन कर चुका होता है और वास्तव में आर्य होता है।

शुनि' महाप्रभु ताँरै बहु प्रशंसिला ।।प्रेमाविष्ट हा श्लोक पड़िते लागिला ॥

७३॥

वल्लभ भट्ट को भक्त के विषय में शास्त्र से उद्धरण देते सुनकर प्रभु अत्यन्त प्रसन्न थे। महाप्रभु ने स्वयं उनकी प्रशंसा की और वे गप्रेम से आविष्ट होकर शास्त्रों से अनेक श्लोक सुनाने लगे।

शुचि: सद्भक्ति-दीप्ताग्नि-दग्ध-दुर्जाति-कल्मषः ।श्व पाकोऽपि बुधैः श्लाघ्यो न वेद-ज्ञोऽपि नास्तिकः ॥

७४॥

भी चैतन्य महाप्रभु ने कहा, भक्ति प्रज्वलित अग्नि की तरह विगत जीवन के सारे पापों के फलों को जला देती है। जो व्यक्ति उस भक्ति के ण साह्मण के शुद्ध गुणों से युक्त है, वह निम्न कुल में जन्म लेने ने पापकर्मों के परिणामों से निश्चित रूप से बच जाता है। भले ही वह चांडाल के परिवार में क्यों न जन्मा हो, विद्वान उसे मान्यता प्रदान करते है, किन्तु वैदिक ज्ञान में पंडित व्यक्ति, यदि वह नास्तिक हो, तो उसे यता नहीं मिलती।

भगवद्भक्ति-हीनस्य जातिः शास्त्रं जपस्तपः ।।अप्राणस्येव देहस्य मण्डनं लोक-रञ्जनम् ॥

७५ ॥

भक्तिहीन व्यक्ति के लिए उच्च कुल या राष्ट्र में जन्म लेना, शास्त्रज्ञान, व्रत-तप तथा वैदिक मन्त्रोच्चार वैसे ही हैं, जैसे मृत शरीर को गहने पहनाना। ऐसे गहने केवल सामान्य जनता के मनोकल्पित आनन्द की ही तुष्टि करने वाले होते हैं।

प्रभुर प्रेमावेश, आर प्रभाव भक्ति-सार ।सौन्दय़दि देखि' भट्टर हैले चमत्कार ॥

७६ ॥

महाप्रभु के प्रेमावेश को देखकर वल्लभ भट्टाचार्य अत्यधिक आश्चर्यचकित थे। वे महाप्रभु के भक्ति विषयक ज्ञान तथा उनके शारीरिक सौन्दर्य और प्रभाव से भी आश्चर्यचकित थे।

सगणे प्रभुरे भट्ट नौकाते चड़ाजा ।।भिक्षा दिते निज-घरे चलिला लञा ॥

७७॥

तब वल्लभ भट्टाचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके संगियों को नाव में चढ़ाया और उन्हें भोजन कराने के लिए अपने स्थान पर ले गये।

यमुनार जल देखि' चिक्कण श्यामल ।।प्रेमावेशे महाप्रभु हइला विह्वल ॥

७८ ॥

यमुना नदी पार करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने चिकना श्यामल जल देखा, तो वे तुरन्त ही प्रेमावेश में विह्वल हो गये।

हुङ्कार करि' यमुनार जले दिला झाँप ।प्रभु देखि' सबार मने हैल भय-काँप ॥

७९॥

यमुना नदी को देखते ही श्री चैतन्य महाप्रभु ने हुंकार की और पानी में कूद पड़े। यह देखकर सारे लोग भयभीत होकर काँपने लगे।

आस्ते-व्यस्ते सबे धरि' प्रभुरे उठाइल ।। नौकार उपरे प्रभु नाचिते लागिल ॥

८०॥

उन्होंने शीघ्रतिशीघ्र श्री चैतन्य महाप्रभु को पकड़ा और जल से बाहर निकाला। नाव के ऊपर आकर महाप्रभु नृत्य करने लगे।

महाप्रभुर भरे नौका करे टलमल ।। डुबिते लागिल नौका, झलके भरे जल ॥

८१॥

महाप्रभु के भार से नाव हिलने-डुलने लगी। उसमें जल भरने लगा और डूबने को हो गई।

यद्यपि भट्टर आगे प्रभुर धैर्य हैल मन ।। दुर्वार उद्भट प्रेम नहे सम्वरण ॥

८२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने वल्लभाचार्य के समक्ष अपने आपको थासम्भव संभालने का प्रयास किया और अपने आपको शान्त रखना हा, किन्तु उनका प्रेमभाव रोके न रुका।

देश-पात्र देखि' महाप्रभु धैर्य हद्दल ।। आड़ाइलेर घाटे नौका आसि' उत्तरिल ॥

८३॥

परिस्थिति देखकर महाप्रभु शान्त हो गये, जिससे नाव आड़ाइल के नारे पहुँचकर लग सकी।

भये भट्ट सङ्गे रहे, मध्याह्न कराना । निज-गृहे आनिला प्रभुरे सङ्क्ते लञा ॥

८४॥

महाप्रभु की कुशलता के लिए भयभीत वल्लभ भट्टाचार्य उनके साथ रहे। महाप्रभु के स्नान का प्रबन्ध करने के बाद भट्टाचार्य उन्हें अपने घर ले गये।

आनन्दित हा भट्ट दिल दिव्यासन । आपने करिल प्रभुर पाद-प्रक्षालन ॥

८५॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु वल्लभ भट्टाचार्य के घर पहुँचे, तब अत्यन्त प्रसन्न होने के कारण, उन्होंने महाप्रभु को सुन्दर आसन प्रदान किया और स्वयं उनके चरणों को धोया।

सवंशे सेइ जल मस्तके धरिल ।। नूतन कौपीन-बहिर्वास पराइल ॥

८६ ।। तब वल्लभ भट्टाचार्य तथा उनके पूरे परिवार ने वह जल अपने सिरों के ऊपर छिड़का। फिर उन्होंने महाप्रभु को नया कौपीन तथा बाह्य व दिये।

गन्ध-पुष्प-धूप-दीपे महा-पूजा कैल ।।भट्टाचार्ये मान्य करि' पाक कराइल ॥

८७॥

बल्लभाचार्य ने सुगन्ध, अगुरु, फूल तथा दीप के द्वारा बड़ी सजधज से महाप्रभु की पूजा की और बड़े ही आदर के साथ ( महाप्रभु के रसोइये) भ भट्टाचार्य को भोजन पकाने के लिए राजी किया।

भिक्षा कराइल प्रभुरे सस्नेह व्रतने ।रूप-गोसाजि दुइ-भाइये कराइल भोजने ॥

८८॥

II इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु को बड़ी ही सावधानी से तथा स्नेह से भोजन परोसा गया। रूप गोस्वामी तथा श्री वल्लभ दोनों भाइयों को भी भोजन दिया गया।

भट्टाचार्य श्री-रूपे देओयाइल अवशेष' ।। तबे सेइ प्रसाद कृष्णदास पाइल शेष ॥

८९॥

वल्लभ भट्टाचार्य ने सबसे पहले श्रील रूप गोस्वामी को महाप्रभु के भोजन का शेष दिया और फिर कृष्णदास को दिया।

मुख-वास दिया प्रभुरे कराइल शयन ।आपने भट्ट करेन प्रभुर पाद-सम्वाहन ॥

९०॥

तब महाप्रभु को मुख-शुद्धि के लिए मसाला दिया गया। इसके बाद उन्हें शयन कराया गया और वल्लभ भट्टाचार्य ने अपने हाथों से उनके पाँव दबाये।

प्रभु पाठाइल ताँरै करिते भोजने ।भोजन करि' आइला तेहो प्रभुर चरणे ॥

९१॥

जब वल्लभ भट्टाचार्य उनके पाँव दबा रहे थे, तब महाप्रभु ने उनसे जाकर प्रसाद ग्रहण करने के लिए कहा। वे प्रसाद ग्रहण करके पुनः महाप्रभु के चरणकमलों पर लौट आये।

हेन-काले आइला रघुपति उपाध्याय ।। तिरुहिता पण्डित, बड़ वैष्णव, महाशय ॥

९२॥

उस समय रघुपति उपाध्याय आया जो तिरुहिता जिले का था। वह बहुत बड़ा विद्वान, महान् भक्त तथा सम्मानित व्यक्ति था।

आसि' तेंहो कैल प्रभुर चरण वन्दन ।। ‘कृष्णे मति रहु' बलि' प्रभुर वचन ॥

९३॥

रघुपति उपाध्याय ने सर्वप्रथम श्री चैतन्य महाप्रभु की वन्दना की और महाप्रभु ने यह कहते हुए आशीर्वाद दिया, सदैव कृष्णभावनामय बने रहो।

शुनि' आनन्दित हैल उपाध्यायेर मन ।।प्रभु ताँरै कहिल,---‘कह कृष्णेर वर्णन' ॥

९४॥

रघुपति उपाध्याय महाप्रभु का आशीर्वाद सुनकर अत्यधिक प्रसन्न हुआ। इसके बाद महाप्रभु ने उससे कृष्ण का वर्णन करने के लिए कहा।

निज-कृत कृष्ण-लीला-श्लोक पड़िल ।।शुनि' महाप्रभुर महा प्रेमावेश हैल ॥

९५ ॥

जबे रघुपति उपाध्याय से कृष्ण का वर्णन करने के लिए कहा गया, तो उसने कुछ श्लोक सुनाये, जो उसने कृष्ण-लीला के विषय में स्वयं लिखे थे। उन श्लोकों को सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु प्रेम से विह्वल हो गये।

श्रुतिमपरे स्मृतिमितरेभारतमन्ये भजन्तु भव-भीताः । अहमिह नन्दं वन्दे ।ग्रस्यालिन्दे परं ब्रह्म ॥

९६ ॥

रघुपति उपाध्याय ने सुनाया, इस भौतिक अस्तित्व से भयभीत लोग वैदिक साहित्य की पूजा करते हैं। कुछ स्मृति की पूजा करते हैं, जो वैदिक साहित्य के उपसिद्धान्त हैं, तो कुछ महाभारत की। किन्तु मैं तो कृष्ण के पिता महाराज नन्द की पूजा करता हूँ, जिनके आँगन में परम सत्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् खेल रहे हैं।

‘आगे कह'—प्रभु-वाक्ये उपाध्याय कहिल ।।रघुपति उपाध्याय नमस्कार कैल ॥

९७॥

जब महाप्रभु ने रघुपति उपाध्याय से और अधिक सुनाने के लिए ,हा, तो उसने तुरन्त ही महाप्रभु को नमस्कार किया और उनके आग्रह को स्वीकार कर लिया।

कं प्रति कथयितुमीशेसम्प्रति को वा प्रतीतिमायातु ।। गो-पति-तनया-कुल्लेगोप-वधूटी-विटं ब्रह्म ॥

९८॥

मैं किससे कहूँ और कौन मेरी बातों में विश्वास करेगा, यदि मैं क कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण यमुना नदी के तट पर गोपियों के साथ कुंजों में विहार कर रहे हैं? भगवान् इस तरह से अपनी लीलाओं को प्रदर्शित करते हैं।

प्रभु कहेन,—कह, तेहो पड़े कृष्ण-लीला ।प्रेमावेशे प्रभुर देह-मन आयुयाइला ॥

१९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने रघुपति उपाध्याय से अनुरोध किया कि श्रीकृष्ण की लीलाओं के विषय में कहता रहे। इस तरह महाप्रभु प्रेमावि हो गये और उनका मन तथा शरीर शिथिल पड़ गये।

प्रेम देखि' उपाध्यायेर हैल चमत्कार ।।‘मनुष्य नहे, इँहो–कृष्ण'–करिल निर्धार ॥

१००॥

जब रघुपति उपाध्याय ने श्री चैतन्य महाप्रभु के भाव-लक्षण देखे, तो उसे यह निश्चित हो गया कि महाप्रभु मनुष्य नहीं, अपितु साक्षात् कृष्ण हैं।

प्रभु कहे,--उपाध्याय, श्रेष्ठ मान' काय? ।।‘श्याममेव परं रूपं'–कहे उपाध्याय ॥

१०१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने रघुपति उपाध्याय से पूछा, तुम्हारे मत के अनुसार सर्वश्रेष्ठ हस्ती कौन है? रघुपति उपाध्याय ने उत्तर दिया, भगवान् श्यामसुन्दर ही सर्वश्रेष्ठ स्वरूप हैं।

श्याम-रूपेर वास-स्थान श्रेष्ठ मान' काय? ।। ‘पुरी मधु-पुरी वरा' कहे उपाध्याय ॥

१०२॥

कृष्ण के समस्त धामों में से तुम किसे सर्वश्रेष्ठ मानते हो? इसके उत्तर में रघुपति उपाध्याय ने कहा, मधुपुरी अर्थात् मथुरा धाम निश्चित रूप से सर्वश्रेष्ठ है।

बाल्य, पौगण्ड, कैशोरे, श्रेष्ठ मान' काय?।। ‘वयः कैशोरकं ध्येयं'–कहे उपाध्याय ॥

१०३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रश्न किया, कृष्ण की बाल्यावस्था, पौगण्डावस्था तथा कैशोरावस्था-इन तीनों में से तुम किसे सर्वश्रेष्ठ मानते हो? रघुपति उपाध्याय ने उत्तर दिया, कैशोर अवस्था सर्वश्रेष्ठ है।

रस-गण-मध्ये तुमि श्रेष्ठ मान' काय? । ‘आद्य एव परो रसः' कहे उपाध्याय ॥

१०४॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, समस्त रसों में तुम किस रस को सर्वश्रेष्ठ मानते हो? तो रघुपति उपाध्याय ने उत्तर दिया, माधुर्य रस ही सर्वोपरि है।

प्रभु कहे,—भाल तत्त्व शिखाइला मोरे ।।एत बलि' श्लोक पड़े गद्गद-स्वरे ॥

१०५॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, तुमने निश्चित रूप से उच्च कोटि के निर्णय दिये हैं। यह कहकर वे लड़खड़ाते स्वर में पूरा श्लोक सुनाने लगे।।

श्याममेव परं रूपं पुरी मधु-पुरी वरा ।।वयः कैशोरकं ध्येयमाद्य एव परो रसः ॥

१०६॥

श्यासुन्दर रूप सर्वश्रेष्ठ रूप है, मथुरापुरी सर्वश्रेष्ठ धाम है, कृष्ण की कैशोरावस्था सदा ध्यान करने योग्य है और माधुर्य रस ही सर्वश्रेष्ठ रस है।

प्रेमावेशे प्रभु ताँरे कैला आलिङ्गन । प्रेम मत्त हा तेंहो करेन नर्तन ॥

१०७॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रेमावेश में रघुपति उपाध्याय का आलिंगन किया। रघुपति उपाध्याय भी प्रेम में विभोर होकर नाचने लगे।

देखि' वल्लभ-भट्ट मने चमत्कार हैल ।। दुई पुत्र आनि' प्रभुर चरणे पाड़िल ॥

१०८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रघुपति उपाध्याय को नाचते देखकर वल्लभ भट्टाचार्य आश्चर्यचकित हो गये। वे अपने दोनों पुत्रों को ले आये और उन्हें महाप्रभु के चरणकमलों में डाल दिया।

प्रभु देखिबारे ग्रामेर सब-लोक आइल ।। प्रभु-दरशने सबे ‘कृष्ण-भक्त' हइल ॥

१०९॥

यह सुनकर कि श्री चैतन्य महाप्रभु आये हुए हैं, सारे ग्रामवासी उनका दर्शन करने के लिए आये। उनका दर्शन करने मात्र से वे सभी कृष्णभक्त बन गये।

ब्राह्मण-सकल करेन प्रभुर निमन्त्रण ।।वल्लभ-भट्ट ताँ-सबारे करेन निवारण ॥

११०॥

गाँव के सारे ब्राह्मण महाप्रभु को निमन्त्रण देने के लिए उत्सुक थे, किन्तु वल्लभ भट्टाचार्य ने उन सबको ऐसा करने से मना कर दिया।

‘प्रेमोन्मादे पड़े गोसाजि मध्य-यमुनाते ।। प्रयागे चालाइब, इहाँ ना दिब रहिते ॥

१११॥

तब वल्लभ भट्ट ने श्री चैतन्य महाप्रभु को आड़ाइल में न रखने का निश्चय किया, क्योंकि महाप्रभु प्रेमावेश में यमुना नदी में कूद पड़े थे। इसलिए उन्होंने महाप्रभु को प्रयाग ले जाने का निश्चय किया।

ग्राँर इच्छा, प्रयागे ग्राञा करिबे निमन्त्रण' ।एत बलि' प्रभु लञा करिल गमन ॥

११२॥

वल्लभ भट्ट ने कहा, जिसकी इच्छा हो वह प्रयाग जा सकता है। और महाप्रभु को निमन्त्रण दे सकता है। इस तरह वे महाप्रभु को अपने साथ लेकर प्रयाग के लिए चल पड़े।

गङ्गा-पथे महाप्रभुरे नौकाते वसावा ।प्रयागे आइला भट्ट गोसाजिरे लञा ॥

११३॥

वल्लभ भट्टाचार्य, यमुना नदी से बचने के लिए, महाप्रभु को नाव में कर गंगा नदी से उनके साथ-साथ प्रयाग गये।

लोक-भिड़-भये प्रभु' दशाश्वमेधे' ग्राजा ।। रूप-गोसाजिरे शिक्षा करा'न शक्ति सञ्चारिया ॥

११४॥

प्रयाग में भारी भीड़ होने के कारण श्री चैतन्य महाप्रभु दशाश्वमेध गये। यहीं पर उन्होंने श्री रूप गोस्वामी को शिक्षा दी और भक्तियोग दर्शन में उनमें शक्ति का संचार किया।

कृष्णतत्त्व-भक्तितत्त्व-रसतत्त्व-प्रान्त ।सब शिखाइल प्रभु भागवत-सिद्धान्त ॥

११५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रील रूप गोस्वामी को कृष्णतत्त्वे, भक्तितत्त्व तथा रस्तत्त्व की चरम सीमा की शिक्षा दी, जिसकी चरम परिणति राधा तथा कृष्ण के माधुर्य प्रेम में होती है। अन्त में उन्होंने रूप गोस्वामी से श्रीमदभागवत् के चरम सिद्धान्त कहे। रामानन्द-पाशे व्रत सिद्धान्त शुनिला ।। रूपे कृपा करि' ताहा सब सञ्चारिला ॥

११६॥

भी चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय से जितने भी सिद्धान्त सुने थे, उन सबको रूप गोस्वामी को सिखलाया और उन्हें भलीभाँति शक्ति प्रदान की, जिससे वे उन्हें समझ सकें।

श्री-रूप-हृदये प्रभु शक्ति सञ्चारिला ।। सर्व-तत्त्व-निरूपणे 'प्रवीण' करिला ॥

११७॥

रूप गोस्वामी के हृदय में प्रवेश करके श्री चैतन्य महाप्रभु ने न समस्त सत्यों के सिद्धान्तों के तत्त्व से समझने की शक्ति प्रदान की। महाप्रभु ने उन्हें अनुभवी भक्त बना दिया, जिनके निर्णय गुरु-शिप परम्परा के निर्णयों से अनुरूप थे। इस प्रकार श्री रूप गोस्वामी को स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु ने शक्ति प्रदान की।

शिवानन्द-सेनेर पुत्र'कवि-कर्णपूर' ।। ‘रूपेर मिलन' स्व-ग्रन्थे लिखियाछेन प्रचुर ॥

११८॥

शिवानन्द सेन के पुत्र कवि कर्णपूर ने अपनी पुस्तक चैतन्य-चन्द्रोदय में भी रूप गोस्वामी तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के मिलन का विस्तार से वर्णन कया है।

कालेन वृन्दावन-केलि-वार्ता ।लुप्तेति तां ख्यापयितुं विशिष्य । कृपामृतेनाभिषिषेच देवस्तत्रैव रूपं च सनातनं च ॥

११९॥

कालक्रम में वृन्दावन में कृष्ण की लीलाओं के दिव्य सन्देश लुप्तप्राय हो गये थे। इन दिव्य लीलाओं की स्पष्ट रूप से स्थापना करने के लिए ही श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रयाग में श्रील रूप गोस्वामी तथा भनातन गोस्वामी को अपनी कृपा का अमृत प्रदान किया, जिससे वे नाव में यह कार्य सम्पन्न कर सकें।

ग्नः प्रागेव प्रिय-गुण-गणैर्गाढ़-बद्धोऽपि मुक्तोगेहाध्यासाद्रस इवे परो मूर्त एवाप्यमूर्तः । प्रेमालापैदृढ़तर-परिष्वङ्ग-रङ्गैः प्रयागेतं श्री-रूपं सममनुपमेनानुजग्राह देवः ॥

१२०॥

श्रील रूप गोस्वामी प्रारम्भ से ही श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य गुणों के प्रति अत्यन्त आकृष्ट थे। इस तरह उन्होंने गृहस्थ जीवन से स्थायी रूप से वैराग्य ले लिया। श्रील रूप गोस्वामी तथा उनके छोटे भाई वल्लभ को श्री चैतन्य महाप्रभु का आशीर्वाद प्राप्त हुआ। यद्यपि महाप्रभु अपने दिव्य शाश्वत रूप में दिव्य पद को प्राप्त थे, किन्तु प्रयाग में उन्होंने रूप गोस्वामी को कृष्ण के दिव्य भावमय प्रेम के विषय में बतलाया। फिर महाप्रभु ने बड़े प्रेम से उनका आलिंगन किया और उन्हें अपनी पूर्ण कृपा प्रदान की।

प्रिय-स्वरूपे दयित-स्वरूपेप्रेम-स्वरूपे सहजाभिरूपे ।।निजानुरूपे प्रभुरेक-रूपेततान रूपे स्व-विलास-रूपे ॥

१२१॥

श्रील स्वरूप दामोदर के प्रिय मित्र, श्रील रूप गोस्वामी, श्री चैतन्य महाप्रभु की हूबहू अनुकृति थे और वे महाप्रभु को अत्यन्त प्रिय थे। श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेम की साक्षात् मूर्ति होने के कारण रूप गोस्वामी स्वाभाविक रूप से अत्यन्त सुन्दर थे। उन्होंने महाप्रभु द्वारा स्थापित सिद्धान्तों का सावधानी से पालन किया और वे भगवान् कृष्ण की लीलाओं की सही व्याख्या करने के लिए उपयुक्त व्यक्ति थे। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन पर इसीलिए अपनी कृपादृष्टि डाली, ताकि वे दिव्य साहित्य की रचना करके सेवा कर सकें।

एइ-मत कर्णपूर लिखे स्थाने-स्थाने । प्रभु कृपा कैला ग्रैछे रूप-सनातने ॥

१२२॥

इस तरह कवि कर्णपूर ने जगह-जगह श्रील रूप गोस्वामी के गुणों का वर्णन किया है। उन्होंने इसका भी वर्णन किया है कि श्री चैतन्यमहाप्रभु ने किस तरह श्रील रूप गोस्वामी तथा श्रील सनातन गोस्वामी को अपनी अहैतुकी कृपा प्रदान की।

महाप्रभुर व्रत बड़ बड़ भेक्त मात्र ।रूप-सनातन--सबार कृपा-गौरव-पात्र ॥

१२३॥

श्रील रूप गोस्वामी तथा सनातन गोस्वामी श्री चैतन्य महाप्रभु के बड़े-बड़े भक्तों के प्रेम तथा सम्मान के पात्र थे।

केह यदि देशे ग्राय देखि वृन्दावन ।।ताँरे प्रश्न करेन प्रभुर पारिषद-गण ॥

१२४॥

यदि कोई वृन्दावन देखने के बाद अपने देश लौट आता, तो महाप्रभु के पार्षद उस व्यक्ति से प्रश्न करते।

कह, ताहाँ कैछे रहे रूप-सनातन? । कैछे रहे, कैछे वैराग्य, कैछे भोजन? ॥

१२५॥

वृन्दावन से लौटने वाले से वे पूछते, वृन्दावन में रूप और सनातन कैसे हैं? संन्यास आश्रम में उनके कार्य कैसे हैं? वे किस तरह भोजन की व्यवस्था करते हैं? वे इस प्रकार से पूछते थे।

कैछे अष्ट-प्रहर करेन श्री कृष्ण-भजन? ।तबे प्रशंसिया कहे सेइ भक्त-गण ॥

१२६॥

महाप्रभु के पार्षद यह भी पूछते, रूप तथा सनातन किस तरह चौबीसों घण्टे भक्ति में लगे रहते हैं? उस समय वृन्दावन से होकर आने वाला व्यक्ति श्री रूप तथा सनातन गोस्वामी की प्रशंसा करता।

अनिकेत देंहे, वने व्रत वृक्ष-गण ।।एक एक वृक्षेर तले एक एक रात्रि शयन ॥

१२७॥

उन दोनों भाइयों का कोई स्थायी निवासस्थान नहीं है। वे वृक्षों केनीचे निवास करते हैं-एक रात एक वृक्ष के नीचे तो दूसरी रात दूसरे वृक्ष के नीचे।

‘विप्र-गृहे' स्थूल-भिक्षा, काहाँ माधु-करी ।शुष्क रुटी-चाना चिवाय भोग परिहरि' ॥

१२८॥

श्रील रूप तथा सनातन गोस्वामी ब्राह्मणों के घरों से कुछ भोजन माँग लाते हैं। वे सारे भौतिक भोग का परित्याग करके सूखी रोटी तथा भुने चने ही ग्रहण करते हैं।

करोंया-मात्र हाते, काँथा छिंड़ा, बहिर्वास ।कृष्ण-कथा, कृष्ण-नाम, नर्तन-उल्लास ॥

१२९॥

‘वे एकमात्र कमंडल लिये रहते हैं और फटी गुदड़ी ओढ़ते हैं। वे सदैव कृष्ण के पवित्र नाम का जप करते हैं और उनकी लीलाओं की चर्चा करते हैं। वे अति उल्लास से नृत्य भी करते हैं।

अष्ट-प्रहर कृष्ण-भजन, चारि दण्ड शयने ।। नाम-सङ्कीर्तने सेह नहे कोन दिने ॥

१३०॥

वे लगभग चौबीसों घण्टे भगवान् की सेवा में लगे रहते हैं। वे केवल डेढ़ घंटा सोते हैं और कुछ दिनों तो, जब वे निरन्तर पवित्र नाम का कीर्तन करते हैं, तब बिल्कुल नहीं सोते।

कभु भक्ति-रस-शास्त्र करये लिखन । चैतन्य-कथा शुने, करे चैतन्य-चिन्तन ॥

१३१॥

कभी वे भक्ति सम्बन्धी दिव्य साहित्य की रचना करते हैं, तो कभी वे श्री चैतन्य महाप्रभु के विषय में सुनते हैं और उन्हीं के विषय में चिन्तन करने में अपना सारा समय लगाते हैं।

एइ-कथा शुनि' महान्तेर महा-सुख हय । चैतन्येर कृपा याँहे, ताँहे कि विस्मय? ॥

१३२॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु के पार्षदगण रूप तथा सनातन गोस्वामियों के कार्यों के विषय में सुनते तो वे कहते, उस व्यक्ति के लिए कौन-सी विस्मय की बात है, जिसे महाप्रभु की कृपा प्राप्त हो चुकी है? चैतन्येर कृपा रूप लिखियाछेन आपने ।।रसामृत-सिन्धु-ग्रन्थेर मङ्गलाचरणे ॥

१३३॥

श्रील रूप गोस्वामी ने स्वयं ही अपनी पुस्तक भक्तिरसामृतसिन्धु ( १.१.२) के मंगलाचरण में श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा के विषय में लिखा है।

हृदि यस्य प्रेरणयाप्रवर्तितोऽहं वराक-रूपोऽपि । तस्य हरेः पद-कमलं ।वन्दे चैतन्य-देवस्य ॥

१३४॥

यद्यपि मैं मनुष्यों में सबसे नीच हूँ और मुझे कोई ज्ञान नहीं है, किन्तु मुझे भक्ति विषयक दिव्य ग्रन्थ लिखने की प्रेरणा कृपापूर्वक दी गई है। अतएव मैं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर नमस्कार करता हूँ, क्योंकि उन्होंने ही मुझे इन ग्रन्थों की रचना करने का अवसर प्रदान किया है।

एइ-मत दश-दिन प्रयागे रहियो ।श्री-रूपे शिक्षा दिल शक्ति सञ्चारिया ॥

१३५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु प्रयाग में दस दिन रहे और उन्होंने रूप गोस्वामी को आवश्यक शक्ति प्रदान करते हुए शिक्षा दी।

प्रभु कहे,---शुन, रूप, भक्ति-रसेर लक्षण ।।सूत्र-रूपे कहि, विस्तार ना ग्राय वर्णन ॥

१३६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, हे प्रिय रूप, कृपया मेरी बात सुनो। भक्ति का पूरी तरह वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है; अतएव मैं तुम्हें भक्ति के लक्षणों का सारांश बताने का प्रयास कर रहा हूँ।

पारापार-शून्य गभीर भक्ति-रस-सिन्धु ।।तोमाय चाखाइते तार कहि एक 'बिन्दु' ॥

१३७॥

भक्तिरस का सागर इतना विस्तृत है कि कोई इसकी लम्बाई-चौड़ाई का अनुमान नहीं लगा सकता। फिर भी तुम्हें इसका आस्वादन कराने के लिए मैं उसकी एक बूंद का वर्णन कर रहा हूँ।

एइत ब्रह्माण्ड भरि' अनन्त जीव-गण ।चौराशी-लक्ष योनिते करये भ्रमण ॥

१३८॥

इस ब्रह्माण्ड में ८४,००,००० योनियों में असंख्य जीव हैं और वे सारे के सारे इस ब्रह्माण्ड के भीतर भ्रमण करते रहते हैं।

केशाग्र-शतेक-भाग पुनः शतांश करि ।तार सम सूक्ष्म जीवेर ‘स्वरूप' विचारि ॥

१३९॥

जीव की लम्बाई तथा चौड़ाई बाल के अगले भाग के एक दसहजारवें भाग के बराबर बतलाई जाती है। यह जीव की मूल सूक्ष्म प्रकृति है।

केशाग्र-शत-भागस्य शतांश-सदृशात्मकः ।।जीवः सूक्ष्म-स्वरूपोऽयं सङ्ख्यातीतो हि चित्कणः ॥

१४०॥

यदि हम बाल के अगले भाग के सौ खण्ड करें और इनमें से एक 11ण्ड लेकर फिर से उसके सौ भाग करें, तो वह सूक्ष्म भाग असंख्य भीवों में से एक के आकार के तुल्य होगा। वे सब चित्कण अर्थात् आत्मा के कण होते हैं, पदार्थ के नहीं।'

बालाग्र-शत-भागस्य शतधा कल्पितस्य च ।। भागो जीवः स विज्ञेय इति चाह पर श्रुतिः ॥

१४१॥

यदि हम बाल की नोक को सौ भागों में विभाजित करें और इनमें । से एक भाग को लेकर पुनः उसके सौ भाग करें, तो वह दस हजारवाँ भाग ही जीव की माप है। यह मुख्य वैदिक मन्त्रों का निर्णय है।

सूक्ष्माणामप्यहं जीवः ॥

१४२ ॥

( भगवान् कृष्ण कहते हैं :) इन सूक्ष्मकणों में मैं जीव हूँ।'

अपरिमिता धुवास्तनु-भृतो यदि सर्व-गतास् ।तर्हि न शास्यतेति नियमो ध्रुव नेतरथा । अजनि च ग्रन्मयं तदविमुच्य नियन्तृ भवेत् ।सममनुजानतां ग्रदमतं मत-दुष्टतया ॥

१४३॥

हे प्रभु, यद्यपि भौतिक देह धारण करने वाले सारे जीव भ्यात्मिक हैं तथा संख्या में अनन्त हैं, किन्तु यदि वे सर्वव्यापक होते तो उनका आपके अधीन होने का प्रश्न ही न उठता। किन्तु, यदि उन्हें सनातन रूप से अस्तित्व में रहने वाले आध्यात्मिक पुरुष के कणों के रूप में अर्थात् आप सर्वोपरि आत्मा के अंश रूप में स्वीकार किया जाए, तो हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि वे सदैव आपके नियन्त्रण के अधीन हैं। यदि सारे जीव इतने से ही सन्तुष्ट हो जाएँ कि आध्यात्मिक कणों के रूप । में वे आपके समान हैं, तो वे अनेक वस्तुओं के नियन्ता के रूप में सुखी हो जायें। यह निर्णय दोषपूर्ण है कि जीव तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् एक हैं। यह तथ्य नहीं है।'

तार मध्ये 'स्थावर', 'जङ्गम'–दुइ भेद ।। जङ्गमे तिर्घक्जल-स्थलचर-विभेद ॥

१४४॥

असंख्य जीवों के दो विभाग किये जा सकते हैं-चर तथा अचर। चर जीवों में पक्षी, जलचर तथा पशु आते हैं।

तार मध्ये मनुष्य-जाति अति अल्पतर ।।तार मध्ये म्लेच्छ, पुलिन्द, बौद्ध, शबर ॥

१४५ ॥

यद्यपि जीवों में से मनुष्यों की संख्या अत्यल्प है, किन्तु इस विभाग को और आगे विभाजित किया जा सकता है, क्योंकि म्लेच्छ, पुलिन्द, बौद्ध तथा शबर जैसे अनेक असभ्य मानव हैं।

वेद-निष्ठ-मध्ये अर्धेक वेद ‘मुखे' माने ।।वेद-निषिद्ध पाप करे, धर्म नाहि गणे ॥

१४६॥

मनुष्यों में जो लोग वैदिक नियमों का पालन करने वाले हैं, उन्हें सभ्य माना जाता है। इनमें से आधे लोग दिखावा करते हैं और इन सिद्धान्तों के विरुद्ध सभी तरह के पापकर्म करते हैं। ऐसे लोग विधिविधानों की परवाह नहीं करते।

धर्माचारि-मध्ये बहुत ‘कर्म-निष्ठ' । ।कोटि-कर्म-निष्ठ-मध्ये एक 'ज्ञानी' श्रेष्ठ ॥

१४७॥

वैदिक ज्ञान के अनुयायियों में से अधिकांश सकाम कर्म की विधि का अनुसरण करते हैं और अच्छे तथा बुरे काम में अन्तर करते हैं। ऐसे अनेक निष्ठावान सकामे कर्मियों में ऐसा कोई एक हो सकता है, जो वास्तव में ज्ञानी हो।

कोटि-ज्ञानि-मध्ये हय एक-जन 'मुक्त' ।।कोटि-मुक्त-मध्ये 'दुर्लभ' एक कृष्ण-भक्त ॥

१४८॥

ऐसे लाखों ज्ञानियों में से कोई एक वास्तव में मुक्त होता है और ऐसे लाखों मुक्त लोगों में से कृष्ण का शुद्ध भक्त ढूंढ पाना अत्यन्त दुर्लभ है।

कृष्ण-भक्तनिष्काम, अतएव शान्त' ।।भुक्ति-मुक्ति-सिद्धि-कामी—सकलि' अशान्त' ॥

१४९॥

चूंकि भगवान् कृष्ण का भक्त निष्काम होता है, इसलिए वह शान्त होता है। सकाम कर्मी भौतिक भोग चाहते हैं, ज्ञानी मुक्ति चाहते हैं और योगी भौतिक ऐश्वर्य चाहते हैं; अतः वे सभी कामी हैं और शान्त नहीं हो सकते।

मुक्तानामपि सिद्धानां नारायण-परायणः । सुदुर्लभः प्रशान्तात्मा कोटिष्वपि महा-मुने ॥

१५०॥

हे महामुनि, अज्ञान से मुक्त लाखों पुरुषों में तथा सिद्धि प्राप्त लाखों सिद्धों में से कदाचित् कोई एक नारायण का शुद्ध भक्त होता है। केवल ऐसा भक्त ही वास्तव में पूर्णतया तुष्ट तथा शान्त होता है।

ब्रह्माण्ड भ्रमिते कोन भाग्यवान् जीव ।।गुरु-कृष्ण-प्रसादे पाय भक्ति-लता-बीज ॥

१५१॥

सारे जीव अपने-अपने कर्मों के अनुसार समूचे ब्रह्माण्ड में घूम रहे। हैं। इनमें से कुछ उच्च ग्रह-मण्डलों को जाते हैं और कुछ निम्न ग्रहमण्डलों को। ऐसे करोड़ों भटक रहे जीवों में से कोई एक अत्यन्त भाग्यशाली होता है, जिसे कृष्ण की कृपा से अधिकृत गुरु का सान्निध्य प्राप्त करने का अवसर मिलता है। कृष्ण तथा गुरु दोनों की कृपा से ऐसा व्यक्ति भक्ति रूपी लता के बीज को प्राप्त करता है।

माली हा करे सेइ बीज आरोपण ।। श्रवण-कीर्तन-जले करये सेचन ॥

१५२॥

जब किसी व्यक्ति को भक्ति का बीज प्राप्त हो जाता है, तब उसे माली बनकर उस बीज को अपने हृदय में बोकर उसका ध्यान रखना चाहिए। यदि वह बीज को क्रमशः श्रवण तथा कीर्तन की विधि से सींचता है, तो वह बीज अंकुरित होने लगेगा।

उपजिया बाड़े लता ‘ब्रह्माण्ड' भेदि ग्राय ।। ‘विरजा', 'ब्रह्म-लोक' भेदि’ ‘पर-व्योम' पाय ॥

१५३॥

भक्ति-लता-बीज को सींचने पर बीज अंकुरित होता है और लता धीरे-धीरे इस ब्राह्मण्ड की दीवारों को भेदकर वैकुण्ठ तथा भौतिक जगत् के बीच स्थित विरजा नदी के पार चली जाती है। यह ब्रह्मलोक या ब्रह्मज्योति पहुँचती है। ब्रह्मलोक की परत को भी भेदकर भक्ति लता परव्योम तथा गोलोक वृन्दावन पहुँच जाती है।

तबे ग्राय तदुपरि ‘गोलोक-वृन्दावन' ।। ‘कृष्ण-चरण'-कल्प-वृक्षे करे आरोहण ॥

१५४॥

हृदय में स्थित होने से तथा श्रवण-कीर्तन द्वारा सींचे जाने से भक्ति लता अधिकाधिक बढ़ती जाती है। इस तरह इसे कृष्ण के चरणकमल रूपी कल्पवृक्ष का आश्रय प्राप्त हो जाता है, जो परव्योम के सर्वोच्च क्षेत्र गोलोक वृन्दावन में निरन्तर वास करते हैं।

ताहाँ विस्तारित हा फले प्रेम-फल ।। इहाँ माली सेचे नित्य श्रवणादि जल ॥

१५५॥

यह लता गोलोक वृन्दावन ग्रह में खूब बढ़ती है और यहीं इसमें कृष्ण-प्रेम रूपी फल लगता है। यद्यपि माली भौतिक जगत् में रहता है, किन्तु वह नियमित रूप से श्रवण तथा कीर्तन रूपी जल से उसे सींचता है।

यदि वैष्णव-अपराध उठे हाती माता ।। उपाड़े वा छिण्डे, तार शुखि' ग्राय पाता ॥

१५६॥

यदि कोई भक्त भौतिक जगत् में भक्ति-लता का विकास करते हुए किसी वैष्णव के चरणों में अपराध करता है, तो उसके अपराध की तुलना उस पागल हाथी से की जाती है, जो लता को उखाड़कर उसे छिन्न-भिन्न कर देता है। इस तरह लता की पत्तियाँ सूख जाती हैं।

ताते माली मृत्न करि' करे आवरण । अपराध हस्तीर त्रैछे ना हय उद्गम ॥

१५७॥

माली को चारों और बाड़ बनाकर लता की रक्षा करनी चाहिए, जिससे अपराधों का शक्तिशाली हाथी भीतर न प्रवेश कर पाए।

किन्तु यदि लतार सङ्गे उठे ‘उपशाखा' ।। भुक्ति-मुक्ति-वाञ्छा, व्रत असङ्ख्य तार लेखा ॥

१५८॥

कभी-कभी भक्ति-लता के साथ-साथ भौतिक भोग की इच्छाओं तथा भौतिक जगत् से मुक्ति की लालसा की अवांछित लताएँ भी बढ़ने लगती हैं। ऐसी अवांछित लताओं की किस्में असंख्य हैं।

‘निषिद्धाचार', 'कुटीनाटी', 'जीव-हिंसन' । 'लाभ', ‘पूजा', 'प्रतिष्ठादि' व्रत उपशाखा-गण ॥

१५९॥

भक्ति-लता के साथ बढ़ने वाली कुछ अवांछित लताएँ हैं-सिद्धि प्राप्त करने के प्रयास में लगे लोगों के लिए निषिद्ध आचरण, कूटनीति, जीव-हिंसा, सांसारिक लाभ, संसारी पूजा तथा प्रतिष्ठा। ये सभी अवांछित लताएँ हैं।

सेक-जल पा उपशाखा बाड़ि' ग्राय ।। स्तब्ध हन्ना मूल-शाखा बाड़िते ना पाय ॥

१६०॥

यदि भक्ति-लता तथा अन्य लताओं में ठीक से भेद नहीं किया जाता, तो जल सींचने की प्रक्रिया का दुरुपयोग हो जाता है, क्योंकि भक्ति-लता बढ़ नहीं पाती है, जबकि अन्य लताएँ हरी-भरी होती जाती है।

प्रथमेइ उपशाखार करये छेदन ।। तबे मूल-शाखा बाड़ि' ग्राय वृन्दावन ॥

१६१॥

जैसे ही कोई बुद्धिमान भक्त मूल लता के पास अवांछित लता को बढ़ते देखे, उस लता को उसे तुरन्त काट देना चाहिए। तब भक्ति-लता रूपी असली लता ठीक से बढ़ती है और वह भगवदधाम लौटकर कृष्ण के चरणकमलों में आश्रय पाती है।

‘प्रेम-फल' पाकि' पड़े, माली आस्वादय ।।लता अवलम्बि' माली ‘कल्प-वृक्ष' पाय ॥

१६२॥

जब भक्ति का फल पककर नीचे गिर जाता है, तब माली उस फल को चखता है। इस तरह वह लता का लाभ उठाकर गोलोक वृन्दावन में कृष्ण के चरणकमल रूपी कल्पवृक्ष तक पहुँच जाता है।

ताहाँ सेइ कल्प-वृक्षेर करये सेवन ।।सुखे प्रेम-फल-रेस करे आस्वादन ॥

१६३॥

वहाँ पर भक्त भगवान् के कल्पवृक्ष तुल्य चरणकमलों की सेवा करता है। वह बड़े ही आनन्दपूर्वक प्रेम रूपी फल का स्वाद लेता है और शाश्वत रूप से सुखी बन जाता है।

एइत परम-फल ‘परम-पुरुषार्थ' ।।याँर आगे तृण-तुल्य चारि पुरुषार्थ ॥

१६४॥

गोलोक वृन्दावन में भक्ति रूपी फल का आस्वादन ही जीवन की परम सिद्धि है। इस सिद्धि के आगे चार प्रकार की भौतिक सिद्धियाँधर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-तृण के समान हैं।

ऋद्धा सिद्धि-व्रज-विजयिता सत्य-धर्मा समाधिर् | ब्रह्मानन्दो गुरुरपि चमत्कारयत्येव तावत् ।। ग्रावत्प्रेम्णां मधु-रिपु-वशी-कार-सिद्धौषधीनांगन्धोऽप्यन्तः-करण-सरणी-पान्थतां न प्रयाति ॥

१६५ ॥

जब तक कृष्ण के उस शुद्ध प्रेम की रंचमात्र भी सुगंध नहीं होती, जो हृदय के भीतर कृष्ण को वश में लाने की पूर्ण औषधि है, तब तक भौतिक सिद्धियाँ, ब्राह्मण की पूर्णता ( सत्य, शम, तितिक्षा इत्यादि), योगियों की समाधि तथा ब्रह्मानन्द-ये सभी मनुष्य को अद्भुत लगते ।

‘शुद्ध-भक्ति' हैते हय 'प्रेमा' उत्पन्न ।। अतएव शुद्ध-भक्तिर कहिये 'लक्षण' ॥

१६६॥

शुद्ध भक्ति प्राप्त होने पर मनुष्य में भगवत्प्रेम उत्पन्न होता है; अतएव मैं शुद्ध भक्ति के कुछ लक्षणों का वर्णन करता हूँ।

अन्याभिलाषिता-शून्यं ज्ञान-कर्माद्यनावृतम् ।।आनुकूल्येन कृष्णानु-शीलनं भक्तिरुत्तमा ॥

१६७॥

जब प्रथम श्रेणी की भक्ति विकसित होती है, तब मनुष्य को समस्त भौतिक इच्छाओं, अद्वैत-दर्शन से प्राप्त ज्ञान तथा सकाम कर्म से रहित हो जाना चाहिए। भक्त को कृष्ण की इच्छानुसार अनुकूल भाव से उनकी निरन्तर सेवा करनी चाहिए।'

अन्य-वाञ्छा, अन्य-पूजा छाड़ि' 'ज्ञान', 'कर्म' । आनुकूल्ये सर्वेन्द्रिये कृष्णानुशीलन ॥

१६८॥

शुद्ध भक्त को कृष्ण की सेवा करने के अतिरिक्त अन्य कोई कामना नहीं करनी चाहिए। उसे न तो देवताओं की, न ही संसारी व्यक्तियों की पूजा करनी चाहिए। उसे कृष्णभावनामृत से रहित किसी कृत्रिम ज्ञान का अनुशीलन नहीं करना चाहिए और कृष्णभावानाभावित कार्यों के अतिरिक्त अन्य किसी कार्य में नहीं लगना चाहिए। उसे अपनी सारी विशुद्ध इन्द्रियाँ भगवान् की सेवा में लगानी चाहिए। कृष्णभावनाभावित कार्यों को अनुकूल रीति से सम्पन्न करने की यही विधि है।

एइ ‘शुद्ध-भक्ति'—इहा हैते ‘प्रेमा' हय ।।पञ्चरात्रे, भागवते एई लक्षण कय ॥

१६९॥

ये कार्य शुद्ध भक्ति कहलाते हैं। जो व्यक्ति ऐसी शुद्ध भक्ति करता है, वह उचित समय आने पर कृष्ण के प्रति अपना मूल प्रेम विकसित कर लेता है। पंचरात्र तथा श्रीमद्भागवत जैसे वैदिक ग्रन्थों में इन लक्षणों को वर्णन हुआ है।

सर्वोपाधि-विनिर्मुक्तं तत्परत्वेन निर्मलम् ।हृषीकेण हृषीकेश-सेवनं भक्तिरुच्यते ॥

१७० ॥

भक्ति का अर्थ है समस्त इन्द्रियों के स्वामी, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा में अपनी सारी इन्द्रियों को लगाना। जब आत्मा भगवान् की सेवा करता है, तो उसके दो गौण प्रभाव होते हैं। मनुष्य सारी भौतिक उपाधियों से मुक्त हो जाता है और भगवान् की सेवा में लगे रहने मात्र से उसकी इन्द्रियाँ शुद्ध हो जाती हैं।

मदगुण-श्रुति-मात्रेण मयि सर्व-गुहाशये ।मनो-गतिरविच्छिन्ना ग्रथा गङ्गाम्भसोऽम्बुधौ ॥

१७१।। जिस तरह गंगा का स्वर्गीय जल अबाध गति से समुद्र में जाकर मिल जाता है, उसी तरह जब मेरे भक्त मेरा श्रवण मात्र करते हैं, तो उनके मन मेरे पास आते हैं। मैं सबके हृदयों में वास करता हूँ।

लक्षणं भक्ति-योगस्य निर्गुणस्य ह्युदाहृतम् ।। अहैतुक्यव्यवहिता ग्रा भक्तिः पुरुषोत्तमे ॥

१७२ ॥

ये पुरुषोत्तम अर्थात् पम भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति के लक्षण हैं; यह अहैतुकी होती है और किसी तरह रोके नहीं रुकती।

सालोक्य-सार्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमप्युत । दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥

१७३॥

मेरे भक्त मेरी सेवा करने की तुलना में सालोक्य, सार्टि, सामीप्य तथा सारूप्य इन मुक्तियों को मेरे देने पर भी स्वीकार नहीं करते।

स एव भक्ति-योगाख्य आत्यन्तिक उदाहृतः ।।ग्रेनातिव्रन्य त्रि-गुणं मद्भावायोपपद्यते ॥

१७४॥

ऊपर बतलाया गया भक्तियोग जीवन का चरम लक्ष्य है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की भक्ति करने से मनुष्य भौतिक प्रकृति के तीनों गुणों को पार कर जाता है और प्रत्यक्ष भक्ति के स्तर पर आध्यात्मिक पद को प्राप्त करता है।'

भुक्ति-मुक्ति आदि-वाञ्छा ग्रदि मने हय ।।साधन करिले प्रेम उत्पन्न ना हय ॥

१७५॥

यदि कोई भौतिक भोग या भौतिक मुक्ति की कामना से पीड़ित है, तो वह शुद्ध प्रेमाभक्ति के स्तर तक ऊपर नहीं उठ सकता, भले ही वह साधारण विधि-विधानों के अनुसार ऊपरी तौर पर भक्ति क्यों न कर रहा हो।

भुक्ति-मुक्ति-स्पृहा स्रावत्पिशाची हृदि वर्तते ।। तावद्भक्ति-सुखस्यात्र कथमभ्युदयो भवेत् ॥

१७६ ॥

भौतिक जगत् को भोगने की इच्छा तथा भौतिक बन्धन से मुक्त होने की इच्छा-ये दो पिशाचिनियाँ हैं, जो भूतप्रेतों की तरह मँडराती रहती हैं। जब तक ये पिशाचिनियाँ हृदय में रहती हैं, तब तक भला दिव्य आनन्द का अनुभव कैसे हो सकता है? जब तक ये दोनों डायने हृदय मेंरहती हैं, तब तक भक्ति का दिव्य आनन्द अनुभव करने की सम्भावना नहीं रहती।'

साधन-भक्ति हैते हय ‘रतिर उदये ।। रति गाढ़ हैले तार 'प्रेम' नाम कय ॥

१७७॥

नियमित भक्ति करते रहने से मनुष्य क्रमशः पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति अनुरक्त होता है। जब यह अनुरक्ति प्रगाढ़ हो जाती है, तब यही भगवत्प्रेम कहलाती है।

प्रेम वृद्धि-क्रमे नामस्नेह, मान, प्रणय ।। राग, अनुराग, भाव, महाभाव हय ॥

१७८ ॥

प्रेम के आधारभूत पक्ष धीरे धीरे बढ़कर स्नेह, मान, प्रणय, राग, अनुराग, भाव तथा महाभाव बन जाते हैं।

ग्रैछे बीज, इक्षु, रस, गुड़, खण्ड-सार ।शर्करा, सिता, मिछरि, उत्तम-मिछरि आर ॥

१७९॥

प्रेम के क्रमिक विकास की तुलना चीनी की विभिन्न अवस्थाओं से की जा सकती है। पहले गन्ने का बीज, फिर गन्ना, तब गन्ने का रस होता है। जब इस रस को उबाला जाता है, तो प्रवाही शीरा बनता है, जो ठोस बनकर गुड़, फिर चीनी, फिर मिश्री, कठोर मिश्री तथा चूसने की मिश्री प्रदान करता है।

एइ सब कृष्ण-भक्ति-रसेर स्थायिभाव।।स्थायिभावे मिले यदि विभाव, अनुभाव ॥

१८० ॥

ये सारी अवस्थाएँ मिलकर स्थायी भाव-अर्थात् भक्ति में सतत भगवत्प्रेम-कहलाती हैं। इन अवस्थाओं के अतिरिक्त विभाव तथा अनुभाव भी होते हैं।

सात्त्विक-व्यभिचारि-भावेर मिलने ।कृष्ण-भक्ति-रस हय अमृत आस्वादने ॥

१८१॥

जब सात्त्विक तथा व्यभिचारी भावों के लक्षणों को उच्चस्तरीय प्रेमभाव से मिला दिया जाता है, तब भक्त नाना प्रकार के अमृतमय स्वादों में कृष्ण-प्रेम के दिव्य आनन्द का आस्वादन करता है।

ग्रैछे दधि, सिता, घृत, मरीच, कर्पूर ।।मिलने, ‘रसाला' हय अमृत मधुर ॥

१८२॥

इनके स्वाद दही, मिश्री, घी, काली मिर्च तथा कपूर के मिश्रण के स्वाद के तुल्य हैं और मधुर अमृत की भाँति स्वादिष्ट होते हैं।

भक्त-भेदे रति-भेद पञ्च परकार । । शान्त-रति, दास्य-रति, सख्य-रति आर ॥

१८३ ॥

वात्सल्य-रति, मधुर-रति,—ए पञ्च विभेद ।। रति-भेदे कृष्ण-भक्ति-रसे पञ्च भेद ॥

१८४॥

भक्त के अनुसार रति पाँच प्रकार की होती है-शान्त रति, दास्य रति, सख्य रति, वात्सल्य रति तथा मधुर रति । ये पाँचों प्रकार की रति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति भक्त की विभिन्न अनुरक्तियों से उत्पन्न होती हैं। भक्ति से प्राप्त होने वाले दिव्य रस भी पाँच प्रकार के होते हैं।

शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य, मधुर-रस नाम । कृष्ण-भक्ति-रस-मध्ये ए पञ्च प्रधान ॥

१८५।। भगवान् के साथ अनुभव किये जाने वाले प्रमुख रस पाँच हैंशान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य तथा मधुर।

हास्योऽद्भुतस्तथा वीरः करुणो रौद्र इत्यपि ।।भयानकः स-बीभत्स इति गौणश्च सप्तधा ॥

१८६॥

पाँच प्रत्यक्ष रसों के अतिरिक्त सात अप्रत्यक्ष या गौण रस होते हैं, जिन्हें हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, भयानक तथा बीभत्स नाम से जाना जाता है।

हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, बीभत्स, भय ।।पञ्च-विध-भक्ते गौण सप्त-रस हय ॥

१८७॥

पाँच प्रत्यक्ष रसों के अतिरिक्त सात अप्रत्यक्ष रस हैं, जिन्हें हास्य, अद्भुत, वीर, करुण, रौद्र, बीभत्स तथा भयानक कहा जाता है।

पञ्च-रस 'स्थायी' व्यापी रहे भक्त-मने ।सप्त गौण 'आगन्तुक' पाइये कारणे ॥

१८८॥

भक्ति के पाँच प्रत्यक्ष दिव्य रस भक्त के हृदय में स्थायी रूप से स्थित रहते हैं, जबकि सात गौण भाव किन्हीं विशेष परिस्थितियों में सहसा प्रकट होते हैं और अधिक प्रबल प्रतीत होते हैं।

शान्त-भक्त–नव-योगेन्द्र, सनकादि आर ।। दास्य-भाव-भक्त--सर्वत्र सेवक अपार ॥

१८९॥

शान्त भक्तों के उदाहरणों में नव योगेन्द्र तथा चार कुमार आते हैं। दास्य भक्ति के भक्तों के उदाहरण असंख्य हैं, क्योंकि ऐसे भक्त सर्वत्र है।

सख्य-भक्त--श्रीदामादि, पुरे भीमार्जुन । वात्सल्य-भक्त-माता पिता, व्रत गुरु-जन ॥

१९०॥

वृन्दावन में सख्य भक्तों में श्रीदामा तथा सुदामा, द्वारका में भीम तथा अर्जुन, वृन्दावन में वात्सल्य प्रेमी भक्त माता यशोदा तथा पिता नन्द महाराज और द्वारका में भगवान् के माता-पिता वसुदेव तथा देवकी हैं। अन्य गुरुजन भी वात्सल्य प्रेमी भक्त हैं।

मधुर-रसे भक्त-मुख्य व्रजे गोपी-गण । महिषी-गण, लक्ष्मी-गण, असङ्ख्य गणन ॥

१९१॥

माधुर्य प्रेम में प्रमुख भक्त हैं-वृन्दावन की गोपियाँ, द्वारका की पटरानियाँ तथा वैकुण्ठ की लक्ष्मियाँ। इन भक्तों की संख्या अनन्त है।

पुनः कृष्ण-रति हय दुइत प्रकार ।ऐश्वर्य-ज्ञान-मिश्रा, केवला-भेद आर ॥

१९२॥

कृष्ण रति दो प्रकार की है-पहली ऐश्वर्य-ज्ञान-मिश्रित रति तथा दूसरी ऐश्वर्य-ज्ञान-रहित शुद्ध रति ( केवला )।

गोकुले 'केवला' रति-ऐश्वर्य-ज्ञान-हीन ।पुरी-द्वये, वैकुण्ठाद्ये ऐश्वर्य-प्रवीण ॥

१९३॥

ऐश्वर्य-ज्ञान-विहीन शुद्ध रति गोलोक वृन्दावन में पाई जाती है। ऐश्वर्य तथा ज्ञान से युक्त रति मथुरा तथा द्वारका इन दो पुरियों तथा वैकुण्ठ में पाई जाती है।

ऐश्वर्य-ज्ञान-प्राधान्ये सङ्कचित प्रीति ।। देखिया ना माने ऐश्वर्य---- केवलार रीति !! १९४ ।। ऐश्वर्य प्रधान होने पर भगवत्प्रेम कुछ संकुचित हो जाता है। किन्तु केवला भक्ति में भक्त कृष्ण की असीम शक्ति को देखते हुए भी अपने आपको उनके समान मानता है।

शान्त-दास्य-रसे ऐश्वर्य काहाँ उद्दीपन ।। वात्सल्य-सख्य-मधुरे त' करे सङ्कोचन ॥

१९५॥

शान्त तथा दास्य रस के स्तर पर कभी-कभी भगवान् का ऐश्वर्य । प्रमुख होता है। किन्तु वात्सल्य, सख्य तथा माधुर्य रसों में ऐश्वर्य संकुचित हो जाता है।

वसुदेव-देवकीर कृष्ण चरण वन्दिल ।। ऐश्वर्य-ज्ञाने मुँहार मने भय हैल ॥

१९६॥

जब कृष्ण ने अपने माता-पिता वसुदेव-देवकी के चरणकमलों की वन्दना की, तो दोनों के मन में उनके ऐश्वर्य के ज्ञान के कारण भय तथा आदर उत्पन्न हुआ।

देवकी वसुदेवश्च विज्ञाय जगदीश्वरौ ।।कृत-संवन्दनौ पुत्रौ सस्वजाते न शङ्कितौ ॥

१९७॥

जब देवकी तथा वसुदेव ने यह समझ लिया कि उन्हें प्रणाम करने वाले उनके दोनों पुत्र कृष्ण तथा बलराम पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, तो वे भयभीत हो उठे और उन्होंने उनका आलिंगन नहीं किया।

कृष्णेर विश्व-रूप देखि अर्जुनेर हैल भय ।।सख्य-भावे धाय॑ क्षमापय करिया विनय ॥

१९८॥

जब कृष्ण ने अपना विराट् रूप दिखलाया, तो अर्जुन भयभीत हो उठा और उसने मित्र रूप के में कृष्ण के प्रति दिखलाई गई धृष्टता के लिए उनसे क्षमा माँगी।

सखेति मत्वा प्रसभं ग्रदुक्तं | हे कृष्ण हे यादव हे सखेति । अजानता महिमानं तवेदं ।मया प्रमादात्प्रणयेन वापि ॥

१९९।। बच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि| विहार-शय्यासन-भोजनेषु । एकोऽथ वाप्यच्युत तत्समक्षंतत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् ॥

२००॥

मैंने आपकी महिमा न जानने के कारण और आपको मित्र समझकर हे कृष्ण, हे यादव, हे मित्र, कहकर सम्बोधित किया है। मैंने पागलपन या प्रेम में जो कुछ भी किया है, कृपा करके उसके लिए क्षमा कर दें। मैंने एक ही बिस्तर में लेटे हुए परिहास में, साथ-साथ बैठे या खाते हुए, कभी अकेले में तो कभी अपने मित्रों के सामने कई बार आपका अनादर किया है। हे अच्युत, कृपया मेरे उन सारे अपराधों को क्षमा कर दें।

कृष्ण यदि रुक्मिणीरे कैला परिहास ।‘कृष्ण छाड़िबेन'–जानि' रुक्मिणीर हैल त्रास ॥

२०१॥

यद्यपि कृष्ण महारानी रुक्मिणी से परिहास कर रहे थे, किन्तु वेसोच रही थीं कि कृष्ण उनका साथ छोड़ने वाले हैं, जिससे उन्हें भय लगा।

तस्याः सु-दुःख-भय-शोक-विनष्ट-बुद्धेर्| हस्ताच्छ्लथद्वलयतो व्यजनं पपात । देहश्च विक्लव-धियः सहसैव मुह्यन्रम्भेव वात-विहता प्रविकीर्य केशान् ॥

२०२॥

जब कृष्ण द्वारका में रुक्मिणी से परिहास कर रहे थे, तब वे दुःख, भय तथा शोक से संतप्त हो गईं। उनकी बुद्धि भी नष्ट हो गई थी। उन्होंने अपने हाथ की चूड़ियाँ गिरा दीं और जिस पंखे से भगवान् को पंखा झल रही थीं वह भी गिर गया। उनके बाल बिखर गये और वे सहसा बेहोश होकर गिर पड़ीं, मानों तेज हवा से केले का कोई वृक्ष गिर गया हो।'

‘केवला 'र शुद्ध-प्रेम ‘ऐश्वर्य’ ना जाने ।। ऐश्वर्य देखिलेओ निज-सम्बन्ध से माने ॥

२०३॥

केवला (शुद्ध भक्ति) की अवस्था में भक्त अनुभव करते हुए भी कृष्ण के असीम ऐश्वर्य को नहीं मानता। वह कृष्ण से अपने सम्बन्ध के विषय में ही गम्भीरता से विचार करता है।

त्रय्या चोपनिषद्भिश्च साङ्ख्य-योगैश्च सात्वतैः ।। उपगीयमान-माहात्म्यं हरिं साऽमन्यतात्मजम् ॥

२०४॥

जब माता यशोदा ने कृष्ण के मुँह के भीतर सारे ब्रह्माण्डों को देखा, तो क्षण-भर के लिए वे आश्चर्यचकित हो गईं। तीनों वेदों के अनुयायियों द्वारा भगवान्, इन्द्र देव तथा अन्य देवताओं की तरह पूजे जाते हैं। ऐसे अनुयायी भगवान् के लिए यज्ञ करते हैं। उपनिषदों के अध्ययन द्वारा उनकी महानता को जानकर ऋषिगण भगवान् की पूजा निर्विशेष ब्रह्म के रूप में करते हैं। बड़े-बड़े दार्शनिक जो ब्रह्माण्ड का विश्लेषात्मक अध्ययन करते हैं, उनको पुरुष के रूप में पूजते हैं। बड़ेबड़े योगी उन्हें सर्वव्यापक परमात्मा के रूप में तथा भक्त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में पूजते हैं। फिर भी माता यशोदा उन्हें अपने पुत्र के रूप में मानती थीं।

तं मत्वात्मजमव्यक्तं मर्त्य-लिङ्गमधोक्षजम् ।।गोपिकोलूखले दाम्ना बबन्ध प्राकृतं ग्रथा ॥

२०५॥

यद्यपि कृष्ण इन्द्रिय अनुभूति से परे तथा मनुष्यों के लिए अप्रकट है, किन्तु वे भौतिक शरीरधारी मनुष्य का वेश धारण करते हैं। इस तरह माता यशोदा ने उन्हें अपना पुत्र माना और ओखली से एक रस्सी द्वारा भगवान् कृष्ण के बाँध दिया, मानो वे सामान्य बालक हों।'

उवाह कृष्णो भगवान् श्रीदामानं पराजितः ।।वृषभं भद्रसेनस्तु प्रलम्बो रोहिणी-सुतम् ॥

२०६॥

जब कृष्ण श्रीदामा से हार गये, तो उन्हें श्रीदामा को अपने कंधों पर ले जाना पड़ा। इसी तरह भद्रसेन ने वृषभ को तथा प्रलम्ब ने रोहिणी सुत बलराम को उठाया था।'

सा च मेने तदात्मानं वरिष्ठां सर्व-स्रोषिताम् ।। हित्वा गोपीः काम-ग्राना मामसौ भजते प्रियः ॥

२०७॥

ततो गत्वा वनोद्देशं दृप्ता केशवमब्रवीत् । न पारयेऽहं चलितुं नय मां यत्र ते मनः ॥

२०८॥

एवमुक्तः प्रियामाह स्कन्धमारुह्यतामिति ।। ततश्चान्तर्दधे कृष्णः सा वधूरन्वतप्यत ॥

२०९॥

हे प्रियतम कृष्ण, आप तुम मेरी पूजा कर रहे हो और उन सारी गोपियों का साथ छोड़ रहे हो, जो आपके साथ आनन्द भोगना चाहती है। ऐसा सोचती हुई श्रीमती राधारानी ने अपने आपको कृष्ण की सर्वाधिक प्रिय गोपी मान लिया। उन्हें गर्व हो गया था और कृष्ण के साथ उन्होंने रासलीला छोड़ दी थी। उन्होंने गहन वन में कहा, हे प्रिय कृष्ण, अब मैं और अधिक नहीं चल सकती। आप जहाँ चाहो मुझे ले चलो। जब श्रीमती राधारानी ने इस प्रकार से कृष्ण से याचना की तो कृष्ण ने कहा, तुम मेरे कंधों पर चढ़ जाओ। ज्योंही राधारानी ऐसा करने लगीं कि वे अदृश्य हो गये। तब श्रीमती राधारानी अपनी प्रार्थना तथा कृष्ण के अदृश्य होने पर शोक करने लगीं।'

पति-सुतान्वय-भ्रातृ-बान्धवान्अतिविलछ्य तेऽन्त्यच्युतागताः । गति-विदस्तवोद्गीत-मोहिताःकितव योषितः कस्त्यजेन्निशि ॥

२१०॥

हे कृष्ण, हम सब अपने पतियों, पुत्रों, परिवार, भाइयों तथा मित्रों के आदेश की अवहेलना करके उनका साथ छोड़कर आपके पास आई हैं। आप हमारी इच्छाओं के विषय में सब कुछ जानते हैं। हम तो आपकी परम संगीतमयी बाँसुरी से आकृष्ट होकर आई हैं। तो भी, आप बहुत बड़े ठग हो। भला ऐसा कौन होगा जो इस तरह रात्रि के अंधकार में हम जैसी तरुणियों का साथ त्यागना चाहेगा?' शान्त-रसे-‘स्वरूप-बुद्ध्ये कृष्णैक-निष्ठता' ।।शमो मन्निष्ठता बुद्धेः इति श्री-मुख-गाथा ॥

२११॥

जब कोई कृष्ण के चरणकमलों में पूरी तरह लगा रहता है, तब उसे शमता अवस्था प्राप्त होती है। शमता' शब्द 'शम' से निकला है। अतः शान्त रस ( तटस्थ अवस्था) का अर्थ है, भगवान् कृष्ण के चरणों में पूरी तरह लगे रहना। यह साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के मुख से निकला निर्णय है। यह अवस्था आत्म-साक्षात्कार कहलाती है।

शमो मन्निष्ठता बुद्धेरिति श्री-भगवद्वचः ।।तन्निष्ठा दुर्घटा बुद्धेरेतां शान्त-रतिं विना ॥

२१२ ॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के वचन हैं: जब किसी की बुद्धि मेरे चरणकमलों में पूरी तरह संलग्न रहती है, किन्तु वह व्यक्ति किसी तरहकी व्यावहारिक सेवा नहीं करता, तो उसे शान्त-रति या शम अवस्था प्राप्त हुई रहती है। शान्त रति के बिना कृष्ण के प्रति अनुरक्ति प्राप्त कर पाना अत्यन्त कठिन है।'

शमो मन्निष्ठता बुद्धेर्दम इन्द्रिय-संयमः । तितिक्षा दुःख-सम्मर्षों जिह्वोपस्थ-जयो धृतिः ॥

२१३॥

शम या शान्त-रस शब्द इसका सूचक है कि मनुष्य कृष्ण के चरणकमलों के प्रति अनुरक्त है। दम का अर्थ है इन्द्रियों को वश में रखना और भगवान् की सेवा से तनिक भी विचलित न होना। दुःख का सहना तितिक्षा है और धृति का अर्थ है जीभ तथा उपस्थ (जननेंद्रियों ) को वश में रखना।'

कृष्ण विना तृष्णा-त्याग–तार कार्य मानि । अतएव शान्त' कृष्ण-भक्त एक जानि ॥

२१४॥

जो शान्त रस को प्राप्त होता है, उसका कार्य है कि उन इच्छाओं का परित्याग करे, जो कृष्ण से सम्बन्धित नहीं हैं। केवल कृष्ण-भक्त ही इस पद को प्राप्त कर सकता है। इस तरह वह शान्त रस भक्त कहलाता है।

स्वर्ग, मोक्ष कृष्ण-भक्त 'नरक' करि' माने ।। कृष्ण-निष्ठा, तृष्णा-त्याग—शान्तेर दुइ' गुणे ॥

२१५ ॥

जब भक्त शान्त रस की भूमिका पर अवस्थित होता है, तब वह न तो स्वर्ग जाने की इच्छा करता है, न मोक्ष की। ये तो कर्म तथा ज्ञान के फल हैं और भक्त इन्हें नरक के समान मानता है। शान्त रस को प्राप्त व्यक्ति में दो दिव्य गुण प्रकट होते हैं-एक तो समस्त भौतिक इच्छाओं से विरक्ति तथा दूसरा कृष्ण के प्रति पूर्ण अनुरक्ति।

नारायण-पराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति ।।स्वर्गापवर्ग-नरकेष्वपि तुल्यार्थ-दर्शिनः ॥

२१६॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् नारायण के प्रति पूरी तरह समर्पित व्यक्ति किसी वस्तु से नहीं डरता। भक्त के लिए स्वर्ग जाना, नरक में पहुँचना तथा भवबन्धन से मुक्ति-ये सभी एक जैसे होते हैं।' एई दुइ गुण व्यापे सब भक्त-जने ।आकाशेर 'शब्द'-गुण ग्रेन भूत-गणे ॥

२१७॥

शान्त-रस के ये दोनों गुण सभी भक्तों के जीवन में व्याप्त रहते हैं। ये आकाश में शब्द के गुण के समान हैं। शब्द ध्वनि समस्त भौतिक तत्त्वों में पाई जाती है।

शान्तेर स्वभाव–कृष्णे ममता-गन्ध-हीन । ‘परं-ब्रह्म'-'परमात्मा'-ज्ञान प्रवीण ॥

२१८॥

यह शान्त-रस का स्वभाव है कि उसमें रंचमात्र भी ममता नहीं रहती। प्रत्युत निर्विशेष ब्रह्म तथा अन्तर्यामी परमात्मा का ज्ञान प्रमुख होता है।

केवल 'स्वरूप-ज्ञान' हय शान्त-रसे ।‘पूर्णेश्वर्य-प्रभु-ज्ञान' अधिक हय दास्ये ॥

२१९॥

शान्त-रस के पद पर मनुष्य को केवल अपनी वैधानिक स्थिति का ही पता चल पाता है। किन्तु जब वह दास्य-रस के पद पर उन्नति करता है, तब वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के पूर्ण ऐश्वर्य को अच्छी तरह से समझ पाता है।

ईश्वर-ज्ञान, सम्भ्रम-गौरव प्रचुर ।‘सेवा' करि' कृष्णे सुख देन निरन्तर ॥

२२०॥

दास्य-रस पद पर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का ज्ञाने सम्भ्रम तथा गौरव समेत प्रकट होता है। भगवान् कृष्ण की सेवा करके दास्य-रस भक्त भगवान् को निरन्तर सुख प्रदान करता है।

शान्तेर गुण दास्ये आछे, अधिक-सेवन' ।अतएव दास्य-रसेर एइ दुइ' गुण ॥

२२१॥

शान्त-रस के गुण दास्य-रस में भी पाये जाते हैं, किन्तु इसमें सेवा जुड़ जाती है। इस तरह दास्य-रस पद में शान्त-रस तथा दास्य-रस-दोनों के ही गुण रहते हैं।

शान्तेर गुण, दास्येर सेवन—सख्ये दुइ हय ।।दास्येर 'सम्भ्रम-गौरव'-सेवा, सख्ये 'विश्वास'-मय ॥

२२२॥

सख्य-रस पद में शान्त-रस के गुण तथा दास्य-रस की सेवा दोनों ही विद्यमान रहते हैं। सख्य पद पर दास्य-रस के गुणों के साथ आदरयुक्त भय के स्थान पर सख्य का विश्वास मिला रहता है।

कान्धे चड़े, कान्धे चड़ाय, करे क्रीड़ा-रण ।कृष्णे सेवे, कृष्णे कराय आपन-सेवन! ॥

२२३॥

सख्य-रस पद पर कभी भक्त भगवान् की सेवा करता है, तो कभी बदले में कृष्ण से अपनी सेवा करवाता है। क्रीड़ा-युद्ध में ग्वालबाल कभी कृष्ण के कन्धों पर चढ़ जाते थे और कभी वे कृष्ण को अपने कन्धों पर चढ़ा लेते थे।

विश्रम्भ-प्रधान सख्य–गौरव-सम्भ्रम-हीन । अतएव सख्य-रसेर 'तिन' गुण—चिह्न ॥

२२४॥

चूँकि सख्य भाव में आत्मीयता प्रधान होती है, अतएव इसमें संभ्रम तथा गौरव ( आदरयुक्त भय) अनुपस्थित रहते हैं। अतएव सख्य-रस में तीन रसों के गुण विद्यमान होते हैं।

‘ममता' अधिक, कृष्णे आत्म-सम ज्ञान । अतएव सख्य-रसेर वश भगवान् ॥

२२५ ॥

सख्य-रस के पद पर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपने भक्तों के वश में रहते हैं, क्योंकि वे भक्त कृष्ण के घनिष्ठ होते हैं और अपने आपको उन्हीं के समान मानते हैं।

वात्सल्ये शान्तेर गुण, दास्येर सेवन ।।सेइ सेइ सेवनेर इहाँ नाम–‘पालन' ॥

२२६॥

वात्सल्य प्रेम के पद पर शान्त-रस, दास्य-रस तथा सख्य-रस के गुण 'पालन' नामक सेवा में परिणत हो जाते हैं।

सख्येर गुण–‘असङ्कोच', 'अगौरव' सार ।ममताधिक्ये ताड़न-भत्र्सन-व्यवहार ॥

२२७॥

सख्य प्रेम का सार है ममता ( घनिष्ठता ) जिसमें दास्य-रस की औपचारिकता तथा आदर का अभाव रहता है। अधिक घनिष्ठता का भाव होने से भक्त वात्सल्य-रस में कार्य करते हुए भगवान् को सामान्य रूप से दंड देता है और फटकारता है।

आपनारे 'पालक' ज्ञान, कृष्णे ‘पाल्य'-ज्ञान ।‘चारि' गुणे वात्सल्य रस—अमृत-समान ॥

२२८॥

वात्सल्य-रस में भक्त अपने आपको भगवान् का पालक समझता है। इस तरह भगवान् पालन के पात्र रहते हैं, जैसाकि पुत्र होता है। अतएव यह रस शान्त, दास्य, सख्य तथा वात्सल्य रस के चार गुणों से ओतप्रोत रहता है। यह अधिक दिव्य अमृत है।

से अमृतानन्दे भक्त सह डुबेन आपने । ‘कृष्ण-भक्त-वश' गुण कहे ऐश्वर्य-ज्ञानि-गणे ॥

२२९॥

कृष्ण तथा उनके भक्त के बीच आध्यात्मिक आनन्द के आदानप्रदान की तुलना, जिसमें कृष्ण अपने भक्त के वश में रहते हैं, उस अमृत के सागर से की जाती है, जिसमें भक्त तथा कृष्ण डुबकी लगाते हैं। यह उन विद्वानों का मत है, जो कृष्ण के ऐश्वर्य का गुणगान करते हैं।

इतीदृक्स्व-लीलाभिरानन्द-कुण्डेस्वघोषं निमज्जन्तमाख्यापयन्तम् । तदीयेशितज्ञेषु भक्तैर्जितत्वंपुनः प्रेमतस्तं शतावृत्ति वन्दे ॥

२३०॥

मैं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को फिर से सादर नमस्कार करता हूँ। हे प्रभु, मैं आपको सम्पूर्ण स्नेह के साथ सैकड़ों-हजारों बार नमस्कार करता हूँ, क्योंकि आप अपनी निजी लीलाओं से गोपियों को अमृतसागर में निमग्न कर देते हैं। आपके ऐश्वर्य के कारण भक्तगण सामान्यतया घोषित करते हैं कि आप उनकी भावनाओं द्वारा सदैव वशीभूत होते हैं।

मधुर-रसे--कृष्ण-निष्ठा, सेवा अतिशय ।सख्येर असङ्कोच, लालन-ममताधिक्य हय ॥

२३१॥

माधुर्य रस में कृष्ण के प्रति निष्ठा, उनकी सेवा, सख्य का असंकोच भाव तथा पालन की भावना-इन सबकी घनिष्ठता की वृद्धि हो जाती हैं।

कान्त-भावे निजाङ्ग दिया करेन सेवन ।।अतएव मधुर-रसेर हय 'पञ्च' गुण ॥

२३२॥

माधुर्य रस में भक्त भगवान् की सेवा में अपना शरीर अर्पित कर देता है। अतः इस रस में पाँचों रसों के दिव्य गुण उपस्थित रहते हैं।

आकाशादि गुण येन पर पर भूते ।।एक-दुइ-तिन-चारि क्रमे पञ्च पृथिवीते ॥

२३३॥

आकाश आदि भौतिक तत्त्वों में सारे गुण एक के बाद एक विकसित होते जाते हैं। क्रमिक विकास द्वारा सर्वप्रथम एक गुण उत्पन्न होता है, फिर दो भौतिक गुण, तब तीन और चार गुण विकसित होते हैं। और अन्त में पृथ्वी में पाँचों गुण पाये जाते हैं।

एइ-मत मधुरे सब भाव-समाहार ।अतएव आस्वादाधिक्ये करे चमत्कार ॥

२३४॥

इसी तरह माधुर्य रस में भक्तों के सारे भाव घुलमिल जाते हैं। इसका गाढ़ा स्वाद निश्चित रूप से अद्भुत होता है।

एइ भक्ति-रसेर करिलाङ, दिग्दरशन ।।इहार विस्तार मने करिह भावन ॥

२३५॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह कहकर समाप्त किया, मैंने भक्ति रसों का सामान्य सर्वेक्षण ही प्रस्तुत किया है। इसे किस तरह समंजित किया जाए तथा विस्तारित किया जाए, इसके विषय में आप विचार कर सकते हैं।

भाविते भाविते कृष्ण स्फुरये अन्तरे ।।कृष्ण-कृपाय अज्ञ पाय रस-सिन्धु-पारे ॥

२३६॥

जब कोई निरन्तर कृष्ण का चिन्तन करता है, तब उनका प्रेम हृदय के भीतर प्रकट होता है। अनजान होते हुए भी कृष्ण की कृपा से मनुष्य दिव्य प्रेम के सागर के बहुत दूर वाले तट तक पहुँच सकता है।

प्रभाते उठिया ग्रबे करिला गमन । तबे ताँर पदे रूप करे निवेदन ॥

२३८॥

अगले दिन प्रातःकाल जब श्री चैतन्य महाप्रभु जगे और वाराणसी ( बनारस) के लिए प्रस्थान करने वाले थे, तब श्रील रूप गोस्वामी ने महाप्रभु के चरणकमलों में यह निवेदन किया।

‘आज्ञा हय, आसि मुञि श्री-चरण-सङ्गे।।सहिते ना पारि मुजि विरह-तरङ्गे' ॥

२३९॥

यदि आप मुझे आज्ञा दें, तो मैं भी आपके साथ चलँ। विरह की तरंगों को सहन कर पाना मेरे लिए सम्भव नहीं है।

एत बलि' प्रभु ताँरै कैला आलिङ्गन ।वाराणसी चलिबारे प्रभुर हैल मन ॥

२३७॥

यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रील रूप गोस्वामी का आलिंगन किया। तब महाप्रभु ने बनारस शहर जाने का निश्चय किया।

प्रभु कहे, तोमार कर्तव्य, आमार वचन ।।निकटे आसियाछ तुमि, ग्राह वृन्दावन ॥

२४० ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, तुम्हारा कर्तव्य है कि तुम मेरे आदेश का पालन करो। तुम वृन्दावन के निकट आ चुके हो। अब तुम वहीं जाओ।

वृन्दावन हैते तुमि गौड़-देश दिया।आमारे मिलिबा नीलाचलेते आसिया ॥

२४१॥

बाद में तुम वृन्दावन से बंगाल ( गौड़देश) होते हुए जगन्नाथपुरी जा सकते हो। वहाँ तुम पुनः मुझसे मिलोगे।

ताँरै आलिङ्गिया प्रभु नौकाते चड़िला ।मूर्च्छित हा तेंहो ताहाञि पड़िला ॥

२४२॥

रूप गोस्वामी का आलिंगन करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु एक नाव में सवार हो गये। रूप गोस्वामी मूर्च्छित होकर उसी स्थान पर गिर पड़े।

दाक्षिणात्य-विप्र ताँरै घरे ला गेला ।तबे दुइ भाइ वृन्दावनेरे चलिला ॥

२४३॥

एक दाक्षिणात्य ब्राह्मण रूप गोस्वामी को अपने घर ले गया। तत्पश्चात् दोनों भाई वृन्दावन के लिए चल पड़े।

महाप्रभु चलि' चलि' आइला वाराणसी ।चन्द्रशेखर मिलिला ग्रामेर बाहिरे आसि ॥

२४४॥

चलते चलते श्री चैतन्य महाप्रभु अन्ततः वाराणसी आ पहुँचे, जहाँ शहर से बाहर आ रहे चन्द्रशेखर से उनकी भेंट हुई।

रात्रे तेंहो स्वप्न देखे,—प्रभु आइला घरे ।प्रातः-काले आसि' रहे ग्रामेर बाहिरे ॥

२४५ ॥

चन्द्रशेखर ने स्वप्न में देखा था कि श्री चैतन्य महाप्रभु उसके घर आये हुए हैं; अतः प्रातःकाल वे महाप्रभु का स्वागत करने के लिए शहर के बाहर चले आये थे।

आचम्बिते प्रभु देखि' चरणे पड़िला ।।आनन्दित हा निज-गृहे लञा गेला ॥

२४६॥

जब चन्द्रशेखर शहर के बाहर प्रतीक्षा कर रहे थे, तब उन्होंने महाप्रभु को सहसा आते देखा। वे उनके चरणों पर गिर पड़े और परम आनन्दित होकर उन्हें अपने घर ले गये।

तपन-मिश्र शुनि' आसि' प्रभुरे मिलिला ।इष्ट-गोष्ठी करि' प्रभुर निमन्त्रण कैला ॥

२४७॥

तपन मिश्र ने भी वाराणसी में महाप्रभु के आगमन का समाचार सुना, तो वे चन्द्रशेखर के घर उनसे मिलने गये। बातचीत के बाद उन्होंने महाप्रभु को अपने यहाँ भोजन करने के लिए निमन्त्रित किया।

निज घरे लञा प्रभुरे भिक्षा कराइल ।भट्टाचार्ये चन्द्रशेखर निमन्त्रण कैल ॥

२४८॥

तपन मिश्र चैतन्य महाप्रभु को अपने घर ले गये और उन्हें भोजन कराया।चन्द्रशेखर ने बलभद्र भट्टाचार्य को अपने घर भोजन करने के लिए आमन्त्रित किया।

भिक्षा कराज मिश्र कहे प्रभु-पाय धरि' ।एक भिक्षा मागि, मोरे देह' कृपा करि' ॥

२४९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को भोजन कराने के बाद तपन मिश्र ने महाप्रभु से एक अनुग्रह करने के लिए कहा और प्रार्थना की कि वे उन पर कृपा करें।

द्मावत्तोमार हय काशी-पुरे स्थिति ।।मोर घर विना भिक्षा ना करिबा कति ॥

२५०॥

तपन मिश्र ने कहा, आप जब तक वाराणसी में रुकें, तब तक कृपा करके मेरे अतिरिक्त किसी अन्य का निमन्त्रण न स्वीकार करें।

प्रभु जानेन—दिन पाँच-सात से रहिब ।। सन्यासीर सङ्गे भिक्षा काहाँ ना करिब ॥

२५१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु जानते थे कि उन्हें वहाँ पाँच-सात दिन रुकना है। अतः वे कोई ऐसा निमन्त्रण स्वीकार नहीं करेंगे, जिसमें मायावादी संन्यासी का हाथ हो।

एत जानि' ताँर भिक्षा कैला अङ्गीकार ।। वासा-निष्ठा कैला चन्द्रशेखरेर घर ॥

२५२ ॥

यह जानकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने तपन मिश्र के घर पर भोजन करना स्वीकार कर लिया। महाप्रभु ने चन्द्रशेखर के घर को अपना निवासस्थान बना लिया।

महाराष्ट्रीय विप्र आसि' ताँहारे मिलिला ।।प्रभु ताँरे स्नेह करि' कृपा प्रकाशिला ॥

२५३ ॥

महाराष्ट्रीय ब्राह्मण ने आकर महाप्रभु से भेंट की। महाप्रभु ने स्नेहवश । उसे कृपा प्रदान की।

महाप्रभु आइला शुनि' शिष्ट शिष्ट जन । ब्राह्मण, क्षत्रिय आसि' करेन दरशन ॥

२५४॥

यह सुनकर कि श्री चैतन्य महाप्रभु पधारे हैं, ब्राह्मण तथा क्षत्रिय जातियों के सारे सम्मानित व्यक्ति उनके दर्शन के लिए आये।

श्री-रूप-उपरे प्रभुर व्रत कृपा हैल ।। अत्यन्त विस्तार-कथा सङ्क्षेपे कहिल ॥

२५५॥

इस तरह श्री रूप गोस्वामी पर अत्यधिक कृपावृष्टि हुई। मैंने इन सारी कथाओं का संक्षेप में वर्णन किया है।

श्रद्धा करि' एइ कथा शुने ग्रेड जने ।।प्रेम-भक्ति पाय सेइ चैतन्य-चरणे ॥

२५६॥

जो भी इस कथा को श्रद्धा तथा प्रेम से सुनता है, वह अवश्य ही श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में भगवत्प्रेम विकसित करता है।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे ग्रार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

२५७॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों में प्रार्थना करते हुए और उनकी कृपा की सदैव आकांक्षा करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों का अनुसरण करता हुआ श्री चैतन्य-चरितामृत कह रहा हूँ।

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