अध्याय अठारह: भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की श्री वृन्दावन यात्रा
वृन्दावने स्थिर-चरान्नन्दयन्स्वावलोकनैः ।।आत्मानं च तदालोकागौराङ्गः परितोऽभ्रमत् ॥
१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने सारे वृन्दावन में घूमकर सारे चर तथा अचर जीवों को अपनी चितवन से प्रफुल्लित किया। हर व्यक्ति को देखने में महाप्रभु को प्रसन्नता होती। इस तरह भगवान् गौरांग ने वृन्दावन का भ्रमण किया।
जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द ।।जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
भी गौरचन्द्र की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! अद्वैत प्रभु hwय हो तथा भगवान् चैतन्य के भक्तगण श्रीवास ठाकुर आदि की जय हो! एइ-मत महाप्रभु नाचिते नाचिते ।।‘आरिट्'-ग्रामे आसि’ ‘बाह्य' हैल आचम्बिते ॥
३॥
भी चैतन्य महाप्रभु प्रेमाविष्ट होकर नाचते रहते थे, किन्तु जब वे आट ग्राम आये, तो उनकी बाह्य चेतना जाग्रत हो उठी।
आरिटे राधा-कुण्ड-वार्ता पुछे लोक-स्थाने । केह नाहि कहे, सङ्गेर ब्राह्मण ना जाने ॥
४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्थानीय लोगों से पूछा कि राधाकुण्ड कहाँ है, किन्तु उन्हें कोई भी न बता सका। उनके साथ रहने वाला ब्राह्मण भी कुछ नहीं जानता था।
तीर्थ 'लुप्त' जानि' प्रभु सर्वज्ञ भगवान् ।। दुइ धान्य-क्षेत्रे अल्प-जले कैला स्नान ॥
५॥
तब महाप्रभु समझ गये कि राधाकुण्ड नामक तीर्थस्थल लुप्त हो का है। किन्तु सर्वज्ञ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् होने के नाते महाप्रभु ने दो। आन के खेतों में राधाकुण्ड तथा श्यामकुण्ड खोज निकाले। उनमें बहुत कम जल था, किन्तु महाप्रभु ने वहाँ स्नान किया।
देखि' सब ग्राम्य-लोकेर विस्मय हैल मन ।प्रेमे प्रभु करे राधा-कुण्डेर स्तवन ॥
६॥
जब गाँव के लोगों ने धान के खेतों के बीच स्थित दो कुण्डों में श्री बैतन्य महाप्रभु को स्नान करते देखा, तो वे अत्यधिक आश्चर्यचकित हुए। महाप्रभु ने श्री राधाकुण्ड की स्तुति की।
सब गोपी हैते राधा कृष्णेर प्रेयसी ।तैछे राधा-कुण्ड प्रिय 'प्रियार सरसी' ॥
७॥
समस्त गोपियों में राधारानी सर्वाधिक प्रिय हैं। इसी तरह राधाकुण्ड भी भगवान को अत्यन्त प्रिय है, क्योंकि यह श्रीमती राधारानी को अत्यन्त प्रिय है।
ग्रथा राधा प्रिया विष्णोस्तस्याः कुण्डं प्रियं तथा । सर्व-गोपीषु सैवैका विष्णोरत्यन्त-वल्लभा ॥
८॥
जिस प्रकार श्रीमती राधारानी भगवान् कृष्ण को अत्यन्त प्रिय हैं, उसी प्रकार उनका सरोवर राधाकुण्ड भी उन्हें अत्यधिक प्रिय है। समस्त गोपियों में श्रीमती राधारानी निश्चित रूप से अत्यन्त प्रिय हैं।'
येइ कुण्डे नित्य कृष्ण राधिकार सङ्गे।। जले जल-केलि करे, तीरे रास-रङ्गे ॥
९॥
इस कुण्ड में भगवान् कृष्ण तथा श्रीमती राधारानी नित्य प्रति जलविहार किया करते थे और इसके तट पर रासनृत्य करते थे।
सेइ कुण्डे ग्रेड एक-बार करे स्नान ।।ताँरे राधा-सम 'प्रेम' कृष्ण करे दान ॥
१०॥
जो कोई इस कुण्ड में एक बार भी स्नान करता है, उसे भगवान् कृष्ण श्रीमती राधारानी जैसा ही प्रेम प्रदान करते हैं।
कुण्डेर 'माधुरी'—ग्रेन राधार ‘मधुरिमा' ।कुण्डेर 'महिमा'—येन राधार 'महिमा' ॥
११॥
राधाकुण्ड का आकर्षण श्रीमती राधरानी के ही समान मधुर है। इसी तरह राधाकुण्ड की महिमा श्रीमती राधारानी की महिमा के ही समान महन है।
श्री राधेव हरेस्तदीय-सरसी प्रेष्ठाद्भुतैः स्वैर्गुणैर् ।यस्यां श्री-ग्रुत-माधवेन्दुरनिशं प्रीत्या तया क्रीड़ति ।। प्रेमास्मिन्बत राधिकेव लभते ग्रस्यां सकृत्स्नान-कृत् ।तस्या वै महिमा तथा मधुरिमा केनास्तु वर्त्यः क्षितौ ॥
१२॥
राधाकुण्ड अपने अद्भुत दिव्य गुणों के कारण कृष्ण को श्रीमती राधारानी के ही समान प्रिय है। इसी कुण्ड में सर्व ऐश्वर्यमान भगवान् श्रीकृष्ण ने श्रीमती राधारानी के साथ अत्यन्त आनन्दपूर्वक दिव्य लीलाएँ कीं। जो भी राधाकुण्ड में एक बार स्नान करता है, वह श्रीकृष्ण के प्रति राधारानी के प्रेमाकर्षण को प्राप्त करता है। भला इस लोक में ऐसा कौन होगा जो श्री राधाकुण्ड की महिमा तथा मधुरिमा का वर्णन कर सके? एइ-मत स्तुति करे प्रेमाविष्ट हञा ।तीरे नृत्य करे कुण्ड-लीला सडरिया ॥
१३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने राधाकुण्ड की स्तुति की। प्रेमावेश में अभिभूत होकर वे राधाकुण्ड के किनारे भगवान् कृष्ण द्वारा सम्पन्न की गई। लीलाओं का स्मरण करके नृत्य करने लगे।
कुण्डेर मृत्तिका लञा तिलक करिल । भट्टाचार्य-द्वारा मृत्तिका सङ्गे करि' लैल ॥
१४॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने राधाकुण्ड की मिट्टी से अपने शरीर पर तिलक लगाया और बलभद्र भट्टाचार्य की सहायता से उस कुण्ड से मिट्टी एकत्र की तथा उसे अपने साथ लेते गये।
तबे चलि' आइला प्रभु 'सुमनः-सरोवर' ।। ताहाँ ‘गोवर्धन' देखि' हइला विह्वल ॥
१५॥
गधाकुण्ड से श्री चैतन्य महाप्रभु सुमनस्-सरोवर गये। जब उन्होंने से गोवर्धन पर्वत देखा, तो वे प्रसन्नता के मारे विह्वल हो उठे।
गोवर्धन देखि प्रभु हइला दण्डवत् ।।‘एक शिला' आलिङ्गिया हइला उन्मत्त ॥
१६ ॥
महाप्रभु ने गोवर्धन पर्वत को देखकर भूमि पर गिरकर दण्डवत् प्रणाम किया। उन्होंने गोवर्धन पर्वत के एक शिला-खण्ड का आलिंगन किया और उन्मत्त हो गये।
प्रेमे मत्त चलि' आइला गोवर्धन-ग्राम ।। ‘हरिदेव' देखि ताहाँ हइला प्रणाम ॥
१७॥
प्रेम में उन्मत्त महाप्रभु गोवर्धन नामक गाँव में आये। वहाँ उन्होंने हरिदेव अर्चाविग्रह का दर्शन किया और उन्हें सादर नमस्कार किया।
‘मथुरा'-पद्मर पश्चिम-दले ग्राँर वास ।। ‘हरिदेव' नारायण-–आदि परकाश ॥
१८ ॥
हरिदेव नारायण के अवतार हैं और उनका निवास स्थान मथुरा रूपी कमल की पश्चिमी पंखुड़ी पर है।
हरिदेव-आगे नाचे प्रेमे मत्त हा ।। सब लोक देखिते आइल आश्चर्य शुनिया ॥
१९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु प्रेम में उन्मत्त होकर हरिदेव अर्चाविग्रह के सम्मुख नृत्य करने लगे। महाप्रभु के अद्भुत कार्यकलाप सुनकर सारे लोग उन्हें देखने आये।
प्रभु-प्रेम-सौन्दर्य देखि' लोके चमत्कार । हरिदेवेर भृत्य प्रभुर करिल सत्कार ॥
२०॥
जब लोगों ने श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेमावेश तथा उनके शारीरिक मी-दर्य को देखा, तो वे चकित रह गये। हरिदेव विग्रह की सेवा करने वाले पुजारी ने महाप्रभु का भलीभाँति सत्कार किया।
भट्टाचार्छ ‘ब्रह्म-कुण्डे' पाक ग्राजा कैल । ब्रह्म-कुण्डे स्नान करि' प्रभु भिक्षा कैल ॥
२१॥
भट्टाचार्य ने ब्रह्मकुण्ड में भोजन पकाया और महाप्रभु ने ब्रह्मकुण्ड में स्नान करने के बाद भोजन किया।
से-रात्रि रहिला हरिदेवेर मन्दिरे ।। रात्रे महाप्रभु करे मनेते विचारे ॥
२२॥
उसी रात महाप्रभु हरिदेव के मन्दिर में रुके रहे और रात में वे अपने मन में सोचने लगे।
‘गोवर्धन-उपरे आमि कभु ना चड़िब ।। गोपाल-रायेर दरशन केमने पाइब?' ॥
२३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने सोचा, मैं तो गोवर्धन पर्वत पर चढ़ेगा नहीं, तो फिर मुझे गोपाल राय के दर्शन किस प्रकार हो सकेंगे? एत मने करि' प्रभु मौन करि' रहिला ।। जानिया गोपाल किछु भङ्गी उठाइला ॥
२४॥
इस तरह सोचते हुए महाप्रभु मौन हो गये, किन्तु भगवान् गोपाल अनके विचार को जानते थे, इसलिए उन्होंने एक चाल चली।
अनारुरुक्षवे शैलं स्वस्मै भक्ताभिमानिने ।। अवरुह्य गिरेः कृष्णो गौराय स्वमदर्शयत् ॥
२५ ॥
गोवर्धन पर्वत से नीचे उतरकर भगवान् गोपाल ने श्री चैतन्य महाप्रभु को दर्शन दिया, क्योंकि महाप्रभु अपने आपको कृष्ण-भक्त मानने के कारण पर्वत पर चढ़ने के लिए अनिच्छुक थे।
‘अन्नकूट'-नामे ग्रामे गोपालेर स्थिति ।। राजपुत-लोकेर सेइ ग्रामे वसति ॥
२६॥
गोपाल गोवर्धन पर्वत पर अन्नकूट गाँव में स्थित थे। उस गाँव में जो लोग रहते थे, वे मुख्यतः राजस्थान के थे।
एक-जन आसि' रात्रे ग्रामीके बलिल ।। ‘तोमार ग्राम मारिते तुरुक-धारी साजिल ॥
२७॥
एक व्यक्ति ने गाँव में आकर ग्रामवासियों को सूचित किया, “तुर्क सैनिक तुम लोगों के गाँव पर आक्रमण करने वाले हैं।
आजि रात्र्ये पलाह, ना रहिह एक-जन ।। ठाकुर लञा भाग', आसिबे कालि ग्रवन' ॥
२८॥
आज रात में इस गाँव से भाग जाओ और एक व्यक्ति भी यहाँ न रहे। अपने साथ गोपाल का अर्चाविग्रह लो और यहाँ से पलायन करो, क्योंकि मुसलमान सैनिक कल यहाँ आ जायेंगे।
शुनिया ग्रामेर लोक चिन्तित हुइल ।। प्रथमे गोपाल ला गाँठुलि-ग्रामे खुइल ॥
२९॥
यह सुनकर सारे ग्रामवासी अत्यन्त चिन्तित हो उठे। पहले उन्होंने गोपाल को उठाया और फिर उन्हें गाँठुलि नामक गाँव में ले गये।
विप्र-गृहे गोपालेर निभृते सेवन ।। ग्राम उजाड़ हैल, पलाइल सर्व-जन ॥
३०॥
गोपाल के अर्चाविग्रह को एक ब्राह्मण के घर में रखा गया और चोरी-चुपके उनकी पूजा की जाती रही। सभी लोगों के भाग जाने से अन्नकूट ग्राम उजाड़ हो गया था।
ऐछे म्लेच्छ-भये गोपाल भागे बारे-बारे ।। मन्दिर छाड़ि' कुल्ले रहे, किबा ग्रामान्तरे ॥
३१॥
मुसलमानों के भय से गोपाल के अर्चाविग्रह को बारम्बार एक गाँव में मरे गाँव में ले जाया जा रहा था। इस तरह मन्दिर छोड़ने के बाद पान कभी झाड़ी में तो कभी किसी गाँव में और कभी अन्य गाँव में रहे।
प्रातः-काले प्रभु 'मानस-गङ्गा'य करि' स्नान ।। गोवर्धन-परिक्रमाय करिला प्रयाण ॥
३२॥
प्रात:काल श्री चैतन्य महाप्रभु ने मानसगंगा नामक कुंड में स्नान पा। फिर उन्होंने गोवर्धन की परिक्रमा की।
गोवर्धन देखि' प्रभु प्रेमाविष्ट हा ।। नाचिते नाचिते चलिला श्लोक पड़िया ॥
३३॥
गोवर्धन पर्वत को देखते ही श्री चैतन्य महाप्रभु कृष्ण-प्रेम से आविष्ट हो गये। उन्होंने नाचते-नाचते निम्नलिखित श्लोक सुनाया।
हन्तायमद्रिरबला हरि-दास-वर्यो ।|ग्नद्राम-कृष्ण-चरण-स्परश-प्रमोदः ।। मानं तनोति सह-गो-गणयोस्तयोर्यत् ।पानीय-सूयवस-कन्दर-कन्द-मूलैः ॥
३४॥
सभी भक्तों में यह गोवर्धन पर्वत सर्वश्रेष्ठ है! हे सखियों, यह पर्वत कृष्ण तथा बलराम के साथ ही उनके बछड़ों, गायों तथा ग्वालमित्रों को सभी तरह की वस्तुएँ-पीने के लिए जल, कोमल घास, गुफाएँ, फल, फूल तथा तरकारियाँ-देता है। इस तरह यह पर्वत भगवान् का सम्मान करता है। गोवर्धन पर्वत कृष्ण तथा बलराम के चरणकमलों का स्पर्श पाकर अत्यन्त प्रफुल्लित दिखता है।
‘गोविन्द-कुण्डादि' तीर्थे प्रभु कैला स्नान ।।ताहाँ शुनिलागोपाल गेल गाँठुलि ग्राम ॥
३५ ॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोविन्द-कुण्ड में स्नान किया और वहाँ रहते हुए उन्होंने सुना कि गोपाल-अर्चाविग्रह पहले ही गाँठुलि ग्राम चले गये हैं।
सेइ ग्रामे गिया कैल गोपाल-दरशन ।।प्रेमावेशे प्रभु करे कीर्तन-नर्तन ॥
३६॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु गाँठुलि ग्राम गये और वहाँ उन्होंने गोपाल अर्चाविग्रह का दर्शन किया। वे प्रेमाविष्ट होकर कीर्तन तथा नृत्य करने लगे।
गोपालेर सौन्दर्य देखि' प्रभुर आवेश ।।एइ श्लोक पड़ि' नाचे, हैल दिन-शेष ॥
३७॥
गोपाल-अर्चाविग्रह का सौन्दर्य देखते ही महाप्रभु प्रेमाविष्ट हो गये और उन्होंने निम्नलिखित श्लोक पढ़ा। फिर वे दिन डूबने तक कीर्तन करते रहे और नाचते रहे।
वामस्तामरसाक्षस्य भुज-दण्डः स पातु वः ।।क्रीड़ा-कन्दुकतां ग्रेन नीतो गोवर्धनो गिरिः ॥
३८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, कमल-फूल की पंखुड़ियों जैसे नेत्र वाले श्रीकृष्ण की वाम भुजा आपकी सदैव रक्षा करे। उन्होंने अपनी इसी भुजा से गोवर्धन पर्वत को खिलौने की तरह उठा लिया था।
एड-मत तिन-दिन गोपाले देखिला । चतुर्थ-दिवसे गोपाल स्वमन्दिरे गेला ॥
३९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोपाल-अर्चाविग्रह का तीन दिन तक दर्शन किया। चौथे दिन यह विग्रह अपने मन्दिर में लौट गये।
गोपाल सङ्गे चलि' आइला नृत्य-गीत करि ।। आनन्द-कोलाहले लोक बले ‘हरि' ‘हरि' ॥
४० ॥
। चैतन्य महाप्रभु गोपल विग्रह के साथ-साथ चलने लगे और कीर्तन तथा नृत्य करने लगे। लोगों की विशाल तथा हर्षित भीड़ भी साथ-साथ कृष्ण के दिव्य नाम 'हरि! हरि!' का कीर्तन करने लगी।
गोपाल मन्दिरे गेला, प्रभु रहिला तले ।। प्रभुर वाञ्छा पूर्ण सब करिल गोपाले ॥
४१॥
तब गोपाल अपने मन्दिर लौट गये और श्री चैतन्य महाप्रभु पर्वत की तलहटी पर रहे। इस तरह गोपाल विग्रह ने श्री चैतन्य महाप्रभु की सारी इछाएं पूरी कर दीं।
एइ-मत गोपालेर करुण स्वभाव । ग्रेइ भक्त जनेर देखते हय 'भाव' ॥
४२॥
भगवान् गोपाल अपने भक्तों के प्रति ऐसा ही दयापूर्ण आचरण करते हैं। यह देखकर भक्तगण भावाविष्ट हो गये।
देखिते उत्कण्ठा हय, ना चड़े गोवर्धने ।। कोन छले गोपाल आसि' उतरे आपने ॥
४३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु गोपाल को देखने के लिए अत्यन्त उत्कण्ठित थे, किन्तु वे गोवर्धन पर्वत पर चढ़ना नहीं चाहते थे। इसलिए गोपाल विग्रह किसी युक्ति से स्वयं नीचे उतर आये।
कभु कुल्ले रहे, कभु रहे ग्रामान्तरे । सेइ भक्त, ताहाँ आसि' देखये ताँहारे ॥
४४॥
इस तरह किसी न किसी बहाने गोपाल कभी जंगल की झाड़ी में तो कभी गाँव में रुकते हैं। जो भक्त होता है, वह अर्चाविग्रह के दर्शन करने आता है।
पर्वते ना चड़े दुइ-रूप-सनातन ।।एइ-रूपे ताँ-सबारे दियाछेन दरशन ॥
४५॥
रूप तथा सनातन दोनों भाई पर्वत पर नहीं चढ़े। गोपालजी ने उन्हें भी अपना दर्शन दिया।
वृद्ध-काले रूप-गोसाजि ना पारे ग्राइते ।। वाञ्छा हैल गोपालेर सौन्दर्य देखिते ॥
४६॥
श्रील रूप गोस्वामी वृद्धावस्था में वहाँ नहीं जा सकते थे, किन्तु गोपाल का सौन्दर्य देखने की उनकी इच्छा थी।
म्लेच्छ-भये आइला गोपाल मथुरा-नगरे । एक-मास रहिल विठ्ठलेश्वर-घरे ॥
४७॥
मुसलमानों के भय से गोपाल मथुरा चले गये, जहाँ विठ्ठलेश्वर के मन्दिर में वे पूरे एक मास तक रहे।
तबे रूप गोसाञि सब निज-गण ला ।। एक-मास दरशन कैला मथुराय रहिया ॥
४८॥
श्रील रूप गोस्वामी तथा उनके संगी एक मास तक मथुरा में रहे और उन्होंने वहाँ गोपाल विग्रह का दर्शन किया।
सङ्गे गोपाल-भट्ट, दास-रघुनाथ ।। रघुनाथ-भट्ट-गोसाजि, आर लोकनाथ ॥
४९॥
जब रूप गोस्वामी मथुरा में रुके थे, तब उनके साथ गोपाल भट्ट गोस्वामी, रघुनाथ दास गोस्वामी, रघुनाथ भट्ट गोस्वामी तथा लोकनाथ दास गोस्वामी थे।
भूगर्भ-गोसाञि, आर श्री-जीव-गोसाजि ।। श्री-यादवे-आचार्य, आर गोविन्द गोसाजि ॥
५०॥
श्रील रूप गोस्वामी के साथ भूगर्भ गोस्वामी, श्री जीव गोस्वामी, श्री यादव आचार्य तथा गोविन्द गोस्वामी भी थे।
श्री-उद्धव-दास, आर माधव–दुइ-जन ।। श्री-गोपाल-दास, आर दास-नारायण ॥
५१॥
उनके साथ श्री उद्धव दास, माधव, श्री गोपाल दास तथा नारायण दास भी थे।
‘गोविन्द' भक्त, आर वाणी-कृष्णदास ।।पुण्डरीकाक्ष, ईशान, आर लघु-हरिदास ॥
५२॥
महान् भक्त गोविन्द, वाणी कृष्णदास, पुण्डरीकाक्ष, ईशान तथा लघु हरिदास भी उनके साथ थे।
एइ सब मुख्य-भक्त लञा निज-सङ्गे।। श्री-गोपाल दरशन कैला बहु-रङ्गे ॥
५३॥
श्री रूप गोस्वामी ने परम प्रसन्नतापूर्वक इन सारे भक्तों के साथ भगवान् गोपाल का दर्शन किया।
एक-मास रहि' गोपाल गेला निज-स्थाने ।। श्री-रूप-गोसाजि आइला श्री-वृन्दावने ॥
५४॥
मथुरा में एक मास रुके रहने के बाद गोपाल-अर्चाविग्रह अपने स्थान लौट गये और श्री रूप गोस्वामी वृन्दावन चले आये।
प्रस्तावे कहिलॅ गोपाल-कृपार आख्यान । तबे महाप्रभु गेला 'श्री-काम्यवन' ॥
५५॥
इस कथा के मध्य मैं गोपाल की दया का वर्णन कर चुका हूँ। श्री चैतन्य महाप्रभु गोपाल विग्रह का दर्शन करने के बाद श्री काम्यवन गये।
प्रभुर गमन-रीति पूर्वे ये लिखिल । सेइ-मत वृन्दावने तावत्देखिल ॥
५६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु का वृन्दावन भ्रमण पहले ही वर्णित हो चुका है। होंने उसी प्रेमभाव से सारे वृन्दावन की यात्रा की।
ताहाँ लीला-स्थली देखि' गेला 'नन्दीश्वर' ।‘नन्दीश्वर' देखि' प्रेमे हइला विह्वल ॥
५७॥
काम्यवन में कृष्ण के लीला-स्थलों को देखने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु नन्दीश्वर गये। वहाँ पर वे प्रेम से विह्वल हो उठे।
‘पावनादि सब कुण्डे स्नान करिया ।।लोकेरे पुछिल, पर्वत-उपरे ग्राञा ॥
५८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने पावन सरोवर इत्यादि समस्त विख्यात कुण्डों में स्नान किया। तत्पश्चात् वे एक पर्वत पर चढ़ गये और लोगों से पूछा।
किछु देव-मूर्ति हय पर्वत-उपरे ?।। लोक कहे,—मूर्ति हय गोफार भितरे ॥
५९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, क्या इस पर्वत के ऊपर कोई देव-मूर्ति है? स्थानीय लोगों ने उत्तर दिया, इस पर्वत पर देव-मूर्तियाँ हैं, किन्तु वे एक गुफा के भीतर स्थित हैं।
दुइ-दिके माता-पिता पुष्ट कलेवर ।।मध्ये एक 'शिशु' हय त्रिभङ्ग-सुन्दर ॥
६०॥
वहाँ सुगठित शरीर वाले माता-पिता हैं और उनके बीच में एक अत्यन्त सुन्दर शिशु है, जो तीन स्थानों से टेढ़ा ( त्रिभंग ) है।
शुनि' महाप्रभु मने आनन्द पाजा ।।‘तिन' मूर्ति देखिला सेइ गोफा उघाड़िया ॥
६१। यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए। गुफा की खुदाई कराने पर उन्हें तीन मूर्तियाँ दिखीं।
व्रजेन्द्र-व्रजेश्वरीर कैल चरण वन्दन । प्रेमावेशे कृष्णेर कैल सर्वाङ्ग-स्पर्शन ॥
६२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने नन्द महाराज तथा माता यशोदा को सादर नमस्कार किया और अत्यन्त प्रेमाविष्ट होकर उन्होंने भगवान् कृष्ण के शरीर का स्पर्श किया।
सब दिन प्रेमावेशे नृत्य-गीत कैला ।। ताहाँ हैते महाप्रभु ‘खदिर-वन' आइला ॥
६३ ॥
महाप्रभु नित्य ही प्रेमाविष्ट होकर कीर्तन करते और नृत्य करते। अन्त में वे खदिरवन गये।
लीला-स्थल देखि ताहाँ गेला 'शेषशायी' ।।'लक्ष्मी' देखि' एइ श्लोक पड़ेन गोसाजि ॥
६४॥
भगवान् कृष्ण के लीला-स्थलों को देखने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु शेषशायी गये, जहाँ उन्होंने लक्ष्मी का दर्शन किया और निम्नलिखित श्लोक सुनाया।
यत्ते सुजात-चरणाम्बुरुहं स्तनेषु ।भीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु । तेनाटवीमटसि तद्व्यथते न किं स्वित्कूर्पादिभिर्भमति धीर्भवदायुषां नः ॥
६५॥
हे प्रिय! आपके चरणकमल इतने कोमल हैं कि हम उन्हें धीमे से अपने स्तनों पर डरती हुई रखती हैं कि कहीं आपके चरणों में चोट न आ जाए। हमारा जीवन एकमात्र आप पर टिका है। अतः हमारे मन में यही चिन्ता बनी रहती है कि जब आप जंगल के मार्ग पर घूमते हैं तो कंकड़ों से आपके पैर कहीं छिल न जाएँ।
तबे ‘खेला-तीर्थ' देखि 'भाण्डीरवन' आइला । यमुना पार हा 'भद्र-वन' गेला ॥
६६॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने खेलातीर्थ देखा और तब वे भाण्डीरवन गये। यमुना नदी पार करके वे भद्रवन गये।।
श्रीवन' देखि पुनः गेला 'लोह-वन' ।। ‘महावन गिया कैला जन्म-स्थान-दरशन ॥
६७॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रीवन तथा लोहवन देखा। फिर वे महावन गये और कृष्ण की बाल-लीलाओं का स्थान गोकुल देखा।
ग्रमलार्जुन-भङ्गादि देखिल सेइ स्थल ।। प्रेमावेशे प्रभुर मन हैल टलमल ॥
६८॥
जिस स्थान पर श्रीकृष्ण ने जुड़वा अर्जुन वृक्षों को तोड़ा था, उसे देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु प्रेमाभिभूत हो गये।
गोकुल' देखिया आइला ‘मथुरा-नगरे । जन्म-स्थान' देखि' रहे सेइ विप्र-घरे ॥
६९॥
गोकुल देखने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु मथुरा लौट आये, जहाँ उन्होंने कृष्ण का जन्मस्थान देखा। वहाँ पर वे उसी सनोड़िया ब्राह्मण के घर पर रहे।
लोकेर सङ्घट्ट देखि मथुरा छाड़िया ।। एकान्ते 'अक्रूर-तीर्थे' रहिला आसिया ॥
७० ॥
मथुरा में भीड़ एकत्र होती देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु मथुरा छोड़कर अक्रूर तीर्थ चले गये। वहाँ वे एकान्त स्थान में रहे।
आर दिन आइला प्रभु देखिते वृन्दावन' ।।‘कालीय-ह्रदे' स्नान कैला आर प्रस्कन्दन ॥
७१॥
अगले दिन श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन गये और उन्होंने कालीय हद तथा प्रस्कन्दन में स्नान किया।
‘द्वादश-आदित्य' हैते 'केशी-तीर्थे' आइला ।रास-स्थली देखि प्रेमे मूर्च्छित हइला ॥
७२॥
प्रस्कन्दन नामक पुण्यस्थली देखने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु द्वादशादित्य गये। वहाँ से वे केशीतीर्थ गये और जब उन्होंने वह स्थान देखा, जहाँ रासनृत्य होता था, तो वे प्रेमावेश से तुरन्त मूर्छित हो गये।
चेतन पाजा पुनः गड़ागड़ि ग्राय ।।हासे, कान्दे, नाचे, पड़े, उच्चैः-स्वरे गाय ॥
७३॥
जब महाप्रभु सचेत हुए तो वे भूमि पर लोटने लगे। कभी वे हँसते, कभी रोते तो कभी नाचते और गिर पड़ते। वे ऊँचे स्वर से कीर्तन भी करते।
एइ-रङ्गे सेइ-दिन तथा गोडाइला ।।सन्ध्या-काले अक्रूरे आसि' भिक्षा निर्वाहिला ॥
७४॥
इस तरह दिव्य आनन्द का अनुभव करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने केशीतीर्थ में वह दिन प्रसन्नतापूर्वक बिता दिया। शाम को वे अक्रूर तीर्थ लौट आये, जहाँ उन्होंने भोजन किया।
प्राते वृन्दावने कैला'चीर-घाटे' स्नान । तेतुली-तलाते आसि' करिला विश्राम ॥
७५ ॥
प्रातःकाल श्री चैतन्य महाप्रभु ने वृन्दावन लौटकर चीरघाट में स्नान किया। तब वे तेतुलीतला गये, जहाँ उन्होंने विश्राम किया।
कृष्ण-लीला-कालेर सेइ वृक्ष पुरातन ।। तार तले पिंड़ि-बान्धा परम-चिक्कण ।। ७६ ॥
तेंतुलीतला नामक इमली का वृक्ष अत्यन्त पुराना था, जो श्रीकृष्ण की लीलाओं के समय से वहीं था। उस वृक्ष के नीचे अत्यन्त चमकीला घर बना था।
निकटे यमुना वहे शीतल समीर । वृन्दावन-शोभा देखे यमुनार नीर ॥
७७॥
इस इमली के वृक्ष के निकट यमुना नदी बहती थी, इसलिए अत्यन्त शीतल हवा बहती थी। वहाँ पर महाप्रभु ने वृन्दावन की शोभा तथा यमुना नदी का जल देखा।
तेतुल-तले वसि' करे नाम-सङ्कीर्तन ।। मध्याह्न करि' आसि' करे 'अक्रूरे' भोजन ॥
७८ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु इस इमली के पुराने वृक्ष के नीचे बैठकर भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करते थे। दोपहर को वे भोजन करने के लिए। अक्रूर तीर्थ लौट आते थे।
अक्रूरेर लोक आइसे प्रभुरे देखिते ।। लोक-भिड़े स्वच्छन्दे नारे 'कीर्तन' करिते ॥
७९ ॥
अक्रूरतीर्थ के निकट रहने वाले सारे लोग श्री चैतन्य महाप्रभु को देखने आते थे और भीड़ बढ़ जाने से महाप्रभु शान्तिपूर्वक नाम-कीर्तन नहीं कर पाते थे।
वृन्दावने आसि' प्रभु वसिया एकान्त ।। नाम-सङ्कीर्तन करे मध्याह्न-पग्रुन्त ॥
८०॥
अतः श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन चले जाते थे और एकान्त स्थान में बैठकर दोपहर तक नाम-संकीर्तन करते रहते थे।
तृतीय-प्रहरे लोक पाय दरशन ।। सबारे उपदेश करे ‘नाम-सङ्कीर्तन' ॥
८१॥
दोपहर के बाद ही लोग उनका दर्शन प्राप्त कर सके। महाप्रभु ने हर एक व्यक्ति को नाम-संकीर्तन का महत्त्व बतलाया।
हेन-काले आइल वैष्णव ‘कृष्णदास' नाम ।। राजपुत-जाति,---गृहस्थ, यमुना-पारे ग्राम ॥
८२॥
तभी कृष्णदास नामक एक वैष्णव श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने आया। वह गृहस्थ था और क्षत्रिय जाति का था। उसका घर यमुना नदी के उस पार था।
‘केशी' स्नान करि' सेइ 'कालीय-दह' ग्राइते । आम्लि-तलाय गोसाजिरे देखे आचम्बिते ॥
८३॥
केशीतीर्थ में स्नान करने के बाद कृष्णदास कालीयदह की ओर गया और उसने एकाएक श्री चैतन्य महाप्रभु को आम्लितला ( तेतुलीतला ) में बैठे हुए देखा।
प्रभुर रूप-प्रेम देखि' हइल चमत्कार । प्रेमावेशे प्रभुरे करेन नमस्कार ॥
८४॥
महाप्रभु के सौंदर्य तथा प्रेम को देखकर कृष्णदास अत्यधिक अचम्भित हुआ। उसने प्रेमवश महाप्रभु को सादर नमस्कार किया।
प्रभु कहे,—के तुमि, काहाँ तोमार घर?।। कृष्णदास कहे,–मुइ गृहस्थ पामर ॥
८५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कृष्णदास से पूछा, तुम कौन हो? तुम्हारा घर कहाँ है? इस पर कृष्णदास ने उत्तर दिया, मैं अत्यन्त पतित गृहस्थ हूँ।
राजपुत-जाति मुञि, ओ-पारे मोर घर ।। मोर इच्छा हय‘हङवैष्णव-किङ्कर' ॥
८६॥
मैं राजपूत जाति का हूँ और मेरा घर यमुना नदी के उस पार है। कन्तु मैं वैष्णव का सेवक बनना चाहता हूँ।
किन्तु आजि एक मुजि 'स्वप्न' देखिनु ।। सेइ स्वप्न परतेक तोमा आसि' पाइनु ॥
८७॥
आज मैंने एक सपना देखा है। उस स्वप्न के अनुसार ही मैं यहाँ आया हूँ तथा आपको पा सका हूँ।
प्रभु ताँरे कृपा कैला आलिङ्गन करि ।।प्रेमे मत्त हैल सेइ नाचे, बले ‘हरि' ॥
८८ ॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कृष्णदास का आलिंगन करते हुए उसे अपनी अहैतुकी कृपा प्रदान की। कृष्णदास प्रेम से उन्मत्त हो उठा और वह नाचने लगा तथा पवित्र हरि नाम का कीर्तन करने लगा।
प्रभु-सङ्गे मध्याह्ने अक्रूर तीर्थे आइला ।प्रभुर अवशिष्ट-पात्रे-प्रसाद पाइला ॥
८९॥
कृष्णदास महाप्रभु के साथ अक्रूरतीर्थ आया, जहाँ उसे महाप्रभु का शेष बचा भोजन दिया गया।
प्राते प्रभु-सङ्गे आइला जल-पात्र लञा ।।प्रभु-सङ्गे रहे गृह-स्त्री-पुत्र छाड़िया ॥
९०॥
अगले दिन कृष्णदास श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ-साथ उनका जलपात्र लिए हुए वृन्दावन गया। इस तरह कृष्णदास ने अपनी पत्नी, घर तथा बच्चे छोड़ दिये, जिससे कि वह श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ रह सके।
वृन्दावने पुनः 'कृष्ण' प्रकट हइल ।।ग्राहाँ ताहाँ लोक सब कहिते लागिल ॥
९१॥
महाप्रभु जहाँ भी जाते, वहाँ के सारे लोग कहते, वृन्दावन में पुनः कृष्णब्द हुए हैं।
एक-दिन अक्रूरेते लोक प्रातः-काले ।। वृन्दावन हैते आइसे करि' कोलाहले ॥
९२॥
एक दिन प्रातःकाल अनेक लोग अक्रूरतीर्थ आये। चूँकि वे वृन्दावन से आये थे, अतः वे अधिक कोलाहल कर रहे थे।
प्रभु देखि' करिल लोक चरण वन्दन ।प्रभु कहे,—काहाँ हैते करिला आगमन? ॥
९३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु को देखकर उन सबने उनके चरणकमलों में अपना नमस्कार निवेदित किया। तब महाप्रभु ने उन सबसे पूछा, तुम लोग कहाँ से आ रहे हो? लोके कहे,—कृष्ण प्रकट कालीय-दहेर जले! ।। कालीय-शिरे नृत्य करे, फणा-रत्न ज्वले ॥
१४॥
लोगों ने उत्तर दिया, कालीयदह के जल में कृष्ण पुनः प्रकट हुए हैं। वे कालीय सर्प के फनों पर नाचते हैं और फनों के रत्न चमचमा रहे है।
साक्षात्देखिल लोक-नाहिक संशय ।।शुनि' हासि' कहे प्रभु,—सब 'सत्य' हय ॥
९५ ॥
सबने साक्षात् कृष्ण को देखा है, इसमें संशय नहीं है। यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु हँसने लगे और बोले, यह सब सत्य है।
एइ-मत तिन-रात्रि लोकेर गमन ।।सबे आसि' कहे,—कृष्ण पाइलँ दरशन ॥
९६॥
लगातार तीन रात तक लोग कृष्ण का दर्शन करने कालीयदह गये और हर एक यही कहता हुआ लौटा कि, अब हमने साक्षात् कृष्ण का दर्शन दिया है।
प्रभु-आगे कहे लोक,–श्री-कृष्ण देखिल । 'सरस्वती' एइ वाक्ये 'सत्य' कहाइल ॥
९७॥
हर व्यक्ति श्री चैतन्य महाप्रभु के आगे आकर यही कहता, अब हमने कृष्ण को प्रत्यक्ष देखा है। इस तरह सरस्वती देवी की कृपा से हर व्यक्ति को सच कहना पड़ा।
महाप्रभु देखि' 'सत्य' कृष्ण-दरशन ।। निजाज्ञाने सत्य छाड़ि' 'असत्ये सत्य-भ्रम' ॥
९८॥
जब लोगों ने श्री चैतन्य महाप्रभु को देखा, तो वास्तव में उन्होंने कृष्ण का ही दर्शन किया, किन्तु अपने अज्ञान के कारण ही उन्होंने गलत वस्तु को कृष्ण मान लिया था।
भट्टाचार्य तबे कहे प्रभुर चरणे ।। ‘आज्ञा देह', ग्राइ' करि कृष्ण दरशने!' ॥
९९ ॥
तभी बलभद्र भट्टाचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में निवेदन किया, मुझे आज्ञा दें कि मैं जाकर कृष्ण का प्रत्यक्ष दर्शन कर सकें।
तबे तौरे कहे प्रभु चापड़ मारिया ।। मूर्खर वाक्ये 'मूर्ख' हैला पण्डित हा ॥
१०० ॥
जब बलभद्र भट्टाचार्य ने कालीयदह में कृष्ण का दर्शन करने के लिए आज्ञा चाही, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह कहकर दयापूर्वक उसको चपत लगाई, तुम विद्वान होकर भी अन्य मूर्खा की बातों में आकर मूर्ख बन रहे हो।
कृष्ण केने दरशन दिबे कलि-काले? ।।निज-भ्रमे मूर्ख-लोक करे कोलाहले ॥
१०१॥
भला कलियुग में कृष्ण क्यों प्रकट होने लगे? भ्रमित मूर्ख लोग ही उत्तेजना फैलाते हैं और कोलाहल मचाते हैं।
‘वातुल' ना हइओ, घरे रहत वसिया । 'कृष्ण' दरशन करिह कालि रात्र्ये ग्नाआ ॥
१०२॥
पागल मत बनो। यहीं बैठे रहो और कल रात में तुम कृष्ण का दर्शन करने जाओगे।
प्रातः-काले भव्य-लोक प्रभु-स्थाने आइला । ‘कृष्ण देखि' आइला?'–प्रभु ताँहारे पुछिला ॥
१०३ ॥
अगले दिन कुछ भद्र लोग श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने आये और महाप्रभु ने उनसे पूछा, क्या आपने कृष्ण को देखा? लोक कहे,—राये कैवर्त्य नौकाते चड़िया ।। कालीय-दहे मत्स्य मारे, देउटी ज्वालिया ॥
१०४॥
इन भद्र लोगों ने उत्तर दिया, रात में कालीयदह में एक मछुआरा अपनी नाव में दीपक जलाकर मछलियाँ पकड़ता है।
दूर हैते ताहा देखि' लोकेर हय ' भ्रम' ।। 'कालीयेर शरीरे कृष्ण करिछे नर्तन'! ॥
१०५॥
दूर से लोग भ्रमवश सोचते हैं कि वे कालीय नाग के शरीर पर कृष्ण को नाचते हुए देख रहे हैं।
नौकाते कालीय-ज्ञान, दीपे रत्न-ज्ञाने! । जालियारे मूढ़-लोक'कृष्ण' करि' माने! ॥
१०६ ॥
ये मूर्ख सोचते हैं कि नाव कालीय नाग है और दीपक उसके फनों की मणियाँ हैं। लोग मछुआरे को भी कृष्ण मान बैठते हैं।
वृन्दावने 'कृष्ण' आइला, सेइ'सत्य' हय ।। कृष्णेरे देखिल लोक,—इहा 'मिथ्या' नय ॥
१०७॥
सचमुच ही भगवान् कृष्ण फिर से वृन्दावन में लौट आये हैं। यह मध है और यह भी सच है कि लोगों ने उन्हें देखा है।
किन्तु काहों 'कृष्ण' देखे, काहों 'भ्रम' माने । स्थाणु-पुरुषे ग्रैछे विपरीत-ज्ञाने ॥
१०८॥
किन्तु वे कृष्ण को कहाँ देख रहे हैं, यह उनका भ्रम है। यह तो सूखे वृक्ष को पुरुष मानने जैसा है।
प्रभु कहे,–'काहाँ पाइला कृष्ण दरशन?' । लोक कहे,–'सन्यासी तुमि जङ्गम-नारायण ॥
१०९॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनसे पूछा,तुमने कृष्ण को प्रत्यक्ष कहाँ देखा है? लोगों ने उत्तर दिया, आप संन्यासी हैं, अतएव आप चलतेफिरते नारायण ( जङ्गम-नारायण) हैं।
वृन्दावने हइला तुमि कृष्ण-अवतार । तोमा देखि' सर्व-लोक हइल निस्तार ॥
११०॥
तब लोगों ने कहा, आप वृन्दावन में कृष्ण के अवतार के रूप में प्रकट हुए हैं। आपका दर्शन करने से ही हर व्यक्ति मुक्त हो गया है।
प्रभु कहे,–विष्णु' 'विष्णु' इहा ना कहिबा! ।जीवाधमे 'कृष्ण'-ज्ञान कभु ना करिबा! ॥
१११॥
श्री चैतन्य महाप्रभु तुरन्त बोल पड़े, विष्णु! विष्णु! मुझे भगवान् मत कहो। जीव कभी-भी कृष्ण नहीं बन सकता। ऐसी बात कभी मत कहना! सन्यासी—चित्कण जीव, किरण-कण-सम । घडू-ऐश्वर्य-पूर्ण कृष्ण हय सूर्योपम ॥
११२॥
संन्यासी निश्चित ही पूर्ण का अंश है, जिस तरह कि धूप का चमकता लघु कण सूर्य का अंश होता है। कृष्ण सूर्य के समान हैं, छः ऐश्वर्यों से पृर्ण; किन्तु जीव पूर्ण का केवल अंश मात्र है।
जीव, ईश्वर-तत्त्व—कभु नहे 'सम' ।।ज्वलदग्नि-राशि प्रैछे स्फुलिङ्गेर 'कण' ॥
११३॥
जीव तथा परम भगवान् कभी भी समान नहीं माने जा सकते, जिस तरह कि स्फुलिंग का कण कभी मूल प्रज्वलित अग्नि नहीं माना जा सकता।
ह्लादिन्या संविदाश्लिष्टः सच्चिदानन्द ईश्वरः ।। स्वाविद्या-संवृतो जीवः सङ्क्लेश-निकराकरः ॥
११४॥
परम नियन्ता, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सदैव दिव्य आनन्द से पूर्ण रहते हैं और ह्लादिनी तथा सम्वित् शक्तियों से युक्त होते हैं। किन्तु बद्धजीव सदैव अज्ञान से आवृत रहता है और जीवन के तीन प्रकार के कष्टों से ग्रस्त रहता है। इस तरह वह सभी प्रकार के कष्टों की खान है।'
ग्रेइ मूढ़ कहे,---जीव ईश्वर हय ‘सम' ।। सेइत 'पाषण्डी' हय, दण्डे तारे ग्रम ॥
११५॥
जो मूर्ख यह कहता है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् जीव के समान है, वह नास्तिक है। वह यमराज द्वारा दण्डित होने का पात्र बनता है।
ग्रस्तु नारायणं देवं ब्रह्म-रुद्रादि-दैवतैः ।। समत्वेनैव वीक्षेत स पाषण्डी भवेधुवम् ॥
११६॥
जो व्यक्ति ब्रह्मा तथा शिव जैसे देवताओं को नारायण के समकक्ष मानता है, उसे अपराधी अथवा पाषण्डी माना जाता है।
लोक कहे,—तोमाते कभु नहे 'जीव'-मति । कृष्णेर सदृश तोमार आकृति-प्रकृति ॥
११७॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु सामान्य जीव तथा पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के बीच का अन्तर बतला चुके, तो लोगों ने कहा, आपको कोई भी व्यक्ति सामान्य मनुष्य नहीं मानता। आप हर तरह से, शारीरिक लक्षणों तथा गुणों से, कृष्ण के तुल्य हैं।
‘आकृत्ये' तोमारे देखि ‘व्रजेन्द्र-नन्दन' ।।देह-कान्ति पीताम्बर कैल आच्छादन ॥
११८॥
हम आपके शारीरिक लक्षणों से देखते हैं कि आप नन्द महाराज के पुत्र के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं हैं, यद्यपि आपके शरीर की सुनहरी कान्ति ने आपके मूल वर्ण को आच्छादित कर लिया है।
मृग-मद वस्त्रे बान्धे, तबु ना लुकाय ।।‘ईश्वर-स्वभाव' तोमार टाका नाहि ग्राय ॥
११९॥
जिस तरह कस्तूरी की महक कपड़े में बाँधने पर भी छिपाए नहीं पती, उसी तरह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में आपके गुणों को किसी भी प्रकार छिपाया नहीं जा सकता।
अलौकिक ‘प्रकृति' तोमार—बुद्धि-अगोचर ।तोमा देखि' कृष्ण-प्रेमे जगत्पागल ॥
१२०॥
निस्सन्देह, आपके गुण असाधारण हैं और सामान्य जीव की । कल्पना से परे हैं। आपको देख करके ही सारा ब्रह्माण्ड कृष्ण-प्रेम में पागल हो उठता है।
स्त्री-बाल-वृद्ध, आर चण्डाल’ ‘ग्रवन' ।। येइ तोमार एक-बार पाय दरशन ॥
१२१॥
कृष्ण-नाम लय, नाचे हा उन्मत्त ।।आचार्य हइल सेइ, तारिल जगत ॥
१२२॥
यहाँ तक कि स्त्रियाँ, बच्चे, बूढ़े व्यक्ति, मांसाहारी या अधम जाति वाले व्यक्ति भी आपका एक बार दर्शन करने से तुरन्त कृष्ण-नाम का कीर्तन करने लगते हैं, पागलों की भाँति नाचते हैं और सारे संसार को उद्धार करने में समर्थ गुरु बन जाते हैं।
दर्शनेर कार्य आछुक, ये तोमार 'नाम' शुने । सेइ कृष्ण-प्रेमे मत्त, तारे त्रिभुवने ॥
१२३॥
आपके दर्शन के अतिरिक्त जो कोई भी आपका पावन नाम सुनता है, वह कृष्ण-प्रेम में पागल बन जाता है और तीनों लोकों का उद्धार करने में सक्षम हो जाता है।
तोमार नाम शुनि' हय श्वपच 'पावन' । अलौकिक शक्ति तोमार ना ग्राय कथन ॥
१२४॥
आपका पावन नाम सुनने से ही कुत्ते खाने वाले ( चण्डाल ) पवित्र मन बन जाते हैं। आपकी असाधारण शक्तियों का शब्दों में वर्णन नहीं गिया जा सकता।
यन्नामधेय-श्रवणानुकीर्तनाद् ।ग्रत्प्रङ्क्षणाद् यत्स्मरणादपि क्वचित् ।। श्वादोऽपि सद्यः सवनाय कल्पते ।कुतः पुनस्ते भगवन्नु दर्शनात् ॥
१२५॥
परम भगवान् का साक्षात्कार करने वाले लोगों की आध्यात्मिक प्रगति की बात छोड़ दें, चण्डाल के परिवार में जन्मा व्यक्ति भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के नाम का एक बार भी उच्चारण करता है या उनका कीर्तन करता है, उनकी लीलाओं के विषय में सुनता है, उन्हें नमस्कार करता है या उनका स्मरण करता है, तो वह तुरन्त वैदिक यज्ञ करने का पात्र बन जाता है।'
एइत' महिमा तोमार 'तटस्थ'-लक्षण ।।‘स्वरूप'-लक्षणे तुमि–‘व्रजेन्द्र-नन्दन' ॥
१२६॥
आपकी ये महिमाएँ केवल तटस्थ लक्षण हैं। मूलतः आप महाराज नन्द के पुत्र हैं।
सेइ सब लोके प्रभु प्रसाद करिल ।कृष्ण-प्रेमे मत्त लोक निज-घरे गेल ॥
१२७॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने वहाँ पर उपस्थित सभी लोगों को अपनी अहैतुकी कृपा प्रदान की और हर व्यक्ति भगवत्प्रेम से मत्त हो उठा। अन्त में वे सब अपने-अपने घर चले गये।
एइ मत कत-दिन 'अकूरे' रहिला ।।कृष्ण-नाम-प्रेम दिया लोक निस्तारिला ॥
१२८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु कुछ दिनों तक अक्रूर तीर्थ में रहे। उन्होंने वहाँ कृष्ण-नाम तथा भगवत्प्रेम का वितरण करके हर एक का उद्धार किया।
माधव-पुरीर शिष्य सेइत ब्राह्मण ।।मथुरार घरे-घरे करा'न निमन्त्रण ॥
१२९॥
माधवेन्द्र पुरी के ब्राह्मण शिष्य ने मथुरा में घर-घर जाकर अन्य ब्राह्मणों को प्रोत्साहित किया कि श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने घरों में आमंत्रित करें।
मथुरार व्रत लोक ब्राह्मण सज्जन ।।भट्टाचार्य-स्थाने आसि' करे निमन्त्रण ॥
१३०॥
अतः मथुरा के सारे सम्मानित व्यक्ति, जिनमें ब्राह्मण अग्रणी थे, बलभद्र भट्टाचार्य के पास आये और महाप्रभु के लिए निमन्त्रण दिया।
एक-दिन 'दश' 'बिश' आइसे निमन्त्रण ।।भट्टाचार्य एकेर मात्र करेन ग्रहण ॥
१३१॥
प्रतिदिन दस से बीस निमन्त्रण प्राप्त होते, किन्तु बलभद्र भट्टाचार्य उनमें से केवल एक को स्वीकार करते।
अवसर ना पाय लोक निमन्त्रण दिते ।। सेइ विप्रे साधे लोक निमन्त्रण निते ॥
१३२॥
चूँकि हर एक को श्री चैतन्य महाप्रभु को आमन्त्रित करने का अवसर नहीं मिला, अतएव उन्होंने सनोड़िया ब्राह्मण से प्रार्थना की कि वे महाप्रभु से उनका निमन्त्रण स्वीकार करने के लिए कहें।
कान्यकुब्ज़-दाक्षिणात्येर वैदिक ब्राह्मण । दैन्य करि, करे महाप्रभुर निमन्त्रण ।। १३३॥
कान्यकुब्ज तथा दक्षिण भारत जैसे विभिन्न स्थानों के ब्राह्मणों ने, जो वैदिक धर्म के पक्के अनुयायी थे, परम दैन्य भाव से श्री चैतन्य महाप्रभु को निमन्त्रण दिया।
प्रातःकाले अकूरे आसि' रन्धन करिया ।। प्रभुरे भिक्षा देन शालग्रामे समर्पिया ॥
१३४॥
प्रात:काल वे अक्रूर तीर्थ आते और भोजन पकाते थे। फिर इसे शालग्राम शिला को अर्पित करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु को देते।
एक-दिन सेइ अक्रूर-घाटेर उपरे । वसि’ महाप्रभु किछु करेन विचारे ।। १३५ ॥
एक दिन श्री चैतन्य महाप्रभु अक्रूर-तीर्थ के स्नानघाट पर बैठ गये। और इस तरह सोचने लगे।
एइ घाटे अक्रूर वैकुण्ठ देखिल ।। व्रजवासी लोक 'गोलोक' दर्शन कैल ॥
१३६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने सोचा, इस घाट पर अक्रूर को वैकुण्ठ लोक ग्वा था और सारे व्रजवासियों ने गोलोक वृन्दावन देखा था।
एत बलि' झाँप दिला जलेर उपरे ।डुबिया रहिला प्रभु जलेर भितरे ॥
१३७॥
यह सोचते हुए कि अक्रूर किस तरह जल के भीतर रहे, श्री चैतन्य महाप्रभु तुरन्त जल में कूद पड़े और कुछ समय तक जल के भीतर रहे।
देखि' कृष्णदास कान्दि' फुकार करिल ।।भट्टाचार्य शीघ्र आसि’ प्रभुरे उठाइल ॥
१३८॥
जब कृष्णदास ने देखा कि चैतन्य महाप्रभु डूब रहे हैं, तो वह खूब जोर से चिल्लाया। तुरन्त ही बलभद्र भट्टाचार्य ने आकर महाप्रभु को जल से बाहर खींचा।
तबे भट्टाचार्य सेइ ब्राह्मणे ला ।।युक्ति करिला किछु निभृते वसिया ॥
१३९॥
इसके बाद बलभद्र भट्टाचार्य सनोड़िया ब्राह्मण को एकान्त स्थान में ले गया और उससे विचार-विमर्श किया।
आजि आमि आछिलाङ उठाइलें प्रभुरे ।।वृन्दावने डुबेन यदि, के उठाबे ताँरे? ॥
१४० ॥
बलभद्र भट्टाचार्य ने कहा, चूँकि मैं आज उपस्थित था, इसलिए महाप्रभु को ऊपर खींच पाना मेरे लिए सम्भव हो सका। किन्तु यदि वे गन्दावन में डूबने लगें, तो कौन उनकी सहायता करेगा? लोकेर सङ्घट्ट, आर निमन्त्रणेर जञ्जाल ।।निरन्तर आवेश प्रभुर ना देखिये भाल ॥
१४१।। अब यहाँ पर लोगों की भीड़ होने लगी है और इन निमन्त्रणों से बहुत परेशानी होती है। साथ ही, महाप्रभु सदैव भावावेश में रहते हैं। मुझे यहाँ की स्थिति बहुत अच्छी नहीं लगती।
वृन्दावन हैते यदि प्रभुरे काड़िये ।।तबे मङ्गल हय,–एइ भाल युक्ति हुये ।। १४२॥
अच्छा यही होगा, यदि हम श्री चैतन्य महाप्रभु को वृन्दावन से बाहर ले चलें। यही मेरा अन्तिम निर्णय है।
विप्र कहे,—प्रयागे प्रभु ला ग्राइ ।गङ्गा-तीर-पथे ग्राइ, तबे सुख पाइ ॥
१४३ ॥
सनोडिया ब्राह्मण ने कहा, चलो, हम उन्हें प्रयाग ले चलें और गंगा के किनारे-किनारे चलें। उस मार्ग से होकर जाना बहुत ही आनन्दप्रद होगा।
‘सोरो-क्षेत्रे, आगे ग्राञा करि' गङ्गा-स्नान ।।सेइ पथे प्रभु लञा करिये पयान ॥
१४४॥
सोरोक्षेत्र नामक तीर्थस्थान जाकर तथा गंगास्नान करके हम श्री चैतन्य महाप्रभु को उसी मार्ग से होकर ले चलें।
माघ-मास लागिल, एबे यदि ग्राइये ।।मकरे प्रयाग-स्नान कत दिन पाइये ॥
१४५॥
अब माघ मास लग रहा है। यदि हम इस समय प्रयाग जाएँ, तो हमें मकर संक्रान्ति के अवसर पर कुछ दिन स्नान करने का अवसर मिल जायेगा।
आपनार दुःख किछु करि' निवेदन ।।‘मकर-पँचसि प्रयागे' करिह सूचन ॥
१४६॥
सनोड़िया ब्राह्मण ने आगे कहा, तुम अपने मन के भीतर जिस दुःख का अनुभव कर रहे हो, उसे चैतन्य महाप्रभु के सामने निवेदन करो। तब यह प्रस्ताव रखो कि हम माघ मास की पूर्णिमा को प्रयाग जाना चाहते हैं।
गङ्गा-तीर-पथे सुख जानाइह ताँरे ।भट्टाचार्य आसि' तबे कहिल प्रभुरे ॥
१४७॥
तुम महाप्रभु से जाकर उस सुख को बतलाओ, जो तुम गंगा नदी के किनारे-किनारे यात्रा करने में अनुभव करोगे। अत: बलभद्र भट्टाचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु से यह प्रार्थना निवेदित की।
सहिते ना पारि आमि लोकेर गड़बड़ि।। निमन्त्रण लागि' लोक करे हुड़ाहुड़ि ॥
१४८ ॥
बलभद्र भट्टाचार्य ने महाप्रभु से बतलाया, मैं अब भीड़ द्वारा किये जाने वाले उपद्रव को और नहीं सह सकता। लोग एक के बाद एक निमन्त्रण देने के लिए चले आते हैं।
प्रातःकाले आइसे लोक, तोमारे ना पाय ।। तोमारे ना पाजा लोक मोर माथा खाय ॥
१४९॥
प्रातःकाल लोग यहाँ आते हैं और आपको उपस्थित न देखकर मेरा सिर खाते हैं।
तबे सुख हय ग्रबे गङ्गा-पथे ग्राइये । एबे ग्रदि ग्राइ, ‘मकरे' गङ्गा-स्नान पाइये ॥
१५०॥
मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी, यदि हम सभी गंगा नदी के किनारे के मार्ग से यात्रा करें। तब हमें मकर संक्रान्ति के अवसर पर प्रयाग में स्नान करने का अवसर प्राप्त हो सकता है।
उद्विग्न हइल प्राण, सहिते ना पारि ।। प्रभुर ग्रे आज्ञा हय, सेइ शिरे धरि ॥
१५१॥
मेरा मन अत्यन्त उद्विग्न हो उठा है और मैं इस चिन्ता को सह नहीं सकता। अब तो आपकी अनुमति पर ही सब निर्भर करता है। आप जो करना चाहें वह मुझे स्वीकार्य होगा।
ग्रद्यपि वृन्दावन-त्यागे नाहि प्रभुर मन ।। भक्त-इच्छा पूरिते कहे मधुर वचन ॥
१५२॥
यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु की इच्छा नहीं थी कि वृन्दावन छोड़े, किन्तु अपने भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए वे मीठे बचन बोले।
तुमि आमाय आनि' देखाइला वृन्दावन ।।एइ 'ऋण' आमि नारिब करिते शोधन ॥
१५३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, तुम मुझे यहाँ वृन्दावन दिखलाने के लिए लाये हो। इसके लिए मैं तुम्हारा अत्यधिक ऋणी हूँ और मैं इस ऋण को चुका सकने में समर्थ नहीं हो सकेंगा।
ये तोमार इच्छा, आमि सेइत करिब ।।ग्राहाँ लजा ग्राह तुमि, ताहाङिग्राइब ॥
१५४॥
जो तुम्हारी इच्छा है, वही मैं करूँगा। तुम मुझे जहाँ भी ले जाओगे, भी जाऊँगा।
प्रातः-काले महाप्रभु प्रातः-स्नान कैल ।।‘वृन्दावन छाड़िब' जानि' प्रेमावेश हैल ॥
१५५॥
अगले दिन श्री चैतन्य महाप्रभु जल्दी उठ गये। स्नान करने के बाद यह जानकर कि अब उन्हें वृन्दावन छोड़ना है, वे भावाविष्ट हो गये।
बाह्य विकार नाहि, प्रेमाविष्ट मन ।। भट्टाचार्य कहे,—चल, ग्राइ महावन ॥
१५६ ॥
यद्यपि महाप्रभु के शरीर में बाह्य लक्षण प्रकट नहीं हुए, किन्तु उनका मन प्रेमाविष्ट था। उस समय बलभद्र भट्टाचार्य ने कहा, चलिए महावन ( गोकुल ) चलें।
एत बलि' महाप्रभुरे नौकाय वसा ।।पार करि' भट्टाचार्य चलिला ला ॥
१५७॥
यह कहकर बलभद्र भट्टाचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु को नौका में चढ़ाया और नदी पार करने के बाद वह महाप्रभु को अपने साथ ले गया।
प्रेमी कृष्णदास, आर सेइत ब्राह्मण ।। गङ्गा-तीर-पथे ग्राइबार विज्ञ दुइ-जन ॥
१५८॥
राजपूत कृष्णदास तथा सनोड़िया ब्राह्मण दोनों ही गंगा नदी के कनारे के रास्ते से भलीभाँति परिचित थे।
ग्राइते एक वृक्ष-तले प्रभु सबा लञा ।। वसिला, सबार पथ-श्रान्ति देखिया ॥
१५९॥
जाते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु समझ गये कि अन्य लोग थक गये हैं, अतः वे सबको एक वृक्ष के तले ले गये और बैठ गये।
सेइ वृक्ष-निकटे चरे बहु गाभी-गण ।। ताहा देखि' महाप्रभुर उल्लसित मन ॥
१६०॥
उस वृक्ष के पास बहुत-सी गाएँ चर रही थीं और महाप्रभु उन्हें देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए।
अचम्बिते एक गोप वंशी बाजाइल । शुनि' महाप्रभुर महा-प्रेमावेश हैल ॥
१६१॥
सहसा एक ग्वाले ने अपनी वंशी बजाई, तो महाप्रभु तुरन्त प्रेमाविष्ट हो गये।
अचेतन हा प्रभु भूमिते पड़िला । मुखे फेना पड़े, नासाय श्वास रुद्ध हैला ॥
१६२॥
भावाविष्ट होने से महाप्रभु अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े। उनके मुख से फेन निकलने लगा और उनकी श्वास रुक गई।
हेन-काले ताहाँ आशोयार दश आइला । म्लेच्छ-पाठान घोड़ा हैते उत्तरिला ॥
१६३ ॥
जब महाप्रभु बेहोश थे, तब वहाँ दस अश्वारोही सिपाही, जो पुसलमान पठान सैनिक थे, आये और घोड़े से उतरे।
प्रभुरे देखिया म्लेच्छ करये विचार ।। एइ यति-पाश छिल सुवर्ण अपार ॥
१६४॥
महाप्रभु को बेहोश देखकर सिपाहियों ने सोचा, इस संन्यासी के पास अवश्य ही काफी मात्रा में सोना होगा।
एइ चारि बाटोयार धुतुरा खाओयाजा ।। मारि' डारियाछे, ग्रतिर सब धन लञा ॥
१६५ ॥
इन चारों धूर्ती ने धतूरा खिलाकर मारने के बाद अवश्य ही इस संन्यासी का धन ले लिया होगा।
तबे सेइ पाठान चारि-जनेरे बाँधिल ।।काटिते चाहे, गौड़िया सब काँपिते लागिल ॥
१६६॥
यह सोचकर पठान सैनिकों ने उन चारों जनों को बन्दी बना लिया और उनको मार डालने का निश्चय किया। इसके कारण दोनों बंगाली काँपने लगे।
कृष्णदास----राजपुत, निर्भय से बड़ ।।सेइ विप्र निर्भय, से—मुखे बड़ दड़ ॥
१६७॥
भक्त कृष्णदास राजपूत जाति का था और बहुत निडर था। सनोड़िया ब्राह्मण भी निडर था, अतः वह बड़ी बहादुरी से बोला।
विप्र कहे,—पाठान, तोमार पात्सार दोहाइ । चल तुमि आमि सिक्दार-पाश ग्राइ ॥
१६८॥
ब्राह्मण ने कहा, तुम पाठान सिपाही अपने राजा के संरक्षण में हो। भलो हम तुम्हारे अधिकारी के पास चलते हैं और उनका निर्णय लेते हैं।
एइ ग्रति आमार गुरु, आमि–माथुर ब्राह्मण ।। पात्सार आगे आछे मोर ‘शत जन' ॥
१६९॥
यह संन्यासी मेरे गुरु हैं और मैं मथुरा से आया हूँ। मैं ब्राह्मण हूँ और में ऐसे सैकड़ों व्यक्तियों को जानता हूँ, जो मुसलमान राजा की नौकरी में हैं ।"
एइ ग्रति व्याधिते कभु हयेन मूच्छित ।अबँहि चेतन पाइबे, हइबे सम्वित ॥
१७०॥
ये संन्यासी रोग के कारण कभी-कभी बेहोश हो जाते हैं। कृपया बैठ जाएँ और आप देखेंगे कि शीघ्र ही उन्हें चेतना आ जायेगी और वे सामान्य हो जायेंगे।
क्षणेक इहाँ वैस, बान्धि' राखह सबारे ।।इँहाके पुछिया, तबे मारिह सबारे ॥
१७१॥
आप थोड़ी देर बैठे रहें और हम सबको बन्दी बनाये रखें। जब इन संन्यासी को होश आ जाए, तब आप इनसे पूछे। तब यदि आप चाहें तो हम सबको मार सकते हैं।
पाठान कहे,—तुमि पश्चिमा माथुर दुइ-जन ।।‘गौड़िया' ठक् एइ काँपे दुइ-जन ॥
१७२ ॥
सिपाहियों ने कहा, तुम सभी धूर्त हो। तुम में से एक पश्चिम से है, एक मथुरा जिले से है और अन्य दो, जो काँप रहे हैं, बंगाल के हैं।
कृष्णदास कहे,—आमार घर एइ ग्रामे ।।दुइ-शत तुर्की आछे, शतेक कामाने ॥
१७३॥
राजपूत कृष्णदास ने कहा, मेरा घर यहीं है और मेरे पास लगभग मी तुर्की सिपाही तथा एक सौ तोपें हैं।
एखनि आसिबे सब, आमि यदि फुकारि ।।घोड़ा-पिड़ा लुटि' लबे तोमा-सबा मारि' ॥
१७४॥
यदि मैं पुकारूँ, तो वे तुरन्त आकर तुम्हारा वध कर देंगे और तुम्हारे थी तथा काठी लूट लेंगे।
गौड़िया--' बाटपाड़' नहे, तुमि-बाटपाड़' ।तीर्थ-वासी लुठ', आर चाह' मारिबार ॥
१७५ ॥
बंगाली यात्री धूर्त नहीं हैं। तुम्हीं धूर्त हो, जो यात्रियों को मारकर लूट लेना चाहते हो।
शुनिया पाठान मने सङ्कोच हइल ।। हेन-काले महाप्रभु चैतन्य' पाइल ॥
१७६ ॥
यह ललकार सुनकर पाठान सिपाही हिचकिचाये। तभी श्री चैतन्य महाप्रभु की सहसा चेतना लौट आयी।
हुङ्कार करिया उठे, बले ‘हरि' ‘हरि' ।।प्रेमावेशे नृत्य करे ऊर्ध्व-बाहु करि' ॥
१७७॥
चेतना आने पर महाप्रभु जोर-जोर से हरि! हरि! का उच्चारण करने लगे। वे अपनी दोनों बाहें ऊपर उठाकर प्रेमावेश में नृत्य करने लगे।
प्रेमावेशे प्रभु ग्रबे करेन चित्कार। म्लेच्छेर हृदये ग्रेन लागे शेलधार ॥
१७८॥
जब प्रेमावेश में महाप्रभु ने गर्जना की, तो मुसलमान सिपाहियों को लगा कि उनके हृदयों पर वज्रपात हो गया है।
भय पाञा म्लेच्छ छाड़ि' दिल चारि-जन ।। प्रभु ना देखिल निज-गणेर बन्धन ॥
१७९॥
सभी पठान सिपाहियों ने भय के मारे चारों व्यक्तियों को छोड़ दिया। म तह श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने निजी संगियों को बन्दी रूप में नहीं भट्टाचार्य आसि' प्रभुरे धरि' वसाइल ।। म्लेच्छ-गण देखि' महाप्रभुर'बाह्य' हैल ॥
१८०॥
तभी बलभद्र भट्टाचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु के पास जाकर उन्हें पकड़कर बैठाया। मुसलमान सिपाहियों को देखकर महाप्रभु को बाह्य चेतना हो गई।
म्लेच्छ-गण आसि' प्रभुर वन्दिल चरण ।।प्रभु-आगे कहे,—एइ ठक् चारि-जन ॥
१८१॥
तब सारे मुसलमान सिपाही महाप्रभु के समक्ष आये, उन्होंने उनके चरणकमलों की वन्दना की और कहा, ये चारों धूर्त ( ठग ) हैं।
एइ चारि मिलि' तोमाय धुतुरा खाओयाजा ।। तोमार धन लैल तोमाये पागल करिया ॥
१८२॥
इन चारों ने मिलकर आपको धतूरा खिलाया और आपको पागल बनाकर आपका सारा धन ले लिया है।
प्रभु कहेन, ठक् नहे, मोर 'सङ्गी' जन ।। भिक्षुक सन्यासी, मोर नाहि किछु धन ॥
१८३ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, ये चारों ठग नहीं हैं। ये मेरे साथी हैं। सन्यासीभिक्षुक होने के कारण मेरे पास कुछ भी नहीं है।
मृगी-व्याधिते आमि कभु हइ अचेतन ।। एइ चारि दया करि' करेन पालन ॥
१८४॥
मिरगी रोग के कारण मैं कभी-कभी बेहोश हो जाता हूँ। ये चारों यावश मेरी देख-रेख करते हैं।
सेइ म्लेच्छ-मध्ये एक परम गम्भीर ।। काल वस्त्र परे सेइ, लोके कहे 'पीर' ॥
१८५॥
उन मुसलमानों में से एक गम्भीर व्यक्ति था, जो काले वस्त्र पहने था। लोग उसे साधु पुरुष (पीर) कहते थे।
चित्त आई हैल ताँर प्रभुरे देखियो । 'निर्विशेष-ब्रह्म' स्थापे स्वशास्त्र उठाझा ॥
१८६॥
उस पीर का मन श्री चैतन्य महाप्रभु को देखकर मृदु हो गया। उसने उनसे बात करनी चाही और अपने शास्त्र कुरान के आधार पर निर्विशेष ब्रह्म की स्थापना करनी चाही।
‘अद्वैत-ब्रह्म-वाद' सेइ करिल स्थापन । तार शास्त्र-युक्त्ये तारे प्रभु कैला खण्डन ॥
१८७॥
जब उस पीर ने कुरान के आधार पर परम सत्य की निर्विशेष ब्रह्मवाद के रूप में स्थापना करने का प्रयास किया, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसके तर्को का खण्डन किया।
येइ ग्रेइ कहिल, प्रभु सकलि खण्डिल ।। उत्तर ना आइसे मुखे, महा-स्तब्ध हैल ॥
१८८॥
वह जो भी तर्क प्रस्तुत करता, महाप्रभु उन सबका खण्डन कर देते। अन्त में वह व्यक्ति स्तम्भित रह गया और कुछ भी बोल न सका।
प्रभु कहे,—तोमार शास्त्र स्थापे 'निर्विशेषे'।ताहा खण्डि' 'सविशेष' स्थापियाछे शेषे ॥
१८९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, कुरान द्वारा निश्चय ही निर्विशेषवाद स्थापित होता है, किन्तु अन्त में यह निर्विशेषवाद का खण्डन करके माकार ईश्वर की स्थापना करता है।
तोमार शास्त्रे कहे शेषे 'एक-इ ईश्वर' ।‘सर्वैश्वर्य-पूर्ण तेहो–श्याम-कलेवर ॥
१९०॥
कुरान इस तथ्य को स्वीकार करता है कि अन्ततोगत्वा ईश्वर केवल एक हैं। वे ऐश्वर्य से पूर्ण हैं और उनका शारीरिक वर्ण श्याम (काला) हैं।
सच्चिदानन्द-देह, पूर्ण-ब्रह्म-स्वरूप ।। ‘सर्वात्मा', 'सर्वज्ञ', नित्य सर्वादि-स्वरूप ॥
१९१॥
कुरान के अनुसार भगवान् का स्वरूप सनातन, आनन्दमय तथा दिव्य है। वे परम सत्य, सर्वव्यापक, सर्वज्ञ तथा शाश्वत व्यक्ति हैं। वे सभी वस्तुओं के उद्गम हैं।
सृष्टि, स्थिति, प्रलय ताँहा हैते हये ।। स्थूल-सूक्ष्म-जगतेर तेंहो समाश्रय ॥
१९२॥
सृष्टि, पालन और संहार उन्हीं से होते हैं। वे समस्त स्थूल तथा सूक्ष्म प्राकट्यों के मूल आश्रय हैं।
सर्व-श्रेष्ठ, सर्वाराध्य, कारणेर कारण ।।ताँर भक्त्ये हय जीवेर संसार-तारण ॥
१९३॥
भगवान् सबके द्वारा आराध्य परम सत्य हैं। वे समस्त कारणों के कारण हैं। उनकी भक्ति करने से जीव भवबन्धन से छूट जाता है।
ताँर सेवा विना जीवेर ना ग्राय 'संसार' ।।ताँहार चरणे प्रीति–‘पुरुषार्थ-सार' ॥
१९४॥
कोई भी बद्धजीव पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा किये बिना भवबन्धन से छूट नहीं सकता। जीवन का चरम उद्देश्य उनके चरणों के प्रति प्रेम है।
मोक्षादि आनन्द झार नहे एक 'कण' ।।पूर्णानन्द-प्राप्ति ताँर चरण-सेवन ॥
१९५॥
मुक्ति का सुख, जिसमें मनुष्य भगवान् से एकाकार हो जाता है, भगवान् के चरणकमलों की सेवा करने से प्राप्त होने वाले दिव्य आनन्द के एक अंश के भी बराबर नहीं है।
'कर्म', 'ज्ञान', 'ग्रोग' आगे करिया स्थापन ।सब खण्डि' स्थापे 'ईश्वर', 'ताँहार सेवन' ॥
१९६॥
कुरान में सकाम कर्म, ज्ञान, योग तथा सर्वोपरि से मिलन का वर्णन मिलता है, किन्तु अन्ततः हर बात का खण्डन होता है, और भगवान् के रूप तथा उनकी भक्ति की स्थापना होती है।
तोमार पण्डित-सबार नाहि शास्त्र-ज्ञान ।। पूर्वापर-विधि-मध्ये 'पर'–बलवान् ॥
१९७॥
कुरान के विद्वान ज्ञान में अधिक उन्नत नहीं हैं। यद्यपि कई विधियों I aन हुआ है, किन्तु वे यह नहीं जानते कि अन्तिम निर्णय को सबसे मान मानना चाहिए।
निज-शास्त्र देखि' तुमि विचार करिया ।। कि लिखियाछे शेषे कह निर्णय करिया ॥
१९८॥
अपने कुरान को देखकर तथा उसमें जो कुछ लिखा है उस पर र करने के बाद तुम्हारा निर्णय क्या है? ।
म्लेच्छ कहे,—येइ कह, सेइ 'सत्य' हय ।। शास्त्रे लिखियाछे, केह लइते ना पारय ॥
१९९॥
उस मुस्लिम सन्त ने उत्तर दिया, आपने जो कुछ कहा है, वह सत्य है। यह कुरान में लिखा अवश्य है, किन्तु हमारे विद्वान न तो इसे समझते हैं, न स्वीकार करते हैं।
‘निर्विशेष-गोसाञि' लञा करेन व्याख्यान । ‘साकार-गोसाजि'–सेव्य, कारो नाहि ज्ञान ॥
२०० ॥
सामान्यतया वे भगवान् के निर्विशेष पक्ष का वर्णन करते हैं, किन्तु उन्हें शायद ही इसका ज्ञान हो कि भगवान् का साकार रूप पूजनीय है। निस्सन्देह, उनमें इस ज्ञान का अभाव है।
सेइत ‘गोसाजि' तुमि-साक्षात् 'ईश्वर' ।। मोरे कृपा कर, मुञि—अयोग्य पामर ॥
२०१॥
चूँकि आप वही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, अतएव मुझ पर कृपा कीजिये। मैं पतित और अयोग्य हूँ।
अनेक देखिनु मुञि म्लेच्छ-शास्त्र हैते ।।'साध्य-साधन-वस्तु' नारि निर्धारिते ॥
२०२॥
मैंने मुसलमान शास्त्र का विस्तार से अध्ययन किया है, किन्तु मैं अन्तिम रूप से यह निश्चय नहीं कर सकता कि जीवन का चरम लक्ष्य क्या है अथवा उस तक मैं कैसे पहुँच सकता हूँ? तोमा देखि' जिह्वा मोर बले 'कृष्ण-नाम' ।।‘आमि-बड़ ज्ञानी'—एइ गेल अभिमान ॥
२०३ ॥
अब आपको देखकर मेरी जीभ हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन का रही है। अब मेरा यह मिथ्या अभिमान दूर हो गया है कि मैं विद्वान हूँ।
कृपा करि' बल मोरे ‘साध्य-साधने' ।।एत बलि' पड़े महाप्रभुर चरणे ॥
२०४॥
यह कहकर वह सन्त मुसलमान श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमल पर गिर पड़ा और उनसे प्रार्थना की कि वे जीवन के चरम लक्ष्य तथा उसे प्राप्त करने की विधि के बारे में उससे कहें।
प्रभु कहे,—उठ, कृष्ण-नाम तुमि लइला ।।कोटि-जन्मेर पाप गेल, 'पवित्र' हइला ॥
२०५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, कृपया उठो। तुमने कृष्ण के पवि नाम का उच्चारण किया है। अतः तुम्हारे करोड़ों जन्मों के पापों के फल चले गये। अब तुम शुद्ध हो गये हो।
'कृष्ण' कह, 'कृष्ण' कह, कैला उपदेश ।।सबे 'कृष्ण' कहे, सबार हैल प्रेमावेश ॥
२०६॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने वहाँ उपस्थित सारे मुसलमानों से कहा, 'कृष्ण' के पवित्र नाम का कीर्तन करो! कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करो! जब वे सब कीर्तन करने लगे, तो वे सभी प्रेमाविष्ट हो गये।
‘रामदास' बलि' प्रभु ताँर कैल नाम ।।आर एक पाठान, ताँर नाम–'विजुली-खाँन' ॥
२०७॥
अग तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रत्यक्ष रूप से उस सन्त मुसलमान को कृष्ण नाम का कीर्तन करने का उपदेश देकर उसे दीक्षित कर दिया। उसका नाम बदलकर रामदास कर दिया गया। एक अन्य पठान भी वहाँ , जिसका नाम विजुली खान रखा गया।
अल्प वयस ताँर, राजार कुमार ।।‘रामदास' आदि पाठान–चाकर ताँहार ॥
२०८॥
विजुली खान नवयुवक था और राजा का पुत्र था। रामदास आदि अन्य सारे पठान उसके नौकर थे।
'कृष्ण' बलि' पड़े सेइ महाप्रभुर पाय ।।प्रभु श्री-चरण दिल ताँहार माथाय ॥
२०९॥
विजुली खान भी श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़ा। और महाप्रभु ने उसके सिर पर अपना चरण रखा।
ताँ-सबारे कृपा करि' प्रभु त' चलिला ।। सेइत पाठान सब 'वैरागी' हइला ॥
२१०॥
इस तरह उन सब पर कृपा करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु चल पड़े। तब सारे पठान मुस्लिम साधु ( वैरागी) हो गये।
पाठान-वैष्णव बलि' हैल ताँर ख्याति ।। सर्वत्र गाहिया बुले महाप्रभुर कीर्ति ॥
२११॥
ये ही पठान बाद में पठान वैष्णवों के नाम से विख्यात हुए। वे देशभर घूम-घूमकर श्री चैतन्य महाप्रभु की कीर्ति का गुणगान करने लगे।
सेइ विजुली-खाँन हैल 'महा-भागवत' ।।सर्व-तीर्थे हैल ताँर परम-महत्त्व ॥
२१२॥
विजुली खान बहुत बड़ा भक्त बन गया और उसका महत्त्व प्रत्येक तीर्थस्थान में विख्यात हो गया।
ऐछे लीला करे प्रभु श्री-कृष्ण-चैतन्य ।।‘पश्चिमे' आसिया कैल ग्रवनादि धन्य ॥
२१३॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने लीलाएँ कीं। उन्होंने भारत के पश्चिमी भाग में आकर यवनों तथा म्लेच्छों को सौभाग्य प्रदान किया।
सोरो-क्षेत्रे आसि' प्रभु कैला गङ्गा-स्नान । गङ्गा-तीर-पथे कैला प्रयागे प्रयाण ।। २१४॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु सोरोक्षेत्र नामक तीर्थस्थान गये। उन्होंने वहाँ गगा नदी में स्नान किया और फिर वे गंगा के किनारे-किनारे प्रयाग लिए चल पड़े।
सेइ विप्रे, कृष्णदासे, प्रभु विदाय दिला ।। ग्रोड़-हाते दुइ-जन कहते लागिला ॥
२१५॥
सोरोक्षेत्र में महाप्रभु ने सनोड़िया ब्राह्मण तथा राजपूत कृष्णदास से लौट जाने के लिए कहा, किन्तु वे हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले।।
प्रयाग-पर्यन्त मुँहे तोमा-सङ्गे ग्राब ।। तोमार चरण-सङ्ग पुनः काहाँ पाब? ॥
२१६॥
उन्होंने प्रार्थना की, हमें अपने साथ प्रयाग तक चलने दें। यदि हम अभी नहीं जाते, तो हमें आपके चरणकमलों का संग फिर कब मिल पायेगा? म्लेच्छ-देश, केह काहाँ करये उत्पात । भट्टाचार्य–पण्डित, कहिते ना जानेन बात् ॥
२१७॥
यह देश मुख्यतया मुसलमानों से भरा पड़ा है। कोई किसी भी स्थान में उत्पात कर सकता है। यद्यपि आपका संगी बलभद्र भट्टाचार्य विद्वान है, किन्तु वह स्थानीय भाषा में बात करना नहीं जानता।
शुनि' महाप्रभु ईषत् हासिते लागिला ।। सेइ दुइ-जन प्रभुर सङ्गे चलि' आइला ॥
२१८॥
यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने थोड़ा हँसते हुए उनका प्रस्ता स्वीकार कर लिया। इस तरह वे दोनों उनके साथ चलते रहे।
येइ येइ जन प्रभुर पाइल दरशन ।। सेइ प्रेमे मत्त हय, करे कृष्ण-सङ्कीर्तन ॥
२१९॥
जो भी श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करता, वह भावाविष्ट हो जाता है। हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन करने लगता।
ताँर सङ्गे अन्योन्ये, ताँर सङ्गे आने ।।एइ-मत 'वैष्णव' कैला सब देश-ग्राम ॥
२२०॥
जो भी श्री चैतन्य महाप्रभु से मिला, वह वैष्णव बन गया और जो ॥
॥
वैष्णव से मिला, वह भी वैष्णव बन गया। इस तरह एक के बाद मारे नगरवासी तथा ग्रामवासी वैष्णव बन गये।
दक्षिण झाइते भैछे शक्ति प्रकाशिला ।।सेइ-मत पश्चिम देश, प्रेमे भासाइला ॥
२२१॥
जिस तरह महाप्रभु ने अपनी यात्रा से दक्षिण भारत को भगवत्प्रेम से। आप्लावित कर दिया था, उसी तरह उन्होंने देश के पश्चिमी भाग को भी भगवत्प्रेम से आप्लावित किया।
एइ-मत चलि प्रभु 'प्रयोग' आइला ।।दश-दिन त्रिवेणीते मकर-स्नान कैला ॥
२२२॥
अन्त में श्री चैतन्य महाप्रभु प्रयाग पहुँचे और मकर-संक्रान्ति ( माघ मेला ) के अवसर पर लगातार दस दिनों तक गंगा तथा यमुना नदियों के संगम में स्नान किया।
वृन्दावन-गमन, प्रभु-चरित्र अनन्त ।। 'सहस्र-वदन' याँर नाहि पान अन्त ॥
२२३॥
भी चैतन्य महाप्रभु का वृन्दावन गमन और वहाँ पर उनकी लीलाएँ त हैं। यहाँ तक कि सहस्र फनों वाले भगवान् शेष भी उनके भार्यकलापों का अन्त नहीं पा सकते।
ताहा के कहिते पारे क्षुद्र जीव हो ।दिग्दरशन कैलँ मुञि सूत्र करिया ॥
२२४॥
भला कौन सामान्य जीव श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का वर्णन । सकता है? मैंने तो सार रूप में सामान्य दिशानिर्देशन ही किया है।
अलौकिक-लीला प्रभुर अलौकिक-रीति ।। शुनिलेओ भाग्य-हीनेर ना हय प्रतीति ॥
२२५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ तथा रीतियाँ असाधारण हैं। जो अभागा होगा वही इन बातों को सुनने के बाद भी उन पर विश्वास नहीं करेगा।
आद्योपान्त चैतन्य-लीला-'अलौकिक' जान' ।। श्रद्धा करि' शुन इहा, 'सत्य' करि' मान' ॥
२२६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ शुरू से लेकर अन्त तक अलौकिक हैं। उन्हें श्रद्धापूर्वक सुनना चाहिए और सत्य के रूप में स्वीकार करना चाहिए।
ग्रेइ तर्क करे इहाँ, सेइ‘मूर्ख-राज' ।। आपनार मुण्डे से आपनि पाड़े वाज ॥
२२७॥
जो भी इनके विषय में तर्क करता है, वह महामूर्ख है। वह जानबूझकर अपने ही सिर पर वज्रपात करता है।
चैतन्य-चरित्र एइअमृतेर सिन्धु' ।।जगत् आनन्दे भासाय ग्रार एक-बिन्दु ॥
२२८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अमृत के सागर तुल्य हैं। इस समुद्र मी एक बूंद भी सारे संसार को दिव्य आनन्द से आप्लावित कर सकती हैं।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे ग्रार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
२२९॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों में प्रार्थना करते हुए और उनके कृपा की सदैव आकांक्षा करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों का अनुसरण करते हुए श्री चैतन्य-चरितामृत कह रहा हूँ।
