अध्याय पंद्रह: भगवान सर्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद स्वीकार करते हैं
सार्वभौम-गृहे भुञ्जन्स्व-निन्दकममोघकम् ।। अङ्गी-कुर्वन्स्फुटां चक्रे गौर: स्वां भक्त-वश्यताम् ॥
१॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर प्रसाद ग्रहण कर रहे थे, तब अमोघ ने उनकी आलोचना की। फिर भी महाप्रभु ने अमोघ को स्वीकार करके दिखला दिया कि वे अपने भक्तों के कितने कृतज्ञ हैं।
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! नित्यानन्द प्रभु की जय हो! अद्वैतचन्द्र की जय हो तथा चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! जय श्री-चैतन्य-चरितामृत-स्रोता-गण ।। चैतन्य-चरितामृत-—याँर प्राण-धन ॥
३॥
श्री चैतन्य-चरितामृत के श्रोताओं की जय हो, जिन्होंने इसे अपना Tण तथा आत्मा मान रखा है।
एइ-मत महाप्रभु भक्त-गण-सङ्गे।। नीलाचले रहि' करे नृत्य-गीत-रङ्गे ॥
४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी में रहते हुए अपने भक्तों के साथ निरन्तर कीर्तन और नर्तन का आनन्द लेते रहे।
प्रथमावसरे जगन्नाथ-दरशन । नृत्य-गीत करे दण्ड-परणाम, स्तवन ॥
५॥
दिन आरम्भ होते ही श्री चैतन्य महाप्रभु ने मन्दिर में भगवान जगन्नाथ के अर्चाविग्रह के दर्शन किये, उन्हें नमस्कार किया, उनकी स्तुति की और उनके समक्ष नाचा-गाया।
उपल-भोग' लागिले करे बाहिरे विजय ।। हरिदास मिलि' आइसे आपन निलय ॥
६॥
मन्दिर में जाने के बाद, श्री चैतन्य महाप्रभु उपलभोग के समय मन्दिरके बाहर रहते थे। तब वे हरिदास ठाकुर से मिलने जाते और फिर अपने निवासस्थान लौट आते थे।
घरे वसि' करे प्रभु नाम सङ्कीर्तन ।अद्वैत आसिया करे प्रभुर पूजन ॥
७॥
महाप्रभु अपने कमरे में बैठकर माला पर जप करते और अद्वैत प्रभु वहाँ पर महाप्रभु की पूजा करने आया करते।
सुगन्धि-सलिले देन पाद्य, आचमन ।।सर्वाङ्गे लेपये प्रभुर सुगन्धि चन्दन ॥
८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की पूजा करते समय अद्वैत आचार्य उन्हें मुँह तथापाँव धोने के लिए सुगन्धित जल दिया करते। फिर अद्वैत आचार्य महाप्रभु के पूरे शरीर में सुगन्धित चन्दन का लेप किया करते।
गले माला देन, माथाय तुलसी-मञ्जरी ।।ग्रोड़-हाते स्तुति करे पदे नमस्करि' ॥
९॥
श्री अद्वैत आचार्य महाप्रभु के गले में फूल की माला और सिर पर तुलसी की मंजरी चढ़ाया करते थे। फिर हाथ जोड़कर उन्हें नमस्कार करते और उनकी स्तुति करते थे।
पूजा-पात्रे पुष्प-तुलसी शेष ग्रे आछिल ।सेइ सब लञा प्रभु आचार्ये पूजिल ॥
१०॥
इस तरह अद्वैत आचार्य द्वारा पूजे जाने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु थाल में बचे फूलों तथा तुलसी मंजरी एवं जो कुछ सामग्री बची होती, उससे अद्वैत आचार्य की पूजा करते।
ग्रोऽसि सोऽसि नमोऽस्तु ते एइ मन्त्र पड़े। . मुख-वाद्य करि' प्रभु हासाय आचार्येरे ॥
११ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु आप जैसे भी हो, हो। लेकिन मैं आपको नमस्कार करता हूँ-इस मन्त्र का उच्चारण करके अद्वैत आचार्य की पूजा करते थे। इसके अतिरिक्त भी महाप्रभु अपने मुँह के भीतर कुछ ध्वनि करते, जिससे अद्वैत आचार्य को हँसी आ जाती।
एड़-मत अन्योन्ये करेन नमस्कार ।। प्रभुरे निमन्त्रण करे आचार्य बार बार ॥
१२॥
इस तरह अद्वैत आचार्य तथा श्री चैतन्य महाप्रभु एक-दूसरे को सादर नमस्कार करते थे। तब अद्वैत आचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु को बारम्बार अपने यहाँ आने का निमन्त्रण देते।
आचार निमन्त्रण---आश्चर्य-कथन । विस्तारि' वर्णियाछेन दास-वृन्दावन ॥
१३॥
श्री अद्वैत आचार्य का निमन्त्रण दूसरी अद्भुत कथा है। इसका विस्तृत स्पष्ट वर्णन वृन्दावन दास ठाकुर ने किया है।
पुनरुक्ति हय, ताहा ना कैलँ वर्णन । आर भक्त-गण करे प्रभुरे निमन्त्रण ॥
१४॥
चूंकि अद्वैत आचार्य के निमन्त्रण का वर्णन श्रील वृन्दावन दास ठाकुर कर चुके हैं, अतएव मैं इस कथा को नहीं दुहराऊँगा। किन्तु मैं यह कहूँगा कि अन्य भक्तों ने भी महाप्रभु को निमन्त्रण दिये।
एक एक दिन एक एक भक्त-गृहे महोत्सव ।। प्रभु-सङ्गे ताहाँ भोजन करे भक्त सब ॥
१५॥
प्रतिदिन एक के बाद दूसरा भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु तथा अन्य भक्तों को भोजन के लिए निमन्त्रण देता और अपने यहाँ उत्सव मनाता।
चारि-मास रहिला सबे महाप्रभु-सङ्गे।। जगन्नाथेर नाना यात्रा देखे महा-रङ्गे ॥
१६॥
सारे भक्त लगातार चार मास तक जगन्नाथ पुरी में रहे और उन्होंने बड़े ही उत्साह के साथ भगवान जगन्नाथ के सारे उत्सव मनाये।
कृष्ण-जन्म-यात्रा-दिने नन्द-महोत्सव ।। गोप-वेश हैला प्रभु लञा भक्त सब ॥
१७॥
भक्तों ने कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव भी मनाया, जिसे नन्द महोत्सव भी कहा जाता है। इस अवसर पर श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके भक्तों ने ग्वालों का वेश धारण किया।
दधि-दुग्ध-भार सबे निज-स्कन्धे करि' ।।महोत्सव-स्थाने आइला बलि ‘हरि' ‘हरि' ॥
१८॥
ग्वालों का वेश धारण करके तथा कंधे में बहँगी पर दूध तथा दही के बर्तन लेकर सारे भक्त ‘हरि' ‘हरि' का उच्चारण करते हुए महोत्सवस्थल पर आये।
कानाजि-खुटिया आछेन'नन्द'-वेश धरि' । जगन्नाथ-माहाति हाछेन 'व्रजेश्वरी' ॥
१९॥
कानाइ खुटिया ने नन्द महाराज का वेश बनाया और जगन्नाथ माहाति ने माता यशोदा का वेश बना लिया।
आपने प्रतापरुद्र, आर मिश्र-काशी ।। सार्वभौम, आर पड़िछा-पात्र तुलसी ॥
२०॥
उस समय काशी मिश्र, सार्वभौम भट्टाचार्य तथा तुलसी पड़िछापात्र समेत राजा प्रतापरुद्र भी वहाँ उपस्थित थे।
इँहा-सबा ला प्रभु करे नृत्य-रङ्ग ।। दधि-दुग्ध हरिद्रा-जले भरे सबार अङ्ग ॥
२१॥
सदैव की तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने उल्लासपूर्वक नृत्य किया। सारे लोग दूध, दही तथा हल्दी के पीले जल से सराबोर हो गये।
अद्वैत कहे,—सत्य कहि, ना करिह कोप । लगुड़ फिराइते पार, तबे जानि गोप ॥
२२॥
तभी श्रील अद्वैत आचार्य ने कहा, आप नाराज न हों। मैं सच कह रहा हूँ। यदि आप इस लाठी को चन्द्राकार रूप में घुमा सको, तो मैं समझेंगा कि आप ग्वाले हो।
तबे लगुड़ लञा प्रभु फिराइते लागिला ।।बार बार आकाशे फेलि' लुफिया धरिला ॥
२३ ॥
अद्वैत आचार्य की चुनौती को स्वीकार करके श्री चैतन्य महाप्रभु ने बड़ी-सी लाठी ली और वे उसे चारों ओर घुमाने लगे। वे बार-बार लाठी को आकाश में उछालते और गिरते समय पकड़ लेते।
शिरेर उपरे, पृष्ठे, सम्मुखे, दुइ-पाशे ।पाद-मध्ये फिराय लगुड़, देखि' लोक हासे ॥
२४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी लाठी को घुमाते और उछालते और कभीकभी अपने सिर पर ले जाते, कभी पीठ पीछे, कभी सामने, कभी बगल में और कभी दोनों पाँवों के बीच। यह देखकर सारे लोग हँसने लगे।
अलात-चक्रेर प्राय लगुड़ फिराय ।।देखि' सर्व लोक चित्ते चमत्कार पाय ।। २५ ।।। जब श्री चैतन्य महाप्रभु लाठी को अग्निबाण ( अलातचक्र ) की तरह घुमा रहे थे, तो देखने वालों के हृदय चमत्कृत हो गये।
एइ-मत नित्यानन्द फिराय लगुड़ ।।के बुझिबे ताँहा बँहार गोप-भाव गूढ़ ॥
२६॥
नित्यानन्द प्रभु ने भी लाठी घुमाई। कौन समझ सकता है कि वे ग्वालों के भाव में कितने गहरे डूब गये थे? प्रतापरुद्रेर आज्ञाय पड़िछा-तुलसी ।।जगन्नाथेर प्रसाद-वस्त्र एक लञा आसि ॥
२७॥
महाराज प्रतापरुद्र की आज्ञा पाकर मन्दिर का निरीक्षक तुलसी भगवान् जगन्नाथ के उतारे वस्त्रों में से एक वस्त्र ले आया।
बहु-मूल्य वस्त्र प्रभु-मस्तके बान्धिल ।।आचार्मादि प्रभुर गणेरे पराइल ॥
२८ ॥
यह बहुमूल्य वस्त्र श्री चैतन्य महाप्रभु के सिर पर लपेट दिया गया। अद्वैत आचार्य आदि दूसरे भक्तों ने भी अपने सिरों पर इसी तरह वस्त्र लपेट लिये।
कानाञि-खुटिया, जगन्नाथ, दुइ-जन ।।आवेशे विलाइल घरे छिल ग्रत धन ॥
२९॥
कानाई खुटिया जिसने भावावेश में नन्द महाराज को और जगन्नाथ माहाति जिसने माता यशोदा का वेश धरा था, घर में संचित सारे धन को बाँट दिया।
देखि' महाप्रभु बड़ सन्तोष पाइला ।माता-पिता-ज्ञाने हे नमस्कार कैला ॥
३०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु यह देखकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुए। उन्होंने उन दोनों को अपना पिता तथा माता के रूप में स्वीकार करके नमस्कार किया।
परम-आवेशे प्रभु आइला निज-घर ।।एई-मत लीला करे गौराङ्ग-सुन्दर ॥
३१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु परम आवेश में अपने निवासस्थान पर लौट आये। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने, जो गौरांग सुन्दर के नाम से जाने जाते थे, विविध लीलाएँ कीं।
विजया-दशमी—लङ्का-विजयेर दिने ।वानर-सैन्य कैला प्रभु ला भक्त-गणे ॥
३२॥
लंका पर श्री रामचन्द्र की विजय का उत्सव, विजयादशमी मनाने के दिन श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने सारे भक्तों को वानर सैनिकों का वेश धारण कराया।
हनुमानावेशे प्रभु वृक्ष-शाखा ला ।लङ्का-गड़े चड़ि' फेले गड़ भाङ्गिया ॥
३३॥
हनुमान के आवेश में श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक विशाल वृक्ष की शाखा ले ली और लंका गढ़ की दीवालों पर चढ़कर वे उसे तहस-नहस करने लगे।
‘काहाँरै राव्णा' प्रभु कहे क्रोधावेशे ।। ‘जगन्माता हरे पापी, मारिमु सवंशे' ॥
३४॥
हनुमान के भावावेश में श्री चैतन्य महाप्रभु ने क्रुद्ध होकर कहा, कहाँ है वह धूर्त रावण? उसने जगन्माता सीताजी का अपहरण किया है। अब मैं उसे तथा उसके सारे परिवार को मार डालूंगा।
गोसाजिर आवेश देखि लोके चमत्कार । सर्व-लोक 'जय' 'जय' बले बार बार ॥
३५।। सारे लोग श्री चैतन्य महाप्रभु का आवेश देखकर अचम्भित हो गये । और बारम्बार जय हो! जय हो! का घोष करने लगे।
एइ-मत रास-यात्रा, आर दीपावली । उत्थान-द्वादशी यात्रा देखिला सकलि ॥
३६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके सारे भक्तों ने रास-यात्रा, दीपावली तथा उत्थान द्वादशी इन सभी उत्सवों में भाग लिया।
एक-दिन महाप्रभु नित्यानन्दे लञा ।। दुइ भाइ युक्ति कैल निभृते वसिया ॥
३७॥
एक दिन श्री चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु दोनों भाइयों ने कान्त स्थान में बैठकर परस्पर विचार-विमर्श किया।
किबा झुक्ति कैल बँहे, केह नाहि जाने ।फले अनुमान पाछे कैले भक्त-गणे ॥
३८॥
यह कोई नहीं जान पाया कि दोनों भाइयों ने परस्पर क्या बातें कीं, किन्तु बाद में सभी भक्तों ने अनुमान लगा लिया कि उनका विषय क्या था।
तबे महाप्रभु सब भक्ते बोलाइल ।।गौड़-देशे ग्राह सबे विदाय करिल ॥
३९॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने सारे भक्तों को बुलाकर उनसे बंगाल वापस जाने के लिए कहा। इस तरह उन्होंने उन सबको विदा किया।
सबारे कहिल प्रभु–प्रत्यब्द आसिया ।।गुण्डिचा देखिया ग्राबे आमारे मिलिया ॥
४०॥
सारे भक्तों को विदा करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनसे प्रार्थना की कि वे प्रति वर्ष उन्हें देखने जगन्नाथ पुरी वापस आते रहें और गुण्डिचा मन्दिर की सफाई देखें।
आचार्गेरे आज्ञा दिल करिया सम्मान । ‘आ-चण्डाल आदि कृष्ण-भक्ति दिओ दान' ॥
४१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अत्यन्त सम्मानपूर्वक अद्वैत आचार्य से प्रार्थना की, आप अधम से अधम व्यक्तियों ( चण्डालों ) को भी कृष्ण-भक्ति रूपी चेतना प्रदान करें।
नित्यानन्दे आज्ञा दिल,‘ग्राह गौड़-देशे ।। अनर्गल प्रेम-भक्ति करिह प्रकाशे ॥
४२॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु को आज्ञा दी, आप बंगाल जाओ और बिना किसी प्रतिबन्ध के कृष्ण-भक्ति अर्थात् कृष्णभावनामृत का प्राकट्य करो।
राम-दास, गदाधर आदि कत जने ।तोमार सहाय लागि' दिलु तोमार सने ॥
४३॥
नित्यानन्द प्रभु को रामदास, गदाधर दास तथा अन्य कुछ सहायक दिये गये। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैं इन्हें आपकी सहायता के लिए दे रहा हूँ।
मध्ये मध्ये आमि तोमार निकट ग्राइब ।।अलक्षिते रहि' तोमार नृत्य देखिब' ॥
४४॥
मैं बीच-बीच में आपको देखने आया करूंगा। मैं अदृश्य रहकर आपका नृत्य देखा करूंगा।
श्रीवास-पण्डिते प्रभु करि' आलिङ्गन ।कण्ठे धरि' कहे ताँरै मधुर वचन ॥
४५॥
तत्पश्चात् श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रीवास पण्डित का आलिगंन किया और उनके गले में बाँहे डालकर उनसे मधुर वचन कहे।
तोमार घरे कीर्तने आमि नित्य नाचिब ।तुमि देखा पाबे, आर केह ना देखिब ॥
४६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रीवास ठाकुर से प्रार्थना की, आप नित्य संकीर्तन करना और इतना समझ रखना कि आपकी उपस्थिति में मैं भीनृत्य करूंगा। आप यह नृत्य देख सकोगे, किन्तु अन्य लोग नहीं देख सकेंगे।
एइ वस्त्र माताके दिह', एई सब प्रसाद ।।दण्डवत्करि' आमार क्षमाइह अपराध ॥
४७॥
इस जगन्नाथ प्रसाद को और इस वस्त्र को लो। इन्हें मेरी माता शचीदेवी को जाकर दे देना। उन्हें प्रणाम करने के बाद उनसे प्रार्थना करना कि वे मेरा अपराध क्षमा कर दें।
ताँर सेवा छाड़ि' आमि करियाछि सन्यास ।धर्म नहे, करि आमि निज धर्म-नाश ॥
४८॥
मैंने अपनी माता की सेवा छोड़कर संन्यास धारण कर लिया है। वास्तव में मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था, क्योंकि ऐसा करके मैंने अपना धर्म नष्ट किया है।
ताँर प्रेम-वश आमि, ताँर सेवा-धर्म ।। ताहा छाड़ि' करियाछि बातुलेर कर्म ॥
४९॥
मैं अपनी माता के प्रेम के अधीन हूँ और मेरा धर्म है कि बदले में मैं उनकी सेवा करूं। लेकिन ऐसा करने के बदले मैंने संन्यास ग्रहण कर लिया। निस्सन्देह, यह पागलपन है।
बातुल बालकेर माता नाहि लय दोष ।। एइ जानि' माता मोरे ना करय रोष ॥
५०॥
एक माता अपने पागल बेटे से रुष्ट नहीं होती। यह जानते हुए मेरी माता मुझ पर रोष नहीं करतीं।
कि काय सन्यासे मोर, प्रेम निज-धन । ग्रे-काले सन्यास कैलें, छन्न हैल मन ।। ५१॥
मुझे इस संन्यास को स्वीकार करने तथा अपने धनस्वरूप मातृप्रेम की बलि देने से कुछ भी प्रयोजन नहीं था। वास्तव में जब मैंने संन्यास स्वीकार किया, उस समय मुझ पर पागलपन सवार था।
नीलाचले आछों मुजि ताँहार आज्ञाते ।। मध्ये मध्ये आसिमु ताँर चरण देखिते ॥
५२॥
मैं यहाँ जगन्नाथ पुरी (नीलाचल) में उनके आदेशों का पालन करने के लिए रुका हुआ हूँ। किन्तु बीच-बीच में मैं उनके चरणकमलों का दर्शन करने आता रहूँगा।
नित्य झाइ' देखि मुजि ताँहार चरणे ।।स्फूर्ति-ज्ञाने तेहो ताहा सत्य नाहि माने ॥
५३॥
वास्तव में मैं रोज ही वहाँ अपनी माता के चरणकमलों का दर्शन करने जाता हूँ। यद्यपि उन्हें मेरी उपस्थिति का आभास होता है, पर वेले सत्य नहीं मानतीं।
एक-दिन शाल्यन्न, व्यञ्जन पाँच-सात ।। शाक, मोचा-घण्ट, भृष्ट-पटोल-निम्ब-पात ॥
५४॥
लेम्बु-आदा-खण्ड, दधि, दुग्ध, खण्ड-सार ।शालग्रामे समर्पिलेन बहु उपहार ॥
५५॥
एक दिन मेरी माता शचीदेवी ने शालग्राम विष्णु को भोजन अर्पित किया। उन्होंने शालि धान से पकाया चावल, तरह-तरह की तरकारियाँ, पालक, केले के फूलों की बनी कढ़ी, नीम की पत्तियों के साथ तले । पटोल, नींबू समेत अदरक के टुकड़े, दही, दूध, खांड तथा अन्य पकवान अर्पित किये।
प्रसाद लञा कोले करेन क्रन्दन ।। निमाड़र प्रिय मोर-ए-सब व्यञ्जन ॥
५६॥
अपनी गोद में भोजन लेकर तथा यह याद करके मेरी माता रो रही । (के यह भोजन तो मेरे निमाइ को अत्यन्त प्रिय है।
निमात्रि नाहिक एथा, के करे भोजन ।। मोर ध्याने अश्रु-जले भरिल नयन ॥
५७॥
मेरी माता सोच रही थीं, 'यहाँ पर निमाइ नहीं है। इस सारे भोजन को कौन ग्रहण करेगा?' जब वे मेरे बारे में इस तरह सोच रही थीं, तो उनकी आँखो में आँसू भर आये।
शीघ्र ग्राइ' मुजि सब करिनु भक्षण ।शून्य-पात्र देखि' अश्रु करिया मार्जन ॥
५८॥
जब वे इस तरह सोचकर रो रही थीं, तो मैं जल्दी से वहाँ गया और सब भोजन ग्रहण कर लिया। थाल को खाली देखकर उन्होंने अपने आँसू पोछ डाले।
‘के अन्न-व्यञ्जन खाइल, शुन्य केने पात?।। बालगोपाल किबी खाइल सब भात? ॥
५९॥
तब वे आश्चर्य करने लगीं कि किसने सारा भोजन खा लिया। यह | थाल खाली क्यों है?' उन्हें यह आश्चर्य हुआ कि कहीं बालगोपाल ने तो नहीं खा लिया।
किबा मोर कथाय मने भ्रम हा गेल! ।।किबा कोन जन्तु आसि' सकल खाइल? ॥
६०॥
वे आश्चर्य करने लगीं कि थाल में पहले से भोजन था भी या नहीं। फिर उन्होंने सोचा कि हो सकता है कोई पशु आकर सारा भोजन खा गया हो।
किबा आमि अन्न-पात्रे भ्रमे ना बाड़िल!' ।एत चिन्ति' पाक-पात्र यात्रा देखिल ॥
६१॥
उन्होंने सोचा कि, 'हो सकता है गलती से मैंने थाल में भोजन रखाही न हो।' इस तरह सोचते हुए वे रसोई-घर गईं और वहाँ बर्तनों को देखा।
अन्न-व्यञ्जन-पूर्ण देखि' सकल भाजने । देखिया संशय हैल किछु चमत्कार मने ॥
६२॥
जब उन्होंने देखा कि सारे बर्तन अब भी चावल तथा तरकारी से भरे हैं, तो उनके मन में कुछ सन्देह हुआ और वे अचम्भित हुईं।
ईशाने बोलाजा पुनः स्थान लेपाइल ।। पुनरपि गोपालके अन्न समर्पिल ॥
६३॥
इस तरह आश्चर्यचकित होकर उन्होंने अपने नौकर ईशान को बुलाया और उस स्थान की फिर से सफाई कराई। तब उन्होंने गोपाल को दूसरी थाल अर्पित की।
एइ-मत ग्रबे करेन उत्तम रन्धन ।मोरे खाओयाइते करे उत्कण्ठाय रोदन ॥
६४॥
अब जब भी वे कोई अच्छा भोजन बनाती हैं और मुझे वह भोजन खिलाना चाहती हैं, तब वे उत्कण्ठावश रोने लगती हैं।
ताँर प्रेमे आनि' आमाय कराय भोजने ।अन्तरे मानये सुख, बाह्ये नाहि माने ।। ६५ ॥
उनके प्रेम के वशीभूत होकर मैं वहाँ भोजन करने के लिए जाता हैं। मेरी माता ये बातें भीतर-भीतर जानती हैं और सुखी होती हैं, किन्तु बाहर से वे इन्हें नहीं मानती।।
एड विजया-दशमीते हैल एइ रीति ।।ताँहाके पुछिया ताँर कराइह प्रतीति ॥
६६॥
ऐसी घटना पिछली विजयादशमी के दिन घटी। तुम उनसे इस घटनाके बारे में पूछ सकते हो और उन्हें विश्वास दिलाना कि मैं सचमुच वहाँ जाता हूँ।
एतेक कहिते प्रभु विह्वल हइला ।लोक विदाय करिते प्रभु धैर्य धरिला ॥
६७॥
यह सब कहते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु विह्वल हो गये, किन्तु भक्तों की विदाई पूरी करने के उद्देश्य से उन्होंने धैर्य धारण कर रखा।
राघव पण्डिते कहेन वचन सरस ।।‘तोमार शुद्ध प्रेमे आमि हइ' तोमार वश' ॥
६८॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु राघव पण्डित से मीठी वाणी में बोले, मेरे प्रति तुम्हारा प्रेम शुद्ध है, जिसके लिए मैं तुम्हारा कृतज्ञ हूँ।
इँहार कृष्ण-सेवार कथा शुन, सर्व-जन । परम-पवित्र सेवा अति सर्वोत्तम ॥
६९ ॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने सबसे कहा, सुनो! तुम लोग राघव पण्डित द्वारा की गई शुद्ध कृष्ण-भक्ति के बारे में सुनो! राघव पण्डित की सेवा परम शुद्ध तथा सर्वोत्तम है।
आर द्रव्य रहु–शुन नारिकेलेर कथा । पाँच गण्डा करि' नारिकेल विकाय तथा ॥
७० ॥
अन्य वस्तुओं के अतिरिक्त उसके द्वारा नारियल भेंट किये जाने के बारे में सुनो। एक नारियल पाँच गण्डे में बिकता है।
वाटिते कत शत वृक्षे लक्ष लक्ष फल । तथापि शुनेन ग्रथा मिष्ट नारिकेल ॥
७१॥
यद्यपि उसके पास पहले से सैंकड़ों वृक्ष तथा लाखों फल हैं, किन्तुफिर भी वह उस स्थान के विषय में सुनने के लिए अत्यधिक उत्सुक रहता है, जहाँ मीठा नारियल मिलता हो।
एक एक फलेर मूल्य दिया चारि-चारि पण ।दश-क्रोश हैते आनाय करिया ग्नतन ॥
७२॥
वह बीस मील दूर स्थान से भी नारियल को यत्नपूर्वक लाता है। और हर नारियल के लिए चार पण चुकाता है।
प्रति-दिन पाँच-सात फल छोलाजा ।।सुशीतल करिते राखे जले डुबाइबा ॥
७३॥
प्रतिदिन पाँच-सात नारियल छीलकर उन्हें शीतल बनाये रखने के लिए जल के भीतर रखा जाता है।
भोगेर समय पुनः छुलि' संस्करि' । कृष्णे समर्पण करे मुख छिद्र करि' ॥
७४॥
भोग लगाते समय नारियलों को फिर से छीला जाता है और साफ किया जाता है। उनमें ऊपर से छेद करने के बाद उन्हें कृष्ण को अर्पित किया जाता है।
कृष्ण सेइ नारिकेल-जल पान करि' ।।कभु शून्य फल राखेन, कभु जल भरि' ॥
७५ ॥
इन नारियलों का जल कृष्ण पीते हैं और कभी-कभी नारियलों का जल निकालकर उन्हें पूरी तरह से खाली कर दिया जाता है। कभीकभी इन नारियलों में जल भरा रहता है।
जल-शून्य फल देखि' पण्डित-हरषित ।।फल भाङ्गि' शस्ये करे सत्पात्र पूरित ॥
७६ ॥
जब राघव पण्डित देखता है कि नारियलों का जल पी लिया गयाहै, तो वह अत्यन्त प्रसन्न होता है। तब वह नारियल तोड़कर गरी निकालता और उसे किसी अन्य थाल पर रख देता है।
शस्य समर्पण करि बाहिरे धेयान ।। शस्य खाजा कृष्ण करे शून्य भाजन ॥
७७॥
गरी चढ़ाने के बाद वह मन्दिर द्वार के बाहर ध्यान करता है। इस बीच भगवान् कृष्ण सारी गरी खाकर थाल को रिक्त छोड़ देते हैं।
कभु शस्य खाजा पुनः पात्र भरे शांसे ।। श्रद्धा बाड़े पण्डितेर, प्रेम-सिन्धु भासे ।। ७८ । । कभी-कभी गरी खाने के बाद कृष्ण थाल को नई गरी से भर देते हैं। इस तरह राघवे पण्डित की श्रद्धा बढ़ती जाती है और वह प्रेम के सागर में तैरता रहता है।
एक दिन फल दश संस्कार करिया ।।भोग लागाइते सेवक आइल लञा ।। ७९॥
एक दिन ऐसा हुआ कि एक नौकर अर्चाविग्रह पर चढ़ाने के लिए लगभग दस छिले हुए नारियल लाया।
अवसर नाहि हय, विलम्ब हुइल ।।फल-पात्र-हाते सेवक द्वारे त' रहिल ॥
८० ॥
जब नारियल लाए गये, उस समय उन नारियलों को चढ़ाने के लिए समय न था, क्योंकि पहले ही काफी विलम्ब हो चुका था। अतएव वह नौकर नारियलों के पात्र को पकड़े हुए दरवाजे पर ही खड़ा रहा।
द्वारेर उपर भिते तेंहो हात दिल । ।सेइ हाते फल छुडिल, पण्डित देखिल ॥
८१॥
राघव पण्डित ने देखा कि उस नौकर ने दरवाजे के ऊपर की छत १३ई है और उसी हाथ से नारियलों को छुआ है।
पण्डित कहे,—द्वारे लोक करे गतायाते ।।तार पद-धूलि उड़ि' लागे उपर भिते ॥
८२॥
तब राघव पण्डित ने कहा, 'लोग इसे दरवाजे से लगातार आते-जाते रहते हैं। उनके पैरों की धूल उड़कर छत को छूती है।
सेइ भिते हात दिया फल परशिला ।कृष्ण-योग्य नहे, फल अपवित्र हैला ॥
८३॥
तुमने दरवाजे के ऊपर की छत छूकर नारियलों का स्पर्श किया है। अब ये कृष्ण पर चढ़ाने लायक नहीं रह गये, क्योंकि ये दूषित हो गये हैं।'
एत बलि' फल फेले प्राचीर लङ्घिया ।। ऐछे पवित्र प्रेम-सेवा जगत्जिनिया ॥
८४॥
राघव पण्डित की सेवा ऐसी थी। उन्होंने उन नारियलों को नहीं लिया, अपितु उन्हें दीवार से बाहर फेंक दिया। उनकी यह सेवा अनन्य प्रेम पर आश्रित है और यह सारे जगत् को जीतने वाली है।
तबे आर नारिकेल संस्कार कराइल ।परम पवित्र करि' भोग लागाइल ॥
८५ ॥
इसके बाद राघव पण्डित ने दूसरे नारियल मँगवाये, उन्हें साफ कराया और छिलवाया और बड़ी ही सावधानी से अर्चाविग्रह को खाने के लिए अर्पित किया।
एइ-मत कला, आम्र, नारङ्ग, काँठाल ।।ग्राहा ग्राहा दूर-ग्रामे शुनियाछे भाल ॥
८६॥
इस तरह उन्होंने उत्तम केले, आम, नारंगी, कटहल तथा दूर-दूर के गाँवों से जिन-जिन उत्तम फलों के विषय में सुना-सबको एकत्र किया।
बहु-मूल्य दिया आनि' करिया ग्रतन । पवित्र संस्कार करि' करे निवेदन ॥
८७॥
ये सारे फल दूर-दूर के स्थानों से काफी ऊंची कीमत देकर एकत्र किये गये। फिर उन्हें बड़ी सावधानी तथा सफाई से काटकर राघव पण्डित ने उन्होंने अर्चाविग्रह को अर्पित किया।
एइ मत व्यञ्जनेर शाक, मूल, फल ।।एइ मत चिड़ा, हुड़म, सन्देश सकल ॥
८८॥
इस तरह राघव पण्डित बड़ी सावधानी तथा ध्यान से पालक, अन्य सब्जियाँ, मूली, फल, चिउड़ा, चूर्णित चावल तथा मिठाईयाँ तैयार करते।
एइ-मत पिठा-पाना, क्षीर-ओदन ।परम पवित्र, आर करे सर्वोत्तम ॥
८९॥
उन्होंने पीठा, पाना, खीर तथा प्रत्येक वस्तु को बड़े ही ध्यान से पकाई और पकाते समय इतनी सफाई रखी कि भोजन उत्तम कोटि का तथा स्वादिष्ट बने।
काशम्दि, आचार आदि अनेक प्रकार ।। गन्ध, वस्त्र, अलङ्कार, सर्व द्रव्य-सार ॥
९० ॥
राघव पण्डित काशम्दि जैसे सभी प्रकार के अचार भी भोग लगाते। उन्होंने विविध सुगन्धियाँ, वस्त्र, गहने तथा अच्छी से अच्छी वस्तुएँ अर्पित कीं।
एइ-मत प्रेमेर सेवा करे अनुपम ।। ग्राहा देखि' सर्व-लोकेर जुड़ाय नयन ॥
९१॥
इस तरह राघव पण्डित अद्वितीय विधि से भगवान् की सेवा करते। उन्हें देखकर सारे लोग अत्यन्त सन्तुष्ट होते।
एत बलि' राघवेरे कैल आलिङ्गने । एइ-मत सम्मानिल सर्व भक्त-गणे ॥
९२॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने दयापूर्वक राघव पण्डित का आलिंगन किया। महाप्रभु ने अन्य सभी भक्तों को भी इसी तरह सम्मान किया।
शिवानन्द सेने कहे करिया सम्मान ।वासुदेव-दत्तेर तुमि करिह समाधान ॥
९३॥
महाप्रभु ने शिवानन्द सेन से भी आदरपूर्वक कहा, “वासुदेव दत्त का ठीक से ध्यान रखना।
परम उदार इँहो, ग्रे दिन ग्रे आइसे ।सेइ दिने व्यय करे, नाहि राखे शेषे ॥
९४॥
वासुदेव दत्त अत्यन्त उदार है। उसे प्रतिदिन जितनी आमदनी होती है, उसे वह खर्च कर देता है। वह कुछ भी बचाकर नहीं रखता।
‘गृहस्थ' हयेन इँहो, चाहिये सञ्चय ।। सञ्चय ना कैले कुटुम्ब-भरण नाहि हय ॥
९५॥
गृहस्थ होने के कारण वासुदेव दत्त को कुछ धन बचाना चाहिए। किन्तु वह ऐसा नहीं करता, इसलिए उसके लिए अपने परिवार का भरणपोषण कर पाना अत्यन्त कठिन है।
इहार घरेर आय-व्यय सब–तोमार स्थाने । ‘सर खेल' हा तुमि करिह समाधाने ॥
१६॥
कृपया वासुदेव दत्त के पारिवारिक मामलों पर ध्यान दें। उनके व्यवस्थापक बनकर समुचित प्रबन्ध करो।
प्रति-वर्षे आमार सब भक्त-गण ला । गुण्डिचाय आसिबे सबाय पालन करिया ॥
९७॥
तुम लोग हर वर्ष आना और मेरे सारे भक्तों को अपने साथ गुण्डिचा उत्सव में लाना। मेरी यह भी विनती है कि उन सबका भरण-पोषण करना।
कुलीन-ग्रामीरे कहे सम्मान करिया ।।प्रत्यब्द आसिबे यात्राय पट्ट-डोरी ला ॥
९८॥
इसके बाद महाप्रभु ने कुलीन ग्राम के सारे निवासियों को आदरपूर्वक आमन्त्रित किया कि वे प्रतिवर्ष आयें और रथयात्रा उत्सव के समय भगवान जगन्नाथ को खींचे जाने के लिए रेशमी रस्सी लायें।
गुणराज-खाँन कैल श्री-कृष्ण-विजय ।।ताहाँ एक-वाक्य ताँर आछे प्रेममय ॥
९९॥
फिर श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, कुलीन ग्राम के श्री गुणराज खान ने श्रीकृष्णविजय नामक एक ग्रंथ रचा है, जिसमें लेखक के कृष्ण-प्रेम को प्रकट करने वाला एक वाक्य है।
नन्दनन्दन कृष्ण–मोर प्राण-नाथ ।। एइ वाक्ये विकाइनु ताँर वंशेर हात ॥
१०० ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, नन्द महाराज के पुत्र श्रीकृष्ण मेरे प्राणाधार हैं। मैं इसी वाक्य से गुणराज खान के उत्तराधिकारियों के हाथों बिक गया हूँ।
तोमार कि कथा, तोमार ग्रामेर कुकुर ।। सेइ मोर प्रिय, अन्य-जन रहु दूर ॥
१०१॥
तुम्हारे लिए तो क्या कहना, तुम्हारे गाँव का रहने वाला कुत्ता भी मुझे अत्यन्त प्रिय है। तो फिर अन्यों के बारे में तो कहना ही क्या? तबे रामानन्द, आर सत्यराज खाँन ।। प्रभुर चरणे किछु कैल निवेदन ॥
१०२॥
इसके बाद रामानन्द वसु तथा सत्यराज खान दोनों ने श्री चैत महाप्रभु के चरणकमलों में कुछ प्रश्न निवेदन किये।
गृहस्थ विषयी आमि, कि मोर साधने ।। श्री-मुखे आज्ञा कर प्रभु–निवेदि चरणे ॥
१०३॥
सत्यराज खान ने कहा, हे प्रभु, गृहस्थ तथा भौतिकतावादी व्यक्ति होने के कारण मैं आध्यात्मिक जीवन में आगे बढ़ने की विधि नहीं जानता। इसीलिए मैं आपके चरणकमलों की शरण स्वीकार करता हूँ और प्रार्थना करता हूँ कि आप मुझे आदेश दें।
प्रभु कहेन,'कृष्ण-सेवा', 'वैष्णव-सेवन' । ‘निरन्तर कर कृष्ण-नाम-सङ्कीर्तन' ॥
१०४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, तुम निरन्तर कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करो और जब भी सम्भव हो, उनकी तथा उनके भक्त वैष्णवों की सेवा करो।
सत्यराज बले,—वैष्णव चिनिब केमने?।। के वैष्णव, कह ताँर सामान्य लक्षणे ॥
१०५॥
यह सुनकर सत्यराज ने कहा, मैं वैष्णव को कैसे पहचान सकता हूँ? कृपया मुझे बतायें कि वैष्णव कौन होता है? उसके सामान्य लक्षण क्या हैं? प्रभु कहे,–याँर मुखे शुनि एक-बार ।। कृष्ण-नाम, सेइ पूज्य,—श्रेष्ठ सबकार ॥
१०६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा,जो भी व्यक्ति कृष्ण के पवित्र नाम का एक बार भी उच्चारण करता है, वह पूज्य है और सर्वोच्च मानव है।
एक कृष्ण-नामे करे सर्व-पाप क्षय ।। नव-विधा भक्ति पूर्ण नाम हैते हय ॥
१०७॥
कृष्ण के पवित्र नाम का एक बार कीर्तन करने मात्र से मनुष्य सारे पापी जीवन के सारे फलों से छूट जाता है। पवित्र नाम का कीर्तन करने से मनुष्य भक्ति की नवों विधियों को पूरा कर सकता है।
दीक्षा-पुरश्चर्या-विधि अपेक्षा ना करे ।। जिह्वा-स्पर्शे आ-चण्डाल सबारे उद्धारे ॥
१०८॥
न तो दीक्षा लेने की आवश्यकता है न दीक्षा के पूर्व के आवश्यक कृत्य करने की। मनुष्य को केवल होठों पर पवित्र नाम लाना होता है। इस प्रकार अधम से अधम व्यक्ति (चण्डाल ) का भी उद्धार हो जाता है।
अनुषङ्ग-फले करे संसारेर क्षय ।।चित्त आकर्षिया कराय कृष्ण प्रेमोदय ॥
१०९॥
ि भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन द्वारा मनुष्य भौतिक कामों के बन्धन का विनाश करता है। इसके बाद वह कृष्ण के प्रति अत्यधिक आकृष्ट होता है और इस तरह सुप्त कृष्ण-प्रेम का उदय होता है।
आकृष्टिः कृत-चेतसां सु-मनसामुच्चाटनं चांहसाम् ।आचण्डालममूक-लोक-सुलभो वश्यश्च मुक्ति-श्रियः ।। नो दीक्षां न च सक्रियां न च पुरश्च मनागीक्षते ।मन्त्रोऽयं रसना-स्पृगेव फलति श्री-कृष्ण-नामात्मकः ॥
११०॥
भगवान् कृष्ण का पवित्र नाम अनेक सन्त एवं उदार लोगों के लि अत्यन्त आकर्षक है। यह सारे पापों का संहार करने वाला है और शक्तिशाली है कि गैंगों के अतिरिक्त, जो इसका उच्चारण नहीं कर सकते, अधम से अधम व्यक्ति, चण्डाल तक के लिए यह सहज उपलब्ध है। कृष्ण का नाम मुक्ति के ऐश्वर्य का नियामक है और यह कृष्ण से अभिन्न है। जीभ से नाम का स्पर्श करते ही तुरन्त उसका प्रभाव पड़ता है। नामकीर्तन दीक्षा, पुण्यकर्म या दीक्षा के पूर्व पालन किये जाने वाले पुरश्चर्या नियमों पर आश्रित नहीं है। पवित्र नाम इन सारे कार्यों की प्रतीक्षा नहीं करता। वह स्वयं में पर्याप्त है।
अतएव याँर मुखे एक कृष्ण-नाम ।। सेइ त' वैष्णव, करिह ताँहार सम्मान ॥
१११॥
अन्त में श्री चैतन्य महाप्रभु ने उपदेश दिया, जो व्यक्ति हरे कृष्ण मन्त्र कीर्तन करता है, वह वैष्णव माना जाता है, अतएव तुम उसका पूरी में सम्मान करना।
खण्डेर मुकुन्द-दास, श्री-रघुनन्दन । श्री-नरहरि,—एइ मुख्य तिन जन ॥
११२॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने खण्ड नामक स्थान के तीन निवासियों-मुकुन्द दास, रघुनन्दन तथा श्री नरहरि की ओर ध्यान दिया।
मुकुन्द दासेरे पुछे शचीर नन्दन । ‘तुमि—पिता, पुत्र तोमार-श्री-रघुनन्दन? ॥
११३॥
इसके बाद शची-पुत्र श्री चैतन्य महाप्रभु ने मुकुन्द दास से पूछा, “तुम पिता हो और तुम्हारा पुत्र रघुनन्दन है। ऐसा ही है न? किबा रघुनन्दन—पिता, तुमि–तार तनय? ।निश्चय करिया कह, ग्राउक संशय' ॥
११४॥
अथवा श्रील रघुनन्दन तुम्हारा पिता है और तुम उसके पुत्र हो? कृपा करके मुझे असली बात बताओ, जिससे मेरा सन्देह दूर हो जाए।
मुकुन्द कहे,—रघुनन्दन मोर 'पिता' हय ।।आमि तार 'पुत्र',—एइ आमार निश्चय ॥
११५॥
मुकुन्द ने उत्तर दिया, रघुनन्दन मेरा पिता है और मैं उसका पुत्र हूँ। यही मेरा निश्चय है।
आमा सबार कृष्ण-भक्ति रघुनन्दन हैते ।।अतएव पिता रघुनन्दन आमार निश्चिते ॥
११६॥
रघुनन्दन के कारण हम सबको कृष्ण-भक्ति प्राप्त हुई है, इसलिए गरे विचार में वही मेरा पिता है।"
शुनि' हर्षे कहे प्रभु–कहिले निश्चय । याँहा हैते कृष्ण-भक्ति सेइ गुरु हय ॥
११७॥
मुकुन्द दास से यह उचित निर्णय सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह कहकर इसकी पुष्टि की, हाँ, यह सही है। जो कृष्ण-भक्ति को जाग्रत करता है, वह निश्चित रूप से गुरु है।
भक्तेर महिमा प्रभु कहिते पाय सुख । भक्तेर महिमा कहिते हय पञ्च-मुख ॥
११८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों की महिमा का बखान करने से अत्यन्त सुखी थे। जब वे उनकी महिमा का वर्णन कर रहे थे, तो मानो उनके पाँच मुख हो गये हों।
भक्त-गणे कहे,—शुन मुकुन्देर प्रेम ।। निगूढ़ निर्मल प्रेम, येन दग्ध हेम ॥
११९॥
तब महाप्रभु ने अपने सारे भक्तों को बतलाया, “कृपा करके मुकुन्द के भगवत्प्रेम के विषय में सुनें। यह अत्यन्त गहरा और शुद्ध प्रेम है और इसकी उपमा केवल शुद्ध किये गये सोने से ही दी जा सकती है।
बाह्ये राज-वैद्य इँहो करे राज-सेवा । अन्तरे कृष्ण-प्रेम ईंहार जानिबेक केबा ॥
१२०॥
बाहर से मुकुन्द दास सरकारी नौकरी में लगा राज-वैद्य प्रतीत होता है, किन्तु भीतर से उसमें कृष्ण के प्रति अगाध प्रेम है। भला उसके प्रेम को कौन समझ सकता है? एक दिन म्लेच्छ-राजार उच्च-टुङ्गिते ।। चिकित्सार बात्कहे ताँहार अग्रेते ॥
१२१॥
एक दिन राजवैद्य मुकुन्द दास मुसलिम राजा के साथ ऊँचे आमा पर बैठकर ईलाज के विषय में बात कर रहा था।
हेन-काले एक मयूर-पुच्छेर आड़ानी । राज-शिरोपरि धरे एक सेवक आनि' ॥
१२२॥
जिस समय राजा और मुकुन्द दास बातें कर रहे थे, उस समय एक नौकर मोर के पंखों का बना पंखा लाया, जिससे राजा के सिर की पृ से रक्षा की जा सके। फलतः वह राजा के सिर के ऊपर उस पंखे को पक रहा।
शिखि-पिच्छ देखि' मुकुन्द प्रेमाविष्ट हैला ।अति-उच्च टुङ्गि हैते भूमिते पड़िला ॥
१२३॥
मोर के पंख से बने पंखे को देखकर मुकुन्द भगवत्प्रेम में आविष्ट गया और वह उस उच्च आसन से भूमि पर गिर पड़ा।
राजार ज्ञान,—राज-वैद्येर हइल मरण ।। आपने नामिया तबे कराइल चेतन ॥
१२४॥
राजा डर गया कि राजवैद्य की मृत्यु हो गई, फलतः वह स्वयं नीचे तर गया और उसे होश में ले आया।
राजा बले–व्यथा तुमि पाइले कोन ठाजि? । मुकुन्द कहे,—अति-बड़ व्यथा पाइ नाइ ॥
१२५॥
जब राजा ने मुकुन्द से पूछा, तुम्हें कहाँ दर्द है?' तो मुकुन्द ने उत्तर दिया, 'मुझे अधिक दर्द नहीं है।'
राजा कहे,—मुकुन्द, तुमि पड़िला कि लागि'?।। मुकुन्द कहे, राजा, मोर व्याधि आछे मृगी ॥
१२६॥
जब राजा ने पूछा, 'हे मुकुन्द, तुम क्यों गिरे ?' तो मुकुन्द ने उत्तर दिया, 'हे राजन्, मुझे मिरगी नामक रोग है।'
महा-विदग्ध राजा, सेइ सब जाने ।। मुकुन्देरे हैल ताँर 'महा-सिद्ध'-ज्ञाने ॥
१२७॥
अत्यधिक बुद्धिमान होने के कारण राजा सारी बात जान गया। उसके अनुमान से मुकुन्द अत्यन्त असाधारण, महान, मुक्त पुरुष था।
रघुनन्दन सेवा करे कृष्णेर मन्दिरे । द्वारे पुष्करिणी, तार घाटेर उपरे ॥
१२८॥
कदम्बेर एक वृक्षे फुटे बार-मासे । नित्य दुई फुल हय कृष्ण-अवतंसे ॥
१२९॥
रघुनन्दन भगवान् कृष्ण के मन्दिर में निरन्तर सेवारत रहता है। मन्दिर के प्रवेश-द्वार के निकट एक सरोवर है, जिसके तट पर एक कदम्ब का वृक्ष है, जो कृष्ण की सेवा के लिए नित्य दो फूल देता है।
मुकुन्देरे कहे पुनः मधुर वचन ।।‘तोमार कार्य-धर्मे धन-उपार्जन ॥
१३०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु पुनः मुकुन्द से मीठी वाणी में बोले, “तुम्हारा कार्य भौतिक तथा आध्यात्मिक दोनों सम्पत्ति अर्जित करना है।
रघुनन्दनेर कार्य कृष्णेर सेवन ।।कृष्ण-सेवा विना इँहार अन्य नाहि मन ॥
१३१॥
रघुनन्दन का यह भी कार्य है कि वह सदैव भगवान् कृष्ण की सेवा में लगा रहे। भगवान् कृष्ण की सेवा के अतिरिक्त उसका अन्य कोई मन्तव्य नहीं है।
नरहरि रहु आमार भक्त-गण-सने, ।।एइ तिन कार्य सदा करह तिन जने' ॥
१३२॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने नरहरि को आदेश दिया, मैं चाहता हूँ कि तुम मेरे भक्तों के साथ यहीं रहो। इस तरह तुम तीनों भगवान् की सेवा के लिए ये तीनों कार्य सदैव करते रहना।
सार्वभौम, विद्या-वाचस्पति,–दुइ भाइ ।। दुइ-जने कृपा करि' कहेन गोसाजि ॥
१३३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी अहैतुकी कृपावश सार्वभौम भट्टाचार्य तथा विद्यावाचस्पति-इन दोनों भाइयों को निम्नलिखित आदेश दिये।
'दारु'-जल'-रूपे कृष्ण प्रकट सम्प्रति । ‘दरशन'-‘स्नाने' करे जीवेर मुकति ॥
१३४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, इस कलियुग में कृष्ण दो रूपों मेंकाठ तथा जल के रूप में प्रकट हुए हैं। इस तरह बद्धजीवों द्वारा काठ का दर्शन करके और जल में स्नान करके मुक्त होने में वे सहायक हैं।
'दारु-ब्रह्म'-रूपे साक्षात्श्री-पुरुषोत्तम ।भागीरथी हन साक्षात् ‘जल-ब्रह्म'-सम ॥
१३५ ॥
भगवान जगन्नाथ काठ के रूप में साक्षात् भगवान् हैं और गंगा नदी जल के रूप में साक्षात् भगवान् है।
सार्वभौम, कर 'दारु-ब्रह्म'-आराधने । वाचस्पति, कर जल-ब्रह्मेर सेवन ॥
१३६॥
हे सार्वभौम भट्टाचार्य, आप जगन्नाथ पुरुषोत्तम की पूजा में अपने आपको लगाओ और हे वाचस्पति, आप माता गंगा की पूजा करो।
मुरारि-गुप्तेरे प्रभु करि' आलिङ्गन ।।ताँर भक्ति-निष्ठा कहेन, शुने भक्त-गण ॥
१३७।। तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने मुरारि गुप्त का आलिंगन किया और उससे भक्ति-निष्ठा के विषय में बातें कीं। इसे सारे भक्तों ने सुना।
पूर्वे आमि इँहारे लोभाइल बार बार ।परम मधुर, गुप्त, व्रजेन्द्र कुमार ॥
१३८ । श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, इसके पूर्व मैं मुरारि गुप्त को कृष्ण कीओर आकृष्ट होने के लिए बारम्बार प्रेरित करता रहा। मैंने उससे कहा, '।। गुप्त, व्रजेन्द्र कुमार श्रीकृष्ण अत्यन्त मधुर हैं।
स्वयं भगवान्कृष्ण----सर्वांशी, सर्वाश्रय ।विशुद्ध-निर्मल-प्रेम, सर्व-रसमय ॥
१३९॥
कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, समस्त अवतारों के उद्गम तथा सारी वस्तुओं के स्रोत हैं। वे विशुद्ध दिव्य प्रेम रूप हैं और समस्त आनन्। के आगार हैं।
सकल-सद्गुण-वृन्द-रत्न-रत्नाकर ।।विदग्ध, चतुर, धीर, रसिक-शेखर ॥
१४०॥
कृष्ण समस्त दिव्य गुणों के आगार हैं। वे रत्नों की खान के तम्य हैं। वे हर बात में दक्ष हैं, अत्यन्त बुद्धिमान एवं धीर हैं और वे समय दिव्य रसों की पराकाष्ठा हैं।
मधुर-चरित्र कृष्णेर मधुर-विलास ।। चातुर्य-वैदग्ध्य करे याँर लीला-रस ॥
१४१॥
उनका चरित्र अत्यन्त मधुर है और उनकी लीलाएँ मधुर हैं। वे बुद्धि दक्ष हैं। इस तरह वे सारी लीलाओं एवं रसों का आनन्द लूटते हैं।'
सेइ कृष्ण भज तुमि, हओ कृष्णाश्रय । कृष्ण विना अन्य-उपासना मने नाहि लय ॥
१४२॥
तब मैंने मुरारि गुप्त से अनुरोध किया कि, तुम कृष्ण की पूजा परी और उनकी शरण में जाओ। उनकी सेवा के अतिरिक्त मन को अन्य कुछ भी अच्छा नहीं लगता।'
एइ-मत बार बार शुनिया वचन ।। आमार गौरवे किछु फिरि' गेल मन ॥
१४३॥
इस तरह वह बारम्बार मुझे सुनता रहा। मेरे प्रभाव से उसका मन कुछ-कुछ बदला।
आमारे कहेन,—आमि तोमार किङ्कर ।।तोमार आज्ञाकारी आमि नाहि स्वतन्तर ॥
१४४॥
तब मुरारि गुप्त ने उत्तर दिया, मैं आपका सेवक और आज्ञावाहक हूँ। मेरा स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है।'
केमने छाड़िब रघुनाथेर चरण ।।आजि रात्र्ने प्रभु मोर कराह मरण ॥
१४६॥
इसके बाद मुरारि गुप्त ने भगवान् रामचन्द्र के चरणकमलों की प्रार्थना की। उसने प्रार्थना की कि उसके लिए रघुनाथ के चरणकमल को त्याग पाना सम्भव नहीं होगा, अतएव रात में उसकी मृत्यु हो जाए।
एइ मत सर्व-रात्रि करेन क्रन्दन ।मने सोयास्ति नाहि, रात्रि कैल जागरण ॥
१४७॥
इस तरह मुरारि गुप्त रातभर रोता रहा। उसके मन में शांति नहीं थी, अतः वह सो नहीं सका और रातभर जागता रहा।
एत बलि' घरे गेल, चिन्ति' रात्रि-काले । रघुनाथ-त्याग-चिन्ताय हइल विकले ॥
१४५॥
इसके बाद मुरारि गुप्त घर गया और रातभर सोचता रहा कि वह किस तरह रघुनाथ अर्थात् भगवान् रामचन्द्रजी का साथ छोड़ सकेगा। इस तरह वह विह्वल हो गया।
प्रातः-काले आसि' मोर धरिल चरण ।कान्दिते कान्दिते किछु करे निवेदन ॥
१४८ ॥
प्रात:काल मुरारि गुप्त मुझसे मिलने आया। मेरे चरण पकड़कर रोते हुए उसने निवेदन किया।
रघुनाथेर पाय मुञि वेचियाछों माथा । काढ़िते ना पारि माथा, मने पाइ व्यथा ॥
१४९॥
मुरारि गुप्त ने कहा, 'मैंने अपना सिर रघुनाथ के चरणों में बेच दिया है। अब उसे मैं वापस नहीं ले सकता, क्योंकि इससे मुझे अत्यधिक पीड़ा होगी।
श्री-रघुनाथ-चरण छाड़ान ना ग्राय ।। तव आज्ञा-भङ्ग हय, कि करों उपाय ॥
१५०॥
मुझसे रघुनाथ के चरणकमलों की सेवा छोड़ी नहीं जाती। साथ ही यदि मैं ऐसा नहीं करता, तो आपकी आज्ञा भंग होती है। मैं क्या करूं?' ताते मोरे एइ कृपा कर, दयामय ।।तोमार आगे मृत्यु हउक, ग्राउक संशय ॥
१५१॥
इस तरह मुरारि गुप्त ने मुझसे निवेदन किया, 'आप दयालु हैं, इसलिए आप मुझ पर यह कृपा करें : मुझे अपने सामने मर जाने दें, जिससे मेरे सारे संशय समाप्त हो जाएँ।'
एत शुनि' आमि बड़ मने सुख पाइलें ।इँहारे उठाजा तबे आलिङ्गन कैलें ॥
१५२॥
यह सुनकर मैं अत्यन्त प्रसन्न हुआ। तब मैंने मुरारि गुप्त को उठाकर उसका आलिंगन किया।
साधु साधु, गुप्त, तोमार सुदृढ़ भजन ।।आमार वचनेह तोमार ना टलिल मने ॥
१५३॥
मैंने उससे कहा, हे मुरारि गुप्त, तुम्हारी जय हो! तुम्हारी पूजाविधि अत्यधिक सुदृढ़ है-यहाँ तक कि मेरे अनुरोध पर भी तुम्हारा मन नहीं बदला।
एइ-मत सेवकेर प्रीति चाहि प्रभु-पाय ।। प्रभु छाड़ाइलेह, पद छाड़ान ना ग्राय ॥
१५४॥
भगवान् के चरणकमलों पर सेवक का ऐसा ही प्रेम होना चाहिए। यहाँ तक कि भगवान् भी छुड़ाना चाहें, तो भी भक्त उनके चरणकमलों का आश्रय नहीं छोड़ सकता।
एइ-मत तोमार निष्ठा जानिबार तरे ।तोमारे आग्रह आमि कैलॅ बारे बारे ॥
१५५॥
मैंने भगवान् के प्रति तुम्हारी दृढ़ श्रद्धा की परीक्षा करने के लिए। ही तुमसे भगवान् रामचन्द्र की भक्ति छोड़कर कृष्ण की पूजा करने के लिए बारम्बार अनुरोध किया था।
साक्षात् हनुमान्तुमि श्री-राम-किङ्कर ।।तुमि केने छाड़िबे ताँर चरण-कमल ॥
१५६॥
इस तरह मैंने मुरारि गुप्त को बधाई देते हुए कहा, 'निस्सन्देह तुम हनुमान के अवतार हो, फलतः तुम भगवान् रामचन्द्र के सनातन दास हो। तो फिर तुम भगवान् रामचन्द्र तथा उनके चरणकमलों की पूजा क्यों त्यागो? सेइ मुरारि-गुप्त एई—मोर प्राण सम ।।इँहार दैन्य शुनि' मोर फाटये जीवन ॥
१५७॥
श्री चैतन्य ने आगे कहा, मैं इस मुरारि गुप्त को अपने प्राण के समान मानता हूँ। जब मैं उसकी दीनता सुनता हूँ, तो मेरा जीवन विचलित हो जाता है।
तबे वासुदेवे प्रभु करि' आलिङ्गन ।। ताँर गुण कहे हा सहस्र-वदन ॥
१५८॥
इसके बाद महाप्रभु ने वासुदेव दत्त का आलिंगन किया और उसकी महिमा का वर्णन इस तरह करने लगे मानो उनके हजार मुख हों।
निज-गुण शुनि' दत्त मने लज्जा पात्रा। निवेदन करे प्रभुर चरणे धरिया ॥
१५९ ॥
जब चैतन्य महाप्रभु ने उसकी महिमा का वर्णन किया, तो वासुदेव दत्त तुरन्त मन में व्याकुल और लज्जित हो उठे। तब उन्होंने महाप्रभु के चरणकमल छूते हुए यह निवेदन किया।
जगत्तारिते प्रभु तोमार अवतार ।मोर निवेदन एक करह अङ्गीकार ॥
१६० ॥
वासुदेव दत्त ने महाप्रभु से कहा, हे प्रभु, आप समस्त बद्धजीवों का उद्धार करने के लिए अवतरित होते हैं। मेरी आपसे एक विनती है, जिसे मैं चाहता हूँ कि आप स्वीकार करें।
करिते समर्थ तुमि हओ, दयामय । तुमि मन कर, तबे अनायासे हय ॥
१६१॥
हे प्रभु, आप जो चाहें सो करने में समर्थ हैं और निस्सदेह आप दयालु हैं। यदि आप चाहें तो आसानी से सब कुछ कर सकते हैं।
जीवेर दुःख देखि' मोर हृदय विदरे ।सर्व-जीवेर पाप प्रभु देह' मोर शिरे ॥
१६२॥
हे प्रभु, समस्त बद्धजीवों के कष्टों को देखकर मेरा दिल फटता है; अतएव मेरी प्रार्थना है कि आप उनके पापकर्मों को मेरे ऊपर डाल दें।
जीवेर पाप ला मुञि करों नरक भोग ।।सकल जीवेर, प्रभु, घुचाह भव-रोग ॥
१६३ ॥
हे प्रभु, सारे जीवों के पापों को अपने ऊपर लादकर मुझे निरन्तर नरक भोगने दें। किन्तु आप उनके रुग्ण भौतिक जीवन को समाप्त कर दें।
एत शुनि' महाप्रभुर चित्त द्रविला ।।अश्रु-कम्प-स्वरभङ्गे कहिते लागिला ॥
१६४॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने वासुदेव का यह कथन सुना, तो उनका हृदय अत्यन्त द्रवित हो उठा। उनकी आँखो से आँसू बहने लगे और वे काँपने लगे। वे कम्पित स्वर में बोले।
तोमार विचित्र नहे, तुमि–साक्षात्प्रह्लाद ।तोमार उपरे कृष्णेर सम्पूर्ण प्रसाद ॥
१६५॥
वासुदेव दत्त को महान् भक्त स्वीकार करते हुए महाप्रभु ने कहा, ऐसा कथन तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि तुम प्रह्लाद महाराज के अवतार हो। ऐसा लगता है कि भगवान् कृष्ण ने तुम्हें सम्पूर्ण कृपा प्रदान कर दी है। इसमें सन्देह नहीं है।
कृष्ण सेइ सत्य करे, येइ मागे भृत्य ।।भृत्य-वाञ्छा-पूर्ति विनु नाहि अन्य कृत्य ॥
१६६॥
| शुद्ध भक्त अपने स्वामी से जो भी माँगता है, उसे भगवान् कृष्ण अवश्य ही प्रदान करते हैं, क्योंकि उनके पास अपने भक्त की इच्छा पूरी करने के अतिरिक्त कोई अन्य कर्तव्य नहीं रहता।
ब्रह्माण्ड जीवेर तुमि वाञ्छिले निस्तार । विना पाप-भोगे हबे सबार उद्धार ॥
१६७॥
यदि तुम चाहते हो कि ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत सारे जीवों का उद्धार हो जाए, तो तुम्हारे द्वारा पापकर्मों का कष्ट भोगे बिना ही उनका उद्धार किया जा सकता है।
असमर्थ नहे कृष्ण, धरे सर्व बल ।।तोमाके वा केने भुञ्जाइबे पाप-फल? ॥
१६८॥
कृष्ण अक्षम नहीं हैं, क्योंकि उनके पास सारी शक्तियाँ हैं। भला वे अन्य जीवों के पापकर्मों के फलों का कष्ट तुम्हें क्यों भोगने देंगे? तुमि याँर हित वाञ्छ', से हैल ‘वैष्णव' ।वैष्णवेर पाप कृष्ण दूर करे सब ॥
१६९॥
तुम जिस किसी को हित चाहते हो, वह तुरन्त वैष्णव हो जाता है। और कृष्ण सारे वैष्णवों को उनके विगत पापकर्मों से मुक्त कर देते हैं।
ग्रस्त्विन्द्र-गोपमथ वेन्द्रमहो स्व-कर्मबन्धानुरूप-फल-भाजनमातनोति । कर्माणि निर्दहति किन्तु च भक्ति-भाजांगोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि ॥
१७० ॥
मैं उन आदि भगवान् गोविन्द को सादर नमस्कार करता हूँ, जो प्रत्येक व्यक्ति-स्वर्ग के राजा इन्द्र से लेकर छोटे से छोटे कीट (इन्द्रगोप) तक–के कष्टों तथा कर्मों के भोग को नियन्त्रित करते हैं। यही भगवान् भक्ति में लगे व्यक्ति के सकाम कर्म को नष्ट करते हैं।'
तोमार इच्छा-मात्रे हबे ब्रह्माण्ड-मोचन ।। सर्व मुक्त करिते कृष्णेर नाहि किछु श्रम ॥
१७१॥
तुम्हारी सच्ची इच्छा-मात्र से ब्रह्माण्ड के सारे जीवों का उद्धार हो जायेगा, क्योंकि कृष्ण को ब्रह्माण्ड के जीवों को मुक्ति देने के लिए कुछ करना नहीं पड़ता।
एक उडुम्बर वृक्षे लागे कोटि-फले । कोटि ग्रे ब्रह्माण्ड भासे विरजार जले ॥
१७२॥
जिस तरह उडुम्बर वृक्ष में करोड़ों फल लगते हैं, उसी तरह विरजा नदी के जल में करोड़ों ब्रह्माण्ड तैरते रहते हैं।
तार एक फल पड़ि' यदि नष्ट हय ।। तथापि वृक्ष नाहि जाने निज-अपचय ॥
१७३॥
इस उडुम्बर वृक्ष में करोड़ों फल लगते हैं, अतएव यदि एक फल गिरकर नष्ट हो जाए, तो भी वृक्ष को किसी प्रकार की क्षति का अनुभव नहीं होता।
तैछे एक ब्रह्माण्ड यदि मुक्त हय । तबु अल्प-हानि कृष्णेर मने नाहि लय ॥
१७४॥
इसी तरह यदि जीवों के मुक्त हो जाने से एक ब्रह्माण्ड रिक्त भी हो जाए, तो भी कृष्ण के लिए यह मामूली बात है। वे इसे गम्भीरता से नहीं लेते।
अनन्त ऐश्वर्य कृष्णेर वैकुण्ठादि-धाम । तार गड़-खाइ कारणाब्धि झार नाम ॥
१७५ ॥
सम्पूर्ण आध्यात्मिक जगत् कृष्ण का ऐश्वर्य है, जिसमें असंख्य वैकुण्ठ लोक हैं। कारण सागर को वैकुण्ठ लोक के चारों ओर की जल की खाई माना जाता है।
ताते भासे माया लञा अनन्त ब्रह्माण्ड । गड़-खाइते भासे ग्रेन राइ-पूर्ण भाण्ड ॥
१७६ ॥
उस कारण सागर में माया तथा उसके अनन्त भौतिक ब्रह्माण्ड स्थित हैं। निस्सन्देह, माया तो राई के बीजों से भरे तैरते हुए पात्र के समान लगती है।
तार एक राई-नाशे हानि नाहि मानि ।। ऐछे एक अण्ड-नाशे कृष्णेर नाहि हानि ॥
१७७॥
यदि इस तैरते पात्र के करोड़ों बीजों में से एक बीज नष्ट हो जाए, तो यह हानि उल्लेखनीय नहीं है। इसी तरह यदि एक ब्रह्माण्ड नष्ट हो जाए, तो भगवान् कृष्ण के लिए इसका महत्त्व नहीं है।
सब ब्रह्माण्ड सह यदि 'माया'र हय क्षय ।।तथापि ना माने कृष्ण किछु अपचय ॥
१७८॥
एक ब्रह्माण्ड रूपी बीज की बात जाने दें, यदि सारे ब्रह्माण्ड तथा भौतिक शक्ति (माया) भी विनष्ट हो जाएँ, तो भी कृष्ण इस क्षति की परवाह तक नहीं करते।
कोटि-कामधेनु-पतिर छागी भैछे मरे ।।षडू-ऐश्वर्य-पति कृष्णेर माया किबा करे? ॥
१७९॥
यदि एक करोड़ कामधेनुओं के मालिक की एक बकरी खो जाए,तो उसे इस हानि की परवाह नहीं होती। कृष्ण छहों ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं। यदि सम्पूर्ण भौतिक शक्ति ( माया) विनष्ट हो जाए, तो इससे उनको कौन सी क्षति पहुँचने वाली है? जय जय जह्यजामजित दोष-गृभीत-गुणांत्वमसि यदात्मना समवरुद्ध-समस्त-भगः । अग-जगदोकसामखिल-शक्त्यवबोधक तेक्वचिदजयात्मना च चरतोऽनुचरेन्निगमः ॥
१८०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु कहते रहे, हे प्रभु, हे अजित, हे समस्त शक्तियों के स्वामी, आप समस्त चर तथा अचर प्राणियों के अज्ञान को दूर करने के लिए कृपया अपनी अन्तरंगा शक्ति प्रकट कीजिए। अपने अज्ञान के कारण वे सभी दोषपूर्ण बातों को स्वीकार कर लेते हैं, जिससे भयानक स्थिति प्रकट हो जाती है। हे प्रभु, अपनी महिमा प्रकट करें! आप इसे आसानी से कर सकते हैं, क्योंकि आपकी अन्तरंगा शक्ति बहिरंगा शक्ति से परे है और आप समस्त ऐश्वर्य के आगार हैं। आप भौतिक शक्ति के भी प्रदर्शनकर्ता हैं। आप वैकुण्ठ में अपनी लीलाएँ करते रहते हैं, जहाँ आप अपनी सुरक्षित अन्तरंगा शक्ति प्रकट करते हैं और कभी-कभी बहिरंगा शक्ति को उस पर दृष्टिपात करके प्रकट करते हैं। इस तरह आप लीलाएँ प्रकट करते हैं। वेदों द्वारा आपकी इन दोनों शक्तियों की पुष्टि होती है और वे उनसे प्रकट होने वाली लीलाओं को स्वीकार करते हैं।'
एइ मत सर्व-भक्तेर कहि' सब गुण । सबारे विदाय दिल करि' आलिङ्गन ॥
१८१॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों के सद्गुणों का बखान एक-एक करके करते रहे। इसके बाद उन्होंने सबका आलिंगन किया और उन्हें विदा कर दिया।
प्रभुर विच्छेदे भक्त करेन रोदन ।। भक्तेर विच्छेदे प्रभुर विषण्ण हैल मन ॥
१८२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु से आसन्न विछोह के कारण सारे भक्त रोने लगे। महाप्रभु भी भक्तों के विछोह के कारण खिन्न थे।
गदाधर-पण्डित रहिला प्रभुर पाशे ।।ग्रमेश्वरे प्रभु यौरे कराइला आवासे ॥
१८३॥
गदाधर पण्डित श्री चैतन्य महाप्रभु के पास रहे। उन्हें यमेश्वर में रहने के लिए स्थान दिया गया।
पुरी-गोसाजि, जगदानन्द, स्वरूप-दामोदर । दामोदर-पण्डित, आर गोविन्द, काशीश्वर ॥
१८४॥
एइ-सब-सङ्गे प्रभु वैसे नीलाचले ।जगन्नाथ-दरशन नित्य करे प्रातः-काले ॥
१८५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी, नीलाचल में परमानन्द पुरी, जगदानन्द, स्वरूप दामोदर, दामोदर पण्डित, गोविन्द तथा काशीश्वर के साथ रहे। श्री चैतन्य महाप्रभु नित्य ही प्रात:काल जगन्नाथजी का दर्शन करने जाते।
प्रभु-पाश आसि’ सार्वभौम एक दिन ।योड़-हात करि' किछु कैल निवेदन ॥
१८६॥
एक दिन सार्वभौम भट्टाचार्य हाथ जोड़े हुए चैतन्य महाप्रभु के समक्ष आये और उनसे एक प्रार्थना करने लगे।
एबे सब वैष्णव गौड़-देशे चलि' गेल । एबे प्रभुर निमन्त्रणे अवसर हैल ॥
१८७॥
चूँकि सारे वैष्णव बंगाल वापस चले गये थे, अतएव यह अच्छा अवसर था कि महाप्रभु निमन्त्रण स्वीकार कर लेंगे।
एबे मोर घरे भिक्षा करह 'मास' भरि' । प्रभु कहे,—धर्म नहे, करिते ना पारि ॥
१८८ ॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, कृपया एक मास तक मेरे यहाँ भोजन करने का निमन्त्रण स्वीकार करें। महाप्रभु ने उत्तर दिया,“ऐसा सम्भव नहीं है, क्योंकि यह संन्यासी धर्म के विरुद्ध है।
सार्वभौम कहे,—भिक्षा करह बिश दिन । प्रभु कहे,——-एह नहे ग्रति-धर्म-चिह्न ॥
१८९॥
तब सार्वभौम ने कहा, तो फिर बीस दिनों के लिए निमन्त्रण स्वीकार करें। किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, यह संन्यास आश्रम का धर्म नहीं है।
सार्वभौम कहे पुनः,—दिन ‘पञ्च-दश' ।प्रभु कहे,—तोमार भिक्षा 'एक' दिवस ॥
१९०॥
जब सार्वभौम भट्टाचार्य ने पुनः पन्द्रह दिन तक भोजन करने के लिए आग्रह किया, तो महाप्रभु ने कहा, मैं आपके घर केवल एक दिन भोजन ग्रहण करूंगा।
तबे सार्वभौम प्रभुर चरणे धरिया ।। ‘दश-दिन भिक्षा कर' कहे विनति करिया ॥
१९१॥
तब सार्वभौम ने महाप्रभु के चरण पकड़ लिए और विनयपूर्वक कहा, “कम-से-कम दस दिनों तक तो भोजन अवश्य ग्रहण करें।
प्रभु क्रमे क्रमे पाँच-दिन घाटाइल ।।पाँच-दिन ताँर भिक्षा नियम करिल ॥
१९२॥
इस तरह धीरे-धीरे महाप्रभु ने अवधि को घटाकर पाँच दिन दी। इस तरह वे महीने में लगातार पाँच दिनों तक भट्टाचार्य के निमन्त्रण को स्वीकार करते रहे।
तबे सार्वभौम करे आर निवेदन ।।तोमार सङ्गे सन्यासी आछे दश-जन ॥
१९३॥
इसके बाद सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, हे प्रभु, आपके साथ दस संन्यासी हैं।
पुरी गोसाजिर भिक्षा पाँच दिन मोर घरे ।पूर्वे आमि कहियाछों तोमार गोचरे ॥
१९४॥
तब सार्वभौम भट्टाचार्य ने निवेदन किया कि परमानन्द पुरी भी उनके घर पाँच दिन का निमन्त्रण स्वीकार करेंगे। इसका निर्णय महाप्रभु के समक्ष पहले ही हो चुका था।
दामोदर-स्वरूप,—एइ बान्धव आमार ।कभु तोमार सङ्गे ग्राबे, कभु एकेश्वर ॥
१९५॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, दामोदर स्वरूप मेरा घनिष्ठ मित्र है। कभी वह आपके साथ आयेगा और कभी अकेले।
आर अष्ट सन्यासीर भिक्षा दुइ दुइ दिवसे ।।एक एक-दिन, एक एक जने पूर्ण हइल मासे ॥
१९६॥
अन्य आठ संन्यासी दो-दो दिन का निमन्त्रण स्वीकार करेंगे। इस तरह पूरे महीने प्रतिदिन के लिए कार्यक्रम रहेगा।
बहुत सन्यासी यदि आइसे एक ठानि ।।सम्मान करते नारि, अपराध पाइ ॥
१९७॥
यदि सारे संन्यासी एकसाथ आयेंगे, तो मैं उनका समुचित सत्कार नहीं कर पाऊँगा और मैं अपराधी बनूंगा।
तुमिह निज-छाये आसिबे मोर घर ।। कभु सङ्गे आसिबेन स्वरूप-दामोदर ॥
१९८॥
कभी आप अकेले मेरे घर आयेंगे और कभी स्वरूप दामोदर के साथ।
प्रभुर इङ्गित पाजा आनन्दित मन ।।सेइ दिन महाप्रभुर कैल निमन्त्रण ॥
१९९॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस प्रबन्ध की पुष्टि कर दी, तो भट्टाचार्य अत्यन्त प्रसन्न हुए और तुरन्त उसी दिन महाप्रभु को अपने घर आने को निमन्त्रित किया।
षाठीर माता' नाम, भट्टाचार गृहिणी ।प्रभुर महा-भक्त तेंहो, स्नेहेते जननी ॥
२००॥
सार्वभौम भट्टाचार्य की पत्नी पाठी की माता कहलाती थीं। वे श्री चैतन्य महाप्रभु की महान् भक्तिन थीं। वे माता के समान स्नेहिल थीं।
घरे आसि' भट्टाचार्य तौरे आज्ञा दिल । आनन्दे पाठीर माता पाक चड़ाइल ॥
२०१॥
घर लौटकर सार्वभौम भट्टाचार्य ने अपनी पत्नी को आदेश दिया, तो उनकी पत्नी षाठीर माता बड़े ही आनन्द से भोजन पकाने लगीं।
भट्टाचार गृहे सब द्रव्य आछे भरि' । ग्रेबा शाक-फलादिक, आनाइल आहरि' ॥
२०२॥
सार्वभौम भट्टाचार्य के घर में खाद्य पदार्थ का सदैव संग्रह रहता था। जितनी पालक, तरकारियाँ, फल इत्यादि की आवश्यकता थी, उतनी लाकर संग्रह कर दिया गया।
आपनि भट्टाचार्य करे पाकेर सब कर्म ।।पाठीर माता–विचक्षणा, जाने पाक-मर्म ॥
२०३॥
सार्वभौम भट्टाचार्य भोजन पकाने में अपनी पत्नी की सहायता करने लगे। उनकी पत्नी पाठीर माता अत्यन्त अनुभवी थीं और वे अच्छा भोजन बनाना जानती थीं।
पाक-शालार दक्षिणे—दुइ भोगालय ।। एक-घरे शालग्रामेर भोग-सेवा हये ॥
२०४॥
रसोई-घर के दक्षिण की ओर भोजन अर्पण करने के दो कमरे थे, जिनमें से एक में शालग्राम नारायण को भोग लगाया जाता था।
आर घर महाप्रभुर भिक्षार लागिया ।निभृते करियाछे भट्ट नूतन करिया ॥
२०५ ॥
दूसरा कमरा श्री चैतन्य महाप्रभु को भोजन कराने के लिए था। यह कमरा एकान्त में था और इसे भट्टाचार्य ने अभी नया नया बनवाया था।
बाह्ये एक द्वार तार, प्रभु प्रवेशिते ।।पाक-शालार एक द्वार अन्न परिवेशिते ॥
२०६॥
यह कमरा इस तरह बना था कि श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए बाहर से जाने के लिए केवल एक दरवाजा था, जो बाहर की ओर खुलता था। दूसरा दरवाजा रसोई-घर के साथ लगा था, जिससे भोजन लाया जाता था।
बत्तिशा-आठिया कलार आङ्गटिया पाते ।।तिन-मान तण्डुलेर उभारिल भाते ॥
२०७॥
सर्वप्रथम केले के बड़े पत्ते पर तीन मान (लगभग ६ पौंड) पकाया चावल परोसा गया।
पीत-सुगन्धि-घृते अन्न सिक्त कैल ।चारि-दिके पाते घृत वहिया चलिल ॥
२०८॥
तब पूरे चावल में इतना पीला सुगन्धित घी डाला गया कि वह पत्ते से बाहर बह चला।
केयापत्र-कलाखोला-डोङ्गा सारि सारि ।चारि-दिके धरियाछे नाना व्यञ्जन भरि' ॥
२०९॥
केले की छाल तथा केया की पत्तियों के बने अनेक दोने थे। इन्हें विविध तरकारियों से भरकर पत्तल के चारों ओर रख दिया गया।
दश-प्रकार शाक, निम्ब-तिक्त-सुख्त-झोल ।मरिचेर झाल, छाना-बड़ा, बड़ि घोल ॥
२१०॥
व्यंजनों में दस प्रकार की पालक, कड़वी नीम की पत्तियों का बना शोरबा (सुख्त), काली मिर्च का बना तीखा व्यंजन, छाना-बड़ा, बड़ी घोल थे।
दुग्ध-तुम्बी, दुग्ध-कुष्माण्ड, वेसर, लाफ्रा ।।मोचा-घण्ट, मोचा-भाजा, विविध शाक्रा ॥
२११॥
व्यंजनों में दुग्ध-तुम्बी, दुग्ध-कुष्माण्ड, वेसर, लाफ्रा, मोचा-घण्टा, मोचा-भाजा तथा अन्य तरकारियाँ थीं।
वृद्ध-कुष्माण्ड-बड़ीर व्यञ्जन अपार ।फुलबड़ी-फल-मूल विविध प्रकार ॥
२१२॥
अनेक प्रकार की वृद्धकुष्माण्ड बड़ी, फुलबड़ी, फल तथा विविध कन्द थे।
नव-निम्बपत्र-सह भृष्ट-वार्ताकी ।फुल-बड़ी पटोल-भाजा, कुष्माण्ड-मान-चाकी ॥
२१३॥
अन्य व्यंजनों में नीम की नई सुखाई पत्तियों से मिला बैंगन, हल्की बड़ी, सूखा पटोल तथा कुम्हड़े के बने पेठे थे।
भृष्ट-माष-मुद्ग-सूप अमृत निन्दय ।।मधुराम्ल, बड़ाम्लादि अम्ल पाँच छय ॥
२१४॥
तली उड़द की दाल तथा मूंग की दाल का शोरबा अमृत से भी बढ़कर था। मीठी चटनी के साथ ही पाँच-छः प्रकार के खट्टे व्यंजन थे, जिनमें बड़ाम्ल मुख्य था।
मुद्ग-बड़ा, माष-बड़ा, कला-बड़ा मिष्ट । क्षीर-पुलि, नारिकेल-पुलि आर व्रत पिष्ट ॥
२१५॥
मूंग की दाल, उड़द की दाल तथा मीठे केले के बड़े बने थे और मीठे चावल की बर्फी, नारिकेल की बर्फी तथा अन्य अनेक बर्फियाँ थीं।
काँजि-बड़ा, दुग्ध-चिड़ा, दुग्ध-लक्लकी ।। आर व्रत पिठा कैल, कहिते ना शकि ॥
२१६॥
कांजी बड़ा, दुग्ध-चिड़ा, दुग्ध लक्लकी तथा विविध मिठाईंयाँ थीं, जिनका वर्णन करने में मैं अक्षम हूँ।
घृत-सिक्त परमान्न, मृत्कुण्डिका भरि' ।। चाँपाकला-घनदुग्ध-आम्र ताहा धरि ॥
२१७॥
घी मिलाकर मीठे चावल को मिट्टी के पात्र में डाला गया और उसमें चाँपाकला, औंटाया दूध तथा आम मिला दिया गया।
रसाला-मथित दधि, सन्देश अपारे ।गौड़े उत्कले व्रत भक्ष्येर प्रकार ॥
२१८॥
अन्य व्यंजन थे-अत्यन्त स्वादिष्ट लस्सी तथा तरह-तरह की सन्देश मिठाइयाँ। वास्तव में बंगाल तथा उड़ीसा में उपलब्ध सभी विभिन्न खाद्यों को तैयार किया गया था।
श्रद्धा करि' भट्टाचार्य सब कराइल ।शुभ्र-पीठोपरि सूक्ष्म वसने पातिल ॥
२१९॥
इस तरह भट्टाचार्य ने अनेक प्रकार के व्यंजन तैयार किये और तब उन्होंने श्वेत काठ की चौकी पर महीन वस्त्र बिछा दिया।
दुइ पाशे सुगन्धि शीतल जल-झारी ।अन्न-व्यञ्जनोपरि दिल तुलसी-मञ्जरी ॥
२२०॥
भोजन की थाली के दोनों ओर सुगन्धित शीतल जल से भरे घड़े थे। चावल के ढेर के ऊपर तुलसी की मंजरियाँ रखी गई थीं।
अमृत-गुटिका, पिठा-पाना आनाइल ।जगन्नाथ-प्रसाद सब पृथक्धरिल ॥
२२१॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने भगवान जगन्नाथ पर अर्पित किये गये कई । प्रकार के व्यंजनों को भी सम्मिलित कर लिया था। इनमें अमृत गुटिका, खीर तथा केक सम्मिलित थे। इन्हें अलग रखा गया था।
हेन-काले महाप्रभु मध्याह्न करिया ।। एकले आइल ताँर हृदय जानिया ॥
२२२॥
जब सारी वस्तुएँ तैयार हो गईं, तो श्री चैतन्य महाप्रभु दोपहर का कार्य समाप्त करने के बाद वहाँ अकेले ही आये। वे सार्वभौम भट्टाचार्य के हृदय की बात जानते थे।
भट्टाचार्य कैल तबे पाद प्रक्षालन । घरेर भितरे गेला करिते भोजन ॥
२२३॥
जब सार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभु के पाँव धो चुके, तो महाप्रभु दोपहर का भोजन करने कमरे में प्रविष्ट हुए।
अन्नादि देखिया प्रभु विस्मित हा । भट्टाचार्ये कहे किछु भङ्गि करिया ॥
२२४॥
इतना बृहत आयोजन देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु कुछ विस्मित थे, अतः वे कुछ संकेत करके सार्वभौम भट्टाचार्य से कुछ बोले।
अलौकिक एइ सब अन्न-व्यञ्जन ।। दुइ प्रहर भितरे कैछे हइल रन्धन? ॥
२२५॥
यह अत्यन्त असामान्य है! चावल तथा तरकारियों को छह घंटे के भीतर किस तरह पका लिया गया? शत चुलाय शत जन पाक यदि करे ।।तबु शीघ्र एत द्रव्य रान्धिते ना पारे ॥
२२६॥
यदि सौ आदमी सौ चूल्हों में भोजन पकाते, तो भी इतने सारे व्यंजनों को इतने कम समय में न बना पाते।
कृष्णेर भोग लागाछ,—अनुमान करि ।उपरे देखिये ग्राते तुलसी-मञ्जरी ॥
२२७॥
मेरा अनुमान है कि कृष्ण को पहले ही भोजन अर्पित किया जा चुका है, क्योंकि थालों के ऊपर मुझे तुलसी मंजरियाँ दिखती हैं।
भाग्यवान्तुमि, सफल तोमार उद्योग ।राधा-कृष्णे लागाछ एतादृश भोग ॥
२२८॥
आप अत्यन्त भाग्यवान हैं और आपका परिश्रम सफल है, क्योंकि आपने राधा-कृष्ण को इतना अद्भुत भोजन प्रदान किया है।
अन्नेर सौरभ्य, वर्ण–अति मनोरम ।राधा-कृष्ण साक्षातिहाँ करियाछेन भोजन ॥
२२९॥
चावल का रंग इतना आकर्षक है और इसकी सुगन्ध इतनी उत्तम है, मानो राधा तथा कृष्ण ने साक्षात् इसे ग्रहण किया है।
तोमार बहुत भाग्य कत प्रशंसिब ।। आमि–भाग्यवान्, इहार अवशेष पाबे ॥
२३०॥
हे प्रिय भट्टाचार्य, आप बड़े भाग्यशाली हो। मैं आपकी कितनी प्रशंसा करूँ? मैं भी अत्यन्त भाग्यशाली हूँ कि इस भोजन का अवशिष्ट ग्रहण कर रहा हूँ।
कृष्णेर आसन-पीठ राखह उठाना । मोरे प्रसाद देह' भिन्न पात्रेते करिया ॥
२३१॥
कृष्ण का आसन उठाकर एक ओर रख दो; तब मुझे एक अलग पत्तल में प्रसाद दो।
भट्टाचार्य बले—प्रभु ना करह विस्मय ।ग्रेइ खाबे, ताँहार शक्त्ये भोग सिद्ध होय ॥
२३२॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, हे प्रभु, यह उतना आश्चर्यजनक नहीं है। यह सब उनकी शक्ति तथा दया से ही सम्भव हो सका है, जिन्हें यह भोजन करना है।
उद्योग ना छिल मोर गृहिणीर रन्धने ।ग्राँर शक्त्ये भोग सिद्ध, सेइ ताहा जाने ॥
२३३॥
मेरी पत्नी तथा मैंने भोजन बनाने में कोई विशेष प्रयास नहीं किया। जिनकी शक्ति से यह भोजन तैयार हुआ है, वे सब कुछ जानते हैं।
एइत आसने वसि' करह भोजन ।।प्रभु कहे,—पूज्य एइ कृष्णेर आसन ॥
२३४॥
अब कृपा करके इस स्थान पर बैठे और भोजन करें। चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, यह स्थान पूजनीय है, क्योंकि इसका उपयोग कृष्ण द्वारा हो चुका है।
भट्ट कहे,—अन्न, पीठ,—समान प्रसाद ।अन्न खाबे, पीठे वसिते काहाँ अपराध? ॥
२३५॥
भट्टाचार्य ने कहा, भोजन तथा बैठने का स्थान-दोनों ही भगवान् की कृपा के तुल्य हैं। यदि आप उच्छिष्ट भोजन कर सकते हैं, तो इस स्थान पर आपके बैठने में कौन-सा अपराध है? प्रभु कहे,—भाल कैले, शास्त्र-आज्ञा हय ।।कृष्णेर सकल शेष भृत्य आस्वादये ॥
२३६॥
तब चैतन्य महाप्रभु ने कहा, हाँ, आपने ठीक कहा है। शास्त्रों का आदेश है कि भक्त कृष्ण द्वारा छोड़ी गई किसी भी वस्तु का आस्वादन कर सकता है।
त्वयोपयुक्त-स्रग्गन्ध-वासोऽलङ्कार-चर्चिताः ।। उच्छिष्ट-भोजिनो दासास्तव मायां जयेम हि ॥
२३७॥
हे प्रभु, आपको अर्पित की गईं मालाएँ, सुगन्धित पदार्थ, वस्त्र, गहने तथा अन्य वस्तुएँ बाद में आपके सेवकों द्वारा काम में लाई जा सकती हैं। इन वस्तुओं को ग्रहण करने तथा आपका उच्छिष्ट भोजन खाने से हम माया को जीत सकेंगे।
तथापि एतेक अन्न खाओन ना ग्राय । भट्ट कहे,—जानि, खाओ ग्रतेक मुयाय ॥
२३८॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, यहाँ इतना भोजन है कि उसे खा पाना असम्भव है। भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, मैं जानता हूँ कि आप कितना खा सकते हैं।
नीलाचले भोजन तुमि कर बायान्न बार।एक एक भोगेर अन्न शत शत भार ॥
२३९॥
जगन्नाथ पुरी में दिन-भर में आप कम-से-कम ५२ बार भोजन करते हैं और एक-एक बार में आप प्रसाद से भरी सैंकड़ों बाल्टियाँ ग्रहण करते हैं।
द्वारकाते षोल-सहस्र महिषी-मन्दिरे ।अष्टादश माता, आर यादवेर घरे ॥
२४०॥
द्वारका में आपके सोलह हजार महलों में सोलह हजार रानियाँ हैं। वहाँ अठारह माताएँ, अनेक मित्र तथा यदुवंश के अनेक सम्बन्धी भी हैं।
व्रजे ज्येठा, खुड़ा, मामा, पिसादि गोप-गण । सखा-वृन्द सबार घरे द्विसन्ध्या-भोजन ॥
२४१॥
वृन्दावन में भी आपके ताऊ, चाचा, मामा, फूफा तथा अनेक ग्वाले हैं। वहाँ गोप-मित्र भी हैं और आप उन सबके घरों में प्रातः और सांयकाल दो बार भोजन करते हैं।
गोवर्धन-यज्ञे अन्न खाइला राशि राशि ।।तार लेखीय एइ अन्न नहे एक ग्रासी ॥
२४२॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, आपने गोवर्धन पूजा के अवसर पर जितने ढेरों चावल खाया था, उसकी तुलना में यह अल्पमात्र एक कौर भी नहीं है।
तुमि त' ईश्वर, मुञि- क्षुद्र जीव छार ।।एक-ग्रास माधुकरी करह अङ्गीकार ॥
२४३॥
कहाँ आप पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान्, और कहाँ मैं एक क्षुद्रतम जीव! अतएव आप मेरे घर में अल्प मात्रा में भोजन ग्रहण कीजिए।
एत शुनि' हासि' प्रभु वसिला भोजने ।जगन्नाथेर प्रसाद भट्ट देन हर्ष-मने ॥
२४४॥
यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु हँसने लगे और खाने के लिए बैठ गये। भट्टाचार्य ने अति प्रसन्न होकर सबसे पहले उन्हें जगन्नाथजी का प्रसाद दिया।
हेन-काले 'अमोघ,'–भट्टाचार्गेर जामाता ।।कुलीन, निन्दक तेंहो षाठी-कन्यार भर्ता ॥
२४५ ॥
उसी समय भट्टाचार्य की पुत्री षाठी का पति अर्थात् उनका जामाता अमोघ आया। यद्यपि वह उच्च ब्राह्मण कुल में जन्मा था, किन्तु वह निन्दक था।"
भोजन देखिते चाहे, आसिते ना पारे । लाठि-हाते भट्टाचार्य आछेन दुयारे ॥
२४६॥
अमोघ चाहता था कि महाप्रभु को भोजन करते देखे, किन्तु उसे अन्दर जाने नहीं दिया गया। भट्टाचार्य दरवाजे पर लाठी लेकर अपने घर की रखवाली करते रहे।
तेहो यदि प्रसाद दिते हैला आन-मन । अमोध आसि' अन्न देखि' करये निन्दन ॥
२४७॥
किन्तु ज्योंही भट्टाचार्य प्रसाद वितरण करने लगे और थोड़े असावधान हुए, त्योंही अमोघ भीतर आ गया। भोजन की मात्रा देखकर वह निन्दा करने लगा।
एइ अन्ने तृप्त हय दश बार जन । एकेला सन्यासी करे एतेक भक्षण! ॥
२४८॥
इतना भोजन तो दस-बारह लोगों को तुष्ट कर सकता है, लेकिन यह संन्यासी तो अकेले ही इतना सारा खा रहा है।
शुनितेइ भट्टाचार्य उलटि' चाहिल । ताँर अवधान देखि' अमोघ पलाइल ॥
२४९॥
जब अमोघ ने यह कहा, तो सार्वभौम भट्टाचार्य ने उसकी ओर घूरकर देखा। भट्टाचार्य का रुख देखकर अमोघ तुरन्त भाग गया।
भट्टाचार्ये लाठि लञा मारिते धाइल ।। पलाइल अमोघ, तार लाग ना पाइल ॥
२५०॥
भट्टाचार्य लाठी लिए उसके पीछे-पीछे उसे मारने के लिए दौड़े, किन्तु अमोघ इतनी तेजी से निकल भागा कि भट्टाचार्य उसे पकड़ न पाये।
तबे गालि, शाप दिते भट्टाचार्य आइला ।।निन्दा शुनि' महाप्रभु हासिते लागिला ॥
२५१॥
तब भट्टाचार्य अपने दामाद को गाली देने लगे और शाप देने लगे। जब भट्टाचार्य लौटे, तो उन्होंने देखा कि श्री चैतन्य महाप्रभु उनके द्वारा की गई अमोघ की आलोचना सुनकर हँस रहे थे।
शुनि' पाठीर माता शिरे-बुके घात मारे । ‘षाठी राण्डी हउक'—इहा बले बारे बारे ॥
२५२ ॥
जब भट्टाचार्य की पत्नी षाठी की माता ने इस घटना को सुनी, तो वह यह कहकर तुरन्त अपना सिर तथा छाती पीटने लगी, यह षाठी को राँड (विधवा) हो जाने दो! मुँहार दुःख देखि' प्रभु मुँहा प्रबोधिया । मुँहार इच्छाते भोजन कैल तुष्ट हन्ना ।। २५३॥
पति-पत्नी दोनों के शोक को देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें सान्त्वना दिलाने का प्रयास किया। महाप्रभु ने उन दोनों की इच्छापूर्ति के लिए प्रसाद ग्रहण किया और वे अत्यन्त तुष्ट हुए।
आचमन कराा भट्ट दिल मुख-वास ।तुलसी-मञ्जरी, लवङ्ग, एलाचि रस-वास ॥
२५४॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु खा चुके, तो भट्टाचार्य ने उनके मुँह, हाथ तथा पाँव धुलाये और उन्हें सुगन्धित मसाले, तुलसी-मंजरियाँ, लवंग तथा इलायची खाने को दी।
सर्वाङ्गे पराइल प्रभुर माल्य-चन्दन ।।दण्डवत् हा बले सदैन्य वचन ॥
२५५ ॥
फिर भट्टाचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु को फूल-माला पहनाई और उनके शरीर पर चन्दन का लेप किया। नमस्कार करने के बाद भट्टाचार्य ने विनयपूर्वक इस प्रकार निवेदन किया।
निन्दा कराइते तोमा आनिनु निज-घरे ।।एइ अपराध, प्रभु, क्षमा कर मोरे ॥
२५६ ।। | मैं आपको अपने घर आपकी निन्दा कराने के लिए ही लाया। यह बहुत बड़ा अपराध है। मैं इसके लिए क्षमाप्रार्थी हूँ।
प्रभु कहे,—निन्दा नहे, 'सहज' कहिल ।।इहाते तोमार किबा अपराध हैल? ॥
२५७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, अमोघ ने जो कुछ कहा है, वह सही है, अतएव यह निन्दा नहीं है। इसमें आपको क्या अपराध है? एत बलि' महाप्रभु चलिला भवने ।। भट्टाचार्य तॉर घरे गेला तर सने ॥
२५८॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु वहाँ से चलकर अपने घर वापस आये। सार्वभौम भट्टाचार्य भी उनके साथ-साथ गये।
प्रभु-पदे पड़ि' बहु आत्म-निन्दा कैल ।ताँरे शान्त करि' प्रभु घरे पाठाइल ॥
२५९॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने महाप्रभु के चरणों पर गिरकर आत्म-निन्दा में अनेक बातें कहीं। तब महाप्रभु ने उन्हें शान्त किया और उन्हें घर वापस भेज दिया।
घरे आसि' भट्टाचार्य पाठीर माता-सने ।आपना निन्दिया किछु बलेन वचने ॥
२६० ॥
अपने घर लौटकर सार्वभौम भट्टाचार्य ने पाठी की माता से परामर्श किया। फिर अपनी निन्दा करते हुए वे इस प्रकार बोले।
चैतन्य-गोसाजिर निन्दा शुनिल ग्राहा हैते ।। तारे वध कैले हय पाप-प्रायश्चित्ते ॥
२६१॥
जिस व्यक्ति ने श्री चैतन्य महाप्रभु की निन्दा की, यदि उसका वध कर दिया जाए, तो उससे पापकर्म का प्रायश्चित्त हो सकता है।
किम्वा निज-प्राण यदि करि विमोचन । दुइ ग्रोग्य नहे, दुइ शरीर ब्राह्मण ॥
२६२॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने आगे कहा, अथवा यदि मैं अपने प्राण त्याग दें, तो इस पापकर्म का प्रायश्चित्त हो सकता है। किन्तु इनमें से दोनों विचार उपयुक्त नहीं हैं, क्योंकि दोनों शरीर ब्राह्मणों के हैं।
पुनः सेइ निन्दकेर मुख ना देखिब। परित्याग कैलें, तार नाम ना लइब ॥
२६३ ॥
इसके बजाए, मैं उस निन्दक का अब फिर कभी मुँह तक नहीं देखेंगा। मैं उसका परित्याग कर रहा हूँ और उससे सम्बन्ध तोड़ रहा हूँ। अब मैं उसका नाम तक नहीं लूंगा।
पाठीरे कह—तारे छाड़क, से हइल 'पतित' ।।‘पतित' हइले भर्ता त्यजिते उचित ॥
२६४॥
मेरी पुत्री पाठी से कहो कि वह अपने पति से सम्बन्ध तोड़ ले, क्योंकि वह पतित हो चुका है। जब पति पतित हो जाय, तो पत्नी का कर्तव्य है कि वह उससे सम्बन्ध विच्छेद कर ले।
पतिं च पतित त्यजेत ॥
२६५ ॥
यदि पतिं पतितहो जाए, तो उससे सम्बन्ध तोड़ लेना चाहिए।
सेइ रात्रे अमोघ काहाँ पलाजा गेल ।।प्रातः-काले तार विसूचिका-व्याधि हैल ॥
२६६ ॥
उस रात को सार्वभौम भट्टाचार्य का दामाद अमोघ भाग गया और प्रातः होते ही वह हैजे से ग्रस्त हो गया।
अमोघ मरेन–शुनि' कहे भट्टाचार्य ।।सहाय हइया दैव कैल मोर कार्य ॥
२६७॥
जब भट्टाचार्य ने सुना कि अमोघ हैजे से मर रहा है, तो उन्होंने सोचा, 'यह दैव की कृपा है कि जो मैं करना चाह रहा हूँ वही हो रहा है।'
ईश्वरे त' अपराध फले तत-क्षण ।एत बलि' पड़े दुइ शास्त्रेर वचन ॥
२६८ ॥
जब कोई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रति अपराध करता है, तो कर्म तुरन्त प्रभाव दिखाता है। यह कहकर उन्होंने शास्त्रों से दो श्लोक सुनाये।
महता हि प्रयत्नेन हस्त्यश्व-रथ-पत्तिभिः ।। अस्माभिर्युदनुष्ठेयं गन्धर्वैस्तदनुष्ठितम् ॥
२६९ ॥
जिस कार्य को हाथी, घोड़े, रथ तथा पैदल सैनिकों को एकत्र करके बड़े ही प्रयत्न के साथ हमें करना पड़ता, उसे गन्धर्वो ने पहले ही सम्पन्न कर लिया है।'
आयुः श्रियं ग्रशो धर्म लोकानाशिष एव च । हन्ति श्रेयांसि सर्वाणि पुंसो महदतिक्रमः ॥
२७० ॥
जब कोई व्यक्ति किसी महापुरुषों के साथ दुर्व्यवहार करता है, तो उसकी आयु, ऐश्वर्य, कीर्ति, धर्म, धन तथा सौभाग्य सभी नष्ट हो जाते हैं।'
गोपीनाथाचार्य गेला प्रभु-दरशने । प्रभु तौरे पुछिल भट्टाचार्य-विवरणे ॥
२७१ ॥
उसी समय गोपीनाथ आचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने आये, तो महाप्रभु ने उनसे सार्वभौम भट्टाचार्य के घर में घट रही घटनाओं के बारे में पूछा।
आचार्य कहे,—उपवास कैल दुइ जन । विसूचिका-व्याधिते अमोघ छाड़िछे जीवन ॥
२७२ ॥
गोपीनाथ आचार्य ने महाप्रभु को बतलाया कि पति-पत्नी दोनों ही उपवास पर हैं और उनका दामाद अमोघ हैजे से मर रहा है।
शुनि' कृपामय प्रभु आइला धाज्ञा ।।अमोघेरे कहे तार बुके हस्त दिया ॥
२७३ ॥
ज्योहीं महाप्रभु ने सुना कि अमोघ मरणासन्न है, वे तुरन्त जल्दीजल्दी उसके पास दौड़े गये। फिर अमोघ की छाती पर अपना हाथ रखकर वे इस प्रकार बोले।
सहजे निर्मल एइ ‘ब्राह्मण'-हृदय ।कृष्णेर वसिते एइ ग्रोग्य-स्थान हय ॥
२७४॥
ब्राह्मण का हृदय स्वभाव से शुद्ध होता है, अतः कृष्ण के वास करने के लिए यह उपयुक्त स्थान होता है।
‘मात्सर्य'-चण्डाल केने इहाँ वसाइले ।।परम पवित्र स्थान अपवित्र कैले ॥
२७५ ॥
उसमें तुमने ईष्र्या रूपी चण्डाल को भी स्थान क्यों दिया? इसी के कारण तुमने अपने अत्यन्त पवित्र स्थान, हृदय को भी दूषित कर दिया है।
सार्वभौम-सङ्गे तोमार 'कलुष' हैल क्षय ।।‘कल्मष' घुचिले जीव 'कृष्ण-नाम' लय ॥
२७६ ॥
किन्तु सार्वभौम भट्टाचार्य की संगति से तुम्हारा सारा कल्मष घुल चुका है। जब मनुष्य के हृदय का सारा कल्मष धुल जाता है, तब वह हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन कर सकता है।
उठह, अमोघ, तुमि लओ कृष्ण-नाम ।अचिरे तोमारे कृपा करिबे भगवान् ॥
२७७॥
अतएव हे अमोघ, तुम उठो और हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करो! यदि तुम ऐसा करोगे, तो कृष्ण अवश्य ही तुम पर कृपा करेंगे।
शुनि' 'कृष्ण' 'कृष्ण' बलि' अमोघ उठिला ।। मोन्मादे मत्त हा नाचिते लागिला ॥
२७८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की वाणी सुनकर तथा उनका स्पर्श पाकर, मरणशय्या में पड़ा अमोघ उठ खड़ा हुआ और कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करने लगा। इस तरह वह प्रेमोन्मत्त होकर नाचने लगा।
कम्प, अश्रु, पुलक, स्तम्भ, स्वेद, स्वर-भङ्ग । प्रभु हासे देखि' तार प्रेमेर तरङ्ग ॥
२७९॥
प्रेमोन्मत्त होकर नाचते समय अमोघ में सारे भावलक्षण-यथा कम्पन, अश्रु, पुलकित होना, स्तम्भ, स्वेद तथा स्वरभंग प्रकट हो आये। इस प्रेम-तरंगों को देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु हँसने लगे।
प्रभुर चरणे धरि' करये विनय । अपराध क्षम मोरे, प्रभु, दयामय ॥
२८० ॥
अमोघ महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़ा और विनीत भाव से बोला, “हे दयामय प्रभु, कृपया मेरा अपराध क्षमा करें।
एई छार मुखे तोमार करिनु निन्दने ।।एत बलि' आपन गाले चड़ाय आपने ॥
२८१॥
अमोघ ने न केवल महाप्रभु से क्षमा-दान माँगा, अपितु वह यह कहकर अपने गालों पर चपत लगाने लगा, मैंने इसी मुँह से आपकी निन्दा की है।
चड़ाइते चड़ाइते गाल फुलाइल ।हाते धरि' गोपीनाथाचार्य निषेधिल ॥
२८२॥
अमोघ अपने गालों पर तब तक चपत लगाता रहा, जब तक उसके गाल सूज नहीं गये। अन्त में गोपीनाथ आचार्य ने उसके हाथ पकड़कर उसे रोका।
प्रभु आश्वासन करे स्पर्शि' तार गात्र ।सार्वभौम-सम्बन्धे तुमि मोर स्नेह-पात्र ॥
२८३॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसके शरीर का स्पर्श करते हुए उसे यह कहकर शान्त किया, तुम मेरे स्नेह-पात्र हो, क्योंकि तुम सार्वभौम भट्टाचार्य के दामाद हो।
सार्वभौम-गृहे दास-दासी, ग्रे कुकुर ।सेह मोर प्रिय, अन्य जन रहु दूर ॥
२८४॥
सार्वभौम भट्टाचार्य के घर का हर प्राणी मुझे अत्यन्त प्रिय हैयहाँ तक कि उनके दास-दासियाँ तथा उनका कुत्ता भी। तो भला उनके सम्बन्धियों के विषय में क्या कहूँ? अपराध' नाहि, सदा लओ कृष्ण-नाम ।एत बलि' प्रभु आइला सार्वभौम-स्थान ॥
२८५ ॥
अरे अमोघ, अब तुम सदैव हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करना और आगे कोई अपराध न करना। अमोघ को इस तरह उपदेश देकर श्री चैतन्य महाप्रभु सार्वभौम के घर गये।
प्रभु देखि' सार्वभौम धरिला चरणे । प्रभु ताँरै आलिङ्गिया वसिला आसने ॥
२८६ ॥
महाप्रभु को देखते ही सार्वभौम भट्टाचार्य ने उनके चरणकमल पकड़ लिए। महाप्रभु भी उनका आलिंगन किया और फिर बैठ गये।
प्रभु कहे,—अमोघ शिशु, किबा तार दोष ।केने उपवास कर, केने कर रोष ॥
२८७॥
| श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह कहकर सार्वभौम को शान्त किया, आखिर आपका दामाद अमोघ एक बच्चा है। अतएव इसमें उसका क्या दोष? आप क्यों उपवास कर रहे हो और गुस्सा क्यों कर रहे हो? उठ, स्नान कर, देख जगन्नाथ-मुख ।शीघ्र आसि, भोजन कर, तबे मोर सुख ॥
२८८॥
उठो और स्नान करो। फिर जाकर जगन्नाथजी के मुख का दर्शन करो। तब लौटकर अपना भोजन करो। तभी मैं प्रसन्न होऊँगा।
तावत्रहिब आमि एथाय वसिया । ग्रावत्ना खाइबे तुमि प्रसाद आसिया ॥
२८९॥
जब तक आप लौट करके जगन्नाथजी का प्रसाद ग्रहण नहीं कर लेते, तब तक मैं यहीं रुका रहूँगा।
प्रभु-पद धरि' भट्ट कहिते लागिला । मरित' अमोघ, तारे केने जीयाइला ॥
२९०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों को पकड़कर भट्टाचार्य ने कहा, आपने अमोघ को क्यों जिलाया? यदि वह मर गया होता तो अच्छा हुआ होता।
प्रभु कहे,—अमोघ शिशु, तोमार बालक । बालक-दोष ना लय पिता, ताहाते पालक ॥
२९१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, अमोघ तो बच्चा है और आपका पुत्र है। पिता अपने पुत्र के दोष पर ध्यान नहीं देता, विशेष करके तब जब वह उसका पालक हो।
एबे 'वैष्णव' हैल, तार गेल 'अपराध' । ताहार उपरे एबे करह प्रसाद ॥
२९२॥
अब वैष्णव बन जाने से वह अपराधरहित हो चुका है। अब आप निःसंकोच भाव से उस पर कृपा कर सकते हैं।
भट्ट कहे,—चल, प्रभु, ईश्वर-दरशने ।। स्नान करि' ताँहा मुञि आसिछों एखने ॥
२९३ ॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, हे प्रभु, चलिए, जगन्नाथजी का दर्शन करने चलिए। मैं स्नान करने के बाद वहाँ जाऊँगा और तब लौहूँगा।
प्रभु कहे,—गोपीनाथ, इहाञि रहिबा ।। इँहो प्रसाद पाइले, वार्ता आमाके कहिबा ॥
२९४॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोपीनाथ से कहा, तुम यहीं रुको और मुझे सूचित करना जब सार्वभौम भट्टाचार्य प्रसाद ग्रहण कर चुके।"
एत बलि' प्रभु गेला ईश्वर-दरशने ।।भट्ट स्नान दर्शन करि' करिला भोजने ॥
२९५॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करने चले गये। सार्वभौम भट्टाचार्य ने स्नान किया, भगवान् जगन्नाथ का दर्शन किया और फिर वे भोजन ग्रहण करने के लिए अपने घर लौट आये।
सेइ अमोघ हैल प्रभुर भक्त 'एकान्त' । प्रेमे नाचे, कृष्ण-नाम लय महा-शान्त ॥
२९६॥
इसके बाद अमोघ श्री चैतन्य महाप्रभु को शुद्ध भक्त बन गया। वह प्रेम में नाचता और शान्त भाव से भगवान् कृष्ण के नाम का जप करता।
ऐछे चित्र-लीला करे शचीर नन्दन ।। ग्रेइ देखे, शुने, ताँर विस्मय हय मन ॥
२९७॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी विविध लीलाएँ सम्पन्न कीं। जो भी उन्हें देखता या सुनता है, वह विस्मित हुए बिना नहीं रहता।
ऐछे भट्ट-गृहे करे भोजन-विलास ।। तार मध्ये नाना चित्र-चरित्र-प्रकाश ॥
२९८ ॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य के घर में भोजन करने का आनन्द उठाया। इसी एक लीला के अन्तर्गत अनेक अद्भुत लीलाएँ प्रकट हुईं।
सार्वभौम-घरे एइ भोजन-चरित ।सार्वभौम-प्रेम याँहा हइला विदित ॥
२९९॥
ये श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के विशिष्ट लक्षण हैं। इस तरह महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर भोजन किया और महाप्रभु के प्रति सार्वभौम का प्रेम विख्यात हुआ।
पाठीर मातार प्रेम, आर प्रभुर प्रसाद ।।भक्त-सम्बन्धे ग्राहा क्षमिल अपराध ॥
३००॥
इस तरह मैंने सार्वभौम की पत्नी पाठी की माता के प्रेम का वर्णन किया है। मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु की महान् कृपा का भी वर्णन किया है,जिसे उन्होंने अमोघ के अपराध को क्षमा करके प्रदर्शित किया। उन्होंने अमोघ का भक्त के साथ सम्बन्ध होने के कारण ऐसा किया।
श्रद्धा करि' एई लीला शुने ग्रेइ जन ।। अचिरात्पाय सेइ चैतन्य-चरण ॥
३०१॥
जो कोई श्रद्धा तथा प्रेम से श्री चैतन्य महाप्रभु की इन लीलाओं को सुनता है, उसे तुरन्त ही महाप्रभु के चरणों में शरण मिलेगी।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
३०२॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की प्रार्थना करते हुए और सदैव उनकी कृपा की इच्छा रखते हुए उन्हीं के पदचिह्नों पर चलते हुए। मैं कृष्णदास श्री चैतन्य-चरितामृत कह रहा हूँ।
