अध्याय चौदह: वृन्दावन लीलाओं का प्रदर्शन
गौरः पश्यन्नात्म-वृन्दैः श्री-लक्ष्मी-विजयोत्सवम् ।श्रुत्वा गोपी-रसोल्लासं हृष्टः प्रेम्णा ननर्त सः ॥
१॥
अपने निजी भक्तों के साथ श्री चैतन्य महाप्रभु लक्ष्मी विजयोत्सव में गये। वहाँ उन्होंने गोपियों के सर्वोत्कृष्ट प्रेम की चर्चा की। इन सबको सुनने से ही वे परम प्रसन्न हुए और भगवत्प्रेम से अभिभूत होकर खूब नाचे।
जय जय गौरचन्द्र श्री-कृष्ण-चैतन्य ।।जय जय नित्यानन्द जयाद्वैत धन्य ॥
२॥
गौरचन्द्र नाम से विख्यात श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! नित्यानन्द प्रभु की जय हो! परम धन्य अद्वैत आचार्य की जय हो! जय जय श्रीवासादि गौर-भक्त-गण । जय श्रोता-गण,-----यॉर गौर प्राण-धन ॥
३॥
श्रीवास ठाकुर इत्यादि समस्त भक्तों की जय हो! उन सारे पाठकों की जय हो, जिन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने प्राणधन माने हैं।
एड-मत प्रभु आछेन प्रेमेर आवेशे ।।हेन-काले प्रतापरुद्र करिल प्रवेशे ॥
४॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु प्रेमाविष्ट होकर विश्राम कर रहे थे, तभी राजा प्रतापरुद्र बगीचे के भीतर प्रविष्ट हुए।
सार्वभौम-उपदेशे छाड़ि' राज-वेश ।।एकला वैष्णव-वेशे करिल प्रवेश ॥
५॥
सार्वभौम भट्टाचार्य के उपदेशानुसार राजा ने अपना राजसी वेश छोड़ दिया और अब वह वैष्णव-वेश में बगीचे में प्रविष्ट हुए।
सब-भक्तेर आज्ञा निल ग्रोड़-हात हा ।।प्रभु-पद धरि' पड़े साहस करिया ॥
६॥
महाराज प्रतापरुद्र इतने विनीत थे कि सर्वप्रथम उन्होंने सारे भक्तों से हाथ जोड़कर अनुमति माँगी। तब साहस बटोरकर वे महाप्रभु के चरणों पर गिर पड़े और उनका स्पर्श किया।
आङ्घि मुदि' प्रभु प्रेमे भूमिते शयान ।नृपति नैपुण्ये करे पाद-संवाहन ॥
७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु प्रेमाविष्ट होकर आँखें मूंदे चबूतरे पर लेटे थे और राजा बड़ी निपुणता से उनके पाँव दबाने लगे।
रास-लीलार श्लोक पडि' करेन स्तवन ।। जयति तेऽधिकं अध्याय करेन पठन ॥
८॥
वे श्रीमद्भागवत से रासलीला विषयक श्लोक पढ़कर सुनाने लगे। उन्होंने जयति तेऽधिकम् से प्रारम्भ होने वाला अध्याय पढ़ा।
शुनिते शुनिते प्रभुर सन्तोष अपार ।। ‘बल, बल' बलि' प्रभु बले बार बार ॥
९॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने इन श्लोकों को सुना, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए और बारम्बार कहने लगे सुनाते रहो, सुनाते रहो।
तव कथामृतं श्लोक राजा ने पड़िल ।।उठि' प्रेमावेशे प्रभु आलिङ्गन कैल ॥
१०॥
ज्योंही राजा ने तव कथामृतं शब्दों से आरम्भ होने वाला श्लोक पढ़ा, त्योंही महाप्रभु तुरन्त प्रेमावेश में आकर उठे और उन्होंने राजा का आलिंगन कर लिया।
तुमि मोरे दिले बहु अमूल्य रतन ।मोर किछु दिते नाहि, दिलु आलिङ्गन ॥
११॥
राजा द्वारा सुनाये गये श्लोक को सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, तुमने मुझे अमूल्य रत्न प्रदान किये हैं, किन्तु मेरे पास बदले में तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है। इसीलिए मैं तुम्हारा आलिंगन-मात्र कर रहा ।
एत बलि' सेइ श्लोक पड़े बार बार । दुइ-जनार अड़े कम्प, नेत्रे जल-धार ॥
१२॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु उसी श्लोक को बारम्बार पढ़ने लगे। राजा तथा श्री चैतन्य महाप्रभु दोनों ही काँप रहे थे और उनकी आँखों से आँसू बह रहे थे।
तव कथामृतं तप्त-जीवनं ।कविभिरीड़ितं कल्मषापहम् ।। श्रवण-मङ्गलं श्रीमदाततं ।भुवि गृणन्ति ये भूरिदा जनाः ॥
१३॥
हे प्रभु, आपकी वाणी का अमृत तथा आपके कार्यकलापों का वर्णन इस भौतिक जगत् से संतप्त जीवों के लिए प्राणतुल्य हैं। ये कथाएँ महापुरुषों द्वारा संप्रेषित की जाती हैं और ये सभी पापफलों का नाश करने वाली हैं। जो भी इन कथाओं को सुनता है, उसे सौभाग्य प्राप्त होता है। ये कथाएँ विश्वभर में प्रसारित होती हैं और आध्यात्मिक शक्ति से युक्त होती हैं। जो लोग ईश्वर के सन्देश का प्रचार करते हैं, वे निश्चय । महान् दानी तथा कल्याणकर्ता हैं।
भूरिदा' 'भूरिदा' बलि' करे आलिङ्गन ।। इँहो नाहि जाने,—इहों हय कोन्जन ॥
१४॥
इस श्लोक को पढ़ने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुरन्त राजा प्रतापरुद्र का आलिंगन कर लिया और कहा, तुम अत्यन्त वदान्य (दानी ) हो! तुम अत्यन्त दानी हो। अभी तक श्री चैतन्य महाप्रभु यह नहीं जानते थे कि राजा कौन थे।
पूर्व-सेवा देखि' ताँरै कृपा उपजिले ।। अनुसन्धान विना कृपा-प्रसाद करिल ॥
१५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु में राजा की पिछली सेवा के फलस्वरूप दयाभाव जागा था। अतएव बिना पूछे कि वह कौन है, महाप्रभु ने तुरन्त उस पर कृपा की।
एइ देख, चैतन्येर कृपा-महाबल ।। तार अनुसन्धान विना कराय सफल ॥
१६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा कितनी शक्तिशाली है! महाप्रभु ने राजा में पूछे बिना हर काम को सफल बना दिया।
प्रभु बले,—के तुमि, करिला मोर हित?।।आचम्बिते आसि' पियाओ कृष्ण-लीलामृत? ॥
१७॥
अन्त में श्री चैतन्य महाप्रभु बोले, तुम कौन हो? तुमने मेरे लिए इतना किया है। सहसा यहाँ आकर तुमने मुझे कृष्ण की लीलाओं का अमृतपान कराया है।
राजा कहे,—आमि तोमार दासेर अनुदास ।भृत्येर भृत्य कर,——एइ मोर आश ॥
१८॥
राजा ने उत्तर दिया, हे प्रभु. मैं आपके दासों का परम आज्ञाकारी दास हूँ। मेरी अभिलाषा है कि आप मुझे अपने दासों के दास के रूप में स्वीकार करें।
तबे महाप्रभु ताँरे ऐश्वर्य देखाइल ।। ‘कारेह ना कहिबे' एइ निषेध करिल ॥
१९॥
उस समय श्री चैतन्य महाप्रभु ने राजा को अपना कुछ दैवी ऐश्वर्य दिखलाया और उन्हें मना किया कि वे इसे किसी से प्रकट न करे।
‘राजा'–हेन ज्ञान कभु ना कैल प्रकाश ।। अन्तरे सकल जानेन, बाहिरे उदास ॥
२०॥
यद्यपि जो कुछ घटित हो रहा था, उसे महाप्रभु मन ही मन जानते थे, किन्तु बाह्य रूप से उन्होंने उसे प्रकट नहीं किया। न ही उन्होंने यह प्रकट किया कि वे यह जान रहे थे कि वे राजा प्रतापरुद्र से बातें कर रहे थे।
प्रतापरुद्रेर भाग्य देखि भक्त-गणे । राजारे प्रशंसे सबे आनन्दित-मने ॥
२१॥
राजा प्रतापरुद्र पर महाप्रभु की विशेष कृपा देखकर सारे भक्तों ने । ना के भाग्य की प्रशंसा की और उन सबके मन आनन्दमग्न हो गये।
दण्डवत्करि' राजा बाहिरे चलिला ।। ग्रोड़ हस्त करि' सब भक्तेरे वन्दिला ॥
२२॥
राजा बड़े ही विनीत भाव से हाथ जोड़कर भक्तों को प्रणाम करके और श्री चैतन्य महाप्रभु को नमस्कार करके बाहर चले गये।
मध्याह्न करिला प्रभु लञा भक्त-गण ।। वाणीनाथ प्रसाद लञा कैल आगमन ॥
२३ ।।। इसके बाद वाणीनाथ राय सभी प्रकार के प्रसाद ले आया और श्री चैतन्य महाप्रभु ने भक्तों सहित भोजन किया।
सार्वभौम-रामानन्द-वाणीनाथे दिया ।प्रसाद पाठा'ल राजा बहुत करिया ॥
२४॥
राजा ने भी सार्वभौम भट्टाचार्य, रामानन्द राय तथा वाणीनाथ राय के हाथों पर्याप्त प्रसाद भेजा।
'बलगण्डि भोगेर प्रसाद–उत्तम, अनन्त ।‘नि-सकड़ि' प्रसाद आइल, यार नाहि अन्त ॥
२५॥
राजा द्वारा भेजा गया प्रसाद बलगंडि उत्सव में अर्पित किया गया था। इसमें दूध के बने कच्चे पदार्थ तथा फल थे। ये सभी उत्तम कोटि के थे और अनन्त किस्मों वाले थे।
छाना, पाना, पैड़, आम्र, नारिकेल, काँठाल ।नाना-विध कदलक, आर बीज-ताल ॥
२६ ॥
उसमें दही, फल का रस, नारियल, आम, सूखा नारियल, कटहल, तरह-तरह के केले तथा ताड़फल के बीज थे।
नारङ्ग, छोलङ्ग, टाबा, कमला, बीज-पूर।बादाम, छोहारा, द्राक्षा, पिण्ड-खर्जुर ॥
२७॥
उसमें नारंगियाँ, चकोतरे, कमला, बादाम, छोहारे, किशमिश तथा खजूरें थीं।
मनोहरा-लाड़ आदि शतेक प्रकार ।।अमृत-गुटिका-आदि, क्षीरसा अपार ॥
२८॥
उसमें मनोहर लड्ड इत्यादि सैंकड़ों प्रकार की मिठाइयाँ, अमृत गुटिका जैसी मिठाइयाँ तथा औंटे दूध की अनेक किस्में थीं।
अमृत-मण्डा, सरवती, आर कुम्ड़ा-कुरी ।।सरामृत, सरभाजा, आर सरपुरी ॥
२९॥
उसमें पपीते, शरबती नारंगी तथा सीताफल का गुदा थे। सरामृत ( क्रीम ), सरभाजा (तली क्रीम) तथा क्रीम की बनी पूड़ी ( सरपुरी) थीं।
हरि-वल्लभ, सेडोति, कर्पूर, मालती ।डालिमा मरिच-लाडु, नवात, अमृति ॥
३० ॥
हरिवल्लभ मिठाई तथा सेवंती, कपूर एवं मालती फूलों से बनी fuठाइयाँ भी थीं। उसमें अनार, काली मिर्च से बनी मिठाइयाँ, नवात ( चीनी को गलाकर बनाई गई मिठाई) तथा अमृति जिलिपि थीं।
पद्मचिनि, चन्द्रकान्त, खाजा, खण्डसार ।वियरि, कझा, तिलाखाजार प्रकार ॥
३१॥
उसमें कमलचीनी, बड़ा, खाजा, खण्डसारी, वियरि (तले चावल से बनी मिठाई), कद्मा (तिल से बनी मिठाई) तथा तिलखाजा (तिल से बनी मिठाई ) थे।
नारङ्ग-छोलङ्ग-आम्रवृक्षेर आकार ।।फुल-फल-पत्र-युक्त खण्डेर विकार ॥
३२॥
खण्डसारी से बनी नारंगी, नींबू तथा आम के वृक्ष के आकार की मिठाइयाँ, फल-फूल तथा पत्तियों से सजाई गई थीं।
दधि, दुग्ध, ननी, तक्र, रसाला, शिखरिणी ।स-लवण मुद्गाङ्कर, आदा खानि खानि ॥
३३॥
उसमें दही, दूध, मक्खन, छाछ, फलों का रस, शिखरिणी ( दही। तथा शक्कर से तलकर बनी) तथा कतरे अदरक से युक्त नमकीन मूंग की। दाल के अंकुर थे।
लेम्बु-कुल-आदि नाना-प्रकार आचार । लिखिते ना पारि प्रसाद कतेक प्रकार ॥
३४॥
उसमें कई प्रकार के अचार भी थे-यथा नींबू का अचार, बेर का अचार इत्यादि। मैं भगवान जगन्नाथजी को अर्पित किये जाने वाले पकवानों के प्रकारों का वर्णन करने में सक्षम नहीं हूँ।
प्रसादे पूरित हइल अर्ध उपवन ।। देखिया सन्तोष हैल महाप्रभुर मन ॥
३५ ॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने देखा कि नाना प्रकार के प्रसाद से आधा बगीचा भरा हुआ है, तो वे परम सन्तुष्ट हुए।
एइ-मत जगन्नाथ करेन भोजन ।। एइ सुखे महाप्रभुर जुड़ाय नयन ॥
३६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु यह देखकर पूर्णतया सन्तुष्ट थे कि भगवान् जगन्नाथ ने किस तरह सारा भोजन ग्रहण किया।
केया-पत्र-द्रोणी आइल बोझा पाँच-सात ।। एक एक जने दश दोना दिल,—एत पात ॥
३७॥
फिर केतकी वृक्ष की पत्तियों की बनी प्लेटों के पाँच-सात बोझ आये। प्रत्येक व्यक्ति को ऐसी दस दस प्लेटें दी गईं और इस तरह पत्तों की ये प्लेटें बाँटी गईं।
कीर्तनीयार परिश्रम जानि' गौरराय ।। ताँ-सबारे खाओयाइते प्रभुर मन धाय ॥
३८ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु सभी कीर्तनियों के परिश्रम को समझ रहे थे, 3अतएव वे उन्हें पेट भरकर खिलाना चाहते थे।
पाँति पाँति करि' भक्त-गणे वसाइला ।।परिवेशन करिबारे आपने लागिला ॥
३९॥
सारे भक्त पाँतों में बैठ गये और श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं प्रसाद का वितरण करने लगे।
प्रभु ना खाइले, केह ना करे भोजन ।स्वरूप-गोसाञि तबे कैल निवेदन ॥
४०॥
किन्तु भक्त तब तक प्रसाद ग्रहण नहीं कर रहे थे, जब तक स्वयं महाप्रभु प्रसाद ग्रहण न कर लें। स्वरूप गोस्वामी ने यह बात महाप्रभु को बताई।
आपने वैस, प्रभु, भोजन करिते ।।तुमि ना खाइले, केह ना पारे खाइते ॥
४१॥
स्वरूप दामोदर ने कहा, हे प्रभु, कृपया आप खाने के लिए बैठ जायें। जब तक आप नहीं खायेंगे, तब तक कोई भी नहीं खायेगा।
तबे महाप्रभु वैसे निज-गण ला ।। भोजन कराइल सबाके आकण्ठ पूरिया ॥
४२।।। तब श्री चैतन्य महाप्रभु अपने निजी संगियों समेत बैठ गये और उन सबको भरपेट भोजन कराया।
भोजन करि' वसिला प्रभु करि' आचमन ।। प्रसाद उबरिल, खाय सहस्त्रेक जन ॥
४३॥
भोजन करने के बाद महाप्रभु अपना मुँह धोकर बैठ गये। इतना अधिक प्रसाद बचा था कि उसे हजारों लोगों में वितरित कर दिया गया।
प्रभुर आज्ञाय गोविन्द दीन-हीन जने ।।दुःखी काङ्गाल आनि' कराय भोजने ॥
४४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश पर उनके निजी सेवक गोविन्द ने सारे दीन-भिखारियों को बुलाया, जो अपनी गरीबी से दुःखी थे और उन्हें भर-पेट भोजन कराया।
काङ्गालेर भोजन-रङ्ग देखे गौरहरि ।।‘हरि-बोल' बलि' तारे उपदेश करि ॥
४५ ॥
गरीबों को प्रसाद ग्रहण करते देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिबोल! का उच्चारण किया और उन्हें उपदेश दिया कि वे इस नाम का कीर्तन करें।
‘हरि-बोल' बलि' काङ्गाल प्रेमे भासि' ग्राय ।।ऐछन अद्भुत लीला करे गौरराय ॥
४६॥
ज्योंही भिखारियों ने हरिबोल का उच्चारण किया, वे सभी तुरन्त भगवत्प्रेम में निमग्न हो गये। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने अद्भुत लीलाएँ सम्पन्न कीं।
इहाँ जगन्नाथेर रथ-चलन-समय ।।गौड़ सब रथ टाने, आगे नाहि याय ॥
४७॥
जब जगन्नाथजी का रथ खींचने का समय हो गया, तो बगीचे के बाहर सारे कार्यकर्ता ( गौड़) उसे खींचने का प्रयास करने लगे, किन्तु रथ आगे नहीं बढ़ा।
टानिते ना पारे गौड़, रथ छाड़ि' दिल । पात्र-मित्र लञा राजा व्यग्र हा आइल ।।४८॥
जब गौड़ों ने देखा कि रथ टस से मस नहीं हो रहा, तो उन्होंने प्रयास करना छोड़ दिया। तभी अत्यन्त चिन्तित राजा वहाँ आये और उनके साथ अनके अधिकारी तथा मित्र थे।
महा-मल्ल-गणे दिल रथ चालाइते । आपने लागिला रथ, ना पारे टानिते ॥
४९॥
तब राजा ने रथ खींचने के लिए बड़े-बड़े पहलवानों को लगाया और साथ में राजा भी सम्मिलित हो गये किन्तु रथ हिलाये नहीं हिला।।
व्यग्र हञा आने राजा मत्त-हाती-गण।रथ चालाइते रथे करिल ग्रोजन ॥
५०॥
रथ को चलाने की और अधिक उत्सुकता में राजा ने अत्यन्त बलशाली हाथी मँगवाकर रथ में जोते।
मत्त-हस्ति-गण टाने यार व्रत बल ।।एक पद ना चले रथ, हइल अचल ॥
५१॥
बलशाली हाथियों ने रथ को पूरी शक्ति से खींचा, लेकिन इतने पर। भी रथ एक इंच भी नहीं हिला तथा अचल बना रहा।
शुनि' महाप्रभु आइला निज-गण लञा ।।मत्त-हस्ती रथ टाने, देखे दाण्डाजा ॥
५२॥
ज्योंही श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह खबर सुनी, वे अपने सारे निजी संगियों के साथ वहाँ गये। वे वहाँ खड़े होकर हाथियों द्वारा रथ खींचने का प्रयास देखने लगे।
अङ्कशेर घाय हस्ती करये चित्कार ।।रथ नाहि चले, लोके करे हाहाकार ॥
५३॥
सारे हाथी अंकुश से मारे जाने के कारण चिंघाड़ रहे थे, फिर भी रथ Iहिल- इल नहीं रहा था। वहाँ पर एकत्र सारे लोग हाहाकार करने लगे।
तबे महाप्रभु सब हस्ती घुचाइल ।निज-गणे रथ-काछि टानिबारे दिल ॥
५४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने सारे हाथियों को छोड़ दिया और रथ की ५ अपने संगियों के हाथों में थमा दीं।
आपने रथेर पाछे ठेले माथा दिया ।। हेडू हडू करि, रथ चलिल धाड्या ॥
५५॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं रथ के पिछले हिस्से में गये और अपने सिर से रथ को ठेलने लगे। तब वह रथ घर घर्र की आवाज करके चलने लगा।
भक्त-गण काछि हाते करि' मात्र धाय ।।आपने चलिल रथ, टानिते ना पाय ॥
५६॥
वास्तव में रथ स्वतः चलने लगा और भक्तगण अपने हाथों में मात्र रस्सियाँ थामे रहे। चूँकि रथ बिना प्रयास के चल रहा था, अतएव भक्तों को खींचने की आवश्यकता नहीं पड़ी।
आनन्दे करये लोक 'जय' 'जय'-ध्वनि ।।‘जय जगन्नाथ' बई आर नाहि शुनि ॥
५७॥
जब रथ आगे बढ़ने लगा, तो सभी लोग प्रसन्न होकर जय! जय! तथा भगवान जगन्नाथ की जय हो! बोलने लगे। इसके अतिरिक्त और कुछ भी सुनाई नहीं पड़ रहा था।
निमेषे त' गेल रथ गुण्डिचार द्वार ।।चैतन्य-प्रताप देखि' लोके चमत्कार ॥
५८॥
वह रथ क्षण-भर में गुण्डिचा मन्दिर के द्वार पहुँच गया। महाप्रभु की असाधारण शक्ति देखकर सारे लोग आश्चर्यचकित थे।
जय गौरचन्द्र', 'जय श्री कृष्ण-चैतन्य' ।एई-मत कोलाहल लोके धन्य धन्य ॥
५९॥
भीड़ ने जय गौरचन्द्र! जय श्रीकृष्ण चैतन्य! का तुमुल नाद किया। और लोग अद्भुत! अद्भुत! कहने लगे।
देखिया प्रतापरुद्र पात्र-मित्र-सड़े।।प्रभुर महिमा देखि' प्रेमे फुले अङ्गे ॥
६०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की महानता देखकर प्रतापरुद्र महाराज तथा उनके मंत्री एवं मित्रगण भावमय प्रेम से इतने अभिभूत हुए कि उन्हें रोमांच हो आया।
पाण्डु-विजय तबे करे सेवक-गणे ।।जगन्नाथ वसिला गिया निज-सिंहासने ॥
६१॥
तब जगन्नाथजी के सारे सेवकों ने उन्हें रथ से नीचे उतारा और भगवान् अपने सिंहासन पर बैठने चले गये।
सुभद्रा-बलराम निज-सिंहासने आइला ।।जगन्नाथेर स्नान-भोग हइते लागिला ॥
६२॥
सुभद्रा तथा बलराम भी अपने-अपने सिंहासन पर बैठ गये। इसके बाद जगन्नाथजी को स्नान कराया गया और अन्त में भोग लगाया गया।
आङ्गिनाते महाप्रभु लञा भक्त-गण ।। आनन्दे आरम्भ कैल नर्तन-कीर्तन ।। ६३ ।।। जब भगवान जगन्नाथ, भगवान् बलराम तथा सुभद्रा अपने-अपने महासनों पर बैठ गये, तो श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों के साथ मन्दिर के आँगन में बड़े ही हर्ष से संकीर्तन करने लगे और नाचने-गाने लगे।
आनन्दे महाप्रभुर प्रेम उथलिल ।। देखि' सब लोक प्रेम-सागरे भासिल ॥
६४॥
जय श्री चैतन्य महाप्रभु नाच-गा रहे थे, तो वे प्रेमाविष्ट हो गये और जिन लोगों ने उन्हें देखा, वे भी भगवत्प्रेम के सागर में डूब गये।
नृत्य करि' सन्ध्या-काले आरति देखिल । आइटोटा आसि' प्रभु विश्राम करिल ॥
६५॥
। गुण्डिचा मन्दिर के आँगन में अपना नृत्य समाप्त करके संध्या-समय महाप्रभु ने आरती उत्सव देखा। तत्पश्चात् वे आइटोटा नामक स्थान पर गये और वहाँ रात्रि में विश्राम किया।
अद्वैतादि भक्त-गण निमन्त्रण कैल ।।मुख्य मुख्य नव जन नव दिन पाइल ॥
६६॥
तभी अद्वैत आचार्य इत्यादि प्रमुख भक्तों ने नौ दिनों तक अपने-अपने घरों में महाप्रभु को आमन्त्रित करने का अवसर प्राप्त किया।
आर भक्त-गण चातुर्मास्ये ग्रत दिन ।एक एक दिन करि' करिल वण्टन ॥
६७॥
शेष भक्तों ने वर्षा के चार महीनों में महाप्रभु को एक एक दिन अपने यहाँ आमन्त्रित किया। इस तरह उन्होंने आमन्त्रणों का बँटवारा कर लिया।
चारि मासेर दिन मुख्य-भक्त बाँटि' निल ।।आर भक्त-गण अवसर ना पाइल ।। ६८॥
इस चार महीने की अवधि में प्रतिदिन का आमन्त्रण महत्त्वपूर्ण भक्तों ने आपस में बाँट लिया। शेष भक्तों को महाप्रभु को अपने यहाँ आमन्त्रित करने का अवसर ही नहीं मिल पाया।
एक दिन निमन्त्रण करे दुइ-तिने मिलि' ।एइ-मत महाप्रभुर निमन्त्रण-केलि ॥
६९॥
चूँकि उन्हें एक एक दिन नहीं मिला, अतएव दो या तीन भक्तों ने मिलकर आमन्त्रण दिया। ये लीलाएँ हैं महाप्रभु द्वारा आमन्त्रण स्वीकार होने की।
प्रातः-काले स्नान करि' देखि' जगन्नाथ ।।सङ्कीर्तने नृत्य करे भक्त-गण साथ ॥
७० ॥
प्रात:काल स्नान करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करने मन्दिर जाया करते थे। तब वे अपने भक्तों के साथ संकीर्तन करते थे।
कभु अद्वैते नाचाय, कभु नित्यानन्दे ।। कभु हरिदासे नाचाय, कभु अच्युतानन्दे ॥
७१ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कीर्तन तथा नृत्य के द्वारा कभी अद्वैत आचार्य को नाचने के लिए प्रेरित किया। तो कभी वे नित्यानन्द प्रभु, हरिदास ठाकुर तथा अच्युतानन्द को नाचने के लिए प्रेरित करते।
कभु वक्रेश्वरे, कभु आर भक्त-गणे । त्रिसन्ध्या कीर्तन करे गुण्डिचा-प्राङ्गणे ॥
७२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु कभी वक्रेश्वर को कीर्तन तथा नृत्य में लगा देते थे तो कभी अन्य भक्तों को। महाप्रभु गुण्डिचा मन्दिर के आँगन में नित्य तीन बार-प्रातः, दोपहर तथा शाम को-संकीर्तन करते थे।
वृन्दावने आइला कृष्ण–एइ प्रभुर ज्ञान ।कृष्णेर विरह-स्फूर्ति हैल अवसान ॥
७३॥
इस समय पर चैतन्य महाप्रभु को लगा कि कृष्ण वृन्दावन लौट चुके हैं। ऐसा सोचकर उनकी कृष्ण-विरह की अनुभूति शान्त हो गई।
राधा-सङ्गे कृष्ण-लीला--एइ हैल ज्ञाने ।एइ रसे मग्न प्रभु हइला आपने ॥
७४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु सदैव राधा तथा कृष्ण की लीलाओं का चिन्तन #ते रहते और वे इसी चेतना में निमग्न रहते।
नानोद्याने भक्त-सङ्गे वृन्दावन-लीला ।।'इन्द्रद्युम्न'-सरोवरे करे जल-खेला ॥
७५ ॥
गुण्डिचा मन्दिर के पास अनेक बगीचे थे और श्री चैतन्य महाप्रभु । तथा उनके भक्त इन सबमें वृन्दावन-लीलाएँ किया करते थे। इन्द्रद्युम्न नामक सरोवर में वे जल-क्रीड़ा करते थे।
आपने सकल भक्ते सिञ्चे जल दिया । सब भक्त-गण सिचे चौदिके बेड़िया ॥
७६॥
महाप्रभु स्वयं सारे भक्तों पर जल उछालते और सारे भक्त भी उन्हें । चारों ओर से घेरकर उन पर पानी उछालते।
कभु एक मण्डल, कभु अनेक मण्डल ।। जल-मण्डूक-वाद्ये सबे बाजाय करताल ॥
७७॥
जल में वे कभी एक वृत्त ( मण्डल ) बनाते और कभी अनेक वृत्त बनाते। वे जल के भीतर करताल बजाकर मेढ़कों की टर्राहट की नकल उतारते।
दुइ-दुइ जने मेलि' करे जल-रण ।। केह हारे, केह जिने—प्रभु करे दरशन ॥
७८॥
कभी दो भक्त जोड़ी बनाकर जल में लड़ते। इनमें से एक जीत जाता और दूसरा हार जाता। महाप्रभु यह सारा तमाशा देखते रहते।
अद्वैत-नित्यानन्दे जल-फेलाफेलि ।। आचार्य हारिया पाछे करे गालागालि ॥
७९ ॥
पहला खिलवाड़ अद्वैत आचार्य तथा नित्यानन्द प्रभु के बीच हुआ। में एक दूसरे पर पानी फेंकने लगे। अद्वैत आचार्य हार गये और बाद में नित्यानन्द को गालियाँ देने लगे।
विद्यानिधिर जल-केलि स्वरूपेर सने ।।गुप्त-दत्ते जल-केलि करे दुइ जने ॥
८०॥
स्वरूप दामोदर तथा विद्यानिधि भी एक-दूसरे पर पानी फेंकने लगे। मुरारि गुप्त तथा वासुदेव दत्त ने भी इसी तरह खिलवाड़ किया।
श्रीवास-सहित जल खेले गदाधर ।। राघव-पण्डित सने खेले वक्रेश्वर ॥
८१॥
श्रीवास ठाकुर तथा गदाधर पण्डित के बीच जलक्रीड़ा हुई तथा राघव पण्डित और वक्रेश्वर पण्डित के बीच भी ऐसी ही क्रीड़ा हुई। वे । एक-दूसरे पर जल फेंकने में व्यस्त हो गये।
सार्वभौम-सङ्गे खेले रामानन्द-राय ।। गाम्भीर्य गेल दोंहार, हैल शिशु-प्राय ॥
८२॥
सार्वभौम भट्टाचार्य श्रीरामानन्द राय के साथ जल-क्रीड़ा करने लगे। वे दोनों अपनी गम्भीरता त्यागकर बच्चों जैसे बन गये।
महाप्रभु ताँ दोंहार चाञ्चल्य देखियो । गोपीनाथाचार्ये किछु कहेन हासिया ॥
८३ ॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य तथा रामानन्द राय की चंचलता देखी, तो वे हँसने लगे और गोपीनाथ आचार्य से बोले।
पण्डित, गम्भीर, मुँहे—प्रामाणिक जन । बाल-चाञ्चल्य करे, कराह वर्जन ॥
८४॥
भट्टाचार्य तथा रामानन्द राय दोनों से कहो कि वे अपना बालकों नैमा खेल बन्द कर दें, क्योंकि दोनों अत्यन्त विद्वान, गम्भीर तथा महापुरुष हैं।
गोपीनाथ कहे,—तोमार कृपा-महासिन्धु ।उछलित करे ग्रबे तार एक बिन्दु ॥
८५ ॥
गोपीनाथ आचार्य ने उत्तर दिया, मुझे लगता है कि आपकी महान् कृपा रूपी सिंधु का एक बिन्दु उनके ऊपर उछलकर गिर पड़ा है।
मेरु-मन्दर-पर्वत डुबाय ग्रथा तथा।। एइ दुइ–गण्ड-शैल, इहार का कथा ॥
८६॥
आपके कृपा-सिन्धु की एक बूंद सुमेरु तथा मन्दर जैसे विशाल पर्वतों को डुबो सकती है। चूंकि ये दोनों महाशय लघु पर्वतों जैसे हैं, अतएव ये दोनों आपकी कृपा रूपी सिन्धु में डूबे जा रहे हैं।
शुष्क-तर्क-खलि खाइते जन्म गेल याँर।। ताँरै लीलामृत पियाओ,—ए कृपा तोमार ॥
८७॥
तर्क उस शुष्क खली के समान है, जिसमें से सारा तेल निचोर लिया गया हो। भट्टाचार्य का सारा जीवन ऐसी शुष्क खली को खाने में बीता, किन्तु अब आपने उन्हें दिव्य लीलाओं का अमृतपान कराया है। निश्चय ही यह आपकी उन पर महती कृपा है।
हासि' महाप्रभु तबे अद्वैते आनिल ।।जलेर उपरे तौरै शेष-शय्या कैल ॥
८८ ॥
गोपीनाथ आचार्य की बात सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु हँसने लगे और अद्वैत आचार्य को बुलाकर उन्हें शेष नाग की शय्या जैसा बनने को कहा।
आपने ताँहार उपर करिल शयन ।‘शेष-शायी-लीला' प्रभु कैल प्रकटन ॥
८९॥
जल में तैर रहे अद्वैत प्रभु के ऊपर लेटकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने शेषशायी विष्णु की लीला का प्रदर्शन किया।
अद्वैत निज-शक्ति प्रकट करिया ।। महाप्रभु ला बुले जलेते भासिया ॥
९०॥
अद्वैत आचार्य अपनी निजी शक्ति प्रकट करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु को लेकर जल के ऊपर तैरते रहे।
एइ-मत जल-क्रीड़ा करि' कत-क्षण । आइटोटा आइला प्रभु लञा भक्त-गण ॥
९१॥
कुछ काल तक जल-क्रीड़ा करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों के साथ आइटोटा नामक अपने स्थान पर लौट आये।
पुरी, भारती आदि ग्रत मुख्य भक्त-गण ।। आचार्येर निमन्त्रणे करिला भोजन ॥
९२॥
अद्वैत आचार्य द्वारा निमन्त्रित किये जाने पर परमानन्द पुरी, ब्रह्मानन्द भारती तथा महाप्रभु के अन्य प्रमुख भक्तों ने भोजन ग्रहण किया।
वाणीनाथ आर ग्रत प्रसाद आनिल ।। महाप्रभुर गणे सेइ प्रसाद खाइल ॥
९३॥
वाणीनाथ राय अपने साथ जो भी अधिक प्रसाद लाये थे, उसे महाप्रभु के अन्य संगियों ने खाया।
अपराह्ने आसि' कैल दर्शन, नर्तन । निशाते उद्याने आसि' करिला शयन ॥
९४॥
दोपहर के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु गुण्डिचा मन्दिर में भगवान् का दर्शन करने तथा नाचने के लिए गये। रात्रि में वे विश्राम करने के लिए बगीचे में गये।
आर दिन आसि' कैल ईश्वर दरशन ।।प्राङ्गणे नृत्य-गीत कैल कत-क्षण ॥
९५॥
अगले दिन श्री चैतन्य महाप्रभु गुण्डिचा मन्दिर भी गये और भगवान् का दर्शन किया। तब वे आँगन में कुछ समय तक गाते और नाचते रहे।
भक्त-गण-सङ्गे प्रभु उद्याने आसिया ।।वृन्दावन-विहार करे भक्त-गण ला ॥
९६ ॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों के साथ बगीचे में गये और वहाँ । उन्होंने वृन्दावन-लीला का आनन्द उठाया।
वृक्ष-वल्ली प्रफुल्लित प्रभुर दरशने । भृङ्ग-पिक गाय, वहे शीतल पवने ॥
९७॥
बगीचे में नाना प्रकार के वृक्ष तथा लताएँ थे और वे सभी श्री चैतन्य महाप्रभु को देखकर अत्यन्त प्रफुल्लित थे। पक्षी चहचहा रहे थे, भौंरे गुनगुना रहे थे और शीतल पवन बह रही थी।
प्रति-वृक्ष-तले प्रभु करेन नर्तन ।। वासुदेव-दत्त मात्र करेन गायन ॥
९८॥
चूंकि महाप्रभु हर वृक्ष के नीचे नाच रहे थे, इसलिए वासुदेव को अकेले गाना पड़ा।
एक एक वृक्ष-तले एक एक गान गाय । परम-आवेशे एका नाचे गौरराय ॥
१९॥
जब वासुदेव दत्त हर वृक्ष के नीचे पृथक्-पृथक् गाना गा रहे थे, तो श्री चैतन्य महाप्रभु बड़े ही भावावेश में अकेले नाच रहे थे।
तबे वक्रेश्वरे प्रभु कहिली नाचिते ।।वक्रेश्वर नाचे, प्रभु लागिला गाइते ॥
१००॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने वक्रेश्वर पण्डित को नाचने के लिए आदेश दिया और ज्योंही वे नाचने लगे, महाप्रभु गाने लगे।
प्रभु-सङ्गे स्वरूपादि कीर्तनीया गाय ।।दिक्विदिक्नाहि ज्ञान प्रेमेर वन्याय ॥
१०१॥
तब स्वरूप दामोदर तथा अन्य कीर्तनिये भी श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ-साथ गाने लगे। प्रेमविभोर होने के कारण उन्हें समय तथा परिस्थिति का ध्यान ही न रहा।
एइ मत कत-क्षण करि वन-लीला ।।नरेन्द्र-सरोवरे गेला करिते जल-खेला ॥
१०२॥
कुछ समय तक इस तरह उद्यान-लीला करने के बाद वे सभी नरेन्द्र सरोवर में स्नान करने गये और वहाँ जल-क्रीड़ा का आनन्द लूटा।
जल-क्रीड़ा करि' पुनः आइला उद्याने ।भोजन-लीला कैला प्रभु ला भक्त-गणे ॥
१०३ ॥
जल-क्रीड़ा करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु पुनः बगीचे में लौट आये और वहाँ भक्तों के साथ प्रसाद ग्रहण किया।
नव दिन गुण्डिचाते रहे जगन्नाथ ।।महाप्रभु ऐछे लीला करे भक्त-साथ ॥
१०४॥
भगवान् श्री जगन्नाथ देव नौ दिनों तक गुण्डिचा मन्दिर में निवासकरते रहे। इस बीच श्री चैतन्य महाप्रभु भी वहीं रुके रहे और अपने भक्तों के साथ लीलाएँ करते रहे, जिनका वर्णन किया जा चुका है।
‘जगन्नाथ-वल्लभ' नाम बड़ पुष्पाराम ।। नव दिन करेन प्रभु तथाइ विश्राम ॥
१०५॥
जहाँ महाप्रभु लीलाएँ कर रहे थे, वह बगीचा बहुत बड़ा था और जगन्नाथ वल्लभ कहलाता था। श्री चैतन्य महाप्रभु ने वहीं नौ दिनों तक विश्राम किया।
‘हेरा-पञ्चमी र दिन आइल जानिया । काशी-मिश्रे कहे राजा सयत्न करिया ॥
१०६॥
यह जानकर कि हेरापंचमी उत्सव आने वाला है, राजा प्रतापरुद्र ने काशी मिश्र से बड़ी सावधानी से बात की।
कल्य'हेरा-पञ्चमी' हबे लक्ष्मीर विजय । ऐछे उत्सव कर ग्रेन कभु नाहि हय ॥
१०७॥
कल हेरापंचमी या लक्ष्मीविजय उत्सव होगा। तुम इस उत्सव को इस | तरह से मनाओ, जैसाकि इसके पूर्व कभी न मनाया गया हो।
महोत्सव कर तैछे विशेष सम्भार ।। देखि' महाप्रभुर भैछे हय चमत्कार ॥
१०८॥
जो प्रतापरुद्र ने कहा, तुम इस उत्सव को इतने शानदार ढंग सेमनाओ कि इसे देखकर चैतन्य महाप्रभु पूरी तरह प्रसन्न और चकित हो जाएँ।
ठाकुरेर भाण्डारे आर आमार भाण्डारे ।। चित्र-वस्त्र-किङ्किणी, आर छत्र-चामरे ॥
१०९॥
मेरे भण्डार में तथा अर्चाविग्रह के भण्डार-घर में जितने भी छपे कपड़े, छोटी घंटियाँ, छत्र तथा चामर हों, इन सबको ले लो।
ध्वजावृन्द-पताका-घण्टाय करह मण्डन । नाना-वाद्य-नृत्य-दोलाय करह साजन ॥
११०॥
सभी तरह की छोटी बड़ी झंडियाँ तथा झंडे और घण्टे एकत्र करो। तब वाहन ( दोला ) सजाओ और विभिन्न संगीत तथा नृत्य मंडलियों को उसके साथ कर दो। इस तरह वाहन को आकर्षक ढंग से सजाओ।
द्विगुण करिया कर सब उपहार । रथ-यात्रा हैते ग्रैछे हय चमत्कार ॥
१११॥
प्रसाद की मात्रा को भी दुगुना कर दो। प्रसाद इतनी मात्रा में बने कि रथयात्रा उत्सव को भी मात दे दे।
सेइत' करिह, प्रभु लञा भक्त-गण ।। स्वच्छन्दे आसिया ग्रैछे करेन दरशन ॥
११२॥
उत्सव की व्यवस्था ऐसी हो कि श्री चैतन्य महाप्रभु अपने भक्तों समेत स्वच्छन्दपूर्वक बिना किसी कठिनाई के अर्चाविग्रह का दर्शन करने जा सकें।
प्रातःकाले महाप्रभु निज-गण लञा ।। जगन्नाथ दर्शन कैल सुन्दराचले याञा ॥
११३॥
प्रात:काल श्री चैतन्य महाप्रभु अपने निजी संगियों को साथ लेकर भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करने सुन्दराचल गये।।
नीलाचले आइला पुनः भक्त-गण-सङ्गे।।देखिते उत्कण्ठा हेरा-पञ्चमीर रङ्गे ॥
११४॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके निजी संगी हेरापंचमी उत्सव देखने के लिए बड़ी ही उत्सुकता के साथ नीलाचल लौट आये।
काशी-मिश्र प्रभुरे बहु आदर करिया ।स्वगण-सह भाल-स्थाने वसाइल लञा ॥
११५॥
काशी मिश्र ने बड़े ही आदर के साथ चैतन्य महाप्रभु का स्वागत किया और महाप्रभु तथा उनके संगियों को एक बहुत अच्छे स्थान में ले जाकर बिठाया।
रस-विशेष प्रभुर शुनिते मन हैल ।। ईषत् हासिया प्रभु स्वरूपे पुछिल ।। ११६ बैठने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु की इच्छा एक विशेष भक्ति-रस के बारे में सुनने को हुई, अतः वे मन्द हँसते हुए स्वरूप दामोदर से पूछने लगे।
यद्यपि जगन्नाथ करेन द्वारकाय विहार । सहज प्रकट करे परम उदार ।। ११७ ।।। तथापि वत्सर-मध्ये हय एक-बार ।। वृन्दावन देखिने तर उत्कण्ठा अपार ।। ११८ ॥
यद्यपि जगन्नाथ भगवान् द्वारका धाम में अपनी लीलाएँ करते हैं। औ। हां परम उदारता प्रकट करते हैं, फिर भी वर्ष में एक बार वे वृन्दावन देखने के लिए अत्यधिक उत्कण्ठित हो उठते हैं।
वृन्दावन-सम एइ उपवन-गण ।। ताहा देखिबारे उत्कण्ठित हय मन ॥
११९॥
पड़ोस के बगीचों की ओर लक्ष्य करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, ये सारे बगीचे वृन्दावन जैसे ही हैं, अतएव जगन्नाथजी इन्हें फिर से देखने के लिए अत्यधिक उत्सुक हैं।
बाहिर हुइते करे रथ-यात्रा-छल ।। सुन्दराचले ग्राय प्रभु छाड़ि' नीलाचल ॥
१२०॥
बाहर से वे यह दिखावा करते हैं कि वे रथयात्रा में भाग लेना चाहते हैं, लेकिन वास्तव में वे वृन्दावन की प्रतिमूर्ति गुण्डिचा मन्दिर अर्थात् । सुन्दराचल जाने के लिए जगन्नाथ पुरी छोड़ना चाहते हैं।
नाना-पुष्पोद्याने तथा खेले रात्रि-दिने । लक्ष्मीदेवीरे सङ्गे नाहि लय कि कारणे? ॥
१२१।। भगवान् रात-दिन फूलों के विभिन्न बगीचों में लीलाओं का आनन्द लेते हैं। लेकिन वे अपने साथ लक्ष्मीदेवी को क्यों नहीं ले जाते ? स्वरूप कहे,- शुन, प्रभु, कारण इहार ।। वृन्दावन-क्रीड़ाते लक्ष्मीर नाहि अधिकार ॥
१२२ ॥
स्वरूप दामोदर ने उत्तर दिया, हे प्रभु, कृपया इसका कारण सुनें। मीदेवी को वृन्दावन लीलाओं में प्रवेश नहीं कराया जा सकता।
वृन्दावन-लीलाय कृष्णेर सहाय गोपीगण ।। गोपी-गण विना कृष्णेर हरिते नारे मन ।। १२३ ।। दावन लीलाओं में एकमात्र सहायिकाएँ गोपियाँ ही हैं। गोपियों है तरिक्त अन्य कोई कृष्ण का मन आकृष्ट नहीं कर सकता।
प्रभु कहे,--यात्रा-छले कृष्णेर गमन ।सुभद्रा आर बलदेव, सङ्गे दुइ जन ॥
१२४॥
महाप्रभु ने कहा, कृष्ण वहाँ रथयात्रा के बहाने सुभद्रा तथा बलदेव के साथ जाते हैं।
गोपी-सङ्गे ग्रत लीला हय उपवने ।।निगूढ़ कृष्णेर भाव केह नाहि जाने ॥
१२५।। उन बगीचों में गोपियों के साथ की सारी लीलाएँ भगवान् कृष्ण के अत्यन्त गुह्य भाव हैं। उन्हें कोई नहीं जानता।
अतएव कृष्णेर प्राकट्ये नाहि किछु दोष ।।तबे केने लक्ष्मीदेवी करे एत रोष? ॥
१२६॥
चूंकि कृष्ण की लीलाओं में कोई दोष नहीं है, तो फिर लक्ष्मीजी श्यों रुष्ट होती हैं? स्वरूप कहे,--प्रेमवतीर एइ त स्वभाव ।। कान्तेर औदास्य-लेशे हय क्रोध-भाव ॥
१२७।। स्वरूप दामोदर ने उत्तर दिया, प्रेम-पीड़ित युवती का स्वभाव है कि वह अपने प्रेमी से उपेक्षित होने पर तुरन्त क्रुद्ध हो जाती है।
हेन-काले, खचित ग्राहे विविध रतन । सुवर्णेर चौदोला करि' आरोहण ॥
१२८॥
जय स्वरूप दामोदर तथा श्री चैतन्य महाप्रभु इस प्रकार बातें कर रहे थे, तो लक्ष्मीजी का जुलूस निकट आ गया। वे सोने की पालकी में सवार थी, जिसे चार आदमी ले जा रहे थे और पालकी तरह-तरह के रत्नों से भी हुई थी।
छत्र-चामर-ध्वजा पताकार गण ।। नाना-वाद्य-आगे नाचे देव-दासी-गण ।। १२९॥
पालकी के चारों ओर लोग छत्र, चामर तथा झंडे-झंडियाँ लिए हुए थे और इनके आगे-आगे गवैये तथा नर्तकियाँ थीं।
ताम्बूल-सम्पुट, झारि, व्यजन, चामर ।। साथे दासी शत, हार दिव्य भूषाम्बर ।। १३०॥
दासियाँ जल के घड़े, चामर तथा पान की पिटारियाँ लिए थीं। ऐसी । सैंकड़ों दासियाँ थीं और वे सभी आकर्षक वस्त्र धारण किये थीं और बहुमूल्य हार पहने थीं।
अलौकिक ऐश्वर्य सड़े बहु-परिवार ।।क्रुद्ध हा लक्ष्मीदेवी आइला सिंह-द्वार ॥
१३१॥
लक्ष्मीजी क्रुद्ध मुद्रा में मन्दिर के मुख्य द्वार पर आ पहुँचीं। उनके साथ उनके परिवार के अनेक सदस्य थे और वे सभी असाधारण ऐश्वर्य का प्रदर्शन कर रहे थे।
जगन्नाथेर मुख्य मुख्य व्रत भृत्य-गणे ।। लक्ष्मीदेवीर दासी-गण करेन बन्धने ॥
१३२॥
जब जुलूस आ गया, तो लक्ष्मीजी की सारी दासियाँ भगवान जगन्नाथ के सारे प्रधान सेवकों को बन्दी बनाने लगीं।
बान्धिया आनिया पाड़े लक्ष्मीर चरणे ।।चोरे ग्रेन दण्ड करि' लय नाना-धने ॥
१३३ ॥
दासियों ने जगन्नाथजी के सेवकों को बाँधकर उन्हें हथकड़ियाँ लगा मी और उन्हें लाकर लक्ष्मीजी के चरणकमलों पर गिरने के लिए बाध्य किया। वे सभी धन लूटने वाले चोरों की तरह बन्दी बना लिए गये।
अचेतनवत्तारे करेन ताड़ने ।नाना-मत गालि देन भण्ड-वचने ॥
१३४॥
जब नौकर लक्ष्मी के चरणकमलों पर गिरे, तो वे लगभग अचेत हो गये। उन्हें डाँटा-डपटा गया और भद्दी-भद्दी गालियाँ दी गईं तथा मजाक के पात्र बनाये गये।
लक्ष्मी-सङ्गे दासी-गणेर प्रागल्भ्य देखिया ।हासे महाप्रभुर गण मुखे हस्त दिया ॥
१३५॥
जब महाप्रभु के संगियों ने लक्ष्मीजी की दासियों की ऐसी धृष्टता देखी, तो उन्होंने अपने हाथों से अपना मुख ढक लिया और वे हँसने लगे।
दामोदर कहे,—ऐछे मानेर प्रकार ।।त्रिजगते काहाँ नाहि देखि शुनि आर ॥
१३६॥
स्वरूप दामोदर ने कहा, तीनों लोकों में इस तरह का अहंकार नहीं है। कम-से-कम मैंने न तो देखा है, न सुना है।
मानिनी निरुत्साहे छाड़े विभूषण ।।भूमे वसि' नखे लेखे, मलिन-वदन ॥
१३७॥
जब कोई स्त्री उपेक्षित और निराश हो जाती है, तो अहंकार (मान) मश वह अपने आभूषण उतारकर खिन्न होकर फर्श पर बैठ जाती है और अपने नाखूनों से फर्श पर रेखाएँ खींचती है।
पूर्वे सत्यभामार शुनि एवं-विध मान ।। व्रजे गोपी-गणेर मान—रसेर निधान ॥
१३८॥
मैंने इस प्रकार का गर्व (मान) कृष्ण की सबसे गर्वीली महारानी सत्यभामा में सुना है। मैंने समस्त दिव्य रसों की खान समान वृन्दावन की गोपियों में भी ऐसा मान सुना है।
इँहो निज-सम्पत्ति सब प्रकट करिया। प्रियेर उपर ग्राय सैन्य साजाजा ॥
१३९॥
किन्तु लक्ष्मीजी के किस्से में मैं अन्य प्रकार का मान देख रहा हूँ। वे अपना ऐश्वर्य प्रदर्शित करती हैं, यहाँ तक कि अपने पति पर आक्रमण करने के लिए अपने सैनिकों के साथ जाती हैं।
प्रभु कहे,—कह व्रजेर मानेर प्रकार ।। स्वरूप कहे,—गोपी-मान-नदी शत-धार ॥
१४०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, कृपया वृन्दावन में प्रकट होने वाले समस्त प्रकार के मानों का वर्णन कीजिये। स्वरूप दामोदर ने उत्तर दिया, गोपियों का मान सैंकड़ों धाराओं के साथ बहने वाली नदी के समान है।
नायिकार स्वभाव, प्रेम-वृत्ते बहु भेद ।। सेइ भेदे नाना-प्रकार मानेर उद्धेद ॥
१४१॥
विभिन्न स्त्रियों ( नायिकाओं) में प्रेम के गुण तथा स्वभाव भिन्न flv, होते हैं। उनके ईष्र्यायुक्त क्रोध के भी अनेक भेद तथा गुण होते हैं।
सम्यगोपिकार मान ना याय कथन ।। एक-दुइ-भेदे करि दिग्दरशन ॥
१४२॥
गोपियों द्वारा प्रदर्शित विविध प्रकार के ईष्र्यायुक्त क्रोध का पूरा वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है, किन्तु कुछ सिद्धान्तों से संकेत मिल जायेगा।
माने केह हय धीरा', केह त' 'अधीरा' । एइ तिन-भेदे, केह हय धीराधीरा' ॥
१४३॥
द्वेषपूर्ण क्रोध से युक्त नायिकाओं के तीन भेद हैं-धीर, अधीर तथा धीराधीरा।
धीरा' कान्ते दूरे देखि' करे प्रत्युत्थान ।।निकटे आसिले, करे आसन प्रदान ॥
१४४॥
जब धीर नायिका दूर से ही अपने नायक को आते देख लेती है, तो उसके स्वागत के लिए वह तुरन्त उठ खड़ी होती है। जब वह निकट आ जाता है, तो वह तुरन्त उसे बैठने के लिए आसन देती है।
हृदये कोप, मुखे कहे मधुर वचन । प्रिय आलिङ्गिते, तारे करे आलिङ्गन ।। १४५ ॥
धीरा नायिका अपने क्रोध को अपने हृदय में छिपा लेती है और बाहर से मीठी बोली बोलती है। जब उसका प्रेमी उसको आलिंगन करता है, तो वह भी उसे आलिंगन करती है।
सरल व्यवहार, करे मानेर पोषण ।। किम्वा सोल्लुण्ठ-वाक्ये करे प्रिय-निरसन ।। १४६ ।। धीरा नायिका का व्यवहार अत्यन्त सरल होता है। वह अपने मान को अपने हृदय के भीतर रखती है, किन्तु मृदु वचनों तथा मुसकानों से वह अपने प्रेमी के आचरण का प्रतिवाद करती है।
‘अधीरा' निष्ठर-वाक्ये करये भर्सन ।।कर्णोत्पले ताड़े, करे मालाय बन्धन ॥
१४७॥
किन्तु अधीर नायिका कभी-कभी अपने प्रेमी की भर्त्सना कड़ शब्दों से करती है, कभी-कभी उसके कान खींच लेती है और कभीकभी फूल की माला से उसे बाँध देती है।
'धीराधीरा' वक्र-वाक्ये करे उपहास ।कभु स्तुति, कभु निन्दा, कभु वा उदास ॥
१४८ ॥
धीर तथा अधीर स्वभाव वाली नायिका सदैव द्विअर्थी शब्दों : मजाक उड़ाती है। कभी वह अपने प्रेमी की प्रशंसा करती है, कभी निन्। करती है और कभी निरपेक्ष रहती है।
‘मुग्धा', 'मध्या', 'प्रगल्भा',—तिन नायिकार भेद ।। 'मुग्धा' नाहि जाने मानेर वैदग्ध्य-विभेद ॥
१४९॥
नायिकाओं का वर्गीकरण मुग्धा, मध्या तथा प्रगल्भा के रूप में भी या जा सकता है। मुग्धा नायिका द्वेषपूर्ण क्रोध के छलपूर्ण व्यवहार बारीकियों के विषय में अधिक नहीं जानती रहती।
मुख आच्छादिया करे केवल रोदन । कान्तेर प्रिय-वाक्य शुनि' हय परसन्न ॥
१५०॥
मुग्धा नायिका केवल अपना मुँह ढककर रोती रहती है। जब वह अपने प्रेमी से मधुर शब्द सुनती है, तो अत्यन्त प्रसन्न हो उठती है।
‘मध्या' ‘प्रगल्भा' धरे धीरादि-विभेद ।। तार मध्ये सबार स्वभावे तिन भेद ॥
१५१॥
मध्या तथा प्रगल्भा नायिकाओं को धीर, अधीर तथा धीराधीर में विभाजित की जा सकती हैं। इन सबके गुणों के और तीन विभाग किये जा सकते हैं।
केह'प्रखरा', केह'मृद्', केह हय 'समा' ।। स्व-स्वभावे कृष्णेर बाड़ाय प्रेम-सीमा ॥
१५२॥
इनमें से कुछ अत्यधिक बातूनी, कुछ मृदु तथा कुछ संतुलित होती हैं। हर नायिका अपने स्वभाव के अनुसार श्रीकृष्ण के प्रेमभाव को बढ़ाती प्राखर्य, मार्दव, साम्य स्वभाव निर्दोष ।सेइ सेइ स्वभावे कृष्णे कराय सन्तोष ॥
१५३॥
यद्यपि कुछ गोपियाँ बातूनी, कुछ मृदु तथा कुछ संतुलित हैं, किन्तु वे सभी दिव्य तथा निर्दोष हैं। वे अपने विशिष्ट गुणों द्वारा कृष्ण को प्रसन्न करती हैं।
ए-कथा शुनिया प्रभुर आनन्द अपार ।। ‘कह, कह, दामोदर',--बले बार बार ॥
१५४॥
यह विवरण सुनकर महाप्रभु को असीम आनन्द का अनुभव हुआ। उन्होंने स्वरूप दामोदर से आगे कहते रहने के लिए बारम्बार प्रार्थना की।
दामोदर कहे,—कृष्ण रसिक-शेखर । रस-आस्वादक, रसमय-कलेवर ॥
१५५ ॥
दामोदर गोस्वामी ने कहा, कृष्ण समस्त दिव्य रसों के स्वामी हैं। वे सभी दिव्य रसों का आस्वादन करने वाले हैं और उनका शरीर दिव्य आनन्द से बना हुआ है।
प्रेममय-वपु कृष्ण भक्त-प्रेमाधीन ।।शुद्ध-प्रेमे, रस-गुणे, गोपिका—प्रवीण ॥
१५६॥
कृष्ण प्रेममय हैं और सदैव अपने भक्त के प्रेम के अधीन रहते हैं। गोपियाँ शुद्ध प्रेम में तथा दिव्य रसों के आचार-व्यवहार में अत्यन्त अनुभवी हैं।
गोपिकार प्रेमे नाहि रसाभास-दोष ।।अतएव कृष्णेर करे परम सन्तोष ॥
१५७॥
गोपियों के प्रेम में कोई दोष या मिलावट नहीं है, अतएव वे कृष्ण को परम सन्तोष प्रदान करती हैं।
एवं शशङ्कांशु-विराजिता निशाःस सत्य-कामोऽनुरताबला-गणः । सिषेव आत्मन्यवरुद्ध-सौरतः।सर्वाः शरत्काव्य-कथा-रसाश्रयाः ॥
१५८ ॥
परम सत्य भगवान् श्रीकृष्ण शरद ऋतु में प्रत्येक रात रासनृत्य का आनन्द लेते रहे। वे चाँदनी रात में पूर्ण दिव्य रस से युक्त होकर यह नृत्य करते रहे। वे कवित्वपूर्ण शब्दों का प्रयोग करते थे और उन स्त्रियों से घिरे रहते थे, जो उनके प्रति अत्यन्त आकृष्ट थीं।
‘वामा' एक गोपी-गण, ‘दक्षिणा' एक गण ।।नाना-भावे कराय कृष्णे रस आस्वादन ॥
१५९ ।। गोपियों दो वर्ग किये जा सकते हैं-वामा (वामपक्षी ) तथा दक्षिणा ( दक्षिणपक्षी )। दोनों ही वर्ग की गोपियाँ विभिन्न प्रकार के प्रेमभाव प्रकट करके कृष्ण को दिव्य रसों का आस्वादन कराती हैं।
गोपी-गण-मध्ये श्रेष्ठा राधा-ठाकुराणी ।। निर्मल-उज्ज्वल-रस-प्रेम-रत्न-खनि ॥
१६०॥
समस्त गोपियों में श्रीमती राधारानी प्रमुख हैं। वे प्रेमरूपी रत्न की खान हैं और समस्त शुद्ध दिव्य माधुर्य रस की स्रोत हैं।
वयसे 'मध्यमा' तेंहो स्वभावेते 'समा' ।।गाढ़ प्रेम-भावे तेंहो निरन्तर 'वामा' ॥
१६१॥
राधारानी वयस्क हैं और उनका चरित्र ( स्वभाव) समदर्शी है। वे सदैव प्रगाढ़ प्रेम में निमग्न रहती हैं और निरन्तर वामपक्षी गोपीयों के भाव का अनुभव करती रहती हैं।
वाम्य-स्वभावे मान उठे निरन्तर ।।तार मध्ये उठे कृष्णेर आनन्द-सागर ॥
१६२॥
वामा गोपी होने के कारण उनका स्त्रियोचित क्रोध सदैव जाग्रत होता रहता है, किन्तु कृष्ण को उनके कार्यकलापों से दिव्य आनन्द मिलता हैं।
अहेरिव गतिः प्रेम्णः स्वभाव-कुटिला भवेत् ।अतो हेतोरहेतोश्च यूनोर्मान उदञ्चति ॥
१६३ ॥
तरुण-तरुणी के बीच प्रेम की प्रगति स्वभाव से साँप की गति समान कुटिल होती है। इसलिए उनके बीच दो प्रकार का क्रोध उत् होता है-सकारण क्रोध तथा अकारण क्रोध।
एत शुनि' बाड़े प्रभुर आनन्द-सागर । 'कह, कह' कहे प्रभु, बले दामोदर ॥
१६४॥
इन बातों को सुनकर महाप्रभु के दिव्य आनन्द का सागर बढ़ने लगा। अतएव उन्होंने स्वरूप दामोदर से कहा, कहते चलो, कहते चलो। तथा स्वरूप दामोदर आगे कहते रहे।
अधिरूढ़ महाभाव'–राधिकार प्रेम ।। विशुद्ध, निर्मल, त्रैछे दश-वाण हेम ।। १६५ ।। श्रीमती राधारानी का प्रेम अत्यधिक उन्नत भाव ( अधिरूढ़ भाय ) है। उनके सारे व्यापार नितान्त शुद्ध तथा भौतिक कल्मष से त हैं। वस्तुत: उनके व्यापार सोने से भी दस गुना अधिक शुद्ध हैं।
कृष्णेर दर्शन यदि पाय आचम्बिते । नाना-भाव-विभूषणे हेय विभूषिते ॥
१६६॥
जैसे ही राधारानी को कृष्ण का दर्शन करने का अवसर प्राप्त होता है, सहसा उनका शरीर विविध भावरूपी आभूषणों से अलंकृत हो जाता है ।
अष्ट सात्त्विक', हर्षादि व्यभिचारी' याँर ।। ‘सहज प्रेम', विंशति 'भाव'-अलङ्कार ॥
१६७॥
श्रीमती राधारानी के शरीर के दिव्य आभूषणों में आठ सात्त्विक या । दिव्य भाव, हर्ष या आनन्दमय सहज प्रेम इत्यादि तैंतीस व्यभिचारी भाव तथा बीस भाव-अलंकार सम्मिलित हैं।
‘किल-किञ्चित', 'कुट्टमित', 'विलास', 'ललित' ।। ‘विव्वोक', 'मोट्टायित', आर ‘मौग्ध्य', 'चकित' ॥
१६८॥
जिन कतिपय लक्षणों की विवेचना निम्नलिखित श्लोकों में की गई है वे हैं-किलकिंचित, कुट्टमित, विलास, ललित, विव्वोक, मोट्टायित, भीग्थ्य तथा चकित।
एत भाव-भूषाय भूषित श्री-राधार अङ्ग । देख़िते उथले कृष्ण-सुखाब्धि-तरङ्ग ॥
१६९।।। जब श्रीमती राधारानी इन अनेक भाव-आभूषणों को प्रकट करती हैं, तो कृष्ण के सुख-समुद्र में तुरन्त दिव्य लहरें उठने लगती हैं।
किल-किञ्चितादि-भावेर शुन विवरण ।।ये भाव-भूषाय राधा हरे कृष्ण-मन ॥
१७० ॥
अब किलकिंचित इत्यादि विभिन्न भावों का विवरण सुनें। श्रीमती राधारानी इन भावरूपी आभूषणों से कृष्ण के मन को हर लेती हैं।
राधा देखि' कृष्ण यदि छुडिते करे मन ।।दान-घाटि-पथे ग्रबे वर्जन गमन ॥
१७१ ॥
जब श्रीकृष्ण श्रीमती राधारानी को देखते हैं और उनका मन श्रीमती राधारानी के शरीर का स्पर्श करने को करता है, तो वे उन्हें उस स्थान पर जाने से रोक देते हैं जहाँ से यमुना नदी को पार की जा सकती है।
ग्रबे आसि' माना करे पुष्प उठाइते ।।सखी-आगे चाहे यदि गाये हात दिते ॥
१७२॥
राधारानी के पास जाकर कृष्ण उन्हें फूल चुनने से मना करते हैं। में उनकी सखियों के सामने भी उनका स्पर्श कर सकते हैं।
एइ-सब स्थाने 'किल-किञ्चित' उद्गम ।।प्रथमे ‘हर्ष' सञ्चारी- मूल कारण ॥
१७३॥
ऐसे अवसरों पर किलकिंचित भाव के लक्षण जाग्रत होते हैं। सर्वप्रथम भावप्रेम में हर्ष का संचार होता है और यही इन लक्षणों का भय कारण है।
गर्वाभिलाष-रुदित-स्मितासूया-भय-क्रुधाम् । सङ्करी-करणं हर्षादुच्यते किल-किञ्चितम् ॥
१७४॥
गर्व, अभिलाषा, रुदन, हँसी, ईष्र्या, भय तथा क्रोध-ये सात प्रेमभाव-लक्षण हैं, जो हर्ष के कारण सिकुड़कर दूर हटने के फलस्वरूप प्रकट होते हैं। ये लक्षण किलकिंचित भाव कहलाते हैं।
आर सात भाव आसि' सहजे मिलय । अष्ट-भाव-सम्मिलने ‘महा-भाव' हय ॥
१७५॥
सात दिव्य भाव और हैं और जब वे हर्ष के स्तर पर मिलते हैं, तो उनका मेल ( मिलाप ) महाभाव कहलाता है।
गर्व, अभिलाष, भय, शुष्क-रुदित ।। क्रोध, असूया हय, आर मन्द-स्मित ॥
१७६॥
महाभाव में सात अवयव मिले होते हैं-गर्व, अभिलाषा, भय, बनावटी रोदन, क्रोध, ईष्र्या तथा मृदु मुस्कान।
नाना-स्वादु अष्ट-भाव एकत्र मिलन ।। याहार आस्वादे तृप्त हय कृष्ण-मन ॥
१७७॥
दिव्य हर्ष के स्तर पर प्रेमभाव के आठ लक्षण हैं और जब वे मिलते हैं, तो उनका आस्वादन करके भगवान् कृष्ण का मन पूर्णतः तृप्त हो जाता है।
दधि, खण्ड, घृत, मधु, मरीच, कर्पूर ।।एलाचि-मिलने झैछे रसाला मधुर ॥
१७८॥
उनकी उपमा दही, खाँड, घी, शहद, काली मिर्च, कपूर तथा इलायची के मिश्रण से दी जाती है। इन्हें मिला देने पर वे अत्यन्त स्वादिष्ट और मधुर हो जाते हैं।
एइ भाव-मुक्त देखि' राधास्य-नयन ।।सङ्गम हइते सुख पाय कोटि-गुण ॥
१७९॥
भगवान् श्रीकृष्ण भावमय प्रेम के इस मिश्रण से प्रकाशित श्रीमती राधारानी के मुखमण्डल को देखकर उनसे प्रत्यक्ष मिलन की अपेक्षा करोड़ों गुना अधिक सन्तुष्ट होते हैं।
अन्तः स्मेरतयोज्वला जल-कण-व्याकीर्ण-पक्ष्माङ्करा ।किञ्चित्पाटलिताञ्चला रसिकतोत्सिता पुरः कुञ्चती । रुद्धायाः पथि माधवेन मधुर-व्याभुग्न-तोरोत्तरा।राधायाः किल-किञ्चित-स्तवकिनी दृष्टिः श्रियं वः क्रियात् ॥
१८०॥
श्रीमती राधारानी का किलकिंचित भाव, जो गुलदस्ते के समान है, सबको सौभाग्य प्रदान करे। जब श्रीकृष्ण ने राधारानी का दानघाटि का रास्ता रोक दिया, तो उनके हृदय में हँसी उत्पन्न हुई। उनकी आँखें अमक उठीं और उनकी आँखों से नये आँसू बहने लगे, जिससे वे लाललाल हो गईं। कृष्ण से उनके मधुर सम्बन्ध के कारण उनकी आँखें ताहयुक्त थीं और जब उनका रोना रुक गया, तो वे और अधिक सुन्दर नग लगीं।'
बाष्प व्याकुलतारुणाञ्चल-चलन्नेत्रं रसोल्लासितं ।हेलोल्लास चलाधरं कुटिलित-भ्रू-युग्ममुद्यस्मितम् ।।राधायाः किल-किञ्चिताञ्चितमसौ वीक्ष्याननं सङ्गमाद् ।आनन्दं तमवाप कोटि-गुणितं ग्रोऽभून्न गीर्गोचरः ॥
१८१।। ‘आँसुओं से व्याकुल श्रीमती राधारानी की आँखें लाल-लाल हो गईं, मानो सूर्योदय के समय पूर्वी क्षितिज हो। उनके होंठ हर्ष तथा कामवासना के मारे कांपने लगे। उनकी भौंहे टेढ़ी हो गई और उनके कमल जैसे मुखमण्डल में हल्की-सी मुस्कान आ गई। राधारानी के मुखमण्डल से ऐसे भाव प्रकट होते देखकर श्रीकृष्ण को उनका आलिंगन करने की अपेक्षा लाखों गुना अधिक सुख प्राप्त हुआ। भगवान् कृष्ण का यह सुख तनिक भी भौतिक नहीं है। एत शुनि' प्रभु हैला आनन्दित मन ।। सुखाविष्ट ही स्वरूपे कैला आलिङ्गन ॥
१८२।। यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त आनन्दित हुए और इस सुख में मग्न होकर उन्होंने स्वरूप दामोदर गोस्वामी का आलिंगन कर लिया।
‘विलासादि-भाव-भूषार कह त' लक्षण ।।ग्रेइ भावे राधा हरे गोविन्देर मन? ॥
१८३॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वरूप दामोदर से कहा, कृपा करके भीमती राधारानी के शरीर को अलंकृत करने वाले उन भावरूपी आभूषणों को बतलाइये, जिनसे वे श्री गोविन्द के मन को हर लेती हैं।
तबे त' स्वरूप-गोसात्रि कहिते लागिला ।।शुनि' प्रभुर भक्त-गण महा-सुख पाइला ॥
१८४॥
म तरह अनुरोध किये जाने पर स्वरूप दामोदर ने कहना प्रारम्भ गा। इसे सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्त अत्यन्त प्रसन्न थे।
राधा वसि' आछे, किबा वृन्दावने ग्राय ।।ताहाँ यदि आचम्बिते कृष्ण-दरशन पाय ॥
१८५॥
कभी-कभी जब श्रीमती राधारानी बैठी रहती हैं या जब वे वृन्दावन जा रही होती हैं, तो वे कृष्ण का दर्शन पा जाती हैं।
देखिते नाना-भाव हय विलक्षण ।।से वैलक्षण्येर नाम विलास'-भूषण ॥
१८६॥
उस समय विभिन्न भावों के जो-जो लक्षण प्रकट होते हैं, वे विलास कहलाते हैं।
गति-स्थानासनादीनां मुख-नेत्रादि-कर्मणाम् ।।तात्कालिकं तु वैशिष्ट्यं विलासः प्रिय-सङ्ग-जम् ॥
१८७॥
नायिका के मुख, नेत्रों तथा शरीर के अन्य भागों में प्रकट होने वाले [विध लक्षण तथा उसके चलने, खड़े होने या अपने प्रेमी से मिलने पर बैठने की मुद्रा को विलास कहते हैं।
लज्जा, हर्ष, अभिलाष, सम्भ्रम, वाम्य, भय । एत भाव मिलि' राधाय चञ्चल करय ॥
१८८॥
स्वरूप दामोदर ने कहा, लज्जा, हर्ष, अभिलाषा, आदर, भय तथा मा गोपियों के लक्षण-ये सब मिलकर श्रीमती राधारानी को चंचल पाते हैं।
पुरः कृष्णालोकात्स्थगित-कुटिलास्या गतिरभूत् ।तिरश्चीनं कृष्णाम्बर-दर-वृतं श्री-मुखमपि । चलत्तारं स्फारं नयन-युगमाभुग्नमिति साविलासाख्य-स्वालङ्करण-वलितासीत्प्रिय-मुदे ॥
१८९॥
जब श्रीमती राधारानी ने भगवान् कृष्ण को अपने सामने देखा, तो उनकी गति रुक गई और उनकी मनोवृत्ति वामा ( कुटिला ) सी हो गई। यद्यपि उनका मुख नीले वस्त्र से थोड़ा सा ढका था, किन्तु उनके बड़ेबड़े और वक्र नेत्र चंचल थे। इस तरह वे विलास के आभूषण से अलंकृत थीं और उनका सौन्दर्य भगवान् कृष्ण को आनन्द प्रदान करने के लिए बढ़ गया।'
कृष्ण-आगे राधा ग्रदि रहे दाण्डाजा ।।तिन-अङ्गभङ्गे रहे भ्रू नाचा ॥
१९०॥
जब श्रीमती राधारानी कृष्ण के समक्ष खड़ी होती हैं, तब वे तीन स्थानों से टेढ़ी हो जाती हैं-गर्दन, कमर तथा पाँव से और उनकी भौंहे नाचने लगती हैं।
मुखे-नेत्रे हय नाना-भावेर उद्गार ।। एइ कान्ता-भावेर नाम 'ललित'-अलङ्कार ।। १९१ ॥
जब श्रीमती राधारानी के मुख पर तथा नेत्रों पर विविध भावों का उदय होता है, जो सुन्दर नारी-सुलभ प्रवृत्ति के उपयुक्त होते हैं, तब ललित अलंकार का प्राकट्य हुआ माना जाता है।
विन्यास-भङ्गिङ्गानां भू-विलास-मनोहरा । सुकुमारा भवेद् यत्र ललितं तदुदाहृतम् ॥
१९२॥
जब शारीरिक अंग मुलायम तथा भंगिमायुक्त हो और जब भौंहे सुन्दर ढंग से उत्तेजित हों, तो नारी-स्वभाव का सौन्दर्य आभूषण प्रकट होता है, जिसे ललित अलंकार कहा जाता है।
ललित-भूषित राधा देखे ग्रदि कृष्ण । हे मुँहा मिलिबारे हयेन सतृष्ण ॥
१९३॥
जब भगवान् श्रीकृष्ण श्रीमती राधारानी को इन ललित अलंकारों से विभूषित देखते हैं, तो दोनों में एक-दूसरे से मिलने की उत्कण्ठा जाग्रत हो जाती है।
ह्रिया तिर्यग्ग्रीवा-चरण-कटि-भङ्गी-सुमधुराचलच्चिल्ली-वल्ली-दलित-रतिनाथोर्जित-धनुः ।। प्रिय-प्रेमोल्लासोल्लसित-ललितालालित-तनुः ।प्रिय-प्रीत्यै सासीदुदित-ललितालङ्कति-ग्रुता ॥
१९४॥
जब श्रीकृष्ण के प्रेम को बढ़ाने मात्र के लिए श्रीमती राधारानी को ललित अलंकार से सजाया गया, तो उनकी गर्दन, घुटनों तथा कमर से। एक आकर्षक भाव-भंगिमा प्रकट हुई। यह कृष्ण से बचने की उनकी इच्छा तथा उनकी लज्जा से उत्पन्न हुई। उनकी भौहों की चंचलता कामदेव के शक्तिशाली धनुष को जीतने वाली थी। अपने प्रियतम के हर्ष को बढ़ाने के लिए, उन्होंने अपने शरीर को ललित अलंकारों से सजाया था।
लोभे आसि' कृष्ण करे कञ्चकाकर्षण ।।अन्तरे उल्लास, राधा करे निवारण ॥
१९५॥
जब कृष्ण आगे बढ़कर लालचवश श्रीमती राधारानी की साड़ी का किनारा खींचते हैं, तब वे भीतर से अत्यधिक प्रसन्न होती हैं, किन्तु शहर से उन्हें रोकने का प्रयास करती हैं।
बाहिरे वामता-क्रोध, भितरे सुख मने ।‘कुट्टमित'-नाम एइ भाव-विभूषणे ॥
१९६॥
श्रीमती राधारानी की यह आनन्दमय भाव कुट्टमित कहलाता है। । यह भाव प्रकट होता है, तब वे बाह्य रूप से कृष्ण से दूर रहना चाहती और ऊपर से क्रुद्ध होती हैं, यद्यपि मन ही मन वे अत्यन्त सुखी होती हैं।
स्तनाधरादि-ग्रहणे हृत्प्रीतावपि सम्भ्रमात् ।। बहिः क्रोधो व्यथित-वत्प्रोक्तं कुट्टमितं बुधैः ॥
१९७ ॥
जब कृष्ण उनकी साड़ी की किनारी तथा उनके घूघट को पकड़ लेते हैं, तो वे बाहर से अपमानित तथा क्रुद्ध प्रतीत होती हैं, किन्तु अपने हृदय में अत्यन्त सुखी होती हैं। विद्वान लोग इसे कुट्टमित भाव कहते हैं।'
कृष्ण-वाञ्छा पूर्ण हय, करे पाणि-रोध ।। अन्तरे आनन्द राधा, बाहिरे वाम्य-क्रोध ॥
१९८॥
यद्यपि श्रीमती राधारानी अपने हाथ से कृष्ण को रोक रही थीं, किन्तु भीतर ही भीतर सोच रही थीं, ‘कृष्ण को अपनी इच्छा पूरी करने दो।' इस तरह वे भीतर से अत्यन्त प्रसन्न थीं, किन्तु बाहर से विरोध तथा क्रोध प्रकट कर रही थीं।
व्यथा पाजा' करे ग्रेन शुष्क रोदन । ईषत् हासिया कृष्णे करेन भर्सन ॥
१९९॥
श्रीमती राधारानी बाहर से बनावटी रोदन जैसा भाव प्रदर्शित करती मानो उन्हें व्यथा पहुँचती हो। फिर वे मन्द हँसती हैं और कृष्ण को ताड़ना देती हैं।
पाणि-रोधमविरोधित-वाञ्छं।भर्सनाश्च मधुर-स्मित-गर्भाः ।। माधवस्य कुरुते करभोरुर् ।हारि शुष्क-रुदितं च मुखेऽपि ॥
२००॥
वास्तव में उनकी इच्छा नहीं होती कि वे कृष्ण को अपना शरीर ने से मना करें, किन्तु हाथी के बच्चे की सैंड जैसी जाँघों वाली श्रीमती पागनी उनके आगे बढ़ने पर विरोध करती हैं और मीठी हँसी द्वारा उन्हें प्रताड़ित करती हैं। ऐसे अवसरों पर वे अपने आकर्षक मुख पर अश्रु नाये बिना रोती हैं।'
एइ-मत आर सब भाव-विभूषण ।। ग्राहाते भूषित राधा हरे कृष्ण मन ॥
२०१॥
इस प्रकार श्रीमती राधारानी उन विभिन्न प्रेम-भावों से अलंकृत एवं विभूषित हैं, जो श्रीकृष्ण के मन को आकृष्ट करते हैं।
अनन्त कृष्णेर लीला ना ग्राय वर्णन ।। आपने वर्णेन यदि सहस्त्र-वदन' ॥
२०२॥
श्रीकृष्ण की अनन्त लीलाओं का वर्णन कर पाना बिल्कुल सम्भव नहीं है, भले ही वे स्वयं सहस्र वदन अर्थात् एक हजार मुख वाले शेष नाग । के अवतार के रूप में उनका वर्णन क्यों न करें।"
श्रीवास हासिया कहे,—शुन, दामोदर ।आमार लक्ष्मीर देख सम्पत्ति विस्तर ॥
२०३॥
इस पर श्रीवास ठाकुर हँस पड़े और स्वरूप दामोदर से बोले, “हे महाशय, जरा सुनो तो! देखो मेरी लक्ष्मीजी कितनी ऐश्वर्यवान हैं।
वृन्दावनेर सम्पद्देख,—पुष्प-किसलय ।। गिरिधातु-शिखिपिच्छ-गुञ्जाफल-मय । २०४॥
जहाँ तक वृन्दावन के ऐश्वर्य की बात है, उसमें कुछ फूल तथा बानियाँ, कुछ पहाड़ी खनिज, कुछ मोरपंख तथा गुंजा नामक पौधा हैं।
वृन्दावन देखिबारे गेला जगन्नाथ ।। शुनि' लक्ष्मी-देवीर मने हैल आसोयाथ ॥
२०५॥
वृन्दावन देखने का निश्चय करने पर जब जगन्नाथजी वहाँ गये, तो इसे सुनकर लक्ष्मीजी को ईष्र्या तथा बेचैनी का अनुभव होने लगा।
एत सम्पत्ति छाड़ि' केने गेला वृन्दावन ।तारै हास्य करिते लक्ष्मी करिला साजन ॥
२०६॥
उन्हें आश्चर्य हुआ कि, 'जगन्नाथजी इतना ऐश्वर्य छोड़कर वृन्दावन क्यों गये?' उनकी हँसी उड़ाने के उद्देश्य से लक्ष्मीजी ने अपने आपको सजाने का काफी प्रबन्ध किया।
तोमार ठाकुर, देख एत सम्पत्ति छाड़ि' ।।पत्र-फल-फुल-लोभे गेला पुष्प-बाड़ी ॥
२०७॥
तब लक्ष्मीजी की सेविकाओं ने भगवान जगन्नाथजी के दासों से कहा, 'तुम्हारे स्वामी भगवान् जगन्नाथ ने लक्ष्मीजी के महान् ऐश्वर्य को त्याग क्यों किया और कुछ पत्तियों, फूलों तथा फलों के लिए वे श्रीमती राधारानी का फूलों का बगीचा क्यों देखने गये? एइ कर्म करे काहाँ विदग्ध-शिरोमणि? ।। लक्ष्मीर अग्रेते निज प्रभुरे देह' आनि ॥
२०८॥
तुम्हारे स्वामी हर बात में अत्यन्त पटु हैं, लेकिन तो भी वे ऐसे कार्य क्यों करते हैं? तुम लोग अपने स्वामी को लक्ष्मीजी के समक्ष लाओ।'
एत बलि' महा-लक्ष्मीर सब दासी-गणे ।। कटि-वस्त्रे बान्धि' आने प्रभुर निज-गणे ॥
२०९॥
इस तरह लक्ष्मीजी की सारी दासियाँ जगन्नाथजी के सभी दासों को बन्दी बनाकर, कटिवस्त्रों से बाँधकर, लक्ष्मीजी के समक्ष ले आई।।
लक्ष्मीर चरणे आनि' कराय प्रणति ।। धन-दण्ड लय, आर कराय मिनति ॥
२१०॥
जब जगन्नाथजी के सारे दास लक्ष्मीजी के चरणकमलों के समक्ष गाये गये, तो उनको दण्ड दिया गया और उन्हें प्रणाम करने के लिए बाध्य किया गया।
रथेर उपरे करे दण्डेर ताड़न । चोर-प्राय करे जगन्नाथेर सेवक-गण ॥
२११॥
फिर सारी दासियाँ रथ पर लाठियों से प्रहार करने लगीं और उन्होंने भगवान् जगन्नाथ के दासों के साथ लगभग चोरों जैसा बर्ताव किया।
सब भृत्य-गण कहे,—ग्रोड़ करि' हात । ।‘कालि आनि दिब तोमार आगे जगन्नाथ' ॥
२१२॥
अन्त में भगवान जगन्नाथ के सारे दासों ने हाथ जोड़कर लक्ष्मीजी से विनती की और उन्हें विश्वास दिलाया कि वे अगले दिन जगन्नाथजी को। लाकर उनके समक्ष पेश कर देंगे।
तबे शान्त हजा लक्ष्मी ग्राय निज घर ।।आमार लक्ष्मीर सम्पद्वाक्य-अगोचर ॥
२१३॥
तब लक्ष्मीजी इस प्रकार शान्त किए जाने पर अपने घर चली गईं। देखो न! हमारी लक्ष्मीजी का ऐश्वर्य वर्णनातीत है।
दुग्ध आउटि' दधि मथे तोमार गोपी-गणे ।। आमार ठाकुराणी वैसे रत्न-सिंहासने ॥
२१४॥
श्रीवास ठाकुर ने स्वरूप दामोदर से आगे कहा, आपकी गोपियाँ दूध औंटने तथा दही मथने में लगी रहती हैं, किन्तु मेरी ठकुरानी लक्ष्मीजी । तो रत्नों के सिंहासन पर बैठी रहती हैं।
नारद-प्रकृति श्रीवास करे परिहास । शुनि' हासे महाप्रभुर व्रत निज-दास ॥
२१५॥
नारद मुनि के भाव में श्रीवास ठाकुर इस प्रकार मजाक कर रहे थे। था सुनकर महाप्रभु के सारे निजी दास हँसने लगे।
प्रभु कहे,—श्रीवास, तोमाते नारद-स्वभाव । ऐश्वर्य-भावे तोमाते, ईश्वर-प्रभाव ॥
२१६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने तब श्रीवास ठाकुर से कहा, अरे श्रीवास, तुम्हारा स्वभाव ठीक नारद मुनि जैसा है। भगवान् का ऐश्वर्य तुम पर अपना सीधा असर कर रहा है।
इँहो दामोदर-स्वरूप—शुद्ध-व्रजवासी ।। ऐश्वर्य ना जाने इँहो शुद्ध-प्रेमे भासि ॥
२१७॥
स्वरूप दामोदर वृन्दावन के शुद्ध भक्त हैं। वे इतना भी नहीं जानते कि ऐश्वर्य क्या होता है, क्योंकि वे शुद्ध भक्ति में ही डूबे रहते हैं।
स्वरूप कहे,--श्रीवास, शुन सावधाने ।। वृन्दावन-सम्पतोमार नाहि पड़े मने? ॥
२१८॥
तब स्वरूप दामोदर ने उलटकर कहा, अरे श्रीवास, तुम मेरी बात ध्यान से सुनो। तुम वृन्दावन के दिव्य ऐश्वर्य को भूल गये हो।
वृन्दावने साहजिक ग्ने सम्पत्सिन्धु ।।द्वारका-वैकुण्ठ-सम्पत्–तार एक बिन्दु ॥
२१९॥
वृन्दावन का प्राकृतिक ऐश्वर्य एक समुद्र के समान है। द्वारका तथा वैकुण्ठ का ऐश्वर्य एक बूंद के बराबर भी नहीं है।
परम पुरुषोत्तम स्वयं भगवान् ।कृष्ण ग्राहाँ धनी ताहाँ वृन्दावन-धाम ॥
२२०॥
श्रीकृष्ण समस्त ऐश्वर्यों के स्वामी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और उनका पूर्ण ऐश्वर्य केवल वृन्दावन धाम में ही प्रकट होता है।
चिन्तामणि-मय भूमि रत्नेर भवन ।।चिन्तामणि-गण दासी-चरण-भूषण ॥
२२१॥
वृन्दावन धाम दिव्य चिन्तामणि से बना है। इसकी पूरी भूमि बहुमूल्य रत्नों की खान है और चिन्तामणि का प्रयोग वृन्दावन की दासियों के चरणकमलों को अलंकृत करने के लिए किया जाता है।
कल्पवृक्ष-लतार—याहाँ साहजिक-वन ।पुष्प-फल विना केह ना मागे अन्य धन ॥
२२२॥
वृन्दावन कल्पवृक्ष तथा लताओं का प्राकृतिक वन है और वृन्दावन के निवासियों को इन कल्पवृक्षों के फल और फूल के अतिरिक्त किसी भी वस्तु की इच्छा नहीं रहती।
अनन्त काम-धेनु ताहाँ फिरे वने वने ।दुग्ध-मात्र देन, केह ना मागे अन्य धने ॥
२२३॥
वृन्दावन में कामधेनु गौएँ हैं जिनकी संख्या अनन्त है। वे एक जंगल से दूसरे जंगल में चरती हैं और केवल दूध देती हैं। लोगों को और कुछ भी नहीं चाहिए।
सहज लोकेर कथा—याहाँ दिव्य-गीत ।।सहज गमन करे,—प्रैछे नृत्य-प्रतीत ॥
२२४॥
वृन्दावन के लोगों की सहज वाणी संगीत जैसी लगती है और उनकी सहज चाल नृत्य जैसी प्रतीत होती है।
सर्वत्र जले—ग्राहाँ अमृत-समान ।।चिदानन्द ज्योतिः स्वाद्य----याहाँ मूर्तिमान् ॥
२२५ ।। वृन्दावन का जल अमृत के समान होता है और वहाँ ब्रह्मज्योति का तेज जो दिव्य आनन्द से परिपूर्ण है, साक्षात् दृष्टिगोचर होता है।
लक्ष्मी जिनि' गुण ग्राहाँ लक्ष्मीर समाज ।।कृष्ण-वंशी करे ग्राहाँ प्रिय-सखी-काय ॥
२२६॥
वहाँ गोपियाँ भी लक्ष्मियाँ हैं और वे वैकुण्ठ में रहने वाली लक्ष्मी को मात करती हैं। वृन्दावन में भगवान् कृष्ण अपनी प्रिय संगिनी दिव्य वंशी को सदैव बजाते रहते हैं।
श्रियः कान्ताः कान्तः परम-पुरुषः कल्प-तरवोद्रुम भूमिश्चिन्तामणि-गण-मयी तोयममृतम् । कथा गानं नाट्यं गमनमपि वंशी प्रिय-सखीचिदानन्दं ज्योतिः परमपि तदास्वाद्यमपि च ॥
२२७॥
वृन्दावन की ललनाएँ-गोपियाँ–सर्वोपरि लक्ष्मियाँ हैं। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण ही वृन्दावन में भोक्ता हैं। वहाँ के सारे वृक्ष कल्पतरु हैं और वहाँ की भूमि दिव्य चिन्तामणि पत्थर की बनी हुई है। यहाँ का जल अमृत है, वहाँ का वार्तालाप संगीत होता है, चलना-फिरना नृत्य होता है और बाँसुरी कृष्ण की चिरसंगिनी है। सर्वत्र दिव्य आनन्द का तेज अनुभव किया जाता है, अतएव वृन्दावन धाम ही एकमात्र आस्वाद्य धाम है।'
चिन्तामणिश्चरण-भूषणमङ्गनानां ।शृङ्गार-पुष्प-तरवस्तरवः सुराणाम् ।। वृन्दावने व्रज-धनं ननु काम-धेनुवृन्दानि चेति सुख-सिन्धुरहो विभूतिः ॥
२२८ ॥
व्रजभूमि की ललनाओं के पायल ( नूपुर) चिन्तामणि पत्थर के बने हुए हैं। यहाँ के वृक्ष कल्पतरु हैं और उनके फूलों से गोपियाँ अपने आपको सजाती हैं। वहाँ पर कामधेनु गौएँ भी हैं, जो असीम दूध देती हैं। ये धेनुएँ वृन्दावन की सम्पत्ति हैं। इस तरह वृन्दावन का वैभव बड़े ही आनन्द से प्रदर्शित होता है।
शुनि' प्रेमावेशे नृत्य करे श्रीनिवास ।। कक्ष-तालि बाजाय, करे अट्ट-अट्ट हास ॥
२२९ ॥
तब श्रीवास ठाकुर प्रेम से अभिभूत होकर नाचने लगे। वे अपनी काँख में हथेली मारकर आवाज निकालने लगे और जोर-जोर से हँसने लगे।
राधार शुद्ध-रस प्रभु आवेशे शुनिल ।। सेइ रसावेशे प्रभु नृत्य आरम्भिल ॥
२३०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रीमती राधारानी के शुद्ध दिव्य रस की इन। व्याख्याओं को सुना, तो वे दिव्य प्रेम-भाव में मग्न होकर नाचने लगे।
रसावेशे प्रभुर नृत्य, स्वरूपेर गान ।।‘बल' 'बल' बलि' प्रभु पाते निज-काण ॥
२३१॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु रस के आवेश में नाच रहे थे और स्वरूप दामोदर गा रहे थे तो महाप्रभु ने कहा, गाते रहो! गाते रहो! फिर महाप्रभु ने अपने कान फैला दिये।
व्रज-रस-गीत शुनि' प्रेम उथलिल ।पुरुषोत्तम-ग्राम प्रभु प्रेमे भासाइल ॥
२३२॥
इस तरह वृन्दावन के गीत सुनकर महाप्रभु को प्रेम जाग्रत हुआ। इस तरह उन्होंने पुरुषोत्तम ग्राम अर्थात् जगन्नाथ पुरी को भगवत्प्रेम से आप्लावित कर दिया।
लक्ष्मी देवी स्रथा-काले गेला निज-घर ।।प्रभु नृत्य करे, हैल तृतीय प्रहर ॥
२३३॥
अन्ततः लक्ष्मीजी अपने घर लौट गईं। अभी श्री चैतन्य महाप्रभु नाच ही रहे थे कि तीसरा पहर हो गया।
चारि सम्प्रदाय गान करि' बहु श्रान्त हैल ।। महाप्रभुर प्रेमावेश द्विगुण बाड़िल ॥
२३४॥
काफी गाने के बाद चारों संकीर्तन-टोलियाँ थक गई, लेकिन महाप्रभु का प्रेमावेश बढ़कर दुगुना हो गया।
राधा-प्रेमावेशे प्रभु हैला सेइ मूर्ति । नित्यानन्द दूरे देखि' करिलेन स्तुति ॥
२३५॥
श्रीमती राधारानी के प्रेमावेश में डूबकर नाचते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु उन्हीं के रूप में दिखने लगे। नित्यानन्द प्रभु, जो दूर से इस रूप को देख रहे थे, उनकी स्तुति करने लगे।
नित्यानन्द देखिया प्रभुर भावावेश ।।निकटे ना आइसे, रहे किछु दूर-देश ॥
२३६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के भावावेश को देखकर नित्यानन्द प्रभु उनके निकट नहीं गये और कुछ दूरी पर ही रहे।
नित्यानन्द विना प्रभुके धरे कोन्जन ।। प्रभुर आवेश ना याय, ना रहे कीर्तन ॥
२३७॥
केवल नित्यानन्द प्रभु ही ऐसे थे, जो महाप्रभु को पकड़ सकते थे, किन्तु महाप्रभु का आवेश रुकने का नाम नहीं ले रहा था। उस समय कीर्तन भी नहीं चालू रखा जा सकता था।
भङ्गि करि' स्वरूप सबार श्रम जानाइल ।। भक्त-गणेर श्रम देखि' प्रभुर बाह्य हैल ॥
२३८॥
तब स्वरूप दामोदर ने महाप्रभु को बतलाया कि सारे भक्त थक गये हैं। यह दशा देखकर महाप्रभु को बाह्य चेतना आ गई।
सब भक्त लञा प्रभु गेला पुष्पोद्याने । विश्राम करिया कैला माध्याह्निक स्नाने ॥
२३९॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु सभी भक्तों को लेकर फूल के बगीचे में आये। वहाँ पर थोड़ी देर विश्राम करने के बाद उन्होंने दोपहर का स्नान किया।
जगन्नाथेर प्रसाद आइल बहु उपहार ।। लक्ष्मीर प्रसाद आइल विविध प्रकार ॥
२४०॥
तभी श्री जगन्नाथजी पर चढ़ाया गया विविध प्रकार का पर्याप्त प्रसाद आया और इसके बाद लक्ष्मीजी पर अर्पित विविध प्रकार का प्रसाद भी आया।
सबा लञा नाना-रङ्गे करिला भोजन ।। सन्ध्या स्नान करि' कैल जगन्नाथ दरशन ॥
२४१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने दोपहर का भोजन किया और शाम को स्नान करने के बाद वे जगन्नाथजी का दर्शन करने गये।
जगन्नाथ देखि' करेन नर्तन-कीर्तन ।। नरेन्द्रे जल-क्रीड़ा करे लञा भक्त-गण ॥
२४२॥
भगवान् जगन्नाथ को देखते ही श्री चैतन्य महाप्रभु नाचने और कीर्तन करने लगे। तत्पश्चात् अपने भक्तों के साथ उन्होंने नरेन्द्र सरोवर में जलक्रीड़ा की।
उद्याने आसिया कैल वन-भोजन । एइ-मत क्रीड़ा कैल प्रभु अष्ट-दिन ॥
२४३॥
तत्पश्चात् फूल के बगीचे में आकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने भोजन किया। इस तरह आठ दिनों तक महाप्रभु सभी प्रकार की लीलाएँ लगातार करते रहे।
आर दिने जगन्नाथेर भितर-विजये ।।रथे चड़ि' जगन्नाथ चले निजालय ॥
२४४।। अगले दिन भगवान जगन्नाथ मन्दिर से बाहर निकले और रथ पर चढ़कर अपने धाम वापस चले गये।
पूर्ववत्कैल प्रभु ला भक्त-गण ।।परम आनन्दे करेन नर्तन-कीर्तन ॥
२४५ ॥
पहले की तरह श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके भक्त पुनः परम् । आनन्दित होकर कीर्तन करने और नाचने लगे।
जगन्नाथेर पुनः पाण्डु-विजय हइल ।। एक गुटि पट्ट-डोरी ताँहा टुटि' गेल ॥
२४६॥
पाण्डुविजय के समय भगवन जगन्नाथ को जब ले जाये जा रहे थे , तो रेशमी डोरियों का एक गुच्छा टूट गया।
पाण्डु-विजयेर तुलि फाटि-फुटि ग्राय ।।जगन्नाथेर भरे तुला उड़िया पलाये ॥
२४७॥
जब जगन्नाथ के अर्चाविग्रह को ले जाया जाता है, तो उन्हें थोड़ीथोड़ी दूरी पर रुई के गद्दों पर रखा जाता है। जब रस्सियाँ टूट गईं, तो जगन्नाथजी के भार से रुई के गद्दे भी टूट गये और उनकी रुई हवा में उड़ने लगी।।
कुलीन-ग्रामी रामानन्द, सत्यराज खाँन ।।ताँरै आज्ञा दिल प्रभु करिया सम्मान ॥
२४८ ॥
उस शाम कुलीन ग्राम के रामानन्द वसु तथा सत्यराज खान उपस्थित थे, अत: श्री चैतन्य महाप्रभु ने बड़े आदर के साथ उन्हें यह आदेश दिया।
जगन्नाथेर पुनः पाण्डु-विजय हइल ।। एक गुटि पट्ट-डोरी ताँहा टुटि' गेल ॥
२४६॥
एइ पट्ट-डोरीर तुमि हओ यजमान ।। प्रति-वत्सर आनिबे डोरी' करिया निर्माण ॥
२४९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द वसु और सत्यराज खान दोनों को आदेश दिया कि वे इन रस्सियों के पूजक बनें और अपने गाँव से प्रतिवर्ष रेशमी डोरियाँ लाया करें।
एत बलि' दिल ताँरै छिण्डा पट्ट डोरी । इहा देखि करिब डोरी अति दृढ़ करि' ॥
२५०॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें टूटी रेशमी डोरियाँ दिखलाई और कहा, “इस नमूने को देखो। तुम इनसे अधिक मजबूत रस्सियों बनाना।
एइ पट्ट-डोरीते हय ‘शेष'-अधिष्ठान ।।दश-मूर्ति हा ग्रॅहो सेवे भगवान् ॥
२५१॥
फिर श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द वसु और सत्यराज खान को बतलाया कि यह रस्सी उन भगवान् शेष का धाम है, जो दश रूपों में विस्तार करके पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा करते हैं।
भाग्यवान्सत्यराज वसु रामानन्द ।। सेवा-आज्ञा पाळा हैल परम-आनन्द ॥
२५२॥
महाप्रभु से सेवा करने का आदेश पाकर भाग्यशाली सत्यराज तथा रामानन्द वसु परम प्रसन्न हुए।
प्रति वत्सर गुण्डिचाते भक्त-गण-सड़े। पट्ट-डोरी लञा आइसे अति बड़ रङ्गे ॥
२५३ ॥
उसके बाद वर्षानुवर्ष जब गुण्डिचा मन्दिर की सफाई होती, तो सत्यराज तथा रामानन्द वसु अन्य भक्तों के साथ आते और प्रसन्नतापूर्वक रेशमी डोरी लाते।
तबे जगन्नाथ ग्राइ' वसिला सिंहासने ।।महाप्रभु घरे आइला ला भक्त-गणे ॥
२५४॥
इस तरह जगन्नाथजी अपने मन्दिर लौट आये और अपने सिंहासन पर आसीन हुए। श्री चैतन्य महाप्रभु भी अपने भक्तों सहित अपने निवासस्थान पर लौट आये।।
एइ-मत भक्त-गणे य़ात्रा देखाइल ।।भक्त-गण ला वृन्दावन-केलि कैल ॥
२५५ ॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने भक्तों को रथयात्रा उत्सव दिखलाया और उनके साथ वृन्दावन लीला सम्पन्न की।
चैतन्य गोसाजिर लीला—अनन्त, अपार । सहस्त्र-वदन' सार नाहि पाय पार ॥
२५६ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अनन्त और अपार हैं। यहाँ तक कि सहस्र-वदन शेष नाग भी उनकी लीलाओं का पार नहीं पा सकते।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
२५७॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों पर प्रार्थना करते हुए तथा उनकी कृपा की सदा कामना करते हुए मैं, कृष्णदास उन्हीं के चरणचिह्नों का अनुसरण करते हुए श्री चैतन्य-चरितामृत कह रहा हूँ।
