अध्याय तेरह: रथयात्रा में भगवान का परमानंद नृत्य
स जीयाकृष्ण-चैतन्यः श्री-रथाग्रे ननर्त ग्रः ।।ग्रेनासीज्जगतां चित्रं जगन्नाथोऽपि विस्मितः ॥
१॥
श्री जगन्नाथ के रथ के समक्ष नृत्य वाले पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य की जय हो! उनके नृत्य को देखकर न केवल सारा ब्रह्माण्ड चकित था, अपितु स्वयं भगवान जगन्नाथ भी अत्यधिक चकित हो गये।
जय जय श्री-कृष्ण-चैतन्य नित्यानन्द ।।जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्रीकृष्ण चैतन्य तथा प्रभु नित्यानन्द की जय हो! अद्वैतचन्द्र की जय हो! चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो! जय श्रोती-गण, शुन, करि' एक मन ।।रथ-यात्रीय नृत्य प्रभुर परम मोहन ॥
३ ॥
श्री चैतन्य-चरितामृत के श्रोताओं की जय हो! अब कृपा करके ग्थयात्रा उत्सव के समय श्री चैतन्य महाप्रभु के नृत्य का विवरण सुनें। उनका नृत्य अत्यन्त मनोहारी है। कृपा करके इसे ध्यानपूर्वक सुनें।
आर दिन महाप्रभु ही सावधान ।। रात्रे उठि' गण-सङ्गे कैल प्रातः-स्नान ॥
४॥
अगले दिन श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके निजी संगी अँधेरे में ही जग गये और उन्होंने ध्यानपूर्वक प्रात:कालीन स्नान किया।
पाण्डु-विजय देखिबारे करिले गमन ।। जगन्नाथ यात्रा कैल छाड़ि' सिंहासन ॥
५॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु अपने संगियों समेत पाण्डुविजय उत्सव देखने गये। इस उत्सव में भगवान जगन्नाथ अपना सिंहासन छोड़कर रथ पर चढ़ते हैं।
आपनि प्रतापरुद्र लञा पात्र-गण।महाप्रभुर गणे कराय विजय-दर्शन ॥
६॥
राजा प्रतापरुद्र तथा उनके संगियों ने श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त संगियों को पाण्डुविजय उत्सव देखने की अनुमति प्रदान की।
अद्वैत, निताई आदि सङ्गे भक्त-गण ।सुखे महाप्रभु देखे ईश्वर-गमन ॥
७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु तथा अद्वैत आचार्य, नित्यानन्द प्रभु इत्यादि अन्य प्रमुख भक्त यह देखकर परम सुखी थे कि भगवान जगन्नाथ किस तरह रथयात्रा शुरू करने जा रहे हैं।
बलिष्ठ दयिता' गण—ग्रेन मत्त हाती । जगन्नाथ विजय कराय करि' हाताहाति ॥
८॥
बलिष्ठ दयिता ( जगन्नाथ अर्चाविग्रह को ले जाने वाले ) मत्त हाथियों के समान शक्तिशाली थे। वे भगवान् जगन्नाथ को हाथोंहाथ सिंहासन से रथ तक ले गये।।
कतक दयिता करे स्कन्ध आलम्बन । कतक दयिता धरे श्री-पद्म-चरण ॥
९॥
भगवान जगन्नाथ के अर्चाविग्रह को ले जाते समय कुछ दयिताओं ने उनके कन्धे पकड़े और कुछ ने उनके चरणकमल पकड़ लिए।
कटि-तटे बद्ध, दृढ़ स्थूल पट्ट-डोरी ।। दुइ दिके दयिता-गण उठाय ताहा धरि' ॥
१०॥
जगन्नाथजी के अर्चाविग्रह की कमर पर मजबूत मोटी रेशम की रस्सी । बाँधी गई। दयिताओं ने दोनों ओर से इस रस्सी को पकड़ लिया और अर्चाविग्रह को ऊपर उठा लिया।
उच्च दृढ़ तुली सब पाति' स्थाने स्थाने ।। एक तुली हैते त्वराय आर तुलीते आने ॥
११ ॥
सिंहासन से लेकर रथ तक धुनी रुई के मजबूत गद्दे ( तुली ) बिछा दिये गये और जगन्नाथजी का भारी अर्चाविग्रह दयिताओं द्वारा एक गद्दे ॥
दूसरे गद्दे तक ले जाया गया।
प्रभु-पदाघाते तुली हय खण्ड खण्ड ।तुला सेब उड़ि' याय, शब्द हय प्रचण्ड ॥
१२॥
जब दयितागण जगन्नाथजी के भारी अर्चाविग्रह को एक गद्दे से दूसरे तक ले जा रहे थे, तब कुछ गद्दे टूट गये और उनकी रुई हवा में उड़ने लगी। इन गद्दों के टूटने से पटाखे जैसा प्रचण्ड शब्द हुआ।
"text":"विश्वम्भर जगन्नाथ की चालति परे। आपना इच्छाया चले करते विहारी।।१३॥
भगवान जगन्नाथ पूरे ब्रह्मांड के अनुचर हैं। उन्हें एक स्थान से दूसरे स्थान पर कौन ले जा सकता है? प्रभु अपने चाह द्वारा चलते हैं, बस उनकी लीलाएँ करने के लिए।"
महाप्रभु 'मणिमा' ‘मणिमा' करे ध्वनि ।।नाना-वाद्य-कोलाहले किछुइ ना शुनि ॥
१४॥
जब भगवान् को सिंहासन से रथ तक ले जाये जा रहे थे, तब विविध वाद्य-यंत्रों से तुमुल ध्वनि हो रही थी और श्री चैतन्य महाप्रभु मणिमा! मणिमा! का उच्चारण कर रहे थे किन्तु उनकी आवाज किसी को सुनाई। नहीं दे रही थी।
तबे प्रतापरुद्र करे आपने सेवन । ।सुवर्ण-मार्जनी लजा करे पथ सम्मार्जन ॥
१५॥
जब भगवान् को सिंहासन से रथ तक ले जाये जा रहे थे, तब राजा प्रतापरुद्र हाथ में सुनहरी मूठ वाली झाड़ लिए भगवान् की सेवा हेतु मार्ग की सफाई करने में व्यस्त थे।
चन्दन-जलेते करे पथ निषेचने ।।तुच्छ सेवा करे वसि' राज-सिंहासने ॥
१६॥
राजा ने मार्ग पर चन्दन से सुगन्धित जल का छिड़काव किया। यद्यपि में राज सिंहासन के स्वामी थे, किन्तु भगवान जगन्नाथ के लिए तुच्छ सेवा में लगे हुए थे।
उत्तम हा राजा करे तुच्छ सेवन ।।अतएव जगन्नाथेर कृपार भाजन ॥
१७॥
यद्यपि राजा अत्यन्त सम्मानित व्यक्ति थे, फिर भी भगवान् के लिए में तुच्छ सेवा कर रहे थे। अतएव वे भगवान् की कृपा प्राप्त करने के अपयुक्त पात्र बन गये।
महाप्रभु सुख पाइल से-सेवा देखिते ।महाप्रभुर कृपा हैल से-सेवा हइते ॥
१८॥
राजा को ऐसी तुच्छ सेवा में संलग्न देखकर चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए। यह सेवा करने से ही राजा को महाप्रभु की कृपा प्राप्त हो पाई।
रथेर साजनि देखि' लोके चमत्कार ।। नव हेममय रथ—सुमेरु-आकार ॥
१९॥
रथ की सजावट देखकर हर व्यक्ति आश्चर्यचकित था। रथ नये सिरे में सोने का बना लग रहा था और सुमेरु पर्वत जितना ऊँचा था।
शत शत सु-चामर-दर्पणे उज्वल । उपरे पताका शोभे चाँदोया निर्मल ॥
२० ॥
इस सजावट में चमकीले शीशे तथा सैंकड़ों चामर थे। रथ के ऊपर स्वच्छ छत्र तथा एक अत्यन्त सुन्दर झंडा था।
घाघर, किङ्किणी बाजे, घण्टार क्वणित । नाना चित्र-पट्ट-वस्त्रे रथ विभूषित ॥
२१॥
रथ को रेशमी वस्त्र तथा विविध चित्रों से भी सजाया गया था। अनेक पितल के घंटे, घड़ियाल तथा धुंघरू बज रहे थे।
लीलाय चड़िल ईश्वर रथेर उपर ।। आर दुइ रथे चड़े सुभद्रा, हलधर ॥
२२॥
भगवान जगन्नाथ रथयात्रा-लीला के लिए एक रथ पर चढ़े और उनकी बहन सुभद्रा तथा बड़े भाई बलराम अन्य दो रथों पर आरूढ़ हुए।
पञ्च-दश दिन ईश्वर महा-लक्ष्मी ला ।।ताँर सङ्गे क्रीड़ा कैल निभृते वसिया ॥
२३ ॥
भगवान् पन्द्रह दिनों तक महालक्ष्मी के साथ एकान्त स्थान में रहे और उनके साथ क्रीड़ा-विहार किया।
ताँहार सम्मति ला भक्ते सुख दिते ।।रथे चड़ि' बाहिर हैल विहार करिते ॥
२४॥
महालक्ष्मी की अनुमति लेकर भगवान् रथ पर चढ़ने और भक्तों के आनन्द हेतु अपनी लीलाएँ करने के लिए बाहर आये।
सूक्ष्म श्वेत-बालु पथे पुलिनेर सम ।।दुइ दिके टोटा, सब—ग्रेन वृन्दावन ॥
२५॥
सारे मार्ग में बिछी महीन श्वेत बालू यमुना-तट के समान लग रही थी। और दोनों ओर के छोटे-छोटे बगीचे वृन्दावन के बगीचों जैसे लग रहे थे।
रथे चड़ि' जगन्नाथ करिला गमन ।दुइ-पाश्चै देखि चले आनन्दित-मन ॥
२६॥
जब भगवान जगन्नाथ रथ पर चढ़ गये और उन्होंने दोनों ओर के मौन्दर्य को निहारा, तो उनका मन आनन्द से भर गया।
‘गौड़' सब रथ टाने करिया आनन्द ।।क्षणे शीघ्र चले रथ, क्षणे चले मन्द ॥
२७॥
रथ को खींचने वाले गौड़ कहलाते थे और वे रथ को अतीव आनन्द से खींच रहे थे। किन्तु यह रथ कभी तो बहुत तेज चलता था और कभी अत्यन्त मन्द हो जाता था।
क्षणे स्थिर हआ रहे, टानिलेह ना चले । ईश्वर-इच्छाय चले, ना चले कारो बले ॥
२८॥
कभी रथ स्थिर हो जाता और टस से मस न होता, भले ही इसे कितने ही जोर से क्यों न खींचा जाता। अतः यह रथ भगवान् की इच्छा से चल रहा था, किसी सामान्य व्यक्ति की शक्ति से नहीं।
तबे महाप्रभु सब लञा भक्त-गण ।। स्वहस्ते पराइल सबे माल्य-चन्दन ॥
२९॥
जब रथ स्थिर हो गया, तो महाप्रभु ने अपने सारे भक्तों को एकत्र किया और उन्हें अपने हाथों से फूलों की माला तथा चन्दन से सजाया।
परमानन्द पुरी, आर भारती ब्रह्मानन्द ।।श्री-हस्ते चन्दन पाञा बाड़िल आनन्द ॥
३०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने हाथों से परमानन्द पुरी तथा ब्रह्मानन्द भारती को मालाएँ तथा चन्दन प्रदान किया। इससे उनका दिव्य आनन्द बढ़ गया।
अद्वैत-आचार्य, आर प्रभु-नित्यानन्द ।।श्री-हस्त-स्पर्शे ढुंहार हइल आनन्द ॥
३१॥
इसी तरह जब अद्वैत आचार्य तथा नित्यानन्द प्रभु को श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य हाथों का स्पर्श प्राप्त हुआ, तो वे दोनों अत्यन्त प्रसन्न कीर्तनीया-गणे दिल माल्य-चन्दन ।।स्वरूप, श्रीवास,—याहाँ मुख्य दुइ-जन ॥
३२॥
महाप्रभु ने संकीर्तन करने वालों को भी मालाएँ तथा चन्दन दिया। दो मुख्य कीर्तनिये थे-स्वरूप दामोदर तथा श्रीवास ठाकुर।
चारि सम्प्रदाये हैल चब्बिश गायन ।दुइ दुइ मार्दङ्गिक हैल अष्ट जन ॥
३३॥
कीतर्न करने वालों की कुल चार टोलियाँ थीं, जिनमें कुल चौबीस कीर्तनिये थे। प्रत्येक टोली में दो-दो मृदंगवादक थे, जिससे आठ अतिरिक्त व्यक्ति हो गये।
तबे महाप्रभु मने विचार करिया ।।चारि सम्प्रदाय दिल गायन बाँटिया ॥
३४॥
जब चार टोलियाँ बन गईं, तो थोड़ा-सा विचार करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने कीर्तनियों को बाँट दिया।
नित्यानन्द, अद्वैत, हरिदास, वक्रेश्वरे ।। चारि जने आज्ञा दिल नृत्य करिबारे ॥
३५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु, अद्वैत आचार्य, हरिदास ठाकुर तथा वक्रेश्वर पण्डित को आज्ञा दी कि वे चारों टोलियों में से प्रत्येक में जाकर नृत्य करें।
प्रथम सम्प्रदाये कैल स्वरूप प्रधान ।। आर पञ्च-जन दिल ताँर पालिगान ॥
३६॥
स्वरूप दामोदर को पहली टोली का अगुवा चुना गया और उन्हें पाँच महायक दिये गये, जो उनके कीर्तन को दुहरायें।
दामोदर, नारायण, दत्त गोविन्द ।। राघव पण्डित, आर श्री गोविन्दानन्द ॥
३७॥
जो पाँच जन स्वरूप दामोदर के गाने को दुहराते थे, वे थे दामोदर पण्डित, नारायण, गोविन्द दत्त, राघव पण्डित तथा श्री गोविन्दानन्द।
अद्वैतेरे नृत्य करिबारे आज्ञा दिल ।।श्रीवास-प्रधान आर सम्प्रदाय कैल ॥
३८॥
अद्वैत आचार्य प्रभु को पहली टोली में नृत्य करने के लिए आदेश मिला। तब महाप्रभु ने एक अन्य टोली बनाई, जिसके प्रधान व्यक्ति हुए श्रीवास ठाकुर।
गङ्गादास, हरिदास, श्रीमान्, शुभानन्द ।।श्री-राम पण्डित, ताहाँ नाचे नित्यानन्द ॥
३९॥
श्रीवास ठाकुर के गाने को दोहराने वाले पाँच गायक थे-गंगादास, हरिदास, श्रीमान्, शुभानन्द तथा श्रीराम पण्डित। श्री नित्यानन्द प्रभु को वर्तक नियुक्त किये गये।
वासुदेव, गोपीनाथ, मुरारि ग्राहाँ गाय ।।मुकुन्द-प्रधान कैल आर सम्प्रदाय ॥
४०॥
एक अन्य टोली भी बना ली गई जिसमें वासुदेव, गोपीनाथ तथा गरि थे। ये सब दुहराने वाले गायक थे और मुकुन्द प्रधान गायक थे।
श्रीकान्त, वल्लभ-सेन आर दुई जन ।।हरिदास-ठाकुर ताहाँ करेन नर्तन ॥
४१॥
श्रीकान्त तथा वल्लभसेन नामक दो अन्य व्यक्ति दुहराने वाले गवैयों ६) माथ हो लिए। इस टोली के नर्तक थे ज्येष्ठ हरिदास ( हरिदास ठाकुर)।
गोविन्द-घोष—प्रधान कैल आर सम्प्रदाय ।।हरिदास, विष्णुदास, राघव, ग्राहाँ गाय ॥
४२॥
महाप्रभु ने एक अन्य टोली बनाई, जिसके अगुवा गोविन्द धोष नियुक्त किये गये। इस टोली में छोटा हरिदास, विष्णुदास तथा राघव दुहराने वाले गवैये थे।
माधव, वासुदेव-घोष, दुइ सहोदर ।।नृत्य करेन ताहाँ पण्डित-वक्रेश्वर ॥
४३॥
माधव घोष तथा वासुदेव घोष नामक दोनों भाई भी इस टोली में दुहराने वालों में सम्मिलित हो गये। वक्रेश्वर पण्डित इसके नर्तक थे।
कुलीन-ग्रामेर एक कीर्तनीया-समाज ।।ताहाँ नृत्य करेन रामानन्द, सत्यराज ॥
४४॥
कुलीन-ग्राम नामक गाँव की एक कीर्तनियों की टोली थी, जिसमें रामानन्द तथा सत्यराज नर्तक के रूप में नियुक्त किये गये।
शान्तिपुरेर आचार एक सम्प्रदाय ।।अच्युतानन्द नाचे तथा, आर सब गाय ॥
४५ ॥
शान्तिपुर की भी एक टोली थी, जिसे अद्वैत आचार्य ने बनाई थी। अच्युतानन्द इसके नर्तक थे और शेष लोग गवैये थे।
खण्डेर सम्प्रदाय करे अन्यत्र कीर्तन ।।नरहरि नाचे ताहाँ श्री-रघुनन्दन ॥
४६॥
खण्ड के लोगों ने एक अन्य टोली बनाई थी। ये लोग एक भिन्न स्थान पर गा रहे थे। इस दल में नरहरि प्रभु तथा रघुनन्दन नाच रहे थे।
जगन्नाथेर आगे चारि सम्प्रदाय गाय ।।दुई पाशे दुइ, पाछे एक सम्प्रदाय ॥
४७॥
चार टोलियाँ भगवान जगन्नाथ के सामने कीर्तन कर रही थीं और नाच रही थीं। उनके दोनों ओर दो अन्य टोलियाँ थीं। पीछे भी एक टोली थी।
सात सम्प्रदाये बाजे चौद्द मादल ।। ग्रार ध्वनि शुनि' वैष्णव हैल पागल ॥
४८॥
कुल मिलाकर सात संकीर्तन टोलियाँ थीं और प्रत्येक टोली में दो व्यक्ति ढोल नगाड़े बजा रहे थे। इस प्रकार एकसाथ चौदह ढोल बज रहे। थे। इनकी ध्वनि इतनी कोलाहलपूर्ण थी कि सारे भक्त पागल हो गये।
वैष्णवेर मेघ-घटाय हइल बादल । कीर्तनानन्दे सब वर्षे नेत्र-जल ॥
४९॥
सारे वैष्णव बादलों के समूह की तरह एकसाथ आये। जब भक्तों ने अत्यन्त भावपूर्वक नाम-कीर्तन किया, तो उनकी आँखों से आँसू गिरने लगे मानों आँखों से वर्षा हो रही हो।
त्रिभुवन भरि' उठे कीर्तनेर ध्वनि । अन्य वाद्यादिर ध्वनि किछुइ ना शुनि ॥
५०॥
जब संकीर्तन की प्रतिध्वनि हुई, तो उससे तीनों लोक भर गये। तब किसी को संकीर्तन के अतिरिक्त किसी बाजे की ध्वनि या अन्य ध्वनि नहीं सुनाई देती थी।
सात ठाजि बुले प्रभु 'हरि' ‘हरि' बलि' ।। ‘जय जगन्नाथ', बलेन हस्त-युग तुलि' ॥
५१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु हरि!, हरि! उच्चारण करते हुए सातों दलों में Hधरण कर रहे थे। वे अपने दोनों हाथ उठाकर जोर से बोले “जय जगन्नाथ! आर एक शक्ति प्रभु करिल प्रकाश । एक-काले सात ठात्रि करिल विलास ॥
५२॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक ही साथ सभी सातों टोलियों में लीलाएँ सम्पन्न करके अपनी अन्य योगशक्ति का परिचय दिया।
सबे कहे,—-प्रभु आछेन मोर सम्प्रदाय ।।अन्य ठाजि नाहि ग्रा'न आमारे दयाय ॥
५३॥
हर एक ने कहा, श्री चैतन्य महाप्रभु मेरी टोली में उपस्थित हैं। वे अन्यत्र कहीं नहीं जाते। वे हम सब पर कृपा की वृष्टि कर रहे हैं।
केह लखिते नारे प्रभुर अचिन्त्य-शक्ति ।।अन्तरङ्ग-भक्त जाने, याँर शुद्ध-भक्ति ॥
५४॥
वास्तव में कोई भी महाप्रभु की अचिन्त्य शक्ति को देख नहीं सका। केवल सर्वाधिक अन्तरंग भक्त ही, जो शुद्ध अनन्य भक्ति में स्थित थे, समझ सके।
कीर्तन देखिया जगन्नाथ हरषित ।।सङ्कीर्तन देखे रथ करिया स्थगित ॥
५५॥
भगवान जगन्नाथ संकीर्तन से अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने कीर्तन देखने के लिए ही अपने रथ को खड़ा कर दिया।
प्रतापरुद्रेर हैल परम विस्मय ।।देखिते विवश राजा हैल प्रेममय ॥
५६॥
राजा प्रतापरुद्र भी संकीर्तन देखकर विस्मित हो गये। वे निष्क्रिय हो गये और कृष्ण के भावप्रेम में रूपान्तरित हो गये।
काशी-मिश्रे कहे राजा प्रभुर महिमा ।।काशी-मिश्र कहे,—तोमार भाग्येर नाहि सीमा ॥
५७॥
जब राजा ने काशी मिश्र से महाप्रभु की महिमा के विषय में बतलाया, तो काशीमिश्र ने उत्तर दिया, हे राजा, आपके भाग्य की सीमा नहीं है।
सार्वभौम-सङ्गे राजा करे ठाराठारि ।आर केह नाहि जाने चैतन्येर चुरि ॥
५८॥
राजा तथा सार्वभौम भट्टाचार्य दोनों ही महाप्रभु की लीला से अवगत थे, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु की युक्तियों को अन्य कोई नहीं देख सकता था।
यारे ताँर कृपा, सेइ जानिबारे पारे ।कृपा विना ब्रह्मादिक जानिबारे नारे ॥
५९॥
उन्हें केवल वही समझ सकता है, जिसे महाप्रभु की कृपा प्राप्त हो चुकी हो। महाप्रभु की कृपा के बिना ब्रह्मादिक देवतागण तक नहीं समझ सकते।
राजार तुच्छ सेवा देखि' प्रभुर तुष्ट मन । सेइ त' प्रसादे पाइल 'रहस्य-दर्शन' ॥
६०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु राजा को मार्ग की सफाई जैसा तुच्छ कार्य करते देखकर अत्यन्त प्रसन्न थे। राजा ने इसी दीनता के कारण श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा प्राप्त की। अतएव वे श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यों के रहस्य को देख सकते थे।
साक्षाते ना देय देखा, परोक्षे त' दया ।के बुझिते पारे चैतन्य-चन्द्रेर माया ॥
६१॥
यद्यपि राजा को मिलने से मना कर दिया गया था, किन्तु अप्रत्यक्ष रूप से उन पर अहैतुकी कृपा प्रदान की गई थी। भला श्री चैतन्य महाप्रभु की अन्तरंगा शक्ति को कौन समझ सकता है? सार्वभौम, काशी-मिश्र, दुइ महाशय ।राजारे प्रसाद देखि' हइला विस्मय ॥
६२॥
जब सार्वभौम भट्टाचार्य तथा काशी मिश्र महोदयों ने राजा के ऊपर महाप्रभु की अहैतुकी कृपा देखी, तो वे चकित रह गये।
एइ-मत लीला प्रभु कैल कत-क्षण । आपने गायेन, नाचान निज-भक्त-गण ॥
६३ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कुछ समय तक अपनी लीलाएँ इसी प्रकार से कीं। वे स्वयं गा रहे थे और उन्होंने अपने संगियों को नाचने के लिए प्रेरित किया।
कभु एक मूर्ति, कभु हन बहु-मूर्ति ।।कार्य-अनुरूप प्रभु प्रकाशये शक्ति ॥
६४॥
महाप्रभु अपनी आवश्यकता के अनुसार कभी एक रूप प्रदर्शित करते, तो कभी अनेक। ऐसा उनकी अन्तरंगा शक्ति द्वारा सम्पन्न हो रहा था।
लीलावेशे प्रभुर नाहि निजानुसन्धान ।। इच्छा जानि'लीला शक्ति' करे समाधान ॥
६५॥
महाप्रभु अपनी दिव्य लीलाओं के दौरान अपने आपको भूल गये, किन्तु उनकी अन्तरंगा शक्ति ( लीला शक्ति ) ने उनके मनोभावों को जानते हुए सारी व्यवस्था कर दी।
पूर्वे ट्रैछे रासादि लीला कैल वृन्दावने ।।अलौकिक लीला गौर कैल क्षणे क्षणे ॥
६६॥
जिस तरह पूर्वकाल में श्रीकृष्ण ने वृन्दावन में रासलीला तथा अन्य नीनाएँ की थीं, उसी तरह श्री चैतन्य महाप्रभु प्रतिक्षण अलौकिक लीलाएँ का रहे थे।
भक्त-गण अनुभवे, नाहि जाने आन ।। श्री-भागवत-शास्त्र ताहाते प्रमाण ॥
६७॥
केवल शुद्ध भक्तगण ही महाप्रभु को रथयात्रा के रथ के समक्ष नृत्य करने की अनुभूति कर सकते थे। अन्य लोग इसे नहीं समझ सके। भगवान् श्रीकृष्ण के विलक्षण नृत्य का वर्णन श्रीमद्भागवत में मिलता है।
एइ-मत महाप्रभु करे नृत्य-रङ्गे।।भासाइल सब लोक प्रेमेर तरङ्गे ॥
६८ ॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने परम प्रसन्न होकर नृत्य किया और प्रेम की तरंगों से सारे लोगों को आप्लावित कर दिया।
एइ-मत हैल कृष्णेर रथे आरोहण ।। तार आगे प्रभु नाचाइल भक्त-गण ॥
६९॥
इस तरह भगवान् अपने जगन्नाथ रथ पर आरूढ़ हुए और श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने सारे भक्तों को रथ के समक्ष नाचने के लिए प्रोत्साहित किया।
आगे शुन जगन्नाथेर गुण्डिचा-गमन ।। तार आगे प्रभु प्रैछे करिला नर्तन ॥
७० ॥
आप कृपा करके वह वृतान्त सुनिये, जिस समय भगवान जगन्नाथ 10डचा मन्दिर जा रहे थे और महाप्रभु रथ के समक्ष नृत्य कर रहे थे।
एइ-मत कीर्तन प्रभु करिल कत-क्षण ।।आपन-उद्योगे नाचाइल भक्त-गण ॥
७१॥
महाप्रभु ने कुछ समय तक कीर्तन किया और अपने प्रयास से सारे भक्तों को नाचने के लिए प्रेरित किया।
आपनि नाचिते ग्रबे प्रभुर मन हैल ।।सात सम्प्रदाथ तबे एकत्र करिल ॥
७२॥
जब महाप्रभु का मन नाचने को हुआ, तो सातों टोलियाँ आकर मिल गईं।
श्रीवास, रामाइ, रघु, गोविन्द, मुकुन्द ।।हरिदास, गोविन्दानन्द, माधव, गोविन्द ॥
७३॥
श्रीवास, रामाइ, रघु, गोविन्द, मुकुन्द, हरिदास, गोविन्दानन्द, माधव तथा गोविन्द इत्यादि महाप्रभु के सभी भक्त इकट्टे हो गये।
उद्दण्ड-नृत्ये प्रभुर ग्रबे हैल मन ।।स्वरूपेर सङ्गे दिल एइ नव जन ।। ७४।। जब श्री चैतन्य महाप्रभु का ऊँचे कूदते हुए नृत्य करने का मन हुआ, तो उन्होंने इन नौ लोगों को स्वरूप दामोदर के अधीन कर दिया।
एइ दश जन प्रभुर सङ्गे गाय, धाय ।। आर सब सम्प्रदाय चारि दिके गाय ॥
७५ ।। ये भक्त (स्वरूप दामोदर तथा उनके अधीनस्थ भक्त) महाप्रभु के साथ-साथ गाते थे और उन्हीं के साथ दौड़ते भी थे। भक्तों के अन्य समूह भी गाते थे।
दण्डवत्करि, प्रभु गुड़ि' दुइ हात ।। ऊर्ध्व-मुखे स्तुति करे देखि' जगन्नाथ ॥
७६ ॥
महाप्रभु ने हाथ जोड़कर नमस्कार करते हुए अपना मुख जगन्नाथजी की ओर उठाया और इस प्रकार प्रार्थना की।
नमो ब्रह्मण्य-देवाय गो-ब्राह्मण-हिताय च । जगद्धिताय कृष्णाय गोविन्दाय नमो नमः ॥
७७ मैं उन भगवान् कृष्ण को सादर नमस्कार करता हूँ, जो समस्त ब्राह्मणों के आराध्य देव हैं, जो गायों तथा ब्राह्मणों के शुभचिन्तक हैं तथा जो सदैव सारे जगत् को लाभ पहुँचाते हैं। मैं कृष्ण तथा गोविन्द के नाम से विख्यात भगवान् को बारम्बार नमस्कार करता हूँ।तात्पर्य यह श्लोक विष्णु पुराण (१.१९.६५) से लिया गया है।
जयति जयति देवो देवकीनन्दनोऽसौ ।जयति जयति कृष्णो वृष्णि-वंश-प्रदीपः ।। जयति जयति मेघ-श्यामलः कोमलाङ्गोजयति जयति पृथ्वी-भार-नाशो मुकुन्दः ॥
७८ ॥
उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की जय हो, जो देवकी-पुत्र कहलाते। है। उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की जय हो, जो वृष्णि-वंश के दीपक हैं। अग पृर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की जय हो, जिनके शरीर की कान्ति नये दिल की तरह है और जिनका शरीर कमल के फूल के समान कोमल है। उन पृर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की जय हो, जो संसार का असुरों के भार ॥
उद्धार करने के लिए इस पृथ्वी पर प्रकट हुए हैं और जो हर एक को न दे सकते हैं।' जयति जन-निवासो देवकी-जन्म-वादोग्रदु-वर-परिषत्स्वैर्दोभिरस्यन्नधर्मम् । स्थिर-चर-वृजिन-घन: सुस्मित-श्री-मुखेनव्रज-पुर-वनितानां वर्धयन्काम-देवम् ॥
७९॥
भगवान् श्रीकृष्ण जननिवास हैं अर्थात् समस्त जीवों के परम आश्रय हैं और वे देवकीनन्दन या यशोदानन्दन भी कहलाते हैं। वे यदुवंश के मार्गदर्शक हैं और वे अपनी बलशाली भुजाओं से समस्त अशुभ वस्तुओं का तथा अपवित्र मनुष्यों का वध करते हैं। अपनी उपस्थिति से वे उन समस्त वस्तुओं का विनाश करते हैं, जो चर तथा अचर जीवों के लिए अशुभ वस्तुओं का विनाश करते हैं। उनका हँसमुख आनन्ददायक मुख वृन्दावन की गोपियों की कामेच्छाओं को बढ़ाने वाला है। वे विजयी और सुखी हों।
नाहं विप्रो न च नर-पतिर्नापि वैश्यो न शूद्रो ।नाहं वर्णी न च गृह-पतिर्ने वनस्थो तिर्वा ।। किन्तु प्रोद्यन्निखिल-परमानन्द-पूर्नामृताब्धेर् ।गोपी-भर्तुः पद-कमलयोर्दास-दासानुदासः ॥
८०॥
मैं न तो ब्राह्मण हूँ, न क्षत्रिय, न वैश्य, न ही शूद्र हूँ। न ही मैं ब्राह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ या संन्यासी हूँ। मैं तो गोपियों के भर्ता भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों के दास के दास का भी दास हूँ। वे अमृत के मागर के तुल्य हैं और विश्व के दिव्य आनन्द के कारणस्वरूप हैं। वे सदैव जोमय रहते हैं।
एत पड़ि' पुनरपि करिल प्रणाम ।झोड़-हाते भक्त-गण वन्दे भगवान् ॥
८१॥
शास्त्र के इन श्लोकों को सुनाने के बाद महाप्रभु ने पुनः नमस्कार किया और सारे भक्तों ने भी हाथ जोड़कर पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की निना की।
उद्दण्ड नृत्य प्रभु करिया हुङ्कार ।। चक्र-भ्रमि भ्रमे ग्रैछे अलात-आकार ॥
८२॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु बादलों जैसी गर्जना करते हुए और चक्र की तरह चक्कर लगाते हुए ऊँचा उछल-उछलकर नाच रहे थे, तब वे घूमते अग्निपुंज की तरह लग रहे थे।
नृत्ये प्रभुर याहाँ ग्राँहा पड़े पद-तल ।। ससागर-शैल मही करे टलमल ॥
८३॥
नाचते समय महाप्रभु जहाँ कहीं भी चरण रखते थे, पूरी धरती पर्वतों तथा समुद्रों समेत हिलती-डुलती प्रतीत हो रही थी।
स्तम्भ, स्वेद, पुलक, अश्रु, कम्प, वैवर्य ।नाना-भावे विवशता, गर्व, हर्ष, दैन्य ॥
८४॥
जब चैतन्य महाप्रभु नाच रहे थे, तब उनके शरीर में आनन्द के विविध यि विकार उत्पन्न हो उठे। कभी ऐसा लगता मानों वे जड़ हो गये हों। कभी उनके शरीर के रोंगटे खड़े हो जाते। कभी उन्हें पसीना आ जाता, कभी वे रोते, कभी वे काँपने लगते, कभी उनके शरीर का रंग बदल जाता | और कभी उनके शरीर में विवशता, गर्व, हर्ष और दैन्य के लक्षण प्रकट हो आते।
आछाड़ खाजा पड़े भूमे गड़ि' ग्राय ।।सुवर्ण-पर्वत चैछे भूमेते लोटाय ॥
८५ ॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु नाचते हुए पछाड़ खाकर गिरते तो वे भूमि ५। नीटने लगते। उस समय ऐसा प्रतीत होता मानो सुवर्ण पर्वत भूमि पर लौट रहा हो।
नित्यानन्द-प्रभु दुइ हात प्रसारिया। प्रभुरे धरिते चाहे आश-पाश धाबा ॥
८६॥
यह देखकर नित्यानन्द प्रभु अपने दोनों हाथ फैलाकर इधर-उधर दौड़ रहे महाप्रभु को पकड़ने का प्रयास करते।
प्रभु-पाछे बुले आचार्य करिया हुङ्कार ।।‘हरि-बोल' ‘हरि-बोल' बले बार बार ॥
८७॥
अद्वैत आचार्य महाप्रभु के पीछे-पीछे चलते और बारम्बार जोर-जोर से हरिबोल! हरिबोल! का उच्चारण करते।
लोक निवारिते हैल तिन मण्डले । प्रथम-मण्डले नित्यानन्द महा-बल ॥
८८॥
भीड़ को महाप्रभु के पास न आने से रोकने के लिए भक्तों ने तीन वर्तुल बना लिए थे। पहले वर्तुल का निर्देशन नित्यानन्द प्रभु कर रहे थे, जो साक्षात् बलराम अर्थात् महान् शक्ति के स्वामी हैं।
काशीश्वर गोविन्दादि यत भक्त-गण ।।हाताहाति करि' हैल द्वितीय आवरण ॥
८९॥
काशीश्वर तथा गोविन्द आदि सारे भक्तों ने एक-दूसरे का हाथ पकड़कर महाप्रभु के चारों ओर दूसरा वृत्त बना लिया।
बाहिरे प्रतापरुद्र लञा पात्र-गण ।। मण्डल हा करे लोक निवारण ॥
९०॥
महाराज प्रतापरुद्र तथा उनके निजी सहायकों ने दोनों भीतरी वर्तुलों के चारों ओर एक तीसरा वर्तुल बना लिया, जिससे भीड़ अधिक निकट न आ सके।
हरिचन्दनेर स्कन्धे हस्त आलम्बिया ।प्रभुर नृत्य देखे राजा आविष्ट हा ॥
९१॥
हरिचन्दन के कन्धों पर अपने हाथ रखकर राजा प्रतापरुद्र नृत्य करते हुए महाप्रभु का दर्शन कर सके और इससे वे अत्यधिक भावाविष्ट हो गये।
हेन-काले श्रीनिवास प्रेमाविष्ट-मन ।। राजार आगे रहि' देखे प्रभुर नर्तन ॥
९२॥
जब राजा नाच देख रहे थे, तब उनके आगे खड़े श्रीवास ठाकुर ने ज्योंही महाप्रभु को नाचते देखा, वे भावाविष्ट हो गये।
राजार आगे हरिचन्दन देखे श्रीनिवास । हस्ते ताँरे स्पर्शि' कहे,—हओ एक-पाश ॥
९३॥
श्रीवास ठाकुर को राजा के सामने खड़े देखकर हरिचन्दन ने अपने हाथ से श्रीवास को छूकर एक ओर हटने के लिए अनुरोध किया।
नृत्यावेशे श्रीनिवास किछुइ ना जाने ।। बार बार ठेले, तेंहो क्रोध हैल मने ॥
९४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु को नृत्य करते हुए देखने में मग्न होने के कारण भीवास ठाकुर यह नहीं समझ पाये कि उन्हें क्यों छुआ और धकेला जा रहा था। जब उन्हें बारम्बार धकेला गया, तो वे नाराज हो उठे।
चापड़ मारिया तारे कैल निवारण ।। चापड़ खाजा क्रुद्ध हैला हरिचन्दन ॥
९५॥
श्रीवास ठाकुर ने हरिचन्दन को झापड़ मारा, ताकि वह उन्हें धकेलना बन्द करे। इससे हरिचन्दन नाराज हो गया।
क्रुद्ध हा ताँरे किछु चाहे बलिबारे ।। आपनि प्रतापरुद्र निवारिल तारे ॥
९६।। जब क्रुद्ध हरिचन्दन श्रीवास ठाकुर से कुछ बोलने वाला था, तब प्रतापरुद्र महाराज ने खुद उसे रोका।
भाग्यवान्तुमि-इँहार हस्त-स्पर्श पाइला ।।आमार भाग्ये नाहि, तुमि कृतार्थ हैला ॥
९७॥
राजा प्रतापरुद्र ने कहा, तुम अत्यन्त भाग्यशाली हो, क्योंकि श्रीवास ठाकुर ने तुम्हें अपने स्पर्श से कृतार्थ किया है। मैं इतना भाग्यशाली नहीं। हूँ। तुम्हें उनके प्रति कृतज्ञता का अनुभव करना चाहिए।
प्रभुर नृत्य देखि' लोके हैल चमत्कार ।।अन्य आछु, जगन्नाथेर आनन्द अपार ॥
९८॥
चैतन्य महाप्रभु के नृत्य को देखकर हर व्यक्ति चकित था। यहाँ तक कि भगवान जगन्नाथ भी उन्हें देखकर अतीव प्रसन्न हुए।
रथ स्थिर कैल, आगे ना को गमन ।।अनिमिष-नेत्रे करे नृत्य दरशन ॥
९९ ।। उनका रथ पूर्णतया स्थिर हो गया और जब तक जगन्नाथ अपलक नेत्रों से श्री चैतन्य महाप्रभु का नाच देखते रहे, तब तक रथ स्थिर खड़ा हा।
सुभद्रा-बलरामेर हृदये उल्लास ।नृत्य देखि' दुइ जनार श्री-मुखेते हास ॥
१०० ॥
देवी सुभद्रा तथा भगवान् बलराम दोनों को अपने हृदयों में परम सुख तथा भाव का अनुभव हुआ। निस्सन्देह, वे नृत्य देखकर मुस्कुरा रहे थे।
उद्दण्ड नृत्ये प्रभुर अद्भुत विकार ।।अष्ट सात्त्विक भाव उदय हय सम-काल ॥
१०१॥
जब चैतन्य महाप्रभु नाच रहे थे और ऊँचे उछल रहे थे, तब उनके शरीर में आठ प्रकार के सात्त्विक भाव प्रकट हो आये। ये सारे लक्षण एकसाथ दृष्टिगोचर हो रहे थे।
मांस-व्रण सम रोम-वृन्द पुलकित ।शिमुलीर वृक्ष येन कण्टक-वेष्टित ॥
१०२॥
उनके शरीर के रोंगटे खड़े हो गये। ऐसा लगा मानो उनकी चमड़ी में फोड़े फूट निकले हों। उनका शरीर काँटों से आवृत-सेमल वृक्ष के समान प्रतीत हो रहा था।
एक एक दन्तेर कम्प देखिते लागे भय ।।लोके जाने, दन्त सब खसिया पड़य ॥
१०३।। उनके दाँतों को कटकटाते देखकर लोग डर गये और उन्होंने यहाँ तक सोच लिया कि उनके दाँत गिर जायेंगे।
सर्वाङ्गे प्रस्वेद छुटे ताते रक्तोद्गम ।। ‘जज गग' ‘जज गग'–गद्गद-वचन ॥
१०४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे शरीर से पसीना बह रहा था और साथ ही फ़ फूट रहा था। वे भावावेश में जज गग, जज गग की आँधी आवाज निकाल रहे थे।
जलयन्त्र-धारा ग्रैछे वहे अश्रु-जल ।।आश-पाशे लोक व्रत भिजिल सकल ॥
१०५॥
महाप्रभु की आँखों से तेजी से अश्रु निकल रहे थे, मानो पिचकारी में जल निकल रहा हो, जिससे उनके चारों ओर खड़े लोग भीग गये।
देह-कान्ति गौर-वर्ण देखिये अरुण ।।कभु कान्ति देखि ग्रेन मल्लिका-पुष्य-सम ॥
१०६ ॥
सभी लोगों ने देखा कि उनके शरीर का रंग गोरे से गुलाबी हो गया है, जिससे उनकी देह की कान्ति मल्लिका फूल जैसी लग रही थी।
कभु स्तम्भ, कभु प्रभु भूमिते लोटाय ।।शुष्क-काष्ठ-सम पद-हस्त ना चलय ॥
१०७॥
कभी वे स्तम्भित जान पड़ते और कभी जमीन पर लोटने लगते। कभी-कभी उनके हाथ तथा पाँव लकड़ी जैसे कड़े हो जाते, जिससे वे चल-फिर नहीं सकते थे।
कभु भूमे पड़े, कभु श्वास हय हीन ।ग्राहा देखि' भक्त-गणेर प्राण हय क्षीण ॥
१०८॥
जब महाप्रभु जमीन पर गिर पड़ते, तो कभी-कभी उनकी साँस रुकसी जाती। जब भक्तों ने ऐसा देखा, तो उनके प्राण भी क्षीण हो गये।
कभु नेत्रे नासाय जल, मुखे पड़े फेन ।।अमृतेर धारा चन्द्र-बिम्बे वहे ग्रेन ॥
१०९॥
कभी उनकी आँखों से पानी बहता, तो कभी नासिकाओं से। उनके मुख से फेन गिरता। ऐसा प्रतीत होता मानो चन्द्रमा से अमृत की धाराएँ बह चली हों।
सेइ फेन लञा शुभानन्द कैल पान ।। कृष्ण-प्रेम-रसिक तेंहो महा-भाग्यवान् ॥
११०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के मुख से जो फेन गिरा, उसे शुभानन्द ने पी लिया, क्योंकि वह महाभाग्यशाली था और कृष्ण-प्रेम रस का आस्वादन करने में पटु था।
एइ-मत ताण्डव-नृत्य कैल कत-क्षण ।। भाव-विशेषे प्रभुर प्रवेशिल मन ।। १११॥
कुछ काल तक ऐसा प्रलयंकारी नृत्य करने के बाद महाप्रभु का मन प्रेमभाव में प्रविष्ट हुआ।
ताण्डव-नृत्य छाड़ि' स्वरूपेरे आज्ञा दिल ।।हृदय जानिया स्वरूप गाइते लागिल ॥
११२।। नाचना छोड़कर महाप्रभु ने स्वरूप दामोदर को गाने के लिए आज्ञा दी। उनके मन की बात समझकर स्वरूप दामोदर इस प्रकार गाने लगे।
सेइ ते पराण-नाथ पाइनु ।ग्राहा लागि' मदन-दहने झुरि' गेनु ॥
११३॥
अब मुझे अपने जीवन के स्वामी प्राप्त हो गये हैं, जिनके बिना में कामदेव द्वारा दग्ध हो रही थी और सूखी जा रही थी।
एइ धुया उच्चैः-स्वरे गाय दामोदर ।।आनन्दे मधुर नृत्य करेन ईश्वर ॥
११४॥
जब स्वरूप दामोदर इस टेक को जोर-जोर से गा रहे थे, तब श्री चैतन्य महाप्रभु दिव्य आनन्द में मग्न होकर ताल पर फिर नृत्य करने लगे।
धीरे धीरे जगन्नाथ करेन गमन ।।आगे नृत्य करि' चलेन शचीर नन्दन ॥
११५॥
तब जगन्नाथजी का रथ धीरे-धीरे चलने लगा और शचीमाता के पुत्र आगे बढ़कर रथ के समक्ष नाचने लगे।
जगन्नाथे नेत्र दिया सबे नाचे, गाय ।।कीर्तनीया सह प्रभु पाछे पाछे ग्राय ॥
११६॥
नाचते तथा गाते हुए, भगवान जगन्नाथ के सामने जितने भक्त थे, वे उन्हीं पर आँखें टिकाये थे। तब चैतन्य महाप्रभु कीर्तनियों के साथ जुलूस के पिछले सिरे तक गये।
जगन्नाथे मग्न प्रभुर नयन-हृदय ।। श्री-हस्त-युगे करे गीतेर अभिनय ॥
११७॥
चैतन्य महाप्रभु अपने नेत्रों तथा मन को भगवान जगन्नाथ पर टिकाए हुए अपने दोनों हाथों से गीत का अभिनय करने लगे।
गौर यदि पाछे चले, श्याम हय स्थिरे ।।गौर आगे चले, श्याम चले धीरे-धीरे ॥
११८॥
गीत का अभिनय करते हुए महाप्रभु कभी-कभी जुलूस में पिछ जाते। ऐसे अवसरों पर भगवान जगन्नाथ स्थिर हो जाते। जब चैतन्य महाप्रभु पुनः आगे आ जाते, तो भगवान जगन्नाथ का रथ पुनः धीरे-धीरे चल देता।
एइ-मत गौर-श्यामे, दोंहे ठेलाठेलि ।। स्वरथे श्यामेरे राखे गौर महा-बली ॥
११९॥
इस तरह चैतन्य महाप्रभु तथा भगवान जगन्नाथ में यह देखने की होड़ लगी थी कि कौन आगे निकल जाए। किन्तु चैतन्य महाप्रभु इतने बलशाली थे कि जगन्नाथजी को अपने रथ में प्रतीक्षा करनी पड़ती।
नाचिते नाचिते प्रभुर हैला भावान्तर ।। हस्त तुलि' श्लोक पड़े करि' उच्चैः-स्वर ॥
१२०॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु नाच रहे थे, तो उनका भाव बदल गया।वे। अपने दोनों हाथ ऊपर उठाकर ऊँचे स्वर से निम्नलिखित श्लोक सुनाने लगे।
ग्रः कौमार-हरः स एव हि वरस्ता एव चैत्र-क्षेपास्ते चोन्मीलित-मालती-सुरभयः प्रौढ़ाः कदम्बानिलाः ।। सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरत-व्यापार-लीला-विधौ ।रेवा-रोधसि वेतसी-तरु-तले चेतः समुत्कण्ठते ॥
१२१॥
| जिस व्यक्ति ने युवावस्था में मेरा हृदय चुरा लिया था, वही अब फिर से मेरा स्वामी है। ये चैत्र-मास की वही चाँदनी रातें हैं। वही मालती पुष्पों की सुगन्ध है और कदम्ब वन की वही मधुर वायु बह रही है। अपने घनिष्ठ सम्बन्ध में मैं वही प्रेमिका हूँ, फिर भी मेरा मन यहाँ सुखी नहीं है। मैं रेवा नदी के तट पर स्थित वेतसी वृक्ष के नीचे वापस जाने के लिए उत्सुक हूँ। ही मेरी उत्कण्ठा है।
एइ श्लोक महाप्रभु पड़े बार बार ।। स्वरूप विना अर्थ केह ना जाने इहार ॥
१२२॥
श्री चैतन्य महप्रभु इस श्लोक को बारम्बार पढ़ रहे थे, किन्तु स्वरूप दामोदर के अलावा इसका अर्थ अन्य कोई नहीं समझ सका।
एइ श्लोकार्थ पूर्वे करियाछि व्याख्यान ।। श्लोकेर भावार्थ करि सङ्क्षेपे आख्यान ॥
१२३॥
मैं इस श्लोक की व्याख्या पहले ही कर चुका हूँ। अब मैं संक्षेप में इसका वर्णन करूंगा।
पूर्वे ट्रैछे कुरुक्षेत्रे सब गोपी-गण ।। कृष्णेर दर्शन पाञा आनन्दित मन ॥
१२४॥
पहले, जब वृन्दावन की सारी गोपियाँ कृष्ण से कुरुक्षेत्र की पवित्र भूमि में मिलीं, तो वे परम प्रसन्न हुईं।
जगन्नाथ देखि' प्रभुर से भाव उठिल ।। सेई भावाविष्ट हा धुया गाओयाइल ॥
१२५॥
इसी तरह भगवान जगन्नाथ का दर्शन करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु में गोपी-भाव जाग्रत हुआ। इस भाव में मग्न होने के कारण होंने स्वरूप दामोदर से कहा कि वे टेक गायें।
अवशेषे राधा कृष्णे करे निवेदन ।। सेइ तुमि, सेइ आमि, सेइ नव सङ्गम ॥
१२६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान जगन्नाथ से इस प्रकार कहा, आप ही कृष्ण हैं और मैं वही राधारानी हूँ। हम पुनः उसी प्रकार मिल रहे हैं, wम तरह हम अपने जीवन के प्रारम्भ में मिले थे।
तथापि आमार मन हरे वृन्दावन ।। वृन्दावने उदय कराओ आपन-चरण ॥
१२७॥
यद्यपि हम दोनों वही हैं, किन्तु आज भी मेरा मन वृन्दावन-धाम के प्रति आकृष्ट होता है। मेरी इच्छा है कि आप पुनः वृन्दावन में अपने चरणकमल रखें।
इहाँ लोकारण्य, हाती, घोड़ा, रथ-ध्वनि ।। ताहाँ पुष्पारण्य, भृङ्ग-पिक-नाद शुनि ॥
१२८॥
कुरुक्षेत्र में लोगों की भीड़ है; उनके हाथी, घोड़े तथा घर घर्र करते रथ हैं। किन्तु वृन्दावन में फूलों के बाग हैं और उनमें मधुमक्खियों की गुंजार तथा पक्षियों की चहचहाहट सुनी जा सकती है।
इहाँ राज-वेश, सङ्गे सब क्षत्रिय-गण । ताहाँ गोप-वेश, सङ्गे मुरली-वादन ॥
१२९॥
यहाँ कुरुक्षेत्र में आप राजसी वेश में हैं और आपके साथ बड़े-बड़े योद्धा हैं, किन्तु वृन्दावन में आप सामान्य ग्वालबाल की तरह अपनी सुन्दर मुरली लिए प्रकट हुए थे।
व्रजे तोमार सङ्गे ग्रेइ सुख-आस्वादन । सेइ सुख-समुद्रेर इहाँ नाहि एक कण ॥
१३०॥
यहाँ पर उस सुखसागर की एक बूंद भी नहीं है, जिसका आनन्द मैं वृन्दावन में आपके साथ लेती थी।
आमा लञा पुनः लीला करह वृन्दावने ।। तबे आमार मनो-वाञ्छा हय त' पूरणे ॥
१३१॥
अतएव मैं आपसे प्रार्थना करती हूँ कि आप वृन्दावन आयें और मेरे साथ लीलाविलास करें। यदि आप ऐसा करेंगे, तो मेरी मनोकामना पूरी हो जायेगी।
भागवते आछे प्रैछे राधिका-वचन ।पूर्वे ताहा सूत्र-मध्ये करियाछि वर्णन ॥
१३२॥
मैं पहले ही श्रीमद्भागवत से श्रीमती राधारानी के कथन का संक्षिप्त वर्णन कर चुका हूँ।
सेइ भावावेशे प्रभु पड़े आर श्लोक ।।सेइ सब श्लोकेर अर्थ नाहि बुझे लोक ॥
१३३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस भावावेश में अन्य कई श्लोक सुनाये, किन्तु सामान्य लोग उनका अर्थ नहीं समझ सके।
स्वरूप-गोसाजि जाने, ना कहे अर्थ तार ।। श्री-रूप-गोसात्रि कैल से अर्थ प्रचार ॥
१३४॥
इन श्लोकों का अर्थ स्वरूप दामोदर गोस्वामी को ज्ञात था, किन्तु होंने इसे प्रकट नहीं किया। फिर भी श्री रूप गोस्वामी ने इसका अर्थ ज्ञापित किया है।
स्वरूप सङ्गे ग्रार अर्थ करे आस्वादन ।।नृत्य-मध्ये सेइ श्लोक करेन पठन ॥
१३५॥
नाचते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने निम्नलिखित श्लोक पढ़ना शुरू किया, जिसका आस्वादन उन्होंने स्वरूप दामोदर गोस्वामी के साथ किया।
आहुश्च ते नलिन-नाभ पदारविन्दंग्रोगेश्वरैर्हदि विचिन्त्यमगाध-बोधैः ।। संसार-कूप-पतितोत्तरणावलम्बंगेहं जुषामपि मनस्युदियात्सदा नः ॥
१३६॥
[ गोपियाँ इस प्रकार बोलीं : हे कमल-नाभ, जो लोग भौतिक संसाररूपी गहरे कुएँ में गिर चुके हैं, उनके लिए आपके चरणकमल ही एकमात्र आश्रय हैं। आपके चरणों की पूजा तथा उनका ध्यान बड़े-बड़े योगी तथा विद्वान दार्शनिक करते हैं। हम चाहती हैं कि वे ही चरणकमल हमारे हृदयों में भी उदित हों, यद्यपि हम सभी गोपियाँ गृहस्थी के कार्यों में संलग्न रहने वाली सामान्य स्त्रीयाँ हैं।
‘मने' ‘वने' एक करि' जानि ।। ताहाँ तोमार पद-द्वय, कराह यदि उदय, तबे तोमार पूर्ण कृपा मानि ॥
१३७॥
श्रीमती राधारानी के भाव में श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, अधिकांश गोगों के लिए मन तथा हृदय एक होते हैं, किन्तु मेरा मन कभी भी गन्दावन से अलग नहीं होता, अतएव मैं अपने मन और वृन्दावन को एक मानती हूँ। मेरा मन पहले से वृन्दावन है और चूँकि आप वृन्दावन को पसन्द करते हैं, तो क्या आप अपने चरणकमल वहाँ रखेंगे? इसे मैं आपकी पूर्ण कृपा मानूंगी।
प्राण-नाथ, शुन मोर सत्य निवेदन व्रज–आमार सदन, ताहाँ तोमार सङ्गम, ।।ना पाइले ना रहे जीवन ॥
१३८॥
हे प्रभु, कृपया मेरी सच्ची विनती सुनें। मेरा घर वृन्दावन है और मैं वहाँ आपका सान्निध्य चाहती हूँ। किन्तु यदि मुझे सान्निध्य नहीं मिला, तो मेरा जीवन दूर्भर हो जायेगा।
पूर्वे उद्धव-द्वारे, एबे साक्षातामारे,योग-ज्ञाने कहिला उपाय । तुमि–विदग्ध, कृपामय, जानह आमार हृदय,मोरे ऐछे कहिते ना युयाय ॥
१३९॥
हे कृष्ण, जब आप पहले मथुरा में रह रहे थे, तब आपने मुझे योग तथा ज्ञान की शिक्षा देने के लिए उद्धव को भेजा था। अब आप स्वयं वही बात कह रहे हैं, किन्तु मेरा मन उसे स्वीकार नहीं करता। मेरे मन में ज्ञानयोग या ध्यानयोग के लिए कोई स्थान नहीं है। यद्यपि आप मुझे अच्छी तरह से जानते हैं, फिर भी ज्ञानयोग तथा ध्यानयोग का उपदेश दे रहे हैं। ऐसा करना आपके लिए उचित नहीं है।
चित्त काढ़ि' तोमा हैते, विषये चाहि लागाइते,य़त्न करि, नारि काढ़िबारे । तारे ध्यान शिक्षा कराह, लोक हासाला मार,स्थानास्थान ना कर विचारे ॥
१४०॥
चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, मैं अपनी चेतना आपसे हटाकर भौतिक कार्यों में लगाना चाहती हैं, लेकिन लाख प्रयत्न करके भी ऐसा नहीं कर पाती। मैं स्वभाव से आपकी ओर उन्मुख हूँ। अतएव आपका यह उपदेश कि मैं आपका ध्यान करू, अत्यन्त हास्यास्पद प्रतीत होता है। इस तरह आप तो मुझे मारे डाल रहे हैं। आपके लिए अच्छा नहीं है कि आप मुझे अपने उपदेशों का पात्र समझें।।
नहे गोपी योगेश्वर, पद-कमल तोमार,ध्यान करि' पाइबे सन्तोष । तोमार वाक्य-परिपाटी, तार मध्ये कुटिनाटी,शुनि' गोपीर आरो बाढ़ रोष ॥
१४१ ॥
गोपियाँ योगियों जैसी नहीं हैं। वे आपके चरणकमलों का ध्यान ने एवं तथाकथित योगियों का अनुकरण करने मात्र से कभी तुष्ट नहीं होगी। गोपियों को ध्यान की शिक्षा देना एक अन्य प्रकार का छल है। जबउन्हें योगाभ्यास करने का उपदेश दिया जाता है, तब वे तनिक भी सन्तुष्ट नहीं होतीं। उल्टे वे आपसे और अधिक नाराज हो जाती हैं।
देह-स्मृति नाहि झार, संसार-कूप काहाँ तार,ताहा हैते ना चाहे उद्धार ।। विरह-समुद्र-जले, काम-तिमिङ्गिले गिले,गोपी-गणे नेह' तार पार ॥
१४२। श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, गोपियाँ विरह रूपी महासागर में १गर गईं हैं और उन्हें आपकी सेवा करने की अभिलाषा रूपी तिमिंगल मछली निगले जा रही है। शुद्ध भक्त होने के कारण गोपियों को इन शिपिंगल मछलियों से बचाना है। उन्हें जीवन की भौतिक अनुभूति नहीं तो फिर वे मुक्ति की आकांक्षा क्यों करें ? गोपियों को योगियों तथा भनियों द्वारा अभीष्ट मुक्ति नहीं चाहिए, क्योंकि वे पहले से ही भौतिक अस्तित्व के सागर से मुक्त हो चुकी हैं।
वृन्दावन, गोवर्धन, ग्रमुना-पुलिन, वन,सेइ कुल्ले रासादिक लीला ।। सेइ व्रजेर व्रज-जन, माता, पिता, बन्धु-गण,बड़ चित्र, केमने पासरिला ॥
१४३॥
यह विचित्र बात है कि आप वृन्दावन की भूमि को भूल गये हैं। भला आप अपने पिता, माता तथा मित्रों को कैसे भूल गये? आपने गोवर्धन पर्वत, यमुना-तट तथा उस वन को, जहाँ आप रासनृत्य का आनन्द लूटते थे, किस तरह भुला दिया? विदग्ध, मृदु, सद्गुण, सुशील, स्निग्ध, करुण,तुमि, तोमार नाहि दोषाभास ।। तबे ने तोमार मन, नाहि स्मरे व्रज-जन,से—आमार दुर्दैव-विलास ॥
१४४ ॥
हे कृष्ण, आप समस्त सद्गुणों से युक्त शिष्ट महानुभाव हैं। आप सदाचारी हैं, नम्र हृदय वाले तथा दयालु हैं। मैं जानती हूँ कि आपमें दोष का लेशमात्र भी नहीं है, फिर भी आपका मन वृन्दावनवासियों का स्मरण तक नहीं करता। यह हमारे दुर्भाग्य के अलावा और क्या हो सकता है? ना गणि आपन-दुःख, देखि' व्रजेश्वरी-मुख,व्रज-जनेर हृदय विदरे । किबा मार' व्रज-वासी, किबा जीयाओ व्रजे आसि',केन जीयाओ दुःख सहाइबारे? ॥
१४५ ॥
मुझे अपने निजी दुःख की परवाह नहीं है, किन्तु जब मैं माता यशोदा का खिन्न मुखड़ा तथा आपके कारण समस्त वृन्दावनवासियों के भग्न हृदयों को देखती हूँ, तो मुझे आश्चर्य होता है कि आप कहीं उन सबको मारना तो नहीं चाहते। या आप यहाँ आकर उन्हें जीवनदान देना चाहते हैं? आप क्यों उन्हें कष्टप्रद स्थिति में जिन्दा रखना चाहते हैं? तोमार ने अन्य वेश, अन्य सङ्ग, अन्य देश,व्रज-जने कभु नाहि भाय ।। व्रज-भूमि छाड़िते नारे, तोमा ना देखिले मरे,व्रज-जनेर कि हबे उपाय ॥
१४६॥
वृन्दावन के निवासी आपको न तो राजकुमार के वेश में देखना चाहते हैं, न ही वे चाहते हैं कि आप अनजाने देश में महायोद्धाओं की संगति करें। वे वृन्दावन भूमि को छोड़ नहीं सकते और आपकी उपस्थिति के बिना वे सब मर रहे हैं। न जाने उनकी कैसी दशा होगी? तुमि--व्रजेर जीवन, व्रज-राजेर प्राण-धन,तुमि व्रजेर सकल सम्पद् । कृपाई तोमार मन, आसि' जीयाओ व्रज-जन,व्रजे उदय कराओ निज-पद ॥
१४७।। हे कृष्ण, आप वृन्दावन धाम के प्राण और आत्मा हैं। आप विशेषकर नन्द महाराज के जीवन हैं। आप वृन्दावन भूमि में एकमात्र ऐश्वर्य हैं और आप अत्यन्त कृपालु हैं। कृपा करके आइये और सभी वृन्दावनवासियों को जीवन दीजिये। कृपया वृन्दावन में पुनः अपने चरणकमल रखिये।
शुनिया राधिका-वाणी, व्रज-प्रेम मने आनि,भावे व्याकुलित देह-मन ।। व्रज-लोकेर प्रेम शुनि', आपनाके 'ऋणी' मानि',करे कृष्ण ताँरे आश्वासन ॥
१४८॥
श्रीमती राधारानी के वचनों को सुनकर भगवान् कृष्ण में वृन्दावनवासियों के प्रति प्रेम जाग्रत हो आया और उनका तन तथा मन अत्यन्त व्याकुल हो उठा। अपने प्रति उनके प्रेम की बात सुनकर भगवान् ने सोचा कि वे वृन्दावनवासियों के चिर ऋणी हैं। तब कृष्ण श्रीमती राधारानी को इस प्रकार सान्त्वना देने लगे।
प्राण-प्रिये, शुन, मोर ए-सत्य-वचन तोमा-सबार स्मरणे, झुरों मुजि रात्रि-दिने, ।। मोर दुःख ना जाने कोन जन ॥
१४९॥
प्रिय श्रीमती राधारानी! कृपया मेरी बात सुनो। मैं सच कह रहा हूँ। मैं तुम समस्त वृन्दावनवासियों की याद कर-करके रात-दिन रोता रहता हूँ। कोई नहीं जानता कि इससे मैं कितना दुःखी हो जाता हूँ।
व्रज-वासी ग्रत जन, माता, पिता, सखा-गण,सबे हय मोर प्राण-सम ।। ताँर मध्ये गोपी-गण, साक्षात्मोर जीवन,तुमि मोर जीवनेर जीवन ॥
१५० ।। श्रीकृष्ण ने आगे कहा, वृन्दावन धाम के सारे निवासी-मेरे माता, पिता, ग्वालसखा तथा अन्य सभी मेरे प्राणों के समान हैं। वृन्दावन के सारे निवासियों में से गोपियाँ तो मेरे प्राण के समान हैं और गोपियों में, हे राधारानी! तुम मुख्य हो। अतएव तुम मेरे जीवन का भी जीवन हो।
तोमा-सबार प्रेम-रसे, आमाके करिल वशे,आमि तोमार अधीन केवल । तोमा-सबा छाड़ाळा, आमा दूर-देशे लजा,राखियाछे दुर्दैव प्रबल ॥
१५१॥
हे श्रीमती राधारानी! मैं तुम सबके प्रेम के अधीन हूँ। मैं तो एकमात्र तुम्हारे वश में हूँ। तुमसे मेरा विछोह तथा दूर स्थान में मेरा प्रवास मेरे प्रबल दुर्भाग्य के कारण ही हुआ है।
प्रिया प्रिय-सङ्ग-हीना, प्रिय प्रिया-सङ्ग विना,नाहि जीये,—ए सत्य प्रमाण ।। मोर दशा शोने ग्रबे, ताँर एइ दशा हबे,एइ भये मुँहे राखे प्राण ॥
१५२॥
जब किसी स्त्री का उसके प्रेमी से विछोह होता है या कोई पुरुष अपनी प्रिया से विलग होता है, तो उनमें से कोई भी जीवित नहीं रह सकता। यह तथ्य है कि वे एक-दूसरे के लिए जीवित रहते हैं, क्योंकि | पर इनमें से कोई मरता है, तो दूसरा इसे सुनते ही मर जाता है।
सेइ सती प्रेमवती, प्रेमवान्सेइ पति,वियोगे ये वाञ्छे प्रिय-हिते ।। ना गणे आपन-दुःख, वाञ्छे प्रियजन-सुख,सेइ दुइ मिले अचिराते ॥
१५३ ॥
॥
ऐसी प्रेमवती सती पत्नी तथा प्रेमवान पति, विरह में एक-दूसरे की शुभकामना करते हैं और अपने निजी सुख की परवाह नहीं करते। वे एक-दूसरे के कल्याण की ही कामना करते रहते हैं। ऐसे प्रेमी-प्रेमिका दोनों शीघ्र ही फिर से मिलते हैं।
राखिते तोमार जीवन, सेवि आमि नारायण,ताँर शक्त्ये आसि निति-निति ।। तोमा-सने क्रीड़ा करि', निति ग्राइ ग्रदु-पुरी,ताहा तुमि मानह मोर स्फूर्ति ॥
१५४॥
तुम मेरी अत्यन्त प्रिय हो और मैं जानता हूँ कि तुम मेरे बिना एक क्षण भी जीवित नहीं रह सकती। तुम्हें जीवित रखने के लिए ही मैं भगवान् नारायण की पूजा करता हूँ। उनकी कृपामयी शक्ति से मैं तुम्हारे साथ । लीला करने के लिए नित्य वृन्दावन आता हूँ। फिर मैं द्वारका धाम लौट जाता हूँ। इस तरह तुम वृन्दावन में सदैव मेरी उपस्थिति का अनुभव कर सकती हो।
मोर भाग्य मो-विषये, तोमार ने प्रेम हये,सेइ प्रेम-परम प्रबल ।। लुका आमा आने, सङ्ग कराय तोमा-सने,प्रकटेह आनिबे सत्वर ॥
१५५ ॥
हमारी प्रेम-व्यापार इतना शक्तिशाली इसीलिए है, क्योंकि सौभाग्यवश मुझे नारायण की कृपा प्राप्त है। इससे मैं दूसरों से अप्रकट होकर वहाँ आ सकता हूं। मुझे आशा है कि शीघ्र ही मैं सबको दिख सर्केगा।
यादवेर विपक्ष, ग्रेत दुष्ट कंस-पक्ष,ताहा आमि कैलँ सब क्षय । आछे दुइ-चारि जन, ताहा मारि' वृन्दावन, आइलाम आमि, जानिह निश्चय ॥
१५६ ॥
मैं यदुवंश के उत्पाती असुर शत्रुओं को पहले ही मार चुका हूँ और मैंने कंस तथा उनके मित्रों का भी वध कर दिया है। फिर भी दो-चार असुर अभी भी बचे हुए हैं। मैं उन्हें मारना चाहता हूँ और उनका वध करने के बाद मैं शीघ्र ही वृन्दावन लौट आऊँगा। इसे तुम निश्चित जानो।
सेइ शत्रु-गण हैते, व्रज-जन राखिते,रहि राज्ये उदासीन हजा।। येबा स्त्री-पुत्र-धने, करि राज्य आवरणे,ग्रदु-गणेर सन्तोष लागिया ॥
१५७॥
मैं वृन्दावन के निवासियों को अपने शत्रुओं के हमलों से बचाना चाहता हूँ। इसीलिए मैं अपने राज्य में रहता हूँ, अन्यथा मैं अपने राजसी पद के प्रति उदासीन हूँ। मैं राज्य में जो भी पत्नियाँ, पुत्र तथा धन रखता हैं, वे सारे के सारे केवल यदुओं के सन्तोष के लिए हैं।
तोमार ग्रे प्रेम-गुण, करे आमा आकर्षण,आनिबे आमा दिन दश बिशे ।। पुनः आसि' वृन्दावने, व्रज-वधू तोमा-सने,विलसिब रजनी-दिवसे ॥
१५८ ॥
तुम्हारे प्रेममय गुण मुझे सदैव वृन्दावन की ओर खींचते रहते हैं। वे दस-बीस दिनों में मुझे, निश्चय ही, वापस बुला लेंगे और लौटने पर मैं तुम्हारे तथा व्रजभूमि की सारी बालाओं के साथ रात-दिन विलास करूंगा।
एत तौरे कहि कृष्ण, व्रजे ग्राइते सतृष्ण,एक श्लोक पड़ि' शुनाइल ।। सेइ श्लोक शुनि' राधा, खाण्डिल सकल बाधा,कृष्ण-प्राप्त्ये प्रतीति हइल ॥
१५९॥
श्रीमती राधारानी से बातें करते हुए कृष्ण वृन्दावन लौट आने के लिए अत्यन्त उत्सुक हो उठे। उन्होंने उन्हें एक श्लोक सुनाया, जिससे उनके ( श्रीमती राधारानी के ) सारे कष्ट दूर हो गये और आश्वासन प्राप्त हुआ कि उन्हें पुनः श्रीकृष्ण प्राप्त हो जायेंगे।
मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते ।।दिष्ट्या यदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः ॥
१६०॥
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा, मुझे प्राप्त करने का एकमात्र उपाय है। मेरी भक्ति करना । हे गोपियों, तुम लोगों ने सौभाग्यवश मेरे लिए जितना भी स्नेह एवं प्रेम प्राप्त कर रखा है, उसी के कारण मैं तुम्हारे पास वापस आ रहा हूँ।
एइ सब अर्थ प्रभु स्वरूपेर सने ।।रात्रि-दिने घरे वसि' करे आस्वादने ॥
१६१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु अपने कमरे में स्वरूप दामोदर के साथ बैठ जाते और इन श्लोकों का रसास्वादन दिन-रात किया करते।
नृत्य-काले सेइ भावे आविष्ट हञा ।।श्लोक पड़ि' नाचे जगन्नाथ-मुख चाजा ॥
१६२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूर्णतया भावमग्न होकर नृत्य किया। जगन्नाथ के मुख का दर्शन करते हुए वे नाचते और इन श्लोकों को सुनाते जाते।
स्वरूप-गोसाजिर भाग्य ना ग्राय वर्णन ।।प्रभुते आविष्ट याँर काय, वाक्य, मन ॥
१६३ ॥
स्वरूप दामोदर गोस्वामी के सौभाग्य का वर्णन नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे अपने शरीर, मन तथा वाणी से महाप्रभु की सेवा में सदैव लीन रहते हैं।
स्वरूपेर इन्द्रिये प्रभुर निजेन्द्रिय-गण ।। आविष्ट हञा करे गान-आस्वादन ॥
१६४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की इन्द्रियाँ स्वरूप की इन्द्रियों से अभिन्न थीं। अतएव चैतन्य महाप्रभु स्वरूप दामोदर के गाने का आस्वादन करते हुए। पूर्णतया निमग्न हो जाते थे।
भावेर आवेशे कभु भूमिते वसिया ।। तर्जनीते भूमे लिखे अधोमुख हा ॥
१६५ ॥
कभी-कभी भावावेश में चैतन्य महाप्रभु जमीन पर बैठ जाते और नीचे देखते हुए जमीन पर अपनी अँगुली से लिखा करते।
अङ्गलिते क्षत हबे जानि' दामोदर ।।भये निज-करे निवारये प्रभु-कर ॥
१६६॥
यह जानकर कि अँगुली से इस प्रकार लिखते रहने से महाप्रभु को। क्षति पहुँच सकती है, स्वरूप दामोदर ने अपने हाथ से उन्हें रोका।
प्रभुर भावानुरूप स्वरूपेर गान ।।ग्रबे येइ रस ताहा करे मूर्तिमान् ॥
१६७॥
स्वरूप दामोदर महाप्रभु के भाव के अनुरूप ही गाया करते थे। जब भी महाप्रभु किसी रस विशेष का आस्वादन करते, स्वरूप दामोदर उसे गाकर साकार कर देते।
श्री-जगन्नाथेर देखे श्री-मुख-कमल ।ताहार उपर सुन्दर नयन-युगल ॥
१६८। श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान् जगन्नाथ के सुन्दर कमल जैसे मुख तथा नेत्रों के दर्शन किए।
सूर्येर किरणे मुख करे झलमल । माल्य, वस्त्र, दिव्य अलङ्कार, परिमल ॥
१६९॥
भगवान् जगन्नाथ माला पहने थे, सुन्दर वस्त्रों से सजित एवं सुन्दर आभूषणों से अलंकृत थे। उनका मुख सूर्य की किरणों से जगमगा रहा था और समूचा वातावरण सुगन्धित था।
प्रभुर हृदये आनन्द-सिन्धु उथलिल । उन्माद, झञ्झा-वात तत्क्षणे उठिल ॥
१७०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के हृदय में दिव्य आनन्द का सागर उमड़ रहा था और उनमें उन्मत्तता के लक्षण तुरन्त तूफान की तरह जोर पकड़ने लगे।
आनन्दोन्मादे उठाय भावेर तरङ्ग ।।नाना-भाव-सैन्ये उपजिल युद्ध-रङ्ग ॥
१७१॥
दिव्य आनन्द की उन्मत्तता से विविध भावों की तरंगें उत्पन्न हुई। ये भाव युद्ध करते हुए प्रतिद्वन्द्वी सैनिकों जैसे प्रतीत हो रहे थे।
भावोदय, भाव-शान्ति, सन्धि, शाबल्य ।। सञ्चारी, सात्त्विक, स्थायी स्वभाव-प्राबल्य ।। १७२॥
प्राकृतिक भावों के सभी लक्षणों में वृद्धि हो गई; फलतः भावों का उदय, भाव-शान्ति, मिश्रित भाव, युक्त-भाव, दिव्य भाव तथा स्थाई भाव तथा भाव प्रबलता देखी गई।
प्रभुर शरीर ग्रेन शुद्ध-हेमाचल ।। भाव-पुष्प-द्रुम ताहे पुष्पित सकल ॥
१७३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु का शरीर दिव्य हिमालय पर्वत जैसा लगने लगा, जिसमें भावों के पुष्पित वृक्ष उगे हों और ये सारे वृक्ष खिल रहे हों।
देखिते आकर्षये सबार चित्त-मन । प्रेमामृत-वृष्ट्ये प्रभु सिञ्चे सबार मन ॥
१७४॥
इन सारे लक्षणों को देखकर हर एक के मन तथा चित्त आकृष्ट हो रहे थे। महाप्रभु ने हर एक के मन को दिव्य भगवत्प्रेम रूपी अमृत से सींच दिया।
जगन्नाथ–सेवक ग्रत राज-पात्र-गण ।। झात्रिक लोक, नीलाचल-वासी मृत जन ॥
१७५॥
उन्होंने जगन्नाथजी के सेवकों, सरकारी अफसरों, यात्रियों, सामान्य जनता तथा जगन्नाथ पुरी के सभी निवासियों के मनों को सिंचित किया।
प्रभुर नृत्य प्रेम देखि' हय चमत्कार ।। कृष्ण-प्रेम उछलिल हृदये सबार ॥
१७६ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के नृत्य तथा भाव-प्रेम को देखकर सारे लोग चकित हो गये। उन सबके हृदयों में कृष्ण-प्रेम का उछाल लेने लगा।
प्रेमे नाचे, गाय, लोक, करे कोलाहल ।। प्रभुर नृत्य देखि' सबे आनन्दे विह्वल ॥
१७७॥
हर व्यक्ति भाव-प्रेम में नाचने और गाने लगा तथा महान् कोलाहल गूंजने लगा। हर कोई श्री चैतन्य महाप्रभु को नाचते देखकर दिव्य आनन्द से अभिभूत हो गया।
कभु सुखे नृत्य-रङ्ग देखे रथ राखि' ।। से कौतुक ये देखिल, सेइ तार साक्षी ।। १७९ ॥
भगवान् जगन्नाथ तथा भगवान् बलराम कभी-कभी रथ रोक देते और प्रसन्नतापूर्वक महाप्रभु का नृत्य देखने लगते। जो कोई भी उन्हें रथ रोककर नृत्य देखते देख सका, वह उनकी लीलाओं का साक्षी है।
अन्येर कि काय, जगन्नाथ-हलधर ।। प्रभुर नृत्य देखि' सुखे चलिला मन्थर ॥
१७८॥
अन्यों की जाने दें, भगवान जगन्नाथ तथा भगवान् बलराम तक श्री चैतन्य महाप्रभु का नृत्य देखकर परम प्रसन्नतापूर्वक धीरे-धीरे चलने लगे।
एइ-मत प्रभु नृत्य करिते भ्रमिते । प्रतापरुद्रेर आगे लागिला पड़िते ॥
१८०॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु इस तरह नाच तथा घूम रहे थे, तब वे महाराज प्रतापरुद्र के सामने गिर पड़े।
सम्भ्रमे प्रतापरुद्र प्रभुके धरिल ।। ताँहाके देख़िते प्रभुर बाह्य-ज्ञान हइल ॥
१८१॥
महाराज प्रतापरुद्र ने बड़े सम्मान से महाप्रभु को उठाया, किन्तु राजा को देखकर महाप्रभु को बाह्य चेतना आ गई।
राजा देखि' महाप्रभु करेन धिक्कार ।। छि, छि, विषयीर स्पर्श हइल आमार ॥
१८२॥
राजा को देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने आपको यह कहकर धिक्कारा, छिः! कितने दुःख की बात है कि मैंने ऐसे व्यक्ति का स्पर्श कर लिया, जो संसारी मामलों में रुचि रखता है।
आवेशेते नित्यानन्द ना हैला सावधाने ।। काशीश्वर-गोविन्द आछिला अन्य-स्थाने ॥
१८३॥
जब चैतन्य महाप्रभु गिरे, तो न तो नित्यानन्द प्रभु ने, न ही काशीश्वर या गोविन्द ने उनको संभाला। नित्यानन्द अत्यधिक आवेश में थे और काशीश्वर तथा गोविन्द अन्यत्र थे।
यद्यपि राजार देखि हाड़िर सेवन ।। प्रसन्न हाछे ताँरे मिलिबारे मन ॥
१८४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु पहले ही राजा के व्यवहार से प्रसन्न हो चुके थे, क्योंकि राजा ने भगवान जगन्नाथ के लिए झाड़ लगाने का काम स्वीकार किया था। अतः श्री चैतन्य महाप्रभु राजा को वास्तव में मिलना चाहते तथापि आपन-गणे करिते सावधान ।। बाह्ये किछु रोषाभास कैला भगवान् ॥
१८५॥
तथापि अपने निजी संगियों को आगाह करने के लिए पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु ने ऊपर से रोष प्रकट किया।
प्रभुर वचने राजार मने हैल भय ।। सार्वभौम कहे, तुमि ना कर संशय ॥
१८६॥
महाप्रभु द्वारा बाहरी रोष दिखाये जाने पर राजा प्रतापरुद्र भयभीत हो गये, लेकिन सार्वभौम भट्टाचार्य ने राजा से कहा, आप चिन्ता न करें।
तोमार उपरे प्रभुर सुप्रसन्न मन ।।तोमा लक्ष्य करि' शिखायेन निज गण ॥
१८७॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने राजा से कहा, महाप्रभु आप से अत्यन्त प्रसन्न हैं। वे आपको लक्ष्य बनाकर अपने निजी संगियों को शिक्षा दे रहे थे कि संसारी लोगों से किस तरह व्यवहार करना चाहिए।
अवसर जानि' आमि करिब निवेदन ।।सेइ-काले ग्राइ' करिह प्रभुर मिलन ॥
१८८॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने आगे कहा, उपयुक्त अवसर पाकर मैं आपकानिवेदन प्रस्तुत करूंगा। तब आपके लिए आकर महाप्रभु से मिलना आसान होगा।
तबे महाप्रभु रथ प्रदक्षिण करिया ।। रथ-पाछे स्राइ' ठेले रथे माथा दिया ॥
१८९॥
जगन्नाथ की प्रदक्षिणा करके श्री चैतन्य महाप्रभु रथ के पीछे चले गये और अपने सिर से रथ को ढकेलने लगे।
ठेलितेइ चलिल रथ 'हड़' ‘हड़' करि' ।। चतुर्दिके लोक सब बले ‘हरि' ‘हरि' ॥
१९०॥
उनके ढकेलते ही रथ'घर' 'घर' की आवाज करके चल पड़ा। चारों ओर से लोग भगवान् के पवित्र नाम-हरि! हरि! -का उच्चारण करने लगे।
तबे प्रभु निज-भक्त-गण ला सङ्गे।।बलदेव-सुभद्राग्रे नृत्य करे रङ्गे ॥
१९१॥
जैसे ही रथ चल दिया, श्री चैतन्य महाप्रभु अपने निजी संगियों को भगवान् बलराम तथा लक्ष्मी देवी सुभद्रा के रथों के समक्ष ले गये। वे अत्यधिक प्रेरित होकर उनके समक्ष नाचने लगे।
ताहाँ नृत्य करि' जगन्नाथ आगे आइला ।।जगन्नाथ देखि' नृत्य करते लागिला ॥
१९२॥
बलदेवजी तथा सुभद्रा के समक्ष नृत्य करने के बाद श्री महाप्रभु भगवान जगन्नाथ के रथ के समक्ष आये और उन्हें देखकर पुनः नाचने नगे।
चलिया आइल रथ' बलगण्डि'–स्थाने ।।जगन्नाथ रथ राखि' देखे डाहिने वामे ॥
१९३॥
जब वे बलगंडि नामक स्थान पर पहुँचे, तो भगवान जगन्नाथ ने अपना रथ रोक दिया और दाएँ-बाएँ देखने लगे।
वामे-‘विप्र-शासन' नारिकेल-वन ।।डाहिने त' पुष्पोद्यान येन वृन्दावन ॥
१९४॥
भगवान जगन्नाथ ने बाईं ओर ब्राह्मणों की बस्ती विप्रशासन और नारियल के वृक्षों का कुंज देखा। दाहिनी ओर उन्होंने पवित्र धाम वृन्दावन के जैसे सुन्दर पुष्पों के उद्यान देखे।
आगे नृत्य करे गौर लञा भक्त-गण ।।रथ राखि' जगन्नाथ करेन दरशन ॥
१९५।। श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके भक्त रथ के सामने नाच रहे थे और भगवान् जगन्नाथ अपना रथ रोककर उनका नृत्य देखने लगे।
सेइ स्थले भोग लागे,—आछये नियम ।। कोटि भोग जगन्नाथ करे आस्वादन ॥
१९६॥
भगवान् को विप्रशासन स्थान पर भोजन समर्पित किये जाने की प्रथा थी। उन्हें असंख्य व्यंजन समर्पित किये गये और जगन्नाथजी ने उन सबका आस्वादन किया।
जगन्नाथेर छोट-बड़ त भक्त-गण । निज निज उत्तम-भोग करे समर्पण ॥
१९७॥
भगवान जगन्नाथ के सभी तरह के भक्तों ने-नये भक्त से लेकर न्नत भक्तों ने-अपना-अपना सर्वोत्तम भोजन भगवान् को समर्पित किया।
राजा, राज-महिषी-वृन्द, पात्र, मित्र-गण ।। नीलाचल-वासी ग्रत छोट-बड़ जन ॥
१९८॥
इसमें राजा, उनकी रानियाँ, उनके मन्त्री तथा मित्र और जगन्नाथ पुरी के छोटे-बड़े सभी निवासी सम्मिलित थे।
नाना-देशेर देशी व्रत ग्रात्रिक जन ।। निज-निज-भोग ताहाँ करे समर्पण ॥
१९९॥
विभिन्न देशों से जगन्नाथ पुरी आये हुए यात्रियों तथा स्थानीय भक्तों ने जगन्नाथजी को अपने हाथों से पकाया हुआ भोजन अर्पित किया।
आगे पाछे, दुई पार्थे पुष्पोद्यान-वने ।। येइ ग्राहो पाय, लागाय,–नाहिक नियमे ॥
२००॥
भक्तों ने रथ के आगे और पीछे, रथ के दोनों ओर तथा पुष्पोद्यान के भीतर-सभी जगह अपना भोजन अर्पित किया। जहाँ-जहाँ भी सम्भव था, उन्होंने भगवान् को भोग चढ़ाया, क्योंकि इसके लिए कोई नियत नियम नहीं थे।
भोगेर समय लोकेर महा भिड़ हैल ।।नृत्य छाड़ि' महाप्रभु उपवने गेल ॥
२०१॥
। भोजन अर्पित करते समय बहुत बड़ी भीड़ एकत्र हो गई। तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपना नृत्य रोक दिया और वे पास के बगीचे में चले गये।
प्रेमावेशे महाप्रभु उपवन पाजा ।। पुष्पोद्याने गृह-पिण्डाय रहिला पड़िया ॥
२०२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु बगीचे में चले गये। वहाँ वे प्रेमावेश में निमग्न होकर एक चबूतरे पर लेट गये।
नृत्य-परिश्रमे प्रभुर देहे घन घर्म ।।सुगन्धि शीतल-वायु करेन सेवन ॥
२०३॥
महाप्रभु नाचने के कठोर श्रम से बहुत थक गये थे और उनके सारे शरीर पर पसीना था। अतएव उन्होंने बगीचे की सुगन्धित शीतल वायु को आनन्द उठाया।
ग्रत भक्त कीर्तनीया आसिया आरामे ।। प्रति-वृक्ष-तले सबै करेन विश्रामे ॥
२०४॥
संकीर्तन करने वाले सारे भक्त भी वहाँ आ गये और उन्होंने वृक्षों के नीचे विश्राम किया।
एइ त कहिल प्रभुर महा-सङ्कीर्तन । जगन्नाथेर आगे ग्रैछे करिल नर्तन ॥
२०५॥
इस तरह मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा किये गये महासंकीर्तन का वर्णन किया है, जिस तरह वे जगन्नाथ के समक्ष नाचे थे।
रथाग्रेते प्रभु त्रैछे करिला नर्तन ।।चैतन्याष्टके रूप-गोसाञि कर्याचे वर्णन ॥
२०६॥
श्रील रूप गोस्वामी ने चैतन्याष्टक नामक अपनी स्तुति में महाप्रभु द्वारा जगन्नाथजी के रथ के समक्ष नाचने का स्पष्ट वर्णन किया है।
रथारूढ़स्यारादधिपदवि नीलाचल-पतेर् ।अदभ्र-प्रेमोर्मि-स्फुरित-नटनोल्लास-विवशः ।। स-हर्ष गायद्भिः परिवृत-तनुर्वैष्णव-जनैः ।स चैतन्यः किं मे पुनरपि दृशोर्यास्यति पदम् ॥
२०७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने रथ पर विराजमान नीलाचल के स्वामी भगवान् जगन्नाथ के समक्ष प्रमुख मार्ग में परम प्रसन्नतापूर्वक नृत्य किया। नृत्य करने के दिव्य आनन्द से अभिभूत होकर तथा नामोच्चार करने वाले वैष्णवों से घिरे महाप्रभु ने उत्कट भगवत्प्रेम की लहरें प्रकट कीं। ऐसे श्री चैतन्य महाप्रभु कब मेरे समक्ष पुनः दृष्टिगोचर होंगे? इहा ग्रेइ शुने सेइ श्री-चैतन्य पाय ।। सुदृढ़ विश्वास-सह प्रेम-भक्ति हय ॥
२०८॥
जो भी रथयात्रा के इस विवरण को सुनता है, उसे श्री चैतन्य महाप्रभु प्राप्त होंगे। उसे वह उच्च अवस्था भी प्राप्त होगी, जिससे उसे भगवद्भक्ति तथा भगवत्प्रेम में दृढ़ विश्वास प्राप्त होगा।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे झार आश । चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
२०९॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की प्रार्थना करते हुए और उनकी कृपा की कामना करते हुए मैं कृष्णदास श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
