अध्याय बारह: गुंडिका मंदिर की सफाई
श्री-गुण्डिचा-मन्दिरमात्म-वृन्दैःसम्मार्जयन्क्षालनतः स गौरः ।। स्व-चित्त-वच्छीतलमुज्वलं चकृष्णोपवेशौपयिकं चकार ॥
१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने भक्तों और संगियों के साथ गुण्डिचा मन्दिर को धोया तथा उसकी सफाई की और इस तरह उन्होंने मन्दिर को अपने हृदय के ही समान शीतल तथा उज्ज्वल बना दिया, जिससे वह श्रीकृष्ण के बैठने के लिए अनुकूल स्थान बन सका।
जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द । जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
गौरचन्द्र की जय हो! नित्यानन्द की जय हो! अद्वैत आचार्य की जय हो! श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो! जय जय श्रीवासादि गौर-भक्त-गण ।। शक्ति देह,—करि ग्रेन चैतन्य वर्णन ॥
३॥
श्रीवास ठाकुर इत्यादि श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों की जय हो! मैं उनसे शक्ति प्रदान करने की याचना करता हूँ, जिससे श्री चैतन्य महाप्रभु का उचित ढंग से वर्णन कर सकें।
पूर्वे दक्षिण हैते प्रभु झबे आइला ।।ताँरै मिलिते गजपति उत्कण्ठित हैला ॥
४॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी दक्षिण भारत की यात्रा से वापस लौट आये, तब उड़ीसा के राजा महाराज प्रतापरुद्र उनसे मिलने के लिए अत्यन्त आतुर हो उठे।
कटक हैते पत्री दिल सार्वभौम-ठाजि । प्रभुर आज्ञा हय यदि, देखिबारे ग्राइ ॥
५॥
राजा ने अपनी राजधानी कटक से सार्वभौम भट्टाचार्य के पास एक चिट्ठी भेजी, जिसमें यह अनुरोध किया गया था कि वे महाप्रभु से यह आज्ञा प्राप्त कर लें, ताकि वे वहाँ आकर उनसे मिल सके।
प्रभुर निकटे आछे व्रत भक्त-गण ।। मोर लागि' ताँ-सबारे करिह निवेदन ॥
७॥
राजा ने इस पत्र में सार्वभौम भट्टाचार्य से प्रार्थना की, कृपया मेरी ओर से महाप्रभु के सारे भक्तों से यह निवेदन करें और मेरी ओर से यह पत्र उनको दे दें।
भट्टाचार्य लिखिल,—प्रभुर आज्ञा ना हैल ।। पुनरपि राजा ताँरै पत्री पाठाइल ॥
६॥
राजा के पत्र का उत्तर देते हुए सार्वभौम भट्टाचार्य ने लिखा कि श्री चैतन्य महाप्रभु की आज्ञा नहीं मिल सकी। इसके बाद राजा ने उनको दूसरा पत्र लिखा।
सेइ सब दयालु मोरे हा सदय । मोर लागि' प्रभु-पदे करिबे विनय ॥
८॥
यदि महाप्रभु से सम्बन्धित सारे भक्त मेरे प्रति अनुकूल हों, तो वे महाप्रभु के चरणकमलों में मेरा यह निवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।
ताँ-सबार प्रसादे मिले श्री-प्रभुर पाय ।। प्रभु-कृपा विना मोर राज्य नाहि भाय ॥
९॥
समस्त भक्तों की कृपा से ही किसी को महाप्रभु के चरणों की शरण मिल सकती है। महाप्रभु की कृपा के बिना मुझे अपना राज्य अच्छा नहीं लगता।।"
यदि मोरे कृपा ना करिबे गौरहरि ।। राज्य छाड़ि' योगी हइ' हइब भिखारी ॥
१०॥
यदि गौरहरि, श्री चैतन्य महाप्रभु मुझ पर कृपा नहीं करेंगे, तो मैं अपना राज्य छोड़कर योगी बन जाऊँगा और द्वार-द्वार भिक्षा माँगूंगा।"
भट्टाचार्य पत्री देखि' चिन्तित हजा । भक्त-गण-पाश गेला सेइ पत्री लञा ॥
११॥
जब भट्टाचार्य को यह पत्र मिला, तो वे अत्यधिक चिन्तित हो उठे। वे उस पत्र को लेकर महाप्रभु के भक्तों के पास गये।
सबारे मिलिया कहिल राज-विवरण ।। पिछे सेइ पत्री सबारे कराइल दरशन ॥
१२॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने सारे भक्तों से मिलकर राजा की इच्छा बतलाई। फिर उन्होंने सबको वह पत्र दिखाया।"
पत्री देखि' सबार मने हइल विस्मय । प्रभु-पदे गजपतिर एत भक्ति हय! ॥
१३ ॥
पत्र पढ़कर सभी लोग चकित थे कि श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर राजा की इतनी भक्ति है।"
सबे कहे,—-प्रभु ताँरै कभु ना मिलिबे ।।आमि-सब कहि ग्रदि, दुःख से मानिबे ॥
१४॥
भक्तों ने अपना विचार प्रकट किया, महाप्रभु कभी भी राजा से नहीं मिलेंगे और यदि हम उनसे मिलने की प्रार्थना करें, तो वे निश्चित रूप से दुःखी हो जायेंगे।"
सार्वभौम कहे,—सबे चल' एक-बार ।।मिलिते ना कहिब, कहिब राज-व्यवहार ॥
१५॥
तब सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, हम एक बार पुनः महाप्रभु के पास चलेंगे, किन्तु हम उनसे राजा से भेंट करने के लिए नहीं कहेंगे। बल्कि हम केवल राजा के उत्तम व्यवहार के विषय में ही कहेंगे।"
एत बलि' सबे गेला महाप्रभुर स्थाने ।।कहिते उन्मुख सबे, ना कहे वचने ॥
१६॥
इस तरह तय करके वे सभी श्री चैतन्य महाप्रभु के स्थान पर गये। वहाँ वे कुछ कहना तो चाहते थे, किन्तु एक शब्द भी नहीं कह पाये।"
प्रभु कहे,—कि कहिते सबार आगमन ।। देखिये कहते चाह,—ना कह, कि कारण? ॥
१७॥
जब वे लोग श्री चैतन्य महाप्रभु के स्थान पर आ गये, तो उन्हें देखकर महाप्रभु ने कहा, तुम सभी लोग यहाँ क्या कहने आये हो? मैं देख रहा हूँ कि तुम लोग कुछ कहना चाहते हो, किन्तु कह नहीं रहे। क्या कारण है?" नित्यानन्द कहे,—तोमाय चाहि निवेदिते ।। ना कहिले रहिते नारि, कहिते भय चित्ते ॥
१८॥
तब नित्यानन्द प्रभु ने कहा, हम आपसे कुछ कहना चाहते हैं। यद्यपि हमसे बिना कहे रहा नहीं जाता, किन्तु कहते हुए हमें अत्यधिक भय हो रहा है।"
स्रोग्यायोग्य तोमाय सब चाहि निवेदिते ।तोमा ना मिलिले राजा चाहे योगी हैते ॥
१९॥
हम आपसे कुछ ऐसी बात कहना चाहते हैं, जो उचित हो सकती है और नहीं भी हो सकती। बात यह है–यदि उड़ीसा का राजा आपके दर्शन नहीं पाता, तो वह योगी बन जायेगा।
काणे मुद्रा लइ' मुजि हइब भिखारी ।राज्य-भोग नहे चित्ते विना गौरहरि ॥
२०॥
नित्यानन्द प्रभु ने कहा, राजा ने निश्चय किया है कि वह भिखारी बनकर अपने कानों में हाथी-दाँत की बालियाँ पहन लेगा। वह श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों का दर्शन किये बिना अपने राज्य का भोग नहीं करना चाहता।
देखिब से मुख-चन्द्र नयन भरिया ।।धरिब से पाद-पद्म हृदये तुलिया ॥
२१॥
नित्यानन्द प्रभु ने आगे कहा, राजा ने यह भी अभिलाषा व्यक्त की है कि वे महाप्रभु के चन्द्रमा सदृश मुख को दृष्टिभर देखना चाहते हैं। वे महाप्रभु के चरणकमलों को उठाकर अपने हृदय पर रखना चाहते हैं।
यद्यपि शुनिया प्रभुर कोमल हय मन ।।तथापि बाहिरे कहे निष्ठुर वचन ॥
२२ ॥
इतनी सारी बातें सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु का मन निश्चित रूप से द्रवित हुआ, किन्तु ऊपर से वे कुछ कठोर वचन कहना चाहते थे।
तोमा-सबार इच्छा,—एइ आमारे लञा ।।राजाके मिलह इहँ कटकेते गिया ॥
२३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैं समझता हूँ कि तुम सब राजा से भेंट कराने के लिए मुझे कटक ले जाना चाहते हो।
परमार्थ थाकुक लोके करिबे निन्दन ।लोके रहु-दामोदर करिबे भर्सन ॥
२४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, आध्यात्मिक प्रगति की बात तो दूर रही, सारे लोग मेरी निन्दा करेंगे। सारे लोगों की बात जाने दें, दामोदर तक मेरी भत्र्सना करेगा।
तोमा-सबार आज्ञाय आमि ना मिलि राजारे ।। दामोदर कहे ग्रबे, मिलि तबे ताँरे ॥
२५॥
मैं तुम सब भक्तों के अनुरोध से राजा से नहीं मिलूंगा, किन्तु यदि दामोदर कहेगा तो मैं ऐसा करूंगा।
दामोदर कहे,—तुमि स्वतन्त्र ईश्वर । कर्तव्याकर्तव्य सब तोमार गोचर ॥
२६॥
दामोदर ने तुरन्त उत्तर दिया, हे प्रभु, आप सर्वथा स्वतन्त्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। चूंकि आप हर बात को जानते हैं, अतएव आपको पता है कि क्या करने योग्य है और क्या नहीं।
आमि कोन्क्षुद्र-जीव, तोमाके विधि दिब? ।। आपनि मिलिबे ताँरे, ताहाओ देखिब ॥
२७॥
मैं तो एक क्षुद्र जीव हूँ, अतएव मुझमें वह शक्ति कहाँ कि मैं आपको आदेश दें? आप स्वेच्छा से राजा से मिलेंगे और मैं देखूगा।
राजा तोमारे स्नेह करे, तुमि-स्नेह-वश ।। ताँर स्नेहे करावे तौरे तोमार परश ॥
२८॥
राजा आप पर अत्यन्त अनुरक्त है और आप भी उसके प्रति स्नेह का अनुभव करते हैं। अतएव मैं समझ सकता हूँ कि आप राजा के स्नेह से वशीभूत होकर उनका स्पर्श करेंगे।
यद्यपि ईश्वर तुमि परम स्वतन्त्र । तथापि स्वभावे हओ प्रेम-परतन्त्र ॥
२९॥
यद्यपि आप पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं और पूर्णतया स्वतन्त्र हैं, फिर भी आप अपने भक्तों के स्नेह एवं प्रेम के अधीन हो जाते हैं। यही आपका स्वभाव है।
नित्यानन्द कहे ऐछे हय कोन्जन ।।ये तोमारे कहे, ‘कर राज-दरशन' ॥
३० ॥
तब नित्यानन्द प्रभु ने कहा, भला तीनों लोकों में ऐसा कौन-सा व्यक्ति है, जो आपसे कह सके कि आप राजा से मिलें? किन्तु अनुरागी लोकेर स्वभाव एक हय ।।इष्ट ना पाइले निज प्राण से छाड़य ॥
३१॥
फिर भी यदि अनुरक्त व्यक्ति को अपनी वांछित वस्तु प्राप्त न हो पाये, तो क्या यह उसका स्वभाव नहीं है कि वह अपना जीवन त्याग दे? ग्राज्ञिक-ब्राह्मणी सब ताहाते प्रमाण । कृष्ण लागि' पति-आगे छाड़िलेक प्राण ॥
३२॥
उदाहरणार्थ, यज्ञ करने वाले ब्राह्मणों की कुछ पत्नियों ने कृष्ण के लिए अपने पतियों के समक्ष अपने प्राण त्याग दिये।
एक झुक्ति आर्छ, यदि कर अवधान ।। तुमि ना मिलिलेह ताँरे, रहे ताँर प्राण ॥
३३॥
तब नित्यानन्द प्रभु ने महाप्रभु के विचारार्थ एक सुझाव रखा। उन्होंने कहा, “ऐसी एक युक्ति है, जिससे आपको राजा से मिलने की आवश्यकता नहीं रह जायेगी, किन्तु उससे राजा के प्राण बच जायेंगे।
एक बहिर्वास ग्रदि देह' कृपा करि' ।ताहा पात्रा प्राण राखे तोमार आशा धरि ॥
३४॥
यदि आप कृपा करके अपना एक उत्तरीय वस्त्र राजा को भेज दें, तो वह किसी न किसी समय आपके दर्शन होने की आशा में जीवित बना रहेगा।
प्रभु कहे,—तुमि-सब परम विद्वान् ।।येइ भाल हय, सेइ कर समाधान ॥
३५॥
महाप्रभु ने कहा, चूंकि आप लोग सभी परम विद्वान हैं, अतएव आप लोग जो भी निर्णय लेंगे वह मुझे स्वीकार्य होगा।
तबे नित्यानन्द-गोसाजि गोविन्देर पाश ।।मागिया लइल प्रभुर एक बहिर्वास ॥
३६॥
तब नित्यानन्द प्रभु ने गोविन्द से कहकर महाप्रभु का पहना हुआ एक बाह्य वस्त्र प्राप्त कर लिया।
सेइ बहिर्वास सार्वभौम-पाश दिल ।।सार्वभौम सेइ वस्त्र राजारे पाठा'ल ॥
३७॥
नित्यानन्द प्रभु ने वह पुराना वस्त्र सार्वभौम भट्टाचार्य को दे दिया और सार्वभौम भट्टाचार्य ने उसे राजा के पास भेज दिया।
वस्त्र पाजा राजार हैल आनन्दित मन ।।प्रभु-रूप करि' करे वस्त्रेर पूजन ॥
३८॥
जब राजा को वह पुराना वस्त्र मिल गया, तो उन्होंने उसकी वैसी ही पूजा शुरू कर दी, जैसे वे साक्षात् महाप्रभु की पूजा करते।
रामानन्द राय ग्रबे 'दक्षिण' हैते आइला ।।प्रभु-सङ्गे रहिते राजाके निवेदिला ॥
३९॥
दक्षिण भारत से अपनी नौकरी छोड़कर लौटने के बाद रामानन्द राय ने राजा से प्रार्थना की कि वे उन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ रहने की अनुमति दे दें।।
तबे राजा सन्तोषे ताँहारे आज्ञा दिला ।आपनि मिलन लागि' साधिते लागिला ॥
४०॥
जब रामानन्द राय ने महाप्रभु के साथ ठहरने के लिए राजा से अनुमति माँगी, तो राजा ने बड़े ही सन्तोष के साथ तुरन्त ही उन्हें अनुमति दे दी। और राजा ने महाप्रभु से अपने मिलाप की व्यवस्था के लिए रामानन्द राय से अनुरोध करना प्रारम्भ कर दिया।
महाप्रभु महा-कृपा करेन तोमारे ।।मोरे मिलिबारे अवश्य साधिबे ताँहारे ॥
४१॥
राजा ने रामानन्द राय से कहा, श्री चैतन्य महाप्रभु आप पर अत्यन्त कृपालु हैं। अतएव आप मेरी भेंट के लिए उनसे अवश्य अनुरोध करें।
एक-सङ्गे दुइ जन क्षेत्रे ग्रबे आइला ।।रामानन्द राय तबे प्रभुरे मिलिला ॥
४२॥
राजा तथा रामानन्द राय साथ-साथ जगन्नाथ-क्षेत्र (पुरी) लौटे और तब श्री रामानन्द राय श्री चैतन्य महाप्रभु से मिले।
प्रभु-पदे प्रेम-भक्ति जानाइल राजार ।प्रसङ्ग पाञा ऐछे कहे बार-बार ॥
४३॥
उस समय रामानन्द राय ने श्री चैतन्य महाप्रभु से राजा के प्रेमभाव के बारे में बतलाया। जब भी कोई अवसर मिलता, तो वे महाप्रभु को राजा के बारे में बारम्बार बतलाते।
राज-मन्त्री रामानन्द–व्यवहारे निपुण ।।राज-प्रीति कहि' द्रवाइल प्रभुर मन ॥
४४॥
श्री रामानन्द राय निस्सन्देह राजा के नीतिनिपुण मन्त्री थे। वे सामान्य व्यवहार में अत्यन्त निपुण थे। उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु से राजा के प्रेम का वर्णन कर-करके महाप्रभु के मन को द्रवित कर दिया।
उत्कण्ठाते प्रतापरुद्र नारे रहिबारे ।रामानन्द साधिलेन प्रभुरे मिलिबारे ॥
४५ ॥
चूँकि महाराज प्रतापरुद्र महाप्रभु का दर्शन न पा सकने के कारण अत्यन्त उत्कंठित थे और वे इसे सहन नहीं कर पा रहे थे, अतएव श्री रामानन्द राय ने निपुणता से राजा के साथ महाप्रभु की भेंट कराने की व्यवस्था की।
रामानन्द प्रभु-पाय कैल निवेदन ।।एक-बार प्रतापरुद्रे देखाह चरण ॥
४६॥
रामानन्द राय ने श्री चैतन्य महाप्रभु से खुलकर यह निवेदन किया, कृपा करके कम-से-कम एक बार तो राजा को अपने चरणकमलों का दर्शन करने दें।
प्रभु कहे,—रामानन्द, कह विचारिया ।राजाके मिलिते नुयाय सन्यासी हा? ॥
४७॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, हे रामानन्द, संन्यासी को राजा से मिलना उचित होगा या नहीं, यह विचार करने के बाद ही तुम्हें मुझसे अनुरोध करना चाहिए।
राजार मिलने भिक्षुकेर दुइ लोक नाश ।। परलोक रहु, लोके करे उपहास ॥
४८॥
यदि कोई संन्यासी राजा से भेंट करता है, तो उसके लिए यह लोक तथा परलोक दोनों नष्ट हो जायेंगे। हाँ, परलोक के बारे में अभी से क्या कहा जाये। इसी लोक में लोग हँसी उड़ायेंगे, यदि संन्यासी राजा से भेंट करे।
रामानन्द कहे, तुमि ईश्वर स्वतन्त्र ।।कारे तोमार भय, तुमि नह परतन्त्र ॥
४९॥
रामानन्द राय ने उत्तर दिया, हे प्रभु, आप तो परम स्वतन्त्र हैं। आपको किसी से कोई डर नहीं है, क्योंकि आप किसी पर आश्रित नहीं हैं। प्रभु कहे,—आमि मनुष्य आश्रमे सन्यासी ।काय-मनो-वाक्ये व्यवहारे भय वासि ॥
५०॥
जब रामानन्द राय ने महाप्रभु को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कहकर सम्बोधित किया, तो महाप्रभु ने यह कहकर आपत्ति की, मैं परमेश्वर नहीं, अपितु एक सामान्य मनुष्य हूँ। इसलिए मुझे जनता के मत से तीन प्रकार से डरना चाहिए-अपने शरीर, मन तथा शब्दों से।
शुक्ल-वस्त्रे मसि-बिन्दु भैछे ना लुकाय ।। सन्यासीर अल्प छिद्र सर्व-लोके गाय ॥
५१॥
जनता को जैसे ही किसी संन्यासी के आचरण में थोड़ा भी दोष दिख जाता है, तो वह उसे जंगल की आग की तरह विज्ञापित करती है। सफेद वस्त्र पर स्याही का काला धब्बा छिपाये नहीं छिपता। वह सदैव स्पष्ट दिखता रहता है।
राय कहे,—कत पापीर करियाछ अव्याहति ।। ईश्वर-सेवक तोमार भक्त गजपति ॥
५२॥
रामानन्द ने उत्तर दिया, हे प्रभु, आपने अनेकों पापी पुरुषों का उद्धार किया है। यह उड़ीसा का राजा, प्रतापरुद्र वास्तव में भगवान् का सेवक और आपका भक्त है।
प्रभु कहे,—पूर्ण भैछे दुग्धेर कलस ।। सुरा-बिन्दु-पाते केह ना करे परश ॥
५३॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, भले ही किसी बड़े पात्र में कितना अधिक दूध क्यों न हो, किन्तु यदि इसमें शराब की एक भी बूंद गिर जाती है, तो वह अस्पृश्य हो जाता है।
यद्यपि प्रतापरुद्र—सर्व-गुणवान् ।। ताँहारे मलिन कैल एक राजा'-नाम ॥
५४॥
यद्यपि राजा समस्त सद्गुणों से सम्पन्न है, किन्तु उसके नाम के साथ 'राजा' पदवी लगी रहने से प्रत्येक वस्तु दूषित हो चुकी है।
तथापि तोमार यदि महाग्रह हय ।। तबे आनि' मिलाह तुमि ताँहार तनय ॥
५५॥
किन्तु इतने पर भी यदि तुम अत्यधिक इच्छुक हो कि राजा मुझसे भेंट करे, तो सर्वप्रथम उसके पुत्र को लाकर मुझसे मिलाओ।
आत्मा वै जायते पुत्रः-एइ शास्त्र-वाणी । पुत्रेर मिलने ग्रेन मिलिबे आपनि ॥
५६॥
शास्त्रों में इंगित किया गया है कि पुत्र पिता का प्रतिनिधित्व करता है, अतएव उसके पुत्र की भेंट मेरे साथ उसके पिता की भेंट के तुल्य होगी।
तबे राय ग्राइ' सब राजारे कहिला ।।प्रभुर आज्ञाय ताँर पुत्र लञा आइला ॥
५७॥
तब रामानन्द राय राजा के पास महाप्रभु के साथ हुई अपनी बातचीत से अवगत कराने गये और महाप्रभु की आज्ञा के अनुसार वे राजा के पुत्र को उनसे मिलाने के लिए अपने साथ लेते आये।
सुन्दर, राजार पुत्र-श्यामल-वरण ।किशोर वयस, दीर्घ कमल-नयन ॥
५८॥
राजकुमार नवयौवन अवस्था होने के कारण अत्यन्त सुन्दर था। उसका रंग साँवला था और कमल जैसी बड़ी-बड़ी आँखें थीं।
पीताम्बर, धरे अङ्गे रत्न-आभरण ।।श्री-कृष्ण-स्मरणे तेह हैलाउद्दीपन' ॥
५९॥
राजकुमार पीला वस्त्र पहने था और रत्न के आभूषणों से उसका शरीर अलंकृत था। अतएव जो भी उसे देखता, उसे भगवान् कृष्ण का स्मरण हो आता।
ताँरै देखि, महाप्रभुर कृष्ण-स्मृति हैल ।।प्रेमावेशे तौरै मिलि' कहते लागिल ॥
६०॥
। राजकुमार को देखते ही श्री चैतन्य महाप्रभु को कृष्ण का स्मरण हो आया। अतः महाप्रभु उससे प्रेमावेश में मिलते हुए कहने लगे।
एइ–महा-भागवत, याँहार दर्शने ।व्रजेन्द्र-नन्दन-स्मृति हय सर्व-जने ॥
६१ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, यहाँ है महान् भक्त। इसे देखकर किसी भी व्यक्ति को नन्द महाराज के पुत्र भगवान् कृष्ण की याद आ जायेगी।
कृतार्थ हइलाङआमि इँहार दरशने ।एत बलि' पुनः तारे कैल आलिङ्गने ॥
६२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, मैं इस लड़के को देखकर ही अत्यन्त कृतार्थ हो गया हूँ। यह कहकर महाप्रभु ने राजकुमार को फिर से आलिंगन में ले लिया।
प्रभु-स्पर्शे राज-पुत्रेर हैल प्रेमावेश ।।स्वेद, कम्प, अश्रु, स्तम्भ, पुलक विशेष ॥
६३ ॥
ज्योंही श्री चैतन्य महाप्रभु ने राजकुमार का स्पर्श किया, त्योंही उसके शरीर में प्रेमावेश के लक्षण स्वत: उत्पन्न हो गये। ये लक्षण थे-पसीना, कँपकँपी, आँसू, स्तम्भ तथा हर्ष।
‘कृष्ण' 'कृष्ण' कहे, नाचे, करये रोदन ।। ताँर भाग्य देखि' श्लाघा करे भक्त-गण ॥
६४॥
वह राजकुमार रोने और नाचने लगा तथा कृष्ण! कृष्ण का उच्चारण करने लगा। उसके शारीरिक लक्षण तथा उसके कीर्तन एवं नृत्य को देखकर सारे भक्तों ने उसके सौभाग्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की।
तबे महाप्रभु तारे धैर्य कराइल । । नित्य आसि' आमाय मिलिह——एइ आज्ञा दिल ॥
६५॥
उस समय श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस नवयुवक को शान्त कराया और उसे आदेश दिया कि वह नित्य ही उनसे मिलने वहाँ आया करे।
विदाय हा राय आइल राज-पुत्रे ला ।। राजा सुख पाइल पुत्रेर चेष्टा देखियो । ६६ ।। तब रामानन्द राय तथा राजकुमार ने श्री चैतन्य महाप्रभु से विदा ली और रामानन्द राय राजकुमार को राजमहल वापस ले आये। जब राजा ने अपने पुत्र के कार्यकलापों के बारे में सुना, तो वे अत्यन्त सुखी हुए।
पुत्रे आलिङ्गन करि' प्रेमाविष्ट हैला ।।साक्षात्परश ग्रेन महाप्रभुर पाइला ॥
६७॥
अपने पुत्र का आलिंगन करने से ही राजा प्रेमाविष्ट हो गये, मानो उन्हें साक्षात् चैतन्य महाप्रभु का स्पर्श मिला हो।
सेइ हैते भाग्यवान्नाजार नन्दन ।। प्रभु-भक्त-गण-मध्ये हैला एक-जन ॥
६८ ॥
तब से भाग्यशाली राजकुमार महाप्रभु के सर्वाधिक अन्तरंग भक्तों में से एक बन गया।
एइ-मत महाप्रभु भक्त-गण-सङ्गे।। निरन्तर क्रीड़ा करे सङ्कीर्तन-रङ्गे ॥
६९ ॥
इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी लीलाएँ करते हुए और संकीर्तन आन्दोलन का विस्तार करते हुए अपने शुद्ध भक्तों के समाज में कार्य करते थे।
आचादि भक्त करे प्रभुरे निमन्त्रण ।। ताहाँ ताहाँ भिक्षा करे ला भक्त-गण ॥
७० ॥
अद्वैत आचार्य जैसे कुछ प्रमुख भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने अपने घरों में भोजन करने के लिए निमन्त्रित किया करते थे। महाप्रभु ऐसे निमन्त्रणों को स्वीकार कर लेते थे और अपने भक्तों समेत वहाँ जाते थे।
एइ-मत नाना रङ्गे दिन कत गेल ।। जगन्नाथेर रथ-यात्रा निकट हुइल ॥
७१॥
इस तरह महाप्रभु ने कुछ दिन बड़े हर्ष-उल्लास के साथ बिताये। तब जगन्नाथ रथयात्रा महोत्सव निकट आ पहुँचा।
प्रथमेइ काशी-मिश्रे प्रभु बोलाइल ।।पड़िछा-पात्र, सार्वभौमे बोलाजा आनिल ॥
७२ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने सर्वप्रथम काशी मिश्र को बुलावा भेजा, तब मन्दिर की देख-रेख करने वाले को और उसके बाद सार्वभौम को बुलावा भेजा।
तिन-जन-पाशे प्रभु हासिया कहिल ।। गुण्डिचा-मन्दिर-मार्जन-सेवा मागि' निल ॥
७३॥
जब ये तीनों आ गये, तो महाप्रभु ने उनसे गुण्डिचा मन्दिर की धुलाई करने की अनुमति माँगी।
पड़िछा कहे,—आमि-सब सेवक तोमार। ये तोमार इच्छा सेइ कर्तव्य आमार ॥
७४॥
गुण्डिचा मन्दिर की धुलाई करने की महाप्रभु की याचना सुनकर पड़िछा अर्थात् मन्दिर के निरीक्षक ने कहा, हे महोदय, हम सभी आपके सेवक हैं। आप जो भी इच्छा करेंगे, उसे पूरा करना हमारा कर्तव्य है।
विशेषे राजार आज्ञा हाछे आमारे । प्रभुर आज्ञा येइ, सेइ शीघ्र करिबारे ।। ७५ ॥
राजा ने मुझे विशेष आदेश दिया है कि जो भी आप आज्ञा दें, उसे मैं तुरन्त पूरा करूँ।
तोमार ग्रोग्य सेवा नहे मन्दिर-मार्जन ।।एइ एक लीला कर, ये तोमार मन ॥
७६॥
हे प्रभु, मन्दिर की धुलाई करने की सेवा आपके योग्य नहीं है। फिर भी, यदि आप चाहते हैं, तो इसे हम आपकी लीला के रूप में स्वीकार करते हैं।
किन्तु घट, सम्मार्जनी बहुत चाहिये ।।आज्ञा देह–आजि सब इहाँ आनि दिये ॥
७७॥
मन्दिर की धुलाई करने के लिए अनेक घड़ों तथा झाड़ओं की आवश्यकता होगी, अतएव आप मुझे आदेश दें। मैं ये सारी चीजें तुरन्त लाये देता हूँ।
नूतन एक-शत घट, शत सम्मार्जनी ।।पड़िछा आनिया दिल प्रभुर इच्छा जानि' ॥
७८ ॥
ज्योंही पड़िछा ( निरीक्षक ) को महाप्रभु की इच्छा का पता चल गया, उसने तुरन्त एक सौ नये घड़े तथा मन्दिर बुहारने के लिए एक सौ झाड़ लाकर दे दिये।
आर दिने प्रभाते लञा निज-गण ।। श्री-हस्ते सबार अङ्गे लेपिला चन्दन ॥
७९॥
अगले दिन भोर होते ही महाप्रभु ने अपने संगियों को अपने साथ ले लिया और अपने हाथ से उन सबके शरीरों पर चन्दन-लेप लगाया।
श्री-हस्ते दिल सबारे एक एक मार्जनी । सब-गण लञा प्रभु चलिला आपनि ॥
८०॥
फिर उन्होंने अपने हाथ से हर भक्त को एक-एक झाड़ दी और उन सबको अपने साथ लेकर महाप्रभु गुण्डिचा गये।।
गुण्डिचा-मन्दिरे गेला करिते मार्जन ।। प्रथमे मार्जनी लञा करिल शोधन ॥
८१॥
इस तरह महाप्रभु तथा उनके संगी गुण्डिचा मन्दिर की सफाई करने गये। सर्वप्रथम उन्होंने झाड़ओं से मन्दिर को बुहारा।
भितर मन्दिर उपर, सकल माजिल ।। सिंहासन माजि' पुनः स्थापन करिल ॥
८२॥
महाप्रभु ने मन्दिर के भीतर की हर चीज को, यहाँ तक कि छत को भी बहुत अच्छी तरह से साफ किया। फिर उन्होंने सिंहासन उठाया, उसे साफ किया और उसे पुनः उसी स्थान पर रख दिया।
छोट-बड़-मन्दिर कैल मार्जन-शोधन ।। पाछे तैछे शोधिल श्री-जगमोहन ॥
८३॥
इस तरह महाप्रभु तथा उनके संगियों ने मन्दिर की बड़ी तथा छोटी सारी इमारतें बुहारीं और साफ कीं। अन्त में उन्होंने मन्दिर तथा कीर्तन के सभास्थल के बीच के भाग को साफ किया।
चारि-दिके शत भक्त सम्मार्जनी-करे ।।ओपनि शोधेन प्रभु, शिखा'न सबारे ॥
८४॥
सैंकड़ों भक्त मन्दिर की चारों ओर सफाई करने में लगे थे और श्री चैतन्य महाप्रभु दूसरों को शिक्षा देने के लिए स्वयं भी कार्य कर रहे थे।
प्रेमोल्लासे शोधेन, लयेन कृष्ण-नाम् ।।भक्त-गण 'कृष्ण' कहे, करे निज-काम ॥
८५ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अत्यन्त उल्लसित होकर सारे समय कृष्ण-नाम का उच्चारण करते हुए मन्दिर को बुहारा और धोया। इसी तरह सारे भक्त भी कीर्तन करते जाते थे और अपना-अपना कार्य कर रहे थे।
धूलि-धूसर तनु देखिते शोभन ।काहाँ काहाँ अश्रु-जले करे सम्मार्जन ॥
८६॥
महाप्रभु का सारा सुन्दर शरीर धूल से धूसरित था। इससे वह और भी दिव्य रूप से सुन्दर लगने लगा था। मन्दिर की सफाई करते हुए कभीकभी महाप्रभु के आँसू आ जाते और कहीं-कहीं तो उन्होंने उन्हीं आँसुओं से ही धुलाई की।
भोग-मन्दिर शोधन करि' शोधिल प्राङ्गण ।सकल आवास क्रमे करिल शोधन ॥
८७॥
इसके बाद जहाँ अर्चाविग्रह का भोजन रखा जाता था ( भोगमन्दिर), उस स्थान की सफाई की गई। तत्पश्चात् आँगन साफ किया गया और तब एक-एक करके सारे रिहायशी मकान साफ किये गये।
तृण, धूलि, झिङ्कर, सब एकत्र करिया ।।बहिर्वासे लञा फेलाय बाहिर करिया ॥
८८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने तिनकों, धूल तथा बालू के कणों को एक स्थान पर एकत्र किया और फिर अपने वस्त्र में बाँधकर उन्हें बाहर ले जाकर फेंक दिया।
एइ-मत भक्त-गण करि' निज-वासे ।।तृण, धूलि बाहिरे फेलाय परम हरिषे ॥
८९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के उदाहरण का अनुसरण करते हुए सारे भक्त भी उल्लासपूर्वक तिनके तथा धूल को अपने अपने वस्त्रों में बाँध-बाँधकर मन्दिर के बाहर ले जाकर फेंकने लगे।
प्रभु कहे,—के कत करियाछ सम्मार्जन ।।तृण, धूलि देखिलेइ जानिब परिश्रम ॥
९०॥
तब महाप्रभु ने भक्तों से कहा, मैं केवल यह देखकर कि कितने तिनके तथा धूल बाहर ले जाकर ढेर लगाया गया है, बतला सकता हूँ कि आप लोगों ने कितना परिश्रम किया है और कितनी अच्छी तरह से मन्दिर की सफाई की है।
सबार झ्याँटान बोझा एकत्र करिल । सबा हैते प्रभुर बोझा अधिक हइल ॥
९१॥
यद्यपि सारे भक्तों ने धूल का एक ढेर लगाया था, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु का ढेर उस से भी बड़ा था।
एइ-मत अभ्यन्तर करिल मार्जन । पुनः सबाकोरे दिल करिया वण्टन ॥
९२ ॥
जब मन्दिर की भीतरी सफाई पूरी हो गई, तो महाप्रभु ने फिर से भक्तों द्वारा साफ किये जाने के लिए अलग-अलग खण्ड निर्धारित किये।
सूक्ष्म धूलि, तृण, काङ्कर, सब करह दूर ।। भाल-मते शोधन करह प्रभुर अन्तःपुर ॥
९३॥
तत्पश्चात् महाप्रभु ने सबको आदेश दिया कि वे सारी बारीक धूल, तिनके तथा बालू के कणों को बाहर फेंककर अच्छी तरह से मन्दिर के भीतरी भाग की सफाई करें।
सब वैष्णव लञा ग्नबे दुई-बार शोधिल ।। देखि' महाप्रभुर मने सन्तोष हइल ॥
९४॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु तथा सारे वैष्णवों ने मन्दिर की दुबारा सफाई कर ली, तो श्री चैतन्य महाप्रभु सफाई देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए।
आर शत जन शत घटे जल भरि' ।। प्रथमेड़ लग्ना आछे काल अपेक्षा करि' ॥
९५॥
जब मन्दिर बुहारा जा रहा था, तो लगभग एक सौ व्यक्ति जल से भरे घड़े लिए तैयार खड़े थे और उनमें से पानी फेंकने के महाप्रभु के आदेश की प्रतीक्षा कर रहे थे।
जल आन' बलि' ग्रबे महाप्रभु कहिल ।।तबे शत घट आनि' प्रभु-आगे दिल ॥
९६॥
ज्योंही श्री चैतन्य महाप्रभु ने पानी लाने के लिए कहा, त्योंही सारे लोग तुरन्त जल से भरे उन एक सौ घड़ों को ले आये और लाकर महाप्रभु के सामने रख दिये।
प्रथमे करिल प्रभु मन्दिर प्रक्षालन । ऊर्ध्व-अधो भित्ति, गृह-मध्य, सिंहासन ॥
९७॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने सबसे पहिले मुख्य मन्दिर धोया और तब छत, दीवारें, फर्श, सिंहासन तथा कमरे के भीतर की अन्य वस्तुओं को भलीभाँति धोया।
खापरा भरिया जल ऊर्ध्वं चालाइल । सेइ जले ऊर्ध्व शोधि भित्ति प्रक्षालिल ॥
९८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं तथा उनके सारे भक्त छत पर जल फेंकने लगे। जब यह पानी नीचे की ओर गिरा, तो उससे दीवारें तथा फर्श धुल गये।
श्री-हस्ते करेन सिंहासनेर मार्जन ।।प्रभु आगे जले आनि' देय भक्त-गण ॥
९९॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु अपने हाथों से भगवान जगन्नाथ का सिंहासन धोने लगे और सारे भक्त जल लाकर महाप्रभु को देने लगे।
भक्त-गण करे गृह-मध्य प्रक्षालन ।। निज निज हस्ते करे मन्दिर मार्जन ॥
१००॥
सारे भक्त मन्दिर के भीतर धुलाई करने लगे। हर एक के हाथ में एक एक झाड़ था, जिससे उन्होंने भगवान् के मन्दिर को स्वच्छ किया।
केह जल आनि' देय महाप्रभुर करे ।। केह जल देय ताँर चरण-उपरे ॥
१०१॥
उनमें से कोई महाप्रभु के हाथों में पानी लाकर देता और कोई उनके चरणकमलों में पानी गिराता।।
केह लुकाअ करे सेइ जल पान ।।केह मागि' लय, केह अन्ये करे दान ॥
१०२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणों पर गिरने वाले जल को कोई चोरीचोरी पी रहा था, कोई उस जल को माँग रहा था और कोई उस जल का दान कर रहा था।
घर धुइ' प्रणालिकाय जल छाड़ि' दिले ।।सेइ जले प्राङ्गण सब भरिया रहिल ॥
१०३ ॥
जब कमरा धुल गया, तो पानी को एक नाली से बाहर निकाल दिया गया और यही पानी बहकर बाहर के प्रांगण में भर गया।
निज-वस्त्रे कैल प्रभु गृह सम्मार्जन । महाप्रभु निज-वस्त्रे माजिल सिंहासन ॥
१०४॥
महाप्रभु ने अपने वस्त्रों से कमरों को पोंछा और उन्हीं वस्त्रों से सिंहासन को चमकाया भी।
शत घट जले हैल मन्दिर मार्जन ।। मन्दिर शोधिया कैल—येन निज मन ।। १०५ ॥
इस तरह पानी के सौ घड़ों से सारे कमरे धो दिये गये। कमरों की सफाई के बाद भक्तों के मन कमरों की ही तरह निर्मल हो गये।
निर्मल, शीतल, स्निग्ध करिल मन्दिरे । आपन-हृदय ग्रेन धरिल बाहिरे ॥
१०६॥
स्वच्छ हो जाने के बाद मन्दिर शुद्ध, शीतल तथा मनभावन हो गया, मानो स्वयं महाप्रभु का शुद्ध मन प्रकट हुआ हो।
शत शत जन जल भरे सरोवरे ।।घाटे स्थान नाहि, केह कूपे जल भरे ॥
१०७॥
चूँकि सैंकड़ों व्यक्ति सरोवर से जल लाने में लगे हुए थे, अतएव किनारे पर खड़े होने तक के लिए जगह नहीं थी। इसलिए कुछ लोग कुएँ से पानी खींचने लगे।
पूर्ण कुम्भ लजा आइसे शत भक्त-गण ।।शून्य घट लञा ग्राय आर शत जन ॥
१०८॥
सैंकड़ों भक्त जल से भरे घड़े लाते और सैंकड़ों भक्त खाली घड़ों को फिर से भरने के लिए ले जाते।
नित्यानन्द, अद्वैत, स्वरूप, भारती, पुरी ।। इँहा विनु आर सब आने जल भरि' ॥
१०९॥
नित्यानन्द प्रभु, अद्वैत आचार्य, स्वरूप दामोदर, ब्रह्मानन्द भारती तथा परमानन्द पुरी को छोड़कर सारे लोग घड़ों में पानी भरकर लाने में व्यस्त थे।
घटे घटे ठेकि' कत घट भाङ्गि' गेल ।। शत शत घट लोक ताहाँ लञा आइल ॥
११०॥
लोगों के परस्पर टकरा जाने से अनेक घड़े टूट गये और सैंकड़ों लोगों को पानी भरने के लिए नये घड़े लाने पड़े।
जल भरे, घर धोय, करे हरि-ध्वनि ।। 'कृष्ण' ‘हरि' ध्वनि विना आर नाहि शुनि ।। १११॥
कुछ लोग घड़े भर रहे थे और कुछ कमरों की धुलाई कर रहे थे, किन्तु सारे लोग कृष्ण तथा हरि के नाम का उच्चारण करते जा रहे थे।
'कृष्ण' 'कृष्ण' कहि' करे घटेर प्रार्थन।‘कृष्ण' 'कृष्ण' कहि' करे घट समर्पण ॥
११२॥
कोई व्यक्ति कृष्ण, कृष्ण कहकर घड़ा माँग रहा था और कोई व्यक्ति कृष्ण, कृष्ण कहकर घड़ा दे रहा था।
ग्रेइ ग्रेइ कहे, सेइ कहे कृष्ण-नामे ।।कृष्ण-नाम हइल सङ्केत सब-कामे ॥
११३॥
जब किसी को कुछ कहना होता, तो वह 'कृष्ण' नाम का उच्चारण करके ऐसा करती। अतएव जिस किसी को जो कुछ माँगना होता, उसके लिए 'कृष्ण' नाम संकेत बन गया था।
प्रेमावेशे प्रभु कहे 'कृष्ण' 'कृष्ण'-नाम । एकले प्रेमावेशे करे शत-जनेर काम ॥
११४॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु प्रेमाविष्ट होकर कृष्ण का नाम लेते थे, तो ये स्वयं सैंकड़ों आदमियों का काम करते थे।
शत-हस्ते करेन ग्रेन क्षालन-मार्जन ।। प्रतिजन-पाशे ग्राइ' करान शिक्षण ॥
११५ ॥
ऐसा प्रतीत होता मानो श्री चैतन्य महाप्रभु एक सौ हाथों से सफाईधुलाई कर रहे हों। वे हर एक भक्त के पास यह शिक्षा देने के लिए पहुँचते कि काम किस तरह करना चाहिए।
भाल कर्म देखि' तारे करे प्रसंशन । मने ना मिलिले करे पवित्र भर्सन ॥
११६॥
जब कोई ठीक से काम करता, तो महाप्रभु उसकी प्रशंसा करते, किन्तु जब वे देखते कि कोई व्यक्ति सन्तोषजनक कार्य नहीं कर रहा, तो वे बिना किसी द्वेष के उस व्यक्ति की प्रताड़ना करते।
तुमि भाल करियाछ, शिखाह अन्येरे ।एइ-मत भाल कर्म सेहो ग्रेन करे ॥
११७॥
महाप्रभु कहते, तुमने बहुत अच्छा किया है। तुम दूसरों को भी सिखला दो, जिससे वे भी इसी तरह से काम करें।
ए-कथा शुनिया सबे सङ्कुचित हा ।।भाल-मते कर्म करे सबै मन दिया ॥
११८ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु से ऐसा सुनकर हर व्यक्ति लज्जित हो जाता। इसलिए भक्तों ने बड़े ही मनोयोग से काम करना आरम्भ कर दिया।
तबे प्रक्षालन कैल श्री-जगमोहन । भोग-मन्दिर-आदि तबे कैल प्रक्षालन ॥
११९॥
उन्होंने जगमोहन-क्षेत्र की धुलाई की और इसके बाद जहाँ प्रसाद रखा जाता था, वह स्थान धोया गया। फिर अन्य सभी स्थान भी धोये गये।
नाटशाला धुइ' धुइल चत्वर-प्राङ्गण ।।पाकशाला-आदि करि करिल प्रक्षालन ॥
१२०॥
इस तरह सभा-भवन, समूचे प्रांगण, चबूतरों, रसोई-घर तथा अन्य कमरों की धुलाई की गई।
मन्दिरेर चतुर्दिक्प्रक्षालन कैल ।सब अन्तःपुर भाल-मते धोयाइल ॥
१२१॥
। इस तरह मन्दिर के चारों ओर के सारे स्थान भीतर और बाहर से धो दिये गये।"
हेन-काले गौड़ीयो एक सुबुद्धि सरल ।। प्रभुर चरण-युगे दिल घट-जल ॥
१२२॥
जब पूरी तरह सफाई हो चुकी, तो बंगाल से आये हुए एक अत्यन्त बुद्धिमान एवं सरल वैष्णव ने आकर महाप्रभु के चरणकमलों पर जल चढ़ाया।
सेइ जल लजा आपने पान कैल ।। ताहा देखि' प्रभुर मने दुःख रोष हैल ॥
१२३॥
तब उस गौड़ीय वैष्णव ने उस जल को लेकर पी लिया। यह देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु कुछ-कुछ दुःखी और बाहर से क्रुद्ध भी हुए।
यद्यपि गोसाजि तारे हाछे सन्तोष । धर्म-संस्थापन लागि' बाहिरे महा-रोष ॥
१२४॥
यद्यपि महाप्रभु उससे सन्तुष्ट थे, किन्तु धर्म के शिष्टाचार की स्थापना करने के लिए वे बाहर से क्रुद्ध हुए।
शिक्षा लागि' स्वरूपे डाकि' कहिल ताँहारे ।एइ देख तोमार गौड़ीया'र व्यवहारे ॥
१२५॥
तब महाप्रभु ने स्वरूप दामोदर को बुलाया और उनसे कहा, 'जरा अपने बंगाली वैष्णव का व्यवहार तो देखो। '" ईश्वर-मन्दिरे मोर पद धोयाइल ।।सेइ जल आपनि लञा पान कैल ॥
१२६॥
इस बंगाली वैष्णव ने भगवान् के मन्दिर के भीतर मेरे पाँव धोये हैं। यही नहीं, उसने जल भी पी लिया है।
एइ अपराधे मोर काहाँ हबे गति ।। तोमार 'गौड़ीया' करे एतेक फैजति! ॥
१२७॥
मैं नहीं जानता कि इस अपराध के कारण मेरी क्या गति होगी! तुम्हारे बंगाली वैष्णव ने मुझे झंझट में फँसा दिया है।
तबे स्वरूप गोसाजि तार घाड़े हात दिया । ढेका मारि' पुरीर बाहिर राखिलेन ला ॥
१२८॥
तभी स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने गौड़ीय वैष्णव की गर्दन पकड़ ली और उसे धक्का देकर गुण्डिचा पुरी मन्दिर से बाहर कर दिया तथा उसे बाहर ही रहने दिया।
पुनः आसि' प्रभु पाय करिल विनय ।। ‘अज्ञ-अपराध' क्षमा करिते ग्रुयाय ॥
१२९॥
मन्दिर में वापस आकर स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु से प्रार्थना की कि वे उस अबोध व्यक्ति को क्षमा कर दें।
तबे महाप्रभुर मने सन्तोष हइल । सारि करि' दुइ पाशे सबारे वसाइला ॥
१३० ॥
इस घटना के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु को परम सन्तोष हुआ। तब उन्होंने सारे भक्तों को दो पंक्तियों में दोनों ओर बैठ जाने को कहा।
आपने वसिया माझे, आपनार हाते ।।तृण, काङ्कर, कुटा लागिला कुड़ाइते ॥
१३१॥
तब महाप्रभु स्वयं बीच में बैठ गये और सभी तरह के तिनके, बालू के कण तथा गंदी वस्तुएँ चुनने लगे।
के कत कुड़ाय, सब एकत्र करिब ।। ग्रार अल्प, तार ठाजि पिठा-पाना लइब ॥
१३२॥
तिनके तथा बालू के कण चुनते हुए महाप्रभु ने कहा, मैं हर एक के कूड़े को एकत्र करूँगा और जिसका कूड़ा कम होगा उससे कहूँगा कि वह जुर्माना के रूप में मिठाई ( पिठा) तथा खीर ( पाना ) दे।
एइ मत सब पुरी करिल शोधन । शीतल, निर्मल कैल–ग्रेन निज-मन ॥
१३३॥
इस तरह गुण्डिचा मन्दिर के सभी कमरे पूरी तरह स्वच्छ हो गये। सारे कमरे ठंडे तथा स्वच्छ थे, मानो निर्मल तथा शान्त मन हों।
प्रणालिका छाड़ि' यदि पानि वहाइल । नूतन नदी ग्रेन समुद्रे मिलिल ।। १३४।। जब सारे कमरों का पानी हाल कमरे से होकर निकाला गया, तो ऐसा लगा जैसे कि नई नदियाँ समुद्र से मिलने जा रही हों।
एइ-मत पुरद्वार-आगे पथ ग्रत ।। सकल शोधिल, ताहा के वर्णिबे कत ॥
१३५॥
मन्दिर के द्वार के बाहर की सारी सड़कें भी साफ की गईं। किन्तु कोई यह नहीं बता सकता था कि यह सब कैसे हुआ।
नृसिंह-मन्दिर-भितर-बाहिर शोधिल ।। क्षणेक विश्राम करि' नृत्य आरम्भिल ॥
१३६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने नृसिंह मन्दिर की भी भीतर और बाहर से सफाई की। अन्त में उन्होंने कुछ मिनट विश्राम किया और तब नृत्य शुरू किया।"
चारि-दिके भक्त-गण करेन कीर्तन ।।मध्ये नृत्य करेन प्रभु मत्त-सिंह-सम ॥
१३७॥
सारे भक्तों ने श्री चैतन्य महाप्रभु के चारों ओर संकीर्तन किया और महाप्रभु एक उन्मत्त सिंह के समान बीच में नाचने लगे।
स्वेद, कम्प, वैवण्र्याश्रु पुलक, हुङ्कार ।।निज-अङ्ग धुइ' आगे चले अश्रु-धार ॥
१३८॥
हमेशा की तरह जब चैतन्य महाप्रभु नाचने लगे तो पसीना, कँपकँपी, विवर्णता ( रंग फीका पड़ना ), आँसू, हर्ष तथा हुंकार प्रकट होने लगे। उनकी आँखों के अश्रुओं ने उनके शरीर को तथा उनके समक्ष खड़े लोगों के शरीरों को धो दिया।
चारि-दिके भक्त-अङ्ग कैल प्रक्षालन ।। श्रावणेर मेघ ग्रेन करे वरिषण ॥
१३९॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी आँखों के आँसुओं से सारे भक्तों के शरीरों को धो डाला। आँसू इस तरह गिर रहे थे मानों सावन मास की वर्षा हो।
महा-उच्च-सङ्कीर्तने आकाश भरिल ।प्रभुर उद्दण्ड-नृत्ये भूमि-कम्प हैल ॥
१४०॥
महान् तथा जोर-जोर से उच्चरित होने वाले संकीर्तन से आकाश पूँज । उठा और चैतन्य महाप्रभु के कूदने तथा नाचने से धरती हिलने लगी।
स्वरूपेर उच्च-गान प्रभुरे सदा भाय ।। आनन्दे उद्दण्ड नृत्य करे गौरराय ॥
१४१।। श्री चैतन्य महाप्रभु को स्वरूप दामोदर का जोर-जोर से संकीर्तन करना सदा पसन्द था। अतएव जब स्वरूप दामोदर गाते तो श्री चैतन्य महाप्रभु नाचते और हर्ष से ऊँचा उछलते थे।
एइ-मत कत-क्षण नृत्य ग्रे करिया ।।विश्राम करिला प्रभु समय बुझिया ॥
१४२॥
महाप्रभु इस तरह कुछ समय तक कीर्तन करते और नाचते रहे। अन्त में परिस्थिति को समझकर वे रुक गये।
आचार्य-गोसाजिर पुत्र श्री-गोपाल-नाम ।।नृत्य करिते ताँरे आज्ञा दिल गौरधाम ॥
१४३॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने अद्वैत आचार्य के पुत्र श्री गोपाल को नाचने का आदेश दिया।
प्रेमावेशे नृत्य करि' हइला मूच्छिते ।।अचेतन हा तेह पड़िला भूमिते ॥
१४४॥
प्रेमावेश में नाचते हुए श्री गोपाल मूर्छित हो गया और अचेत होकर जमीन पर गिर पड़ा।
आस्ते-व्यस्ते आचार्य ताँरै कैल कोले ।।श्वास-रहित देखि' आचार्य हैला विकले ॥
१४५ ॥
। जब श्री गोपाल मूर्छित हो गया, तो अद्वैत आचार्य ने तुरन्त उसे अपनी गोद में उठा लिया। यह देखकर कि उसकी साँस नहीं चल रही, वे अत्यन्त क्षुब्ध हो उठे।
नृसिंहेर मन्त्र पड़ि' मारे जल-छाँटि ।।हुङ्कारेर शब्दे ब्रह्माण्ड ग्राय फाटि' ॥
१४६॥
अद्वैत आचार्य तथा अन्य लोग भगवान् नृसिंह के नाम का उच्चारण करके जल छिड़कने लगे। उच्चारण की हुंकार इतनी तेज थी कि उससे सारा ब्रह्माण्ड हिलता हुआ प्रतीत हुआ।
अनेक करिल, तबु ना हय चेतन ।।आचार्य कान्देन, कान्दे सब भक्त-गण ॥
१४७॥
जब लड़के को कुछ समय तक होश नहीं आया, तो अद्वैत आचार्य तथा अन्य भक्तगण रोने लगे।
तबे महाप्रभु ताँर बुके हस्त दिल ।।‘उठह गोपाल' बलि' उच्चैःस्वरे कहिल ॥
१४८॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्री गोपाल की छाती पर अपना हाथ रखा और जोर से बोले, गोपाल, उठो! शुनितेइ गोपालेर हुइल चेतन ।। 'हरि' बलि' नृत्य करे सर्व-भक्त-गण ॥
१४९॥
ज्योंही गोपाल ने श्री चैतन्य महाप्रभु की वाणी सुनी, उसे तुरन्त चेत हो गया। अतः सारे भक्त हरि का नाम लेकर नाचने लगे।
एइ लीला वर्णियाछेन दास वृन्दावन ।। अतएव सङ्क्षेप करि करिलॅ वर्णन ॥
१५०॥
वृन्दावन दास ठाकुर ने इस घटना का विस्तार से वर्णन किया है, अतएव मैंने संक्षेप में ही इसे कहा है।
तबे महाप्रभु क्षणेक विश्राम करिया । स्नान करिबारे गेला भक्त-गण लञा ॥
१५१॥
विश्राम करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु तथा सारे भक्त स्नान करने चले गये।
तीरे उठि' परेन प्रभु शुष्क वसन ।। नृसिंह-देवे नमस्करि' गेला उपवन ॥
१५२॥
स्नान करने के बाद महाप्रभु ने सरोवर के किनारे खड़े होकर सूखे कपड़े पहने। फिर पास ही के मन्दिर में स्थित भगवान् नृसिंह देव को नमस्कार करके वे बगीचे में आये।
उद्याने वसिला प्रभु भक्त-गण लञा । तबे वाणीनाथ आइला महा-प्रसाद लञा ॥
१५३॥
उस बगीचे में श्री चैतन्य महाप्रभु अन्य भक्तों के साथ बैठ गये। तभी वाणीनाथ राय सभी प्रकार का प्रसाद लेकर आये।
काशी-मिश्र, तुलसी-पड़िछा-दुइ जन ।। पञ्च-शत लोक व्रत करये भोजन ॥
१५४॥
तत अन्न-पिठा-पाना सब पाठाइल ।। देखि' महाप्रभुर मने सन्तोष हइल ॥
१५५ ॥
काशी मिश्र तथा मन्दिर की देख-रेख करने वाला तुलसी–दोनों इतना अधिक प्रसाद लेकर आये जो पाँच सौ व्यक्तियों के खाने लायक था। इस प्रसाद में चावल, रोटियाँ, खीर तथा विविध प्रकार की तरकारियाँ थीं। इन्हें देखकर महाप्रभु अत्यन्त सन्तुष्ट हुए।
पुरी-गोसाञि, महाप्रभु, भारती ब्रह्मानन्द ।।अद्वैत-आचार्य, आर प्रभु-नित्यानन्द ॥
१५६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के पास उपस्थित भक्तों में परमानन्द पुरी, ब्रह्मानन्द भारती, अद्वैत आचार्य तथा नित्यानन्द प्रभु थे।
आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, श्रीवास, गदाधरे ।शङ्कर, नन्दनाचार्य, आर राघव, वक्रेश्वर ॥
१५७॥
वहाँ पर आचार्यरत्न, आचार्यनिधि, श्रीवास ठाकुर, गदाधर पण्डित, शंकर, नन्दनाचार्य, राघव पण्डित तथा वक्रेश्वर भी उपस्थित थे।
प्रभु-आज्ञा पाजा वैसे आपने सार्वभौम ।।पिण्डार उपरे प्रभु वैसे ला भक्त-गण ॥
१५८॥
महाप्रभु की आज्ञा पाकर सार्वभौम भट्टाचार्य बैठ गये। श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके सारे भक्त काठ के चबूतरे (पिण्डार) पर बैठे।
तार तले, तार तले करि' अनुक्रम ।।उद्यान भरि' वैसे भक्त करिते भोजन ॥
१५९॥
इस तरह सारे भक्त एक-दूसरे के पीछे पंक्ति बनाकर भोजन करने के लिए बैठ गये।
‘हरिदास' बलि' प्रभु डाके घने घन ।।दूरे रहि' हरिदास करे निवेदन ॥
१६०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु बारम्बार हरिदास, हरिदास कहकर पुकार रहे थे। वे उस समय दूर खड़े थे और वहीं से वे इस तरह बोले।
भक्त-सङ्गे प्रभु करुन प्रसाद अङ्गीकार ।।ए-सङ्गे वसिते योग्य नहि मुजि छार ॥
१६१॥
हरिदास ठाकुर ने कहा, महाप्रभु! आप भक्तों के साथ भोजन ग्रहण करें। चूँकि मैं निन्दनीय हूँ, अतएव आप लोगों के बीच में नहीं बैठ सकता।
पाछे मोरे प्रसाद गोविन्द दिबे बहिद्वारे । मन जानि' प्रभु पुनः ना बलिल ताँरे ॥
१६२॥
गोविन्द बाद में मुझे दरवाजे के बाहर प्रसाद दे जायेगा। महाप्रभु ने उनके मन की बात जान कर फिर से नहीं पुकारा।
स्वरूप-गोसाजि, जगदानन्द, दामोदर । काशीश्वर, गोपीनाथ, वाणीनाथ, शङ्कर ॥
१६३॥
परिवेशन करे ताहाँ एई सात-जन ।।मध्ये मध्ये हरि-ध्वनि करे भक्त-गण ॥
१६४॥
स्वरूप दामोदर गोस्वामी, जगदानन्द, दामोदर पण्डित, काशीश्वर, गोपीनाथ, वाणीनाथ तथा शंकर ने प्रसाद का वितरण किया और भक्तगण बीच-बीच में हरि नाम का उच्चारण करते जा रहे थे।
पुलिन-भोजन कृष्ण पूर्वे ट्रैछे कैल । सेइ लीला महाप्रभुर मने स्मृति हैल ॥
१६५ ॥
जिस तरह भगवान् श्रीकृष्ण ने पहले जंगल में भोजन किया था, श्री चैतन्य महाप्रभु को वही लीला याद हो आयी।
ग्रद्यपि प्रेमावेशे प्रभु हैला अस्थिर ।।समय बुझिया प्रभु हैला किछु धीर ॥
१६६ ॥
श्रीकृष्ण की लीलाओं के स्मरण मात्र से श्री चैतन्य महाप्रभु को प्रेमावेश हो आया, किन्तु समय तथा परिस्थिति को देखते हुए वे कुछ धीर बने रहे।
प्रभु कहे,—मोरे देह' लाफ्रा-व्यञ्जने । पिठा-पाना, अमृत-गुटिका देह' भक्त-गणे ॥
१६७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, आप मुझे साधारण तरकारी, जिसे लाफरा व्यंजन कहते हैं, परोसें और सभी भक्तों को मिठाई, खीर तथा अमृत गुटिका जैसे उत्तम व्यंजन परोसें।
सर्वज्ञ प्रभु जानेन याँरे येइ भाय ।तारे ताँरे सेइ देओयाय स्वरूप-द्वाराय ॥
१६८ ॥
चूंकि चैतन्य महाप्रभु सब कुछ जानने वाले हैं, अतएव वे जानते थे कि किस व्यक्ति को कौन-सा व्यंजन पसन्द है। इसलिए चैतन्य महाप्रभु के आदेश से हरेक भक्त को स्वरूप दामोदर के हाथों से उन व्यंजनों को भरपेट परोसा गया।
जगदानन्द बेड़ाय परिवेशन करिते ।।प्रभुर पाते भाल-द्रव्य देन अचम्बिते ।। १६९॥
जगदानन्द प्रसाद वितरण करने आये और उसने सहसा सर्वश्रेष्ठ व्यंजन महाप्रभु की पत्तल में परोस दिये।
यद्यपि दिले प्रभु ताँरे करेन रोष ।।बले-छले तबु देन, दिले से सन्तोष ॥
१७०॥
जब महाप्रभु की पत्तल में इतना अच्छा प्रसाद परोस दिया गया, तो वे बाहर से अत्यधिक क्रुद्ध प्रतीत हुए। किन्तु फिर भी जब कभी किसी न किसी बहाने से अथवा जबरदस्ती उनकी पत्तल पर व्यंजन परोस दिये जाते, तो महाप्रभु को अत्यधिक सन्तोष हुआ।
पुनरपि सेइ द्रव्य करे निरीक्षण ।ताँर भये प्रभु किछु करेन भक्षण ॥
१७१॥
जब इस तरह भोजन परोस दिया जाता, तो महाप्रभु कुछ समय तक उसे देखते रहते। किन्तु जगदानन्द के भय से वे अन्ततः उसमें से कुछ न कुछ खा लेते।
ना खाइले जगदानन्द करिबे उपवास ।। ताँर आगे किछु खान—मने ऐ त्रास ॥
१७२॥
महाप्रभु जानते थे कि यदि वे जगदानन्द द्वारा परोसा गया भोजन नहीं खायेंगे, तो वे अवश्य उपवास करेंगे। इस भय से श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसके द्वारा दिये गये प्रसाद में से कुछ अंश खा लिया।
स्वरूप-गोसाजि भाल मिष्ट-प्रसाद ला ।। प्रभुके निवेदन करे आगे दाण्डाजा ॥
१७३॥
तब स्वरूप दामोदर गोसांई कुछ उत्तम मिठाइयाँ ले आये और महाप्रभु के सामने खड़े होकर उन्हें अर्पित किया।
एइ महा-प्रसाद अल्प करह आस्वादन ।। देख, जगन्नाथ कैछे कर्याछेन भोजन ॥
१७४॥
तब स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने कहा, इस महाप्रसाद में से थोड़ा ले लें और देखें कि भगवान जगन्नाथ ने इसे किस प्रकार ग्रहण किया।
एते बलि' आगे किछु करे समर्पण ।।ताँर स्नेहे प्रभु किछु करेन भोजन ॥
१७५ ॥
यह कहकर स्वरूप दामोदर गोसांई ने महाप्रभु के सामने कुछ भोजन रख दिया और महाप्रभु ने स्नेहवश उसे ग्रहण किया।
एइ मत दुइ-जन करे बार-बार ।। विचित्र एइ दुइ भक्तेर स्नेह-व्यवहार ॥
१७६ ॥
स्वरूप दामोदर तथा जगदानन्द ने महाप्रभु को बारम्बार कुछ भोजन दिया। इस तरह उन्होंने महाप्रभु के साथ स्नेहपूर्ण व्यवहार किया। यह अत्यन्त असामान्य बात थी।
सार्वभौमे प्रभु वसाळाछेन वाम-पाशे ।। दुइ भक्तेर स्नेह देखि' सार्वभौम हासे ॥
१७७॥
महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य को अपने बाईं ओर बैठा लिया। सार्वभौम ने जब स्वरूप दामोदर तथा जगदानन्द का व्यवहार देखा, तो वे हँसने लगे।
सार्वभौमे देयान प्रभु प्रसाद उत्तम । स्नेह करि' बार-बार करान भोजन ॥
१७८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु सार्वभौम भट्टाचार्य को भी उत्तम भोजन देना चाहते थे, अतएव उन्होंने परोसने वाले से बार-बार उनकी पत्तल में उत्तम भोजन परोसने को कहा।
गोपीनाथाचार्य उत्तम महा-प्रसाद आनि' ।। सार्वभौमे दिया कहे सुमधुर वाणी ॥
१७९॥
गोपीनाथ आचार्य ने भी उत्तम भोजन लाकर मधुर वचन कहते हुए। सार्वभौम भट्टाचार्य को दिया।
काहाँ भट्टाचार पूर्व जड़-व्यवहार ।।काहाँ एइ परमानन्द, करह विचार ॥
१८० ॥
भट्टाचार्य को उत्तम भोजन परोसने के बाद गोपीनाथ आचार्य ने कहा, जरा विचार करें कि भट्टाचार्य को पूर्ववर्ती भौतिक आचरण कैसा था! जरा विचार करें कि इस समय वे किस तरह दिव्य आनन्द भोग रहे हैं।
सार्वभौम कहे,—आमि तार्किक कुबुद्धि ।। तोमार प्रसादे मोर ए सम्पत्सिद्धि ॥
१८१॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने गोपीनाथ आचार्य को उत्तर दिया, मैं अल्पबुद्धि तार्किक था। फिर भी आपकी कृपा से मुझे सिद्धि का यह ऐश्वर्य प्राप्त हो सका है।
महाप्रभु विना केह नाहि दयामय । काकेरे गरुड़ करे,---ऐछे कोन्हय ॥
१८२॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने आगे कहा, श्री चैतन्य महाप्रभु के अतिरिक्त इतना दयावान कौन हो सकता है? उन्होंने एक कौवे को गरुड़ बना दिया है। भला इतना दयावान और कौन हो सकता है? तार्किक-शृगाल-सङ्गे भेउ-भेउ करि । सेइ मुखे एबे सदा कहि 'कृष्ण' ‘हरि' ॥
१८३॥
तार्किक व्यक्ति रूपी सियारों के साथ मैं भौं-भौं की गूंज करता था। अब मैं उसी मुँह से 'कृष्ण' तथा 'हरि' के पवित्र नामों का उच्चारण कर रहा हूँ। काहाँ बहिर्मुख तार्किक-शिष्यगण-सङ्गे।। काहाँ एइ सङ्ग-सुधा-समुद्र-तरङ्गे ॥
१८४॥
कहाँ मैं अभक्त तार्किक शिष्यों की संगति में रहता था, कहाँ अब में भक्तों के संग-रूपी अमृत के सागर की लहरों में निमग्न हूँ।
प्रभु कहे,—पूर्वे सिद्ध कृष्णे तोमार प्रीति ।।तोमा-सङ्गे आमा-सबार हैल कृष्णे मति ॥
१८५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य को कहा, आप अपने पूर्वजन्म से कृष्णभावनामृत में रहते आ रहे हो। आप कृष्ण से इतना प्रेम करते हो कि आपकी संगति से हम लोगों में कृष्णभावना विकसित हो गी है।
भक्त-महिमा बाड़ाइते, भक्ते सुख दिते ।।महाप्रभु विना अन्य नाहि त्रिजगते ॥
१८६॥
इस तरह तीनों लोकों के भीतर श्री चैतन्य महाप्रभु के अतिरिक्त ऐसा कोई अन्य व्यक्ति नहीं है, जो भक्तों की महिमा को बढ़ाने की इच्छा रखता हो और उन्हें सन्तोष प्रदान करता हो।
तबे प्रभु प्रत्येके, सब भक्तेर नाम लञा ।। पिठा-पाना देओयाइल प्रसाद करिया ॥
१८७॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगन्नाथजी पर चढ़ाया गया सारा पीठापाना (मिठाई तथा खीर) लेकर अन्य सभी भक्तों को एक एक करके बुला-बुलाकर उनमें वितरित कर दिया।
अद्वैत-नित्यानन्द वसियाछेन एक ठात्रि ।। दुइ-जने क्रीड़ा-कलह लागिल तथाइ ॥
१८८ ॥
श्री अद्वैत आचार्य तथा नित्यानन्द प्रभु पास-पास बैठ गये और जब प्रमाद बाँटा जाने लगा, तो वे एक तरह के दिखावटी झगड़े ( क्रीड़ाकलह ) में लग गये।
अद्वैत कहे,—अवधूतेर सङ्गे एक पङि ।। भोजन करिलें, ना जानि हबे कोन्गति ॥
१८९॥
पहले अद्वैत आचार्य ने कहा, मैं एक अज्ञात अवधूत के साथ पंक्ति में बैठा हूँ और उसके साथ भोजन कर रहा हूँ; अतः मैं नहीं जानता कि मेरी क्या गति होगी? प्रभु त' सन्यासी, उँहार नाहि अपचय ।। अन्न-दोषे सन्यासीर दोष नाहि हय ॥
१९०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु तो संन्यासी हैं। अतएव वे कोई दोष नहीं देखते। तथ्य तो यह है कि संन्यासी कहीं का भी अन्न खाने से प्रभावित नहीं होता।
नान्ने-दोषेण मस्करी–एइ शास्त्र-प्रमाण ।आमि त' गृहस्थ-ब्राह्मण, आमार दोष-स्थान ॥
१९१॥
शास्त्रों के अनुसार यदि संन्यासी दूसरे के घर में भोजन करे तो इसमें कोई त्रुटि नहीं है। किन्तु गृहस्थ ब्राह्मण के लिए इस तरह भोजन करना दोषपूर्ण है।
जन्म-कुल-शीलाचार ना जानि ग्राहार ।। तार सङ्गे एक पङ्कि-बड़ अनाचार ॥
१९२॥
जिन लोगों का पूर्वजन्म, कुल, चरित्र तथा आचरण अज्ञात हो, उनके साथ गृहस्थों को भोजन करना उचित नहीं है।
नित्यानन्द कहे—तुमि अद्वैत-आचार्य ।‘अद्वैत-सिद्धान्ते' बाधे शुद्ध-भक्ति-कार्य ॥
१९३ ॥
नित्यानन्द प्रभु ने तुरन्त ही अद्वैत आचार्य का खण्डन करते हुए कहा, ' आप निर्विशेष अद्वैतवाद के शिक्षक हो और अद्वैतवादी निष्कर्ष प्रगतिशील शुद्ध भक्ति के पथ में बहुत बड़ा अवरोध है। '" तोमार सिद्धान्त-सङ्ग करे ग्रेइ जने ।‘एक वस्तु विना सेइ द्वितीय' नाहि माने ॥
१९४॥
जो आपके निर्विशेष अद्वैतवादी दर्शन में भाग लेता है, वह एक ब्रह्म के अतिरिक्त अन्य कुछ भी नहीं स्वीकार करता।
हेन तोमार सङ्गे मोर एकत्रे भोजन ।ना जानि, तोमार सङ्गे कैछे हय मन ॥
१९५॥
नित्यानन्द प्रभु ने आगे कहा, आप इस तरह के अद्वैतवादी हो! और मैं अब आपकी बगल में बैठकर खा रहा हूँ। मैं नहीं जानता कि इससे मेरा मन किस तरह प्रभावित होगा? ।
एइ-मत दुइ-जने करे बलाबलि । ।व्याज-स्तुति करे मुँहे, ग्रेन गालागालि ॥
१९६॥
। इस तरह दोनों बातें करते और एक-दूसरे की प्रशंसा करते रहे, यद्यपि उनकी प्रशंसा नकारात्मक जान पड़ती थी, क्योंकि ऐसा लग रहा था मानो वे एक दूसरे को गाली दे रहे हों।
तबे प्रभु सर्व-वैष्णवेर नाम लञा ।।महा-प्रसाद देन महा-अमृत सिञ्चिया ॥
१९७॥
तत्पश्चात् सारे वैष्णवों का नाम ले-लेकर बुलाकर महाप्रभु ने महाप्रसाद वितरित किया, मानो वे अमृत छिड़क रहे हों। उस समय अद्वैत आचार्य तथा नित्यानन्द प्रभु की क्रीड़ा-कलह अधिकाधिक रोचक लगने लगी।
भोजन करि' उठे सबे हरि-ध्वनि करि' । हरि-ध्वनि उठिल सब स्वर्ग-मर्त्य भरि' ।। १९८॥
भोजन करने के बाद सारे वैष्णव हरि हरि की ध्वनि करते हुए उठ खड़े हुए। यह हरि-ध्वनि सभी उच्चलोकों तथा निम्नलोकों में भर गई।
तबे महाप्रभु सब निज-भक्त-गणे ।। सबकारे श्री-हस्ते दिला माल्य-चन्दने ॥
१९९॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने सारे भक्त संगियों को अपने हाथ से फूल-मालाएँ तथा चन्दन-लेप प्रदान किया।
तबे परिवेशक स्वरूपादि सात जन ।। गृहेर भितरे कैल प्रसाद भोजन ॥
२००॥
प्रसाद वितरण में लगे स्वरूप दामोदर आदि सात भक्तों ने इसके बाद कमरे के भीतर भोजन किया।
प्रभुर अवशेष गोविन्द राखिल धरिया । सेइ अन्न हरिदासे किछु दिल लञा ॥
२०१॥
गोविन्द ने महाप्रभु द्वारा छोड़े गये कुछ शेष प्रसाद को सावधानी से रख लिया और बाद में इसमें से कुछ अंश हरिदास ठाकुर को लाकर दे दिया।
भक्त-गण गोविन्द-पाश किछु मागि' निल ।। सेइ प्रसादान्न गोविन्द आपनि पाइल ॥
२०२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के उच्छिष्ट प्रसाद को बाद में उन भक्तों में वितरित किया गया, जिन्होंने याचना की और फिर जो कुछ बचा उसे स्वयं गोविन्द ने खाया।
स्वतन्त्र ईश्वर प्रभु करे नाना खेला ।। ‘धोया-पाखला' नाम कैल एइ एक लीला ॥
२०३। परम स्वतन्त्र भगवान् नाना प्रकार की लीलाएँ करते हैं। गुण्डिचा मन्दिर की धुलाई और सफाई उनमें से केवल एक है।
आर दिने जगन्नाथेर 'नेत्रोत्सव' नाम ।। महोत्सव हैल भक्तेर प्राण-समान ॥
२०४॥
अगले दिन नेत्रोत्सव मनाया गया। यह महोत्सव भक्तों के प्राणों के समान था।
पक्ष-दिन दुःखी लोक प्रभुर अदर्शने ।। दर्शन करिया लोक सुख पाइल मने ॥
२०५॥
एक पखवाड़े तक सारे लोग भगवान जगन्नाथ का दर्शन न पाने से दु:खी थे। किन्तु इस उत्सव में भगवान् का दर्शन करके भक्तगण परम प्रसन्न थे।
महाप्रभु सुखे लञा सब भक्त-गण ।। जगन्नाथ-दरशने करिला गमन ॥
२०६॥
। इस अवसर पर सारे भक्तों को अपने साथ लेकर महाप्रभु ने आनन्दपूर्वक मन्दिर में भगवान् का दर्शन किया।
आगे काशीश्वर यायं लोक निवारिया ।। पाछे गोविन्द ग्राय जल-करङ्ग लञा ॥
२०७॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु मन्दिर में दर्शन करने गये, तो काशीश्वर उनके आगे-आगे चलकर भीड़ को रोक रहा था और पीछे-पीछे गोविन्द था, जो जल से भरा संन्यासी को कमण्डलु लिए हुए था।
प्रभुर आगे पुरी, भारती, मुँहार गमन । ।स्वरूप, अद्वैत, मुँहेर पार्थे दुइ-जन ॥
२०८॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु मन्दिर की ओर जा रहे थे, तो परमानन्द पुरी तथा ब्रह्मानन्द भारती उनके आगे-आगे चल रहे थे और स्वरूप दामोदर तथा अद्वैत आचार्य उनके अगल-बगल चल रहे थे।
पाछे पाछे चलि' ग्राय आर भक्त-गण ।। उत्कण्ठाते गेला सब जगन्नाथ-भवन ॥
२०९॥
अन्य सारे भक्त परम उत्सुकता के साथ महाप्रभु के पीछे-पीछे जगन्नाथजी के मन्दिर में गये।
दर्शन-लोभेते करि' मर्यादा लङ्घन ।।भोग-मण्डपे ग्राञा करे श्री-मुख दर्शन ॥
२१०॥
उन सबने भगवान् का दर्शन करने की परम उत्सुकता के कारण विधि-विधानों की उपेक्षा कर दी और भगवान् के मुख का दर्शन करने के लिए ही वे सभी भोग-मन्दिर में गये।
तृषार्त प्रभुर नेत्र--भ्रमर-युगल ।।गाढ़ तृष्णाय पिये कृष्णेर वदन-कमल ॥
२११॥
श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान् का दर्शन करने के लिए अत्यन्त प्यासे थे, अतः उनके दोनों नेत्र उन दो भौरों के तुल्य बन गये, जो साक्षात् कृष्णस्वरूप भगवान जगन्नाथ के कमलव नेत्रों के मधु का पान कर रहे थे ।
प्रफुल्ल-कमल जिनि' नयन-युगल ।। नीलमणि-दर्पण-कान्ति गण्ड झलमल ॥
२१२॥
भगवान् जगन्नाथ की आँखें प्रफुल्लित कमलों के सौन्दर्य को जीतने वाली और उनकी गर्दन नीलमणि से बने दर्पण की तरह कान्तियुक्त थी।
बान्धुलीर फुल जिनि' अधर सुरङ्ग।ईषत् हसित कान्ति–अमृत-तरङ्ग ॥
२१३ ॥
भगवान् की ठुड्डी लाल रंग से रंगी थी, जो बान्धुली फूल की शोभा को मात करने वाली थी। इससे उनके मन्द हास की सुन्दरता बढ़ गई, जो अमृत की चमकीली तरंगों के समान थी।
श्री-मुख-सुन्दर-कान्ति बाढ़ क्षणे क्षणे ।।कोटि-भक्त-नेत्र-भृङ्ग करे मधु-पाने ॥
२१४॥
उनके सुन्दर मुख की कान्ति प्रतिक्षण बढ़ती जा रही थी और करोड़ों भक्तों के नेत्र भौरों के तुल्य उसका मधुपान कर रहे थे।
ग्रत पिये तत तृष्णा बाढ़े निरन्तर ।।मुखाम्बुज छाड़ि' नेत्र ना ग्राय अन्तर ॥
२१५ ॥
ज्यों-ज्यों उनके नेत्र भगवान् के कमल-मुख का अमृततुल्य मधु पी रहे थे, त्यों-त्यों उनकी प्यास बढ़ती जा रही थी। इस तरह उनकी आँखें उन्हें छोड़ नहीं पा रही थीं।
एइ-मत महाप्रभु लञा भक्त-गण । मध्याह्न पर्यन्त कैल श्री-मुख दरशन ॥
२१६॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके भक्तों ने जगन्नाथजी के मुख का दर्शन करके दिव्य आनन्द प्राप्त किया। ऐसा दोपहर तक चलता रहा।
स्वेद, कम्प, अश्रु-जल वहे सर्व-क्षण । दर्शनेर लोभे प्रभु करे संवरण ॥
२१७॥
हमेशा की तरह चैतन्य महाप्रभु के शरीर में दिव्य आनन्द के लक्षण प्रकट हो आये। उन्हें पसीना हो आया और वे काँपने लगे। उनके नेत्रों से । लगातार अश्रु की धारा बहने लगी। किन्तु महाप्रभु ने इन आँसुओं को रोका, जिससे भगवान् का मुख देखने में बाधा न पहुँचे।
मध्ये मध्ये भोग लागे, मध्ये दरशन ।।भोगेर समये प्रभु करेन कीर्तन ॥
२१८॥
जब-जब भोग लगाया जाता, केवल तब ही भगवान जगन्नाथ का मुख-दर्शन करने में बाधा पहुँचती थी। इसके बाद वे पुनः उनका मुख देखने लगते। जब भगवान् को भोग अर्पित किया जाता, तो श्री चैतन्य महाप्रभु कीर्तन करने लगते।।
दर्शन-आनन्दे प्रभु सब पासरिला ।। भक्त-गण मध्याह्न करिते प्रभुरे ला गेला ॥
२१९॥
भगवान् जगन्नाथ के मुख का दर्शन करके परम आनन्द का अनुभव करने से श्री चैतन्य महाप्रभु सब कुछ भूल गये। किन्तु भक्तगण उन्हें दोपहर के समय भोजन कराने ले गये।
प्रात:-काले रथ-यात्रा हबेक जानिया ।।सेवक लागाय भोग द्विगुण करिया ॥
२२०॥
यह जानते हुए कि रथयात्रा प्रात:काल शुरू होगी, जगन्नाथजी के सारे सेवकों ने चढ़ाये जाने वाले भोजन की मात्रा दुगुनी कर दी।
गुण्डिचा-मार्जन-लीला सङ्क्षेपे कहिले ।ग्राहा देखि' शुनि' पापीर कृष्ण-भक्ति हैल ॥
२२१॥
मैंने गुण्डिचा मन्दिर के धोने और साफ करने की महाप्रभु की लीला का संक्षिप्त वर्णन किया है। इन लीलाओं को देखकर अथवा सुनकर पापी व्यक्तियों में भी कृष्ण-भक्ति जाग्रत हो सकती है।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
२२२॥
श्री रूप और श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए और सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए मैं कृष्णदास उन्हीं के पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत कह रहा हूँ।
