अध्याय ग्यारह: श्री चैतन्य महाप्रभु की बेदा-कीर्तन लीलाएँ
अत्युद्दण्डं ताण्डवं गौरचन्द्रः ।कुर्वन्भक्तैः श्री-जगन्नाथ-गेहे ।। नाना-भावालङ्कताङ्गः स्व-धाम्ना ।चक्रे विश्व प्रेम-वन्या-निमग्नम् ॥
१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगन्नाथ मन्दिर के भीतर अपना सुन्दर नृत्य करके सारे जगत् को प्रेम के सागर में निमग्न कर दिया। उन्होंने बहुत ही अच्छी तरह से ऊँचे उछलकर नृत्य किया।
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत प्रभु की जय हो! श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो!" आर दिन सार्वभौम कहे प्रभु-स्थाने ।अभय-दान देह' म्रदि, करि निवेदने ॥
३॥
अगले दिन सार्वभौम भट्टाचार्य ने चैतन्य महाप्रभु से निवेदन किया कि वे उन्हें अनुमति दें, जिससे वे अभय होकर अपनी बात कह सकें।"
प्रभु कहे, कह तुमि, नाहि किछु भय ।।योग्य हैले करिब, अयोग्य हैले नय ॥
४॥
महाप्रभु ने भट्टाचार्य को आश्वासन दिया कि वे बिना किसी भय के अपनी बात कहें, किन्तु साथ में यह भी कहा कि यदि उनकी बात उपयुक्त होगी, तभी वे स्वीकार करेंगे, अन्यथा अस्वीकार कर देंगे।"
सार्वभौम कहे--एइ प्रतापरुद्र राय ।। उत्कण्ठा हाछे, तोमा मिलिबारे चाय ॥
५॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, प्रतापरुद्र राय नाम का एक राजा है। वह आपसे मिलने के लिए अत्यन्त उत्सुक है और आपकी अनुमति चाहता है।"
कर्णे हस्त दिया प्रभु स्मरे 'नारायण' ।। सार्वभौम, कह केन अयोग्य वचन ॥
६॥
इस प्रस्ताव को सुनते ही श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने हाथों से कान बन्द कर दिये और कहा, अरे सार्वभौम, आप मुझसे ऐसी अनुपयुक्त बात के लिए अनुरोध क्यों कर रहे हैं?" विरक्त सन्यासी आमार राज-दरशन । स्त्री-दरशन-सम विषेर भक्षण ॥
७॥
मैं संन्यासी हैं, इसलिए मेरे लिए किसी राजा से मिलना उसी तरह घातक है, जिस तरह किसी स्त्री से मिलना। इन दोनों से मिलना विषपान करने के तुल्य है।"
निष्किञ्चनस्य भगवद्भजनोन्मुखस्यपारं परं जिगमिषोर्भव-सागरस्य । सन्दर्शनं विषयिणामथ योषितां चहा हन्त हन्त विष-भक्षणतोऽप्यसाधु ॥
८॥
अत्यधिक शोक प्रकट करते हुए महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य को बतलाया हाय! जो व्यक्ति भवसागर को पार करना चाहता है और बिना किसी भौतिक हेतु के भगवान् की दिव्य प्रेममयी सेवा में लगना चाहता है, उसके लिए इन्द्रियतृप्ति में लगे भौतिकतावादी अथवा ऐसी ही रुचि रखने वाली स्त्री को देखना जान-बूझकर विष खाने से भी अधिक निन्दनीय है।"
सार्वभौम कहे,—सत्य तोमार वचन ।।जगन्नाथ-सेवक राजा किन्तु भक्तोत्तम ॥
९ ॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, हे प्रभु, आपने जो कुछ कहा है, वह सही है; किन्तु यह राजा कोई सामान्य राजा नहीं है। यह जगन्नाथजी का महान् भक्त तथा सेवक है।"
प्रभु कहे, तथापि राजा काल-सर्पाकार ।काष्ठ-नारी-स्पर्शे ग्रैछे उपजे विकार ॥
१०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, यह सच है कि राजा महान् भक्त है, फिर भी उसे विषैला साँप ही समझना होगा। इसी प्रकार स्त्री चाहे काठ की ही ( पुतली ) क्यों न हो, उसके रूप को स्पर्श करने मात्र से मनुष्य विचलित हो उठता है।"
आकारादपि भेतव्यं स्त्रीणां विषयिणामपि ।।यथाहेर्मनसः क्षोभस्तथा तस्याकृतेरपि ॥
११॥
जिस तरह मनुष्य किसी जीवित सर्प या सर्प की आकृति को देखते ही डर जाता है, उसी तरह आत्म-साक्षात्कार के इच्छुक व्यक्ति को भौतिकतावादी पुरुष तथा स्त्री से डरना चाहिए। उसे उनके शारीरिक लक्षणों पर दृष्टि भी नहीं डालनी चाहिए।'" ऐछे बात पुनरपि मुखे ना आनिबे ।।कह ग्रदि, तबे आमाय एथा ना देखिबे ॥
१२॥
हे भट्टाचार्य, यदि आप इसी तरह मुझसे कहते रहोगे, तो आप मुझे पुनः यहाँ कभी नहीं देखेंगे। अतः आप कभी भी ऐसा निवेदन अपने मुख से न करना।"
भय पाना सार्वभौम निज घरे गेला ।वासाय गिया भट्टाचार्य चिन्तित हुइला ॥
१३॥
सार्वभौम डरकर अपने घर वापस चले गये और इस विषय पर मनन करने लगे।"
हेन काले प्रतापरुद्र पुरुषोत्तमे आइला ।।पात्र-मित्र-सङ्गे राजा दरशने चलिला ॥
१४॥
उसी समय महाराज प्रतापरुद्र जगन्नाथ पुरी अर्थात् पुरुषोत्तम पधारे और वे अपने मन्त्रियों, सचिवों तथा सैनिक अधिकारियों समेत जगन्नाथ मन्दिर का दर्शन करने गये।।"
रामानन्द राय आइला गजपति-सङ्गे।।प्रथमेइ प्रभुरे आसि' मिलिला बहु-रङ्गे ।। १५ ।। । जब राजा प्रतापरुद्र जगन्नाथ पुरी लौटे, तब रामानन्द राय भी उनके साथ आये। वे तुरन्त हर्षपूर्वक श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने गये।"
राय प्रणति कैल, प्रभु कैल आलिङ्गन ।दुइ जने प्रेमावेशे करेन क्रन्दन ॥
१६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलकर रामानन्द राय ने उन्हें नमस्कार किया। महाप्रभु ने उनका आलिंगन किया और दोनों प्रेमावेश में आकर रोने लगे।"
राय-सङ्गे प्रभुर देखि' स्नेह-व्यवहार । सर्व भक्त-गणेर मने हैल चमत्कार ॥
१७॥
। श्री रामानन्द राय के साथ श्री चैतन्य महाप्रभु के घनिष्ठ व्यवहार को देखकर सारे भक्त अचम्भित हो गये।"
राय कहे,—तोमार आज्ञा राजाके कहिल।। तोमार इच्छाय राजा मोर विषय छाड़ाइल ॥
१८॥
रामानन्द राय ने कहा, मैंने राजा प्रतापरुद्र को आपके आदेश से अवगत करा दिया है कि वे मुझे नौकरी से मुक्त कर दें। आपकी कृपा से राजा ने प्रसन्न होकर मुझे इन भौतिक कार्यों से मुक्त कर दिया है।"
आमि कहि,—आमा हैते ना हय ‘विषय' । चैतन्य-चरणे रहों, यदि आज्ञा होय ॥
१९॥
मैंने उनसे कहा, 'हे राजन्, अब मैं राजनैतिक कार्यों में नहीं लगा रहना चाहता। मेरी इच्छा केवल श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों में रहने की है। कृपया मुझे अनुमति दें।।"
तोमार नाम शुनि' राजा आनन्दित हैल ।।आसन हैते उठि' मोरे आलिङ्गन कैल ॥
२०॥
जब मैंने यह प्रस्ताव रखा, तो आपका नाम सुनते ही राजा अत्यधिक प्रसन्न हो गये। वे तुरन्त अपने सिंहासन से उठे और उन्होंने मेरा आलिंगन कर लिया।"
तोमार नाम शुनि' हैल महा-प्रेमावेश ।मोर हाते धरि' करे पिरीति विशेष ॥
२१॥
हे प्रभु, ज्योंही राजा ने आपका पवित्र नाम सुना, वे अत्यधिक भावविह्वल हो उठे। मेरा हाथ पकड़कर उन्होंने प्रेम के सारे लक्षणों को प्रदर्शित किये।"
तोमार ने वर्तन, तुमि खाओ सेइ वर्तन ।। निश्चिन्त हञा भज चैतन्येर चरण ॥
२२॥
ज्योंही उन्होंने मेरा निवेदन सुना, उन्होंने तुरन्त बिना कटौती के मेरी अवकाशवृत्ति (पेंशन) मंजूर कर दी। इस तरह राजा ने अवकाशवृत्ति के रूप में पूरा वेतन देने की अनुमति दी और मुझसे अनुनय किया कि मैं आपके चरणकमलों की सेवा निश्चिन्त होकर करूँ।"
आमिछार, योग्य नहि ताँर दरशने ।। तारै ग्रेइ भजे ताँर सफल जीवने ॥
२३॥
तब महाराज प्रतापरुद्र ने विनीत होकर कहा, 'मैं अत्यन्त पतित हैं और गर्हित हूँ। मैं महाप्रभु का दर्शन पाने के लिए अयोग्य हूँ। जो व्यक्ति उनकी सेवा में लगता है, उसका जीवन सफल हो जाता है।'" परम कृपालु तेह व्रजेन्द्र-नन्दन ।। कोन-जन्मे मोरे अवश्य दिबेन दरशन ॥
२४॥
राजा ने तब कहा, 'श्री चैतन्य महाप्रभु महाराज नन्द के पुत्र कृष्ण हैं। वे अत्यन्त कृपालु हैं और मैं आशा करता हूँ कि वे मुझे अगले जन्म में अवश्य दर्शन देंगे।'" ये ताँहार प्रेम-आर्ति देखिलॅ तोमाते ।। तार एक प्रेम-लेश नाहिक आमाते ॥
२५॥
हे प्रभु, मैं सोचता हूँ कि मुझ में महाराज प्रतापरुद्र के प्रेम का एक अंश भी नहीं है।"
प्रभु कहे,—तुमि कृष्ण-भकत-प्रधान ।तोमाके ये प्रीति करे, सेइ भाग्यवान् ॥
२६॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, हे रामानन्द राय, आप कृष्ण के भक्तों में अग्रणी हो, अतएव जो भी आप से प्रेम करता है, वह निश्चित रूप से अत्यन्त भाग्यशाली है।"
तोमाते ग्रे एत प्रीति हइल राजार ।।एई गुणे कृष्ण ताँरै करिबे अङ्गीकार ॥
२७॥
चूंकि राजा ने आप पर इतना प्रेम दर्शाया है, अतएव भगवान् कृष्ण उसे अवश्य स्वीकार करेंगे।"
ने मे भक्त-जनाः पार्थ न मे भक्ताश्च ते जनाः ।। मद्भक्तानां च ये भक्तास्ते मे भक्त-तमा मताः ॥
२८॥
। ( भगवान् कृष्ण ने अर्जुन से कहा :) 'जो मेरे प्रत्यक्ष भक्त हैं, वे वास्तव में मेरे भक्त नहीं हैं, किन्तु जो मेरे दास के भक्त हैं, वे सचमुच मेरे भक्त हैं।'" आदरः परिचर्यायां सर्वाङ्गैरभिवन्दनम् ।। मद्भक्त-पूजाभ्यधिका सर्व-भूतेषु मन्मतिः ॥
२९॥
मदर्थेष्वङ्ग-चेष्टा च वचसा मद्गुणेरणम् ।।मय्यर्पणं च मनसः सर्व-काम-विवर्जनम् ॥
३०॥
। मेरे भक्त बड़ी सतर्कता तथा आदर से मेरी सेवा करते हैं। वे अपने सारे अंगों से मुझे नमस्कार करते हैं। वे मेरे अन्य भक्तों की पूजा करते हैं। और सारे जीवों को मुझसे सम्बन्धित पाते हैं। वे मेरे लिए अपने शरीर की सारी शक्ति लगा देते हैं। वे मेरे गुणों तथा रूप की महिमा का बखान करने में अपनी वाणी का प्रयोग करते हैं। वे अपना मन भी मुझे अर्पित कर देते हैं और सारी भौतिक इच्छाओं को त्यागने की चेष्टा करते हैं। मेरे भक्तों के यही लक्षण हैं।'" आराधनानां सर्वेषां विष्णोराराधनं परम् ।।तस्मात्परतरं देवि तदीयानां समर्चनम् ॥
३१॥
( शिवजी ने दुर्गा देवी से कहा :) 'हे देवी, यद्यपि वेदों में देवताओं की पूजा की संस्तुति की गई है, लेकिन भगवान् विष्णु की पूजा सर्वोपरि है। किन्तु भगवान् विष्णु की सेवा से भी बढ़कर है उन वैष्णवों की सेवा, जो भगवान् विष्णु से सम्बन्धित हैं।'" दुरापा ह्यल्प-तपसः सेवा वैकुण्ठ-वर्मसु ।।यत्रोपगीयते नित्यं देव-देवो जनार्दनः ॥
३२॥
जिनकी तपस्या बहुत कम है, वे भगवद्धाम वापस जाने के मार्ग पर आगे बढ़ते हुए शुद्ध भक्तों की सेवा शायद ही प्राप्त कर सकते हैं। शुद्ध भक्त उन भगवान् की महिमा के गायन में अपना शत-प्रतिशत समय लगाते हैं, जो देवताओं के स्वामी हैं और सारे जीवों के नियन्ता हैं।"
पुरी, भारती-गोसाञि, स्वरूप, नित्यानन्द ।।जगदानन्द, मुकुन्दादि ग्रत भक्त-वृन्द ॥
३३ ।। उस समय महाप्रभु के समक्ष परमानन्द पुरी, ब्रह्मानन्द भारती गोसांई, स्वरूप दामोदर गोसांई, नित्यानन्द प्रभु, जगदानन्द, मुकुन्द तथा अन्य भक्त उपस्थित थे।"
चारि गोसाजिर कैल राय चरण वन्दन । यथा-योग्य सब भक्तेर करिल मिलन ॥
३४॥
। श्री रामानन्द राय ने सभी भक्तों को, विशेषकर चारों गुरुओं को नमस्कार किया और वे अन्य सभी भक्तों से यथायोग्य रूप से मिले।"
प्रभु कहे,—राय, देखिले कमल-नयन? । राय कहे,—एबे ग्राइ पाब दरशन ॥
३५ ॥
। तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय से पूछा, क्या तुमने कमल जैसे नेत्रों वाले भगवान जगन्नाथ के मन्दिर का दर्शन किया है? रामानन्द राय ने कहा, अब मैं मन्दिर में दर्शन करने जाऊँगा।"
प्रभु कहे,- राय, तुमि कि कार्य करिले?।।ईश्वरे ना देखि' केने आगे एथा आइले? ॥
३६॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मेरे प्रिय राय, तुमने क्या कर दिया? तुम पहले जगन्नाथजी का दर्शन करने जाते और तब यहाँ आते? तुम पहले यहाँ पर क्यों आये हो?" राये कहे, चरण–रथ, हृदय-सारथि ।।याहाँ लञा याय, ताहाँ ग्राय जीव-रथी ॥
३७॥
। रामानन्द राय ने कहा, चरण रथ के तुल्य हैं, और हृदय रथ चलाने वाले सारथी के समान है। हृदय जीव को जहाँ भी ले जाता है, जीव को वहीं जाना पड़ता है।"
आमि कि करिब, मन इहाँ लजा आइल । जगन्नाथ-दरशने विचार ना कैल ॥
३८॥
श्री रामानन्द राय कहते गये, मैं क्या करूं? मेरा मन मुझे यहाँ ले आया। मैं पहले जगन्नाथजी के मन्दिर जाने की बात सोच ही न सका।"
प्रभु कहे, शीघ्र गिया कर दरशन ।। ऐछे घर ग्राइ' कर कुटुम्ब मिलन ॥
३९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने परामर्श दिया, भगवान् का दर्शन करने तुरन्त जगन्नाथ मन्दिर में जाओ। तब तुम घर जाकर अपने परिवार वालों से मिलो।"
प्रभु आज्ञा पाळा राय चलिला दरशने ।। रायेर प्रेम-भक्ति-रीति बुझे कोन्जने ॥
४० ।।। श्री चैतन्य महाप्रभु की आज्ञा पाकर रामानन्द राय शीघ्रतापूर्वक जगन्नाथ मन्दिर गये। भला रामानन्द राय की भक्ति को कौन समझ सकता है।"
त्रे आसि' राजा सार्वभौमे बोलाइला ।। सार्वभौमे नमस्करि' ताँहारे पुछिला ॥
४१॥
जब राजा प्रतापरुद्र लौटकर जगन्नाथ पुरी आये, तो उन्होंने सार्वभौम भट्टाचार्य को बुलवाया। जब भट्टाचार्य राजा से भेंट करने गये, तो राजा ने उन्हें नमस्कार किया और उनसे पूछा।"
मोर लागि' प्रभु-पदे कैले निवेदन ? ।। सार्वभौम कहे,—कैनु अनेक ग्रतन ॥
४२॥
राजा ने पूछा, क्या आपने महाप्रभु के समक्ष मेरा निवेदन प्रस्तुत किया?' सार्वभौम ने उत्तर दिया, हाँ, मैंने भरसक प्रयत्न किया है।"
तथापि ना करे तेंह राज-दरशन ।।क्षेत्र छाड़ि' ग्राबेन पुनः यदि करि निवेदन ॥
४३॥
मेरे अथक प्रयास के बावजूद भी महाप्रभु राजा से मिलने के लिए राजी नहीं हैं। उन्होंने कहा कि यदि उनसे फिर से पूछा गया, तो वे जगन्नाथ पुरी छोड़कर अन्यत्र चले जायेंगे।"
शुनिया राजार मने दुःख उपजिल । विषाद करिया किछु कहिते लागिल ॥
४४॥
यह सुनकर राजा अत्यन्त दुःखी हुए और शोक करते हुए इस प्रकार बोले।"
पापी नीच उद्धारिते ताँर अवतार ।। जगाई माधाइ तेह करिला उद्धार ॥
४५ ॥
राजा ने कहा : श्री चैतन्य महाप्रभु सभी प्रकार के पापी एवं निम्न पुरुषों का उद्धार करने के लिए ही अवतरित हुए हैं। फलस्वरूप उन्होंने जगाइ तथा माधाइ जैसे पापियों का उद्धार किया है।"
प्रतापरुद्र छाड़ि' करिबे जगलिस्तार ।।एइ प्रतिज्ञा करि' करियाछेन अवतार? ॥
४६॥
हाय, क्या श्री चैतन्य महाप्रभु महाराज प्रतापरुद्र नामक राजा के अतिरिक्त अन्य सभी पापियों के ही उद्धार के लिए अवतरित हुए हैं ?" अदर्शनीयानपि नीच-जातीन् ।संवीक्षते हन्त तथापि नो माम् ।। मदेक-वर्णं कृपयिष्यतीति ।निर्णीय किं सोऽवततार देवः ॥
४७॥
। हाय! क्या श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह निर्णय लेकर अवतार लिया है कि वे मेरे अतिरिक्त अन्य सबका उद्धार करेंगे? वे अपनी कृपादृष्टि ऐसे अनेक निम्न जाति के व्यक्तियों पर डालते हैं, जिन्हें देखना भी वर्जित है।"
ताँर प्रतिज्ञा––मोरे ना करिबे दरशन ।। मोर प्रतिज्ञा–ताँहा विना छाड़िब जीवन ।। ४८॥
। महाराज प्रतापरुद्र ने आगे कहा, यदि श्री चैतन्य महाप्रभु ने मुझे न देखने का संकल्प ले रखा है, तो मैं भी कृतसंकल्प हूँ कि यदि मैं उनका दर्शन नहीं पाता, तो मैं अपना जीवन त्याग दूंगा।"
यदि सेइ महाप्रभुर ना पाइ कृपा-धन ।। किबा राज्य, किबा देह,---सब अकारण ॥
४९॥
यदि मुझे श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा प्राप्त नहीं होती, तो मेरा शरीर तथा मेरा राज्य निश्चित रूप से व्यर्थ हैं।"
एत शुनि' सार्वभौम हुइला चिन्तित ।।राजार अनुराग देखि' हइला विस्मित ॥
५०॥
राजा प्रतापरुद्र के संकल्प को सुनकर सार्वभौम चिन्तित हो उठे। वे राजा के संकल्प को देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये।"
भट्टाचार्य कहे देव ना कर विषाद ।। तोमारे प्रभुर अवश्य हइबे प्रसाद ॥
५१॥
अन्त में सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, हे राजन्! आप चिन्ता न करें। आपके दृढ़ संकल्प के कारण आपको श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा अवश्य प्राप्त होगी।"
तेह—प्रेमाधीन, तोमार प्रेम–गाढ़तर ।।अवश्य करिबेन कृपा तोमार उपर ॥
५२॥
जब भट्टाचार्य ने राजा के दृढ़ संकल्प को जान लिया, तो उन्होंने घोषित किया, केवल शुद्ध प्रेम से भगवान् तक पहुँचा जा सकता है। श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रति आपका प्रेम अत्यन्त गहरा है, अतएव वे आप पर अवश्य ही कृपा करेंगे।"
तथापि कहिये आमि एक उपाय ।।एइ उपाय कर' प्रभु देखिबे ग्राहाय ॥
५३॥
तब सार्वभौम ने सुझाया, एक उपाय है, जिससे आप उनका प्रत्यक्ष दर्शन कर सकते हैं।"
रथ-यात्रा-दिने प्रभु सब भक्त ल ।।रथ-आगे नृत्य करिबेन प्रेमाविष्ट हा ॥
५४॥
रथयात्रा के दिन श्री चैतन्य महाप्रभु बड़े ही भावावेश में अर्चाविग्रह के समक्ष नृत्य करेंगे।"
प्रेमावेशे पुष्पोद्याने करिबेन प्रवेश ।।सेइ-काले एकले तुमि छाड़ि' राज-वेश ।। ५५ ।। उस रथयात्रा के दिन भगवान जगन्नाथ के समक्ष नृत्य करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु गुण्डीचा उद्यान में जायेंगे। उस समय आप अपना राजसी वेश उतारकर अकेले ही वहाँ जायें।"
‘कृष्ण-रास-पञ्चाध्याय' करिते पठन ।।एकले ग्राइ' महाप्रभुर धरिबे चरण ॥
५६॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु गुण्डीचा उद्यान में प्रवेश करें, तभी आप भी वहाँ जायें और श्रीमद्भागवत् के उन पाँच अध्यायों को पढ़े, जिनमें गोपियों के साथ कृष्ण के रासनृत्य का वर्णन है। इस तरह आप महाप्रभु के चरणकमलों को पकड़ सकते हैं।"
बाह्य-ज्ञान नाहि, से-काले कृष्ण-नाम शुनि, ।।आलिङ्गन करिबेन तोमाय 'वैष्णव' ‘जानि' ॥
५७॥
। प्रेमाविष्ट होने के कारण श्री चैतन्य महाप्रभु को बाहरी सुधि-बुधि नहीं रहेगी। उसी समय आप श्रीमद्भागवत के वे अध्याय सुनाना शुरू करें। तब वे आपको शुद्ध वैष्णव जानकर गले लगा लेंगे।"
रामानन्द राय, आजि तोमार प्रेम-गुण ।। प्रभु-आगे कहिते प्रभुर फिरि' गेल मन ॥
५८॥
रामानन्द राय ने उनसे आपके प्रेम का जो विवरण दिया है, उससे महाप्रभु ने पहले ही अपना मन बदल लिया है।"
शुनि' गजपतिर मने सुख उपजिल ।।प्रभुरे मिलिते एइ मन्त्रणा दृढ़ कैल ॥
५९॥
महाराज प्रतापरुद्र ने भट्टाचार्य का परामर्श मान लिया और उनके आदेशों का पालन करने का दृढ़ निश्चय किया। इस तरह उन्हें दिव्य सुख का अनुभव हुआ।"
स्नान-यात्रा कबे हुबे पुछिल भट्टरे ।। भट्ट कहे,—–तिन दिन आछये ग्रात्रारे ।। ६०॥
जब राजा ने भट्टाचार्य से पूछा कि भगवान जगन्नाथ को नहलाने का उत्सव (स्नान-यात्रा) कब होगा, तो भट्टाचार्य ने बतलाया कि इस उत्सव के होने में केवल तीन दिन शेष हैं।"
राजारे प्रबोधिया भट्ट गेला निजालय ।।स्नान-यात्रा-दिने प्रभुर आनन्द हृदय ॥
६१॥
। इस तरह राजा को प्रोत्साहित करके सार्वभौम भट्टाचार्य अपने घर चले गये। भगवान् जगन्नाथ की स्नान-यात्रा के दिन श्री चैतन्य महाप्रभु हृदय से परम प्रसन्न थे।"
स्नान-यात्रा देखि' प्रभुर हैल बड़ सुख ।।ईश्वरेर ‘अनवसरे' पाइल बड़ दुःख ।। ६२ ।। भगवान् जगन्नाथ की स्नान-यात्रा देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्तप्रसन्न हुए। किन्तु जब उत्सव के बाद भगवान जगन्नाथ विश्राम करने चले गये, तब भगवान् चैतन्य अत्यन्त दुःखी हो गये, क्योंकि वे उनका दर्शन नहीं पा सके।"
गोपी-भावे विरहे प्रभु व्याकुल हा ।।आलालनाथे गेला प्रभु सबारे छाड़िया ॥
६३॥
। भगवान् जगन्नाथ से विलग होने के कारण श्री चैतन्य महाप्रभु को वैसी ही व्याकुलता का अनुभव हुआ, जैसी कि कृष्ण के वियोग में गोपियों को हुई थी। ऐसी अवस्था में उन्होंने सबका संग छोड़ दिया और आलालनाथ चले गये।
पाछे प्रभुर निकट आइला भक्त-गण । गौड़ हैते भक्त आइसे, कैल निवेदन ॥
६४॥
भक्तगण महाप्रभु का पीछा करते-करते उनके समक्ष आये और उनसे पुरी लौट चलने के लिए अनुनय-विनय की। उन्होंने निवेदन किया कि बंगाल के भक्त पुरुषोत्तम-क्षेत्र में पधार रहे हैं।"
सार्वभौम नीलाचले आइला प्रभु लजा ।प्रभु आइला,—राजा-ठात्रि कहिलेन गिया ॥
६५ ॥
इस तरह सार्वभौम भट्टाचार्य भगवान् चैतन्य को जगन्नाथ पुरी वापस ले आये। तब राजा प्रतापरुद्र के यहाँ जाकर उन्होंने महाप्रभु के आने की उन्हें जानकारी दी।"
हेन-काले आइला तथा गोपीनाथाचार्य ।।राजाके आशीर्वाद करि' कहे,—शुन भट्टाचार्य ॥
६६॥
। जब सार्वभौम भट्टाचार्य राजा प्रतापरुद्र के साथ थे, उसी समय गोपीनाथ आचार्य वहाँ आये। ब्राह्मण होने के नाते उन्होंने राजा को आशीर्वाद दिया और सार्वभौम भट्टाचार्य से इस प्रकार कहा।"
गौड़ हैते वैष्णव आसितेछेन दुई-शत ।।महाप्रभुर भक्त सब-–महा-भागवत ॥
६७॥
लगभग दो सौ भक्त बंगाल से आ रहे हैं। वे सभी महाभागवत हैं। और श्री चैतन्य महाप्रभु को विशेष रूप से समर्पित हैं।"
नरेन्द्रे आसिया सबे हैल विद्यमान ।।ताँ-सबारे चाहि वासा प्रसाद-समाधान ॥
६८॥
वे सभी नरेन्द्र सरोवर के तट पर आ चुके हैं और वहाँ प्रतीक्षा कर रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि उनके रहने तथा प्रसाद की व्यवस्था हो जाए।"
राजा कहे,—पड़िछाके आमि आज्ञा दिब ।। वासा आदि ने चाहिये,—पड़िछ। सब दिब ॥
६९॥
राजा ने उत्तर दिया, मैं मन्दिर के कर्मचारी को आज्ञा दिये देता हूँ। वह आपकी इच्छानुसार सबके लिए आवास तथा प्रसाद की व्यवस्था कर देगा।"
महाप्रभुर गण व्रत आइल गौड़ हैते । भट्टाचार्य, एके एके देखाह अमाते ॥
७० ॥
हे सार्वभौम भट्टाचार्य, कृपया मुझे बंगाल से आने वाले श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों को एक-एक करके दिखलाइये।"
भट्ट कहे,—अट्टालिकाय कर आरोहण ।।गोपीनाथ चिने सबारे, कराबे दरशन ॥
७१॥
। सार्वभौम भट्टाचार्य ने राजा से अनुरोध किया, कृपया अपने महल की छत पर चढ़ जाएँ। गोपीनाथ आचार्य हर भक्त को जानते हैं। वे आपको उनकी पहचान करवा देंगे।
आमि काहो नाहि चिनि, चिनिते मन हय ।। गोपीनाथाचार्य सबारे करा'बे परिचय ॥
७२॥
वास्तव में मैं उनमें से किसी को नहीं पहचानता, यद्यपि उन्हें जानने की मेरी इच्छा है। चूंकि गोपीनाथ आचार्य उन सबको जानते हैं, अतएव वे उनका नाम आपको बता सकेंगे।
एत बलि' तिन जन अट्टालिकाय चड़िल ।। हेन-काले वैष्णव सब निकटे आइल ॥
७३॥
यह कहकर सार्वभौम भट्टाचार्य राजा तथा गोपीनाथ आचार्य के साथ महल के ऊपर चले गये। उसी समय बंगाल के सारे वैष्णव भक्त महल के निकट आ गये।
दामोदर-स्वरूप, गोविन्द,—दुइ जन ।माला-प्रसाद ला याय, याहाँ वैष्णव-गण ॥
७४॥
स्वरूप दामोदर तथा गोविन्द जगन्नाथजी का प्रसाद तथा फूलों की मालाएँ लेकर उस स्थान पर गये, जहाँ सारे वैष्णव खड़े थे।
प्रथमेते महाप्रभु पाठाइला बँहारे ।।राजा कहे, एइ दुइ कोन्चिनाह आमारे ॥
७५ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने इन दोनों को पहले ही भेज दिया था। राजा ने पूछा, ये दोनों कौन हैं? कृपया मुझे इनकी पहचान करायें।
भट्टाचार्य कहे,—एइ स्वरूप-दामोदर ।। महाप्रभुर हय इँह द्वितीय कलेवर ॥
७६ ॥
श्री सार्वभौम भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, ये स्वरूप दामोदर हैं, जो एक तरह से श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर के द्वितीय विस्तार रूप हैं।
द्वितीय, गोविन्द–भृत्य, इहाँ दोंहा दिया ।। माला पाठाबाछेन प्रभु गौरव करिया ॥
७७॥
। दूसरे व्यक्ति महाप्रभु का निजी सेवक गोविन्द है। महाप्रभु ने बंगाल के भक्तों का सम्मान करने के लिए इन दोनों के हाथों जगन्नाथजी का प्रसाद तथा मालाएँ भेजी हैं।
आदौ माला अद्वैतेरे स्वरूप पराइल । पाछे गोविन्द द्वितीय माला आनि' ताँरे दिल ॥
७८ ॥
। पहले स्वरूप दामोदर ने आगे बढ़कर अद्वैत आचार्य को माला पहनायी। इसके बाद गोविन्द ने आकर दूसरी माला अद्वैत आचार्य को पहनायी।
तबे गोविन्द दण्डवत्केल आचार्येरे ।ताँरै नाहि चिने आचार्य, पुछिल दामोदरे ॥
७९ ॥
। जब गोविन्द ने भूमि पर गिरकर अद्वैत आचार्य को दण्डवत् प्रणाम किया, तो अद्वैत आचार्य ने स्वरूप दामोदर से उसकी पहचान के बारे में पूछताछ की, क्योंकि वे तब गोविंद को नहीं जानते थे।
दामोदर कहे,—इहार 'गोविन्द' नाम ।।ईश्वर-पुरीर सेवक अति गुणवान् ॥
८०॥
स्वरूप दामोदर ने उन्हें बतलाया, “यह गोविन्द ईश्वर पुरी का सेवक था। वह अत्यन्त योग्य है।
प्रभुर सेवा करिते पुरी आज्ञा दिल । अतएव प्रभु इँहाके निकटे राखिल ॥
८१॥
ईश्वर पुरी ने गोविन्द को आज्ञा दी कि वह श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा करे। अतएव महाप्रभु उसे अपने पास रखते हैं।
राजा कहे,—याँरै माला दिल दुइ-जन ।।आश्चर्य तेज, बड़े महान्त,—कहे कोन्जन? ॥
८२॥
। राजा ने पूछा, स्वरूप दामोदर तथा गोविन्द ने दोनों मालाएँ किसे पहनाईं? उनके शरीर को तेज इतना अधिक है कि वे अवश्य ही महान् । भक्त होंगे। कृपया मुझे बतलायें कि वे कौन हैं? आचार्य कहे,—इँहार नाम अद्वैत आचार्य ।।महाप्रभुर मान्य-पात्र, सर्व-शिरोधार्य ॥
८३॥
गोपीनाथ आचार्य ने उत्तर दिया, इनका नाम अद्वैत आचार्य है। इनका आदर श्री चैतन्य महाप्रभु भी करते हैं, अतएव वे सर्वश्रेष्ठ भक्त हैं।
श्रीवास-पण्डित ईंह, पण्डित-वक्रेश्वर ।।विद्यानिधि-आचार्य, इँह पण्डित-गदाधर ॥
८४॥
। ये श्रीवास पण्डित, वक्रेश्वर पण्डित, विद्यानिधि आचार्य तथा गदाधर पण्डित हैं।
आचार्यरत्न ईंह, पण्डित-पुरन्दर ।गङ्गादास पण्डित ईंह, पण्डित-शङ्कर ॥
८५ ॥
ये रहे आचार्यरत्न, पुरन्दर पण्डित, गंगादास पंडित तथा शंकर पंडित।
एइ मुरारि गुप्त, इँह पण्डित नारायण ।हरिदास ठाकुर इँह भुवन-पावन ॥
८६॥
ये हैं मुरारि गुप्त, पण्डित नारायण तथा सारे ब्रह्माण्ड के उद्धारक हरिदास ठाकुर।।
एइ हरि-भट्ट, एइ श्री-नृसिंहानन्द ।। एइ वासुदेव दत्त, एइ शिवानन्द ॥
८७॥
ये रहे हरि भट्ट और वे हैं नृसिंहानन्द। ये वासुदेव दत्त तथा शिवानन्द सेन हैं।
गोविन्द, माधव घोष, एइ वासु-घोष ।। तिन भाइर कीर्तने प्रभु पायेन सन्तोष ॥
८८॥
और ये हैं गोविन्द घोष, माधव घोष तथा वासुदेव घोष। ये तीनों भाई हैं और इनका संकीर्तन महाप्रभु को बहुत अच्छा लगता है।
राघव पण्डित, इँह आचार्य नन्दन । श्रीमान्पण्डित एइ, श्रीकान्त, नारायण ॥
८९॥
। ये हैं राघव पण्डित, ये रहे आचार्यनन्दन, वे श्रीमान पण्डित हैं तथा ये हैं श्रीकान्त तथा नारायण।
शुक्लाम्बर देख, एइ श्रीधर, विजये ।।वल्लभ-सेन, एइ पुरुषोत्तम, सञ्जय ॥
९० ॥
गोपीनाथ आचार्य भक्तों की ओर संकेत करते रहे, ये शुक्लाम्बर हैं। वे रहे श्रीधर। ये विजय हैं और ये हैं वल्लभ सेन। ये रहे पुरुषोत्तम और वे हैं संजय।
कुलीन-ग्राम-वासी एड सत्यराज-खान ।। रामानन्द-आदि सबे देख विद्यमान ॥
९१॥
। और ये सत्यराज तथा रामानन्द जैसे सभी कुलीन ग्राम के निवासी हैं। वे सभी यहाँ उपस्थित हैं। कृपा करके देखें।
मुकुन्द-दास, नरहरि, श्री-रघुनन्दन ।।खण्ड-वासी चिरञ्जीव, आर सुलोचन ॥
९२॥
ये रहे मुकुन्द दास, नरहरि, श्री रघुनन्दन, चिरंजीव तथा सुलोचनये सभी खण्ड के निवासी हैं।
कतेक कहिब, एइ देख ग्रत जन ।।चैतन्येर गण, सब––चैतन्य-जीवन ॥
९३ ॥
मैं आपको कितने नाम गिनाऊँ? आप यहाँ जितने सारे भक्त देखरहे हैं, वे सब श्री चैतन्य महाप्रभु के संगी हैं, और महाप्रभु ही उनके प्राण राजा कहे देखि' मोर हैल चमत्कार ।।वैष्णवेर ऐछे तेज देखि नाहि आर ॥
९४॥
राजा ने कहा, इन सब भक्तों को देखकर मैं अत्यधिक चकित हूँ, क्योंकि इसके पूर्व मैंने किसी में इतना तेज कभी नहीं देखा।
कोटि-सूर्य-सम सब–उज्वल-वरण ।कभु नाहि शुनि एइ मधुर कीर्तन ॥
९५॥
। सचमुच, उनका तेज करोड़ सूर्यों के तेज के समान है। न ही मैंने इसके पूर्व कभी भगवन्नाम का इतना मधुर कीर्तन होते सुना है।
ऐछे प्रेम, ऐछे नृत्य, ऐछे हरि-ध्वनि ।।काहाँ नाहि देखि, ऐछे काहाँ नाहि शुनि ॥
९६॥
मैंने न तो कभी ऐसा प्रेमभाव देखा है, ने भगवान् के नाम का इस तरह कीर्तन होते सुना है, न ही संकीर्तन के समय इस प्रकार का नृत्य होते देखा है।
भट्टाचार्य कहे एइ मधुर वचन ।। चैतन्येर सृष्टि-—एइ प्रेम-सङ्कीर्तन ॥
९७॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, यह मधुर दिव्य ध्वनि महाप्रभु की विशेष सृष्टि है, जो प्रेम-संकीर्तन कहलाती है।
अवतरि' चैतन्य कैल धर्म-प्रचारण ।।कलि-काले धर्म-कृष्ण-नाम-सङ्कीर्तन ॥
९८॥
इस कलियुग में श्री चैतन्य महाप्रभु कृष्णभावनामृत धर्म का प्रचार करने के लिए अवतरित हुए हैं। अतएव भगवान् कृष्ण के पवित्र नामों का कीर्तन वही इस युग का धर्म है।
सङ्कीर्तन-यज्ञे ताँरे करे आराधन ।।सेइ त' सुमेधा, आर---कलि-हत-जन ॥
९९॥
जो भी व्यक्ति संकीर्तन द्वारा श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा करता है, उसे अत्यन्त बुद्धिमान समझा जाना चाहिए। जो ऐसा नहीं करता, उसे इस युग का शिकार तथा बुद्धि से रहित समझा जाना चाहिए।
कृष्ण-वर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्र-पार्षदम् ।।यज्ञैः सङ्कीर्तन-प्रायैर्यजन्ति हि सु-मेधसः ॥
१०० ।। इस कलियुग में बुद्धिमान लोग भगवान् के उन अवतार की, जो निरन्तर कृष्ण-नाम का गायन करते हैं, पूजा करने के लिए संकीर्तन करते हैं। यद्यपि उनका रंग साँवला नहीं है, तो भी वे साक्षात् कृष्ण हैं। वे अपने संगियों, सेवकों, अस्त्रों तथा पार्षदों से युक्त रहते हैं।
राजा कहे,—शास्त्र-प्रमाणे चैतन्य हुन कृष्ण ।तबे केने पण्डित सब ताँहाते वितृष्ण? ॥
१०१॥
। राजा ने कहा, शास्त्रों के प्रमाण के अनुसार यह निष्कर्ष निकलता है कि श्री चैतन्य महाप्रभु ही स्वयं भगवान् कृष्ण हैं। तो फिर पण्डितजन कभी-कभी उनके प्रति उदासीन क्यों रहते हैं? भट्ट कहे, ताँर कृपा-लेश हय ग्राँरै ।।सेइ से ताँहारे 'कृष्ण' करि' लइते पारे ॥
१०२॥
। भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, जिसे श्री चैतन्य महाप्रभु की रंचमात्र भी कृपा प्राप्त हुई है, वही व्यक्ति समझ पाता है कि वे कृष्ण हैं, अन्य कोई नहीं।
ताँर कृपा नहे झारे, पण्डित नहे केने ।देखिले शुनिलेह ताँरे 'ईश्वर' ना माने ॥
१०३॥
जब तक किसी व्यक्ति पर श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा नहीं होती, तब तक कोई कितना ही बड़ा पण्डित क्यों न हो और वह कितना ही क्यों न देखे या सुने, वह महाप्रभु को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में नहीं स्वीकार कर सकता।
अथापि ते देव पदाम्बुज-द्वय प्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि । जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नो ।न चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन् ॥
१०४॥
। ( ब्रह्माजी ने कहा ) हे प्रभु, यदि किसी को आपके चरणकमलों की रंचमात्र भी कृपा प्राप्त हो जाती है, तो वह आपकी महानता को समझ सकता है। किन्तु जो लोग पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझने के लिए तर्कवितर्क करते हैं, वे अनेक वर्षों तक वेदों का अध्ययन करते रहने पर भी आपको नहीं जान पाते। ।
राजा कहे,—सबे जगन्नाथ ना देखिया ।।चैतन्येर वासा-गृहे चलिला धाआ ॥
१०५ ॥
राजा ने कहा, सारे भक्त भगवान जगन्नाथ के मन्दिर जाने के बदले श्री चैतन्य महाप्रभु के निवासस्थान की ओर दौड़े जा रहे हैं।
भट्ट कहे,—एइ त' स्वाभाविक प्रेम-रीत ।।महाप्रभु मिलिबारे उत्कण्ठित चित ॥
१०६॥
। सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, यही रागानुग प्रेम है। सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने के लिए अत्यन्त उत्सुक हैं।
आगे ताँरे मिलि' सबे ताँरै सङ्गे लञा ।ताँर सङ्गे जगन्नाथ देखिबेन गिया ॥
१०७॥
सारे भक्त पहले श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलेंगे और तब उन्हें साथ लेकर वे सब भगवान जगन्नाथ का दर्शन करने मन्दिर में जायेंगे।
राजा कहे,—भवानन्देर पुत्र वाणीनाथ ।।प्रसाद लञा सङ्गे चले पाँच-सात ॥
१०८॥
राजा ने कहा, भवानन्द राय का पुत्र वाणीनाथ पाँच-सात अन्य लोगों के साथ जगन्नाथजी का प्रसाद लाने गये हैं।
महाप्रभुर आलये करिल गमन ।।एत महा-प्रसाद चाहि' कह कि कारण ॥
१०९॥
। वस्तुतः वाणीनाथ पहले ही श्री चैतन्य महाप्रभु के निवासस्थान जा चुका है और पर्याप्त महाप्रसाद ले गया है। कृपा करके मुझे इसका कारण बतलायें।
भट्ट कहे,—-भक्त-गण आइल जानि ।।प्रभुर इङ्गिते प्रसाद ग्राय ताँरा लञा ॥
११०॥
सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, यह समझकर कि सारे भक्त आ चुके हैं, महाप्रभु ने संकेत दिया और इतनी मात्रा में महाप्रसाद ले आये हैं।
राजा कहे,—उपवास, क्षौर-तीर्थेर विधान।ताहा ना करिया केने खाइब अन्न-पान ॥
१११॥
तब राजा ने भट्टाचार्य से पूछा, उन भक्तों ने तीर्थस्थान की मुलाकात लेने के नियमों का-यथा उपवास रखने, बाल बनवाने इत्यादि का पालन क्यों नहीं किया? उन्होंने पहले प्रसाद क्यों ग्रहण किया? भट्ट कहे,—तुमि येइ कह, सेइ विधि-धर्म ।एइ राग-मार्गे आछे सूक्ष्म-धर्म-मर्म ॥
११२॥
भट्टाचार्य ने राजा से कहा, आपने जो कुछ कहा है, वह तीर्थस्थानों की मुलाकात लेने के नियमानुसार ठीक है, किन्तु एक दूसरा भी मार्ग है, जो स्वतःस्फूर्त रागानुग प्रेम का मार्ग है। इसके अनुसार धार्मिक नियमों के पालन में सूक्ष्म बारीकियाँ सन्निहित हैं।
ईश्वरेर परोक्ष आज्ञा—क्षौर, उपोषण ।। प्रभुर साक्षाताज्ञा–प्रसाद-भोजन ॥
११३॥
सिर मुंड़ाने तथा उपवास रखने के शास्त्रीय आदेश पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की परोक्ष आज्ञा हैं, किन्तु जब महाप्रभु प्रसाद ग्रहण करने की प्रत्यक्ष आज्ञा देते हैं, तो स्वाभाविक है कि भक्तगण उसे ही प्रथम कर्तव्य मानकर प्रसाद ग्रहण करते हैं।
ताहाँ उपवास, याहाँ नाहि महा-प्रसाद ।। प्रभु-आज्ञा-प्रसाद-त्यागे हय अपराध ॥
११४॥
जहाँ महाप्रसाद उपलब्ध न हो, वहीं उपवास करना चाहिए, किन्तु जहाँ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् प्रत्यक्ष रूप से प्रसाद ग्रहण करने का आदेश दें, वहाँ ऐसे सुअवसर की उपेक्षा करना अपराध है।
विशेषे श्री-हस्ते प्रभु करे परिवेशन ।। एत लाभ छाड़ि' कोन्करे उपोषण ॥
११५॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु अपने दिव्य हाथ से प्रसाद बाँट रहे हों, तो भला कौन उस अवसर को हाथ से जाने देगा और उपवास के विधान को स्वीकार करेगा? पूर्वे प्रभु मोरे प्रसाद-अन्न आनि' दिल ।। प्राते शय्याय वसि' आमि से अन्न खाइल ।। ११६॥
इससे पहले एक दिन प्रात:काल महाप्रभु ने मुझे महाप्रसाद को अन्न दिया था, जिसे मैंने बिना हाथ-मुँह धोये ही बिस्तर पर बैठे-बैठे खाया था।
याँरे कृपा करि' करेन हृदये प्रेरण। कृष्णाश्रय हय, छाड़े वेद-लोक-धर्म ॥
११७॥
महाप्रभु जिस मनुष्य को भीतर से प्रेरित करके उस पर अपनी कृपा दर्शाते हैं, वह केवल भगवान् कृष्ण की शरण ग्रहण करता है और समस्त वैदिक तथा सामाजिक प्रथाओं को त्याग देता है।
यदा ग्रमनुगृह्णाति भगवानात्म-भावितः ।।स जहाति मतिं लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥
११८॥
जब कोई व्यक्ति अपने हृदय में आसीन भगवान् के द्वारा प्रेरित होता है, तब वह न तो सामाजिक रीतियों की न ही वैदिक विधानों की परवाह करता है।
तबे राजा अट्टालिका हैते तलेते आइला ।। काशी-मिश्र, पड़िछा-पात्र, मुँहे आनाइला ॥
११९ इसके बाद राजा प्रतापरुद्र अपने महल की अटारी से नीचे चले आये और काशी मिश्र को तथा मन्दिर की देख-रेख करने वाले को बुला भेजा।
प्रतापरुद्र आज्ञा दिल सेइ दुइ जने । प्रभु-स्थाने आसियाछेन ग्रत प्रभुर गणे ॥
१२०॥
बारे स्वच्छन्द वासा, स्वच्छन्द प्रसाद ।। स्वच्छन्द दर्शन कराइह, नहे येन बाध ॥
१२१॥
फिर महाराज प्रतापरुद्र ने काशी मिश्र तथा मन्दिर की देख-रेख करने वाले से कहा, श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों तथा संगियों के लिए आवास, प्रसाद तथा मन्दिर में दर्शन करने की सुविधा की समुचित व्यवस्था की जाए, जिससे उन्हें कोई कठिनाई न हो।
प्रभुर आज्ञा पालिह मुँहे सावधान हन्ना ।। आज्ञा नहे, तबु करिह, इङ्गित बुझिया ॥
१२२॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु की आज्ञाओं का सावधानी से पालन होना चाहिए। यद्यपि महाप्रभु सीधे कोई आदेश नहीं देंगे, फिर भी उनके संकेतों को समझकर उनकी इच्छाओं का पालन किया जाए।
एत बलि' विदाय दिल सेइ दुइ-जने । सार्वभौम देखिते आइल वैष्णव-मिलने ॥
१२३॥
यह कहकर राजा ने उन दोनों को जाने दिया। सार्वभौम भट्टाचार्य भी सारे वैष्णवों के समूह से मिलने गये।
गोपीनाथाचार्य भट्टाचार्य सार्वभौम । दूरे रहि' देखे प्रभुर वैष्णव-मिलन ॥
१२४॥
गोपीनाथ आचार्य तथा सार्वभौम भट्टाचार्य दूर से श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ समस्त वैष्णवों का मिलन देखते रहे।
सिंह-द्वार डाहिने छाड़ि' सब वैष्णव-गण । काशी-मिश्र-गृह-पथे करिला गमन ॥
१२५ ॥
। मन्दिर के मुख्य द्वार की दाईं ओर से सारे वैष्णव काशी मिश्र के घर की ओर जाने लगे।
हेन-काले महाप्रभु निज-गण-सङ्गे।। वैष्णवे मिलिला आसि' पथे बहु-रङ्गे ॥
१२६॥
तभी मार्ग पर श्री चैतन्य महाप्रभु अपने निजी संगियों समेत सारे वैष्णवों से बड़ी ही प्रसन्नतापूर्वक मिले।
अद्वैत करिल प्रभुर चरण वन्दन ।आचार्येरे कैल प्रभु प्रेम-आलिङ्गन ॥
१२७।।। सर्वप्रथम अद्वैत आचार्य ने महाप्रभु के चरणकमलों की वन्दना की और महाप्रभु ने प्रेमवश तुरन्त उनका आलिंगन कर लिया।
प्रेमानन्दे हैला देंहे परम अस्थिर ।समय देखिया प्रभु हैला किछु धीर ॥
१२८॥
प्रेमवश श्री चैतन्य महाप्रभु तथा अद्वैत आचार्य विचलित हो उठे। किन्तु काल तथा परिस्थिति देखकर महाप्रभु ने धीरज धारण की।
श्रीवासादि करिल प्रभुर चरण वन्दन ।।प्रत्येके करिल प्रभु प्रेम-आलिङ्गन ॥
१२९॥
इसके बाद श्रीवास ठाकुर तथा सभी भक्तों ने महाप्रभु के चरणकमलों की वन्दना की और महाप्रभु ने बारी-बारी से हर एक का अत्यन्त प्रेमभाव से आलिंगन किया।
एके एके सर्व-भक्ते कैल सम्भाषण ।। सबा लञा अभ्यन्तरे करिला गमन ॥
१३०॥
महाप्रभु ने एक-एक करके सारे भक्तों को सम्बोधित किया और वे उन सबको अपने साथ घर के भीतर ले गये।
मिश्रर आवास सेइ हय अल्प स्थान । असङ्ख्य वैष्णव ताहाँ हैल परिमाण ॥
१३१॥
चूंकि काशी मिश्र के घर में पर्याप्त स्थान न था, इसलिए वहाँ एकत्र भक्तों की भीड़ लग गई।
आपन-निकटे प्रभु सबा वसाइला । आपनि श्री-हस्ते सबारे माल्य-गन्ध दिला ॥
१३२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने सारे भक्तों को अपने पास बैठाया और अपने हाथ से उन्हें मालाएँ तथा चन्दन-लेप दिया।
भट्टाचार्य, आचार्य तबे महाप्रभुर स्थाने ।। प्रथा-स्रोग्य मिलिला सबाकार सने ॥
१३३॥
इसके बाद गोपीनाथ आचार्य तथा सार्वभौम भट्टाचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु के निवासस्थान पर सभी वैष्णवों से समुचित ढंग से मिले।
अद्वैतेरे कहेन प्रभु मधुर वचने ।। आजि आमि पूर्ण हइलाङ तोमार आगमने ॥
१३४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने मीठे वचनों से अद्वैत आचार्य प्रभु को सम्बोधित किया, “हे प्रिय महाशय, आपके आने से आज मैं पूर्ण हो गया हूँ।
अद्वैत कहे, ईश्वरेर एइ स्वभाव हय । यद्यपि आपने पूर्ण, सर्वेश्वर्य-मय ॥
१३५॥
तथापि भक्त-सङ्गे हय सुखोल्लास ।।भक्त-सङ्गे करे नित्य विविध विलास ॥
१३६ ॥
अद्वैत आचार्य प्रभु ने उत्तर दिया, यह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का स्वाभाविक गुण है। यद्यपि वे स्वयं सम्पूर्ण हैं और समस्त ऐश्वर्यों से युक्त हैं, किन्तु वे अपने भक्तों के संग में अनेक प्रकार की नित्य लीलाएँ करके दिव्य आनन्द का आस्वादन करते हैं।
वासुदेव देखि' प्रभु आनन्दित हा ।।ताँरै किछु कहे ताँर अङ्गे हस्त दिया ॥
१३७॥
महाप्रभु ने ज्योंही मुकुन्द दत्त के बड़े भाई वासुदेव दत्त को देखा, त्योंही वे तुरन्त अत्यन्त प्रसन्न हो उठे और उनके शरीर पर अपना हाथ रखकर बोलने लगे।
यद्यपि मुकुन्द–आमा-सङ्गे शिशु हैते ।। ताँहा हैते अधिक सुख तोमारे देखते ॥
१३८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, यद्यपि मुकुन्द मेरा बचपन का मित्र है, किन्तु उसकी तुलना में आपको देखकर मुझे कहीं अधिक प्रसन्नता हो रही है।
वासु कहे,—मुकुन्द आदौ पाइल तोमार सङ्ग। तोमार चरण पाइल सेइ पुनर्जन्म ॥
१३९॥
। वासुदेव ने उत्तर दिया, मुकुन्द को प्रारम्भ में आपका साथ मिला। अतएव उसने आपके चरणकमलों की शरण ग्रहण कर ली है। यही उसका दिव्य पुनर्जन्म है।
छोट हा मुकुन्द एबे हैल आमार ज्येष्ठ । तोमार कृपा-पात्र ताते सर्व-गुणे श्रेष्ठ ॥
१४०॥
। इस तरह वासुदेव दत्त ने अपने छोटे भाई मुकुन्द से अपनी कनिष्ठता स्वीकार कर ली। उन्होंने कहा, यद्यपि मुकुन्द मुझ से छोटा है, किन्तु उसे आपकी कृपा पहले प्राप्त हुई। अत: वह मुझसे आध्यात्मिक दृष्टि से वरिष्ठ हो गया। इसके अतिरिक्त, आप उस पर बहुत कृपालु हैं। इस तरह वह सारे सद्गुणों में मुझसे वरिष्ठ है।
पुनः प्रभु कहे-आमि तोमार निमित्ते ।।दुइ पुस्तक आनियाछि ‘दक्षिण' हइते ॥
१४१॥
। महाप्रभु ने कहा, “मैं केवल आपके लिए दक्षिण भारत से दो पुस्तकें लाया हूँ।
स्वरूपेर ठाङि आछे, लह ता लिखिया । वासुदेव आनन्दित पुस्तक पाञा ॥
१४२॥
वे पुस्तकें स्वरूप दामोदर के पास रखी हैं और आप उनकी नकल करवा सकते हैं। यह सुनकर वासुदेव अत्यन्त प्रसन्न हुए।
प्रत्येक वैष्णव सबे लिखिया लइल ।।क्रमे क्रमे दुइ ग्रन्थ सर्वत्र व्यापिल ॥
१४३॥
प्रत्येक वैष्णव ने इन दोनों पुस्तकों की प्रतिलिपि कर ली। धीरे-धीरे ये दोनों पुस्तकें ( ब्रह्म-संहिता तथा श्रीकृष्णकर्णामृत ) सारे भारत में व्याप्त हो गईं।
श्रीवासाद्ये कहे प्रभु करि' महा-प्रीत ।तोमार चारि-भाइर आमि हइनु विक्रीत ॥
१४४॥
महाप्रभु ने श्रीवास तथा उनके भाइयों को अत्यन्त प्रेम तथा स्नेह के साथ सम्बोधित किया, मैं तो इतना कृतज्ञ हूँ कि तुम चारों भाइयों ने मुझे खरीद लिया है।
श्रीवास कहेन, केने कह विपरीत । कृपा-मूल्ये चारि भाई हइ तोमार क्रीत ॥
१४५॥
तब श्रीवास ने महाप्रभु से कहा, आप उल्टा क्यों कह रहे हैं? वास्तव में हमें चारों भाई आपकी कृपा द्वारा खरीदे जा चुके हैं।
शङ्करे देखिया प्रभु कहे दामोदरे । सगौरव-प्रीति आमार तोमार उपरे ॥
१४६॥
शंकर को देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने दामोदर से कहा, तुम पर मेरा स्नेह गौरव से युक्त है।
शुद्ध केवल-प्रेम शङ्कर-उपरे ।अतएव तोमार सङ्गे राखह शङ्करे ॥
१४७॥
इसलिए तुम अपने छोटे भाई शंकर को अपने साथ रखो, क्योंकि वह मुझसे शुद्ध प्रेम से जुड़ा हुआ है।
दामोदर कहे,- शङ्कर छोट आमा हैते ।।एबे आमार बड़ भाइ तोमार कृपाते ॥
१४८॥
। दामोदर पंडित ने उत्तर दिया, शंकर मेरा छोटा भाई तो है, किन्तु आज से वह मेरा बड़ा भाई बन गया, क्योंकि उस पर आपकी विशेष कृपा है।"
शिवानन्दे कहे प्रभु, तोमार आमाते ।।गाढ़ अनुराग हय, जानि आगे हैते ॥
१४९॥
फिर शिवानन्द सेन की ओर मुड़ते हुए महाप्रभु ने कहा, मैं जानता हूँ कि प्रारम्भ से ही मेरे प्रति तुम्हारा अतीव अनुराग रहा है।"
शुनि' शिवानन्द-सेन प्रेमाविष्ट हा ।। दण्डवत् हा पदे श्लोक पड़िया ॥
१५०।। यह सुनते ही शिवानन्द सेन भावविभोर हो उठे और महाप्रभु को प्रणाम करके भूमि पर गिर पड़े। फिर उन्होंने निम्नलिखित श्लोक सुनाना शुरू किया।"
निमजतोऽनन्त भवार्णवान्तश् ।चिराय मे कुलमिवासि लब्धः ।। त्वयापि लब्धं भगवन्निदानीम् ।अनुत्तमं पात्रमिदं दयायाः ॥
१५१॥
हे प्रभु! हे असीम! यद्यपि मैं अज्ञान के सागर में डूबा हुआ था, किन्तु अब दीर्घकाल के बाद मैंने आपको उसी प्रकार प्राप्त किये हैं, जिस प्रकार किसी को समुद्र का किनारा मिल जाए। हे प्रभु, मुझे प्राप्त करके आपने ऐसा उपयुक्त व्यक्ति प्राप्त किया है, जिस पर आप अपनी अहैतुकी कृपा प्रदान कर सकते हैं।"
प्रथमे मुरारि-गुप्त प्रभुरे ना मिलिया ।। बाहिरेते पड़ि' आछे दण्डवत् हा ॥
१५२॥
। मुरारि गुप्त पहले महाप्रभु से नहीं मिले, किन्तु दरवाजे के बाहर से ही उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया।"
मुरारि ना देखियो प्रभु करे अन्वेषण ।।मुरारि लइते धाा आइला बहु-जन ॥
१५३॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने भक्तों के बीच मुरारि गुप्त को नहीं देखा, तो उन्होंने उनके विषय में पूछताछ की। फलतः अनेक लोग उन्हें महाप्रभु के पास लाने के लिए दौड़े-दौड़े गये।"
तृण दुइ-गुच्छ मुरारि दशने धरिया ।।महाप्रभु आगे गेला दैन्याधीन हा ॥
१५४॥
इस तरह मुरारि गुप्त अपने दाँतो में तिनके के दो गुच्छे दबाकर अत्यन्त दीन-हीन भाव से महाप्रभु के समक्ष गये।"
मुरारि देखिया प्रभु आइला मिलिते ।पाछे भागे मुरारि, लागिला कहिते ॥
१५५॥
यह देखकर कि मुरारि उनसे मिलने आ रहे हैं, श्री चैतन्य महाप्रभु उनके पास गये, किन्तु मुरारि दूर भागने लगे और इस प्रकार कहने लगे।"
मोरे ना छुडिह, प्रभु, मुजि त' पामर ।।तोमार स्पर्श-योग्य नहे पाप कलेवर ॥
१५६॥
हे प्रभु! कृपया आप मुझे न छुएँ। मैं अत्यन्त नीच हूँ और आपके छूने योग्य नहीं हैं, क्योंकि मेरा शरीर पापमय है। ।"
प्रभु कहे,—मुरारि, कर दैन्य संवरण ।तोमार दैन्य देखि' मोर विदीर्ण हय मन ॥
१५७॥
महाप्रभु ने कहा, हे मुरारि, कृपया तुम अपनी अनावश्यक दीनता बन्द करो। तुम्हारी दीनता देखकर मेरा मन विचलित हो रहा है।"
एत बलि' प्रभु ताँरै कैल आलिङ्गन ।निकटे वसाझा करे अङ्ग सम्मार्जन ॥
१५८॥
यह कहकर महाप्रभु ने मुरारि का आलिंगन किया और उन्हें अपने पास में बैठाया। फिर महाप्रभु अपने हाथों से उनका शरीर साफ करने लगे।"
आचार्यरत्न, विद्यानिधि, पण्डित गदाधर ।। गङ्गादास, हरि-भट्ट, आचार्य पुरन्दर ॥
१५९॥
प्रत्येके सबार प्रभु करि' गुण गान ।।पुनः पुनः आलिङ्गिया करिल सम्मान ॥
१६०॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने आचार्यरत्न, विद्यानिधि, पंडित गदाधर, गंगादास, हरिभट्ट तथा आचार्य पुरन्दर इत्यादि सभी भक्तों का बारम्बार आलिंगन किया। उनके सद्गुणों का बखान किया और बारम्बार उनका सम्मान किया।"
सबारे सम्मानि' प्रभुर हद्दल उल्लास ।।हरिदासे ना देखिया कहे,—काहाँ हरिदास ॥
१६१॥
इस तरह प्रत्येक भक्त का सम्मान करके श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रफुल्लित हुए। किन्तु हरिदास ठाकुर को न देखकर उन्होंने पूछा, हरिदास कहाँ हैं?" दूर हैते हरिदास गोसाळे देखियो ।राजपथ-प्रान्ते पड़ि' आछे दण्डवत् ह ॥
१६२॥
तभी श्री चैतन्य महाप्रभु ने देखा कि हरिदास ठाकुर दूर से, रास्ते पर गिरकर, उन्हें प्रणाम कर रहे हैं।"
मिलन-स्थाने आसि' प्रभुरे ना मिलिला ।।राजपथ-प्रान्ते दूरे पड़िया रहिला ॥
१६३॥
हरिदास ठाकुर महाप्रभु के मिलन-स्थल पर नहीं आये, अपितु वे दूर ही सामान्य रास्ते पर दण्डवत् पड़े रहे।"
भक्त सब धाजी आइल हरिदासे निते ।प्रभु तोमाय मिलिते चाहे, चलह त्वरिते ॥
१६४॥
तब सारे भक्त हरिदास ठाकुर के पास जाकर बोले, “महाप्रभु आपसे मिलना चाहते हैं। कृपया तुरन्त आइये।"
हरिदास कहे,–मुबि नीच-जाति छार ।।मन्दिर-निकटे ग्राइते मोर नाहि आधिकार ॥
१६५ ॥
हरिदास ठाकुर ने उत्तर दिया, मैं मन्दिर के पास नहीं जा सकता, क्योंकि मैं नीच जाति का अधम व्यक्ति हूँ। मुझे वहाँ जाने का कोई अधिकार नहीं है।"
निभृते टोटा-मध्ये स्थान यदि पाङ।। ताहाँ पड़ि' रहो, एकले काल गोङ॥
१६६॥
तब हरिदास ठाकुर ने अपनी इच्छा व्यक्त की, यदि मुझे मन्दिर के निकट कोई एकान्त स्थान मिल जाता, तो मैं वहाँ अकेले रहकर अपना समय बिताता।"
जगन्नाथ-सेवकेर मोर स्पर्श नाहि हय ।।ताहाँ पड़ि' रहों,—मोर एइ वाञ्छा हय ॥
१६७॥
मैं नहीं चाहता कि भगवान जगन्नाथ के सेवक मेरा स्पर्श करें। मैं वहाँ बगीचे में अकेला रहूँगा। यही मेरी इच्छा है।"
एइ कथा लोक गिया प्रभुरे कहिल ।।शुनिया प्रभुर मने बड़ सुख हइल ॥
१६८॥
जब लोगों ने श्री चैतन्य महाप्रभु को यह सन्देश दिया, तो वे यह सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए।"
हेन-काले काशी-मिश्र, पड़िछा,--दुइ जन ।।आसिया करिल प्रभुर चरण वन्दन ॥
१६९॥
उसी समय काशी मिश्र मन्दिर की देख-रेख करने वाले के साथ आये और उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर अपना सादर नमस्कार किया।"
सर्व वैष्णव देखि सुख बड़ पाइला । यथा-स्रोग्य सबा-सने आनन्दे मिलिला ॥
१७० ॥
सारे वैष्णवों को एकसाथ देखकर काशी मिश्र तथा अध्यक्ष दोनों अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे उन सबसे समुचित रीति से अति प्रसन्नतापूर्वक मिले।"
प्रभु-पदे दुई जने कैल निवेदने ।। आज्ञा देह',—वैष्णवेर करि समाधाने ॥
१७१॥
दोनों ने श्री चैतन्य महाप्रभु से निवेदन किया, “कृपया हमें आदेश दें, जिससे हम सारे वैष्णवों के रहने की उचित व्यवस्था कर सकें।"
सबार करियाछि वासा-गृह-स्थान ।। महा-प्रसाद सबकारे करि समाधान ॥
१७२॥
। सारे वैष्णवों के रहने की व्यवस्था हो चुकी है। अब हम उन सबों को महा-प्रसाद वितरित करेंगे।"
प्रभु कहे,—गोपीनाथ, ग्राह' वैष्णव लजी ।ग्राहाँ ग्राहाँ कहे वासा, ताहाँ देह' लञा ॥
१७३॥
तुरन्त ही श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोपीनाथ आचार्य से कहा, आप वैष्णवों के साथ जाएँ और काशी मिश्र तथा मन्दिर की देख-रेख करने वाले सज्जन जो भी निवासस्थान दें, वहाँ उन सबको रखने का प्रबन्ध करें।"
महा-प्रसादान्न देह वाणीनाथ-स्थाने ।।सर्व-वैष्णवेर इँहो करिबे समाधाने ॥
१७४॥
तब महाप्रभु ने काशी मिश्र तथा मन्दिर के अध्यक्ष से कहा, जहाँ तक जगन्नाथजी के महाप्रसाद की बात है, उसका भार वाणीनाथ राय को दे दिया जाए, क्योंकि वे सारे वैष्णवों की देखभाल कर सकते हैं और उन्हें महाप्रसाद वितरित कर सकते हैं।"
आमार निकटे एइ पुष्पेर उद्याने । एक-खानि घर आछे परम-निर्जने ॥
१७५॥
फिर श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मेरे स्थान के पास इस फुलवारी में एक कमरा है, जो अत्यन्त एकान्त में है।"
सेइ घर आमाके देह'–आछे प्रयोजन ।।निभृते वसिया ताहाँ करिब स्मरण ।। १७६ ॥
वह कमरा मुझे दे दें, क्योंकि मुझे उसकी आवश्यकता है। मैं उस एकान्त स्थान में बैठकर भगवान् के चरणकमलों का स्मरण करूंगा।"
मिश्र कहे,—सब तोमार, चाह कि कारणे?।।आपन-इच्छाये लह, ग्रेइ तोमार मने ॥
१७७॥
तब काशी मिश्र ने श्री चैतन्य महाप्रभु से कहा, हर वस्तु आपकी है। फिर माँगने से क्या लाभ? आप अपनी इच्छानुसार जो चाहें ले सकते है।
आमि-दुइ हइ तोमार दास आज्ञाकारी ।।ग्रे चाह, सेइ आज्ञा देह' कृपा करि' ॥
१७८ ॥
हे प्रभु, हम दोनों दास आपकी आज्ञाओं को पूरा करने के लिए हैं। कृपा करके आप जो भी चाहें हमसे करने को कहें।"
एत कहि' दुइ जने विदाय लइल ।।गोपीनाथ, वाणीनाथ-मुँहे सङ्गे निल ॥
१७९॥
यह कहकर काशी मिश्र तथा मन्दिर की देख-रेख करने वाले व्यक्ति ने विदा ली और गोपीनाथ तथा वाणीनाथ भी उनके साथ गये।"
गोपीनाथे देखाइल सब वासा-घर ।।वाणीनाथ-ठात्रि दिल प्रसाद विस्तर ॥
१८०॥
तब गोपीनाथ को सारे निवासस्थान दिखलाये गये और वाणीनाथ को प्रचुर मात्रा में जगन्नाथजी का महाप्रसाद दिया गया।"
वाणीनाथ आइला बहु प्रसाद पिठा लञा ।।गोपीनाथ आइला वासा संस्कार करिया ॥
१८१ ।। इस तरह वाणीनाथ राय प्रचुर मात्रा में भगवान जगन्नाथजी के प्रसाद के साथ-साथ मिठाई आदि लेकर लौटे। गोपीनाथ आचार्य भी सारे आवासीय कमरों की सफाई कराने के बाद लौट आये।।"
महाप्रभु कहे,—शुन, सर्व वैष्णव-गण ।। निज-निज-वासा सबे करह गमन ॥
१८२॥
तभी श्री चैतन्य महाप्रभु ने सभी वैष्णवों को सम्बोधित करते हुए कहा, सभी लोग सुनिये। अब आप लोग अपने अपने रिहायशी कमरों में जा सकते हैं।"
समुद्र-स्नान करि' कर चूड़ा दरशन ।।तबे आजि इहँ आसि' करिबे भोजन ॥
१८३॥
सभी लोग समुद्र जाकर स्नान करो और मन्दिर के शिखर के दर्शन करो। ऐसा करने के बाद यहाँ आकर भोजन प्राप्त करो।"
प्रभु नमस्करि' सबे वासाते चलिला । गोपीनाथाचार्य सबे वासा-स्थान दिला ॥
१८४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु को नमस्कार करने के बाद सारे भक्त अपने अपने निवासस्थानों को चले गये और गोपीनाथ आचार्य ने उन सबको उनके कमरे दिखलाये।"
महाप्रभु आइला तबे हरिदास-मिलने । हरिदास करे प्रेमे नाम-सङ्कीर्तने ॥
१८५॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु हरिदास ठाकुर से मिलने गये और वहाँ देखा कि वे अत्यन्त प्रेम से महामन्त्र के कीर्तन में संलग्न हैं। हरिदास । हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे / हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे-का कीर्तन कर रहे थे।"
प्रभु देखि' पड़े आगे दण्डवत् हा ।।प्रभु आलिङ्गन कैल तरै उठाजा ॥
१८६॥
ज्योंही हरिदास ठाकुर ने श्री चैतन्य महाप्रभु को देखा, वे उन्हें प्रणाम करने के लिए तुरन्त दण्डवत् गिर गये और श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें उठाकर अपने गले लगाया।"
दुइ-जने प्रेमावेशे करेन क्रन्दने ।।प्रभु-गुणे भृत्य विकल, प्रभु भृत्य-गुणे ॥
१८७।। । तब महाप्रभु तथा उनके दास ( हरिदास) दोनों ही प्रेमवश रुदन करने लगे। प्रभु अपने दास के गुण से और दास अपने स्वामी के गुण से प्रभावित थे।"
हरिदास कहे,—प्रभु, ना छुडिओ मोरे ।। मुञि—नीच, अस्पृश्य, परम पामरे ॥
१८८ ॥
हरिदास ठाकुर ने कहा, हे प्रभु, कृपया आप मुझे न छुएँ, क्योंकि मैं अत्यन्त पतित, अछूत तथा मनुष्यों में सबसे नीच हूँ।"
प्रभु कहे,—तोमा स्पर्शि पवित्र हइते ।। तोमार पवित्र धर्म नाहिक आमाते ॥
१८९॥
महाप्रभु ने कहा, मैं तो पवित्र बनने के लिए तुम्हारा स्पर्श करना चाहता हूँ, क्योंकि तुम्हारे जैसे पवित्र कर्म मुझ में नहीं हैं।"
क्षणे क्षणे कर तुमि सर्व-तीर्थे स्नान ।।क्षणे क्षणे कर तुमि यज्ञ-तपो-दान ॥
१९०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर की प्रशंसा करते हुए कहा, तुम प्रतिक्षण सारे तीर्थस्थानों में स्नान करते हो और प्रतिक्षण यज्ञ, तप तथा दान करते रहते हो।"
निरन्तर कर चार वेद अध्ययन ।।द्विज--न्या हैले तुमि परम-पावन ॥
१९१॥
तुम तो निरन्तर चारों वेदों का अध्ययन करते हो और किसी भी ब्राह्मण या संन्यासी से बढ़कर हो।"
अहो बत श्व-पचोऽतो गरीयान्ग्रज्जिह्वाग्रे वर्तते नाम तुभ्यम् । तेपुस्तपस्ते जुहुवुः सस्नुराग्नब्रह्मानूचुर्नाम गृणन्ति ये ते ॥
१९२॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह श्लोक सुनाया, हे प्रभु, जो व्यक्ति आपके पवित्र नाम को अपनी जीभ पर सदैव रखता है, वह दीक्षित ब्राह्मण से बढ़कर बन जाता है। भले ही वह चंडाल परिवार में उत्पन्न हुआ हो और इस कारण से भौतिक दृष्टि में अत्यन्त नीच क्यों न माना जाये, तो भी वह प्रशंसनीय है। यह भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन का अद्भुत प्रभाव है। अतएव निष्कर्ष यह निकालना चाहिए कि जो व्यक्ति भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करता है, समझ लो कि उसने वेदों में वर्णित सारे तप तथा यज्ञ सम्पन्न कर लिए; उसने सारे तीर्थस्थानों में स्नान कर लिया है; उसने सारे वेदों का अध्ययन कर लिया है और वह वास्तव में आर्य है।"
एत बलि ताँरे ला गेला पुष्पोद्याने ।अति निभृते ताँरे दिला वासा-स्थाने ॥
१९३॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु हरिदास ठाकुर को फूल के बगीचे के भीतर ले गये और वहीं एक अत्यन्त एकान्त स्थान में उनको रहने के लिए निवासस्थान दे दिया।"
एइ-स्थाने रहि' कर नाम सङ्कीर्तन । प्रति-दिन आसि' आमि करिब मिलन ॥
१९४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर से निवेदन किया, तुम यहीं पर रहो और हरे कृष्ण महामन्त्र का जप करो। मैं प्रतिदिन यहीं तुमसे मिलने आता रहूँगा।"
मन्दिरेर चक्र देखि' करिह प्रणाम ।। एइ ठात्रि तोमार आसिबे प्रसादान्न ॥
१९५॥
तुम यहीं शान्तिपूर्वक रहो और मन्दिर के शिखर पर लगे चक्र को देखकर नमस्कार किया करो। जहाँ तक तुम्हारे प्रसाद की बात है, मैं उसे तुम्हारे पास भेजे जाने की व्यवस्था करा दूंगा।"
नित्यानन्द, जगदानन्द, दामोदर, मुकुन्द ।। हरिदासे मिलि' सबे पाइल आनन्द ॥
१९६ ।। नित्यानन्द प्रभु, जगदानन्द प्रभु, दामोदर प्रभु तथा मुकुन्द प्रभु हरिदास ठाकुर से मिलकर अत्यन्त आनन्दित हुए।"
समुद्र-स्नान करि' प्रभु आइला निज स्थाने ।।अद्वैतादि गेला सिन्धु करिबारे स्नाने ॥
१९७॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु समुद्र-स्नान करके अपने निवासस्थान वापस आ गये, तो अद्वैत प्रभु इत्यादि सारे भक्त समुद्र में स्नान करने गये।"
आसि' जगन्नाथेर कैल चूड़ा दरशन ।। प्रभुर आवासे आइला करिते भोजन ॥
१९८॥
समुद्र-स्नान करने के बाद अद्वैत प्रभु समेत सारे भक्त लौट आये और उन्होंने लौटते समय जगन्नाथ मन्दिर की चोटी का दर्शन किया। इसके बाद वे भोजन करने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु के निवासस्थान गये।"
सबारे वसाइला प्रभु ग्रोग्य क्रम करि' ।। श्री-हस्ते परिवेशन कैल गौरहरि ॥
१९९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक-एक करके सारे भक्तों को उनके उचित स्थान पर बैठाया। फिर उन्होंने अपने दिव्य हाथ से प्रसाद वितरण करना शुरू किया।"
अल्प अन्न नाहि आइसे दिते प्रभुर हाते ।। दुइ-तिनेर अन्न देन एक एक पाते ॥
२००॥
। सारे भक्तों को केले के पत्तों में प्रसाद परोसा गया और श्री चैतन्य महाप्रभ ने हर पत्ते पर इतनी मात्रा परोसी जो दो-तीन व्यक्तियों के लिए पर्याप्त थी, क्योंकि उनके हाथ इससे कम नहीं बाँट सकते थे।"
प्रभु ना खाइले केह ना करे भोजन । ऊर्ध्व-हस्ते वसि' रहे सर्व भक्त-गण ॥
२०१।। सारे भक्त अपने-अपने हाथ परोसे हुए प्रसाद के ऊपर उठाये रहे, क्योंकि वे महाप्रभु को पहले खाते हुए देखे बिना खाना नहीं चाह रहे थे।"
स्वरूप-गोसाञि प्रभुके कैल निवेदन । तुमि ना वसिले केह ना करे भोजन ॥
२०२॥
तब स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु को सूचित किया, जब तक आप बैठेंगे नहीं और प्रसाद नहीं ग्रहण करेंगे, तब तक कोई भोजन नहीं करेगा।"
तोमा-सङ्गे रहे व्रत सन्यासीर गण ।। गोपीनाथाचार्य ताँरै करियाछे निमन्त्रण ।। २०३॥
। गोपीनाथ आचार्य ने उन सारे संन्यासियों को आने और प्रसाद ग्रहण करने के लिए आमन्त्रित किया है, जो आपके साथ रहते हैं।"
आचार्य आसियाछेन भिक्षार प्रसादान्न लो। पुरी, भारती आछेन तोमार अपेक्षा करिया ॥
२०४॥
गोपीनाथ आचार्य सारे संन्यासियों को बाँटने के लिए पर्याप्त प्रसाद लेकर पहले ही आ चुके हैं और परमान्द पुरी तथा ब्रह्मानन्द भारती जैसे संन्यासी आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं।"
नित्यानन्द लञा भिक्षा करिते वैस तुमि ।।वैष्णवेर परिवेशन करितेछि आमि ॥
२०५॥
आप बैठ जाएँ और नित्यानन्द प्रभु के साथ भोजन करें। मैं प्रसाद सारे वैष्णवों को वितरित कर दूंगा।"
तबे प्रभु प्रसादान्न गोविन्द-हाते दिला ।।ग्रल करि' हरिदास-ठाकुरे पाठाइला ॥
२०६॥
इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने कुछ प्रसाद गोविन्द के हाथों में हरिदास ठाकुर को भेजे जाने के लिए लाकर दिया।"
आपने वसिला सब सन्यासीरे लञा । । परिवेशन करे आचार्य हरषित हा ॥
२०७॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु अन्य संन्यासियों के साथ भोजन करने बैठ गये और गोपीनाथ आचार्य बड़े ही हर्ष के साथ प्रसाद का वितरण करने लगे।"
स्वरूप गोसाजि, दामोदर, जगदानन्द । वैष्णवेरे परिवेशे तिन जने–आनन्द ॥
२०८॥
। इसके बाद स्वरूप दामोदर गोस्वामी, दामोदर पण्डित तथा जगदानन्द ने बड़े हर्ष से भक्तों को प्रसाद बाँटा।"
नाना पिठा-पानी खाय आकण्ठ पूरिया ।।मध्ये मध्ये ‘हरि' कहे आनन्दित हञा ॥
२०९॥
उन्होंने हर तरह की मिठाईयाँ तथा खीर भरपेट खाई और बीच-बीच में हर्षित होकर 'हरि' के पवित्र नाम का उच्चारण किया।"
भोजन समाप्त हैल, कैल आचमन ।।सबारे पराइल प्रभु माल्य-चन्दन ॥
२१०॥
। जब सभी लोग खाकर अपने अपने हाथ-मुँह धो चुके, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने हाथों से हर एक को फूल की माला तथा चन्दन-लेप से अलंकृत किया।"
विश्राम करिते सबे निज वासा गेला ।सन्ध्या-काले आसि' पुनः प्रभुके मिलिला ॥
२११॥
। इस प्रकार प्रसाद ग्रहण करने के बाद वे सब अपने-अपने वासस्थानों में विश्राम करने चले गये और संध्या समय वे फिर महाप्रभु से मिलने आये।"
हेन-काले रामानन्द आइला प्रभु-स्थाने ।।प्रभु मिलाइल ताँरै सब वैष्णव-गणे ॥
२१२॥
उसी समय रामानन्द राय भी श्री चैतन्य महाप्रभु से भेंट करने आये और महाप्रभु ने सभी वैष्णवों से उनका परिचय कराने के लिए इस अवसर का लाभ उठाया।"
सबा ला गेला प्रभु जगन्नाथालय ।। कीर्तन आरम्भ तथा कैल महाशय ॥
२१३॥
तब महापुरुष श्री चैतन्य महाप्रभु उन सबको जगन्नाथ मन्दिर ले गये और वहाँ उन्होंने भगवान् के पवित्र नाम का संकीर्तन प्रारम्भ कर दिया।"
सन्ध्या-धूप देखि' आरम्भिला सङ्कीर्तन ।पड़िछा आसि' सबारे दिल माल्य-चन्दन ॥
२१४॥
भगवान् की धूप-आरती देखने के बाद सबने संकीर्तन प्रारम्भ किया। तब पड़िछा ( मन्दिर की देखभाल करने वाला) आया और उसने हर एक को फूलमाला तथा चन्दन-लेप दिया।"
चारि-दिके चारि सम्प्रदाय करेन कीर्तन ।।मध्ये नृत्य करे प्रभु शचीर नन्दन ॥
२१५॥
। चारों दिशाओं में संकीर्तन करने के लिए चार टोलियाँ बनायी गई और उन चारों के बीच में माता शची के पुत्र महाप्रभु स्वयं नृत्य करने लगे।"
अष्ट मृदङ्ग बाजे, बत्रिश करताल । हरि-ध्वनि करे सबे, बले-भाल, भाल ॥
२१६॥
चारों टोलियों के पास आठ मृदंग तथा बत्तीस करताल थे। वे सभी एकसाथ दिव्य ध्वनि करने लगे और हर व्यक्ति कहने लगा, बहुत अच्छा! बहुत अच्छा! कीर्तनेर ध्वनि महा-मङ्गल उठिल ।।चतुर्दश लोक भरि' ब्रह्माण्ड भेदिल ॥
२१७॥
। जब संकीर्तन का कोलाहल गूंजने लगा, तो तुरन्त ही सारा सौभाग्य जाग उठा और यह ध्वनि चौदहों लोकों को पूरित करके ब्रह्माण्ड को भेद गई।"
कीर्तन-आरम्भे प्रेम उथलि' चलिल ।।नीलाचल-वासी लोक धा आइल ॥
२१८ ॥
जब संकीर्तन प्रारम्भ हुआ, तो तुरन्त प्रेम-भाव ने हर वस्तु को आप्लावित कर दिया और जगन्नाथ पुरी के सारे निवासी दौड़ते हुए आये।"
कीर्तन देखि' सबार मने हैल चमत्कार ।।कभु नाहि देखि ऐछे प्रेमेर विकार ॥
२१९ ॥
। प्रत्येक व्यक्ति उस तरह संकीर्तन होते देखकर आश्चर्यचकित था। सबने स्वीकार किया कि इसके पूर्व कभी भी न तो ऐसा कीर्तन हुआ, ने ईश्वर-प्रेम का ऐसा प्राकट्य हुआ।"
तबे प्रभु जगन्नाथेर मन्दिर बेड़िया ।प्रदक्षिण करि' बुलेन नर्तन करिया ॥
२२०॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगन्नाथ मन्दिर की प्रदक्षिणा की और पूरी प्रदक्षिणा-भर लगातार नाचते रहे।"
आगे-पाछे गान करे चारि सम्प्रदाय ।। अछाड़ेर काले धरे नित्यानन्द राय ॥
२२१॥
जब प्रदक्षिणा की जा रही थी, तब चारों टोलियों ने आगे और पीछे कीर्तन किया। जब श्री चैतन्य महाप्रभु भूमि पर गिर पड़े, तो नित्यानन्द प्रभु ने उन्हें उठा लिया।"
अश्रु, पुलक, कम्प, स्वेद, गम्भीर हुङ्कार ।। प्रेमेर विकार देखि लोके चमत्कार ॥
२२२॥
जब कीर्तन चल रहा था, तब श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में प्रेमविकार उत्पन्न हुए-यथा अश्रु, हर्ष, कम्पन, प्रस्वेद तथा गम्भीर हुंकार। इन विकारों को देखकर वहाँ पर उपस्थित सारे लोग अत्यन्त आश्चर्यचकित हुए।"
पिच्कारि-धारा जिनि' अश्रु नयने ।।चारि-दिकेर लोक सब करये सिनाने ॥
२२३॥
महाप्रभु के नेत्रों से अश्रु की धारा तेजी से निकल पड़ी, मानो पिचकारी से पानी निकल रहा हो। उनके चारों ओर खड़े लोग उनके अश्रुओं से भीग गये।"
‘बेड़ा-नृत्य' महाप्रभु करि' कत-क्षण ।मन्दिरेर पाछे रहि' करये कीर्तन ॥
२२४॥
मन्दिर की प्रदक्षिणा करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु कुछ समय तक मन्दिर के पीछे रहे और उन्होंने अपना संकीर्तन जारी रखा।"
चारि-दिके चारि सम्प्रदाय उच्चैःस्वरे गाय ।मध्ये ताण्डव-नृत्य करे गौरराय ॥
२२५॥
चारों दिशाओं में चारों संकीर्तन टोलियाँ जोर-जोर से कीर्तन कर रही थीं और श्री चैतन्य महाप्रभु बीच में ऊँचे उछल-उछलकर नाच रहे थे।"
बहु-क्षण नृत्य करि' प्रभु स्थिर हैला ।। चारि महान्तेरे तबे नाचिते आज्ञा दिली ॥
२२६॥
लम्बे समय तक नाचने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु स्थिर हो गये और उन्होंने चार महापुरुषों को नृत्य शुरू करने का आदेश दिया।"
एक सम्प्रदाये नाचे नित्यानन्द-राये ।। अद्वैत-आचार्य नाचे आर सम्प्रदाये ॥
२२७॥
। एक टोली में नित्यानन्द प्रभु नाचने लगे और दूसरी टोली में अद्वैत आचार्य नाचने लगे।"
आर सम्प्रदाये नाचे पण्डित-वक्रेश्वर ।। श्रीवास नाचे आर सम्प्रदाय-भितर ॥
२२८॥
अन्य टोली में वक्रेश्वर पण्डित तथा चौथी टोली में श्रीवास ठाकुर नाचने लगे।"
मध्ये रहि' महाप्रभु करेन दरशन ।।ताहाँ एक ऐश्वर्य ताँर हइल प्रकटन ॥
२२९॥
। जब यह नृत्य चल रहा था, तब श्री चैतन्य महाप्रभु उन्हें देख रहे थे और तब उन्होंने एक चमत्कार प्रदर्शित किया।"
चारि-दिके नृत्य-गीत करे व्रत जन ।।सबे देखे,—प्रभु करे आमारे दरशन ॥
२३०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु नाचने वालों के बीच में खड़े थे और सारी दिशाओं के नाचने वालों ने अनुभव किया कि श्री चैतन्य महाप्रभु उनकी ही ओर देख रहे हैं।"
चारि जनेर नृत्य देखिते प्रभुर अभिलाष ।। सेइ अभिलाषे करे ऐश्वर्य प्रकाश ॥
२३१॥
। चारों महापुरुषों का नाच देखने की अभिलाषा से श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह चमत्कार दिखाया, मानो वे हर एक को देख रहे हों।"
दर्शने आवेश ताँर देखि' मात्र जाने । केमने चौदिके देखे,—इहा नाहि जाने ॥
२३२॥
जिस किसी ने श्री चैतन्य महाप्रभु को देखा, वह समझ सका कि वे चमत्कार कर रहे हैं, किन्तु वे यह नहीं जान सके कि वे चारों दिशाओं में किस प्रकार देख सकते हैं।"
पुलिन-भोजने ग्रेन कृष्ण मध्य-स्थाने । चौदिकेर सखा कहे,—आमारे नेहाने ॥
२३३॥
। जब कृष्ण अपनी वृन्दावन-लीलाओं में यमुना नदी के तट पर अपने मित्रों के बीच में बैठकर भोजन किया करते थे, तब हर ग्वालबाल यही अनुभव करता था कि कृष्ण उसकी ओर देख रहे हैं। इसी तरह जब चैतन्य महाप्रभु नाच देख रहे थे, तब हर व्यक्ति ने चैतन्य महाप्रभु को अपनी ओर देखते पाया।"
नृत्य करते येइ आइसे सन्निधाने । महाप्रभु करे ताँरे दृढ़ आलिङ्गने ।। २३४॥
जब कोई नाचता हुआ उनके निकट आता, तो श्री चैतन्य महाप्रभु उसका कसकर आलिंगन करते।"
महा-नृत्य, महा-प्रेम, महा-सङ्कीर्तन ।। देखि' प्रेमावेशे भासे नीलाचल-जन ॥
२३५ ।। महानृत्य, महाप्रेम तथा महासंकीर्तन देखकर जगन्नाथ पुरी के सारे लोग प्रेम के सागर में तैरने लगे।"
गजपति राजा शुनि' कीर्तन-महत्त्व ।। अट्टालिका चड़ि' देखे स्वगण-सहित ॥
२३६॥
संकीर्तन की महानता को सुनकर राजा प्रतापरुद्र अपने महल के ऊपर चढ़ गये और उन्होंने अपने निजी संगियों सहित संकीर्तन होते देखा।"
कीर्तन देखिया राजार हैल चमत्कार ।। प्रभुके मिलिते उत्कण्ठा बाड़िल अपार ॥
२३७॥
। राजा महाप्रभु का कीर्तन देखकर अत्यधिक आश्चर्यचकित थे और महाप्रभु से मिलने की उनकी उत्कण्ठा अत्यधिक बढ़ गई।"
कीर्तन-समाप्त्ये प्रभु देखि' पुष्पाञ्जलि ।। सर्व वैष्णव ला प्रभु आइला वासा चलि' ॥
२३८॥
जब संकीर्तन समाप्त हो गया, तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान् जगन्नाथ के अर्चाविग्रह पर पुष्प अर्पित होते देखा। फिर वे तथा सारे वैष्णव अपने निवासस्थान लौट गये।"
पड़िछा आनिया दिल प्रसाद विस्तर ।। सबारे बाँटिया ताहा दिलेन ईश्वर ॥
२३९॥
। तत्पश्चात् मन्दिर की देख-रेख करने वाला अध्यक्ष काफी मात्रा में प्रसाद ले आया, जिसे श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने हाथों से सारे भक्तों को बाँटा।"
सबारे विदाय दिल करिते शयन । एइ-मत लीला करे शचीर नन्दन ॥
२४०॥
अन्त में सारे लोग सोने के लिए चले गये। इस तरह शचीमाला के पुत्र श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी लीलाएँ कीं।"
यावताछिला सबे महाप्रभु-सङ्गे।। प्रति-दिन एइ-मत करे कीर्तन-रङ्गे ॥
२४१॥
जब तक भक्तगण जगन्नाथ पुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ रहे, तब तक प्रतिदिन बड़े ही हर्ष के साथ संकीर्तन लीला चलती रही।"
एइ त कहिलँ प्रभुर कीर्तन-विलास ।। ग्रेबा इहा शुने, हय चैतन्येर दास ॥
२४२॥
। इस तरह मैंने महाप्रभु की संकीर्तन लीला का वर्णन किया है और मैं हर एक को यही आशीर्वाद देता हूँ–यह विवरण सुनकर प्रत्येक व्यक्ति निश्चित रूप से श्री चैतन्य महाप्रभु का दास बन जायेगा।"
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
२४३॥
। श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की आकांक्षा करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।"
