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अध्याय नौ: भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की पवित्र स्थानों की यात्राएँ

नाना-मत-ग्राह-ग्रस्तान्दाक्षिणात्य-जन-द्विपान् ।।कृपारिणा विमुच्यैतागौरश्चक्रे स वैष्णवान् ॥

१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने दक्षिण भारत के निवासियों का हृदय-परिवर्तन किया। ये लोग हाथी के समान बलशाली थे, किन्तु वे विभि विचारधाराओं-यथा बौद्ध, जैन, मायावादी दर्शन-रूपी घड़ियालों (मगरमच्छों) के चंगुल में फँसे हुए थे। महाप्रभु ने अपनी कृपा रूपी चक्र से सबको वैष्णव अर्थात् भगवद्भक्त बनाकर सबका उद्धार किया।

जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो।! श्री अद्वैत प्रभु की जय हो तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो! दक्षिण-गमन प्रभुर अति विलक्षण । सहस्र सहस्र तीर्थ कैल दरशन ॥

३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की दक्षिण भारत की यात्रा निश्चय ही अद्वितीय थी, क्योंकि उन्होंने वहाँ कई हजार तीर्थस्थान देखे।

सेइ सब तीर्थ स्पर्शि' महा-तीर्थ कैल।। सेइ छले सेइ देशेर लोक निस्तारिल ॥

४॥

उन तीर्थस्थानों में जाने के बहाने उन्होंने हजारों निवासियों का हृदय परिवर्तन किया और इस तरह उनका उद्धार किया। उन्होंने तीर्थस्थानों को अपने स्पर्श मात्र से महान् तीर्थस्थलों में परिणत कर दिया। सेइ सब तीर्थेर क्रम कहिते ना पारि ।दक्षिण-वामे तीर्थ-गमन हय फेराफेरि ॥

५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने जिन समस्त तीर्थस्थानों का भ्रमण किया, उनका क्रमबद्ध वर्णन कर पाना मेरे लिए सम्भव नहीं है। मैं संक्षेप में इतना ही कह सकता हूँ कि महाप्रभु ने आते-जाते दाहिने तथा बाँये के सारे तीर्थस्थानों का भ्रमण किया।"

अतएव नाम-मात्र करिये गणन । कहिते ना पारि तार था अनुक्रम ॥

६ ॥

चूंकि इन सारे स्थानों का क्रमबद्ध वर्णन कर पाना मेरे लिए सम्भव नहीं है, अतएव मैं नाम के लिए ही उनका वर्णन करूंगा।"

पूर्ववत्पथे ग्राइते ग्रे पाय दरशन ।।ग्रेइ ग्रामे याय, से ग्रामेर व्रत जन ॥

७॥

सबेइ वैष्णव हय, कहे 'कृष्ण' ‘हरि' । अन्य ग्राम निस्तारये सेइ वैष्णव' करि' ॥

८॥

जैसाकि पहले कहा जा चुका है, भगवान् चैतन्य महाप्रभु जिन-जिन गाँवों में गये, वहाँ के सारे निवासी वैष्णव बन गये, और 'हरि' तथा 'कृष्ण' नाम का उच्चारण करने लगे। इस तरह महाप्रभु जितने सारे गाँवों में गये, उनका हर व्यक्ति वैष्णव भक्त बन गया।"

दक्षिण देशेर लोक अनेक प्रकार ।।केह ज्ञानी, केह कर्मी, पाषण्डी अपार ॥

९॥

। दक्षिण भारत में अनेक प्रकार के लोग थे। कुछ तो ज्ञानी थे और कुछ सकाम कर्मी, किन्तु अभक्तों की संख्या अपार थी।

सेइ सब लोक प्रभुर दर्शन-प्रभावे ।।निज-निज-मत छाड़ि' हइल वैष्णवे ॥

१०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रभाव से इन सारे लोगों ने अपने-अपने मते त्याग दिये और वैष्णव अर्थात् कृष्ण-भक्त बन गये।

वैष्णवेर मध्ये राम-उपासक सब ।।केह'तत्त्ववादी', केह हय 'श्री-वैष्णव' ॥

११॥

उस समय दक्षिण भारत के सारे वैष्णव भगवान् रामचन्द्र के पास थे। उनमें से कुछ तत्त्ववादी थे और कुछ रामानुजाचार्य के अनुयायी ।

सेइ सब वैष्णव महाप्रभुर दर्शने ।।कृष्ण-उपासक हैल, लय कृष्ण-नामे ॥

१२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु से भेंट करने के बाद वे सारे वैष्णव कृष्ण-भक्त बन गये और हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने लगे।

राम! राघव! राम! राघव! राम! राघव! पाहि माम् ।।कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! रक्ष माम् ॥

१३॥

हे रघुवंशी रामचन्द्र, कृपया आप मेरी रक्षा करें! हे केशी असुर को । मारने वाले कृष्ण, कृपया आप मेरी रक्षा करें!" एइ श्लोक पथे पड़ि' करिला प्रयाण ।। गौतमी-गङ्गाय ग्राइ' कैल गङ्गा-स्नान ॥

१४॥

मार्ग पर जाते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु इसी रामराघव मन्त्र का कीर्तन करते थे। इस प्रकार कीर्तन करते-करते वे गौतमी-गंगा के तट पर पहुँचे और वहाँ पर उन्होंने स्नान किया।"

मल्लिकार्जुन-तीर्थे ग्राइ' महेश देखिल ।ताहाँ सब लोके कृष्ण-नाम लओयाइल ॥

१५॥

तत्पश्चात् श्री चैतन्य महाप्रभु मल्लिकार्जुन तीर्थ गये और वहाँ पर शिवजी के अर्चाविग्रह का दर्शन किया। उन्होंने सारे लोगों को हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने के लिए प्रेरित भी किया।

रामदास महादेवे करिल दरशन ।।अहोवल-नृसिंहेरे करिला गमन ॥

१६ ॥

वहाँ पर उन्होंने भगवान् राम के दास महादेव (शिव) का दर्शन किया। इसके बाद वे अहोवल-नृसिंह देखने गये।

नृसिंह देखिया ताँरे कैल नति-स्तुति ।।सिद्धवट गेला याहाँ मूर्ति सीतापति ॥

१७॥

। अहोवल नृसिंह अर्चाविग्रह का दर्शन करने के बाद चैतन्य महाप्रभु ने भगवान् की स्तुति की। फिर वे सिद्धवट गये, जहाँ उन्होंने सीतादेवी के स्वामी रामचन्द्र के अर्चाविग्रह का दर्शन किया।

रघुनाथ देखि' कैल प्रणति स्तवन ।।ताहाँ एक विप्र प्रभुर कैल निमन्त्रण ॥

१८॥

महाप्रभु ने रघुवंशी भगवान् रामचन्द्र के अर्चाविग्रह का दर्शन करने के बाद उनको नमस्कार किया और स्तुति की। तत्पश्चात् एक ब्राह्मण ने उन्हें भोजन करने के लिए आमन्त्रित किया।

सेइ विप्र राम-नाम निरन्तर लय ।।‘राम' 'राम' विना अन्य वाणी ना कहय ॥

१९॥

वह ब्राह्मण निरन्तर पवित्र राम-नाम का उच्चारण करता था। वह ब्राह्मण राम-नाम के अतिरिक्त अन्य किसी शब्द का उच्चारण नहीं करता था।

सेइ दिन ताँर घरे रहि' भिक्षा करि' ।ताँरे कृपा करि' आगे चलिला गौरहरि ॥

२०॥

उस दिन भगवान् चैतन्य वहीं रहे और उसके घर में प्रसाद ग्रहण किया। इस तरह उस ब्राह्मण पर कृपा करने के बाद महाप्रभु आगे बढ़ गये।

स्कन्द-क्षेत्र-तीर्थे कैल स्कन्द दरशन ।।त्रिमठ आइला, ताहाँ देखि' त्रिविक्रम ॥

२१॥

स्कन्द-क्षेत्र नामक तीर्थस्थल में श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्कन्द का मन्दिर देखा। वहाँ से वे त्रिमठ गये, जहाँ उन्होंने विष्णु के अर्चाविग्रह त्रिविक्रम का दर्शन किया।"

पुनः सिद्धवट आइला सेइ विप्र-घरे ।। सेइ विप्र कृष्ण-नाम लय निरन्तरे ॥

२२॥

त्रिविक्रम मन्दिर का दर्शन करने के बाद महाप्रभु सिद्धवट लौट आये, जहाँ वे पुनः उसी ब्राह्मण के घर गये, जो अब निरन्तर हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करता था।"

भिक्षा करि' महाप्रभु ताँरे प्रश्न कैल ।। कह विप्र, एइ तोमार कोन्दशा हैल ॥

२३॥

भोजन करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस ब्राह्मण से पूछा, “हे। मित्रवर, मुझसे अपनी वर्तमान स्थिति के विषय में बतलाओ।"

पूर्वे तुमि निरन्तर लैते राम-नाम ।।एबे केने निरन्तर लओ कृष्ण-नाम ॥

२४॥

पहले तो तुम भगवान् राम के पवित्र नाम का निरन्तर जप करते थे। तुम अब कृष्ण-नाम का निरन्तर जप क्यों करते हो? विप्र बले,—एइ तोमार दर्शन-प्रभावे ।।तोमा देखि' गेल मोर आजन्म स्वभावे ॥

२५॥

ब्राह्मण ने उत्तर दिया, हे महाशय, यह आपके प्रभाव से है। आपका दर्शन करने के बाद मैंने अपने जीवन-भर के उस अभ्यास को छोड़ दिया।"

बाल्यावधि राम-नाम-ग्रहण आमार ।।तोमा देखि' कृष्ण-नाम आइल एक-बार ॥

२६॥

। मैं अपने बचपन से भगवान् रामचन्द्र के नाम का कीर्तन करता रहा। हूँ, किन्तु आपको देखने के बाद मैंने एक बार भगवान् कृष्ण के नाम का कीर्तन किया।"

सेइ हैते कृष्ण-नाम जिह्वाते वसिला । कृष्ण-नाम स्फुरे, राम-नाम दूरे गेला ॥

२७॥

तब से मेरी जिह्वा पर कृष्ण का पावन नाम ही बैठ गया है। क्योंकि अब मैं कृष्ण-नाम का कीर्तन करता हूँ, अतः भगवान् रामचन्द्र का नाम दूर भाग गया है।"

बाल्यकाल हैते मोर स्वभाव एक हय ।। नामेर महिमा-शास्त्र करिये सञ्चय ॥

२८॥

मैं अपने बचपन से शास्त्रों से पवित्र नाम की महिमाओं का संग्रह करता रहा हूँ।"

रमन्ते योगिनोऽनन्ते सत्यानन्दे चिदात्मनि ।। इति राम-पदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥

२९॥

परम सत्य राम कहलाता है, क्योंकि अध्यात्मवादी आध्यात्मिक अस्तित्व के असीम यथार्थ सुख में आनन्द लेते हैं।"

कृषिभू-वाचकः शब्दो णश्च निर्वृति-वाचकः ।। तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ॥

३०॥

। कृष् शब्द भगवान् के अस्तित्व का आकर्षक स्वरूप है, और ण का अर्थ है आध्यात्मिक आनन्द। कृष् धातु ण प्रत्यय से मिलकर कृष्ण बनाती है, जिसका अर्थ है परम सत्य।'" परं ब्रह्म दुइ-नाम समान हइल । पुनः आर शास्त्रे किछु विशेष पाइल ॥

३१॥

जहाँ तक राम तथा कृष्ण के पवित्र नामों का सम्बन्ध है, वे एक समान हैं। किन्तु अधिक उन्नति के लिए हमें प्रामाणिक शास्त्रों से कुछ विशेष जानकारी प्राप्त होती है।"

राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे ।। सहस्र-नामभिस्तुल्यं राम-नाम वरानने ॥

३२॥

[ शिवजी ने अपनी पत्नी दुर्गा से कहा :‘हे वरानना, मैं राम, राम, राम के पवित्र नाम का कीर्तन करता हूँ, और इस सुन्दर ध्वनि का आनन्द लूटता हूँ। रामचन्द्र का यह पवित्र नाम भगवान् विष्णु के एक हजार नामों के बराबर है।"

सहस्र-नाम्नां पुण्यानां त्रिरावृत्त्या तु यत्फलम् ।। एकावृत्त्या तु कृष्णस्य नामैकं तत्प्रयच्छति ॥

३३॥

विष्णु के पवित्र सहस्र नामों को तीन बार उच्चारण करने से जो पुण्य मिलता है, वही कृष्ण के नाम का केवल एक बार उच्चारण करने से मिल जाता है।'" एइ वाक्ये कृष्ण-नामेर महिमा अपार ।। तथापि लइते नारि, शुन हेतु तार ॥

३४॥

शास्त्रों के कथनानुसार कृष्ण के पवित्र नाम की महिमा अपार है। फिर भी मैं उनका नाम नहीं ले पाया। कृपया आप इसका कारण सुनें।"

इष्ट-देव राम, ताँर नामे सुख पाई ।। सुख पाबा राम-नाम रात्रि-दिन गाइ ॥

३५॥

मेरे आराध्य देव भगवान् रामचन्द्र रहे हैं, और उनके पवित्र नाम के कीर्तन से मैं सुख प्राप्त करता रहा हूँ। चूंकि मुझे इतना सुख प्राप्त हुआ, इसलिए मैं भगवान् राम के पवित्र नाम का कीर्तन दिन-रात करता रहा।"

तोमार दर्शने ग्रबे कृष्ण-नाम आइल ।। ताहार महिमा तबे हृदये लागिल ॥

३६॥

आपके आने से भगवान् कृष्ण का पवित्र नाम भी आया। तब मेरे हृदय में कृष्ण नाम की महिमा का उदय हुआ।"

सेइ कृष्ण तुमि साक्षात्-इहा निर्धारिल ।एत कहि' विप्र प्रभुर चरणे पड़िल ॥

३७॥

उस ब्राह्मण ने कहा, हे महाशय, आप वही भगवान् कृष्ण स्वयं हैं। यह मेरा दृढ़ मत है। यह कहकर वह ब्राह्मण महाप्रभु के चरणों पर गिर पड़ा।"

ताँरे कृपा करि' प्रभु चलिला आर दिने । उस ब्राह्मण पर कृपा करके श्री चैतन्य महाप्रभु ने अगले दिन प्रस्थान किया और वृद्धकोशी आये, जहाँ उन्होंने शिवजी के मन्दिर की मुलाकात ली।।वृद्धकाशी आसि' कैल शिव-दरशने ॥

३८॥

" ताहाँ हैते चलि' आगे गेला एक ग्रामे ।। ब्राह्मण-समाज ताहाँ, करिल विश्रामे ॥

३९॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु वृद्धकाशी से रवाना होकर आगे बढ़ते रहे। उन्होंने एक गाँव में विश्राम किया और उन्होंने देखा कि वहाँ के अधिकांश निवासी ब्राह्मण थे।

प्रभुर प्रभावे लोक आइल दरशने ।।लक्षार्बुद लोक आइसे ना ग्राय गणने ॥

४०॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रभाव से करोड़ों लोग उनके दर्शन करने आये। इन लोगों की संख्या अनन्त थी, अतएव उनकी गिनती नहीं की जा सकती थी।"

गोसाजिर सौन्दर्य देखि' ताते प्रेमावेश ।।सबे 'कृष्ण' कहे, ‘वैष्णव' हैल सर्व-देश ॥

४१॥

महाप्रभु का शरीर अत्यन्त सुन्दर था। साथ ही वे सदैव भगवान् के प्रेमभाव से आविष्ट रहते थे। उनका दर्शन करने से ही सारे लोग कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करने लगे और प्रत्येक व्यक्ति वैष्णव भक्त बन गया।"

तार्किक-मीमांसक, व्रत मायावादि-गण । साङ्ख्य, पातञ्जल, स्मृति, पुराण, आगम ॥

४२॥

। दार्शनिक कई प्रकार के होते हैं। कुछ तार्किक होते हैं, जो गौतम या कणाद के अनुयायी होते हैं। कुछ जैमिनि के मीमांसा-दर्शन के अनुयायी होते हैं। कुछ शंकराचार्य के मायावाद-दर्शन के तथा कुछ कपिल के सांख्य-दर्शन या पतंजलि के योग-दर्शन के अनुयायी होते हैं। कुछ बीस शास्त्रों से युक्त स्मृति शास्त्र का पालन करते हैं, तथा अन्य लोग पुराण एवं तन्त्र शास्त्र का पालन करते हैं। इस तरह दार्शनिकों के विभिन्न प्रकार होते हैं।"

निज-निज-शास्त्रोद्ग्राहे सबाइ प्रचण्ड । सर्व मत दुषि' प्रभु करे खण्ड खण्ड ॥

४३॥

ये विभिन्न शास्त्रों के अनुयायी अपने-अपने शास्त्रों के निष्कर्ष प्रस्तुत करने के लिए तैयार थे। किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन सबके मतों को खण्डन किया और अपने भक्ति-सम्प्रदाय की स्थापना की, जो वेदों, वेदान्त, ब्रह्मसूत्र तथा अचिन्त्य भेदाभेद तत्त्व दर्शन पर आधारित था।।"

सर्वत्र स्थापय प्रभु वैष्णव-सिद्धान्ते ।।प्रभुर सिद्धान्त केह ना पारे खण्डिते ॥

४४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने सर्वत्र भक्ति-सम्प्रदाय की स्थापना की। उन्हें कोई परास्त नहीं कर पाया होते हैं।"

हारि' हारि' प्रभु-मते करेन प्रवेश ।।एइ-मते 'वैष्णव' प्रभु कैल दक्षिण देश ॥

४५॥

। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु के द्वारा पराजित होकर ये सारे दार्शनिक तथा इनके अनुयायी महाप्रभु के सम्प्रदाय में सम्मिलित हो गये। इस तरह भगवान् चैतन्य ने दक्षिण भारत को वैष्णवों का देश बना दिया।"

पाषण्डी आइल ग्रत पाण्डित्य शुनिया ।। गर्व करि' आइल सङ्गे शिष्य-गण ला ॥

४६॥

जब पाखंडियों ने महाप्रभु के पाण्डित्य के बारे में सुना, तो वे अपनेअपने शिष्यों को लेकर बड़े गर्व के साथ उनके पास आये।"

बौद्धाचार्य महा-पण्डित निज नव-मते । प्रभुर आगे उद्ग्राह करि' लागिला बलिते ॥

४७॥

उनमें से एक बौद्ध-सम्प्रदाय का मुखिया था और बहुत बड़ा पंडित था। वह बौद्धवाद के नौ दार्शनिक निष्कर्षों की स्थापना करने के उद्देश्य से महाप्रभु के समक्ष आया और इस प्रकार बोलने लगा।"

ग्रद्यपि असम्भाष्य बौद्ध अयुक्त देखिते । तथापि बलिला प्रभु गर्व खण्डाइते ॥

४८॥

यद्यपि बौद्धजन विवाद करने के लिए अनुपयुक्त होते हैं और वैष्णवों को चाहिए कि उनका दर्शन न करें, किन्तु उनके मिथ्या अहंकार को कम करने के उद्देश्य से ही चैतन्य महाप्रभु उनसे बोले।"

तर्क-प्रधान बौद्ध-शास्त्र'नव मते' । तर्केइ खण्डिल प्रभु, ना पारे स्थापिते ॥

४९॥

बौद्ध सम्प्रदाय के सारे शास्त्र मुख्यतः तर्क पर आश्रित हैं और उनमें नौ सिद्धान्त प्रमुख हैं। चूंकि श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें उनके तर्क में परास्त कर दिया, अतएव वे अपना मत स्थापित नहीं कर पाये।"

बौद्धाचार्य 'नव प्रश्न' सब उठाइल ।।दृढ़ युक्ति-तकें प्रभु खण्ड खण्ड कैल ॥

५०॥

। बौद्ध-सम्प्रदाय के प्रचारक ने नौ सिद्धान्त प्रस्तुत किये, लेकिन श्री । चैतन्य महाप्रभु ने अपने प्रबल तर्क से उन्हें खण्ड-खण्ड कर डाले।

दार्शनिक पण्डित सबाइ पाइल पराजय ।। लोके हास्य करे, बौद्ध पाइल लज्जा-भय ॥

५१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने सारे बौद्धिक चिन्तकों तथा पण्डितों को हरा दिया, और बौद्ध दार्शनिकों पर जब लोग हँसने लगे, तो उन्हें लज्जा तथा भय दोनों का अनुभव हुआ।"

प्रभुके वैष्णव जानि' बौद्ध घरे गेल । सकल बौद्ध मिलि' तबे कुमन्त्रणा कैल ॥

५२॥

। बौद्ध लोग जान गये कि श्री चैतन्य महाप्रभु वैष्णव हैं, अतएव वे दुःखी मन से अपने-अपने घर वापस गये। किन्तु बाद में उन लोगों ने महाप्रभु के विरुद्ध षड्यन्त्र रचना शुरू कर दिया।"

अपवित्र अन्न एक थालिते भरिया । प्रभु-आगे निल'महा-प्रसाद' बलिया ॥

५३॥

षड्यन्त्र रचने के बाद वे बौद्धजन अपवित्र भोजन की थाली श्री चैतन्य महाप्रभु के समक्ष ले आये, और कहा कि यह महाप्रसाद है।

हेन-काले महाकाय एक पक्षी आइल ।।ठोंटे करि' अन्न-सह थालि ला गेल ॥

५४॥

जब यह दूषित भोजन श्री चैतन्य महाप्रभु को लाकर दिया गया, तब एक बड़ा-सा पक्षी उस स्थान में प्रकट हुआ, और थाली को अपनी चोंच में दबा ली और उसे लेकर उड़ गया।"

बौद्ध-गणेर उपरे अन्न पड़े अमेध्य हैया ।। बौद्धाचार माथाय थालि पड़िल बाजिया ॥

५५॥

। वह अछूत भोजन उन बौद्धों के ऊपर गिर पड़ा और उस बड़े पक्षी ने वह थाली उस प्रमुख बौद्धाचार्य के सिर के ऊपर गिरा दी। जब वह उसके सिर पर गिरी, तो बड़े जोर की आवाज हुई।

तेरछे पड़िल थालि,—माथा काटि' गेल ।मूर्च्छित हा आचार्य भूमिते पड़िल ॥

५६॥

थाली धातु की बनी थी, अतएव जब उसकी धार उस आचार्य के सिर पर लगी, तो घाव हो गया। फलतः वह आचार्य तुरन्त बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़ा।"

हाहाकार करि' कान्दे सब शिष्य-गण ।। सबे आसि' प्रभु-पदे लइल शरण ।। ५७।। जब आचार्य बेहोश हो गया, तो उसके सारे शिष्य जोर-जोर से रोने लगे और शरण पाने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की ओर दौड़े।।"

तुमि त' ईश्वर साक्षात्, क्षम अपराध । जीयाओ आमार गुरु, करह प्रसाद ॥

५८॥

। उन सबने श्री चैतन्य महाप्रभु को साक्षात् भगवान् सम्बोधित करते हुए कहा, “कृपया, हमारी अपराध क्षमा करें। हम पर कृपा करें और हमारे गुरुदेव को जीवनदान दें।"

प्रभु कहे,—सबे कह 'कृष्ण' 'कृष्ण' ‘हरि' । गुरु-कर्ण कह कृष्ण-नाम उच्च करि' ॥

५९॥

तब महाप्रभु ने उन बौद्ध शिष्यों से कहा, तुम सभी मिलकर अपने गुरु के कान में जोर से कृष्ण तथा हरि के नामों का उच्चारण करो।"

तोमा-सबार 'गुरु' तबे पाइबे चेतन । सब बौद्ध मिलि' करे कृष्ण-सङ्कीर्तन ॥

६०॥

इस तरह से तुम्हारे गुरु को चेतना प्राप्त होगी। श्री चैतन्य महाप्रभु का परामर्श मानकर वे सारे बौद्ध शिष्य कृष्ण के पवित्र नाम का सामूहिक कीर्तन करने लगे।

गुरु-कणें कहे सबे 'कृष्ण' 'राम' ‘हरि' ।। चेतन पाञा आचार्य बले ‘हरि' ‘हरि' ॥

६१॥

जब सारे शिष्य कृष्ण, राम तथा हरि के पवित्र नामों का कीर्तन करनेलगे, तो बौद्ध आचार्य की चेतना वापस आ गई और वह तुरन्त ही हरिनाम का कीर्तन करने लगा।"

कृष्ण बलि' आचार्य प्रभुरे करेन विनय । देखिया सकल लोक हइल विस्मय ॥

६२॥

। जब वह बौद्धाचार्य कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करने लगा और श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण में आ गया, तो वहाँ पर एकत्र सारे लोग आश्चर्य से चकित रह गये।"

एइ-रूपे कौतुक करि' शचीर नन्दन ।अन्तर्धान कैल, केह ना पाय दर्शन ॥

६३॥

। तब शचीदेवी के पुत्र श्री चैतन्य महाप्रभु सहसा आँखों से नाटकीय ढंग से ओझल हो गये, और उन्हें कोई ढूंढ नहीं सका।"

महाप्रभु चलि' आइला त्रिपति त्रिमल्ले ।।चतुर्भुज मूर्ति देखि' व्येङ्कटान्ने चले ।। ६४॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु तिरुपति तथा तिरुमल्ल आये, जहाँ उन्होंने चतुर्भुजी मूर्ति देखी। तत्पश्चात् वे वेंकट पर्वत की ओर चल पड़े।"

त्रिपति आसिया कैल श्री-राम दरशन । रघुनाथ-आगे कैल प्रणाम स्तवन ॥

६५॥

तिरुपति पहुँचकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान् रामचन्द्र के मन्दिर का दर्शन किया। वहाँ उन्होंने प्रार्थना की और रघुवंशी रामचन्द्र के समक्ष नमस्कार किया।"

स्व-प्रभावे लोक-सबार करा विस्मय ।।पाना-नृसिंहे आइला प्रभु दया-मय ॥

६६॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु जहाँ-जहाँ जाते, वहीं उनके प्रभाव से हर व्यक्ति विस्मित हो उठता। फिर वे पाना-नृसिंह मन्दिर आये। महाप्रभु इतने दयामय हैं।

नृसिंहे प्रणति-स्तुति प्रेमावेशे कैल । प्रभुर प्रभावे लोक चमत्कार हैल ॥

६७॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रेमावेश में आकर भगवान् नृसिंह को नमस्कार किया और उनकी स्तुति की। लोग भगवान् चैतन्य के प्रभाव को देखकर चकित हो गये।"

शिव-काञ्ची आसिया कैल शिव दरशन ।।प्रभावे 'वैष्णव' कैल सब शैव-गण ॥

६८॥

शिवकांची आकर चैतन्य महाप्रभु ने शिवजी के अर्चाविग्रह का दर्शन किया। उन्होंने अपने प्रभाव से सारे शिव-भक्तों को वैष्णव बना दिया।"

विष्णु-काञ्ची आसि' देखिल लक्ष्मी-नारायण ।प्रणाम करिया कैल बहुत स्तवन ॥

६९ ॥

तत्पश्चात् महाप्रभु विष्णुकांची नामक स्थान गये, जहाँ उन्होंने लक्ष्मीनारायण के अर्चाविग्रह देखे और उन्हें प्रसन्न करने के लिए नमस्कार किया तथा अनेक स्तुतियाँ कीं।"

प्रेमावेशे नृत्य-गीत बहुत करिल ।। दिन-दुइ रहि लोके ‘कृष्ण-भक्त' कैल ॥

७० ॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु विष्णुकांची में दो दिन ठहरे, तो उन्होंने भावावेश में नृत्य और कीर्तन किया। जब सारे लोगों ने उन्हें देखा, तो वे कृष्ण-भक्त बन गये।"

त्रिमलय देखि' गेला त्रिकाल-हस्ति-स्थाने । महादेव देखि' ताँरे करिल प्रणामे ॥

७१॥

त्रिमलय देखने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु त्रिकालहस्ति देखने गये। यहीं पर उन्होंने शिवजी को देखा और उन्हें सभी प्रकार से प्रणाम किया।"

पक्षि-तीर्थ देखि' कैल शिव दरशन ।। वृद्धकोल-तीर्थे तबे करिला गमन ॥

७२॥

पक्षितीर्थ में श्री चैतन्य महाप्रभु ने शिवजी का मन्दिर देखा। तब वे वृद्धकोल तीर्थ गये।

श्वेत-वराह देखि, ताँरै नमस्करि' ।। पीताम्बर-शिव-स्थाने गेला गौरहरि ॥

७३॥

वृद्धकोल में श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान् श्वेतवराह का मन्दिर देखा। उन्हें नमस्कार करने के बाद महाप्रभु शिवजी के मन्दिर गये, जहाँ अर्चाविग्रह को पीले रंग के वस्त्र पहनाये जाते हैं।"

शियाली भैरवी देवी करि' दरशन । कावेरीर तीरे आइला शचीर नन्दन ॥

७४॥

शियाली भैरवी ( दुर्गादेवी का अन्य रूप) मन्दिर देखने के बाद शचीदेवी के पुत्र श्री चैतन्य महाप्रभु कावेरी नदी के किनारे गये।"

गो-समाजे शिव देखि' आइला वेदावन । महादेव देखि' तौरै करिला वन्दन ॥

७५ ॥

इसके बाद महाप्रभु गोसमाज नामक स्थान गये, जहाँ उन्होंने शिवमन्दिर देखा। तब वे वेदावन पहुँचे, जहाँ उन्होंने शिवजी का दूसरा अर्चाविग्रह देखा और उन्हें नमस्कार किया।"

अमृतलिङ्ग-शिव देखि' वन्दन करिल । सब शिवालये शैव वैष्णव' हइल ॥

७६ ॥

अमृतलिंग नामक शिव के अर्चाविग्रह को देखने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें नमस्कार किया। इस तरह उन्होंने शिवजी के सारे मन्दिर देखे और शिवजी के भक्तों को वैष्णव बनाये।"

देव-स्थाने आसि' कैल विष्णु दरशन । श्री-वैष्णवेर सङ्गे ताहाँ गोष्ठी अनुक्षण ॥

७७॥

देवस्थान आकर चैतन्य महाप्रभु ने भगवान् विष्णु का मन्दिर देखा और वहाँ रामानुजाचार्य की गुरु-शिष्य परम्परा के वैष्णवों से बातें कीं। ये वैष्णव श्री वैष्णव कहलाते हैं।"

कुम्भकर्ण-कपाले देखि' सरोवर । शिव-क्षेत्रे शिव देखे गौराङ्ग-सुन्दर ॥

७८ ॥

कुम्भकर्ण-कपाल आकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक विशाल सरोवर देखा और फिर शिवक्षेत्र नामक पवित्र स्थान देखा, जहाँ पर शिवजी का मन्दिर है।"

पाप-नाशने विष्णु कैल दरशन ।श्री-रङ्ग-क्षेत्रे तबे करिला गमन ॥

७९ ॥

शिवक्षेत्र नामक तीर्थ देखने के बाद चैतन्य महाप्रभु पापनाशन आये, जहाँ उन्होंने भगवान् विष्णु के मन्दिर में दर्शन किये। अन्त में वे श्रीरंगक्षेत्र पहुँचे।"

कावेरीते स्नान करि' देखि' रङ्गनाथ । स्तुति-प्रणति करि' मानिला कृतार्थ ॥

८०॥

कावेरी नदी में स्नान करके श्री चैतन्य महाप्रभु ने रंगनाथ मन्दिर देखा और वहाँ स्तुति की तथा प्रणाम किया। इस तरह उन्होंने अपने आपको कृतार्थ माना।"

प्रेमावेशे कैल बहुत गान नर्तन ।। देखि’ चमत्कार हैल सब लोकेर मन ॥

८१ ॥

रंगनाथ मन्दिर में श्री चैतन्य महाप्रभु ने भावावेश में आकर नृत्य तथा कीर्तन किया, जिसे देखकर सारे लोग आश्चर्यचकित हो गये।"

श्री-वैष्णवे एक,–'व्येङ्कट भट्ट' नाम । प्रभुरे निमन्त्रण कैल करिया सम्मान ॥

८२॥

। तब वेंकट भट्ट नामक एक वैष्णव ने श्री चैतन्य महाप्रभु को बड़े ही आदर के साथ अपने घर आमन्त्रित किया।"

निज-घरे ला कैल पाद-प्रक्षालन । सेइ जल ला कैल सवंशे भक्षण ॥

८३॥

श्री वेंकट भट्ट श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने घर ले गये। उन्होंने महाप्रभु के चरण धोये और उस जल को उनके परिवार के सारे लोगों ने पिया।"

भिक्षा कराञा किछु कैल निवेदन ।चातुर्मास्य आसि' प्रभु, हैल उपसन्न ॥

८४॥

महाप्रभु को भोजन कराने के बाद वेंकट भट्ट ने निवेदन किया कि चातुर्मास का समय आ चुका है।"

चातुर्मास्ये कृपा करि' रह मोर घरे ।।कृष्ण-कथा कहि' कृपाय उद्धार' आमारे ॥

८५॥

वेंकट भट्ट ने कहा, आप मुझ पर कृपा करें, और चातुर्मास-भर मेरे घर पर रहें। आप भगवान् कृष्ण की लीलाएँ कहकर कृपा करके मेरा उद्धार करें।"

ताँर घरे रहिला प्रभु कृष्ण-कथा-रसे ।।भट्ट-सङ्गे गोङाइल सुखे चारि मासे ॥

८६॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु वेंकट भट्ट के घर पर चार महीने तक लगातार रहे। महाप्रभु ने बड़े ही सुखपूर्वक भगवान् कृष्ण की लीलाएँ कहते हुए और दिव्य रस का आस्वादन करते हुए अपने दिन बिताये।"

कावेरीते स्नान करि' श्री-रङ्ग दर्शन ।।प्रतिदिन प्रेमावेशे करेन नर्तन ॥

८७॥

वहाँ रहते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने कावेरी नदी में स्नान किया और श्री-रंग मन्दिर देखा। महाप्रभु प्रतिदिन भावावेश में नाचते भी रहे।"

सौन्दर्यादि प्रेमावेश देखि, सर्व-लोक ।।देखिबारे आइसे, देखे, खण्डे दुःख-शोक ॥

८८॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर के सौन्दर्य तथा उनके प्रेमावेश को हर एक ने देखा। उन्हें देखने अनेक लोग आते रहते थे, और उनका दर्शन करने से ही उनका दुःख तथा शोक भाग जाता था।"

लक्ष लक्ष लोक आइल नाना-देश हैते ।। सबे कृष्ण-नाम कहे प्रभुके देखिते ॥

८९॥

विभिन्न देशों से लाखों लोग महाप्रभु का दर्शन करने आये और उन्हें देखने के बाद उन्होंने हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन किया।"

कृष्ण-नाम विना केह नाहि कहे आर।। सबे कृष्ण-भक्त हैल, लोके चमत्कार ॥

९०॥

वे केवल हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने लगे, और सबके सब भगवान् कृष्ण के भक्त बन गये। इस तरह सारी जनता आश्चर्यचकित थी।"

श्री-रङ्ग-क्षेत्रे वैसे व्रत वैष्णव-ब्राह्मण ।। एक एक दिन सबे कैल निमन्त्रण ॥

९१॥

श्री रंगक्षेत्र में रहने वाले सारे वैष्णव ब्राह्मणों ने महाप्रभु को एक एक दिन अपने अपने घरों में आमन्त्रित किया।"

एक एक दिने चातुर्मास्य पूर्ण हैल ।। कतक ब्राह्मण भिक्षा दिते ना पाइल ॥

९२॥

। यद्यपि प्रतिदिन विभिन्न ब्राह्मण महाप्रभु को आमन्त्रित करते रहते, किन्तु कुछ को भोजन कराने का अवसर नहीं मिल पाया, क्योंकि चातुर्मास्य की अवधि बीत गई।"

सेइ क्षेत्रे रहे एक वैष्णव-ब्राह्मण ।। देवालये आसि' करे गीता आवर्तन ॥

९३॥

श्री रंगक्षेत्र में एक ब्राह्मण वैष्णव नित्य मन्दिर में दर्शन करने आता , और समूची भगवद्गीता का पाठ करता था।"

अष्टादशाध्याय पड़े आनन्द-आवेशे । अशुद्ध पड़ेन, लोक करे उपहासे ॥

९४॥

। वह ब्राह्मण अत्यन्त भावावेश में भगवद्गीता के अठारहों अध्याय का पाठ करता था। किन्तु वह शुद्ध उच्चारण नहीं कर सकता था, इसलिए लोग उसका मजाक उड़ाते थे।"

केह हासे, केह निन्दे, ताहा नाहि माने ।आविष्ट हा गीता पड़े आनन्दित-मने ॥

९५ ॥

। अशुद्ध उच्चारण करने से लोग कभी उसकी आलोचना करते और उस पर हँसते थे; किन्तु वह उनकी कोई परवाह नहीं करता था। वह भगवद्गीता का पाठ करने के कारण भावाविष्ट रहता था और मन-हीमन अत्यन्त सुखी था।"

पुलकाश्रु, कम्प, स्वेद,—यावत्पठन ।। देखि' आनन्दित हैले महाप्रभुर मन ॥

९६ ॥

भगवद्गीता पढ़ते समय ब्राह्मण को दिव्य शारीरिक विकारों को अनुभव होता था। उसके रोंगटे खड़े हो जाते थे, उसकी आँखों से आँसू आते रहते थे, उसका शरीर काँपने लगता था और वह पसीना-पसीना हो जाता था। यह देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त आनन्दित होते थे।"

महाप्रभु पुछिल तारे, शुन, महाशय ।। कोनर्थ जानि' तोमार एत सुख हय ॥

९७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस ब्राह्मण से पूछा, हे महोदय, आप ऐसे भावावेश में क्यों हैं? आपको भगवद्गीता के किस अंश से ऐसा दिव्य सुख प्राप्त होता है? विप्र कहे,—मूर्ख आमि, शब्दार्थ ना जानि । शुद्धाशुद्ध गीता पड़ि, गुरु-आज्ञा मानि' ॥

९८॥

उस ब्राह्मण ने उत्तर दिया, मैं मूर्ख हूँ, अतएव मैं शब्दों का अर्थ नहीं जानता। मैं कभी भगवद्गीता का शुद्ध पाठ करता हूँ, कभी अशुद्ध, किन्तु ऐसा करके मैं अपने गुरु के आदेश का पालन कर रहा हूँ।"

अर्जुनेर रथे कृष्ण हय रज्जु-धर।। वसियाछे हाते तोत्र श्यामल सुन्दर ॥

९९ ॥

वह ब्राह्मण कहता गया, वास्तव में मैं भगवान् कृष्ण के उस चित्र को ही देखता हूँ, जिसमें वे अर्जुन के सारथी के रूप में रथ पर बैठे हैं। वे अपने हाथों में लगाम थामे हुए अत्यन्त सुन्दर तथा साँवले लगते हैं।"

अर्जुनेरे कहितेछेन हित-उपदेश ।।ताँरै देखि' हये मोर आनन्द-आवेश ॥

१०० ॥

जब मैं रथ में बैठे और अर्जुन को उपदेश देते हुए भगवान् कृष्ण के चित्र को देखता हूँ, तो मैं भावमय आनन्द से पूरित हो उठता हूँ।"

यावत्पड़ों, तावत्पाङ ताँर दरशन ।।एइ लागि' गीता-पाठ ना छाड़े मोर मन ॥

१०१॥

। जब तक मैं गीता पढ़ता हूँ, तब तक मैं भगवान् के सुन्दर स्वरूप जा ही दर्शन करता हूँ। इसी कारण से मैं भगवद्गीता पढ़ता हूँ और मेरा न उससे विचलित नहीं होता।"

प्रभु कहे,—गीता-पाठे तोमाराइ अधिकार ।तुमि से जानह एइ गीतार अर्थ-सार ॥

१०२॥

आ चैतन्य महाप्रभु ने ब्राह्मण से कहा, निस्सन्देह, भगवदगीता पढने के तुम्हीं अधिकारी हो। तुम जो कुछ जानते हो, वही भगवद्गीता का वास्तविक तात्पर्य है।"

एत बलि' सेइ विप्रे कैल आलिङ्गन । प्रभु-पद धरि' विप्र करेन रोदन ॥

१०३॥

यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस ब्राह्मण का आलिंगन किया, और वह ब्राह्मण महाप्रभु के चरणकमलों को पकड़कर रोने लगा।"

तोमा देखि' ताहा हैते द्वि-गुण सुख हय । सेइ कृष्ण तुमि, हेन मोर मने लय ॥

१०४॥

उस ब्राह्मण ने कहा, आपको देखकर मेरा सुख दुगना हो गया है। । मैं तो समझता हूँ कि आप ही वे भगवान् कृष्ण हैं।"

कृष्ण-स्फूर्ये ताँर मन हाछे निर्मल ।। अतएव प्रभुर तत्त्व जानिल सकल ॥

१०५॥

भगवान् कृष्ण के प्रकाशित होने से ब्राह्मण का मन शुद्ध हो गया, अतएव वह श्री चैतन्य महाप्रभु के तत्त्व को पूरी तरह से समझ सका।"

तबे महाप्रभु ताँरै कराइल शिक्षण ।।एइ बात्काहाँ ना करिह प्रकाशन ॥

१०६॥

तत्पश्चात् श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस ब्राह्मण को भलीभाँति शिक्षा और उससे अनुरोध किया कि वह यह बात किसी से प्रकट नहीं करे । वे साक्षात् कृष्ण हैं।"

सेइ विप्र महाप्रभुर बड़े भक्त हैल ।चारि मास प्रभु-सङ्ग कभु ना छाड़िल ॥

१०७॥

वह ब्राह्मण श्री चैतन्य महाप्रभु का महान् भक्त बन गया और चतु के चार महीनों तक लगातार उसने उनका साथ नहीं छोड़ा।"

एइ-मत भट्ट-गृहे रहे गौरचन्द्र ।।निरन्तर भट्ट-सङ्गे कृष्ण-कथानन्द ॥

१०८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु वेंकट भट्ट के घर पर रहे और निरन्तर भगवान् ण के विषय में बातें करते रहते। इस तरह वे परम आनन्दित थे।

श्री-वैष्णव' भट्ट सेवे लक्ष्मी-नारायण ।। ताँर भक्ति देखि' प्रभुर तुष्ट हैल मन ॥

१०९॥

रामानुज सम्प्रदाय का वैष्णव होने के कारण वेंकट भट्ट लक्ष्मी तथा नारायण के अर्चाविग्रह की पूजा करता था। उसकी शुद्ध भक्ति देखकर भी चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न थे।"

निरन्तर ताँर सङ्गे हैल सख्य-भाव । हास्य-परिहासे मुँहे सख्येर स्वभाव ॥

११०॥

एक दूसरे के साथ लगातार रहने से श्री चैतन्य महाप्रभु तथा वेंकट भट्ट में धीरे-धीरे मैत्रीभाव स्थापित हो गया। वे कभी मिलकर हँसते और कभी मजाक करते।"

प्रभु कहे,—भट्ट, तोमार लक्ष्मी-ठाकुराणी ।। कान्त-वक्षः-स्थिता, पतिव्रता-शिरोमणि ॥

१११॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने भट्ट से कहा, तुम्हारी आराध्य देवी लक्ष्मी सदैव नारायण के वक्षस्थल पर विराजमान रहती हैं, और वे निश्चय ही सृष्टि की सबसे अधिक पतिव्रता स्त्री हैं।"

आमार ठाकुर कृष्ण गोप, गो-चारक ।। साध्वी हा केने चाहे ताँहार सङ्गम ॥

११२॥

किन्तु मेरे स्वामी तो ग्वालबाल श्रीकृष्ण हैं, जो गायों के चराने में लगे रहते हैं। ऐसा क्यों है कि लक्ष्मी ऐसी पतिव्रता स्त्री होते हुए भी मेरे प्रभु का साथ चाहती हैं?" एइ लागि' सुख-भोग छाड़ि' चिर-काल । व्रत-नियम करि' तप करिल अपार ॥

११३॥

लक्ष्मीजी ने कृष्ण की संगति प्राप्त करने के लिए ही वैकुण्ठ लोक के सारे सुख त्याग दिये और दीर्घकाल तक व्रत-नियम का पालन करके अपार तपस्या की।"

कस्यानुभावोऽस्य न देव विद्महेतवाघ्रि-रेणु-स्परशाधिकारः ।। ग्रद्वाञ्छया श्रीलंलनाचरत्तपो ।विहाय कामान्सु-चिरं धृत-व्रता ॥

११४॥

तब चैतन्य महाप्रभु ने कहा, हे प्रभु, हम नहीं जानते कि कालिय नाग को किस तरह आपके चरणकमलों की धूलि प्राप्त करने का अवसर प्राप्त हुआ। इसके लिए तो लक्ष्मीदेवी को भी समस्त इच्छाओं को त्यागकर और व्रत करके सदियों तक तपस्या करनी पड़ी थी। निस्सन्देह, हम नहीं जानते कि किस तरह कालिय नाग को ऐसा सुअवसर मिल सका।'" भट्ट कहे, कृष्ण-नारायण–एकइ स्वरूप । कृष्णेते अधिक लीला-वैदग्ध्यादि-रूप ॥

११५॥

तब वेंकट भट्ट ने कहा, भगवान् कृष्ण तथा भगवान् नारायण एक ही रूप हैं, किन्तु कृष्ण की लीलाएँ अपने क्रीडा रस के कारण अधिक आस्वाद्य हैं।"

तार स्पर्शे नाहि ग्राय पतिव्रता-धर्म ।। कौतुके लक्ष्मी चाहेन कृष्णेर सङ्गम ॥

११६॥

। चूंकि कृष्ण तथा नारायण एक ही व्यक्ति हैं, अतएव कृष्ण के सा लक्ष्मी का संग उनके पतिव्रता धर्म को भंग नहीं करता। प्रत्युत यह तो अत्यन्त आनन्द की बात थी कि लक्ष्मीजी ने भगवान् कृष्ण का साया करना चाहा।"

सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि श्रीश-कृष्ण-स्वरूपयोः ।।रसेनोत्कृष्यते कृष्ण-रूपमेषा रस-स्थितिः ॥

११७॥

वेंकट भट्ट ने आगे कहा, दिव्य अनुभूति के अनुसार नारायण तथा कृष्ण के स्वरूपों में कोई अन्तर नहीं है। किन्तु कृष्ण में माधुर्य रस के कारण विशेष दिव्य आकर्षण है, अतएव वे नारायण से बढ़कर हैं। यह दिव्य रसों का निर्णय है।"

कृष्ण-सङ्गे पतिव्रता-धर्म नहे नाश । अधिक लाभ पाइये, आर रास-विलास ॥

११८॥

लक्ष्मीजी ने विचार किया कि उनका पतिव्रता धर्म कृष्ण के साथ उनका सम्बन्ध होने से नष्ट नहीं होगा। प्रत्युत कृष्ण की संगति करने से वे रासनृत्य के लाभ का आस्वादन कर सकेंगी।"

विनोदिनी लक्ष्मीर हय कृष्णे अभिलाष । इहाते कि दोष, केने कर परिहास ॥

११९॥

। वेंकट भट्ट ने आगे बतलाया, माता लक्ष्मी दिव्य आनन्द की भोक्ता भी हैं, अतएव यदि उन्होंने कृष्ण के साथ भोग करना चाहा, तो इसमें कौन-सा दोष है? आप इसका मजाक क्यों उड़ा रहे हैं?" प्रभु कहे,—दोष नाहि, इहा आमि जानि ।। रास ना पाइल लक्ष्मी, शास्त्रे इहा शुनि ॥

१२०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, मुझे पता है कि लक्ष्मीजी में कोई दोष नहीं है, फिर भी वे रासनृत्य में प्रविष्ट नहीं हो पाईं। प्रामाणिक शास्त्रों से हम ऐसा सुनते हैं।"

नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्त-रतेः प्रसादःस्वप्नषितां नलिन-गन्ध-रुचां कुतोऽन्याः । रासोत्सवेऽस्य भुज-दण्ड-गृहीत-कण्ठलब्धाशिषां ग्र उदगाद्व्रज-सुन्दरीणाम् ॥

१२१॥

जब भगवान् श्रीकृष्ण रासलीला में गोपियों के साथ नृत्य कर रहे थे, तब उन्होंने गोपियों को अपनी बाहों में भरकर उनका आलिंगन किया। यह दिव्य कृपा लक्ष्मी या वैकुण्ठ की अन्य प्रेयसियों को प्राप्त नहीं हो पाई। न ही स्वर्गलोक की सर्वश्रेष्ठ सुन्दरियों ने, जिनकी शारीरिक कान्ति तथा सुगन्ध कमल-पुष्प जैसी होती हैं, कभी इसकी कल्पना की। तो भला संसारी स्त्रियों के विषय में क्या कहा जाए, चाहे वे भौतिक अनुमान से कितनी ही सुन्दर क्यों न हों?' ।"

लक्ष्मी केने ना पाइल, इहार कि कारण ।।तप करि' कैछे कृष्ण पाइल श्रुति--गण ॥

१२२॥

किन्तु क्या आप मुझे बता सकेंगे कि लक्ष्मी रासनृत्य में क्यों प्रवेश नहीं पा सकीं? वैदिक ज्ञान के अधिकारी नृत्य में प्रवेश करके कृष्ण का सान्निध्य प्राप्त कर सके।"

निभृत-मरुन्मनोऽक्ष-दृढ़-ग्रोग-मुजो हृदि ग्रन्मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः स्मरणात् ।। स्त्रिय उरगेन्द्र-भोग-भुज-दण्ड-विषक्त-धियोवयमपि ते समाः समदृशोऽङ्घि-सरोज-सुधीः ॥

१२३ ॥

बड़े बड़े ऋषि योगाभ्यास तथा श्वास-नियन्त्रण द्वारा मन तथा इन्द्रियों को जीतते हैं। इस तरह योग में रत रहकर तथा अपने हृदयों में परमात्मा का दर्शन करते हुए वे निर्विशेष ब्रह्म में प्रवेश करते हैं। किन्तु भगवान् के शत्रु भी मात्र उनके बारे में सोचने के द्वारा वही पद प्राप्त करते हैं। किन्तु कृष्ण के सौन्दर्य से आकृष्ट होकर व्रज की गोपियाँ कृष्ण तथा उनकी सर्प जैसी भुजाओं का आलिंगन चाहती हैं। गोपियों को अन्ततः भगवान् के चरणकमलों का अमृत आस्वादन करने को मिला। इसी प्रकार हम उपनिषद् भी गोपियों के चरणचिह्नों का अनुगमन करते हुए भगवान् के चरणकमलों का अमृत आस्वादन सकते हैं।"

श्रुति पाय, लक्ष्मी ना पाय, इथे कि कारण ।। भट्ट कहे,——इहा प्रवेशिते नारे मोर मन ॥

१२४॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा यह पूछे जाने पर कि रासनृत्य में लक्ष्मी क्यों प्रवेश नहीं कर पाईं, जबकि वैदिक ज्ञान के अधिकारी कर पाये, तब वेंकट भट्ट ने उत्तर दिया, मैं इस बर्ताव के रहस्य में प्रवेश नहीं कर सकता।"

आमि जीव,—क्षुद्र-बुद्धि, सहजे अस्थिर ।ईश्वरेर लीला—कोटि-समुद्र-गम्भीर ॥

१२५ ।।। वेंकट भट्ट ने तब स्वीकार किया, मैं एक सामान्य मनुष्य हूँ। मेरी बुद्धि अत्यन्त सीमित है और मैं सरलता से विचलित हो जाता हूँ, अतएव मेरा मन भगवान् की लीलाओं के अगाध समुद्र में प्रवेश नहीं कर पाता।"

तुमि साक्षात्सेइ कृष्ण, जान निज-कर्म ।यारे जानाह, सेइ जाने तोमार लीला-मर्म ॥

१२६॥

आप साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण हैं। आप ही अपने कार्यों के प्रयोजन को समझते हैं, या फिर जिसे आप यह ज्ञान प्रदान करें, वह भी आपकी लीलाओं को समझ सकता है।

प्रभु कहे,---कृष्णेर एक स्वभाव विलक्षण । स्व-माधुर्ये सर्व चित्त करे आकर्षण ॥

१२७॥

महाप्रभु ने कहा, भगवान् कृष्ण का एक विशिष्ट स्वभाव है। वे अपने माधुर्य रस द्वारा हर एक के चित्त को आकर्षित कर लेते हैं।

व्रज-लोकेर भावे पाइये ताँहार चरण । तौरे ईश्वर करि' नाहि जाने व्रज-जन ॥

१२८॥

व्रजलोक या गोलोक वृन्दावन के निवासियों के चरण चिह्नों का अनुसरण करके मनुष्य भगवान् श्रीकृष्ण के चरणकमलों का आश्रय प्राप्त सकता है। किन्तु उस लोक के निवासी जानते नहीं हैं कि कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।"

केह ताँरे पुत्र-ज्ञाने उदुखले बान्धे ।। केह सखा-ज्ञाने जिनि' चड़े ताँर कान्धे ॥

१२९॥

। वहाँ कोई उन्हें पुत्र के रूप में स्वीकार करके कभी-कभी उन्हें ओखली से बाँध देता है। कोई उन्हें अपना अन्तरंग सखा मानकर, उन पर विजय पाकर उनके कन्धों पर चढ़ जाता है।

‘व्रजेन्द्र-नन्दन' बलि' ताँरे जाने व्रज-जन । ऐश्वर्य-ज्ञाने नाहि कोन सम्बन्ध-मानन ॥

१३०॥

व्रजभूमि के निवासी कृष्ण को व्रजभूमि के राजा महाराज नन्द के पुत्ररूप में जानते हैं, और वे मानते हैं कि ऐश्वर्य-रस में भगवान् के साथ कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता।

व्रज-लोकेर भावे ग्रेड करये भजन । सेइ जन पाय व्रजे व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

१३१॥

। जो व्यक्ति व्रजभूमि के निवासियों के चरणचिह्नों का अनुसरण करता है, वह भगवान् को व्रज के दिव्यलोक में प्राप्त करता है। वहाँ पर वे महाराज नन्द के पुत्र के रूप में विख्यात हैं।

नायं सुखापो भगवान्देहिनां गोपिका-सुतः ।।ज्ञानिनां चात्म-भूतानां ग्रथा भक्ति-मतामिह ॥

१३२॥

तब चैतन्य महाप्रभु ने प्रमाण दिया, यशोदा-पुत्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण उन भक्तों को सुलभ हैं, जो रागानुगा भक्ति में लगे हैं, किन्तु वे ज्ञानियों, तपस्या में रत आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रयत्न करने वालों या आत्मा और शरीर को एक मानने वालों को सहज सुलभ नहीं श्रुति--गण गोपी-गणेर अनुगत हा ।।व्रजेश्वरी-सुत भजे गोपी-भाव जा ॥

१३३॥

। वैदिक साहित्य के अधिकारियों ने, जो श्रुतिगण कहलाते हैं, गोपीभाव में कृष्ण की पूजा की और उनके चरणचिह्नों का अनुसरण किया।

बाह्यान्तरे गोपी-देह व्रजे ग्रबे पाइल ।। सेइ देहे कृष्ण-सङ्गे रास-क्रीड़ा कैल ॥

१३४॥

। वैदिक स्तोत्रों के साकार अधिकारियों ने गोपियों जैसा शरीर प्राप्त किया और व्रजभूमि में जन्म लिया। तब उन शरीरों में उन्हें भगवान् की रासलीला नृत्य में प्रविष्ट होने दिया गया।

गोप-जाति कृष्ण, गोपी प्रेयसी ताँहार । देवी वा अन्य स्त्री कृष्ण ना करे अङ्गीकार ॥

१३५॥

भगवान् कृष्ण गोप जाति के हैं, और गोपियाँ कृष्ण की सर्वप्रिय प्रेमिकाएँ हैं। यद्यपि स्वर्गलोक के निवासियों की पत्नियाँ भौतिक जगत् में सर्वाधिक ऐश्वर्यवान हैं, किन्तु न तो वे, न भौतिक जगत् की अन्य स्त्रियाँ, कृष्ण का सान्निध्य प्राप्त कर सकती हैं।

लक्ष्मी चाहे सेइ देहे कृष्णेर सङ्गम ।। गोपिका-अनुगा हा ना कैल भजन ॥

१३६॥

। लक्ष्मीजी कृष्ण के साथ भोग करना चाहती थीं, किन्तु साथ ही साथ लक्ष्मी के रूप में अपना आध्यात्मिक शरीर बनाये रखना चाहती थीं। किन्तु उन्होंने कृष्ण की पूजा करने में गोपियों के पदचिह्नों का अनुसरण नहीं किया।

अन्य देहे ना पाइये रास-विलास ।। अतएव नायं' श्लोक कहे वेद-व्यास ॥

१३७॥

वैदिक साहित्य के सर्वोपरि अधिकारी व्यासदेव ने नायं सुखापो भगवान् से प्रारम्भ होने वाले श्लोक की रचना की, क्योंकि गोपियों के शरीर के अतिरिक्त अन्य कोई शरीर में व्यक्ति रासलीला नृत्य में प्रवेश नहीं कर सकता।

पूर्वे भट्टेर मने एक छिल अभिमान ।। श्री-नारायण' हयेन स्वयं-भगवान् ॥

१३८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा की गई इस विवेचना के पूर्व वेंकट भट्ट मानते थे कि श्री नारायण ही पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।

ताँहार भजन सर्वोपरि-कक्षा हय । श्री-वैष्णवे'र भजन एई सर्वोपरि हय ॥

१३९॥

इस प्रकार सोचते हुए वेंकट भट्ट का विश्वास था कि नारायण की पूजा ही सर्वोपरि पूजा है-भक्ति की अन्य सभी विधियों से सर्वोपरि है, क्योंकि इसका अनुसरण रामानुजाचार्य के श्री वैष्णव शिष्य करते थे।

एइ ताँर गर्व प्रभु करिते खण्डन ।।परिहास-द्वारे उठाय एतेक वचन ॥

१४०॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु वेंकट भट्ट की इस भ्रान्ति को समझ गये थे, और इसे सुधारने के उद्देश्य से ही महाप्रभु इस प्रकार परिहास में इतना बोल रहे।

प्रभु कहे,–भट्ट, तुमि ना करिह संशय ।‘स्वयं-भगवान् कृष्ण एइ त निश्चय ॥

१४१॥

तब महाप्रभु ने कहा, हे वेंकट भट्ट, अब अधिक संशय मत करो। कृष्ण ही स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, और यही वैदिक साहित्य का निर्णय है।

कृष्णेर विलास-मूर्ति–श्री-नारायण ।।अतएव लक्ष्मी-आद्येर हरे तेंह मन ॥

१४२ ॥

कृष्ण का ऐश्वर्यशाली रूप, भगवान् नारायण, लक्ष्मी तथा उनकी सखियों के मन को आकृष्ट करता है।

एते चांश-कलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम् ।इन्द्रारि-व्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे ॥

१४३॥

ईश्वर के ये सारे अवतार, पुरुषावतार के अंश या कला हैं। किन्तु कृष्ण साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। जब-जब इन्द्र के शत्रुओं द्वारा यह जगत् व्याकुल होता है, तब-तब हर युग में वे अपने विभिन्न स्वरूपों द्वारा संसार की रक्षा करते हैं।'

नारायण हैते कृष्णेर असाधारण गुण ।।अतएव लक्ष्मीर कृष्णे तृष्णा अनुक्षण ॥

१४४॥

चूंकि कृष्ण में ऐसे चार असाधारण गुण हैं, जो नारायण में नहीं हैं, अतएव लक्ष्मीजी सदैव उनका संग चाहती हैं।

तुमि से पड़िला श्लोक, से हय प्रमाण ।।सेइ श्लोके आइसे 'कृष्ण—स्वयं भगवान्' ॥

१४५ ॥

तुमने सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि से आरम्भ होने वाला श्लोक सुनाया है। यह श्लोक ही साक्षी है कि कृष्ण स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।

सिद्धान्ततस्त्वभेदेऽपि श्रीश-कृष्ण-स्वरूपयोः ।।रसेनोत्कृष्यते कृष्ण-रूपमेषा रस-स्थितिः ॥

१४६॥

दिव्य अनुभूति के अनुसार कृष्ण तथा नारायण के रूपों में कोई अन्तर नहीं है। फिर भी माधुर्य रस के कारण कृष्ण में विशिष्ट दिव्य आकर्षण है। फलतः वे नारायण से बढ़कर हैं। यह दिव्य रसों का निष्कर्ष है।

स्वयं भगवान् कृष्ण हरे लक्ष्मीर मन ।।गोपिकार मन हरिते नारे 'नारायण' ॥

१४७॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण लक्ष्मी के मन को आकृष्ट करते हैं, किन्तु भगवान् नारायण गोपियों के मन को आकृष्ट नहीं कर पाते। इससे कृष्ण की सर्वोत्कृष्टता सिद्ध होती है।

नारायणेर का कथा, श्री-कृष्ण आपने । गोपिकारे हास्य कराइते हुयनारायणे' ॥

१४८ ॥

भगवान् नारायण के विषय में क्या कहा जाये, गोपियों के साथ मजाक उड़ाने के लिए भगवान् कृष्ण स्वयं नारायण के रूप में प्रकट हुए।

‘चतुर्भुज-मूर्ति' देखाय गोपी-गणेर आगे ।।सेइ ‘कृष्णे' गोपिकार नहे अनुरागे ॥

१४९।। यद्यपि कृष्ण ने नारायण का चतुर्भुज स्वरूप धारण कर लिया, किन्तु वे गोपिकाओं की प्रेमदृष्टि को आकृष्ट नहीं कर सके।

गोपीनां पशुपेन्द्र-नन्दन-जुषो भावस्य कस्तां कृतीविज्ञातुं क्षमते दुरूह-पदवी-सञ्चारिणः प्रक्रियाम् । आविष्कुर्वति वैष्णवीमपि तनुं तस्मिन्भुजैर्जिष्णुभिर् ग्रासां हन्त चतुर्भिरद्भुत-रुचिं रागोदयः कुञ्चति ॥

१५०॥

एक बार भगवान् कृष्ण ने चतुर्भुजी नारायण का अत्यन्त सुन्दर स्वरूप धारण किया। किन्तु जब गोपियों ने उनके इस भव्य स्वरूप को देखा, तो उनके भाव कुंठित हो गये। इसलिए विद्वान व्यक्ति भी गोपियों के ऊर्मिमय भावों को नहीं समझ सकता, क्योंकि वे नन्द महाराज के पुत्र कृष्ण के आदि स्वरूप पर पूरी तरह स्थिर हैं। कृष्ण के साथ गोपियों का परम रस आध्यात्मिक जीवन का सबसे बड़ा रहस्य है।

एत कहि' प्रभु ताँर गर्व चूर्ण करिया ।।ताँरै सुख दिते कहे सिद्धान्त फिराइया ॥

१५१।। । इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने वेंकट भट्ट के गर्व को चूर्ण कर दिया, किन्तु उन्हें पुनः प्रसन्न करने के उद्देश्य से वे इस प्रकार बोले।

दुःख ना भाविह, भट्ट, कैलँ परिहास ।। शास्त्र-सिद्धान्त शुन, झाते वैष्णव-विश्वास ॥

१५२॥

महाप्रभु ने वेंकट भट्ट को यह कहकर सान्त्वना दी, 'वास्तव में मैंने जो कुछ कहा, वह परिहास था। अब तुम मुझसे शास्त्रों का निष्कर्ष सुन सकते हो, जिसमें हर वैष्णव भक्त का दृढ़ विश्वास होता है।

कृष्ण-नारायण, ग्रैछे एक स्वरूप ।।गोपी-लक्ष्मी-भेद नाहि हय एक-रूप ॥

१५३॥

भगवान् कृष्ण तथा भगवान् नारायण में कोई भेद नहीं है, क्योंकि दोनों एकरूप हैं। इसी प्रकार गोपियों तथा लक्ष्मी में कोई अन्तर नहीं है, क्योंकि वे भी एकरूप हैं।

गोपी-द्वारे लक्ष्मी करे कृष्ण-सङ्गास्वाद ।।ईश्वरत्वे भेद मानिले हय अपराध ॥

१५४॥

लक्ष्मीजी गोपियों के माध्यम से कृष्ण संग का आस्वादन करती हैं। हमें चाहिए कि भगवान् के स्वरूपों में भेदभाव न बरतें, क्योंकि ऐसा करना अपराध है।

एक ईश्वर–भक्तेर ध्यान-अनुरूप । एकइ विग्रहे करे नानाकार रूप ॥

१५५॥

। भगवान् के दिव्य रूपों में कोई अन्तर नहीं होता। विभिन्न भक्तों की विभिन्न अनुरक्तियों के कारण विभिन्न रूप प्रकट होते हैं। वास्तव में भगवान् एक हैं, लेकिन वे अपने भक्तों को सन्तुष्ट करने के लिए विविध रूपों में प्रकट होते हैं।

। मणिग्रंथा विभागेन नील-पीतादिभिर्युतः ।।रूप-भेदमवाप्नोति ध्यान-भेदात्तथाच्युतः ॥

१५६॥

जब वैदूर्य मणि अन्य वस्तुओं का स्पर्श करता है, तो यह विभिन्न रंगों में विभक्त होता प्रतीत होता है, फलतः उसके रूप भी भिन्न लगने लगते हैं। इसी प्रकार भक्त के ध्यान-भाव के अनुसार अच्युत भगवान् एक होते हुए भी विभिन्न रूपों में प्रकट होते हैं।

भट्ट कहे,—काहाँ आमि जीव पामर ।।काहाँ तुमि सेइ कृष्ण,—साक्षातीश्वर ॥

१५७ ॥

तब वेंकट भट्ट ने कहा, मैं सामान्य पतित जीव हूँ, किन्तु आप तो साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण हैं।

अगाध ईश्वर-लीला किछुइ ना जानि ।।तुमि ग्रेइ कह, सेइ सत्य करि' मानि ॥

१५८ ॥

भगवान् की लीलाएँ अगाध हैं और मैं उनके विषय में कुछ भी नहीं जानता। आप जो भी कहते हैं मैं उन्हें ही सत्य के रूप में स्वीकार करता मोरे पूर्ण कृपा कैल लक्ष्मी-नारायण ।।ताँर कृपाय पाइनु तोमार चरण-दरशन ॥

१५९ ॥

मैं लक्ष्मी-नारायण की सेवा में लगा हुआ था और उन्हीं की कृपा में आपके चरणकमलों का दर्शन कर सका हूँ।।

कृपा करि' कहिले मोरे कृष्णेर महिमा ।। याँर रूप-गुणैश्वर्येर केह ना पाय सीमा ॥

१६०॥

अपनी अहैतुकी कृपा से आपने मुझे भगवान् कृष्ण की महिमा बतलाई। भगवान् के ऐश्वर्य, गुण तथा रूप का कोई भी अन्त नहीं पा सकता।

एबे से जानिनु कृष्ण-भक्ति सर्वोपरि ।। कृतार्थ करिले, मोरे कहिले कृपा करि' ॥

१६१॥

अब मैं समझ सका हूँ कि भगवान् कृष्ण की भक्ति ही सर्वोपरि पूजा है। आपने अहैतुकी कृपा करते हुए तथ्यों की व्याख्या करके ही मेरे जीवन को कृतार्थ कर दिया।

एत बलि' भट्ट पड़िला प्रभुर चरणे । कृपा करि' प्रभु ताँरै कैला आलिङ्गने ॥

१६२॥

यह कहकर वेंकट भट्ट महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़े और महाप्रभु ने अपनी अहैतुकी कृपा करते हुए उनका आलिंगन किया।

चातुर्मास्य पूर्ण हैल, भट्ट-आज्ञा लञा ।।दक्षिण चलिला प्रभु श्री-रङ्ग देखिया ॥

१६३॥

जब चातुर्मास्य का काल व्यतीत हो गया, तब पर श्री चैतन्य महाप्रभु। ने प्रस्थान करने के लिए वेंकट भट्ट से अनुमति माँगी, और श्रीरंग का दर्शन करने के बाद वे दक्षिण भारत की ओर आगे बढ़ गये।

सङ्क्ते चलिला भट्ट, ना ग्राय भवने ।ताँरै विदाय दिला प्रभु अनेक ग्रतने ॥

१६४॥

वेंकट भट्ट घर लौटना नहीं चाहते थे, किन्तु उनके साथ जाना चाह रहे थे। श्री चैतन्य महाप्रभु ने बड़े ही प्रयत्न से उन्हें विदा किया।

प्रभुर वियोगे भट्ट हैल अचेतन ।एइ रङ्ग-लीला करे शचीर नन्दन ॥

१६५ ॥

। महाप्रभु के चले जाने पर वेंकट भट्ट बेहोश होकर गिर पड़े। श्रीरंगक्षेत्र में शचीपुत्र श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ ऐसी थीं।

ऋषभ-पर्वते चलि' आइला गौरहरि ।।नारायण देखिला ताँहा नति-स्तुति करि' ॥

१६६।। महाप्रभु ने ऋषभ पर्वत पहुँचकर भगवान् नारायण का मन्दिर देखा। और नमस्कार किया। साथ ही विविध स्तुतियाँ कीं।

परमानन्द-पुरी ताहाँ रहे चतुर्मास ।। शुनि' महाप्रभु गेला पुरी-गोसाजिर पाश ॥

१६७॥

। परमानन्द पुरी चतुर्मास में इसी ऋषभ पर्वत में रह रहे थे और जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह सुना, तो वे तुरन्त उन्हें मिलने गये।

पुरी-गोसाजिर प्रभु कैले चरण वन्दन ।। प्रेमे पुरी गोसाजि ताँरे कैल आलिङ्गन ॥

१६८॥

परमानन्द पुरी से मिलने पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनका पाद-स्पर्श । करके सम्मान किया और परमानन्द पुरी ने प्रेमवश महाप्रभु का आलिंगन किया।

तिन-दिन प्रेमे दोंहे कृष्ण-कथा-रङ्गे। सेइ विप्र-घरे दोहे रहे एक-सङ्गे ॥

१६९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु परमानन्द पुरी के साथ उसी ब्राह्मण के घर रुके, जहाँ परमानन्द पुरी रह रहे थे। दोनों ने कृष्ण-कथा की चर्चा में तीन दिन बिताये।

पुरी-गोसाजि बले,—आमि झाब पुरुषोत्तमे ।। पुरुषोत्तम देखि' गौड़े ग्राब गङ्गा-स्नाने ॥

१७०॥

परमानन्द पुरी ने श्री चैतन्य महाप्रभु को बतलाया कि वे जगन्नाथ पुरी स्थित पुरुषोत्तम का दर्शन करने जा रहे हैं। वहाँ भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करने के बाद वे गंगास्नान करने बंगाल जायेंगे।

प्रभु कहे, तुमि पुनः आइस नीलाचले । आमि सेतुबन्ध हैते आसिब अल्प-काले ॥

१७१॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनसे कहा, कृपा करके जगन्नाथ पुरी फिर । आयें, क्योंकि मैं शीघ्र ही रामेश्वर (सेतुबन्ध) से वहाँ लौट आऊँगा।

तोमार निकटे रहि, हेन वाञ्छा हय ।।नीलाचले आसिबे मोरे हा सदय ॥

१७२ ॥

मेरी इच्छा है कि आपके साथ रहूँ, अतएव यदि आप जगन्नाथ पुरी वापस आ सकें, तो यह मेरे ऊपर महान् कृपा होगी।

एत बलि' ताँर ठाञि एइ आज्ञा लञा ।।दक्षिणे चलिला प्रभु हरषित हा ॥

१७३॥

परमानन्द पुरी से इस तरह बातें करके महाप्रभु ने उनसे प्रस्थान करने की आज्ञा माँगी और अत्यन्त प्रसन्न चित्त से दक्षिण भारत के लिए रवाना हो गये।

परमानन्द पुरी तबे चलिला नीलाचले ।महाप्रभु चलि चलि आइला श्री-शैले ॥

१७४॥

इस तरह परमानन्द पुरी जगन्नाथ पुरी चले गये, और श्री चैतन्य महाप्रभु श्री शैल की ओर चल पड़े।

शिव-दुर्गा रहे ताहाँ ब्राह्मणेर वेशे । महाप्रभु देखि' दोंहार हुइल उल्लासे ॥

१७५ ॥

इसी श्री शैल पर शिवजी तथा उनकी पत्नी दुर्गा ब्राह्मण-वेश में रहते थे, और जब उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु को देखा तो अत्यन्त प्रसन्न हुए।

तिन दिन भिक्षा दिल करि' निमन्त्रण ।।निभृते वसि' गुप्त-वार्ता कहे दुइ जन ॥

१७६॥

ब्राह्मण वेशधारी शिवजी ने श्री चैतन्य महाप्रभु को भिक्षा दी, और एकान्त में तीन दिन बिताने का आमन्त्रण दिया। दोनों वहाँ पर साथ बैठकर गुप्त बातें करते रहे।

ताँर सङ्गे महाप्रभु करि इष्टगोष्ठी ।।ताँर आज्ञा लबा आइला पुरी कामकोष्ठी ॥

१७७॥

शिवजी से वार्तालाप करने के बाद महाप्रभु ने उनसे विदा ली और कामकोष्ठी-पुरी गये।।

दक्षिण-मथुरा आइला कामकोष्ठी हैते ।।ताहाँ देखा हैल एक ब्राह्मण-सहिते ॥

१७८॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु कामकोष्ठी से दक्षिण-मथुरा पहुँचे, तो वहाँ उनकी भेंट एक ब्राह्मण से हुई।

सेइ विप्र महाप्रभुके कैल निमन्त्रण ।।राम-भक्त सेइ विप्र-विरक्त महाजन ॥

१७९॥

उस ब्राह्मण ने महाप्रभु को अपने घर आमन्त्रित किया। यह ब्राह्मण महान् भक्त था और श्री रामचन्द्र भगवान् के बारे में विशेषज्ञ अधिकारी था। वह भौतिक कार्यकलापों से सदा विरक्त रहता था।

कृतमालाय स्नान करि' आइला ताँर घरे ।भिक्षा कि दिबेन विप्र,----पाक नाहि करे ।। १८०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु कृतमाला नदी में स्नान करके उस ब्राह्मण के घर भोजन करने गये, किन्तु उन्होंने देखा कि भोजन तैयार नहीं था-अभी ब्राह्मण ने उसे पकाया नहीं था।

महाप्रभु कहे तौरे,—शुन महाशय ।।मध्याह्न हैल, केने पाक नाहि हय ॥

१८१॥

। यह देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, “हे महाशय, मुझे बतायें कि आपने भोजन क्यों नहीं पकाया है। अब तो दोपहर हो चुकी है।

विप्र कहे,—प्रभु, मोर अरण्ये वसति ।।पाकेर सामग्री वने ना मिले सम्प्रति ॥

१८२॥

ब्राह्मण ने उत्तर दिया, हे प्रभु, हम वन में रहते हैं। इस समय हमें भोजन की सारी सामग्री वन में प्राप्त नहीं हो सकती।

वन्य शाक-फल-मूल आनिबे लक्ष्मण ।। तबे सीता करिबेन पाक-प्रयोजन ॥

१८३॥

जब लक्ष्मण जंगल से शाक-सब्जियाँ, फल तथा कन्दमूल लायेंगे, तब सीताजी भोजन पकाने का प्रबन्ध करेंगी।

ताँर उपासना शुनि' प्रभु तुष्ट हैला ।। आस्ते-व्यस्ते सेइ विप्र रन्धन करिला ॥

१८४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु उस ब्राह्मण की पूजा-विधि सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। अन्त में ब्राह्मण ने त्वरित भोजन पकाने की व्यवस्था की।

प्रभु भिक्षा कैल दिनेर तृतीय-प्रहरे ।। निर्विण्ण सेइ विप्र उपवास करे ॥

१८५ ।।। श्री चैतन्य महाप्रभु ने तीन बजे के लगभग दोपहर का भोजन किया। किन्तु दुःखी होने के कारण वह ब्राह्मण उपवास पर रह गया।

प्रभु कहे,—विप्र काँहे कर उपवास ।केने एत दुःख, केने करह हुताश ॥

१८६॥

ब्राह्मण को उपवास किए देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उससे पूछा, 'आप उपवास क्यों कर रहे हैं? आप दुःखी क्यों हैं? आप इतने चिन्तित क्यों हैं?' विप्र कहे,—जीवने मोर नाहि प्रयोजन ।अग्नि-जले प्रवेशिया छाड़िब जीवन ॥

१८७॥

। ब्राह्मण ने उत्तर दिया, मेरे जीने का कोई प्रयोजन नहीं है। मैं या तो अग्नि में या जल में प्रवेश करके अपने प्राण त्याग दूंगा।

जगन्माता महा-लक्ष्मी सीता-ठाकुराणी ।।राक्षसे स्पर्शिल ताँरे,—इहा काने शुनि ॥

१८८॥

। हे महाशय, सीताजी जगज्जननी और महालक्ष्मी हैं। उनका स्पर्श राक्षस रावण ने किया है और मैं यह समाचार सुनकर अत्यन्त क्षुब्ध हूँ।

ए शरीर धरिबारे कभु ना ग्रुयाय ।।एइ दुःखे ज्वले देह, प्राण नाहि ग्राय ॥

१८९॥

हे महाशय, इस दुःख के कारण अब मैं जीवित नहीं रह सकता। यद्यपि मेरा शरीर जल रहा है, किन्तु प्राण निकल नहीं रहे।

प्रभु कहे,—ए भावना ना करिह आर।।पण्डित हा केने ना करह विचार ॥

१९०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, आप अब इस तरह न सोचें। आप तो विद्वान पंडित हैं। आप इस समस्या पर विचार क्यों नहीं करते? ईश्वर-प्रेयसी सीता–चिदानन्द-मूर्ति ।प्राकृत-इन्द्रियेर ताँरै देखिते नाहि शक्ति ॥

१९१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु कहते रहे, “भगवान् रामचन्द्र की प्रियतमा सीतादेवी का रूप निश्चय ही आनन्दमय एवं आध्यात्मिक है। उन्हें कोई भी व्यक्ति अपनी भौतिक आँखों से नहीं देख सकता, क्योंकि किसी भी भौतिक प्राणी में वह शक्ति नहीं है।

स्पर्शिबार कार्य आछुक, ना पाय दर्शन ।।सीतार आकृति-माया हरिल रावण ॥

१९२॥

। माता सीता को स्पर्श करने की तो बात ही दूर रही, भौतिक इन्द्रिय वाला व्यक्ति उन्हें देख तक नहीं सकता। रावण ने तो उनके भौतिक मायारूप का ही हरण किया था।

रावण आसितेइ सीता अन्तर्धान कैल।। रावणेर आगे माया-सीता पाठाइल ॥

१९३॥

ज्योंही रावण सीताजी के सम्मुख आया, वे अप्रकट हो गईं। उन्होंने रावण को धोखा देने के लिए ही अपना मायारूप भेजा।

अप्राकृत वस्तु नहे प्राकृत-गोचर ।। वेद-पुराणेते एइ कहे निरन्तर ॥

१९४॥

। आध्यात्मिक वस्तु कभी-भी भौतिक अनुभूति के सीमा-क्षेत्र में नहीं रहती। यही वेदों और पुराणों का निर्णय है।

विश्वास करह तुमि आमार वचने । पुनरपि कु-भावना ना करिह मने ॥

१९५॥

तत्पश्चात् श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस ब्राह्मण को आश्वस्त किया, “मेरे वचनों में विश्वास रखें, और अपने मन को इस कुंभावना से बोझिल मत करें।

प्रभुर वचने विप्रेर हद्दल विश्वास । भोजन करिल, हैल जीवनेर आश ॥

१९६॥

यद्यपि वह ब्राह्मण उपवास कर रहा था, किन्तु उसे श्री चैतन्य महाप्रभु के शब्दों पर विश्वास था, अतएव उसने भोजन ग्रहण किया और इस तरह उसकी जान बच गई।

ताँरे आश्वासियो प्रभु करिला गमन ।।कृतमालाय स्नान करि आइला दुर्वशन ॥

१९७॥

। ब्राह्मण को आश्वासन देने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु दक्षिण भारत में और आगे बढ़ते गये और अन्त में दुर्वशन पहुँचे, जहाँ उन्होंने कृतमाला नदी में स्नान किया।

दुर्वशने रघुनाथे कैल दरशन ।। महेन्द्र-शैले परशुरामेर कैल वन्दन ॥

१९८॥

। दुर्वशन में श्री चैतन्य महाप्रभु ने भगवान् रामचन्द्र के मन्दिर का दर्शन किया। इसी तरह महेन्द्र-शैल नामक पर्वत पर उन्होंने भगवान् परशुराम के दर्शन किये।

सेतुबन्धे आसि' कैल धनुस्तीर्थे स्नान ।। रामेश्वर देखि' ताहाँ करिल विश्राम ॥

१९९॥

तत्पश्चात् श्री चैतन्य महाप्रभु सेतुबन्ध (रामेश्वर) गये, जहाँ उन्होंने धनुस्तीर्थ नामक स्थान पर स्नान किया। वहाँ से वे रामेश्वर मन्दिर देखने गये और तब विश्राम किया।

विप्र-सभाय शुने ताँहा कूर्म-पुराण ।तार मध्ये आइला पतिव्रता-उपाख्यान ॥

२०० ॥

वहाँ पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने ब्राह्मणों के संग में कूर्म-पुराण सुना, जिसमें पतिव्रता स्त्री की कथा का आख्यान है।

पतिव्रता-शिरोमणि जनकनन्दिनी ।। जगतेर माता सीता–रामेर गृहिणी ॥

२०१॥

श्रीमती सीतादेवी तीनों लोकों की माता तथा भगवान् रामचन्द्र की पत्नी हैं। वे पतिव्रता स्त्रियों में सर्वोच्च हैं और राजा जनक की पुत्री हैं।

रावण देखिया सीता लैल अग्निर शरण । रावण हैते अग्नि कैल सीताके आवरण ॥

२०२॥

जब रावण माता सीता का हरण करने आया और उन्होंने उसे देखा तो उन्होंने अग्नि-देवता की शरण ग्रहण कर ली। अग्निदेव ने माता सीता के शरीर को ढक लिया और इस तरह रावण से उनकी रक्षा हो सकी।

‘माया-सीता' रावण निल, शुनिला आख्याने ।। शुनि' महाप्रभु हैल आनन्दित मने ॥

२०३॥

। कूर्म-पुराण में यह सुनकर कि किस तरह रावण ने माता सीता के माया रूप का हरण किया, श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त आनन्दित हुए।

सीता लञा राखिलेन पार्वतीर स्थाने । ‘माया-सीता' दिया अग्नि वञ्चिला रावणे ॥

२०४॥

। अग्नि-देव वास्तविक सीता को देवी दुर्गा अर्थात् पार्वती के स्थान पर ले आये और रावण को सीता को माया-रूप दे दिया। इस तरह रावण को ठगा गया।

रघुनाथ आसि' ग्रबे रावणे मारिल । अग्नि-परीक्षा दिते ग्नबे सीतारे आनिल ॥

२०५॥

जब भगवान् रामचन्द्रजी ने रावण को मार डाला, तब उसके बाद सीतादेवी परीक्षा हेतु अग्नि के समक्ष लायी गईं।

तबे माया-सीता अग्नि करि अन्तर्धान ।। सत्य-सीता आनि' दिल राम-विद्यमान ॥

२०६॥

। जब रामचन्द्रजी द्वारा अग्नि के समक्ष माया सीता लाई गईं तो अग्नि ने इस माया-रूप को अप्रकट कर दिया और भगवान् रामचन्द्र को वास्तविक सीता लाकर प्रदान कीं।

शुनिळा प्रभुर आनन्दित हैल मन ।।रामदास-विप्रेर कथा हइल स्मरण ॥

२०७॥

। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह कहानी सुनी, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्हें रामदास विप्र के शब्द याद आये।

ए-सब सिद्धान्त शुनि' प्रभुर आनन्द हैल। ब्राह्मणेर स्थाने मागि' सेइ पत्र निल ॥

२०८॥

। जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कूर्म-पुराण से इन निश्चयात्मक सिद्धान्तों को सुना, तो उन्हें अतीव प्रसन्नता हुई। उन्होंने ब्राह्मण की अनुमति से कूर्म-पुराण के इन हस्तलिखित पन्नों को ले लिया।

नूतन पत्र लेखाजा पुस्तके देओयाइल । प्रतीति लागि' पुरातन पत्र मागि' निल ॥

२०९॥

। चूंकि कूर्म-पुराण अत्यन्त प्राचीन है, अतएव उसकी पाण्डुलिपि भी अत्यन्त प्राचीन थी। श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रत्यक्ष साक्ष्य के लिए मूल पन्ने रख लिए और नये पन्नों पर मूल की प्रतिलिपि करके कूर्म पुराण में लगा दी।

पत्र लञा पुनः दक्षिण-मथुरा आइला ।। रामदास विप्रे सेइ पत्र आनि दिला ॥

२१०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु तब लौटकर दक्षिण मथुरा ( मदुरई) आये और कूर्म पुराण की मूल पाण्डुलिपि रामदास विप्र को दी।

सीतयाराधितो वह्निश्छाया-सीतामजीजनत् ।। तां जहार दश-ग्रीवः सीता वह्नि-पुरं गता ॥

२११॥

परीक्षा-समये वह्नि छाया-सीता विवेश सा ।। वह्निः सीतां समानीय तत्पुरस्तादनीनयत् ॥

२१२॥

नुवाद जब सीताजी ने अग्निदेव का आवाहन किया, तो वे सीता का मायारूप ले आये, और दस सिरों वाले रावण ने इस माया-सीता का अपहरण कर लिया। तब मूल सीता अग्निदेव के घर चली गईं। जब भगवान् रामचन्द्र ने सीता के शरीर की परीक्षा ली, तो वह माया-सीता थी जो अग्नि में प्रवेश कर गईं। उसी समय अग्निदेव ने मूल सीता को अपने घर से लाकर भगवान् रामचन्द्र को अर्पित कर दीं।

पत्र पाजा विप्रेर हैल आनन्दित मन ।। प्रभुर चरणे धरि' केरये क्रन्दन ॥

२१३॥

रामदास विप्र कूर्म पुराण के मूल पन्ने पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। वह तुरन्त श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों पर गिरकर रुदन करने लगा।

विप्र कहे,--तुमि साक्षात्श्री-रघुनन्दन ।। सन्यासीर वेषे मोरे दिला दरशन ॥

२१४॥

पाण्डुलिपि पाकर अत्यन्त प्रसन्न हुए ब्राह्मण ने कहा, आप साक्षात् भगवान् रामचन्द्र हैं, और संन्यासी के वेश में मुझे दर्शन देने आये हैं।

महा-दुःख हइते मोरे करिला निस्तार ।आजि मोर घरे भिक्षा कर अङ्गीकार ॥

२१५॥

हे मान्यवर, आपने मुझे अत्यन्त दुःखद परिस्थिति से उबारा है। मेरी प्रार्थना है कि आप मेरे घर भोजन करें। कृपया मेरा यह निमन्त्रण स्वीकार करें।

मनो-दुःखे भाल भिक्षा ना दिल सेइ दिने ।मोर भाग्ये पुनरपि पाइलें दरशने ॥

२१६॥

मानसिक क्षोभ के कारण उस दिन मैं आपको अच्छा भोजन नहीं करा सका। अब सौभाग्यवश आप पुनः मेरे घर पधारे हैं।

एत बलि' सेइ विप्र सुखे पाक कैल ।। उत्तम प्रकारे प्रभुके भिक्षा कराइल ॥

२१७॥

यह कहकर उस ब्राह्मण ने सुखपूर्वक भोजन बनाया और श्री चैतन्य महाप्रभु को उत्तम कोटि को भोजन कराया।

सेइ रात्रि ताहाँ रहि' ताँरै कृपा करि' ।। पाण्ड्य-देशे ताम्रपर्णी गेलो गौरहरि ॥

२१८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने वह रात उस ब्राह्मण के घर बिताई। उस पर कृपा करने के बाद महाप्रभु ने पाण्ड्य देश में ताम्रपर्णी नदी की ओर यात्रा प्रारम्भ की।

ताम्रपर्णी स्नान करि' ताम्रपर्णी-तीरे । नय त्रिपति देखि' बुले कुतूहले ॥

२१९॥

ताम्रपर्णी नदी के तट पर नयत्रिपति नामक स्थान में भगवान् विष्णु के नौ मन्दिर थे। महाप्रभु ने नदी में स्नान करने के बाद अत्यन्त उत्सुकता से अर्चाविग्रह देखे और वहाँ विचरण किया।

चियड़तला तीर्थे देखि' श्री-राम-लक्ष्मण ।। तिल-काञ्ची आसि' कैल शिव दरशन ॥

२२०॥

इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु चियड़तला नामक तीर्थस्थान गये, जहाँ उन्होंने रामचन्द्र तथा लक्ष्मण दोनों भाइयों के अर्चाविग्रह देखे। तब थे तिलकांची गये, जहाँ उन्होंने शिवजी का मन्दिर देखा।

गजेन्द्र-मोक्षण-तीर्थे देखि विष्णु-मूर्ति ।।पानागड़ि-तीर्थे आसि' देखिल सीतापति ॥

२२१॥

तत्पश्चात् श्री चैतन्य महाप्रभु गजेन्द्रमोक्षण नामक तीर्थस्थान गये, जहाँ उन्होंने भगवान् विष्णु का मन्दिर देखा। फिर वे पानागड़ि नामक पवित्र स्थल पर आये, जहाँ उन्होंने भगवान् रामचन्द्र तथा सीताजी के अर्चाविग्रह देखे।

चाम्तापुरे आसि' देखि' श्री-राम-लक्ष्मण ।।श्री-वैकुण्ठे आसि' कैल विष्णु दरशन ॥

२२२॥

। बाद में महाप्रभु चाम्तापुर गये, जहाँ उन्होंने श्री रामचन्द्र तथा लक्ष्मण के अर्चाविग्रह के दर्शन किये। इसके बाद वे श्री वैकुण्ठ गये, और वहाँ भगवान् विष्णु का मन्दिर देखा।

मलय-पर्वते कैल अगस्त्य-वन्दन ।कन्या-कुमारी ताहाँ कैल दरशन ॥

२२३॥

इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु मलय पर्वत गये और उन्होंने अगस्त्य मुनि की वन्दना की। तत्पश्चात् उन्होंने कन्याकुमारी (केप केमोरिन) नामक स्थान की मुलाकात ली।

आम्लितलाय देखि' श्री-राम गौरहरि ।। मल्लार-देशेते आइला ग्रथा भट्टथारि ॥

२२४॥

। कन्याकुमारी देख चुकने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु आप्ति आये, जहाँ उन्होंने श्री रामचन्द्र के अर्चाविग्रह का दर्शन किया। तत्य वे मल्लार देश गये, जहाँ भट्टथारि जाति के लोग रहते थे।

तमाल-कार्तिक देखि' आइल वेतापनि ।रघुनाथ देखि' ताहाँ वञ्चिला रजनी ॥

२२५॥

मल्लार देश घूमने के बाद महाप्रभु तमालकार्तिक गये, और वहाँ से तापनि गये। वहाँ उन्होंने रघुनाथ अर्थात् रामचन्द्र का मन्दिर देखा और रात बिताई।

गोसाजिर सङ्गे रहे कृष्णदास ब्राह्मण ।। भट्टथारि-सह ताहाँ हैल दरशन ॥

२२६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ उनका सेवक था, जिसका नाम कृष्णदास था। वह ब्राह्मण था, किन्तु वहाँ उसकी भेंट भट्टथारियों से हो । गई।

स्त्री-धन देखाजा ताँर लोभ जन्माइल ।। आर्य सरल विप्रेर बुद्धि-नाश कैल ॥

२२७॥

भट्टथारियों ने ब्राह्मण कृष्णदास को स्त्रियों के माध्यम से लोभ में फँसा लिया, क्योंकि वह सरल एवं भला आदमी था। उन्होंने अपनी बुरी संगति से उसकी बुद्धि भ्रष्ट कर दी।

प्राते उठि' आइला विप्र भट्टथारि-घरे । ताहार उद्देशे प्रभु आइला सत्वरे ॥

२२८॥

भट्टथारियों से फुसलाया हुआ कृष्णदास प्रात:काल उठते ही उनके घर गया और महाप्रभु भी उसे ढूंढने के लिए तेजी से वहाँ गये।

आसिया कहेन सब भट्टथारि-गणे ।। आमार ब्राह्मण तुमि राख कि कारणे ॥

२२९॥

भट्टथारियों के पास आकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनसे पूछा, “तुम लोग मेरे ब्राह्मण सहायक को अपने यहाँ क्यों रखे हुए हो? आमिह सन्यासी देख, तुमिह सन्यासी ।।मोरे दुःख देह,—तोमार'न्याय' नाहि वासि ॥

२३०॥

मैं संन्यासी हूँ और तुम लोग भी हो। फिर भी तुम लोग जान-बूझकर मुझे कष्ट दे रहे हो। मुझे इसमें कोई अच्छा कारण नहीं दिखता।

शुनि' सब भट्टथारि उठे अस्त्र ला । मारिबारे आइल सबे चारि-दिके धाज्ञा ॥

२३१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की बात सुनकर सारे भट्टथारि सभी दिशाओं से अपने-अपने हाथों में हथियार लिए महाप्रभु को मारने के लिए दौड़े आये।

तार अस्त्र तार अड़े पड़े हात हैते ।। खण्ड खण्ड हैल भट्टथारि पलाय चारि भिते ॥

२३२॥

। किन्तु उनके हथियार उनके हाथों से छूटकर गिर पड़े, और उन्हीं के शरीरों पर जा लगे। इस तरह जब कुछ भट्टथारि कटकर टुकड़े-टुकड़े हो गये, तो अन्य लोग चारों दिशाओं में भाग गये।

भट्टथारि-घरे महा उठिल क्रन्दन । केशे धरि' विप्रे ला करिल गमन ॥

२३३॥

जब भट्टथारि जाति में चीख-चीत्कार मच गई, तब श्री चैतन्य महाप्रभु कृष्णदास के बाल पकड़कर उसे बाहर ले आये।

सेइ दिन चलि' आइला पयस्विनी-तीरे ।। स्नान करि' गेला आदि-केशव-मन्दिरे ॥

२३४॥

उसी रात श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनका सहायक कृष्णदास पयस्विनी नदी के तट पर आये। उन्होंने स्नान किया और फिर वे आदिकेशव का मन्दिर देखने गये।

केशव देखिया प्रेमे आविष्ट हैला ।।नति, स्तुति, नृत्य, गीत, बहुत करिला ॥

२३५॥

। आदि-केशव मन्दिर को देखते ही महाप्रभु भावाविष्ट हो गये। वे विविध नमस्कार तथा स्तुतियाँ करके कीर्तन करने लगे और नाचने लगे।

प्रेम देखि' लोके हैल महा-चमत्कार ।।सर्व-लोक कैल प्रभुर परम सत्कार ॥

२३६॥

वहाँ के सारे लोग श्री चैतन्य महाप्रभु की भावमयी लीलाओं को देखकर अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये। उन्होंने महाप्रभु का अच्छे से सत्कार किया।

महा-भक्त-गण-सह ताहाँ गोष्ठी कैल ।।‘ब्रह्म-संहिताध्याय'-पॅथि ताहाँ पाइल ॥

२३७॥

। आदि-केशव के मन्दिर में श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्नत भक्तों के बीच आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा की। वहाँ रहते हुए उन्हें ब्रह्म-संहिताका एक अध्याय मिला।

पॅथि पाञा प्रभुर हैल आनन्द अपार ।।कम्पाश्रु-स्वेद-स्तम्भ-पुलक विकार ॥

२३८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु इस शास्त्र का एक अध्याय प्राप्त करके अत्यन्त प्रसन्न थे और उनके शरीर में कम्प, अश्रु, पसीना, समाधि तथा प्रसन्नता के भावरूपी विकार प्रकट हो आये।

सिद्धान्त-शास्त्र नाहि 'ब्रह्म-संहिता'र सम ।। गोविन्द-महिमा ज्ञानेर परम कारण ॥

२३९॥

अल्पाक्षरे कहे सिद्धान्त अपार ।। सकल-वैष्णव-शास्त्र-मध्ये अति सार ॥

२४०॥

जहाँ तक अन्तिम आध्यात्मिक सिद्धान्तों का सम्बन्ध है, ब्रह्म-संहिता के समान अन्य कोई शास्त्र नहीं है। निस्सन्देह, यह शास्त्र भगवान् गोविन्द की महिमाओं का परम प्रकाश है, क्योंकि यह उनके विषय में सर्वोच्च ज्ञान प्रकट करता है। चूंकि सारे सिद्धान्त ब्रह्म-संहिता में संक्षेप में दिये। हैं, अतएव यह सारे वैष्णव ग्रंथों का सार है।

बहु ग्रने सेइ पुँथि निल लेखाइयो । 'अनन्त पद्मनाभ' आइला हरषित हा ॥

२४१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने यत्नपूर्वक ब्रह्म-संहिता की प्रतिलिपि उता और बाद में वे हर्षित होकर अनन्त-पद्मनाभ नामक स्थान गये।

दिन-दुई पद्मनाभेर कैल दरशन ।। आनन्दे देखिते आइला श्री-जनार्दन ॥

२४२॥

भी चैतन्य महाप्रभु अनन्त-पद्मनाभ में दो-तीन दिन रहे, और उन्होंने का मन्दिर देखा। फिर हर्षपूर्वक वे श्री जनार्दन मन्दिर देखने गये।

दिन-दुइ ताहाँ करि' कीर्तन-नर्तन । पयस्विनी आसिया देखे शङ्कर नारायण ॥

२४३॥

भी चैतन्य महाप्रभु श्री जनार्दन में दो दिन तक कीर्तन तथा नृत्य करते फिर वे पयस्विनी नदी के किनारे गये और वहाँ उन्होंने शंकर-नारायण का मन्दिर देखा।

शृङ्गेरि-मठे आइला शङ्कराचार्य-स्थाने ।। मत्स्य-तीर्थ देखि' कैल तुङ्गभद्राय स्नाने ॥

२४४॥

वहाँ उन्होंने श्रृंगेरी मठ देखा जो शंकराचार्य का निवास है। उन्होंने मत्स्य-तीर्थ देखा और तुंगभद्रा नदी में स्नान किया।

मध्वाचार्य-स्थाने आइलो याँहा 'तत्त्ववादी' ।। उड़पीते 'कृष्ण' देखि, ताहाँ हैल प्रेमोन्मादी ॥

२४५॥

तत्पश्चात् चैतन्य महाप्रभु मध्वाचार्य के स्थान उडुपी पर पहुँचे, जो तत्त्ववादी के नाम से जाने जाने वाले दार्शनिक रहते थे। वे वहाँ भगवान् कृष्ण के अर्चाविग्रह को देखकर भावविह्वल हो उठे।

नर्तक गोपाल देखे परम-मोहने ।।मध्वाचार्ये स्वप्न दिया आइला ताँर स्थाने ॥

२४६ ॥

उडुपी मठ में श्री चैतन्य महाप्रभु ने नर्तक गोपाल' के अतीव सुन्दर अर्चाविग्रह के दर्शन किये। यह विग्रह मध्वाचार्य के स्वप्न में आये थे।

गोपी-चन्दन-तले आछिल डिङ्गाते ।।मध्वाचार्य सेइ कृष्ण पाइला कोन-मते ॥

२४७॥

मध्वाचार्य ने कृष्ण का यह विग्रह उस गोपीचन्दन के ढेर से किसी न किसी तरह प्राप्त किया था, जो नाव में लाया गया था।

मध्वाचार्य आनि' तौरे करिला स्थापन ।अद्यावधि सेवा करे तत्त्ववादि-गण ॥

२४८ ॥

मध्वाचार्य इस नर्तक गोपाल के विग्रह को उडुपी ले आये और उन्होंने उन्हें मन्दिर में स्थापित कर दिया। मध्वाचार्य के अनुयायी अर्थात् तत्त्ववादीगण आज भी इस मूर्ति की पूजा करते हैं।

कृष्ण-मूर्ति देखि' प्रभु महा-सुख पाइल ।।प्रेमावेशे बहु-क्षण नृत्य-गीत कैल ॥

२४९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को गोपाल का यह सुन्दर रूप देखकर अत्यन्त हर्ष हुआ। वे देर तक भावावेश में नृत्य तथा कीर्तन करते रहे।

तत्त्ववादि-गण प्रभुके ‘मायावादी' ज्ञाने ।।प्रथम दर्शने प्रभुके ना कैल सम्भाषणे ॥

२५०॥

पहले तो तत्त्ववादी वैष्णवों ने श्री चैतन्य महाप्रभु को मायावादी संन्यासी समझा, अतएव उन्होंने उनसे बात नहीं की।

पाछे प्रेमावेश देखि' हैल चमत्कार ।।वैष्णव-ज्ञाने बहुत करिल सत्कार ॥

२५१॥

। बाद में श्री चैतन्य महाप्रभु को भावावेश में देखकर वे लोग चकित हे गये। तत्पश्चात् उन्हें वैष्णव जानकर उन्होंने उनका अच्छा स्वागत किया। वैष्णवता' सबार अन्तरे गर्व जानि' ।।ईषत् हासिया किछु कहे गौरमणि ॥

२५२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु जान गये कि तत्त्ववादियों को अपने वैष्णव होने पर अत्यधिक गर्व है। अतएव वे मुसकाये और उनसे बातें करने लगे।

ताँ-सबार अन्तरे गर्व जानि गौरचन्द्र ।।ताँ-सबा-सङ्गे गोष्ठी करिला आरम्भ ॥

२५३॥

उन्हें अत्यन्त गर्वित जानकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनसे शास्त्रार्थ शुरू किया।

तत्त्ववादी आचार्य—सब शास्त्रेते प्रवीण ।ताँरे प्रश्न कैल प्रभु हा ग्रेन दीन ॥

२५४॥

तत्त्ववादियों का मुख्य आचार्य शास्त्रों में अत्यन्त पटु था। श्री चैतन्य महाप्रभु ने अत्यन्त विनीत भाव से उससे प्रश्न किया।

साध्य-साधन आमि ना जानि भाल-मते ।।साध्य-साधन-श्रेष्ठ जानाह आमाते ॥

२५५॥

चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैं जीवन का लक्ष्य तथा उसे प्राप्त करने की विधि को ठीक से नहीं जानता। कृपया मुझे बतलायें कि मानवता के लिए सर्वश्रेष्ठ आदर्श क्या है और उसे कैसे प्राप्त किया जाए? आचार्य कहे,–'वर्णाश्रम-धर्म, कृष्णे समर्पण' ।। एइ हय कृष्ण-भक्तेर श्रेष्ठ 'साधन' ॥

२५६॥

आचार्य ने उत्तर दिया, जब चारों वर्षों तथा चारों आश्रमों के कार्य कृष्ण को समर्पित किये जाते हैं, तो वे ही सर्वश्रेष्ठ साधन होते हैं, जिनसे जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।

‘पञ्च-विध मुक्ति' पाजा वैकुण्ठे गमन । ‘साध्य-श्रेष्ठ' हय,—एई शास्त्र-निरूपण ॥

२५७॥

जब मनुष्य वर्णाश्रम धर्म के कार्य कृष्ण को समर्पित करता है, तो वह पाँच प्रकार की मुक्ति का पात्र होता है और वैकुण्ठ लोक भेज दिया जाता है। यही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है और यही सारे शास्त्रों का निष्कर्ष है।

प्रभु कहे,—शास्त्रे कहे श्रवण-कीर्तन । कृष्ण-प्रेम-सेवा-फलेर 'परम-साधन' ॥

२५८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, शास्त्रों के निष्कर्ष के अनुसार कृष्ण की प्रेमाभक्ति प्राप्त करने के सर्वश्रेष्ठ साधन श्रवण तथा कीर्तन हैं।

श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पाद-सेवनम् । अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्म-निवेदनम् ॥

२५९॥

इति पुंसार्पिता विष्णौ भक्तिश्चेन्नव-लक्षणा । क्रियेत भगवत्यद्धा तन्मन्येऽधीतमुत्तमम् ॥

२६० ॥

इस विधि में श्रवण, कीर्तन, भगवान् के पवित्र नाम, रूप, गुण, स्मीलाओं तथा पार्षदों का स्मरण, देश, काल तथा पात्र के अनुसार सेवा करना, अर्चाविग्रह की पूजा करना, स्तुति करना, अपने आपको कृष्ण का शाश्वत दास समझना, उनके प्रति सख्य भाव उत्पन्न करना और उन्हें अपना सर्वस्व अर्पित करना सम्मिलित हैं। जब इस तरह कृष्ण की नौ प्रकार से सीधी प्रेममयी सेवा की जाती है, तो वही जीवन की सर्वोच्च उपलब्धि है। यही प्रामाणिक शास्त्रों का मत है।'

श्रवण-कीर्तन हइते कृष्णे हय ‘प्रेमा' ।।सेइ पञ्चम पुरुषार्थ—पुरुषार्थेर सीमा ॥

२६१॥

जब मनुष्य श्रवण-कीर्तन से आरम्भ होने वाली इन नौ विधियों से कृष्ण की प्रेममयी सेवा करता है, तब उसे सिद्धि का पाँचवाँ पद ए जीवन के लक्ष्य की सीमा प्राप्त होती है।

एवं-व्रतः स्व-प्रिय-नाम-कीत्र्याजातानुरागो द्रुत-चित्त उच्चैः । हसत्यथो रोदिति रौति गायत्य् ।उन्माद-वन्नृत्यति लोक-बाह्यः ॥

२६२॥

जब कोई व्यक्ति वास्तव में उन्नत होता है और अपने प्रिय भगवान के पवित्र नाम के कीर्तन में आनन्द का अनुभव करता है, तब वह उत्तेजित होकर जोर-जोर से पवित्र नाम का उच्चारण करता है। वह किसी को परवाह न करते हुए हँसता है, रोता है, क्षोभित होता है और पागल मनुष्य की तरह कीर्तन करता है।' कर्म-निन्दा, कर्म-त्याग, सर्व-शास्त्रे कहे ।।कर्म हैते प्रेम-भक्ति कृष्णे कभु नहे ॥

२६३ ॥

प्रत्येक प्रामाणिक शास्त्र सकाम कर्म की निन्दा करता है। सभी जगह यही उपदेश दिया गया है कि सारे सकाम कर्मों का त्याग कर दिया। जाए, क्योंकि इसके द्वारा जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य, भगवत्प्रेम को प्राप्त नहीं किया जा सकता।

आज्ञायैवं गुणान्दोषान्मयादिष्टानपि स्वकान् ।।धर्मान्सन्त्यज्य सः सर्वान्मां भजेत्स च सत्तमः ॥

२६४॥

। धार्मिक शास्त्रों में नियत कर्मों का वर्णन किया गया है। उनकी विवेचना करने पर मनुष्य उनके गुणों तथा दोषों को पूरी तरह समझ सकता है और तब भगवान् की सेवा करने के लिए उनका पूर्ण परित्याग कर सकता है। जो मनुष्य ऐसा करता है, वह प्रथम कोटि का व्यक्ति (उत्तम) कहलाता है।'

सर्व-धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।। अहं त्वां सर्व-पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

२६५ ॥

सारे धर्मों को त्याग कर मेरी शरण में आओ। मैं तुम्हें सारे पापकर्मों से मुक्त कर दूंगा। तुम डरो मत।। तावत्कर्माणि कुर्वीत न निर्विद्येत सावता ।। त्कथा-श्रवणादौ वा श्रद्धा यावन्न जायते ॥

२६६॥

जब तक मनुष्य सकाम कर्म द्वारा तृप्त नहीं होता और श्रवणं कीर्तन विष्णोः द्वारा भक्ति के लिए रुचि विकसित नहीं कर लेता, तब तक उसे वैदिक आदेशों के विधि-विधानों के अनुसार कर्म करना आवश्यक है। पञ्च-विध मुक्ति त्याग करे भक्त-गण ।।फल्गु करि' ‘मुक्ति' देखे नरकेर सम ॥

२६७॥

शुद्ध भक्त मुक्ति के पाँचों प्रकारों को त्याग देते हैं। निस्सन्देह उनके लिए मुक्ति अत्यन्त नगण्य है, क्योंकि वे इसे नरक के समान मानते हैं। सालोक्य-सार्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमध्युत ।।दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥

२६८॥

शुद्ध भक्त सदैव पाँच प्रकार की मुक्ति का बहिष्कार करते हैंये हैं वैकुण्ठ लोक में रहना, भगवान् जैसे ऐश्वर्यों से युक्त होना, भगवान् जैसा स्वरूप प्राप्त करना, भगवान् की संगति करना तथा भगवान् के शरीर में समा जाना। शुद्ध भक्त भगवद्भक्ति के बिना इन वरदानों को स्वीकार नहीं करते।' ग्रो दुस्त्यजान्क्षिति-सुत-स्वजनार्थ-दारान् ।प्राथ्र्यां श्रियं सुर-वरैः सदयावलोकाम् ।। नैच्छन्नृपस्तदुचितं महतां मधु-द्विट्सेवानुरक्त-मनसामभवोऽपि फल्गुः ॥

२६९॥

भौतिक ऐश्वर्य, भूमि, सन्तान, समाज, मित्र, धन, पत्नी या लक्ष्मी के आशीर्वादों को त्याग पाना अत्यन्त कठिन है, जो बड़े-बड़े देवताओं द्वारा भी प्रार्थित हैं। किन्तु राजा भरत को ऐसी वस्तुओं की कामना नहीं थी और यह उनके पद के अनुरूप भी था, क्योंकि ऐसे शुद्ध भक्त के लिए, जिसका मन सदैव भगवान् की सेवा में लगा रहता है, मुक्ति या भगवान् से तादात्म्य भी तुच्छ है। तो फिर भौतिक अवसरों के विषय में तो कहना ही क्या?' नारायण-पराः सर्वे न कुतश्चन बिभ्यति ।।स्वर्गापवर्ग-नरकेष्वपि तुल्यार्थ-दर्शिनः ॥

२७० ॥

भगवान् नारायण का भक्त नरक से नहीं डरता, क्योंकि वह इसे स्वर्ग जाने या मुक्ति के ही समान मानता है। भगवान् नारायण के भक्त इन वस्तुओं को एक-सा ही मानने के अभ्यस्त होते हैं।'

मुक्ति, कर्म–दुइ वस्तु त्यजे भक्त-गण ।।सेइ दुइ स्थाप' तुमि ‘साध्य’, ‘साधन' ॥

२७१॥

भक्तगण मुक्ति तथा सकाम कर्म-इन दोनों का परित्याग करते हैं। आप इन्हें ही जीवन का लक्ष्य तथा उसे प्राप्त करने की विधि के रूप में स्थापित करना चाह रहे हैं।

सन्यासी देखिया मोरे करह वञ्चन ।।ना कहिली तेञि साध्य-साधन-लक्षण ॥

२७२।। श्री चैतन्य महाप्रभु उस तत्त्ववादी आचार्य से कहते रहे, आप मुझे संन्यासी वेश में देखकर मेरे साथ कपटपूर्ण आचरण कर रहे हैं। आपने विधि ( साधन ) तथा चरम लक्ष्य (साध्य) का सही-सही वर्णन नहीं किया है।

शुनि' तत्त्वाचार्य हैला अन्तरे लज्जित । प्रभुर वैष्णवता देखि, हइला विस्मित ॥

२७३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की बात सुनकर तत्त्ववादी सम्प्रदाय का आचार्य अत्यधिक लज्जित हो गया। वैष्णव-धर्म में श्री चैतन्य महाप्रभु की दृढ़ श्रद्धा देखकर वह आश्चर्यचकित रह गया।

आचार्य कहे,—तुमि ग्रेइ कह, सेइ सत्य हय ।।सर्व-शास्त्रे वैष्णवेर एइ सुनिश्चय ॥

२७४॥

तत्त्ववादी आचार्य ने उत्तर दिया, आपने जो कहा है, वह सत्य है; यही सारे प्रामाणिक वैष्णव शास्त्रों का निर्णय है।

तथापि मध्वाचार्य → करियाछे निर्बन्ध ।सेइ आचरिये सबे सम्प्रदाय-सम्बन्ध ॥

२७५ ॥

। तो भी मध्वाचार्य ने हमारे सम्प्रदाय के लिए जो सूत्र निश्चित कर दिये हैं, हम उन्हीं का पालन सम्प्रदाय की नीति के रूप में करते हैं।

प्रभु कहे,—कर्मी, ज्ञानी,—दुइ भक्ति-हीन ।तोमार सम्प्रदाये देखि सेइ दुइ चिह्न ॥

२७६ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, सकाम कर्मी तथा ज्ञानी-दोनों ही अभक्त माने जाते हैं। हमें ये दोनों आपके सम्प्रदाय में दिखते हैं।

सबे, एक गुण देखि तोमार सम्प्रदाये ।।सत्य-विग्रह करि' ईश्वरे करह निश्चये ॥

२७७॥

मुझे आपके सम्प्रदाय में जो एकमात्र गुण दिखता है, वह यही है। कि आप लोग भगवान् के अर्चाविग्रह को सत्य रूप मानते हैं।

एइ-मत ताँर घरे गर्व चूर्ण करि' ।।फल्गु-तीर्थे तबे चलि आइला गौरहरि ॥

२७८ ॥

। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने तत्त्ववादियों के गर्व को चूर-चूर कर दिया। तब वे फल्गु तीर्थ गये।

त्रितकूपे विशालार करि' दरशन । पञ्चाप्सरा-तीर्थे आइला शचीर नन्दन ॥

२७९॥

माता शची के पुत्र श्री चैतन्य महाप्रभु तब त्रितकूप गये और वहाँ पर विशाला अर्चाविग्रह का दर्शन करने के बाद वे पंचाप्सरा नामक तीर्थस्थान गये।

गोकर्णे शिव देखि' आइला द्वैपायनि । सूर्पारक-तीर्थे आइला न्यासि-शिरोमणि ॥

२८०॥

पंचाप्सरा की मुलाकात लेने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु गोकर्ण गये। वहाँ उन्होंने शिवजी का मन्दिर देखा और फिर द्वैपायनी गये। तब संन्यासियों में सर्वश्रेष्ठ श्री चैतन्य महाप्रभु सूर्पारक तीर्थ गये।

कोलापुरे लक्ष्मी देखि' देखेन क्षीर-भगवती ।। लाङ्ग-गणेश देखि' देखेन चोर-पार्वती ।। २८१॥

इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु कोलापुर नामक नगर गये, जहाँ उन्होंने क्षीर भगवती के मन्दिर में लक्ष्मीजी को और चोर पार्वती नामक अन्य मन्दिर में लांग गणेश के दर्शन किये।

तथा हैते पाण्डरपुरे आइला गौरचन्द्र ।विठ्ठल-ठाकुर देखि' पाइला आनन्द ॥

२८२॥

वहाँ से श्री चैतन्य महाप्रभु पांडरपुर गये, जहाँ उन्होंने प्रसन्नतापूर्वक विठ्ठल ठाकुर का मन्दिर देखा।

प्रेमावेशे कैले बहुत कीर्तन-नर्तन ।। ताहाँ एक विप्र ताँरे कैल निमन्त्रण ॥

२८३ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु सदा की तरह कई प्रकार से नृत्य और कीर्तन करने लगे और एक ब्राह्मण उन्हें भावावेश में देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। उसने महाप्रभु को अपने घर पर भोजन करने के लिए भी आमन्त्रण दिया।

बहुत आदरे प्रभुके भिक्षा कराइल ।।भिक्षा करि' तथा एक शुभ-वार्ता पाइल ॥

२८४॥

इस ब्राह्मण ने अतीव सम्मान सहित तथा प्रेमपूर्वक श्री चैतन्य महाप्रभु को भोजन कराया। भोजन करने के बाद महाप्रभु को शुभ समाचार मिला।

माधव-पुरीर शिष्य'श्री-रङ्ग-पुरी' नाम । सेइ ग्रामे विप्र-गृहे करेन विश्राम ॥

२८५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को यह समाचार मिला कि श्री माधवेन्द्र पुरी के एक शिष्य श्री रंग पुरी उसी गाँव में एक ब्राह्मण के घर उपस्थित हैं।

शुनिया चलिला प्रभु ताँरै देखिबारे ।। विप्र-गृहे वसि' आछेन, देखिला ताँहारे ॥

२८६ ॥

यह समाचार सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु तुरन्त श्री रंग पुरी को मिलने उस ब्राह्मण के घर गये। प्रवेश करते ही महाप्रभु ने उन्हें वहाँ बैठे देखा।

प्रेमावेशे करे ताँरै दण्ड-परणाम ।। अश्रु, पुलक, कम्प, सर्वाङ्गे पड़े घाम ॥

२८७॥

श्री रंग पुरी को देखते ही श्री चैतन्य महाप्रभु ने भूमि पर दण्डवत् गिरकर भावावेश में प्रणाम किया। उनके शरीर में अश्रु, हर्ष, कम्पन तथा स्वेद (पसीने) के दिव्य विकार लक्षण प्रकट हो गये थे।

देखिया विस्मित हैल श्री-रङ्ग-पुरीर मन ।। उठह श्रीपाद बलि' बलिला वचन ॥

२८८ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को ऐसे भावावेश में देखकर श्रीरंग पुरी ने कहा, हे श्रीपाद, कृपया उठे।

श्रीपाद, धर मोर गोसाजिर सम्बन्ध ।। ताहा विना अन्यत्र नाहि एइ प्रेमार गन्ध ।। २८९॥

हे श्रीपाद, आप श्री माधवेन्द्र पुरी से सम्बन्धित हैं, जिनके बिना प्रेमानन्द की कोई सुगन्ध नहीं होती।

एते बलि' प्रभुके उथाजा कैल आलिङ्गन । गलागलि करि' हे करेन क्रन्दन ॥

२९०॥

यह कहकर श्री रंग पुरी ने श्री चैतन्य महाप्रभु को उठाया और उनका आलिंगन किया। आलिंगन करते समय दोनों भाववश रुदन करने लगे।

क्षणेके आवेश छाड़ि' मुँहार धैर्य हैल ।।ईश्वर-पुरीर सम्बन्ध गोसाजि जानाइल ॥

२९१॥

कुछ क्षणों के बाद उन्हें होश आया, तो वे शान्त हुए। तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्री रंग पुरी से ईश्वर पुरी के साथ अपने सम्बन्ध के विषय में बतलाया।

अद्भुत प्रेमेर वन्या वँहार उथलिल ।।हे मान्य करि' हे आनन्दे वसिल ॥

२९२॥

। वे दोनों अपने भीतर उठने वाले अद्भुत प्रेम-भाव से आप्लावित हो उठे। अन्त में दोनों बैठ गये और आदरपूर्वक बातें करने लगे।

दुइ जने कृष्ण-कथा कहे रात्रि-दिने ।।एइ-मते गोवाइल पाँच-सात दिने ।। २९३॥

इस तरह वे दोनों लगातार पाँच-सात दिनों तक कृष्ण-विषयक कथाओं की चर्चा करते रहे।

कौतुके पुरी ताँरै पुछिल जन्म-स्थान ।।गोसाजि कौतुके कहेन 'नवद्वीप' नाम ॥

२९४ ।। श्री रंग पुरी ने उत्सुकतावश चैतन्य महाप्रभु से उनके जन्मस्थान के विषय में पूछा, तो महाप्रभु ने बतलाया कि नवद्वीप धाम उनका जन्मस्थान है।

श्री-माधव-पुरीर सङ्गे श्री-रङ्ग-पुरी ।।पूर्वे आसियाछिला तेंहो नदीया-नगरी ॥

२९५॥

। पहले श्री रंग पुरी श्री माधवेन्द्र पुरी के साथ नवद्वीप जा चुके थे, अतएव उन्हें वहाँ हुई घटनाएँ याद आ गईं।

जगन्नाथ-मिश्र-घरे भिक्षा ग्रे करिल ।।अपूर्व मोचार घण्ट ताहाँ ये खाइल ॥

२९६॥

नवद्वीप का नाम सुनते ही श्री रंग पुरी को स्मरण हो आया कि वे माधवेन्द्र पुरी के साथ जगन्नाथ मिश्र के घर गये थे, जहाँ उन्होंने दोपहर का भोजन किया था। यहाँ तक कि उन्हें केले के फूलों की बनी सब्जी का अद्वितीय स्वाद भी याद आ गया।

जगन्नाथेर ब्राह्मणी, तेंह–महा-पतिव्रता ।वात्सल्ये हयेन तेंह ग्रेन जगन्माता ॥

२९७॥

श्री रंग पुरी को जगन्नाथ मिश्र की पत्नी भी याद आईं। वे अत्यन्त समर्पित तथा पतिव्रता थीं। वात्सल्य में तो वे जगन्माता तुल्य थीं।

रन्धने निपुणा ताँ-सम नाहि त्रिभुवने ।पुत्र-सम स्नेह करेन सन्यासि-भोजने ॥

२९८॥

उन्हें यह भी स्मरण हो आया कि श्री जगन्नाथ मिश्र की पत्नी शचीमाता भोजन बनाने में कैसी निपुण थीं। उन्हें स्मरण हो आया कि वे संन्यासियों के प्रति अत्यधिक स्नेह रखती थीं और उन्हें अपने पुत्रों के समान भोजन कराती थीं।

ताँर एक योग्य पुत्र करियाछे सन्यास ।‘शङ्करारण्य' नाम ताँर अल्प वयस ॥

२९९॥

श्री रंग पुरी यह भी जानते थे कि उनके एक योग्य पुत्र ने कम वय में ही संन्यास ले लिया था। उसका नाम शंकरारण्य था।

एइ तीर्थे शङ्कारण्येर सिद्धि-प्राप्ति हैल ।।प्रस्तावे श्री-रङ्ग-पुरी एतेक कहिल ॥

३००॥

श्री रंग पुरी ने श्री चैतन्य महाप्रभु को बतलाया कि इसी तीर्थ पांडरपुर में शंकरारण्य नामक संन्यासी ने सिद्धि प्राप्त की थी।

प्रभु कहे,—पूर्वाश्रमे तेंह मोर भ्राता ।।जगन्नाथ मिश्र–पूर्वाश्रमे मोर पिता ॥

३०१॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, “मेरे पूर्व आश्रम में शंकरारण्य मेरा भाई था और जगन्नाथ मिश्र मेरे पिता थे।

एइ-मत दुइ-जने इष्ट-गोष्ठी करि' ।। द्वारका देखिते चलिला श्री-रङ्ग-पुरी ॥

३०२॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु से बातें करने के बाद श्री रंग पुरी द्वारका धाम के लिए रवाना हो गये।

दिन चारि तथा प्रभुके राखिल ब्राह्मण ।। भीमा-नदी स्नान करि' करेन विठ्ठल दर्शन ॥

३०३॥

श्री रंग पुरी के द्वारका-गमन के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु पाण्डरपुर में उस ब्राह्मण के घर चार दिनों तक और रहे। उन्होंने भीमा नदी में स्नान किया और विठ्ठल-मन्दिर का दर्शन किया।

तबे महाप्रभु आइला कृष्ण-वेण्वा-तीरे ।। नाना तीर्थ देखि' ताहाँ देवता-मन्दिरे ॥

३०४॥

इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु कृष्णवेण्वा नदी के किनारे गये, जहाँ उन्होंने अनेक तीर्थस्थल तथा विभिन्न देवों के मन्दिर देखे।"

ब्राह्मण-समाज सब-वैष्णव-चरित ।। वैष्णव सकल पड़े ‘कृष्ण-कर्णामृत' ॥

३०५॥

वहाँ के ब्राह्मण समाज में सभी शुद्ध भक्त थे, जो नियमित रूप से बिल्वमंगल ठाकुर कृत कृष्णकर्णामृत नामक ग्रंथ का अध्ययन करते थे।

कृष्ण-कर्णामृत शुनि' प्रभुर आनन्द हैल ।। आग्रह करिया पुँथि लेखाजा लैल ॥

३०६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु कृष्णकर्णामृत पुस्तक सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। और उन्होंने बड़ी ही उत्सुकता से उसकी नकल करवाई तथा उसे अपने साथ लेते गये।

‘कर्णामृत'-सम वस्तु नाहि त्रिभुवने । ग्राहा हैते हय कृष्णे शुद्ध-प्रेम-ज्ञाने ॥

३०७॥

तीनों लोकों में कृष्णकर्णामृत की बराबरी का कोई ग्रंथ नहीं है। इस पुस्तक को पढ़ने से कृष्ण की शुद्ध भक्ति का ज्ञान प्राप्त होता है।

सौन्दर्य-माधुर्य-कृष्ण-लीलार अवधि ।। सेइ जाने, ये 'कर्णामृत' पड़े निरवधि ॥

३०८ ॥

। जो व्यक्ति निरन्तर कृष्णकर्णामृत को पढ़ता है, वह भगवान् कृष्ण के सौन्दर्य तथा उनकी लीलाओं के मधुर स्वाद को समझ सकता है।

‘ब्रह्म-संहिता', 'कर्णामृत' दुइ पुँथि पाञा ।। महा-रत्न-प्राय पाइ आइला सङ्गे ला ॥

३०९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ब्रह्म-संहिता तथा कृष्ण-कर्णामृत नामक दो पुस्तकों को अत्यन्त मूल्यवान रत्न मानते थे। अतएव अपनी वापसी यात्रा में वे इन्हें अपने साथ ले आये।

तापी स्नान करि' आइला माहिष्मती-पुरे ।। नाना तीर्थ देखि ताहाँ नर्मदार तीरे ॥

३१०॥

। इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु तापी नदी के तट पर पहुँचे। वहाँ स्नान करने के बाद वे माहिष्मतीपुर गये। वहाँ रहते हुए उन्होंने नर्मदा नदी के किनारे अनेक तीर्थस्थानों को देखा।

धनुस्तीर्थ देखि' करिला निर्विन्ध्याते स्नाने । ऋष्यमूक-गिरि आइला दण्डकारण्ये ॥

३११॥

। इसके बाद महाप्रभु धनुस्तीर्थ में पहुँचे, जहाँ पर उन्होंने निर्विन्ध्या नदी में स्नान किया। तत्पश्चात् वे ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचे और वहाँ से दण्डकारण्य चले गये।

‘सप्तताल-वृक्ष' देखे कानन-भितर ।अति वृद्ध, अति स्थूल, अति उच्चतर ॥

३१२॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने दण्डकारण्य जंगल के भीतर सप्तताले नामक स्थान देखा। यहाँ के ताड़ के सात वृक्ष अत्यन्त पुराने, मोटे तथा ऊँचे थे।

सप्तताल देखि प्रभु आलिङ्गन कैल ।।सशरीरे सप्तताल वैकुण्ठे चलिल ॥

३१३॥

। सात ताड़ वृक्षों को देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें गले लगा लिया। फलस्वरूप वे वृक्ष वैकुण्ठ लोक वापस चले गये।

शून्य-स्थल देखि लोकेर हैल चमत्कार ।।लोके कहे, ए सन्यासी–राम-अवतार ॥

३१४॥

जब सातों ताड़ के वृक्ष वैकुण्ठ लोक चले गये, तो वहाँ के सारे लोग चकित रह गये। तब वे कहने लगे, श्री चैतन्य महाप्रभु नामक यह संन्यासी अवश्य ही भगवान् रामचन्द्र के अवतार हैं।

सशरीरे ताल गेल श्री-वैकुण्ठ-धाम ।।ऐछे शक्ति कार हय, विना एक राम ॥

३१५॥

केवल भगवान् रामचन्द्र में सप्ततालों को वैकुण्ठ लोक भेजने की शक्ति है।

प्रभु आसि' कैल पम्पा-सरोवरे स्नान ।।पञ्चवटी आसि, ताहाँ करिल विश्राम ॥

३१६॥

अन्ततः श्री चैतन्य महाप्रभु पम्पा नामक सरोवर आये, जहाँ उन्होंने स्नान किया। इसके बाद वे पंचवटी गये, जहाँ उन्होंने विश्राम किया।

नासिके त्र्यम्बक देखि' गेला ब्रह्मगिरि ।।कुशावर्ते आइला ग्राहाँ जन्मिला गोदावरी ॥

३१७॥

तत्पश्चात् श्री चैतन्य महाप्रभु नासिक गये, जहाँ उन्होंने त्र्यम्बक (शिवजी ) का दर्शन किया। तब वे ब्रह्मगिरि गये और फिर गोदावरी के उद्गम स्थान कुशावर्त गये।।

सप्त गोदावरी आइला करि' तीर्थ बहुतर । पुनरपि आइला प्रभु विद्यानगर ॥

३१८॥

अन्य अनेक तीर्थों की मुलाकात लेने के बाद महाप्रभु सप्तगोदावरी गये। अन्त में वे विद्यानगर लौट आये।

रामानन्द राय शुनि' प्रभुर आगमन ।। आनन्दे आसिया कैल प्रभु-सह मिलन ॥

३१९॥

। जब रामानन्द राय ने सुना कि श्री चैतन्य महाप्रभु आ गये हैं, तो वे अत्यन्त आनन्दित हो उठे और तुरन्त ही उन्हें मिलने गये।

दण्डवत् हा पड़े चरणे धरिया ।।आलिङ्गन कैल प्रभु ताँरै उठाञा ॥

३२०॥

जब रामानन्द राय श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों को स्पर्श करते हुए दण्डवत् गिर पड़े, तो महाप्रभु ने तुरन्त उन्हें उठा लिया और उनका आलिंगन किया।

दुइ जने प्रेमावेशे करेन क्रन्दन ।प्रेमानन्दे शिथिल हैल मुँहाकार मन ॥

३२१॥

वे दोनों भावाविष्ट होकर रोने लगे और इस तरह उनके मन शिथिल पड़ गये।

कत-क्षणे दुइ जना सुस्थिर हा ।।नाना इष्ट-गोष्ठी करे एकत्र वसिया ॥

३२२॥

कुछ समय के बाद दोनों को होश में आये और वे एकसाथ बैठकर विभिन्न विषयों पर बातें करने लगे।

तीर्थ-यात्रा-कथा प्रभु सकल कहिला ।। कर्णामृत, ब्रह्म-संहिता, दुइ पुँथि दिला ॥

३२३ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय को तीर्थस्थानों की यात्रा का सुन्दर विवरण सुनाया और उन्हें बतलाया कि उन्होंने कृष्णकर्णामृत तथा ब्रह्म-संहिता नामक दो ग्रंथ किस तरह प्राप्त किये। महाप्रभु ने दोनों पुस्तकें रामानन्द राय को दे दीं।

प्रभु कहे,—तुमि ग्रेइ सिद्धान्त कहिले । एई दुइ पुँथि सेइ सब साक्षी दिले ॥

३२४॥

। महाप्रभु ने कहा : आपने मुझसे भक्ति के विषय में जो कुछ कहा है, उसकी पुष्टि इन दोनों पुस्तकों से होती है।

रायेर आनन्द हैल पुस्तक पाइयो । प्रभु-सह आस्वादिल, राखिल लिखिया ॥

३२५॥

। इन पुस्तकों को पाकर रामानन्द राय अत्यन्त हर्षित हुए। उन्होंने महाप्रभु के साथ मिलकर इनका रसास्वादन किया और दोनों की एक प्रतिलिपि तैयार कर ली।

‘गोसाञि आइला' ग्रामे हैल कोलाहल ।।प्रभुके देखिते लोक आइल सकल ॥

३२६॥

विद्यानगर गाँव में श्री चैतन्य महाप्रभु के आने की खबर फैल गई और सारे लोग एक बार फिर उनके दर्शन के लिए आये।

लोक देखि ' रामानन्द गेला निज-घरे ।।मध्याह्न उठिला प्रभु भिक्षा करिबारे ॥

३२७॥

। यहाँ पर एकत्र लोगों को देखकर श्री रामानन्द राय अपने घर चले आये। दोपहर में श्री चैतन्य महाप्रभु भोजन करने के लिए उठे।

रात्रि-काले राय पुनः कैल आगमन ।। दुइ जने कृष्ण-कथाय कैल जागरण ॥

३२८ ।। रामानन्द राय रात्रि में फिर आये और वे तथा चैतन्य महाप्रभु दोनों कृष्ण-विषयक कथाओं पर चर्चा करते रहे। उन्होंने इसी तरह रात बिताई।

दुइ जने कृष्ण-कथा कहे रात्रि-दिने । परम-आनन्दे गेल पाँच-सात दिने ॥

३२९॥

रामानन्द राय तथा श्री चैतन्य महाप्रभु रात-दिन कृष्ण-कथा की चर्चा करते रहे। इस तरह उन्होंने बड़े ही आनन्द में पाँच-सात दिन बिता दिये।।

रामानन्द कहे,—प्रभु, तोमार आज्ञा पाळा ।।राजाके लिखिलॆ आमि विनय करिया ॥

३३०॥

रामानन्द राय ने कहा, “हे प्रभु, आपकी अनुमति से मैं विनयपूर्वक राजा को एक पत्र लिख चुका हूँ।

राजा मोरे आज्ञा दिल नीलाचले ग्राइते । चलिबार उद्योग आमि लागियाछि करिते ॥

३३१॥

राजा ने मुझे जगन्नाथ पुरी लौट जाने का आदेश दे दिया है और मैं वापस जाने का प्रबन्ध कर रहा हूँ।

प्रभु कहे,---एथा मोर ए-निमित्ते आगमन ।। तोमा ला नीलाचले करिब गमन ॥

३३२॥

। तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैं केवल इसी कार्य के लिए यहाँ लौटकर आया हूँ। मैं आपको अपने साथ जगन्नाथ पुरी ले चलना चाहता हूँ।

राय कहे,--प्रभु, आगे चल नीलाचले ।।मोर सङ्गे हाती-घोड़ा, सैन्य-कोलाहले ॥

३३३॥

। रामानन्द राय ने कहा, हे प्रभु, अच्छा यही होगा, यदि आप जगन्नाथ पुरी अकेले जायें, क्योंकि मेरे साथ अनेक घोड़े, हाथी तथा सैनिक होंगे, जिनके कारण बहुत कोलाहल मचता रहेगा।

दिन-दशे इहा-सबार करि' समाधान ।।तोमार पाछे पाछे आमि करिब प्रयाण ॥

३३४॥

मैं दस दिनों में सारी तैयारी कर लूंगा। मैं जल्दी ही आपके पीछेपीछे नीलाचल आऊँगा।

तबे महाप्रभु ताँरे आसिते आज्ञा दिया ।नीलाचले चलिला प्रभु आनन्दित हुआ ॥

३३५॥

रामानन्द राय को नीलाचल आने की आज्ञा देकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक जगन्नाथ पुरी के लिए चल दिये।

येइ पथे पूर्वे प्रभु कैला आगमन ।। सेइ पथे चलिला देखि, सर्व वैष्णव-गण ॥

३३६ ॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु जिस रास्ते से पहले विद्यानगर आये थे, उसी से लौटे और सारे वैष्णवजन रास्ते में उन्हें फिर से मिले।

याहाँ याय, लोक उठे हरि-ध्वनि करि' ।। देखि आनन्दिते-मन हैला गौरहरि ॥

३३७॥

जहाँ कहीं भी श्री चैतन्य महाप्रभु जाते, श्री हरि के नाम का उच्चारण होता। यह देखकर महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए।

आलालनाथे आसि' कृष्णदासे पाठाइल ।।नित्यानन्द-आदि निज-गणे बोलाइल ॥

३३८ ॥

आलालनाथ पहुँचकर महाप्रभु ने अपने सहायक कृष्णदास को नित्यानन्द प्रभु तथा अन्य निजी संगियों को बुलाने के उद्देश्य से आगे भेज दिया।

प्रभुर आगमन शुनि' नित्यानन्द राय ।।उठिया चलिला, प्रेमे थेह नाहि पाय ॥

३३९॥

ज्योंही नित्यानन्द प्रभु ने श्री चैतन्य महाप्रभु के आगमन की खबर सुनी, त्योंही वे तुरन्त उठकर उन्हें मिलने चल दिये। वे महान् भाव के कारण अत्यन्त अधीर हो उठे।

जगदानन्द, दामोदर-पण्डित, मुकुन्द ।।नाचिया चलिला, देहे ना धरे आनन्द ॥

३४०॥

आनन्द के मारे श्री नित्यानन्द राय, जगदानन्द, दामोदर पण्डित तथा मुकुन्द भावविभोर हो उठे और वे रास्ते-भर नाचते हुए महाप्रभु से मिलने गये।

गोपीनाथाचार्य चलिला आनन्दित हजा।।प्रभुरे मिलिला सबे पथे लाग्पञिा ॥

३४१॥

गोपीनाथ आचार्य भी अत्यन्त प्रसन्न मुद्रा में गये। वे सब महाप्रभु से मिलने गये और अन्त में रास्ते में ही उन सबकी भेंट हो गई।

प्रभु प्रेमावेशे सबाय कैल आलिङ्गन ।।प्रेमावेशे सबे करे आनन्द-क्रन्दन ॥

३४२॥

। महाप्रभु भी प्रेमवश हो गये और उन्होंने सबका आलिंगन किया। वे सभी प्रेमवश आनन्दित होकर रोने लगे।

सार्वभौम भट्टाचार्य आनन्दे चलिला ।। समुद्रेर तीरे आसि' प्रभुरे मिलिला ॥

३४३॥

सार्वभौम भट्टाचार्य भी परम आनन्दित होकर महाप्रभु से मिलने गये, और उनकी भेंट समुद्र के किनारे हो गई।

सार्वभौम महाप्रभुर पड़िला चरणे ।। प्रभु ताँरै उठाजा कैल आलिङ्गने ॥

३४४॥

सार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़े और महाप्रभु ने उन्हें उठाकर उनका आलिंगन किया।

प्रेमावेशे सार्वभौम करिला रोदने । सबा-सङ्गे आइला प्रभु ईश्वर-दरशने ॥

३४५॥

सार्वभौम भट्टाचार्य अत्यधिक प्रेमावेश में रोने लगे। तब महाप्रभु सबके साथ जगन्नाथ मन्दिर गये।

जगन्नाथ-दरशन प्रेमावेशे कैल ।। कम्प-स्वेद-पुलकाश्रुते शरीर भासिल ॥

३४६॥

भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करते समय प्रेमावेश के कारण कम्पन, स्वेद, अश्रु तथा पुलक से महाप्रभु का शरीर आप्लावित हो उठा।

बहु नृत्य-गीत कैल प्रेमाविष्ट हो । पाण्डा-पाल आइल सबे माला-प्रसाद लञा ॥

३४७॥

।श्री चैतन्य महाप्रभु प्रेमावेश के कारण नाचने लगे और कीर्तन करने लगे। उस समय सारे पाण्डे तथा पुजारी उन्हें भगवान जगन्नाथ का प्रसाद तथा माला देने आये।

माला-प्रसाद पाञा प्रभु सुस्थिर हुइला । जगन्नाथेर सेवक सब आनन्दे मिलिला ॥

३४८॥

भगवान् जगन्नाथ की माला तथा प्रसाद पाकर श्री चैतन्य महाप्रभु सन्तुष्ट हुए। भगवान् जगन्नाथ के सारे सेवक बहुत ही प्रसन्नतापूर्वक श्री चैतन्य महाप्रभु से मिले।

काशी-मिश्र आसि' प्रभुर पड़िला चरणे ।। मान्य करि' प्रभु ताँरै कैल आलिङ्गने ॥

३४९॥

बाद में काशी मिश्र आये और वे महाप्रभु के चरणकमलों पर गिर पड़े। महाप्रभु ने बड़े ही आदर से उनका आलिंगन किया।

प्रभु ला सार्वभौम निज-घरे गेला ।मोर घरे भिक्षा बलि' निमन्त्रण कैला ॥

३५०॥

तब सार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभु को अपने साथ अपने घर यह कहकर ले गये, “आज आप मेरे घर में भोजन करेंगे। इस तरह उन्होंने महाप्रभु को आमन्त्रित किया।

दिव्य महाप्रसाद अनेक आनाइल ।।पीठा-पाना आदि जगन्नाथ ने खाइल ॥

३५१॥

सार्वभौम भट्टाचार्य भगवान् जगन्नाथ द्वारा छोड़े गये विविध प्रकार के प्रसाद ले आये। वे अनेक प्रकार के पकवान तथा औंटे दूध की बनी वस्तुएँ ले आये।

मध्याह्न करिला प्रभु निज-गण लञा ।।सार्वभौम-घरे भिक्षा करिला आसिया ॥

३५२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु अपने संगियों समेत सार्वभौम भट्टाचार्य के घर गये। और वहाँ दोपहर का भोजन किया।

भिक्षा कराळा ताँरै कराइल शयन ।। आपने सार्वभौम करे पाद-संवाहन ॥

३५३॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु को भोजन कराने के बाद सार्वभौम भट्टाचार्य ने उन्हें विश्राम के लिए शयन कराया और स्वयं उनके पाँव दबाने लगे।

प्रभु ताँरे पाठाइल भोजन करते ।। सेइ रात्रि ताँर घरे रहिला ताँर प्रीते ॥

३५४॥

तब महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य से कहा कि जाकर भोजन करें और महाप्रभु उन्हें प्रसन्न करने के लिए उस रात्रि उन्हीं के घर रुके।

सार्वभौम-सङ्गे आर लञा निज-गण ।। तीर्थ-यात्रा-कथा कहि' कैल जागरण ॥

३५५ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके निजी संगी सार्वभौम भट्टाचार्य के यहीं रहे। वे सारी रात महाप्रभु की तीर्थयात्रा का वृत्तान्त सुनते हुए जगते रहे।

प्रभु कहे,—एत तीर्थ कैलँ पर्यटन । तोमा-सम वैष्णव ना देखिलॅ एक-जन ॥

३५६॥

महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य से कहा, मैंने अनेक तीर्थस्थानों की यात्रा की है, किन्तु कहीं भी आप जैसा वैष्णव नहीं देखा।।

एक रामानन्द राय बह सख दिल ।। भट्ट कहे,—एइ लागि' मिलिते कहिले ॥

३५७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु कहते रहे, रामानन्द राय की बातों से मुझे बहुत सुख प्राप्त हुआ। भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, इसीलिए मैंने आपसे विनती की थी कि आप उनसे अवश्य मिलें।

तीर्थ-यात्रा-कथा एइ कैलँ समापन । सङ्क्षेपे कहिलँ, विस्तार ना ग़ाय वर्णन ॥

३५८ ॥

इस तरह मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु की तीर्थयात्रा का वर्णन संक्षेप में पूरा किया है। इसे और विस्तार से नहीं बतलाया जा सकता।

अनन्त चैतन्य-लीला कहिते ना जानि ।।लोभे लज्जा खाजा तार करि टानाटानि ॥

३५९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अनन्त हैं। उनके कार्यकलापों का कोई ठीक से वर्णन नहीं कर सकता, फिर भी लोभवश मैंने चेष्टा की है। इससे मेरी निर्लज्जता ही प्रकट होती है।

भुर तीर्थ-यात्रा-कथा शुने येइ जन ।।चैतन्य-चरणे पाय गाढ़ प्रेम-धन ॥

३६०॥

जो कोई भी श्री चैतन्य महाप्रभु की विभिन्न तीर्थस्थानों की यात्रा के विषय में सुनता है, वह प्रगाढ़ प्रेमभाव रूपी धन को प्राप्त करता है।

चैतन्य-चरित शुन श्रद्धा-भक्ति करि' ।। मात्सर्घ छाड़िया मुखे बल ‘हरि' ‘हरि' ॥

३६१॥

कृपया श्रद्धा तथा भक्ति के साथ श्री चैतन्य महाप्रभु की दिव्य लीलाओं का श्रवण करें। सब लोग भगवान् से ईष्र्या करना छोड़कर भगवान् के पवित्र नाम हरि का कीर्तन करो।

एइ कलि-काले आर नाहि कोन धर्म ।। वैष्णव, वैष्णव-शास्त्र, एइ कहे मर्म ॥

३६२॥

। इस कलियुग में कोई असली धर्म नहीं रहा। केवल वैष्णव भक्तों तथा वैष्णव शास्त्रों द्वारा स्थापित सिद्धान्त रह गये हैं। यही सभी बातों का सार है।

चैतन्य-चन्द्रेर लीला–अगाध, गम्भीर । प्रवेश करते नारि,-स्पर्श रहि' तीर ॥

३६३ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अगाध समुद्र की भाँति हैं। उनमें प्रवेश कर पाना मेरे लिए सम्भव नहीं है। मैं तो समुद्र-तट पर खड़े होकर केवल जल का स्पर्श कर रहा हूँ।

चैतन्य-चरित श्रद्धाय शुने ग्रेइ जन । । ग्रतेक विचारे, तत पाय प्रेम-धन ।। ३६४॥

जितना अधिक कोई श्रद्धापूर्वक श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं को सुनता है और व्याख्या करके उनका अध्ययन करता है, उतना ही अधिक। वह भगवत्प्रेम रूपी धन को प्राप्त करता है।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे ग्रार आश । ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

३६५॥

श्री रूप और श्री रघुनाथ के चरणकमलों पर प्रार्थना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिहों पर चलकर श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

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