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अध्याय आठ: श्री चैतन्य महाप्रभु और रामानंद राय के बीच बातचीत

सञ्चार्य रामाभिध-भक्त-मेघेस्व-भक्ति-सिद्धान्त-चयामृतानि । गौराब्धिरेतैरमुना वितीर्णैस् ।तज्ज्ञत्व-रत्नालयतां प्रयाति ॥

१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु, जो गौरांग भी कहलाते हैं, भक्ति विषयक समस्त सैद्धान्तिक ज्ञान के सागर हैं। उन्होंने श्री रामानन्द राय को शक्ति प्रदान की, जिनकी तुलना भक्ति के बादल से की जा सकती है। यह बादल भक्ति के समस्त सैद्धान्तिक निष्कर्षों रूपी जल से पूरित था, और सागर द्वारा शक्तिप्रदत्त था कि वह इस जल को स्वयं श्री चैतन्य महाप्रभु रूपी समुद्र के ऊपर फैला दे। इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु रूपी समुद्र स्वयं शुद्ध भक्ति के ज्ञान रूपी रत्नों से भर गया।"

जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत आचार्य की जय हो तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! पूर्व-रीते प्रभु आगे गमन करिला ।‘जियड़-नृसिंह'-क्षेत्रे कत-दिने गेला ॥

३॥

अपने पूर्ववर्ती कार्यक्रम के अनुसार श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे यात्रा की और कुछ दिनों के बाद जियड़-नृसिंह नामक तीर्थस्थान पहुँचे।।"

नृसिंह देखिया कैल दण्डवत्प्रणति ।।प्रेमावेशे कैल बहु नृत्य-गीत-स्तुति ॥

४॥

मन्दिर में भगवान् नृसिंह के अर्चाविग्रह का दर्शन करके श्री चैतन्य महाप्रभु ने दण्डवत् प्रणाम किया। फिर प्रेमावेश में उन्होंने अनेक प्रकार से नृत्य किया, कीर्तन किया और स्तुतियाँ कीं।"

श्री-नृसिंह, जय नृसिंह, जय जय नृसिंह । प्रह्लादेश जय पद्मा-मुख-पद्म-भृङ्ग ॥

५॥

नृसिंहदेव की जय हो! नृसिंहदेव की जय हो! प्रह्लाद महाराज के प्रभु नृसिंहदेव की जय हो, जो भौंरे के समान ही लक्ष्मीजी के कमल सदृश मुख को देखने में सदैव लगे रहते हैं।'" उग्रोऽप्यनुग्र एवायं स्व-भक्तानां नृ-केशरी ।।केशरीव स्व-पोतानामन्येषां उग्र-विक्रमः ॥

६॥

यद्यपि सिंहिनी अत्यन्त हिंस्र होती है, किन्तु वह अपने बच्चों के प्रति अत्यन्त दयालु होती है। इसी तरह यद्यपि नृसिंहदेव हिरण्यकशिपु जैसे अभक्तों के प्रति अत्यन्त उग्र हैं, किन्तु वे प्रह्लाद महाराज जैसे भक्तों के प्रति अत्यन्त कोमल एवं दयालु हैं।"

एइ-मत नाना श्लोक पड़ि' स्तुति कैल ।।नृसिंह-सेवक माला-प्रसाद आनि' दिल ॥

७॥

इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु ने शास्त्रों से अनेक श्लोक सुनाये। तब नृसिंहदेव के पुजारी ने महाप्रभु को मालाएँ तथा प्रसाद लाकर दिया।"

पूर्ववत्कोन विप्रे कैल निमन्त्रण ।। सेइ रात्रि ताहाँ रहि' करिला गमन ॥

८॥

पहले की ही तरह एक ब्राह्मण ने श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने यहाँ आमन्त्रित किया। महाप्रभु ने वह रात्रि मन्दिर में ही बिताइ और पुनः अपनी यात्रा शुरू कर दी।"

प्रभाते उठिया प्रभु चलिला प्रेमावेशे । दिग्विदिक्नाहि ज्ञान रात्रि-दिवसे ॥

९ ॥

अगली सुबह श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रेमावेश में अपनी यात्रा पर बिना किसी दिशा-ज्ञान के ही चल पड़े और दिन-रात चलते गये।"

पूर्ववत् वैष्णव' करि' सर्व लोक-गणे । गोदावरी-तीरे प्रभु आइला कत-दिने ॥

१०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने पहले की ही तरह मार्ग में मिलने वाले अनेक लोगों को वैष्णव बनाया। कुछ दिनों बाद महाप्रभु गोदावरी नदी के तट पर जा पहुँचे।"

गोदावरी देखि' हइल 'यमुना'-स्मरण ।। तीरे वन देखि' स्मृति हैल वृन्दावन ॥

११॥

जब उन्होंने गोदावरी नदी देखी, तो उन्हें यमुना नदी का स्मरण हो आया और जब उन्होंने नदी के तट पर स्थित वन देखा, तो उन्हें श्री वृन्दावन धाम की याद हो आई।"

सेइ वने कत-क्षण करि' नृत्य-गान ।। गोदावरी पार हा ताहाँ कैल स्नान ॥

१२॥

इस वन में कुछ समय तक कुछ काल के लिए पहले की तरह कीर्तन तथा नृत्य करने के बाद महाप्रभु ने नदी पार की और दूसरे किनारे पर पहुँचकर स्नान किया।"

घाट छाड़ि' कत-दूरे जल-सन्निधाने ।वसि' प्रभु करे कृष्ण-नाम-सङ्कीर्तने ॥

१३॥

नदी में स्नान करने के बाद महाप्रभु स्नान-घाट से कुछ दूर गये और कृष्ण के पवित्र नाम के कीर्तन में लग गये।"

हेन-काले दोलाय चड़ि' रामानन्द राय ।।स्नान करिबारे आइला, बाजना बाजाय ॥

१४॥

उस समय बाजे-गाजे के साथ पालकी पर चढ़कर रामानन्द राय वहाँ ग्नान करने आये।"

ताँर सङ्गे बहु आइला वैदिक ब्राह्मण ।। विधि-मते कैल तेंहो स्नानादि-तर्पण ॥

१५॥

रामानन्द राय के साथ साथ वैदिक सिद्धान्तों का पालन करने वाले अनेक ब्राह्मण थे। रामानन्द राय ने वैदिक रीति से स्नान किया और अपने पितरों को तर्पण दिया।"

प्रभु ताँरै देखि' जानिल—एइ राम-राय ।। ताँहारे मिलिते प्रभुर मन उठि' धाय ॥

१६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु जान गये कि जो व्यक्ति नदी में स्नान करने आये हैं, वे रामानन्द राय हैं। महाप्रभु उनसे मिलने के लिए इतने इच्छुक हो उठे। कि उनका मन उसके पीछे-पीछे दौड़ने लगा।"

तथापि धैर्य धरि' प्रभु रहिला वसिया ।।रामानन्द आइला अपूर्व सन्यासी देखिया ॥

१७॥

यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु का मन उसके पीछे पीछे दौड़ रहा था, किन्तु वे धैर्यपूर्वक बैठे रहे। तब रामानन्द राय इसे अपूर्व संन्यासी को देखकर उनसे मिलने आये।"

सूर्य-शत-सम कान्ति, अरुण वसन । सुबलित प्रकाण्ड देह, कमल-लोचन ॥

१८॥

श्रील रामानन्द राय ने देखा कि श्री चैतन्य महाप्रभु सौ सूर्यों के समान कान्तिवान हैं। उन्होंने केसरिया वस्त्र पहन रखा था। उनका शरीर विशाल तथा सुदृढ़ था और उनकी आँखें कमल की पंखुड़ियों जैसी थीं।"

देखिया ताँहार मने हैल चमत्कार ।। आसिया करिल दण्डवत्नमस्कार ॥

१९॥

जब रामानन्द राय ने इस अद्भुत संन्यासी को देखा, तो वे । आश्चर्यचकित रह गये। वे उनके पास गये और तुरन्त भूमि पर दण्डवत् गिरकर उन्हें सादर नमस्कार किया।"

उठि' प्रभु कहे,—ऊठ, कह'कृष्ण' 'कृष्ण' । तारे आलिङ्गिते प्रभुर हृदय सतृष्ण ॥

२० ॥

महाप्रभु खड़े हो गये और उन्होंने रामानन्द राय से उठने तथा कृष्णनाम का कीर्तन करने के लिए कहा। श्री चैतन्य महाप्रभु उनका आलिंगन करने के लिए अत्यन्त उत्सुक थे।"

तथापि पुछिल, तुमि राय रामानन्द?।। तेंहो कहे,—सेई हङदास शूद्र मन्द ॥

२१॥

तब महाप्रभु ने पूछा कि क्या आप रामानन्द राय हो? तो उन्होंने उत्तर दिया, हाँ, मैं आपका तुच्छ दास हूँ और शूद्र जाति का हूँ।"

तबे तारे कैल प्रभु दृढ़ आलिङ्गन ।प्रेमावेशे प्रभु-भृत्य दोहे अचेतन ॥

२२॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्री रामानन्द राय का दृढ़ता से आलिंगन किया। इस तरह प्रभु तथा दास दोनों प्रेमावेश में अचेत-से हो गये।"

स्वाभाविक प्रेम दोंहार उदय करिला ।।मुँहा आलिङ्गिया हे भूमिते पड़िला ॥

२३॥

दोनों में एक-दूसरे के प्रति स्वाभाविक प्रेम उमड़ आया, दोनों ने आलिंगन किया और दोनों भूमि पर गिर पड़े।"

स्तम्भ, स्वेद, अश्रु, कम्प, पुलक, वैवर्य ।।मुँहार मुखेते शुनि' गद्गद 'कृष्ण' वर्ण ॥

२४॥

। एक-दूसरे का आलिंगन करते समय उनमें स्तम्भ, स्वेद, अश्रु, कम्प, पुलक, वैवर्य-ये भावलक्षण प्रकट हो आये। उनके मुखों से रुकरुककर ‘कृष्ण’ शब्द निकल रहा था।"

देखिया ब्राह्मण-गणेर हैल चमत्कार ।।वैदिक ब्राह्मण सबै करेन विचार ॥

२५॥

जब रूढ़िवादी कर्मकाण्डी वैदिक ब्राह्मणों ने इस प्रेम-आवेश के प्राकट्य को देखा, तो वे आश्चर्यचकित रह गये। वे सारे ब्राह्मण इस प्रकार विचार करने लगे।"

एइ त' सन्यासीर तेज देखि ब्रह्म-सम ।।शूद्रे आलिङ्गिया केने करेन क्रन्दन ॥

२६॥

ब्राह्मणों ने सोचा, हम देख रहे हैं कि इस संन्यासी में ब्रह्म जैसा तेज है, किन्तु यह समाज के चौथे वर्ण के एक शूद्र का आलिंगन करके से क्यों रहा है? एइ महाराज—महा-पण्डित, गम्भीर । सन्यासीर स्पर्शे मत्त हइला अस्थिर ॥

२७॥

उन्होंने सोचा, यह रामानन्द राय तो मद्रास का गवर्नर है, प्रकाण्ड पण्डित और गम्भीर व्यक्ति है, किन्तु इस संन्यासी का स्पर्श करके यह पागल व्यक्ति की तरह व्याकुल हो उठा है।"

एइ-मत विप्र-गण भावे मने मन ।।विजातीय लोक देखि, प्रभु कैल सम्वरण ॥

२८॥

जब सारे ब्राह्मण श्री चैतन्य महाप्रभु एवं रामानन्द राय के कार्यों के fuषय में इस प्रकार सोच रहे थे, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने इन बाहरी ब्राह्मणों को देख लिया, अतएव उन्होंने अपने दिव्य भावों को रोका।"

सुस्थ हा मुँहे सेइ स्थानेते वसिला ।।तबे हासि' महाप्रभु कहिते लागिला ॥

२९॥

। जब दोनों के मन स्थिर हो गये, तो दोनों बैठ गये और श्री चैतन्य महाप्रभु ने हँसकर इस प्रकार कहना शुरू किया।"

‘सार्वभौम भट्टाचार्य कहिल तोमार गुणे ।तोमारे मिलिते मोरे करिल ग्नतने ॥

३०॥

सार्वभौम भट्टाचार्य ने आपके सारे अच्छे गुण मुझसे बतलाये हैं। और उन्होंने मुझे प्रभावित करने का भरसक प्रयास किया कि मैं आपसे मिलँ।।"

तोमा मिलिबारे मोर एथा आगमन । भाल हैल, अनायासे पाइलँ दरशन' ॥

३१॥

निस्सन्देह, मैं यहाँ आपसे ही मिलने आया हूँ। अच्छा हुआ कि बिना प्रयास के आपसे यहाँ भेंट हो गईं।"

राय कहे,—सार्वभौम करे भृत्य-ज्ञान ।। परोक्षेह मोर हिते हेय सावधान ॥

३२॥

रामानन्द राय ने उत्तर दिया, सार्वभौम भट्टाचार्य मुझे अपने सेवक की तरह मानते हैं। वे मेरी अनुपस्थिति में भी मेरा हित करने के लिए सोचते रहते हैं।"

ताँर कृपाय पाइनु तोमार दरशन ।। आजि सफल हैल मोर मनुष्य-जनम ॥

३३ ॥

। उनकी कृपा से मुझे यहाँ पर आपका दर्शन प्राप्त हुआ है। फलतः मैं मानता हूँ कि आज मेरा मनुष्य-जन्म सफल हो गया।"

सार्वभौमे तोमार कृपा,—तार एइ चिह्न ।। अस्पृश्य स्पर्शले हा ताँर प्रेमाधीन ॥

३४॥

मैं देख रहा हूँ कि आपने सार्वभौम भट्टाचार्य पर विशेष कृपा की है। अतएव आपने मेरा स्पर्श किया है, यद्यपि मैं अस्पृश्य ( अछूत) हूँ। यह आपके प्रति उनके प्रेम के ही कारण है।"

काहाँ तुमि–साक्षातीश्वर नारायण ।काहाँ मुजि—राज-सेवी विषयी शूद्राधम ॥

३५॥

आप साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् नारायण हैं और मैं भौतिकतावादी कार्यों में रुचि रखने वाला केवल एक सरकारी नौकर हूँ। निस्सन्देह, मैं शूद्रों में भी सबसे नीच हूँ।"

मोर स्पर्शे ना करिले घृणा, वेद-भय ।। मोर दर्शन तोमा वेदे निषेधय ॥

३६॥

आपको इस वैदिक आदेश का भी भय नहीं है कि आपको शूद्र का संग नहीं करना चाहिए। यद्यपि वेदों में शूद्रों की संगति करने का निषेध है, किन्तु आपको मेरा स्पर्श करने में कोई घृणा नहीं हुई।"

तोमार कृपाय तोमाय कराय निन्द्य-कर्म । साक्षातीश्वर तुमि, के जाने तोमार मर्म ॥

३७॥

आप स्वयं साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, अतएव आपके प्रयोजन ( रहस्य) को कोई नहीं समझ सकता। यह आपकी कृपा है क्रि आप मेरा स्पर्श कर रहे हैं, यद्यपि वेदों द्वारा इसकी अनुमति नहीं है।"

आमा निस्तारिते तोमार इहाँ आगमन ।।परम-दयालु तुमि पतित-पावन ॥

३८॥

आप यहाँ मेरा उद्धार करने के लिए विशेष रूप से पधारे हैं। आप इतने दयालु हैं कि सभी पतितात्माओं को केवल आप ही उबार सकते हैं।"

महान्त-स्वभाव एइ तारिते पामर ।। निज कार्य नाहि तबु यान तार घर ॥

३९॥

सारे सन्त पुरुषों का यह सामान्य कार्य है कि वे पतितों का उद्धार करते हैं। इसीलिए वे लोगों के घरों में जाते हैं, यद्यपि वहाँ उनका कोई निजी कार्य नहीं रहता।।"

महद्विचलनं नृणां गृहिणां दीन-चेतसाम् ।।निःश्रेयसाय भगवन्नान्यथा कल्पते क्वचित् ॥

४०॥

। हे प्रभु, कभी-कभी बड़े से बड़े सन्त पुरुष भी गृहस्थों के घर जाते हैं, यद्यपि ये गृहस्थ सामान्यतया तुच्छ बुद्धि वाले होते हैं। जब कोई सन्त पुरुष उनके घर जाता है, तो यही समझना चाहिए कि गृहस्थों को लाभ पहुँचाने के अतिरिक्त उनका अन्य कोई उद्देश्य नहीं हो सकता।"

आमार सङ्गे ब्राह्मणादि सहस्त्रेक जन ।। तोमार दर्शने सबार द्रवी-भूत मन ॥

४१॥

मेरे साथ ब्राह्मणों को मिलाकर लगभग एक हजार व्यक्ति हैं और उन सबके हृदय आपके दर्शन से द्रवीभूत हो चुके हैं।"

'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम शुनि सबार वदने । सबार अङ्ग पुलकित, अश्रुनयने ॥

४२॥

मैं हर व्यक्ति को कृष्ण-नाम का कीर्तन करते हुए सुन रहा हूँ। प्रत्येक व्यक्ति का शरीर भाव से पुलकित है और हर एक की आँखों में आँसू हैं।"

आकृत्ये-प्रकृत्ये तोमार ईश्वर-लक्षण ।।जीवे ना सम्भवे एइ अप्राकृत गुण ॥

४३॥

हे मान्यवर, आप अपने शारिरिक लक्षणों तथा स्वभाव से पूर्ण पुरूषोत्तम भगवान् हैं। सामान्य जीवों में ऐसे दिव्य लक्षणों का मिलना असम्भव है।"

प्रभु कहे,—तुमि महा-भागवतोत्तम । तोमार दर्शने सबार द्रव हैल मन ॥

४४॥

। महाप्रभु ने रामानन्द राय को उत्तर दिया, हे महोदय, आप सर्वोच्च भक्तों के शिरोमणि हैं, अतएव आपके दर्शन से हर एक का हृदय द्रवित हो उठा है।"

अन्येर कि कथा, आमि–‘मायावादी सन्यासी' । आमिह तोमार स्पर्शे कृष्ण-प्रेमे भासि ॥

४५ ॥

। यद्यपि मैं मायावादी संन्यासी अर्थात् अभक्त हूँ, किन्तु आपका स्पर्श पाने मात्र से मैं भी कृष्ण-प्रेम के सागर में तैर रहा हूँ। दूसरों का तो कहना ही क्या? एइ जानि' कठिन मोर हृदय शोधिते ।।सार्वभौम कहिलेन तोमारे मिलिते ॥

४६॥

सार्वभौम भट्टाचार्य यह जानते थे कि ऐसा होगा और इसीलिए मेरे अत्यन्त कठोर हृदय को शुद्ध करने के उद्देश्य से उन्होंने मुझे आपसे मिलने के लिए कहा है।"

एइ-मत ढूँहे स्तुति करे मुँहार गुण ।।मुँहे बँहार दरशने आनन्दित मन ॥

४७॥

इस तरह दोनों एक-दूसरे के गुणों की प्रशंसा करते रहे, और दोनों ही एक-दूसरे को देखकर अत्यन्त प्रसन्न थे।"

हेन-काले वैदिक एक वैष्णव ब्राह्मण । दण्डवत्करि' कैल प्रभुरे निमन्त्रण ॥

४८ ।। उसी समय एक वैष्णव ब्राह्मण आया, जो वैदिक नियमों का पालन करने वाला था और उसने नमस्कार किया। महाप्रभु के समक्ष दण्डवत् गिरने के बाद उसने उन्हें भोजन करने के लिए आमन्त्रित किया।"

निमन्त्रण मानिल ताँरै वैष्णव जानिया । रामानन्दे कहे प्रभु ईषत् हासिया ॥

४९॥

। महाप्रभु ने उस ब्राह्मण को एक भक्त जानकर उसका निमन्त्रण स्वीकार कर लिया और कुछ-कुछ हँसते हुए रामानन्द राय से वे इस प्रकार बोले।"

तोमार मुखे कृष्ण-कथा शुनिते हय मन । पुनरपि पाइ ग्रेन तोमार दरशन ॥

५०॥

“मैं आपसे भगवान् कृष्ण के विषय में सुनना चाहता हूँ। मेरा मन ऐसा चाहता है, अतएव मैं आपके दर्शन फिर से करना चाहता हूँ।"

राय कहे, आइला यदि पामर शोधिते । दर्शन-मात्रे शुद्ध नहे मोर दुष्ट चित्ते ॥

५१॥

दिन पाँच-सात रहि' करह मार्जन ।।तबे शुद्ध हय मोर एइ दुष्ट मन ॥

५२॥

रामानन्द राय ने उत्तर दिया, हे प्रभु, यद्यपि आप मुझ पतित का शोधन करने आये हैं, किन्तु मेरा मन आपको देखने से अभी शुद्ध नहीं हुआ है। कृपया आप पाँच-सात दिन रुकें और मेरे दूषित मन को शुद्ध कर दें। इतने दिनों में मेरा मन अवश्य ही शुद्ध हो जायेगा।"

ग्रद्यपि विच्छेद दोंहार सहन ना ग्राय ।। तथापि दण्डवत्करि' चलिला राम-राय ॥

५३॥

यद्यपि वे दोनों एक-दूसरे के विछोह को सहन नहीं कर सकते थे, फिर भी रामानन्द राय ने महाप्रभु को नमस्कार किया और वहाँ से विदा ली।"

प्रभु झाइ' सेइ विप्र-घरे भिक्षा कैल ।दुइ जनार उत्कन्ठाय आसि' सन्ध्या हैल ॥

५४॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु उस ब्राह्मण के घर गये, जिसने उन्हें आमन्त्रित किया था और उन्होंने वहीं भोजन किया। जब संध्या हुई, तो रामानन्द राय तथा महाप्रभु दोनों ही एक-दूसरे से पुनः मिलने के लिए उत्कण्ठित हो उठे।"

प्रभु स्नान-कृत्य करि' आछेन वसिया ।। एक-भृत्य-सङ्गे राय मिलिला आसिया ॥

५५॥

। शाम को स्नान करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु बैठकर रामानन्द राय के आने की प्रतीक्षा करने लगे। तभी रामानन्द राय एक नौकर के साथ उनसे मिलने के लिए आये।"

नमस्कार कैल राय, प्रभु कैल आलिङ्गने ।। दुइ जने कृष्ण-कथा कय रहः-स्थाने ॥

५६॥

। रामानन्द राय ने महाप्रभु के पास आकर सादर नमस्कार किया और महाप्रभु ने उनका आलिंगन किया। फिर वे दोनों एकान्त स्थान में कृष्ण के विषय में चर्चा करने लगे।"

प्रभु कहे,–पड़ श्लोक साध्येिर निर्णय ।। राय कहे,–स्व-धर्माचरणे विष्णु-भक्ति हय ॥

५७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय को आदेश दिया, जीवन के चरम लक्ष्य से सम्बन्धित शास्त्रों से एक श्लोक सुनायें। इस पर रामानन्द ने उत्तर दिया, यदि कोई अपने सामाजिक पद सम्बन्धी नियत कर्मों को सम्पन्न करता है, तो वह अपनी मूल कृष्णभावनामृत को जाग्रत करता हैं ।"

वर्णाश्रमाचार-वता पुरुषेण परः पुमान् ।। विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्तत्तोष-कारणम् ॥

५८॥

वर्णाश्रम प्रणाली में नियत कर्तव्यों को उचित रीति से सम्पन्न करके पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् विष्णु की पूजा की जाती है। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को तुष्ट करने की अन्य कोई विधि है ही नहीं। मनुष्य को चारों वर्गों तथा चारों आश्रमों के संस्थान में स्थित होना चाहिए।"

प्रभु कहे, एहो बाह्य, आगे कह आर ।। राय कहे, कृष्णे कर्मार्पण सर्व-साध्य-सार ॥

५९॥

महाप्रभु ने कहा, यह तो बाह्य है। आप मुझे कोई दूसरा साधन बतलायें। इस पर रामानन्द ने उत्तर दिया, सारी पूर्णता का सार यह है। कि अपने कर्मों के फल कृष्ण को अर्पित किये जाएँ।"

ग्रत्करोषि ग्रदश्नासि झज्जुहोषि ददासि ग्रत् ।। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ॥

६० ॥

रामानन्द राय ने आगे कहा, हे कुन्ती-पुत्र, तुम जो कुछ करो, जो भी खाओ, जो भी यज्ञ करो, जो भी दान दो तथा तुम जितनी भी तपस्याएँ करो, उन सबके फल मुझे, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण को अर्पण करो।"

प्रभु कहे,-एहो बाह्य, आगे कह आर ।।राय कहे,–स्वधर्म-त्याग, एइ साध्य-सार ॥

६१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, यह भी बाह्य है। इस विषय पर आगे कहो। तब रामानन्द राय ने उत्तर दिया, वर्णाश्रम में अपने नियत कर्मों को त्यागना ही पूर्णता का सार है।"

आज्ञायैवं गुणान्दोषान्मयादिष्टानपि स्वकान् ।।धर्मान्सन्त्यज्य ग्रः सर्वान्मां भजेत्स च सत्तमः ॥

६२॥

रामानन्द राय ने आगे कहा, शास्त्रों में नियत कर्तव्यों का वर्णन हुआ है। उनका विश्लेषण करने पर उनके गुण-दोषों का पता चल सकता है। और तब उनका पूर्ण परित्याग करके पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा की जा सकती है। ऐसा व्यक्ति उच्च कोटि का माना जाता है।"

सर्व-धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज । अहं त्वां सर्व-पापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥

६३॥

। जैसाकि शास्त्र ( भगवद्गीता १८.६६ ) में कहा गया है, 'यदि तुम सारे धार्मिक तथा नियत कर्तव्यों को त्यागकर मुझ भगवान् की शरण में । आ जाओ, तो मैं तुम्हें तुम्हारे जीवनभर के सारे पापकर्मों के फलों से । छुटकारा दिला हूँगा। तुम चिन्ता मत करो।"

प्रभु कहे,_एहो बाह्य, आगे कह आर ।। राय कहे, ज्ञान-मिश्रा भक्ति-साध्य-सार ॥

६४॥

रामानन्द राय को इस तरह बातें करते सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनके कथन को अस्वीकार करते हुए कहा, आगे कुछ और कहो। तब रामानन्द राय ने कहा, ज्ञानमिश्रित भक्ति ही पूर्णता का सार है।"

ब्रह्म-भूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।। समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥

६५॥

रामानन्द राय ने आगे कहा, भगवद्गीता के अनुसार-'जो इस प्रकार दिव्य पद को प्राप्त है, उसे परम ब्रह्म की अनुभूति तुरन्त हो जाती है और वह पूर्णतया प्रसन्न हो जाता है। वह न तो कभी चिन्ता करता है, न किसी वस्तु की इच्छा रखता है। वह सभी जीवों के प्रति समभाव रखता है। उस अवस्था में वह मेरी पूर्ण भक्ति प्राप्त करता है।"

प्रभु कहे, एहो बाह्य, आगे कह आर ।। राय कहे,--ज्ञान-शून्या भक्ति–साध्य-सार ॥

६६॥

यह सुनकर महाप्रभु ने पहले की तरह इसे भी बाह्य भक्ति मानते हुए अस्वीकार कर दिया। उन्होंने रामानन्द राय से पुनः आगे बोलने के लिए कहा। इस पर रामानन्द राय ने उत्तर दिया, ज्ञान से रहित शुद्ध भक्ति ही पूर्णता का सार है।"

ज्ञाने प्रयासमुदपास्य नमन्त एव ।जीवन्ति सन्मुखरितां भवदीय-वार्ताम् । स्थाने स्थिताः श्रुति-गतां तनु-वाङ्मनोभिर्ये प्रायशोऽजित जितोऽप्यसि तैत्रि-लोक्याम् ॥

६७॥

रामानन्द ने आगे कहा, [ ब्रह्माजी ने कहा :‘हे प्रभु, जिन भक्तों ने परम सत्य के बारे में निर्विशेष खयाल को त्याग दिया है और जिन्होंने चिन्तन के दार्शनिक सत्यों के बारे में विचार-विमर्श करना त्याग दिया है, उन्हें स्वरूपसिद्ध भक्तों से आपके नाम, रूप, लीलाओं तथा गुणों के बारे में श्रवण करना चाहिए। उन्हें भक्ति के नियमों का पूर्णतया पालन करना चाहिए और अवैध सम्बन्ध, जुआ, नशा तथा पशु-हत्या से दूर रहना चाहिए। मन, कर्म तथा वचन से शरणागत होकर वे किसी भी वर्ण या आश्रम में रह सकते हैं। निस्सन्देह, आप सदैव अजेय होते हुए भी ऐसे व्यक्तियों द्वारा जीते जाते हैं।"

प्रभु कहे, एहो हय, आगे कह आर ।। राय कहे, प्रेम-भक्ति--सर्व-साध्य-सार ॥

६८ ॥

। इस पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, यह ठीक है, फिर भी कुछ आगे कहो। तब रामानन्द राय ने कहा, समस्त पूर्णता का सार पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की भावपूर्ण प्रेमाभक्ति है।"

नानोपचार-कृत-पूजनमार्त-बन्धोः ।प्रेम्णैव भक्त-हृदयं सुख-विद्रुतं स्यात् ।। यावत्क्षुदस्ति जठरे जरठा पिपासातावत्सुखाय भवतो ननु भक्ष्य-पेये ॥

६९॥

रामानन्द राय ने आगे कहा, जब तक पेट में भूख और प्यास है, तब तक विविध प्रकार के खाद्य-पेय पदार्थों से मनुष्य अत्यन्त सुख का अनुभव करता है। इसी तरह जब शुद्ध प्रेम से भगवान् की पूजा की जाती है, तो उस पूजा के दौरान किए गये विभिन्न कार्यकलापों से भक्त के हृदय में दिव्य आनन्द जाग्रत होता है।"

कृष्ण-भक्ति-रस-भाविता मतिः । क्रीयतां यदि कुतोऽपि लभ्यते । तत्र लौल्यमपि मूल्यमेकलंजन्म-कोटि-सुकृतैर्न लभ्यते ॥

७० ॥

सैकड़ों-हजारों जन्मों के पुण्यकर्मों से भी कृष्णभावनाभावित शुद्ध भक्ति प्राप्त नहीं की जा सकती। इसे तो केवल एक मूल्य पर-उसे प्राप्त करने की उत्कट लालसा से ही–प्राप्त की जा सकती है। यदि यह कहीं भी उपलब्ध हो सके, तो उसे तुरन्त ही खरीद लेनी चाहिए।"

प्रभु कहे, एहो हय, आगे कह आर ।। राय कहे, दास्य-प्रेम–सर्व-साध्य-सार ॥

७९॥

स्वतः स्फूर्त प्रेम की बात सुनकर महाप्रभु ने कहा, यह ठीक है, किन्तु यदि आप और अधिक जानते हों तो कृपया मुझे बतलायें। इसके उत्तर में रामानन्द राय ने कहा, स्वतः स्फूर्त दास्य प्रेम-स्वामी तथा । सेवक में आदान-प्रदान होने वाला प्रेम-ही सर्वोच्च पूर्णता है।"

ग्रन्नाम-श्रुति-मात्रेण पुमान्भवति निर्मलः ।तस्य तीर्थ-पदः किं वा दासानामवशिष्यते ॥

७२॥

जिन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के चरणकमल तीर्थस्थानों को उत्पन्न करते हैं, उनके पवित्र नाम को सुनने से ही मनुष्य निर्मल हो जाता है। अतएव जो उनके दास बन चुके हैं, उन्हें अब आगे पाने के लिए क्या बचा है? भवन्तमेवानुचरन्निरन्तरःप्रशान्त-नि:शेष-मनो-रथान्तरः ।।कदाहमैकान्तिक-नित्य-किङ्करःप्रहर्षयिष्यामि स-नाथ-जीवितम् ॥

७३॥

। आपकी निरन्तर सेवा करते रहने से मनुष्य सारी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है और पूर्णतया शान्त बन जाता है। वह दिन कब आयेगा जब आप मुझे अपना सनातन दास बना लेंगे और मैं आप जैसे पूर्ण स्वामी को पाकर परम हर्ष का अनुभव करूँगा? प्रभु कहे, एहो हय, किछु आगे आर ।।राय कहे, सख्य-प्रेम--सर्व-साध्य-सार ॥

७४॥

रामानन्द राय से यह सुनकर महाप्रभु ने पुनः प्रार्थना की कि वे और आगे बढ़े। रामानन्द राय ने उत्तर में कहा, सख्य भाव से की गई कृष्ण की प्रेमाभक्ति सर्वोच्च पूर्णता है।"

इत्थं सतां ब्रह्म-सुखानुभूत्यादास्यं गतानां पर-दैवतेन ।। मायाश्रितानां नर-दारकेण ।सार्धं विजः कृत-पुण्य-पुञ्जाः ॥

७५॥

जो लोग भगवान् के ब्रह्मतेज की सराहना करते हुए आत्मसाक्षात्कार में लगे हैं, और जो लोग भगवान् को स्वामी के रूप में स्वीकार करके भक्ति में लगे हैं, तथा वे जो भगवान् को सामान्य पुरुष मानकर माया के पाश में बँधे रहते हैं, कभी यह नहीं समझ सकते कि कुछ महापुरुष अनेक पुण्यकर्मों को संचित करने के बाद ग्वालबालों के रूप में भगवान् के साथ मित्र बनकर खेल रहे हैं।"

प्रभु कहे,–एहो उत्तम, आगे कह आर ।। राय कहे, वात्सल्य-प्रेम–सर्व-साध्य-सार ॥

७६ ॥

महाप्रभु ने कहा, ह कथन अति उत्तम है, किन्तु आगे कहते चलो।तब रामानन्द राय ने उत्तर दिया, भगवान् के प्रति वात्सल्य प्रेम सर्वोच्च पूर्णता की अवस्था है।"

नन्दः किमकरोद्बह्मन्श्रेय एवं महोदयम् ।।यशोदा वा महा-भागा पपौ यस्याः स्तनं हरिः ॥

७७॥

रामानन्द राय कहते रहे, हे ब्राह्मण, भला नन्द महाराज ने कौनसा पुण्यकर्म किया था, जिसके कारण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण उन्हें पुत्र रूप में प्राप्त हुए? और माता यशोदा ने कौन-से पुण्यकर्म किये थे, जिनके कारण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण से अपने आपको माता कहलवाया और अपने स्तनों का पान कराया? नेमं विरिञ्चो न भवो न श्रीरप्यङ्ग-संश्रया ।प्रसादं लेभिरे गोपी ग्रत्तत्प्राप विमुक्ति-दात् ॥

७८ ॥

मुक्ति प्रदान करने वाले श्रीकृष्ण से माता यशोदा को जो कृपाप्रसाद मिला, वह न तो कभी ब्रह्माजी को प्राप्त हो सका, न शिवजी को, न ही उन लक्ष्मीजी को जो सदैव भगवान् विष्णु के वक्षस्थल पर विराजमान रहती हैं।"

प्रभु कहे, एहो उत्तम, आगे कह आर ।राय कहे, कान्ती-प्रेम सर्व-साध्य-सार ॥

७९॥

। महाप्रभु ने कहा, तुम्हारे कथन उत्तरोत्तर अच्छे होते जा रहे हैं, किन्तु इन सबसे बढ़कर अन्य दिव्य रस है, जिसे आप अच्छी तरह बतला सकते हैं। तब रामानन्द राय ने उत्तर दिया, भगवत्प्रेम में कृष्ण के प्रति माधुर्य आसक्ति सर्वोपरि है।"

नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्त-रतेः प्रसादः ।स्वर्णोषितां नलिन-गन्ध-रुचां कुतोऽन्याः ।। रासोत्सवेऽस्य भुज-दण्ड-गृहीत-कण्ठलब्धाशिषां य उदगाव्रज-सुन्दरीणाम् ॥

८०॥

। जब भगवान् श्रीकृष्ण गोपियों के साथ रासनृत्य कर रहे थे, तब उनकी भुजाएँ गोपियों के गले के इर्द गिर्द उनका आलिंगन कर रही थीं। ऐसा दिव्य सुयोग न तो कभी लक्ष्मीजी को प्राप्त हुआ, न ही वैकुण्ठ की अन्य प्रेयसियों को। न ही स्वर्गलोक की उन श्रेष्ठ सुन्दरियों ने कभी ऐसी कल्पना की थी, जिनकी शारीरिक कान्ति तथा सुगन्धि कमल के फूल जैसी है। तो भला उन सांसारिक स्त्रियों की बात ही क्या, जो भौतिक दृष्टि से अत्यन्त सुन्दर हों? तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमान-मुखाम्बुजः ।।पीताम्बर-धरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथ-मन्मथः ॥

८१ ॥

गोपियों की विरह भावनाओं के कारण कृष्ण पीताम्बर पहने फूलों की माला धारण किये एकाएक उनके बीच में प्रकट हो गये। उनका कमल-मुख मुस्कुरा रहा था और वे कामदेव के मन को भी आकृष्ट करने वाले थे।"

कृष्ण-प्राप्तिर उपाय बहु-विध हय ।।कृष्ण-प्राप्ति-तारतम्य बहुत आछय ॥

८२॥

कृष्ण की कृपा प्राप्त करने के अनेक साधन तथा विधियाँ हैं। अब उन सारी दिव्य विधियों का अध्ययन सापेक्ष महत्त्व की दृष्टि से किया जायेगा।"

किन्तु याँर ग्रेड रस, सेई सर्वोत्तम । तट-स्थ हा विचारिले, आछे तर-तम ॥

८३॥

यह सच है कि भगवान् के साथ जिस भक्त का जैसा भी सम्बन्ध है, वही उसके लिए सर्वोत्तम है। किन्तु तो भी जब हम विभिन्न विधियों का अध्ययन तटस्थ होकर करते हैं, तो हम समझ सकते हैं कि प्रेम की उच्च तथा निम्न कोटियाँ होती हैं।"

ग्रथोत्तरमसौ स्वाद-विशेषोल्लास-मय्यपि । रतिर्वासनया स्वाद्वी भासते कापि कस्यचित् ॥

८४॥

“एक के बाद एक रसों में अधिकाधिक प्रेम का अनुभव होता है। किन्तु सर्वोच्च स्वाद वाला प्रेम तो माधुर्य रस में ही प्रकट होता है।"

पूर्व-पूर्व-रसेर गुण----परे परे हय ।। दुइ-तिन गणने पञ्च पर्यन्त बाड़य ।। ८५॥

एक रस से लेकर बाद के रसों तक क्रमशः बढ़ोतरी होती जाती है। दूसरे, तीसरे और अधिक से अधिक पाँचवे रस तक प्रत्येक परवर्ती रस के गुण में पूर्ववर्ती रस के गुण प्रकट होते हैं।"

गुणाधिक्ये स्वादाधिक्य बाड़े प्रति-रसे ।।शान्त-दास्य-सख्य-वात्सल्येर गुण मधुरेते वैसे ॥

८६॥

गुणों में वृद्धि के साथ-साथ प्रत्येक रस के स्वाद में भी वृद्धि होती जाती है। अतएव शान्त रस, दास्य रस, सख्य रस तथा वात्सल्य रस के सारे गुण माधुर्य रस में प्रकट होते हैं।"

आकाशादिर गुण ग्रेन पर-पर भूते ।।दुइ-तिन क्रमे बाड़े पञ्च पृथिवीते ॥

८७।। पाँच भौतिक तत्त्वों-आकाश, वायु, अग्नि, जल तथा पृथ्वी-में गुणों की उत्तरोत्तर वृद्धि एक, दो, तथा तीन की क्रमिक विधि से होती है और अन्तिम अवस्था में पृथ्वी तत्त्व में पाँचों गुण पूर्णतया दृष्टिगोचर होते है।"

परिपूर्ण-कृष्ण-प्राप्ति एइ ‘प्रेमा' हैते ।। एइ प्रेमार वश कृष्ण कहे भागवते ॥

८८ ॥

भगवान् कृष्ण के चरणकमलों की पूर्ण प्राप्ति भगवत्प्रेम से, विशेष रूप से माधुर्य रस द्वारा सम्भव हो पाती है। भगवान् कृष्ण इस स्तर के प्रेम के वश में हो जाते हैं। श्रीमद्भागवत में ऐसा कहा गया है।"

मयि भक्तिर्हि भूतानाममृतत्वाय कल्पते । दिष्ट्या ग्रदासीन्मत्स्नेहो भवतीनां मदापनः ॥

८९॥

भगवान् कृष्ण ने गोपियों से कहा, 'मेरी कृपा प्राप्त करने का साधन मेरी प्रेममयी सेवा है और सौभाग्य से तुम सब उसी में लगी हुई हो। जो जीव मेरी सेवा करते हैं, वे वैकुण्ठ जाने और ज्ञान तथा आनन्द से पूर्ण शाश्वत जीवन प्राप्त करने के पात्र हैं।"

कृष्णेर प्रतिज्ञा दृढ़ सर्व-काले आछे ।ग्रे ग्रैछे भजे, कृष्ण तारे भजे तैछे ॥

९०॥

। भगवान् कृष्ण ने सदा सदा के लिए दृढ़ प्रतिज्ञा की है। जो कोई कृष्ण की जितनी सेवा करता है, वे उसे भगवद्भक्ति में उतनी ही सफलता प्रदान करते हैं।"

ग्रे ग्रथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम् ।।मम वर्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः ॥

९१॥

[ भगवद्गीता (४.११) में भगवान् कृष्ण के अनुसार : ‘जिस भाव से सभी लोग मेरी शरण में आते हैं, उसी के अनुरूप मैं उन्हें फल प्रदान करता हूँ। हे पृथा-पुत्र, हर व्यक्ति सभी प्रकार से मेरे पथ का अनुसरण करता है।"

एइ ‘प्रेमे 'र अनुरूप ना पारे भजिते ।।अतएव 'ऋणी' हय—कहे भागवते ॥

९२॥

श्रीमद्भागवत (१०.३२.२२) में कहा गया है कि भगवान् कृष्ण माधुर्य रस में भक्ति का आदान-प्रदान समान अनुपात में नहीं कर पाते, अतएव वे ऐसे भक्तों के सदैव ऋणी रहते हैं।"

न पारयेऽहं निरवस्व-साधु-कृत्यं विबुधायुषापि वः ।। ग्रा माभजन्दुर्जय-गेह-शृङ्खलाः ।संवृश्च्य तद्वः प्रतियातु साधुना ॥

१३॥

जब गोपियाँ कृष्ण से रासलीला में उनकी अनुपस्थिति के कारण असन्तुष्ट होकर विह्वल थीं, तभी कृष्ण वापस आ गये और उन्होंने उनसे कहा, हे गोपियों, हमारा मिलन निस्सन्देह समस्त भौतिक कल्मष से मुक्त है। मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं तुम सबके ऋण को अनेक जन्मों में भी नहीं चुका सकुँगा, क्योंकि तुम लोगों ने मुझे ढूंढ़ने के लिए अपने पारिवारिक बन्धनों को तोड़ डाला है। अतएव मैं ऋण चुकाने में असमर्थ हूँ। फलतः तुम लोग इस सम्बन्ध में किये गये अपने नेक कार्यों से सन्तुष्ट हो जाओ।"

यद्यपि कृष्ण-सौन्दर्य-माधुर धुर्घ ।।व्रज-देवीर सङ्गे ताँर बाड़ये माधुर्यं ॥

९४।। यद्यपि कृष्ण का अप्रतिम सौन्दर्य भगवत्प्रेम का सर्वोच्च माधुर्य है, किन्तु जब वे गोपियों के संग में होते हैं, तब उनका माधुर्य असीम रूप से बढ़ जाता है। फलस्वरूप गोपियों के साथ कृष्ण द्वारा प्रेम का आदानप्रदान भगवत्प्रेम की चरम पूर्णता है।"

तत्रातिशुशुभे ताभिर्भगवान्देवकी-सुतः ।। मध्ये मणीनां हैमानां महा-मरकतो यथा ॥

९५॥

यद्यपि देवकी-पुत्र भगवान् समस्त सौन्दर्य के आगार हैं, किन्तु जब वे गोपियों के बीच होते हैं, तब वे और भी अधिक सुन्दर लगते हैं, श्योंकि वे सोने तथा अन्य मणियों से घिरे हुए मरकत मणि जैसे लगते हैं प्रभु कहे,---एइ ‘साध्यावधि' सुनिश्चय ।। कृपा करि' कह, यदि आगे किछु हय ॥

९६ ।। । श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, यह निश्चय ही पूर्णता की सीमा है, किन्तु आप मुझ पर कृपा करें और यदि कुछ और हो तो उसे कहें।"

राय कहे,—इहार आगे पुछे हेन जने ।। एत-दिन नाहि जानि, आछये भुवने ॥

९७॥

रामानन्द राय ने उत्तर दिया, आज तक मैं इसे भौतिक संसार में ऐसे किसी व्यक्ति को नहीं जानता था, जो भक्ति की इस पूर्ण अवस्था के आगे क्या है, इसके बारे में पूछ सके।"

इँहार मध्ये राधार प्रेम-साध्य-शिरोमणि' ।झाँहार महिमा सर्व-शास्त्रेते वाखानि ॥

९८॥

रामानन्द राय कहते गये, गोपियों के प्रेम व्यापार में से कृष्ण के प्रति श्रीमती राधारानी का प्रेम सर्वोपरि है। निस्सन्देह, श्रीमती राधारानी की महिमा का बखान सभी प्रामाणिक शास्त्रों में उच्च स्तर पर हुआ है।"

यथा राधा प्रिया विष्णोस्तस्याः कुण्डं प्रियं तथा । सर्व-गोपीषु सैवैका विष्णोरत्यन्त-वल्लभा ॥

९९॥

जिस तरह श्रीमती राधारानी श्रीकृष्ण को परम प्रिय हैं, उसी तरह उनका स्नान-स्थान राधाकुण्ड भी उन्हें प्रिय है। सारी गोपियों में श्रीमती राधारानी सर्वोच्च हैं और कृष्ण को अत्यन्त प्रिय हैं।"

अनयाराधितो नूनं भगवान्हरिरीश्वरः ।। ग्रन्नो विहाय गोविन्दः प्रीतो ग्रामनयद्रहः ॥

१००॥

[ गोपियों ने परस्पर बातें करते हुए कहा : 'हे सखियों, जिस गोपी को कृष्ण अपने साथ एकान्त स्थल में ले गये हैं, उसने भगवान् की पूजा दूसरे सब की अपेक्षा अधिक की होगी।"

प्रभु कहे—आगे कह, शुनिते पाइ सुखे ।।अपूर्वामृत-नदी वहे तोमार मुखे ॥

१०१॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, बोलते जाइये। मुझे आपकी बातें सुनकर परम सुख हो रहा है, क्योंकि आपके मुख से अद्वितीय अमृत की नदी बह रही है।"

चुरि करि' राधाके निल गोपी-गणेर डरे । अन्यापेक्षा हैले प्रेमेर गाढ़ता ना स्फुरे ॥

१०२ ॥

श्रीकृष्ण ने रासनृत्य के समय अन्य गोपियों की उपस्थिति के कारण श्रीमती राधारानी से प्रेम का आदान-प्रदान नहीं किया। अन्यों पर आश्रित होने के कारण राधा तथा कृष्ण के प्रेम की प्रगाढ़ता प्रकट नहीं हो पाई। इसीलिए वे उन्हें चुरा ले गये।"

राधा लागि' गोपीरे यदि साक्षात्करे त्याग । तबे जानि,—राधाय कृष्णेर गाढ़-अनुराग ॥

१०३ ॥

यदि भगवान् कृष्ण ने राधारानी के लिए अन्य गोपियों का साथ त्याग दिया, तो हम यह समझ सकते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण में उनके fणा प्रगाढ़ स्नेह है।"

राय कहे,—तबे शुन प्रेमेर महिमा ।।त्रि-जगते राधा-प्रेमेर नाहिक उपमा ॥

१०४॥

रामानन्द राय ने आगे कहा, “अतएव आप मुझसे श्रीमती राधारानी के प्रेम की महिमा सुनें। तीनों लोकों में उसकी तुलना के योग्य अन्य कोई नहीं है।"

गोपी-गणेर रास-नृत्य-मण्डली छाड़िया ।।राधा चाहि' वने फिरे विलाप करिया ॥

१०५॥

श्रीमती राधारानी ने जब यह देखा कि उनके साथ अन्य गोपियों जैसा व्यवहार हो रहा है, तो उन्होंने चाल चली और रासनृत्य के मण्डल (वृत्त) को छोड़ दिया। श्रीमती राधारानी को न पाकर कृष्ण दुःखी हुए और विलाप करते हुए उनकी खोज में सारे वन में घूमने लगे।"

कंसारिरपि संसार-वासना-बद्ध-शृङ्खलाम् ।। राधामाधाय हृदये तत्याज व्रज-सुन्दरीः ॥

१०६॥

कंस के शत्रु भगवान् कृष्ण ने श्रीमती राधारानी को अपने हृदय में बसा लिया, क्योंकि वे उनके साथ नृत्य करना चाहते थे। इस तरह उन्होंने रासनृत्य के क्षेत्र को तथा व्रज की अन्य सुन्दरियों का साथ छोड़ दिया।"

इतस्ततस्तामनुसृत्य राधिकाम् ।अनङ्ग-बाण-व्रण-खिन्न-मानसः ।। कृतानुतापः स कलिन्द-नन्दिनी ।तटान्त-कुल्ले विषसाद माधवः ॥

१०७॥

कामदेव के बाणों से विद्ध होकर तथा राधारानी के साथ किये गये दुर्व्यवहार से दुःखी होकर माधव, भगवान् कृष्ण, श्रीमती राधारानी को यमुना नदी के किनारे-किनारे खोजने लगे। किन्तु जब वे उन्हें नहीं खोज सके, तो वे वृन्दावन के कुंजों में प्रवेश करके विलाप करने लगे।"

एइ दुइ-श्लोकेर अर्थ विचारिले जानि ।। विचारिते उठे येन अमृतेर खनि ॥

१०८॥

केवल इन्हीं दो श्लोकों पर विचार करने से समझा जा सकता है कि ऐसे प्रेम-व्यापारों में कितना अमृत है। यह तो वैसा ही है जैसे अमृत की खान को खुला छोड़ दिया जाए।"

शत-कोटि गोपी-सङ्गे रास-विलास ।। तार मध्ये एक-मूर्ये रहे राधा-पाश ॥

१०९॥

। यद्यपि रासनृत्य के समय श्रीकृष्ण लाखों गोपियों के बीच में थे, किन्तु तो भी उन्होंने अपने आपको अनेकों में से एक दिव्य रूप में श्रीमती राधारानी की बगल में रखा।"

साधारण-प्रेमे देखि सर्वत्र 'समता' ।। राधार कुटिल-प्रेमे हइल 'वामता' ॥

११०॥

यद्यपि भगवान् कृष्ण अपने सामान्य व्यवहार में सबके प्रति समभाव रखते हैं, किन्तु श्रीमती राधारानी के कुटिल प्रेमभाव के कारण विरोधी तत्त्व उपस्थित हो गये।"

अहेरिव गतिः प्रेम्णः स्वभाव-कुटिला भवेत् ।।अतो हेतोरहेतोश्च यूनोर्मान उदञ्चति ॥

१११॥

। तरुण युवक तथा तरुण युवती के मध्य प्रेम की प्रगति साँप की गति जैसी होती है। इसके फलस्वरूप तरुण युगलों में दो प्रकार का क्रोध उत्पन्न होता है-एक तो हेतु सहित क्रोध और दूसरे हेतु रहित क्रोध।"

क्रोध करि' रास छाड़ि' गेला मान करि' ।। तारै ना देखिया व्याकुल हैल श्री-हरि ॥

११२॥

जब श्रीमती राधारानी बुरा मान गईं और क्रुद्ध होकर रासनृत्य से चली गईं, तो उन्हें न देखकर श्रीकृष्ण अत्यन्त व्याकुल हो उठे।"

सम्यक्सार वासना कृष्णेर रास-लीला ।।रास-लीला-वासनाते राधिका शृङ्खला ॥

११३॥

रासलीला मण्डल में भगवान् कृष्ण की इच्छा सम्यक् रूप से पूर्ण है, किन्तु उस इच्छा को बाँधने वाली कड़ी श्रीमती राधारानी हैं।"

ताँहा विनु रास-लीला नाहि भाय चित्ते ।।मण्डली छाड़िया गेला राधा अन्वेषिते ॥

११४॥

श्रीमती राधारानी के बिना कृष्ण के हृदय में रासनृत्य में आनन्द नहीं रहता। अतएव उन्होंने भी रासनृत्य मण्डल को छोड़ दिया और वे राधा की खोज में निकल गये।"

इतस्ततः भ्रमि' काहाँ राधा ना पाजा ।।विषाद करेन काम-बाणे खिन्न हा ॥

११५॥

जब कृष्ण श्रीमती राधारानी की खोज में निकल गये, तो वे इधरउधर घूमते रहे। किन्तु उन्हें न पाकर वे कामदेव के बाण से खिन्न होकर विलाप करने लगे।"

शत-कोटि-गोपीते नहे काम-निर्वापण ।।ताहातेइ अनुमानि श्री-राधिकार गुण ॥

११६॥

चूंकि कृष्ण की काम-वासना लाखों गोपियों के बीच में भी पूरी हीं हो सकी और इस प्रकार वे श्रीमती राधारानी की खोज कर रहे थे, ताव हम अनुमान लगा सकते हैं कि राधारानी में कितने दिव्य गुण थे।"

प्रभु कहे ये लागि' आइलाम तोमा-स्थाने । सेइ सबै तत्त्व-वस्तु हैल मोर ज्ञाने ॥

११७॥

यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय से कहा, मैं जिसके लिए आपके निवासस्थान पर आया हूँ, वह तत्त्व-वस्तु अब मेरी समझ में आ चुकी है।"

एबे से जानिहुँ साध्य-साधन-निर्णय ।। आगे आर आछे किछु, शुनिते मन हय ॥

११८॥

अब जाकर मैं जीवन के दिव्य लक्ष्य को और उसे प्राप्त करने की विधि को समझ पाया हूँ। इतने पर भी मैं सोचता हूँ कि अभी और कुछ बाकी है, जिसे पाने के लिए मेरा मन इच्छा रखता है।"

'कृष्णेर स्वरूप' कह 'राधार स्वरूप' ।। 'रस' कोन्तत्त्व, ‘प्रेम'- कोन्तत्त्व-रूप ॥

११९॥

। कृपया कृष्ण तथा श्रीमती राधारानी के दिव्य स्वरूप का वर्णन करें। इसके साथ दिव्य रस तथा भगवत्प्रेम का दिव्य स्वरूप भी बतलायें।"

कृपा करि' एइ तत्त्व कह त' आमारे ।। तोमा-विना केह इहा निरूपिते नारे ॥

१२०॥

। कृपा करके मुझे इन सारे तत्त्वों को समझा दें। आपके अतिरिक्त इनको कोई और नहीं समझा सकता।"

राय कहे,—इहा आमि किछुइ ना जानि ।। तुमि ग्रेइ कहाओ, सेइ कहि आमि वाणी ॥

१२१॥

। श्री रामानन्द राय ने उत्तर दिया, मैं इसके विषय में कुछ भी नहीं जानता। मैं तो वही शब्द कह पाता हैं, जिसे आप मुझसे बुलवाते हैं।"

तोमार शिक्षाय पड़ि ग्रेन शुक-पाठ । साक्षातीश्वर तुमि, के बुझे तोमार नाट ॥

१२२॥

मैं तो आपके द्वारा दी गई शिक्षाओं को तोते की तरह केवल दोहराता हूँ। आप स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। आपके नाटकीय कृत्यों को भला कौन समझ सकता है? हृदये प्रेरण कर, जिह्वाय कहाओ वाणी ।।कि कहिये भाल-मन्द, किछुइ ना जानि ॥

१२३॥

। आप मेरे हृदय के भीतर से मुझे प्रेरित करते हैं और जीभ से कहलवाते हैं। मैं यह नहीं जानता कि मैं अच्छा बोल रहा हूँ या बुरा।"

प्रभु कहे,—मायावादी आमि त' सन्यासी ।। भक्ति-तत्त्व नाहि जानि, मायावादे भासि ॥

१२४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैं तो मायावादी संन्यासी हूँ और मैं यह भी नहीं जानता कि भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति है क्या। मैं तो केवल मायावादी दर्शन के सागर में तैरता रहता हूँ।"

सार्वभौम-सङ्गे मोर मन निर्मल हइल ।।‘कृष्ण-भक्ति-तत्त्व कह,' ताँहारे पुछिल ॥

१२५॥

सार्वभौम भट्टाचार्य की संगति करने से मेरा मन निर्मल हुआ है। इसीलिए मैंने उनसे कृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति के तत्त्व के विषय में पृछताछ की।"

तेहो कहे-आमि नाहि जानि कृष्ण-कथा ।।सबे रामानन्द जाने, तेहो नाहि एथा ॥

१२६॥

सार्वभौम भट्टाचार्य ने मुझसे कहा, 'वास्तव में मैं भगवान् कृष्ण की कथा के विषय में नहीं जानता। रामानन्द राय ही सब कुछ जानता है, किन्तु वह यहाँ उपस्थित नहीं है।"

तोमार ठाजि आइलाङ तोमार महिमा शुनिया । तुमि मोरे स्तुति कर 'सन्यासी' जानिया ॥

१२७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, मैं आपकी महिमा सुनकर आपके यहाँ आया हूँ। किन्तु आप मुझे संन्यासी जानकर मेरी प्रशंसा कर रहे हैं।"

किबा विप्र, किबा न्यासी, शूद्र केने नय ।। ग्रेइ कृष्ण-तत्त्ववेत्ता, सेइ 'गुरु' हय ॥

१२८॥

कोई चाहे ब्राह्मण हो अथवा संन्यासी या शूद्र हो-यदि वह कृष्णतत्त्व जानता है, तो गुरु बन सकता है।"

‘सन्यासी' बलिया मोरे ना करिह वञ्चन ।।कृष्ण-राधा-तत्त्व कहि' पूर्ण कर मन ॥

१२९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, आप मुझे विद्वान संन्यासी समझकर ठगने की चेष्टा न करें। कृपया आप राधा तथा कृष्ण के तत्त्व का वर्णन करके मेरे मन को तुष्ट करें।"

यद्यपि राय—प्रेमी, महा-भागवते । ताँर मन कृष्ण-माया नारे आच्छादिते ॥

१३०॥

तथापि प्रभुर इच्छा–परम प्रबल ।जानिलेह रायेर मन हैल टलमल ॥

१३१॥

श्री रामानन्द राय भगवान् के महान् भक्त थे तथा भगवत्-प्रेमी थे और यद्यपि उनका मन कृष्ण की माया से कभी आच्छादित नहीं किया जा सकता था और वे महाप्रभु के दृढ़ और गम्भीर मन की बात समझ सकते। थे, किन्तु फिर भी रामानन्द का मन कुछ-कुछ विचलित हो उठा।"

राय कहे,–आमिनट, तुमि—सूत्र-धार।ग्रेइ मत नाचाओ, तैछे चाहि नाचिबार ॥

१३२॥

श्री रामानन्द राय ने कहा, मैं तो केवल नाचने वाली कठपुतली हूँ, और आप रस्सी खींचने वाले हैं। आप मुझे जिस तरह नचायेंगे, मैं उसी तरह नाचूँगा।"

मोर जिह्वा-वीणा-यन्त्र, तुमि–वीणा-धारी ।।तोमार मने ग्रेइ उठे, ताहाइ उच्चारि ॥

१३३॥

हे प्रभु, मेरी जीभ वीणा के समान है, और आप इस वीणा के वादक हैं। अतएव जो आपके मन में उठता है, मैं उसी की ध्वनि उत्पन्न करता हूँ।"

परम ईश्वर कृष्ण-स्वयं भगवान् ।। सर्व-अवतारी, सर्व-कारण-प्रधान ॥

१३४॥

फिर रामानन्द राय कृष्ण-तत्त्व पर बोलने लगे। उन्होंने कहा, कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। वे स्वयं आदि ईश्वर हैं, समस्त अवतारों के उद्गम तथा समस्त कारणों के कारण हैं।"

अनन्त वैकुण्ठ, आर अनन्त अवतार ।। अनन्त ब्रह्माण्ड इहाँ,—सबार आधार ॥

१३५॥

वैकुण्ठ ग्रहों की संख्या अनन्त है और अवतार भी असंख्य हैं। भौतिक जगत् में भी असंख्य ब्रह्माण्ड हैं और कृष्ण उन सबके परम आधार हैं।"

सच्चिदानन्द-तनु, व्रजेन्द्र-नन्दन ।।सर्वैश्वर्य-सर्वशक्ति-सर्वरस-पूर्ण ॥

१३६॥

। श्रीकृष्ण का दिव्य देह सनातन है और आनन्द तथा ज्ञान से पूर्ण है। वे नन्द महाराज के पुत्र हैं। वे समस्त ऐश्वर्यो, शक्तियों तथा दिव्य रसों से पूर्ण हैं।"

ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द-विग्रहः ।। अनादिरादिर्गोविन्दः सर्व-कारण-कारणम् ॥

१३७॥

गोविन्द के नाम से विख्यात श्रीकृष्ण परम नियन्ता हैं। उनका शरीर शाश्वत, आनन्दपूर्ण तथा आध्यात्मिक है। वे सबके उद्गम हैं। समस्त कारणों के मूल कारण होने के कारण उनका कोई अन्य उद्गम नहीं है।"

वृन्दावने 'अप्राकृत नवीन मदन' ।।काम-गायत्री काम-बीजे याँर उपासन ॥

१३८॥

वृन्दावन के आध्यात्मिक क्षेत्र में कृष्ण चिरनवीन आध्यात्मिक कामदेव हैं। उनकी पूजा आध्यात्मिक बीज क्लीम् के साथ कामगायत्री मन्त्र का उच्चारण करके की जाती है।"

पुरुष, योषित्, किबा स्थावर-जङ्गम ।। सर्व-चित्ताकर्षक, साक्षात्मन्मथ-मदन ॥

१३९॥

कृष्ण नाम का ही अर्थ यह होता है कि वे कामदेव को भी आकृष्ट करने वाले हैं। अतएव वे सबके लिए-स्त्री तथा पुरुष, चर तथा अचर । जीवों के लिए आकर्षक हैं। निस्सन्देह, कृष्ण सर्वचित्ताकर्षक के रूप में सर्वविदित हैं।"

तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमान-मुखाम्बुजः ।। पीताम्बर-धरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथ-मन्मथः ॥

१४०॥

जब कृष्ण रासलीला नृत्य छोड़कर चले गये, तब गोपियाँ अत्यन्त खिन्न हो गईं; किन्तु जब वे शोकमग्न थीं तो कृष्ण पीताम्बर धारण किये पुनः प्रकट हो गये। फूलों की माला पहने तथा मृदु मुस्कान करते वे कामदेव को भी आकृष्ट करने वाले थे। इस तरह कृष्ण गोपियों के बीच प्रकट हो गये।"

नाना-भक्तेर रसामृत नाना-विध हय ।। सेइ सब रसामृतेर 'विषय' 'आश्रय' ॥

१४१॥

हर भक्त का कृष्ण के साथ एक विशेष प्रकार का दिव्य रस होता है। किन्तु इन सारे दिव्य सम्बन्धों में भक्त पूजक ( आश्रय ) होता है और कृष्ण पूज्य (विषय) होते हैं।"

अखिल-रसामृत-मूर्तिः।प्रसृमर-रुचि-रुद्ध-तारका-पालिः ।। कलित-श्यामा-ललितोराधा-प्रेयान्विधुर्जयति ॥

१४२॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण की जय हो! उन्होंने निरन्तर बढ़ने वाले अपने आकर्षक लक्षणों के कारण तारका तथा पाली नामक गोपियों को जीत लिया है और श्यामा तथा ललिता के मनों को हर लिया है। वे भीमती राधारानी के सर्वाधिक आकर्षक प्रेमी हैं और समस्त रसों में भक्तों के लिए आनन्द के आगार हैं।"

शृङ्गार-रसराज-मय-मूर्ति-धर।।अतएव आत्म-पर्यन्त-सर्व-चित्त-हर ॥

१४३॥

। कृष्ण सारे रसों में भक्तों के लिए सर्व-आकर्षक हैं, क्योंकि वे माधुर्य रस के मूर्तिमान स्वरूप हैं। कृष्ण न केवल समस्त भक्तों के लिए, अपितु स्वयं के लिए भी आकर्षक हैं।"

विश्वेषामनुरञ्जनेन जनयन्नानन्दमिन्दीवरश्रेणी-श्यामल-कोमलैरुपनयन्नङ्गैरनङ्गोत्सवम् । स्वच्छन्दं व्रज-सुन्दरीभिरभितः प्रत्यङ्गमालिङ्गितः।शृङ्गारः सखि मूर्तिमानिव मधौ मुग्धो हरिः क्रीड़ति ॥

१४४॥

। हे सखियों, जरा देखो न, श्रीकृष्ण किस तरह वसन्त ऋतु का आनन्द लूट रहे हैं। गोपियाँ उनके सारे अंगों का आलिंगन कर रही हैं, जिससे वे श्रृंगार प्रेम के मूर्तिमान स्वरूप लगते हैं। वे अपनी दिव्य लीलाओं से सारी गोपियों तथा अखिल सृष्टि को जीवन प्रदान करते हैं। उनके मृदु श्यामल हाथ तथा पाँव नीले कमलों के समान हैं, जिनसे उन्होंने कामदेव के लिए उत्सव की सृष्टि कर दी है।"

लक्ष्मी-कान्तादि अवतारेर हरे मन ।। लक्ष्मी-आदि नारी-गणेर करे आकर्षण ॥

१४५॥

वे संकर्षण के अवतार तथा लक्ष्मी-पति नारायण को भी आकर्षित करने वाले हैं। वे न केवल नारायण को अपितु नारायण की प्रेयसी लक्ष्मी समेत समस्त स्त्रियों को आकर्षित करते हैं।"

द्विजात्मजा में ग्रुवयोर्दिदृक्षुणा ।मयोपनीता भुवि धर्म-गुप्तये ।।कलावतीर्णाववनेर्भरासुरान्हत्वेह भूयस्त्वरयेतमन्ति मे ॥

१४६॥

[ कृष्ण तथा अर्जुन को सम्बोधित करते हुए महाविष्णु ( महापुरुष) ने कहा :‘मैं आप दोनों को देखना चाहता था, इसलिए मैं ब्राह्मण-पुत्रों को यहाँ ले आया हूँ। आप दोनों इस भौतिक जगत् में धर्म की स्थापना करने के लिए अपनी-अपनी समस्त शक्तियों समेत प्रकट हुए हैं। आप कृपया सारे असुरों का वध करने के बाद तुरन्त आध्यात्मिक जगत् में लौट जायें।"

कस्यानुभावोऽस्य न देव विद्महेतवाघ्रि-रेणु-स्परशाधिकारः ।। ग्रद्वाञ्छया श्रीलंलनाचरत्तपो ।विहाय कामान्सु-चिरं धृत-व्रता ॥

१४७॥

हे प्रभु! हम नहीं जानते कि किस तरह कालिय नाग को आपके चरणकमलों की धूल स्पर्श करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसके लिए लक्ष्मीजी ने अन्य सारी इच्छाएँ त्यागकर तथा दृढ़ व्रत धारण करके शताब्दियों तक तपस्या की थी। निस्सन्देह, हम नहीं जानतीं कि इस कालिय नाग को ऐसा अवसर किस तरह प्राप्त हुआ।"

आपन-माधुर्ये हरे आपनार मन ।।आपना आपनि चाहे करिते आलिङ्गन ॥

१४८॥

भगवान् कृष्ण की मधुरता इतनी आकर्षक है कि वह स्वयं उन्हीं के मन को चुरा लेती है। इस तरह वे स्वयं अपने आपको भी आलिंगन करना चाहते हैं।"

अपरिकलित-पूर्वः कश्चमत्कार-कारीस्फुरति मम गरीयानेष माधुर्य-पूरः ।। अयमहमपि हन्त प्रेक्ष्य ग्रं लुब्ध-चेताः ।स-रभसमुपभोक्तुं कामये राधिकेव ॥

१४९॥

द्वारका के महल के रत्नजटित खंभों में अपनी ही परछाई देखकर कृष्ण ने यह कहते हुए उसे आलिंगन करना चाहा, “हाय, मैंने इसके पूर्व इतना सुन्दर व्यक्ति नहीं देखा। यह कौन है? इसे देखकर ही मैं श्रीमती राधारानी के समान इसका आलिंगन करने को उत्सुक हो रहा हूँ।"

एइ त' सङ्क्षेपे कहिल कृष्णेर स्वरूप ।।एबे सङ्क्षेपे कहि शुन राधा-तत्त्व-रूप ॥

१५०॥

तब श्री रामानन्द राय ने कहा, “इस तरह मैंने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आदि स्वरूप को संक्षेप में कहा है। अब मैं श्रीमती राधारानी की स्थिति का वर्णन करूंगा।"

कृष्णेर अनन्त-शक्ति, ताते तिन—प्रधान ।।‘चिच्छक्ति', ‘माया-शक्ति', ‘जीव-शक्ति'-नाम् ॥

१५१॥

। श्रीकृष्ण की अनन्त शक्तियाँ हैं, जिन्हें तीन प्रमुख भागों में विभाजित किया जा सकता है। ये हैं-आध्यात्मिक शक्ति, भौतिक शक्ति तथा तटस्था शक्ति जो जीवों के नाम से विख्यात है।"

'अन्तरङ्गा', 'बहिरङ्गा', 'तटस्था' कहि झारे । अन्तरङ्गा 'स्वरूप-शक्ति'—सबार उपरे ॥

१५२॥

दूसरे शब्दों में, अन्तरंगा, बहिरंगा तथा तटस्था—ये सब भगवान् की शक्तियाँ हैं, किन्तु अन्तरंगा शक्ति भगवान् की निजी शक्ति है और अन्य दो से श्रेष्ठ है।"

विष्णु-शक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथा परा ।।अविद्या-कर्म-संज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥

१५३ ॥

भगवान् विष्णु की आदि शक्ति श्रेष्ठ अर्थात् आध्यात्मिक है। जीव वास्तव में इसी श्रेष्ठ शक्ति से सम्बन्धित है; किन्तु एक अन्य शक्ति भी है, जो भौतिक शक्ति कहलाती है। यह तीसरी शक्ति अज्ञान से भरी है।"

सच्चिदानन्द-मय कृष्णेर स्वरूप ।। अतएव स्वरूप-शक्ति हय तिन रूप ॥

१५४॥

मूलतः भगवान् कृष्ण सच्चिदानन्द-विग्रह अर्थात् शाश्वतता, ज्ञान तथा आनन्द के दिव्य रूप हैं, अतएव उनकी निजी शक्ति-अन्तरंगा शक्ति-के तीन विविध रूप हैं।"

आनन्दांशे ‘ह्लादिनी', सदंशे 'सन्धिनी' । चिदंशे ‘सम्वित्', झारे ज्ञान करि' मानि ॥

१५५ ॥

। ह्लादिनी उनका आनन्द पक्ष है, सन्धिनी उनका शाश्वतता पक्ष है और मम्वित् ज्ञान पक्ष है।"

ह्लादिनी सन्धिनी सम्वित्त्वय्येका सर्व-संश्रये ।। ह्लाद-ताप-करी मिश्रा त्वयि नो गुण-वर्जिते ॥

१५६॥

हे प्रभु, आप समस्त दिव्य शक्तियों के दिव्य आगार हैं। आपकी दिनी (आनन्द देने वाली शक्ति), सन्धिनी ( अस्तित्व शक्ति) तथा वित् (ज्ञान शक्ति ) शक्तियाँ वास्तव में आपकी एक ही अन्तरंगा शक्ति । बद्ध आत्मा, आध्यात्मिक होते हुए भी कभी हर्ष का अनुभव करता है, तो कभी पीड़ा का और कभी हर्ष और पीड़ा दोनों के मिश्रण का। ऐसा पदार्थ का स्पर्श होने से होता है। किन्तु आप समस्त भौतिक गुणों से परे ; अतएव ये गुण आप में नहीं पाये जाते। आपकी परा आध्यात्मिक शक्ति पूर्णतया दिव्य है। आपके लिए सापेक्ष हर्ष, पीड़ा या हर्षमिश्रित । पीड़ा जैसी कोई वस्तु नहीं होती।"

कृष्णके आह्लादे, ता'ते नाम ‘ह्लादिनी' ।।सेइ शक्ति-द्वारे सुख आस्वादे आपनि ॥

१५७॥

ह्लादिनी शक्ति कृष्ण को दिव्य आनन्द प्रदान करती है। इसी क्लादिनी शक्ति के माध्यम से कृष्ण समस्त आध्यात्मिक आनन्द का स्वयं आस्वादन करते हैं।"

सुख-रूप कृष्ण करे सुख आस्वादन ।।भक्त-गणे सुख दिते ‘ह्लादिनी'—कारण ॥

१५८॥

। भगवान् कृष्ण मूर्तिमान सुख होते हुए भी सभी प्रकार के दिव्य सुख का आस्वादन करते हैं। उनके शुद्ध भक्तों द्वारा आस्वादन किया गया सुख भी उनकी ह्लादिनी शक्ति से प्रकट होता है।"

ह्लादिनीर सार अंश, तार 'प्रेम' नाम । आनन्द-चिन्मय-रस प्रेमेर आख्यान ॥

१५९॥

इस ह्लादिनी शक्ति का सबसे महत्त्वपूर्ण अंश भगवत्प्रेम है। फलस्वरूप भगवत्प्रेम की व्याख्या भी आनन्द से पूर्ण दिव्य रस है।"

प्रेमेर परम-सार'महाभाव' जानि ।।सेइ महाभाव-रूपा राधा-ठाकुराणी ॥

१६० ॥

भगवत्प्रेम का सार अंश महाभाव अर्थात् दिव्य आह्लाद कहलाता है और इस महाभाव का प्रतिनिधित्व करने वाली हैं श्रीमती राधारानी।"

तयोरप्युभयोर्मध्ये राधिका सर्वथाधिका ।।महाभाव-स्वरूपेयं गुणैरतिवरीयसी ॥

१६१॥

वृन्दावन की गोपियों में श्रीमती राधारानी तथा एक अन्य गोपी प्रमुख मानी जाती हैं। किन्तु जब हम गोपियों की परस्पर तुलना करते हैं, तो ऐसा लगता है कि श्रीमती राधारानी सबसे महत्त्वपूर्ण हैं, क्योंकि उनके असली स्वरूप से सर्वोत्तम प्रेमभाव व्यक्त होता है। अन्य गोपियों द्वारा अनुभव किया जाने वाला प्रेमभाव श्रीमती राधारानी के प्रेमभाव की बराबरी नहीं कर सकता।"

प्रेमेर 'स्वरूप-देह'–प्रेम-विभावित ।। कृष्णेर प्रेयसी-श्रेष्ठा जगते विदित ॥

१६२॥

श्रीमती राधारानी का शरीर भगवत्प्रेम का वास्तविक रूपान्तर है। वे कृष्ण की सर्वाधिक प्रिय संगिनी हैं, जो सारे जगत् में सुप्रसिद्ध हैं।"

आनन्द-चिन्मय-रस-प्रतिभाविताभिस् ।ताभिर्य एव निज-रूपतया कलाभिः ।। गोलोक एव निवसत्यखिलात्म-भूतोगोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि ॥

१६३॥

मैं उन आदि भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ, जो अपने गोलोक-धाम में राधा के साथ निवास करते हैं। ये राधा उनके आध्यात्मिक स्वरूप के समान हैं, और आनन्ददायिनी ह्लादिनी-शक्ति स्वरूपा हैं। उनकी अन्तरंग सखियाँ उनके स्वरूप के विस्तार रूप हैं, और सदैव आनन्दमय रस से परिव्याप्त रहती हैं।"

सेइ महाभाव हय 'चिन्तामणि-सार' ।।कृष्ण-वाञ्छा पूर्ण करे एइ कार्य ताँर ॥

१६४॥

श्रीमती राधारानी का वह महाभाव ही आध्यात्मिक जीवन का सार है। उनका एकमात्र कार्य कृष्ण की समस्त इच्छाओं को पूर्ण करना रहता है।

‘महाभाव-चिन्तामणि' राधार स्वरूप ।।ललितादि सखी—ताँर काय-व्यूह-रूप ॥

१६५ ॥

श्रीमती राधारानी सर्वोत्तम आध्यात्मिक मणि हैं और अन्य गोपियाँ-यथा ललिता, विशाखा आदि-उनके आध्यात्मिक शरीर के विस्तार रूप हैं।

राधा-प्रति कृष्ण-स्नेह—सुगन्धि उद्वर्तन ।।ता'ते अति सुगन्धि देह—उज्वल-वरण ॥

१६६॥

श्रीमती राधारानी का दिव्य शरीर उज्वल कान्ति वाला है, तथा समस्त दिव्य सुगन्धियों से पूर्ण है। उनके प्रति कृष्ण का स्नेह सुगन्धित उबटन के समान है।

कारुण्यामृत-धाराये स्नान प्रथम ।। तारुण्यामृत-धाराय स्नान मध्यम ॥

१६७।। श्रीमती राधारानी पहला स्नान करुणा रूपी अमृत की धारा में करती हैं, और दूसरा स्नान युवावस्था के अमृत में करती हैं।

लावण्यामृत-धाराय तदुपरि स्नान ।।निज-लज्जा-श्याम-पट्टसाटि-परिधान ॥

१६८॥

। दोपहर के स्नान के बाद श्रीमती राधारानी शारीरिक कान्ति के अमृत से पुनः स्नान करती हैं और तब लज्जा रूपी वस्त्र धारण करती हैं, जो उनकी काली रेशमी साड़ी होती है।

कृष्ण-अनुराग द्वितीय अरुण-वसन ।प्रणय-मान-कञ्चलिकाय वक्ष आच्छादन ॥

१६९॥

कृष्ण के प्रति श्रीमती राधारानी का स्नेह उनका ऊपरी वस्त्र है, जिसका रंग गुलाबी है। वे अपने स्तनों को एक दूसरे वस्त्र से ढकती हैं, जो कृष्ण के प्रति स्नेह तथा रोष से युक्त होता है।

सौन्दर्य—कुङ्कम, सखी-प्रणय–चन्दन ।। स्मित-कान्ति कर्पूर, तिने–अङ्गे विलेपन ॥

१७०॥

। श्रीमती राधारानी के निजी सौन्दर्य की उपमा कुंकुम नामक लाल चूर्ण से की जाती है। अपनी सखियों के प्रति उनका स्नेह चन्दन-लेप की तरह है, और उनकी हँसी की मधुरता कपूर के समान है। इन सबको मिलाकर उनके शरीर पर लेप किया जाता है।

कृष्णेर उज्वल-रस-मृगमद-भर ।। सेइ मृगमदे विचित्रित कलेवर ॥

१७१॥

। कृष्ण के प्रति उनकी अनुरक्ति उनके चमकीले होठों पर पान का लाले रंग है। उनकी प्रेम-कुटिलता उनकी आँखों में लगा काजल है।

प्रच्छन्न-मान वाम्य-धम्मिल्ल-विन्यास ।। ‘धीराधीरात्मक' गुण–अङ्गे पट-वास ॥

१७२॥

प्रच्छन्न मान तथा ढका हुआ क्रोध उनके केश विन्यास हैं। ईष्र्या के कारण उत्पन्न क्रोध का गुण उनके शरीर पर पड़े रेशमी वस्त्र का आवरण हैं।

राग-ताम्बूल-रागे अधर उज्वल । ।प्रेम-कौटिल्य नेत्र-युगले कज्जल ॥

१७३॥

कृष्ण के प्रति माधुर्य प्रेम मानो कस्तूरी की प्रचुरता है। इसी कस्तूरी से राधारानी का सम्पूर्ण शरीर सजाया जाता है।

‘सूद्दीप्त-सात्त्विक' भाव, हर्षादि 'सञ्चारी' ।। एइ सब भाव-भूषण सब-अङ्गे भरि' ॥

१७४॥

उनके शरीर में सजे हुए गहने दीप्तिवान सात्त्विक भाव हैं, और इन स्थायी भावों में हर्ष प्रमुख है। ये सारे भाव उनके पूरे शरीर में गहनों के समान हैं।

‘किल-किञ्चितादि'-भाव-विंशति-भूषित ।।गुण-श्रेणी-पुष्पमाला सर्वाङ्गे पूरित ॥

१७५॥

। किलकिंचित से प्रारम्भ होने वाले बीस प्रकार के भाव-लक्षणों से उनका शरीर विभूषित है। उनके दिव्य गुणों से उनके सारे शरीर पर लटक रही फूल की माला बनी है।

सौभाग्य-तिलक चारु-ललाटे उज्वल ।।प्रेम-वैचित्त्य रत्न, हृदय तरल ॥

१७६॥

उनके सुन्दर चौड़े मस्तक पर सौभाग्य का तिलक है। उनके विविध प्रेम-व्यवहार मणि हैं और उनका हृदय लाकेट है।

मध्य-वयस, सखी-स्कन्धे कर-न्यास ।।कृष्णलीला-मनोवृत्ति-सखी आश-पाश ॥

१७७॥

श्रीमती राधारानी की गोपी सखियाँ उनकी मानसिक क्रियाएँ हैं, जो कृष्ण-लीलाओं पर ही केन्द्रित रहती हैं। वे अपना हाथ युवावस्था की प्रतीक अपनी सखी के कन्धे पर रखती हैं।

निजाङ्ग-सौरभालये गर्व-पर्युङ्क।। ता'ते वसि' आछे, सदा चिन्ते कृष्ण-सङ्ग ॥

१७८॥

। श्रीमती राधारानी की सेज साक्षात् गर्व है, जो उनकी शारीरिक सुगन्धि के धाम में स्थित है। वे सदैव उसमें आसीन होकर कृष्ण के संग के विषय में सोचती रहती हैं।

कृष्ण-नाम-गुण-यश-अवतंस काणे ।कृष्ण-नाम-गुण-यश-प्रवाह-वचने ॥

१७९॥

श्रीमती राधारानी के कान की बालियाँ भगवान् कृष्ण के नाम, यश तथा गुणों की प्रतीक हैं। भगवान् कृष्ण के नाम, यश तथा गुणों की । महिमा उनकी वाणी को आप्लावित किये रहती है।

कृष्णके कराय श्याम-रस-मधु पान ।।निरन्तर पूर्ण करे कृष्णेर सर्व-काम ॥

१८०॥

श्रीमती राधारानी कृष्ण को माधुर्य रस का मधु पीने के लिए प्रेरित करती रहती हैं। फलतः वे कृष्ण की सारी काम-वासनाओं को पूरा करने में लगी रहती हैं।

कृष्णेर विशुद्ध-प्रेम-रत्नेर आकर ।। अनुपम-गुणगण-पूर्ण कलेवर ॥

१८१॥

श्रीमती राधारानी कृष्ण-प्रेम रूपी अमूल्य मणियों से पूर्ण खान के सदृश हैं। उनका दिव्य शरीर अद्वितीय आध्यात्मिक गुणों से पूर्ण है।

का कृष्णस्य प्रणय-जनि-भूः श्रीमती राधिकैकाकास्य प्रेयस्यनुपम-गुणा राधिकैका न चान्या । जैह्यं केशे दृशि तरलता निष्ठरत्वं कुचेऽस्या ।वाञ्छा-पूयँ प्रभवति हरे राधिकैका न चान्या ॥

१८२॥

यदि कोई पूछे कि कृष्ण-प्रेम का उद्गम कहाँ है, तो उत्तर होगा एकमात्र श्रीमती राधारानी में। कृष्ण का सर्वाधिक प्रिय मित्र कौन है? पुनः उत्तर होगा एकमात्र श्रीमती राधारानी। अन्य कोई नहीं। श्रीमती राधारानी के बाल अत्यन्त पुंघराले हैं, उनकी दोनों आँखें हमेशा चंचल रहती हैं और उनके स्तन दृढ़ हैं। चूँकि श्रीमती राधारानी में सारे दिव्य गुण प्रकट हैं, अतएव अकेले वे ही कृष्ण की सारी इच्छाएँ पूरी करने में समर्थ हैं - अन्य कोई नहीं।'

ग्राँर सौभाग्य-गुण वाञ्छे सत्यभामा ।। ग्राँर ठाञि कला-विलास शिखे व्रज-रामा ॥

१८३॥

याँर सौन्दर्यादि-गुण वाञ्छे लक्ष्मी-पार्वती ।।ग्राँर पतिव्रता-धर्म वाञ्छे अरुन्धती ॥

१८४॥

यहाँ तक कि श्रीकृष्ण की रानियों में से एक सत्यभामा भी श्रीमती राधारानी के सौभाग्य और उत्तम गुणों के लिए इच्छा करती रहती हैं। सारी गोपियाँ श्रीमती राधारानी से सजने की कला सीखती हैं और विष्णुपत्नी लक्ष्मी तथा शिव-पत्नी पार्वती भी उनके सौन्दर्य और गुणों के लिए इच्छा करती हैं। वसिष्ठ की पतिव्रता पत्नी अरुन्धती भी श्रीमती राधारानी के पातिव्रत्य तथा धार्मिक नियमों का अनुकरण करना चाहती हैं।

याँर सद्गुण-गणने कृष्ण ना पाय पार ।।ताँर गुण गणिबे केमने जीव छार ॥

१८५॥

। स्वयं भगवान् कृष्ण भी श्रीमती राधारानी के दिव्य गुणों का पार नहीं पा सकते, तो भला तुच्छ जीव किस प्रकार उनकी गिनती कर सकता है? प्रभु कहे,—जानिहुँ कृष्ण-राधा-प्रेम-तत्त्व ।शुनिते चाहिये मुँहार विलास-महत्त्व ॥

१८६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, “अब जाकर मैं राधा तथा कृष्ण के प्रेम-तत्त्व को समझ सकता हूँ। तो भी मैं सुनने का इच्छुक हूँ कि वे दोनों ऐसे प्रेम का उपभोग किस गौरव पूर्ण ढंगसे करते है।

राय कहे,—कृष्ण हय 'धीर-ललित' ।।निरन्तर काम-क्रीड़ा—याँहार चौरैत ॥

१८७॥

। रामानन्द राय ने उत्तर दिया, “भगवान् कृष्ण धीरललित हैं, क्योंकि वे अपनी प्रेयसियों को सदा वश में रख सकते हैं। इस तरह उनका एकमात्र व्यापार है इन्द्रियतृप्ति का भोग करना।

विदग्धो नव-तारुण्यः परिहास-विशारदः ।।निश्चिन्तो धीर-ललितः स्यात्प्राय: प्रेयसी-वशः ॥

१८८ ॥

जो व्यक्ति अत्यन्त चालाक होता है, सदैव तरुण रहता है, परिहास करने में दक्ष होता है, चिन्तारहित होता है और जो अपनी प्रेयसियों को मदेव वश में रखता है, वह धीरललित कहलाता है।

रात्रि-दिन कुल्ले क्रीड़ा करे राधा-सङ्गे।।कैशोर वयस सफल कैल क्रीड़ा-रङ्गे ॥

१८९ ॥

भगवान् श्रीकृष्ण वृन्दावन के कुंजों में श्रीमती राधारानी के सात पिन रात क्रीड़ा करते हैं। इस तरह उनकी कैशोर अवस्था राधारानी के माथ क्रीड़ा में सफल होती है।

वाचा सूचित-शर्वरी-रति-कला-प्रागल्भ्यया राधिकाव्रीड़ा-कुञ्चित-लोचनां विरचयन्नग्रे सखीनामसौ ।। तद्वक्षोरुह-चित्र-केलि-मकरी-पाण्डित्य-पारं गतः ।कैशोरं सफली-करोति कलयन्कुञ्ज विहारं हरिः ॥

१९०॥

। इस तरह भगवान् श्रीकृष्ण ने गत रात्रि की रति-क्रीड़ा का वर्णन किया। इससे राधारानी ने लज्जावश अपनी आँखें बन्द कर लीं। इस अवसर का लाभ उठाते हुए श्रीकृष्ण ने उनके स्तनों पर तरह-तरह की मछलियाँ चित्रित कर दीं। इस तरह वे समस्त गोपियों के लिए अत्यन्त कुशल चित्रकार बन गये। ऐसी लीलाओं में भगवान् ने अपनी कैशोर अवस्था का पूरी तरह भोग किया।

प्रभु कहे,——एहो हय, आगे कह आर।।राय कहे, ईहा वइ बुद्धि-गति नाहि आर ॥

१९१।। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, यह तो ठीक है, किन्तु और आगे कहिये। तब रामानन्द राय ने उत्तर दिया, मैं नहीं समझता कि मेरी बुद्धि इससे आगे जा सकती है।

येबा ‘प्रेम-विलास-विवर्त' एक हय ।।ताहा शुनि' तोमार सुख हय, कि ना हय ॥

१९२॥

तब रामानन्द राय ने श्री चैतन्य महाप्रभु को बतलाया, प्रेम विलास विर्त नामक एक अन्य विषय है। चाहें तो आप उसे मुझसे सुन सकते ।, किन्तु मैं कह नहीं सकता कि इससे आप सुखी होंगे अथवा नहीं।

एत बलि' आपन-कृत गीत एक गाहिल ।।प्रेमे प्रभु स्व-हस्ते ताँर मुख आच्छादिल ॥

१९३॥

पर कहकर रामानन्द राय ने स्वरचित एक गीत गाना शुरू किया, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने भावावेश में आकर तुरन्त ही अपने हाथ से रामानन्द राय का मुँह बन्द कर दिया।

पहिलेहि राग नयन-भङ्गे भेल ।अनुदिन बाढ़ल, अवधि ना गेल ना सो रमण, ना हाम रमणी ।पँहु-मन मनोभव पेषल जानि' ए सखि, से-सब प्रेम-काहिनी ।कानु-ठामे कहबि विछुरल जानि ना खोंजलै दूती, ना खोंजलु आन् ।पँहुकेरि मिलने मध्य त पाँच-बाण अब्सोहि विराग, हुँहु भेलि दूतीसु-पुरुख-प्रेमकि ऐछन रीति ॥

१९४॥

। हाय! हमारे मिलन के पूर्व हमारे बीच चितवन के आदान-प्रदान से प्रारम्भिक अनुरक्ति हुई थी। इस तरह अनुरक्ति विकसित होती रही। यह अनुरक्ति क्रमशः बढ़ने लगी है और अब इसकी कोई सीमा नहीं रही। अब वही अनुरक्ति हमारे बीच स्वाभाविक व्यवहार बन चुकी है। ऐसा नहीं है कि यह भोक्ता कृष्ण के कारण है, न ही मुझ भोग्या के कारण है। ऐसा नहीं है। यह अनुरक्ति हमारे पारस्परिक मिलन से ही सम्भव हो सकी है। आकर्षण का यह आदान-प्रदान मनोभव अर्थात् कामदेव कहलाता है। मग मन और कृष्ण का मन मिलकर एक हो गया है। अब इस विरह की पड़ी में इन प्रेम-व्यापारों की व्याख्या कर पाना कठिन है। हे प्रिय सखी, सम्भव है कृष्ण ये सारी बातें भूल चुके हों, किन्तु तुम समझ सकती हो, इसलिए यह सन्देश उन तक ले जा सकती हो। किन्तु प्रथम मिलन के समय हम दोनों के बीच न तो कोई दूत था, न ही मैंने किसी से कहा था कि वह उनके पास जाए। कामदेव के पाँच बाण ही हमारे माध्यम थे। अब मि विरह की अवधि में वह आकर्षण दूसरी भावदशा तक बढ़ गया है। है प्रिय सखी, कृपया मेरी दूती बनो, क्योंकि सुन्दर पुरुष से प्रेम करने का पही परिणाम होता है।'

राधाया भवतश्च चित्त-जतुनी स्वेदैर्विलाप्य क्रमाद् ।झुञ्जन्नद्रि-निकुञ्ज-कुञ्जर-पते निर्भूत-भेद-भ्रमम् । । चित्राय स्वयमवरञ्जयदिह ब्रह्माण्ड-हर्योदरे ।भूयोभिर्नव-राग-हिङ्गल-भरैः शृङ्गार-कारुः कृती ॥

१९५॥

हे प्रभु, आप गोवर्धन पर्वत के जंगल में रहते हैं और आप हाथियो । के राजा की तरह माधुर्य प्रेम की कला में पटु हैं। हे ब्रह्माण्ड के स्वामी, आपका हृदय तथा श्रीमती राधारानी का हृदय दोनों लाख की तरह है। और वे अब आपके आध्यात्मिक पसीने में द्रवित हो गये हैं। इसलिए अब आप में तथा राधारानी में कोई भी व्यक्ति अन्तर नहीं बता सकता। अब आपने अपने नवीन स्नेह को, जो सिन्दूर की तरह है, दोनों के द्रवित हृदय के साथ मिश्रित कर दिया है और सारे विश्व के कल्याण हेतु इस ब्रह्माण रूपी प्रासाद के भीतर दोनों के हृदयों को लाल रंग दे दिया है। ।

प्रभु कहे,–'साध्य-वस्तुर अवधि' एइ हये । तोमार प्रसादे इहा जानिहुँ निश्चय ॥

१९६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्री रामानन्द राय द्वारा सुनाये गये इन श्लोकों की पुष्टि यह कहकर की, मानव-जीवन के लक्ष्य की यही सीमा है। केवल आपकी कृपा से मैं निश्चित रूप से इसे समझ सका हूँ।

‘साध्य-वस्तु' ‘साधन' विनु केह नाहि पाये ।। कृपा करि' कह, राय, पाबार उपाय ॥

१९७॥

विधि के पालन बिना जीवन-लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता। म आप मुझ पर कृपा करके उस उपाय को बतलायें, जिससे यह जीवन लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।

राय कहे,—ग्रेइ कहाओ, सेइ कहि वाणी ।।कि कहिये भाल-मन्द, किछुइ ना जानि ॥

१९८॥

। श्री रामानन्द राय ने उत्तर दिया, “मैं क्या कह रहा हूँ, यह मैं नहीं जानता, किन्तु अच्छा या बुरा जो भी है, उसे आप ही मुझसे कहलवा रहे हैं। मैं तो केवल उसी सन्देश को दोहरा रहा हूँ।

त्रिभुवन-मध्ये ऐछे हय कोन्धीर ।। ये तोमार माया-नाटे हइबेक स्थिर ॥

१९९॥

। तीनों लोकों में ऐसा कौन अविचलित व्यक्ति होगा, जो आपकी विभिन्न शक्तियों के अदलने-बदलने पर स्थिर रह सके? मोर मुखे वक्ता तुमि, तुमि हओ श्रोता ।।अत्यन्त रहस्य, शुन, साधनेर कथा ॥

२०० ॥

। वास्तव में आप ही मेरे मुँह से बोल रहे हैं और साथ साथ आप ही सुन भी रहे हैं। यह अत्यन्त रहस्यमय है। जो भी हो, कृपा करके उस व्याख्या को सुनें जिससे लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।

राधा-कृष्णेर लीला एइ अति गूढ़तर । दास्य-वात्सल्यादि-भावे ना हय गोचर ॥

२०१॥

राधा तथा कृष्ण की लीलाएँ अत्यन्त गूढ़ हैं। उन्हें दास्य, सख्य या वात्सल्य रसों के माध्यम से नहीं समझा जा सकता।

सबे एक सखी-गणेर इहाँ अधिकार । सखी हैते हय एइ लीलार विस्तार ॥

२०२॥

वास्तव में एकमात्र गोपियों को ही यह अधिकार है कि वे इन दिव्य लीलाओं का आस्वादन करें और केवल वे ही इन लीलाओं का विस्तार कर सकती हैं।

सखी विना एइ लीला पुष्ट नाहि हय ।।सखी लीला विस्तारिया, सखी आस्वादय ॥

२०३॥

गोपियों के बिना राधाकृष्ण की इन लीलाओं का संवर्धन नहीं हो सकता। केवल उन्हीं के सहयोग से इन लीलाओं का विस्तार होता है। इन रसों का आस्वादन करना भी उन्हीं का कार्य है।

सखी विना एइ लीलाय अन्येर नाहि गति ।। सखी-भावे ग्रे ताँरै करे अनुगति ॥

२०४॥

राधा-कृष्ण-कुञ्जसेवा-साध्य सेइ पाय ।।सेइ साध्य पाइते आर नाहिक उपाय ॥

२०५॥

गोपियों की सहायता के बिना इन लीलाओं में प्रवेश नहीं किया जा सकता। जो व्यक्ति गोपी भाव में भगवान् की पूजा करता है और गोपियों के पदचिह्नों पर चलता है, वही श्री श्री राधा-कृष्ण की सेवा वृन्दावन के कुंजों में कर सकता है। केवल तभी वह राधा और कृष्ण के माधुर्य रस को समझ सकता है। इसके अतिरिक्त इसे समझने का कोई अन्य उपाय नहीं है।

विभुरपि सुख-रूपः स्व-प्रकाशोऽपि भावः।क्षणमपि न हि राधा-कृष्णयोर्या ऋते स्वाः ।। प्रवहति रस-पुष्टिं चिद्विभूतीरिवेशः।श्रयति न पदमासां कः सखीनां रस-ज्ञः ॥

२०६॥

श्री राधा तथा कृष्ण की लीलाएँ स्वतः तेजोमय हैं। वे मूर्तिमान सुख हैं, अनन्त तथा सर्वशक्तिमान हैं। इतने पर भी ऐसी लीलाओं का आध्यात्मिक रस भगवान् की सखियों अर्थात् गोपियों के बिना कभी पुष्ट नहीं होता। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपनी आध्यात्मिक शक्तियों के बिना कभी भी पूर्ण नहीं होते। अतएव गोपियों की शरण लिए बिना कोई राधा तथा कृष्ण की संगति प्राप्त नहीं कर सकता। भला गोपियों की शरण लिए बिना राधा-कृष्ण की आध्यात्मिक लीलाओं में कौन रुचि रख सकता है?' ।

सखीर स्वभाव एक अकथ्य-कथन ।कृष्ण-सह निज-लीलाय नाहि सखीर मन ॥

२०७॥

गोपियों की स्वाभाविक प्रवृत्ति (स्वभाव) अवर्णनीय है। गोपियाँ कृष्ण के साथ कभी भी स्वयं भोग करना नहीं चाहतीं।

कृष्ण सह राधिकार लीला ग्रे कराय।। निज-सुख हैते ताते कोटि सुख पाय ॥

२०८॥

जब गोपियाँ श्री श्री राधा और कृष्ण को उनकी दिव्य लीलाओं में प्रवृत्त करने का काम करती हैं, तो उनका सुख करोड़ गुना बढ़ जाता है।

राधार स्वरूप कृष्ण-प्रेम-कल्पलता ।।सखी-गण हय तार पल्लव-पुष्प-पाता ॥

२०९॥

। स्वभाव से श्रीमती राधारानी भगवत्प्रेम की लता के समान हैं और गोपियाँ उस लता की टहनियाँ, फूल तथा पत्तियाँ हैं।

कृष्ण-लीलामृत यदि लताके सिञ्चय ।।निज-सुख हैते पल्लवाद्येर कोटि-सुख हय ॥

२१०॥

जब इस लता पर कृष्ण-लीला रूपी अमृत छिड़का जाता है, तो टहनियों, फूलों तथा पत्तियों को जो सुख मिलता है, वह लता की तुलना में एक करोड़ गुना अधिक होता है।

सख्यः श्री-राधिकाया व्रज-कुमुद-विधोह्रदिनी-नाम-शक्तेःसारांश-प्रेम-वल्ल्याः किसलय-दल-पुष्पादि-तुल्याः स्व-तुल्याः ।सिक्तायां कृष्ण-लीलामृत-रस-निचयैरुल्लसन्त्याममुष्यां ।जातोल्लासाः स्व-सेकाच्छत-गुणमधिकं सन्ति ग्रत्तन्न चित्रम् ॥

२११।। श्रीमती राधारानी की निजी सखियाँ-सारी गोपियाँ-उन्हीं के समान हैं। जिस तरह चन्द्रमा कमल-पुष्पों को अच्छा लगता है, कृष्ण उसी तरह व्रजभूमि के निवासियों को अच्छे लगते हैं। उनकी आनन्ददायिनी शक्ति आह्लादिनी कहलाती है, जिसका मुख्य सक्रिय तत्त्व श्रीमती राधारानी हैं। उनकी उपमा उस लता से दी जाती है, जिसमें नयेनये फूल तथा कोंपले लगी हैं। जब कृष्ण-लीला रूपी अमृत श्रीमती राधारानी पर छिड़का जाता है, तो उनकी सारी सखियों ( गोपियाँ) को, वह अमृत अपने ऊपर छिड़के जाने की अपेक्षा, सैकड़ों गुना अधिक आनन्द का अनुभव होता है। वास्तव में यह तनिक भी आश्चर्यजनक नहीं है।'

यद्यपि सखीर कृष्ण-सङ्गमे नाहि मन ।।तथापि राधिका यत्ने करान सङ्गम ॥

२१२॥

यद्यपि श्रीमती राधारानी की सखियाँ ( गोपियाँ) कृष्ण के साथ प्रत्यक्ष भोग नहीं करना चाहतीं, किन्तु श्रीमती राधारानी श्रीकृष्ण को गोपियों के साथ भोग करने के लिए प्रेरित करने का काफी प्रयत्न करती हैं।

नाना-च्छले कृष्णे प्रेरि' सङ्गम कराय।। आत्म-कृष्ण-सङ्ग हैते कोटि-सुख पाय ॥

२१३॥

श्रीमती राधारानी कभी-कभी तरह-तरह के बहानों से गोपियों को कृष्ण के पास भेजती हैं, जिससे वे उनका प्रत्यक्ष संग कर सकें। ऐसे अवसरों पर उन्हें अपने प्रत्यक्ष मिलन की अपेक्षा एक करोड़ गुना अधिक सुख मिलता है।

अन्योन्ये विशुद्ध प्रेमे करे रस पुष्ट । ताँ-सबार प्रेम देखि' कृष्ण हय तुष्ट ॥

२१४॥

भगवत्प्रेम के पारस्परिक व्यवहार में दिव्य रस की पुष्टि होती है। जब का यह देखते हैं कि गोपियों ने उनके लिए किस तरह से शुद्ध प्रेम विकसित कर लिया है, तो वे अत्यधिक तुष्ट होते हैं।

सहज गोपीर प्रेम,-नहे प्राकृत काम ।।काम-क्रीड़ा-साम्ये तार कहि 'काम'-नाम ॥

२१५॥

यह ध्यान देने की बात है कि परम भगवान् से प्रेम करना गोपियों का सहज गुण है। उनकी कामेच्छा की तुलना भौतिक कामवासना से नहीं की जानी चाहिए। फिर भी कभी-कभी उनकी इच्छा भौतिक कामवासना जैसी प्रतीत होती है, इसलिए कभी-कभी कृष्ण के प्रति उनका दिव्य प्रेम 'काम' कहकर पुकारा जाता है।

प्रेमैव गोप-रामाणां काम इत्यगमत्प्रथाम् ।। इत्युद्धवादयोऽप्येतं वाञ्छन्ति भगवत्प्रियाः ॥

२१६॥

गोपियों के कृष्ण के साथ व्यवहार शुद्ध भगवत्प्रेम के स्तर पर होते हैं। किन्तु कभी-कभी उन्हें काममय मान लिया जाता है। किन्तु ऐसे व्यवहार सर्वथा आध्यात्मिक होते हैं, अतएव उद्धव जैसे भगवान् के अन्य अत्यन्त प्रिय भक्त भी उनमें भाग लेने के इच्छुक रहते हैं।"

निजेन्द्रिय-सुख-हेतु कामेर तात्पर्य । कृष्ण-सुख-तात्पर्य गोपी-भाव-वर्य ॥

२१७॥

। कामेच्छाओं का अनुभव तब होता है, जब कोई अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए उत्सुक रहता है। किन्तु गोपियों का भाव ऐसा नहीं होता। उनकी एकमात्र इच्छा कृष्ण की इन्द्रियों को तृप्त करना है।"

निजेन्द्रिय-सुख-वाञ्छा नाहि गोपिकार ।।कृष्णे सुख दिते करे सङ्गम-विहार ॥

२१८॥

। गोपियों में अपनी खुद की इन्द्रियतृप्ति की रंचमात्र इच्छा नहीं है। उनकी एकमात्र इच्छा कृष्ण को आनन्द देने की होती है। इसी कारण वे उनसे मिलती हैं और उनके साथ भोग करती हैं।"

ग्रत्ते सुजात-चरणाम्बुरुहं स्तनेषुभीताः शनैः प्रिय दधीमहि कर्कशेषु । तेनाटवीमटसि तद्यथते न किं स्वित् ।कूर्पादिभिर्भमति धीभवदायुषां नः ॥

२१९॥

[ सारी गोपियों ने कहा : ‘हे कृष्ण, हम आपके कोमल चरणकमलों को बड़ी सावधानी से अपने कठोर स्तनों पर रखती हैं। जब आप जंगल में विचरण करते हैं, तो आपके कोमल चरणकमलों में कंकड़-पत्थर लगते हैं। हम डरती रहती हैं कि इससे आपको पीड़ा होती होगी। चूँकि आप हमारे जीवन और आत्मा हैं, अतएव जब आपके चरणकमलों को पीड़ा पहुँचती हैं, तो हमारे मन अत्यन्त विचलित हो उठते हैं।"

सेइ गोपी-भावामृते याँर लोभ हय ।। वेद-धर्म-लोक त्यजि' से कृष्ण भजय ॥

२२०॥

। जो व्यक्ति गोपियों के ऐसे प्रेमभाव से आकृष्ट है, वह वैदिक जीवन के विधानों या लोकमत की परवाह नहीं करता। प्रत्युत वह कृष्ण की शरण में पूर्णतया जाकर उनकी सेवा करता है।"

रागानुग-मार्गे ताँरै भजे येइ जन ।। सेइ-जन पाय व्रजे व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

२२१॥

जो व्यक्ति रागानुग मार्ग पर (स्वतःस्फूर्त प्रेम से) भगवान् की पूजा मरता है और वृन्दावन जाता है, उसे नन्द महाराज के पुत्र व्रजेन्द्रनन्दन की शण प्राप्त होती है।"

व्रज-लोकेर कोन भाव लजा ग्रेइ भजे ।।भाव-योग्य देह पाजा कृष्ण पाय व्रजे ॥

२२२॥

। इस मुक्त अवस्था में भक्त भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति के पाँच रसों में से किसी एक रस के द्वारा आकृष्ट होता है। वह उसी भाव से भगवान् की सेवा करते रहने से गोलोक वृन्दावन में कृष्ण की सेवा करने के लिए आध्यात्मिक शरीर प्राप्त करता है।"

ताहाते दृष्टान्त–उपनिषद्श्रुति-गण । राग-मार्गे भजि' पाइल व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

२२३॥

जो सन्तजन उपनिषदों का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे इसके ज्वलन्त दाहरण हैं। रागानुग प्रेम के मार्ग पर भगवान् की पूजा करके उन्होंने न; महाराज के पुत्र व्रजेन्द्रनन्दन के चरणकमल प्राप्त किये।"

निभृत-मरुन्मनोऽक्ष-दृढ़-स्रोग-युजो हृदि ग्रन् ।मुनय उपासते तदरयोऽपि ययुः स्मरणात् ।। स्त्रिय उरगेन्द्र-भोग-भुज-दण्ड-विषक्त-धियो ।वयमपि ते समाः सम-दृशोऽघ्रि-सरोज-सुधाः ॥

२२४॥

बड़े बड़े मुनि योगाभ्यास तथा प्राणायाम द्वारा अपने मन तथा इन्द्रियों को जीतते हैं। इस तरह योग में प्रवृत्त होकर वे अपने हृदयों के भीतर परमात्मा का दर्शन करते हैं, और अन्ततः निर्विशेष ब्रह्म में प्रवेश करते हैं। किन्तु यह पद तो पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के शत्रु भी उनका केवल चिन्तन करके प्राप्त करते हैं। किन्तु व्रजांगनाएँ अर्थात् गोपियाँ कृष्ण के सौन्दर्य से आकृष्ट होकर कृष्ण का और उनकी सर्प जैसी भुजाओं का आलिंगन करना चाहती थीं। इस प्रकार उन्होंने अन्ततोगत्वा भगवान् के चरणकमलों के अमृत का आस्वादन किया। इसी तरह हम उपनिषद् भी गोपियों के पदचिह्नों पर चलकर कृष्ण के चरणकमलों का अमृत चख सकते हैं।"

‘सम-दृश:'-शब्द कहे 'सेइ भावे अनुगति' ।। ‘समा:'-शब्दे कहे श्रुतिर गोपी-देह-प्राप्ति ॥

२२५॥

पिछले श्लोक के चतुर्थ चरण में उल्लिखित ‘समदृशः' शब्द का अर्थ है, ‘गोपियों के भाव का अनुगमन करते हुए।' 'समाः' का अर्थ है, ‘श्रुतियों द्वारा गोपियों जैसा ही शरीर प्राप्त करके।'" ‘अघ्रि-पद्म-सुधा'य कहे 'कृष्ण-सङ्गानन्द' ।। विधि-मार्गे ना पाइये व्रजे कृष्ण-चन्द्र ।। २२६॥

। अघ्रि-पद्मसुधा' का अर्थ है, कृष्ण से घनिष्ठतापूर्वक संगति करते हुए।' ऐसी पूर्णता एकमात्र भगवान् के रागानुग प्रेम द्वारा मिल सकती है। केवल विधि-विधानों द्वारा भगवान् की सेवा करने से गोलोक वृन्दावन में कृष्ण को प्राप्त नहीं किया जा सकता।"

नायं सुखापो भगवान्देहिनां गोपिका-सुतः ।। ज्ञानिनां चत्म-भूतानां ग्रथा भक्ति-मतामिह ॥

२२७॥

यशोदा के पुत्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण उन भक्तों को सुलभ हैं, जो रागानुगा भक्ति में लगे हुए हैं। किन्तु वे शुष्क चिन्तकों, कठिन व्रत तथा तपस्या द्वारा आत्म-साक्षात्कार के लिए प्रयत्न करने वालों या शरीर को आत्मा मानने वालों को इतनी सरलता से सुलभ नहीं हैं।'" अतएव गोपी-भाव करि अङ्गीकार ।।रात्रि-दिन चिन्ते राधा-कृष्णेर विहार ॥

२२८॥

अतएव मनुष्य को गोपियों के सेवाभाव को ग्रहण करना चाहिए। ऐसे दिव्य भाव में श्री राधाकृष्ण की लीलाओं का निरन्तर चिन्तन करना चाहिए।"

सिद्ध-देहे चिन्ति' करे ताहाँञि सेवन ।।सखी-भावे पाय राधा-कृष्णेर चरण ॥

२२९॥

राधा-कृष्ण तथा उनकी लीलाओं का दीर्घकाल तक चिन्तन करने और भौतिक कल्मष से पूरी तरह मुक्त होने पर मनुष्य आध्यात्मिक जगत् को चला जाता है। वहाँ भक्त को गोपी के रूप में राधा तथा कृष्ण की सेवा करने का सुअवसर प्राप्त होता है।"

गोपी-आनुगत्य विना ऐश्वर्य-ज्ञाने । भजिलेह नाहि पाय व्रजेन्द्र-नन्दने ॥

२३०॥

। जब तक मनुष्य गोपियों के चरणचिह्नों का अनुसरण नहीं करता, तब तक उसे नन्द महाराज के पुत्र कृष्ण के चरणकमलों की सेवा प्राप्त नहीं हो सकती। यदि वह भगवान् के ऐश्वर्य के ज्ञान से परास्त हो जाता है, तो उसे भगवान् के चरणकमल प्राप्त नहीं हो सकते, भले ही वह भक्तिमयी सेवा में क्यों न लगा हुआ हो।"

ताहाते दृष्टान्त–लक्ष्मी करिल भजन ।। तथापि ना पाइल व्रजे व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

२३१॥

इस प्रसंग में अकथनीय उदाहरण लक्ष्मीजी का है, जिन्होंने वृन्दावन में कृष्ण की लीलाओं को प्राप्त करने के लिए भगवान् कृष्ण की पूजा की। किन्तु अपनी ऐश्वर्यमयी जीवन-शैली के कारण उन्हें वृन्दावन में कृष्ण की सेवा प्राप्त नहीं हो सकी।"

नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्त-रतेः प्रसादः ।स्वर्शोषितां नलिन-गन्ध-रुचां कुतोऽन्याः ।। रासोत्सवेऽस्य भुज-दण्ड-गृहीत-कण्ठलब्धाशिषां ग्न उदगाव्रज-सुन्दरीणाम् ॥

२३२॥

जब भगवान् श्रीकृष्ण गोपियों के साथ रासलीला में नृत्य कर रहे थे, तब भगवान् की भुजाएँ गोपियों की गर्दन को आलिंगित किए थीं। यह दिव्य कृपा न तो लक्ष्मीजी को, न ही वैकुण्ठ में अन्य किसी प्रेयसी को प्राप्त हो पाई। न ही स्वर्गलोक की उन सुन्दरियों ने कभी ऐसी कल्पना भी की थी, जिनकी शारीरिक कान्ति तथा सुगन्ध कमल-पुष्य जैसी है। तो भला संसारी स्त्रियों के विषय में क्या कहा जाए, जो भौतिक दृष्टि से [कतनी भी सुन्दर क्यों न हों? एत शुनि' प्रभु ताँरै कैल आलिङ्गन ।दुइ जने गलागलि करेन क्रन्दन ॥

२३३॥

यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय का आलिंगन किया और दोनों एक-दूसरे को गले लगाकर रुदन करने लगे।"

एड्-मत प्रेमावेशे रात्रि गोइला ।।प्रातः-काले निज-निज-कार्ये हे गेला ॥

२३४॥

इस तरह सारी रात भगवान् के प्रेमावेश में बीती और प्रातःकाल दोनों अपने-अपने कार्यों पर चले गये।"

विदाय-समये प्रभुर चरणे धरिया ।।रामानन्द राय कहे विनति करिया ॥

२३५॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु से विदा होने के पूर्व रामानन्द राय ने पृथ्वी पर गिरकर महाप्रभु के चरणकमल पकड़ लिए। फिर वे अत्यन्त विनीत भावे से इस प्रकार बोले।"

‘मोरे कृपा करिते तोमार इहाँ आगमन ।।दिन दश रहि' शोध मोर दुष्ट मन ॥

२३६॥

श्री रामानन्द राय ने कहा, “आप मुझ पर अपनी अहैतुकी कृपा दर्शाने ही यहाँ आये हैं। अतएव आप यहाँ कम-से-कम दस दिन तक रुक जायें और मेरे दूषित मन को शुद्ध कर दें।"

तोमा विना अन्य नाहि जीव उद्धारिते ।तोमा विना अन्य नाहि कृष्ण-प्रेम दिते' ॥

२३७॥

आपके अतिरिक्त ऐसा कौन है, जो सारे जीवों का उद्धार कर सके, क्योंकि केवल आप ही कृष्ण-प्रेम प्रदान कर सकते हैं।"

प्रभु कहे,—आइलाङशुनि' तोमार गुण ।।कृष्ण-कथा शुनि, शुद्ध कराइते मन ॥

२३८॥

महाप्रभु ने उत्तर दिया, मैं आपके सद्गुण सुनकर यहाँ आया हूँ। मैं तो आपके पास कृष्ण का गुणानुवाद सुनने और इस तरह अपना मन शुद्ध करने आया हूँ।"

ग्रैछे शुनिलु, तैछे देखिलें तोमार महिमा ।।राधा-कृष्ण-प्रेमरस-ज्ञानेर तुमि सीमा ॥

२३९॥

जिस तरह मैंने आपके बारे में सुना था, उसी तरह मैंने आपकीमा भी देख ली। जहाँ तक राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाओं का सम्बन्ध ।, आप तो ज्ञान की सीमा हैं।"

दश दिनेर का-कथा ग्रावतामि जीब' ।।तावत्तोमार सङ्ग छाड़िते नारिब ॥

२४०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, दस दिन की क्या बात है, जब तक मैं जीवित रहूँगा तब तक आपका साथ छोड़ पाना मेरे लिए असम्भव होगा।"

नीलाचले तुमि-आमि थाकिब एक-सङ्गे।।सुखे गोङकाइब काल कृष्ण-कथा-रङ्गे ॥

२४१॥

आप और मैं दोनों साथ साथ जगन्नाथ पुरी में रहेंगे। हम एक साथ आनन्द में कृष्ण तथा उनकी लीलाओं की चर्चा करते हुए अपना समय बितायेंगे।"

एत बलि' मुँहे निज-निज कार्ये गेला ।।सन्ध्या-काले राय पुनः आसिया मिलिला ॥

२४२॥

इस तरह वे दोनों अपने अपने कामों पर चले गये। तत्पश्चात् संध्यासमय रामानन्द राय श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने आये।"

अन्योन्ये मिलि' मुँहे निभृते वसिया ।।प्रश्नोत्तर-गोष्ठी कहे आनन्दित हा ॥

२४३॥

इस तरह वे बारम्बार मिलते, एकान्त स्थान में बैठते और प्रश्नोत्तर के रूप में प्रसन्न चित्त होकर कृष्ण की लीलाओं पर चर्चा करते थे।"

प्रभु पुछे, रामानन्द करेन उत्तर ।।एइ मत सेई रात्रे कथा परस्पर ॥

२४४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु प्रश्न पूछते थे और रामानन्द राय उत्तर देते थे। इस तरह रात-भर वे चर्चा में लगे रहते।"

प्रभु कहे,कोन्विद्या विद्या-मध्ये सार?।। राय कहे,कृष्ण-भक्ति विना विद्या नाहि आर ॥

२४५॥

एक अवसर पर महाप्रभु ने पूछा, सभी प्रकार की विद्याओं में कौनसी विद्या सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है? रामानन्द राय ने उत्तर दिया, दिव्य कृष्ण-भक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई विद्या महत्त्वपूर्ण नहीं है।"

'कीर्ति-गण-मध्ये जीवेर कोन्बड़ कीर्ति?'। ‘कृष्ण-भक्त बलिया याँहार हय ख्याति' ॥

२४६॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय से पूछा, समस्त यशस्वी कार्यों में कौन-सा कार्य सर्वाधिक यशस्वी है? रामानन्द राय ने उत्तर दिया, वह व्यक्ति जो भगवान् कृष्ण के भक्त के रूप में विख्यात है, वही सर्वाधिक यश तथा कीर्ति भोगता है।"

‘सम्पत्तिर मध्ये जीवेर कोन्सम्पत्ति गणि?' ।। ‘राधा-कृष्ण प्रेम ग्राँर, सेइ बड़ धनी' ॥

२४७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, धनवानों में सर्वोच्च कौन है? रामानन्द राय ने उत्तर दिया, जो राधा तथा कृष्ण के प्रेम का सबसे बड़ा धनी है, वही सबसे बड़ा धनवान है।"

‘दुःख-मध्ये कोन दुःख हय गुरुतर?' ।।‘कृष्ण-भक्त-विरह विना दुःख नाहि देखि पर' ॥

२४८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, समस्त दुःखों में कौन-सा दुःख सर्वाधिक कष्टदायक है? श्री रामानन्द राय ने उत्तर दिया, मेरी जानकारी में कृष्ण-भक्त के विरह से बढ़कर कोई दूसरा असह्य दुःख नहीं है।"

‘मुक्त-मध्ये कोन्जीव मुक्त करि' मानि?'।। ‘कृष्ण-प्रेम याँर, सेइ मुक्त-शिरोमणि' ॥

२४९॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, समस्त मुक्त पुरुषों में किसे सबसे महान् माना जाए? रामानन्द राय ने उत्तर दिया, जो कृष्ण-प्रेम से युक्त है, उसे ही सर्वोच्च मुक्ति प्राप्त है।"

‘गान-मध्ये कोन गान–जीवेर निज धर्म?'। ‘राधा-कृष्णेर प्रेम-केलि'——येइ गीतेर मर्म ॥

२५०॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय से पूछा, अनेक गीतों में से कम गीत को जीव का वास्तविक धर्म माना जाए? रामानन्द राय ने तर दिया, श्री राधा तथा कृष्ण के प्रेम का वर्णन करने वाला गीत अन्य मस्त गीतों से श्रेष्ठ है।

‘श्रेयो-मध्ये कोन श्रेयः जीवेर हय सार?'। ‘कृष्ण-भक्त-सङ्ग विना श्रेयः नाहि आर' ॥

२५१॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, समस्त शुभ तथा लाभप्रद कार्यों में से जीव के लिए सर्वश्रेष्ठ कार्य कौन-सा है? रामानन्द राय ने उत्तर दिया, एकमात्र शुभ कार्य कृष्ण-भक्तों की संगति है।"

‘काँहार स्मरण जीव करिबे अनुक्षण?' ।।‘कृष्ण'-नाम-गुण-लीला—प्रधान स्मरण' ॥

२५२॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, सारे जीव किसका निरन्तर स्मरण करें? रामानन्द राय ने उत्तर दिया, स्मरण करने की मुख्य वस्तु सदैव भगवान् के नाम, गुण तथा लीलाएँ हैं।"

ध्येय-मध्ये जीवेर कर्तव्य कोन्ध्यान?' ।।‘राधा-कृष्ण-पदाम्बुज-ध्यान–प्रधान' ॥

२५३॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने और आगे पूछा, समस्त प्रकार के ध्यानों में से कौन-सा ध्यान जीवों के लिए आवश्यक है? श्रील रामानन्द राय ने उत्तर दिया, प्रत्येक जीव का प्रधान कर्तव्य यह है कि वह राधाकृष्ण के चरणकमलों का ध्यान करे।"

‘सर्व त्यजि' जीवेर कर्तव्य काहाँ वास?' ।। ‘व्रज-भूमि वृन्दावन ग्राहाँ लीला-रास' ॥

२५४॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, “जीव को अन्य सारे स्थान त्यागकर कहाँ रहना चाहिए? रामानन्द राय ने उत्तर दिया, उसे वृन्दावन या व्रजभूमि नामक पवित्र स्थान में रहना चाहिए, जहाँ भगवान् ने रासनृत्य किया था।"

श्रवण-मध्ये जीवेर कोन्श्रेष्ठ श्रवण?' ।। ‘राधा-कृष्ण-प्रेम-केलि कर्ण-रसायन' ॥

२५५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, सुने जाने वाले समस्त विषयों में से कौन-सा विषय समस्त जीवों के लिए सर्वोत्तम है? रामानन्द राय ने उत्तर दिया, राधा तथा कृष्ण के प्रेम-व्यापार के विषय में श्रवण करना कानों को सर्वाधिक सुहावना लगता है।"

'उपास्येर मध्ये कोनुपास्य प्रधान?' । ।‘श्रेष्ठ उपास्य–मुगल ‘राधा-कृष्ण' नाम' ॥

२५६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, समस्त पूजा के योग्य ( उपास्य) वस्तुओं में से कौन प्रधान है? रामानन्द ने उत्तर दिया, प्रधान पूजा योग्य वस्तु राधाकृष्ण का नाम-हरे कृष्ण मन्त्र-है।"

‘मुक्ति, भुक्ति वाञ्छे येइ, काहाँ वँहार गति?'। ‘स्थावर-देह, देव-देह ग्रैछे अवस्थिति' ॥

२५७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूछा, और जो मुक्ति चाहते हैं तथा जो इन्द्रियतृप्ति की इच्छा करते हैं, उनका गन्तव्य क्या है? रामानन्द राय ने उत्तर दिया, जो लोग भगवान् के अस्तित्व में समा जाने की चेष्टा करते हैं, उन्हें वृक्ष के समान शरीर धारण करना होगा और जो लोग इन्द्रियतृप्ति में अधिक आसक्त हैं, उन्हें देवताओं का शरीर मिलेगा।"

अरस-ज्ञ काक चूषे ज्ञान-निम्ब-फले ।। रस-ज्ञ कोकिल खाय प्रेमाम्र-मुकुले ॥

२५८॥

रामानन्द राय ने आगे कहा, सभी दिव्य रसों से रहित व्यक्ति ( अरसिक) उन कौवों के समान हैं, जो ज्ञानरूपी नीम वृक्ष के कटु फलों का रस चूसते हैं, जबकि रसज्ञ व्यक्ति उन कोयलों के तुल्य हैं, जो भगवत्प्रेम रूपी आम्र वृक्ष की मंजरियों को खाते हैं।"

अभागिया ज्ञानी आस्वादये शुष्क ज्ञान ।। कृष्ण-प्रेमामृत पान करे भाग्यवान् ॥

२५९॥

रामानन्द राय ने आगे कहा, अभागे शुष्क दार्शनिक दर्शन की शुष्क विधि का आस्वादन करते हैं, किन्तु भक्तगण नियमित रूप से कृष्ण-प्रेम रूपी अमृत का पान करते हैं। अतएव वे सर्वाधिक भाग्यशाली हैं।"

एइ-मत दुइ जन कृष्ण-कथा-रसे ।। नृत्य-गीत-रोदने हैल रात्रि-शेषे ॥

२६० ॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रामानन्द राय ने कृष्ण-कथा के रस का आस्वादन करते हुए पूरी रात बिताई। उनके कीर्तन करते, नाचते तथा रोते हुए सारी रात बीत गई।"

दोंहे निज-निज-कार्ये चलिला विहाने । सन्ध्या-काले राय आसि' मिलिला आर दिने ॥

२६१॥

प्रातः होने पर दोनों अपने अपने कार्य पर चले गये, किन्तु संध्यासमय रामानन्द पुनः महाप्रभु से मिलने आये।

इष्ट-गोष्ठी कृष्ण-कथा कहि कत-क्षण ।।प्रभु-पद धरि' राय करे निवेदन ॥

२६२॥

उसी दिन संध्या-समय कुछ समय तक कृष्ण-कथा की चर्चा चलाने के बाद रामानन्द राय ने महाप्रभु के चरणकमल पकड़ लिए और इस तरह बोले।

'कृष्ण-तत्त्व', ‘राधा-तत्त्व', 'प्रेम-तत्त्व-सार' ।‘रस-तत्त्व 'लीला-तत्त्व' विविध प्रकार ॥

२६३॥

राधारानी तथा कृष्ण विषयक तत्त्व तथा उनके दिव्य प्रेम, रस तथा लीलाओं के अनेकानेक दिव्य तत्त्व हैं।

एत तत्त्व मोर चित्ते कैले प्रकाशन ।।ब्रह्माके वेद ग्रेन पड़ाइल नारायण ॥

२६४॥

आपने मेरे हृदय में इन अनेक दिव्य तत्त्वों ( सत्यों) को प्रकट किया है। नारायण ने इसी तरह ब्रह्माजी को शिक्षा दी थी।"

अन्तर्यामी ईश्वरेर एइ रीति हये ।। बाहिरे ना कहे, वस्तु प्रकाशे हृदये ॥

२६५ ॥

रामानन्द राय ने आगे कहा, परमात्मा हर एक के हृदय के भीतर से बोलते हैं, बाहर से नहीं। वे सभी प्रकार से भक्तों को उपदेश देते हैं, और यही उनकी उपदेश-विधि है।"

जन्माद्यस्य व्रतोऽन्वयादितरतश्चार्थेष्वभिज्ञः स्व-राट्तेने ब्रह्म हुदा य़ आदि-कवये मुह्यन्ति यत्सूरयः । तेजो-वारि-मृदां ग्रथा विनिमयो यत्र त्रि-सर्गोऽमृषाधाम्ना स्वेन सदा निरस्त-कुहकं सत्यं परं धीमहि ॥

२६६॥

हे मेरे प्रभु, वसुदेव के पुत्र श्रीकृष्ण, हे सर्वव्यापी भगवान्, मैं आपको सादर प्रणाम करता हूँ। मैं भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करता हूँ, क्योंकि वे परम अद्वय सत्य हैं और व्यक्त ब्रह्माण्डों की सृष्टि, स्थिति और प्रलय के कारणों के आदि कारण हैं। वे प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से समस्त जगत् से अवगत रहते हैं और वे स्वतंत्र हैं, क्योंकि उनसे परे अन्य कोई भी कारण नहीं है। उन्होंने ही पहले प्रथम-जीव ब्रह्मा के हृदय में वैदिक ज्ञान प्रदान किया। उनके द्वारा बड़े-बड़े ऋषि और देवतागण भी मोहित हो जाते हैं, जैसे अग्नि में जल या जल में भूमि दिखने से मनुष्य भ्रमित हो जाता है। उन्हीं के कारण तीन गुणों की क्रिया-प्रतिक्रियाओं से निर्मित भौतिक ब्रह्माण्ड वास्तविकता प्रतीत होते हैं, यद्यपि वे अवास्तविक होते हैं। अतएव मैं उन परम सत्य श्रीकृष्ण का ध्यान करता हैं, जो अपने दिव्य धाम में निरन्तर रहते हैं, जो भौतिक जगत् की माया से सदा मुक्त है। मैं उनका ध्यान करता हूँ, क्योंकि वे परम सत्य हैं।"

एक संशय मोर आछये हृदये ।। कृपा करि' कह मोरे ताहार निश्चये ॥

२६७॥

। तत्पश्चात् रामानन्द राय ने कहा कि उनके हृदय में अब एक ही संशय बचा है; अतएव उन्होंने महाप्रभु से याचना की कि, आप मुझ पर कृपालु हों और मेरा संशय दूर करें।"

पहिले देखिहूँ तोमार सन्यासि-स्वरूप ।।एबे तोमा देखि मुजि श्याम-गोप-रूप ॥

२६८ ॥

। तब रामानन्द राय ने श्री चैतन्य महाप्रभु से कहा, पहले मैंने आपको संन्यासी के रूप में देखा, किन्तु अब मैं आपको एक गोपाल बालक श्यामसुन्दर के रूप में देख रहा हूँ।"

तोमार सम्मुखे देखि काञ्चन-पञ्चालिका ।।ताँर गौर-कान्त्ये तोमार सर्व अङ्ग ढाका ॥

२६९॥

अब मैं आपको सुनहरे गुड्डे की तरह प्रकट होते देख रहा हूँ और आपका सारा शरीर सुनहरी कान्ति से आच्छादित प्रतीत होता है।"

ताहाते प्रकट देखों स-वंशी वदन । नाना भावे चञ्चल ताहे कमल-नयन ॥

२७० ॥

मैं देख रहा हूँ कि आप मुख में वंशी धारण किये हैं और आपके कमल-नेत्र विभिन्न भावों के कारण चंचल हो रहे हैं।"

एइ-मत तोमा देखि' हय चमत्कार ।। अकपटे कह, प्रभु, कारण इहार ॥

२७१॥

मैं आपको वास्तव में इसी रूप में देख रहा हूँ और यह अत्यन्त अद्भुत है। हे प्रभु, कृपया निष्कपट भाव से बतलायें कि ऐसा क्यों है। रहा है।"

प्रभु कहे,—कृष्णे तोमार गाढ़-प्रेम हय ।।प्रेमार स्वभाव एइ जानिह निश्चय ॥

२७२॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, आप में कृष्ण के प्रति प्रगाढ़ प्रेम है और जिसमें भगवान् के प्रति ऐसा प्रगाढ़ भावमय प्रेम होता है, वह वाभाविक रूप से वस्तुओं को इसी तरह से देखता है। आप इसे निश्चय जानें।"

महा-भागवत देखे स्थावर-जङ्गमे ।।ताहाँ ताहाँ हय ताँर श्री-कृष्ण-स्फुरण ॥

२७३॥

आध्यात्मिक स्थिति में उन्नत भक्त प्रत्येक चर तथा अचर वस्तु को भगवान् के रूप में देखता है। उसे इधर-उधर दिखने वाली सारी वस्तुएँ भगवान् कृष्ण के ही स्वरूप जान पड़ती हैं।"

स्थावर-जङ्गम देखे, ना देखे तार मूर्ति ।सर्वत्र हय निज इष्ट-देव-स्फूर्ति ॥

२७४॥

महान् भक्त अर्थात् महाभागवत अवश्य हर चर तथा अचर को देखता है, किन्तु वह उनके बाह्य रूपों को नहीं देखता। प्रत्युत वह जहाँ कहीं भी देखता है, उसे तुरन्त भगवान् का स्वरूप प्रकट होते दिखता है।"

सर्व-भूतेषु यः पश्येद्भगवद्भावमात्मनः ।। भूतानि भगवत्यात्मन्येष भागवतोत्तमः ॥

२७५ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, भक्ति में अग्रसर व्यक्ति हर वस्तु के भीतर आत्माओं के आत्मा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण को देखता है। फलस्वरूप वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के स्वरूप को समस्त कारणों के कारण के रूप में देखता है और यह समझता है कि सारी वस्तुएँ उन्हीं में स्थित हैं।'" वन-लतास्तरव आत्मनि विष्णुव्यञ्जयन्त्य इव पुष्प-फलाढ्याः ।। प्रणत-भार-विटपो मधु-धाराः ।प्रेम-हृष्ट-तनवो ववृषुः स्म ॥

२७६॥

कृष्ण-प्रेम के भाव में पौधे, लताएँ तथा वृक्ष फूलों तथा फलों से लदे थे, जिसके कारण वे झुके जा रहे थे। वे कृष्ण के ऐसे प्रगाढ़ प्रेम से प्रेरित थे कि वे लगातार मधु की वर्षा कर रहे थे। इस तरह गोपियों ने । वृन्दावन के पूरे जंगल को देखा।"

राधा-कृष्णे तोमार महा-प्रेम हय ।।ग्राहाँ ताहाँ राधा-कृष्ण तोमारे स्फुरय ॥

२७७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, हे राय, आप महान् भक्त हैं, और राधाकृष्ण के प्रेमभाव से सदैव पूरित रहते हैं। अतएव आप जहाँ कहीं जो कुछ देखते हैं, वह आप में कृष्णभावनामृत को जाग्रत करता है।"

राय कहे,—प्रभु तुमि छाड़ भारि-भूरि ।।मोर आगे निज-रूप ना करिह चुरि ॥

२७८ ॥

रामानन्द राय ने उत्तर दिया, हे प्रभु, कृपया आप इन सारी गम्भीर बातों को छोड़ दें। कृपया आप मुझसे अपना असली रूप मत छिपायें।"

राधिकार भाव-कान्ति करि' अङ्गीकार ।।निज-रस आस्वादिते करियाछ अवतार ॥

२७९॥

रामानन्द राय ने आगे कहा, हे प्रभु, मैं जानता हूँ कि आपने श्रीमती राधारानी का भाव तथा शारीरिक वर्ण धारण कर रखा है। इस तरह आप अपने निजी दिव्य रस का आस्वादन कर रहे हैं, और इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए हैं।"

निज-गूढ़-कार्य तोमार—प्रेम आस्वादन ।आनुषङ्गे प्रेम-मय कैले त्रिभुवन ॥

२८० ॥

हे प्रभु, आप निजी कारणों से चैतन्य महाप्रभु के इस रूप में अवतरित होकर प्रकट हुए हैं। आप अपने स्वयं के आध्यात्मिक आनन्द का आस्वादन करने के लिए आये हैं और साथ ही साथ भगवत्प्रेम का प्रसार करके सारे जगत् को रूपान्तरित कर रहे हैं।

आपने आइले मोरे करिते उद्धार । एबे कपट कर,—तोमार कोन व्यवहार ॥

२८१॥

हे प्रभु, आप मुझे मुक्ति प्रदान करने के लिए अपनी अहैतुकी कृपा में मेरे समक्ष प्रकट हुए हैं। अब लेकिन आप छल कर रहे हैं। ऐसे व्यवहार का क्या कारण है?" तबे हासि' तौरै प्रभु देखाइल स्वरूप ।।‘रस-राज', ‘महाभाव'–दुइ एक रूप ॥

२८२॥

भगवान् कृष्ण समस्त आनन्द के आगार हैं और श्रीमती राधारानी मामात् महाभावमय भगवत्प्रेम की मूर्तिमन्त स्वरूप हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु में ये दोनों स्वरूप मिलकर एक हो गये हैं। ऐसा होने के कारण श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय को अपना वास्तविक स्वरूप दिखलाया।"

देखि' रामानन्द हैला आनन्दे मूच्छिते ।। धरिते ना पारे देह, पड़िला भूमिते ॥

२८३॥

यह स्वरूप देखकर रामानन्द राय दिव्य आनन्द के कारण मूर्छित हो गये। वे खड़े नहीं रह सके, अतः भूमि पर गिर पड़े।"

प्रभु ताँरे हस्त स्पर्शि' कराइला चेतन ।। सन्यासीर वेष देखि विस्मित हैल मन ॥

२८४॥

। जब रामानन्द राय मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़े, तो चैतन्य महाप्रभु ने उनके हाथ का स्पर्श किया, जिससे उन्हें तुरन्त चेतना प्राप्त हो गई। किन्तु जब उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु को संन्यासी वेश में देखा, तो वे आश्चर्यचकित हो गये।"

आलिङ्गन करि' प्रभु कैल आश्वासन ।तोमा विना एइ-रूप ना देखे अन्य-जन ॥

२८५॥

रामानन्द राय का आलिंगन करने के बाद महाप्रभु ने उन्हें सान्त्वना मी और बतलाया, आपके अतिरिक्त अन्य किसी ने यह स्वरूप नहीं देखा है।"

मोर तत्त्व-लीला-रस तोमार गोचरे ।। अतएव एइ-रूप देखाइहुँ तोमारे ॥

२८६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने पुष्टि की, मेरी लीलाओं तथा रसों का सारा । तत्त्व ( सत्य) आपको ज्ञात है। इसीलिए मैंने आपको यह स्वरूप दिखलाया है।"

गौर अङ्ग नहे मोर—राधाङ्ग-स्पर्शन ।।गोपेन्द्र-सुत विना तेहो ना स्पर्शे अन्य-जन ॥

२८७॥

। वास्तव में मेरा शरीर गौर वर्ण का नहीं है। यह तो श्रीमती राधारानी के शरीर को स्पर्श करने से ऐसा प्रतीत होता है। किन्तु राधारानी नन्द महाराज के पुत्र के अतिरिक्त अन्य किसी का स्पर्श नहीं करती।।"

ताँर भावे भावित करि' आत्म-मन ।।तबे निज-माधुर्घ करि आस्वादने ॥

२८८॥

अब मैंने अपने शरीर तथा मन को श्रीमती राधारानी के भाव में रंग लिया है। इस तरह मैं अपने ही माधुर्य का आस्वादन उस रूप में कर रहा हूँ।"

तोमार ठाजि आमार किछु गुप्त नाहि कर्म ।लुकाइले प्रेम-बले जाने सर्व-मर्म ॥

२८९॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने शुद्ध भक्त रामानन्द राय के समक्ष स्वीकार किया, अब कोई ऐसा गुप्त कार्य नहीं है, जो आपसे अज्ञात हो। यद्यपि मैं अपने कार्यों को गुप्त रखने की चेष्टा करता हूँ, फिर भी आप मेरे प्रति अपने उन्नत प्रेम के कारण प्रत्येक बात को विस्तार से समझ सकते हैं।

गुप्ते राखिह, काहाँ ना करिओ प्रकाश ।।आमार बातुल-चेष्टा लोके उपहास ॥

२९०॥

। तब महाप्रभु ने रामानन्द राय से अनुरोध किया, इन सारी बातों को गुप्त रखें। आप इन्हें कहीं भी प्रकट न करें। चूंकि मेरे कार्य उन्मत्त व्यक्ति जैसे प्रतीत होते हैं, अतएव लोग उनकी गम्भीरता न समझते हुए हँसी उड़ा सकते हैं।"

आमि—एक बातुल, तुमि—द्वितीय बातुल ।अतएव तोमाय आमाय हइ सम-तुल ॥

२९१॥

चैतन्य महाप्रभु ने तब कहा, मैं सचमुच उन्मत्त व्यक्ति हूँ और आप भी उन्मत्त हो। अतएव हम दोनों समान धरातल पर हैं।"

एइ-रूप देश-रात्रि रामानन्द-सङ्गे। सुखे गोडाइला प्रभु कृष्ण-कथा-रङ्गे ॥

२९२॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रामानन्द राय ने कृष्ण की लीलाओं पर चर्चा करते हुए सुखपूर्वक दस रातें बिताईं।"

निगूढ़ व्रजेर रस-लीलार विचार । अनेक कहिल, तार ना पाइल पार ॥

२९३॥

। रामानन्द राय तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के बीच हुई वार्ताएँ अत्यन्त गूढ़ हैं, जो वृन्दावन (व्रजभूमि) में राधा तथा कृष्ण के माधुर्य प्रेम से सम्बन्धित हैं। यद्यपि दोनों ने इन लीलाओं पर विस्तार से बातें कीं, किन्तु । उनको पार नहीं पा सके।

तामा, काँसा, रूपा, सोना, रत्न-चिन्तामणि ।।केह ग्रदि काहाँ पोता पाय एक-खानि ॥

२९४॥

वस्तुतः ये वार्ताएँ उस विशाल खान के तुल्य हैं, जहाँ पर एक ही स्थान से सभी तरह की धातुएँ निकाली जा सकती हैं यथा ताँबा, काँसा, चाँदी, सोना तथा अन्य सभी धातुओं का आधार चिन्तामणि पत्थर।"

क्रमे उठाइते सेह उत्तम वस्तु पाय ।। ऐछे प्रश्नोत्तर कैल प्रभु-रामराय ॥

२९५ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रामानन्द राय ने एक से एक उत्तम धातुओं को निकालने वाले खनिक का काम किया। उनके प्रश्न तथा उत्तर बिल्कुल इसी तरह के हैं।"

आर दिन राय-पाशे विदाय मागिला ।।विदायेर काले ताँरे एइ आज्ञा दिला ॥

२९६॥

अगले दिन श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रस्थान करने के लिए रामानन्द यि से अनुमति माँगी। विदा होते समय महाप्रभु ने राय को निम्नलिखित आज्ञा दी।

विषय छाड़िया तुमि ग्राह नीलाचले ।।आमि तीर्थ करि' ताँहा आसिब अल्प-काले ॥

२९७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनसे कहा, आप सारे भौतिक कार्यकलाप ोड़कर जगन्नाथ पुरी जायें। मैं अपनी तीर्थयात्रा समाप्त करके शीघ्र ही वहां लौट आऊँगा।"

दुइ-जने नीलाचले रहिब एक-सङ्गे। ।सुखे गोडनइब काल कृष्ण-कथा-रङ्गे ॥

२९८॥

हम दोनों जगन्नाथ पुरी में मिलकर रहेंगे और कृष्ण-कथा कहते हुए सुखपूर्वक अपना समय बितायेंगे।

एत बलि' रामानन्दे करि' आलिङ्गन ।।ताँरे घरे पाठाइया करिल शयन ॥

२९९॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय का आलिंगन किया और उन्हें उनके घर भेजकर वे स्वयं विश्राम करने लगे।

प्रातः-काले उठि' प्रभु देखि' हनुमान् ।।तारै नमस्करि' प्रभु दक्षिणे करिला प्रयाण ॥

३०० ॥

प्रात:काल जगने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु स्थानीय मन्दिर में गये, जहाँ हनुमानजी का विग्रह था। उन्हें नमस्कार करने के बाद महाप्रभु ने दक्षिण भारत के लिए प्रस्थान किया।

‘विद्यापूरे' नाना-मत लोक वैसे ग्रत ।।प्रभु-दर्शने 'वैष्णव' हैल छाड़ि' निज-मत ॥

३०१॥

विद्यानगर के सारे निवासी विभिन्न मतों को मानने वाले थे, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने के बाद उन्होंने अपना-अपना मत त्याग दिया और वैष्णव बन गये।"

रामानन्द हैला प्रभुर विरहे विह्वल ।।प्रभुर ध्याने रहे विषय छाड़िया सकल ॥

३०२॥

रामानन्द राय श्री चैतन्य महाप्रभु के विरह में विह्वल हो उठे। वे अपने सारे भौतिक कार्यकलाप त्यागकर महाप्रभु के ध्यान में मग्न रहने लगे।"

सङ्क्षेपे कहिलें रामानन्देर मिलन ।।विस्तारि' वर्णिते नारे सहस्र-वदन ॥

३०३॥

मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रामानन्द राय के मिलन का संक्षेप में वर्णन किया है। इसका पूरे विस्तार से वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है। यह तक कि हजार फनों वाले भगवान् शेषनाग भी इसका वर्णन नहीं कर सकते।"

सहजे चैतन्य-चरित्र—घन-दुग्ध-पूर ।।रामानन्द-चरित्र ताहे खण्ड प्रचुर ॥

३०४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के कार्यकलाप गाढ़े दूध के समान हैं और रामानन्द राय के कार्यकलाप मिश्री के ढेर के समान हैं।"

राधा-कृष्ण-लीला—ताते कर्पूर-मिलन ।। भाग्यवान् ग्रेइ, सेइ करे आस्वादन ॥

३०५॥

उनका मिलन गाढ़े दूध और मिश्री के मिश्रण के समान है। जब वे राधा तथा कृष्ण की लीलाओं के विषय में बातें करते हैं, तो मानो उसमें कपूर मिल गया हो। जो व्यक्ति इस मिश्रित व्यंजन का स्वाद चखता है, वह परम भाग्यशाली है।"

ने इहा एक-बार पिये कर्ण-द्वारे । तार कर्ण लोभे इहा छाड़िते ना पारे ॥

३०६॥

इस अद्भुत व्यंजन को कानों से ग्रहण करना होता है। जो इसे ग्रहण करता है, वह इसका और अधिक आस्वादन करने के लिए लालायित हो जाता है।"

'रस-तत्त्व-ज्ञान' हय इहार श्रवणे । ‘प्रेम-भक्ति' हय राधा-कृष्णेर चरणे ॥

३०७॥

। रामानन्द राय तथा श्री चैतन्य महाप्रभु की वार्ताओं को सुनकर राधाकृष्ण-लीलाओं के रसों का दिव्य ज्ञान प्राप्त होता है। इस तरह राधा तथा कृष्ण के चरणकमलों के प्रति अनन्य प्रेम विकसित हो सकता है।"

चैतन्येर गूढ़-तत्त्व जानि इहा हैते ।। विश्वास करि' शुन, तर्क ना करिह चित्ते ॥

३०८॥

। लेखक का हर पाठक से यही अनुरोध है कि इन वार्ताओं को श्रद्धापूर्वक बिना तर्क किये सुने। इस तरह से अध्ययन करने पर ही वह श्री चैतन्य महाप्रभु के गूढ़ तत्त्व को समझ सकेगा।"

अलौकिक लीला एइ परम निगूढ़ ।। विश्वासे पाइये, तर्के हय बहु-दूर ॥

३०९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का यह अंश परम गोपनीय है। मनुष्य केवल श्रद्धा से तुरन्त लाभान्वित हो सकता है, अन्यथा तर्क करने से वह इससे वंचित रहेगा।"

श्री-चैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत-चरण ।।याँहार सर्वस्व, ताँरै मिले एइ धन ॥

३१०॥

। जिसने श्री चैतन्य महाप्रभु, नित्यानन्द प्रभु तथा अद्वैत प्रभु के चरणकमलों को सब कुछ मान रखा है, वही इस दिव्य खजाने को प्राप्त कर सकता है।"

रामानन्द राये मोर कोटी नमस्कार ।। ग्राँर मुखे कैल प्रभु रसेर विस्तार ॥

३११॥

मैं श्री रामानन्द राय के चरणकमलों में एक करोड़ बार नमस्कार करता हूँ, क्योंकि श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनके मुख से प्रचुर आध्यात्मिक ज्ञान का विस्तार किया।"

दामोदर-स्वरूपेर कड़चा-अनुसारे । रामानन्द-मिलन-लीला करिल प्रचारे ॥

३१२॥

। मैंने श्री स्वरूप दामोदर के गुटकों के अनुसार श्री चैतन्य महाप्रभु तथा रामानन्द राय की मिलन-लीलाओं का प्रचार किया है।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

३१३॥

श्री रूप और श्री रघुनाथ दास के चरणकमलों पर प्रार्थना करते उनकी कृपा की कामना करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलकर श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

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