अध्याय सात: भगवान ने दक्षिण भारत का दौरा शुरू किया
धन्यं तं नौमि चैतन्यं वासुदेवं दयाई-धी। नष्ट-कुष्ठं रूप-पुष्टं भक्ति-तुष्टं चकार ग्नः ॥
१॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु ने वासुदेव नामक ब्राह्मण पर अत्यन्त कृपालु होकर उसका कुष्ठ रोग ठीक कर दिया। उन्होंने उसे भक्ति से सन्तुष्ट एक सुन्दर पुरुष में परिवर्तित कर दिया। मैं उन महिमावान श्री चैतन्य महाप्रभु को सादर प्रणाम करता हूँ।"
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत आचार्य की जय हो एवं श्री चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो!" एइ-मते सार्वभौमेर निस्तार करिल ।दक्षिण-गमने प्रभुर इच्छा उपजिल ॥
३॥
सार्वभौम भट्टाचार्य का उद्धार करने के बाद महाप्रभु को दक्षिण भारत में प्रचार करने की इच्छा हुई।"
माघ-शुक्ल-पक्षे प्रभु करिल सन्यास ।।फाल्गुने आसिया कैल नीलाचले वास ॥
४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने माघ मास के शुक्लपक्ष में संन्यास ग्रहण किया। उसके अगले मास फाल्गुन में वे जगन्नाथ पुरी गये और वहाँ रहे।"
फाल्गुनेर शेषे दोल-यात्रा से देखिल ।।प्रेमावेशे ताँहा बहु नृत्य-गीत कैल ॥
५॥
फाल्गुन मास के अन्त में उन्होंने दोलयात्रा उत्सव देखा और अपने स्वाभाविक भगवत् प्रेम के भावावेश में आकर उन्होंने उस अवसर पर कीर्तन तथा विविध प्रकार से नृत्य किया।"
चैत्रे रहि' कैल सार्वभौम-विमोचन ।। वैशाखेर प्रथमे दक्षिण ग्राइते हैल मन ॥
६॥
। चैत्र मास में जगन्नाथ पुरी में रहते हुए उन्होंने सार्वभौम भट्टाचार्य का उद्धार किया और वैशाख मास के लगते ही उन्होंने दक्षिण भारत जाने का निश्चय किया।"
निज-गण आनि' कहे विनय करिया ।।आलिङ्गन करि' सबाय श्री-हस्ते धरिया ॥
७॥
तोमा-सबा जानि आमि प्राणाधिक करि' ।। प्राण छाड़ा द्याय, तोमा-सबा छाड़िते ना पारि ॥
८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने सारे भक्तों को बुलाकर और उनके हाथ पकड़कर विनयपूर्वक उनसे इस प्रकार कहा, तुम सभी लोग मुझे अपने प्राणों से भी अधिक प्यारे हो। मैं अपना प्राण छोड़ सकता हूँ, किन्तु तुम लोगों को छोड़ पाना मेरे लिए कठिन है।"
तुमि-सब बन्धु मोर बन्धु-कृत्य कैले । इहाँ आनि' मोरे जगन्नाथ देखाइले ॥
९॥
तुम सब मेरे मित्र हो और तुम लोगों ने मुझे जगन्नाथ पुरी लाकर तथा मन्दिर में भगवान जगन्नाथ का दर्शन करने का अवसर प्रदान करके अपना मित्र-कर्तव्य निभाया है।"
एबे सबा-स्थाने मुजि मागों एक दाने ।। सबे मेलि' आज्ञा देह, ग्राइब दक्षिणे ॥
१०॥
अब मैं तुम लोगों से एक छोटा-सा दान माँग रहा हूँ। कृपा करके मुझे दक्षिण भारत की यात्रा पर प्रस्थान करने की अनुमति प्रदान करें।"
विश्वरूप-उद्देशे अवश्य आमि ग्राब ।। एकाकी ग्राइब, काहो सङ्गे ना लइब ॥
११॥
मैं विश्वरूप की खोज करने जाउँगा। तुम लोग मुझे क्षमा करना, किन्तु मैं अकेले जाना चाहता हूँ। मैं किसी को अपने साथ नहीं ले जाना चाहता।"
सेतुबन्ध हैते आमि ना आसि ग्रावत् ।।नीलाचले तुमि सब रहिबे तावत् ॥
१२॥
जब तक मैं सेतुबन्ध से लौट न आऊँ, तब तक तुम सब जगन्नाथ पुरी में ही रहना।"
विश्वरूप-सिद्धि-प्राप्ति जानेन सकल ।दक्षिण-देश उद्धारिते करेन एइ छल ॥
१३ ॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु सर्वज्ञ हैं, इसलिए वे भलीभाँति जानते थे कि विश्वरूप पहले ही चल बसे हैं, किन्तु अनजान बनने का बहाना आवश्यक था, जिससे वे दक्षिण भारत जाकर वहाँ के लोगों का उद्धार कर सकें।"
शुनिया सबार मने हैल महा-दुःख । निःशब्द हइला, सबार शुकाइल मुख ॥
१४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के मुख से यह समाचार सुनकर सारे भक्त अत्यन्त दुःखी हुए, उनके मुख सूख गये और वे मौन हो गये।"
नित्यानन्द-प्रभु कहे, ऐछे कैछे हय ।। एकाकी ग्राइबे तुमि, के इहा सहय ॥
१५॥
तब नित्यानन्द प्रभु ने कहा, यह कैसे हो सकता है कि आप अकेले जाएँ? इसे कौन सहन कर सकता है? दुइ-एक सङ्गे चलुक, ना पड़ हठ-रङ्गे।। झारे कह सेइ दुइ चलुक्तोमार सङ्गे ॥
१६॥
हममें से एक या दो को अपने साथ चलने दें, अन्यथा आप रास्ते में चोरों तथा धूर्तों के चंगुल में पड़ सकते हैं। हममें से आप जिन्हें चाहें ले लें, किन्तु हर हालत में दो व्यक्तियों को आपके साथ जाना चाहिए।"
दक्षिणेर तीर्थ-पथ आमि सब जानि ।।आमि सङ्गे ग्राइ, प्रभु, आज्ञा देह तुमि ॥
१७॥
मैं दक्षिण भारत के विभिन्न तीर्थस्थलों के सारे मार्ग जानता हूँ। बस, आप आज्ञा दें तो मैं आपके साथ चला चलँ।"
प्रभु कहे, आमि-नर्तक, तुमि सूत्र-धार । तुमि त्रैछे नाचाओ, तैछे नर्तन आमार ॥
१८ ॥
महाप्रभु ने उत्तर दिया, मैं तो मात्र नर्तक हूँ और तुम डोर खींचने वाले ( सूत्रधार) हो। तुम जिस तरह नचाओगे, मैं उसी तरह नाचूंगा।"
सन्यास करिया आमि चलिलाँ वृन्दावन । तुमि आमा लञा आइले अद्वैत-भवन ॥
१९॥
संन्यास ग्रहण करने के बाद मैंने वृन्दावन जाने का निश्चय किया, किन्तु तुम मुझे वहाँ न ले जाकर अद्वैत प्रभु के घर ले आये।"
नीलाचल आसिते पथे भाङ्गिला मोर दण्ड ।। तोमा-सबार गाढ़-स्नेहे आमार कार्य-भङ्ग ॥
२०॥
जगन्नाथ पुरी आते समय तुमने मेरा संन्यास-दण्ड तोड़ डाला। मैं जानता हूँ कि तुम सबका मुझ पर अतीव स्नेह है, किन्तु इससे मेरे कार्य में बाधा पहुँचती है।"
जगदानन्द चाहे आमा विषय भुञ्जाइते ।।ग्रेइ कहे सेइ भये चाहिये करिते ॥
२१॥
जगदानन्द चाहता है कि मैं शारीरिक इन्द्रिय-भोग करूँ और वह मुझसे जो-जो कहता है, वह भयवश मैं करता हूँ।"
कभु यदि इँहार वाक्य करिये अन्यथा ।क्रोधे तिन दिन मोरे नाहि कहे कथा ॥
२२॥
यदि कभी मैं उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ करता हूँ, तो वह क्रोधवश तीन दिनों तक मुझसे बात नहीं करता।"
मुकुन्द हयेन दुःखी देखि' सन्यास-धर्म ।।तिनबारे शीते स्नान, भूमिते शयन ॥
२३॥
संन्यासी होने के कारण मेरा धर्म है कि जमीन पर सोऊँ और जाड़े में भी प्रतिदिन तीन बार स्नान करूं। किन्तु मुकुन्द बेचारा मेरी कठोर तपस्या को देखकर अत्यन्त दु:खी होता है।"
अन्तरे दुःखी मुकुन्द, नाहि कहे मुखे ।। इहार दुःख देखि' मोर द्वि-गुण हये दुःखे ॥
२४॥
हाँ, मुकुन्द कुछ कहता नहीं, किन्तु मैं जानता हूँ कि वह अन्दर से अत्यन्त दुःखी है और उसे दुःखी देखकर मैं उससे दुगना दुःखी हो जाता हूँ ।"
आमि त' सन्यासी, दामोदर—ब्रह्मचारी ।। सदा रहे आमार उपर शिक्षा-दण्ड धरि ॥
२५॥
यद्यपि मैं संन्यासी हूँ और दामोदर एक ब्रह्मचारी है, फिर भी वह मुझे शिक्षा देने के लिए अपने हाथ में दण्ड लिए रहता है।"
इँहार आगे आमि ना जानि व्यवहार ।। इँहारे ना भाय स्वतन्त्र चरित्र आमार ॥
२६॥
। दामोदर के अनुसार सामाजिक व्यवहार में मैं अब भी नौसिखिया हूँ, अतएव उसे मेरी स्वतन्त्र प्रकृति नहीं भाती।"
लोकापेक्षा नाहि इँहार कृष्ण-कृपा हैते ।।आमि लोकापेक्षा कभु ना पारि छाड़िते ॥
२७॥
दामोदर पण्डित तथा अन्य लोगों को भगवान् कृष्ण की अधिक कृपा प्राप्त है, अतएव वे लोग लोक-मत से स्वतन्त्र हैं। इसलिए वे चाहते हैं कि मैं इन्द्रियतृप्ति करूं, भले ही यह अनैतिक क्यों न हो। किन्तु मैं एक दीन संन्यासी हूँ। मैं संन्यास के कर्तव्यों को नहीं त्याग सकता, अतएव मैं उनका कठोरता से पालन करता हूँ।"
अतएव तुमि सब रह नीलाचले ।।दिन कत आमि तीर्थ भ्रमिब एकले ॥
२८॥
अतएव तुम सभी लोग कुछ दिनों तक यहाँ नीलाचल में रहो, जिससे मैं अकेले ही तीर्थस्थानों की यात्रा कर आऊँ।"
इँहा-सबार वश प्रभु हये ये ये गुणे ।।दोषारोप-च्छले करे गुण आस्वादने ॥
२९॥
वास्तव में महाप्रभु अपने सारे भक्तों के सद्गुणों के वशीभूत थे। उन्होंने दोषारोपण करने के बहाने उन सारे गुणों का आस्वादन किया।"
चैतन्येर भक्त-वात्सल्य--अकथ्य-कथन । आपने वैराग्य-दुःख करेन सहन ॥
३०॥
। अपने भक्तों के प्रति श्री चैतन्य महाप्रभु में जो प्रेम था, उसका सहीसही वर्णन कोई भी नहीं कर सकता। उन्होंने संन्यास ग्रहण करने के फलस्वरूप सभी प्रकार के निजी दुःखों को सदैव सहन किया।"
सेइ दुःख देखि' ग्रेइ भक्त दुःख पाय ।। सेई दुःख ताँर शक्त्ये सहन ना ग्राय ॥
३१॥
कभी-कभी श्री चैतन्य महाप्रभु असह्य नियमों का पालन करते और सारे भक्त उनसे अत्यधिक दुःखी होते। यद्यपि महाप्रभु नियमों का कठोरता से पालन करते, किन्तु वे अपने भक्तों के दुःखों को सहन नहीं कर पाते थे।"
गुणे दोषोद्गार-च्छले सबा निषेधिया ।।एकाकी भ्रमिबेन तीर्थ वैराग्य करिया ॥
३२॥
। अतएव उन्हें अपने साथ चलने और दुःखी होने से रोकने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनके गुणों को दोष कहकर घोषित किया।"
तबे चारि-जन बहु मिनति करिल ।।स्वतन्त्र ईश्वर प्रभु कभु ना मानिल ॥
३३॥
। तब चार भक्तों ने बहुत अनुनय-विनय की कि वे महाप्रभु के साथ चलें, किन्तु स्वतन्त्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् होने के कारण श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनकी प्रार्थना स्वीकार नहीं की।"
तबे नित्यानन्द कहे,—ये आज्ञा तोमार।दुःख सुख ये हउक्कर्तव्य आमार ॥
३४॥
तब नित्यानन्द प्रभु ने कहा, आपकी आज्ञा मेरा कर्तव्य है, चाहे उससे हमें सुख मिले या दुःख।"
किन्तु एक निवेदन करों आर बार।।विचार करिया ताहा कर अङ्गीकार ॥
३५॥
। फिर भी मैं आपसे एक निवेदन करना चाहता हूँ। कृपया इस पर विचार करें और यदि उचित समझें, तो स्वीकार कर लें।"
कौपीन, बहिर्वास और जल-पात्र ।। आर किछु नाहि ग्राबे, सबे एइ मात्र ॥
३६॥
आप अपने साथ एक लँगोटा, बाह्य वस्त्र तथा एक जलपात्र लें। आप इससे अधिक कुछ भी न लें।"
तोमार दुई हस्त बद्ध नाम-गणने ।।जल-पात्र-बहिर्वास वहिबे केमने ॥
३७॥
जब आपके दोनों हाथ सदैव नाम-जप तथा पवित्र नाम जप की गिनती करने में लगे रहेंगे, तो आप जलपात्र तथा बाह्य वस्त्रों को किस प्रकार ले जायेंगे?" प्रेमावेशे पथे तुमि हबे अचेतन ।। ए-सब सामग्री तोमार के करे रक्षण ॥
३८॥
जब आप रास्ते में भगवत्प्रेम के आवेश में अचेत हो जायेंगे, तो आपके सामान की-जलपात्र, वस्त्र आदि की रक्षा कौन करेगा?" ‘कृष्णदास'-नामे एइ सरल ब्राह्मण ।। इँहो सङ्गे करि' लह, धर निवेदन ॥
३९॥
श्री नित्यानन्द प्रभु ने आगे कहा, यह कृष्णदास नामक एक सीधासादा ब्राह्मण है। कृपया आप इसे अपने साथ ले जाएँ। यही मेरी विनती है।"
जल-पात्र-वस्त्र वहि' तोमा-सङ्गे ग्राबे ।। ये तोमार इच्छा, कर, किछु ना बलिबे ॥
४०॥
वह आपका जलपात्र तथा वस्त्र वहन करेगा। आप चाहे जो भी करेंगे, वह एक शब्द भी नहीं बोलेगा।"
तबे ताँर वाक्य प्रभु करि' अङ्गीकारे ।ताहा-सबा ला गेला सार्वभौम-घरे ॥
४१॥
श्री नित्यानन्द प्रभु के अनुरोध को मानकर भगवान् चैतन्य ने अपने सारे भक्तों को अपने साथ लिया और वे सार्वभौम भट्टाचार्य के घर गये।"
नमस्करि' सार्वभौम आसन निवेदिल ।।सबाकारे मिलि' तबे आसने वसिल ॥
४२॥
। सार्वभौम भट्टाचार्य ने उनके प्रविष्ट होते ही महाप्रभु को नमस्कार किया और उन्हें बैठने को आसन दिया। फिर अन्य सारे भक्तों को बैठाने के बाद भट्टाचार्य स्वयं बैठे।"
नाना कृष्ण-वार्ता कहि' कहिल ताँहारे ।। ‘तोमार ठाजि आइलाँ आज्ञा मागिबारे ॥
४३॥
भगवान् कृष्ण विषयक विविध वार्ताएँ करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य को बतलाया, मैं तो आपके यहाँ आपका आदेश प्राप्त करने आया हूँ।"
सन्यास करि' विश्वरूप गियाछे दक्षिणे । अवश्य करिब आमि ताँर अन्वेषणे ॥
४४॥
। मेरा बड़ा भाई विश्वरूप संन्यास लेकर दक्षिण भारत चला गया है। अब मुझे उसकी खोज करने जाना है।"
आज्ञा देह, अवश्य आमि दक्षिणे चलिब । तोमार आज्ञाते सुखे लेउटि' आसिब' ॥
४५ ॥
। कृपया मुझे जाने की अनुमति दें, क्योंकि मुझे दक्षिण भारत की यात्रा करनी है। आपकी आज्ञा से मैं शीघ्र ही सुखपूर्वक वापस लौट आऊँगा।"
शुनि' सार्वभौम हैला अत्यन्त कातर ।।चरणे धरिया कहे विषाद-उत्तर ॥
४६॥
यह सुनकर सार्वभौम भट्टाचार्य अत्यन्त क्षुब्ध हो उठे। उन्होंने चैतन्य महाप्रभु के चरणकमल पकड़ लिए और विषाद से पूर्ण यह उत्तर दिया।"
‘बहु-जन्मेर पुण्य-फले पाइनु तोमार सङ्ग ।हेन-सङ्ग विधि मोर करिलेक भङ्ग ॥
४७॥
मुझे कुछ पुण्यकर्मों के कारण अनेक जन्मों के बाद आपको संग मिला था। अब विधाता इस अमूल्य संग का विच्छेद कर रहा है।"
शिरे वज़ पड़े ग्रदि, पुत्र मरि' ग्राय ।।ताहा सहि, तोमार विच्छेद सहन ना याय ॥
४८॥
। यदि मेरे सिर पर वज्रपात हो जाए अथवा मेरा पुत्र मर जाए, तो मैं उसे सहन कर सकता हूँ। किन्तु मैं आपके वियोग के दुःख को नहीं सह सकता।"
स्वतन्त्र-ईश्वर तुमि करिबे गमन ।।दिन कथो रह, देखि तोमार चरण' ॥
४९॥
हे प्रभु, आप स्वतन्त्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। आपको जाना निश्चित है, यह मैं जानता हूँ। फिर भी मैं आपसे कुछ दिन और रुकने के लिए निवेदन कर रहा हूँ, जिससे आपके चरणकमलों का दर्शन कर सकें।"
ताहार विनये प्रभुर शिथिल हैल मन ।।रहिल दिवस कथो, ना कैल गमन ॥
५०॥
सार्वभौम भट्टाचार्य की विनती सुनकर, चैतन्य महाप्रभु दयाई हो गये। वे कुछ दिन और रुके रहे और प्रस्थान नहीं किया।"
भट्टाचार्य आग्रह करि' करेन निमन्त्रण । गृहे पाक करि' प्रभुके करा'न भोजन ॥
५१॥
भट्टाचार्य ने बड़े ही आग्रहपूर्वक चैतन्य महाप्रभु को अपने घर आमन्त्रित किया और उन्हें अच्छी तरह भोजन कराया।"
ताँहार ब्राह्मणी, ताँर नाम-पाठीर माता' ।। रान्धि' भिक्षा देन तेंहो, आश्चर्य ताँर कथा ॥
५२॥
भट्टाचार्य की पत्नी का नाम पाठीमाता (पाठी की माता) था। उन्होंने ही भोजन पकाया। इन लीलाओं का वर्णन अत्यन्त आश्चर्यजनक है।"
आगे त' कहिब ताहा करिया विस्तार । एबे कहि प्रभुर दक्षिण-यात्रा-समाचार ॥
५३॥
बाद में इसका विस्तार से वर्णन करूँगा, किन्तु इस समय मैं श्री चैतन्य महाप्रभु की दक्षिण भारत यात्रा का वर्णन करना चाहता हूँ।"
दिन पाँच रहि' प्रभु भट्टाचार्य-स्थाने । चलिबार लागि' आज्ञा मागिला अपने ॥
५४॥
। सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पर पाँच दिन रुककर श्री चैतन्य महाप्रभु ने दक्षिण भारत के लिए प्रस्थान करने हेतु स्वयं अनुमति माँगी।"
प्रभुर आग्रहे भट्टाचार्य सम्मत हइला ।। प्रभु ताँरे ला जगन्नाथ-मन्दिरे गेला ॥
५५ ।। भट्टाचार्य की अनुमति पाकर श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथजी के मन्दिर में दर्शन करने गये। वे अपने साथ भट्टाचार्य को लेते गये।"
दर्शन करि' ठाकुर-पाश आज्ञा मागिला । पूजारी प्रभुरे माला-प्रसाद आनि' दिला ॥
५६॥
भगवान जगन्नाथ का दर्शन करके श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनसे भी आज्ञा माँगी। तब पुजारी ने महाप्रभु को तुरन्त प्रसाद और माला लाकर दी ।"
आज्ञा-माला पाजा हर्षे नमस्कार करि' ।। आनन्दे दक्षिण-देशे चले गौरहरि ॥
५७॥
माला के रूप में भगवान जगन्नाथजी की आज्ञा पाकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें नमस्कार किया और अत्यन्त प्रसन्नचित्त होकर दक्षिण भारत जाने की तैयारी की।"
भट्टाचार्य-सङ्गे आर ग्रत निज-गण। जगन्नाथ प्रदक्षिण करि' करिला गमन ॥
५८॥
अपने निजी संगियों तथा सार्वभौम भट्टाचार्य के साथ श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगन्नाथजी की वेदी की प्रदक्षिणा की। तत्पश्चात् वे अपनी दक्षिण भारत की यात्रा पर रवाना हो गये।"
समुद्र-तीरे तीरे आलालनाथ-पथे ।। सार्वभौम कहिलेन आचार्य-गोपीनाथे ॥
५९॥
जब महाप्रभु समुद्र-तट पर स्थित आलालनाथ के मार्ग पर जा रहे थे, तब सार्वभौम भट्टाचार्य ने गोपीनाथ आचार्य को निम्नलिखित आदेश दिया।"
चारि कोपीन-बहिर्वास राखियाछि घरे ।। ताहा, प्रसादान्न, लजा आइस विप्र-द्वारे ॥
६०॥
मैंने घर पर कौपीन तथा बाहरी वस्त्रों के जो चार जोड़े रख छोड़े हैं, उन्हें लाओ और साथ में कुछ जगन्नाथजी का प्रसाद भी लेते आओ। तुम किसी ब्राह्मण की सहायता से ये चीजें अपने साथ लेते आना।"
तबे सार्वभौम कहे प्रभुर चरणे ।। अवश्य पालिबे, प्रभु, मोर निवेदने ॥
६१॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु विदा हो रहे थे, तो सार्वभौम भट्टाचार्य ने उनके चरणकमलों पर यह निवेदन किया, हे प्रभु, मेरी एक अन्तिम प्रार्थना है और मुझे आशा है कि आप उसे अवश्य पूरी करेंगे।"
‘रामानन्द राय' आछे गोदावरी-तीरे । अधिकारी हयेन तेंहो विद्यानगरे ॥
६२॥
गोदावरी नदी के किनारे स्थित विद्यानगर नामक नगरी में रामानन्द राय नामक एक जिम्मेदार सरकारी अधिकारी हैं।"
शूद्र विषयि-ज्ञाने उपेक्षा ना करिबे ।आमार वचने ताँरे अवश्य मिलिबे ॥
६३॥
आप कृपया उन्हें भौतिक कार्यकलापों में व्यस्त रहने वाला शूद्र समझकर उनकी उपेक्षा न करें। मेरी विनती है कि आप उनसे अवश्य मिलें।"
तोमार सङ्गेर स्रोग्य तेहो एक जन ।।पृथिवीते रसिक भक्त नाहि ताँर सम ॥
६४॥
। सार्वभौम भट्टाचार्य ने आगे कहा, रामानन्द राय आपकी संगति के लिए उपयुक्त व्यक्ति है। दिव्य रसों के ज्ञान के विषय में अन्य कोई भक्त उनकी बराबरी नहीं कर सकता।"
पाण्डित्य आर भक्ति-रस, मुँहेर तेहो सीमा ।सम्भाषिले जानिबे तुमि ताँहार महिमा ॥
६५॥
वे अत्यन्त विद्वान एवं भक्ति-रस में दक्ष हैं। वे वास्तव में अत्यन्त उन्नत हैं और जब आप उनसे बात करेंगे, तो देखेंगे कि वे कितने महिमावान हैं।"
अलौकिक वाक्य चेष्टा ताँर ना बुझिया ।।परिहास करियाछि ताँरे 'वैष्णव' बलिया ।। ६६॥
जब पहले पहल मैंने रामानन्द राय से बात की थी, तो मुझे इसका अनुभव नहीं हो पाया था कि उनकी बातचीत तथा चेष्टाएँ दिव्य और असामान्य हैं। मैंने उनका परिहास किया था, क्योंकि वे वैष्णव थे।"
तोमार प्रसादे एबे जानिनु ताँर तत्त्व ।। सम्भाषिले जानिबे ताँर ग्रेमन महत्त्व ॥
६७॥
भट्टाचार्य ने कहा, आपकी कृपा से मैंने अब रामानन्द राय को वास्तव में समझा है। आप उनसे बातें करेंगे, तो आप भी उनकी महानता को स्वीकार करेंगे।"
अङ्गीकार करि' प्रभु ताँहार वचन ।। तारै विदाय दिते ताँरै कैल आलिङ्गन ॥
६८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य के इस अनुरोध को मान लिया कि वे रामानन्द राय से अवश्य मिलें। महाप्रभु ने सार्वभौम से विदा लेते हुए उनका आलिंगन किया।"
घरे कृष्ण भजि' मोरे करिह आशीर्वादे ।। नीलाचले आसि' ग्रेन तोमार प्रसादे ॥
६९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने भट्टाचार्य से कहा कि जब वे अपने घर में भगवान् कृष्ण की भक्ति में लगे हों, तब वे उन्हें आशीर्वाद देते रहें, जिससे सार्वभौम की कृपा से वे पुनः जगन्नाथ पुरी वापस आ सकें।"
एत बलि' महाप्रभु करिला गमन । मूर्च्छित हा ताहाँ पड़िला सार्वभौम ॥
७० ॥
यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी यात्रा पर चल पड़े और उधर सार्वभौम भट्टाचार्य तुरन्त मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।"
ताँरै उपेक्षिया कैल शीघ्र गमन ।। के बुझिते पारे महाप्रभुर चित्त-मन ॥
७१॥
यद्यपि सार्वभौम भट्टाचार्य मूर्छित हो गये, किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने इस पर ध्यान नहीं दिया, प्रत्युत वे तुरन्त वहाँ से चले गये। भला श्री चैतन्य महाप्रभु के मन तथा मनोभाव को कौन समझ सकता है? महानुभावेर चित्तेर स्वभाव एइ हय ।। पुष्प-सम कोमल, कठिन वज्र-मय ॥
७२॥
एक महान् व्यक्ति के मन का स्वभाव ऐसा ही होता है। कभी वह फूल के समान कोमल हो जाता है, तो कभी वज्र के समान कठोर।"
वज्रादपि कठोराणि मृदूनि कुसुमादपि ।। लोकोत्तराणां चेतांसि को नु विज्ञातुमीश्वरः ॥
७३॥
सामान्य व्यक्ति से ऊँचे व्यवहार वालों के हृदय कभी वज्र से भी अधिक कठोर होते हैं, तो कभी फूल से भी अधिक कोमल होते हैं। महापुरुषों में ऐसे विरोधाभासों को समझने में कौन समर्थ हो सकता है? नित्यानन्द प्रभु भट्टाचार्ये उठाइल ।।ताँर लोक-सङ्गे ताँरै घरे पाठाइल ॥
७४। श्री नित्यानन्द प्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य को उठाया और उनके लोगों की सहायता से उन्हें उनके घर भेज दिया।"
भक्त-गण शीघ्र आसि' लैल प्रभुर साथ।वस्त्र-प्रसाद ली तबे आइला गोपीनाथ ॥
७५ ॥
तुरन्त सारे भक्त आ गये और श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ हो लिए। इसके बाद गोपीनाथ आचार्य वस्त्र तथा प्रसाद लेकर आये।"
सबा-सङ्गे प्रभु तबे आलालनाथ आइला । नमस्कार करि' तारे बहु-स्तुति कैला ॥
७६ ।। । सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ-साथ आलालनाथ तक गये। वहाँ उन सबने नमस्कार किया और विविध स्तुतियाँ कीं।"
प्रेमावेशे नृत्य-गीत कैल कत-क्षण ।।देखिते आइला ताहाँ वैसे व्रत जन ॥
७७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कुछ समय तक अत्यधिक भावावेश में नृत्य और कीर्तन किया। पड़ोस के सारे लोग उन्हें देखने आये।"
चौदिकेते सब लोक बले ‘हरि' ‘हरि' ।प्रेमावेशे मध्ये नृत्य करे गौरहरि ॥
७८ ॥
गौरहरि के नाम से विख्यात श्री चैतन्य महाप्रभु के चारों ओर लोग जोर-जोर से हरि नाम का उच्चारण करने लगे। श्री चैतन्य महाप्रभु हमेशा की तरह अपने प्रेमावेश में मग्न होकर उन सबके बीच नाचते रहे।"
काञ्चने-सदृश देह, अरुण वसन ।पुलकाश्रु-कम्प-स्वेद ताहाते भूषण ॥
७९ ॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु का शरीर प्राकृतिक रूप से अत्यन्त सुन्दर था। यह पिघले सोने के समान था और केसरिया वस्त्र से सजित था। वे भावलक्षणों यथा रोमांच, अश्रु, कम्पन तथा शरीर-भर में पसीने से अलंकृत होकर अत्यन्त सुन्दर लग रहे थे।"
देखिया लोकेर मने हैल चमत्कार ।।ग्रत लोक आइसे, केह नाहि ग्राय घर ॥
८०॥
वहाँ पर उपस्थित सारे लोग श्री चैतन्य महाप्रभु के नृत्य तथा उनके शारीरिक परिवर्तनों को देखकर चकित थे। जो भी वहाँ आया वह घर जाने का नाम नहीं ले रहा था।"
केह नाचे, केह गाय, 'श्री-कृष्ण' ‘गोपाल' । प्रेमेते भासिल लोक, स्त्री-वृद्ध-आबाल ॥
८१॥
। बच्चे, बूढ़े तथा स्त्रियाँ-हर कोई श्रीकृष्ण तथा गोपाल नाम लेलेकर नाचने-गाने लगा। इस तरह वे सब भगवत्प्रेम के सागर में तैर रहे थे।"
देखि' नित्यानन्द प्रभु कहे भक्त-गणे ।एइ-रूपे नृत्य आगे हबे ग्रामे-ग्रामे ॥
८२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के कीर्तन तथा नृत्य को देखकर श्री नित्यानन्द प्रभु ने भविष्यवाणी की कि आगे चलकर गाँव-गाँव में ऐसा नृत्य तथा कीर्तन होगा।"
अतिकाल हैल, लोक छाड़िया ना ग्राय ।।तबे नित्यानन्द-गोसाञि सृजिला उपाय ॥
८३ ॥
यह देखकर कि काफी विलम्ब हो रहा है, नित्यानन्द गोसांई ने भीड़ छटाने का उपाय ढूंढ निकाला।"
मध्याह्न करिते गेला प्रभुके लजी ।।ताहा देखि’ लोक आइसे चौदिके धाज्ञा ॥
८४॥
जब नित्यानन्द प्रभु श्री चैतन्य महाप्रभु को दोपहर का भोजन कराने ले गये, तो सारे लोग उनके चारों ओर दौड़ते हुए आये।"
मध्याह्न करिया आइला देवता-मन्दिरे ।निज-गण प्रवेशि' कपाट दिल बहिद्वरि ॥
८५॥
स्नान करने के बाद वे दोपहर के समय मन्दिर लौट आये। श्री नित्यानन्द प्रभु ने अपने लोगों को भीतर लेकर बाहरी दरवाजे को बन्द कर लिया।"
तबे गोपीनाथ दुइ-प्रभुरे भिक्षा कराइल ।। प्रभुर शेष प्रसादान्न सबे बाँटि' खाइल ॥
८६॥
। तत्पश्चात् गोपीनाथ आचार्य दोनों प्रभुओं के खाने के लिए प्रसाद ले आये, और जब वे खा चुके, तो प्रभुओं के शेष बचे प्रसाद को सभी भक्तों में बाँट दिया गया।"
शुनि' शुनि' लोक-सब आसि' बहिद्वारे । ‘हरि' ‘हरि' बलि' लोक कोलाहल करे ॥
८७।। यह सुनकर सारे लोग बाहरी दरवाजे पर आ गये और ‘हरि' ‘हरि' कहकर कीर्तन करने लगे। इस तरह वहाँ पर कोलाहल मच गया।"
तबे महाप्रभु द्वार कराइल मोचन ।आनन्दे आसिया लोक पाइल दरशन ॥
८८॥
। दोपहर के भोजन के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने दरवाजा खुलवा दिया। इस तरह हर एक ने बड़े ही आनन्द से उनका दर्शन प्राप्त किया।"
एई-मत सन्ध्या पर्यन्त लोक आसे, ग्राय ।।‘वैष्णव' हइल लोक, सबे नाचे, गाय ॥
८९॥
लोग संध्या-समय तक आते और जाते रहे। वे सभी वैष्णव-भक्त बन गये और कीर्तन करने और नाचने लगे।"
एइ-रूपे सेइ ठाजि भक्त-गण-सङ्गे।।सेइ रात्रि गोइला कृष्ण-कथा-रङ्गे ॥
९०॥
तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने रात वहीं बिताई, और अपने भक्तों के साथ बड़े ही आनन्द से भगवान् कृष्ण की लीलाओं की चर्चा की।"
प्रातः-काले स्नान करि' करिला गमन ।।भक्त-गणे विदाय दिला करि' आलिङ्गन ॥
९१॥
। प्रातःकाल स्नान करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी दक्षिणभारत यात्रा पर चल पड़े। उन्होंने भक्तों का आलिंगन करके उनसे विदा ली।।"
मूर्च्छित हा सबे भूमिते पड़िला ।।ताँहा-सबा पाने प्रभु फिरि' ना चाहिला ॥
९२॥
। यद्यपि वे सब बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़े थे, किन्तु महाप्रभु ने मुड़कर उनकी ओर नहीं देखा-वे आगे ही बढ़ते गये।"
विच्छेदे व्याकुल प्रभु चलिला दुःखी हा ।। पाछे कृष्णदास ग्राय जल-पात्र लञा ॥
९३॥
वियोग के कारण महाप्रभु अत्यन्त व्याकुल हो उठे और दुःखी मन से चलते रहे। उनका सेवक कृष्णदास उनका जलपात्र लिए उनके पीछे पीछे चल रहा था।"
भक्त-गण उपवासी ताहाङिहिला ।। आर दिने दुःखी हा नीलाचले आइला ॥
९४॥
। सारे भक्त वहीं बिना खाये पड़े रहे, किन्तु अगले दिन सभी दुःखी मन से जगन्नाथ पुरी लौट गये।"
मत्त-सिंह-प्राय प्रभु करिला गमन ।। प्रेमावेशे ग्राय करि' नाम-सङ्कीर्तन ॥
९५॥
। प्रायः उन्मत्त सिंह की भाँति श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी यात्रा पर निकल पड़े। वे प्रेमावेश से पूर्ण थे और कृष्ण-नाम का निम्नवत् उच्चारण करते हुए संकीर्तन करते जा रहे थे।"
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! हे । कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! हे ॥
कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! रक्ष माम् ।। कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! पाहि माम् ॥
राम! राघव! राम! राघव! राम! राघव! रक्ष माम् ।।कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! पाहि माम् ॥
९६॥
महाप्रभु कीर्तन कर रहे थेकृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! हे कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! हे कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! रक्ष माम् कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! कृष्ण! पाहि माम्।अर्थात् हे भगवान् कृष्ण! कृपया मेरी रक्षा कीजिये और मेरा पालन कीजिये। उन्होंने यह भी कीर्तन किया राम! राघव! राम! राघव! राम! राघव! रक्ष माम्।। कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! कृष्ण! केशव! पाहि माम्।अर्थात् हे राजा रघु के वंशज! हे भगवान् राम! मेरी रक्षा करें। हे कृष्ण, हे केशी असुर के संहारक केशव, कृपया मेरा पालन करें।"
एइ श्लोक पड़ि' पथे चलिला गौरहरि ।। लोक देखि' पथे कहे,---बल' हरि' 'हरि' ॥
९७॥
इस श्लोक का कीर्तन करते हुए गौरहरि श्री चैतन्य महाप्रभु अपने मार्ग पर चले जा रहे थे। जब वे किसी को देखते, तो वे उससे अनुरोध करते कि हरि! हरि! बोलो।"
सेई लोक प्रेम-मत्त हा बले 'हरि' 'कृष्ण' ।। प्रभुर पाछे सङ्गे ग्राय दर्शन-सतृष्ण ॥
९८॥
जो कोई भी श्री चैतन्य महाप्रभु को हरि! हरि! बोलते सुनता, वह भी हरि तथा कृष्ण के नामों का उच्चारण करने लगता। इस तरह वे सब महाप्रभु का दर्शन पाने की उत्सुकता से उनके पीछे-पीछे चलने लगते।"
कत-क्षणे रहि' प्रभु तारे आलिङ्गिया ।। विदाय करिल तारे शक्ति सञ्चारिया ॥
९९॥
। कुछ समय बाद महाप्रभु उन लोगों का आलिंगन करते और उन्हें आध्यात्मिक शक्ति से ओतप्रोत करने के बाद घर वापस जाने के लिए कहते।।"
सेड़-जन निज-ग्रामे करिया गमन 'कृष्ण' बलि' हासे, कान्दे, नाचे अनुक्षण ॥
१००॥
। इस प्रकार शक्ति को पाकर हर व्यक्ति कृष्ण-नाम का कीर्तन करता और कभी हँसता, रोता और नाचता हुआ अपने घर को लौटता।"
झारे देखे, तारे कहे,—कह कृष्ण-नाम ।।एड-मत 'वैष्णव' कैल सब निज-ग्राम ॥
१०१।। इस प्रकार शक्ति प्राप्त व्यक्ति जिस किसी को देखता, उसी से प्रार्थना करता कि वह कृष्ण-नाम का उच्चारण करें। इस तरह सारे गाँव वाले भी पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के भक्त बन जाते।।"
ग्रामान्तर हैते देखिते आइल ग्रत जन ।।ताँर दर्शन-कृपाय हय ताँर सम ॥
१०२॥
ऐसे शक्ति प्राप्त लोगों का दर्शन करने मात्र से विभिन्न गाँवों के लोग जो उन्हें देखने आते, उनकी कृपादृष्टि से उन्हीं के समान बन जाते।"
सेइ ग्राइ' ग्रामेर लोक वैष्णव करय ।।अन्य-ग्रामी आसि' ताँरै देखि' वैष्णव हय ॥
१०३॥
जब शक्ति से संचारित ये लोग अपने अपने गाँवों को लौटते, तो इन्होंने भी दूसरों को भक्त बना लिया। जब और लोग विभिन्न गाँवों से इन्हें देखने आये, तो वे भी भक्त बन गये।"
सेइ ग्राइ' आर ग्रामे करे उपदेश ।।एइ-मत 'वैष्णव' हैल सब दक्षिण-देश ॥
१०४॥
इस प्रकार जैसे जैसे वे सारे शक्ति-प्राप्त लोग एक गाँव से दूसरे गाँव जाने लगे, वैसे वैसे दक्षिण भारत के सारे लोग भक्त बनते गये।"
एइ-मत पथे ग्राइते शत शत जन ।।‘वैष्णव' करेन ताँरै करि' आलिङ्गन ॥
१०५ ॥
इस तरह कई सौ लोग वैष्णव बन गये, जो महाप्रभु को रास्ते में मिले और जिन्हें उन्होंने गले लगाया।"
ग्रेइ ग्रामे रहि' भिक्षा करेन याँर घरे ।।सेइ ग्रामेर व्रत लोक आइसे देखिबारे ॥
१०६॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु जिस-जिस गाँव में भिक्षा ग्रहण करने के लिए रुके, वहीं अनेक लोग उनका दर्शन करने आये।"
प्रभुर कृपाय हय महाभागवत ।सेई सब आचार्य हा तारिल जगत् ॥
१०७॥
। भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से सारे व्यक्ति उच्च कोटि के भक्त बन गये। बाद में वे शिक्षक या गुरु बने और उन्होंने सम्पूर्ण जगत् का उद्धार किया।"
एइ-मत कैला झावला सेतुबन्धे ।।सर्व-देश 'वैष्णव' हैल प्रभुर सम्बन्धे ॥
१०८॥
इस तरह महाप्रभु भारत की दक्षिण सीमा तक गये और उन्होंने सारे प्रान्तों के लोगों को वैष्णव बना दिया।"
नवद्वीपे ग्रेइ शक्ति ना कैला प्रकाशे ।।से शक्ति प्रकाशि' निस्तारिल दक्षिण-देशे ॥
१०९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने नवद्वीप में अपनी आध्यात्मिक शक्ति प्रकट नहीं की, किन्तु उन्होंने ने दक्षिण भारत में उसे प्रकट किया और वहाँ के सारे लोगों का उद्धार किया।"
प्रभुके ये भजे, तारे ताँर कृपा हय ।।सेइ से ए-सब लीला सत्य करि' लय ॥
११०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु अन्यों को किस तरह शक्ति प्रदान करते हैं, उसे केवल वही समझ सकता है, जो वास्तव में भगवद्भक्त है और जिसे उनकी कृपा प्राप्त हो चुकी है।"
अलौकिक-लीलाय ग्रार ना हय विश्वास । इह-लोक, पर-लोक तार हय नाश ॥
१११॥
जो व्यक्ति महाप्रभु की असामान्य दिव्य लीलाओं में विश्वास नहीं करता, उसका इस लोक तथा परलोक दोनों में विनाश हो जाता है।"
प्रथमेइ कहिल प्रभुर ग्रे-रूपे गमन । एइ-मत जानिह यावत्दक्षिण-भ्रमण ॥
११२॥
मैंने पहले महाप्रभु के गमन के विषय में जो कुछ कहा है, उसे महाप्रभु की दक्षिण भारत की पूरी यात्रा की अवधि पर लागू समझना चाहिए।"
एइ-मत ग्राइते साइते गेला कूर्म-स्थाने ।। कूर्म देखि' कैल ताँरे स्तवन-प्रणामे ॥
११३॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु कूर्मक्षेत्र नामक तीर्थस्थान में पहुँचे, तो उन्होंने अर्चाविग्रह का दर्शन किया, स्तुति की तथा प्रणाम किया।"
प्रेमावेशे हासि' कान्दि' नृत्य-गीत कैल ।।देखि' सर्व लोकेर चित्ते चमत्कार हैल ॥
११४॥
जब तक श्री चैतन्य महाप्रभु इस स्थान पर रहे, वे यथावत् अपने भगवत्प्रेम के भावावेश में रहे और हँसते, रोते, नाचते तथा कीर्तन करते रहे। जो भी उन्हें देखता, आश्चर्यचकित रह जाता।"
आश्चर्य शुनिया लोक आइल देखिबारे ।।प्रभुर रूप-प्रेम देखि' हैला चमत्कारे ॥
११५ ।। इन अद्भुत घटनाओं को सुन-सुनकर लोग वहाँ उनके दर्शन करने आते। जब वे महाप्रभु का सौन्दर्य तथा उनकी भावदशा देखते, तो वे आश्चर्यचकित रह जाते।"
दर्शने 'वैष्णव' हैल, बले 'कृष्ण' ‘हरि' ।। प्रेमावेशे नाचे लोक ऊर्ध्व बाहु करि' ॥
११६॥
चैतन्य महाप्रभु के दर्शन-मात्र से लोग भक्त बन गये। वे कृष्ण तथा हरि एवं समस्त पवित्र नामों का कीर्तन करने लगे। वे सभी प्रेमावेश में मग्न होकर अपने हाथ ऊपर उठा-उठाकर नाचने लगे।"
कृष्ण-नाम लोक-मुखे शुनि' अविराम । सेड लोक वैष्णव' कैल अन्य सब ग्राम ॥
११७॥
उन्हें सदैव भगवान् कृष्ण के पवित्र नामों को कीर्तन करते सुनकर दूसरे सभी गाँवों के लोग भी वैष्णव बन गये।"
एइ-मत परम्पराय देश 'वैष्णव' हैल । कृष्ण-नामामृत-वन्याय देश भासाइल ॥
११८॥
कृष्ण का पवित्र नाम सुन-सुनकर सारा देश वैष्णव बन गया। ऐसा प्रतीत होता था मानो कृष्ण के पवित्र नाम के अमृत ने सम्पूर्ण देश को आप्लावित कर दिया हो।"
कत-क्षणे प्रभु यदि बाह्य प्रकाशिला ।। कूर्मेर सेवक बहु सम्मान करिला ।। ११९॥
कुछ समय बाद जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने बाह्य चेतना दिखलाई, तो कूर्मदेव के एक पुजारी ने उन्हें विविध भेटें दीं।"
ग्रेड ग्रामे ग्राय ताहाँ एइ व्यवहार ।। एक ठात्रि कहिल, ना कहिब आर बार ॥
१२०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की प्रचार-विधि का वर्णन मैं पहले ही कर चुका हैं, अतएव मैं उसे फिर से नहीं दोहराऊँगा। महाप्रभु जिस किसी गाँव में जाते, उनका व्यवहार वैसा ही रहता।।"
‘कूर्म'-नामे सेइ ग्रामे वैदिक ब्राह्मण ।बहु श्रद्धा-भक्त्ये कैल प्रभुर निमन्त्रण ॥
१२१॥
एक गाँव में कूर्म नाम का एक वैदिक ब्राह्मण था। उसने बड़े ही सत्कार तथा भक्ति से श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने घर आमन्त्रित किया।"
घरे आनि' प्रभुर कैल पाद प्रक्षालन ।।सेई जल वंश-सहित करिल भक्षण ।। १२२॥
यह ब्राह्मण महाप्रभु को अपने घर ले आया, उसने उनके चरणकमल धोये और उस जल को परिवार सहित पिया।"
अनेक-प्रकार स्नेहे भिक्षा कराइल ।। गोसाजिर शेषान्न स-वंशे खाइल ॥
१२३॥
। उस कूर्म ब्राह्मण ने महाप्रभु को बड़े ही स्नेह तथा आदर से सभी प्रकार का भोजन कराया। उसके बाद जो शेष बचा उसे परिवार के सारे सदस्यों सहित उसने खाया।।"
‘ग्रेइ पाद-पद्म तोमार ब्रह्मा ध्यान करे।सेइ पाद-पद्म साक्षाताइल मोर धरे ॥
१२४॥
फिर उस ब्राह्मण ने प्रार्थना करनी शुरू की, हे प्रभु, आपके जिन चरणकमलों का ध्यान ब्रह्माजी करते हैं, वे ही चरणकमल मेरे घर में पधारे हैं।"
मोर भाग्येर सीमा ना याय कहने ।आजि मोर श्लाघ्य हैल जन्म-कुल-धन ॥
१२५॥
हे प्रभु, मेरे महान् सौभाग्य की कोई सीमा नहीं रही। इसका वर्णन नहीं किया जा सकता। आज मेरा परिवार, जन्म तथा मेरा धन सभी धन्य हो गये।"
कृपा कर, प्रभु, मोरे, ग्राँ तोमा-सङ्गे।।सहिते ना पारि दुःख विषय-तरङ्गे' ॥
१२६॥
उस ब्राह्मण ने श्री चैतन्य महाप्रभु से प्रार्थना की, हे प्रभु, आप मुझ पर कृपादृष्टि करें और मुझे अपने साथ चलने दें। मैं अब और अधिक समय तक भौतिक जीवन से उत्पन्न दुःख की लहरों को सहन नहीं कर सकता।"
प्रभु कहे,–ऐछे बाकभु ना कहिबा ।। गृहे रहि' कृष्ण-नाम निरन्तर लइबा ॥
१२७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, अब फिर से ऐसा मत कहना। अच्छा यही होगा कि तुम घर पर रहो और सदैव कृष्ण-नाम का जप करो।।"
ग्रारे देख, तारे कह 'कृष्ण'-उपदेश ।। आमार आज्ञाय गुरु हा तार' एइ देश ॥
१२८॥
हर एक को उपदेश दो कि वह भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत में दिये गये भगवान् श्रीकृष्ण के आदेशों का पालन करे। इस तरह गुरु बनो और इस देश के हर व्यक्ति का उद्धार करने का प्रयास करो।"
कभु ना बाधिबे तोमार विषय-तरङ्ग ।। पुनरपि एइ ठाजि पाबे मोर सङ्ग ॥
१२९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कूर्म ब्राह्मण को यह भी उपदेश दिया, यदि तुम इस उपदेश का पालन करोगे, तो तुम्हारा गृहस्थ जीवन तुम्हारी आध्यात्मिक प्रगति में बाधक नहीं बनेगा। यदि तुम इन नियमों का पालन करोगे, तो हम पुनः यहीं मिलेंगे, अथवा तुम मेरा साथ कभी नहीं छोड़ोगे।"
एइ मत ग्राँर घरे करे प्रभु भिक्षा ।।सेइ ऐछे कहे, ताँरे कराय एइ शिक्षा ॥
१३०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु जिस किसी के घर में प्रसाद ग्रहण करके भिक्षा लेते, वे उस घर के रहने वालों को अपने संकीर्तन आन्दोलन में सम्मिलित कर लेते और उन्हें वैसी ही शिक्षा देते, जैसी कि कूर्म नामक ब्राह्मण को दी थी।"
पथे ग्राइते देवालये रहे येइ ग्रामे ।। याँर घरे भिक्षा करे, सेइ महा-जने ॥
१३१॥
कूर्मे भैछे रीति, तैछे कैल सर्व-ठानि ।।नीलाचले पुनः ग्रावत्नी आइला गोसाजि ॥
१३२॥
अपनी यात्रा के दौरान श्री चैतन्य महाप्रभु या तो मन्दिर में या सड़क के किनारे रात बिताते। जब वे किसी व्यक्ति के घर भोजन ग्रहण करते, तो वे उसे वही उपदेश देते, जो उन्होंने कूर्म ब्राह्मण को दिया था। दक्षिण भारत की यात्रा से जगन्नाथ पुरी लौट आने तक महाप्रभु इसी प्रकार प्रचार करते रहे।"
अतएव इहाँ कहिलाँ करिया विस्तार । एइ-मत जानिबे प्रभुर सर्वत्र व्यवहार ॥
१३३॥
इस तरह मैंने कूर्म के प्रसंग में महाप्रभु के व्यवहार का विस्तार से वर्णन किया है। इसी तरह से आप सारे दक्षिण भारत में महाप्रभु के व्यवहार को जान सकेंगे।"
एइ-मत सेइ रात्रि ताहाङि रहिला ।।प्रातः-काले प्रभु स्नान करिया चलिला ॥
१३४॥
इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु एक स्थान में रात-भर रहते, और प्रातःकाल स्नान करके पुनः चल देते।"
प्रभुर अनुव्रजि' कूर्म बहु दूर आइला ।।प्रभु ताँरे यत्न करि' घरे पाठाइला ॥
१३५॥
जब महाप्रभु चले, तो कूर्म ब्राह्मण बहुत दूर तक उनके पीछे-पीछे आया, किन्तु अन्त में महाप्रभु ने उसे घर वापस भेज दिया।"
‘वासुदेव'-नाम एक द्विज महाशय । सर्वाङ्गे गलित कुष्ठ, ताते कीड़ा-मय ॥
१३६॥
। वासुदेव नाम का एक अन्य ब्राह्मण था, जो एक महान् व्यक्ति था, किन्तु कोढ़ से पीड़ित था। उसका शरीर जीवित कीड़ों से भरा था।"
अङ्ग हैते येइ कीड़ा खसिया पड़य । उठाजा सेई कीड़ा राखे सेइ ठाञ ॥
१३७॥
यद्यपि वासुदेव कोढ़ से पीड़ित था, किन्तु ज्ञानी था। ज्योंही उसके शरीर से कोई कीड़ा गिर पड़ता, तो वह उसे उठाकर पुनः उसी स्थान में रख देता।"
रात्रिते शुनिला तेंहो गोसाजिर आगमन ।।देखिबारे आइला प्रभाते कूर्मेर भवन ॥
१३८॥
एक रात को वासुदेव ने महाप्रभु के आगमन की बात सुनी, और प्रातः होते ही वह कूर्म के घर महाप्रभु का दर्शन करने आया।"
प्रभुर गमन कूर्म-मुखेते शुनिळा ।।भूमिते पड़िला दुःखे मूर्च्छित हा ॥
१३९॥
जब वह कोढ़ी वासुदेव कूर्म के घर चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने गया, तो उसे बताया गया कि महाप्रभु वहाँ से पहले ही जा चुके हैं। इस पर वह बेहोश होकर भूमि पर गिर पड़ा।"
अनेक प्रकार विलाप करिते लागिला ।सेइ-क्षणे आसि' प्रभु ताँरै आलिङ्गिला ॥
१४०॥
जब वह कोढ़ी ब्राह्मण वासुदेव महाप्रभु का दर्शन न कर सकने के कारण विलाप कर रहा था, तो महाप्रभु तुरन्त उस स्थान को लौट आये और उन्होंने उसका आलिंगन किया।"
प्रभु-स्पर्शे दुःख-सङ्गे कुछ दूरे गेल ।। आनन्द सहिते अङ्ग सुन्दर हइल ॥
१४१॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने उसका स्पर्श किया, तो उसका कोढ़ तथा उसका कष्ट एकसाथ दूर भाग गये। वासुदेव का शरीर अत्यन्त सुन्दर हो गया, जिससे उसे परम सुख प्राप्त हुआ।"
प्रभुर कृपा देखि' ताँर विस्मय हैल मन ।। श्लोक पड़ि' पाये धरि, करये स्तवन ॥
१४२॥
वह ब्राह्मण वासुदेव श्री चैतन्य महाप्रभु की अद्भुत कृपा देखकर चकित था और वह महाप्रभु के चरणकमलों का स्पर्श करके श्रीमद्भागवत का एक श्लोक सुनाने लगा।"
क्वाहं दरिद्रः पापीयान्क्व कृष्णः श्री-निकेतनः ।। ब्रह्म-बन्धुरिति स्माहं बाहुभ्यां परिरम्भितः ॥
१४३॥
उसने कहा, मैं कौन हूँ? एक पापी दरिद्र ब्रह्मबन्धु। और कृष्ण कौन हैं? छः ऐश्वर्ययुक्त पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्। फिर भी उन्होंने अपनी दोनों भुजाओं में भरकर मेरा आलिंगन किया है।"
बहु स्तुति करि' कहे,—–शुन, दया-मय ।। जीवे एई गुण नाहि, तोमाते एइ हय ॥
१४४॥
मोरे देखि' मोर गन्धे पलाय पामर ।। हेन-मोरे स्पर्श' तुमि, स्वतन्त्र ईश्वर ॥
१४५॥
वासुदेव ब्राह्मण ने आगे कहा, हे दयामय प्रभु, ऐसी कृपा सामान्य जीवों में सम्भव नहीं। ऐसी कृपा तो केवल आप में ही पाई जा सकती है। पापी व्यक्ति भी मुझे देखकर मेरे शरीर की दुर्गंध के कारण दूर चला जाता है, फिर भी आपने मेरा स्पर्श किया। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का व्यवहार ऐसा स्वतन्त्र होता है।"
किन्तु आछिलाँ भाल अधम हा । एबे अहङ्कार मोर जन्मिबे आसिया ॥
१४६ ॥
उस दीन विनम्र वासुदेव को चिन्ता थी कि श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से ठीक हो जाने से कहीं वह गर्वित न हो उठे।"
प्रभु कहे,–कभु तोमार ना हबे अभिमान । निरन्तर कह तुमि 'कृष्ण' 'कृष्ण' नाम ॥
१४७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने उस ब्राह्मण को इससे बचाने के लिए उपदेश दिया कि वह निरन्तर हरे कृष्ण मन्त्र का जप करे। ऐसा करने से वह कभी भी व्यर्थ गर्वित नहीं होगा।"
कृष्ण उपदेशि' कर जीवेर निस्तार । अचिराते कृष्ण तोमा करिबेन अङ्गीकार ॥
१४८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने वासुदेव को यह भी सलाह दी कि वह कृष्ण के विषय में उपदेश दे और इस तरह जीवों का उद्धार करे। फलस्वरूप, कृष्ण शीघ्र ही उसका अपने भक्त के रूप में स्वीकार कर लेंगे।"
एतेक कहिया प्रभु कैल अन्तर्धाने । दुइ विप्र गलागलि कान्दे प्रभुर गुणे ॥
१४९॥
वासुदेव ब्राह्मण को इस प्रकार उपदेश देने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु उस स्थान से अदृश्य हो गये। तब कूर्म तथा वासुदेव दोनों ब्राह्मण एकदूसरे के गले लगकर श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य गुणों का स्मरण करके रोने लगे।"
'वासुदेवोद्धार' एइ कहिल आख्यान ।। ‘वासुदेवामृत-प्रद' हैल प्रभुर नाम ॥
१५० ॥
इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु ने जिस तरह वासुदेव कोढ़ी का उद्धार किया, और जिस तरह उनका नाम वासुदेवामृत-प्रद पड़ा, उसका वर्णन मैंने किया है।"
एइ त कहिल प्रभुर प्रथम गमन । कूर्म-दरशन, वासुदेव-विमोचन ।। १५१॥
इस तरह मैं श्री चैतन्य महाप्रभु की प्रारम्भिक यात्रा का वर्णन समाप्त करता हूँ, जिसमें उन्होंने कूर्म-मन्दिर का दर्शन किया और कोढ़ी ब्राह्मण वासुदेव का उद्धार किया।"
श्रद्धा करि' एइ लीला ग्रे करे श्रवण । अचिराते मिलये तारे चैतन्य-चरण ॥
१५२॥
। जो कोई श्री चैतन्य महाप्रभु की इन लीलाओं को अत्यन्त श्रद्धापूर्वक सुनेगा, उसे तुरन्त ही उनके चरणकमल प्राप्त हो जायेंगे।"
चैतन्य-लीलार आदि-अन्त नाहि जानि ।। सेइ लिखि, ग्रेइ महान्तेर मुखे शुनि ॥
१५३ ॥
मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का आदि और अन्त नहीं जानता। फिर भी मैंने जो कुछ लिखा है, उसे महापुरुषों के मुख से सुनकर लिखा है।"
इथे अपराध मोर ना लइओ, भक्त-गण ।।तोमा-सबार चरण–मोर एकान्त शरण ॥
१५४॥
हे भक्तों, कृपया इस विषय में मेरे अपराधों पर विचार मत करना। आपके चरणकमल ही मेरे एकमात्र शरण हैं।"
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश । चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
१५५॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों पर प्रार्थना करते हुए और सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।"
