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अध्याय छह: सार्वभौम भट्टाचार्य की मुक्ति

नौमि तं गौरचन्द्रं यः कुतर्क-कर्कशाशयम् ।सार्वभौमं सर्व-भूमा भक्ति-भूमीनमाचरत् ॥

१॥

मैं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गौरचन्द्र को सादर नमस्कार करता हूँ, जिन्होंने सारे कुतर्को के आगार, कठोर हृदय वाले सार्वभौम भट्टाचार्य को महान् भक्त में बदल दिया।

जय जय गौरचन्द्र जय नित्यानन्द । जयाद्वैतचन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत आचार्य की जय हो! श्री चैतन्य महाप्रभु के भक्तों की जय हो! आवेशे चलिला प्रभु जगन्नाथ-मन्दिरे ।। जगन्नाथ देखि' प्रेमे हइला अस्थिरे ॥

३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु भावावेश में आठारनाला से जगन्नाथ मन्दिर गये। वहाँ जगन्नाथ भगवान् का दर्शन करके वे भगवत्प्रेमवश अत्यन्त व्याकुल हो उठे।

जगन्नाथ आलिङ्गिते चलिला धाञा । मन्दिरे पड़िला प्रेमे आविष्ट हा ॥

४॥

भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु तेजी से भगवान जगन्नाथ का आलिंगन करने गये, किन्तु मन्दिर में प्रवेश करने के बाद वे भगवत्प्रेम में इतने विभोर हो गये कि वे भूमि पर मूर्छित होकर गिर पड़े।

दैवे सार्वभौम ताँहाके करे दरशन । पड़िछा मारिते तेंहो कैल निवारण ॥

५॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु गिर पड़े, तब दैववश सार्वभौम भट्टाचार्य ने उन्हें देख लिया। जब सुरक्षाकर्मी ने महाप्रभु को मारने की धमकी दी, तो सार्वभौम भट्टाचार्य ने तुरन्त उसे मना कर दिया।

प्रभुर सौन्दर्य आर प्रेमेर विकार ।।देखि’ सार्वभौम हैला विस्मित अपार ॥

६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की सुन्दरता तथा भगवत्प्रेम के कारण उनके शरीर में उत्पन्न दिव्य विकारों को देखकर सार्वभौम भट्टाचार्य को अत्यधिक आश्चर्य हुआ।

बहु-क्षणे चैतन्य नहे, भोगेर काल हैल । सार्वभौम मने तबे उपाय चिन्तिल ॥

७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु अधिक समय तक अचेतन पड़े रहे। तभी भगवान जगन्नाथ को भोग लगाने का समय हो गया और भट्टाचार्य कुछ उपाय सोचने लगे।

शिष्य पड़िछा-द्वारा प्रभु निल वहाजा ।। घरे आनि' पवित्र स्थाने राखिल शोयाजा ।। ८॥

सार्वभौम भट्टाचार्य सुरक्षाकर्मी तथा कुछ शिष्यों की सहायता से भी चैतन्य महाप्रभु को अचेत अवस्था में ही अपने घर ले आये और उन्हें एक अत्यन्त पवित्र स्थान में लिटा दिया।

श्वास-प्रश्वास नाहि उदर-स्पन्दन । देखिया चिन्तित हैल भट्टाचार्येर मन ॥

९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर की परीक्षा करने पर सार्वभौम ने देखा कि न तो उनका उदर गति कर रहा है न ही वे श्वास ले रहे हैं। उनकी यह दशा देखकर भट्टाचार्य अत्यन्त चिन्तित हो उठे।

सूक्ष्म तुला आनि' नासा-अग्रेते धरिल ।। ईषत चलये तुला देखि' धैर्य हैल ॥

१०॥

भट्टाचार्य ने बारीक रुई का फोहा लिया और उसे महाप्रभु के नासिका के सामने रखा। जब उन्होंने देखा कि रुई कुछ-कुछ हिल रही है, तो उन्हें कुछ आशा बँधी।

वसि' भट्टाचार्य मने करेन विचार । एइ कृष्ण-महाप्रेमेर सात्त्विक विकार ॥

११॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के पास बैठकर उन्होंने सोचा, यह दिव्य ऊर्मिपृर्ण परिवर्तन ( सात्त्विक विकार) कृष्ण-प्रेम के कारण हुआ है।

'सूद्दीप्त सात्त्विक' एइ नाम ग्रे ‘प्रलय' ।।नित्य-सिद्ध भक्ते से ‘सूद्दीप्त भाव' होय ॥

१२॥

सूद्दीप्त सात्त्विक के लक्षण देखकर सार्वभौम भट्टाचार्य को समझते देर न लगी कि चैतन्य महाप्रभु के शरीर में दिव्य भावावेश (सूद्दीप्त भाव ) हुआ है। ऐसा लक्षण केवल नित्यसिद्ध भक्तों के शरीरों में ही दिखा करता ।

‘अधिरूढ़ भाव' याँर, ताँर ए विकार ।मनुष्येर देहे देखि,—बड़ चमत्कार ॥

१३॥

सार्वभौम भट्टाचार्य ने विचार किया, श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में अधिरूढ भाव के असाधारण दिव्य लक्षण प्रकट हो रहे हैं। यह बड़ा आश्चर्यजनक है! भला मनुष्य के शरीर में ये किस तरह सम्भव हैं? एत चिन्ति' भट्टाचार्य आछेन वसिया ।।नित्यानन्दादि सिंह-द्वारे मिलिल आसिया ॥

१४॥

जब भट्टाचार्य अपने घर में इस प्रकार विचार कर रहे थे, तब नित्यानन्द प्रभु समेत चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्त मन्दिर के सिंह-द्वार ( प्रवेश-द्वार) के निकट पहुँचे।

ताँहा शुने लोके कहे अन्योन्ये बात् ।एक सन्यासी आसि' देखि' जगन्नाथ ॥

१५॥

वहाँ पर इन भक्तों ने लोगों को एक संन्यासी के बारे में बातें करते सुना, जो जगन्नाथ पुरी आया था और जिसने जगन्नाथ विग्रह के दर्शन किये थे।

मूर्च्छित हैल, चेतन ना हय शरीरे । सार्वभौम लञा गेला आपनार घरे ॥

१६॥

लोग कह रहे थे कि वह संन्यासी जगन्नाथ के विग्रह का दर्शन करने पर मूर्छित हो गया। चूँकि उसको होश नहीं आया, इसलिए सार्वभौम भट्टाचार्य उसे अपने घर ले गये।

शुनि' सबै जानिला एइ महाप्रभुर कार्य । हेन-काले आइला ताहाँ गोपीनाथाचार्य ॥

१७॥

यह सुनकर भक्तगण समझ गये कि वे लोग श्री चैतन्य महाप्रभु के बारे में बातें कर रहे हैं। तभी श्री गोपीनाथ आचार्य वहाँ आये।

नदीया-निवासी, विशारदेर जामाता । महाप्रभुर भक्त तेहो प्रभु-तत्त्वज्ञाता ॥

१८॥

गोपीनाथ आचार्य नदिया के निवासी, विशारद के दामाद तथा चैतन्य महाप्रभु के भक्त थे। वे महाप्रभु की वास्तविक पहचान को जानते थे।

मुकुन्द-सहित पूर्वे आछे परिचय ।।मुकुन्द देखिया ताँर हइल विस्मय ॥

१९॥

गोपीनाथ आचार्य पहले से मुकुन्द दत्त को जानते थे; अतएव जब उन्होंने मुकुन्द दत्त को जगन्नाथ पुरी में देखा, तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

मुकुन्द ताँहारे देखि' कैल नमस्कार ।तेहो आलिङ्गिया पुछे प्रभुर समाचार ॥

२० ॥

जब मुकुन्द दत्त गोपीनाथ आचार्य से मिलें, तो उन्होंने उन्हें नमस्कार किया। उनका आलिंगन करने के बाद गोपीनाथ आचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु के विषय में पूछा।

मुकुन्द कहे,—प्रभुर इहाँ हैल आगमने ।। आमि-सब आसियाछि महाप्रभुर सने ॥

२१॥

मुकुन्द दत्त ने उत्तर दिया, महाप्रभु तो पहले ही यहाँ आ चुके हैं। हम उन्हीं के साथ आये हैं।

नित्यानन्द-गोसाजिके आचार्य कैल नमस्कार । सबे मेलि' पुछे प्रभुर वार्ता बार बार ॥

२२ ॥

गोपीनाथ आचार्य ने श्री नित्यानन्द प्रभु को देखते ही उन्हें प्रणाम किया। इस तरह सभी भक्तों से मिलकर उन्होंने बारम्बार श्री चैतन्य महाप्रभु का समाचार पूछा।

मुकुन्द कहे,—‘महाप्रभु सन्यास करिया ।। नीलाचले आइला सङ्गे आमा-सबा ला ॥

२३॥

मुकुन्द दत्त ने आगे कहा, संन्यास लेने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी आये हैं और हम सबको अपने साथ लाये हैं।

आमा-सबा छाड़ि' आगे गेला दरशने । आमि-सब पाछे आइलाँ ताँर अन्वेषणे ॥

२४॥

महाप्रभु हमारा साथ छोड़कर आगे-आगे भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करने चले आये। हम सब अभी आये हैं और अब उन्हीं की खोज में हैं।

अन्योन्ये लोकेर मुखे ये कथा शुनिल ।। सार्वभौम-गृहे प्रभु,—अनुमान कैल ॥

२५ ॥

सब लोगों की बातों से हमने अनुमान लगाया है कि महाप्रभु अब सार्वभौम भट्टाचार्य के घर में हैं।

ईश्वर-दर्शने प्रभु प्रेमे अचेतन ।सार्वभौम ला गेला आपन-भवन ॥

२६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करके भावविभोर हो गये और अचेत हो गये और सार्वभौम भट्टाचार्य उन्हें उसी अवस्था में अपने घर ले गये हैं।

तोमार मिलने ग्रबे आमार हैले मन ।दैवे सेइ क्षणे पाइलैं तोमार दरशन !! २७॥

जब मैं आपसे मिलने की सोच रहा था, अकस्मात् हमारी भेंट संयोग से हो गई।

चल, सबे ग्राइ सार्वभौमेर भवन ।प्रभु देखि' पाछे करिब ईश्वर दर्शन' ॥

२८॥

चलिये, पहले सार्वभौम भट्टाचार्य के घर चलकर श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करें। बाद में हम भगवान जगन्नाथ का दर्शन करने आयेंगे।

एत शुनि' गोपीनाथ सबारे ला ।सार्वभौम-घरे गेला हरषित हा ॥

२९॥

यह सुनकर हर्षित मन से गोपीनाथ आचार्य तुरन्त सभी भक्तों को साथ लेकर सार्वभौम भट्टाचार्य के घर पहुँचे।

सार्वभौम-स्थाने गिया प्रभुके देखिल ।।प्रभु देखि' आचार दुःख-हर्ष हैल ॥

३०॥

सार्वभौम भट्टाचार्य के घर जाकर सबने देखा कि महाप्रभु अचेतावस्था में हैं। उन्हें इस अवस्था में देखकर गोपीनाथ आचार्य अत्यन्त दुःखी हुए, किन्तु साथ ही प्रसन्न थे कि उन्हें महाप्रभु का दर्शन मिल रहा है।

सार्वभौमे जानाञा सबा निल अभ्यन्तरे । नित्यानन्द-गोसाञिरे तेंहो कैल नमस्कारे ॥

३१॥

सार्वभौम भट्टाचार्य ने सभी भक्तों को घर के भीतर आने दिया और नित्यानन्द प्रभु को देखकर भट्टाचार्य ने उन्हें प्रणाम किया।

सबा सहित ग्रथा-ग्रोग्य करिल मिलन ।। प्रभु देखि' सबार हैल हरषित मन ॥

३२॥

सार्वभौम सभी भक्तों से मिले और उनका समुचित स्वागत किया। वे सभी श्री चैतन्य महाप्रभु को देखकर प्रसन्न थे।

सार्वभौम पाठाइल सबा दर्शन करते । ‘चन्दनेश्वर' निज-पुत्र दिल सबार साथे ॥

३३ ॥

तब भट्टाचार्य ने उन सबको जगन्नाथजी का दर्शन करने के लिए वापस भेज दिया और मार्गदर्शक के रूप में अपने पुत्र चन्दनेश्वर को उनके साथ भेजा।

जगन्नाथ देखि' सबार हइल आनन्द ।। भावेते आविष्ट हैला प्रभु नित्यानन्द ॥

३४॥

। तत्पश्चात् जगन्नाथजी के विग्रह को देखकर सभी लोग अत्यन्त प्रसन्न हुए। नित्यानन्द प्रभु विशेष रूप से भावविभोर हो गये।

सबे मेलि' धरि तारे सुस्थिर करिल ।। ईश्वर-सेवक माला-प्रसाद आनि' दिल ॥

३५ ॥

जब नित्यानन्द प्रभु लगभग अचेत हो गये, तो सारे भक्तों ने उन्हें पकड़कर सुस्थिर किया। उस समय जगन्नाथजी का पुजारी विग्रह पर अर्पित एक माला ले आया और नित्यानन्द प्रभु को समर्पित की।

प्रसाद पाजा सबे हैला आनन्दित मने । पुनरपि आइला सबे महाप्रभुर स्थाने ।। ३६॥

। भगवान् जगन्नाथ द्वारा पहनी हुई इस माला को प्राप्त करके सारे लोग अत्यन्त प्रसन्न हुए। बाद में वे सभी उस स्थान पर लौट आये जहाँ महाप्रभु रुके थे।

उच्च करि' करे सबे नाम-सङ्कीर्तन । तृतीय प्रहरे हैल प्रभुर चेतन ॥

३७॥

तत्पश्चात् सारे भक्त उच्च स्वर में हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन करने लगे। महाप्रभु दोपहर से थोड़ा समय पहले सचेत हो गये।

हुङ्कार करिया उठे ‘हरि' ‘हरि' बलि' ।। आनन्दे सार्वभौम ताँर लैल पद-धूलि ॥

३८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु उठकर बैठ गये और हुंकार भरते हुए हरि! हरि! का उच्चारण करने लगे । सार्वभौम भट्टाचार्य महाप्रभु को सचेत देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने महाप्रभु के चरण-धूलि ग्रहण की।

सार्वभौम कहे,—शीघ्र करह मध्याह्न ।। मुजि भिक्षा दिमु आजि महाप्रसादान्न ॥

३९॥

भट्टाचार्य ने सबसे कहा, कृपया तुरन्त ही दोपहर का स्नान कर लें। आज मैं आप लोगों को महा-प्रसाद अर्थात् भगवान जगन्नाथ को अर्पित भोग का उच्चिष्ठ दूंगा।

समुद्र-स्नान करि' महाप्रभु शीघ्र आइला । चरण पाखालि' प्रभु आसने वसिला ॥

४०॥

समुद्र स्नान करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके भक्तजन तुरन्त ही लौट आये। तत्पश्चात् महाप्रभु ने अपने पाँव धोये और भोजन करने के लिए एक आसन पर बैठ गये।

बहुत प्रसाद सार्वभौम आनाइल ।।तबे महाप्रभु सुखे भोजन करिल ॥

४१॥

सार्वभौम भट्टाचार्य ने जगन्नाथ मन्दिर से विविध प्रकार का महाप्रसाद लाये जाने की व्यवस्था की। तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने परम सुखपूर्वक दोपहर का भोजन ग्रहण किया।

सुवर्ण-थालीर अन्न उत्तम व्यञ्जन ।भक्त-गण-सङ्गे प्रभु करेन भोजन ॥

४२॥

चैतन्य महाप्रभु को सोने की थाली में विशेष चावल तथा सर्वोत्तम तरकारियाँ परोसी गईं। इस तरह महाप्रभु ने अपने भक्तों के साथ भोजन किया।

सार्वभौम परिवेशन करेन आपने । प्रभु कहे,----मोरे देह लाफ्रा-व्यञ्जने ॥

४३॥

जब सार्वभौम भट्टाचार्य स्वयं ही प्रसाद का वितरण कर रहे थे, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनसे अनुरोध किया, कृपया मुझे केवल उबली तरकारियाँ दें।

पीठा-पाना देह तुमि इँहा-सबाकारे । तबे भट्टाचार्य कहे गुड़ि' दुइ करे ॥

४४॥

आप सारे भक्तों को पीठा ( केक) तथा कड़े हुए दूध से बने द्रव्य( रबड़ी ) दे सकते हैं। यह सुनकर भट्टाचार्य दोनों हाथ जोड़कर इस प्रकार बोले।

जगन्नाथ कैछे करियाछेन भोजन । आजि सब महाप्रसाद कर आस्वादन ॥

४५ ॥

आज आप सब दोपहर के भोजन का उसी प्रकार आस्वादन करें, जिस प्रकार भगवान् जगन्नाथ ने इसे स्वीकार किया है।

एत बलि' पीठा-पाना सब खाओयाइला । भिक्षा कराञा आचमन कराइला ॥

४६॥

यह कहकर उन्होंने सबको विविध प्रकार का पीठा तथा पाना ( दूध से निर्मित व्यंजन) खिलाया। बाद में उन्हें हाथ, मुँह तथा पाँव धोने के लिए जल दिया।

आज्ञा मागि' गेला गोपीनाथ आचार्यके ला ।।प्रभुर निकट आइला भोजन करिञा ॥

४७॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु तथा उनके भक्तों से आज्ञा लेकर सार्वभौम भट्टाचार्य गोपीनाथ आचार्य सहित भोजन करने गये। भोजन करने के बाद वे महाप्रभु के पास लौट आये।

'नमो नारायणाय' बलि' नमस्कार कैल ।।‘कृष्ण मतिरस्तु' बलि' गोसाजि कहिल ॥

४८॥

सार्वभौम भट्टाचार्य ने नमो नारायणाय ( मैं नारायण को नमस्कार करता हूँ) कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु को नमस्कार किया। श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर में कृष्णो मतिरस्तु कहा ( आपका ध्यान कृष्ण में हो )।

शुनि' सार्वभौम मने विचार करिल ।वैष्णव-सन्यासी इँहो, वचने जानिल ॥

४९॥

ये वचन सुनकर सार्वभौम समझ गये कि श्री चैतन्य महाप्रभु एक वैष्णव संन्यासी हैं।

गोपीनाथ आचार्गेरे कहे सार्वभौम ।।गोसाजिर जानिते चाहि काहाँ पूर्वाश्रम ॥

५०॥

तब सार्वभौम ने गोपीनाथ आचार्य से कहा, मैं श्री चैतन्य महाप्रभु के पूर्व आश्रम (स्थिति ) को जानना चाहता हूँ।

गोपीनाथाचार्य कहे,—नवद्वीपे घर ।।‘जगन्नाथ' नाम, पदवी मिश्र पुरन्दर' ॥

५१॥

गोपीनाथ आचार्य ने उत्तर दिया, नवद्वीप में जगन्नाथ नामक एक निवासी थे, जिनका उपनाम मिश्र पुरन्दर था।

‘विश्वम्भर' नाम इँहार, ताँर इँहो पुत्र ।।नीलाम्बर चक्रवर्तीर हयेन दौहित्र ॥

५२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु उन्हीं जगन्नाथ मिश्र के पुत्र हैं और इनका पहले का नाम विश्वम्भर मिश्र था। ये नीलाम्बर चक्रवर्ती के नाती भी लगते सार्वभौम कहे,—नीलाम्बर चक्रवर्ती ।।विशारदेर समाध्यायी,—एइ ताँर ख्याति ॥

५३॥

भट्टाचार्य ने कहा, नीलाम्बर चक्रवर्ती तो मेरे पिता महेश्वर विशारद के सहपाठी थे। मैं उन्हें इसी रूप में जानता था।

‘मिश्र पुरन्दर' ताँर मान्य, हेन जानि । पितार सम्बन्धे दोंहाके पूज्य करि' मानि ॥

५४॥

मेरे पिता जगन्नाथ मिश्र पुरन्दर का आदर करते थे। इस तरह मेरे पिता के साथ सम्बन्ध होने के कारण मैं जगन्नाथ मिश्र तथा नीलाम्बर चक्रवर्ती दोनों का आदर करता हूँ।

नदीया-सम्बन्धे सार्वभौम रूष्ट हैला ।प्रीत हा गोसाञिरे कहिते लागिला ॥

५५॥

यह सुनकर कि श्री चैतन्य महाप्रभु नदीया जिले के हैं, सार्वभौम भट्टाचार्य अत्यन्त प्रसन्न हुए और महाप्रभु से वे इस प्रकार बोले।।

सहजेइ पूज्य तुमि, आरे त' सन्यास । अतएव हङतोमार आमि निज-दास' ॥

५६॥

। आप स्वाभाविक रूप से मेरे पूज्य हैं। इसके अतिरिक्त आप संन्यासी हैं, अतएव मैं आपका निजी दास बनना चाहता हूँ।

शुनि' महाप्रभु कैल श्री-विष्णु स्मरण । भट्टाचार्ये कहे किछु विनय वचन ॥

५७॥

भट्टाचार्य से यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुरन्त भगवान् विष्णु का स्मरण किया और अत्यन्त विनीत भाव से उनसे इस प्रकार बोले।

तुमि जगद्गुरु–सर्वलोक-हित-कर्ता ।। वेदान्त पड़ाओ, सन्यासीर उपकर्ता ॥

५८॥

चूँकि आप वेदान्त दर्शन के अध्यापक हैं, अतएव आप विश्व के समस्त लोगों के गुरु तथा उनके शुभचिन्तक भी हैं। आप सभी संन्यासियों का हित भी करने वाले हैं।

आमि बालक-सन्यासी–भाल-मन्द नाहि जानि । तोमार आश्रय निहुँ, गुरु करि' मानि ॥

५९॥

मैं तो अभी तरुण संन्यासी हूँ और मुझे अच्छे-बुरे का कोई ज्ञान नहीं है। अतएव मैं आपकी शरण ग्रहण करता हूँ और आपको अपना गुरु मानता हूँ।

तोमार सङ्ग लागि' मोर इहाँ आगमन ।।सर्व प्रकारे करिबे आमाय पालन ॥

६० ॥

मैं यहाँ आपका संग करने आया हूँ और अब मैं आपकी शरण ग्रहण कर रहा हूँ। क्या आप कृपया सभी प्रकार से मेरा पालन करेंगे? आजि ये हैल आमार बड़-इ विपत्ति ।।ताहा हैते कैले तुमि आमार अव्याहति ॥

६१॥

आज जो घटना घटी है, वह मेरे लिए महान् विपत्ति थी; किन्तु आपने मुझे उससे उबार लिया है।

भट्टाचार्य कहे,—एकले तुमि ना ग्राइह दर्शने । आमार सङ्गे ग्राबे, किम्वा आमार लोक-सने ॥

६२ ॥

भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, आप जगन्नाथ मन्दिर में विग्रह-दर्शन करने अकेले न जाएँ। अच्छा होगा कि आप या तो मेरे साथ या मेरे लोगों के साथ जाएँ।

प्रभु कहे,–'मन्दिर भितरे ना ग्राइब ।गरुड़ेर पाशे रहि' दर्शन करिब' ॥

६३॥

महाप्रभु ने कहा, मैं अब कभी भी मन्दिर के भीतर नहीं जाऊँगा। मैं सदैव गरुड़-स्तम्भ के पास से भगवान् का दर्शन किया करूंगा।

गोपीनाथाचाय़के कहे सार्वभौम ।‘तुमि गोसाजिरे ला कराईह दरशन ॥

६४॥

तब सार्वभौम भट्टाचार्य ने गोपीनाथ आचार्य से कहा, गोस्वामीजी को ले जाओ और उन्हें जगन्नाथजी का दर्शन कराओ।

आमार मातृ-स्वसा-गृह–निर्जन स्थान ।ताहाँ वासा देह, कर सर्व समाधान' ॥

६५॥

मेरी मौसी का घर अत्यन्त निर्जन स्थान में है। वहीं इनके रहने की सारी व्यवस्था कर देना।

गोपीनाथ प्रभु ला ताहाँ वासा दिल ।जल, जल-पात्रादिक सर्व समाधान कैल ॥

६६॥

गोपीनाथ आचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु को उस घर तक ले गये और उन्हें पानी, पानी के पात्र, नाँद आदि दिखला दिया। इस प्रकार उन्होंने सब प्रकार की व्यवस्था कर दी।

आर दिन गोपीनाथ प्रभु स्थाने गिया ।। शय्योत्थान दरशन कराइल लञा ॥

६७॥

अगले दिन गोपीनाथ आचार्य चैतन्य महाप्रभु को जगन्नाथ भगवान् का शय्योत्थान ( भोर के समय उठाना ) दिखाने ले गये।

मुकुन्द-दत्त लजा आइला सार्वभौम स्थाने । सार्वभौम किछु ताँरे बलिला वचने ॥

६८॥

इसके बाद गोपीनाथ आचार्य मुकुन्द दत्त को अपने साथ लेकर सार्वभौम भट्टाचार्य के घर गये। वहाँ पहुँचने पर सार्वभौम ने मुकुन्द दत्त से इस प्रकार कहा।

‘प्रकृति-विनीत, सन्यासी देखिते सुन्दर । आमार बहु-प्रीति बाड़े इँहार उपर ॥

६९॥

यह संन्यासी अत्यन्त नम्र एवं विनीत स्वभाव का है और देखने में अत्यन्त सुन्दर है। फलतः इसके प्रति मेरा स्नेह बढ़ता जा रहा है।

कोन्सम्प्रदाये सन्यास कर्याछेन ग्रहण ।। किबा नाम इँहार, शुनिते हय मन' ॥

७० ॥

इन्होंने किस सम्प्रदाय से संन्यास ग्रहण किया है और इनका नाम क्या है? गोपीनाथ कहे,- नाम श्रीकृष्ण-चैतन्य ।।गुरु इँहार केशव-भारती महा-धन्य ॥

७१॥

गोपीनाथ आचार्य ने उत्तर दिया, महाप्रभु का नाम श्रीकृष्ण चैतन्य है और उन्हें संन्यास देने वाले गुरु महाभाग्यवान केशव भारती हैं।

सार्वभौम कहे,–'इँहार नाम सर्वोत्तम । भारती-सम्प्रदाय इँहो–हयेन मध्यम' ॥

७२॥

सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, श्रीकृष्ण नाम अत्युत्तम है, किन्तु ये भारती सम्प्रदाय के हैं, अतएव ये द्वितीय श्रेणी के संन्यासी हैं।

गोपीनाथ कहे,—इँहार नाहि बाह्यापेक्षा ।। अतएव बड़ सम्प्रदायेर नाहिक अपेक्षा ॥

७३॥

। गोपीनाथ आचार्य ने उत्तर दिया, श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु किसी बाहरी औपचारिकता पर निर्भर नहीं हैं। उन्हें किसी श्रेष्ठ सम्प्रदाय से संन्यास ग्रहण करने की आवश्यकता नहीं है।

भट्टाचार्य कहे,—इँहार प्रौढ़ ग्रौवन ।।केमते सन्यास-धर्म हइबे रक्षण ॥

७४॥

। भट्टाचार्य ने पूछा, श्री चैतन्य महाप्रभु तो अपनी पूर्ण यौवनावस्था में हैं। वे संन्यास के नियमों का किस तरह पालन कर पायेंगे? निरन्तर इँहाके वेदान्त शुनाइब ।वैराग्य-अद्वैत-मार्गे प्रवेश कराइब ॥

७५ ॥

मैं इन्हें निरन्तर वेदान्त दर्शन सुनाऊँगा, जिससे वे अपने वैराग्य में स्थिर रहें और इस तरह अद्वैत मार्ग में प्रवेश कर सकें।

कहेन यदि, पुनरपि स्रोग-पट्ट दिया ।संस्कार करिये उत्तम-सम्प्रदाये आनिया' ।। ७६ ॥

तब सार्वभौम भट्टाचार्य ने सुझाया, यदि श्री चैतन्य महाप्रभु चाहें,तो मैं उन्हें गेरुआ वस्त्र प्रदान करके एवं उनका पुनः संस्कार कराकर उच्च कोटि के सम्प्रदाय में ले आऊँगा।

शुनि' गोपीनाथ-मुकुन्द मुँहे दुःखी हैला ।गोपीनाथाचार्य किछु कहिते लागिला ॥

७७॥

गोपीनाथ आचार्य तथा मुकुन्द दत्त यह सुनकर बहुत दुःखी हुए। अतः गोपीनाथ आचार्य ने सार्वभौम भट्टाचार्य को इस प्रकार सम्बोधित । किया।

भट्टाचार्य' तुमि इँहार ना जान महिमा ।भगवत्ता-लक्षणेर इँहातेइ सीमा ॥

७८॥

हे भट्टाचार्य, आप श्री चैतन्य महाप्रभु की महिमा को नहीं जानते। इनमें भगवत्ता के समस्त लक्षण अपनी चरम सीमा को प्राप्त हैं।

ताहाते विख्यात इँहो परम-ईश्वर । अज्ञ-स्थाने किछु नहे विज्ञेर गोचर' ॥

७९॥

गोपीनाथ आचार्य ने आगे कहा, श्री चैतन्य महाप्रभु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में विख्यात हैं। इस विषय से अनजान व्यक्ति तत्त्ववेताओं के निर्णय को अत्यन्त कठिनाई से समझ पाते हैं।

शिष्य-गण कहे,–'ईश्वर कह कोन्प्रमाणे' ।। आचार्य कहे,--'विज्ञ-मत ईश्वर-लक्षणे' ।। ८० ॥

सार्वभौम भट्टाचार्य के शिष्यों ने प्रतिकार करते हुए पूछा, आप किस साक्ष्य के आधार पर यह निर्णय कर रहे हैं कि श्री चैतन्य महाप्रभु परमेश्वर हैं? गोपीनाथ आचार्य ने उत्तर दिया, इसका प्रमाण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को जानने वाले प्रामाणिक आचार्यों के कथन हैं।

शिष्य कहे,–'ईश्वर-तत्त्व साधि अनुमाने' । आचार्य कहे,–'अनुमाने नहे ईश्वर-ज्ञाने ॥

८१ ॥

भट्टाचार्य के शिष्यों ने कहा, हम तार्किक अनुमान के द्वारा परम सत्य का ज्ञान प्राप्त करते हैं। गोपीनाथ आचार्य ने उत्तर दिया, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के विषय में वास्तविक ज्ञान इस प्रकार के अनुमान तथा तर्क से प्राप्त नहीं किया जा सकता।

अनुमान प्रमाण नहे ईश्वर-तत्त्व-ज्ञाने ।।कृपा विना ईश्वरेरे केह नाहि जाने ॥

८२॥

गोपीनाथ आचार्य ने आगे कहा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को केवल उनकी कृपा द्वारा ही जाने जा सकते हैं, अनुमान द्वारा नहीं।

ईश्वरेर कृपा-लेश हय त' ग्राहारे ।सेइ त' ईश्वर-तत्त्व जानिबारे पारे ॥

८३॥

आचार्य ने आगे कहा, यदि किसी को भक्ति द्वारा भगवान् की लेशमात्र भी कृपा प्राप्त होती है, तो वह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को तत्त्व से समझ सकता है।

अथापि ते देव पदाम्बुज-द्वयप्रसाद-लेशानुगृहीत एव हि । जानाति तत्त्वं भगवन्महिम्नोन चान्य एकोऽपि चिरं विचिन्वन् ॥

८४॥

हे प्रभु, यदि आप के चरणकमलों की रंचमात्र भी कृपा किसी पर हो जाये, तो वह आपकी महानता को समझ सकता है। किन्तु जो लोग पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को समझने के लिए तर्कवितर्क करते हैं, वे अनेक वर्षों तक वेदों का अध्ययन करते रहने पर भी आपको जानने में अक्षम रहते हैं।

यद्यपि जगद्गुरु तुमि-शास्त्र-ज्ञानवान् । पृथिवीते नाहि पण्डित तोमार समान ॥

८५॥

ईश्वरेर कृपा-लेश नाहिक तोमाते ।।अतएव ईश्वर-तत्त्व ना पार जानिते ॥

८६॥

तब गोपीनाथ आचार्य ने सार्वभौम भट्टाचार्य को सम्बोधित किया, आप महान् पंडित हैं और अनेक शिष्यों के गुरु हैं। निस्सन्देह, आपके समान इस पृथ्वी पर अन्य कोई विद्वान नहीं है। फिर भी आप भगवान् की रंचमात्र कृपा से भी वंचित हैं, अतएव आप उन्हें अपने घर में पाकर भी नहीं समझ सकते।

तोमार नाहिक दोष, शास्त्रे एइ कहे ।।पाण्डित्याद्ये ईश्वर-तत्त्व-ज्ञान कभु नहे' ॥

८७॥

यह आपका दोष नहीं है; यह तो शास्त्रों का निर्णय है। आप केवल पाण्डित्य से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को नहीं समझ सकते।

सार्वभौम कहे,—आचार्य, कह सावधाने ।तोमाते ईश्वर-कृपा इथे कि प्रमाणे ॥

८८॥

। सार्वभौम भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, हे गोपीनाथ आचार्य, कृपया आप सावधानी से कहें। आपके पास इसका क्या प्रमाण है कि आपको भगवत्कृपा प्राप्त हो चुकी है? आचार्य कहे,–वस्तु-विषये हय वस्तु-ज्ञान ।। वस्तु-तत्त्व-ज्ञान हय कृपाते प्रमाण ॥

८९॥

गोपीनाथ आचार्य ने उत्तर दिया, सर्वाधिक कल्याणकारी परम सत्य का ज्ञान ही परमेश्वर की कृपा का प्रमाण है।

इँहार शरीरे सब ईश्वर-लक्षण ।।महा-प्रेमावेश तुमि पाळाछ दर्शन ॥

९०॥

। गोपीनाथ आचार्य ने आगे कहा, जब श्री चैतन्य महाप्रभु भावाविष्ट थे, तो उनके शरीर में आपने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के लक्षण देखे हैं।

तबु त' ईश्वर-ज्ञान ना हय तोमार।ईश्वरेर माया एइ–बलि व्यवहार ॥

९१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के लक्षणों को प्रत्यक्ष देखने के बाद भी आप उन्हें नहीं समझ सके। इसे ही सामान्यतया माया ( भ्रम) कहा जाता है।

देखिले ना देखे तारे बहिर्मुख जन ।। शुनि' हासि' सार्वभौम बलिल वचन ॥

९२॥

। बहिरंगा शक्ति से प्रभावित व्यक्ति बहिर्मुखजन अर्थात् संसारी व्यक्ति कहलाता है, क्योंकि देखने के बाद भी वह वास्तविक वस्तु को नहीं समझ पाता। गोपीनाथ आचार्य के वचन सुनकर सार्वभौम भट्टाचार्य मुसकाये और इस प्रकार कहने लगे।

इष्ट-गोष्ठी विचार करि, ना करिह रोष ।।शास्त्र-दृष्ट्ये कहि, किछु ना लइह दोष ॥

९३॥

भट्टाचार्य ने कहा, हम तो मित्रों के बीच चर्चा कर रहे हैं और शास्त्रों में वर्णित बातों पर विचार कर रहे हैं। आप क्रुद्ध न हों। मैं तो केवल शास्त्रों के आधार पर ही बोल रहा हूँ। आप इसे अपराध न मानें।

हा-भागवत हय चैतन्य-गोसाजि ।एइ कलि-काले विष्णुर अवतार नाइ ॥

९४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु अवश्य ही महान् एवं असाधारण भक्त हैं, किन्तु हम उन्हें भगवान् विष्णु के अवतार के रूप में स्वीकार नहीं कर सकते, क्योंकि शास्त्रों के अनुसार इस कलियुग में कोई अवतार नहीं होने वाला है।

अतएव 'त्रि-युग' करि' कहि विष्णु-नाम ।कलि-मुगे अवतार नाहि, शास्त्र-ज्ञान ॥

९५॥

भगवान् विष्णु का एक नाम त्रियुग है, क्योंकि कलियुग में उनका अवतार नहीं होता है। यह प्रामाणिक शास्त्रों का निर्णय है।

शुनिया आचार्य कहे दुःखी हा मने ।शास्त्र-ज्ञ करिजा तुमि कर अभिमाने ॥

९६॥

यह सुनकर गोपीनाथ आचार्य अत्यन्त दुःखी हुए। उन्होंने भट्टाचार्य से कहा, “आप स्वयं को समस्त वैदिक शास्त्रों का ज्ञाता (शास्त्रज्ञ ) मानते हैं।

भागवत-भारत दुइ शास्त्रेर प्रधान ।सेइ दुइ-ग्रन्थ-वाक्ये नाहि अवधान ॥

९७ ॥

श्रीमद्भागवत तथा महाभारत दो सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण वैदिक शास्त्र हैं, किन्तु आपने इनके कथनों पर कोई ध्यान नहीं दिया।

सेइ दुइ कहे कलिते साक्षातवतार ।तुमि कह,—कलिते नाहि विष्णुर प्रचार ॥

९८॥

। श्रीमद्भागवत तथा महाभारत में कहा गया है कि स्वयं भगवान् अवतरित होते हैं, किन्तु आप कह रहे हैं कि इस युग में भगवान् विष्णु का प्राकट्य या अवतार ही नहीं होता।

कलि-मुंगे लीलावतार ना करे भगवान् ।।अतएव 'त्रि-युग' करि' कहि तार नाम ॥

९९॥

इस कलियुग में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का कोई लीलावतार नहीं होता, इसीलिए वे त्रियुग कहलाते हैं और यह उनके पवित्र नामों में से एक है।

प्रतियुगे करेन कृष्ण युग-अवतार ।तर्क-निष्ठ हृदय तोमार नाहिक विचार ॥

१०० ॥

गोपीनाथ आचार्य ने आगे कहा, निश्चित रूप से प्रत्येक युग में एक अवतार होता है, जो युग-अवतार कहलाता है। किन्तु आपका हृदय तर्क के कारण इतना कठोर हो चुका है कि आप इन तथ्यों पर विचार नहीं कर सकते।

आसन्वर्णास्त्रयो ह्यस्य गृहृतोऽनु-युगं तनूः ।। शुक्लो रक्तस्तथा पीत इदानीं कृष्णतां गतः ॥

१०१।। भूतकाल में युग के अनुसार आपके पुत्र के तीन विभिन्न रंगों वाले शरीर थे। ये रंग थे श्वेत, लाल तथा पीत। इस ( द्वापर) युग में उन्होंने कृष्ण (श्याम) शरीर धारण किया है।'

इति द्वापर उर्वीश स्तुवन्ति जगदीश्वरम् ।।नाना-तन्त्र-विधानेन कलावपि तथा शृणु ॥

१०२॥

कलियुग में तथा द्वापर युग में भी लोग विभिन्न मन्त्रों से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की स्तुति करते हैं और पूरक वैदिक ग्रंथों के नियमों का पालन करते हैं। अब आप कृपया मुझसे इसके विषय में सुनें।

कृष्णवर्णं त्विषाकृष्णं साङ्गोपाङ्गास्त्र-पार्षदम् ।।ग्रज्ञैः सङ्कीर्तन-प्रायैर्यजन्ति हि सुमेधसः ॥

१०३॥

इस कलियुग में बुद्धिमान लोग हरे कृष्ण महामन्त्र का सामूहिक कीर्तन करते हैं और उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा करते हैं, जो इस युग में सदैव कृष्ण की महिमा का वर्णन करने के लिए प्रकट होते हैं। ये अवतार पीत वर्ण के होते हैं और सदैव अपने पूर्ण विस्तारों (यथा नित्यानन्द प्रभु) तथा स्वांशों (यथा गदाधर) के अतिरिक्त भक्तों तथा पार्षदों ( यथा स्वरूप दामोदर) को साथ रखते हैं।

सुवर्ण-वर्णो हेमाङ्गो वराङ्गश्चन्दनाङ्गदी । सन्यास-कृच्छमः शान्तो निष्ठा-शान्ति-परायणः ॥

१०४॥

(गौरसुन्दर अवतार में) भगवान् का रंग सुनहरा है। उनका अत्यन्त सुगठित शरीर पिघले सोने जैसा है। उनके सारे शरीर पर चन्दन का लेप है। वे चतुर्थ आश्रम ( संन्यास) ग्रहण करेंगे और अत्यन्त आत्म-संयमी होंगे। वे मायावादी संन्यासियों से इस कारण भिन्न होंगे कि वे भक्ति में स्थिर होंगे और संकीर्तन आन्दोलन का विस्तार करेंगे।

तोमार आगे एत कथार नाहि प्रयोजन ।।ऊषर-भूमिते ग्रेन बीजेर रोपण ॥

१०५॥

तब गोपीनाथ आचार्य ने कहा, शास्त्रों से और अधिक प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि आप शुष्क चिन्तक हैं। बंजर भूमि में बीज डालने से कोई लाभ नहीं होता।

तोमार उपरे ताँर कृपा ग्रबे हबे ।ए-सब सिद्धान्त तबे तुमिह कहिबे ॥

१०६॥

जब आप पर भगवान् प्रसन्न होंगे, तब आप भी इन सारे सिद्धान्तों को समझ सकेंगे और फिर शास्त्रों से उद्धरण देंगे।

तोमार ग्रे शिष्य कहे कुतर्क, नाना-वाद ।।इहार कि दोष—एइ मायारे प्रसाद ॥

१०७॥

। आपके शिष्यों के झूठे तर्क तथा दार्शनिक शब्दाडम्बर उनके दोष नहीं हैं। उन्हें केवल मायावाद दर्शन का प्रसाद प्राप्त हुआ है।

मृच्छक्तयो वदतां वादिनां वैविवाद-संवाद-भुवो भवन्ति । कुर्वन्ति चैषां मुहुरात्म-मोहं । तस्मै नमोऽनन्त-गुणाय भूम्ने ॥

१०८॥

मैं उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को सादर नमस्कार करता हूँ, जो असीम गुणों से सम्पन्न हैं और जिनकी विभिन्न शक्तियाँ वाद-विवाद करने वालों के बीच सहमति तथा विरोध लाने वाली हैं। इस तरह वाद-विवाद करने वाले दोनों पक्षों के आत्म-साक्षात्कार को माया पुनः पुनः आवृत करती रहती है।

युक्तं च सन्ति सर्वत्र भाषन्ते ब्राह्मणा ग्रथा ।मायां मदीयामुद्गृह्य वदतां किं नु दुर्घटम् ॥

१०९॥

। प्रायः सभी क्षेत्रों में विद्वान ब्राह्मण के वचन मान्य होते हैं। जो मेरी बहिरंगा माया की शरण में आता है और उसके वशीभूत होकर बोलता है, उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।

तबे भट्टाचार्य कहे, ग्राह गोसाजिर स्थाने ।। आमार नामे गण-सहित कर निमन्त्रणे ॥

११०॥

गोपीनाथ आचार्य से यह सुनकर सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, पहले आप उस स्थान को जाएँ, जहाँ श्री चैतन्य महाप्रभु ठहरे हैं और उन्हें उनके साथियों समेत मेरी ओर से आमंत्रित करके यहाँ बुलाएँ।

प्रसाद आनि' ताँरै कराह आगे भिक्षा ।।पश्चात् आसि' आमारे कराइह शिक्षा ॥

१११॥

जगन्नाथजी को प्रसाद लीजिये और सर्वप्रथम इसे चैतन्य महाप्रभु तथा उनके साथियों को दीजिये। उसके बाद यहाँ लौटकर आइए और तब मुझे भलीभाँति शिक्षा दीजिये।

आचार्य-भगिनी-पति, श्यालक-भट्टाचार्य ।।निन्दा-स्तुति-हास्ये शिक्षा करा'न आचार्ट्स ॥

११२ ।। गोपीनाथ आचार्य सार्वभौम भट्टाचार्य के बहनोई थे; अतएव उनका सम्बन्ध अत्यन्त मधुर तथा घनिष्ठ था। ऐसी स्थिति में, गोपीनाथ आचार्यने उन्हें कभी उनकी निन्दा करके, कुछ उनकी प्रशंसा करके और कुछ परिहास करके सिखलाया। कुछ समय से ऐसा ही चल रहा था।

आचार्येर सिद्धान्ते मुकुन्देर हैल सन्तोष । भट्टाचार्येर वाक्य मने हैल दुःख-रोष ॥

११३॥

श्री मुकुन्द दत्त गोपीनाथ आचार्य के निष्कर्षात्मक वचनों को सुनकर अत्यन्त सन्तुष्ट हुए; किन्तु सार्वभौम भट्टाचार्य के कथनों को सुनकर वे अत्यन्त दुःखी तथा रुष्ट हुए।

गोसाजिर स्थाने आचार्य कैल आगमन । भट्टाचार नामे ताँरै कैल निमन्त्रण ॥

११४॥

सार्वभौम भट्टाचार्य के आदेशानुसार गोपीनाथ आचार्य श्री चैतन्य महाप्रभु के पास गये और उन्हें भट्टाचार्य की ओर से आमन्त्रित किया।

मुकुन्द-सहित कहे भट्टाचार कथा । भट्टाचार निन्दा करे, मने पाळा व्यथा ॥

११५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के सामने भट्टाचार्य के कथनों की चर्चा की गई। गोपीनाथ आचार्य तथा मुकुन्द दत्त दोनों ने ही भट्टाचार्य के कथनों को अस्वीकार कर दिया, क्योंकि उनसे उनको मानसिक दुःख पहुँचता था।

शुनि महाप्रभु कहे ऐछे मत् कह। आमा प्रति भट्टाचार्मेर हय अनुग्रह ॥

११६॥

यह सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, आप इस तरह न बोलें। सार्वभौम भट्टाचार्य मेरे प्रति अत्यन्त वत्सल एवं कृपालु हैं।

आमार सन्यास-धर्म चाहेन राखिते । वात्सल्ये करुणा करेन, कि दोष इहाते ॥

११७॥

वे मेरे प्रति वात्सल्य के कारण मेरी रक्षा करना चाहते हैं और यह चाहते हैं कि मैं संन्यासी के नियमों का पालन करूं। इसमें कौन-सा दोष हैं।

आर दिन महाप्रभु भट्टाचार्य-सने । आनन्दे करिला जगन्नाथ दरशने ॥

११८॥

अगले दिन प्रात:काल श्री चैतन्य महाप्रभु सार्वभौम भट्टाचार्य के साथ जगन्नाथजी के मन्दिर दर्शन करने गये। दोनों ही अत्यन्त प्रसन्न मुद्रा में थे।

भट्टाचार्य-सङ्गे ताँर मन्दिरे आइला ।।इन दिया आपने वसिला ॥

११९॥

जब वे मन्दिर में पहुँचे, तो सार्वभौम भट्टाचार्य ने चैतन्य महाप्रभु को आसन दिया और संन्यासी के आदरार्थ स्वयं भूमि पर बैठ गये।

वेदान्त पड़ाइते तबे आरम्भ करिला । स्नेह-भक्ति करि' किछु प्रभुरे कहिला ॥

१२०॥

तब उन्होंने चैतन्य महाप्रभु को वेदान्त-दर्शन पढ़ाना शुरू किया और स्नेह तथा भक्ति के कारण महाप्रभु से वे इस प्रकार बोले।

वेदान्त-श्रवण,—एइ सन्यासीर धर्म ।। निरन्तर कर तुमि वेदान्त श्रवण ॥

१२१॥

भट्टाचार्य ने कहा, वेदान्त दर्शन सुनना ही संन्यासी का मुख्य कर्तव्य है। अतएव आपको चाहिए कि बिना हिचक के वेदान्त-दर्शन का अध्ययन करें और किसी श्रेष्ठ व्यक्ति से इसका निरन्तर श्रवण करें।

प्रभु कहे,–'मोरे तुमि कर अनुग्रह।सेइ से कर्तव्य, तुमि ग्रेइ मोरे कह' ॥

१२२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, आप मुझ पर अत्यन्त कृपालु हैं। अतएव आपके आदेश का पालन करना मेरा कर्तव्य है।

सात दिन पर्यन्त ऐछे करेन श्रवणे ।।भाल-मन्द नाहि कहे, वसि' मात्र शुने ॥

१२३॥

इस तरह महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य द्वारा प्रतिपादित वेदान्त-दर्शन का सात दिनों तक लगातार श्रवण किया। किन्तु चैतन्य महाप्रभु न तो कुछ बोले, न ही इसका संकेत दिया कि यह सही है या गलत। वे केवल बैठे बैठे भट्टाचार्य की बातें सुनते रहे।

अष्टम-दिवसे ताँरै पुछे सार्वभौम । सात दिन कर तुमि वेदान्त श्रवण ॥

१२४॥

आठवें दिन सार्वभौम भट्टाचार्य ने चैतन्य महाप्रभु से कहा, आप लगातार सात दिनों से मुझसे वेदान्त दर्शन सुन रहे हैं।

भाल-मन्द नाहि कह, रह मौन धरि' ।।बुझ, कि ना बुझ, इहा बुझिते ना पारि ।। १२५ ॥

आप मौन धारण किये हुए सुनते रहे हैं। चूंकि आप यह नहीं कह रहे हैं कि यह सही है या गलत, अतएव मैं यह नहीं समझ पा रहा कि आप वेदान्त-दर्शन को वास्तव में समझ पा रहे हैं या नहीं।

प्रभु कहे–मूर्ख आमि, नाहि अध्ययन ।तोमार आज्ञाते मात्र करिये श्रवण ॥

१२६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर में कहा, मैं मूर्ख हूँ, फलतः मैं वेदान्तसूत्र का अध्ययन नहीं करता। आपने आदेश दिया है, अतएव मैं आपसे इसे सुनने का प्रयत्न कर रहा हूँ।

सन्यासीर धर्म लागि' श्रवण मात्र करि ।तुमि ग्रेइ अर्थ कर, बुझिते ना पारि ॥

१२७॥

मैं तो संन्यासी धर्म के पालन के लिए ही सुनता हूँ। दुर्भाग्यवश आप जो अर्थ कह रहे हैं, उसका मैं लेशमात्र भी अर्थ नहीं समझ पा रहा हूँ।

भट्टाचार्य कहे,—ना बुझि', हेन ज्ञान ग्रार ।बुझिबार लागि' सेह पुछे पुनर्बार ॥

१२८॥

सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, मैं मानता हूँ कि आप नहीं समझ रहे, किन्तु जिसकी समझ में नहीं आता, वह भी तो विषय-वस्तु के विषय में जिज्ञासा करता है।

तुमि शुनि' शुनि' रह मौन मात्र धरि'। हृदये कि आछे तोमार, बुझिते ना पारि ॥

१२९॥

आप लगातार सुनते जा रहे हैं, किन्तु मौन धारण किये हुए हैं। मेरी समझ में नहीं आ रहा कि वास्तव में आपके मन में है क्या? प्रभु कहे,–सूत्रेर अर्थ बुझिये निर्मल ।। तोमार व्याख्या शुनि' मन हय त' विकल ॥

१३०॥

तब महाप्रभु ने यह कहते हुए अपने मन की बात प्रकट की, मैं प्रत्येक सूत्र का अर्थ बहुत अच्छी तरह समझ सकता हूँ, किन्तु आपकी व्याख्या ने मेरे मन को विचलित कर दिया है।

सूत्रेर अर्थ भाष्य कहे प्रकाशिया ।।तुमि, भाष्य कह—सूत्रेर अर्थ आच्छादिया ॥

१३१॥

वेदान्त-सूत्र के श्लोकों का स्पष्ट तात्पर्य उन्हीं में निहित है, किन्तु आपने जितने अन्य तात्पर्य प्रस्तुत किये हैं, उन्होंने सूत्र के अर्थ को बादल की तरह ढक लिया है।

सूत्रेर मुख्य अर्थ ना करह व्याख्यान ।कल्पनार्थे तुमि ताहा कर आच्छादन ॥

१३२॥

आप ब्रह्मसूत्र का मुख्य अर्थ नहीं बतला रहे। ऐसा लगता है कि आपका कार्य वास्तविक अर्थ को छिपाना है।

उपनिषशब्दे येइ मुख्य अर्थ हय ।सेइ अर्थ मुख्य, व्यास-सूत्रे सब कय ॥

१३३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, वेदान्त-सूत्र समस्त उपनिषदों का सार है; इसलिए उपनिषदों में जो भी मुख्य अर्थ है, वह सब वेदान्त-सूत्र या व्यास-सूत्र में भी अंकित है।

मुख्यार्थ छाड़िया कर गौणार्थ कल्पना ।।‘अभिधा'-वृत्ति छाड़ि' कर शब्देर लक्षणा ॥

१३४॥

प्रत्येक सूत्र के मुख्य (प्रधान) अर्थ को बिना किसी अनुमान के स्वीकार कर लेना चाहिए। किन्तु आप तो मुख्य अर्थ को त्यागकर अपने मनोकल्पित अर्थ को लेकर आगे बढ़ते हैं।

प्रमाणेर मध्ये श्रुति प्रमाण–प्रधान । श्रुति ने मुख्यार्थ कहे, सेइ से प्रमाण ॥

१३५॥

यद्यपि अन्य प्रमाण भी हैं, किन्तु वैदिक प्रमाण को सर्वोपरि मानना चाहिए। वेदों में वर्णित सिद्धान्तों का मुख्य अर्थ सर्वोत्तम प्रमाण है।

जीवेर अस्थि-विष्ठा दुइ–शङ्ख-गोमय । श्रुति-वाक्ये सेइ दुइ महा-पवित्र हय ॥

१३६ ॥

चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, शंख तथा गोबर किन्हीं जीवों की अस्थियाँ और विष्ठा मात्र हैं, किन्तु श्रुतिवाक्य है कि ये दोनों अत्यन्त पवित्र हैं।

स्वतः-प्रमाण वेद सत्य येइ कय ।। लक्षणा' करिले स्वतः-प्रामाण्य-हानि हय ॥

१३७॥

वैदिक कथन स्वतः प्रमाण होते हैं। वेदों में वर्णित प्रत्येक कथन को स्वीकार करना चाहिए। यदि हम अपनी खुद की मनोकल्पना से उसकी व्याख्या करते हैं, तो वैदिक प्रमाण की सत्ता तुरन्त नष्ट हो जाती हैं।

व्यास-सूत्रेर अर्थ—प्रैछे सूर्येर किरण । स्व-कल्पित भाष्य-मेघे करे आच्छादन ।। १३८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, श्रील व्यासदेव द्वारा रचित ब्रह्मसूत्र सूर्य के समान तेजस्वी है। इसके अर्थ का अनुमान लगाने की चेष्टा सूर्य के इस प्रकाश को केवल बादल से आच्छादित करने के समान है।

वेद-पुराणे कहे ब्रह्म-निरूपण ।।सेइ ब्रह्म-—बृहद्वस्तु, ईश्वर-लक्षण ॥

१३९॥

सारे वेदों तथा वैदिक सिद्धान्तों को अनुगमन करने वाले अन्य साहित्य का निश्चित मत है कि परब्रह्म ही परम सत्य है, सबसे महान है और भगवान् का एक पहलू है।

सर्वैश्वर्य-परिपूर्ण स्वयं भगवान् ।ताँरै निराकार करि' करह व्याख्यान ॥

१४०॥

वास्तव में परम सत्य एक पुरुष है, पूर्ण पुरुष भगवान् है और सभी ऐश्वर्यों से पूर्णतया युक्त है। आप उनकी व्याख्या निराकार तथा निर्विशेष के रूप में कर रहे हैं।

‘निर्विशेष' ताँरे कहे येइ श्रुति-गण ।‘प्राकृत' निषेधि करे 'अप्राकृत' स्थापन ॥

१४१॥

वेदों में जहाँ कहीं भी निराकार का वर्णन हुआ है, वहाँ वेदों का उद्देश्य यह स्थापित करना है कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से सम्बन्धित हर वस्तु दिव्य है और भौतिक गुणों से सर्वथा स्वतन्त्र है।

ग्रा य़ा श्रुतिर्जल्पति निर्विशेषसा साभिधत्ते स-विशेषमेव । विचार-योगे सति हन्त तासांप्रायो बलीयः स-विशेषमेव ।। १४२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, परम सत्य को निराकार वर्णित करने वाले मंत्र अन्त में यही सिद्ध करते हैं कि परम सत्य एक पुरुष है। भगवान् निराकार तथा साकार इन दो रूपों में समझे जाते हैं। यदि कोई व्यक्ति पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को इन दोनों रूपों में मानता है, तो वह सचमुच परम सत्य को समझ सकता है। वह जानता है कि साकार ज्ञान सशक्त है, क्योंकि हम देखते हैं कि हर वस्तु विविधता से पूर्ण है। कोई व्यक्ति ऐसी वस्तु नहीं देख सकता जो विविधता से पूर्ण न हो।'

ब्रह्म हैते जन्मे विश्व, ब्रह्मते जीवय ।। सेई ब्रह्मे पुनरपि हये ग्राय लय ॥

१४३ ॥

इस विराट जगत् की प्रत्येक वस्तु परम सत्य से उत्पन्न होती है, उसी में रहती है और प्रलय के बाद पुनः परम सत्य में प्रवेश करती है।

‘अपादान,' ‘करण, ''अधिकरण'-कारक तिन । भगवानेर सविशेषे एइ तिन चिह्न ॥

१४४॥

। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साकार स्वरूप की तीन श्रेणियाँ हैंअपादान, करण तथा अधिकरण।

भगवान् बहु हैते ग्रबे कैल मन ।। प्राकृत-शक्तिते तबे कैल विलोकन ॥

१४५॥

से काले नाहि जन्मे 'प्राकृत' मनो-नयन । अतएव 'अप्राकृत' ब्रह्मेर नेत्र-मन ॥

१४६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, जब पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने अनेक होने की इच्छा की, तब उन्होंने भौतिक प्रकृति पर दृष्टिपात किया। सृष्टि के पूर्व भौतिक नेत्रों या मन का आस्तित्व नहीं था, अतएव परम सत्य के मन तथा नेत्रों की दिव्य प्रकृति की पुष्टि होती है।

ब्रह्म-शब्दे कहे पूर्ण स्वयं भगवान् ।स्वयं भगवान्कृष्ण, शास्त्रेर प्रमाण ॥

१४७ । ब्रह्म' शब्द पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को सूचित करता है, जो स्वयं श्रीकृष्ण हैं। यही समस्त वैदिक साहित्य का निर्णय है।

वेदेर निगूढ़ अर्थ बुझन ना हय । पुराण-वाक्ये सेइ अर्थ करय निश्चय ॥

१४८ ॥

। साधारण लोग आसानी से वेदों के गूढ़ अर्थ को नहीं समझ पाते, इसलिए उसकी पूर्ति पुराणों के वाक्यों द्वारा की जाती है।

अहो भाग्यमहो भाग्यं नन्द-गोप-व्रजौकसाम् ।।ग्रन्मित्रं परमानन्दं पूर्णं ब्रह्म सनातनम् ॥

१४९ ॥

नन्द महाराज, गोप तथा व्रजभूमि के सारे निवासी कितने भाग्यशाली हैं। उनके भाग्य की कोई सीमा नहीं है, क्योंकि दिव्य आनन्द के स्रोत सनातन परम ब्रह्म, परम सत्य उनके मित्र बन चुके हैं।

अपाणि-पाद'-श्रुति वर्जे 'प्राकृत' पाणि-चरण ।पुनः कहे, शीघ्र चले, करे सर्व ग्रहण ॥

१५०॥

। अपाणि-पाद-वैदिक मन्त्र भौतिक हाथों तथा पाँवों का निषेध करता है, फिर भी यह बतलाता है कि भगवान् अत्यन्त तेज चलते हैं और अर्पित की जाने वाली हर वस्तु को ग्रहण करते हैं।

अतएव श्रुति कहे, ब्रह्म-सविशेष ।।‘मुख्य' छाड़ि' ‘लक्षणा'ते माने निर्विशेष ॥

१५१॥

ये सभी मन्त्र इसकी पुष्टि करते हैं कि परम सत्य साकार है, किन्तु मायावादी मुख्य अर्थ को त्यागकर परम सत्य का निराकार या निर्विशेष के रूप में अर्थ लगाते हैं।

षडू-ऐश्वर्य-पूर्णानन्द-विग्रह याँहार ।।हेन-भगवाने तुमि कह निराकार ? ॥

१५२ ।। जिन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का दिव्य स्वरूप छह दिव्य ऐश्वर्यों से युक्त है, क्या आप उन्हें निराकार कह रहे हैं? स्वाभाविक तिन शक्ति येइ ब्रह्मे हय । ‘नि:शक्तिक' करि' ताँरे करह निश्चय? ॥

१५३॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की तीन मूल शक्तियाँ होती हैं। तो क्या आप यह सिद्ध करना चाहते हैं कि उनकी शक्तियाँ नहीं होतीं? विष्णु-शक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्र-ज्ञाख्या तथा परा ।।अविद्या-कर्म-संज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥

१५४॥

जैसाकि शास्त्रों में कहा गया है, भगवान् विष्णु की अन्तरंगी शक्ति आध्यात्मिक है। एक अन्य आध्यात्मिक शक्ति है, जो क्षेत्रज्ञ या जीव कहलाती है। तीसरी शक्ति अविद्या कहलाती है, जो जीव को ईश्वरविहीन (निरीश्वर) बनाती है और उसे सकाम कर्म से पूरित करती है।

यया क्षेत्र-ज्ञ-शक्तिः सा वेष्टिता नृप सर्व-गा। संसार-तापानखिलानवाप्नोत्यत्र सन्ततान् ॥

१५५॥

। । हे राजन्, क्षेत्रज्ञ शक्ति जीव है। यद्यपि उसे भौतिक में अथवा तो आध्यात्मिक जगत् में रहने की सुविधा प्राप्त है, किन्तु वह अविद्या शक्ति के वशीभूत होकर भौतिक जगत् के तीन प्रकार के कष्टों को भोगता है, क्योंकि यह शक्ति उसकी स्वाभाविक वैधानिक स्थिति को आच्छादित कर लेती है।

तया तिरोहितत्वाच्च शक्तिः क्षेत्र-ज्ञ-संज्ञिता ।सर्व-भूतेषु भू-पाल तारतम्येन वर्तते ॥

१५६ ॥

अविद्या के प्रभाव में आच्छादित होकर यह जीव भौतिक अवस्था में विभिन्न रूपों में विद्यमान रहता है। हे राजन्, इस तरह वह कम या अधिक मात्रा में भौतिक शक्ति के प्रभाव के अनुपात में मुक्त रहता है।'

ह्लादिनी सन्धिनी सम्वित्त्वय्येका सर्व-संश्रये ।। ह्लाद-ताप-करी मिश्रा त्वयि नो गुण-वर्जिते ॥

१५७॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् सच्चिदानन्द विग्रह हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि उनमें मूलतः तीन शक्तियाँ हैं-ह्लादिनी ( आनन्द), सन्धिनी (शाश्वतता ) तथा सम्वित् (ज्ञान-शक्ति)। ये सभी मिलकर चित् शक्ति कहलाती हैं और भगवान् में ये पूर्णरूपेण पाई जाती हैं। भगवान् के अंशरूप जीवों के लिए भौतिक जगत् में ह्लादिनी शक्ति कभी अरुचिकर होती है और कभी मिश्रित होती है। किन्तु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के साथ ऐसा नहीं है, क्योंकि वे भौतिक शक्ति या उसके गुणों से प्रभावित नहीं होते।'

सच्चिदानन्द-मय हय ईश्वर-स्वरूप । तिन अंशे चिच्छक्ति हय तिन रूप ॥

१५८॥

। अपने आदि रूप में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् शाश्वतता, ज्ञान तथा आनन्द से परिपूर्ण हैं। इन तीनों अंशों ( सत्, चित्, आनन्द) में आध्यात्मिक शक्ति तीन विभिन्न रूप ग्रहण करती है।

आनन्दांशे ‘ह्लादिनी,' सदंशे ‘सन्धिनी' ।चिदंशे 'सम्वित्', यारे ज्ञान करि मानि ॥

१५९॥

आध्यात्मिक शक्ति के तीन अंश ह्लादिनी ( आनन्द अंश), सन्धिनी (सत् अंश) तथा सम्वित् (चित् या ज्ञान अंश) कहलाते हैं। हम इन तीनों के ज्ञान को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के पूर्ण ज्ञान के रूप में स्वीकार करते हैं।

अन्तरङ्गा–चिच्छक्ति, तटस्था--जीव-शक्ति । बहिरङ्गा–माया, तिने करे प्रेम-भक्ति ॥

१६०॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की आध्यात्मिक शक्ति भी तीन अवस्थाओं में प्रकट होती है-अन्तरंगा, तटस्था तथा बहिरंगा। ये सभी उनकी प्रेमाभक्ति में लगी रहती हैं।

घडू-विध ऐश्वर्य-प्रभुर चिच्छक्ति-विलास ।।हेन शक्ति नाहि मान, परम साहस ॥

१६१॥

भगवान् अपनी आध्यात्मिक शक्ति में छह प्रकार के ऐश्वर्यों का भोग करते हैं। आप इस आध्यात्मिक शक्ति को स्वीकार नहीं करते। यह आपकी भारी धृष्टता के कारण है।

‘मायाधीश' ‘माया-वश'–ईश्वरे-जीवे भेद । हेन-जीवे ईश्वर-सह कह त' अभेद ॥

१६२॥

भगवान् शक्तियों के अधीश्वर हैं और जीव उनका दास है। भगवान् तथा जीव में यही अन्तर है। किन्तु आप यह कह रहे हैं कि भगवान् तथा जीव एक ही हैं।

गीता-शास्त्रे जीव-रूप 'शक्ति' करि' माने ।हेन जीवे 'भेद' कर ईश्वरेर सने ॥

१६३॥

भगवद्गीता में जीव को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की तटस्था शक्ति बतलाया गया है। फिर भी आप कहते हो कि जीव भगवान् से पूर्णतया भिन्न है।

भूमिरापोऽनलो वायुः खं मनो बुद्धिरेव च । अहङ्कार इतीयं मे भिन्न प्रकृतिरष्टधा ॥

१६४।। । पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि तथा मिथ्या अहंकार-ये मेरी आठ पृथक् शक्तियाँ हैं।

अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि में पराम् । जीव-भूतां महा-बाहो ग्रयेदं धार्यते जगत् ॥

१६५॥

इन भौतिक निकृष्ट शक्तियों के अतिरिक्त मेरी एक अन्य शक्ति है, जो कि आध्यात्मिक शक्ति है और हे महाबाहु, यह जीव है। सारा भौतिक जगत् जीवों के द्वारा धारण किया जाता है।

ईश्वरेर श्री-विग्रह सच्चिदानन्दाकार । से-विग्रहे कह सत्त्व-गुणेर विकार ॥

१६६॥

पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का दिव्य स्वरूप शाश्वतता, ज्ञान तथा आनन्द से परिपूर्ण है, किन्तु आप इसे भौतिक सत्त्वगुण की उपज बतला रहे हैं।

श्री-विग्रह ये ना माने, सेइ त' पाषण्डी ।। अदृश्य अस्पृश्य, सेइ हय ग्रम-दण्डी ॥

१६७॥

जो व्यक्ति भगवान् के दिव्य रूप को स्वीकार नहीं करता, वह निश्चय ही पाषण्डी है। ऐसे व्यक्ति को न तो देखना चाहिए, न ही उसका स्पर्श करना चाहिए। निस्सन्देह, वह यमराज द्वारा दण्डनीय है।

वेद ना मानिया बौद्ध हय त' नास्तिक । वेदाश्रय नास्तिक्य-वाद बौद्धके अधिक ॥

१६८॥

चूंकि बौद्धगण वेदों की सत्ता को नहीं मानते, अतएव वे नास्तिक माने जाते हैं। किन्तु जो लोग वैदिक शास्त्रों की शरण लेकर भी मायावादी दर्शन के अनुसार नास्तिकता का प्रचार करते हैं, वे बौद्धों से भी अधिक नास्तिक हैं।

जीवेर निस्तार लागि' सूत्र कैल व्यास । मायावादि-भाष्य शुनिले हय सर्वनाश ॥

१६९॥

। श्रील व्यासदेव ने बद्धजीवों के उद्धार हेतु वेदान्त-दर्शन प्रस्तुत किया, किन्तु यदि कोई व्यक्ति शंकराचार्य का भाष्य सुनता है, तो उसका सर्वनाश हो जाता है।

‘परिणाम-वाद'–व्यास-सूत्रेर सम्मत ।अचिन्त्य-शक्ति ईश्वर जगद् रूपे परिणत ॥

१७० ॥

वेदान्त-सूत्र का लक्ष्य यह स्थापित करना है कि विराट जगत् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की अचिन्त्य शक्ति के रूपान्तर से उत्पन्न हुआ है।

मणि ग्रैछे अविकृते प्रसबे हेम-भार ।जगद् रूप हय ईश्वर, तबु अविकार ॥

१७१॥

पारस-पत्थर लोहे का स्पर्श करके ढेरों सोना उत्पन्न करता है, किन्तु स्वयं अपरिवर्तित बना रहता है। इसी तरह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् अपनी अचिन्त्य शक्ति द्वारा अपने आपको विराट जगत् के रूप में प्रकट करते हैं, किन्तु उनका सनातन दिव्य स्वरूप अपरिवर्तित रहता है।

व्यास–भ्रान्त बलि' सेइ सूत्रे दोष दिया ।‘विवर्त-वाद' स्थापियाछे कल्पना करिया ॥

१७२ ॥

शंकराचार्य के सिद्धान्त के अनुसार परम सत्य रूपान्तरित होता है। इस सिद्धान्त के बल पर मायावादी दार्शनिक श्रील वेदव्यास में दोष दिखलाकर उन्हें नीचा दिखाते हैं। इस तरह वे वेदान्त-सूत्र में त्रुटि निकालते हैं और विवर्तवाद की स्थापना करने हेतु वे इस विषय में अपना अर्थ लगाते हैं।

जीवेर देहे आत्म-बुद्धि–सेइ मिथ्या हय ।।जगत् ग्रे मिथ्या नहे, नश्वर-मात्र हय ॥

१७३॥

विवर्तवाद तभी प्रभावी होता है, जब जीव अपनी पहचान शरीर के रूप में करे। किन्तु जहाँ तक विराट जगत् का सम्बन्ध है, इसे मिथ्या नहीं कहा जा सकता। हाँ, यह नश्वर अवश्य है।

'प्रणव' ये महा-वाक्य-—ईश्वरेर मूर्ति । प्रणव हैते सर्व-वेद, जगत् उत्पत्ति ॥

१७४॥

ॐकार की दिव्य ध्वनि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का शब्द-रूप है। सारा वैदिक ज्ञान तथा यह विराट जगत् भगवान् के इस शब्द-रूप से उत्पन्न हुए हैं।

‘तत्त्वमसि'-जीव-हेतु प्रादेशिक वाक्य । प्रणव ना मानि' तारे कहे महा-वाक्य ॥

१७५॥

तत्त्वमसि'(तुम वही हो) गौण ध्वनि ( प्रादेशिक वाक्य) जीव की जानकारी के लिए है, किन्तु मुख्य ध्वनि ॐकार है। शंकराचार्य ने ॐकार को महत्त्व न देकर तत्त्वमसि ध्वनि पर बल दिया है।

एइ-मते कल्पित भाष्ये शत दोष दिल ।।भट्टाचार्य पूर्व-पक्ष अपार करिल ॥

१७६ ॥

इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु ने शंकराचार्य के शारीरक भाष्य को काल्पनिक कहकर आलोचना की और उसमें सैकड़ों दोष दिखलाये, किन्तु सार्वभौम भट्टाचार्य ने शंकराचार्य का पक्ष लेते हुए अनेक तर्क प्रस्तुत किये।

वितण्डा, छल, निग्रहादि अनेक उठाइल ।सब खण्डि' प्रभु निज-मत से स्थापिले ॥

१७७॥

भट्टाचार्य ने छद्म तर्क समेत विविध प्रकार के मिथ्या तर्क प्रस्तुत किये और अपने प्रतिपक्षी को हराने के लिए अनेक प्रकार से प्रयास किये। किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने इन सारे तर्को को खण्डित किये और अपना मत स्थापित किया।

भगवान्–'सम्बन्ध', भक्ति-अभिधेय' हय । प्रेमा–‘प्रयोजन', वेदे तिन-वस्तु कय ॥

१७८ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, सभी सम्बन्धों के केन्द्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं, उनकी भक्ति करना (अभिधेय) मनुष्य का वास्तविक कर्म है और भगवत्प्रेम की प्राप्ति ही जीवन का चरम लक्ष्य (प्रयोजन ) है। वैदिक साहित्य में इन तीनों विषयों का वर्णन हुआ है।

आर ये ग्रे-किछु कहे, सकल-इ कल्पना ।। स्वतः-प्रमाण वेद-वाक्ये कल्पेन लक्षणा ॥

१७९॥

यदि कोई व्यक्ति भिन्न तरीके से वैदिक साहित्य की विवेचना करने की चेष्टा करता है, तो वह मात्र कल्पना है। स्वतः प्रमाणरूप वेद वाक्य के विषय में अनुमान लगाने को कोरी कल्पना ही समझना चाहिए।

आचार्गेर दोष नाहि, ईश्वर-आज्ञा हैल । अतएव कल्पना करि' नास्तिक-शास्त्र कैल ॥

१८०॥

वास्तव में इसमें शंकराचार्य का कोई दोष नहीं है। उन्होंने केवल पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के आदेश का पालन किया है। उन्हें किसी न किसी प्रकार के अनुमान की कल्पना करनी थी, अतएव उन्होंने ऐसा वैदिक साहित्य प्रस्तुत किया, जो पूर्णतया नास्तिक है।

स्वागमैः कल्पितैस्त्वं च जनान्मद्विमुखान्कुरु ।मां च गोपय ग्रेन स्यात्सृष्टिरेषोत्तरोत्तरा ॥

१८१॥

[ शिवजी को सम्बोधित करते हुए पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने कहा : 'आप साधारण लोगों को वेदों की अपनी कल्पित व्याख्या द्वारा मुझसे विमुख कर दीजिए। आप मुझे इस प्रकार ढक दीजिए कि लोगों में ऐसा प्रचार हो कि वे भौतिक सभ्यता में प्रगति करने में अधिक रुचि लेने लगें, ताकि आध्यात्मिक ज्ञान से रहित जनसंख्या में वृद्धि हो।'

मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमुच्यते ।मयैव विहितं देवि कलौ ब्राह्मण-मूर्तिना ॥

१८२॥

[ शिवजी ने भौतिक जगत् की अधिष्ठात्री देवी दुर्गा को बतलाया : ‘कलियुग में मैं एक ब्राह्मण का रूप धारण करके मिथ्या शास्त्रों के माध्यम से वेदों की व्याख्या नास्तिक ढंग से करूँगा, जो बौद्ध दर्शन जैसी होगी।

शुनि' भट्टाचार्य हैल परम विस्मित ।मुखे ना नि:सरे वाणी, हइला स्तम्भित ॥

१८३॥

यह सुनकर सार्वभौम भट्टाचार्य अत्यन्त आश्चर्यचकित हो गये। वे स्तम्भित रह गये और कुछ भी न बोल सके।

प्रभु कहे,—भट्टाचार्य, ना कर विस्मय । भगवाने भक्ति–परम-पुरुषार्थ हय ॥

१८४॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनसे कहा, आप विस्मित न हों। वास्तव में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की भक्ति मानव-कर्म की सर्वोच्च सिद्धि है।

‘आत्माराम' पर्यन्त करे ईश्वर भजन ।।ऐछे अचिन्त्य भगवानेर गुण-गण ॥

१८५ ॥

भगवान् के दिव्य गुण ऐसे हैं कि आत्मतुष्ट ( आत्माराम ) सन्त भी भगवान् की भक्ति करते हैं। उनके गुण अचिन्त्य आध्यात्मिक शक्ति से पूर्ण हैं।

आत्मारामाश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे ।कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूत-गुणो हरिः ॥

१८६॥

जो आत्मतुष्ट ( आत्माराम ) हैं और बाह्य भौतिक इच्छाओं से विरक्त हैं, वे भी भगवान् श्रीकृष्ण की प्रेममयी सेवा के प्रति आकृष्ट होते हैं, क्योंकि कृष्ण के गुण दिव्य हैं और उनके कार्यकलाप अद्भुत हैं। भगवान् हरि इसीलिए कृष्ण कहलाते हैं, क्योंकि वे दिव्य आकर्षक लक्षणों से युक्त हैं।

शुनि' भट्टाचार्य कहे,‘शुन, महाशय ।। एइ श्लोकेर अर्थ शुनिते वाञ्छा हय' ॥

१८७॥

आत्माराम श्लोक सुनने के बाद सार्वभौम भट्टाचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु से आग्रह किया, 'हे महोदय, कृपया इस श्लोक की व्याख्या कीजिये। मैं इस पर आपकी व्याख्या सुनने के लिए अत्यन्त उत्सुक हूँ।'" प्रभु कहे,—तुमि कि अर्थ कर, ताहा आगे शुनि' । पाछे आमि करिब अर्थ, ग्रेबा किछु जानि' ॥

१८८॥

महाप्रभु ने उत्तर दिया, पहले मुझे अपनी व्याख्या सुनायें। तब मैं जो थोड़ा-बहुत जानता हूँ, बताने की चेष्टा करूंगा।

शुनि' भट्टाचार्य श्लोक करिल व्याख्याने । तर्क-शास्त्र-मत उठाय विविध विधान ॥

१८९॥

तब सार्वभौम भट्टाचार्य ने आत्माराम श्लोक की व्याख्या करनी शुरू की और तर्कशास्त्र के सिद्धान्तों के अनुसार उन्होंने अनेक प्रस्तावनाएँ प्रस्तुत कीं।

नव-विध अर्थ कैल शास्त्र-मत ला । शुनि' प्रभु कहे किछु ईषत् हासिया ॥

१९०॥

भट्टाचार्य ने शास्त्रों के आधार पर आत्माराम श्लोक की व्याख्या नौ विविध प्रकारों से की। उनकी व्याख्या सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु मन्दहास करते हुए बोले।।

‘भट्टाचार्य', जानि-तुमि साक्षात्बृहस्पति ।शास्त्र-व्याख्या करिते ऐछे कारो नाहि शक्ति ॥

१९१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, हे भट्टाचार्य, आप तो साक्षात् स्वर्गलोक के पुरोहित, बृहस्पति के समान हैं। निस्सन्देह इस जगत् में शास्त्रों की ऐसी व्याख्या करने की शक्ति अन्य किसी में नहीं है।

किन्तु तुमि अर्थ कैले पाण्डित्य-प्रतिभाय ।इहा वइ श्लोकेर आछे आरो अभिप्राय ॥

१९२॥

। हे प्रिय भट्टाचार्य, आपने अवश्य ही इस श्लोक की व्याख्या अपने विस्तृत पाण्डित्य के बल पर की है, किन्तु आप जान लीजिये कि इस पाण्डित्यपूर्ण व्याख्या के अतिरिक्त भी इस श्लोक का अन्य तात्पर्य है।

भट्टाचार्येर प्रार्थनाते प्रभु व्याख्या कैल ।। ताँर नव अर्थ-मध्ये एक ना छुडिल ॥

१९३॥

। सार्वभौम भट्टाचार्य के अनुरोध पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने भट्टाचार्य के नवों अर्थों को छुये बिना श्लोक की व्याख्या प्रारम्भ की।

आत्मारामाश्च-श्लोके 'एकादश' पद हय । पृथक् पृथक् कैल पदेर अर्थ निश्चय ॥

१९४॥

आत्माराम श्लोक में ग्यारह शब्द हैं। श्री चैतन्य महाप्रभु ने एक-एक करके इनकी व्याख्या की।

तत्तत्पद-प्राधान्ये 'आत्माराम' मिलाञा ।। अष्टादश अर्थ कैल अभिप्राय लञा ॥

१९५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रत्येक शब्द को लेकर उसके साथ। आत्माराम शब्द को जोड़ा। इस तरह उन्होंने आत्माराम' शब्द की व्याख्या अठारह भिन्न प्रकार से की।

भगवान्, ताँर शक्ति, ताँर गुण-गण ।। अचिन्त्य प्रभाव तिनेर ना याय कथन ॥

१९६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, उनकी विभिन्न शक्तियाँ तथा उनके दिव्य गुण-ये सभी अचिन्त्य शक्ति से युक्त हैं। उनकी पूर्ण व्याख्या कर पाना सम्भव नहीं है।

अन्य व्रत साध्य-साधन करि' आच्छादन । एइ तिने हरे सिद्ध-साधकेर मन ॥

१९७॥

ये तीनों आध्यात्मिक कार्यों में संलग्न सिद्ध जिज्ञासु को आकृष्ट कर लेते हैं तथा अन्य सभी प्रकार के आध्यात्मिक साधनों को आच्छादित कर लेते हैं।

सनकादि-शुकदेव ताहाते प्रमाण । एइ-मत नाना अर्थ करेन व्याख्यान ॥

१९८॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने शुकदेव गोस्वामी तथा सनक, सनत्कुमार, सनातन और सनन्दन नामक चार ऋषियों का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए इस श्लोक की व्याख्या की। इस तरह महाप्रभु ने विविध अर्थ तथा व्याख्याएँ प्रस्तुत कीं।

शुनि' भट्टाचार मने हैल चमत्कार ।।प्रभुके कृष्ण जानि' करे आपना धिक्कार ॥

१९९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु से आत्माराम श्लोक की व्याख्या सुनकर सार्वभौम भट्टाचार्य चकित रह गये। तब वे समझ गये कि श्री चैतन्य महाप्रभु साक्षात् कृष्ण हैं और उन्होंने स्वयं को निम्नलिखित शब्दों से धिक्कारा।

‘इँहो त' साक्षात्कृष्ण,–मुजि ना जानिया । महा-अपराध कैनु गर्वित हइया' ॥

२०० ॥

चैतन्य महाप्रभु निश्चय ही साक्षात् भगवान् कृष्ण हैं। उन्हें न समझ पाने के कारण और अपने पाण्डित्य पर अत्यन्त गर्वित होने के कारण मैंने अनेक अपराध किये हैं।

आत्म-निन्दा करि' लैल प्रभुर शरण ।कृपा करिबारे तबे प्रभुर हैल मन ॥

२०१॥

जब सार्वभौम भट्टाचार्य ने अपने आपको अपराधी कहकर धिक्कारा और महाप्रभु की शरण ग्रहण की, तो महाप्रभु का उन पर कृपा करने का मन हुआ।

निज-रूप प्रभु ताँरै कराइल दर्शन ।चतुर्भुज-रूप प्रभु हइला तखन ॥

२०२॥

। उन पर कृपा करने हेतु श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने विष्णु रूप का दर्शन कराया। उन्होंने तुरन्त चतुर्भुज रूप धारण कर लिया।

देखाइल ताँरे आगे चतुर्भुज-रूप ।पाछे श्याम-वंशी-मुख स्वकीय स्वरूप ॥

२०३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने सर्वप्रथम अपना चतुर्भुज रूप दिखलाया और फिर वे उनके समक्ष कृष्ण के अपने मूल रूप में श्याम वर्ण तथा अधरों पर वंशी धारण किये प्रकट हुए।

देखि' सार्वभौम दण्डवत्करि' पड़ि' ।पुनः उठि' स्तुति करे दुइ कर गुड़ि' ॥

२०४॥

। जब सार्वभौम भट्टाचार्य ने चैतन्य महाप्रभु में भगवान् कृष्ण का स्वरूप देखा, तो वे तुरन्त उन्हें दण्डवत् प्रणाम करने के लिए गिर पड़े। फिर वे खड़े हुए और दोनों हाथ जोड़कर स्तुति करने लगे।

प्रभुर कृपाय ताँर स्फुरिल सब तत्त्व । नाम-प्रेम-दान-आदि वर्णेन महत्त्व ॥

२०५॥

। महाप्रभु की कृपा से सार्वभौम भट्टाचार्य को सभी तत्त्व स्फुरित हो गये और वे भगवन्नाम का कीर्तन तथा भगवत्प्रेम का सर्वत्र वितरण करने के महत्त्व को समझ सके।

शत श्लोक कैल एक दण्ड ना ग्राइते ।। बृहस्पति तैछे श्लोक ना पारे करिते ॥

२०६॥

। सार्वभौम भट्टाचार्य ने अल्प समय में सौ श्लोक रच दिये। निस्सन्देह स्वर्गलोक के पुरोहित बृहस्पति भी इतनी शीघ्रता से श्लोकों की रचना नहीं कर सकते थे।

शुनि' सुखे प्रभु ताँरै कैल आलिङ्गन । भट्टाचार्य प्रेमावेशे हैल अचेतन ॥

२०७॥

एक सौ श्लोक सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रसन्नतापूर्वक सार्वभौम भट्टाचार्य का आलिंगन किया और भगवत्प्रेम से अभिभूत होने के कारण सार्वभौम भट्टाचार्य तुरन्त अचेत हो गये।

अश्रु, स्तम्भ, पुलक, स्वेद, कम्प थरहरि । नाचे, गाय, कान्दे, पड़े प्रभु-पद धरि' ॥

२०८॥

। भगवत्प्रेम के भावावेश के कारण भट्टाचार्य की आँखों से आँसू झर रहे थे और उनका शरीर स्तम्भित था। वे पुलकित हो गये और उनको पसीना आ गया, वे काँपने और थरथराने लगे। वे कभी नाचते, कभी गाते, कभी रोते और कभी महाप्रभु के चरणकमलों का स्पर्श करने के लिए नीचे गिर पड़ते।

देखि' गोपीनाथाचार्य हरषित-मन ।। भट्टाचार्येर नृत्य देखि' हासे प्रभुर गण ॥

२०९॥

सार्वभौम भट्टाचार्य को इस भावावेश में देखकर गोपीनाथ आचार्य अत्यधिक हर्षित हुए। श्री चैतन्य महाप्रभु के सभी पार्षद भट्टाचार्य को इस तरह नाचते देखकर हँस पड़े।

गोपीनाथाचार्य कहे महाप्रभुर प्रति ।।'सेइ भट्टाचार्येर प्रभु कैले एइ गति' ॥

२१०॥

गोपीनाथ आचार्य ने चैतन्य महाप्रभु से कहा, हे प्रभु, आपने सार्वभौम भट्टाचार्य की यह गति बना दी है।

प्रभु कहे,--‘तुमि भक्त, तोमार सङ्ग हैते ।।जगन्नाथ इँहारे कृपा कैल भाल-मते' ॥

२११॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, आप भक्त हैं। आपकी संगति के कारण ही जगन्नाथ भगवान् ने इन पर यह कृपा की है।

तबे भट्टाचार्ये प्रभु सुस्थिर करिल ।।स्थिर हा भट्टाचार्य बहु स्तुति कैल ॥

२१२ ॥

इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने भट्टाचार्य को शान्त किया। शान्त होने पर उन्होंने महाप्रभु की अनेक प्रकार से स्तुतियाँ कीं।

‘जगत् निस्तारिले तुमि,—सेह अल्प-कार्य । आमा उद्धारिले तुमि,—ए शक्ति आश्चर्य ॥

२१३॥

सार्वभौम भट्टाचार्य द्वारा की गई स्तुति सुनकर श्री चैतन्य महाप्रभु अपने निवासस्थान पर लौट आये और भट्टाचार्य ने गोपीनाथ आचार्य के माध्यम से उन्हें वहीं पर भोजन करवाया।

तर्क-शास्त्रे जड़ आमि, भैछे लौह-पिण्ड । आमा द्रवाइले तुमि, प्रताप प्रचण्ड' ॥

२१४॥

तर्कशास्त्र सम्बन्धी अनेक पुस्तकें पढ़ने के कारण मेरी जड़ बुद्धि लोहे की छड़ के समान बन गई थी। फिर भी आपने मुझे द्रवित कर दिया, अतएव आपका प्रभाव अत्यन्त प्रचण्ड है।

स्तुति शुनि' महाप्रभु निज वासा आइला । भट्टाचार्य आचार्य-द्वारे भिक्षा कराइला ॥

२१५॥

सार्वभौम भट्टाचार्य ने कहा, हे प्रभु, आपने सारे जगत् का उद्धार किया है, किन्तु यह कोई बड़ा काम नहीं है। किन्तु आपने मेरा भी उद्धार कर दिया, जो निश्चित रूप से अद्भुत शक्ति का काम है।

आर दिन प्रभु गेला जगन्नाथ-दरशने । दर्शन करिला जगन्नाथ-शय्योत्थाने ॥

२१६॥

अगले दिन प्रातःकाल श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथजी का दर्शन करने मन्दिर गये और उन्होंने भगवान् के शय्या से उठने के दर्शन किये।

पूजारी आनिया माला-प्रसादान्न दिला ।।प्रसादान्न-माला पाआ प्रभु हर्ष हैला ॥

२१७॥

पुजारी ने उन्हें जगन्नाथजी को अर्पित फूल-मालाएँ तथा प्रसाद लाकर दिये। इससे महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए।

सेइ प्रसादान्न-माला अञ्चले बान्धिया ।भट्टाचार्येर घरे आइला त्वरायुक्त हा ॥

२१८॥

इस प्रसाद तथा माला को सावधानी से कपड़े में बाँधकर श्री चैतन्य महाप्रभु सार्वभौम भट्टाचार्य के घर की ओर तेजी से बढ़े।

अरुणोदय-काले हैल प्रभुर आगमन ।।सेइ-काले भट्टाचार हैल जागरण ॥

२१९॥

वे सूर्योदय होने से थोड़ा पहले भट्टाचार्य के घर पधारे। ठीक उसी समय भट्टाचार्य सोकर जगे थे।

‘कृष्ण' 'कृष्ण' स्फुट कहि' भट्टाचार्य जागिला ।कृष्ण-नाम शुनि' प्रभुर आनन्द बाड़िला ॥

२२०॥

सार्वभौम भट्टाचार्य ने उठते ही स्पष्ट रूप से कृष्ण, कृष्ण का उच्चारण किया। श्री चैतन्य महाप्रभु उन्हें कृष्ण-नाम का उच्चारण करते सुनकर अत्यन्त हर्षित हुए।

बाहिरे प्रभुर तेहो पाइल दरशन ।आस्ते-व्यस्ते आसि' कैल चरण वन्दन ॥

२२१॥

भट्टाचार्य ने महाप्रभु को बाहर खड़े देखा, तो आतुरता से वे उनके पास गये और उनके चरणकमलों की वन्दना की।

वसिते आसन दिया मुँहेत वसिला ।।प्रसादान्न खुलि' प्रभु ताँर हाते दिला ॥

२२२॥

भट्टाचार्य ने महाप्रभु को बैठने के लिए आसन दिया और फिर दोनों ने आसन ग्रहण किया। तत्पश्चात् श्री चैतन्य महाप्रभु ने प्रसाद खोला और उसे भट्टाचार्य के हाथों पर रख दिया।

प्रसादान्न पाजा भट्टाचार्येर आनन्द हैल ।। स्नान, सन्ध्या, दन्त-धावन यद्यपि ना कैल ॥

२२३॥

। उस समय भट्टाचार्य ने न तो मुँह धोया था, न स्नान किया था, न ही प्रात:कालीन नित्य कर्म किया था। फिर भी वे जगन्नाथजी का प्रसाद पाकर अत्यन्त आनन्दित थे।

चैतन्य-प्रसादे मनेर सब जाडूय गेल ।एइ श्लोक पड़ि' अन्न भक्षण करिल ॥

२२४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से सार्वभौम भट्टाचार्य के मन की सारी जड़ता दूर हो गई थी। उन्होंने निम्नलिखित दो श्लोक पढ़कर उस प्रसाद को ग्रहण किया।

शुष्कं पर्युषितं वापि नीतं वा दूर-देशतः । प्राप्ति-मात्रेण भोक्तव्यं नात्र काल-विचारणा ॥

२२५॥

भट्टाचार्य ने कहा, भगवान् का महाप्रसाद पाते ही उसे तुरन्त ग्रहण कर लेना चाहिए, भले ही वह सूखा, बासी या दूर देश से लाया हुआ क्यों न हो। इसमें देश व काल का विचार नहीं करना चाहिए।

न देश-नियमस्तत्र न काल-नियमस्तथा ।प्राप्तमन्नं द्रुतं शिष्टैर्भोक्तव्यं हरिरब्रवीत् ॥

२२६॥

शिष्ट लोगों को चाहिए कि ज्योंही भगवान् कृष्ण का प्रसाद प्राप्त हो, त्योंही उसे ग्रहण कर लिया जाये; इसमें किसी प्रकार का संकोच नहीं करना चाहिए। इसके लिए देश तथा काल के विषय में कोई नियम नहीं है। यह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का आदेश है।

देखि' आनन्दित हैल महाप्रभुर मन ।।प्रेमाविष्ट हा प्रभु कैला आलिङ्गन ॥

२२७॥

यह देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए। वे भगवत्प्रेम में भावाविष्ट हो गये और उन्होंने सार्वभौम भट्टाचार्य का आलिंगन किया।

दुइ-जने धरि' मुँहे करेन नर्तन ।।प्रभु-भृत्य हा स्पर्शे, दोंहार फुले मन ॥

२२८॥

प्रभु तथा दास ने एक-दूसरे का आलिंगन किया और दोनों नाचने लगे। वे एक-दूसरे के स्पर्श मात्र से भावाविष्ट हो गये।

स्वेद-कम्प-अश्रु पँहे आनन्दे भासिला ।प्रेमाविष्ट हञा प्रभु कहिते लागिला ॥

२२९॥

जब वे नाचने लगे और आलिंगन करने लगे, तो उनके शरीरों में आध्यात्मिक लक्षण प्रकट होने लगे। उनको पसीना आ गया, वे काँपने तथा रोने लगे और महाप्रभु भावावेश में बोलने लगे।

आजि मुजि अनायासे जिनिनु त्रिभुवन ।।आजि मुजि करिनु वैकुण्ठ आरोहण ॥

२३०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, आज मैंने बड़ी आसानी से तीनों लोकों को जीत लिया है। आज मुझे वैकुण्ठ लोक प्राप्त हो गया है।

आजि मोर पूर्ण हैल सर्व अभिलाष । सार्वभौमेर हैल महा-प्रसादे विश्वास ॥

२३१॥

चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, मेरी समझ में आज मेरी सारी इच्छाएँ पूरी हो गईं, क्योंकि मैं देख रहा हूँ कि सार्वभौम भट्टाचार्य को जगन्नाथजी के महाप्रसाद में श्रद्धा उत्पन्न हो गई है।

आजि तुमि निष्कपटे हैला कृष्णाश्रय । कृष्ण आजि निष्कपटे तोमा हैल सदय ॥

२३२॥

निस्सन्देह, आज आपने निष्कपट होकर कृष्ण के चरणकमलों की शरण ग्रहण की है और कृष्ण भी निष्कपट होकर आपके प्रति अत्यन्त दयालु हो गये हैं।

आजि से खण्डिल तोमार देहादि-बन्धन । आजि तुमि छिन्न कैले मायार बन्धन ॥

२३३ ।। हे प्रिय भट्टाचार्य, आज आप देहात्म-बुद्धि के भौतिक बन्धन से मुक्त हो गये। आपने माया के बन्धन को खण्ड-खण्ड कर दिया है।

आजि कृष्ण-प्राप्ति-योग्य हैल तोमार मन ।। वेद धर्म लङ्घि' कैले प्रसाद भक्षण ॥

२३४॥

आज आपका मन कृष्ण के चरणकमलों की शरण ग्रहण करने के योग्य हुआ है, क्योंकि आपने वैदिक नियमों का उल्लंघन करके भगवत्प्रसाद ग्रहण किया है।

येषां स एष भगवान्दययेदनन्तः सर्वात्मनाश्रित-पदो ग्नदि नियंलीकम् । ते दुस्तरामतितरन्ति च देव-मायां ।नैषां ममाहमिति धीः श्व-शृगाल-भक्ष्ये ॥

२३५॥

। जब मनुष्य निष्कपट भाव से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करता है, तो असीम दयालु भगवान् उस पर अपनी अहैतुकी कृपा दिखलाते हैं। इस तरह वह अज्ञान के दुर्लंघ्य सागर को पार कर सकता है। जिसकी बुद्धि देहात्म-बोध में लगी रहती है और जो यह सोचता है कि, मैं यह शरीर हूँ वह कुत्तों तथा सियारों का उपयुक्त भोजन है। परम भगवान् ऐसे व्यक्ति पर कभी कृपा नहीं करते।

एत कहि' महाप्रभु आइला निज-स्थाने । सेइ हैते भट्टाचार्येर खण्डिले अभिमाने ॥

२३६॥

सार्वभौम भट्टाचार्य से ऐसा कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु अपने निवासस्थान लौट आये। उस दिन से भट्टाचार्य मुक्त हो गये, क्योंकि उनका मिथ्या अभिमान टूट चुका था।

चैतन्य-चरण विने नाहि जाने आन ।भक्ति विनु शास्त्रेर आर ना करे व्याख्यान ॥

२३७॥

। उस दिन से सार्वभौम भट्टाचार्य ने श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों के अतिरिक्त और कुछ नहीं जाना। उस दिन से वे केवल भक्तियोग के अनुसार शास्त्रों की व्याख्या करने लगे।

गोपीनाथाचार्य ताँर वैष्णवता देखियो ।‘हरि' ‘हरि' बलि' नाचे हाते तालि दिया ॥

२३८॥

सार्वभौम भट्टाचार्य को वैष्णव सम्प्रदाय में दृढ़ता के साथ अवस्थित हुए देखकर उनके बहनोई गोपीनाथ आचार्य नाचने, ताली बजाने और हरि! हरि का उच्चारण करने लगे।

आर दिन भट्टाचार्य आइला दर्शने ।। जगन्नाथ ना देखि' आइला प्रभु-स्थाने ॥

२३९॥

अगले दिन भट्टाचार्य जगन्नाथ मन्दिर गये, किन्तु मन्दिर पहुँचने के पहले वे चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने गये।

दण्डवत्करि' कैल बहु-विध स्तुति । दैन्य करि' कहे निज पूर्व-दुर्मति ॥

२४० ॥

महाप्रभु से मिलने पर भट्टाचार्य ने उन्हें दण्डवत् प्रणाम किया। विविध प्रकार से उनकी स्तुति करने के बाद उन्होंने अत्यन्त दीन भाव से अपनी पूर्व दुर्मति का वर्णन किया।

भक्ति-साधन-श्रेष्ठ शुनिते हैल मन । प्रभु उपदेश कैल नाम-सङ्कीर्तन ॥

२४१॥

तत्पश्चात् भट्टाचार्य ने चैतन्य महाप्रभु से पूछा, भक्ति की साधना में कौन-सा कार्य सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है? महाप्रभु ने उत्तर दिया कि सबसे महत्त्वपूर्ण कार्य भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन है।

हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम् । कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥

२४२॥

कलह और दिखावे के इस युग में उद्धार का एकमात्र साधन भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन है। इसके अतिरिक्त अन्य कोई साधन नहीं है, अन्य कोई नहीं है, अन्य कोई नहीं है।

एइ श्लोकेर अर्थ शुनाइल करिया विस्तार । शुनि' भट्टाचार्य-मने हैल चमत्कार ॥

२४३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने बृहन्नारदीय-पुराण के हरेर्नाम श्लोक की विस्तार से व्याख्या की। सार्वभौम भट्टाचार्य उनकी व्याख्या सुनकर चकित रह गये।

गोपीनाथाचार्य बले,–'आमि पूर्वे ग्रे कहिल ।शुन, भट्टाचार्य, तोमार सेइ त' हइल' ॥

२४४॥

गोपीनाथ आचार्य ने सार्वभौम भट्टाचार्य को स्मरण कराया, प्रिय भट्टाचार्य, मैंने आपसे जो कुछ पहले कहा था, अब वह घटित हो गया।"

भट्टाचार्य कहे ताँरे करि' नमस्कारे । तोमार सम्बन्धे प्रभु कृपा कैल मोरे ॥

२४५ ॥

गोपीनाथ आचार्य को नमस्कार करते हुए भट्टाचार्य ने कहा, मैं आपका सम्बन्धी हूँ और आप भक्त हैं, अतएव आपकी कृपा से महाप्रभु ने मुझ पर कृपा की है।

तुमि–महाभागवत, आमि तर्क-अन्धे । प्रभु कृपा कैल मोरे तोमार सम्बन्धे ॥

२४६॥

आप महाभागवत (उच्च कोटि के भक्त ) हैं और मैं तर्कशास्त्र के अन्धकार में पड़ा हुआ व्यक्ति। किन्तु भगवान् के साथ आपका सम्बन्ध होने के कारण भगवान् ने मुझे अपना आशीर्वाद प्रदान किया है।

विनय शुनि' तुष्ट्ये प्रभु कैल आलिङ्गन ।। कहिल,—ग्राञा करह ईश्वर दरशन ॥

२४७॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु इस विनीत वचन से अत्यन्त प्रसन्न हुए। उन्होंने भट्टाचार्य का आलिंगन करके उनसे कहा, अब आप मन्दिर में भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करने जाएँ।

जगदानन्द दामोदर, दुई सङ्गे ला । घरे आइल भट्टाचार्य जगन्नाथ देखिया ॥

२४८॥

भगवान् जगन्नाथ के मन्दिर के दर्शन करने के बाद सार्वभौम भट्टाचार्य जगदानन्द तथा दामोदर के साथ घर लौट आये।।

उत्तम उत्तम प्रसाद बहुत आनिला ।। निज-विप्र-हाते दुइ जना सङ्गे दिला ॥

२४९॥

भट्टाचार्य अपने साथ भगवान जगन्नाथ का बहुत-सा सर्वोत्तम प्रसाद ले आये थे। उन्होंने यह सारा प्रसाद अपने ब्राह्मण सेवक तथा जगदानन्द और दामोदर को दे दिया।

निज कृत दुइ श्लोक लिखिया ताल-पाते । ‘प्रभुके दिह' बलि' दिल जगदानन्द-हाते ॥

२५०॥

तब सार्वभौम भट्टाचार्य ने ताड़पत्र पर दो श्लोकों की रचना की और वह ताड़पत्र जगदानन्द प्रभु को देते हुए उनसे प्रार्थना की कि वे उसे श्री । चैतन्य महाप्रभु को दे दें।

प्रभु-स्थाने आइला मुँहे प्रसाद-पत्री ला ।। मुकुन्द दत्त पत्री निल तार हाते पाञा ॥

२५१॥

तब जगदानन्द तथा दामोदर प्रसाद तथा वह लिखा ताड़पत्र लेकर श्री चैतन्य महाप्रभु के पास लौट आये। किन्तु मुकुन्द दत्त ने वह ताड़पत्र महाप्रभु को दिये जाने के पूर्व ही जगदानन्द के हाथ से ले लिया।

दुइ श्लोक बाहिर-भिते लिखिया राखिल ।। तबे जगदानन्द पत्री प्रभुके लञा दिल ॥

२५२॥

। तब मुकुन्द दत्त ने कमरे की बाहरी दीवाल पर दोनों श्लोकों को लिख दिये। इसके बाद जगदानन्द ने मुकुन्द दत्त से ताड़पत्र ले लिया और उसे श्री चैतन्य महाप्रभु को दे दिया।

प्रभु श्लोक पड़ि' पत्र छिण्डिया फेलिल । भित्त्ये देखि' भक्त सब श्लोक कण्ठे कैल ॥

२५३॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने दोनों श्लोकों को पढ़ते ही ताड़पत्र को तुरन्त फाड़ डाला। किन्तु सारे भक्तों ने बाहरी दीवाल पर इन श्लोकों को पढ़े और उन्हें कण्ठस्थ कर लिये। ये श्लोक इस प्रकार थे।

वैराग्य-विद्या-निज-भक्ति-योगशिक्षार्थमेकः पुरुषः पुराणः । श्री-कृष्ण-चैतन्य-शरीर-धारीकृपाम्बुधिय़स्तमहं प्रपद्ये ॥

२५४॥

। मैं उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण की शरण ग्रहण करता हूँ, जो हमें वास्तविक ज्ञान, अपनी भक्ति तथा कृष्णभावनामृत के विकास में बाधक वस्तुओं से विरक्ति सिखलाने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतरित हुए हैं। वे दिव्य कृपा के सिन्धु होने के कारण अवतरित हुए हैं। मैं उनके चरणकमलों की शरण ग्रहण करता हूँ।

कालान्नष्टं भक्ति-योगं निजं ग्रः।प्रादुष्कर्तुं कृष्ण-चैतन्य-नामा । आविर्भूतस्तस्य पादारविन्दे । गाढ़े गाढ़े लीयतां चित्त-भृङ्गः ॥

२५५॥

मधुकर के समान मेरी चेतना उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के चरणकमलों की शरण ग्रहण करे, जो अब श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के रूप में अपने प्रति प्राचीन भक्तियोग की शिक्षा देने के लिए प्रकट हुए हैं। यह भक्तियोग समय के प्रभाव से लुप्तप्राय हो चुका था।

एइ दुइ श्लोक-भक्त-कण्ठे रत्न-हार । सार्वभौमेर कीर्ति घोषे ढक्का-वाद्याकार ॥

२५६ ।। । सार्वभौम भट्टाचार्य द्वारा रचित ये दोनों श्लोक उनके नाम तथा यश की घोषणा ढोल की थाप के समान उच्च स्वर से सदैव करते रहेंगे, क्योंकि ये श्लोक सारे भक्तों के कंठ का रत्नहार बन चुके हैं।

सार्वभौम हैला प्रभुर भक्त एकतान । महाप्रभुर सेवा-विना नाहि जाने आन ॥

२५७॥

निस्सन्देह, सार्वभौम भट्टाचार्य चैतन्य महाप्रभु के अनन्य भक्त बन गये। महाप्रभु की सेवा के अतिरिक्त वे दूसरा कुछ भी नहीं जानते थे।

'श्री-कृष्ण-चैतन्य शची-सूत गुण-धाम' ।। एई ध्यान, एई जपे, लये एइ नाम ॥

२५८ ॥

भट्टाचार्य सदैव माता शची के पुत्र एवं समस्त सद्गुणों के आगार श्रीकृष्ण चैतन्य के नाम का कीर्तन करते थे। निस्सन्देह नाम-कीर्तन ही उनका ध्यान बन गया।

एक-दिन सार्वभौम प्रभु-आगे आइला ।नमस्कार करि' श्लोक पड़िते लागिला ॥

२५९ ॥

एक दिन सार्वभौम भट्टाचार्य चैतन्य महाप्रभु के समक्ष आये और नमस्कार करने के बाद एक श्लोक सुनाने लगे।

भागवतेर ‘ब्रह्म-स्तवे'र श्लोक पड़िला ।श्लोक-शेषे दुइ अक्षर-पाठ फिराइला ॥

२६० ॥

वे श्रीमद्भागवत से ब्रह्माजी की एक स्तुति सुनाने लगे, किन्तु उन्होंने श्लोक के अन्तिम दो अक्षरों को बदल दिया।

तत्तेऽनुकम्पां सुसमीक्षमाणोभुञ्जान एवात्म-कृतं विपाकम् । हृद्वाग्वपुभिर्विदधन्नमस्ते ।जीवेत म्रो भक्ति-पदे स दाय-भाक् ॥

२६१॥

[ यह श्लोक थाजो आपकी अनुकम्पा चाहता है और अपने विगत कर्मों से उत्पन्न सभी प्रकार की विपरीत परिस्थितियों को सहन करता है, जो मन, वचन तथा शरीर से सदैव आपकी सेवा में संलग्न रहता है और जो सदैव आपको नमस्कार करता है, वह निश्चय ही आपका अनन्य भक्त बनने का पात्र है।

प्रभु कहे, ‘मुक्ति-पदे'—इहा पाठ हय । ‘भक्ति-पदे' केने पड़, कि तोमार आशय ॥

२६२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने तुरन्त आपत्ति की, उस श्लोक में 'मुक्तिपदे' शब्द आया है, किन्तु आपने इसे बदलकर 'भक्तिपदे' कर दिया है। आप क्या कहना चाहते हैं? भट्टाचार्य कहे,–'भक्ति'-सम नहे मुक्ति-फल ।भगवद्भक्ति-विमुखेर हय दण्ड केवल ॥

२६३ ॥

सार्वभौम भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, शुद्ध भगवत्प्रेम का उदय जो भक्ति का फल है, वह भौतिक बन्धन की मुक्ति से कहीं बढ़कर है। जो भक्ति से विमुख हैं, उनके लिए ब्रह्मतेज में समा जाना एक प्रकार का दण्ड है।

कृष्णेर विग्रह येइ सत्य नाहि माने ।। येइ निन्दा-युद्धादिक करे ताँर सने ॥

२६४॥

सेइ दुइर दण्ड हय–ब्रह्म-सायुज्य-मुक्ति' ।तार मुक्ति फल नहे, ग्रेड करे भक्ति ॥

२६५ ॥

। भट्टाचार्य ने आगे कहा, भगवान् श्रीकृष्ण के दिव्य रूप को न मानने वाले निर्विशेषवादी तथा भगवान् की निन्दा करने और उनसे सदैव युद्ध करने वाले असुर ब्रह्मज्योति में समाकर दण्डित होते हैं। किन्तु जो व्यक्ति भगवान् की भक्तिमयी सेवा में लगा रहता है, उसके साथ ऐसा नहीं होता।

यद्यपि से मुक्ति हय पञ्च-परकार ।सालोक्य-सामीप्य-सारूप्य-सार्टि-सायुज्य आर ॥

२६६॥

मुक्ति पाँच प्रकार की है—सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्टि तथा सायुज्य।

सालोक्यादि' चारि यदि हय सेवा-द्वार ।तबु कदाचित्भक्त करे अङ्गीकार ॥

२६७॥

यदि शुद्ध भक्त को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की सेवा करने का अवसर मिले, तो वह कभी-कभी सालोक्य, सारूप्य, सामीप्य या सार्टि मुक्ति को तो स्वीकार करता है, किन्तु सायुज्य को कभी नहीं।

‘सायुज्य' शुनिते भक्तेर हय घृणा-भय ।।नरक वाञ्छये, तबु सायुज्य ना लय ॥

२६८॥

शुद्ध भक्त तो सायुज्य मुक्ति का नाम भी सुनना नहीं चाहता, क्योंकि उससे उसे भय तथा घृणा उत्पन्न होते हैं। निस्सन्देह, शुद्ध भक्त भगवान् के तेज में समा जाने की अपेक्षा नरक जाना पसन्द करेगा।

ब्रह्मे, ईश्वरे सायुज्य दुइ त' प्रकार ।ब्रह्म-सायुज्य हैते ईश्वर-सायुज्य धिक्कार ॥

२६९।। सार्वभौम भट्टाचार्य ने आगे कहा, सायुज्य मुक्ति दो प्रकार की हैब्रह्मतेज में समा जाना और भगवान् के शरीर में समा जाना। भगवान् के शरीर में समा जाना तो उनके तेज में समा जाने से भी अधिक निन्दनीय है।

सालोक्य-सार्टि-सामीप्य-सारूप्यैकत्वमप्युत ।दीयमानं न गृह्णन्ति विना मत्सेवनं जनाः ॥

२७० ॥

सार्वभौम भट्टाचार्य ने अन्त में कहा, समस्त प्रकार की मुक्तियाँ प्रदान किये जाने पर भी शुद्ध भक्त उन्हें स्वीकार नहीं करता। वह भगवान् की सेवा में लगे रहने से ही सन्तुष्ट रहता है।"

प्रभु कहे,–'मुक्ति-पदे'र आर अर्थ हय ।मुक्ति-पद-शब्दे साक्षातीश्वर' कहय ॥

२७१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने उत्तर दिया, मुक्ति-पदे शब्द का अन्य अर्थ है। मुक्ति-पद साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् का द्योतक है।

मुक्ति पदे याँर, सेइ ‘मुक्ति-पद' हय ।किम्वा नवम पदार्थ 'मुक्तिर' समाश्रय ॥

२७२॥

चूँकि सभी प्रकार की मुक्तियाँ पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के चरणकमलों में विद्यमान रहती हैं, अतएव वे मुक्तिपद कहे जाते हैं। एक अन्य अर्थ के अनुसार मुक्ति नौवाँ विषय है और पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् मुक्ति के आश्रय हैं।

दुइ-अर्थे 'कृष्ण' कहि, केने पाठ फिरि । सार्वभौम कहे,—ओ-पाठ कहिते ना पारि ॥

२७३ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, चूंकि मैं इन दोनों अर्थों से श्रीकृष्ण को समझ सकता हूँ, तो फिर श्लोक को बदलने से क्या लाभ? सार्वभौम भट्टाचार्य ने उत्तर दिया, मैं इस श्लोक का वह पाठ नहीं कर पा रहा था।

यद्यपि तोमार अर्थ एइ शब्दे कय । तथापि 'आश्लिष्य-दोषे' कहने ना ग्राय ॥

२७४॥

यद्यपि आपकी व्याख्या सही है, किन्तु ‘मुक्तिपद' पद में असमंजसता होने के कारण इसका प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।

ग्रद्यपि ‘मुक्ति'-शब्देर हय पञ्च वृत्ति ।।रूढ़ि-वृत्त्ये कहे तबु ‘सायुज्ये' प्रतीति ॥

२७५ ॥

मुक्ति' शब्द पाँच प्रकार की मुक्तियों का घोतक है। किन्तु सामान्यतया इसका मुख्य अर्थ सायुज्य की प्रतीति है।

मुक्ति-शब्द कहिते मने हय घृणा-त्रास । भक्ति-शब्द कहिते मने हय त' उल्लास ॥

२७६ ॥

मुक्ति' शब्द की ध्वनि मात्र से मन में घृणा तथा भय का भाव उत्पन्न होता है, किन्तु जब हम 'भक्ति' शब्द कहते हैं, तो हमारे मन में दिव्य आनन्द की सहज अनुभूति होती है।

शुनिया हासेन प्रभु आनन्दित-मने । भट्टाचार्य कैल प्रभु दृढ़ आलिङ्गने ॥

२७७॥

यह व्याख्या सुनकर महाप्रभु हँसने लगे और तुरन्त ही उन्होंने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक भट्टाचार्य का दृढ आलिंगन किया।

ग्रेइ भट्टाचार्य पड़े पड़ाय मायावादे । ताँर ऐछे वाक्य स्फुरे चैतन्य-प्रसादे ॥

२७८ ॥

जो व्यक्ति मायावाद-दर्शन पढ़ने और पढ़ाने का अभ्यस्त था, वही अब मुक्ति शब्द से घृणा कर रहा था। यह सब केवल श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से ही सम्भव हुआ।

लोहाके यावत्स्पर्शि' हेम नाहि करे ।तावत्स्पर्श-मणि केह चिनिते ना पारे ॥

२७९॥

जब तक स्पर्शमणि लोहे को अपने स्पर्श से सोना न बना दे, तब तक कोई भी व्यक्ति किसी अज्ञात पत्थर को स्पर्शमणि के रूप में नहीं जान सकता।

भट्टाचार्येर वैष्णवता देखि' सर्व-जन ।। प्रभुके जानिल-‘साक्षात्व्रजेन्द्र-नन्दन' ॥

२८०॥

सार्वभौम भट्टाचार्य की दिव्य वैष्णवता देखकर हर व्यक्ति यह जान सका कि चैतन्य महाप्रभु नन्द महाराज के पुत्र कृष्ण के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं हैं।

काशी-मिश्र-आदि व्रत नीलाचल-वासी ।शरण लइल सबे प्रभु-पदे आसि' ॥

२८१॥

इस घटना के बाद काशीमिश्र आदि जगन्नाथ पुरी के सारे निवासी महाप्रभु के चरणकमलों की शरण में आ गये।

सेइ सब कथा आगे करिब वर्णन ।सार्वभौम करे ग्रैछे प्रभुर सेवन ॥

२८२॥

मैं इसका वर्णन बाद में करूंगा कि सार्वभौम भट्टाचार्य किस प्रकार महाप्रभु की सेवा में सदा लगे रहते थे।

ग्रैछे परिपाटी करे भिक्षा-निर्वाहन । विस्तारिया आगे ताहा करिब वर्णन ॥

२८३॥

मैं इसका भी विस्तार से वर्णन करूंगा कि किस तरह सार्वभौम भट्टाचार्य ने भिक्षा देकर श्री चैतन्य महाप्रभु की सम्यक् सेवा की।

एइ महाप्रभुर लीला- सार्वभौम-मिलन । इहा ग्रेइ श्रद्धा करि' करये श्रवण ॥

२८४॥

ज्ञान-कर्म-पाश हैते हय विमोचन ।। अचिरे मिलये तौरै चैतन्य-चरण ॥

२८५॥

। यदि कोई व्यक्ति श्रद्धा तथा प्रेमपूर्वक सार्वभौम भट्टाचार्य तथा चैतन्य महाप्रभु के मिलन से सम्बन्धित इन लीलाओं को सुनता है, तो वह तुरन्त ही मानसिक तर्कवितर्क तथा सकाम कर्म के बन्धन से मुक्त हो जाता है और श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की शरण प्राप्त करता है।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

२८६॥

मैं कृष्णदास श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए उनके चरणचिह्नों पर चलकर श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

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