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अध्याय पाँच: साक्षी-गोपाल की गतिविधियाँ

पद्भ्यां चलन् यः प्रतिमा-स्वरूपो ब्रह्मण्य-देवो हि शताह-गम्यम् । देशं ग्रयौ विप्र-कृतेऽद्भुतेहंतं साक्षि-गोपालमहं नतोऽस्मि ॥

१॥

मैं उन पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ( ब्रह्मण्य-देव) को सादर नमस्कार करता हूँ, जो एक ब्राह्मण पर उपकार करने के लिए साक्षीगोपाल के रूप में प्रकट हुए। उन्होंने १०० दिनों तक देश की पैदल यात्रा की। इस तरह उनकी लीलाएँ अद्भुत हैं।

जय जय श्री-चैतन्ये जय नित्यानन्द । जयाद्वैतचन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैत प्रभु की जय हो और श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय चलिते चलते आइला झाजपुर-ग्राम ।।वराह-ठाकुर देखि' करिला प्रणाम ॥

३॥

चलते चलते श्री चैतन्य महाप्रभु अपनी टोली सहित वैतरणी नदी के तट पर स्थित याजपुर गाँव आये। वहाँ उन्होंने वराहदेव का मन्दिर देखा और उन्हें नमस्कार किया।

नृत्य-गीत कैल प्रेमे बहुत स्तवन ।। ग्राजपुरे से रात्रि करिला यापन ॥

४॥

वराह देव के मन्दिर में श्री चैतन्य महाप्रभु ने कीर्तन तथा नृत्य किया और प्रार्थनाएँ की । वह रात्रि उन्होंने मन्दिर में ही बिताई।

कटके आइला साक्षि-गोपाल देखिते । गोपाल-सौन्दर्य देखि' हैला आनन्दिते ॥

५॥

इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु कटक नामक नगर में साक्षीगोपाल का मन्दिर देखने गये। गोपाल विग्रह के सौन्दर्य को देखकर वे अत्यन्त प्रफुल्लित हुए।

प्रेमावेशे नृत्य-गीत कैल कत-क्षण ।।आविष्ट हा कैल गोपाल स्तवन ॥

६॥

वहाँ पर श्री चैतन्य महाप्रभु कुछ समय तक कीर्तन तथा नृत्य करते गई और भावाभिभूत होकर उन्होंने गोपाल की अनेक प्रकार से स्तुति की । सेइ रात्रि ताहाँ रहि' भक्त-गण-सङ्गे ।गोपालेर पूर्व-कथा शुने बहु रङ्गे ॥

७॥

उस रात श्री चैतन्य महाप्रभु गोपाल के मन्दिर में रहे और सभी भक्तों सहित उन्होंने साक्षीगोपाल की कथा अत्यन्त उत्साहपूर्वक सुनी।

नित्यानन्द-गोसाजि ग्रबे तीर्थ भ्रमिला।साक्षि-गोपाल देखिबारे कटक आइला ॥

८॥

इसके पूर्व जब नित्यानन्द प्रभु ने विभिन्न तीर्थस्थलों का दर्शन करने के लिए पूरे भारत का भ्रमण किया था, तो वे कटक स्थित साक्षीगोपाल का दर्शन करने भी आये थे।

साक्षि-गोपालेर कथा शुनि, लोक-मुखे ।।सेइ कथा कहेन, प्रभु शुने महा-सुखे ॥

९॥

उस समय नित्यानन्द प्रभु ने साक्षीगोपाल की कथा उस नगर के लोगों से सुनी थी। अब उन्होंने वही कथा फिर सुनाई और चैतन्य महाप्रभु ने उस कथा को अत्यन्त सुखपूर्वक सुना।

पूर्वे विद्यानगरेर दुइ त' ब्राह्मण । तीर्थ करिबारे मुँहे करिला गमन ॥

१०॥

प्राचीनकाल में दक्षिण भारत में विद्यानगर में दो ब्राह्मण थे, जिन्होंने विभिन्न तीर्थस्थानों के दर्शनार्थ लम्बी यात्रा की।

गया, वाराणसी, प्रयाग—सकल करिया ।।मथुराते आइला मुँहे आनन्दित हा ॥

११॥

। सर्वप्रथम वे गया गये, फिर काशी और तब प्रयाग। अन्त में वे अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक मथुरा आये।

वन-यात्राय वन देखि' देखे गोवर्धन ।द्वादश-वन देखि' शेषे गेला वृन्दावन ॥

१२॥

मथुरा पहुँचकर उन्होंने वृन्दावन के विभिन्न वनों का दर्शन करना प्रारम्भ किया। तब वे गोवर्धन पर्वत आये। उन्होंने सारे बारहों वनों के दर्शन किये और अन्त में वृन्दावन नगरी पहुँचे।

वृन्दावने गोविन्द-स्थाने महा-देवालय ।से मन्दिरे गोपालेर महा-सेवा हय ॥

१३॥

पंचक्रोशी वृन्दावन ग्राम में, जहाँ अब गोविन्द मन्दिर स्थित है, पहले एक विशाल मन्दिर था जहाँ गोपाल की भव्य सेवा की जाती थी।

केशी-तीर्थ, कालीय-हृदादिके कैल स्नान ।।श्री-गोपाल देखि' ताहाँ करिला विश्राम ॥

१४॥

यमुना नदी के किनारे स्थित विभिन्न घाटों में, यथा केशीघाट तथा कालिय घाट में, स्नान करने के बाद वे दोनों यात्री गोपाल-मन्दिर में दर्शन करने गये। इसके बाद उन्होंने उस मन्दिर में विश्राम किया।

गोपाल-सौन्दर्घ मुँहार मन निल हरि' ।।सुख पाञा रहे ताहाँ दिन दुइ-चारि ॥

१५॥

गोपाल-विग्रह के सौन्दर्य ने उनके मनों को हर लिया और परम सुख का अनुभव करते हुए वे दोनों दो-चार दिन वहाँ रुके रहे।

दुइ-विप्र-मध्ये एक विप्र-वृद्ध-प्राय ।।आर विप्र—ब्रुवा, ताँर करेन सहाय ॥

१६॥

दोनों ब्राह्मणों में एक वृद्ध था और दूसरा तरुण। यह तरुण व्यक्ति वृद्ध ब्राह्मण की सहायता कर रहा था।

छोट-विप्र करे सदा ताँहार सेवन । ताँहार सेवाय विप्रेर तुष्ट हैल मन ॥

१७॥

निस्सन्देह तरुण ब्राह्मण वृद्ध की सतत सेवा करता था और वह वृद्ध ब्राह्मण उसकी सेवा से सन्तुष्ट होने के कारण उससे प्रसन्न था।

विप्र बले तुमि मोर बहु सेवा कैला ।सहाय हआ मोरे तीर्थ कराइला ॥

१८॥

बूढ़े व्यक्ति ने उस तरुण से कहा, तुमने तरह-तरह से मेरी सेवा की है और इन सारे तीर्थस्थानों की यात्रा करने में मेरी सहायता की है।

पुत्रेओ पितार ऐछे ना करे सेवन ।। तोमार प्रसादे आमि ना पाइलाम श्रम ॥

१९॥

मेरा पुत्र भी ऐसी सेवा नहीं करता। तुम्हारी दया से मुझे यात्रा में कोई थकान नहीं हुई।

कृतघ्नता हय तोमाय ना कैले सम्मान ।अतएव तोमाय आमि दिब कन्या-दान ॥

२०॥

यदि मैं तुम्हारा आदर न करूं, तो मैं कृतघ्न माना जाऊँगा। अतएव मैं वचन देता हूँ कि मैं तुम्हें अपनी कन्या दान में दूंगा।

छोट-विप्र कहे, शुन, विप्र-महाशय ।।असम्भव कह केने, ग्रेई नाहि हय ॥

२१॥

तरुण ब्राह्मण ने कहा, हे भद्र ब्राह्मण, कृपया मेरी बात सुनें। आप कुछ असम्भव बात कर रहे हैं। ऐसा कभी होता नहीं।

महा-कुलीन तुमि—विद्या-धनादि-प्रवीण ।आमि अकुलीन, आर धन-विद्या-हीन ॥

२२॥

आप उच्च कुल के व्यक्ति हैं, सुशिक्षित हैं और अत्यन्त धनी हैं। और मैं न तो उच्च कुल का हूँ, न ही मेरे पास उत्तम शिक्षा है, न ही धन है।

कन्या-दान-पात्र आमि ना हइ तोमार ।कृष्ण-प्रीत्ये करि तोमार सेवा-व्यवहार ॥

२३ ॥

हे महोदय, मैं आपकी कन्या के उपयुक्त वर नहीं हूँ। मैं तो केवल कृष्ण की तुष्टि के लिए आपकी सेवा कर रहा हूँ।

ब्राह्मण-सेवाय कृष्णेर प्रीति बड़ हय ।।ताँहार सन्तोषे भक्ति-सम्पद्वाड़य ॥

२४॥

भगवान् कृष्ण ब्राह्मणों की सेवा करने से अत्यन्त प्रसन्न होते हैं और जब भगवान् प्रसन्न होते हैं, तो भक्ति संपदा बढ़ती है।

बड़-विप्र कहे,–तुमि ना कर संशय ।।तोमाके कन्या दिब आमि, करिल निश्चय ॥

२५॥

उस वृद्ध ब्राह्मण ने कहा, बेटे, तुम मुझ पर सन्देह मत करो। मैं तुम्हें कन्यादान दूंगा। मैंने पहले ही यह निश्चय कर लिया है।

छोट-विप्र बले,–तोमार स्त्री-पुत्र सब । बहु ज्ञाति-गोष्ठी तोमार बहुत बान्धव ॥

२६॥

तरुण ब्राह्मण बोला, आपके पत्नी तथा पुत्र हैं तथा आपके अनेक परिजन तथा मित्र हैं।

ता'-सबार सम्मति विना नहे कन्या-दान । रुक्मिणीर पिता भीष्मक ताहाते प्रमाण ॥

२७॥

अपने सारे मित्रों तथा परिजनों की सम्मति के बिना आप अपनी कन्या का दान मुझे नहीं दे सकते। कृपया महारानी रुक्मिणी तथा उनके पिता भीष्मक की कथा पर विचार करें।

भीष्मकेर इच्छा,—कृष्ण कन्या समर्पिते ।।पुत्रेर विरोधे कन्या नारिल अर्पिते ॥

२८॥

वृद्ध ब्राह्मण ने कहा, मेरी पुत्री मेरी निजी सम्पत्ति है। यदि मैं किसी को अपनी सम्पत्ति देना चाहूँ, तो किसमें शक्ति है कि मुझे रोक सके? बड़-विप्र कहे,-कन्या मोर निज-धन ।।निज-धन दिते निषेधिबे को जन ॥

२९॥

राजा भीष्मक अपनी कन्या रुक्मिणी का दान कृष्ण को करना चाहते थे, किन्तु उनके बड़े पुत्र रुक्मी ने विरोध किया। अतएव वे अपना निर्णय पूरा नहीं कर सके।

तोमाके कन्या दिब, सबाके करि' तिरस्कार ।संशय ना कर तुमि, करह स्वीकार ॥

३०॥

प्रिय बालक, मैं तुम्हें अपनी कन्या दान करूंगा और मैं अन्यों की चिन्ता नहीं करूंगा। तुम इसमें मुझ पर सन्देह मत करो। तुम मेरा प्रस्ताव स्वीकार कर लो।

छोट-विप्र कहे,यदि कन्या दिते मन ।।गोपालेर आगे कह ए सत्य-वचन ॥

३१॥

तरुण ब्राह्मण ने उत्तर दिया, यदि आपने अपनी तरुण कन्या मुझे देने का निश्चय कर लिया है, तो गोपाल-विग्रह के सामने चलकर ऐसा कहें।

गोपालेर आगे विप्र कहिते लागिल । ‘तुमि जान, निज-कन्या इहारे आमि दिल' ॥

३२॥

उस वृद्ध ब्राह्मण ने गोपाल के समक्ष आकर कहा, हे प्रभु, आप साक्षी हैं कि मैंने अपनी कन्या इस लड़के को दे दी है।

छोट-विप्र बले,–ठाकुर, तुमि मोर साक्षी ।। तोमा साक्षी बोलाईमु, यदि अन्यथा देखि ॥

३३॥

। तब तरुण ब्राह्मण ने विग्रह को सम्बोधित करते हुए कहा, हे प्रभु, आप मेरे साक्षी हैं। यदि बाद में जरूरत पड़ी, तो मैं आपको साक्षी के रूप में बुलाऊँगा।

एत बलि' दुइ-जने चलिला देशेरे।।गुरु-बुद्धये छोट-विप्र बहु सेवा करे ॥

३४॥

इस वार्तालाप के बाद दोनों ब्राह्मण घर के लिए चल पड़े। पहले की ही तरह तरुण ब्राह्मण उस वृद्ध ब्राह्मण के साथ चला, मानो वृद्ध ब्राह्मण उसका गुरु हो और वह उसकी तरह-तरह से सेवा करता रहा।

देशे आसि' दुइ-जने गेला निज-घरे ।। कत दिने बड़-विप्र चिन्तित अन्तरे ॥

३५ ॥

विद्यानगर लौटकर दोनों ब्राह्मण अपने-अपने घर चले गये। कुछ समय बाद वृद्ध ब्राह्मण को चिन्ता सताने लगी।

तीर्थे विप्रे वाक्य दिहुँ, केमते सत्य हय ।। स्त्री, पुत्र, ज्ञाति, बन्धु जानिबे निश्चय ॥

३६॥

वह सोचने लगा, मैंने तीर्थस्थान में एक ब्राह्मण को वचन दिया है। और मेरे वचन का अवश्य पालन होना चाहिए। अब मुझे अपनी स्त्री, पुत्रों, अन्य सम्बन्धियों तथा मित्रों को यह बात बता देनी चाहिए।

एक-दिन निज-लोक एकत्र करिल ।। ता-सबार आगे सब वृत्तान्त कहिल ॥

३७॥

फलतः उस वृद्ध ब्राह्मण ने एक दिन अपने सारे सम्बन्धियों तथा मित्रों की सभा बुलाई और उसने उन सबको गोपाल के समक्ष हुई पूरी । घटना बताई।

शुनि' सब गोष्ठी तार करे हाहाकार । ‘ऐछे बात् मुखे तुमि ना आनिबे आर ॥

३८॥

। जब परिवार वालों ने वृद्ध ब्राह्मण का वृत्तान्त सुना, तो वे निराशा प्रकट करते हुए हाहाकार करने लगे। उन सबने यही अनुरोध किया कि वह फिर ऐसा प्रस्ताव न रखे।

नीचे कन्या दिले कुल ग्राइबेक नाश । शुनिजी सकल लोक करिबे उपहास' ॥

३९॥

सबने एक स्वर से कहा, यदि तुम अपनी कन्या निम्न परिवार में देते हो, तो तुम्हारी कुलीनता जाती रहेगी। जब लोग इसे सुनेंगे, तो वे तुम्हारा उपहास करेंगे।

विप्र बले,–तीर्थ-वाक्य केमने करि आने ।ये हउक्, से हडक, आमि दिबे कन्या-दान ॥

४०॥

वृद्ध ब्राह्मण ने कहा, तीर्थयात्रा के समय पवित्र स्थान में दिया गया वचन मैं कैसे मिटा सकता हूँ? चाहे जो भी हो, मुझे उसे ही कन्यादान करना चाहिए।

ज्ञाति लोक कहे,–'मोरा तोमाके छाड़िब' ।।स्त्री-पुत्र कहे,--‘विष खाइया मरिब' ॥

४१॥

सम्बन्धियों ने एकजुट होकर कहा, यदि तुम अपनी कन्या उस लड़के को दोगे, तो हम तुमसे अपने सारे सम्बन्ध तोड़ देंगे। उसकी स्त्री तथा पुत्रों ने घोषित किया, यदि ऐसा होता है, तो हम सभी विष खाकर पर जायेंगे।

विप्र बले,--साक्षी बोलाजा करिबेक न्याय । जिति' कन्या लबे, मरि व्यर्थ धर्म हय ॥

४२॥

वृद्ध ब्राह्मण ने कहा, यदि मैं अपनी कन्या उस तरुण ब्राह्मण को नहीं देता, तो वह श्री गोपालजी को साक्षी के रूप में बुलायेगा। इस तरह वह मेरी कन्या को बलपूर्वक ले जायेगा और उस दशा में मेरा धर्म नष्ट हो जायेगा।

पुत्र बले,– प्रतिमा साक्षी, सेह दूर देशे ।के तोमार साक्षी दिबे, चिन्ता कर किसे ॥

४३॥

उसके पुत्र ने उत्तर दिया, भले ही विग्रह साक्षी हों किन्तु वे दूर देश में हैं। भला वे आपके विरुद्ध साक्षी देने किस तरह आ सकते हैं? आप इसके विषय में इतने चिन्तित क्यों हैं? नाहि कहि–ना कहिओ ए मिथ्या-वचन ।।सबे कहिबे–‘मोर किछु नाहिक स्मरण' ॥

४४॥

आपको एकदम यह नहीं कहना है कि आपने ऐसी बात नहीं कही थी। ऐसी झूठी बात कहने की आवश्यकता नहीं है। आप केवल इतना ही कहिये कि आपको स्मरण नहीं है कि आपने क्या कहा था।

तुमि यदि कह,–'आमि किछुइ ना जानि'।तबे आमि न्याय करि' ब्राह्मणेरे जिनि ॥

४५॥

यदि आप केवल इतना ही कहें, ‘मुझे स्मरण नहीं है, तो बाकी मैं निपट लूंगा। मैं तर्क द्वारा उसे तरुण ब्राह्मण को हरा दूंगा।

एत शुनि' विप्रेर चिन्तित हैल मन ।।एकान्त-भावे चिन्ते विप्र गोपाल-चरण ॥

४६॥

जब वृद्ध ब्राह्मण ने यह सुना, तो उसका मन क्षुब्ध हो उठा। असहाय अवस्था में उसने अपना ध्यान गोपाल के चरणकमलों पर एकाग्र किया।

‘मोर धर्म रक्षा पाय, ना मरे निज-जन ।।दुइ रक्षा कर, गोपाल, लैनु शरण' ॥

४७॥

वृद्ध ब्राह्मण ने विनती की, हे प्रभु गोपाल! मैंने आप के चरणकमलों की शरण ली है, अतएव मेरी आपसे यही प्रार्थना है कि मेरे । धर्म की रक्षा करें और साथ ही मेरे आत्मीय जनों को मरने से बचायें।

एइ-मत विप्र चित्ते चिन्तिते लागिल ।आर दिन लघु-विप्र ताँर घरे आइल ॥

४८॥

अगले दिन जब वह ब्राह्मण इस बारे में गम्भीरतापूर्वक विचार कर रहा था, तभी वह तरुण ब्राह्मण उसके घर आया।

आसिजा परम-भक्त्ये नमस्कार करि' ।।विनय करिआ कहे कर दुइ गुड़ि' ॥

४९॥

तरुण ब्राह्मण ने उसके पास आकर सादर प्रणाम किया। फिर अत्यन्त विनीत भाव से हाथ जोड़कर वह इस प्रकार बोला।

‘तुमि मोरे कन्या दिते कर्याछ अङ्गीकार । एबे किछु नाहि कह, कि तोमार विचार' ॥

५०॥

आपने मुझे अपनी कन्या दान करने का वचन दिया है। किन्तु अब आप कुछ नहीं बोल रहे हैं। आपने क्या निर्णय लिया है? एत शुनि' सेइ विप्र रहे मौन धरि' ।।ताँर पुत्र मारिते आइल हाते ठेङ्गा करि' ॥

५१॥

तरुण ब्राह्मण द्वारा ऐसा कहे जाने पर वृद्ध ब्राह्मण मौन रहा। इस अवसर का लाभ उठाकर वृद्ध ब्राह्मण का पुत्र उस तरुण ब्राह्मण को मारने के लिए लाठी लेकर तुरन्त बाहर निकल आया।

'आरे अधम! मोर भग्नी चाह विवाहिते ।। वामन हा चाँद ग्रेन चाह त' धरिते' ॥

५२॥

पुत्र ने कहा, अरे नीच! तू मेरी बहन के साथ इस प्रकार विवाह करना चाहता है, जैसे कोई बौना व्यक्ति चाँद को पकड़ना चाहता हो! ठेला देखि' सेइ विप्र पलाञा गेल ।। आर दिन ग्रामेर लोक एकत्र करिल ॥

५३॥

उसके हाथ में लाठी देखकर बेचारा तरुण ब्राह्मण भाग गया। किन्तु अगले दिन उसने गाँव के सारे लोगों को एकत्र किया।

सब लोक बड़-विप्रे डाकिया आनिल ।। तबे सेइ लघु-विप्र कहिते लागिल ॥

५४॥

तब गाँव के सभी लोगों ने वृद्ध ब्राह्मण को सभा-स्थल पर बुलाया। तत्पश्चात् तरुण ब्राह्मण ने उनके समक्ष कहना शुरू किया।

‘इँह मोरे कन्या दिते कर्याछे अङ्गीकार ।एबे ये ना देन, पुछ इँहार व्यवहार' ॥

५५॥

इन महाशय ने अपनी कन्या मुझे देने का वचन दिया था, किन्तु अब ये अपना वचन नहीं निभा रहे हैं। कृपया इनसे इनके इस व्यवहार के विषय में पूछे।

तबे सेइ विप्रेरे पुछिल सर्व-जन ।।‘कन्या केने ना देह, यदि दियाछ वचन' ॥

५६॥

वहाँ पर एकत्रित सभी लोगों ने वृद्ध ब्राह्मण से पूछा, यदि पहले आप कन्यादान का वचन दे चुके हैं तो अपना वादा पूरा क्यों नहीं कर रहे हैं? आपने वचन दे रखा है। वृद्ध ब्राह्मण ने कहा, हे मित्रों, कृपया मेरा निवेदन सुनें। मुझे ठीक से स्मरण नहीं है कि मैंने ऐसा कोई वचन दिया था।

विप्र कहे,–'शुन, लोक, मोर निवेदन ।कबे कि बलियाछि, मोर नाहिक स्मरण' ॥

५७॥

वृद्ध ब्राह्मण ने कहा, हे मित्रों, कृपया मेरा निवेदन सुनें। मुझे ठीक से स्मरण नहीं है कि मैंने ऐसा कोई वचन दिया था।

एत शुनि' ताँर पुत्र वाक्य-च्छल पाजा ।प्रगल्भ हइया कहे सम्मुखे आसिजा ॥

५८॥

जब वृद्ध ब्राह्मण के पुत्र ने यह सुना, तो उसे शब्दों को तोड़नेमरोड़ने का अवसर मिल गया। वह सभा के समक्ष अत्यन्त धृष्टतापूर्वक खड़ा हो गया और इस प्रकार बोला।

‘तीर्थ-यात्राय पितार सङ्गे छिल बहु धन ।।धन देखि एइ दुष्टेर लैते हैल मन ॥

५९॥

जगह-जगह की तीर्थयात्रा करते समय मेरे पिता अपने साथ प्रचुर धन ले गये थे। इस धूर्त ने उस धन को ले लेने की ठान ली।

आर केह सङ्गे नाहि, एइ सङ्गे एकल ।। धुतुरा खाओयाञा बापे करिल पागल ॥

६०॥

मेरे पिता के साथ इसके अतिरिक्त अन्य कोई नहीं था। इस धूर्त ने मेरे पिता को धतूरा खिलाकर पागल बना दिया।

सब धन लञा कहे-‘चोरे लइल धन' ।। ‘कन्या दिते चाहियाछे'–उठाइल वचन ॥

६१ ॥

इस धूर्त ने मेरे पिता का सारा धन लेकर यह कह दिया कि उसे कोई चोर ले गया। अब वह यह दावा कर रहा है कि मेरे पिता ने उसे अपनी कन्या दान करने का वचन दिया है।

तोमरा सकल लोक करह विचारे । ‘मोर पितार कन्या दिते ग्रोग्य कि इहारे' ॥

६२॥

। यहाँ पर एकत्र आप सभी लोग सज्जन हैं। कृपया यह विचार करें क्या इस दरिद्र ब्राह्मण को मेरे पिता का कन्यादान उचित होगा? एत शुनि' लोकेर मने हइल संशय ।।‘सम्भवे,—धन-लोभे लोक छाड़े धर्म-भय' ॥

६३॥

ये सब तर्क सुनकर वहाँ पर एकत्र सारे लोग कुछ कुछ शंकित हो। गये। उन्होंने सोचा कि यह सम्भव है कि धन के लोभ से कोई अपना धर्म छोड़ दे।

तबे छोट-विप्र कहे, शुन, महाजन ।।न्याय जिनिबारे कहे असत्य-वचन ॥

६४॥

। उस समय तरुण ब्राह्मण ने कहा, हे सज्जनों, कृपया मेरी बात सुनें। तर्क में जीतने के लिए ही यह व्यक्ति झूठ बोल रहा है।

एइ विप्र मोर सेवाय तुष्ट ग्रबे हैला ।'तोरे आमि कन्या दिब' आपने कहिला ॥

६५॥

मेरी सेवा से अत्यधिक सन्तुष्ट होकर इस ब्राह्मण ने स्वेच्छा से मुझसे कहा कि, मैं तुम्हें अपनी कन्या दान करने का वचन देता हूँ।

तबे मुञि निषेधिनु, शुन, द्विज-वर ।।तोमार कन्यार योग्य नहि मुजि वर ॥

६६॥

। उस समय मैंने इनसे यह कहते हुए ऐसा करने से मना किया, हे। ब्राह्मण-श्रेष्ठ, मैं आपकी पुत्री के लिए योग्य वर नहीं हूँ।

काहाँ तुमि पण्डित, धनी, परम कुलीन ।।काहाँ मुञि दरिद्र, मूर्ख, नीच, कुल-हीन ॥

६७॥

कहाँ आप पंडित, धनी और उच्च कुली के व्यक्ति! कहाँ मैं एक गरीब, अशिक्षित तथा कुलहीन व्यक्ति।'

तबु एइ विप्र मोरे कहे बार बार ।।तोरे कन्या दिलँ, तुमि करह स्वीकार ॥

६८॥

फिर भी इस ब्राह्मण ने हठ किया। इन्होंने बारम्बार मुझसे यह कहते हुए प्रस्ताव स्वीकार करने को कहा, 'मैंने तुम्हें अपनी कन्या दे दी। तुम उसे स्वीकार करो।'

तबे आमि कहिलाँ–शुन, महा-मति । तोमार स्त्री-पुत्र-ज्ञातिर ना हबे सम्मति ॥

६९॥

तब मैंने कहा, 'कृपया मेरी बात सुनिये। आप विद्वान ब्राह्मण हैं। आपकी पत्नी, आपके मित्र तथा सम्बन्धी इस प्रस्ताव से कभी भी सहमत नहीं होंगे।

कन्या दिते नारिबे, हबे असत्य-वचन ।। पुनरपि कहे विप्र करिया ग्रतन ॥

७० ॥

मान्यवर, आप अपना वचन निभा नहीं पायेंगे। अतः आपका वचन अंग होगा।' फिर भी ये ब्राह्मण अपने वचन पर बारम्बार बल देते रहे।

कन्या तोरे दिलँ, द्विधा ना करिह चिते । आत्म-कन्या दिब, केबा पारे निषेधिते ॥

७1॥

मैंने तुम्हें कन्यादान दिया है। संकोच मत करो। वह मेरी पुत्री है और । मैं उसे तुम्हें दूंगा। भला मुझे कौन मना कर सकता है?' तबे आमि कहिलाँ दृढ़ करि' मन । गोपालेर आगे कह ए-सत्य वचन ॥

७२॥

उस समय मैंने अपना मन दृढ़ किया और ब्राह्मण से विनती की कि वे गोपाल-विग्रह के समक्ष वचन दें।

तबे इँहो गोपालेर आगेते कहिल ।। तुमि जान, एइ विप्रे कन्या आमि दिल ॥

७३॥

तब इस महाशय ने गोपाल-विग्रह के समक्ष कहा, 'हे प्रभु, आप साक्षी हैं। मैंने अपनी कन्या इस ब्राह्मण को दान दे दी है।

तबे आमि गोपालेरे साक्षी करिजा ।। कहिलाँ ताँर पदे मिनति करिञा ॥

७४॥

तब मैंने गोपाल-विग्रह को अपना साक्षी बनाकर उनके चरणकमलों में इस प्रकार निवेदन किया।

यदि एइ विप्र मोरे ना दिबे कन्या-दान ।। साक्षी बोलाइमु तोमाय, हइओ सावधान ॥

७५ ॥

यदि बाद में ये ब्राह्मण अपनी कन्या मुझे देने में संकोच करेंगे, तो मैं आपको साक्षी के रूप में बुलाऊँगा। कृपया इसे सावधान होकर सुनें।'

एइ वाक्ये साक्षी मोर आछे महाजन । ग्राँर वाक्य सत्य करि माने त्रिभुवन ॥

७६॥

इस तरह इस घटना में मैंने एक महापुरुष का आवाहन किया है। मैंने पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को मेरा साक्षी बनने को कहा है। भगवान् के वचनों को तीनों लोक सत्य मानते हैं।

तबे बड़-विप्र कहे, एइ सत्य कथा । गोपाल यदि साक्षी देन, आपने आसि' एथा ॥

७७॥

तबे कन्या दिब आमि, जानिह निश्चय ।ताँर पुत्र कहे,–'एइ भाल बात हय' ॥

७८ ॥

। इस अवसर का लाभ उठाते हुए वृद्ध ब्राह्मण ने तुरन्त पुष्टि की कि यह वास्तव में सच है। उसने कहा, यदि स्वयं गोपाल साक्षी के रूप में यहाँ तक चलकर आयें, तो मैं इस तरुण ब्राह्मण को अपनी कन्या दान दे दूंगा। उस वृद्ध ब्राह्मण के पुत्र ने तुरन्त ही यह कहकर पुष्टि की, हाँ, यह बहुत ही उत्तम प्रस्ताव है।

बड़-विप्रेर मने,–'कृष्ण बड़ दयावान् ।अवश्य मोर वाक्य तेंहो करिबे प्रमाण' ॥

७९॥

उस वृद्ध ब्राह्मण ने सोचा, चूंकि भगवान् कृष्ण अत्यन्त दयालु हैं, वे निश्चय ही मेरे कथन को प्रमाणित करने हेतु आयेंगे।

पुत्रेर मने,–'प्रतिमा ना आसिबे साक्षी दिते' । एई बुद्ध्ये दुइ-जन हइला सम्मते ॥

८०॥

नास्तिक पुत्र ने सोचा, गोपाल के लिए यह सम्भव नहीं कि वे आकर साक्षी दें। ऐसा सोचकर पिता तथा पुत्र दोनों सहमत हो गये।

छोट-विप्र बले,—पत्र करह लिखन। पुनः ग्रेन नाहि चले ए-सब वचन' ॥

८१॥

तरुण विप्र ने अवसर पाकर कहा, कृपया यह बात एक कागज पर स्पष्ट रूप से लिख दें, जिससे फिर आप अपने वचनों को बदल न सकें।

तबे सब लोक मेलि' पत्र त' लिखिल । मुँहार सम्मति लञा मध्यस्थ राखिल ॥

८२॥

वहाँ पर एकत्र सारे लोगों ने यह बात कागज पर स्पष्ट रूप से अंकित करा दी और उन दोनों के हस्ताक्षर लेकर वे मध्यस्थ बन गये।

तबे छोट-विप्र कहे,—शुन, सर्व-जन । एइ विप्र सत्य-वाक्य, धर्म-परायण ॥

८३॥

तब तरुण ब्राह्मण ने कहा,यहाँ पर एकत्र सारे लोग कृपया मेरी बात सुनेंगे? यह वृद्ध ब्राह्मण निस्सन्देह सत्यवादी हैं और धर्म का पालन करने वाले हैं।

स्व-वाक्य छाड़िते इँहार नाहि कभु मन ।। स्वजन-मृत्यु-भये कहे असत्य-वचन ॥

८४॥

वे अपना वचन भंग करना नहीं चाहते थे, किन्तु इस भय से कि उसके सम्बन्धी आत्महत्या न कर लें, सत्य के पथ से विचलित हो गये।

इँहार पुण्ये कृष्णे आनि' साक्षी बोलाइब ।।तबे एइ विप्रेर सत्य-प्रतिज्ञा राखिब ॥

८५॥

मैं इस ब्राह्मण के पुण्य के बल पर भगवान् को साक्षी के रूप में बुलाऊँगा और इसके सत्य वचन की रक्षा करूंगा।

एत शुनि' नास्तिक लोक उपहास करे ।केह बले, ईश्वर दयालु, आसितेह पारे ॥

८६॥

उस तरुण विप्र के ऐसे दृढ़ वचन सुनकर उस सभा में उपस्थित कुछ नास्तिक उसका उपहास करने लगे। किन्तु किसी एक ने कहा, अन्ततः ईश्वर दयालु हैं और चाहें तो आ सकते हैं।

तबे सेइ छोट-विप्र गेला वृन्दावन ।।दण्डवत्करि' कहे सब विवरण ॥

८७॥

सभा समाप्त होने पर वह तरुण ब्राह्मण वृन्दावन के लिए चल पड़ा। वहाँ पहुँचकर सर्वप्रथम उसने विग्रह को सादर दंडवत् प्रणाम किया और फिर विस्तार से सारा वृत्तान्त कह सुनाया।

ब्रह्मण्य-देव तुमि बड़ दया-मय ।दुइ विप्रेर धर्म राख हा सदय ॥

८८॥

उसने कहा, हे प्रभु, आप ब्राह्मण संस्कृति के रक्षक हैं और आप अत्यन्त दयावान भी हैं। अतएव आप हम दोनों ब्राह्मणों के धर्म की रक्षा करके अपनी परम दया प्रदर्शित करें।

कन्या पाब,—मोर मने इहा नाहि सुख ।ब्राह्मणेर प्रतिज्ञा ग्राय एई बड़े दुःख ॥

८९॥

हे प्रभु, मैं उसकी कन्या को पत्नी रूप में पाकर सुखी बनने की बात नहीं सोच रहा। मैं तो यह सोच रहा हूँ कि उस ब्राह्मण ने अपना वचन तोड़ा है-यही बात मुझे अत्यधिक पीड़ा पहुँचा रही है।"

एत जानि' तुमि साक्षी देह, दया-मय ।।जानि' साक्षी नाहि देय, तार पाप हय ॥

९० ॥

उस तरुण ब्राह्मण ने आगे कहा, हे प्रभु, आप अत्यन्त कृपालु तथा सर्वज्ञ हैं। अतएव कृपया इस मामले में साक्षी बनें। जो व्यक्ति सही बातें जानते हुए भी साक्षी नहीं बनता, वह पापकर्म का भागी होता है।

कृष्ण कहे, विप्र, तुमि ग्राह स्व-भवने । सभा करि' मोरे तुमि करिह स्मरणे ॥

९१॥

कृष्ण ने उत्तर दिया, हे ब्राह्मण, तुम अपने घर लौट जाओ और वहाँ सारे लोगों को बुलाकर एक सभा करो। उस सभा में तुम मेरा स्मरण मात्र करना।

आविर्भाव हा आमि ताहाँ साक्षी दिब । तबे दुइ विप्रेर सत्य प्रतिज्ञा राखिब ॥

९२॥

मैं वहाँ निश्चित रूप से प्रकट होऊँगा और उस समय मैं दिए हुए वचन का साक्षी बनकर तुम दोनों के सम्मान की रक्षा करूंगा।

विप्र बले, यदि हओ चतुर्भुज-मूर्ति ।। तबु तोमार वाक्ये कारु ना हबे प्रतीति ॥

९३॥

तरुण ब्राह्मण ने उत्तर दिया, हे प्रभु, भले ही आप चतुर्भुज विष्णु । रूप में क्यों न प्रकट हों, तब भी उन लोगों में से कोई भी आपके वाक्यों पर विश्वास नहीं करेगा।

एइ मूर्ति गिया यदि एइ श्री-वदने । साक्षी देह यदि तबे सर्व-लोक शुने ॥

९४॥

किन्तु यदि आप इसी गोपाल-रूप में वहाँ चलें और अपने श्रीमुख से कहें, तभी आपकी साक्षी सभी लोगों द्वारा सुनी जायेगी।

कृष्ण कहे, प्रतिमा चले, कोथाह ना शुनि ।।विप्र बले,–प्रतिमा हञा कह केने वाणी ॥

९५॥

। भगवान् कृष्ण ने कहा, मैंने आज तक किसी विग्रह को एक स्थान से दूसरे स्थान तक चलकर जाते नहीं सुना। ब्राह्मण ने कहा, यह सत्य है, किन्तु यह कैसे सम्भव हो रहा है कि आप विग्रह होकर भी मुझसे बातें कर रहे हैं।

प्रतिमा नह तुमि साक्षात्व्रजेन्द्र-नन्दन । विप्र लागि' कर तुमि अकार्य-करण ॥

१६॥

। । हे प्रभु, आप मूर्ति नहीं हैं, आप तो साक्षात् महाराज नन्द के पुत्र हैं। आप उस वृद्ध ब्राह्मण के लिए आप ऐसा कुछ कर सकते हैं, जो आपने अभी तक न किया हो।

हासिबा गोपाल कहे,–शुनह, ब्राह्मण । तोमार पाछे पाछे आमि करिब गमन ॥

९७॥

श्री गोपाल ने मुस्कराते हुए कहा, हे प्रिय ब्राह्मण, मेरी बात सुनो। मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चलूंगा और इस तरह तुम्हारे साथ चलूंगा।

उलटिया आमा तुमि ना करिह दरशने । आमाके देखिले, आमि रहिब सेइ स्थाने ॥

९८॥

भगवान् ने कहा, तुम मुझे मुड़कर देखने का प्रयत्न मत करना। अन्यथा तुम ज्योंहीं मेरी ओर देखोगे, मैं उसी स्थान पर स्थिर हो जाऊँगा।

नूपुरेर ध्वनि-मात्र आमार शुनिबा । सेइ शब्दे आमार गमन प्रतीति करिबा ॥

९९॥

। तुम मेरे नुपुर की ध्वनि से जानोगे कि मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चल रहा हूँ।

एक-सेर अन्न रान्धि' करिह समर्पण ।। ताहा खाजा तोमार सङ्गे करिब गमन ॥

१००॥

प्रतिदिन एक किलो चावल पकाकर मुझे अर्पित करना। मैं उसी चावल को खाऊँगा और तुम्हारे पीछे-पीछे चलूंगा।

आर दिन आज्ञा मागि' चलिला ब्राह्मण । तार पाछे पाछे गोपाल करिला गमन ॥

१०१॥

अगले दिन ब्राह्मण ने गोपाल से आज्ञा माँगी और वह अपने देश के लिए चल पड़ा। गोपाल भी उसके पीछे-पीछे चल पड़े।

नूपुरेर ध्वनि शुनि' आनन्दित मन ।। उत्तमान्न पाक करि' कराय भोजन ॥

१०२॥

जब गोपाल उस तरुण ब्राह्मण के पीछे चल रहे थे, तो उनके नुपुरों की रूनझुन ध्वनि सुनाई पड़ने लगी। वह ब्राह्मण अत्यधिक प्रसन्न हुआ और उसने उत्तम चावल गोपाल के भोग के लिए पकाया।

एइ-मते चलि' विप्र निज-देशे आइला ।। ग्रामेर निकट आसि' मनेते चिन्तिला ॥

१०३ ॥

इस प्रकार यह तरुण ब्राह्मण चलता रहा, जब तक कि वह अपने देश में नहीं पहुँच गया। जब वह अपने गाँव के निकट पहुँचा, तो वह इस प्रकार सोचने लगा।

‘एबे मुजि ग्रामे आइनु, ग्राइमु भवन । लोकेरे कहिब गिया साक्षीर आगमन ॥

१०४॥

अब मैं अपने गाँव पहुँच चुका हूँ और अपने घर जाकर सभी लोगों को बतलाऊँगा कि साक्षी आ गया है।

साक्षाते ना देखिले मने प्रतीति ना हय ।।इहाँ ग्रदि रहेन, तबु नाहि किछु भय' ॥

१०५ ॥

उस ब्राह्मण ने सोचा कि यदि गाँव वाले गोपाल-विग्रह का प्रत्यक्ष दर्शन नहीं करेंगे, तो उन्हें विश्वास नहीं होगा कि गोपाल आ गये हैं। उसने सोचा, किन्तु यदि गोपाल यहीं पर ही रह जाएँ, तो भी डर की कोई बात नहीं है।

एत भावि' सेइ विप्र फिरिया चाहिल । हासिआ गोपाल-देव तथाय रहिल ॥

१०६॥

तब उस ब्राह्मण ने अपने गाँव जाकर सबको गोपाल के आगमन की जानकारी दी। यह सुनकर सारे लोग आश्चर्यचकित हो उठे।

ब्राह्मणेरे कहे,–तुमि ग्राह निज-घर । एथाय रहिब आमि, ना ग्राब अत:पर ॥

१०७॥

भगवान् ने ब्राह्मण से कहा, अब तुम घर जा सकते हो। मैं यहीं रुकेंगा और कहीं नहीं जाऊँगा।

तबे सेइ विप्र झाइ नगरे कहिल। शुनिआ सकल लोक चमत्कार हैल ॥

१०८॥

यह सोचकर वह देखने के लिए पीछे मुड़ा और उसने देखा कि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् गोपाल मुसकाते हुए वहाँ खड़े थे।

आइल सकल लोक साक्षी देखिबारे ।गोपाल देखि लोक दण्डवत् करे ॥

१०९॥

गाँव के सारे वासी साक्षीगोपाल को देखने गये और जब उन्होंने सचमुच भगवान् को खड़े देखे, तो सबने उन्हें सादर दंडवत् प्रणाम किया।

गोपाल-सौन्दर्य देखि' लोके आनन्दित ।प्रतिमा चलिञा आइला, शुनिआ विस्मित ॥

११०॥

लोग गोपाल की सुन्दरता देखकर अत्यधिक प्रसन्न थे और जब उन लोगों ने यह सुना कि वे सचमुच चलकर आये हैं, तो उन सबके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

तबे सेइ बड़-विप्र आनन्दित हजा।गोपालेर आगे पड़े दण्डवत् हा ॥

१११॥

तब वह वृद्ध ब्राह्मण भी परम आनन्दित होकर गोपाल के सआया और तुरन्त ही दण्ड के समान पृथ्वी पर गिर पड़ा।

सकल लोकेर आगे गोपाल साक्षी दिल ।बड़-विप्र छोट-विप्रे कन्या-दान कैल ॥

११२॥

इस तरह गाँव-भर के निवासियों के समक्ष गोपाल इसके साक्षी कि उस वृद्ध ब्राह्मण ने तरुण ब्राह्मण को अपनी कन्या दान में दी थी।

तबे सेइ दुई विप्रे कहिल ईश्वर ।।तुमि-दुइ–जन्मे-जन्मे आमार किङ्कर ॥

११३॥

विवाह सम्पन्न हो जाने के बाद भगवान् ने उन दोनों ब्राह्मण बतलाया, तुम दोनों ब्राह्मण जन्म-जन्मांतर से मेरे सनातन दास हो।

मुँहार सत्ये तुष्ट हइलाँ, मुँहे माग' वर ।।दुइ-विप्र वर मागे आनन्द-अन्तर ॥

११४॥

भगवान् ने कहा, मैं तुम दोनों की सच्चाई से अतीव प्रसन्न हुआ हूँ। अब तुम वर माँग सकते हो। इस तरह दोनों ब्राह्मणों ने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक वर माँगा।

यदि वर दिबे, तबे रह एइ स्थाने ।किङ्करेरे दया तव सर्व-लोके जाने ॥

११५॥

उन ब्राह्मणों ने कहा, कृपा करके आप यहीं रहें, जिससे सारे संसार के लोग जान सकें कि आप अपने सेवकों पर कितने कृपालु हैं।

गोपाल रहिला, मुँहे करेन सेवन । देखिते आइला सब देशेर लोक-जन ॥

११६॥

भगवान् गोपाल वहीं रहने लगे और दोनों ब्राह्मण उनकी सेवा में लग गये। यह घटना सुनकर विभिन्न देशों से अनेक लोग गोपाल का दर्शन मरने के लिए आने लगे।

से देशेर राजा आइल आश्चर्य शुनि । परम सन्तोष पाइल गोपाले देखिञा ॥

११७॥

अन्त में उस देश के राजा ने यह आश्चर्यजनक कथा सुनी, तो वह भी गोपाल का दर्शन करने के लिए आया और अत्यन्त सन्तुष्ट हुआ।

मन्दिर करिया राजा सेवा चालाइल ।। ‘साक्षि-गोपाल' बलि' ताँर नाम ख्याति हैल ॥

११८॥

उस राजा ने एक सुन्दर मन्दिर बनवा दिया और नियमित सेवा प्रारम्भ करवाई। गोपाल साक्षीगोपाल के नाम से अत्यन्त विख्यात हो गये।

एइ मत विद्यानगरे साक्षि-गोपाल । सेवा अङ्गीकार करि' आछेन चिर-काल ॥

११९॥

इस प्रकार साक्षीगोपाल ने विद्यानगर में रहकर दीर्घकाल तक सेवा स्वीकार की।

उत्कलेर राजा पुरुषोत्तम-देव नाम ।सेइ देश जिनि' निल करिया सङ्ग्राम ॥

१२० ॥

बाद में युद्ध हुआ जिसमें उड़ीसा के राजा पुरुषोत्तम देव ने इस देश को जीत लिया।

सेइ राजा जिनि' निल ताँर सिंहासन ।‘माणिक्य-सिंहासन' नाम अनेक रतन ॥

१२१॥

। । उस राजा ने विद्यानगर के राजा को हरा दिया और उसके माणिक्य सिंहासन' नामक सिंहासन को अपने अधिकार में कर लिया, जिसमें अनेक रत्न जड़े हुए थे।

पुरुषोत्तम-देव सेइ बड़ भक्त आर्य । गोपाल-चरणे मागे,–'चल मोर राज्य' ॥

१२२॥

उस राजा का नाम पुरुषोत्तम देव था। वह महान् भक्त था और आई। सभ्यता में अग्रसर था। उसने गोपाल के चरणकमलों पर याचना की, कृपा करके मेरे राज्य में चलें।

ताँर भक्ति-वशे गोपाल तौरै आज्ञा दिल ।। गोपाल लइया सेइ कटके आइल ॥

१२३॥

जब राजा ने गोपाल से अपने राज्य में चलने के लिए प्रार्थना की, तो गोपाल ने उसकी भक्ति के वश में होकर उसकी प्रार्थना स्वीकार का ली। इस तरह गोपाल-विग्रह को वह राजा अपने साथ लेकर कटक लौह गया।

जगन्नाथे आनि' दिल माणिक्य-सिंहासन ।। कटके गोपाल-सेवा करिल स्थापन ॥

१२४॥

माणिक्य सिंहासन को जीतकर राजा पुरुषोत्तम देव उसे जगन्नाथ पुरी ले आया और उसने उसे जगन्नाथ भगवान् को समर्पित कर दिया। इस पीच उसने कटक में गोपाल की नियमित पूजा भी स्थापित की।

ताँहार महिषी आइला गोपाल-दर्शने । भक्ति करि' बहु अलङ्कार कैल समर्पणे ॥

१२५॥

जब गोपाल-विग्रह की स्थापना कटक में हो गई, तो पुरुषोत्तम देव की रानी उनका दर्शन करने गईं और उसने अत्यन्त भक्ति के साथ अनेक प्रकार के आभूषण भेंट किये।

ताँहार नासाते बहु-मूल्य मुक्ता हय । ताहा दिते इच्छा हैल, मनेते चिन्तय ॥

१२६॥

रानी ने अपनी नाक में अति मूल्यवान मोती पहन रखा था, जिसे वह गोपाल को भेंट करना चाह रही थी। तब वह इस प्रकार सोचने लगी।

ठाकुरेर नासाते ग्रदि छिद्र थाकित । तबे एइ दासी मुक्ती नासाय पराइत ॥

१२७॥

। यदि विग्रह की नाक में छेद होता, तो मैं अपना मोती उन्हें पहना सकती थी।

एत चिन्ति' नमस्करि' गेला स्व-भवने । रात्रि-शेषे गोपाल ताँरे कहेन स्वपने ॥

१२८॥

यह विचार करके रानी ने गोपाल को नमस्कार किया और वह अपने महल लौट आई। उस रात उसने सपना देखा कि गोपाल प्रकट हुए हैं। और उससे कह रहे हैं।

बाल्य-काले माता मोर नासा छिद्र करि' । मुक्ता पराञाछिल बहु ग्रन करि' ॥

१२९॥

बचपन में मेरी माता ने मेरी नाक में छेद करके उसमें बड़े यत्न से एक मोती पहनाया था।

सेइ छिद्र अद्यापिह आछये नासाते ।सेइ मुक्ता पराह, ग्राहा चाहियाछ दिते ॥

१३०॥

वह छेद अब भी है। चाहो तो तुम इस छेद का प्रयोग उस मोती को पहनाने के लिए कर सकती हो जिसे तुम मुझे देना चाहती थी।

स्वप्ने देखि' सेइ राणी राजाके कहिल । राजा-सह मुक्ता लञा मन्दिरे आइल ॥

१३१॥

यह सपना देखने के बाद रानी ने अपने राजा पति से इसकी चर्चा की। तब राजा तथा रानी दोनों ही वह मोती लेकर मन्दिर में गये।

पराइल मुक्ता नासाय छिद्र देखिञा ।महा-महोत्सव कैल आनन्दित हा ॥

१३२॥

विग्रह की नाक में छेद देखकर उन्होंने वह मोती वहाँ पहना दिया और अत्यधिक प्रसन्न होकर उन्होंने विशाल उत्सव का आयोजन किया।

सेइ हैते गोपालेर कटकेते स्थिति ।।एइ लागि ‘साक्षि-गोपाल' नाम हैल ख्याति ॥

१३३॥

। तभी से गोपाल कटक नगर में विराजमान हैं और तभी से वे साक्षीगोपाल नाम से विख्यात हैं।

नित्यानन्द-मुखे शुनि' गोपाल-चरित ।।तुष्ट हैला महाप्रभु स्वभक्त-सहित ॥

१३४॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोपाल की लीलाओं को सुना। इससे वे तथा उनके भक्त अत्यन्त सन्तुष्ट हुए।

गोपालेर आगे बे प्रभुर हय स्थिति ।।भक्त-गणे देखे ग्रेन हे एक-मूर्ति ॥

१३५ ॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु गोपाल-विग्रह के समक्ष बैठे हुए थे, तो सारे भक्तों ने उन्हें तथा विग्रह को एकरूप देखा।

मुँहे—एक वर्ण, मुँहे प्रकाण्ड-शरीर ।मुँहे रक्ताम्बर, मुँहार स्वभाव-गम्भीर ॥

१३६॥

दोनों एक ही वर्ण के तथा एक जैसे विराट शरीर वाले थे। दोनों ने केसरिया वस्त्र पहन रखा था और दोनों ही गम्भीर थे।

महा-तेजोमय है कमल-नयन ।मुँहार भावावेश, मुँहे–चन्द्र-वदन ॥

१३७॥

भक्तों ने देखा कि चैतन्य महाप्रभु तथा गोपाल दोनों ही दीप्तिमान तेज से युक्त थे और दोनों के नेत्र कमल जैसे थे। दोनों ही भाव में मग्न थे और उनके मुखमण्डल पूर्णचन्द्रमा सदृश थे।

मुँहा देखि' नित्यानन्द-प्रभु महा-रङ्गे।। ठाराठारि करि' हासे भक्त-गण-सङ्गे ॥

१३८॥

जब श्री नित्यानन्द ने श्री चैतन्य महाप्रभु तथा गोपाल-विग्रह दोनों को इस तरह देखा, तो वे भक्तों से परिहास करने लगे जो सबके सब मुस्कुरा रहे थे।

एइ-मत महा-रङ्गे से रात्रि वञ्चिया ।प्रभाते चलिला मङ्गल-आरति देखिञा ॥

१३९॥

इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु ने मन्दिर में वह रात बड़े ही आनन्द से बिताई। प्रातःकालीन मंगल आरती देखने के बाद उन्होंने अपनी यात्रा आरम्भ की।

भुवनेश्वर-पथे ग्रैछे कैल दरशन । विस्तारि' वणियाछेन दास-वृन्दावन ॥

१४०॥

श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने ( अपनी पुस्तक चैतन्य भागवत में) श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा भुवनेश्वर जाते समय देखे गये स्थानों का विस्तार से वर्णन किया है।

कमलपुरे आसि भार्गीनदी-स्नान कैल।।नित्यानन्द-हाते प्रभु दण्ड धरिल ॥

१४१॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु कमलपुर पहुँचे, तो उन्होंने भार्गीनदी में स्नान किया। स्नानार्थ जाते समय वे अपना संन्यास-दंड नित्यानन्द प्रभु को देते गये।

कपोतेश्वर देखिते गेला भक्त-गण सङ्गे। एथा नित्यानन्द-प्रभु कैल दण्ड-भङ्गे ॥

१४२॥

तिने खण्ड करि' दण्ड दिल भासा ।।भक्त-सङ्गे आइला प्रभु महेश देखिञा ॥

१४३॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु कपोतेश्वर नामक शिव-मन्दिर में गये, तब नित्यानन्द प्रभु ने अपने पास रखे उनके संन्यास-दण्ड के तीन खण्ड करके भार्गी नदी में फेंक दिया। बाद में यह नदी दण्ड-भांगा-नदी कहलाने लगी।

जगन्नाथेर देउल देखि' आविष्ट हैला ।दण्डवत्करि प्रेमे नाचिते लागिला ॥

१४४॥

दूर से ही जगन्नाथ के मन्दिर को देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु तुरन्त भावाविष्ट हो गये। मन्दिर को दंडवत् प्रणाम करने के बाद वे प्रेमावेश में नृत्य करने लगे।

भक्त-गण आविष्ट हबा, सबे नाचे गाय।। प्रेमावेशे प्रभु-सङ्गे राज-मार्गे ग्राये ॥

१४५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ साथ सारे भक्त भी भावाविष्ट हो गये और इस तरह भगवत्प्रेम में मग्न होकर वे मुख्य मार्ग पर जाते हुए नाचने तथा गाने लगे।

हासे, कान्दे, नाचे प्रभु हुङ्कार गर्जन । तिन-क्रोश पथ हैल—सहस्र ग्रोजन ॥

१४६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु हँसते, रोदन करते, नाचते तथा भाव में आकर हुँकार कर रहे थे। यद्यपि मन्दिर केवल छह मील दूरी पर था, किन्तु उन्हें यह दूरी हजारों मील लगी।

चलिते चलते प्रभु आइला 'आठारनाला' ।ताहाँ आसि' प्रभु किछु बाह्य प्रकाशिला ॥

१४७॥

इस तरह चलते-चलते महाप्रभु आठारनाला नामक स्थान पर पहुँचे। वहाँ आकर उन्होंने श्री नित्यानन्द प्रभु से बातें करते हुए अपनी बाह्य चेतना व्यक्त की।

नित्यानन्दे कहे प्रभु,—देह मोर दण्ड ।।नित्यानन्द बले, दण्ड हैल तिन खण्ड ॥

१४८॥

। जब श्री चैतन्य महाप्रभु को बाह्य चेतना आई, तो उन्होंने श्री नित्यानन्द प्रभु से कहा, मेरा दण्ड लौटा दो। तब नित्यानन्द प्रभु ने उत्तर दिया, उसके तो तीन खण्ड हो गये हैं।

प्रेमावेशे पड़िला तुमि, तोमारे धरिनु ।तोमा-सह सेइ दण्ड-उपरे पड़िनु ॥

१४९॥

नित्यानन्द प्रभु ने कहा, जब आप भावावेश में गिरे, तो मैंने आपको पकड़ा, किन्तु हम दोनों ही उस दण्ड पर गिर पड़े।

दुइ-जनार भरे दण्ड खण्ड खण्ड हैल ।सेइ खण्ड काँहा पड़िल, किछु ना जानिल ॥

१५०॥

इस तरह वह दण्ड हम लोगों के भार से टूट गया। मैं नहीं जानता कि उसके टुकड़े कहाँ गये।

मोर अपराधे तोमार दण्ड हइल खण्ड ।ये उचित हय, मोर कर तार दण्ड ॥

१५१॥

आपका दण्ड निश्चित रूप से मेरे अपराध के कारण टूटा है। अब आप जो उचित समझें, मुझे दण्ड दें।

शुनि' किछु महाप्रभु दुःख प्रकाशिला ।।ईषत् क्रोध करि' किछु कहिते लागिला ॥

१५२॥

जिस तरह से उनका दण्ड टूटा था, उसकी कहानी सुनकर महाप्रभु ने थोड़ा दुःख प्रकट किया और कुछ क्रोध में आकर वे इस प्रकार बोले।

नीलाचले आनि' मोर सबे हित कैला ।। सबे दण्ड-धन छिल, ताहा नो राखिला ॥

१५३ ॥

चैतन्य महाप्रभु ने कहा, आप लोगों ने मुझे नीलांचल लाकर मुझ पर उपकार किया है। किन्तु वह दण्ड मेरा एकमात्र धन था, जिसे आप लोग संभालकर नहीं रख पाये।

तुमि-सब आगे ग्राह ईश्वर देखिते । किबा आमि आगे ग्राइ, ना ग्राब सहिते ॥

१५४॥

अतएव आप सारे लोग या तो मुझसे पहले या मेरे बाद भगवान् जगन्नाथ का दर्शन करने जाओ। मैं आप लोगों के साथ नहीं जाऊँगा।

मुकुन्द दत्त कहे,—प्रभु, तुमि ग्राह आगे ।।आमि-सब पाछे ग्राब, ना ग्राब तोमार सङ्गे ॥

१५५ ॥

मुकुन्द दत्त ने श्री चैतन्य महाप्रभु से कहा, हे प्रभु, आप आगे आगे चलें और अन्यों को पीछे-पीछे चलने की अनुमति दें। हम आपके साथ। साथ नहीं जायेंगे।

एत शुनि' प्रभु आगे चलिला शीघ्र-गति ।।बुझिते ना पारे केह दुइ प्रभुर मति ॥

१५६॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु अन्य सभी भक्तों के आगे-आगे शीघ्रता से चलने लगे। कोई भी दोनों प्रभुओं-चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन प्रभु-के वास्तविक उद्देश्य को नहीं समझ सका।

इँहो केने दण्ड भाङ्गे, तेंहो केने भाङ्गाय ।भाङ्गाजा क्रोधे तेंहो इँहाके दोषाय ॥

१५७॥

भक्तगण यह नहीं समझ पाये कि नित्यानन्द प्रभु ने दण्ड क्यों तोड़ा, महाप्रभु ने उन्हें ऐसा क्यों करने दिया और ऐसा करने देने के बाद अब महाप्रभु क्रुद्ध क्यों हो गये।

दण्ड-भङ्ग-लीला एइ–परम गम्भीर ।सेइ बुझे, मुँहार पदे ग्राँर भक्ति धीर ॥

१५८॥

दण्डभंग लीला अत्यन्त गम्भीर है। इसे वही समझ सकता है, जिसकी दोनों प्रभुओं के चरणकमलों पर दृढ़ भक्ति हो।

ब्रह्मण्य-देव-गोपालेर महिमा एइ धन्य ।। नित्यानन्द–वक्ता ग्रार, श्रोता-श्री-चैतन्य ॥

१५९॥

ब्राह्मणों पर कृपालु रहने वाले भगवान् गोपाल की महिमा अपार ।। साक्षीगोपाल की यह कथा नित्यानन्द प्रभु द्वारा सुनाई गई और इसके श्रोता थे श्री चैतन्य महाप्रभु।

श्रद्धा-युक्त हा इहा शुने ग्रेइ जन ।।अचिरे मिलये तारे गोपाल-चरण ॥

१६० ॥

जो व्यक्ति श्रद्धा तथा प्रेमपूर्वक गोपाल के इस आख्यान को सुनता है, उसे शीघ्र ही गोपाल के चरणकमल प्राप्त होते हैं।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

१६१॥

श्री रूप और श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा । उनकी कृपा की सदैव कामना करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलते हुए श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

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