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अध्याय दो: श्री चैतन्य महाप्रभु, भगवान के सर्वोच्च व्यक्तित्व

श्री-चैतन्य-प्रभुं वन्दे बालोऽपि यदनुग्रहात् ।तरेन्नाना-मत-ग्राह-व्याप्तं सिद्धान्त-सागरम् ॥

१॥

मैं उन श्री चैतन्य महाप्रभु को नमस्कार करता हूँ, जिनकी कृपा से एक अबोध बालक भी निर्णायक सत्य रूपी सागर को पार कर सकता है, जो विभिन्न सिद्धान्त रूपी मगरों से भरा हुआ है।

कृष्णोत्कीर्तन-गान-नर्तन-कला-पाथोजनि-भ्राजिता सद्भक्तावलि-हंस-चक्र-मधुप-श्रेणी-विहारास्पदम् । कर्णानन्द-कल-ध्वनिर्वहतु मे जिह्वा-मरु-प्राङ्गणे श्री-चैतन्य दयानिधे तव लसल्लीला-सुधा-स्वर्धनी ॥

२॥

हे मेरे दयालु भगवान् श्री चैतन्य! आपकी दिव्य लीलाओं का अमृततुल्य गंगाजल मेरी मरुस्थल जैसी जीभ पर बहता रहे। कृष्ण के पवित्र नाम का उच्च स्वर से कीर्तन, गान, नर्तन रूपी वे कमल के फूल जो अनन्य भक्तों के आनन्द-धाम हैं, इस जल को सुशोभित करने वाले है। ये भक्त हंसों, चक्रवाकों तथा भ्रमरों के तुल्य हैं। नदी के प्रवाह से मधुर पनि उत्पन्न होती है, जो उनके कानों को आनन्दित करती है।

जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

३॥

भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु तथा श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! भताचार्य की जय हो तथा भगवान् गौरांग के भक्तों की जय हो।

तृतीय श्लोकेर अर्थ करि विवरण ।वस्तु-निर्देश-रूप मङ्गलाचरण ॥

४॥

। सर्वप्रथम मैं (प्रथम चौदह श्लोकों में से ) तीसरे श्लोक के अर्थ का र्णन करूंगा। यह एक शुभ ध्वनि है, जो परम सत्य का वर्णन करती है।

ग्रदद्वैतं ब्रह्मोपनिषदि तदप्यस्य तनु-भा। → आत्मान्तर्यामी पुरुष इति सोऽस्यांश-विभवः ।। षडू-ऐश्वर्यैः पूर्णो ग्न इह भगवान्स स्वयमयंन चैतन्याकृष्णाजगति पर-तत्त्वं परमिह ॥

५॥

जिसका वर्णन उपनिषदों में निर्विशेष ब्रह्म के रूप में हुआ है, वह उनके शरीर का तेज मात्र है और परमात्मा के रूप में जाने जाने वाले भगवान् उनके स्थानीय पूर्ण अंश हैं। भगवान् चैतन्य छः ऐश्वर्यों से पूर्ण स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण हैं। वे परम सत्य हैं और अन्य कोई सत्य न उनसे बड़ा है, न उनके समान है।

ब्रह्म, आत्मा, भगवान्– तिने । अङ्ग-प्रभा, अंश, स्वरूप-तिन विधेय-चिह्न ॥

६ ॥

निर्विशेष ब्रह्म, स्थानीय परमात्मा तथा भगवान्-ये तीन उद्देश्य हैं। और चमकदार ज्योति, आंशिक प्राकट्य तथा मूल स्वरूप ये इन तीनों को दष्ट करने वाले क्रमिक लक्षण हैं।

आगे, पाछे विधेय स्थापन । सेइ अर्थ कहि, शुन शास्त्र-विवरण ॥

७॥

विधेय सदैव उद्देश्य के बाद आता है। अब मैं इस श्लोक का अर्थ भात्रों के अनुसार बतलाऊँगा।

स्वयं भगवान्कृष्ण, विष्णु-परतत्त्व । पूर्ण-ज्ञान पूर्णानन्द परम महत्त्व ॥

८॥

भगवान् के आदि स्वरूप कृष्ण सर्वव्यापी विष्णुतत्त्व हैं। वे पूर्ण ज्ञान तथा पूर्ण आनन्द हैं। वे परम दिव्य हैं।

‘नन्द-सुत' बलि' याँरै भागवते गाइ ।।सेइ कृष्ण अवतीर्ण चैतन्य-गोसाजि ॥

९॥

जिन्हें श्रीमद्भागवत नन्द महाराज के पुत्र के रूप में बतलाता है, वही भगवान् चैतन्य के रूप में इस पृथ्वी पर अवतरित हुए हैं।

प्रकाश-विशेषे तेह धरे तिन नाम । ब्रह्म, परमात्मा आर स्वयं-भगवान् ॥

१०॥

अपने विभिन्न प्राकट्यों की दृष्टि से वे तीन पहलूओं में विख्यात हैं, मा भिर्विशेष ब्रह्म, स्थानीय परमात्मा तथा आदि भगवान् कहलाते हैं।

वदन्ति तत्तत्त्व-विदस्तत्त्वं ग्नज्ज्ञानमद्वयम् ।। ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥

११॥

परम सत्य को जानने वाले विद्वान-अध्यात्मवादी कहते हैं कि यह अद्वय ज्ञान तत्त्व है, जो निर्विशेष ब्रह्म, स्थानीय परमात्मा तथा भगवान् कहलाता है।

ताँहार अङ्गेर शुद्ध किरण-मण्डल ।। उपनिषत्कहे ताँरे ब्रह्म सुनिर्मल ॥

१२॥

जिसे उपनिषदें दिव्य निर्विशेष ब्रह्म कहती हैं, वह उन्हीं परम पुरुष के प्रकाशमान तेज का मण्डल है।

चर्म-चक्षे देखे ग्रैछे सूर्य निर्विशेष ।।ज्ञान-मार्गे लैते नारे कृष्णेर विशेष ॥

१३॥

जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपने नग्न नेत्रों से सूर्य को केवल एक चमकीली वस्तु के अतिरिक्त और किसी रूप में नहीं जान सकता, उसी तह केवल दार्शनिक चिन्तन से वह कृष्ण की दिव्य विविधताओं को नहीं समझ सकता।

ग्रस्य प्रभा प्रभवतो जगदण्ड-कोटि कोटीष्वशेष-वसुधादि-विभूति-भिन्नम् । तद्ब्रह्म निष्कलमनन्तमशेष-भूतंगोविन्दमादि-पुरुषं तमहं भजामि ॥

१४॥

मैं उन आदि भगवान् गोविंद की पूजा करता हूँ, जो महान् शक्ति से अन्यत्र हैं। उनके दिव्य स्वरूप का दीप्तिमान तेज निर्विशेष ब्रह्म है, जो म, पूर्ण तथा असीम है और जो करोड़ों ब्रह्माण्डों में असंख्य प्रकार के को उनके विभिन्न ऐश्वर्यों के साथ प्रदर्शित करता है।

कोटी कोटी ब्रह्माण्डे ये ब्रह्मेर विभूति ।।सेइ ब्रह्म गोविन्देर हय अङ्ग-कान्ति ॥

१५॥

( ब्रह्माजी ने कहा :) निर्विशेष ब्रह्म के ऐश्वर्य करोड़ों ब्रह्माण्डों में परिव्याप्त होते हैं। यह ब्रह्म भगवान् गोविन्द का शारीरिक तेज मात्र होता है।

सेइ गोविन्द भजि आमि, तेहों मोर पति ।ताँहार प्रसादे मोर हय सृष्टि-शक्ति ॥

१६॥

मैं भगवान् गोविन्द की पूजा करता हूँ। वे ही मेरे स्वामी हैं। केवल उन्हीं की कृपा से मुझमें ब्रह्माण्ड का सृजन करने की शक्ति है।

मुनयो वात-वासनाः श्रमणा ऊर्ध्व-मन्थिनः । ब्रह्माख्यं धाम ते ग्रान्ति शान्ताः सन्यासिनोऽमलाः ॥

१७॥

वे नग्न साधु तथा संन्यासी, जो कठोर शारीरिक तपस्या करते हैं, जो अपने वीर्य को मस्तिष्क तक ऊपर उठा सकते हैं (ऊर्ध्व-रेता हैं) तथा जो ब्रह्म में पूर्णतया स्थित हैं, वे ब्रह्मलोक नामक मण्डल में निवास कर सकते हैं।

आत्मान्तर्यामी याँरै योग-शास्त्रे कय । सेह गोविन्देर अंश विभूति ये हय ॥

१८॥

जिन्हें योगशास्त्रों में अन्तर्यामी परमात्मा कहकर वर्णित किया जाता है, वे भी गोविन्द के निजी विस्तार के अंश हैं।

अनन्त स्फटिके ग्रैछे एक सूर्य भासे ।। तैछे जीवे गोविन्देर अंश प्रकाशे ॥

१९॥

जिस प्रकार एक ही सूर्य असंख्य रत्नों में प्रतिबिम्बित होता दिखता है, उसी प्रकार गोविन्द (परमात्मा रूप में) समस्त जीवों के हृदयों में प्रकट होते हैं।

अथ वा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन ।।विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् ॥

२०॥

[ भगवान् कृष्ण ने कहा :अब मैं तुमसे और अधिक क्या कहूँ? मैं केवल अपने एक अंश के द्वारा इस विराट् जगत् में व्याप्त रहता हूँ।

तमिममहमजं शरीर-भाजांहृदि हृदि धिष्ठितमात्म-कल्पितीनाम् । प्रति-दृशमिव नैकधार्कमेकंसमधिगतोऽस्मि विधूत-भेद-मोहः ॥

२१॥

[ भीष्म पितामह ने कहा :जिस प्रकार एक ही सूर्य विभिन्न दर्शकों को भिन्न भिन्न रूप से अवस्थित प्रतीत होता है, उसी तरह हे अजन्मा, आप हर जीव में परमात्मा के रूप में भिन्न भिन्न प्रकार से प्रतिनिधित्व करते प्रतीत होते हैं। किन्तु जब दर्शक अपने आपको आपके सेवक-रूप में जाने लेता है, तो उसमें ऐसा द्वैत नहीं रह पाता। इस प्रकार अब मैं आपके शाश्वत रूपों को समझने में समर्थ हूँ और भलीभाँति जानता हूँ कि परमात्मा आपके अंश मात्र हैं।

सेइत गोविन्द साक्षाच्चैतन्य गोसाजि ।जीव निस्तारिते ऐछे दयालु आर नाइ ॥

२२॥

वही गोविन्द स्वयं चैतन्य गोसांई के रूप में प्रकट होते हैं। अन्य कोई प्रभु पतित आत्माओं का उद्धार करने में इतने दयालु नहीं हैं।

पर-व्योमेते वैसे नारायण नाम । घडू-ऐश्वर्य-पूर्ण लक्ष्मी-कान्त भगवान् ॥

२३॥

दिव्य जगत् के सर्वेसर्वा भगवान् नारायण छः ऐश्वर्यों से पूर्ण हैं। वे लक्ष्मीपति भगवान् हैं।

वेद, भागवत, उपनिषत्, आगम ।। ‘पूर्ण-तत्त्व' याँरे कहे, नाहि यॉर सम ॥

२४॥

परमेश्वर वे हैं, जिन्हें वेदों, उपनिषदों तथा अन्य दिव्य साहित्य में परम पूर्ण के रूप में वर्णित किये गये हैं। उनके तुल्य कोई नहीं है।

भक्ति-योगे भक्त पाय याँहार दर्शन ।। सूर्य ग्रेन सविग्रह देखे देव-गण ॥

२५॥

भक्तगण अपनी सेवा के माध्यम से भगवान् को उसी तरह देखते हैं, जिस प्रकार स्वर्ग के निवासी सूर्यदेव को देखते हैं।

ज्ञान-योग-मार्गे तौरे भजे येइ सब ।। ब्रह्म-आत्म-रूपे तौरे करे अनुभव ॥

२६॥

। जो लोग ज्ञान तथा योग के मार्गों पर चलते हैं, वे भगवान् ही की पूजा रहे हैं, क्योंकि वे निर्विशेष ब्रह्म तथा अन्तर्यामी परमात्मा के रूप में उन्हीं अनुभव करते हैं।

उपासना-भेदे जानि ईश्वर-महिमा ।।अतएव सूर्य ताँर दियेत उपमा ॥

२७॥

इसलिए पूजा के विविध प्रकारों से भगवान् की महिमा को उसी प्रकार समझा जा सकता है, जिस प्रकार सूर्य की उपमा से पता लगता है।

सेइ नारायण कृष्णेर स्वरूप-अभेद ।।एकइ विग्रह, किन्तु आकार-विभेद ॥

२८॥

नारायण तथा श्रीकृष्ण एक ही ईश्वर हैं, किन्तु एक होकर भी उनके शारीरिक लक्षण भिन्न हैं।

इँहोत द्वि-भुज, तिंहो धरे चारि हाथ ।इँहो वेणु धरे, तिंहो चक्रादिक साथ ॥

२९॥

इन ईश्वर ( श्रीकृष्ण) के दो हाथ हैं और वे मुरली धारण करते हैं, जबकि दूसरे ( नारायण) के चार हाथ हैं, जिनमें वे शंख, चक्र, गदा या पद्म धारण करते हैं।

नारायणस्त्वं न हि सर्व-देहिनाम्आत्मास्यधीशाखिल-लोक-साक्षी। नारायणोऽङ्गं नर-भू-जलायनात् ।तच्चापि सत्यं न तवैव माया ॥

३०॥

हे प्रभुओं के प्रभु! आप सारी सृष्टि के द्रष्टा हैं। आप निस्सन्देह हर एक के प्रियतम प्राण हैं। तो क्या आप मेरे पिता श्री नारायण नहीं हैं? भारायण का अर्थ है, वे जिसका घर जल में है, जो 'नर' (गर्भोदकशायी विष्णु) से उत्पन्न हुए हैं और वे नारायण तो आपके अंश हैं। आपके सारे पूर्ण अंश दिव्य हैं। वे परम पूर्ण हैं और वे माया द्वारा सृजित नहीं हैं।

शिशु वत्स हरि' ब्रह्मा करि अपराध । अपराध क्षमाइते मागेन प्रसाद ॥

३१॥

कृष्ण के साथियों तथा बछड़ों को चुराने का अपराध करने के बाद ब्रह्मा'ने अपने अपराध के लिए भगवान् से क्षमा याचना की और दया करने की याचना की।

तोमार नाभि-पद्य हैते आमार जन्मोदय ।।तुमि पिता-माता, आमि तोमार तनय ॥

३२॥

। मैंने उस कमल से जन्म लिया, जो आपकी नाभि से निकला था। स तरह आप मेरे पिता-माता दोनो हैं और मैं आपका पुत्र हूँ।

पिता माता बालकेर ना लय अपराध ।अपराध क्षम, मोरे करह प्रसाद ॥

३३॥

। माता-पिता अपनी सन्तान के अपराधों को कभी गम्भीरतापूर्वक नहीं लेते। अतएव मैं आपसे क्षमा-याचना करता हूँ और आपका आशीर्वाद चाहता हूँ।

कृष्ण कहेन--ब्रह्मा, तोमार पिता नारायण । आमि गोप, तुमि कैछे आमार नन्दन ॥

३४॥

श्रीकृष्ण ने कहा, हे ब्रह्मा! आपके पिता तो नारायण हैं। मैं तो एक गोप-बालक हूँ। आप मेरे पुत्र किस तरह हो सकते हैं? ब्रह्मा बलेन, तुमि कि ना हओ नारायण ।।तुमि नारायण शुन ताहार कारण ॥

३५॥

ब्रह्मा ने उत्तर दिया, क्या आप नारायण नहीं हैं? आप अवश्य नारायण हैं। कृपया सुनें, मैं इसके प्रमाण देता हूँ।

प्राकृताप्राकृत-सृष्ट्ये व्रत जीव-रूप ।। ताहार ये आत्मा तुमि मूल-स्वरूप ॥

३६॥

भौतिक तथा आध्यात्मिक जगतों के सारे जीव आखिर आप से ही उत्पन्न होते हैं, क्योंकि आप उन सबके परमात्मा हैं।

पृथ्वी ग्रैछे घट-कुलेर कारण आश्रय ।। जीवेर निदान तुमि, तुमि सर्वाश्रय ॥

३७॥

जिस प्रकार पृथ्वी मिट्टी के बने समस्त पात्रों (घड़ों) को मूल कारण एवं आश्रय है, उसी प्रकार आप समस्त जीवों के परम कारण एवं आश्रय है।

‘नार'-शब्दे कहे सर्व जीवेर निचय ।। ‘अयन'-शब्देते कहे ताहार आश्रय ॥

३८ ॥

नार' शब्द समस्त जीवों के समुच्चय को बताता है और 'अयन' शब्द उन सबके आश्रय को बतलाने वाला है।

अतएव तुमि हओ मूल नारायण ।एइ एक हेतु, शुन द्वितीय कारण ॥

३९ ॥

अतएव आप आदि नारायण हैं। यह हुआ पहला कारण। अब मैं दूसरा कारण बताता हूँ, कृपया उसे सुनें।

जीवेर ईश्वर–पुरुषादि अवतार । ताँहा सबा हैते तोमार ऐश्वर्य अपार ॥

४० ॥

जीवों के प्रत्यक्ष ईश्वर पुरुष अवतार हैं। किन्तु आपका ऐश्वर्य एवं शक्ति उनसे कहीं अधिक उन्नत हैं।

अतएव अधीश्वर तुमि सर्व पिता। तोमार शक्तिते ताँरा जगत्रक्षिता ॥

४१॥

अतएव आप हर एक के आदि पिता, आदि स्वामी हैं। वे (पुरुषावतार) आपकी शक्ति से ही ब्रह्माण्डों के रक्षक हैं।

नारेर अयन ग्राते करह पालन । अतएव हओ तुमि मूल नारायण ॥

४२॥

चूँकि आप समस्त जीवों के आश्रयों की रक्षा करते हैं, अतएव आप मूल नारायण हैं।

तृतीय कारण शुन श्री-भगवान् । अनन्त ब्रह्माण्ड बहु वैकुण्ठादि धाम ॥

४३॥

हे प्रभु! हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्! कृपया मेरे तीसरे कारण को सुनें। ग्राण्ड असंख्य हैं और दिव्य वैकुण्ठ लोक अनेक हैं।

इथे व्रत जीव, तार त्रै-कालिक कर्म ।। ताहा देख, साक्षी तुमि, जान सब मर्म ॥

४४।। आप इस भौतिक जगत् में तथा दिव्य जगत् दोनों में समस्त जीवों के भूत, वर्तमान तथा भविष्य के समस्त कर्मों को देखते हैं। चूँकि आप न सब कर्मों के साक्षी हैं, अतः आप सब का सार जानते हैं।

तोमार दर्शने सर्व जगतेर स्थिति । तुमि ना देखिले कारो नाहि स्थिति गति ॥

४५ ॥

सारे जगत् इसलिए विद्यमान हैं, क्योंकि उन पर आपका निरीक्षण है। आपके निरीक्षण के बिना कोई न तो जीवित रह सकता है, न हिल सकता है और न अस्तित्व बनाये रख सकता है।

नारेर अयन य़ाते कर दरशन । ताहातेओ हओ तुमि मूल नारायण ॥

४६॥

आप सारे जीवों की गतियों का निरीक्षण करते हैं। इसलिए भी आप आदि भगवान् नारायण हैं।

कृष्ण कहेन–ब्रह्मा, तोमार ना बुझि वचन । जीव-हृदि, जले वैसे सेइ नारायण ॥

४७॥

कृष्ण ने कहा, हे ब्रह्मा! जो आप कह रहे हैं, उसे मैं नहीं समझ पा हा हूँ। भगवान् नारायण तो वे हैं, जो समस्त जीवों के हृदयों में आसीन हते हैं और कारण सागर के जल में शयन करते हैं।

ब्रह्मा कहे—जले जीवे येइ नारायण । से सब तोमार अंश-ए सत्य वचन ॥

४८॥

ब्रह्मा ने उत्तर दिया, मैंने जो कहा है, वह सत्य है। वही भगवान् नारायण जो जल में तथा सारे जीवों के हृदयों में रहते हैं, आपके अंश मात्र है।

कारणाब्धि-गर्भोदक-क्षीरोदक-शायी ।। माया-द्वारे सृष्टि करे, ताते सब मायी ॥

४९॥

। नारायण के कारणोदकशायी, गर्भोदकशायी तथा क्षीरोदकशायी रूप भौतिक शक्ति के सहयोग से सृजन कार्य करते हैं। इस प्रकार वे माया से जुड़े हुए हैं।

सेइ तिन जल-शायी सर्व-अन्तर्यामी । ब्रह्माण्ड-वृन्देर आत्मा ने पुरुष-नामी ॥

५०॥

जल में शयन करने वाले ये तीनों विष्णु सबके परमात्मा हैं। समस्त ब्रह्माण्डों के परमात्मा प्रथम पुरुष के नाम से विख्यात हैं।

हिरण्य-गर्भेर आत्मा गर्भोदक-शायी ।। व्यष्टि-जीव-अन्तर्यामी क्षीरोदक-शायी ॥

५१॥

गर्भोदकशायी विष्णु सारे जीव-समुदाय के परमात्मा हैं और गरोदकशायी विष्णु हर व्यक्तिगत जीव के परमात्मा हैं।

ए सभार दर्शनेते आछे माया-गन्ध ।तुरीय कृष्णेर नाहि मायार सम्बन्ध ॥

५२॥

ऊपर से हमें दिखता है कि इन पुरुषों का सम्बन्ध माया से है, किन्तु अमके ऊपर, चतुर्थ आयाम में भगवान् कृष्ण हैं, जिनका भौतिक शक्ति (माया) से कोई सम्पर्क नहीं होता।

विराडू हिरण्य-गर्भश्च कारणं चेत्युपाधयः ।।ईशस्य ग्रन्त्रिभिनं तुरीयं तत्प्रचक्षते ॥

५३॥

भौतिक जगत् में भगवान् की उपाधियाँ विराट्, हिरण्यगर्भ तथा कारण हैं। किन्तु वे इन तीन उपाधियों से परे अन्ततोगत्वा चतुर्थ आयाम (तुरीय) में रहते हैं।

यद्यपि तिनेर माया लइया व्यवहार ।।तथापि तत्स्पर्श नाहि, सभे माया-पार ॥

५४॥

यद्यपि भगवान् के ये तीनों स्वरूप भौतिक शक्ति से सीधे सम्बन्धित हैं, लेकिन यह शक्ति इनमें से किसी का भी स्पर्श नहीं करती। ये सब माया से परे हैं।

एतदीशनमीशस्य प्रकृति-स्थोऽपि तद्गुणैः ।न ग्रुज्यते सदात्म-स्थैर्यथा बुद्धिस्तदाश्रया ॥

५५॥

। यह भगवान् का ऐश्वर्य है । यद्यपि वे भौतिक प्रकृति में स्थित रहते ।, फिर भी वे प्रकृति के गुणों से कभी भी प्रभावित नहीं होते। उसी प्रकार जो लोग उनकी शरण में जा चुके हैं और जिन्होंने अपनी बुद्धि उन पर स्थिर कर ली है, वे प्रकृति के गुणों से प्रभावित नहीं होते।

सेइ तिन जनेर तुमि परम आश्रय ।। तुमि मूल नारायण इथे कि संशय ॥

५६॥

आप इन तीनों पुरुषावतारों के परम आश्रय हैं। इस तरह इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि आप आदि नारायण हैं।

सेइ तिनेर अंशी परव्योम-नारायण । तेह तोमार विलास, तुमि मूल-नारायण ॥

५७॥

इन तीनों स्वरूपों के स्रोत आध्यात्मिक आकाश ( परव्योम) में स्थित नारायण हैं। वे आपके विलास-विस्तार हैं। अतएव आप परम नारायण हैं।

तएव ब्रह्म-वाक्ये--परव्योम-नारायण ।। तेंहो कृष्णेर विलास–एई तत्त्व-विवरण ॥

५८॥

। अतएव ब्रह्मा के वचनों के अनुसार दिव्य जगत् के अधिष्ठाता-विग्रह नारायण कृष्ण के विलास-विस्तार हैं। अब यह पूरी तरह सिद्ध हो चुका एइ श्लोक तत्त्व-लक्षण भागवत-सार । परिभाषा-रूपे इहार सर्वत्राधिकार ॥

५९॥

इस श्लोक (श्लोक ३० ) में सूचित सत्य श्रीमद्भागवत का सार है। यह निर्णय पर्यायों के माध्यम से सर्वत्र लागू होता है।

ब्रह्म, आत्मा, भगवान् कृष्णेर विहार । ए अर्थ ना जानि' मूर्ख अर्थ करे आर ॥

६० ॥

मूर्ख विद्वान नहीं जानते कि ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान् सभी श्रीकृष्ण के पहलू हैं, अतएव वे तरह-तरह से तर्कवितर्क करते हैं।

अवतारी नारायण, कृष्ण अवतार ।तेह चतुर्भुज, इँह मनुष्य-आकार ॥

६१॥

चूँकि नारायण के चार हाथ हैं, जबकि कृष्ण मनुष्य की तरह दिखते हैं, अतएव उनका कहना है कि नारायण तो मूल ईश्वर हैं, जबकि कृष्ण अवतार मात्र हैं।

एइ-मते नाना-रूप करे पूर्व-पक्ष ।।ताहारे निजिते भागवत-पद्य दक्ष ॥

६२॥

इस प्रकार उनके तर्क नाना रूपों में प्रकट होते हैं, किन्तु भागवत भाव्य इन सबका बड़ी ही दक्षता से खंडन करता है।

वदन्ति तत्तत्त्व-विदस्तत्त्वं यज्ञानमद्वयम् ।ब्रह्मेति परमात्मेति भगवानिति शब्द्यते ॥

६३ ॥

। परम सत्य को जानने वाले विद्वान अध्यात्मवादी कहते हैं कि यह अभय ज्ञान है और यही निर्विशेष ब्रह्म, अन्तर्यामी परमात्मा तथा भगवान् लाता है।"

भाइ एइ श्लोक करह विचार ।एक मुख्य-तत्त्व, तिन ताहार प्रचार ॥

६४॥

मेरे भाइयों, कृपा करके इस श्लोक की व्याख्या को सुनो और इसके अर्थ पर विचार करो : एक मूल तत्त्व अपने तीन विभिन्न पहलूओं में जाना जाता है।

अद्वय-ज्ञान तत्त्व-वस्तु कृष्णेर स्वरूप ।। ब्रह्म, आत्मा, भगवान् तिन ताँर रूप ॥

६५॥

भगवान् कृष्ण स्वयं परम अद्वय सत्य हैं, आखरी वास्तविकता हैं। वे अपने आपको ब्रह्म, परमात्मा तथा भगवान्-इन तीन पहलूओं में प्रकट करते हैं।

एई श्लोकेर अर्थे तुमि हैला निर्वचन ।आर एक शुन भागवतेर वचन ॥

६६॥

इस श्लोक के तात्पर्य ने तुम्हें तर्क करने से रोक दिया है। अब तुम श्रीमद्भागवत का अन्य श्लोक सुनो।

एते चांश-कलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान्स्वयम् । इन्द्रारि-व्याकुलं लोकं मृड़यन्ति युगे युगे ॥

६७॥

परमेश्वर के ये सारे अवतार या तो पुरुष अवतारों के अंश हैं या अंशों के अंश (कला) हैं। लेकिन कृष्ण स्वयं पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं। प्रत्येक युग में, जब जब इन्द्र के शत्रु संसार को विचलित करते हैं, तब तब वे अपने विभिन्न स्वरूपों के माध्यम से जगत् की रक्षा करते हैं।

सब अवतारेर करि सामान्य-लक्षण । तार मध्ये कृष्ण-चन्द्रेर करिल गणन ॥

६८ ॥

भागवत सामान्य रीति से अवतारों के लक्षणों तथा कार्यों का वर्णन करता है और इन्हीं में श्रीकृष्ण की गणना करता है।

तबे सूत गोसाञि मने पाजी बड़े भय ।।यार ये लक्षण ताहा करिल निश्चय ॥

६९॥

इससे सूत गोस्वामी अत्यधिक आशंकित हो उठे और उन्होंने प्रत्येक अवतार को उनके विशिष्ट लक्षणों से विभेदित किया।

अवतार सब–पुरुषेर कला, अंश ।।स्वयं-भगवान्कृष्ण सर्व-अवतंस ॥

७० ॥

ईश्वर के सारे अवतार या तो पुरुष अवतारों के पूर्ण अंश या पूर्ण अंश के अंश (कला) हैं, किन्तु आदि भगवान् तो श्रीकृष्ण ही हैं। वे समस्त अवतारों के स्रोत पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।

पूर्व-पक्ष कहे तोमार भाल त' व्याख्यान । परव्योम-नारायण स्वयं-भगवान् ॥

७१ ॥

एक विपक्षी कह सकता है, यह तो तुम्हारी व्याख्या है, किन्तु वास्तव परम भगवान् तो नारायण हैं, जो दिव्य लोक में स्थित हैं।

तेह आसि' कृष्ण-रूपे करेन अवतार ।। एइ अर्थ श्लोके देखि कि आर विचार ॥

७२॥

वे ( नारायण) भगवान् कृष्ण के रूप में अवतार लेते हैं। मेरी दृष्टि । यही इस श्लोक का अर्थ है। अब और आगे विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

तारे कहे–केने कर कुतर्कानुमान । शास्त्र-विरुद्धार्थ कभु ना हय प्रमाण ॥

७३॥

हम ऐसे भ्रान्त व्याख्याकार को इस प्रकार उत्तर दे सकते हैं, तुम ऐसा कुतर्क क्यों प्रस्तुत करते हो? जो व्याख्या शास्त्र के सिद्धान्तों के विरुद्ध होती है, वह कभी भी साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं की जाती।

मनुक्त्वा तु न विधेयमुदीरयेत् ।। न ह्यलब्धास्पदं किञ्चित्कुत्रचित्प्रतितिष्ठति ॥

७४॥

कर्ता के पूर्व उसकी निर्दिष्ट बात ( विधेय) का प्रयोग नहीं करना चाहिए, क्योंकि समुचित आधार के बिना वह खड़ा नहीं रह सकता।

ना कहिया ना कहि विधेय ।। आगे कहि, पश्चाद्विधेय ॥

७५ ॥

यदि मैं उद्देश्य ( कर्ता ) को उल्लेख न करूं, तो मैं विधेय का उल्लेख नहीं करता हूँ। अतएव पहले मैं उद्देश्य का उल्लेख करूंगा और तब विधेय का।

‘विधेय' कहिये तारे, ग्रे वस्तु अज्ञात ।।‘' कहि तारे, येइ हय ज्ञात ॥

७६ ॥

किसी वाक्य का विधेय वह है, जो पाठक को अज्ञात होता है, जबकि उद्देश्य (कर्ता) वह है, जो उसे ज्ञात रहता है।

ग्रैछे कहि,—एइ विप्र परम पण्डित ।।विप्र-, इहार विधेय–पाण्डित्य ॥

७७॥

उदाहरणार्थ, हम कह सकते हैं, 'यह विप्र महान् पण्डित है। इस वाक्य में विप्र उद्देश्य है और उसका पाण्डित्य विधेय है।

विप्रत्व विख्यात तार पाण्डित्य अज्ञात ।अतएव विप्न आगे, पाण्डित्य पश्चात ॥

७८॥

मनुष्य का विप्र होना ज्ञात है, किन्तु उसका पाण्डित्य अज्ञात है।। अतएव व्यक्ति की पहचान पहले की जाती है और उसके पाण्डित्य की । बाद में।"

तैछे ईंह अवतार सब हैल ज्ञात ।।कार अवतार—एइ वस्तु अविज्ञात ॥

७९॥

इसी प्रकार, ये सारे अवतार ज्ञात थे, किन्तु ये किनके अवतार थे, यह ज्ञात न था।

‘एते'-शब्दे अवतारेर आगे ।।‘पुरुषेर अंश' पाछे विधेय-संवाद ॥

८०॥

पहले 'एते' ( ये) शब्द से उद्देश्य (अवतार) की स्थापना होती है। तत्पश्चात् 'पुरुषावतारों के पूर्ण अंश' विधेय के रूप में आये हैं।

तैछे कृष्ण अवतार-भितरे हैल ज्ञात ।ताँहार विशेष-ज्ञान सेइ अविज्ञात ॥

८१॥

इसी प्रकार से, जब पहले कृष्ण की गणना अवतारों में हो चुकी, तो भी उनके विषय में विशिष्ट ज्ञान अज्ञात था।

अतएव 'कृष्ण'-शब्द आगे ।‘स्वयं-भगवत्ता' पिछे विधेय-संवाद ॥

८२॥

अतएव सबसे पहले 'कृष्ण' शब्द उद्देश्य के रूप में आता है, जिसके बाद विधेय आता है, जो उनके आदि भगवान् रूप को बतलाने घाला है।

कृष्णेर स्वयं-भगवत्ता–इहा हैल साध्य ।स्वयं-भगवानेर कृष्णत्व हैल बाध्य ॥

८३॥

इससे यह प्रमाणित होता है कि श्रीकृष्ण आदि भगवान् हैं। इसलिए आदि भगवान् अनिवार्य रूप से कृष्ण ही हैं।

कृष्ण यदि अंश हैत, अंशी नारायण । तबे विपरीत हैत सूतेर वचन ॥

८४॥

यदि कृष्ण पूर्ण अंश होते और नारायण आदि भगवान् अंशी ), तो सूत गोस्वामी का कथन विपरीत हो जाता।

नारायण अंशी ग्रेइ स्वयं-भगवान् ।। तेह श्री-कृष्ण—ऐछे करित व्याख्यान ॥

८५॥

तब वे यह कहते, ‘समस्त अवतारों के उद्गम नारायण मूल भगवान् हैं और वे श्रीकृष्ण के रूप में प्रकट हुए।

भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव । आर्ष-विज्ञ-वाक्ये नाहि दोष एइ सबै ॥

८६॥

प्रामाणिक ऋषियों के वचनों में त्रुटियाँ, मोह, ठगने की प्रवृत्ति तथा भ्रान्त अनुभूति (इन्द्रियों की अपूर्णता) नहीं होतीं।

विरुद्धार्थ कह तुमि, कहिते कर रोष । तोमार अर्थे अविमृष्ट-विधेयांश-दोष ॥

८७॥

तुम विरुद्ध बात कहते हो और जब इसकी ओर इंगित किया जाता है, तो तुम क्रोधित होते हो। तुम्हारी व्याख्या में स्थानभ्रष्ट विधेय का दोष है। यह अविचारणीय तालमेल है।

ग्राँर भगवत्ता हैते अन्येर भगवत्ता । ‘स्वयं-भगवान्'-शब्देर ताहातेइ सत्ता ॥

८८ ॥

केवल वे भगवान्, जो अन्य समस्त भगवत्ताओं के उद्गम हैं, स्वयं भगवान् या आदि भगवान् कहलाने के पात्र हैं।

दीप हैते ग्रैछे बहु दीपेर ज्वलन ।मूल एक दीप ताहा करिये गणन ॥

८९॥

जब एक दीपक से अन्य अनेक दीपक जलाये जाते हैं, तो मैं उसे ॥

आदि (मूल) दीपक मानता हूँ।

तैछे सब अवतारेर कृष्ण से कारण । आर एक श्लोक शुन, कुव्याख्या-खण्डन ॥

९० ॥

इसी प्रकार से कृष्ण समस्त कारणों एवं समस्त अवतारों के कारण हैं। सारी भ्रान्त व्याख्याओं के खंडन हेतु अब दूसरा श्लोक सुनो।

अत्र सर्गो विसर्गश्च स्थानं पोषणमूतयः ।। मन्वन्तरेशानुकथा निरोधो मुक्तिराश्रयः ॥

९१॥

दशमस्य विशुद्ध्यर्थं नवानामिह लक्षणम् ।।वर्णयन्ति महात्मानः श्रुतेनार्थेन चाञ्जसा ॥

९२॥

इसमें ( श्रीमद्भागवत में) दस विषयों का वर्णन किया गया है । (१) ब्रह्माण्ड के अवयवों की सृष्टि, (२) ब्रह्मा की सृष्टि, (३) सृष्टि का पालन, (४) श्रद्धावानों के प्रति विशिष्ट अनुग्रह, (५) कर्म के लिए प्रेरणाएँ, (६) नियमों का पालन करने वाले मनुष्यों के कर्तव्य, (७) भगवान् के अवतारों का वर्णन, (८) सृष्टि का संहार, (९) स्थूल तथा सूक्ष्म जगत् से मुक्ति तथा (१०) परम आश्रय पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्। दसवाँ विषय अन्य सबके आश्रय हैं। परम आश्रय और अन्य विषयों में अन्तर दिखाने के लिए महाजनों ने प्रार्थनाओं या प्रत्यक्ष याओं के द्वारा प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से इन नवों का वर्णन किया हैं।

आश्रय जानिते कहि ए नव पदार्थ ।।ए नवेर उत्पत्ति-हेतु सेइ आश्रयार्थ ॥

९३॥

मैंने हर वस्तु के चरम आश्रय को स्पष्ट रूप से जानने के लिए अन्य भी श्रेणियों का वर्णन किया है। इन नवों की उत्पत्ति का कारण उनका अभय कहा गया है, जो ठीक ही है।

कृष्ण एक सर्वाश्रय, कृष्ण सर्व-धाम । कृष्णेर शरीरे सर्व-विश्वेर विश्राम ॥

९४॥

भगवान् श्रीकृष्ण सबके आश्रय एवं धाम हैं। सारे ब्रह्माण्ड कृष्ण के शरीर पर आश्रित हैं।

दशमे दशमं लक्ष्यमाश्रिताश्रय-विग्रहम् ।श्री कृष्णाख्यं परं धाम जगद्धाम नमामि तत् ॥

९५ ॥

श्रीमद्भागवत का दसवाँ स्कन्ध दसवें लक्ष्य, पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् को प्रकट करता है, जो समस्त शरणागत जीवों के आश्रय हैं। वे श्रीकृष्ण कहलाते हैं और वे सारे ब्रह्माण्डों के परम स्रोत (उद्गम ) हैं। मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ।

कृष्णेर स्वरूप, आर शक्ति-त्रय-ज्ञान ।।याँर हय, ताँर नाहि कृष्णेते अज्ञान ॥

१६ ॥

जो श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप को तथा उनकी तीन विभिन्न शक्तियों को जानता है, वह उनके विषय में अनजान नहीं रह सकता।

कृष्णेर स्वरूपेर हय षडू-विध विलास ।। प्राभव-वैभव-रूपे द्वि-विध प्रकाश ॥

९७॥

भगवान् श्रीकृष्ण अपने छः मूल विस्तारों में विलास करते हैं। प्राभव तथा वैभव-ये उनके दो प्राकट्य हैं।

अंश-शक्त्यावेश-रूपे द्वि-विधावतार । बाल्य पौगण्ड धर्म दुइ त' प्रकार ॥

९८ ॥

उनके अवतार दो प्रकार के हैं-आंशिक तथा शक्त्यावेश। वे दो अवस्थाओं में प्रकट होते हैं-बाल्य तथा पौगण्ड (कुमारावस्था)।

किशोर-स्वरूप कृष्ण स्वयं अवतारी ।। क्रीड़ा करे एइ छय-रूपे विश्व भरि' ॥

९९॥

नित्य किशोर रहने वाले भगवान् श्रीकृष्ण समस्त अवतारों के उद्गम, मूल भगवान् हैं। वे ब्रह्माण्ड-भर में अपनी श्रेष्ठता स्थापित करने के लिए इन छह रूपों में अपना विस्तार करते हैं।

एइ छय-रूपे हय अनन्त विभेद ।।अनन्त-रूपे एक-रूप, नाहि किछु भेद ॥

१०० ॥

इन छः रूपों के असंख्य भेद हैं। यद्यपि वे अनेक हैं, किन्तु सभी एक हैं। उनके बीच कोई अन्तर नहीं है।

चिच्छक्ति, स्वरूप-शक्ति, अन्तरङ्गा नाम ।।ताहार वैभव अनन्त वैकुण्ठादि धाम ॥

१०१॥

चित्-शक्ति, जिसे स्वरूप-शक्ति अथवा अन्तरंगा शक्ति भी कहा जाता है, अनेक रूपों में अपना प्रदर्शन करती है। यह भगवान् के धाम तथा उसके वैभव को धारण करती है।

माया-शक्ति, बहिरङ्गा, जगत्कारण । ताहार वैभव अनन्त ब्रह्माण्डेर गण ॥

१०२ ॥

माया शक्ति कहलाने वाली बहिरंगा शक्ति विविध भौतिक शक्तियों से सम्पन्न असंख्य ब्रह्माण्डों की कारण है।

जीव-शक्ति तटस्थाख्य, नाहि ग्रार अन्त ।मुख्य तिन शक्ति, तार विभेद अनन्त ॥

१०३ ॥

इन दोनों के बीच की तटस्था शक्ति असंख्य जीवों की बनी है। ये ही तीन प्रधान शक्तियाँ हैं, जिनके असंख्य भेद और उपभेद हैं।

ए-मत स्वरूप-गण, आर तिन शक्ति । संभार आश्रय कृष्ण, कृष्णे सभार स्थिति ॥

१०४॥

भगवान् के मुख्य स्वरूप, विस्तार और उनकी तीन शक्तियाँ हैं। परम पूर्ण श्रीकृष्ण से प्रकट हैं। ये सब उन्हीं में स्थित हैं।

यद्यपि ब्रह्माण्ड-गणेर पुरुष आश्रय ।सेइ पुरुषादि संभार कृष्ण मूलाश्रय ॥

१०५॥

पि तीनों पुरुष सारे ब्रह्माण्डों के आश्रय हैं, किन्तु भगवान् कृष्ण के मूल स्रोत हैं।

स्वयं भगवान्कृष्ण, कृष्ण सर्वाश्रय । परम ईश्वर कृष्ण सर्व-शास्त्रे कय ॥

१०६ ॥

तरह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण मूल आदि भगवान् एवं के विस्तारों के उद्गम हैं। सारे प्रामाणिक शास्त्र श्रीकृष्ण को रूप में स्वीकार करते हैं।

ईश्वरः परमः कृष्णः सच्चिदानन्द-विग्रहः ।अनादिरादिर्गोविन्दः सर्व-कारण-कारणम् ॥

१०७॥

गोविन्द नाम से विख्यात कृष्ण परम नियन्ता हैं। उनका शरीर शाश्वत, आनन्दमय तथा आध्यात्मिक है। वे सबके उद्गम हैं। उनका कोई उद्गम नहीं है, क्योंकि वे समस्त कारणों के मूल कारण हैं।'

ए सब सिद्धान्त तुमि जान भाल-मते ।।तबु पूर्व-पक्ष कर आमा चालाइते ॥

१०८॥

तुम शास्त्रों के इन सारे सिद्धान्तों को भलीभाँति जानते हो। किन्तु मुझे क्षुब्ध करने के लिए ही सारे तर्क-वितर्क उत्पन्न करते हो।

सेइ कृष्ण अवतारी व्रजेन्द्र-कुमार । आपने चैतन्य-रूपे कैल अवतार ॥

१०९॥

वे भगवान् श्रीकृष्ण ही व्रजराज के पुत्र कहलाते हैं, जो समस्त तारों के स्रोत हैं। वे स्वयं भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में। तरित हुए हैं।

अतएव चैतन्य गोसाजि परतत्त्व-सीमा ।।ताँरे क्षीरोद-शायी कहि, कि ताँर महिमा ॥

११०॥

अतएव भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु परम सत्य हैं। उन्हें क्षीरोदकशायी णु कहकर पुकारने से उनकी महिमा नहीं बढ़ती।

सेइ त' भक्तेर वाक्य नहे व्यभिचारी ।। सकल सम्भवे ताँते, याते अवतारी ।। १११॥

किन्तु निष्ठावान भक्त के मुख से निकले ऐसे शब्द कभी मिथ्या नहीं । हो सकते। उनमें सारी सम्भावनाएँ निहित हैं, क्योंकि वे आदि भगवान् हैं।

अवतारीर देहे सब अवतारेर स्थिति ।।केहो कोन-मते कहे, ग्रेमन ग्रार मति ॥

११२॥

अन्य सारे अवतार मूल भगवान् के आदि शरीर में शक्तिमान के रूप में स्थित हैं। अतएव अपने मत के अनुसार कोई उन्हें किसी भी एक अवतार के रूप में सम्बोधित कर सकता है।

कृष्णके कहये केह-नर-नारायण । केहो कहे, कृष्ण हये साक्षावामन ॥

११३॥

कुछ लोग कहते हैं कि श्रीकृष्ण साक्षात् नर-नारायण हैं। अन्य लोग कहते हैं कि वे साक्षात् वामन हैं।

केहो कहे, कृष्ण क्षीरोद-शायी अवतार ।। असम्भव नहे, सत्य वचन सबार ॥

११४॥

कुछ लोग कहते हैं कि कृष्ण क्षीरोदकशायी विष्णु के अवतार हैं। इनमें से कोई भी कथन असम्भव नहीं है। प्रत्येक कथन अन्यों की ही तरह सत्य है।

केहो कहे, पर-व्योमे नारायण हरि ।सकले सम्भवे कृष्णे, ग्राते अवतारी ॥

११५ ॥

कुछ उन्हें हरि या दिव्य लोक का नारायण कहते हैं। कृष्ण के लिए सब कुछ सम्भव है, क्योंकि वे आदि भगवान् हैं।

सब श्रोता-गणेर करि चरण वन्दन ।ए सब सिद्धान्त शुन, करि' एक मन ॥

११६॥

मैं इस कथा को सुनने या पढ़ने वाले समस्त लोगों के चरणों में नमस्कार करता हूँ। कृपा करके इन सारे कथनों के सार को ध्यान से सुनें।

सिद्धान्त बलिया चित्ते ना कर अलस ।। इहा हइते कृष्णे लागे सुदृढ़ मानस ॥

११७॥

निष्ठापूर्ण जिज्ञासु को चाहिए कि ऐसे सिद्धान्तों की व्याख्या को विवादास्पद मानकर उनकी उपेक्षा न करे, क्योंकि ऐसी व्याख्याओं से मन छ होता है। इस तरह मनुष्य का मन श्रीकृष्ण के प्रति अनुरक्त होता है।

चैतन्य-महिमा जानि ए सब सिद्धान्ते ।। चित्त दृढ़ हा लागे महिमा-ज्ञान हैते ॥

११८॥

ऐसे निर्णायक अध्ययन द्वारा मैं चैतन्य महाप्रभु की महिमा को जानता हूँ। इन महिमाओं को जान लेने से ही मनुष्य बलवान बन सकता है और उनके प्रति अनुराग में सुस्थिर हो सकता है।

चैतन्य-प्रभुर महिमा कहिबार तरे । कृष्णेर महिमा कहि करिया विस्तारे ॥

११९॥

मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु का महिमा-वर्णन करने के लिए ही श्रीकृष्ण की महिमाओं का विस्तार से वर्णन करने का प्रयास किया है।

चैतन्य-गोसाजिर एइ तत्त्व-निरूपण । स्वयं-भगवान्कृष्ण व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

१२०॥

निष्कर्ष यह है कि श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं व्रजराज के पुत्र पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण हैं।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

१२१॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों में प्रार्थना करते हुए एवं उनकी दया की सदा आकांक्षा करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों का अनुसरण करते हुए श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

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