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अध्याय दो: भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की परमानंद अभिव्यक्तियाँ

विच्छेदेऽस्मिन्प्रभोरन्त्य-लीला-सूत्रानुवर्णने ।।गौरस्य कृष्ण-विच्छेद-प्रलापाद्यनुवर्ण्यते ॥

१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के अन्तिम विभाग को सारांश रूप में प्रप्तुत करते हुए इस अध्याय में मैं भगवान् के दिव्य भाव का वर्णन करूंगा, जो कृष्ण से उनके विरह के कारण उन्माद जैसा प्रतीत होता है।

जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द ।जयाद्वैतचन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! भतधन्द्र की जय हो और महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो! शेष ग्ने रहिल प्रभुर द्वादश वत्सर ।कृष्णेर वियोग-स्फूर्ति हय निरन्तर ॥

३॥

अन्तिम बारह वर्षों में श्री चैतन्य महाप्रभु ने अविरत कृष्ण के विरह आम के सारे लक्षण प्रकट किये।

श्री-राधिकार चेष्टा ग्रेन उद्धव-दर्शने ।।एइ-मत दशा प्रभुर हय रात्रि-दिने ॥

४॥

भी चैतन्य महाप्रभु की मानसिक दशा दिन-रात वैसी ही रहती थी, भी कि राधारानी की थी, जब उद्धव गोपियों से मिलने वृन्दावन आये थे।

निरन्तर हय प्रभुर विरह-उन्माद ।।भ्रम-मय चेष्टा सदा, प्रलाप-मय वाद ॥

५॥

महाप्रभु लगातार विरहजनित उन्माद के भाव में रहते थे। उनके सारे कार्यकलाप विस्मृति तथा उनकी बातचीत सदैव प्रलाप पर आधारित रहती थी।

रोम-कूपे रक्तोद्गम, दन्त सब हाले ।क्षणे अङ्ग क्षीण हय, क्षणे अङ्ग फुले ॥

६॥

। उनके शरीर के समस्त रोमछिद्रों से रक्त बहता था और उनके सारे दाँत हिलने लगते थे। किसी क्षण उनका सारा शरीर दुबला हो जाता और दूसरे ही क्षण मोटा हो जाता।

गम्भीरा-भितरे रात्रे नाहि निद्रा-लव ।भित्ते मुख-शिर घषे, क्षत हय सब ॥

७॥

दालान के आगे का छोटा कमरा गम्भीरा कहलाता है। श्री चैतन्य महाप्रभु उसी कमरे में रहते थे, किन्तु वे एक क्षण-भर भी सोते नहीं थे। वे रात भर अपना मुँह और सिर दीवार पर रगड़ते रहते थे और उनके सारे भूमण्डल में घाव हो गये थे।

तिन द्वारे कपाट, प्रभु झायेन बाहिरे । कभु सिंह-द्वारे पड़े, कभु सिन्धु-नीरे ॥

८॥

यद्यपि घर के तीनों दरवाजे सदैव बन्द रहते थे, किन्तु फिर भी महाप्रभु हर चले जाते थे। कभी वे जगन्नाथ मन्दिर के सिंहद्वार पर पाये जाते थे और कभी वे समुद्र में गिर पड़ते थे।

चटक पर्वत देखि' 'गोवर्धन' भ्रमे ।धाञा चले आर्त-नाद करिया क्रन्दने ॥

९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु बालू के टीलों को गोवर्धन पर्वत समझकर तेजी ॥

दौड़ते। दौड़ते समय महाप्रभु उच्च स्वर में विलाप तथा क्रन्दन करते।

उपवनोद्यान देखि' वृन्दावन-ज्ञान ।।ताहाँ ग्राइ' नाचे, गाय, क्षणे मूच्र्छा ग्रा'न ॥

१०॥

कभी-कभी श्री चैतन्य महाप्रभु को नगर के छोटे छोटे उद्यानों से वृन्दावन का भ्रम हो जाता। कभी वे वहाँ जाते, नाचते और कीर्तन करते और कभी-कभी आध्यात्मिक भावावेश में अचेत हो जाते।

काहाँ नाहि शुनि येइ भावेर विकार ।।सेइ भाव हय प्रभुरे शरीरे प्रचार ॥

११॥

दिव्य भावों के कारण महाप्रभु के शरीर में जो अद्वितीय विकार प्रकट होते, वे उनके अतिरिक्त किसी अन्य के शरीर में सम्भव नहीं है।

हस्त-पदेर सन्धि सब वितस्ति-प्रमाणे ।।सन्धि छाड़ि' भिन्न हये, चर्म रहे स्थाने ॥

१२ ॥

कभी-कभी उनके हाथों तथा पैरों के जोड़ आठ इंच (एक बित्ता) के अलग हो जाते थे और ऊपर से केवल चमड़ी से जुड़े रहते थे।

हस्त, पद, शिर सब शरीर-भितरे ।प्रविष्ट हय कूर्म-रूप देखिये प्रभुरे ॥

१३॥

कभी-कभी श्री चैतन्य महाप्रभु के हाथ, पैर तथा सिर उनके शरीर के भीतर उसी तरह समा जाते, जिस प्रकार कछुआ अपने अंगों को भीतर समेट लेता है।

एइ मत अद्भुत-भाव शरीरे प्रकाश ।। मनेते शून्यता, वाक्ये हा-हा-हुताश ॥

१४॥

इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु अद्भुत भावपूर्ण लक्षण (भाव) प्रकट करते थे। उनका मन शून्य प्रतीत होता और उनके शब्दों में निराशा तथा हताशा प्रकट होती।

काहाँ मोर प्राण-नाथ मुरली-वदन ।। काहाँ करों काहाँ पाँ व्रजेन्द्र-नन्दन ॥

१५॥

श्री चैतन्य महाप्रभु अपने मन के भाव इस प्रकार प्रकट करते, मुरली वादन करने वाले मेरे प्राणनाथ कहाँ हैं? अब मैं क्या करूँ? मैं महाराज नन्द के बेटे को ढूंढने कहाँ जाऊँ? काहारे कहिब, केबा जाने मोर दु:ख ।। व्रजेन्द्र-नन्दन विनु फाटे मोर बुक ॥

१६॥

मैं किससे कहूँ? मेरे दुःख को कौन समझ सकेगा? नन्द महाराज के पुत्र के बिना मेरा हृदय फटा जा रहा है।

एड-मत विलाप करे विह्वल अन्तर ।। रायेर नाटक-श्लोक पड़े निरन्तर ॥

१७॥

इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु कृष्ण के विरह में सदैव अपनी विह्वलता प्रकट करते और विलाप करते। ऐसे अवसरों पर वे रामानन्द राय के नाटक, जगन्नाथ-वल्लभ-नाटक से श्लोक का उच्चारण करते।

प्रेम-च्छेद-रुजोऽवगच्छति हरिर्नायं न च प्रेम वा ।स्थानास्थानमवैति नापि मदनो जानाति नो दुर्बलाः ।। अन्यो वेद न चान्य-दुःखमखिलं नो जीवनं वाश्रवंद्वि-त्राण्येव दिनानि यौवनमिदं हा-हा विधे को गतिः ॥

१८॥

। [ श्रीमती राधारानी विलाप किया करती थीं :हमारा कृष्ण इस पर कोई ध्यान नहीं देता कि हमने प्रेम-सम्बन्ध में न जाने कितनी चोटें सही हैं। वास्तव में प्रेम में हमारा दुरुपयोग किया गया है, क्योंकि प्रेम यह नहीं । जानता कि कहाँ प्रहार किया जाय और कहाँ नहीं। यहाँ तक कि कामदेव भी हमारी असहाय अवस्था से परिचित नहीं है। मैं किसी से क्या कहूँ? कोई दूसरे की कठिनाइयों को नहीं समझ सकता। हमारा जीवन वास्तव में हमारे वश में नहीं रहा, क्योंकि यौवन तो दो-तीन दिन रहेगा और शीघ्र ही समाप्त हो जायेगा। ऐसी अवस्था में हे विधाता, हमारी गति क्या होगी? उपजिल प्रेमाङ्कर, भाङ्गिल ग्रे दुःख-पूर,कृष्ण ताहा नाहि करे पान ।।बाहिरे नागर-राज, भितरे शठेर काज,पर-नारी वधे सावधान ॥

१९॥

। । कृष्ण के विरह में दुःखी श्रीमती राधारानी ने इस प्रकार कहा : ओह! मैं अपने दुःख के बारे में क्या कहूँ? कृष्ण से मिलने के बाद ही प्रेम का अंकुर फूटा, किन्तु उनसे विलग होने पर मुझे इतना बड़ा जा लगा कि वह व्याधि की तरह जाने का नाम नहीं ले रहा। इस व्याधि १ एकमात्र वैद्य स्वयं कृष्ण हैं, किन्तु वे भक्ति के इस अंकुरित पौधे की । चिन्ता नहीं कर रहे। मैं कृष्ण के व्यवहार के बारे में क्या कहूँ? र से वे एक आकर्षण तरुण प्रेमी हैं, किन्तु भीतर से महा ठग हैं और रों की पत्नियों को मारने में अत्यन्त निपुण हैं।

सखि हे, ना बुझिये विधिर विधान सुख लागि' कैलँ प्रीत, हैल दुःख विपरीत, ।एबे ग्राय, ना रहे पराण ॥

२०॥

[कृष्ण से प्रेम करने के परिणामों के विषय में श्रीमती राधारानी ने आगे कहा : हे सखी, मैं विधाता के विधान को नहीं समझ पा रही। मैंने तो सुख के लिए कृष्ण से प्रेम किया था, किन्तु परिणाम बिल्कुल विपरीत निकला। अब मैं दु:ख के सागर में डूब रही हूँ। हो सकता है कि मैं अब मरने वाली हैं, क्योंकि मेरी जीवनी-शक्ति चुक गई है। ऐसी है मेरी मानसिक दशा।

कुटिल प्रेमा अगेयान, नाहि जाने स्थानास्थान,भाल-मन्द नारे विचारिते ।। क्रूर शठेर गुण-डोरे, हाते-गले बान्धि' मोरे,राखियाछे, नारि' उकाशिते ॥

२१॥

प्रेम-व्यापार प्रकृति से कुटिल होते हैं। उनमें पर्याप्त ज्ञान से प्रवेश नहीं किया जाता, न ही वे इसका विचार करते हैं कि कोई स्थान उपयुक्त है या नहीं। न ही वे परिणामों की चिन्ता करते हैं। क्रूर कृष्ण ने अपने सद्गुणों की डोरी से मेरा गला तथा मेरे हाथ बाँध दिये हैं और अब मैं सुख पाने में असमर्थ हूँ।

ये मदन तनु-हीन, पर-द्रोहे परवीण, पाँच बाण सन्धे अनुक्षण ।। अबलार शरीरे, विन्धि' कैल जरजरे, दुःख देय, ना लय जीवन ॥

२२॥

मेरे प्रेम सम्बन्ध में मदन नाम का एक व्यक्ति है। उसके गुण इस कार है-उसका कोई स्थूल शरीर नहीं है, किन्तु वह अन्यों को पीड़ा ने में बहुत ही प्रवीण है। उसके पास पाँच बाण हैं, जिन्हें वह अपने धनुष्य पर चढ़ाकर निर्दोष स्त्रियों के शरीर में सन्धान करता है। इस प्रकार ये स्रियाँ जर्जर हो जाती हैं। अच्छा तो यह होता कि वह बिना हिचक के । प्राण ले लेता, किन्तु वह ऐसा नहीं करता। वह मुझे केवल पीड़ा देता हैं अन्येर ये दुःख मने, अन्ये ताहा नाहि जाने,सत्य एइ शास्त्रेर विचारे । अन्य जन काहाँ लिखि, ना जानये प्राण-सखी,झाते कहे धैर्य धरिबारे ॥

२३॥

शास्त्रों में कहा गया है कि एक मनुष्य दूसरे के मन के दुःख को नहीं जान सकता। अतएव मैं ललिता तथा अपनी अन्य प्रिय सखियों के बारे में क्या कह सकती हूँ? न ही वे मेरे अन्तर के दुःख को समझ सकती हैं। वे बारम्बार यही कहकर मुझे सान्त्वना देती हैं ‘हे सखी, धैर्य धरो।'

‘कृष्ण कृपा-पारावार, कभु करिबेन अङ्गीकार'सखि, तोर ए व्यर्थ वचन ।। जीवेर जीवन चञ्चल, ग्रेन पद्म-पत्रेर जल,तत दिन जीवे कोन्जन ॥

२४॥

मैं कहती हैं, 'हे सखियों, तुम मुझे यह कहकर धैर्य धरने को कहती हो कि कृष्ण कृपासिन्धु हैं और एक न एक दिन मुझे स्वीकार कर लेंगे। किन्तु मैं बतला हूँ कि मुझे इससे सान्त्वना नहीं मिल सकेगी। जीव का जीवन क्षणभंगुर है। यह कमल की पंखुड़ी पर टिके जल के समान है। कृष्ण-कृपा की आशा में भला इतने दिन कौन जीवित रहेगा? शत वत्सर पर्यन्त, जीवेर जीवन अन्त,एइ वाक्य कह ना विचारि' ।। नारीर यौवन-धन, यारे कृष्ण करे मन,से यौवन-दिन दुइ-चारि ॥

२५॥

मनुष्य सौ वर्ष से अधिक जीवित नहीं रहता। तुम्हें यह भी विचार करना होगा कि स्त्री का यौवन, जो कृष्ण का एकमात्र आकर्षण है, कुछ 0 दिनों तक रहता है।

अग्नि ग्रैछे निज-धाम, देखाइया अभिराम,पतङ्गीरे आकर्षिया मारे ।। कृष्ण ऐछे निज-गुण, देखाइया हरे मन,पाछे दुःख-समुद्रेते डारे ॥

२६ ॥

यदि तुम यह कहती हो कि कृष्ण दिव्य गुणों के सागर हैं, अतएव कभी न कभी दयालु होंगे, तो मुझे इतना ही कहना है कि वे उस अग्नि के समान हैं, जो अपनी चकाचौंध से पतंगों को आकृष्ट करती है और उन्हें मार डालती है। कृष्ण के गुण ऐसे हैं। वे अपने दिव्य गुण दिखलाकर वे हमारे मनों को आकृष्ट करते हैं और बाद में हमसे विलग होकर हमें दुः के सागर में डुबा देते हैं।

एतेक विलाप करि', विषादे श्री-गौरहरि,उघाड़िया दुःखेर कपाट ।। भावेर तरङ्ग-बले, नाना-रूपे मन चले, आर एक श्लोक कैल पाठ ॥

२७॥

इस प्रकार श्री चैतन्य महाप्रभु विषाद के महासागर में विलाप करते। और अपने दुःख के द्वारों को खोल देते थे। भाव की तरंगों के वशीभूत होकर उनको मन दिव्य रसों में विचरण करता और इस तरह वे एक अन्य श्लोक का उच्चारण करते ( जो निम्न है)।

श्री-कृष्ण-रूपादि-निषेवणं विनाव्यर्थानि मेऽहान्यखिलेन्द्रियाण्यलम् । पाषाण-शुष्केन्धन-भारकाण्यहोबिभर्मि वा तानि कथं हत-त्रपः ॥

२८ ॥

हे सखियों, यदि मैं श्रीकृष्ण के दिव्य रूप, गुणों तथा लीलाओं को सेवा नहीं करती, तो मेरे सारे दिन तथा मेरी सारी इन्द्रियाँ पूर्णतया व्यर्थ हो आयेंगे। अभी मैं पत्थर तथा सूखी लकड़ी जैसी अपनी इन्द्रियों का भार व ही ढो रही हूँ। मैं नहीं जानती कि निर्लज्ज बनकर कब तक मैं यह र दोती रहूंगी।'

वंशी-गानामृत-धाम, लावण्यामृत-जन्म-स्थान,ने ना देखे से चाँद वदन ।।से नयने किबा काज, पड़क तार मुण्डे वाज,से नयन रहे कि कारण ॥

२९॥

उस मनुष्य की आँखों का क्या लाभ, जो कृष्ण के उस चन्द्र ।। मुख को नहीं देखता, जो सारी सुन्दरता का जन्मस्थान है और उनकी वंशी के अमृततुल्य गीतों का आगार है? अरे! उस मनुष्य के सिर पर वज्रपात हो जाये! उसने ऐसी आँखें क्यों रखी हैं? सखि हे, शुन, मोर हत विधि-बल मोर वपु-चित्त-मन, सकल इन्द्रिय-गण, ।।कृष्ण विनु सकल विफले ॥

३०॥

हे सखियों, कृपया मेरी बात सुनो। विधाता द्वारा प्रदत्त मेरी सारी । शक्ति जाती रही है। कृष्ण के बिना मेरा शरीर, मेरी चेतना, मन तथा उसी के माथ मेरी सारी इन्द्रियाँ व्यर्थ हैं।

कृष्णेर मधुर वाणी, अमृतेर तरङ्गिणी, तार प्रवेश नाहि ये श्रवणे । कोणाकड़ि-छिद्र सम, जानिह से श्रवण,तार जन्म हैल अकारणे ॥

३१॥

कृष्ण की कथाएँ अमृत की तरंगों के समान हैं। यदि ऐसा अमृत किमी के कानों में प्रविष्ट नहीं करता, तो वे कान टूटे शंख के छिद्र के अमान हैं। ऐसे कान को बनाने का प्रयोजन व्यर्थ है।

कृष्णेर अधरामृत, कृष्ण-गुण-चरित,सुधा-सार-स्वाद-विनिन्दन ।। तार स्वाद ये ना जाने, जन्मिया ना मैल केने,से रसना भेक जिह्वा सम ॥

३२॥

भगवान् कृष्ण के होठों का अमृत तथा उनके दिव्य गुण और चरि, सभी अमृत के सार के स्वाद को तुच्छ बनाने वाले हैं, और ऐसे अमृत का आस्वादन करने में कोई दोष नहीं है। जो इसका आस्वादन नहीं करता, उसे जन्म लेते ही मर जाना चाहिए और उसकी जीभ मेंढक की जीभ ।। समान समझी जानी चाहिए।

मृग-मद नीलोत्पल, मिलने ग्रे परिमल,येइ हरे तार गर्व-मान ।। हेन कृष्ण-अङ्ग-गन्ध, यार नाहि से सम्बन्ध,सेइ नासा भस्त्रार समान ॥

३३॥

कृष्ण के शरीर की सुगन्ध कस्तूरी की सुगन्ध के साथ मिली नी कमल के फूल की सुगन्ध के समान है। जिसने कृष्ण की इस सुगन्धको नहीं हूँघा, उसके नथुने लोहार की धौंकनी के तुल्य हैं। वस्तुतः ऐसी सुगन्ध कृष्ण के शरीर की सुगन्ध के आगे फीकी पड़ जाती है।

कृष्ण-कर-पद-तल, कोटि-चन्द्र-सुशीतल,तार स्पर्श ग्रेन स्पर्श-मणि ।। तार स्पर्श नाहि ग्रार, से ग्राउक्छारखार,सेइ वपु लौह-सम जानि ॥

३४॥

कृष्ण के हाथ तथा पैर के तलवे इतने शीतल और सुहावने हैं कि उनकी उपमा करोड़ों चन्द्रमाओं के प्रकाश से ही दी जा सकती है। जिसने के हाथों तथा पैरों का स्पर्श किया है, उसने सचमुच पारस पत्थर के प्रभाव का अनुभव किया है। यदि किसी ने उनका स्पर्श नहीं किया, तो का जीवन व्यर्थ है और उसका शरीर लोहे के समान है।

करि' एत विलपन, प्रभु शची-नन्दन, उघाड़िया हृदयेर शोक ।। दैन्य-निर्वेद-विषादे, हृदयेर अवसादे,पुनरपि पड़े एक श्लोक ॥

३५॥

इस प्रकार विलाप करते हुए श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने हृदय के । भीतर शोक के कपाट खोल दिये। उन्होंने हताश, दीन एवं उदास होका अवसाद भरे हृदय से बार-बार एक श्लोक पढ़ा।

यदा ग्रातो दैवान्मधु-रिपुरसौ लोचन-पथंतदास्माकं चेतो मदन-हतकेनाहृतमभूत् । पुनर्यस्मिन्नेष क्षणमपि दृशोरेति पदवींविधास्यामस्तस्मिन्नखिल-घटिका रत्न-खचिताः ॥

३६॥

। पदि दैववश कृष्ण का दिव्य रूप मेरी दृष्टि के सामने आये, तो में व्यथित मेरा हृदय, मूर्तिमन्त आनन्द रूप कामदेव द्वारा चुरा लिया। गा। चूंकि मैं कृष्ण के सुन्दर रूप को जी-भरकर नहीं देख सकी, । जिस क्षण मैं इस रूप को पुनः देखेंगी, तो उस क्षण को मैं अनेक में अलंकृत करूंगी।'

ग्रे काले वा स्वपने, देखिनु वंशी-वदने,सेइ काले आइला दुइ वैरि ।।‘आनन्द' आर ‘मदन', हरि' निल मोर मन,देखिते ना पाइनु नेत्र भरि' ॥

३७॥

जब भी, यहाँ तक कि स्वप्न में भी, मुझे कृष्ण के मुख तथा उनकी वंशी के दर्शन का अवसर मिलता था, तो मेरे सामने दो शत्रु प्रकट हो जाते थे-आनन्द तथा कामदेव। चूंकि ये मेरे चित्त को हर लेते थे, अतएव में। नेत्र-भरकर कृष्ण के मुख को न देख सकी।

पुनः यदि कोन क्षण, कराय कृष्ण दरशनतबे सेइ घटी-क्षण-पल ।। दिया माल्य-चन्दन, नाना रत्न-आभरण,अलङ्कृत करिमु सकल ॥

३८ ॥

यदि दैववश ऐसा क्षण आये कि मैं पुनः कृष्ण को देख पाऊँ तो उन क्षणों, घड़ियों तथा घंटों की फूल की मालाओं तथा चन्दन-लेप में। पूजा करूंगी और उन्हें सभी प्रकार के रत्नों तथा आभूषणों से सजाऊँगी। ।

क्षणे बाह्य हैल मन, आगे देखे दुइ जन,ताँरै पुछे,—आमि ना चैतन्य?।।स्वप्न-प्राय कि देखिनु, किबा आमि प्रलापिनु,तोमरा किछु शुनियाछ दैन्य? ॥

३९॥

क्षण भर में श्री चैतन्य महाप्रभु को बाह्य चेतना आ गई और उन्होंने ने पपक्ष दो व्यक्तियों को देखा। महाप्रभु ने उनसे पूछा, क्या मैं सचेत मैं कौन से स्वपन देख रहा था? मैं कैसा प्रलाप कर रहा था? क्या सैन्य के कुछ वचन सुने ? शुन मोर प्राणेर बान्धव नाहि कृष्ण-प्रेम-धन, दरिद्र मोर जीवन, ।।देहेन्द्रिय वृथा मोर सब ॥

४०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, हे मित्रों, तुम लोग मेरे प्राण हो, अतएव मैं तुम्हें बतलाता हूँ कि मेरे पास कृष्ण-प्रेमरूपी धन नहीं है। इसलिए मेरा जीवन दरिद्र है। मेरे अंग तथा इन्द्रियाँ व्यर्थ हैं।

पुनः कहे,—हाय हाय, शुन, स्वरूप-रामराय,एइ मोर हृदय-निश्चय ।। शुनि करह विचार, हय, नय---कह सार, एत बलि' श्लोक उच्चारय ॥

४१॥

निराशाभरे शब्दों में उन्होंने पुनः स्वरूप दामोदर तथा राय रामानन्द को सम्बोधित किया, हाय! मेरे मित्रों, अब तुम मेरे हृदय के निश्चय को जान सकते हो और यह जान लेने के बाद तुम यह निर्णय करो कि मैं सही हूँ या नहीं। तुम इस बारे में ठीक से कह सकते हो। इसके बाद श्री । महाप्रभु ने दूसरे श्लोक का उच्चारण किया।

क-इ-अवरहि-अं पेम्मं ण हि होइ माणुसे लोए । ज-इ होइ कस्स विरहे होन्तम्मि को जीअ-इ ॥

४२॥

छलसहित भगवत्प्रेम इस भौतिक जगत् में सम्भव नहीं है। यदि ऐसा , तो उसमें विरह नहीं हो सकता, क्योंकि विरह में कोई कैसे जीवित रह सकता है?' अकैतव कृष्ण-प्रेम, ग्रेन जाम्बूनद-हेम,सेइ प्रेमा नृलोके ना हय ।। यदि हय तार योग, ना हय तबे वियोग, वियोग हैले केह ना जीयय ॥

४३॥

कृष्ण का शुद्ध प्रेम जाम्बू नदी से मिलने वाले सोने की तरह है, जो मानव समाज में नहीं पाया जाता। यदि यह होता तो इसमें वियोग नहीं होता। वियोग होने से कोई जीवित नहीं रह सकता।

एत कहि' शची-सुत, श्लोक पड़े अद्भुत,शुने मुँहे एक-मन हा । आपन-हृदय-काज, कहिते वासिये लाज, तबु कहि लाज-बीज खाजा ॥

४४॥

। इस प्रकार कहते हुए श्रीमती शचीमाता के पुत्र ने एक दूसरा अद्भुत श्लोक सुनाया, जिसे रामानन्द राय एवं स्वरूप दामोदर ने एकाग्र चित्त से सुना। श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मैं अपने मन के कार्य बताने में लज्जा का अनुभव कर रहा हूँ। फिर भी मैं सारी औपचारिकताओं को छोड़कर अपने मन की बात कहूँगा। सुनो। ।

न प्रेम-गन्धोऽस्ति दरापि मे हरौक्रन्दामि सौभाग्य-भरं प्रकाशितुम् ।। वंशी-विलास्यानन-लोकनं विनाबिभर्मि ग्रत्प्राण-पतङ्गकान्वृथा ॥

४५ ॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने आगे कहा, हे मित्रों, मेरे हृदय में रंचमात्र भी भगवत् प्रेम नहीं है। जब तुम लोग मुझे विरह में रोते देखते हो, तो मैं अपने पाम सौभाग्य का मात्र झूठा प्रदर्शन कर रहा होता हूँ। निस्सन्देह, मुरली बजाते हुए कृष्ण के सुन्दर मुखमण्डल का दर्शन किये बिना मैं एक कीट भी तरह व्यर्थ जीवन व्यतीत कर रहा हूँ।

दूरे शुद्ध-प्रेम-गन्ध, कपट प्रेमेर बन्ध,सेह मोर नाहि कृष्ण-पाय ।। तबे ये करि क्रन्दन, स्व-सौभाग्य प्रख्यापन,करि, इहा जानिह निश्चय ॥

४६॥

वास्तव में मुझे कृष्ण से बिल्कुल भी प्रेम नहीं है। मैं जो भी करता हूँ, वह सब कपटपूर्ण भगवत्प्रेम का दिखावा है। जब मैं रोता हूँ, तो मात्र अपने सौभाग्य का मिथ्या प्रदर्शन करता हूँ। इसे निश्चत रूप से जानो।

ग्राते वंशी-ध्वनि-सुख, ना देखि' से चाँद मुख,यद्यपि नाहिक 'आलम्बन' । निज-देहे करि प्रीति, केवल कामेर रीति,प्राण-कीटेर करिये धारण ॥

४७॥

यद्यपि मैं वंशी बजाते हुए कृष्ण का चन्द्रमुख नहीं देख पाता, न ही मेरी उनसे भेंट होने की कोई सम्भावना है, तब भी मैं अपने शरीर की देखभाल करता हूँ। यही कामवासना की रीति है। इस प्रकार मैं अपने कीट सदृश जीवन को धारण किए रहता हूँ।

कृष्ण-प्रेमा सुनिर्मल, ग्रेन शुद्ध-गङ्गा-जल, सेइ प्रेमा-अमृतेर सिन्धु ।। निर्मल से अनुरागे, ना लुकाय अन्य दागे,शुक्ल-वस्त्रे त्रैछे मसी-बिन्दु ॥

४८॥

। कृष्ण-प्रेम गंगाजल के समान अत्यन्त शुद्ध है। ऐसा प्रेम अमृत का म है। कृष्ण के प्रति ऐसा शुद्ध अनुराग किसी दाग को नहीं छिपाता, भी मफेद वस्त्र पर स्याही के दाग के समान दिखता है।

शुद्ध-प्रेम-सुख-सिन्धु, पाइ तार एक बिन्दु,सेइ बिन्दु जगत्डुबाय ।। कहिबार योग्य नय, तथापि बाउले कय, कहिले वा केबा पातियाय ॥

४९॥

शुद्ध कृष्ण-प्रेम सुख के सागर जैसा है। यदि किसी को उसकी एक बूंद भी मिल जाये, तो उस बूंद में सारा संसार डूब सकता है। यद्यपि ऐसे भगवत्प्रेम को व्यक्त करना उचित नहीं है, तथापि एक उन्मत्त व्यक्ति उसे कह देगा। किन्तु उसके कहने पर भी उस पर कोई विश्वास नहीं करता।

एई मत दिने दिने, स्वरूप-रामानन्द-सने,निज-भाव करेन विदित । बाह्ये विष-ज्वाला हये, भितरे आनन्द-मय,कृष्ण-प्रेमार अद्भुत चरित ॥

५०॥

। इस प्रकार चैतन्य महाप्रभु नित्य प्रति इन भावों का आनन्द लेते और भा को स्वरूप तथा रामानन्द के सामने प्रकट करते। ऊपर से तो नाण कष्ट प्रतीत होता था, मानों महाप्रभु किसी विषैले प्रभाव से त हो, किन्तु हृदय में वे आनन्द का अनुभव करते थे। कृष्ण के दिव्य का यही गुण है।

एइ प्रेमा-आस्वादन, तप्त-इक्षु-चर्वण,मुख ज्वले, ना ग्राय त्यजन ।। सेइ प्रेमा ग्राँर मने, तार विक्रम सेइ जाने,विषामृते एकत्र मिलन ॥

५१॥

। । जो ऐसे भगवत्-प्रेम का आस्वादन करता है, वह इसकी तुलना गर्म = (ई) से करता है। गर्म गन्ने को यदि कोई चबाता है, तो उसका लता है, फिर भी वह उसे छोड़ नहीं सकता। इसी प्रकार किसी में यदि लेश मात्र भी भगवत्प्रेम हो, तो वह इसके सशक्त प्रभाव का अनुभव कर सकता है। इसकी तुलना अमृत और विष के मिश्रण से ही की जा सकती हैं। पीड़ाभिर्नव-काल-कूट-कटुता-गर्वस्य निर्वासनोनिस्यन्देन मुदां सुधा-मधुरिमाहङ्कार-सङ्कोचनः । प्रेमा सुन्दरि नन्द-नन्दन-परो जागर्ति ग्रस्यान्तरे ।ज्ञायन्ते स्फुटमस्य वक़-मधुरास्तेनैव विक्रान्तयः ॥

५२॥

चैतन्य महाप्रभु ने कहा, हे सुन्दरियों, यदि कोई भगवत्प्रेम अर्थात् नन्द महाराज के पुत्र, कृष्ण के प्रति प्रेम जाग्रत कर लेता है, तो उसके हृदय में इस प्रेम के कड़वे तथा मीठे सभी प्रभाव प्रकट होंगे। ऐसा भगवत्प्रेम दो प्रकार से कार्य करता है। भगवत्प्रेम का विषैला प्रभाव सर्प के ताजे तथा तीव्र विष को भी पराजित करनेवाला है। तथापि उसी के साथ ऐसा दिव्य आनन्द भी मिलता है, जो अमृत के अहंकार को चूर करके उसके मान को घटाता है। दूसरे शब्दों में, कृष्ण-प्रेम इतना शक्तिशाली है कि वह सर्प के विषैले प्रभाव के साथ-साथ सिर पर गिरने वाले अमृत से प्राप्त सुख को भी परास्त करने वाला होता है। इसका अनुभव दो रूपों में किया जाता है-एक साथ विषैला तथा अमृततुल्य।

ग्रे काले देखे जगन्नाथ-श्रीराम-सुभद्रा-साथ,तबे जाने–आइलाम कुरुक्षेत्र ।। सफल हैल जीवन, देखिलँ पद्म-लोचन,जुड़ाइल तनु-मन-नेत्र ॥

५३॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथजी को श्री बलराम तथा सुभद्रा के माथ देखते, तो वे तुरन्त सोचने लगते कि वे कुरुक्षेत्र पहुँच गये हैं, जहाँ १ सय आये थे। वे अपने जीवन को कृतार्थ समझते, क्योंकि उन्होंने उन कमलनयन के दर्शन किये हैं, जो अपने दर्शन से तन, मन तथा नेत्रों को शान्त करने वाले हैं।

गरुड़ेर सन्निधाने, रहि' करे दरशने,से आनन्देर कि कहिब ब'ले ।। गरुड़-स्तम्भेर तले, आछे एक निम्न खाले,से खाल भरिल अश्रु-जले ॥

५४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु गरुड़-स्तम्भ के पास खड़े रहकर भगवान जगन्नाथ का दर्शन करते थे। भला उस प्रेम के बल के विषय में क्या। कहा जा सकता है? उस गरुड़-स्तम्भ के नीचे भूमि पर एक गहरी नाली थी, जो उनके अश्रु-जल से भर जाती थी।

ताहाँ हैते घरे आसि', माटीर उपरे वसि',नखे करे पृथिवी लिखन ।। हा-हा काहाँ वृन्दावन, काहाँ गोपेन्द्र-नन्दन,काहाँ सेइ वंशी-वदन ॥

५५॥

जगन्नाथ-मन्दिर से घर लौटकर श्री चैतन्य महाप्रभु भूमि पर बैठा और अपने नाखूनों से उसे कुरेदते। ऐसे अवसर पर वे अत्यन्त दुःखी हो प्रलाप करते, हाय, वृन्दावन कहाँ है? गोपेन्द्रनन्दन कृष्ण कहाँ हैं? वंशी बजाने वाला कहाँ है? काहाँ से त्रि-भङ्ग-ठाम, काहाँ सेइ वेणु-गान,काहाँ सेइ यमुना-पुलिन ।। काहाँ से रास-विलास, काहाँ नृत्य-गीत-हास,काहाँ प्रभु मदन-मोहन ॥

५६॥

भी चैतन्य महाप्रभु यह कहकर विलाप किया करते, त्रिभंगी कृष्ण हैं? कहाँ है उनकी बाँसुरी का मधुर गान? कहाँ है यमुना का तट? । रास-नृत्य? कहाँ है वह नृत्य, गीत और हँसी? कहाँ है मेरे नाथ मोहन, जो कामदेव को मोहत करने वाले हैं? उठिल नाना भावावेग, मने हैल उद्वेग,क्षण-मात्र नारे गोडाइते ।। प्रबल विरहानले, धैर्य हैल टलमले, नाना श्लोक लागिला पड़िते ॥

५७॥

इस प्रकार विविध भावावेग उत्पन्न होते और चैतन्य महाप्रभु का मन उद्विग्न हो उठता। वे एक क्षण भी निश्चिन्त नहीं रह पाते। इस तरह विरह की प्रबल भावनाओं के कारण उनका धैर्य छूटने लगता और वे विभिन्न श्लोकों का उच्चारण करने लगते।।

अमून्यधन्यानि दिनान्तराणिहरे त्वदालोकनमन्तरेण ।। अनाथ-बन्धो करुणैक-सिन्धोहा हन्त हा हन्त कथं नयामि ॥

५८॥

हे प्रभु, हे पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान्, हे अनाथों के मित्र! आप एकमात्र कृपा के सागर हैं। चूंकि मैं आपसे मिल नहीं पाया, इसलिए मेरे अशुभ दिन तथा रातें असह्य हो गये हैं। मैं समझ नहीं पा रहा कि मैं अपना समय किस तरह व्यतीत करूं?' तोमार दर्शन-विने, अधन्य ए रात्रि-दिने,एड काल ना ग्राय काटन ।। तुमि अनाथेर बन्धु, अपार करुणा-सिन्धु, कृपा करि' देह देरशन ॥

५९॥

। आपके दर्शन के अभाव में ये अशुभ दिन तथा रातें कट नहीं रही हैं। समझ में नहीं आता कि यह समय कैसे काटा जाये। किन्तु आप अनाथों के मित्र और करुणा के सागर हैं। कृपा करके अपना दर्शन दें, क्योंकि मैं बहुत संदिग्ध अवस्था में हूँ।

उठिल भाव-चापल, मन हइल चञ्चल,भावेर गति बुझन ना ग्राय ।। अदर्शने पोड़े मन, केमने पाब दरशन,कृष्ण-ठाजि पुछेन उपाय ॥

६०॥

इस प्रकार महाप्रभु भावावेश के कारण अस्थिर हो गये और उनका मन उत्तेजित हो गया। कोई यह समझ नहीं पा रहा था कि यह भाव किभर ले जायेगा। पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण से न मिल पाने के कारण भी चैतन्य महाप्रभु का मन जलने लगा। वे भगवान् कृष्ण से उन तक पहुँचने का उपाय पूछने लगे।

त्वच्छैशवं त्रि-भुवनाद्भुतमित्यवेहि ।मच्चापलं च तव वा मम वाधिगम्यम् । तत्कि करोमि विरलं मुरली-विलासिमुग्धं मुखाम्बुजमुदीक्षितुमीक्षणाभ्याम् ॥

६१ ॥

हे कृष्ण, हे वंशीवादक, आपके बाल्यकाल की माधुरी तीनों लोको में अद्भुत है। आप मेरी चपलता को जानते हैं और मैं आपकी। इस विषय में अन्य कोई नहीं जानता। मैं आपके सुन्दर आकर्षक मुखमण्डल को एकान्त में देखना चाहता हूँ, किन्तु यह कैसे सम्भव होगा?' तोमार माधुरी-बल, ताते मोर चापल,एइ दुइ, तुमि आमि जानि ।। काहाँ करों काहाँ ग्राँ, काहाँ गेले तोमा पाँ,ताहा मोरे कह त' आपनि ॥

६२॥

प्रिय कृष्ण! आपके सुन्दर रूप की शक्ति को केवल मैं या आप भाभते हैं और मेरी अस्थिरता (चपलता) का कारण भी वही है। अब । स्थिति ऐसी है कि समझ में नहीं आता क्या करूँ और कहाँ जाऊँ। आपको कहाँ पा सकता हूँ। मैं तो आपसे ही मार्गदर्शन के लिए कह रहा हूँ ।

नाना-भावेर प्राबल्य, हैल सन्धि-शाबल्य,भावे-भावे हैल महा-रण ।। औत्सुक्य, चापल्य, दैन्य, रोषामर्ष आदि सैन्य,प्रेमोन्माद—सबारे कारण ॥

६३॥

विभिन्न प्रकार के भावों के कारण मन में विरोधी दशाएँ उत्पन्न होती, जिससे विभिन्न प्रकार के भावों में डटकर युद्ध होता था। चिन्ता, चपलता, दीनता, क्रोध तथा अधीरता सैनिकों की भाँति युद्ध करते और इसका कारण था भगवत्-प्रेम का उन्माद।

मत्त-गज भाव-गण, प्रभुर देह-इक्षु-वन, गज-युद्धे वनेर दलन ।। प्रभुर हैल दिव्योन्माद, तनु-मनेर अवसाद,भावावेशे करे सम्बोधन ॥

६४॥

महाप्रभु का शरीर उस गन्ने के खेत के समान था, जिसमें भावरूपी उन्मत्त हाथी प्रवेश कर गये हों। इन हाथियों में युद्ध होने से ईख का सारा गत नष्ट हो गया। इस तरह महाप्रभु के शरीर में दिव्य उन्माद का उदय हुआ और उन्हें मन तथा शरीर में निराशा का अनुभव होने लगा। ऐसी भर दशा में वे इस प्रकार बोलने लगे।

हे देव हे दयित हे भुवनैक-बन्धोहे कृष्ण हे चपल हे करुणैक-सिन्धो ।हे नाथ हे रमण हे नयनाभिरामहा हा कदा नु भवितासि पदं दृशोर्मे ॥

६५॥

हे प्रभु! हे प्रियतम! हे ब्रह्माण्ड के एकमात्र सखा! हे कृष्ण, ।। चपल, हे करुणासिन्धु! हे स्वामी, हे मेरे भोक्ता, हे मेरे नयनाभिराम।।हाय, आप मुझे अब पुनः कब दर्शन देंगे? उन्मादेर लक्षण, कराय कृष्ण-स्फुरण,भावावेशे उठे प्रणय मान ।। सोल्लुण्ठ-वचन-रीति, मान, गर्व, व्याज-स्तुति,कभु निन्दा, कभु वा सम्मान ॥

६६॥

उन्माद के लक्षणों से कृष्ण के स्मरण को प्रोत्साहन मिलता था।भावावेश में प्रेम (प्रणय), मान, मीठे वचनों द्वारा तिरस्कार, गर्व, आदर तथा अप्रत्यक्ष स्तुति जाग्रत होते थे। इस प्रकार कभी कृष्ण की निन्दा होती है। कभी उनका सम्मान होता। तुमि देव क्रीड़ा-रत, भुवनेर नारी व्रत, ताहे कर अभीष्ट क्रीड़न ।। तुमि मोर दयित, मोते वैसे तोमार चित,मोर भाग्ये कैले आगमन ॥

६७॥

राधारानी के मनोभाव में श्री चैतन्य महाप्रभु ने कृष्ण को इस प्रकार सम्बोधित किया : हे प्रभु, आप अपनी लीलाओं में रत हैं और आप अपनी इच्छानुसार ब्रह्माण्ड की सारी स्त्रियों का उपभोग करते हैं। आप मुझ पर अत्यन्त कृपालु हैं। आप अपना ध्यान मेरी ओर दें, क्योंकि भाग्यवश आप मेरे समक्ष प्रकट हुए हैं।

भुवनेर नारी-गण, सबा' कर आकर्षण,ताहाँ कर सब समाधान । तुमि कृष्ण—चित्त-हर, ऐछे कोन पामर,तोमारे वा केबा करे मान ॥

६८ ॥

हे प्रभु, आप ब्रह्माण्ड की सारी स्त्रियों को आकृष्ट करते हैं और वे आती हैं, तब आप उन सबका समाधान करते हैं। आप भगवान् कृष्ण हैं और सबके चित्त को हरने वाले हैं, किन्तु अन्ततः आप हैं लेप (विलासी ) ही। भला आपका सम्मान कौन करेगा? तोमार चपल-मति, एकत्र ना हय स्थिति,ता'ते तोमार नाहि किछु दोष ।। तुमि त' करुणा-सिन्धु, आमार पराण-बन्धु,तोमाय नाहि मोर कभु रोष ॥

६९॥

। हे प्रिय कृष्ण, आपका मन सदैव चंचल रहता है। आप एक स्थान ॥

नहीं रह सकते, किन्तु इसमें आपका दोष नहीं है। आप तो करुणा के मगर हैं, मेरे प्राण-प्रिय हैं। अतएव आपसे रुष्ट होने का कोई कारण नहीं तुमि नाथ-व्रज-प्राण, व्रजेर कर परित्राण, बहु कार्ये नाहि अवकाश ।। तुमि आमार रमण, सुख दिते आगमन,ए तोमार वैदग्ध्य-विलास ॥

७० ॥

हे नाथ, आप वृन्दावन के स्वामी तथा उसके प्राण हैं। कृपा करके वृन्दावन के उद्धार का उपाय कीजिये। हमें अपने अनेक कामों से तनिक भी अवकाश नहीं है। वास्तव में आप मेरे भोक्ता हैं। आप मुझे सुख प्रदान करने के लिए ही प्रकट हुए हैं और यह आपकी दक्ष लीलाओं में से एक है।

मोर वाक्य निन्दा मानि, कृष्ण छाड़ि' गेला जानि,शुन, मोर ए स्तुति-वचन ।। नयनेर अभिराम, तुमि मोर धन-प्राण,हा-हा पुनः देह दरशन ॥

७१॥

मेरे वचनों को निन्दा मानकर भगवान् कृष्ण मुझे छोड़कर चले गये हैं। मैं जानता हूँ कि वे चले गये हैं, किन्तु मेरी स्तुति सुन लीजिये : 'आप मेरे नेत्रों की तुष्टि हो। आप ही मेरे धन और जीवन हो। हाय! कृपया एक । बार फिर मुझे अपना दर्शन दीजिये। ।

स्तम्भ, कम्प, प्रस्वेद, वैवर्य, अश्रु, स्वर-भेद, देह हैल पुलके व्यापित ।। हासे, कान्दे, नाचे, गाय, उठि' इति उति धाय,क्षणे भूमे पड़िया मूर्च्छित ॥

७२॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु के शरीर में विविध विकार प्रकट होते थेलाभत होना, कांपना, पसीना आना, रंग फीका पड़ना, रोना और गला रुँधना। इस प्रकार उनका सारा शरीर दिव्य आनन्द से व्याप्त रहता था। फलस्वरूप श्री चैतन्य महाप्रभु कभी हँसते, कभी रोते, कभी नाचते तो कभी गाते थे। कभी वे उठकर इधर-उधर दौड़ते और कभी भूमि पर गिर जाते और अचेत हो जाते।

मूच्छय हैल साक्षात्कार, उठि' करे हुहुङ्कार,कहे—एइ आइला महाशय ।। कृष्णेर माधुरी-गुणे, नाना भ्रम हय मने, श्लोक पड़ि' करये निश्चय ॥

७३॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु अचेत थे, तब उनकी भेंट पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् से हुई। फलस्वरूप वे तुरन्त उठकर जोर से हुंकार करने लगे और उन्होंने ऊँचे स्वर में घोषित किया, महापुरुष कृष्ण अब उपस्थित हैं। इस प्रकार कृष्ण के मधुर गुणों के कारण चैतन्य महाप्रभु को मन में तरह-तरह के भ्रम होते थे। वे निम्नलिखित श्लोक को पढ़कर भगवान् कृष्ण की उपस्थिति सुनिश्चित करते थे।

मारः स्वयं नु मधुर-द्युति-मण्डलं नु।माधुर्यमेव नु मनो-नयनामृतं नु । वेणी-मृजो नु मम जीवित-वल्लभो नु।कृष्णोऽयमभ्युदयते मम लोचनाय ।। ७४ ॥

राधारानी के भाव में श्री चैतन्य महाप्रभु ने गोपियों को सम्बोधित किया, हे सखियों, कदम्ब पुष्प के समान तेजस्वी, साक्षात् माधुर्य, मेरी आँखों तथा मन के अमृत, गोपियों के बालों को शिथिल करने वाले, दिव्य आनन्द के परम स्रोत और मेरे जीवन-प्राण रूपी मूर्तिमान कामदेव कृष्ण कहाँ हैं? क्या वे मेरे नेत्रों के समक्ष दोबारा प्रकट हुए हैं?' किबा एई साक्षात्काम, द्युति-बिम्ब मूर्तिमान्,कि माधुर्य स्वयं मूर्तिमन्त ।। किबा मनो-नेत्रोत्सव, किबा प्राण-वल्लभ,सत्य कृष्ण आइला नेत्रानन्द ॥

७५॥

तब श्री चैतन्य महाप्रभु इस प्रकार कहने लगे, “क्या कदम्ब वृक्ष के तेज एवं प्रतिबिम्ब के साथ साक्षात् कामदेव उपस्थित है? क्या ये वही व्यक्ति हैं, जो साक्षात् माधुर्य हैं, जो मेरी आँखों तथा मन के आनन्द हैं, जो मेरे जीवन और प्राण हैं? क्या सचमुच कृष्ण मेरी आँखों के सामने आ गये हैं? गुरु नाना भाव-गण, शिष्य—प्रभुर तनु-मन,नाना रीते सतत नाचाय ।निर्वेद, विषाद, दैन्य, चापल्य, हर्ष, धैर्य, मन्यु,एइ नृत्ये प्रभुर काल ग्राय ॥

७६ ॥

जिस प्रकार गुरु शिष्य को डांटता है और उसे भक्ति की कला मरवृलाता है, उसी प्रकार निर्वेद ( उदासी), विषाद, दीनता, चंचलता, आर्य, धैर्य और क्रोध आदि भाव महाप्रभु के शरीर तथा मन को शिक्षा देते थे। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु अपना समय बिताते थे।

चण्डीदास, विद्यापति, रायेर नाटक-गीति,कर्णामृत, श्री-गीत-गोविन्द ।। स्वरूप-रामानन्द-सने, महाप्रभु रात्रि-दिने,गाय, शुने—परम आनन्द ॥

७७॥

वे अपना समय पुस्तकें पढ़ने तथा चण्डीदास और विद्यापति द्वारा रचित गीत गाने और जगन्नाथ वल्लभ नाटक, कृष्णकर्णामृत तथा गीतगोविन्द के उद्धरण सुनने में बिताते थे। इस तरह स्वरूप दामोदर तथा राय रामानन्द के साथ श्री चैतन्य महाप्रभु परम आनन्द के साथ कीर्तन एवं श्रवण करके दिन तथा रात व्यतीत करते थे।

पुरीर वात्सल्य मुख्य, रामानन्देर शुद्ध-सख्य,गोविन्दाद्येर शुद्ध-दास्य-रस ।। गदाधर, जगदानन्द, स्वरूपेर मुख्य रसानन्द,एइ चारि भावे प्रभु वश ॥

७८ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को अपने पार्षदों में परमानन्द पुरी से वात्सल्य, रामानन्द राय से सख्य, गोविन्द तथा अन्यों से शुद्ध दास्य और गदाधर, जगदानन्द तथा स्वरूप दामोदर से माधुर्य रस का आनन्द प्राप्त होता था। श्री चैतन्य महाप्रभु इन चारों रसों का आस्वादन करते और इस तरह अपने भक्तों के वश में रहते हुए जगन्नाथ पुरी में रहे।

लीलाशुक–मर्त्य-जन, ताँर हय भावोद्गम,ईश्वरे से कि इहा विस्मय ।। ताहे मुख्य-रसाश्रय, हइयाछेन महाशय,ताते हय सर्व-भावोदय ॥

७९ ॥

लीलाशुक (बिल्वमंगल ठाकुर) एक सामान्य मनुष्य थे; फिर भी के शरीर में अनेक भाव उत्पन्न होते थे। तो फिर यदि पूर्ण पुरुषोत्तम । भगवान् के शरीर में ये लक्षण प्रकट हों, तो कौन-सा आश्चर्य है? श्री बैतन्य महाप्रभु माधुर्य भाव में सर्वोच्च स्थिति पर थे, अतएव उनके शरीर में समस्त भाव स्वाभाविक रूप से प्रकट होते थे।

पूर्वे व्रज-विलासे, येइ तिन अभिलाषे,ग्रत्नेह आस्वाद ना हैल ।। श्री-राधार भाव-सार, आपने करि' अङ्गीकार,सेइ तिन वस्तु आस्वादिल ॥

८० ॥

। वृन्दावन की अपनी पूर्ववर्ती लीलाओं में भगवान् कृष्ण तीन विधि प्रकार के भावों का आस्वादन करना चाहते थे, किन्तु अत्यधिक प्रय के बाद भी वे वैसा नहीं कर पाये। ऐसे भावों पर श्रीमती राधारानी एकाधिकार है। अतएव उनका आस्वादन करने के लिए ही श्रीकृष्ण श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में श्रीमती राधारानी का स्थान अंगीकार किया।

आपने करि' आस्वादने, शिखाइल भक्त-गणे,प्रेम-चिन्तामणिर प्रभु धनी ।। नाहि जाने स्थानास्थान, झारे तारे कैल दान,महाप्रभु–दाता-शिरोमणि ॥

८१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने स्वयं भगवत्प्रेम रस का आस्वादन करके अपने । को इस विधि की शिक्षा दी। वे भगवत्-प्रेम रूपी चिन्तामणि ( पारस पत्थर ) से संपन्न सर्वाधिक धनवान व्यक्ति हैं। वे पात्र-कुपात्र का किये बिना हर एक को यह धन प्रदान करते हैं। इस प्रकार वे । उदार हैं।

एइ गुप्त भाव-सिन्धु, ब्रह्मा ना पाय एक बिन्दु,हेन धन विलाइल संसारे । ऐछे दयालु अवतार, ऐछे दाता नाहि आर,गुण केह नारे वर्णिबारे ॥

८२॥

ब्रह्माजी समेत कोई भी इस गुप्त भाव-सिन्धु की एक बूंद का भी पार नहीं पा सकता या आस्वादन नहीं कर सकता। किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपनी अहैतुकी कृपा से इस भगवत्प्रेम को सारे विश्व में बाँट दिया है। अतएव श्री चैतन्य महाप्रभु से बढ़कर उदार अन्य कोई अवतार नहीं हो सकता। उनसे बड़ा दाता कोई नहीं है। भला उनके दिव्य गुणों का वर्णन कौन कर सकता है? कहिबार कथा नहे, कहिले केह ना बुझये,ऐछे चित्र चैतन्येर रङ्ग ।। सेइ से बुझिते पारे, चैतन्येर कृपा याँरे,हय ताँर दासानुदास-सङ्ग ॥

८३॥

ऐसी कथाएँ सार्वजनिक रूप से कहने के लिए नहीं हैं, क्योंकि ऐसा करने पर भी कोई उन्हें समझ नहीं पायेगा। श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ इतनी अद्भुत हैं। जो उन्हें समझ सकता है, उस पर श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने निजी दास के दास की संगति प्रदान करके अवश्य कृपा की है।

चैतन्य-लीला-रत्न-सार, स्वरूपेर भाण्डार, तेहो थुइला रघुनाथेर कण्ठे ।। ताहाँ किछु → शुनिलँ, ताहा इहाँ विस्तारिलें,भक्त-गणे दिलॆ एइ भेटे । ८४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ सर्वश्रेष्ठ रत्न हैं। वे स्वरूप दामोदर गोस्वामी के भंडार में रखे हुए थे। स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने रघुनाथ दास गोस्वामी को उनके बारे में बतलाया और रघुनाथ दास गोस्वामी ने ये लीलाएँ मेरे सामने दोहरायी। मैंने जो कुछ थोड़ा-बहुत रघुनाथ दास गोस्वामी से सुना, उसी को इस पुस्तक में, सभी भक्तों को भेंट स्वरूप, वर्णित किया है।

यदि केह हेन कय, ग्रन्थ कैल श्लोक-मय,इतर जने नारिबे बुझिते ।। प्रभुर येइ आचरण, सेइ करि वर्णन,सर्व-चित्त नारि आराधिते ॥

८५॥

यदि कोई यह कहता है कि श्रीचैतन्य-चरितामृत संस्कृत श्लोकों से भरी होने के कारण साधारण व्यक्तियों की समझ के बाहर है, तो मैं इसको उत्तर यही हूँगा कि मैंने इसमें श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का ही वर्णन किया है और मेरे लिए हर एक को सन्तुष्ट करना सम्भव नहीं है।

नाहि काहाँ सविरोध, नाहि काहाँ अनुरोध,सहज वस्तु करि विवरण । यदि हय रागोदेश, ताहाँ हये आवेश, सहज वस्तु ना ग्राय लिखन ।। ८६ ॥

। इस चैतन्य-चरितामृत में न तो कोई विरोधात्मक निर्णय है, न ही किसी अन्य के मत को स्वीकृति दी गई है। मैंने यह पुस्तक उस सहज विषयवस्तु का वर्णन करने के लिए लिखी है, जिसे मैंने अपने गुरुजनों से सुना है। यदि मैं किसी की रुचि तथा अरुचि से प्रभावित होता, तो सम्भवतः मैं इस सरल सत्य को न लिख पाता।

ग्रेबा नाहि बुझे केह, शुनिते शुनिते सेह,कि अद्भुत चैतन्य-चरित ।। कृष्णे उपजिबे प्रीति, जानिबे रसेर रीति,शुनिलेइ बड़ हय हित ॥

८७॥

यदि प्रारम्भ में किसी की समझ में नहीं आता, किन्तु वह बार-बार इसे सुनता रहता है, तो उसमें महाप्रभु की लीलाओं के अद्भुत प्रभाव से कृष्ण-प्रेम उत्पन्न हो जायेगा। धीरे-धीरे वह कृष्ण तथा गोपियों एवं वृन्दावन के अन्य पार्षदों की माधुर्य लीलाओं को समझने लगेगा। पूरा लाभ उठाने के लिए हर एक को परामर्श दिया जाता है कि वह बार-बार श्रवण करता रहे।

भागवत–श्लोक-मय, टीका तार संस्कृत हय,तबु कैछे बुझे त्रिभुवन ।। इहाँ श्लोक दुइ चारि, तार व्याख्या भाषा करि,केने ना बुझिबे सर्व-जन ॥

८८ । जो आलोचक यह कहते हैं कि श्री चैतन्य-चरितामृत संस्कृत श्लोकों से भरा है, उसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि श्रीमद्भागवत भी संस्कृत श्लोकों से भरा है और उसके भाष्य भी। तथापि श्रीमद्भागवत को हर कोई समझ लेता है-वे उन्नत भक्तगण भी, जो संस्कृत भाष्य पढ़ते हैं। तो फिर लोग चैतन्य-चरितामृत को क्यों नहीं समझ पायेंगे? इसमें कुछ ही संस्कृत श्लोक हैं और उनकी व्याख्या बांग्ला भाषा में दी हुई है। तो फिर इसे समझने में क्या कठिनाई है? शेष-लीलार सूत्र-गण, कैलँ किछु विवरण,इहाँ विस्तारिते चित्त हय । थाके यदि आयुः-शेष, विस्तारिब लीला-शेष,ग्रदि महाप्रभुर कृपा हय ॥

८९॥

। मैंने पहले ही श्री चैतन्य महाप्रभु की अन्तिम लीलाओं से सम्बन्धित सारे तथ्यों को सूत्र रूप में दे दिया है। मेरी इच्छा है कि मैं इनका विस्तृत वर्णन करूं। यदि मैं अधिक काल तक जीवित रहा और श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा प्राप्त करने का सौभाग्य मिला, तो मैं पुनः इनका विस्तार से वर्णन करने का प्रयास करूंगा।

आमि वृद्ध जरातुर, लिखिते काँपये कर,मने किछु स्मरण ना हय ।। ना देखिये नयने, ना शुनिये श्रवणे,तबु लिखि'–ए बड़ विस्मय ॥

९०॥

मैं अब अत्यन्त वृद्ध हो गया हूँ और अपनी अक्षमता से विचलित हूँ। लिखते समय मेरे हाथ काँपते हैं। न तो मुझे कुछ स्मरण रहता है, न मैं ठीक से देख या सुन सकता हूँ। फिर भी मैं लिखता हूँ; यह बहुत बड़ा आश्चर्य है।

एइ अन्त्य-लीला-सार, सूत्र-मध्ये विस्तार,करि' किछु करितुं वर्णन ।। इहा-मध्ये मरि ग्रबे, वर्णिते ना पारि तबे,एइ लीला भक्त-गण-धन ॥

९१॥

इस अध्याय में मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु की अन्तिम लीलाओं के सार का कुछ वर्णन किया है। यदि इसी बीच मैं मर जाऊँ और विस्तार से उनका वर्णन न कर पाऊँ, तो भक्तों को कम-से-कम यह दिव्य कोष तो मिल ही जायेगा।

सङ्क्षेपे एइ सूत्र कैल, येइ इहाँ ना लिखिल,आगे ताहा करिब विस्तार । यदि तत दिन जिये, महाप्रभुर कृपा हये, इच्छा भरि' करिब विचार ।। ९२॥

मैंने इस अध्याय में संक्षेप में अन्त्य-लीला का वर्णन किया है। जो कुछ बच रहा है, उसका विस्तार से वर्णन भविष्य में करूंगा। यदि श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा से मैं इतने दिनों तक जीवित रहा कि मैं अपनी इच्छाएँ पूरी कर पाऊँ, तो इन लीलाओं पर पूरी तरह विचार करूंगा।

छोट बड़ भक्त-गण, वन्दों सबार श्री-चरण,सबे मोरे करह सन्तोष । स्वरूप-गोसाजिर मत, रूप-रघुनाथ जाने व्रत,ताइ लिखि' नाहि मोर दोष ॥

९३ ॥

। मैं यहाँ छोटे-बड़े सभी भक्तों के चरणकमलों की वन्दना करता हूँ। मेरी उनसे प्रार्थना है कि मुझ से सन्तुष्ट हों। मैं निर्दोष हूँ, क्योंकि मैंने म्यरूप दामोदर गोस्वामी तथा रूप और रघुनाथ दास गोस्वामियों से जैसा समझा है, वैसा ही लिख दिया है। मैंने उसमें अपनी ओर से न तो कुछ जोड़ा है, न कम किया है।

श्री-चैतन्य, नित्यानन्द, अद्वैतादि भक्त-वृन्द,शिरे धरि सबार चरण ।। स्वरूप, रूप, सनातन, रघुनाथेर श्री-चरण,धूलि करों मस्तके भूषण ॥

९४॥

। परम्परा पद्धति के अनुसार मैं श्री चैतन्य महाप्रभु, नित्यानन्द प्रभु, अद्वैत प्रभु तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त पार्षदों यथा स्वरूप दामोदर, रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी और रघुनाथ दास गोस्वामी के चरणकमलों की धूलि लेना चाहता हूँ। मैं उनके चरणकमलों की धूलि अपने मस्तक पर धारण करना चाहता हूँ। इस प्रकार मैं उनकी कृपा का आशीर्वाद चाहता हूँ।

पाजा ग्राँर आज्ञा-धन, व्रजेर वैष्णव-गण,वन्दों ताँर मुख्य हरिदास ।। चैतन्य-विलास-सिन्धु-कल्लोलेर एक बिन्दु,तार कणा कहे कृष्णदास ॥

९५ ॥

उपर्युक्त महापुरुषों एवं वृन्दावन के वैष्णवों, विशेषकर गोविन्दजी के पजारी हरिदास की आज्ञा से मैंने (कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने) श्री चैतन्य महाप्रभु के लीला-सिन्धु की एक लहर के एक बिन्दु के एक कण का वर्णन करने का प्रयास किया है।

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