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मध्य लीला: अध्याय एक: भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु की बाद की लीलाएँ

ग्रस्य प्रसादादज्ञोऽपि सद्यः सर्व-ज्ञतां व्रजेत् ।। से श्री-चैतन्य-देवो मे भगवान्सम्प्रसीदतु ॥

१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के आशीर्वाद मात्र से एक अज्ञानी व्यक्ति भी तुरन्त समस्त ज्ञान प्राप्त कर सकता है। अतएव मैं महाप्रभु से प्रार्थना करता हूँ कि वे मुझ पर अपनी अहैतुकी कृपा करें।

वन्दे श्री-कृष्ण-चैतन्य-नित्यानन्दौ सहोदितौ ।।गौड़ोदये पुष्पवन्तौ चित्रौ शन्दौ तमो-नुदौ ॥

२॥

मैं श्रीकृष्ण चैतन्य और नित्यानन्द प्रभु को सादर प्रणाम करता हूँ, जो सूर्य और चन्द्रमा के समान हैं। वे गौड़ देश के क्षितिज पर अज्ञान के अन्धकार को दूर करने के लिए और इस प्रकार सबको अद्भुत आशीर्वाद देने के लिए एक साथ उदित हुए हैं।"

जयतां सुरतौ पोर्मम मन्द-मतेर्गती ।।मत्सर्वस्व-पदाम्भोजौ राधा-मदन-मोहनौ ॥

३॥

। परम कृपालु राधा तथा मदनमोहन की जय हो! यद्यपि मैं लंगड़ा और मूर्ख हैं, फिर भी वे मेरे मार्गदर्शक हैं और उनके चरणकमल मेरे लिए सर्वस्व हैं।"

दीव्यद्न्दारण्य-कल्प-द्रुमाधःश्रीमद्रत्नागार-सिंहासन-स्थौ ।। श्रीमद्राधा-श्रील-गोविन्द-देवौ ।प्रेष्ठालीभिः सेव्यमानौ स्मरामि ॥

४॥

वृन्दावन में कल्पवृक्ष के नीचे, रत्नों के मन्दिर के भीतर श्री श्री राधागोविन्द एक देदीप्यमान सिंहासन पर विराजमान हैं और उनके सर्वाधिक अन्तरंग पार्षद उनकी सेवा में लगे हुए हैं। मैं उन्हें मेरे विनम्र प्रणाम करता हैं।"

श्रीमान्नास-रसारम्भी वंशी-वट-तट-स्थितः ।।कर्षन्वेणु-स्वनैर्गोपीर्गोपीनाथः श्रियेऽस्तु नः ॥

५॥

अपने वंशी-वादन से समस्त गोपियों को आकृष्ट करने वाले एवं वंशीवट में यमुना नदी के तट पर अत्यन्त मधुर रासनृत्य को आरम्भ करने वाले गोपीनाथजी हम सब पर दयालु हों।"

जय जय गौरचन्द्र जय कृपा-सिन्धु ।।जय जय शची-सुत जय दीन-बन्धु ॥

६॥

। दया के सिन्धु श्री गौरहरि की जय हो! हे शचीदेवी के पुत्र! आपकी जय हो, क्योंकि आप समस्त पतितात्माओं के एकमात्र मित्र हैं।"

जय जय नित्यानन्द जयाद्वैत-चन्द्र ।।जय श्रीवासादि जय गौर-भक्त-वृन्द ॥

७॥

। श्री नित्यानन्द प्रभु तथा अद्वैत प्रभु की जय हो! श्रीवास ठाकुर आदि श्री चैतन्य महाप्रभु के सभी भक्तों की जय हो! पूर्वे कहिलॆ आदि-लीलार सूत्र-गण ।। ग्राहा विस्तारियाछेन दास-वृन्दावन ॥

८॥

। इसके पहले मैंने आदिलीला (प्रारम्भिक लीलाएँ) का संक्षेप में वर्णन किया है, जिसका विस्तृत वर्णन वृन्दावन दास ठाकुर पहले ही कर चुके ।

अतएव तार आमि सूत्र-मात्र कैलें।ग्रे किछु विशेष, सूत्र-मध्येइ कहिलें ॥

९॥

इसीलिए मैंने उन घटनाओं को केवल संक्षेप में दिया है और जो कुछ विशेष कहने योग्य था, वह भी उसी के साथ वर्णित है।

एबे कहि शेष-लीलार मुख्य सूत्र-गण ।। प्रभुर अशेष लीला ना ग्राय वर्णन ॥

१० ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु की अनन्त लीलाओं का वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है, किन्तु अब मैं मुख्य घटनाएँ बताना चाहता हूँ और अन्त में घटित होने वाली लीलाओं का सार प्रस्तुत करना चाहता हूँ।"

तार मध्ये ग्रेइ भाग दास-वृन्दावन ।। चैतन्य-मङ्गले' विस्तारि' करिला वर्णन ॥

११॥

सेइ भागेर इहाँ सूत्र-मात्र लिखिब। ताहाँ ये विशेष किछु, इहाँ विस्तारिब ॥

१२॥

श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने अपनी पुस्तक चैतन्य मंगल में जिन लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया है, उसे मैं केवल संक्षेप में कहूँगा। किन्तु जो घटनाएँ विशिष्ट हैं, उनका मैं बाद में विस्तार करूंगा।

चैतन्य-लीलार व्यास---दास वृन्दावन ।। ताँर आज्ञाय करों ताँर उच्छिष्ट चर्वण ॥

१३॥

वास्तव में श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के प्रामाणिक संकलनकर्ता तो श्रील वृन्दावन दास हैं, जो व्यासदेव के अवतार हैं। उनकी आज्ञा से ही मैं उनके द्वारा छोड़े गये उच्छिष्ट को पुनः चबाने का प्रयास कर रहा हूँ।

भक्ति करि' शिरे धरि ताँहार चरण ।। शेष-लीलार सूत्र-गण करिये वर्णन ॥

१४॥

। अब मैं अत्यन्त भक्तिपूर्वक उनके चरणकमलों को अपने मस्तक पर धारण करके महाप्रभु की अन्तिम लीलाओं (शेषलीला ) का संक्षिप्त वर्णन करूंगा।"

चब्बिश वत्सर प्रभुर गृहे अवस्थान ।। ताहाँ ये करिला लीला--'आदि-लीला' नाम ॥

१५ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु चौबीस वर्षों तक घर पर रहे और इस काल में उन्होंने जो भी लीलाएँ कीं, वे आदिलीला के नाम से जानी जाती हैं।"

चब्बिश वत्सर शेषे येइ माघ-मास ।तार शुक्ल-पक्षे प्रभु करिला सन्यास ॥

१६॥

चौबीस वर्ष पूरे होने पर माघ मास के शुक्लपक्ष में महाप्रभु ने संन्यास ग्रहण किया।"

सन्यास करिया चब्बिश वत्सर अवस्थान ।।ताहाँ ग्रेइ लीला, तार 'शेष-लीला' नाम ॥

१७ ॥

। संन्यास ग्रहण करने के बाद चैतन्य महाप्रभु अगले चौबीस वर्षों तक इस भौतिक जगत् में रहे। इस काल में उन्होंने जो भी लीलाएँ कीं, वे शेषलीला कहलाती हैं अर्थात् ऐसी लीलाएँ जो अन्त में घटित हुईं।"

शेष-लीलार'मध्य’ ‘अन्त्य',—दुइ नाम हय ।।लीला-भेदे वैष्णवे सब नाम-भेद कय ॥

१८॥

अन्तिम चौबीस वर्षों में सम्पन्न होने वाली लीलाएँ मध्य तथा अन्त्यइन दो नामों से जानी जाती हैं। इन्हीं विभागों के अनुसार सारे भक्त महाप्रभु की लीलाओं का उल्लेख करते हैं।"

तार मध्ये छय वत्सर-गमनागमन ।।नीलाचल-गौड़-सेतुबन्ध-वृन्दावन ॥

१९॥

अन्तिम चौबीस वर्षों में से छह वर्षों तक श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगन्नाथ पुरी से लेकर बंगाल और कुमारी अन्तरीप से लेकर वृन्दावन तक सारे भारतवर्ष में भ्रमण किया।"

ताहाँ येइ लीला, तार 'मध्य-लीला' नाम । तार पाछे लीला-'अन्त्य-लीला' अभिधान ॥

२०॥

इन स्थानों में महाप्रभु ने जितनी लीलाएँ कीं, वे मध्य-लीला कहलाती हैं और उसके बाद की जितनी लीलाएँ हैं, वे अन्त्य-लीला कहलाती हैं।"

‘आदि-लीला', 'मध्य-लीला', 'अन्त्य-लीला' आर।। एबे ‘मध्य-लीलार' किछु करिये विस्तार ॥

२१॥

इसीलिए महाप्रभु की लीलाओं को तीन कालों में विभाजित किया जाता है-आदि-लीला, मध्य-लीला तथा अन्त्य-लीला। अब मैं मध्यलीला का विस्तारपूर्वक वर्णन करूंगा।"

अष्टादश-वर्ष केवल नीलाचले स्थिति । आपनि आचरि' जीवे शिखाइला भक्ति ॥

२२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु अठारह वर्षों तक लगातार जगन्नाथ पुरी में रहे और उन्होंने अपने खुद के आचरण से सारे जीवों को भक्तियोग का उपदेश दिया।"

तार मध्ये छय वत्सर भक्त-गण-सङ्गे।। प्रेम-भक्ति प्रवर्ताइला नृत्य-गीत-रङ्गे ॥

२३ ॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगन्नाथ पुरी में इन अठारह वर्षों में से छह वर्ष अपने अनेक भक्तों के साथ बिताये। उन्होंने कीर्तन तथा नृत्य द्वारा भगवान् की प्रेमाभक्ति का प्रवर्तन किया।"

नित्यानन्द-गोसाजिरे पाठाइल गौड़-देशे ।।तेंहो गौड़-देश भासाइल प्रेम-रसे ॥

२४॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु को जगन्नाथ पुरी से बंगाल भेजे, जो गौड़ देश के नाम से प्रसिद्ध है। श्री नित्यानन्द प्रभु ने भगवान् की दिव्य प्रेमाभक्ति से इस देश को आप्लावित कर दिया।"

सहजेइ नित्यानन्द—कृष्ण-प्रेमोद्दाम ।।प्रभु-आज्ञाय कैल ग्राहाँ ताहाँ प्रेम-दान ॥

२५॥

श्री नित्यानन्द प्रभु स्वभाव से भगवान् कृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति करने के लिए अत्यधिक उत्साहित रहते हैं। अतएव जब श्री चैतन्य महाप्रभु का आदेश हुआ, तो उन्होंने इस प्रेमाभक्ति का सर्वत्र वितरण किया।"

ताँहार चरणे मोर कोटि नमस्कार ।। चैतन्येर भक्ति स्नेहो लओयाइल संसार ॥

२६॥

मैं उन श्री नित्यानन्द प्रभु के चरणकमलों में असंख्य प्रणाम करता हूँ, जो इतने दयालु हैं कि उन्होंने श्री चैतन्य महाप्रभु की भक्ति को सारे विश्व में प्रचारित किया।"

चैतन्य-गोसाञि याँरै बले 'बड़ भाइ' । तेंहो कहे, मोर प्रभु–चैतन्य-गोसाञि ॥

२७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु श्री नित्यानन्द प्रभु को अपना बड़ा भाई कहकरपुकारते थे, जबकि नित्यानन्द प्रभु चैतन्य महाप्रभु को अपने स्वामी कहा करते थे।"

ग्रद्यपि आपनि हये प्रभु बलराम ।। तथापि चैतन्येर करे दास-अभिमान ॥

२८॥

। यद्यपि नित्यानन्द प्रभु स्वयं बलराम हैं, तथापि वे अपने आपको सदैव श्री चैतन्य महाप्रभु के नित्य दास मानते हैं।"

‘चैतन्य' सेव, चैतन्य' गाओ, लओ'चैतन्य'-नाम । चैतन्ये' ये भक्ति करे, सेइ मोर प्राण ॥

२९॥

नित्यानन्द प्रभु हर एक से श्री चैतन्य महाप्रभु की सेवा करने, उनकी महिमा का कीर्तन करने तथा उनका नाम उच्चारण करने का आग्रह करते थे। वे उस व्यक्ति को अपने प्राणों के तुल्य समझते थे, जो श्री चैतन्य महाप्रभु की भक्तिमय सेवा करता था।"

इ मत लोके चैतन्य-भक्ति लओयाइल । दीन-हीन, निन्दक, सबारे निस्तारिल ॥

३०॥

इस प्रकार श्रील नित्यानन्द प्रभु ने बिना भेदभाव के हर एक को श्री चैतन्य-सम्प्रदाय में सम्मिलित किया। ऐसा करने से पतितात्माओं तथा निन्दकों का भी उद्धार हो गया।

तबे प्रभु व्रजे पाठाइल रूप-सनातन । प्रभु-आज्ञाय दुइ भाई आइला वृन्दावन ॥

३१॥

तत्पश्चात् श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रील रूप गोस्वामी तथा श्रील सनातन गोस्वामी दोनों भाईयों को व्रज भेजे। उनके आदेश से वे श्री वृन्दावन धाम गये।"

भक्ति प्रचारिया सर्व-तीर्थ प्रकाशिल । मदन-गोपाल-गोविन्देर सेवा प्रचारिल ॥

३२॥

। वृन्दावन जाकर इन दोनों भाइयों ने भक्ति का प्रचार किया और अनेक तीर्थस्थानों की खोज की। उन्होंने विशेष रूप से मदनमोहन तथा गोविन्दजी की सेवा का शुभारम्भ किया।"

नाना शास्त्र आनि' कैला भक्ति-ग्रन्थ सार ।। मूढ़ अधम-जनेरे तेंहो करिला निस्तार ॥

३३॥

। रूप गोस्वामी तथा सनातन गोस्वामी दोनों ने वृन्दावन में अनेक शास्त्र एकत्र किये और भक्ति विषयक अनेक शास्त्रों का संकलन करके इनका सार प्रस्तुत किया। इस प्रकार उन्होंने सारे धूर्ती तथा पतितों का उद्धार किया।"

प्रभु आज्ञाय कैल सब शास्त्रेर विचार । व्रजेर निगूढ़ भक्ति करिल प्रचार ॥

३४॥

इन गोस्वामियों ने समस्त गुह्य वैदिक साहित्य के विश्लेषणात्मक अध्ययन के आधार पर भक्ति का प्रचार किया। यह सब श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश की पूर्ति के निमित्त था। इस तरह कोई भी वृन्दावन की सर्वाधिक गुह्य भक्ति को समझ सकता है।

हरि-भक्ति-विलास, आर भागवतामृत ।।दशम-टिप्पनी, आर दशम-चरित ॥

३५ ॥

श्रील सनातन गोस्वामी द्वारा रचित कुछ पुस्तकें इस प्रकार हैंहरिभक्ति-विलास, बृहद् भागवतामृत, दशम-टिप्पणी तथा दशम-चरित।"

एइ सब ग्रन्थ कैल गोसात्रि सनातन ।। रूप-गोसाजि कैल ग्रत, के करु गणन ॥

३६॥

मैंने सनातन गोस्वामी द्वारा रचित चार ग्रंथों के नाम पहले ही दे दिये हैं। इसी तरह श्रील रूप गोस्वामी ने भी अनेक ग्रंथों की रचना की है, जिनकी गिनती नहीं की जा सकती।"

प्रधान प्रधान किछु करिये गणन ।। लक्ष ग्रन्थे कैल व्रज-विलास वर्णन ॥

३७॥

। अतएव मैं श्रील रूप गोस्वामी द्वारा रचित मुख्य-मुख्य ग्रंथों के ही नाम गिनाऊँगा। उन्होंने एक लाख श्लोकों में वृन्दावन की लीलाओं का वर्णन किया है।"

रसामृत-सिन्धु, आर विदग्ध-माधव ।। उज्वल-नीलमणि, आर ललित-माधव ॥

३८॥

। श्री रूप गोस्वामी द्वारा रचित ग्रंथों में भक्तिरसामृतसिन्धु, विदग्ध माधव, उज्वल-नीलमणि तथा ललित-माधव सम्मिलित हैं।"

दान-केलि-कौमुदी, आर बहु स्तवावली । अष्टादश लीला-च्छन्द, आर पद्यावली ॥

३९॥

गोविन्द-विरुदावली, ताहार लक्षण । मथुरा-माहात्म्य, आर नाटक-वर्णन ॥

४०॥

श्रील रूप गोस्वामी ने दानकेलि-कौमुदी, स्तवावली, लीलाच्छन्द, पद्यावली, गोविन्द-विरुदावली, मथुरा-माहात्म्य तथा नाटक-वर्णन नामक पुस्तकों की भी रचना की।"

लघु-भागवतामृतादि के करु गणन ।।सर्वत्र करिल व्रज-विलास वर्णन ॥

४१॥

भला श्रील रूप गोस्वामी द्वारा रचित शेष पुस्तकों (जिनमें लघु भागवतामृत मुख्य है) की गिनती कौन कर सकता है? उन्होंने उन सब ग्रंथ में ‘वृन्दावन की लीलाओं का वर्णन किया है।"

ताँर भ्रातुष्पुत्र नाम–श्री-जीव-गोसाजि ।।ग्रत भक्ति-ग्रन्थ कैल, तर अन्त नाई ॥

४२॥

। श्री रूप गोस्वामी के भतीजे श्रील जीव गोस्वामी ने भक्ति सम्बन्धी इतनी पुस्तकें लिखी हैं कि उनकी गणना नहीं की जा सकती।"

श्री-भागवत-सन्दर्भ-नाम ग्रन्थ-विस्तार ।।भक्ति-सिद्धान्तेर ताते देखाइयाछेन पार ॥

४३॥

श्रील जीव गोस्वामी ने श्री भागवत-सन्दर्भ में भक्ति की चरम पराकाष्ठा का विस्तार से वर्णन किया है।"

गोपाल-चम्पू-नामे ग्रन्थ-महाशूर ।। नित्य-लीला स्थापन ग्राहे व्रज-रस-पूर ॥

४४॥

गोपाल-चम्पू सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं प्रभावशाली दिव्य ग्रंथ है। इस ग्रंथ में भगवान् की सनातन लीलाओं की स्थापना की गई है और वृन्दावन में भोगे जाने वाले दिव्य रसों का वर्णन विस्तारपूर्वक हुआ है।

एइ मत नाना ग्रन्थ करिया प्रकाश । गोष्ठी सहिते कैला वृन्दावने वास ॥

४५ ॥

इस प्रकार श्रील रूप गोस्वामी, सनातन गोस्वामी तथा उनके भतीजे श्रील जीव गोस्वामी तथा लगभग उनका सारा परिवार वृन्दावन में रहा और उन्होंने भक्ति पर महत्त्वपूर्ण पुस्तकें प्रकाशित कीं।"

प्रथम वत्सरे अद्वैतादि भक्त-गण । प्रभुरे देखिते कैल, नीलाद्रि गमन ॥

४६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा संन्यास ग्रहण कर लेने के एक वर्ष बाद, श्री अद्वैत प्रभु के नेतृत्व में सारे भक्त उनका दर्शन करने के लिए जगन्नाथ पुरी गये।।"

रथ-यात्रा देखि ताहाँ रहिला चारि-मास । प्रभु-सङ्गे नृत्य-गीत परम उल्लास ॥

४७॥

जगन्नाथ पुरी में रथयात्रा महोत्सव में सम्मिलित होने के बाद सारे भक्त चार मास तक वहीं रहे और चैतन्य महाप्रभु के साथ कीर्तन ( कीर्तन तथा नृत्य) का परम आनन्द लूटते रहे।"

विदाय समय प्रभु कहिला सबारे ।।प्रत्यब्द आसिबे सबे गुण्डिचा देखिबारे ॥

४८॥

विदाई के समय महाप्रभु ने सभी भक्तों से निवेदन किया, 'कृपा करके प्रतिवर्ष भगवान् जगन्नाथ की गुण्डिचा मन्दिर तक की यात्रा (जो रथयात्रा महोत्सव के नाम से विख्यात है) देखने के लिए अवश्य आयें।'

प्रभु-आज्ञार्य भक्त-गण प्रत्यब्द आसिया ।।गुण्डिचा देखिया या 'न प्रभुरे मिलिया ॥

४९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश का पालन करते हुए सारे भक्त प्रतिवर्ष उन्हें मिलने आते थे। वे जगन्नाथ पुरी में गुण्डिचा-उत्सव देखते और चार मास के बाद अपने घर लौट जाया करते थे।

विंशति वत्सर ऐछे कैला गतागति ।।अन्योन्ये मुँहार हा विना नाहि स्थिति ॥

५०॥

लगातार बीस वर्षों तक इस प्रकार भेट होती रही और स्थिति इतनी तीव्र हो गई कि महाप्रभु तथा भक्तगण एक-दूसरे से मिले बिना सुख से नहीं रह पाते थे।"

शेष आर ग्रेड रहे द्वादश वत्सर ।।कृष्ोर विरह-लीला प्रभुर अन्तर ॥

५१।। । महाप्रभु ने अन्तिम बारह वर्ष अपने हृदय के भीतर केवल कृष्ण की विरह-लीला का आस्वादन करने में बिताये।।"

निरन्तर रात्रि-दिन विरह उन्मादे ।।हासे, कान्दे, नाचे, गाय परम विषादे ॥

५२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु इस विरह-भाव में रात-दिन उन्मत्त प्रतीत होते थे। कभी वे हँसते और कभी विलाप करते; कभी नाचते और कभी अत्यन्त शोक में कीर्तन करते थे।"

ने काले करेन जगन्नाथ दरशन ।मने भावे, कुरुक्षेत्रे पाबाछि मिलन ॥

५३॥

ऐसे अवसरों पर श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथजी के मन्दिर जायाकरते। उस समय उनकी मनोदशा ठीक ठीक उन गोपियों जैसी होती, जिन्होंने दीर्घ विछोह के बाद कुरुक्षेत्र में कृष्ण के दर्शन किये थे। कृष्ण अपने भाई तथा बहन के साथ कुरुक्षेत्र आये हुए थे।"

रथ-यात्राय आगे प्रबे करेन नर्तन ।।ताहाँ एइ पद मात्र करये गायन ॥

५४॥

रथयात्रा के समय जब चैतन्य महाप्रभु रथ के आगे नृत्य करते थे, तो वे सदैव निम्नलिखित दो पंक्तियाँ गाते थे।"

सेइत पराण-नाथ पाइनु ।ग्राहा लागी' मदन-दहने झुरि गेनु ॥

५५॥

मैंने अपने प्राणों के उन स्वामी को पा लिया है, जिनके लिए मैं कामाग्नि में जल रहा था।"

एइ धुया-गाने नाचेन द्वितीय प्रहर । कृष्ण ला व्रजे ग्राई–ए-भाव अन्तरं ॥

५६ ।। श्री चैतन्य महाप्रभु इस गीत ( सेहत पराणनाथ) को दिन के दूसरे पहर में विशेष रूप से गाते और सोचा करते, मैं कृष्ण को लेकर वृन्दावन लौट जाऊँ। यह भाव सदैव उनके हृदय में उठता रहता था।"

एइ भावे नृत्य-मध्ये पड़े एक श्लोक ।। सेइ श्लोकेर अर्थ केह नाहि बुझे लोक ॥

५७।। उस भावावेश में श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान जगन्नाथ के समक्ष नृत्य करते समय एक श्लोक गाया करते थे, जिसका अर्थ लगभग कोई भी नहीं समझ पाता था।"

ग्रः कौमार-हरः स एव हि वरस्ता एव चैत्र-क्षपास् । . ते चोन्मीलित-मालती-सुरभयः प्रौढ़ाः कदम्बानिलाः ।। सा चैवास्मि तथापि तत्र सुरत-व्यापार-लीला-विधौ ।रेवी-रोधसि वेतसी-तरु-तले चेतः समुत्कण्ठते ॥

५८॥

। जिस व्यक्ति ने मेरी युवावस्था में मेरा हृदय चुरा लिया था, वही अब पुनः मेरा स्वामी है। ये चैत्र-मास की वही चाँदनी रातें हैं, वही मालती फूलों की सुगन्ध है और वही मधुर वायु कदम्ब वन से आ रही है। अपने घनिष्ठ सम्बन्ध में मैं भी वही प्रेमिका हूँ, किन्तु फिर भी मेरा मन यहाँ सुखी नहीं है। मैं रेवा नदी के तट पर वेतसी वृक्ष के नीचे उसी स्थान पर फिर से जाने के लिए लालायित हूँ। यही मेरी इच्छा है।

एइ श्लोकेर अर्थ जाने एकले स्वरूप ।।दैवे से वत्सर ताहाँ गियाछेन रूप ॥

५९॥

यह श्लोक एक सामान्य भौतिक युवक तथा युवती की लालसा के समान लगता है, किन्तु इसका वास्तविक गहन अर्थ एकमात्र स्वरूप दामोदर को ज्ञात था। संयोगवश रूप गोस्वामी भी एक वर्ष वहाँ उपस्थित थे।

प्रभु-मुखे श्लोक शुनि' श्री-रूप-गोसाजि ।सेइ श्लोकेर अर्थ-श्लोक करिला तथाइ ॥

६०॥

यद्यपि इस श्लोक का अर्थ केवल स्वरूप दामोदर को ज्ञात था, किन्तु रूप गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु से इसे सुनकर तुरन्त एक अन्य श्लोक की रचना कर डाली, जिसमें मूल श्लोक का अर्थ दिया गया था।"

श्लोक करि' एक ताल-पत्रेते लिखिया । आपन वासार चाले राखिल गुञ्जिया ॥

६१॥

। इस श्लोक की रचना करके रूप गोस्वामी ने इसे एक ताड़ के पत्ते पर लिख दिया और जिस कुटिया में वे रह रहे थे उसकी छत पर रख दिया।"

श्लोक राखि' गेला समुद्र-स्नान करिते ।। हेन-काले आइला प्रभु ताँहारे मिलिते ॥

६२॥

इस श्लोक की रचना करके इसे अपने घर की छत पर रखने के बाद श्रील रूप गोस्वामी समुद्र में स्नान करने चले गये। इसी बीच श्री चैतन्य महाप्रभु उनसे मिलने उनकी कुटिया में आये।"

हरिदास ठाकुर और रूप-सनातन ।। जगन्नाथ-मन्दिरे ना मान तिन जन ।। ६३ ।। विरोध की स्थिति से बचने के लिए श्रील हरिदास ठाकुर, श्रील रूप गोस्वामी तथा श्रील सनातन गोस्वामी-ये तीनों महान् भक्त जगन्नाथ मन्दिर में प्रवेश नहीं करते थे।"

महाप्रभु जगन्नाथेर उपल-भोग देखियो । निज-गृहे यान एइ तिनेरे मिलिया ।। ६४ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु नित्यप्रति जगन्नाथ मन्दिर में उपलभोग उत्सव देखते थे और उसके बाद वे अपने निवासस्थान लौटते समय इन तीनों महापुरुषों से भेंट किया करते थे।"

एइ तिन मध्ये ग्नबे थाके येइ जन ।।ताँरै आसि' आपने मिले,-प्रभुर नियम ॥

६५॥

। यदि इन तीनों में से कोई एक उपस्थित नहीं होता था, तो वे शेष जनों से मिलते थे। यह उनका दैनिक नियम था।"

दैवे आसि' प्रभु ग्रबे ऊर्ध्वते चाहिला ।। चाले गोंजा ताल-पत्रे सेइ श्लोक पाइला ॥

६६॥

। जब श्री चैतन्य महाप्रभु श्रील रूप गोस्वामी के आवास में गये, तो संयोगवश उन्होंने छत पर रखा ताड़-पत्र देख लिया और उन्होंने उनके द्वारा रचित उस श्लोक को पढ़ा।"

श्लोक पडि' आछे प्रभू आविष्ट हइया ।।रूप-गोसाजि आसि' पड़े दण्डवत् हा ॥

६७॥

। इस श्लोक को पढ़कर श्री चैतन्य महाप्रभु को भावावेश हो आया। जब वे इस दशा में थे, तो श्रील रूप गोस्वामी आ गये और वे तुरन्त ही भूमि पर दण्डवत् गिर पड़े।"

उठि' महाप्रभु ताँरै चापड़ मारिया । कहिते लागिला किछु कोलेते करिया ॥

६८॥

जब श्रील रूप गोस्वामी डंडे के समान गिर पड़े, तो श्री चैतन्य महाप्रभु उठे और उन्हें एक चपत लगाई। फिर उन्हें अपनी गोद में लेकर उनसे इस प्रकार कहा : मोर श्लोकेर अभिप्राय ना जाने कोन जने । मोर मनेर कथा तुमि जानिले केमने? ॥

६९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, मेरे श्लोक का तात्पर्य कोई नहीं जानता। तुम मेरे मन के भाव को कैसे समझ गये?" एत बलि' तारे बहु प्रसाद करिया ।।स्वरूप-गोसाजिरे श्लोक देखाइल लञा ॥

७० ॥

यह कहकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्रील रूप गोस्वामी को अनेकआशीर्वाद दिये और उस श्लोक को ले जाकर बाद में स्वरूप गोस्वामी को दिखलाया।"

स्वरूपे पुछेन प्रभु हइया विस्मिते ।। मोर मनेर कथा रूप जानिल केमते ॥

७१॥

स्वरूप दामोदर को अत्यन्त आश्चर्य के साथ वह श्लोक दिखाते हुए चैतन्य महाप्रभु ने उनसे पूछा कि रूप गोस्वामी किस तरह उनके मन के भाव को समझ सके।"

स्वरूप कहे,----य़ाते जानिल तोमार मन ।। ताते जानि, हय तोमार कृपार भाजन ॥

७२॥

श्रीले स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने श्री चैतन्य महाप्रभु से कहा, यदि रूप गोस्वामी आपके मन तथा भावों को जान सकते हैं, तो अवश्य ही । उन्हें आपको विशेष आशीर्वाद प्राप्त हुआ होगा।"

प्रभु कहे,—तारे आमि सन्तुष्ट हा । आलिङ्गन कैलु सर्व-शक्ति सञ्चारिया ॥

७३॥

महाप्रभु ने कहा, मैं रूप गोस्वामी से इतना प्रसन्न था कि मैंने उसका आलिंगन कर लिया और उसे भक्ति की विधि का प्रचार करने के लिए। सारी आवश्यक शक्तियाँ प्रदान कर दीं।

ग्रोग्य पात्र हय गूढ़-रस-विवेचने ।तुमिओ कहिओ तारे गूढ़-रसाख्याने ॥

७४॥

। मैं श्रील रूप गोस्वामी को भक्ति के गुह्य रस को समझने के लिए सर्वथा योग्य समझता हूँ और संस्तुति करता हूँ कि तुम उसे भक्ति के विषय में और आगे बतलाओ।"

ए-सब कहिब आगे विस्तार करिजा । संक्षेपे उद्देश कैल प्रस्ताव पाइञा ॥

७५ ॥

। मैं इन सब घटनाओं के बारे में बाद में विस्तार से बतलाऊँगा। यहाँ पर मैंने केवल संक्षिप्त वर्णन किया है।"

प्रियः सोऽयं कृष्णः सहचरि कुरुक्षेत्र-मिलितस्तथाहं सो राधा तदिदमुभयोः सङ्गम-सुखम् ।। तथाप्यन्तः-खेलन्मधुर-मुरली-पञ्चम-जुषेमनो मे कालिन्दी-पुलिन-विपिनाय स्पृहयति ॥

७६ ॥

[ यह श्रीमती राधारानी द्वारा कहा गया श्लोक है।हे प्रिय सखी, अब मैं इस कुरुक्षेत्र में अपने अत्यन्त पुराने और प्रिय मित्र कृष्ण से मिली हूँ। मैं वही राधारानी हूँ और अब हम मिल रहे हैं। यह अत्यन्त सुखद है, किन्तु अब भी मेरा मन यमुना-तट पर वहाँ के वन के वृक्षों के नीचे बैठने के लिए लालायित है। मैं वृन्दावन के वन के भीतर पंचम स्वर में गूंजने वाली उनकी मधुर मुरली की ध्वनि सुनने की इच्छुक हूँ।"

एइ श्लोकेर संक्षेपार्थ शुन, भक्त-गण ।। जगन्नाथ देखि' त्रैछे प्रभुर भावने ॥

७७॥

। अब हे भक्तों, इस श्लोक की संक्षिप्त व्याख्या सुनो। श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ के विग्रह का दर्शन करते हुए इस प्रकार सोचते थे।"

श्री-राधिका कुरुक्षेत्रे कृष्णेर दरशन ।। यद्यपि पायेन, तबु भावेन ऐछन ।। ७८ ॥

वे उन श्रीमती राधारानी के विषय में सोच रहे थे, जो कृष्ण से कुरुक्षेत्र में मिली थीं। यद्यपि वे कृष्ण से वहाँ मिल चुकी थीं, किन्तु फिर भी वे उनके विषय में इस प्रकार सोच रही थीं।"

राज-वेश, हाती, घोड़ा, मनुष्य गहन । काहाँ गोप-वेश, काहाँ निर्जन वृन्दावन ॥

७९ ॥

वे कृष्ण को वृन्दावन के शान्त वातावरण में गोपवेश धारण किये हुए सोच रही थीं। किन्तु कुरुक्षेत्र में तो वे राजसी वेश में थे और उनके साथ हाथी, घोड़े तथा लोगों का समूह था। इस प्रकार वहाँ का वातावरण उनके मिलन के लिए अनुकूल नहीं था।"

सेइ भाव, सेइ कृष्ण, सेई वृन्दावन ।। ग्रबे पाइ, तबे हय वाञ्छित पूरण ॥

८०॥

इस प्रकार कृष्ण से मिलकर और वृन्दावन के वातावरण के विषय में सोचकर राधारानी ने मन ही मन चाहा कि वे मुझे पुन: वृन्दावन ले जाकर उस शान्त वातावरण में मेरी इच्छा पूरी करें।"

आहुश्च ते नलिन-नाभ पदारविन्दंयोगेश्वरैर्हदि विचिन्त्यमगाध-बोधैः ।।संसार-कूप-पतितोत्तरणावलम्बगेहं जुषामपि मनस्युदियात्सदा नः ॥

८१॥

गोपियाँ इस प्रकार बोलीं : हे कमल-पुष्प जैसी नाभि वाले प्रभु! आपके चरणकमल इस भौतिक अस्तित्वरूपी गहरे कुएँ में गिरे हुए व्यक्तियों के लिए एकमात्र आश्रय हैं। आपके चरणों की पूजा एवं ध्यान बड़े-बड़े योगियों और विद्वान दार्शनिकों द्वारा किया जाता है। हमारी मनोकामना है कि ये चरणकमल हमारे हृदयों के भीतर भी उदित हों, यद्यपि हम घर के कार्यकलापों में लगी हुईं साधारण स्त्रियाँ हैं।

तोमार चरण मोर व्रज-पुर-घरे ।उदय करये ग्रदि, तबे वाञ्छा पूरे ॥

८२॥

गोपियों ने सोचा, हे प्रभु! यदि आपके चरणकमलों को हमारे वृन्दावन स्थित घरों में फिर पदार्पण हो, तो हमारी मनोकामनाएँ पूरी हो जायेंगी।"

भागवतेर श्लोक-गूढार्थ विशद करिजा ।रूप-गोसाजि श्लोक कैल लोक बुझाइञा ॥

८३॥

। श्रील रूप गोस्वामी ने साधारण जनों को समझाने के लिए श्रीमद्भागवत के श्लोक के गुह्य अर्थ को एक श्लोक में बतलाया है।"

ग्रा ते लीला-रस-परिमलोद्गारि-वन्यापरीता ।धन्या क्षौणी विलसति वृता माथुरी माधुरीभिः ।। तत्रास्माभिश्चटुल-पशुपी-भाव-मुग्धान्तराभिः ।संवीतस्त्वं कलय वदनोल्लासि-वेणुर्विहारम् ॥

८४॥

गोपियों ने आगे कहा-हे कृष्ण! आपके लीला-रसों की सुगन्धि मथुरा जनपद की माधुरी से घिरे हुए वृन्दावन की धन्य भूमि के वनों में व्याप्त है। इस अद्भुत भूमि के अनुकूल वातावरण में अपने अधरों पर थिरकने वाली बाँसुरी से तथा हम गोपियों के मध्य, जिनके हृदय अकथनीय आह्लादपूर्ण भावों से सदैव मोहित रहते हैं, आप अपनी लीलाओं का आनन्द लूट सकते हैं।"

एइ-मत महाप्रभु देखि जगन्नाथे ।सुभद्रा-सहित देखे, वंशी नाहि हाते ॥

८५॥

इस तरह जब श्री चैतन्य महाप्रभु ने जगन्नाथ का दर्शन किया, तो । उन्होंने देखा कि वे अपनी बहन सुभद्रा के साथ थे और उनके हाथ में वंशी नहीं थी।"

त्रिभङ्ग-सुन्दर व्रजे व्रजेन्द्र-नन्दन ।।काहाँ पाब, एइ वाञ्छा बाड़े अनुक्षण ॥

८६॥

गोपियों के हर्षोन्माद भाव में मग्न श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान् जगन्नाथ को अपने आदि स्वरूप, वृन्दावन में त्रिभंगी शरीर के कारण अत्यन्त सुन्दर लगने वाले नन्दनन्दन कृष्ण-रूप में देखना चाहते थे। इस रूप का दर्शन करने की उनकी इच्छा निरन्तर बढ़ती जा रही थी।

राधिका-उन्माद ग्रैछे उद्धव-दर्शने ।।उद्भूर्णा-प्रलाप तैछे प्रभुर रात्रि-दिने ॥

८७॥

। जिस प्रकार श्रीमती राधारानी ने उद्धव की उपस्थिति में एक भौंरे से असंगत रूप में प्रलाप किया था, उसी तरह श्री चैतन्य महाप्रभु भावावेश में उन्मत्त की तरह रात-दिन असंगत बातें करते थे।

द्वादश वत्सर शेष ऐछे गोडाइल ।।एइ मत शेष-लीला त्रि-विधाने कैल ॥

८८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के अन्तिम बारह वर्ष इसी दिव्य उन्माद में बीते। इस तरह उन्होंने अपनी अन्त्य लीलाएँ तीन प्रकार से सम्पन्न कीं।

सन्यास करि' चब्बिश वत्सर कैला ने ये कर्म ।अनन्त, अपार-----तार के जानिबे मर्म ॥

८९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने संन्यास ग्रहण करने के बाद चौबीस वर्षों तक जो-जो लीलाएँ कीं, वे असंख्य तथा अपार थीं। ऐसी लीलाओं का मर्म भला कौन समझ सकता है? उद्देश करिते करि दिग्दरशन ।।मुख्य मुख्य लीलार करि सूत्र गणन ॥

९०॥

उन लीलाओं का संकेत करने के उद्देश्य से मैं मुख्य-मुख्य लीलाओं को सूत्र रूप में प्रस्तुत कर रहा हूँ।

प्रथम सूत्र प्रभुर सन्यास-करण ।। सन्यास करि' चलिला प्रभु श्री-वृन्दावन ॥

९१॥

पहला सूत्र यह है : संन्यास ग्रहण करने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन की ओर चल पड़े।

प्रेमेते विह्वल बाह्य नाहिक स्मरण । राढ़-देशे तिन दिन करिला भ्रमण ॥

९२॥

। जब श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन की ओर जा रहे थे, तो वे कृष्णप्रेम में विह्वल हो गये और उनकी बाहरी जगत् की सारी सुध-बुध जाती रही। इस तरह उन्होंने तीन दिनों तक उस राढ़देश में भ्रमण किया, जो ऐसा प्रदेश है, जिसमें गंगा नदी नहीं बहती।।

नित्यानन्द प्रभु महाप्रभु भुलाइयो । गङ्गा-तीरे लजा आइला 'यमुना' बलिया ॥

९३ ॥

। सर्वप्रथम नित्यानन्द प्रभु ने श्री चैतन्य महाप्रभु को गंगा के किनारेकिनारे ले जाते समय यह कहकर भ्रमित कर दिया कि यह यमुना नदी है।

शान्तिपुरे आचार गृहे आगमन ।।प्रथम भिक्षा कैल ताहाँ, रात्रे सङ्कीर्तन ॥

९४॥

तीन दिन बाद श्री चैतन्य महाप्रभु शान्तिपुर में अद्वैत आचार्य के घर आये और वहाँ उन्होंने भिक्षा ग्रहण की। यह उनके द्वारा प्रथम भिक्षा-ग्रहण था। उस रात उन्होंने वहाँ सामूहिक कीर्तन किया।

माता भक्त-गणेर ताहाँ करिल मिलन ।सर्व समाधान करि' कैल नीलाद्रि-गमन ॥

९५॥

अद्वैत प्रभु के घर में वे अपनी माता से तथा मायापुर के सारे भक्तों से मिले। वहाँ पर सबका समाधान करने के बाद वे जगन्नाथ पुरी चले गये।

पथे नाना लीला-रस, देव-दरशन । माधव-पुरीर कथा, गोपाल-स्थापन ॥

९६ ॥

जगन्नाथ पुरी के मार्ग में श्री चैतन्य महाप्रभु ने अन्य अनेक लीलाएँ कीं। उन्होंने विविध मन्दिरों की मुलाकात ली और गोपाल की स्थापना एवं माधवेन्द्र पुरी की कथा सुनी।।

क्षीर-चुरि-कथा, साक्षि-गोपाल-विवरण ।नित्यानन्द कैल प्रभुर दण्ड-भञ्जन ॥

९७॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने नित्यानन्द प्रभु से क्षीर-चुरी गोपीनाथ एवं साक्षीगोपाल की कथाएँ सुनीं। इसके बाद नित्यानन्द प्रभु ने श्री चैतन्य महाप्रभु का संन्यास-दण्ड तोड़ दिया।

क्रुद्ध हा एका गेला जगन्नाथ देखिते ।। देखिया मूर्च्छित हा पड़िला भूमिते ॥

९८ ॥

इसके बाद जब नित्यानन्द प्रभु ने उनका संन्यास-दण्ड तोड़ डाला, तो श्री चैतन्य महाप्रभु बाह्य रूप से अत्यधिक क्रुद्ध हुए और वे उनका साथ छोड़कर अकेले ही जगन्नाथ मन्दिर की यात्रा के लिए चल पड़े। जब श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ-मन्दिर के भीतर प्रविष्ट हुए और उन्होंने भगवान् जगन्नाथ का दर्शन किया, तो वे तुरन्त अचेत होकर भूमि पर गिर पड़े।

सार्वभौम लञा गेला आपन-भवन ।।तृतीय प्रहरे प्रभुर हइल चेतन ॥

९९ ॥

जब मन्दिर में श्री चैतन्य महाप्रभु भगवान् जगन्नाथ के दर्शन करने के बाद अचेत होकर गिर पड़े, तो सार्वभौम भट्टाचार्य उन्हें अपने घर ले गये। महाप्रभु दोपहर के बाद तक अचेत रहे। तब अन्त में उन्हें चेतना आई।

नित्यानन्द, जगदानन्द, दामोदर, मुकुन्द ।। पाछे आसि' मिलि' सबे पाइल आनन्द ॥

१०० ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु नित्यानन्द का साथ छोड़कर अकेले जगन्नाथ मन्दिर गये थे, किन्तु बाद में नित्यानन्द, जगदानन्द, दामोदर तथा मुकुन्द उन्हें मिलने के लिए आये और उन्हें देखकर वे सभी अत्यन्त प्रसन्न हुए।

तबे सार्वभौमे प्रभु प्रसाद करिल ।। आपने-ईश्वर-मूर्ति ताँरे देखाइल ॥

१०१।। । इस घटना के बाद भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ने सार्वभौम भट्टाचार्य को अपना आदि-भगवान् रूप दिखलाकर उन पर कृपा की।

तबे त' करिला प्रभु दक्षिण गमन ।। कूर्म-क्षेत्रे कैल वासुदेव विमोचन ॥

१०२॥

सार्वभौम भट्टाचार्य पर कृपादृष्टि करने के बाद महाप्रभु दक्षिण भारत के लिए चल पड़े। जब वे कूर्मक्षेत्र आये, तो वहाँ उन्होंने वासुदेव नामक व्यक्ति का उद्धार किया।

जियड़-नृसिंहे कैल नृसिंह-स्तवन । पथे-पथे ग्रामे-ग्रामे नाम-प्रवर्तन ॥

१०३॥

कूर्मक्षेत्र की यात्रा करने के बाद महाप्रभु दक्षिण भारत में जियड़ नृसिंह के मन्दिर गये और वहाँ भगवान् नृसिंह देव की स्तुति की। रास्ते में उन्होंने प्रत्येक गाँव में हरे कृष्ण महामंत्र के कीर्तन का शुभारम्भ किया।

गोदावरी-तीर-वने वृन्दावन-भ्रम । रामानन्द राय सह ताहाञि मिलन ॥

१०४॥

एक बार महाप्रभु ने गोदावरी नदी के तट पर स्थित एक वन को वृन्दावन समझ लिया। वहाँ उनकी भेंट रामानन्द राय से हुई।

त्रिमल्ल-त्रिपदी-स्थान कैले दरशन ।। सर्वत्र करिल कृष्ण-नाम प्रचारण ॥

१०५ ॥

उन्होंने तिरुमल तथा तिरुपति नामक स्थानों की यात्रा की और वहाँ उन्होंने भगवान् के पवित्र नाम के कीर्तन का सर्वत्र प्रचार किया।

तबे त' पाषण्डि-गणे करिल दलन ।। अहोवल-नृसिंहादि कैल दरशन ॥

१०६ ।। तिरुमल तथा तिरुपति मन्दिर के दर्शन के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु को कुछ नास्तिकों का दमन करना पड़ा। इसके बाद उन्होंने अहोवलनृसिंह मन्दिर में दर्शन किया।

श्री-रङ्ग-क्षेत्र आइला कावेरीर तीर । श्री-रङ्ग देखिया प्रेमे हुइला अस्थिर ॥

१०७॥

। जब श्री चैतन्य महाप्रभु कावेरी के तट पर स्थित श्रीरंग क्षेत्र में आये, तो उन्होंने श्री रंगनाथ मन्दिर में दर्शन किये और वहाँ पर वे भगवत्प्रेम के आनन्द में विह्वल हो गये।

त्रिमल्ल भट्टर घरे कैल प्रभु वास । ताहाञि रहिला प्रभु वर्षा चारि मास ॥

१०८॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु वर्षा ऋतु के चार महीने त्रिमल्ल भट्ट के घर में रहे।

श्री-वैष्णव त्रिमल्ल-भट्ट- परम पण्डित ।। गोसाजिर पाण्डित्य-प्रेमे हइला विस्मित ॥

१०९॥

श्री त्रिमल्ल भट्ट श्री-वैष्णव संप्रदाय का सदस्य होने के साथ ही प्रकाण्ड विद्वान भी थे; अतएव जब उन्होंने परम विद्वान एवं महान् भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु को देखे, तो वे अत्यन्त विस्मित हुए।

चातुर्मास्य ताँहा प्रभु श्री-वैष्णवेर सने ।। गोङगइल नृत्य-गीत-कृष्ण-सङ्कीर्तने ॥

११०॥

भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ने श्री-वैष्णवों के साथ नृत्य, गान तथा कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन करते हुए चातुर्मास व्यतीत किये।

चातुर्मास्य-अन्ते पुनः दक्षिण गमन ।। परमानन्द-पुरी सह ताहाञि मिलन ॥

१११॥

। चातुर्मास के समाप्त होने पर श्री चैतन्य महाप्रभु सारे दक्षिण भारत में भ्रमण करते रहे। तभी उनकी भेंट परमानन्द पुरी से हुई।

तबे भट्टथारि हैते कृष्ण-दासेर उद्धार ।।राम-जपी विप्र-मुखे कृष्ण-नाम प्रचार ॥

११२॥

। इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने भट्टथारि के चंगुल से अपने सेवक कृष्णदास को बचाया। इसके बाद उन्होंने शिक्षा दी कि भगवान् कृष्ण के नाम का कीर्तन उन ब्राह्मणों को भी करना चाहिए, जो भगवान् राम के नाम का कीर्तन करने के अभ्यस्त हैं।

श्री-रङ्ग-पुरी सह ताहाजि मिलन ।रामदास विप्रेर कैले दुःख-विमोचन ॥

११३॥

। तत्पश्चात् श्री चैतन्य महाप्रभु श्री रंग पुरी से मिले और उन्होंने रामदास नामक एक ब्राह्मण के सारे दुःखों को दूर किया।

तत्त्व-वादी सह कैल तत्त्वेर विचार ।।आपनाके हीन-बुद्धि हैल ताँ-सबार ॥

११४ ।। श्री चैतन्य महाप्रभु ने तत्त्ववादी सम्प्रदाय से भी विचार-विमर्श किया और उन तत्त्ववादियों ने अपने आपको निम्न वैष्णव अनुभव किया।

अनन्त, पुरुषोत्तम, श्री-जनार्दन ।।पद्मनाभ, वासुदेव कैल दरशन ॥

११५॥

इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने अनन्तदेव, पुरुषोत्तम, श्री जनार्दन, पद्मनाभ तथा वासुदेव के विष्णु-मन्दिरों में दर्शन किया।

तबे प्रभु कैल सप्त-ताल विमोचन ।सेतु-बन्धे स्नान, रामेश्वर दरशन ॥

११६॥

इसके बाद भगवान् श्री चैतन्य महाप्रभु ने विख्यात सप्तताल वृक्षों का उद्धार किया, सेतुबन्ध रामेश्वर में स्नान किया और शिवजी अर्थात् रामेश्वर के मन्दिर में दर्शन किया।

ताहाञि करिल कूर्म-पुराण श्रवण ।। माया-सीता निलेक रावण, ताहाते लिखन ॥

११७॥

। रामेश्वर में श्री चैतन्य महाप्रभु को कूर्म पुराणपढ़ने का अवसर मिला, जिससे उन्हें यह पता चला कि रावण ने जिस सीता का अपहरण किया था वह वास्तविक सीता न थीं, अपितु उनकी छाया-मात्र थीं।

शुनिया प्रभुर आनन्दित हैल मन ।। रामदास विप्रेर कथा हुइल स्मरण ॥

११८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु माया-सीता के विषय में पढ़कर अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्हें रामदास विप्र से अपनी भेंट का स्मरण हो आया, जो अत्यन्त दुःखी था कि रावण ने सीता माता का अपहरण किया था।

सेइ पुरातन पत्र आग्रह करि' निल ।।रामदासे देखाइया दुःख खण्डाइल ॥

११९ ॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने कूर्म पुराण की उस अत्यन्त प्राचीन पुस्तक से यह पन्ना उत्सुकता के कारण फाड़ लिया और बाद में इसे रामदास विप्र को दिखलाया, जिसे देखकर उसका दुःख दूर हुआ।

ब्रह्म-संहिता, कर्णामृत, दुइ पुँथि पाञा ।।दुड़ पुस्तक लञा आइला उत्तम जानिळा ॥

१२०॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को दो ग्रन्थ और भी मिले-ब्रह्म-संहिता तथा कृष्णकर्णामृत । इन ग्रन्थों को श्रेष्ठ मानते हुए वे उन्हें अपने भक्तों को भेंट करने के लिए ले आये।

पुनरपि नीलाचले गमन करिल ।। भक्त-गणे मेलिया स्नान-यात्रा देखिल ॥

१२१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु इन पुस्तकों को लेकर जगन्नाथ पुरी लौट आये। उस समय जगन्नाथजी का स्नान-उत्सव मनाया जा रहा था, जिसे उन्होंने देखा।

अनवसरे जगन्नाथेर ना पाजा दरशन ।। विरहे आलालनाथ करिला गमन ॥

१२२॥

जब जगन्नाथजी मन्दिर में नहीं थे, तब श्री चैतन्य महाप्रभु उनका दर्शन नहीं कर सके। फलतः उनके विरह में वे जगन्नाथ पुरी छोड़कर आलालनाथ नामक स्थान पर चले गये।

भक्त-सने दिन कत ताहाजि रहिली ।।गौड़ेर भक्त आइसे, समाचार पाइला ।। १२३॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु कुछ दिनों तक आलालनाथ रहे। तभी उन्हें यह समाचार मिला कि बंगाल से सारे भक्तगण जगन्नाथ पुरी आ रहे हैं।

नित्यानन्द-सार्वभौम आग्रह करिजा ।।नीलाचले आइला महाप्रभुके लइञा ॥

१२४॥

जब बंगाल के भक्तगण जगन्नाथ पुरी आ गये, तो नित्यानन्द प्रभु तथा सार्वभौम भट्टाचार्य काफी प्रयास से श्री चैतन्य महाप्रभु को जगन्नाथ पुरी वापस ले आये।।

विरहे विह्वल प्रभु ना जाने रात्रि-दिने ।हेन-काले आइला गौड़ेर भक्त-गणे ॥

१२५॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु अन्ततः आलालनाथ छोड़कर जगन्नाथ पुरी लौटे, तो वे जगन्नाथ के विरह में रात-दिन भावविभोर रहने लगे। उनके शोक की कोई सीमा न थी। इस समय बंगाल के विभिन्न भागों के और विशेष रूप से नवद्वीप के सारे भक्त जगन्नाथ पुरी पहुँचे।

सबे मिलि' युक्ति करि कीर्तन आरम्भिल । कीर्तन-आवेशे प्रभुर मन स्थिर हैल ॥

१२६॥

परस्पर विचार-विमर्श के बाद सभी भक्तों ने सामूहिक कीर्तन प्रारम्भ किया। इस तरह श्री चैतन्य महाप्रभु का मन कीर्तन के आह्लाद से शान्त हुआ।

पूर्वे ग्रबे प्रभु रामानन्देरे मिलिला ।।नीलाचले आसिबारे ताँरै आज्ञा दिला ॥

१२७॥

इसके पूर्व जब श्री चैतन्य महाप्रभु दक्षिण भारत का भ्रमण कर रहे थे, तब गोदावरी नदी के तट पर उनकी भेंट रामानन्द राय से हुई थी। उस समय यह तय हुआ था कि रामानन्द राय अपने राज्यपाल के पद से त्यागपत्र दे देंगे और जगन्नाथ पुरी आयेंगे और श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ रहेंगे।

राज-आज्ञा लञा तेहो आइला कत दिने । रात्रि-दिने कृष्ण-कथा रामानन्द-सने ॥

१२८॥

श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेश पर श्री रामानन्द राय ने राजा से छुट्टी । माँगी और जगन्नाथ पुरी आ गये। उनके वहाँ आने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने उनके साथ दिन-रात कृष्ण तथा उनकी लीलाओं के विषय में बातें करते हुए प्रचुर आनन्द प्राप्त किया।

काशी-मिश्रे कृपा, प्रद्युम्न मिश्रादि-मिलन । परमानन्द-पुरी-गोविन्द-कोशीश्वरागमन ॥

१२९॥

। रामानन्द राय के आने के बाद, श्री चैतन्य महाप्रभु ने काशी मिश्र पर कृपा की और प्रद्युम्न मिश्र तथा अन्य भक्तों से भेंट की। उस समय तीन और भक्त परमानन्द पुरी, गोविन्द तथा काशीश्वर श्री चैतन्य महाप्रभु से मिलने जगन्नाथ पुरी आये।।

दामोदर-स्वरूप-मिलने परम आनन्द ।।शिखि-माहिति-मिलन, राय भवानन्द ॥

१३०॥

। अन्ततः स्वरूप दामोदर गोस्वामी से भेंट होने पर चैतन्य महाप्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए। इसके बाद शिखि माहिति तथा रामानन्द राय के पिता भवानन्द राय से उनकी भेंट हुई।

गौड़ हइते सर्व वैष्णवेर आगमन ।।कुलीन-ग्राम-वासि-सङ्गे प्रथम मिलन ॥

१३१॥

बंगाल के सारे भक्त क्रमशः जगन्नाथ पुरी पहुँचने लगे। उस समय कुलीन ग्राम के निवासी भी श्री चैतन्य महाप्रभु से भेंट करने पहली बार आये।

नरहरि दास आदि ग्रत खण्ड-वासी ।।शिवानन्द-सेन-सङ्गे मिलिला सबे आसि' ॥

१३२॥

अन्ततोगत्वा नरहरि दास तथा खण्ड के सारे निवासी शिवानन्द सेन सहित आये और श्री चैतन्य महाप्रभु उन सबसे मिले।

स्नान-यात्रा देखि' प्रभु सङ्गे भक्त-गण ।।सबा लञा कैला प्रभु गुण्डिचा मार्जन ॥

१३३॥

भगवान जगन्नाथ की स्नान यात्रा के दर्शन के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने अनेक भक्तों की सहायता से श्री गुण्डिचा मन्दिर को धोया और सफाई की।

सबा-सङ्गे रथ-यात्रा कैल दरशन ।।रथ-अग्रे नृत्य करि' उद्याने गमन ॥

१३४॥

इसके बाद समस्त भक्तों सहित श्री चैतन्य महाप्रभु ने रथयात्रा को दर्शन किया। चैतन्य महाप्रभु ने रथ के आगे स्वयं नृत्य किया और नृत्य के बाद एक बगीचे में गये।

प्रतापरुद्रेरे कृपा कैल सेइ स्थाने ।।गौड़ीया-भक्ते आज्ञा दिल विदायेर दिने ॥

१३५॥

। उस बगीचे में श्री चैतन्य महाप्रभु ने राजा प्रतापरुद्र पर कृपा की। इसके बाद जब बंगाल के भक्तगण अपने घरों को लौटने वाले थे, तो महाप्रभु ने लगभग सबों को अलग-अलग आदेश दिये।

प्रत्यब्द आसिबे रथ-यात्रा-दरशने ।एइ छले चाहे भक्त-गणेर मिलने ॥

१३६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु बंगाल के सारे भक्तों से प्रतिवर्ष मिलते रहना चाहते थे। अतएव महाप्रभु ने उन्हें आज्ञा दी कि वे प्रतिवर्ष रथयात्रा का दर्शन करने आया करें।

सार्वभौम-घरे प्रभुर भिक्षा-परिपाटी ।पाठीर माता कहे, ग्राते राण्डी हउक् षाठी ॥

१३७॥

सार्वभौम भट्टाचार्य के घर भोजन करने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु आमन्त्रित किये गये। जब महाप्रभु सुस्वादु भोजन कर रहे थे, तो सार्वभौम भट्टाचार्य के जामाता उनकी पुत्री पाठी के पति ) ने उनकी आलोचना की। इसके कारण पाठी की माता ने उसे शाप दे दिया कि षाठी विधवा हो जाये। दूसरे शब्दों में, उसने अपने जामाता को मर जाने का शाप दे डाला।

वर्षान्तरे अद्वैतादि भक्तेर आगमन ।।प्रभुरे देखिते सबे करिला गमन ॥

१३८॥

साल के अन्त में बंगाल के सारे भक्त अद्वैत आचार्य के साथ पुनः श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने आये। निस्सन्देह, जगन्नाथ पुरी जाने के लिए भक्तों की भारी भीड़ उमड़ रही थी।

आनन्दे सबारे निया देन वास-स्थान ।शिवानन्द सेन करे सबार पालन ॥

१३९॥

जब बंगाल के सारे भक्त आ गये, तो श्री चैतन्य महाप्रभु ने सबको रहने का स्थान दिया और शिवानन्द सेन को उनकी देखरेख का भार सौंप दिया।

शिवानन्देर सङ्गे आइला कुकुर भाग्यवान् ।प्रभुर चरण देखि' कैल अन्तर्धान ॥

१४०॥

। शिवानन्द सेन तथा भक्तों के साथ एक कुत्ता आया था, जो इतना भाग्यवान निकला कि श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों का दर्शन करने के बाद वह मुक्त हो गया और भगवधाम वापस चला गया।

पथे सार्वभौम सह सबार मिलन ।।सार्वभौम भट्टाचार काशीते गमन ॥

१४१॥

वाराणसी जा रहे सार्वभौम भट्टाचार्य से मार्ग में सभी लोग मिले।

प्रभुरे मिलिला सर्व वैष्णव आसिया ।। जल-क्रीड़ा कैल प्रभु सबारे लइयो । १४२॥

जगन्नाथ पुरी आकर सारे वैष्णव श्री चैतन्य महाप्रभु से मिले। बाद में सभी भक्तों को साथ लेकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने जलक्रीड़ा की।

सबा लञा कैल गुण्डिचा-गृह-सम्मार्जन ।। रथ-यात्रा-दरशने प्रभुर नर्तन ॥

१४३॥

सबसे पहले महाप्रभु ने गुण्डिचा-मन्दिर को बारीकी से धोया। उसके बाद सब भक्तों ने रथयात्रा उत्सव एवं रथ के आगे महाप्रभु के नृत्य का दर्शन किया।

उपवने कैल प्रभु विविध विलास । प्रभुर अभिषेक कैल विप्र कृष्णदास ॥

१४४॥

जगन्नाथ मन्दिर से गुण्डिचा के रास्ते में पड़ने वाले बगीचे में श्री चैतन्य महाप्रभु ने विविध लीलाएँ कीं। कृष्णदास नामक एक ब्राह्मण ने श्री चैतन्य महाप्रभु का अभिषेक किया।

गुण्डिचाते नृत्य-अन्ते कैल जल-केलि ।हेरा-पञ्चमीते देखिल लक्ष्मी देवीर केली ॥

१४५ ॥

गुण्डिचा-मन्दिर में नृत्य करने के बाद महाप्रभु ने भक्तों के साथ जलक्रीड़ा की और हेरापंचमी के दिन उन सबने लक्ष्मीदेवी के कार्यकलापों का दर्शन किया।

कृष्ण-जन्म-ग्रात्राते प्रभु गोप-वेश हैला ।।दधि-भार वहि' तबे लगुड़ फिराइला ॥

१४६॥

। कृष्ण के जन्मदिवस, जन्माष्टमी को, श्री चैतन्य महाप्रभु ने ग्वालबाल का वेश बनाकर दही के मटकों से युक्त एक बहँगी धारण की तथा एक लाठी को घुमाइ।

गौड़ेर भक्त-गणे तबे करिल विदाय ।। सङ्गेर भक्त लजा करे कीर्तन सदाय ॥

१४७॥

। इसके बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने गौड़देश ( बंगाल ) से आये सारे भक्तों को विदा किया। महाप्रभु सदा साथ रहने वाले अपने अन्तरंग भक्तों के साथ सदैव कीर्तन करते रहे।

वृन्दावन ग्राइते कैल गौड़ेरे गमन । प्रतापरुद्र कैल पथे विविध सेवन ॥

१४८॥

वृन्दावन जाने के लिए, महाप्रभु पहले गौड़देश ( बंगाल) गये। रास्ते में राजा प्रतापरुद्र ने महाप्रभु को प्रसन्न करने के लिए अनेक प्रकार से सेवाएँ कीं।

पुरी-गोसाजि-सङ्गे वस्त्र-प्रदान-प्रसङ्ग ।।रामानन्द राय आइला भद्रक पर्यन्त ॥

१४९॥

बंगाल होकर वृन्दावन जाते समय एक घटना घटी, जिसमें पुरी गोसांई का वस्त्र उनसे बदल गया। श्री रामानन्द राय महाप्रभु के साथमाथ भद्रक नगर तक गये।

आसि' विद्या-वाचस्पतिर गृहेते रहिला ।।प्रभुरे देखिते लोक-सङ्घट्ट हइला ॥

१५०॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन जाते हुए विद्यानगर ( बंगाल) पहुँचे, तो वे सार्वभौम भट्टाचार्य के भाई विद्या वाचस्पति के घर पर रुके। जब महाप्रभु सहसा उनके घर पहुँचे, तो वहाँ लोगों की भारी भीड़ जमा हो गई।

पञ्च-दिन देखे लोक नाहिक विश्राम ।।लोक-भये रात्रे प्रभु आइला कुलिया-ग्राम ॥

१५१॥

लोग लगातार पाँच दिनों तक महाप्रभु का दर्शन करने आते रहे और उन्हें कोई विश्राम नहीं मिल रहा था। अतएव भीड़ के भय से महाप्रभु ने रात्रि में ही प्रस्थान कर दिया और वे कुलिया नामक ग्राम ( आज का नवद्वीप ) में चले गये।

कुलिया-ग्रामेते प्रभुर शुनिया आगमन ।। कोटि कोटि लोक आसि' कैल दरशन ॥

१५२॥

। कुलियाग्राम में महाप्रभु का आगमन सुनकर हजारों-लाखों लोग उनका दर्शन करने आये।।

कुलिया-ग्रामे कैल देवानन्देरे प्रसाद ।। गोपाल-विप्रेरे क्षमाइल श्रीवासापराध ॥

१५३ ॥

इस समय श्री चैतन्य महाप्रभु ने जो विशेष कार्य किये, उनमें देवानन्द पंडित पर कृपा करना तथा गोपाल चापल नामक ब्राह्मण, जिसने श्रीवास ठाकुर के चरणकमलों के प्रति अपराध किया था, उसको क्षमा प्रदान करना मुख्य हैं।

पाषण्डी निन्दक आसि' पड़िला चरणे ।। अपराध क्षमि' तारे दिल कृष्ण-प्रेमे ॥

१५४॥

अनेक नास्तिक तथा निन्दक भी आये और महाप्रभु के चरणकमलों में गिर पड़े। महाप्रभु ने उन्हें क्षमा की और उनको कृष्ण-प्रेम प्रदान किया।

वृन्दावन ग्राबेन प्रभु शुनि' नृसिंहानन्द ।।पथ साजाइल मने पाइया आनन्द ॥

१५५॥

। जब श्री नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी ने सुना कि श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन जायेंगे, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए और मन ही मन उस मार्ग को सजाने लगे।

कुलिया नगर हैते पथ रत्ने बान्धाइल ।।निवृन्त पुष्प-शय्या उपरे पतिल ॥

१५६॥

सर्वप्रथम नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी ने कुलिया नगरी से शुरु होने वाली एक चौड़ी सड़क का चिन्तन किया। उन्होंने पुनः इस सड़क को रत्नों से सजाया और उसके ऊपर डंठल रहित फूलों की एक सेज बिछायी।

पथे दुइ दिके पुष्य-बकुलेर श्रेणी ।।मध्ये मध्ये दुइ-पाशे दिव्य पुष्करिणी ॥

१५७॥

। उन्होंने मन-ही-मन सड़क के दोनों किनारों को बकुल पुष्प के वृक्षों से सजाया और बीच-बीच में दोनों ओर दिव्य सरोवर निर्मित किये।

रत्न-बाँधा घाट, ताहे प्रफुल्ल कमल ।।नाना पक्षि-कोलाहल, सुधा-सम जल ॥

१५८॥

इन सरोवरों में स्नान करने के घाट रत्नों से बने थे, जिनमें कमल के फूल खिले थे। तरह-तरह के पक्षी चहक रहे थे और सरोवरों का जल अमृत के समान था।

शीतल समीर वहे नाना गन्ध लबा। ‘कानाइर नाटशाला' पर्यन्त लइल बान्धिञा ॥

१५९॥

पूरी सड़क में नाना प्रकार की शीतल हवा बह रही थी, जो विविध फूलों की सुगन्ध से लदी थी। वे इस सड़क को कानाइ नाटशाला तक बनाते हुए ले गये।

आगे मन नाहि चले, ना पारे बान्धिते । पथ-बान्धा ना याय, नृसिंह हैला विस्मिते ॥

१६०॥

नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी अपने मन में कानाइ नाटशाला के आगे सड़क नहीं बना पाये। उनकी समझ में नहीं आ रहा था कि पूरी सड़क क्यों नहीं बन पा रही है, अतः वे चकित थे।

निश्चय करिया कहि, शुन, भक्त-गण ।। एबार ना झाबेन प्रभु श्री-वृन्दावन ॥

१६१॥

उसके बाद उन्होंने विश्वासपूर्वक भक्तों से बतलाया कि इस बार श्री चैतन्य महाप्रभु वृन्दावन नहीं जायेंगे।

कानाजिर नाटशाला' हैते आसिब फिरिना ।। जानिबे पश्चात्, कहिले निश्चय करिञा ॥

१६२॥

नृसिंहानन्द ब्रह्मचारी ने कहा, महाप्रभु कानाइ नाटशाला तक जायेंगे और पुनः लौट आयेंगे। इसे तुम बाद में जानोगे, किन्तु मैं अभी बड़े ही विश्वास के साथ कह रहा हूँ।

गोसात्रि कुलिया हैते चलिला वृन्दावन ।। सङ्गे सहस्रेक लोक व्रत भक्त-गण ॥

१६३॥

। जब श्री चैतन्य महाप्रभु कुलिया से वृन्दावन की ओर चलने लगे, तो हजारों लोग उनके साथ थे और ये सारे भक्त थे।

ग्राहाँ ग्राय प्रभु, ताहाँ कोटि-संख्य लोक ।। देखिते आइसे, देखि' खण्डे दुःख-शोक ॥

१६४॥

। श्री चैतन्य महाप्रभु जहाँ-जहाँ गये, वहीं असंख्य लोगों की भीड़ उनका दर्शन करने आई। दर्शन करने पर उनका सारा दुःख और शोक दूर हो गया ग्राहाँ ग्राहाँ प्रभुर चरण पड़ये चलिते ।।से मृत्तिका लय लोक, गर्त हय पथे ॥

१६५ ॥

जहाँ-जहाँ महाप्रभु के चरणकमल भूमि पर पड़ते थे, लोग तुरन्त आकर वहाँ की धूल ले लेते थे। उन लोगों ने इतनी धूल एकत्रित की कि इससे मार्ग में अनेक गड्ढे बन गये।

ऐछे चलि, आइला प्रभु 'रामकेलि' ग्राम । गौड़ेर निकट ग्राम अति अनुपाम ॥

१६६ ॥

अन्त में श्री चैतन्य महाप्रभु रामकेलि नामक गाँव में आये। यह गाँव बंगाल की सीमा पर स्थित है और अत्यन्त मनोहर है।

ताहाँ नृत्य करे प्रभु प्रेमे अचेतन ।। कोटि कोटि लोक आइसे देखते चरण ॥

१६७ ।। रामकेलि ग्राम में संकीर्तन करते समय महाप्रभु नृत्य करते और कभीकभी भगवत्-प्रेमवश अपनी चेतना खो देते थे। रामकेलि ग्राम में असंख्य लोग उनके चरणकमलों का दर्शन करने के लिए आये।

गौड़ेश्वर ग्नवन-राजा प्रभाव शुनिजा।। कहिते लागिल किछु विस्मित हुआ ॥

१६८॥

जब बंगाल के मुसलमान राजा ने सुना कि श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रभाव से असंख्य लोग आकृष्ट हो रहे हैं, तो वह अत्यन्त विस्मित हुआ और इस प्रकार कहने लगा।

काजी, वन इहार ना करिह हिंसन ।आपन-इच्छाय बुलुन, ग्राहाँ उँहार मन ॥

१७० ॥

। उस मुसलमान राजा ने अपने काजी ( मैजिस्ट्रेट) को आदेश दिया, इस हिन्दू ईश्वर के दूत को ईर्ष्यावश तंग मत करना। यह जहाँ भी जो कुछ चाहे उसे करने दिया जाये।

विना दाने एत लोक ग्राँर पाछे हुय ।। सेइ त' गोसाजा, इहा जानिह निश्चय ॥

१६९॥

बिना कुछ दान दिये ही जिस व्यक्ति का इतने लोग अनुसरण कर रहे हैं, वह निश्चय ही ईश्वर का दूत होगा। मैं निश्चित रूप से ऐसा समझता केशव-छत्रीरे राजा वार्ता पुछिल ।।प्रभुर महिमा छत्री उड़ाइया दिल ॥

१७१॥

जब मुसलमान राजा ने अपने सहायक केशव छत्री से श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रभाव के बारे में जानना चाहा, तो उसने महाप्रभु के बारे में सब कुछ जानते हुए भी बात टालने के लिए चैतन्य महाप्रभु के कार्यकलापों को कोई महत्त्व नहीं दिया।

भिखारी सन्यासी करे तीर्थ पर्यटन ।।ताँरै देखिबारे आइसे दुइ चारि जन ॥

१७२॥

केशव छत्री ने मुसलमान राजा को बतलाया कि चैतन्य महाप्रभु एक संन्यासी हैं, जो विभिन्न तीर्थस्थलों की यात्रा कर रहे हैं, अतएव कुछेक लोग ही उन्हें देखने आते हैं।

ग्रवने तोमार ठात्रि करये लागानि ।।ताँर हिंसाय लाभ नाहि, हय आर हानि ॥

१७३॥

केशव छत्री ने कहा, आपका मुसलमान सेवक ईष्यवश उनके विरुद्ध षड्यंत्र कर रहा है। मेरे विचार से उनमें अधिक रुचि लेना आपके लिए लाभप्रद नहीं होगा, प्रत्युत इससे नुकसान ही हो सकता है।

राजारे प्रबोधि' केशव ब्राह्मण पाठाजा ।। चलिबार तरे प्रभुरे पाठाइल कहि ॥

१७४॥

इस प्रकार राजा को समझा-बुझाकर केशव छत्री ने श्री चैतन्य महाप्रभु के पास इस प्रार्थना के साथ एक ब्राह्मण दूत भेजा कि वे शीघ्र ही वहाँ से चले जायें।

दबिर खासेरे राजा पुछिल निभृते ।। गोसाजिर महिमा तेहो लागिल कहते ॥

१७५ ॥

राजा ने एकान्त में दबिर खास ( श्रील रूप गोस्वामी ) से पूछताछ की, तो वे महाप्रभु की महिमाओं का वर्णन करने लगे।

ये तोमारे राज्य दिल, ये तोमार गोसाजा ।। तोमार देशे तोमार भाग्ये जन्मिला आसिजा ॥

१७६॥

श्रील रूप गोस्वामी ने कहा, जिस पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने आपको यह राज्य दिया है और जिन्हें आप ईश्वर के दूत के रूप में स्वीकार करते हैं, उन्होंने आपके सौभाग्य से आपके देश में जन्म लिया है।

तोमार मङ्गल वाञ्छे, कार्य-सिद्धि हय ।। इहार आशीर्वादे तोमार सर्वत्र-इ जय ॥

१७७॥

यह ईश्वर के दूत सदैव आपके मंगल के आकांक्षी हैं। उन्हीं की कृपा से आपके सारे कार्य सफल होते हैं। उनके आशीर्वाद से आपकी सर्वत्र विजय होगी।

मोरे केन पुछ, तुमि पुछ आपने-मन ।। तुमि नराधिप हओ विष्णु-अंश सम ॥

१७८ ॥

आप मुझसे क्यों पूछ रहे हैं? आप अपने मन से क्यों नहीं पूछते? आप जनता के राजा होने के कारण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के प्रतिनिधि हैं। अतएव आप इसे मुझसे अधिक अच्छी तरह समझ सकते हैं।

तोमार चित्ते चैतन्येरे कैछे हय ज्ञान ।।तोमार चित्ते येइ लय, सेइ त' प्रमाण ॥

१७९॥

इस प्रकार श्रील रूप गोस्वामी ने राजा को बतलाया कि उसका मन श्री चैतन्य महाप्रभु को जानने का एक साधन है। उन्होंने राजा को विश्वास दिलाया कि उसके मन में जो भी आये उसे ही प्रमाण मानें।

राजा कहे, शुन, मोर मने येइ लय ।।साक्षातीश्वर इहँ नाहिक संशय ॥

१८० ॥

। राजा ने उत्तर दिया, मैं श्री चैतन्य महाप्रभु को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् मानता हूँ। इसमें कोई सन्देह नहीं है।

एत कहि' राजा गेला निज अभ्यन्तरे ।तबे दबिर खास आइला आपनार घरे ॥

१८१॥

रूप गोस्वामी के साथ इस बातचीत के बाद राजा अपने अन्तःपुर में चला गया। तब रूप गोस्वामी (जो उस समय दबिर खास कहलाते थे) भी अपने घर लौट गये।

घरे आसि' दुइ भाइ झुकति करिजा ।।प्रभु देखिबारे चले वेश लुकाञा ॥

१८२॥

अपने घर लौट आने के बाद दबिर खास तथा उनके भाई ने पर्याप्त विचार विमर्श के बाद महाप्रभु से वेष बदलकर मिलने का निर्णय किया।

अर्ध-रात्रे दुई भाइ आइला प्रभु-स्थाने ।।प्रथमे मिलिला नित्यानन्द-हरिदास सने ॥

१८३॥

इस प्रकार दबिर खास तथा साकर मल्लिक दोनों भाई आधी रात को वेश बदलकर श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने गये। सर्वप्रथम वे नित्यानन्द प्रभु तथा हरिदास ठाकुर से मिले।

ताँरा दुइ-जन जानाइला प्रभुर गोचरे ।।रूप, साकर-मल्लिक आइला तोमा' देखिबारे ॥

१८४॥

श्री नित्यानन्द प्रभु तथा हरिदास ठाकुर ने श्री चैतन्य महाप्रभु को बतलाया कि दो भक्त-श्री रूप तथा सनातन-उनका दर्शन करने के लिए आये हैं।

दुई गुच्छ तृण पँहे दशने धरिजा ।।गले वस्त्र बान्धि' पड़े दण्डवत् हा ॥

१८५॥

दोनों भाई अत्यन्त दीनतावश अपने दाँतों में तिनके दबाकर और अपने गले में कपड़ा बाँधकर महाप्रभु के सामने दण्ड के समान गिर पड़े।

दैन्य रोदन करे, आनन्दे विह्वल ।।प्रभु कहे,—उठ, उठ, हइल मङ्गल ॥

१८६॥

श्री चैतन्य महाप्रभु को देखकर दोनों भाई आनन्द से अभिभूत हो गये और दीनतावश रोने लगे। महाप्रभु ने उनसे उठने के लिए कहा और उनके मंगल की कामना की।

उठि' दुइ भाइ तबे दन्ते तृण धरि' ।। दैन्य करि' स्तुति करे करयोड़ करि ॥

१८७॥

दोनों भाई उठ खड़े हुए और पुनः अपने दाँतों में तिनका दबाकर उन्होंने हाथ जोड़कर विनीत भाव से प्रार्थना की।

जय जय श्री कृष्ण-चैतन्य दयामय ।। पतित-पावन जय, जय महाशय ॥

१८८॥

पतितात्माओं का उद्धार करने वाले परम दयालु श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु की जय हो! परम भगवान् की जय हो! नीचे-जाति, नीच-सङ्गी, करि नीच काज ।। तोमार अग्रेते प्रभु कहिते वासि लाज ॥

१८९॥

। हे प्रभु, हम नीच जाति के हैं और हमारे संगी तथा हमारी नौकरी भीनिम्न कोटि की है। अतएव हम आपके समक्ष अपना परिचय नहीं दे सकते। हमें यहाँ आपके समक्ष खड़े होने में अत्यधिक लज्जा का अनुभव हो रहा है।

मत्तुल्यो नास्ति पापात्मा नापराधी च कश्चन । परिहारेऽपि लज्जा मे किं ब्रुवे पुरुषोत्तम ॥

१९०॥

हे प्रभु, हम आपको बतला देना चाहते हैं कि न तो हम से बड़ा कोई पापी है, न ही हमारे समान कोई अपराधी है। यदि हम अपने पापकर्म बताना भी चाहें, तो हमें तुरन्त लज्जा आ जाती है। उन्हें छोड़ने की बात तो दूर रही।

पतित-पावन-हेतु तोमार अवतार । आमा-बइ जगते, पतित नाहि आर ॥

१९१॥

दोनों भाइयों ने निवेदन किया, हे प्रभु, आप पतितात्माओं का उद्धार करने के लिए अवतरित हुए हैं। आप ऐसा समझिये कि इस संसार में हम जैसा पतित कोई नहीं है।

जगाइ-माधाइ दुइ करिले उद्धार । ताहाँ उद्धारिते श्रम नहिल तोमार ॥

१९२॥

आपने जगाइ तथा माधाई दोनों भाइयों का उद्धार किया, किन्तु उनका उद्धार करने में आपको अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ा।

ब्राह्मण-जाति तारा, नवद्वीपे घर । नीच-सेवा नाहि करे, नहे नीचेर कूर्पर ॥

१९३ ॥

जगाइ तथा माधाइ में केवल एक दोष था-वे पापकर्मों में लिप्त रहते थे। किन्तु पापकर्मों का भण्डार आपके पवित्र नाम के कीर्तन के आभास मात्र से ही जलकर भस्म हो सकता है।

सबे एक दोष तार, हय पापाचार । पाप-राशि दहे नामाभासेइ तोमार ॥

१९४॥

जगाइ तथा माधाइ दोनों भाई ब्राह्मण जाति के थे और उनका निवास-स्थान नवद्वीप की पुण्यभूमि में था। उन्होंने न तो कभी नीच पुरुषों की सेवा की थी, न ही वे नीच कार्यों के साधन बने।

तोमार नाम लञा तोमार करिल निन्दन । सेइ नाम हइल तार मुक्तिर कारण ॥

१९५॥

जगाइ तथा माधाइ ने आपकी निन्दा के रूप में आपके पवित्र नाम का उच्चारण किया। सौभाग्यवश वही पवित्र नाम उनकी मुक्ति का कारण बना।

जगाइ-माधाइ हैते कोटी कोटी गुण ।। अधम पतित पापी आमि दुइ जन ॥

१९६॥

हम दोनों जगाइ तथा माधाइ से करोड़ों गुना अधम हैं। हम उनसे अधिक नीच, पतित तथा पापी हैं।

म्लेच्छ-जाति, म्लेच्छ-सेवी, करि म्लेच्छ-कर्म ।। गो-ब्राह्मण-द्रोहि-सङ्गे आमार सङ्गम ॥

१९७॥

वास्तव में हम म्लेच्छ (मांसाहारी ) जाति के हैं, क्योंकि हम म्लेच्छों के नौकर हैं। निस्सन्देह, हमारे कार्य बिल्कुल म्लेच्छों की ही तरह हैं। चूँकि हम सदैव ऐसे लोगों की संगति करते हैं, अतएव हम गौवों तथा ब्राह्मणों के प्रति शत्रुभाव रखने वाले हैं।

मोर कर्म, मोर हाते-गलाय बान्थियो । कु-विषय-विष्ठा-गर्ते दियाछे फेलाइया ॥

१९८॥

साकर मल्लिक तथा दबिर खास, दोनों भाइयों ने विनीत भाव से निवेदन किया कि अपने जघन्य कार्यों के फलस्वरूप उन्हें हाथ तथा गले से बाँधकर भौतिक इन्द्रिय-भोग रूपी घृणित मल जैसे पदार्थों के गड्ढे में गिरा दिये गये हैं।

आमा उद्धारिते बली नाहि त्रि-भुवने । पतित-पावन तुमि—सबे तोमा विने ॥

१९९॥

तीनों लोकों में हमारा उद्धार करने में कोई भी समर्थ नहीं है। आप पतितात्माओं के एकमात्र उद्धारक हैं, अतएव आपके अतिरिक्त हमारा कोई दूसरा नहीं है।

आमा उद्धारिया यदि देखाओ निज-बल ।।‘पतित-पावन' नाम तबे से सफल ॥

२०० ॥

यदि आप अपने दिव्य बल से हमारा उद्धार कर दें, तो निश्चय ही आप 'पतितपावन' के रूप में जाने जायेंगे। सत्य एक बात कहों, शुन, दयामय ।।मो-विनु दयार पात्र जगते ना हय ॥

२०१॥

हम बिल्कुल सत्य कह रहे हैं। हे दयामय! कृपया इसे सुन लीजिये। तीनों लोकों में हमारे अतिरिक्त कोई दूसरा दया का पात्र नहीं है।

मोरे दया करि' कर स्व-दया सफल ।। अखिल ब्रह्माण्ड देखक तोमार दया-बल ॥

२०२॥

हम सर्वाधिक पतित हैं, अतएव हम पर दया करने पर आपकी दया सर्वाधिक सफल होगी। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को आपकी दया की शक्ति देखने दीजिये! न मृषा परमार्थमेव मेशृणु विज्ञापनमेकमग्रतः ।। यदि मे न दयिष्यसे तदा ।दयनीयस्तव नाथ दुर्लभः ॥

२०३॥

हे प्रभु, हमें आपके समक्ष एक बात कहने दें। यह रंचमात्र भी मिथ्या नहीं है अपितु सार्थक है। यह इस प्रकार है-यदि आप हम पर दयालु नहीं होंगे, तो आपकी कृपा के लिए हमसे अधिक योग्य पात्र ढूंढ पाना अत्यधिक कठिन होगा।'

आपने अयोग्य देखि' मने पाँ क्षोभ ।। तथापि तोमार गुणे उपजय लोभ ॥

२०४॥

आपकी कृपा के लिए उपयुक्त पात्र न होने से हम अत्यधिक क्षुब्ध हैं। फिर भी हमने आपके दिव्य गुणों के विषय में सुन रखा है, अतएव हम आपके प्रति अत्यधिक आकृष्ट हैं।

वामन ग्रैछे चाँद धरिते चाहे करे ।। तैछे एइ वाञ्छा मोर उठये अन्तरे ॥

२०५॥

। निस्सन्देह, हम उस वामन के तुल्य हैं, जो चाँद को पकड़ना चाहता है। यद्यपि हम सर्वथा अयोग्य हैं, किन्तु हमारे मनों में आपकी कृपा प्राप्त करने की इच्छा उठ रही है।

भवन्तमेवानुचरन्निरन्तरः ।प्रशान्त-नि:शेष-मनो-रथान्तरः । कदाहमैकान्तिक-नित्य-किङ्करः।प्रहर्षयिष्यामि सनाथ-जीवितम् ॥

२०६॥

आपकी निरन्तर सेवा करने से मनुष्य सारी भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाता है और पूर्ण शान्ति प्राप्त करता है। वह समय कब आयेगा जब मैं आपका नित्य दास बनूंगा और ऐसा योग्य स्वामी पाकर सदैव प्रसन्नता का अनुभव करूँगा? ।

शुनि' महाप्रभु कहे,—शुन, दबिर-खास । तुमि दुइ भाइ–मोर पुरातन दास ॥

२०७॥

दबिर खास तथा साकर मल्लिक की प्रार्थना सुनने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने कहा, हे दबिर खास, तुम दोनों भाई मेरे पुराने सेवक हो।

आजि हैते मुँहार नाम 'रूप' 'सनातन' । दैन्य छाड़, तोमार दैन्ये फाटे मोर मन ॥

२०८॥

। हे साकर मल्लिक, आज से तुम्हारे नाम श्रील रूप तथा श्रील सनातन होंगे। अब अपनी दीनता को त्यागो, क्योंकि तुम्हारी दीनता देखकर मेरा हृदय फटा जा रहा है।

दैन्य-पत्री लिखि' मोरे पाठाले बार बार ।। सेइ पत्री-द्वारा जानि तोमार व्यवहार ॥

२०९॥

तुमने मेरे पास अपनी दीनता जताने वाले अनेक पत्र लिखे, जिनसे तुम्हारी दीनता परिलक्षित होती है। मैं उन पत्रों से तुम्हारे व्यवहार को समझ सकता हूँ।

तोमार हृदय आमि जानि पत्री-द्वारे । तोमा शिखाइते श्लोक पाठाइल तोमारे ॥

२१०॥

मैं तुम्हारे पत्रों से ही तुम्हारे हृदय को जान गया था। इसलिए तुम्हें देने के लिए मैंने तुम्हारे पास एक श्लोक लिख भेजा था, जो इस प्रकार है।

पर-व्यसनिनी नारी व्यग्रापि गृह-कर्मसु ।। तदेवास्वादयत्यन्तर्नव-सङ्ग-रसायनम् ॥

२११॥

यदि कोई स्त्री अपने पति को छोड़कर किसी अन्य पुरुष में आसक्त गती है, तो वह अपने घरेलू कामों में अत्यधिक व्यस्त दिखेगी, किन्तु अपने अन्तर में वह अपने प्रेमी के सान्निध्य की अनुभूति का सदैव भवादन करती रहती है।

गौड़-निकट आसिते नाहि मोर प्रयोजन ।।तोमा-मुँहा देखिते मोर इहाँ आगमन ॥

२१२॥

। वास्तव में बंगाल आने में मेरा कोई प्रयोजन नहीं था, किन्तु मैं तुम योगी भाइयों को मिलने के लिए ही आया हूँ।

एइ मोर मनेर कथा केह नाहि जाने ।सबै बले, केने आइला रामकेलि-ग्रामे ॥

२१३॥

हर कोई पूछ रहा है कि मैं इस रामकेलि गाँव में क्यों आया हूँ। कोई भी मेरे प्रयोजन को नहीं जानता।

भाल हैल, दुई भाइ आइला मोर स्थाने ।।घरे ग्राह, भय किछु ना करिह मने ॥

२१४॥

यह अच्छा हुआ कि तुम दोनों भाई मुझे मिलने आये। अब तुम घर जा सकते हो। अब किसी बात का डर न रखो।

जन्मे जन्मे तुमि दुई—किङ्कर आमार ।।अचिराते कृष्ण तोमाय करिबे उद्धार ॥

२१५॥

तुम दोनों जन्म-जन्मांतर मेरे सनातन दास रहे हो। मुझे विश्वास है कि कृष्ण शीघ्र ही तुम्हारा उद्धार करेंगे।

एत बलि देंहार शिरे धरिल दुई हाते ।। दुइ भाइ प्रभु-पद निल निज माथे ॥

२१६॥

तब महाप्रभु ने उन दोनों के सिरों पर अपने दोनों हाथ रख दिये और उन दोनों ने तुरन्त ही अपने-अपने मस्तक पर महाप्रभु के चरणकमलों को रख लिया।

दोहा आलिङ्गिया प्रभु बलिल भक्त-गणे । सबे कृपा करि' उद्धारह दुइ जने ॥

२१७॥

इसके बाद महाप्रभु ने उन दोनों को अपने आलिंगन में ले लिया और वहाँ पर उपस्थित सारे भक्तों से अनुरोध किया कि वे उन पर दयालु हों और उनका उद्धार करें।

दुइ जने प्रभुर कृपा देखि' भक्त-गणे ।। ‘हरि' 'हरि' बले सबे आनन्दित-मने ॥

२१८॥

जब समस्त भक्तों ने दोनों भाइयों पर महाप्रभु की कृपा देखी, तो वे अत्यन्त पुलकित हुए और हरि! हरि! कहकर भगवन्नाम का कीर्तन करने लगे।

नित्यानन्द, हरिदास, श्रीवास, गदाधर ।। मुकुन्द, जगदानन्द, मुरारि, वक्रेश्वर ॥

२१९॥

हाप्रभु के सभी वैष्णव पार्षद वहाँ उपस्थित थे, जिनमें नित्यानन्द , अग्दिास ठाकुर, श्रीवास ठाकुर, गदाधर पण्डित, मुकुन्द, जगदानन्द स, मुरारि तथा वक्रेश्वर सम्मिलित थे।

सबार चरणे धरि, पड़े दुई भाइ ।। सबे बले,—धन्य तुमि, पाइले गोसाजि ॥

२२० । श्री चैतन्य महाप्रभु के आदेशानुसार रूप तथा सनातन दोनों भाइयों ने तुरन्त ही इन वैष्णवों के चरणकमलों का स्पर्श किया। वे सभी अत्यन्त प्रसन्न हुए और उन्होंने दोनों भाइयों को महाप्रभु की कृपा प्राप्त होने पर बधाई दी।

सबा-पाश आज्ञा मागि' चलन-समय ।। प्रभु-पदे कहे किछु करिया विनय ॥

२२१॥

। वहाँ पर उपस्थित सारे वैष्णवों से आज्ञा लेकर दोनों भाइयों ने विदा लेते समय महाप्रभु के चरणकमलों पर कुछ निवेदन किया।

इहाँ हैते चल, प्रभु, इहाँ नाहि काज । यद्यपि तोमारे भक्ति करे गौड-राज ॥

२२२॥

उन्होंने कहा, हे प्रभु, यद्यपि बंगाल का राजा नवाब हुसैन शाह आपका अत्यन्त सम्मान करता है, किन्तु अब आपको यहाँ कोई अन्य काम नहीं है। अतएव कृपया आप इस स्थान से प्रस्थान करें।

तथापि झवन जाति, ना करि प्रतीति ।।तीर्थ-यात्राय एत संघट्ट भाल नहे रीति ॥

२२३।। यद्यपि राजा आपके प्रति आदर-भाव रखता है, तो भी वह यवन जाति का है और उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। हमारे विचार से वृन्दावन की तीर्थयात्रा के लिए अपने साथ इतनी बड़ी भीड़ ले जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

ग्रार सङ्गे चले एइ लोक लक्ष-कोटि ।।वृन्दावन-यात्रार ए नहे परिपाटी ॥

२२४॥

हे प्रभु, आप अपने साथ लाखों लोगों को लेकर वृन्दावन जा रहे हैं, किन्तु तीर्थयात्रा करने की यह उपयुक्त विधि नहीं है।

यद्यपि वस्तुतः प्रभुर किछु नाहि भय ।।तथापि लौकिक-लीला, लोक-चेष्टा-मय ॥

२२५॥

। यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु स्वयं श्रीकृष्ण भगवान् थे और तनिक भी भयभीत नहीं थे, तथापि उन्होंने अपने नये भक्तों को शिक्षा देने के लिए एक मनुष्य की भाँति आचरण किया।

एत बलि' चरण वन्दि' गेला दुई-जन ।।प्रभुर सेइ ग्राम हैते चलिते हैल मन ॥

२२६॥

। यह कहकर दोनों भाइयों ने महाप्रभु के चरणकमलों की वन्दना की और अपने घर लौट आये। तत्पश्चात् महाप्रभु ने उस गाँव को छोड़ने का धार किया।

प्राते चलि' आइला प्रभु'कानाइर नाटशाला' ।देखिल सकल ताहाँ कृष्ण-चरित्र-लीला ॥

२२७॥

प्रातःकाल महाप्रभु वहाँ से चल पड़े और कानाइ नाटशाला नामक स्थान गये। वहाँ उन्होंने भगवान् कृष्ण की अनेक लीलाएँ देखीं।

सेइ रात्रे प्रभु ताहाँ चिम्ले मने मन ।सङ्गे संघट्ट भाल नहे, कैल सनातन ॥

२२८॥

। उस रात महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी के इस प्रस्ताव पर विचार किया कि उन्हें इतने लोगों को साथ लेकर वृन्दावन नहीं जाना चाहिए।

मथुरा ग्राइब आमि एत लोक सङ्गे।। किछु सुख ना पाइब, हबे रस-भङ्गे ॥

२२९॥

। महाप्रभु ने सोचा, यदि मैं इतनी बड़ी भीड़ के साथ मथुरा जाऊँगा, तो बहुत अच्छा नहीं होगा; क्योंकि इससे वातावरण अशान्त हो जायेगा।

एकाकी ग्राइब, किम्वा सङ्गे एक जन ।तबे से शोभये वृन्दावनेरे गमन ॥

२३०॥

। महाप्रभु इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि वे अकेले ही या अधिक से अधिक एक व्यक्ति के साथ वृन्दावन जायेंगे। इस तरह से वृन्दावन जाना अत्यन्त मुखद होगा।

एत चिन्ति प्रातः-काले गङ्गा-स्नान करि' ।।‘नीलाचले ग्राब' बलि' चलिला गौरहरि ॥

२३१॥

। इस प्रकार सोचकर महाप्रभु ने प्रात:काल गंगा नदी में स्नान किया और यह कहकर चल पड़े कि, मैं नीलाचल जाऊँगा। ।

एइ मत चलि' चलि' आइला शान्तिपुरे ।दिन पाँच-सात रहिला आचार घरे ॥

२३२॥

श्री चैतन्य महाप्रभु चलते-चलते शान्तिपुर पहुँचे और अद्वैत आचार्य के घर में पाँच-सात दिन रहे।

शची-देवी आनि' ताँरे कैल नमस्कार ।।सात दिन ताँर ठाञि भिक्षा-व्यवहार ॥

२३३॥

इस अवसर का लाभ उठाकर श्री अद्वैत आचार्य प्रभु ने माता शचीदेवी को बुला लिया और वे उनके घर में महाप्रभु का भोजन बनाने के लिए सात दिन तक रहीं।

ताँर आज्ञा लञा पुनः करिला गमने ।। विनय करिया विदाय दिल भक्त-गणे ॥

२३४॥

। अपनी माता से आज्ञा लेकर श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी के लिए चल पड़े। जब भक्तगण उनके साथ चलने लगे, तो महाप्रभु ने उनसे विनती की कि वे वहीं रहें और तब उन्होंने सबसे विदा ली।

जना दुई सङ्गे आमि ग्राब नीलाचले ।।आमारे मिलिबा आसि' रथ-यात्रा-काले ॥

२३५॥

यद्यपि श्री चैतन्य महाप्रभु ने सारे भक्तों से लौट जाने के लिए कहा, किन्तु उनमें से दो लोगों को उन्होंने अपने साथ आने दिया। बलभद्र भट्टाचार्य, आर पण्डित दामोदर ।। दुइ-जन-सङ्गे प्रभु आइला नीलाचल ॥

२३६॥

दो भक्त जो श्री चैतन्य महाप्रभु के साथ जगन्नाथ पुरी ( नीलाचल) जा रहे थे, वे थे बलभद्र भट्टाचार्य तथा दामोदर पण्डित।

दिन कत ताहाँ रहि चलिला वृन्दावन ।।लुकाजा चलिला रात्रे, ना जाने कोन जन ॥

२३७॥

जगन्नाथ पुरी में कुछ दिन रहकर महाप्रभु रात में चुपके से वृन्दावन के लिए चल पड़े। उन्होंने यह कार्य किसी की जानकारी में आये बिना किया।

बलभद्र भट्टाचार्य रहे मात्र सङ्गे। ।झारिखण्ड-पथे काशी आइला महा-रङ्गे ॥

२३८॥

जब श्री चैतन्य महाप्रभु जगन्नाथ पुरी से वृन्दावन के लिए चले, तब उनके साथ केवल बलभद्र भट्टाचार्य थे। इस तरह वे मार्ग में झारखण्ड होते हुए बड़ी प्रसन्नतापूर्वक बनारस (वाराणसी) पहुँचे।

दिन चार काशीते रहि' गेला वृन्दावन ।। मथुरा देखिया देखे द्वादश कानन ॥

२३९॥

श्री चैतन्य महाप्रभु बनारस में केवल चार दिन रहे और फिर वृन्दावन के लिए चल पड़े। मथुरा नगरी देखने के बाद उन्होंने बारह वन देखे।

लीला-स्थल देखि प्रेमे हइला अस्थिर ।। बलभद्र कैल ताँरे मथुरार बाहिर ॥

२४०॥

श्रीकृष्ण की बारहों लीलास्थलियाँ देखकर श्री चैतन्य महाप्रभु भावावेश के कारण अत्यधिक विह्वल हो उठे। उन्हें बलभद्र भट्टाचार्य किसी तरह मथुरा से बाहर ले गये।

गङ्गा-तीर-पथे लबा प्रयागे आइला ।। श्री-रूप आसि' प्रभुके तथाई मिलिला ॥

२४१॥

। मथुरा छोड़ने के बाद महाप्रभु गंगा नदी के किनारे-किनारे चलने लगे और अन्त में प्रयाग (इलाहबाद) नामक पवित्र स्थान पर आ पहुँचे। यहीं पर श्रील रूप गोस्वामी आकर महाप्रभु से मिले।

दण्डवत्करि' रूप भूमिते पड़िला । परम आनन्द प्रभु आलिङ्गन दिला ॥

२४२॥

प्रयाग में रूप गोस्वामी ने आकर महाप्रभु को दण्डवत् प्रणाम किया और महाप्रभु ने बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उनका आलिंगन किया।

श्री-रूपे शिक्षा कराइ' पाठाइला वृन्दावन । आपने करिला वाराणसी आगमन ॥

२४३॥

प्रयाग में दशाश्वमेध घाट पर श्रील रूप गोस्वामी को शिक्षा देने के बाद चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें वृन्दावन जाने का आदेश दिया। तत्पश्चात् माप्रभु वाराणसी लौट आये।।

काशीते प्रभुके आसि' मिलिला सनातन ।।दुइ मास रहि' ताँरै कराइला शिक्षण ॥

२४४॥

जबचैतन्य महाप्रभु वाराणसी आये, तो वहाँ उनसे सनातन गोस्वामी मले। महाप्रभु वहाँ दो मास तक रहे और सनातन गोस्वामी को पूरी तरह शिक्षा दी।

मथुरा पाठाइला ताँरे दिया भक्ति-बल ।।सन्यासीरे कृपा करि' गेला नीलाचल ॥

२४५ ॥

। सनातन गोस्वामी को पूरी तरह शिक्षित करके श्री चैतन्य महाप्रभु ने में भक्ति की शक्ति देकर मथुरा भेज दिये। बनारस में उन्होंने मायावादी संन्यासियों पर भी कृपा की। तत्पश्चात् वे नीलाचल (जगन्नाथ पुरी ) लौट गये।"

छय वत्सर ऐछे प्रभु करिला विलास ।।कभु इति-उति, कभु क्षेत्र-वास ॥

२४६॥

महाप्रभु छः वर्षों तक सारे भारत में भ्रमण करते रहे। वे अपनी दिव्य लीलाएँ सम्पन्न करते हुए कभी इधर तो कभी उधर रहते और कभी वे जगन्नाथ पुरी में रहते।

आनन्दे भक्त-सङ्गे सदा कीर्तन-विलास ।जगन्नाथ-दरशन, प्रेमेर विलास ॥

२४७॥

जगन्नाथ पुरी में रहते हुए महाप्रभु संकीर्तन करने और भाव-विभोर होकर जगन्नाथ मन्दिर का दर्शन करने में अपना समय प्रसन्नतापूर्वक बिताते रहे।

मध्य-लीलार कैलँ एइ सूत्र-विवरण ।अन्त्य-लीलार सूत्र एबे शुन, भक्त-गण ॥

२४८॥

इस प्रकार मैंने महाप्रभु की मध्यलीला का सारांश दिया है। हे भक्तों, कृपया अब महाप्रभु की अन्तिम लीला का सारांश सुनो, जो अन्त्यलीला कहलाती है।

वृन्दावन हैते यदि नीलाचले आइला ।। आठार वर्ष ताहाँ वास, काहाँ नाहि गेला ॥

२४९॥

जब महाप्रभु वृन्दावन से लौटकर जगन्नाथ पुरी आ गये, तो वे वहीं पर रहे और अठारह वर्षों तक कहीं नहीं गये।

प्रतिवर्ष आइसेन ताहाँ गौड़ेर भक्त-गण ।। चारि मास रहे प्रभुर सङ्गे सम्मिलन ॥

२५०॥

इन अठारह वर्षों में बंगाल के सारे भक्त प्रतिवर्ष उनसे जगन्नाथ पुरी में आकर मिलते रहे। वे वहाँ लगातार चार महीने रहते और महाप्रभु के संग का आनन्द लूटते।

निरन्तर नृत्य-गीत कीर्तन-विलास । आचण्डाले प्रेम-भक्ति करिला प्रकाश ॥

२५१॥

जगन्नाथ पुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु निरन्तर कीर्तन और नृत्य करते। इस तरह उन्होंने संकीर्तन-लीला के आनन्द का आस्वादन किया। वे सब पर, यहाँ तक कि नीच से नीच व्यक्ति (चाण्डाल ) पर भी, अपनी अहैतुकी कृपा अर्थात् शुद्ध भगवत्प्रेम प्रकट करते।

पण्डित-गोसात्रि कैल नीलाचले वास ।वक्रेश्वर, दामोदर, शङ्कर, हरिदास ॥

२५२॥

जगन्नाथ पुरी में चैतन्य महाप्रभु के साथ रहने वालों में पण्डित गोसांई तथा अन्य भक्त यथा वक्रेश्वर, दामोदर, शंकर तथा हरिदास ठाकुर थे।

जगदानन्द, भगवान्, गोविन्द, काशीश्वर ।। परमानन्द-पुरी, आर स्वरूप-दामोदर ॥

२५३ ॥

महाप्रभु के साथ जो अन्य भक्त रह रहे थे, उनके नाम थेजगदानन्द, भगवान, गोविन्द, काशीश्वर, परमानन्द पुरी तथा स्वरूप दामोदर।

त्र-वासी रामानन्द राय प्रभृति ।। प्रभु-सङ्गे एइ सब कैल नित्य-स्थिति ॥

२५४॥

श्री रामानन्द राय तथा जगन्नाथ पुरी के निवासी अन्य भक्तगण भी महाप्रभु के साथ स्थायी रूप से रहते थे।

अद्वैत, नित्यानन्द, मुकुन्द, श्रीवास ।। विद्यानिधि, वासुदेव, मुरारि,—ग्रत दास ॥

२५५॥

प्रतिवर्षे आइसे सङ्गे रहे चारि-मास ।ताँ-सबा लञा प्रभुर विविध विलास ॥

२५६॥

अन्य भक्त जिनमें अद्वैत आचार्य, नित्यानन्द प्रभु, मुकुन्द, श्रीवास, विद्यानिधि, वासुदेव तथा मुरारि प्रमुख हैं, जगन्नाथ पुरी आया करते थे और लगातार चार मास तक महाप्रभु के साथ रहा करते थे। महाप्रभु इन सबके साथ विविध लीलाओं का आनन्द लेते थे।

हरिदासेर सिद्धि-प्राप्ति,—अद्भुत से सब ।आपनि महाप्रभु याँर कैल महोत्सव ॥

२५७॥

। जगन्नाथ पुरी में हरिदास ठाकुर ने देह त्याग किया। यह घटना अत्यन्त अद्भुत थी, क्योंकि स्वयं महाप्रभु ने हरिदास ठाकुर के तिरोभाव के उपलक्ष्य में उत्सव मनाया।

तबे रूप-गोसाजिर पुनरागमन ।। ताँहार हृदये कैल प्रभु शक्ति-सञ्चारण ॥

२५८॥

। श्रील रूप गोस्वामी जगन्नाथ पुरी में महाप्रभु से पुनः मिले। महाप्रभु ने उनके हृदय में समस्त दिव्य शक्ति संचारित कर दी।

तबे छोट हरिदासे प्रभु कैल दण्ड ।। दामोदर-पण्डित कैल प्रभुके वाक्य-दण्ड ॥

२५९॥

इसके बाद महाप्रभु ने छोटे हरिदास को दण्ड दिया और दामोदर पण्डित ने महाप्रभु को कुछ चेतावनी दी।

तबे सनातन-गोसाजिर पुनरागमन ।। ज्यैष्ठ-मासे प्रभु ताँरे कैल परीक्षण ॥

२६०॥

इसके बाद सनातन गोस्वामी पुनः चैतन्य महाप्रभु से मिले और महाप्रभु ने ज्येष्ठ मास की झुलसाने वाली गर्मी में उनकी परीक्षा ली।

तुष्ट हा प्रभु ताँरे पाठाइला वृन्दावन । अद्वैतेर हस्ते प्रभुर अद्भुत भोजन ॥

२६१॥

प्रसन्न होकर महाप्रभु ने सनातन गोस्वामी को पुनः वृन्दावन भेज दिये। इसके बाद महाप्रभु ने श्री अद्वैत आचार्य के हाथों से अद्भुत भोजन किया।

नित्यानन्द-सङ्गे मुक्ति करिया निभृते ।ताँरै पाठाइला गौड़े प्रेम प्रचारिते ॥

२६२॥

सनातन गोस्वामी को वृन्दावन पुनः भेजने के बाद महाप्रभु ने श्री नित्यानन्द प्रभु से एकान्त में परामर्श किया। तत्पश्चात् उन्होंने भगवत्-प्रेम का प्रचार करने के लिए उन्हें बंगाल भेज दिये।

तबे त' वल्लभ भट्ट प्रभुरे मिलिला ।। कृष्ण-नामेर अर्थ प्रभु ताँहारे कहिला ॥

२६३ ।। इसके तुरन्त बाद वल्लभ भट्ट महाप्रभु से जगन्नाथ पुरी में मिले और महाप्रभु ने उन्हें पवित्र कृष्ण-नाम का अर्थ बतलाया।

प्रद्युम्न मिरे प्रभु रामानन्द-स्थाने । कृष्ण-कथा शुनाइल कहि' ताँर गुणे ॥

२६४॥

रामानन्द राय के दिव्य गुणों की व्याख्या कर महाप्रभु ने प्रद्युम्न मिश्र को रामानन्द राय के घर भेजा और प्रद्युम्न मिश्र ने उनसे कृष्ण-कथा सुनी।।

गोपीनाथ पट्टनायक–रामानन्द-भ्राता ।। राजा मारितेछिल, प्रभु हैल त्राता ॥

२६५ ॥

इसके बाद चैतन्य महाप्रभु ने रामानन्द राय के छोटे भाई गोपीनाथ पट्टनायक को राजा द्वारा दिये जाने वाले मृत्यु-दण्ड से बचाया।

रामचन्द्र-पुरी-भये भिक्षा घाटाइला ।वैष्णवेर दुःख देखि' अर्धेक राखिला ॥

२६६॥

रामचन्द्र पुरी ने महाप्रभु के भोजन की आलोचना की, अतएव उन्होंने अपना भोजन न्यूनतम कर दिया। किन्तु जब सारे वैष्णव इससे अत्यन्त 1:जी हुए, तो महाप्रभु ने उसे बढ़ाकर पहले का आधा कर दिया।

ब्रह्माण्ड-भितरे हय चौद्द भुवन ।।चौद्द-भुवने वैसे व्रत जीव-गण ॥

२६७ ॥

इस ब्रह्माण्ड के भीतर चौदह भुवन ( ग्रह मण्डल ) हैं और सारे जीव भ ग्रह मण्डलों में रहते हैं।

मनुष्येर वेश धरि' यात्रिकेर छले ।।प्रभुर दर्शन करे आसि' नीलाचले ॥

२६८॥

वे सभी तीर्थयात्रियों का वेश धारण करके श्री चैतन्य महाप्रभु का १र्शन करने जगन्नाथ पुरी आया करते थे।

एक-दिन श्रीवासादि व्रत भक्त-गण ।।महाप्रभुर गुण गाजा करेन कीर्तन ॥

२६९॥

एक दिन श्रीवास ठाकुर इत्यादि सारे भक्त श्री चैतन्य महाप्रभु के दिव्य गुणों का कीर्तन कर रहे थे।

शुनि' भक्त-गणे कहे स-क्रोध वचने ।।कृष्ण-नाम-गुण छाड़ि, कि कर कीर्तने ॥

२७० ॥

। अपने दिव्य गुणों का कीर्तन श्री चैतन्य महाप्रभु को अच्छा नहीं लगा। अतएव उन्होंने उन सबको डाँटा मानो वे नाराज हों। उन्होंने पूछा, यह कैसा कीर्तन है? क्या तुम लोग भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन छोड़ रहे हो? द्धत्य करते हैल सबाकार मन ।।स्वतन्त्र हइया सबे नाशा 'बे भुवन ॥

२७१॥

श्री चैतन्य महाप्रभु ने यह कहते हुए सबको प्रताड़ित किया कि तुम । लोग स्वतन्त्र बनकर अपनी धृष्टता मत दिखलाओ और इस तरह सारे संसार का विनाश मत करो।।

देश-दिके कोटी कोटी लोक हेन काले ।। जय कृष्ण-चैतन्य' बलि' करे कोलाहले ॥

२७२ ॥

जय श्री चैतन्य महाप्रभु बाह्य रूप से नाराज दिख रहे थे और अपने भक्तों को प्रताड़ित कर रहे थे, तब बाहर से हजारों भक्तों ने उच्च स्वर में पुकारा, श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! जय जय महाप्रभु-व्रजेन्द्र कुमार ।। जगत्तारिते प्रभु, तोमार अवतार ॥

२७३॥

महाप्रभु ने लोगों की विनीत याचना सुनी, तो उनका हृदय द्रवित हो उठा। अत्यन्त दयालु होने के कारण वे तुरन्त बाहर निकल आये और Tो नर्शन दिया।

बहु-दूर हैते आइनु हा बड़ आर्त ।। दरशन दिया प्रभु करह कृतार्थ ॥

२७४॥

हे प्रभु, हम बहुत दुःखी हैं। हम बहुत दूर से चलकर आपका दर्शन करने आये हैं। कृपया दयालु होकर आपकी कृपा का प्रदर्शन करें।

शुनिया लोकेर दैन्य द्रविला हृदय ।बाहिरे आसि' दरशन दिला दयामय ॥

२७५ ॥

सारे भक्त उच्च स्वरों में कीर्तन करने लगे, महाराज नन्द के पुत्र श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! आप सारे जगत् का उद्धार करने के लिए। प्रकट हुए हैं।

बाहु तुलि' बले प्रभु बल' ‘हरि' ‘हरि' ।।उठिल–श्री-हरि-ध्वनि चतुर्दिक्भरि' ॥

२७६ ॥

अपनी दोनों बाँहें उठाकर महाप्रभु ने सबसे भगवान् हरि के पवित्र नाम को स्वर में कीर्तन करने को कहा। तुरन्त ही वहाँ हलचल मच गई । ध्वनि से समस्त दिशाएँ गुंजायमान हो उठीं।

प्रभु देखि' प्रेमे लोक आनन्दित मन ।प्रभुके ईश्वर बलि' करये स्तवन ॥

२७७॥

महाप्रभु का दर्शन करके सभी लोग प्रेमवश आनन्दित हो उठे। सबने महाप्रभु को भगवान् के रूप में स्वीकार किये और उनकी स्तुति की।

स्तव शुनि' प्रभुके कहेन श्रीनिवास ।। घरे गुप्त हओ, केने बाहिरे प्रकाश ॥

२७८॥

जब लोग इस प्रकार से महाप्रभु की स्तुति कर रहे थे, तब श्रीनिवास आचार्य ने महाप्रभु से व्यंग्यपूर्वक कहा,आप तो घर में गुप्त रहना चाहते थे। किन्तु आपने अपने आपको बाहर क्यों प्रकट कर दिया? के शिखाल एइ लोके, कहे कोन्बात ।।इहा-सबार मुख ढाक दिया निज हात ॥

२७९॥

। श्रीवास ठाकुर ने आगे कहा, इन लोगों को किसने सिखाया है? ये सब क्या कह रहे हैं? अब आप इनके मुँह अपने हाथ से बन्द कर सकते हैं।

सूर्य ग्रैछे उदय करि' चाहे लुकाइते । बुझिते ना पारि तैछे तोमार चरिते ॥

२८० ॥

। यह तो उसी प्रकार है जैसे मानो सूर्य उदय होने के बाद अपने आपको छिपाना चाहे। हम आपके चरित्र ( व्यवहार) के ऐसे गुणों को अपम नहीं पाते।

प्रभु कहेन,–श्रीनिवास, छाड़ विडम्बना ।।सबे मेलि' कर मोर कतेक लाञ्चना ॥

२८१॥

महाप्रभु ने उत्तर दिया,हे श्रीनिवास, यह परिहास बन्द करो। तुम । लोग इस प्रकार से मुझे शर्मिन्दा करने के लिए आपस में मिल गये हो।

एत बलि' लोके करि’ शुभ-दृष्टि दान ।।अभ्यन्तरे गेला, लोकेर पूर्ण हैल काम ॥

२८२॥

इस प्रकार कहकर लोगों पर कृपापूर्वक अपनी शुभ दृष्टि डालकर महाप्रभु अपने कमरे में चले गये। इस तरह सभी लोगों की मनोकामनाएँ पूर्ण हुईं।

रघुनाथ-दास नित्यानन्द-पाशे गेला ।। चिड़ा-दधि-महोत्सव ताहाङि करिला ॥

२८३ ॥

। इसके बाद रघुनाथ दास श्री नित्यानन्द प्रभु के पास पहुँचे और उनके आदेशानुसार उत्सव का आयोजन किया और चिउड़ा तथा दही से युक्त प्रसाद का वितरण किया।

ताँर आज्ञा लञा गेला प्रभुर चरणे ।।प्रभु ताँरै समर्पिला स्वरूपेर स्थाने ॥

२८४॥

बाद में श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी ने अपना घर छोड़ दिया और जगन्नाथ पुरी में श्री चैतन्य महाप्रभु की शरण ली। उस समय महाप्रभु ने उन्हें स्वीकार किया और आध्यात्मिक उन्नति के लिए स्वरूप-दामोदर के रिक्षण में सौंप दिया।

ब्रह्मानन्द-भारतीर घुचाइल चर्माम्बर । एइ मत लीला कैल छय वत्सर ॥

२८५ ॥

बाद में श्री चैतन्य महाप्रभु ने ब्रह्मानन्द भारती का मृगचर्म पहनने की भादत को बन्द करवाया। इस प्रकार महाप्रभु छः वर्षों तक निरन्तर अपनी नीलाएँ करते हुए अनेक प्रकार के दिव्य आनन्द का अनुभव करते रहे।

एइ त कहिल मध्य-लीलार सूत्र-गण ।।शेष द्वादश वत्सरेर शुन विवरण ॥

२८६॥

इस तरह मैंने मध्यलीला का सारांश कह दिया है। अब कृपा करके महाप्रभु द्वारा अन्तिम बारह वर्षों में सम्पन्न की गई लीलाओं को सुने।।

श्री-रूप-रघुनाथ-पदे ग्रार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥

२८७॥

श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए एवं है। उनकी कृपा की कामना करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों भर चलते हुए श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।

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