अध्याय सोलह: बचपन और युवावस्था में भगवान की लीलाएँ
पा-सुधा-सरिद् ग्रस्य विश्वमाप्लावयन्त्यपि ।।नीच-गैव सदा भाति तं चैतन्य-प्रभुं भजे ॥
१॥
। मैं उन श्री चैतन्य महाप्रभु की पूजा करता हूँ, जिनकी अमृतमयी कृपा एक महान् नदी की तरह अखिल ब्रह्माण्ड को आप्लावित करती हुई प्रवाहित होती है। जिस प्रकार नदी नीचे की ओर बहती है, उसी तरह चैतन्य महाप्रभु पतितों के लिए विशेष रूप से सुलभ हैं।
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द । जयाद्वैतचन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री नित्यानन्द प्रभु की जय हो! श्री अद्वैतचन्द्र की जय हो तथा महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! जीयाकैशोर-चैतन्यो मूर्ति-मत्या गृहाश्रमात् ।। लक्ष्म्यार्चितोऽथ वाग्देव्या दिशां जय-जय-च्छलात् ॥
३॥
कैशोर अवस्था को प्राप्त श्री चैतन्य महाप्रभु दीर्घजीवी हों! लक्ष्मीदेवी तथा सरस्वती दोनों उनकी पूजा करती थीं। सरस्वती ने विश्वविजयी पण्डित पर उनकी विजय के लिए उनकी पूजा की, तो लक्ष्मीदेवी ने घर में उनकी पूजा की। चूँकि वे दोनों देवियों के पति या स्वामी हैं, अतएव मैं उन्हें नमस्कार करता हूँ।
एइ त' कैशोर-लीलार सूत्र-अनुबन्ध ।। शिष्य-गण पड़ाइते करिला आरम्भ ॥
४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ग्यारह वर्ष की आयु में विद्यार्थियों को पढ़ाने लगे थे। यहीं से उनकी किशोरावस्था प्रारम्भ होती है।
शत शत शिष्य सङ्गे सदा अध्यापन ।व्याख्या शुनि सर्व-लोकेर चमकित मन ॥
५॥
। जब महाप्रभु शिक्षक बने, तो अनेकानेक विद्यार्थी उनके पास आने । लगे और हर विद्यार्थी उनकी व्याख्या की शैली सुनकर आश्चर्यचकित रह जाता।
सर्व-शास्त्रे सर्व पण्डित पाय पराजये ।।विनय-भङ्गीते कारो दुःख नाहि हय ॥
६॥
महाप्रभु ने शास्त्रार्थ में सभी प्रकार के पण्डितों को हराया; तथापि कोई भी पण्डित महाप्रभु की विनयशीलता के कारण दुःखी नहीं हुआ।
विविध औद्धत्य करे शिष्य-गण-सङ्गे।।जाह्नविते जल-केलि करे नाना रङ्गे ॥
७॥
जब महाप्रभु शिक्षक थे, तब वे गंगा के जल में अनेक प्रकार की क्रीड़ाएँ करते थे।
कत दिने कैल प्रभु बङ्गेते गमन ।।ग्राहाँ ग्राय, ताहाँ लओयाय नाम-सङ्कीर्तन ॥
८॥
कुछ दिनों के बाद महाप्रभु पूर्व बंगाल गये और वे जहाँ-जहाँ गये, उन्होंने वहाँ-वहाँ संकीर्तन आन्दोलन का सूत्रपात किया।
विद्यार प्रभाव देखि चमत्कार चिते ।।शत शत पडुया आसि लागिला पड़िते ॥
९॥
चैतन्य महाप्रभु की बौद्धिक शक्ति के प्रभाव से चकित होकर सैकड़ों विद्यार्थी उनके निर्देशन में अध्ययन करने के लिए आने लगे।
सेइ देशे विप्र, नाम–मिश्र तपन ।निश्चय करिते नारे साध्य-साधन ॥
१०॥
पूर्वी बंगाल में तपन मिश्र नामक एक ब्राह्मण था, जो निश्चय नहीं कर पा रहा था कि जीवन का उद्देश्य क्या है और उसे किस तरह प्राप्त किया जाए।
बहु-शास्त्रे बहु-वाक्ये चित्ते भ्रम हय । साध्य-साधन श्रेष्ठ ना हय निश्चय ॥
११॥
यदि कोई किताबी कीड़ा बनकर अनेक ग्रंथ तथा शास्त्रों को पढता रहता है और अनेकानेक लोगों की टीकाएँ एवं उपदेश सुनता है, तो उसके मन में सन्देह उत्पन्न हो जायेगा। इस तरह मनुष्य जीवन का वास्तविक लक्ष्य निश्चित नहीं कर पाता।
स्वप्ने एक विप्र कहे,—शुनह तपन ।निमाजि-पण्डित पाशे करह गमन ॥
१२॥
। इस प्रकार से मोहग्रस्त तपन मिश्र को स्वप्न में एक ब्राह्मण ने निर्देश दिया कि तुम निमाइ पण्डित ( चैतन्य महाप्रभु) के पास जाओ।
तेहो तोमार साध्य-साधन करिबे निश्चय ।साक्षातीश्वर तेंहो,–नाहिक संशय ॥
१३ ॥
उस ब्राह्मण ने कहा, चूँकि वे साक्षात् ईश्वर हैं, अतएव वे निस्सन्देह तुम्हारा सही दिशा-निर्देशन कर सकते हैं।
स्वप्न देखि' मिश्र आसि' प्रभुर चरणे ।।स्वप्नेर वृत्तान्त सब कैल निवेदने ॥
१४॥
स्वप्न देखने के बाद तपन मिश्र महाप्रभु के चरणों की शरण में आये और उन्होंने महाप्रभु से स्वप्न का विस्तार से वर्णन किया।
प्रभु तुष्ट हा साध्य-साधन कहिल ।नाम-सङ्कीर्तन कर,—उपदेश कैल ॥
१५॥
महाप्रभु ने सन्तुष्ट होकर उसे जीवन-लक्ष्य तथा उसे प्राप्त करने की विधि के बारे में उपदेश दिया। उन्होंने उपदेश दिया कि सफलता की कुंजी भगवान् के पवित्र नाम ( हरे कृष्ण महामन्त्र) का कीर्तन करना है।
ताँर इच्छा,—प्रभु-सङ्गे नवद्वीपे वसि ।प्रभु आज्ञा दिल, तुमि ग्राओ वाराणसी ॥
१६॥
तपन मिश्र की इच्छा थी कि वह महाप्रभु के साथ नवद्वीप में रहे, किन्तु महाप्रभु ने उसे वाराणसी (बनारस ) जाने के लिए कहा।
ताहाँ आमा-सङ्गे तोमार हबे दरशन ।।राजा मिश्र कैल काशीते गमन ॥
१७॥
महाप्रभु ने तपन मिश्र को आश्वस्त किया कि वे पुनः वाराणसी में मिलेंगे। यह आज्ञा पाकर तपन मिश्र वहाँ चले गये।
प्रभुर अतर्क्स-लीला बुझिते नो पारि । स्व-सङ्ग छाड़ा केने पाठाय काशीपुरी ॥
१८॥
मैं श्री चैतन्य महाप्रभु की अचिन्त्य लीलाओं को नहीं समझ सकता, क्योंकि तपन मिश्र महाप्रभु के साथ नवद्वीप में रहना चाहते थे, किन्तु महाप्रभु ने उन्हें वाराणसी जाने का आदेश दिया।
एइ मत बङ्गेर लोकेर कैला महा हित ।। 'नाम' दिया भक्त कैल, पड़ा पण्डित ॥
१९॥
। इस प्रकार से श्री चैतन्य महाप्रभु ने पूर्वी बंगाल के लोगों को हरिनाम अर्थात् हरे कृष्ण महामंत्र के कीर्तन में दीक्षित करके तथा उन्हें शिक्षा देकर विद्वान बनाकर उन पर बड़ा उपकार किया।
एइ मत बङ्गे प्रभु करे नाना लीला ।। एथा नवद्वीपे लक्ष्मी विरहे दुःखी हैला ॥
२०॥
महाप्रभु पूर्वी बंगाल में नाना प्रकार के प्रचार-कार्य में लगे हुए थे, अतएव उनकी पत्नी लक्ष्मीदेवी अपने पति के विरह में घर पर अत्यधिक दुःखी थीं।
प्रभुर विरह-सर्प लक्ष्मीरे दंशिल । विरह-सर्प-विषे ताँर परलोक हैल ॥
२१॥
विरहरूपी सर्प ने लक्ष्मीदेवी को डस लिया और इसके विष के कारण उनका देहान्त हो गया। इस तरह वे परलोक सिधार गईं-वे भगवद्धाम वापस चली गईं।
अन्तरे जानिला प्रभु, याते अन्तर्यामी ।देशेरे आइला प्रभु शची-दुःख जानि' ॥
२२॥
लक्ष्मीदेवी के तिरोधान को महाप्रभु जान गये थे, क्योंकि वे स्वयं परमात्मा हैं। इस तरह वे अपनी माता शचीदेवी को सान्त्वना देने घर लौट आये, जो अपनी पुत्रवधू के देहावसान के कारण अत्यन्त दुःखी थीं।
घरे आइला प्रभु बहु ला धन-जन ।।तत्त्व-ज्ञाने कैला शचीर दुःख विमोचन ॥
२३॥
जब महाप्रभु प्रचुर धन तथा अनेक अनुयायियों के साथ घर लौटे, तो उन्होंने शचीदेवी को शोक से छुटकारा दिलाने के लिए उन्हें दिव्य ज्ञान का उपदेश दिया।
शिष्य-गण लञा पुनः विद्यार विलास । विद्या-बले सबा जिनि' औद्धत्य प्रकाश ॥
२४॥
पूर्वी बंगाल से लौट आने के बाद श्री चैतन्य महाप्रभु ने फिर से लोगों को पढ़ाना शुरू कर दिया। अपनी शिक्षा के बल पर उन्होंने हर एक पर विजय प्राप्त की और इस तरह वे अधिक गर्व का अनुभव करने लगे।
तबे विष्णुप्रिया-ठाकुराणीर परिणय । तबे त' करिल प्रभु दिग्विजयी जय ॥
२५ ॥
। बाद में चैतन्य महाप्रभु ने लक्ष्मी देवी विष्णुप्रिया से विवाह किया और उसके बाद उन्होंने केशव काश्मीरी नामक दिग्विजयी विद्वान को पराजित किया।
वृन्दावन-दास इहा करियाछेन विस्तार ।।स्फुट नाहि करे दोष-गुणेर विचार ॥
२६ ॥
वृन्दावन दास ठाकुर पहले ही इसका विस्तार से वर्णन कर चुके हैं। जो स्पष्ट है, उसके गुण-दोषों की छानबीन करने की आवश्यकता नहीं है।
सेइ अंश कहि, ताँरै करि' नमस्कार ।। या' शुनि' दिग्विजयी कैल आपना धिक्कार ॥
२७॥
श्रील वृन्दावन दास ठाकुर को नमस्कार करके मैं महाप्रभु द्वारा की गई व्याख्या के उस अंश का वर्णन करूँगा, जिसे सुनकर दिग्विजयी ने स्वयं को धिक्कारा ।
ज्योत्स्नावती रात्रि, प्रभु शिष्य-गण सङ्गे।। वसियाछेन गङ्गातीरे विद्यार प्रसङ्गे ॥
२८॥
एक बार पूर्णमासी की रात को महाप्रभु अपने अनेक शिष्यों के साथ गंगाजी के किनारे बैठकर साहित्यिक चर्चा कर रहे थे।
हेन-काले दिग्विजयी ताहाङिआइला ।।गङ्गारे वन्दन करि' प्रभुरे मिलिला ॥
२९॥
संयोगवश पण्डित केशव काश्मीरी भी वहाँ आया। उसने माता गंगा की स्तुति की और फिर वह चैतन्य महाप्रभु से मिला।
वसाइली तारे प्रभु आदर करिया ।।दिग्विजयी कहे मने अवज्ञा करिया ॥
३०॥
महाप्रभु ने उसका सम्मानपूर्वक स्वागत किया, किन्तु केशव काश्मीरी अत्यन्त अभिमानी था, अतएव उसने महाप्रभु के साथ उपेक्षापूर्वक बातें व्याकरण पड़ाह, निमात्रि पण्डित तोमार नाम । बाल्य-शास्त्रे लोके तोमार कहे गुण-ग्राम ॥
३१॥
उसने कहा मैं समझता हूँ कि आप व्याकरण के शिक्षक हैं और आपका नाम निमाइ पण्डित है। लोग आपके बाल-व्याकरण पढ़ाने की बहुत प्रशंसा करते हैं।
व्याकरण-मध्ये, जानि, पड़ाह कलाप । शुनिहुँ फाङ्किते तोमार शिष्येर संलाप ॥
३२॥
मैं समझता हूँ कि आप कलाप व्याकरण पढ़ाते हैं। मैंने सुना है कि आपके विद्यार्थी इस व्याकरण के शब्द-जाल में अत्यन्त पटु हैं।
काहाँ तुमि सर्व-शास्त्रे कवित्वे प्रवीण । काहाँ आमि सबे शिशु—पड़या नवीन ॥
३४॥
हे महाशय, कहाँ आप सभी शास्त्रों के प्रकाण्ड पण्डित और कविता रचने में अत्यन्त अनुभवी और कहाँ मैं एक बालक, नया विद्यार्थी मात्र! प्रभु कहे, व्याकरण पड़ाइ–अभिमान करि ।शिष्येते ना बुझे, आमि बुझाइते नारि ॥
३३॥
महाप्रभु ने कहा, हाँ, मैं व्याकरण का शिक्षक माना जाता हूँ, किन्तु । तथ्य यह है कि न तो मैं अपने विद्यार्थियों को अपने व्याकरण-ज्ञान से प्रभावित कर पाता हूँ, न ही वे मेरी बात ठीक से समझ पाते हैं।
तोमार कवित्व किछु शुनिते हय मन ।। कृपा करि' कर ग्रदि गङ्गार वर्णन ॥
३५॥
। अतएव मेरी इच्छा आपके मुख से आपकी कविता-रचना का कौशल सुनने की है। यदि आप कृपा करके माता गंगा के यश का वर्णन करें, तो हम सब सुनें।
शुनिया ब्राह्मण गर्ने वर्णिते लागिला ।।घटी एके शत श्लोक गङ्गार वर्णिला ॥
३६॥
जब उस ब्राह्मण केशव काश्मीरी ने यह सुना, तो वह और भी गर्वित हुआ और घंटे-भर के ही भीतर उसने गंगा-माता का वर्णन करते हुए एक सौ श्लोक रच डाले।
शुनिया करिल प्रभु बहुत सत्कार ।तोमा सम पृथिवीते कवि नाहि आर ॥
३७॥
। महाप्रभु ने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा, महाशय, सारे संसार में आपके समान दूसरा कवि नहीं है।
तोमार कविता श्लोक बुझिते कार शक्ति ।।तुमि भाल जान अर्थ किंवा सरस्वती ॥
३८॥
आपकी कविता इतनी कठिन है कि उसे आप तथा विद्या की देवी ।। माता सरस्वती के अतिरिक्त अन्य कोई नहीं समझ सकता।
एक श्लोकेर अर्थ यदि कर निज-मुखे ।।शुनि' सब लोक तबे पाइब बड़-सुखे ॥
३९॥
किन्तु यदि आप एक श्लोक का अर्थ व्याख्या करके कहें, तो हम सब स्वयं आपके मुख से सुनकर अत्यन्त प्रसन्न हो सकते हैं।
तबे दिग्विजयी व्याख्यार श्लोक पुछिल ।। शत श्लोकेर एक श्लोक प्रभु त' पड़िल ॥
४०॥
दिग्विजयी केशव काश्मीरी ने पूछा कि आप किस श्लोक की । व्याख्या चाहते हैं। तब महाप्रभु ने केशव काश्मीरी द्वारा रचे एक सौ श्लोकों में से एक श्लोक सुनाया।
महत्त्वं गङ्गायाः सततमिदमाभाति नितरांप्रदेषा श्री-विष्णोश्चरण-कमलोत्पत्ति-सुभगा । द्वितीय-श्री-लक्ष्मीरिव सुर-नरैर-चरणाभवानी-भर्तुर्या शिरसि विभवत्यद्भुत-गुणा ॥
४१॥
माता गंगा की महानता सदैव चमकती रहने वाली है। वे सर्वाधिक भाग्यशालिनी हैं, क्योंकि वे भगवान् विष्णु के चरणकमलों से निकलती हैं। वे द्वितीय लक्ष्मी हैं, इसीलिए देवता तथा मनुष्य सदा उनकी पूजा करते हैं। वे सारे अद्भुत गुणों से समन्वित होकर शिवजी के मस्तक पर सुशोभित होती हैं।
‘एइ श्लोकेर अर्थ कर'—प्रभु यदि बैल ।।विस्मित हा दिग्विजयी प्रभुरे पुछिल ॥
४२॥
जब चैतन्य महाप्रभु ने इस श्लोक का अर्थ बतलाने के लिए कहा, । तो दिग्विजयी ने आश्चर्यचकित होकर उनसे पूछा।
झञ्झावात-प्राय आमि श्लोक पड़िले ।तार मध्ये श्लोक तुमि कैछे कण्ठे कैल ॥
४३॥
मैंने तो सारे श्लोक आँधी की गति से सुनाये हैं। तुमने उन श्लोकों में से इस एक श्लोक को किस तरह ठीक से कण्ठस्थ कर लिया? प्रभु कहे, देवेर वरे तुमि–'कवि-वर' ।ऐछे देवेर वरे केहो हय' श्रुतिधर' ॥
४४॥
महाप्रभु ने उत्तर दिया, जिस तरह भगवान् की कृपा से कोई कोई महाकवि बनता है, उसी तरह उन्हीं की कृपा से कोई-कोई महान् श्रुतिधर । भी बन सकता है, जो किसी चीज को तुरन्त स्मरण रख ले।
श्लोकेर अर्थ कैल विप्र पाइया सन्तोष ।प्रभु कहे—कह श्लोकेर किबा गुण-दोष ॥
४५॥
वह ब्राह्मण ( केशव काश्मीरी ) महाप्रभु के कथन से सन्तुष्ट हुआ और उसने उधृत श्लोक का अर्थ बतलाया। तब महाप्रभु ने कहा, कृपया इस श्लोक के कुछ विशेष गुणों और दोषों की भी व्याख्या कर दें।
विप्र कहे श्लोके नाहि दोषेर आभास ।।उपमालङ्कार गुण, किछु अनुप्रास ॥
४६॥
। ब्राह्मण ने उत्तर दिया, इस श्लोक में नाम-मात्र भी दोष नहीं है। प्रत्युत यह उपमा तथा अनुप्रास की उत्कृष्ट विशेषताओं से युक्त है।
प्रभु कहेन, कहि, यदि न करह रोष ।कह तोमार एइ श्लोके किबा आछे दोष ॥
४७॥
महाप्रभु ने कहा, हे महाशय, यदि आप रूष्ट न हों, तो मैं कुछ कहूँ। क्या आप इस श्लोक के दोषों की व्याख्या कर सकेंगे? प्रतिभार काव्य तोमार देवता सन्तोषे ।। भाल-मते विचारिले जानि गुण-दोषे ॥
४८॥
इस में सन्देह नहीं कि आपकी कविता प्रतिभा से युक्त है और निश्चय ही, इसने परमेश्वर को सन्तुष्ट कर लिया है। फिर भी यदि हम इसकी समीक्षात्मक रूप से विवेचना करें, तो इसमें गुण और दोष दोनों मिल जायेंगे।
ताते भाल करि' श्लोक करह विचार । कवि कहे,—ये कहिले सेइ वेद-सार ॥
४९॥
महाप्रभु ने अन्त में कहा, अतएव अब हम इस श्लोक की भलीभाँति विवेचना कर लें। तब उस कवि ने उत्तर दिया, हाँ, तुमने जो श्लोक पढ़ा है, वह पूरी तरह सही है।
व्याकरणिया तुमि नाहि पड़ अलङ्कार ।। तुमि कि जानिबे एइ कवित्वेर सार ॥
५० ॥
आप तो व्याकरण के सामान्य विद्यार्थी हो। काव्य-शास्त्र के अलंकारों के बारे में आप क्या जानो? आप इस कविता की समालोचना नहीं कर सकते, क्योंकि आपको इसका कोई ज्ञान नहीं है।
प्रभु कहेन अतएव पुछिये तोमारे ।।विचारियो गुण-दोष बुझाह आमारे ॥
५१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने विनीत भाव से कहा, चूँकि मैं आपके स्तर का नहीं हैं, इसीलिए मैंने आपसे अनुरोध किया है कि आप अपनी कविता के गुण-दोषों की व्याख्या करके मुझे सिखाएँ।
नाहि पड़ि अलङ्कार, करियाछि श्रवण ।।ताते एइ श्लोके देखि बहु दोष-गुण ॥
५२॥
निश्चय ही मैंने अलंकार-शास्त्र नहीं पढ़ा। किन्तु मैंने बड़े लोगों से इस सम्बन्ध में सुना है, अतएव मैं इस श्लोक की समीक्षा कर सकता हूँ। और इसमें अनेक दोष और अनेक विशेषताएँ हूँढ सकता हूँ।
कवि कहे, कह देखि, कोन् गुण-दोष । प्रभु कहेन,—कहि, शुन, ना करिह रोष ॥
५३॥
कवि ने कहा, जरा देखें तो, आपने कौन-कौन से गुण और दोष ढूँढे हैं। महाप्रभु ने उत्तर दिया, मैं कह रहा हूँ। कृपया आप रुष्ट हुए बिना सुनें।
पञ्च दोष एइ श्लोके पञ्च अलङ्कार । क्रमे आमि कहि, शुन, करह विचार ॥
५४॥
हे महोदय, इस श्लोक में पाँच दोष हैं और पाँच अलंकार हैं। मैं क्रम से उन्हें कहूँगा। कृपया सुनें और फिर अपना निर्णय दें।
‘अविमृष्ट-विधेयांश'–दुइ ठाञि चिह्न ।‘विरुद्ध-मति', 'भग्न-क्रम', 'पुनरात्त', दोष तिन ॥
५५॥
इस श्लोक में अविमृष्टविधेयांश दोष दो बार आया है और विरुद्धमति, भग्नक्रम तथा पुनरात्त दोष एक-एक बार आये हैं।
‘गङ्गार महत्त्व'–श्लोके मूल 'विधेय' ।इदं शब्दे ‘'–पाछे अविधेय ॥
५६॥
। इस श्लोक का मुख्य अज्ञात विषय (विधेय) गंगा का महत्त्व ( महत्त्वं गंगायाः) है और ज्ञात विषय ( उद्देश्य) इदम् शब्द से सूचित होता है, जो अज्ञात के बाद रखा हुआ है।
‘विधेय' आगे कहि' पाछे कहिले '' ।एइ लागि' श्लोकेर अर्थ करियाछे बाध ॥
५७ ॥
चूँकि आपने ज्ञात विषय को ( उद्देश्य या को) अन्त में रखा है और जो अज्ञात है (विधेय) उसे प्रारम्भ में रखा है, अतएव यह रचना दोषपूर्ण है और शब्दों का अर्थ सन्देहजनक हो गया है।
मनुक्त्वैव न विधेयमुदीरयेत् ।न ह्यलब्धास्पदं किञ्चित्कुत्रचित्प्रतितिष्ठति ॥
५८॥
सर्वप्रथम ज्ञात का उल्लेख किये बिना अज्ञात को स्थान नहीं देना चाहिए, क्योंकि जिसकी ठोस आधारभूमि नहीं होती, उसे कहीं भी स्थापित नहीं किया जा सकता।
‘द्वितीय श्री-लक्ष्मी'---इहाँ ‘द्वितीयत्व' विधेय ।। समासे गौण हैल, शब्दार्थ गेल क्षय ॥
५९॥
द्वितीय श्रीलक्ष्मी' शब्द में द्वितीय लक्ष्मी होने का गुण अज्ञात है। इस समास के बनाने से अर्थ गौण हो गया और अभीष्ट मूल अर्थ खो गया।
‘द्वितीय' शब्द–विधेय ताहा पड़िल समासे ।। ‘लक्ष्मीर समता' अर्थ करिल विनाशे ॥
६० ॥
चूँकि 'द्वितीय' शब्द विधेय ( अज्ञात) है, अतएव इस समास में लक्ष्मी की समता का जो अभीष्ट अर्थ था, वह नष्ट हो गया है।
‘अविमृष्ट-विधेयांश'–एइ दोषेर नाम ।।आर एक दोष आछे, शुन सावधान ॥
६१ ॥
न केवल अविमृष्ट विधेयांश का दोष ही है, अपितु एक अन्य दोष भी है, जिसे मैं आपको इंगित करने जा रहा हूँ। कृपया ध्यानपूर्वक सुनें।
भवानी-भर्तृ-शब्द दिले पाइयो सन्तोष ।।‘विरुद्ध-मति-कृत्' नाम एइ महा दोष ॥
६२ ॥
यहाँ पर एक अन्य महान् दोष है। आपने अपने पूर्ण सन्तोष के लिए भवानीभर्तृ' शब्द रखा है, किन्तु इसमें विरुद्धमतिकृत् नामक ( विरोधाभास का ) दोष है।
भवानी-शब्दे कहे महादेवेर गृहिणी ।।ताँर भर्ता कहिले द्वितीय भर्ता जानि ॥
६३ ॥
भवानी' का शब्दार्थ है 'शिवजी की पत्नी।' किन्तु जब हम उनके पति का उल्लेख करते हैं, तो इससे यह निष्कर्ष भी निकल सकता है कि उनका कोई दूसरा पति भी है।
'शिव-पत्नीर भर्ता' इहा शुनिते विरुद्ध ।।‘विरुद्ध-मति-कृत्' शब्द शास्त्रे नहे शुद्ध ॥
६४॥
। यह सुनना विरोधाभासी लगता है कि शिवजी की पत्नी का एक दूसरा पति है। साहित्य में ऐसे शब्दों के प्रयोग से विरुद्धमतिकृत् नामक दोष उत्पन्न होता है।"
‘ब्राह्मण-पत्नीर भर्तार हस्ते देह दान' ।शब्द शुनितेइ हय द्वितीय-भर्ता ज्ञान ॥
६५ ॥
यदि कोई कहे कि 'यह दान ब्राह्मण की पत्नी के पति के हाथ में दे दो,' तो इन विपरीतार्थी शब्दों को सुनते ही हम तुरन्त समझते हैं कि ब्राह्मण-पत्नी को कोई दूसरा पति भी है।
‘विभवति' क्रियाय वाक्य–साङ्ग, पुनः विशेषण ।‘अद्भुत-गुणा'–एइ पुनरात्त दूषण ॥
६६॥
विभवति ( फलती फूलती है ) शब्द द्वारा कहा गया कथन पूर्ण है। किन्तु इसके विशेषण के रूप में अद्भुतगुणारखने से पुनरुक्ति नामक दोष उत्पन्न होता है।
तिन पादे अनुप्रास देखि अनुपम ।एक पादे नाहि, एइ दोष'भग्न-क्रम' ॥
६७॥
इस श्लोक की तीन पंक्तियों में अद्वितीय अनुप्रास पाया जाता है, किन्तु एक पंक्ति में अनुप्रास बिल्कुल नहीं है। यह भग्नक्रम नामक दोष उत्पन्न होता हैं। दश अलङ्कारे यदि एक श्लोक हय । एक दोषे सब अलङ्कार हय क्षय ॥
६९॥
यदि किसी श्लोक में दस अलंकार हों, किन्तु एक भी दोष रहने पर पूरा श्लोक व्यर्थ हो जाता है।
यद्यपि एइ श्लोके आछे पञ्च अलङ्कार ।।एइ पञ्च-दोघे श्लोक कैल छारखार ॥
६८ ॥
यद्यपि इस श्लोक में पाँच अलंकार हैं, किन्तु इन पाँच दोषों के कारण पूरा श्लोक नष्ट-भ्रष्ट हो गया है।
सुन्दर शरीर ग्रैछे भूषणे भूषित ।। एक श्वेत-कुष्ठे ग्रैछे करये विगीत ॥
७० ॥
किसी का सुन्दर शरीर रत्नों से क्यों न अलंकृत हो, किन्तु यदि श्वेत कुष्ठ का एक भी दाग दिखे तो सारा शरीर घृणित हो जाता है।
रसालङ्कार-वत् काव्यं दोष-मुक् चेद् विभूषितम् ।। स्याद्वपुः सुन्दरमपि श्वित्रेणैकेन दुर्भगम् ॥
७१॥
जिस प्रकार गहनों से सुसज्जित शरीर श्वेत कुष्ठ के एक दाग से भी अशुभ हो जाता है, उसी तरह पूरी कविता अनुप्रास, उपमा तथा रूपक से युक्त होने पर भी केवल एक दोष से व्यर्थ हो जाती है।'
पञ्च अलङ्कारेर एबे शुनह विचार ।। दुइ शब्दालङ्कार, तिन अर्थ-अलङ्कार ॥
७२॥
अब पाँच साहित्यिक अलंकारों का विवरण सुनें। दो शब्दालंकार हैं और तीन अर्थालंकार हैं।
शब्दालङ्कार-तिन-पादे आछे अनुप्रास ।। 'श्री-लक्ष्मी' शब्दे ‘पुनरुक्तवदाभास' ॥
७३॥
श्लोक की तीन पंक्तियों में अनुप्रास नामक शब्दालंकार है।'श्री' तथा 'लक्ष्मी' शब्दों के समास में पुनरुक्तवदाभास शब्दालंकार है।
प्रथम-चरणे पञ्चत'-कारेर पाँति । तृतीय-चरणे हय पञ्च ‘रेफ'-स्थिति ॥
७४॥
श्लोक के प्रथम चरण में 'त' पाँच बार आया है और तीसरे चरण में 'र' पाँच बार आया है।
चतुर्थ-चरणे चारि 'भ'-कार-प्रकाश । अतएव शब्दालङ्कार अनुप्रास ॥
७५ ॥
चौथे चरण में ‘भ' अक्षर चार बार आया है। इस तरह श्लोक में अनुप्रास नामक मधुर शब्दालंकार है।
'श्री'-शब्दे, 'लक्ष्मी'-शब्दे–एक वस्तु उक्त ।पुनरुक्त-प्राय भासे, नहे पुनरुक्त ॥
७६॥
यद्यपि 'श्री' तथा 'लक्ष्मी' शब्दों का अर्थ एक ही है, अतएवं पुनरुक्ति प्रतीत होती है, किन्तु पुनरुक्ति है नहीं।"
'श्री-युक्त लक्ष्मी' अर्थे अर्थेर विभेद ।।पुनरुक्तवदाभास, शब्दालङ्कार-भेद ॥
७७॥
लक्ष्मी को श्री ( ऐश्वर्य) युक्त कहने से पुनरुक्ति के साथ अर्थ में अन्तर आता है। यह द्वितीय शब्दालंकार पुनरुक्तवदाभास है।
‘लक्ष्मीरिव' अर्थालङ्कार–उपमा-प्रकाश ।आर अर्थालङ्कार आछे, नाम–'विरोधाभास' ॥
७८ ॥
लक्ष्मीरिव (लक्ष्मी के समान) में उपमा नामक अर्थालंकार है। एक अन्य अर्थालंकार विरोधाभास भी है।
‘गङ्गाते कमल जन्मे'—सबार सुबोध ।। ‘कमले गङ्गार जन्म'—अत्यन्त विरोध ॥
७९॥
। यह सबको ज्ञात है कि कमल के फूल गंगाजल में खिलते हैं। किन्तु यह कहना कि गंगा का जन्म कमल-फूल से होता है, यह अत्यन्त विरोधाभासी प्रतीत होता है।
‘इहाँ विष्णु-पाद-पद्ये गङ्गार उत्पत्ति' । विरोधालङ्कार इहा महा-चमत्कृति ॥
८० ॥
गंगा माता की उत्पत्ति भगवान् के चरणकमलों से होती है। यद्यपि यह कथन कि कमल के फूल से जल आता है विरोधमूलक है, किन्तु भगवान् विष्णु के प्रसंग में यह महान् चमत्कार है।
ईश्वर-अचिन्त्य-शक्त्ये गङ्गार प्रकाश । इहाते विरोध नाहि, विरोध-आभास ॥
८१॥
गंगा की उत्पत्ति में भगवान् की अचिन्त्य शक्ति के कारण तनिक भी विरोध नहीं है, यद्यपि यह विरोधाभास जैसा प्रतीत होता है।
अम्बुजमम्बुनि जातं क्वचिदपि न जातमम्बुजादम्बु । मुर-भिदि तद्विपरीतं पादाम्भोजान्महा-नदी जाता ॥
८२॥
हर कोई जानता है कि कमल के फूल जल में खिलते हैं, किन्तु कमल में जल कभी नहीं उगता। फिर भी ये सारे विरोधाभास कृष्ण में अद्भुत रूप से सम्भव हैं। गंगा जैसी महान् नदी भगवान् के चरणकमलों से निकली है।
गङ्गार महत्त्व- साध्य, साधन ताहार ।विष्णु-पादोत्पत्ति-अनुमान' अलङ्कार ॥
८३ ।। गंगा नदी की असली महिमा यह है कि वह भगवान् विष्णु के चरणकमलों से उत्पन्न हुई हैं। ऐसी परि-कल्पना अनुमान नामक अलंकार है।
ल एइ पञ्च दोष, पञ्च अलङ्कार ।। सूक्ष्म विचारिये यदि आछये अपार ॥
८४॥
मैंने पाँच स्थूल दोषों तथा पाँच साहित्यिक अलंकारों पर ही विचार किया है, किन्तु यदि हम सूक्ष्म विचार करें, तो पायेंगे कि दोषों की गणना कर पाना सम्भव नहीं है।
प्रतिभा, कवित्व तोमार देवता-प्रसादे ।। अविचार काव्ये अवश्य पड़े दोष-बाधे ॥
८५॥
आपको कवि-कल्पना तथा प्रतिभा अपने आराध्य देव की कृपा से प्राप्त हुई है। किन्तु यदि काव्य की ठीक से समीक्षा नहीं की जाती है, तो वह निश्चय ही आलोचित होता है।
विचारि' कवित्व कैले हय सुनिर्मल । सालङ्कार हैले अर्थ करे झलमल ॥
८६॥
। यदि विचारपूर्वक कवित्व का प्रयोग किया जाए, तो वह अत्यन्त निर्मल होता है और रूपकों तथा उपमाओं से वह चमकने लगता है।
शुनिया प्रभुर व्याख्या दिग्विजयी विस्मित ।मुखे ना निःसरे वाक्य, प्रतिभा स्तम्भित ॥
८७॥
चैतन्य महाप्रभु की व्याख्या सुनकर दिग्विजयी कवि हतप्रभ हो गया, उसकी सारी चतुराई जड़ बन गई और उसके मुख से शब्द ही निकल नहीं पाए।
कहिते चाहये किछु, ना आइसे उत्तर । तबे विचारये मने हइया फाँफर ॥
८८॥
वह कुछ कहना चाहता था, किन्तु उसके मुँह से कोई उत्तर नहीं निकलता था। तब वह अपने मन में इस उलझन पर विचार करने लगा।
पड़या बालक कैल मोर बुद्धि लोप ।। जानि-सरस्वती मोरे करियाछेन कोप ॥
८९॥
इस छोटे से बालक ने मेरी बुद्धि को अवरुद्ध कर दिया है। अतएव मेरी समझ में आता है कि माता सरस्वती मुझ से रूठ गई हैं।
ग्रे व्याख्या करिल, से मनुष्येर नहे शक्ति ।निमात्रि-मुखे रहि' बले आपने सरस्वती ॥
९० ॥
इस लड़के ने जो अद्भुत व्याख्या की है, वह किसी भी मनुष्य के लिए सम्भव नहीं हो सकती थी। अतएव माता सरस्वती ही उसके मुख से स्वयं बोली होंगी।
एत भावि' कहे–शुन, निमात्रि पण्डित ।।तव व्याख्या शुनि' आमि हइलाँ विस्मित ॥
९१॥
यह सोचकर पण्डित ने कहा, हे निमाइ पण्डित, मेरी बात सुनो। आपकी व्याख्या सुनकर मैं तो आश्चर्यचकित हो गया हूँ।
अलङ्कार नाहि पड़, नाहि शास्त्राभ्यास । केमने ए सब अर्थ करिले प्रकाश ॥
९२॥
मैं चकित हूँ। आप साहित्य-शास्त्र के विद्यार्थी नहीं हैं और आपको शास्त्र पढ़ने का दीर्घकालीन अनुभव भी नहीं है। तो फिर आप ये सारी आलोचनात्मक बातों की व्याख्या कैसे कर सके? इहा शुनि' महाप्रभु अति बड़ रङ्गी । ताँहार हृदय जानि' कहे करि' भङ्गी ॥
९३॥
यह सुनकर तथा पण्डित के मन की बात जानकर श्री चैतन्य महाप्रभु ने हँसी में उत्तर दिया।
शास्त्रेर विचार भाल-मन्द नाहि जानि । सरस्वती ये बलाय, सेइ बलि वाणी ॥
९४॥
हे महोदय, मैं यह नहीं जानता कि अच्छी रचना क्या है और बुरी क्या है। किन्तु मैंने जो कुछ भी कहा है, उसे माता सरस्वती द्वारा कहा गया समझा जाना चाहिए।
इहा शुनि' दिग्विजयी करिल निश्चय । शिशु-द्वारे देवी मोरे कैल पराजय ॥
९५ ॥
जब पण्डित ने चैतन्य महाप्रभु से यह निर्णय सुना, तो वह दुःखी हुआ और आश्चर्य करने लगा कि माता सरस्वती ने उसे छोटे बालक के माध्यम से क्यों हराना चाहा।
आजि ताँरै निवेदिब, करि' जप-ध्यान ।।शिशु-द्वारे कैल मोरे एत अपमान ।। ९६॥
उस दिग्विजयी ने सोचा, मैं सरस्वती देवी की स्तुति करूँगा, उनका ध्यान करूँगा तथा उनसे यह पूढुंगा कि आपने इस बालक के माध्यम से मेरा ऐसा घोर अपमान क्यों कराया।
वस्तुतः सरस्वती अशुद्ध श्लोक कराइल ।विचार-समय ताँर बुद्धि आच्छादिल ।। ९७॥
वास्तव में सरस्वती ने ही उस दिग्विजयी को अशुद्ध ढंग से अपना श्लोक रचने के लिए प्रेरित किया था। यही नहीं, जब श्लोक की व्याख्या हुई तो उन्होंने उसकी बुद्धि पर परदा डाल दिया, जिससे महाप्रभु की । बुद्धि जीत गई।
तबे शिष्य-गण सब हासिते लागिल । ता'-सबा निषेधि' प्रभु कविरे कहिल ॥
९८॥
जब वह दिग्विजयी कवि इस तरह परास्त हो गया, तो वहाँ पर बैठे हुए महाप्रभु के सारे शिष्य जोर-जोर से हँसने लगे। किन्तु श्री चैतन्य महाप्रभु ने उन्हें ऐसा करने से मना किया और कवि को इस तरह से सम्बोधित किया।
तुमि बड़ पण्डित, महाकवि-शिरोमणि ।ग्राँर मुखे बाहिराय ऐछे कव्य-वाणी ॥
९९॥
आप बहुत बड़े पण्डित तथा सभी महाकवियों में शिरोमणि हैं, अन्यथा इतना अच्छा काव्य आपके मुख से कैसे निकलता? तोमार कवित्व येन गङ्गा-जल-धार ।। तोमा-सम कवि कोथा नाहि देखि आर ॥
१००॥
आपका काव्य-चातुर्य निरन्तर प्रवाहित होने वाले गंगा जल की तरह है। मुझे संसार में ऐसा कोई नहीं दिखता, जो आपकी बराबरी कर सके।
भवभूति, जयदेव, आर कालिदास ।।ताँ-सबार कवित्वे आछे दोषेर प्रकाश ॥
१०१॥
भवभूति, जयदेव तथा कालिदास जैसे महाकवियों के काव्य में भी अनेक दोष हैं।
दोष-गुण-विचार-एइ अल्प करि' मानि ।। कवित्व-करणे शक्ति, ताँहा से वाखानि ॥
१०२॥
। ऐसे दोषों को नगण्य मानना चाहिए। केवल इतना ही देखना चाहिए कि ऐसे कवियों ने किस तरह अपनी कवित्व-शक्ति का प्रदर्शन किया शैशव-चापल्य किछु ना लबे आमार ।। शिष्येर समान मुजि ना हँ तोमार ॥
१०३ ॥
मैं आपका शिष्य भी होने योग्य नहीं हूँ। अतएव मैंने जो भी बालसुलभ धृष्टता की है, उसे बुरा नहीं माने।
आजि वासा' ग्राह, कालि मिलिब आबार ।शुनिब तोमार मुखे शास्त्रेर विचार ॥
१०४॥
कृपया घर जायें। कल हम फिर से मिलेंगे, ताकि मैं आपके मुख से शास्त्र-सम्बन्धी चर्चाएँ सुन सकें।
एइ-मते निज घरे गेला दुइ जन ।कवि रात्रे कैल सरस्वती-आराधन ।। १०५॥
इस तरह कवि और चैतन्य महाप्रभु दोनों जन अपने-अपने घर चले गये और कवि ने रात में माता सरस्वती का आराधन किया।
सरस्वती स्वप्ने तारे उपदेश कैल ।।साक्षातीश्वर करि' प्रभुके जानिल ॥
१०६॥
सरस्वती देवी ने स्वप्न में उसे महाप्रभु के पद की जानकारी दी और दिग्विजयी कवि यह समझ गया कि चैतन्य महाप्रभु साक्षात् पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् हैं।
प्राते आसि' प्रभु-पदे लइल शरण ।प्रभु कृपा कैल, ताँर खण्डिल बन्धन ॥
१०७॥
। दूसरे दिन वह कवि भगवान् चैतन्य के पास आया और उनके चरणकमलों में शरणागत हो गया। महाप्रभु ने उस पर कृपा की और उसके भौतिक आसक्ति के सारे बन्धन काट दिये।
भाग्यवन्त दिग्विजयी सफल-जीवन । विद्या-बले पाइल महाप्रभुर चरण ॥
१०८॥
वह दिग्विजयी कवि निश्चित रूप से परम भाग्यशाली था। उसको जीवन उसकी विशद विद्या और पाण्डित्यपूर्ण अध्ययन कौशल के कारण सफल हुआ और इस तरह उसे चैतन्य महाप्रभु की शरण प्राप्त हुई।
ए-सब लीला वर्णियाछेन वृन्दावन-दास ।ये किछु विशेष इहाँ करिल प्रकाश ॥
१०९॥
श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने इन सारी घटनाओं का विस्तार से वर्णन किया है। मैंने तो उन विशिष्ट घटनाओं को ही प्रस्तुत किया है, जिनका वर्णन उन्होंने नहीं किया।
चैतन्य-गोसाबिर लीला--अमृतेर धार ।सर्वेन्द्रिय तृप्त हुये श्रवणे ग्राहार ॥
११०॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के अमृतकण हर किसी सुनने वाले की इन्द्रियों को तृप्त करने वाले हैं।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
१११॥
। श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करता हुआ तथा उनकी कृपा की कामना करता हुआ, मैं कृष्णदास उन्हीं के चरणचिह्नों का अनुसरण करते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
