अध्याय चौदह: भगवान चैतन्य की बचपन की लीलाएँ
कथञ्चन स्मृते ग्रस्मिन्दुष्करं सुकरं भवेत् ।। विस्मृते विपरीतं स्यात् श्री-चैतन्यं नमामि तम् ॥
१॥
यदि कोई चैतन्य महाप्रभु का किसी भी प्रकार से स्मरण करता है, तो उसका कठिन कार्य सरल हो जाता है। किन्तु यदि उनका स्मरण नहीं किया जाता, तो सरल कार्य भी बड़ा कठिन बन जाता है। ऐसे चैतन्य महाप्रभु को मैं सादर नमस्कार करता हूँ।
जय जय श्री-चैतन्य, जय नित्यानन्द ।। जयाद्वैतचन्द्र, जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु, श्री नित्यानन्द प्रभु, श्री अद्वैत प्रभु तथा चैतन्य महाप्रभु के सारे भक्तों की जय हो! प्रभुर कहिल एइ जन्मलीला-सूत्र ।। यशोदा-नन्दन ग्रैछे हैल शची-पुत्र ॥
३॥
इस तरह मैंने श्री चैतन्य महाप्रभु के आविर्भाव को संक्षेप में सूत्रबद्ध किया है, जो शचीमाता के पुत्र के रूप में उसी तरह प्रकट हुए जिस तरह माता यशोदा के पुत्र रूप में श्रीकृष्ण प्रकट हुए थे।
सङ्क्षेपे कहिल जन्मलीला-अनुक्रम ।। एबे कहि बाल्यलीला-सूत्रेर गणन ॥
४॥
मैं उनके जन्म की लीलाओं का क्रमबद्ध वर्णन पहले ही कर चुका हूँ। अब मैं उनकी बाल्यकाल की लीलाओं को संक्षेप में बताऊँगा।
वन्दे चैतन्य-कृष्णस्य बाल्य-लीलां मनो-हराम् । लौकिकीमपि तामीश-चेष्टया वलितान्तराम् ॥
५॥
मैं उन श्री चैतन्य महाप्रभु की बाल-लीलाओं को सादर नमस्कार करता हूँ, जो स्वयं भगवान् कृष्ण हैं। यद्यपि ऐसी लीलाएँ सामान्य बालक के कार्यकलाप के समान लगती हैं, किन्तु उन्हें पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की विविध लीलाओं के रूप में समझा जाना चाहिए।
बाल्य-लीलाय आगे प्रभुर उत्तान शयन ।पिता-माताय देखाइल चिह्न चरण ॥
६॥
अपनी पहली बाल-लीलाओं में महाप्रभु अपने बिस्तर पर लेटे लेटे ऊपर से नीचे की ओर पलट गये और इस तरह उन्होंने अपने माता-पिता को अपने चरणकमलों के चिह्न दिखलाये।
गृहे दुई जन देखि लघुपद-चिह्न ।।ताहे शोभे ध्वज, वज्र, शङ्ख, चक्र, मीन ॥
७॥
जब महाप्रभु ने चलने का प्रयास किया, तो उनके पाँव की छोटी छोटी छाप में भगवान् विष्णु के विशिष्ट चिह्न-ध्वज, वज्र, शंख, चक्र तथा मछली-दिखलाई पड़े।
देखिया दोंहार चित्ते जन्मिल विस्मय ।। कार पद-चिह्न घरे, ना पाय निश्चय ॥
८॥
। इन सारी छाप को देखकर न तो उनके पिता, न ही माता समझ पाये कि पाँवों की ये छाप किसकी हैं। इस प्रकार विस्मित होकर वे यह निश्चय नहीं कर पाये कि उनके घर में ये चिह्न कैसे आये।
मिश्र कहे,—बालगोपाल आछे शिला-सङ्गे।।तेंहो मूर्ति हा घरे खेले, जानि, रङ्गे ॥
९॥
जगन्नाथ मिश्र ने कहा, निश्चय ही बाल कृष्ण शालग्राम-शिला के साथ हैं। वे अपना बालरूप धारण करके कमरे के भीतर खेल रहे हैं।
सेइ क्षणे जागि' निमाइ करये क्रन्दन ।अङ्के लञा शची ताँरे पियाइल स्तन ॥
१०॥
जब माता शची तथा जगन्नाथ मिश्र बातें कर रहे थे, तब बालक निमाइ जग गया और रोने लगा। माता शची ने उसे गोद में उठा लिया और अपने स्तन से दूध पिलाने लगीं।
स्तन पियाइते पुत्रेर चरण देखिल ।सेइ चिह्न पाये देखि' मिश्रे बोलाईल ॥
११॥
जब माता शची बालक को स्तनपान करवा रही थीं, तब उन्होंने अपने पुत्र के चरणकमल में वे सारे चिह्न देखें, जो उन्हें कमरे के फर्श पर दिखे थे। तब उन्होंने जगन्नाथ मिश्र को बुलाया।
देखिया मिश्रेर हइल आनन्दित मति ।। गुप्ते बोलाइल नीलाम्बर चक्रवर्ती ॥
१२॥
जब जगन्नाथ मिश्र ने अपने पुत्र के तलवे पर ये अद्भुत चिह्न देखे, तो वे अत्यन्त पुलकित हुए और चुपके से उन्होंने नीलाम्बर चक्रवर्ती को बुलावा भेजा।
चिह्न देखि' चक्रवर्ती बलेन हासिया ।।लग्न गणि' पूर्वे आमि राखियाछि लिखिया ॥
१३॥
जब नीलाम्बर चक्रवर्ती ने ये चिह्न देखे, तो हँसते हुए उन्होंने कहा, मैंने पहले ही नक्षत्र-गणना से इसे निश्चित कर लिया था और लिख भी लिया था।
बत्रिश लक्षण–महापुरुष-भूषण ।एइ शिशु अङ्गे देखि से सब लक्षण ॥
१४॥
बत्तीस लक्षणों से महापुरुष का बोध होता है और मैं इस बालक के शरीर में इन सारे लक्षणों को देख रहा हूँ।
पञ्च-दीर्घः पञ्च-सूक्ष्मः सप्त-रक्तः षडू-उन्नतः । त्रि-ह्रस्व-पृथु-गम्भीरो द्वात्रिंशल्लक्षणो महान् ॥
१५ ॥
महापुरुष के शरीर में ३२ लक्षण होते हैं-उसके शरीर के पाँच अंग बड़े, पाँच सूक्ष्म, सात लाल रंग के, छह उठे हुए, तीन छोटे, तीन चौड़े तथा तीन गहरे ( गम्भीर) होते हैं।'
नारायणेर चिह्न-युक्त श्री-हस्त चरण ।एइ शिशु सर्व लोके करिबे तारण ॥
१६॥
इस बालक की हथेलियों तथा तलवों में भगवान् नारायण के सारे लक्षण (चिह्न) हैं। यह तीनों लोकों का उद्धार करने में समर्थ होगा।
एई त' करिबे वैष्णव-धर्मेर प्रचार ।।इहा हैते हबे दुइ कुलेर निस्तार ॥
१७॥
यह बालक वैष्णव सम्प्रदाय का प्रचार करेगा और अपने मातृ तथा पितृ दोनों कुलों का उद्धार करेगा।
महोत्सव कर, सब बोलाह ब्राह्मण ।।आजि दिन भाल,—करिब नाम-करण ॥
१८ ॥
मैं नामकरण संस्कार करना चाहता हूँ। हम उत्सव मनायें और ब्राह्मणों को बुलायें, क्योंकि आज का दिन अत्यन्त शुभ है।
सर्व-लोकेर करिबे इहँ धारण, पोषण ।‘विश्वम्भर' नाम इहार,—एइ त’ कारण ॥
१९॥
यह बालक भविष्य में सारे जगत् की रक्षा और पालन करेगा। इसलिए इसे विश्वम्भर नाम से पुकारा जायेगा।
शुनि' शची-मिश्रेर मने आनन्द बाड़िल ।। ब्राह्मण-ब्राह्मणी आनि' महोत्सव कैल ॥
२० ॥
नीलाम्बर चक्रवर्ती की भविष्यवाणी सुनकर शचीमाता तथा जगन्नाथ मिश्र ने बड़े ही आनन्द के साथ सारे ब्राह्मणों और उनकी पत्नियों को आमन्त्रित करके नामकरण उत्सव सम्पन्न किया।
तबे कत दिने प्रभुर जानु-चङ्क्रमण ।।नाना चमत्कार तथा कराइल दर्शन ॥
२१॥
कुछ दिनों के बाद महाप्रभु अपने घुटनों पर सरकने लगे और वे तरह-तरह के चमत्कार दिखलाने लगे।
क्रन्दनेर छल्ले बलाइल हरि-नाम ।नारी सब ‘हरि' बले, हासे गौर-धाम ॥
२२ ॥
महाप्रभु रोने के बहाने सारी स्त्रियों को हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने के लिए बाध्य कर देते और जब वे कीर्तन करतीं तो महाप्रभु मुस्काते रहते।
तबे कत दिने कैल पद-चक्रमण । शिशु-गणे मिलि' कैल विविध खेलन ॥
२३॥
कुछ दिनों के बाद महाप्रभु पाँवों से चलने लगे। वे अन्य बालकों के साथ मिलने-जुलने लगे और तरह-तरह के खेल दिखाने लगे।
एकदिन शची खइ-सन्देश आनिया ।।बाटा भरि' दिया बैल,——खाओ त' बसिया ॥
२४॥
एक दिन जब महाप्रभु अन्य छोटे बालकों के साथ खेल रहे थे, तब शचीमाता खइ तथा मिष्टान से भरा थाल ले आईं और उन्होंने बालक से कहा, बैठकर खा लो।
एत बलि' गेला शची गृहे कर्म करिते ।।लुका लागिला शिशु मृत्तिका खाइते ॥
२५॥
किन्तु जब शचीमाता वापस जाकर गृहकार्यों में लग गईं, तो बालक अपनी माता से छिपकर मिट्टी खाने लगा।
देखि' शची धाआ आइला करि' ‘हाय, हाय' ।।माटि काड़ि' लञा कहे ‘माटि केने खाय' ॥
२६॥
यह देखकर शचीमाता हड़बड़ी में यह क्या है! यह क्या है! चिल्लाती हुई लौट आईं। उन्होंने महाप्रभु के हाथों से मिट्टी छीन ली और पूछा इसे क्यों खा रहे हो? कान्दिया बलेन शिशु,—केने कर रोष ।तुमि माटि खाइते दिले, मोर किबा दोष ॥
२७॥
रोते हुए बालक ने अपनी माता से पूछा, आप नाराज क्यों होती हैं? आपने मिट्टी ही तो खाने के लिए मुझे दी है। इसमें मेरा क्या दोष है? खइ-सन्देश-अन्न ग्रतेक-माटिर विकार । एहो माटि, सेह माटि, कि भेद-विचार ॥
२८॥
खइ, सन्देश (मिठाई) तथा अन्य सारे खाद्य पदार्थ मिट्टी के ही रूपान्तर (विकार ) हैं। यह भी मिट्टी है और वह भी मिट्टी है। कृपया इसे पर विचार करें। इनमें अन्तर ही क्या है? माटि–देह, माटि–भक्ष्य, देखह विचारि' । अविचारे देह दोष, कि बलिते पारि ॥
२९॥
यह शरीर मिट्टी का विकार है और खाने की वस्तुएँ ( भक्ष्य) भी मिट्टी के विकार हैं। कृपया इस पर विचार करें। आप बिना विचार के मुझे दोष दे रही हैं। मैं क्या कह सकता हूँ? अन्तरे विस्मित शची बलिल ताहारे ।।माटि खाइते ज्ञान-योग के शिखाल तोरे ॥
३०॥
शचीमाता आश्चर्यचकित थीं कि यह बालक मायावाद दर्शन बोल रहा है, अतएव वे बोलीं, “तुम्हें यह दार्शनिक तर्कवितर्क किसने सिखलाया है, जो मिट्टी खाने को सही ठहराता है? माटिर विकार अन्न खाइले देह-पुष्टि हय ।माटि खाइले रोग हय, देह ग्राय क्षय ॥
३१॥
दार्शनिक बालक के मायावादी विचार का उत्तर देते हुए माता शची ने कहा, प्रिय पुत्र, यदि हम अन्न में रूपान्तरित मिट्टी खाते हैं, तो हमारे शरीर का पोषण होता है और वह हृष्ट-पुष्ट बनता है, किन्तु यदि हम कोरी मिट्टी खाते हैं, तो शरीर हृष्ट-पुष्ट होने के बजाय रुग्ण होकर नष्ट हो जाता है माटिर विकार घटे पानि भरि' आनि ।माटि-पिण्डे धरि ग्रबे, शोषि' ग्राय पानि ॥
३२॥
मिट्टी के ही रूपान्तर एक घड़े में मैं आसानी से पानी ला सकती हूँ, किन्तु यदि मैं मिट्टी के ढेले पर पानी डालें, तो ढेला जल को सोख लेगी और मेरा परिश्रम व्यर्थ हो जायेगा।
आत्म लुकाइते प्रभु बलिला ताँहारे ।। आगे केन इहा, माता, ना शिखाले मोरे ॥
३३॥
महाप्रभु ने अपनी माता से कहा, आपने पहले ही मुझे यह वहारिक दर्शन क्यों नहीं सिखलाया? आपने आत्म-साक्षात्कार की यह धि मुझसे क्यों छिपा रखी? ।
एबे से जानिलाँ, आर माटि ना खाइब ।।क्षुधा लागे ग्रबे, तबे तोमार स्तन पिब ॥
३४॥
अब मैं समझा इस दर्शन को। अब मैं मिट्टी नहीं खाऊँगा। जब भी मुझे भूख लगेगी, मैं आपके स्तनों से दुग्ध का पान करूंगा।
एत बलि' जननीर कोलेते चड़िया ।।स्तन पान करे प्रभु ईषत् हासिया ॥
३५ ॥
यह कहकर महाप्रभु धीरे से हँसते हुए अपनी माता की गोद में चल गये और उनका स्तनपान करने लगे।
एइमते नाना-छले ऐश्वर्य देखाय ।। बाल्य-भाव प्रकटिया पश्चात् लुकाय ॥
३६॥
इस तरह महाप्रभु अपने बचपन में विविध बहानों से अपना अधिक से अधिक ऐश्वर्य प्रदर्शित करते और इन ऐश्वर्यों को दिखला चुकने के बाद वे स्वयं को छिपा लेते।
अतिथि-विप्रेर अन्न खाइल तिन-बार । पाछे गुप्ते सेइ विप्रे करिल निस्तार ॥
३७॥
। एक बार महाप्रभु एक ब्राह्मण अतिथि के भोजन को तीन बार खा ये और बाद में उन्होंने गुप्त रूप से उस ब्राह्मण का भवबन्धन से उद्धार र दिया।
चोरे ला गेल प्रभुके बाहिरे पाइया ।।तारे स्कन्धे चड़ि' आइला तारे भुलाइया ॥
३८॥
बचपन में महाप्रभु को दो चोर उठाकर उनके घर के बाहर ले गये। किन्तु महाप्रभु उन चोरों के कंधे पर चढ़ गये और जब वे सोच रहे थे कि हम इस बालक के आभूषण आराम से उतार लेंगे, तो महाप्रभु ने उन्हें भ्रमित कर दिया, जिससे वे चोर अपने घर जाने के बदले जगन्नाथ मिश्र के घर वापस जा पहुँचे।
व्याधि-छले जगदीश-हिरण्य-सदने ।विष्णु-नैवेद्य खाइल एकादशी-दिने ॥
३९॥
महाप्रभु ने बीमार होने के बहाने एकादशी के दिन हिरण्य तथा जगदीश के घर से कुछ भोजन माँगा।
शिशु सब लये पाड़ा-पड़सीर घरे ।चुरि करि' द्रव्य खाय मारे बालकेरे ॥
४०॥
जैसाकि बच्चों में होता है, महाप्रभु ने खेलना सीखा और वे अपने । मित्रों के साथ पड़ोसी मित्रों के घरों में जाते, उनकी खाने की वस्तुएँ चुराते और खाते। कभी-कभी बच्चे परस्पर लड़ते-झगड़ते।।
शिशु सब शची-स्थाने कैल निवेदन ।शुनि' शची पुत्रे किछु दिला ओलाहन ॥
४१॥
सारे बच्चों ने शचीमाता से शिकायत की कि महाप्रभु उनसे लड़ते हैं। और पड़ोसियों के घरों से चीजें चुराते हैं। फलस्वरूप कभी-कभी माता अपने पुत्र को दण्ड देती अथवा डाँटती रहती थीं।
केने चुरि कर, केने मारह शिशुरे । केने पर-घरे ग्राह, किबा नाहि घरे ॥
४२॥
शचीमाता ने कहा-तुम दूसरों की चीजें क्यों चुराते हो? तुम दूसरे लड़कों को क्यों मारते हो? तुम दूसरों के घर के भीतर क्यों जाते हो? आखिर तुम्हारे घर में कौन-सी चीज नहीं है? शुनि' क्रुद्ध हा प्रभु घर-भितर ग्राजा ।। घरे व्रत भाण्ड छिल, फेलिल भाङ्गिया ॥
४३॥
इस प्रकार माता की डाँट खाकर महाप्रभु क्रोधित होकर कमरे के भीतर चले जाते और वहाँ पर सारे बर्तन तोड़-फोड़ देते।
तबे शची कोले करि' कराइल सन्तोष । लजित हइला प्रभु जानि' निज-दोष ॥
४४॥
तब शचीमाता अपने पुत्र को गोद में लेकर चुप करातीं और महाप्रभु अपनी गलतियाँ स्वीकार करते और काफी लज्जित होते।
कभु मृदु-हस्ते कैल माताके ताड़न ।माताके मूर्च्छिता देखि' करये क्रन्दन ॥
४५ ॥
एक बार बालक चैतन्य ने अपनी माता को अपने कोमल हाथ से मारा, तो उनकी माता दिखावे के लिए मूर्च्छित हो गईं। यह देखकर चैतन्य महाप्रभु रोने लगे।
नारीगण कहे,_नारिकेल देह आनि' ।तबे सुस्थ हइबेन तोमार जननी ॥
४६॥
पड़ोस की स्त्रियों ने उनसे कहा, बेटा, जाकर कहीं से एक नारियल । ले आओ। तब तुम्हारी माता स्वस्थ होंगी।
बाहिरे ग्राञी आनिलेन दुई नारिकेल ।। देखिया अपूर्व हैल विस्मित सकल ॥
४७॥
वे घर से बाहर गये और तुरन्त ही दो नारियल ले आये। सारी स्त्रियाँ ऐसा अद्भुत कार्य देखकर विस्मित हो गईं।
कभु शिशु-सङ्गे स्नान करिल गङ्गाते ।। कन्यागण आइला ताहाँ देवता पूजिते ॥
४८॥
कभी-कभी महाप्रभु अन्य बालकों के साथ गंगा नदी में स्नान करने जाते और पास की लड़कियाँ भी वहीं पर देवताओं की पूजा करने आतीं।
गङ्गा-स्नान करि' पूजा करिते लागिला । कन्यागण-मध्ये प्रभु आसिया बसिला ॥
४९॥
जब कन्याएँ गंगास्नान करके विभिन्न देवताओं की पूजा करने लगतीं, तो बालक महाप्रभु वहाँ आते और उनके बीच में बैठ जाते।
कन्यारे कहे,—आमा पूज, आमि दिब वर । गङ्गा-दुर्गादासी मोर, महेश—किङ्कर ॥
५०॥
। महाप्रभु कन्याओं को सम्बोधित करके कहते, मेरी पूजा करो, तो मैं तुम्हें सुन्दर पति या सुन्दर वरदान दूंगा। गंगा तथा देवी दुर्गा मेरी दासियाँ हैं और अन्य देवताओं की बात तो दूर रही, शिवजी तक मेरे दास हैं।
आपनि चन्दन परि' परेन फुल-माला ।।नैवेद्य काड़िया खान सन्देश, चाल, कला ॥
५१॥
महाप्रभु कन्याओं की अनुमति के बिना ही चन्दन निकाल लेते और पने शरीर में लगा लेते, उनकी फूल-मालाओं को अपने गले में पहन ते और मिठाइयाँ, चावल तथा केलों की भेंट को छीनकर स्वयं खा जाते ।
क्रोधे कन्यागण कहे—शुन, हे निमाबि ।।ग्राम-सम्बन्धे हओ तुमि आमा सबार भाई ॥
५२॥
महाप्रभु के इस व्यवहार से सारी कन्याएँ अत्यन्त क्रुद्ध हो गईं। उन्होंने कहा, अरे निमाइ, तुम गाँव के रिश्ते से हमारे भाई जैसे हो।
आमा सबाकार पक्षे इहा करिते ना युयाय ।। ना लह देवता सज्ज, ना कर अन्याय ॥
५३॥
अतएव ऐसा करना तुम्हें शोभा नहीं देता। तुम हमारी देव-पूजन की सामग्री मत लो। तुम इस तरह उपद्रव ने मचाओ।
प्रभु कहे,–तोमा सबाके दिल एइ वर ।तोमा सबार भर्ता हबे परम सुन्दर ॥
५४॥
महाप्रभु ने कहा, मेरी प्रिय बहनों, मैं तुम्हें वर देता हूँ कि तुम सबको अत्यन्त सुन्दर पति मिलेंगे।
पण्डित, विदग्ध, युवा, धन-धान्यवान् ।सात सात पुत्र हबे-चिरायु, मतिमान् ॥
५५॥
वे विद्वान, चतुर तथा तरुण होंगे और धन-धान्य से परिपूर्ण होंगे। इतना ही नहीं, बल्कि तुम सबके सात-सात बेटे होंगे, जो लम्बी आयु वाले तथा अत्यन्त बुद्धिमान होंगे।
वर शुनि' कन्या-गणेर अन्तरे सन्तोष । बाहिरे भर्सन करे करि' मिथ्या रोष ॥
५६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा दिया गया यह वर सुनकर सारी कन्याएँ मन ही मन अत्यन्त प्रसन्न थीं, किन्तु ऊपर से, जैसाकि कन्याओं के लिए स्वाभाविक है, क्रुद्ध होने का बहाना बनाकर उन्हें डाँटने लगीं।
कोन कन्या पलाइल नैवेद्य लइया ।। तारे डाकि' कहे प्रभु सक्रोध हइया ॥
५७॥
जब कुछ कन्याएँ नैवेद्य लेकर भाग गईं, तो महाप्रभु ने क्रुद्ध होकर उन्हें बुलाया और इस तरह कहा।
यदि नैवेद्य ना देह हइया कृपणी । बुड़ा भर्ता हबे, आर चारि चारि सतिनी ॥
५८॥
यदि तुम कंजूसी करोगी और मुझे भेंट नहीं चढ़ाओगी, तो तुम में से हर एक को बूढ़ा पति और कम से कम चार चार सौतनें मिलेंगी।
इहा शुनि' ता-सबार मने हइल भय ।।कोन किछु जाने, किबा देवाविष्ट हय ॥
५९॥
श्री चैतन्य का यह कल्पित शाप सुनकर कन्याओं ने सोचा कि हो सकता है यह कुछ असाधारण बातें जानता हो या इसे देवताओं से शक्ति प्राप्त हो, अतः वे भयभीत हो गई थीं कि उसका शाप कहीं सच न हो जाए।
आनिया नैवेद्य तारा सम्मुखे धरिल ।।खाड्या नैवेद्य तारे इष्ट-वर दिल ॥
६०॥
तब कन्याएँ महाप्रभु के समक्ष अपनी अपनी भेटें ले आईं और महाप्रभु ने उन्हें खाकर कन्याओं को मनोवांछित आशीर्वाद दिया।
एइ मत चापल्य सेब लोकेरे देखाय ।।दुःख कारो मने नहे, सबे सुखे पाय ॥
६१॥
जब लोगों को कन्याओं के प्रति महाप्रभु की इस चातुरी का पता लगा, तो उनमें किसी तरह की गलतफहमी नहीं हुई। बल्कि उन्हें इन व्यवहारों से आनन्द प्राप्त हुआ।
एक-दिन वल्लभाचार्य-कन्या 'लक्ष्मी' नाम ।देवता पूजिते आइल करि गङ्गा-स्नान ॥
६२ ॥
एक दिन वल्लभाचार्य की पुत्री, जिसका नाम लक्ष्मी था, गंगा किनारे नदी में स्नान करने और देवताओं को पूजने आई।
ताँरे देखि प्रभुर हइल साभिलाष मन ।।लक्ष्मी चित्ते प्रीत पाइल प्रभुर दर्शन ॥
६३॥
लक्ष्मीदेवी को देखकर महाप्रभु उनके प्रति अनुरक्त हो गये और महाप्रभु को देखकर लक्ष्मी को अपने मन में परम सन्तोष की अनुभूति हुई।
साहजिक प्रीति देंहार करिल उदय ।।बाल्य-भावाच्छन्न तभु हइल निश्चय ॥
६४॥
उन में परस्पर सहज प्रेम जाग्रत हुआ और बाल्यकाल की भावनाओं से प्रच्छन्न होने पर भी यह प्रकट हो गया कि वे दोनों एक दूसरे पर स्वाभाविक रूप से अनुरक्त हैं।
मुँहा देखि' मुँहार चित्ते हइल उल्लास । देव-पूजा छले कैल हे परकाश ॥
६५॥
उन दोनों ने एक दूसरे को निहारने के नैसर्गिक आनन्द का आस्वादन । किया और देव-पूजा के बहाने दोनों ने अपनी भावनाएँ प्रकट कीं।
प्रभु कहे, 'आमा' पूज, आमि महेश्वर ।।आमारे पूजिले पाबे अभीप्सित वर’ ॥
६६॥
महाप्रभु ने लक्ष्मी से कहा, मेरी पूजा करो, क्योंकि मैं परमेश्वर हूँ। यदि तुम मेरी पूजा करोगी, तो निश्चय ही तुम्हें मनोवांछित वर प्राप्त होगा।
लक्ष्मी ताँर अङ्गे दिल पुष्प-चन्दन । मल्लिकार माला दिया करिल वन्दन । ६७॥
श्री चैतन्य महाप्रभु का आदेश सुनकर लक्ष्मी ने तुरन्त उनकी पूजा की-उनके शरीर पर चन्दन तथा फूल चढ़ाये, उन्हें मल्लिका फूलों की माला पहनाई और उनकी स्तुति की।
प्रभु ताँर पूजा पाञा हासिते लागिला ।।श्लोक पड़ि' ताँर भाव अङ्गीकार कैला ॥
६८ ।। लक्ष्मी द्वारा इस प्रकार पूजे जाने पर महाप्रभु मुस्काने लगे। उन्होंने श्रीमद्भागवत का एक श्लोक कहा और लक्ष्मी द्वारा व्यक्त मनोभाव को। स्वीकार कर लिया।
सङ्कल्पो विदितः साध्व्यो भवतीनां मदर्चनम् ।।मयानुमोदितः सोऽसौ सत्यो भवितुमर्हति ॥
६९॥
। हे प्रिय गोपियों, मैं तुम्हारा पति बनने तथा इस प्रकार से मेरी पूजा करने की तुम लोगों की इच्छा को स्वीकार करता हूँ। मैं चाहता हूँ कि तुम लोगों की इच्छा पूरी हो, क्योंकि यह पूरी होने योग्य है।
एड्-मत लीला करि' हे गेला घरे ।।गम्भीर चैतन्य-लीला के बुझिते पारे ॥
७० ॥
इस तरह परस्पर अपने-अपने भावों को व्यक्त करने के बाद भगवान् चैतन्य तथा लक्ष्मी दोनों अपने-अपने घर लौट गये। भला चैतन्य महाप्रभु की गम्भीर लीलाओं को कौन समझ सकता है? चैतन्य-चापल्य देखि' प्रेमे सर्व जन । शची-जगन्नाथे देखि' देन ओलाहन ॥
७१॥
पास पड़ोस के लोगों ने जब चैतन्य महाप्रभु के नटखट स्वभाव को देखा, तो उन्होंने प्रेमवश शचीमाता तथा जगन्नाथ मिश्र से शिकायत की।
एकदिन शची-देवी पुत्रेरे भत्सिया ।।धरिबारे गेला, पुत्र गेला पलाइया ॥
७२॥
एक दिन शचीमाता अपने पुत्र को डाँटने के उद्देश्य से उसे पकड़ने गईं, किन्तु वे उस स्थान से भाग निकले।
उच्छिष्ट-गर्ते त्यक्त-हाण्डीर उपर ।बसियाछेन सुखे प्रभु देव-विश्वम्भर ॥
७३॥
। यद्यपि चैतन्य महाप्रभु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के पालनकर्ता हैं, किन्तु एक बार वे उस गड्डे में भोजन पकाने के बाद फेंके गये पात्रों के ऊपर जाकर बैठ गये, जहाँ जूठन फेंका जाता है।
शची आसि' कहे,—केने अशुचि छुडिला ।गङ्गा-स्नान कर ग्राइ'—अपवित्र होइला ॥
७४॥
जब शचीमाता ने अपने बेटे को फेंकी हुई हाँड़ियों के ऊपर बैठे देखा, तो उन्होंने यह कहकर आपत्ति प्रकट की, तुमने इन अशुद्ध बर्तनों को क्यों छुआ? अब तुम अशुद्ध हो गये हो। जाओ और गंगा में स्नान करो।
इहा शुनि' माताके कहिल ब्रह्म-ज्ञान ।विस्मिता हइया माता कराइल स्नान ॥
७५ ॥
यह सुनकर चैतन्य महाप्रभु ने अपनी माता को ब्रह्म-ज्ञान की शिक्षा दी। यद्यपि वे इससे विस्मित तो हुईं, किन्तु फिर भी उन्होंने महाप्रभु को स्नान करने के लिए बाध्य किया।
कभु पुत्र-सड़े शची करिला शयन ।देखे, दिव्यलोक आसि' भरिल भवन ॥
७६ ॥
कभी-कभी शचीमाता अपने पुत्र को लेकर बिस्तर पर लेटतीं और वे देखतीं कि स्वर्गलोक के निवासी वहाँ आये हुए हैं, जिनसे सारा घर भर गया है।
शची बले,—याह, पुत्र, बोलाह बापेरे ।।मातृ-आज्ञा पाइया प्रभु चलिलो बाहिरे ॥
७७॥
एक बार शचीमाता ने महाप्रभु से कहा, जाकर अपने पिता को बुला लाओ। माता का आदेश पाकर वे उन्हें बुलाने बाहर गये।
चलिते चरणे नूपुर बाजे झन्झन् ।शुनि' चमकित हैल पिता-मातार मन ॥
७८ ॥
जब बालक बाहर जा रहा था, तो उसके चरणकमलों से नुपुर की ध्वनि आ रही थी। यह सुनकर पिता तथा माता दोनों ही आश्चर्यचकित हो गये।
मिश्र कहे,—एइ बड़ अद्भुत काहिनी ।।शिशुर शून्य-पदे केने नूपुरेर ध्वनि ॥
७९॥
जगन्नाथ मिश्र ने कहा, यह बड़ी अद्भुत घटना है। मेरे पुत्र के नंगे । पाँवों से नूपुरों की ध्वनि कैसे आ रही है? शची कहे,—आर एक अद्भुत देखिल ।। दिव्य दिव्य लोक आसि' अङ्गन भरिल ।। ८० ॥
माता शची ने कहा, मैंने भी एक और आश्चर्य देखा है। स्वर्गलोक से लोग उतरे चले आ रहे थे और पूरे आँगन में भीड़ लगी थी।
किबा कोलाहल करे, बुझिते ना पारि ।। काहाके वा स्तुति करे अनुमान करि ॥
८१॥
। उन्होंने जोर-जोर से कुछ शब्द किया जिसे मैं नहीं समझ पाई। मेरा अनुमान है कि वे किसी की स्तुति कर रहे थे।
मिश्र बले,—किछु हउक्, चिन्ता किछु नाइ । विश्वम्भरेर कुशल हउक्,--एइ मात्र चाइ ॥
८२॥
जगन्नाथ मिश्र ने उत्तर दिया, इसकी परवाह मत करो। चिन्ता की कोई बात नहीं है। विश्वम्भर सदैव कुशल रहे। यही मेरी कामना है।
एक-दिन मिश्र पुत्रेर चापल्य देखिया ।। धर्म-शिक्षा दिल बहु भर्त्सना करिया ॥
८३॥
एक अन्य अवसर पर जगन्नाथ मिश्र ने अपने बेटे की चपलता देखकर उसे खूब फटकारा और फिर नैतिकता की शिक्षा दी।
रात्रे स्वप्न देखे,—एक आसि' ब्राह्मण । मिश्रेरे कहये किछु स-रोष वचन ॥
८४॥
उसी रात को जगन्नाथ मिश्र ने सपना देखा कि एक ब्राह्मण आकर क्रोध में उनसे ये वचन कह रहा है : मिश्र, तुमि पुत्रेर तत्त्व किछुइ ना जान ।भर्सन-ताड़न कर,—पुत्र करि' मान ॥
८५॥
हे प्रिय मिश्र, तुम अपने पुत्र के बारे में कुछ भी नहीं जानते। तुम । उसे अपना पुत्र समझकर फटकारते और प्रताड़ित करते हो।
मिश्र कहे, देव, सिद्ध, मुनि केने नय ।।ये से बड़ हउक् मात्र आमार तनय ॥
८६॥
जगन्नाथ मिश्र ने उत्तर दिया, यह बालक देवता, योगी या सन्त पुरुष है, तो हुआ करे। मुझे इसकी परवाह नहीं कि वह क्या है, क्योंकि मैं उसे अपना पुत्र ही मानता हूँ।
पुत्रेर लालन-शिक्षा-पितार स्व-धर्म ।।आमि ना शिखाले कैछे जनिबे धर्म-मर्म ॥
८७॥
यह पिता का कर्तव्य है कि वह अपने पुत्र को धर्म तथा नैतिकता की शिक्षा दे। यदि मैं इसे यह शिक्षा नहीं दूंगा तो यह जानेगा कैसे? विप्र कहे,—पुत्र यदि दैव-सिद्ध हय ।।स्वतः-सिद्ध-ज्ञान, तबे शिक्षा व्यर्थ हय ॥
८८॥
ब्राह्मण ने उत्तर दिया, यदि तुम्हारा पुत्र स्वयं तेजोमय पूर्ण ज्ञान से युक्त दिव्य योगी है, तो तुम्हारी शिक्षा का क्या लाभ है? मिश्र कहे,–पुत्र केने नहे नारायण । तथापि पितार धर्मपुत्रेर शिक्षण ॥
८९॥
जगन्नाथ मिश्र ने कहा, चाहे मेरा पुत्र सामान्य पुरुष न होकर नारायण ही क्यों न हो, तो भी पिता का कर्तव्य है कि अपने पुत्र को शिक्षा दे।
एइ-मते मुँहे करेन धर्मेर विचार ।।विशुद्ध-वात्सल्य मिश्रेर, नाहि जाने आर ॥
९० ॥
इस तरह स्वप्न में जगन्नाथ मिश्र तथा ब्राह्मण में धर्म विषयक विचारविमर्श होता रहा। फिर भी जगन्नाथ मिश्र शुद्ध वात्सल्य रस में निमग्न रहे और वे दूसरा कुछ जानना नहीं चाहते थे।
एत शुनि' द्विज गेला हा आनन्दित । मिश्र जागिया हइला परम विस्मित ॥
९१॥
जगन्नाथ मिश्र से बातें करने के बाद अत्यन्त प्रसन्न होकर वह ब्राह्मण चला गया और जब जगन्नाथ मिश्र अपने स्वप्न से जगे, तो वे अत्यधिक विस्मित थे।
बन्धु-बान्धव-स्थाने स्वप्न कहिल ।कल लोक विस्मित हइल ॥
९२॥
उन्होंने अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों से अपना स्वप्न कह सुनाया और वे सब इसे सुनकर अत्यन्त विस्मित हुए।
एइ मत शिशु-लीला करे गौरचन्द्र ।। दिने दिने पिता-मातार बाड़ाय आनन्द ॥
९३॥
इस तरह गौरहरि ने अपनी बाल-लीलाएँ सम्पन्न कीं और दिनप्रतिदिन वे अपने माता-पिता के आनन्द को बढ़ाते रहे।
कत दिने मिश्र पुत्रेर हाते खड़ि दिल ।।अल्प दिने द्वादश-फला अक्षर शिखिल ॥
९४॥
कुछ दिनों के बाद जगन्नाथ मिश्र ने अपने पुत्र का हातखड़ी संस्कार सम्पन्न करके उसकी प्रारम्भिक शिक्षा का शुभारम्भ कर दिया। महाप्रभु ने कुछ ही दिनों में सारे अक्षर और संयुक्त अक्षर सीख लिए।
बाल्यलीला-सूत्र एइ कैल अनुक्रम । हा विस्तारियाछेन दास-वृन्दावन ॥
९५ ॥
यह श्री चैतन्य महाप्रभु की बाल-लीलाओं की रूपरेखा है, जिसे यहाँ क्रमबद्ध करके प्रस्तुत किया गया है। वृन्दावन दास ठाकुर ने पहले ही अपनी पुस्तक चैतन्य-भागवत में इन लीलाओं का विस्तार से वर्णन किया है।
अतएव एइ-लीला सङ्क्षेपे सूत्र कैल ।।पुनरुक्ति-भये विस्तारिया ना कहिल ॥
९६ ॥
इसलिए मैंने केवल संक्षिप्त सारांश दिया है। पुनरुक्ति के भय से मैंने इस विषय को विस्तार से नहीं दिया।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
९७॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की स्तुति करते हुए और सदैव उनकी कृपा की आकांक्षा करते हुए मैं कृष्णदास उन्हीं के चरणचिह्नों का अनुसरण करते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कररहा हूँ।
