अध्याय तेरह: भगवान श्री चैतन्य महाप्रभु का आगमन
स प्रसीदतु चैतन्य-देवो ग्रस्य प्रसादतः ।।तल्लीला-वर्णने योग्यः सद्यः स्यादधमोऽप्ययम् ॥
१॥
मैं श्री चैतन्य महाप्रभु की कृपा की कामना करता हूँ, जिनकी कृपा से एक अधम भी उनकी लीलाओं का वर्णन कर सकता है।
जय जय श्री कृष्ण-चैतन्य गौरचन्द्र । जयाद्वैतचन्द्र जय जय नित्यानन्द ॥
२॥
कृष्णचैतन्य महाप्रभु की जय हो! श्री अद्वैतचन्द्र की जय हो! श्री द प्रभु की जय हो! जय जय गदाधर जय श्रीनिवास ।जय मुकुन्द वासुदेव जय हरिदास ॥
३॥
। गदाधर प्रभु की जय हो! श्रीवास ठाकुर की जय हो! मुकुन्द प्रभु ॥
वासुदेव प्रभु की जय हो! हरिदास ठाकुर की जय हो! जय दामोदर-स्वरूप जय मुरारि गुप्त ।।एइ सब चन्द्रोदये तमः कैल लुप्त ॥
४॥
स्वरूप दामोदर तथा मुरारि गुप्त की जय हो! इन सारे दैदीप्यमान चन्द्रमाओं ने मिलकर इस भौतिक जगत् के अंधकार को दूर भगाया है।
जय श्री-चैतन्यचन्द्रेर भक्त चन्द्र-गण ।। सबार प्रेम ज्योत्स्नाय उज्वल त्रिभुवन ॥
५॥
उन सारे चन्द्रमाओं की जय हो, जो चैतन्य महाप्रभु नामक प्रधान चन्द्रमा के भक्त हैं। उनका उज्वल चन्द्रप्रकाश समूचे ब्रह्माण्ड को प्रकाशित करता है।
एइ त कहिल ग्रन्थारम्भे मुख-बन्ध । एबे कहि चैतन्य-लीला-क्रम-अनुबन्ध ॥
६॥
इस प्रकार मैंने चैतन्य-चरितामृत की भूमिका कही है। अब मैं चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का काल-क्रम से वर्णन करूंगा।
प्रथमे त' सूत्र-रूपे करिये गणन। पाछे ताहा विस्तारि करिब विवरण ॥
७॥
। सर्वप्रथम मैं महाप्रभु की लीलाओं को सूत्र-रूप में कहता हूँ। तब मैं उनका वर्णन विस्तार से करूंगा।
श्री-कृष्ण-चैतन्य नवद्वीपे अवतरि । आट-चल्लिश वत्सर प्रकट विहरि ॥
८॥
श्री चैतन्य महाप्रभु नवद्वीप में अवतरित होकर अड़तालीस वर्षों तक प्रकट रहे और उन्होंने अपनी लीलाओं का आनन्द लिया।
चौद्द-शत सात शके जन्मेर प्रमाण । चौद्द-शत पश्चान्ने हइल अन्तर्धान ॥
९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु शक सम्वत १४०७ (१४८६ ई.) में प्रकट हुए और १४५५ (१५३४ ई.) में इस जगत् से अन्तर्धान हो गये।
चब्बिश वत्सर प्रभु कैल गृह-वासे ।।निरन्तर कैल कृष्ण-कीर्तन-विलास ॥
१०॥
भी चैतन्य महाप्रभु चौबीस वर्षों तक गृहस्थाश्रम में रहे और सदा हरे ग आन्दोलन की लीलाओं में व्यस्त रहे।
चब्बिश वत्सर-शेषे करिया सन्यास । आर चब्बिश वत्सर कैल नीलाचले वास ॥
११॥
चौबीस वर्ष बाद उन्होंने संन्यास ग्रहण कर लिया और अगले चौबीस घर्षों तक वे जगन्नाथ पुरी में रहे।
तार मध्ये छय वत्सर-गमनागमन ।।कभु दक्षिण, कभु गौड़, कभु वृन्दावन ॥
१२॥
इन अन्तिम चौबीस वर्षों में से छः वर्षों तक वे लगातार भारत का भ्रमण करते रहे-कभी दक्षिण भारत में, कभी बंगाल में तो कभी वृन्दावन में।
अष्टादश वत्सर रहिला नीलाचले ।।कृष्ण-प्रेम-नामामृते भासा'ल सकले ॥
१३॥
शेष अठारह वर्षों तक वे निरन्तर जगन्नाथ पुरी में ही रहे। वहाँ उन्होंने अमृततुल्य हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करते हुए हर एक को कृष्णप्रेम की बाढ़ से सराबोर कर दिया।
गार्हस्थ्ये प्रभुर लीला ‘आदि'-लीलाख्यान ।‘मध्य'-'अन्त्य'-लीला–शेष-लीलार दुई नाम ॥
१४॥
उनके गृहस्थ-जीवन की लीलाएँ आदिलीला अर्थात् मूल लीलाएँ कहलाती हैं और उनकी बाद की लीलाएँ मध्यलीला तथा अन्त्यलीला कहलाती हैं।
आदि-लीला-मध्ये प्रभुर ग्रतेक चरित ।।सूत्र-रूपे मुरारि गुप्त करिला ग्रथित ॥
१५॥
आदिलीला के अन्तर्गत श्री चैतन्य महाप्रभु ने जितनी लीलाएँ कीं, मुरारि गुप्त ने संक्षेप में अंकित किया है।
प्रभुर ग्रे शेष-लीला स्वरूप-दामोदर ।।सूत्र करि' ग्रन्थिलेन ग्रन्थेर भितर ॥
१६॥
उनकी बाद की (शेष) लीलाएँ (मध्यलीला तथा अन्त्यलीला ) के सचिव स्वरूप दामोदर गोस्वामी ने संक्षेप में लिपिबद्ध कीं और इस प्रकार वे पुस्तक के रूप में रखी हुई हैं।
एइ दुइ जनेर सूत्र देखियो शुनिया ।वर्णना करेन वैष्णव क्रम → करिया ॥
१७ ॥
इन दो महापुरुषों द्वारा अंकित टिप्पणियों को देखकर तथा सुनकर कोई भी वैष्णव अर्थात् भगवद्भक्त इन लीलाओं को क्रमवार जान सकता हैं।
बाल्य, पौगण्ड, कैशोर, यौवन,—-चारि भेद ।अतएव आदि-खण्डे लीला चारि भेद ॥
१८॥
उनकी आदिलीला में चार विभाग हैं-बाल्य, पौगण्ड, कैशोर तथा यौवन।
सर्व-सद्गुण-पूर्णाम् तां वन्दे फाल्गुन-पूर्णिमाम् ।।यस्यां श्री-कृष्ण-चैतन्योऽवतीर्णः कृष्ण-नामभिः ॥
१९॥
मैं फाल्गुन महीने की पूर्णिमा की संध्या को सादर नमस्कार करता हूँ, जो शुभ-लक्षणों से पूर्ण शुभ घड़ी है, जब श्री चैतन्य महाप्रभु हरे कृष्ण नाम के संकीर्तन के साथ अवतीर्ण हुए।
फाल्गुन-पूर्णिमा-सन्ध्याय प्रभुर जन्मोदय ।।सेइ-काले दैव-योगे चन्द्र-ग्रहण हय ॥
२०॥
फाल्गुन पूर्णिमा की संध्या के समय जब महाप्रभु ने जन्म लिया, योगवश उस समय चन्द्रग्रहण भी लगा था।
‘हरि' ‘हरि' बले लोक हरषित हा ।जन्मिला चैतन्य-प्रभु' नाम' जन्माइया ॥
२१॥
हर्ष से हर व्यक्ति भगवान् के पवित्र नाम हरि! हरि! का उच्चारण कर रहा था और अपने प्रकट होने के पूर्व महाप्रभु पवित्र नाम को प्रकट कर चुके थे।
जन्म-बाल्य-पौगण्ड-कैशोर-युवा-काले ।हरि-नाम लओयाइला प्रभु नाना छले ॥
२२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने जन्म के समय, बाल्य, पौगण्ड, कैशोर तथा युवावस्था में भिन्न-भिन्न बहानों से लोगों को हरि-नाम ( हरे कृष्ण महामन्त्र) का कीर्तन करने के लिए प्रेरित किया।
बाल्य-भाव छले प्रभु करेन क्रन्दन ।'कृष्ण' 'हरि' नाम शुनि' रहये रोदन ॥
२३ ॥
अपने बाल्यकाल में जब महाप्रभु रो रहे होते थे, तब कृष्ण तथा हरि के पवित्र नामों को सुनकर वे तुरन्त रोना बन्द कर देते थे।
अतएव 'हरि' ‘हरि' बले नारीगण ।देखिते आइसे ज़ेबा सर्व बन्धु जन ॥
२४॥
जितनी सारी स्नेहशीला स्त्रियाँ बालक को देखने आती थीं, वे बालक के रोते ही हरि! हरि! नाम का उच्चारण करती थीं।
‘गौरहरि' बलि' तारे हासे सर्व नारी ।अतएव हैल ताँर नाम 'गौरहरि' ॥
२५॥
जब स्त्रियाँ यह कौतुक देखती थीं, तो वे आनन्दित होकर हँसने लगती थीं और वे महाप्रभु को 'गौरहरि' कहकर पुकारने लगीं। तभी से उनका अन्य नाम 'गौरहरि' पड़ गया।
बाल्य वयस–यावत् हाते खड़ि दिल ।। पौगण्ड वयस-—यावविवाह ना कैल ॥
२६॥
उनका बाल्यकाल उनकी शिक्षा का शुभारम्भ होने ( हाते खड़ि) के समय तक रहा, और बाल्यकाल समाप्ति से लेकर उनके विवाहित होने तक की उम्र पौगण्ड कहलाती है।
विवाह करिले हैल नवीन यौवन ।सर्वत्र लओयाइल प्रभु नाम-सङ्कीर्तन ॥
२७॥
उनके विवाह के बाद उनका यौवन प्रारम्भ हुआ, और अपनी युवावस्था में उन्होंने हर एक को सर्वत्र हरे कृष्ण महामन्त्र कीर्तन करने के लिए प्रेरित किया।
पौगण्ड-वयसे पड़ेन, पड़ान शिष्यगणे ।। सर्वत्र करेन कृष्ण-नामेर व्याख्याने ॥
२८॥
पौगण्डे अवस्था में वे गम्भीर विद्यार्थी बन गये और शिष्यों को पढ़ाते भी थे। इस तरह वे सर्वत्र कृष्णनाम की व्याख्या करते थे।
सूत्र-वृत्ति-पाँजि-टीका कृष्ोते तात्पर्य ।।शिष्येर प्रतीत हय,—प्रभाव आश्चर्य ॥
२९॥
व्याकरण का पाठ पढ़ाते समय तथा व्याख्या करके बताते समय श्री चैतन्य महाप्रभु ने अपने शिष्यों को भगवान् कृष्ण की महिमा के विषय में शिक्षा दी। चूंकि उनकी सारी व्याख्याएँ कृष्ण में समाप्त होती थीं, अतएव शिष्यगण उन्हें आसानी से समझ सकते थे। इस तरह उनका प्रभाव आश्चर्यजनक था।
यारे देखे, तारे कहे,—कह कृष्ण-नाम । कृष्ण-नामे भासाइल नवद्वीप-ग्राम ॥
३०॥
जब चैतन्य महाप्रभु विद्यार्थी थे, तब उन्हें जो कोई मिलता था उसको वे हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने के लिए कहते थे। इस तरह उन्होंने । पूरे नवद्वीप ग्राम को हरे कृष्ण कीर्तन से आप्लावित कर दिया।
किशोर वयसे आरम्भिला सङ्कीर्तन ।रात्र-दिने प्रेमे नृत्य, सङ्गे भक्त-गण ॥
३१॥
युवावस्था के कुछ पहले उन्होंने संकीर्तन आन्दोलन प्रारम्भ किया। वे अपने भक्तों के साथ भावविभोर होकर दिन-रात नृत्य किया करते थे।
नगरे नगरे भ्रमे कीर्तन करिया । भासाइल त्रिभुवन प्रेम-भक्ति दिया ॥
३२॥
। ज्यों-ज्यों महाप्रभु कीर्तन करते हुए सर्वत्र भ्रमण करने लगे, त्यों संकीर्तन आन्दोलन नगर के एक छोर से दूसरे छोर तक बढ़ता गया। स तरह उन्होंने सारे विश्व को भगवत्प्रेम वितरण करके आप्लावित कर या।
चब्बिश वत्सर ऐछे नवद्वीप-ग्रामे ।। लओयाइला सर्व-लोके कृष्ण-प्रेम-नामे ।। ३३॥
चैतन्य महाप्रभु नवद्वीप क्षेत्र में चौबीस वर्षों तक रहे और उन्होंने हर व्यक्ति को हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने तथा इस तरह कृष्ण-प्रेम में निमग्न होने के लिए प्रेरित किया।
चब्बिश वत्सर छिला करिया सन्यास ।भक्त-गण लञा कैला नीलाचले वास ॥
३४॥
शेष चौबीस वर्षों तक श्री चैतन्य महाप्रभु संन्यास लेकर अपने भक्तों के साथ जगन्नाथ पुरी में निवास करते रहे।
तार मध्ये नीलाचले छय वत्सर ।नृत्य, गीत, प्रेमभक्ति-दान निरन्तर ॥
३५॥
नीलाचल (जगन्नाथ पुरी) के इन चौबीस वर्षों में से छः वर्षों तक उन्होंने सदैव कीर्तन और नृत्य द्वारा भगवत्प्रेम का वितरण किया।
सेतुबन्ध, आर गौड़-व्यापि वृन्दावन । प्रेम-नाम प्रचारिया करिला भ्रमण ॥
३६॥
इन छः वर्षों में कुमारी अन्तरीप से लेकर बंगाल होते हुए वृन्दावन क कीर्तन करते, नाचते और कृष्ण-प्रेम का वितरण करते हुए उन्होंने सारे भारत का भ्रमण किया।
एइ ‘मध्य-लीला' नाम–लीला-मुख्यधाम ।शेष अष्टादश वर्षअन्त्य-लीला' नामे ॥
३७॥
। संन्यास ग्रहण करने के बाद चैतन्य महाप्रभु के भ्रमण के समय के कार्यकलाप ही उनकी मुख्य लीलाएँ हैं। शेष अठारह वर्षों के उनके कार्यकलाप अन्त्यलीला कहलाते हैं।
तार मध्ये छय वत्सर भक्तगण-सङ्गे ।प्रेम-भक्ति लओयाइल नृत्य-गीत-रङ्गे ॥
३८ ॥
इन अठारह वर्षों में से वे छः वर्षों तक लगातार जगन्नाथ पुरी में रहे और नियमित रूप से कीर्तन किया और सारे भक्तों को कीर्तन तथा नृत्य द्वारा कृष्ण-प्रेम के लिए प्रेरित किया।
द्वादश वत्सर शेष रहिला नीलाचले । प्रेमावस्था शिखाइला आस्वादन-च्छले ॥
३९॥
शेष बारह वर्ष वे जगन्नाथ पुरी में रहे और कृष्ण-प्रेम की दिव्य अनुभूति का आस्वादन करते हुए उन्होंने हर एक को इसके आस्वादन की विधि की शिक्षा प्रदान की।
रात्रि-दिवसे कृष्ण-विरह-स्फुरण ।उन्मादेर चेष्टा करे प्रलाप-वचन ॥
४०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु को दिन-रात कृष्ण का विरह सताता रहता था। इस विरह के लक्षणों को प्रकट करते हुए करुण पुकार करते, और पागल की तरह प्रलाप करते थे।
श्री-राधार प्रलाप ग्रैछे उद्धव-दर्शने ।।सेइमत उन्माद-प्रलाप करे रात्रि-दिने ॥
४१॥
जिस प्रकार उद्धव, से भेंट होने पर श्रीमती राधारानी असम्बद्ध बातें करती थीं, उसी तरह श्री चैतन्य महाप्रभु श्रीमती राधारानी के भाव में रात-दिन वैसा ही आस्वादन करते थे।
विद्यापति, जयदेव, चण्डीदासेर गीत ।।आस्वादेन रामानन्द-स्वरूप-सहित ॥
४२ ॥
महाप्रभु विद्यापति, जयदेव तथा चण्डीदास की कृतियाँ पढ़ा करते थे और रामानन्द राय तथा स्वरूप दामोदर गोस्वामी जैसे अपने अन्तरंग पार्षदों के साथ उनके गीतों का रसास्वादन करते थे।
कृष्णेर वियोगे व्रत प्रेम-चेष्टित ।। आस्वादिया पूर्ण कैल आपन वाञ्छित ।। ४३॥
कृष्ण के वियोग में श्री चैतन्य महाप्रभु इन सारे भावाविष्ट कार्यकलापों का आस्वादन करते थे और इस तरह वे स्वयं की इच्छाओं की पूर्ति करते थे।
अनन्त चैतन्य-लीला क्षुद्र जीव हा ।। के वर्णिते पारे, ताहा विस्तार करिया ॥
४४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ अनन्त हैं। भला एक क्षुद्र जीव उन । दिव्य लीलाओं को कितना विस्तारपूर्वक वर्णन कर सकता है? सूत्र करि' गणे यदि आपने अनन्त । सहस्र-वदने तेहो नाहि पाय अन्त ॥
४५ ॥
यदि साक्षात् शेषनाग अनन्त को चैतन्य महाप्रभु की लीलाएँ सूत्रबद्ध करनी पड़े, तो वे अपने हजारों मुखों से भी उनकी सीमा पा सकने में समर्थ नहीं हो सकते।
दामोदर-स्वरूप, आर गुप्त मुरारि ।मुख्य-मुख्य-लीला सूत्रे लिखियाछे विचारि' ॥
४६।। श्री स्वरूप दामोदर तथा मुरारि गुप्त जैसे भक्तों ने पर्याप्त विचार विमर्श के बाद चैतन्य महाप्रभु की प्रमुख लीलाओं को सूत्रबद्ध किया है।
सेइ, अनुसारे लिखि लीला-सूत्रगण ।विस्तारि' वणिआछेन ताहा दास-वृन्दावन ॥
४७॥
श्री स्वरूप दामोदर तथा मुरारि गुप्त ने जो संक्षिप्त टिप्पणियाँ लिखी थीं, वे ही इस पुस्तक के आधारस्वरूप हैं। उन्हीं टिप्पणियों का अनुसरण करते हुए मैं महाप्रभु की सारी लीलाएँ लिख रहा हूँ। इन टिप्पणियों का विशद् वर्णन वृन्दावन दास ठाकुर द्वारा हुआ है।
चैतन्य-लीलार व्यास,---दास वृन्दावन ।मधुर करिया लीला करिला रचन ।। ४८ ॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के प्रामाणिक लेखक श्रील वृन्दावन दास ठाकुर श्रील व्यासदेव के ही समान हैं। उन्होंने इन लीलाओं का वर्णन इस प्रकार किया है कि वे अधिक मधुर बन गई हैं।
ग्रन्थ-विस्तार-भये छाड़िला ग्रे ग्रे स्थान ।।सेइ सेइ स्थाने किछु करिब व्याख्यान ॥
४९॥
। इस भय से कि उनका ग्रंथ कहीं बहुत बृहदाकार न हो जाए, उन्होंने कुछ स्थानों का विस्तृत वर्णन छोड़ दिया है। मैं उन्हीं-उन्हीं स्थानों को यथाशक्ति पूरित करने का प्रयास करूंगा।
प्रभुर लीलामृत तेंहो कैल आस्वादन ।।ताँर भुक्त-शेष किछु करिये चर्वण ॥
५०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की दिव्य लीलाओं का वास्तविक आस्वादन तो श्रील वृन्दावन दास ठाकुर ने किया है। मैं तो उन्हीं के छोड़े हुए भोजन को चबाने का प्रयास-मात्र कर रहा हूँ।
आदि-लीला-सूत्र लिखि, शुन, भक्त-गण ।सक्षेपे लिखिये सम्यक् ना ग्राय लिखन ॥
५१॥
। हे भगवान् चैतन्य के भक्तों, अब मैं आदिलीला के सूत्रों को संक्षेप में लिख रहा हूँ, क्योंकि इन लीलाओं का पूर्ण रूप से वर्णन करना सम्भव नहीं है।
कोन वाञ्छा पूरण लागि' व्रजेन्द्र-कुमार।अवतीर्ण हैते मने करिला विचार ॥
५२॥
अपने मन की एक विशेष इच्छा पूरी करने के लिए व्रजेन्द्रकुमार भगवान् कृष्ण ने भलीभाँति विचार करने के बाद इस लोक में अवतरित होने का निश्चय किया।
आगे अवतारिला ग्रे ये गुरु-परिवार ।सङ्क्षेपे कहिये, कहा ना ग्राय विस्तार ॥
५३॥
अतएव भगवान् कृष्ण ने सबसे पहले अपने वरिष्ठ जनों के परिवार को पृथ्वी पर अवतरित होने दिया। मैं उनका संक्षेप में ही वर्णन करूँगा, क्योंकि उनका पूर्णतया वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है।
श्री-शची-जगन्नाथ, श्री-माधव-पुरी ।। केशव भारती, आर श्री-ईश्वर पुरी ॥
५४॥
अद्वैत आचार्य, आर पण्डित श्रीवास ।।आचार्यरत्न, विद्यानिधि, ठाकुर हरिदास ॥
५५॥
भगवान् श्रीकृष्ण ने चैतन्य महाप्रभु के रूप में प्रकट होने के पूर्व इन भक्तों को अपने से पहले प्रकट होने का आग्रह किया-श्री शचीदेवी, जगन्नाथ मिश्र, माधवेन्द्र पुरी, केशव भारती, ईश्वर पुरी, अद्वैत आचार्य, श्रीवास पण्डित, आचार्यरत्न, विद्यानिधि तथा ठाकुर हरिदास।
श्रीहट्ट-निवासी श्री-उपेन्द्र-मिश्र-नाम ।वैष्णव, पण्डित, धनी, सद्गुण-प्रधान ॥
५६॥
श्रीहट्ट जिले के एक निवासी थे जिनका नाम श्री उपेन्द्र मिश्र था। वे भगवान् विष्णु के महान् भक्त, विद्वान पण्डित, धनी तथा सारे सद्गुणों की खान थे।
सप्त मिश्र ताँर पुत्र—सप्त ऋषीश्वर । कंसारि, परमानन्द, पद्मनाभ, सर्वेश्वर ॥
५७॥
जगन्नाथ, जनार्दन, त्रैलोक्यनाथ ।।नदीयाते गङ्गा-वास कैल जगन्नाथ ॥
५८॥
उपेन्द्र मिश्र के सात पुत्र थे और वे सभी परम सन्त तथा अत्यन्त प्रभावशाली थे। इनके नाम थे-(१) कंसारि, (२) परमानन्द, (३) पद्मनाभ, (४) सर्वेश्वर, (५) जगन्नाथ, (६) जनार्दन तथा (७) त्रैलोक्यनाथ। पाँचवें पुत्र जगन्नाथ मिश्र ने गंगा नदी के तट पर नदिया नामक स्थान में रहने का निश्चय किया।
जगन्नाथ मिश्रवर—पदवी 'पुरन्दर' ।नन्द-वसुदेव-रूप सद्गुण-सागर ॥
५९॥
। जगन्नाथ मिश्र को 'पुरन्दर' उपाधि मिली थी। वे नन्द महाराज तथा वसुदेव की ही भाँति समस्त सद्गुणों के सागर थे।
ताँर पत्नी ‘शची'-नाम, पतिव्रता सती ।। याँर पिता 'नीलाम्बर' नाम चक्रवर्ती ॥
६०॥
उनकी पत्नी श्रीमती शचीदेवी सती स्त्री थीं और अत्यन्त पतिव्रता थीं। शचीदेवी के पिता का नाम नीलाम्बर था तथा उनका कुलनाम चक्रवर्ती था।
राढ़देशे जन्मिला ठाकुर नित्यानन्द ।। गङ्गादास पण्डित, गुप्त मुरारि, मुकुन्द ॥
६१॥
राढ़देश बंगाल का वह भाग है जहाँ गंगा दिखाई नहीं पड़ती। उसी देश में नित्यानन्द प्रभु, गंगादास पण्डित, मुरारि गुप्त तथा मुकुन्द ने जन्म लिया।
असङ्ख्य भक्तेर कराइला अवतार । शेषे अवतीर्ण हैला व्रजेन्द्रकुमार ॥
६२ ।। व्रजेन्द्र कुमार भगवान् कृष्ण ने सर्वप्रथम असंख्य भक्तों को प्रकट होने दिया और अन्त में वे स्वयं प्रकट हुए।
प्रभुर आविर्भाव-पूर्वे व्रत वैष्णव-गण । अद्वैत-आचार स्थाने करेन गमन ॥
६३॥
चैतन्य महाप्रभु के प्रकट होने के पूर्व नवद्वीप के सारे भक्त अद्वैत यं के घर में जुटा करते थे।
गीता-भागवत कहे आचार्य-गोसाजि ।ज्ञान-कर्म निन्दि' करे भक्तिर बड़ाइ ।। ६४॥
। वैष्णवों की इन सभाओं में अद्वैत आचार्य भगवद्गीता तथा मद्भागवत सुनाया करते थे, जिसमें वे दार्शनिक चिन्तन तथा सकाम फर्म की निन्दा करते और भक्ति की सर्वश्रेष्ठता स्थापित करते थे।
सर्व-शास्त्रे कहे कृष्ण-भक्तिर व्याख्यान । ज्ञान, योग, तपो-धर्म नाहि माने आन ।। ६५॥
। वैदिक संस्कृति के सारे प्रामाणिक शास्त्र भगवान् कृष्ण की भक्ति की व्याख्या से भरे पड़े हैं। इसलिए भगवान् कृष्ण के भक्त दार्शनिक सर्क, योग, व्यर्थ तपस्या एवं तथाकथित धार्मिक अनुष्ठानों को मान्यता प्रदान नहीं करते। वे भक्ति के अतिरिक्त अन्य किसी विधि को ना स्वीकार करते।
ताँर सङ्गे आनन्द करे वैष्णवेर गण । कृष्ण-कथा, कृष्ण-पूजा, नाम-सङ्कीर्तन ॥
६६॥
सारे वैष्णव अद्वैत आचार्य के घर में सदैव कृष्ण के विषय में बातें करने, कृष्ण की पूजा करने तथा हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने में आनन्द का अनुभव करते थे।
किन्तु सर्व-लोक देखि' कृष्ण-बहिर्मुख । विषये निमग्न लोक देखि पाय दुःख ॥
६७॥
। किन्तु श्री अद्वैत आचार्य को पीड़ा होती, जब वे देखते कि सारे लोग णभावनामृत से रहित हैं और मात्र भौतिक इन्द्रियभोग में डूबे हुए हैं।
लोकेर निस्तार-हेतु करेन चिन्तन ।। केमते ए सब लोकेर हइबे तारण ॥
६८ ॥
संसार की ऐसी दशा देखकर वे गम्भीरतापूर्वक सोचने लगे कि माया के पाश से किस प्रकार इन लोगों का उद्धार किया जा सकता है।
कृष्ण अवतरि' करेन भक्तिर विस्तार ।तबे त' सकल लोकेर हइबे निस्तार ॥
६९॥
श्रील अद्वैत आचार्य प्रभु ने सोचा, यदि भक्ति सम्प्रदाय का वितरण करने के लिए स्वयं कृष्ण अवतरित हों, तभी सारे लोगों का उद्धार होना सम्भव है।
कृष्ण अवतारिते आचार्य प्रतिज्ञा करिया ।। कृष्ण-पूजा करे तुलसी-गङ्गाजल दिया ॥
७० ॥
इस उद्देश्य से अद्वैत आचार्य प्रभु ने भगवान् को अवतरित कराने की प्रतिज्ञा करते हुए तुलसीदल तथा गंगाजल से पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की पूजा करनी शुरू कर दी।
कृष्णेर आह्वान करे सघन हुङ्कार ।।हुङ्कारे आकृष्ट हैला व्रजेन्द्र कुमार ॥
७१॥
उन्होंने जोर जोर से हुंकार करके भगवान् कृष्ण को प्रकट होने के लिए आमन्त्रित किया, और उनकी बार-बार की हुंकार से कृष्ण अवतरित होने के लिए आकृष्ट हुए।
जगन्नाथमिश्र-पत्नी शचीर उदरे । अष्ट कन्या क्रमे हैल, जन्मि' जन्मि' मरे ॥
७२॥
चैतन्य महाप्रभु के जन्म के पूर्व जगन्नाथ मिश्र की पत्नी शचीमाता की कोख से एक-एक करके आठ पुत्रियाँ जन्म ले चुकी थीं। किन्तु उन सबकी जन्म लेने के तुरन्त बाद मृत्यु हो गई।
अपत्य-विरहे मिश्रर दुःखी हैल मन ।।पुत्र लागि' आराधिल विष्णुर चरण ॥
७३॥
एक-एक करके सारी सन्तानों की मृत्यु से जगन्नाथ मिश्र अत्यन्त दुःखी थे। अतएव उन्होंने पुत्र-प्राप्ति की कामना से भगवान् विष्णु के चरणकमलों की पूजा की।
तबे पुत्र जनमिला 'विश्वरूप' नाम ।महा-गुणवान् तेह—'बलदेव'-धाम ॥
७४॥
। इसके बाद जगन्नाथ मिश्र को विश्वरूप नामक पुत्र की प्राप्ति हुई, जो अत्यन्त शक्तिमान तथा गुणवान थे, क्योंकि वे बलदेव के अवतार थे।
बलदेव-प्रकाश-परम-व्योमे ‘सङ्कर्षण' ।।तेह—विश्वेर उपादान-निमित्त-कारण ॥
७५ ॥
आध्यात्मिक जगत् में बलदेव के अंश संकर्षण कहलाते हैं, जो इस भौतिक जगत् के उपादान तथा प्रत्यक्ष कारण हैं।
ताँहा बइ विश्वे किछु नाहि देखि आर ।अतएव विश्वरूप' नाम ये ताँहार ॥
७६ ॥
विराट्-रूप को महासंकर्षण का विश्वरूप अवतार कहते हैं। इस तरह इस विराट् जगत् में हमें उनके अतिरिक्त कुछ भी और देखने को नहीं मिलता।
नैतच्चित्रं भगवति ह्यनन्ते जगदीश्वरे ।। ओतं प्रोतमिदं ग्रस्मिन्तन्तुष्वङ्ग ग्रथा पटः ॥
७७ ॥
जिस प्रकार वस्त्र में धागा लम्बाई तथा चौड़ाई दोनों ओर फैला रहता है, उसी तरह इस ब्रह्माण्ड के भीतर की प्रत्येक वस्तु में पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से विद्यमान हैं। यह उनके लिए आश्चर्यजनक नहीं है।
अतएव प्रभु ताँरै बले, ‘बड़ भाइ' ।। कृष्ण, बलराम दुइ-चैतन्य, निताई ॥
७८॥
। महासंकर्षण प्रकट ब्रह्माण्ड के उपादान तथा निमित्त कारण हैं, अतएव वे ब्रह्माण्ड की हर वस्तु में विद्यमान हैं। अतएव चैतन्य महाप्रभु न्हें अपना बड़ा भाई कहते थे। आध्यात्मिक जगत् में दोनों भाई कृष्ण तथा बलराम कहलाते हैं, किन्तु अब वे ही चैतन्य तथा निताई हैं। अतएव निष्कर्ष यह है कि नित्यानन्द प्रभु आदि संकर्षण, बलदेव हैं।
पुत्र पाञा दम्पति हैला आनन्दित मन ।।विशेषे सेवन करे गोविन्द-चरण ॥
७९॥
विश्वरूप को पुत्र रूप में पाकर दम्पति (जगन्नाथ मिश्र तथा शचीमाता) मन ही मन अत्यन्त प्रसन्न थे। इसी प्रसन्नता के कारण वे गोविन्द के चरणकमलों की सेवा विशेषरूप से करने लगे।
चौद्द-शत छय शके शेष माघ मासे । जगन्नाथ-शचीर देहे कृष्णेर प्रवेशे ।। ८०॥
शक सम्वत १४०६ के माघ मास (१४८५ ई. का जनवरी मास) में भगवान् कृष्ण जगन्नाथ मिश्र तथा शचीदेवी दोनों ही के शरीर में प्रविष्ट हुए।
मिश्र कहे शची-स्थाने,-—देखि आन रीत । ज्योतिर्मय देह, गेह लक्ष्मी-अधिष्ठित ॥
८१॥
जगन्नाथ मिश्र ने शचीमाता से कहा, मैं आश्चर्य देख रहा हूँ। तुम्हारा और ज्योति से युक्त है और ऐसा लगता है कि साक्षात् लक्ष्मी देवी मेरे घर पधारी हैं।
ग्राहाँ ताहाँ सर्व-लोक करये सम्मान ।घरे पाठाइया देय धन, वस्त्र, धान ॥
८२॥
मैं जहाँ कहीं जाता हूँ, लोग मेरा सम्मान करते हैं। वे मेरे कहे बिना ही स्वेच्छा से मुझे धन, वस्त्र तथा धान देते हैं।
शची कहे,---मुजि देखों आकाश-उपरे । दिव्य-मूर्ति लोक सब ग्रेन स्तुति करे ॥
८३॥
शचीमाता ने अपने पति से कहा, मुझे बाह्य आकाश में अत्यन्त विचित्र तेजोमय पुरुष प्रकट होते दिख रहे हैं, मानों वे स्तुति कर रहे हों।
जगन्नाथ मिश्र कहे,—स्वप्न ग्ने देखिल ।ज्योतिर्मय-धाम मोर हृदये पशिल ॥
८४॥
तब जगन्नाथ मिश्र ने कहा, मैंने सपने में भगवान् के तेजोमय धाम को अपने हृदय में प्रवेश होते देखा है।
आमार हृदय हैते गेला तोमार हृदये ।। हेन बुझि, जन्मिबेन कोन महाशये ॥
८५ ॥
फिर यह मेरे हृदय से निकलकर तुम्हारे हृदय में प्रविष्ट हुआ। इसलिए मुझे लगता है कि शीघ्र ही किसी महापुरुष का जन्म होगा।
एत बलि' हे रहे हरषित हा ।। शालग्राम सेवा करे विशेष करिया ॥
८६॥
इस वार्तालाप के बाद पति-पत्नी दोनों परम हर्षित थे और दोनों ने मिलकर घर की शालग्राम-शिला की सेवा की।
हैते हैते हैल गर्भ त्रयोदश मास । तथापि भूमिष्ठ नहे,—मिश्रेर हैल त्रास ॥
८७॥
इस तरह गर्भ तेरहवें मास में आ पहुँचा, किन्तु शिशु के प्रसव का कोई संकेत न था। फलतः जगन्नाथ मिश्र को बड़ी चिन्ता होने लगी।"
नीलाम्बर चक्रवर्ती कहिल गणिया ।। एइ मासे पुत्र हबे शुभ-क्षण पाञा ॥
८८ ॥
तब नीलाम्बर चक्रवर्ती (चैतन्य महाप्रभु के नाना ) ने नक्षत्रों की गणना करके बतलाया कि शुभ क्षण का लाभ उठाकर इसी मास में बालक का जन्म होगा।
चौद्द-शत सात-शके मास ये फाल्गुन ।।पौर्णमासीर सन्ध्या-काले हैले शुभ-क्षण ॥
८९॥
इस प्रकार शक सम्वत १४०७ (१४८६ ई.) के फाल्गुन मास ( फरवरी-मार्च) में पूर्णमासी की सन्ध्या के समय वांछित शुभ मुहूर्त आ गया।
सिंह-राशि, सिंह-लग्न, उच्च ग्रह-गण ।घडू-वर्ग, अष्ट-वर्ग, सर्व सुलक्षण ॥
९०॥
। (ज्योतिर्वेद अर्थात् वैदिक ज्योतिष के अनुसार मुहूर्त का वर्णन निम्न प्रकार है), शुभ जन्म चन्द्र सिंह राशि पर था, सिंह उच्च स्थान पर था। ग्रहगण उच्च स्थान पर शक्तिशाली स्थिति में थे। षड्वर्ग एवं अष्ट-वर्ग शुभ प्रभाव को प्रदर्शित कर रहे थे।
अ-कलङ्क गौरचन्द्र दिला दरशन ।। स-कलङ्क चन्द्रे आर को प्रयोजन ॥
९१ ॥
जब श्री चैतन्य महाप्रभु रूपी निष्कलंक चन्द्रमा दिख गया, तो फिर कलंकयुक्त चन्द्रमा की आवश्यकता कहाँ रही? एत जानि' राहु कैल चन्द्रेर ग्रहण । 'कृष्ण' 'कृष्ण' ‘हरि' नामे भासे त्रिभुवन ॥
९२॥
यह सोचकर काले ग्रह राहु ने पूर्णचन्द्रमा को ढक लिया और तुरन्त ही तीनों जगत् कृष्ण! कृष्ण! हरि! की ध्वनि से गुंजायमान हो उठे।
जय जय ध्वनि हैल सकल भुवन ।।चमत्कार हैया लोक भावे मने मन ॥
९३॥
इस तरह सारे लोग चन्द्र ग्रहण के समय हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन कर रहे थे और उनके मन आश्चर्यचकित थे।
जगत् भरिया लोक बले–‘हरि' ‘हरि' ।सेइ-क्षणे गौरकृष्ण भूमे अवतरि ॥
९४॥
जब सारा जगत् इस तरह पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् कृष्ण के पवित्र नाम का कीर्तन कर रहा था, तब गौरहरि के रूप में स्वयं कृष्ण पृथ्वी पर अवतरित हुए।
प्रसन्न हइल सब जगतेर मन ।।‘हरि' बलि' हिन्दुके हास्य करये ग्रवन ॥
९५॥
सारा जगत् प्रसन्न था। जहाँ हिन्दू लोग भगवान् के नाम का कीर्तन कर रहे थे, वहीं अहिन्दू, विशेषतया मुसलमान, उनके शब्दों की हँसी हँसी में नकल कर रहे थे।
‘हरि' बलि' नारीगण देइ हुलाहुलि ।।स्वर्गे वाद्य-नृत्य करे देव कुतूहली ॥
९६॥
जब सारी स्त्रियाँ पृथ्वी पर हरि-नाम का उच्चारण कर रही थीं, तो उस समय स्वर्गलोक में नृत्य और गान चल रहा था, क्योंकि देवतागण अत्यन्त उत्सुक थे।
प्रसन्न हैल दश दिक्, प्रसन्न नदीजल ।स्थावर-जङ्गम हैल आनन्दे विह्वल ॥
९७॥
इस प्रकार के वातावरण में दशों दिशाएँ प्रमुदित हो उठीं और नदियों की तरंगे भी उसी तरह उमड़ने लगीं। साथ ही सारे चर तथा अचर प्राणी दिव्य आनन्द से अभिभूत हो उठे।
नदीया-उदयगिरि, पूर्णचन्द्र गौरहरि, कृपा करि' हइल उदय ।। पाप-तम: हैल नाश, त्रि-जगतेर उल्लास,जगभरि' हरि-ध्वनि हय ॥
९८॥
इस तरह अपनी अहैतुकी कृपा से पूर्णचन्द्र रूपी गौरहरि नदिया जिले में उदित हुए। नदिया की उपमा उस उदयगिरि से दी गई है, जहाँ सूर्य सर्वप्रथम दिखता है। आकाश में उनके उदय होने से पापमय जीवन का अंधकार विनष्ट हो गया और तीनों लोक हर्षित हो उठे तथा भगवान के पवित्र नाम का कीर्तन करने लगे।
सेइ-काले निजालय, उठिया अद्वैत राय,नृत्य करे आनन्दित-मने । हरिदासे लञा सङ्गे, हुङ्कार-कीर्तन-रङ्गेकेने नाचे, केह नाहि जाने ॥
९९ ॥
उस समय श्री अद्वैत आचार्य प्रभु अपने शान्तिपुर के घर में प्रसन्न मुद्रा में नाच रहे थे। वे हरिदास ठाकुर को अपने साथ लेकर नाच रहे थे और ऊँचे स्वर में हरे कृष्ण का कीर्तन कर रहे थे। किन्तु वे क्यों नाच रहे थे, यह कोई नहीं समझ सका।
देखि' उपराग हासि', शीघ्र गङ्गा-घाटे आसि'आनन्दे करिल गङ्गा-स्नान ।। पाञा उपराग-छले, आपनार मनो-बले, ब्राह्मणेरे दिल नाना दान ॥
१०० ॥
चन्द्र-ग्रहण को देखते तथा हँसते हुए अद्वैत आचार्य तथा हरिदास ठाकुर दोनों तुरन्त गंगा के तट पर गये और परम हर्ष के साथ उन्होंने गंगास्नान किया। चन्द्रग्रहण के अवसर का लाभ उठाते हुए अद्वैत आचार्य ने अपनी मानसिक शक्ति के द्वारा ब्राह्मणों को तरह-तरह के दान दिये।
जगतानन्दमय, देखि' मने स-विस्मय, ठारेठोरे कहे हरिदास ।। तोमार ऐछन रङ्ग, मोर मन परसन्न,देखि—किछु कार्ये आछे भास ॥
१०१॥
जब हरिदास ने देखा कि सारा संसार हर्षित है, तो उन्होंने विस्मित मन से अद्वैत आचार्य से प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रूप से कह ही दिया, आपका नाचना और दान वितरित करना मुझे बहुत हर्षित कर रहा है। मैं समझ सकता हूँ कि इन क्रियाओं के पीछे अवश्य ही कोई विशेष प्रयोजन है।
आचार्यरत्न, श्रीवास, हैल मने सुखोल्लासग्राइ' स्नान कैल गङ्गा-जले ।। आनन्दे विह्वल मन, करे हरि-सङ्कीर्तन नाना दान कैल मनो-बले ॥
१०२॥
। । आचार्यरत्न (चन्द्रशेखर) तथा श्रीवास ठाकुर उल्लास से अभिभूत गये और वे तुरन्त गंगा नदी के तट पर गये और गंगाजल में स्नान करने लगे उनके मन आनन्द से पूर्ण थे। उन्होंने हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन या और मनोबल द्वारा दान दिया।
एइ मत भक्त-तति, ग्राँर येइ देशे स्थिति,ताहाँ ताहाँ पाञा मनो-बले ।। नाचे, करे सङ्कीर्तन, आनन्दे विह्वल मन, दान करे ग्रहणेर छले ॥
१०३ ॥
इस तरह से सारे भक्त, जो जहाँ भी, जिस नगर तथा जिस देश में थे, सबके सब चन्द्र-ग्रहण के बहाने नाचने लगे, संकीर्तन करने लगे और मनोबल द्वारा दान देने लगे। उन सबके मन प्रसन्नता के मारे विह्वल थे।
ब्राह्मण-सज्जन-नारी, नाना-द्रव्ये थाली भरि'आइला सबे यौतुक लइया ।। ग्रेन काँचा-सोणा-द्युति, देखि' बालकेर मूर्ति,आशीर्वाद करे सुख पाञा ॥
१०४॥
सभी कोटियों के सम्मानीय ब्राह्मण जन तथा स्त्रियाँ विविध उपहारों से भरी थालियाँ भेंट करने आईं। सोने की तरह चमचमाते स्वरूप वाले नवजात शिशु को देखकर उन सबने अत्यन्त प्रसन्नता का अनुभव करते हुए आशीर्वाद दिये।
सावित्री, गौरी, सरस्वती, शची, रम्भा, अरुन्धतीआर ग्रत देव-नारीगण ।। नाना-द्रव्ये पात्र भरि', ब्राह्मणीर वेश धरि', आसि' सबे करे दरशन ।। १०५॥
समस्त दैवी स्त्रियाँ जिनमें ब्रह्माजी, शिवजी, भगवान् नृसिंहदेव, राजा त्र तथा ऋषि वशिष्ठ की पत्नियाँ एवं स्वर्ग की अप्सरा रम्भा भी सम्मिलित थीं, ब्राह्मणियों का वेश धारण करके नाना प्रकार के उपहार लेकर वहाँ पर आईं।
अन्तरीक्षे देव-गण, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, स्तुति-नृत्य करे वाद्य-गीत ।। नर्तक, वादक, भाट, नवद्वीपे यार नाट, सबे आसि' नाचे पाञा प्रीत ॥
१०६॥
बाह्य अन्तरिक्ष में सारे देवता, जिनमें गन्धर्वलोक, सिद्धलोक तथा चारणलोक के निवासी सम्मिलित थे, स्तुति करने लगे और गीत गाका तथा ढोल बजाकर नाचने लगे। इसी प्रकार नवद्वीप नगरी में सारे पेशेवर नर्तक, गायक तथा भाटगण एकत्र होकर अत्यन्त प्रसन्नता के मारे नाचने लगे।
केबा आसे केबा याय, केबा नाचे केबा गाय,सम्भालिते नारे कार बोल । खण्डिलेक दुःख-शोक, प्रमोद-पूरित लोक, मिश्र हैला आनन्दे विह्वल ॥
१०७॥
कोई यह समझ नहीं पा रहा था कि कौन आ रहा है, कौन जा रहा फोन नाच रहा है और कौन गा रहा है। कोई एक दूसरे की भाषा तक समझ पा रहा था। किन्तु हुआ यह कि सारा दुःख और शोक तुरन्त से गया और सारे लोग प्रसन्न हो उठे। इस तरह जगन्नाथ मिश्र भी नन्द से अभिभूत हो गये।
आचार्यरत्न, श्रीवास, जगन्नाथ मिश्र-पाश,आसि' ताँरे करे सावधान ।। कराइल जातकर्म, ये आछिल विधि-धर्म,तबे मिश्र करे नाना दान ॥
१०८॥
। चन्द्रशेखर आचार्य तथा श्रीवास ठाकुर दोनों ने ही जगन्नाथ मिश्र के पास आकर तरह-तरह से उनका ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने धार्मिक नियमों के अनुसार जन्मकाल के सारे अनुष्ठान सम्पन्न कराये। जगन्नाथ मिश्र ने भी तरह-तरह के दान दिये।
ग्रौतुक पाइल ग्रत, घरे वा आछिल कत,सब धन विप्रे दिल दान । ग्रत नर्तक, गायन, भाट, अकिञ्चन जन,धन दिया कैल सबार मान ॥
१०९॥
जगन्नाथ मिश्र ने भेंटों या उपहारों के रूप में जो धन पाया और जो कुछ उसके घर में था, उसे उन्होंने ब्राह्मणों, पेशेवर गायकों, नाचने वालों, भाटों तथा गरीबों में बाँट दिया। उन्होंने दान में धन देकर उन सबका सम्मान किया।
श्रीवासेर ब्राह्मणी, नाम ताँर ‘मालिनी',आचार्यरत्नेर पत्नी-सङ्गे।। सिन्दूर, हरिद्रा, तैल, खइ, कला, नारिकेल, दिया पूजे नारीगण रङ्गे ॥
११०॥
(आचार्यरत्न) की पत्नी तथा अन्य स्त्रियाँ परम प्रसन्नता से बालक की पूजा करने के लिए सिन्दूर, हल्दी, तेल, खइ ( भुने चावल), केले तथा नारियल जैसी सामग्री लेकर आईं।
अद्वैत-आचार्य-भार्या, जगत्पूजिता आर्या,नाम ताँर 'सीता ठाकुराणी' ।। आचार आज्ञा पाळा, गेल उपहार ला, देखिते बालक-शिरोमणि ॥
१११॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के जन्म के एक दिन बाद अद्वैत आचार्य की पत्नी सीतादेवी, जो जगत-भर के लिए पूज्य हैं, अपने पति से आज्ञा लेकर और अपने साथ तरह-तरह की भेंटें और उपहार लेकर उस सर्वश्रेष्ठ बालक को देखने गईं।
सुवर्णेर कड़ि-ब-उलि, रजतमुद्रा-पाशुलि, सुवर्णेर अङ्गद, कङ्कण ।। दु-बाहुते दिव्य शङ्ख, रजतेर मलबङ्क,स्वर्ण-मुद्रार नाना हारगण ॥
११२॥
वे अपने साथ अनेक प्रकार के सोने के आभूषण लाई थीं, जिनमें हाथ के कंगन, बाजूबन्द, हार तथा पाँव की पायल थी।
व्याघ्र-नख हेम-जड़ि, कटि-पट्टसूत्र-डोरी हस्त-पदेर व्रत आभरण ।। चित्र-वर्ण पट्ट-साड़ी, बुनि फोतो पट्टपाड़ी,स्वर्ण-रौप्य-मुद्रा बहु-धन ॥
११३॥
उसमें सोने में जड़े बघनखे, रेशमी कमरबन्ध, हाथों तथा पाँवों के । आभूषण, सुन्दर छपी रेशमी साड़ियाँ तथा रेशम की ही बनी बच्चे की पोषाक भी थे। साथ ही सोने तथा चाँदी के सिक्कों समेत अन्य द्रव्य भी बालक को न्यौछावर किये गये।
दुर्वा, धान्य, गोरोचन, हरिद्रा, कुङ्कुम, चन्दन,मङ्गल-द्रव्य पात्र भरिया ।। वस्त्र-गुप्त दोला चड़ि' सङ्गे ला दासी चेड़ी, वस्त्रालङ्कार पेटारि भरिया ॥
११४॥
सीता ठाकुराणी पर्दे से ढकी पालकी में चढ़कर और दासियों को साथ लेकर जगन्नाथ मिश्र के घर आईं। वे अपने साथ अनेक मंगल द्रव्य-यथा दूर्वा, धान, गोरोचन, हल्दी, कुंकुम एवं चन्दन लाई थीं। ये सारी भेटें एक बड़ी पिटारी में भरी हुई थीं।
भक्ष्य, भोज्य, उपहार, सङ्गे लइल बहु भार,शची-गृहे हैल उपनीत । देखिया बालक-ठाम, साक्षात्गोकुल-कान,वर्ण-मात्र देखि विपरीत ॥
११५॥
जब सीता ठाकुराणी अपने साथ अनेक खाने की वस्तुएँ, वस्त्र तथा अन्य उपहार लेकर शचीदेवी के घर आईं, तो वे नवजात शिशु को देखकर चकित हुईं, क्योंकि उन्हें लगा कि यह शिशु साक्षात् गोकुल के कृष्ण हैं, केवल रंग का अन्तर है।
सर्व अङ्ग सुनिर्माण, सुवर्ण-प्रतिमा-भान, सर्व अङ्ग–सुलक्षणमय ।। बालकेर दिव्य ज्योति, देखि' पाइल बहु प्रीति,वात्सल्येते द्रविल हृदय ॥
११६॥
बालक के दिव्य शारीरिक तेज, शुभ लक्षणों से युक्त सुगठित अंगों तथा स्वर्ण जैसे स्वरूप को देखकर सीता ठाकुराणी अत्यधिक प्रसन्न थीं और अपने मातृस्नेह के कारण उन्हें लग रहा था मानो उनका हृदय द्रवित हो उठा है।
दुर्वा, धान्य, दिल शीर्षे, कैल बहु आशीषे,चिरजीवी हओ दुई भाइ । डाकिनी-शाङ्खिनी हैते, शङ्का उपजिल चिते,डरे नाम थुइल निमाई' ॥
११७॥
। उन्होंने नवजात शिशु के सिर पर दूर्वादल तथा धान्य रखकर यह आशीष दिया दीर्घायु हो। किन्तु भूत-प्रेत तथा डायनों से भयभीत होने के कारण उन्होंने बालक का नाम निमाई रख दिया।
पुत्रमाता-स्नानदिने, दिल वस्त्र विभूषणे,पुत्र-सह मिश्रेरे सम्मानि' ।। शची-मिश्रेर पूजा लजा, मनेते हरिष हो,घरे आइला सीता ठाकुराणी ॥
११८॥
जिस दिन माता तथा बालक ने स्नान किया और प्रसूति-घर को छोड़ा, उस दिन सीता ठाकुराणी ने उन्हें सभी तरह के गहने और वस्त्र दिये। और जगन्नाथ मिश्र को भी सम्मानित किया। तत्पश्चात् सीता ठाकुराणी भी माता शचीदेवी और जगन्नाथ मिश्र द्वारा समादरित होकर अपने मन में अत्यधिक प्रसन्न हुईं और फिर अपने घर लौट आईं।
ऐछे शची-जगन्नाथ, पुत्र पाञा लक्ष्मीनाथ, पूर्ण हइल सकल वाञ्छित ।। धन-धान्ये भरे घर, लोकमान्य कलेवर,दिने दिने हय आनन्दित ॥
११९॥
इस प्रकार लक्ष्मीपति को पुत्र रूप में पाकर माता शचीदेवी तथा जगन्नाथ मिश्र की सारी मनोकामनाएँ पूरी हो गईं। उनका घर सदैव धनधान्य से भरा रहने लगा। वे ज्यों-ज्यों श्री चैतन्य के प्यारे शरीर को देखते, दिन-प्रतिदिन उनका आनन्द बढ़ता जाता था।
मिश्र वैष्णव, शान्त, अलम्पट, शुद्ध, दान्त,धन-भोगे नाहि अभिमान ।। पुत्रेर प्रभावे ग्रत, धन आसि' मिले, तत,विष्णु-प्रीते द्विजे देन दान ॥
१२०॥
। जगन्नाथ मिश्र एक आदर्श वैष्णव थे। वे शान्त, इन्द्रियतृप्ति में संयमित, शुद्ध तथा संयमी थे। अतएव उनमें भौतिक ऐश्वर्य भोगने की । कोई इच्छा नहीं थी। जो भी धन उनके दिव्य पुत्र के प्रभाव से आया, उसे उन्होंने विष्णु की तुष्टि के लिए ब्राह्मणों को दान में दे दिया।
लग्न गणि' हर्षमति, नीलाम्बर चक्रवर्ती,गुप्ते किछु कहिल मिशेरे ।। महापुरुषेर चिह्न, लग्ने अङ्गे भिन्न भिन्न,देखि,—एइ तारिबे संसारे ॥
१२१॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जन्मघड़ी की गणना करके नीलाम्बर चक्रवर्ती जगन्नाथ मिश्र से एकान्त में कहा कि उन्होंने बालक के शरीर तथा जन्मघड़ी दोनों में ही महान् व्यक्ति के विभिन्न लक्षण देखे हैं। इस प्रकार में समझ गये कि यह बालक भविष्य में तीनों लोकों का उद्धार करेगा।
ऐछे प्रभु शची-घरे, कृपाय कैल अवतारे, ग्रेइ इहा करये श्रवण ।। गौर-प्रभु दयामय, ताँरे हयेन सदय, सेइ पाय ताँहार चरण ॥
१२२॥
इस तरह चैतन्य महाप्रभु अपनी अहैतुकी कृपावश शचीदेवी के घर में अवतरित हुए। चैतन्य महाप्रभु उस किसी भी व्यक्ति पर अत्यन्त कृपाल होते हैं, जो उनके जन्म के इस वृत्तान्त को सुनता है। ऐसा मनुष्य महाप्रभु के चरणकमलों को प्राप्त करता है।
पाइया मानुष जन्म, ये ना शुने गौर-गुण,हेन जन्म तार व्यर्थ हैल ।। पाइया अमृतधुनी, पिये विष-गर्त-पानि,जन्मिया से केने नाहि मैल ॥
१२३॥
। जो व्यक्ति मनुष्य का शरीर पाकर भी श्री चैतन्य महाप्रभु के सम्प्रदाय को ग्रहण नहीं करता, वह अपने सुअवसर को खो देता है। अमृतधुनी भक्तिरूपी अमृत की प्रवाहमान नदी है। यदि मनुष्य शरीर पाकर कोई ऐसी नदी का जल पीने के बदले भौतिक सुख रूपी विषैले गड्ढे का जल पीता है, तो अच्छा यही होता कि वह जीवित रहने के बजाय बहुत पहले ही मर गया होता।
श्री-चैतन्य-नित्यानन्द, आचार्य अद्वैतचन्द्र,स्वरूप-रूप-रघुनाथदास ।। इँहा-सबार श्री-चरण, शिरे वन्दि निज-धन,जन्म-लीला गाइल कृष्णदास ॥
१२४॥
। मैंने, कृष्णदास कविराज गोस्वामी ने, श्री चैतन्य महाप्रभु, नित्यानन्द प्रभु, आचार्य अद्वैतचन्द्र, स्वरूप दामोदर, रूप गोस्वामी तथा रघुनाथ स गोस्वामी के चरणकमलों को अपनी सम्पत्ति समझकर अपने सिर भारण करके श्री चैतन्य महाप्रभु के आविर्भाव का वर्णन किया है।
