अध्याय बारह: अद्वैत आचार्य और गदाधर पंडित का विस्तार
अद्वैताद्ध्यब्ज-भृङ्गस्तान्सारासार-भृतोऽखिलान् ।हित्वासारान्सार-भृतो नौमि चैतन्य-जीवनान् ॥
१॥
श्री अद्वैत प्रभु के अनुयायी दो प्रकार के थे। कुछ तो असली थे और कुछ नकली। मैं नकली अनुयायियों का बहिष्कार करते हुए श्री अद्वैत आचार्य के असली अनुयायियों को सादर नमस्कार करता हूँ, जिनके जीवन और प्राण श्री चैतन्य महाप्रभु थे।
जय जय महाप्रभु श्री-कृष्ण-चैतन्य ।। जय जय नित्यानन्द जयाद्वैत धन्य ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! नित्यानन्द प्रभु की जय हो और जय हो श्री अद्वैत प्रभु की! ये सभी धन्य हैं।
श्री-चैतन्यामर-तरोद्वितीय-स्कन्ध-रूपिणः ।। श्रीमदद्वैत-चन्द्रस्य शाखा-रूपान्गणान्नुमः ॥
३॥
मैं श्री चैतन्य रूपी नित्य वृक्ष की द्वितीय शाखा सर्वयशस्वी अद्वैत प्रभु हो तथा उनकी उपशाखा रूपी उनके अनुयायियों को सादर नमस्कार रता हूँ।
वृक्षेर द्वितीय स्कन्ध–आचार्य-गोसाजि ।।ताँर व्रत शाखा हइल, तार लेखा नाजि ॥
४॥
श्री अद्वैत प्रभु उस वृक्ष की द्वितीय बड़ी शाखा थे। उस वृक्ष की अनेक उपशाखाएँ हैं, किन्तु उन सभी का उल्लेख कर सकना असम्भव है।
चैतन्य-मालीर कृपा-जलेर सेचने ।सेइ जले पुष्ट स्कन्ध बाड़े दिने दिने ॥
५॥
श्री चैतन्य महाप्रभु माली भी थे और ज्यों-ज्यों वे अपने कृपा-रूपी जल से इस वृक्ष को सींचते, त्यों-त्यों नित्यप्रति उसकी सारी शाखाएँ तथा उपशाखाएँ बढ़ती जातीं।
सेइ स्कन्धे व्रत प्रेम-फल उपजिल ।। सेइ कृष्ण-प्रेम-फले जगभरिल ॥
६ ॥
इस चैतन्य-रूपी वृक्ष की शाखाओं में जो भगवत्प्रेम रूपी फल लगे, वे इतने अधिक थे कि सारा संसार ही कृष्ण-प्रेम से आप्लावित हो उठा।
सेइ जल स्कन्धे करे शाखाते सञ्चार ।।फले-फुले बाड़े, शाखा हइल विस्तार ॥
७॥
ज्यों-ज्यों तना तथा शाखाएँ सींची गईं, त्यों-त्यों शाखाएँ तथा उपशाखाएँ बहुतायत से बढ़ती गईं और यह वृक्ष फलों तथा फूलों से लद गया।
प्रथमे त' एक-मत आचार गण ।पाछे दुइ-मत हैल दैवेर कारण ॥
८॥
प्रारम्भ में अद्वैत आचार्य के सारे अनुयायी एक ही मत को मानते थे, किन्तु बाद में वे संयोग से दो भिन्न-भिन्न मतों का अनुसरण करने लगे।
केह त' आचार्य आज्ञाय, केह त' स्वतन्त्र । स्व-मत कल्पना करे दैव-परतन्त्र ॥
९॥
कुछ शिष्यों ने आचार्य के आदेशों का दृढ़तापूर्वक पालन किया और कुछ अन्य दैवीमाया के वशीभूत होकर अपना स्वतंत्र मत गढ़ने के कारण डक गये।
आचार्गेर मत येइ, सेइ मत सार ।ताँर आज्ञा लङ्घि' चले, सेइ त' असार ॥
१० ॥
आध्यात्मिक जीवन में गुरु का आदेश ही जीवन्त सिद्धान्त है। जो कोई गुरु की आज्ञा का उल्लंघन करता है, वह तुरन्त व्यर्थ (असार) हो जाता है।
असारेर नामे इहाँ नाहि प्रयोजन । भेद जानिबारे करि एकत्र गणन ॥
११॥
जो असार हैं, उनका नाम लेना व्यर्थ है। मैंने उनको उल्लेख केवल उपयोगी भक्तों से अन्तर दिखलाने के लिए किया है।
धान्य-राशि मापे ग्रैछे पात्ना सहिते ।। पश्चाते पाला उड़ाञा संस्कार करते ॥
१२ ॥
पहले धान पुआल के साथ मिला रहता है और धान को पुआल से अलग करने के लिए उसे हवा देनी पड़ती है।
अच्युतानन्द-बड़ शाखा, आचार्य-नन्दन । आजन्म सेविला तेंहो चैतन्य-चरण ॥
१३॥
अद्वैत आचार्य की एक विशाल शाखा थे उनके पुत्र अच्युतानन्द। वे अपने जीवन के प्रारम्भ से ही चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों की सेवा में संलग्न रहे।
चैतन्य-गोसाजिर गुरु—केशव भारती ।एइ पितार वाक्य शुनि' दुःख पाइल अति ॥
१४॥
जब अच्युतानन्द ने अपने पिता से यह सुना कि केशव भारती चैतन्य महाप्रभु के गुरु थे, तो वे अत्यधिक अप्रसन्न हुए।
जगद्गुरुते तुमि कर ऐछे उपदेश ।तोमार एइ उपदेशे नष्ट हइल देश ॥
१५ ॥
उन्होंने अपने पिता से कहा, आपको यह उपदेश कि केशव भारती श्री चैतन्य महाप्रभु के गुरु हैं, सारे देश को बर्बाद कर देगा।
चौद्द भुवनेर गुरु-चैतन्य गोसाजि । तॉर गुरु—अन्य, एइ कोन शास्त्रे नाइ ॥
१६॥
श्री चैतन्य महाप्रभु तो चौदहों लोकों के गुरु हैं, किन्तु आप बतलाते कि उनका गुरु कोई अन्य है। इसकी पुष्टि किसी मान्य शास्त्र द्वारा नहीं ती।
पञ्चम वर्षेर बालक कहे सिद्धान्तेर सार । शुनिया पाइला आचार्य सन्तोष अपार ॥
१७॥
जब अद्वैत आचार्य ने अपने पाँच वर्ष के पुत्र अच्युतानन्द से यह वाक्य सुना, तो उन्हें परम सन्तोष हुआ, क्योंकि यह सिद्धान्त का सार था।
कृष्ण-मिश्र-नाम आर आचार्य-तनय । चैतन्य गोसाजि बैसे याँहार हृदय ॥
१८॥
कृष्ण मिश्र अद्वैत आचार्य के पुत्र थे। उनके हृदय में श्री चैतन्य प्रभु सदैव विराजमान रहते थे।
श्री-गोपाल-नामे आर आचार्गेर सुत ।।ताँहार चरित्र, शुन, अत्यन्त अद्भुत ॥
१९॥
श्री अद्वैत आचार्य प्रभु के अन्य पुत्र थे श्री गोपाल। अब उनकी विशेषताओं के बारे में सुनिये, क्योंकि वे सभी अत्यन्त अद्भुत हैं।
गुण्डिचा-मन्दिरे महाप्रभुर सम्मुखे ।।कीर्तने नर्तन करे बड़ प्रेम-सुखे ॥
२० ॥
जब भगवान् चैतन्य अपने हाथ से जगन्नाथ पुरी में गुण्डिचा मन्दिर की सफाई करते थे, तब गोपाल बड़े प्रेम और मुदित भाव से महाप्रभु के समक्ष नाचता था।
नाना-भावोद्गम देहे अद्भुत नर्तन ।दुइ गोसाजि‘हरि' बले, आनन्दित मन ॥
२१॥
जिस समय चैतन्य महाप्रभु तथा अद्वैत प्रभु हरे कृष्ण मन्त्र का कीर्तन करते तथा नाचते थे, तब उनके शरीरों में विविध भावातिरेक के लक्षण प्रकट होने लगते और उनके मन अत्यन्त प्रमुदित होते थे।
नाचिते नाचिते गोपाल हइल मूर्च्छित ।भूमेते पड़िल, देहे नाहिक संवित ॥
२२॥
जब वे सबै नाच रहे थे, तब गोपाल नाचते-नाचते मूर्च्छित हो गया और भूमि पर गिरकर अचेत हो गया।
दुःखित हइला आचार्य पुत्र कोले लञा ।रक्षा करे नृसिंहेर मन्त्र पड़िया ॥
२३॥
अद्वैत आचार्य प्रभु अत्यन्त दुःखी हुए। वे अपने पुत्र को अपनी गोद में उठाकर उसकी रक्षा के लिए नृसिंह-मन्त्र का उच्चारण करने लगे।
नाना मन्त्र पड़ेन आचार्य, ना हय चेतन ।।आचार्गेर दुःखे वैष्णव करेन क्रन्दन ॥
२४॥
अद्वैत आचार्य ने विविध मन्त्रों का उच्चारण किया, किन्तु गोपाल को होश नहीं आया। अतएव वहाँ पर उपस्थित सारे वैष्णव उनकी व्यथा से शोकातुर होकर रोने लगे।
तबे महाप्रभु, ताँर हृदे हस्त धरि' ।।‘उठह, गोपाल, कैल बल ‘हरि' ‘हरि' ॥
२५॥
तब चैतन्य महाप्रभु ने गोपाल की छाती पर अपना हाथ रखा और उससे कहा, “प्रिय गोपाल! उठो और भगवान् के पवित्र नाम का कीर्तन करो ! उठिल गोपाल प्रभुर स्पर्श-ध्वनि शुनि' ।।आनन्दित हा सबे करे हरि-ध्वनि ॥
२६॥
जब गोपाल ने महाप्रभु की आवाज सुनी और उनके स्पर्श का अनुभव किया, तो वह तुरन्त उठ पड़ा और सारे वैष्णव खुशी में हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन करने लगे।
आचार्मेर आर पुत्र-श्री-बलराम । आर पुत्र-----‘स्वरूप-शाखा, जगदीश' नाम ॥
२७॥
अद्वैत आचार्य के अन्य पुत्र श्री बलराम, स्वरूप तथा जगदीश थे।
नीलाचले तेहो एक पत्रिका लिखिया । प्रतापरुद्रेर पाश दिल पाठाइया ॥
२९॥
जब कमलाकान्त विश्वास जगन्नाथ पुरी में था, तो उसने किसी के थों एक चिट्ठी महाराज प्रतापरुद्र के पास भेजी।
‘कमलाकान्त विश्वास'-नाम आचार्घ-किङ्कर। आचार्य-व्यवहार सब-ताँहार गोचर ॥
२८॥
आचार्य अद्वैत का अत्यन्त विश्वासपात्र नौकर कमलाकान्त विश्वास अद्वैत आचार्य के सारे आचारों-व्यवहारों को जानता था।
सेइ पत्रीर कथा आचार्य नाहि जाने ।। कोन पाके सेइ पत्री आइल प्रभु-स्थाने ॥
३०॥
किसी को इस चिट्ठी के विषय में पता नहीं था, किन्तु यह चिट्ठी । किसी तरह श्री चैतन्य महाप्रभु के हाथ लग गई।
से पत्रीते लेखा आछे-एइ त' लिखन। ईश्वरत्वे आचार्येरे करियाछे स्थापन ॥
३१॥
इस चिट्ठी में यह प्रमाणित किया गया था कि अद्वैत आचार्य भगवान् के अवतार हैं।
किन्तु ताँर दैवे किछु हइयाछे ऋण ।। ऋण शोधिबारे चाहि तङ्का शत-तिन ॥
३२॥
किन्तु साथ ही यह भी उल्लेख था कि अद्वैत आचार्य के ऊपर हाल ही में तीन सौ रुपये का ऋण चढ़ गया है, कमलाकान्त विश्वास जिसको चुकाना चाहता है।
पत्र पड़िया प्रभुर मने हैल दुःख ।बाहिरे हासिया किछु बले चन्द्र-मुख ॥
३३॥
चैतन्य महाप्रभु यह चिट्ठी पढ़कर अत्यन्त दुःखी हुए, यद्यपि ऊपर से उनका मुख अब भी चन्द्रमा के समान चमक रहा था। इस प्रकार हँसते हुए महाप्रभु ने यह कहा।
आचाग्रेर स्थापियाछ करिया ईश्वर ।इथे दोष नाहि, आचार्य दैवत ईश्वर ॥
३४॥
। उसने अद्वैत आचार्य को भगवान् के अवतार के रूप में स्थापित कर दिया है। इसमें कोई दोष नहीं है, क्योंकि वे सचमुच साक्षात् भगवान् हैं।
ईश्वरेर दैन्य करि' करियाछे भिक्षा ।।अतएव दण्ड करि' कराइब शिक्षा ॥
३५॥
। किन्तु उसने भगवान् के अवतार को निर्धनता-ग्रस्त भिक्षुक बना दिया है, अतएव मैं उसकी इस भूल को सुधारने के लिए उसे पाठ पढ़ाऊँगा।
गोविन्देरे आज्ञा दिल,–इँहा आजि हैते ।। बाउलिया विश्वासे एथा ना दिबे आसिते ॥
३६॥
महाप्रभु ने गोविन्द को आज्ञा दी, आज से उस बाउलिया मलाकान्त विश्वास को यहाँ मत आने देना।
दण्ड शुनि' 'विश्वास' हइल परम दुःखित ।शुनिया प्रभुर दण्ड आचार्य हर्षित ॥
३७॥
जब कमलाकान्त विश्वास ने श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा दिये गये इस दण्ड के बारे में सुना, तो वह बहुत दुःखी हुआ, किन्तु जब अद्वैत प्रभु ने इसके बारे में सुना, तो वे अत्यन्त प्रसन्न हुए।
विश्वासेरे कहे,—तुमि बड़ भाग्यवान् ।तोमारे करिल दण्ड प्रभु भगवान् ॥
३८॥
कमलाकान्त विश्वास को अप्रसन्न देखकर अद्वैत आचार्य प्रभु ने उससे कहा, “तुम परम भाग्यशाली हो कि भगवान् चैतन्य महाप्रभु द्वारा दण्डित हुए हो।
पूर्व महाप्रभु मोरे करेन सम्मान ।। दुःख पाइ' मने आमि कैलँ अनुमान ॥
३९॥
। पहले तो चैतन्य महाप्रभु अपने वरिष्ठ की तरह मेरा आदर करते थे, । किन्तु मुझे ऐसा आदर पसन्द न था। अतएव मेरा मन दुखित होने के कारण मैंने एक योजना बनाई थी।
मुक्ति-श्रेष्ठ करि' कैनु वाशिष्ठ व्याख्यान ।क्रुद्ध हा प्रभु मोरे कैल अपमान ॥
४० ॥
मैंने मुक्ति को जीवन को चरम लक्ष्य मानने वाले ग्रंथ योगवाशिष्ठ की व्याख्या की, इसीलिए महाप्रभु मुझ पर क्रुद्ध हुए और उन्होंने मेरे प्रति दिखावटी असम्मान प्रदर्शित किया।
दण्ड पाला हैल मोर परम आनन्द ।।ये दण्ड पाइल भाग्यवान्श्री-मुकुन्द ॥
४१॥
चैतन्य महाप्रभु से प्रताड़ित होकर मैं परम प्रसन्न हुआ कि मुझे भी श्री मुकुन्द जैसा दण्ड प्राप्त हुआ है।
ये दण्ड पाइल श्री-शची भाग्यवती ।। से दण्ड प्रसाद अन्य लोक पाबे कति ॥
४२॥
। ऐसा ही दण्ड माता शचीदेवी को मिला था। भला ऐसा दण्ड पाने उनसे अधिक और कौन भाग्यवान हो सकेगा? एत कहि' आचार्य तौरै करिया आश्वास । आनन्दित हइया आइल महाप्रभु-पाश ॥
४३॥
इस प्रकार से कमलाकान्त को आश्वासन देने के बाद श्री अद्वैत आचार्य प्रभु श्री चैतन्य महाप्रभु का दर्शन करने गये।
प्रभुके कहेन तोमार ना बुझि ए लीला ।।आमा हैते प्रसाद-पात्र करिला कमला ॥
४४॥
। श्री अद्वैत आचार्य ने भगवान् चैतन्य से कहा, आपकी दिव्य लीलाएँ मेरी समझ में नहीं आ सकतीं। आप मुझ पर जितनी कृपा करते हैं, उससे अधिक कृपा आपने कमलाकान्त पर की है।
आमारेह कभु येइ ना हय प्रसाद ।तोमार चरणे आमि कि कैनु अपराध ॥
४५ ॥
। आपने कमलाकान्त पर जो कृपा की है, वह इतनी महान् है कि आपने मुझ पर कभी भी ऐसी कृपा नहीं की। भला मैंने आपके चरणकमलों पर कौन-सा ऐसा अपराध किया है कि आपने ऐसी कृपा मुझ पर नहीं दिखलाई? एत शुनि' महाप्रभु हासिते लागिला ।।बोलाइया कमलाकान्ते प्रसन्न हइला ॥
४६॥
यह सुनकर चैतन्य महाप्रभु हर्षित होकर हँसने लगे और तुरन्त ही उन्होंने कमलाकान्त विश्वास को बुलाया।
आचार्य कहे, इहाके केने दिले दरशन ।दुइ प्रकारेते करे मोरे विडम्बन ॥
४७॥
तब अद्वैत आचार्य ने चैतन्य महाप्रभु से कहा, आपने इस व्यक्ति को फिर से क्यों बुलाया और इसे अपने दर्शन की क्यों अनुमति दी है? इसने तो मुझे दो प्रकार से धोखा दिया है।
शुनिया प्रभुर मन प्रसन्न हइल ।।मुँहार अन्तर-कथा मुँहे से जानिल ॥
४८ ॥
जब चैतन्य महाप्रभु ने यह सुना, तो उनका मन प्रसन्न हो गया। केवल वे ही एक दूसरे के मन की बातें समझ सकते थे।
प्रभु कहे—बाउलिया, ऐछे काहे कर ।। आचार लज्जा-धर्म-हानि से आचर ॥
४९॥
श्री चैतन्य महाप्रभु ने कमलाकान्त को समझाया, “तुम तो बाउलिया हो, जिसको वस्तुओं की सही स्थिति के बारे में ज्ञान नहीं होता है। तुम इस तरह क्यों करते हो? तुम अद्वैत आचार्य की गोपनीयता को क्यों भंग करते हो तथा उनके धार्मिक सिद्धान्तों को क्षति पहुँचाते हो? प्रतिग्रह कभु ना करिबे राज-धन ।।विषयीर अन्न खाइले दुष्ट हय मन ॥
५०॥
मेरे गुरु अद्वैत आचार्य को धनी पुरुषों या राजाओं से दान कभी भी कार नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि कोई गुरु ऐसे भौतिकतावादियों जा धन या अन्न स्वीकार करता है, तो उसका मन दूषित हो जाता है।
मन दुष्ट हइले नहे कृष्णेर स्मरण ।। कृष्ण-स्मृति विनु हय निष्फल जीवन ॥
५१॥
जब मनुष्य का मन दूषित हो जाता है, तो कृष्ण का स्मरण करना अत्यन्त कठिन हो जाता है और जब कृष्ण के स्मरण में बाधा आती है, तो जीवन निष्फल हो जाता है।
लोक-लज्जा हय, धर्म-कीर्ति हय हानि ।।ऐछे कर्म ना करिह कभु इहा जानि' ॥
५२॥
इस तरह मनुष्य जनसाधारण की दृष्टि में अलोकप्रिय हो जाता है,क्योंकि इससे उसकी धार्मिकता तथा यश को हानि पहुँचती है। एक tणव को, विशेषकर जो गुरु का कार्य करता हो, कोई ऐसा कर्म नहीं करना चाहिए। उसे इस तथ्य के प्रति सदैव जागरूक रहना चाहिए।
एइ शिक्षा सबाकारे, सबे मने कैल। आचार्य-गोसान्नि मने आनन्द पाइल ॥
५३॥
जब चैतन्य महाप्रभु ने कमलाकान्त को यह शिक्षा दी, तो वहाँ पर उपस्थित सारे लोगों ने यही माना कि यह हर एक के लिए है। इस प्रकार अद्वैत आचार्य अत्यधिक प्रसन्न हुए।
आचार अभिप्राय प्रभु-मात्र बुझे । प्रभुर गम्भीर वाक्य आचार्य समुझे ॥
५४॥
केवल चैतन्य महाप्रभु ही अद्वैत आचार्य के मनोभाव समझ सके और अद्वैत आचार्य महाप्रभु के गम्भीर उपदेश को समझ सके।
एइ त' प्रस्तावे आछे बहुत विचार । ग्रन्थ-बाहुल्य-भये नारि लिखिबार ॥
५५ ॥
इस कथन में अनेक गुह्य विचार हैं। मैं उन सबको नहीं लिख रहा, क्योंकि इससे पुस्तक के व्यर्थ ही बढ़ जाने का भय है।
श्री-यदुनन्दनाचार्य–अद्वैतेर शाखा । ताँर शाखा-उपशाखार नाहि हय लेखा ॥
५६॥
। अद्वैत आचार्य की पाँचवीं शाखा श्री यदुनन्दन आचार्य थे, जिनसे इतनी शाखाएँ तथा उपशाखाएँ निकलीं कि उन सबको लिपिबद्ध करना सम्भव है।
वासुदेव दत्तेर तेंहो कृपार भाजन ।।सर्व-भावे आश्रियाछे चैतन्य-चरण ॥
५७॥
श्री यदुनन्दन आचार्य वासुदेव दत्त के शिष्य थे और उन्हें गुरु की पूरी कपा प्राप्त थी। अतएव उन्होंने सभी प्रकार से श्री चैतन्य महाप्रभु के चरणों को परम आश्रय के रूप में स्वीकार किया।
भागवताचार्य, आर विष्णुदासाचार्य ।।चक्रपाणि आचार्य, आर अनन्त आचार्य ॥
५८॥
भागवत आचार्य, विष्णुदास आचार्य, चक्रपाणि आचार्य तथा अनन्त । अद्वैत आचार्य की क्रमशः छठी, सातवीं, आठवीं तथा नवीं शाखाएँ थे।
नन्दिनी, आर कामदेव, चैतन्य-दास ।दुर्लभ विश्वास, आर वनमालि-दास ॥
५९॥
। : नन्दिनी, कामदेव, चैतन्य दास, दुर्लभ विश्वास तथा वनमाली दास श्री अद्वैत आचार्य की क्रमशः दसवीं, ग्यारहवीं, बारहवीं, तेरहवीं तथा चौदवी शाखाएँ थे।
जगन्नाथ कर, आर कर भवनाथ । हृदयानन्द सेन, आर दास भोलानाथ ॥
६० ॥
इसी तरह जगन्नाथ कर, भवनाथ कर, हृदयानन्द सेन तथा भोलानाथ पास अद्वैत आचार्य की क्रमशः पंद्रहवीं, सोलहवीं, सत्रहवीं तथा अठारहवीं शाखाएँ थे।
यादव-दास, विजय-दास, दास जनार्दन । अनन्त-दास, कानु-पण्डित, दास नारायण ॥
६१॥
यादव दास, विजय दास, जनार्दन दास, अनन्त दास, कानु पण्डित तथा नारायण दास क्रमशः उन्नीसवीं, बीसवीं, इक्कीसवीं, बाइसवीं, तेइसवीं और चौबीसवीं शाखाएँ थे।
श्रीवत्स पण्डित, ब्रह्मचारी हरिदास ।पुरुषोत्तम ब्रह्मचारी, आर कृष्णदास ॥
६२॥
श्रीवत्स पण्डित, हरिदास ब्रह्मचारी, पुरुषोत्तम ब्रह्मचारी तथा कृष्णदास अद्वैत आचार्य की क्रमशः पच्चीसवीं, छब्बीसवीं, सत्ताइसवीं तथा अठ्ठाइसवीं शाखाएँ थे।
पुरुषोत्तम पण्डित, आर रघुनाथ ।वनमाली कविचन्द्र, आर वैद्यनाथ ॥
६३ ॥
उसके आगे क्रमशः पुरुषोत्तम पण्डित, रघुनाथ, वनमाली कविचन्द्र तथा वैद्यनाथ अद्वैत आचार्य की उन्तीसवीं, तीसवीं, इकतीसवीं और बत्तीसवीं शाखाएँ थे।
लोकनाथ पण्डित, आर मुरारि पण्डित । श्री-हरिचरण, आर माधव पण्डित ॥
६४॥
लोकनाथ पण्डित, मुरारी पण्डित, श्री हरिचरण तथा माधव पण्डित अद्वैत आचार्य की क्रमशः तैंतीसवीं चौंतीसवीं, पैंतीसवीं और छत्तीसवीं पाएँ थे।
विजय पण्डित, आर पण्डित श्रीराम ।असङ्ख्य अद्वैत-शाखा कत लइब नाम ॥
६५॥
विजय पण्डित तथा श्रीराम पण्डित अद्वैत आचार्य की दो महत्त्वपूर्ण खाएँ थे। शाखाएँ तो असंख्य हैं, लेकिन मैं उन सबका नाम गिना पाने असमर्थ हूँ।
मालि-दत्त जल अद्वैत-स्कन्ध स्रोगाय ।सेइ जले जीये शाखा, फुल-फल पाय ॥
६६॥
अद्वैत आचार्य की शाखा को मूल माली श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा प्रदत्त जल प्राप्त हुआ। इस तरह उपशाखाओं का प्रतिपालन हुआ और उनमें प्रचुर फल-फूल लगे।
इहार मध्ये माली पाछे कोन शाखा-गण ।।ना माने चैतन्य-माली दुर्दैव कारण ॥
६७॥
चैतन्य महाप्रभु के तिरोधान के बाद दुर्भाग्यवश कुछ शाखाएँ महाप्रभु द्वारा दिखाए गये मार्ग से भटक गईं।
सृजाइल, जीयाइल, ताँरे ना मानिल। कृतघ्न होइला, ताँरे स्कन्ध क्रुद्ध हइल ॥
६८॥
। कुछ शाखाओं ने उस मूल तने को स्वीकार नहीं किया, जो सम्पूर्ण क्ष का जीवनदाता तथा पालनकर्ता था। इस प्रकार जब वे कृतघ्न बन गई, तो मूल तना उन पर क्रुद्ध हो गया।
क्रुद्ध हा स्कन्ध तारे जल ना सञ्चारे । जलाभावे कृश शाखा शुकाइया मरे ॥
६९॥
इस प्रकार चैतन्य महाप्रभु ने उन पर अपनी कृपा-रूपी जल नहीं छिड़का और धीरे-धीरे वे मुरझाकर मर गईं।
चैतन्य-रहित देह—शुष्ककाठे-सम । जीवितेइ मृत सेइ, मैले दण्डे ग्रम ॥
७०॥
कृष्णभावनाविहीन पुरुष शुष्क काठ या मृत शरीर से बढ़कर कुछ। नहीं है। वह जीवित होकर भी मृत माना जाता है और मरने के बाद उसे यमराज दण्डित करते हैं।
केवल ए गण-प्रति नहे एइ दण्ड ।चैतन्य-विमुख येइ सेइ त' पाषण्ड ॥
७१॥
। । न केवल अद्वैत आचार्य के दिग्भ्रमित वंशज, अपितु जो कोई भी श्री चैतन्य महाप्रभु सम्प्रदाय के विरुद्ध है, उसे नास्तिक मानना चाहिए और ह यमराज के दण्ड का पात्र है।
कि पण्डित, कि तपस्वी, किबा गृही, ग्रति ।चैतन्य-विमुख ग्रेइ, तार एइ गति ॥
७२॥
। चाहे कोई पण्डित हो, महान् तपस्वी हो अथवा सफल गृहस्थ हो या प्रसिद्ध संन्यासी ही क्यों न हो, किन्तु यदि वह चैतन्य महाप्रभु के सम्प्रदाय के विरुद्ध है, तो उसे यमराज द्वारा दिये जाने वाला कष्ट भोगना ही होगा।
ये ये लैल श्री-अच्युतानन्देर मत ।सेइ आचार्येर गण-महा-भागवत ॥
७३॥
अद्वैत आचार्य के जिन वंशजों ने श्री अच्युतानन्द के मार्ग को अपनाया, वे सबके सब महान् भक्त हुए।
सेइ सेइ,--आचार्गेर कृपार भाजन ।अनायासे पाइल सेइ चैतन्य-चरण ॥
७४॥
अद्वैत आचार्य की कृपा से जिन भक्तों ने चैतन्य महाप्रभु के मार्ग का दृढ़ता से पालन किया, उन्हें चैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों का आश्रय सहज ही प्राप्त हो गया।
अच्युतेर ग्रेइ मत, सेइ मत सार ।।और व्रत मत सब हैल छारखार ॥
७५ ॥
अतएव यह निष्कर्ष यह निकलता है कि अच्युतानन्द का मार्ग ही यात्मिक जीवन का सार है। जिन लोगों ने इस मार्ग का पालन नहीं किया, वे मात्र तितर-बितर होकर रह गये।
सेइ आचार्य-गणे मोर कोटि नमस्कार ।अच्युतानन्द-प्राय, चैतन्य जीवन याँहार ॥
७६ ॥
अतः मैं अच्युतानन्द के उन असली अनुगामियों को कोटि-कोटि नमस्कार करता हूँ, जिनके जीवनाधार श्री चैतन्य महाप्रभु थे।
एइ त कहिलाँ आचार्य-गोसाजिर गण ।।तिन स्कन्ध-शाखार कैल संक्षेप गणन ॥
७७॥
इस तरह मैंने संक्षेप में श्री अद्वैत आचार्य के वंशजों की तीन शाखाओं (अच्युतानन्द, कृष्ण मिश्र तथा गोपाल) का वर्णन किया है।
शाखा-उपशाखा, तार नाहिक गणन।किछु-मात्र कहि' करि दिग्दरशन ॥
७८॥
अद्वैत आचार्य की असंख्य शाखाएँ तथा उपशाखाएँ हैं। उन सबकी पूर्णरूपेण गणना कर पाना अत्यन्त कठिन है। मैंने तो पूरे तने तथा इसकी शाखाओं-उपशाखाओं की झाँकी मात्र प्रस्तुत की है।
श्री-गदाधर पण्डित शाखाते महोत्तम ।।ताँर उपशाखा किछु करि ग्रे गणन ॥
७९॥
अद्वैत आचार्य की शाखाओं तथा उपशाखाओं का वर्णन करने के बाद मैं अब श्री गदाधर पण्डित के कुछ वंशजों का वर्णन करने का प्रयास करूंगा, क्योंकि यह प्रधान शाखाओं में से एक है।
शाखा-श्रेष्ठ धुवानन्द, श्रीधर ब्रह्मचारी ।। भागवताचार्य, हरिदास ब्रह्मचारी ॥
८०॥
वा श्री गदाधर पण्डित की मुख्य शाखाएँ थीं (१) श्री धुवानन्द, १) श्रीधर ब्रह्मचारी, (३) हरिदास ब्रह्मचारी तथा (४) रघुनाथ गवताचार्य।
अनन्त आचार्य, कविदत्त, मिश्र-नयन ।गङ्गामन्त्री मामु ठाकुर, कण्ठाभरण ॥
८१॥
। पाँचवीं शाखा थे अनन्त आचार्य, छठी कविदत्त, सातवीं नयन मिश्र, आठवीं गंगामन्त्री, नवीं मामु ठाकुर तथा दसवीं शाखा कण्ठाभरण थे।
भूगर्भ गोसाजि, आर भागवत-दास ।।ग्रेइ दुइ आसि' कैल वृन्दावने वास ॥
८२ ॥
गदाधर गोस्वामी की ग्यारहवीं शाखा में भूगर्भ गोसांइ हुए और बारहवीं में भागवतदास। ये दोनों वृन्दावन चले गये और जीवनभर वहीं रहे।
वाणीनाथ ब्रह्मचारी—बड़ महाशय । वल्लभ-चैतन्य-दास—कृष्ण-प्रेममय ॥
८३॥
। तेरहवीं शाखा थे वाणीनाथ ब्रह्मचारी और चौदहवीं वल्लभ चैतन्य स। ये दोनों महापुरुष सदैव कष्ण-प्रेम से परित रहते थे।
श्रीनाथ चक्रवर्ती, आर उद्धव दास ।।जितामित्र, काष्ठकाटा-जगन्नाथ-दास ॥
८४॥
श्रीनाथ चक्रवर्ती पंद्रहवीं, उद्धव सोलहवीं, जितामित्र सत्रहवीं तथा जगन्नाथ दास अठारहवीं शाखाएँ थे।
श्री-हरि आचार्य, सादि-पुरिया गोपाल ।कृष्णदास ब्रह्मचारी, पुष्प-गोपाल ॥
८५ ॥
श्री हरि आचार्य उन्नीसवीं, सादिपुरिया गोपाल बीसवीं, कृष्णदास ब्रह्मचारी इक्कीसवीं तथा पुष्पगोपाल बाइसवीं शाखाएँ थे।
श्रीहर्ष, रघु-मिश्र, पण्डित लक्ष्मीनाथ ।बङ्गवाटी-चैतन्य-दास, श्री-रघुनाथ ॥
८६॥
श्रीहर्ष तेईसवीं शाखा थे, रघु मिश्र चौबीसवीं, लक्ष्मीनाथ पण्डित पीसवीं, बंगवाटी चैतन्य दास छब्बीसवीं तथा रघुनाथ सत्ताइसवीं खाएँ थे।
अमोघ पण्डित, हस्ति-गोपाल, चैतन्य-वल्लभ ।यदु गाङ्गुलि आर मङ्गल वैष्णव ॥
८७॥
अट्ठाइसवीं शाखा अमोघ पण्डित थे, उन्तीसवीं हस्तिगोपाल, तीसवीं चैतन्य वल्लभ, इकतीसवीं यदु गांगुली तथा मंगल वैष्णव बत्तीसवीं शाखा थे।
चक्रवर्ती शिवानन्द सदा व्रजवासी । महाशाखा-मध्ये तेहो सुदृढ़ विश्वासी ॥
८८॥
शिवानन्द चक्रवर्ती लैंतीसवीं शाखा थे। वे दृढ़ विश्वास के साथ सदा दावन में रहे और गदाधर पण्डित की एक महत्त्वपूर्ण शाखा माने जाते है।
एई त' सङ्क्षेपे कहिलाँ पण्डितेर गण ।ऐछे आर शाखा-उपशाखार गणन ॥
८९॥
इस तरह मैंने गदाधर पण्डित की शाखाओं तथा उपशाखाओं का संक्षेप में वर्णन किया है। तब भी ऐसी अनेक शाखाएँ हैं, जिनका उल्लेख मैंने यहाँ नहीं किया।
पण्डितेर गण सब,-भागवत धन्य। प्राण-वल्लभ-सबार श्रीकृष्ण-चैतन्य ॥
९०॥
गदाधर पण्डित के सारे अनुयायी महान् भक्त माने जाते हैं, क्योंकि श्री चैतन्य महाप्रभु इन सबके प्राणप्रिय थे।
एइ तिन स्कन्धेर कैलँ शाखारे गणन ।याँ-सबा-स्मरणे भव-बन्ध-विमोचन ॥
९१॥
। मैंने जिन तीन तनों (नित्यानन्द, अद्वैत तथा गदाधर) की शाखाओं तथा उपशाखाओं का वर्णन किया है, उनके नामों का स्मरण करने मात्र ही मनुष्य भवबन्धन से छूट जाता है।
याँ-सबा-स्मरणे पाइ चैतन्य-चरण ।याँ-सबा-स्मरणे हये वाञ्छित पूरण ॥
९२॥
इन सारे वैष्णवों के नामों का स्मरण करने मात्र से ही मनुष्य श्री पैतन्य महाप्रभु के चरणकमलों तक पहुँच सकता है। निस्सन्देह, उनके पवित्र नामों के स्मरण मात्र से सारी इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं।
अतएव ताँ-सबार वन्दिये चरण ।चैतन्य-मालीर कहि लीला-अनुक्रम ॥
९३ ॥
अतएव उन सबके चरणकमलों को सादर नमस्कार करते हुए अब मैं माली-रूप श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का क्रमवार वर्णन करूंगा।
गौर-लीलामृत-सिन्धु–अपार अगाध ।। के करिते पारे ताहाँ अवगाह-साध ॥
९४॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं का समुद्र अपार तथा अगाध है। भला ऐसे विशाल समुद्र को मापने का साहस कौन कर सकता है? ताहार माधुर्य-गन्धे लुब्ध हय मन ।। अतएव तटे रहि' चाकि एक कण ॥
९५॥
उस विशाल समुद्र में डुबकी लगाना सम्भव नहीं है, किन्तु उसकी माधुर्य गन्ध मेरे मन को आकृष्ट करती है। अतएव मैं उस समुद्र के तट पर केवल एक बूंद चखने के लिए खड़ा हूँ।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।। चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
९६॥
भी रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की वन्दना करते हुए तथा देव उनकी कृपा की आकांक्षा करते हुए मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों का अनुसरण करते हुए श्रीचैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
