अध्याय ग्यारह: भगवान नित्यानंद का विस्तार
नित्यानन्द-पदाम्भोज-भृङ्गान्प्रेम-मधून्मदान् । नत्वाखिलान्तेषु मुख्या लिख्यन्ते कतिचिन्मया ॥
१ ॥
मैं श्री नित्यानन्द प्रभु के उन समस्त भक्तों को नमस्कार करता हूँ, जो उनके चरणकमलों के मधु को संचय करने वाले भौरों के समान हैं। नमस्कार करने के बाद उनमें से जो जो अत्यधिक प्रमुख हैं, उनका वर्णन करने का प्रयास करूंगा।
जय जय महाप्रभु श्री-कृष्ण-चैतन्य ।ताँहार चरणाश्रित येइ, सेइ धन्य ॥
२॥
श्री चैतन्य महाप्रभु की जय हो! जिस किसी ने उनके चरणों की शरण ले ली है, वह धन्य है।
जय जय श्री-अद्वैत, जय नित्यानन्द ।।जय जय महाप्रभुर सर्व-भक्त-वृन्द ॥
३॥
श्री अद्वैत प्रभु, नित्यानन्द प्रभु तथा श्री चैतन्य महाप्रभु के समस्त भक्तों की जय हो! तस्य श्री-कृष्ण-चैतन्य-सत्प्रेमामर-शाखिनः ।ऊर्ध्व-स्कन्धावधूतेन्दोः शाखा-रूपान्गणान्नुमः ॥
४॥
श्री नित्यानन्द प्रभु श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु के भगवत्प्रेम रूपी अमरवृक्ष की सबसे ऊपरी शाखा हैं। मैं उस सबसे ऊपरी शाखा की समस्त उपशाखाओं को सादर नमस्कार करता हूँ।
श्री-नित्यानन्द-वृक्षेर स्कन्ध गुरुतर ।। ताहाते जन्मिल शाखा-प्रशाखा विस्तर ॥
५॥
श्री नित्यानन्द प्रभु श्री चैतन्य-वृक्ष की सर्वाधिक भारी शाखा हैं। उस शाखा से अनेक शाखाएँ तथा उपशाखाएँ निकलती हैं।
मालाकारेर इच्छा जले बाड़े शाखा-गण ।प्रेम-फुल-फले भरि' छाइल भुवन ॥
६॥
। श्री चैतन्य महाप्रभु के इच्छा-जल से सिंचित होकर ये सारी शाखाएँ तथा उपशाखाएँ असीम रूप से बढ़ गई हैं, और अपने फलों और फूलों से उन्होंने समस्त विश्व को आच्छादित कर लिया है।
असङ्ख्य अनन्त गण के करु गणने । आपना शोधिते कहि मुख्य मुख्य जन ॥
७॥
भक्तों की ये शाखाएँ तथा उपशाखाएँ अगणनीय तथा असीम हैं। इनकी गिनती कौन कर सकता है? मैं अपनी निजी शुद्धि के लिए उनमें से जो सर्वाधिक प्रमुख हैं, उन्हीं की गिनती करने का प्रयास करूंगा।
श्री वीरभद्र गोसाजि-स्कन्ध-महाशाखा ।। ताँर उपशाखो यत, असङ्ख्य तार लेखा ॥
८॥
नित्यानन्द प्रभु के बाद सबसे बड़ी शाखा वीरभद्र गोसांई हैं, जिनकी भी अनेक शाखाएँ तथा उपशाखाएँ हैं। उन सबका वर्णन कर पाना सम्भव नहीं है।
ईश्वर हइयो कहाय महा-भागवत ।। वेद-धर्मातीत हा वेद-धर्मे रत ॥
९॥
यद्यपि वीरभद्र गोसांई पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् थे, किन्तु उन्होंने अपने आपको महान् भक्त के रूप में प्रस्तुत किया। यद्यपि भगवान् सारे वैदिक आदेशों से परे होते हैं, किन्तु वे वैदिक अनुष्ठानों का दृढ़तापूर्वक पालन करते थे।
अन्तरे ईश्वर-चेष्टा, बाहिरे निर्दम्भ ।चैतन्य-भक्ति-मण्डपे तेंहो मूल-स्तम्भ ॥
१०॥
वे श्री चैतन्य महाप्रभु द्वारा निर्मित भक्ति रूपी भवन के मुख्य स्तम्भ हैं। वे अपने अंत:करण से जानते थे कि वे भगवान् विष्णु के रूप में कार्य करते थे, किन्तु बाहर से वे गर्वरहित थे।
अद्यापि याँहार कृपा-महिमा हइते ।।चैतन्य-नित्यानन्द गाय सकल जगते ॥
११॥
श्री वीरभद्र गोसांई की महिमामयी कृपा से अब सारे विश्व के लोगों को चैतन्य तथा नित्यानन्द के नामों का कीर्तन करने का अवसर प्राप्त हुआ। सेई वीरभद्र-गोसाजिर लइनु शरण ।।याँहार प्रसादे हय अभीष्ट-पूरण ॥
१२॥
। अतएव मैं वीरभद्र गोसांई के चरणकमलों की शरण ग्रहण करता हूँ, जिससे श्रीचैतन्य-चरितामृत लिखने की मेरी बड़ी अभिलाषा का सही ढंग से मार्गदर्शन हो सके।
श्री रामदास आर, गदाधर दास ।चैतन्य गोसाजिर भक्त रहे ताँर पाश ॥
१३॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के दो भक्त श्री रामदास तथा गदाधर दास सदैव श्री वीरभद्र गोसांई के साथ रहते थे।
नित्यानन्दे आज्ञा दिल ग्रबे गौड़े माइते । महाप्रभु एइ दुइ दिला ताँर साथे ॥
१४॥
अतएव दुइ-गणे मुँहार गणन।।माधव-वासुदेव घोषेरओ एइ विवरण ॥
१५ ॥
जब नित्यानन्द प्रभु को बंगाल जाकर प्रचार करने का आदेश दिया गया, तब इन दोनों भक्तों ( श्री रामदास तथा गदाधर दास ) को उनके साथ जाने का आदेश मिला था। इसलिए कभी इन्हें श्री चैतन्य महाप्रभु के और कभी नित्यानन्द प्रभु के भक्तों के रूप में गिना जाता है। इसी प्रकार माधव घोष तथा वासुदेव घोष भी भक्तों के दोनों समूहों से साथसाथ सम्बन्धित थे।
रामदास मुख्य-शाखा, सख्य-प्रेम-राशि ।।घोलसाङ्गेर काष्ठ ग्रेई तुलि' कैल वंशी ॥
१६॥
शाखाओं में एक मुख्य शाखा, राम दास भगवान् के सख्य प्रेम से । परिपूर्ण थे। उन्होंने सोलह गाँठों वाली लकड़ी की एक बाँसुरी बनाई थी।
गदाधर दास गोपीभावे पूर्णानन्द ।।ग्राँर घरे दानकेलि कैल नित्यानन्द ॥
१७॥
श्रील गदाधर दास सदैव गोपी-भाव में मग्न रहते थे। इनके घर में भगवान् नित्यानन्द ने दानकेलि नाटक का अभिनय किया था।
श्री-माधव घोष-मुख्य कीर्तनीया-गणे ।।नित्यानन्द-प्रभु नृत्य करे याँर गाने ॥
१८॥
श्री माधव घोष मुख्य कीर्तनिया थे। जब वे गाते थे, तब नित्यानन्द प्रभु नृत्य करते थे।
वासुदेव गीते करे प्रभुर वर्णने ।काष्ठ-पाषाण द्रवे ग्राहार श्रवणे ॥
१९॥
जब वासुदेव घोष कीर्तन करते हुए चैतन्य महाप्रभु तथा नित्यानन्द प्रभु का वर्णन करते, तो उसे सुनकर तो लकड़ी तथा पत्थर भी पिघल जाते।
मुरारि-चैतन्य-दासेर अलौकिक लीला ।।व्याघ्र-गाले चड़ मारे, सर्प-सने खेला ॥
२०॥
श्री चैतन्य महाप्रभु के महान् भक्त मुरारि अनेक अलौकिक कार्य करते रहते थे। कभी वे भावातिरेक में बाघ के मुंह पर चपत लगाते थे और कभी विषैले सर्प से खेलते थे।
नित्यानन्देर गण व्रत- सब व्रज-सखा ।।शृङ्ग-वेत्र-गोपवेश, शिरे शिखि-पाखा ॥
२१॥
। नित्यानन्द प्रभु के सारे पार्षद पहले व्रजभूमि के ग्वालबाल थे। उनके हाथों में श्रृंग तथा छड़ी, उनकी ग्वालों की वेशभूषा तथा उनके सिरों पर र पंख उनके प्रतीक थे।
रघुनाथ वैद्य उपाध्याय महाशय ।याँहार दर्शने कृष्ण-प्रेम-भक्ति हय ॥
२२॥
रघुनाथ वैद्य का एक अन्य नाम उपाध्याय भी था। वे इतने बड़े भक्त थे कि उनके दर्शन-मात्र से मनुष्य का सुप्त भगवत्प्रेम जाग्रत हो उठता था।
सुन्दरानन्द–नित्यानन्देर शाखा, भृत्य मर्म ।याँर सङ्गे नित्यानन्द करे व्रज-नर्म ॥
२३॥
श्री नित्यानन्द प्रभु की अन्य शाखा, सुन्दरानन्द उनके घनिष्ठ दास थे। उनके संग में नित्यानन्द प्रभु को व्रजभूमि के जीवन की अनुभूति होती थी।
कमलाकर पिप्पलाइ–अलौकिक रीत ।। अलौकिक प्रेम ताँर भुवने विदित ॥
२४॥
कहा जाता है कि कमलाकर पिप्पलाइ तीसरे गोपाल थे। उनका व्यवहार तथा उनका भगवत्प्रेम अलौकिक था। अतः वे विश्वविदित हैं।
सूर्यदास सरखेल, ताँर भाइ कृष्णदास । नित्यानन्दे दृढ़ विश्वास, प्रेमेर निवास ॥
२५॥
सूर्यदास सरखेल तथा उनके छोटे भाई कृष्णदास सरखेल को नित्यानन्द प्रभु में दृढ़ विश्वास था। वे दोनों भगवत्प्रेम के आगार थे।
गौरीदास पण्डित ग्राँर प्रेमोद्दण्ड-भक्ति ।कृष्ण-प्रेमा दिते, निते, धरे महाशक्ति ॥
२६॥
भगवत्प्रेम में सर्वोच्च भक्ति के प्रतीक गौरीदास पण्डित में ऐसा प्रेम प्राप्त करने और उसे प्रदान करने की महान् शक्ति थी।
नित्यानन्दे समर्पिल जाति-कुल-पाँति ।। श्री-चैतन्य-नित्यानन्दे करि प्राणपति ॥
२७॥
भगवान् श्री चैतन्य तथा भगवान् नित्यानन्द को अपने जीवन के स्वामी बनाकर गौरीदास पण्डित ने भगवान् नित्यानन्द की सेवा के लिए सब कुछ अर्पित कर दिया, यहाँ तक कि अपने परिवार की सदस्यता भी।
नित्यानन्द प्रभुर प्रिय–पण्डित पुरन्दर ।प्रेमार्णव-मध्ये फिरे ग्रैछन मन्दर ॥
२८॥
। श्री नित्यानन्द प्रभु के तेरहवें मुख्य भक्त पण्डित पुरन्दर थे। वे भगवत्प्रेम के सागर में इस तरह चलते थे मानो मन्दर पर्वत हों।
परमेश्वर-दास–नित्यानन्दैक-शरण ।कृष्ण-भक्ति पाय, ताँरे ये करे स्मरण ॥
२९॥
परमेश्वर दास, जो कृष्णलीला के पाँचवे गोपाल कहे जाते हैं, वे नित्यानन्द प्रभु के चरणकमलों में पूरी तरह से समर्पित थे। जो कोई उनके इस नाम परमेश्वर दास को स्मरण करेगा, उसे सरलता से कृष्ण-प्रेम प्राप्त हो जायेगा।
जगदीश पण्डित हय जगत्पावन । कृष्ण-प्रेमामृत वर्षे, ग्रेन वर्षा घन ॥
३०॥
। नित्यानन्द के अनुयायियों की पन्द्रहवीं शाखा, जगदीश पण्डित म्पूर्ण जगत् के उद्धारक थे। उनसे कृष्ण-प्रेम भक्ति की बौछार ऐसी ती थी, मानों बरसात की झड़ी लगी हो।
नित्यानन्द-प्रियभृत्य पण्डित धनञ्जय ।अत्यन्त विरक्त, सदा कृष्ण-प्रेममय ॥
३१॥
नित्यानन्द प्रभु के सोलहवें प्रिय सेवक धनंजय पण्डित थे। वे अत्यधिक विरक्त थे और सदैव कृष्ण-प्रेम में निमग्न रहते थे।
महेश पण्डित-व्रजेर उदार गोपाल ।ढक्का-वाद्ये नृत्य करे प्रेमे मातोयाल ॥
३२॥
महेश पण्डित बारह गोपालों में सातवें गोपाल थे। ये अत्यन्त उदार थे। ये ढक्का (नगाड़ा) बजने पर कृष्ण-प्रेम में उन्मत्त होकर नाचा करते थे।
नवद्वीपे पुरुषोत्तम पण्डित महाशय ।। नित्यानन्द-नामे ग्राँर महोन्माद हय ॥
३३॥
नवद्वीप निवासी पुरुषोत्तम पण्डित आठवें गोपाल थे। वे नित्यानन्द महाप्रभु का पवित्र नाम सुनते ही उन्मत्त से हो उठते थे।
बलराम दास—कृष्ण-प्रेम-रसास्वादी । नित्यानन्द-नामे हय परम उन्मादी ॥
३४॥
बलराम दास कृष्ण-प्रेम रूपी अमृत का सदैव आस्वादन करते थे। भी नित्यानन्द प्रभु का नाम सुनते ही अत्यधिक उन्मत्त हो जाते थे।
महा-भागवत यदुनाथ कविचन्द्र ।झाँहार हृदये नृत्य करे नित्यानन्द ॥
३५ ।। । । यदुनाथ कविचन्द्र महान् भक्त थे। उनके हृदय में श्री नित्यानन्द प्रभु तत नृत्य करते थे।
राढ़े याँर जन्म कृष्णदास द्विजवर ।श्री-नित्यानन्देर तेहो परम किङ्कर ॥
३६॥
बंगाल में श्री नित्यानन्द के इक्कीसवें भक्त कृष्णदास ब्राह्मण थे, जो नित्यानन्द प्रभु के उच्च श्रेणी के सेवक थे।
काला-कृष्णदास बड़ वैष्णव-प्रधान । नित्यानन्द-चन्द्र विनु नहि जाने आन ॥
३७॥
नित्यानन्द प्रभु के बाइसवें भक्त काला कृष्णदास थे, जो नवें गोपाल थे। वे प्रथम श्रेणी के वैष्णव थे और नित्यानन्द प्रभु के अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं जानते थे।
श्री-सदाशिव कविराज–बड़ महाशय । श्री-पुरुषोत्तम-दास–ताँहार तनय ॥
३८॥
श्री नित्यानन्द प्रभु के तेइसवें और चौबीसवें भक्त सदाशिव कविराज तथा उनके पुत्र पुरुषोत्तमदास थे, जो दसवें गोपाल थे।
आजन्म निमग्न नित्यानन्देर चरणे ।निरन्तर बाल्य-लीला करे कृष्ण-सने ॥
३९॥
जन्म से ही पुरुषोत्तम दास नित्यानन्द प्रभु के चरणकमलों की सेवा में निमग्न रहते थे और सदैव कृष्ण के साथ बच्चों जैसे खेल में लगे रहते थे।
ताँर पुत्र—महाशय श्री-कानु ठाकुर । याँर देहे रहे कृष्ण-प्रेमामृत-पूर ॥
४०॥
अत्यन्त सम्माननीय व्यक्ति श्री कानु ठाकुर पुरुषोत्तम दास ठाकुर के पुत्र थे। वे इतने बड़े भक्त थे कि भगवान् कृष्ण सदैव उनके शरीर में वास करते थे।
महा-भागवत-श्रेष्ठ दत्त उद्धारण । सर्व-भावे सेवे नित्यानन्देर चरण ॥
४१॥
बारह गोपालों में से ग्यारहवें गोपाल उद्धारण दत्त ठाकुर श्री नित्यानन्द प्रभु के उन्नत भक्त थे। वे नित्यानन्द प्रभु के चरणकमलों की सभी प्रकार से सेवा करते थे।
आचार्य वैष्णवानन्द भक्ति-अधिकारी ।पूर्वे नाम छिल ग्राँर रघुनाथ पुरी' ॥
४२॥
नित्यानन्द प्रभु के सत्ताइसवें प्रमुख भक्त आचार्य वैष्णवानन्द थे, जो भक्तिमयी सेवा में एक महान् अधिकारी थे। वे पहले रघुनाथ पुरी नाम से प्रसिद्ध थे।
विष्णुदास, नन्दन, गङ्गादास–तिन भाइ ।पूर्वे याँर घरे छिला ठाकुर निताई ॥
४३॥
नित्यानन्द प्रभु के एक अन्य महत्त्वपूर्ण भक्त विष्णुदास थे, जिनके दो भाई थे-नन्दन तथा गंगादास। कभी-कभी नित्यानन्द प्रभु इनके घर में ठहरते थे।
नित्यानन्द-भृत्य--परमानन्द उपाध्याय ।।श्री-जीव पण्डित नित्यानन्द-गुण गाय ॥
४४॥
परमानन्द उपाध्याय नित्यानन्द प्रभु के महान् सेवक थे और श्री जीव पण्डित नित्यानन्द प्रभु के गुणों का बखान करते थे।
परमानन्द गुप्त—कृष्ण-भक्त महामती ।पूर्वे याँर घरे नित्यानन्देर वसति ॥
४५ ॥
नित्यानन्द प्रभु के इकतीसवें भक्त श्री परमानन्द गुप्त थे, जो कृष्णभक्त थे और आध्यात्मिक चेतना में अग्रणी थे। नित्यानन्द प्रभु पहले उनके घर कुछ काल तक रह चुके थे।
नारायण, कृष्णदास आर मनोहर ।देवानन्द–चारि भाइ निताइ-किङ्कर ॥
४६॥
नारायण, कृष्णदास, मनोहर तथा देवानन्द-ये चारों भाई सदैव नित्यानन्द प्रभु की सेवा में लगे रहने वाले बत्तीसवें, तैंतीसवें, चौंतीसवें और पैंतीसवें प्रभुख भक्त थे।
होड़ कृष्णदास–नित्यानन्द-प्रभु-प्राण ।नित्यानन्द-पद विनु नाहि जाने आन ॥
४७॥
भगवान् नित्यानन्द के छत्तीसवें भक्त होड़ कृष्णदास थे, जिनके लिए नित्यानन्द प्रभु जीवन और प्राण थे। वे सदैव श्री नित्यानन्द के चरणकमलों पर समर्पित रहते थे और उनके अतिरिक्त वे अन्य किसी को नहीं जानते थे।
नकड़ि, मुकुन्द, सूर्य, माधव, श्रीधर । रामानन्द वसु, जगन्नाथ, महीधर ॥
४८॥
। नित्यानन्द प्रभु के भक्तों में नकड़ि सैंतीसवें, मुकुन्द अड़तीसवें, सूर्य उन्तालीसवें, माधव चालीसवें, श्रीधर इकतालीसवें, रामानन्द बयालीसवें, जगन्नाथ तैंतालीसवें तथा महीधर चवालीसवें क्रम पर थे।
श्रीमन्त, गोकुल-दास हरिहरानन्द ।।शिवाइ, नन्दाइ, अवधूत परमानन्द ॥
४९॥
श्रीमन्त पैंतालीसवें, गोकुलदास छियालीसवें, हरिहरानन्द सैंतालीसवें, शिवाई अड़तालीसवें, नन्दाइ उनचासवें तथा परमानन्द पचासवें भक्त थे।
वसन्त, नवनी होड़, गोपाल, सनातन ।।विष्णाइ हाजरा, कृष्णानन्द, सुलोचन ॥
५०॥
। वसन्त इक्यावनवे, नवनी होड़ बावनवें, गोपाल तिरपनवें, सनातन चौवनवे, विष्णाइ पचपनवे, कृष्णानन्द छप्पनवें एवं सुलोचन सत्तावनवें भक्त थे।
कंसारि सेन, रामसेन, रामचन्द्र कविराज ।गोविन्द, श्रीरङ्ग, मुकुन्द, तिन कविराज ॥
५१॥
श्री नित्यानन्द के अठ्ठावनवे महान् भक्त कंसारि सेन, उनसठवें रामसेन, साठवें रामचन्द्र कविराज तथा इकसठवें, बासठवें एवं तिरसठवें भक्त गोविन्द, श्रीरंग तथा मुकुन्द सभी वैद्य थे।
पीताम्बर, माधवाचार्य, दास दामोदर ।शङ्कर, मुकुन्द, ज्ञान-दास, मनोहर ॥
५२॥
नित्यानन्द प्रभु के भक्तों में पीताम्बर चौसठवें, माधवाचार्य पैंसठवें, दामोदर दास छियासठवें, शंकर सतसठवें, मुकुन्द अड़सठवें, ज्ञानदास उनहत्तरवें तथा मनोहर सत्तरवें भक्त थे।
नर्तक गोपाल, रामभद्र, गौराङ्ग-दास ।नृसिंह-चैतन्य, मीनकेतन रामदास ॥
५३॥
नर्तक गोपाल इकहत्तरवें, रामभद्र बहत्तरवें, गौरांग दास तिहत्तरवें, नृसिंह चैतन्य चौहत्तरखें तथा मीनकेतन रामदास पचहत्तरवें भक्त थे।
वृन्दावन-दास नारायणीर नन्दन ।‘चैतन्य-मङ्गल' ग्रेहो करिल रचन ॥
५४॥
श्रीमती नारायणी के पुत्र वृन्दावन दास ठाकुर ने श्री चैतन्य मंगल (जो बाद में श्री चैतन्य भागवत नाम से प्रसिद्ध हुआ) की रचना की।
भागवते कृष्ण-लीला वर्णिला वेदव्यास ।चैतन्य-लीलाते व्यास वृन्दावन दास ॥
५५॥
श्रील वेदव्यास ने श्रीमद्भागवत में कृष्ण-लीलाओं का वर्णन किया और श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं के व्यास हुए वृन्दावन दास।
सर्वशाखा-श्रेष्ठ वीरभद्र गोसाजि।।ताँर उपशाखा व्रत, तार अन्त नाइ ॥
५६॥
नित्यानन्द प्रभु की समस्त शाखाओं में वीरभद्र गोसांई सर्वोपरि थे। उनकी उपशाखाएँ अनन्त थीं।
अनन्त नित्यानन्द-गण–के करु गणन ।।आत्म-पवित्रता-हेतु लिखिलाँ कत जन ॥
५७॥
श्री नित्यानन्द प्रभु के असंख्य अनुयायियों की कोई गिनती नहीं कर सकता। मैंने तो केवल आत्म शुद्धि के लिए उनमें से कुछ का ही उल्लेख किया है।
एई सर्व-शाखा पूर्ण–पक्व प्रेम-फले ।।ग्रारे देखे, तारे दिया भासाइल सकले ॥
५८॥
श्री नित्यानन्द प्रभु के भक्तों की ये सारी शाखाएँ कृष्ण-प्रेम के पके फलों से परिपूर्ण थीं और उनसे जो भी मिला, उन सबको ये फल बाँट दिये और उन्हें कृष्ण-प्रेम से आप्लावित कर दिया।
अनर्गल प्रेम सबार, चेष्टा अनर्गल ।प्रेम दिते, कृष्ण दिते धरे महाबल ॥
५९॥
इन सारे भक्तों में अबाध, अनन्त कृष्ण-प्रेम प्रदान करने की असीम शक्ति थी। वे अपनी शक्ति से किसी को भी कृष्ण तथा कृष्ण-प्रेम प्रदान कर सकते थे।
सङ्क्षेपे कहिलाँ एइ नित्यानन्द-गण ।। झाँहार अवधि ना पाय ‘सहस्र-वदन' ॥
६०॥
। मैंने श्री नित्यानन्द प्रभु के अनुयायियों और भक्तों में से कुछ का ही संक्षेप में वर्णन किया है। एक हजार मुखों वाले शेषनाग भी इन सभी असंख्य भक्तों का वर्णन नहीं कर सकते।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश । चैतन्य चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
६१॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के उद्देश्य की पूर्ति की प्रबल इच्छा से मैं कृष्णदास उनके चरणचिह्नों पर चलते हुए श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
