आदि लीला: अध्याय एक: आध्यात्मिक गुरु
वन्दे गुरूनीश-भक्तानीशमीशावतारकान् ।।तत्प्रकाशांश्च तच्छक्तीः कृष्ण-चैतन्य-संज्ञकम् ॥
१॥
मैं समस्त गुरुओं, भगवद्भक्तों, भगवान् के अवतारों, उनके पूर्ण अंशों, उनकी शक्तियों तथा स्वयं आदि भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य को सादर नमस्कार करता हूँ।
वन्दे श्री-कृष्ण-चैतन्य-नित्यानन्दौ सहोदितौ ।।गौड़ोदये पुष्पवन्तौ चित्रौ शन्दौ तमो-नुदौ ॥
२॥
। मैं सूर्य तथा चन्द्रमा के समान श्रीकृष्ण चैतन्य तथा भगवान् नित्यानन्द दोनों को सादर नमस्कार करता हूँ। वे गौड़ के क्षितिज पर अज्ञान के अन्धकार को दूर करने तथा आश्चर्यजनक रूप से सबको आशीर्वाद प्रदान करने के लिए एकसाथ उदय हुए हैं।
ग्रदद्वैतं ब्रह्मोपनिषदि तदप्यस्य तनु-भा ।ग्र आत्मान्तर्यामी पुरुष इति सोऽस्यांश-विभवः ।। षडू-ऐश्वर्यैः पूर्णो ये इह भगवान्स स्वयमयंन चैतन्याकृष्णाजगति पर-तत्त्वं परमिह ॥
३॥
जिसे उपनिषदों में निर्विशेष ब्रह्म कहा गया है, वह उनके शरीर का तेजमात्र है और जो भगवान् अन्तर्यामी परमात्मा के रूप में जाने जाते हैं, वे उनके अंशमात्र हैं। भगवान् चैतन्य छहों ऐश्वर्यों से युक्त स्वयं भगवान् कृष्ण हैं। वे परम सत्य हैं और कोई भी अन्य सत्य न तो उनसे बड़ा है, न उनके तुल्य है।
अनर्पित-चरी चिरात्करुणयावतीर्णः कलौसमर्पयितुमुन्नतोज्वल-रसां स्व-भक्ति-श्रियम् । हरिः पुरट-सुन्दर-द्युति-कदम्ब-सन्दीपितःसदा हृदय-कन्दरे स्फुरतु वः शची-नन्दनः ॥
४॥
। श्रीमती शचीदेवी के पुत्र के नाम से विख्यात वे महाप्रभु आपके हृदय की गहराई में दिव्य रूप से विराजमान हों। पिघले सोने की आभा से दीप्त, वे कलियुग में अपनी अहैतुकी कृपा से अपनी सेवा के अत्यन्त उत्कृष्ट तथा दीप्त आध्यात्मिक रस के ज्ञान को, जिसे इसके पूर्व अन्य किसी अवतार ने प्रदान नहीं किया था, प्रदान करने के लिए अवतीर्ण हुए। हैं।
राधा कृष्ण-प्रणय-विकृतिह्णदिनी शक्तिरस्माद् एकात्मानावपि भुवि पुरा देह-भेदं गतौ तौ ।। चैतन्याख्यं प्रकटमधुना तद्द्वयं चैक्यमाप्तं राधा-भाव-द्युति-सुवलितं नौमि कृष्ण-स्वरूपम् ॥
५॥
श्री राधा तथा कृष्ण की माधुर्य लीलाएँ भगवान् की अन्तरंगा ह्लादिनी शक्ति की दिव्य अभिव्यक्तियाँ हैं। यद्यपि राधा तथा कृष्ण अभिन्न हैं, किन्तु उन्होंने अपने आपको अनादि काल से पृथक् कर रखा है। अब ये दोनों दिव्य स्वरूप पुनः श्रीकृष्ण चैतन्य के रूप में मिलकर एक हो गये हैं। मैं उनको नमस्कार करता हूँ, जो साक्षात् कृष्ण होते हुए भी श्रीमती राधारानी के भाव तथा अंगकान्ति के साथ प्रकट हुए हैं।
श्री-राधायाः प्रणय-महिमा कीदृशो वानयैवास्वाद्यो ग्रेनाद्भुत-मधुरिमा कीदृशो वा मदीयः । सौख्यं चास्या मदनुभवतः कीदृशं वेति लोभात्।तद्भावाढूयः समजनि शची-गर्भ-सिन्धौ हरीन्दुः ॥
६॥
श्रीमती राधारानी के प्रेम की महिमा; अपने ( भगवान् के ) उन गुणों, जिनका आस्वादन केवल श्रीमती राधारानी प्रेम के माध्यम से करती हैं; एवं उनके प्रेम की मधुरता का आस्वादन करने पर राधारानी जिस सुख का अनुभव करती हैं, उसे समझने के लिए भगवान् श्री हरि राधा के भावों में विभोर होकर श्रीमती शचीदेवी की कोख से उसी प्रकार प्रकट हुए, जिस तरह समुद्र से चन्द्रमा प्रकट होता है।
सङ्कर्षणः कारण-तोय-शायीगर्भोद-शायी च पयोब्धि-शायी ।शेषश्च यस्यांश-कलाः स नित्यानन्दाख्य-रामः शरणं ममास्तु ॥
७॥
श्री नित्यानन्द राम मेरे सतत स्मरण के विषय बनें। संकर्षण, शेषनाग तथा विभिन्न विष्णु भगवान्, जो कारण समुद्र, गर्भ समुद्र तथा क्षीर समुद्र में शयन करते हैं, वे उनके अंश तथा अंशों के भी अंश (कला) हैं।
मायातीते व्यापि-वैकुण्ठ-लोके पूर्णेश्व→ श्री-चतुर्व्यह-मध्ये । रूपं ग्रस्योद्धाति सङ्कर्षणाख्यंतं श्री-नित्यानन्द-रामं प्रपद्ये ॥
८॥
मैं उन श्री नित्यानन्द राम के चरणकमलों की शरण ग्रहण करता हूँ, जो चतुयूंह ( वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध) के मध्य संकर्षण के नाम से विख्यात हैं। वे भौतिक सृष्टि से परे वैकुण्ठ लोक में निवास करते हैं और समस्त ऐश्वर्यों से युक्त हैं।
माया-भर्तीजाण्डे-सङ्गाश्रयाङ्गःशेते साक्षात्कारणाम्भोधि-मध्ये । यस्यैकांशः श्री-पुमानादि-देवस्तं श्री-नित्यानन्द-रामं प्रपद्ये ॥
९॥
मैं श्री नित्यानन्द राम के चरणों में पूर्ण नमस्कार करता हूँ, जिनके अंशरूप कारणोदकशायी विष्णु कारण समुद्र में शयन करने वाले आदि पुरुष हैं, माया के पति हैं और समस्त ब्रह्माण्डों के आश्रय हैं।
यस्यांशांशः श्रील-गर्भोद-शायीग्रन्नाभ्यब्जं लोक-सात-नालम् । लोक-स्रष्टुः सूतिका-धाम धातुस्तं श्री-नित्यानन्द-रामं प्रपद्ये ॥
१०॥
। मैं उन श्री नित्यानन्द राम के चरणों में पूर्ण नमस्कार करता हूँ, जिनके अंश गर्भोदकशायी विष्णु हैं। इन्हीं गर्भोदकशायी विष्णु की नाभि से कमल प्रस्फुटित होता है, जो ब्रह्माण्ड के शिल्पी ब्रह्मा का जन्मस्थान है। इस कमल की नाल असंख्य लोकों का विश्राम-स्थल है।
यस्यांशांशांशः परात्माखिलानांपोष्टा विष्णुर्भाति दुग्धाब्धि-शायी । क्षौणी-भर्ता यत्कला सोऽप्यनन्तस् ।तं श्री-नित्यानन्द-रामं प्रपद्ये ॥
११॥
हरि अर्थात् परमेश्वर से अभिन्न होने के कारण वे अद्वैत कहलाते हैं। और भक्ति सम्प्रदाय का प्रचार करने के कारण वे आचार्य कहलाते हैं। वे भगवान् के भक्तों के स्वामी तथा भक्तावतार हैं। अतएव मैं उनकी शरण ग्रहण करता हूँ।
महा-विष्णुर्जगत्कर्ता मायया ग्रः सृजत्यदः । तस्यावतार एवायमद्वैताचार्य ईश्वरः ॥
१२ ॥
अद्वैत आचार्य महाविष्णु के अवतार हैं, जिनका मुख्य कार्य माया की क्रियाओं द्वारा भौतिक जगत् की सृष्टि करना है।
अद्वैतं हरिणाद्वैतादाचार्यं भक्ति-शंसनात् ।। भक्तावतारमीशं तमद्वैताचार्यमाश्रये ॥
१३॥
मैं उन श्री नित्यानन्द राम के चरणकमलों में सादर नमस्कार करता हूँ, जिनके गौण अंश क्षीरसागर में शयन करने वाले विष्णु हैं। वे क्षीरोदकशायी विष्णु ही समस्त जीवों के परमात्मा और समस्त ब्रह्माण्डों के पालक हैं। शेषनाग उनके अंशांश हैं।
पञ्च-तत्त्वात्मकं कृष्णं भक्त-रूप-स्वरूपकम् । भक्तावतारं भक्ताख्यं नमामि भक्त-शक्तिकम् ॥
१४॥
मैं उन परमेश्वर कृष्ण को सादर नमस्कार करता हूँ, जो अपने भक्तरूप, भक्तस्वरूप, भक्तावतार, शुद्ध भक्त और भक्तशक्ति रूपी लक्षण से अभिन्न हैं।
जयतां सुरतौ पङ्गोर्मम मन्द-मतेर्गती । मत्सर्वस्व-पदाम्भोजौ राधा-मदन-मोहनौ ॥
१५॥
सर्वथा दयालु राधा तथा मदनमोहन की जय हो! मैं पंगु तथा कुबुद्धि हूँ, फिर भी वे मेरे मार्गदर्शक हैं और उनके चरणकमल मेरे लिए सर्वस्व हैं।
दीव्यद्वन्दारण्य-कल्प-द्रुमाधःश्रीमद्रनागार-सिंहासनस्थौ । श्रीमद्राधा-श्रील-गोविन्द-देवौ प्रेष्ठालीभिः सेव्यमानौ स्मरामि ॥
१६॥
श्री श्री राधा-गोविन्द वृन्दावन में कल्पवृक्ष के नीचे रत्नों के मन्दिर में तेजोमय सिंहासन के ऊपर विराजमान होकर अपने सर्वाधिक अन्तरंग पार्षदों द्वारा सेवित होते हैं। मैं उन्हें सादर नमस्कार करता हूँ।
श्रीमानास-रसारम्भी वंशीवट-तट-स्थितः ।। कर्षन्वेणु-स्वनैर्गोपीर्गोपी-नाथः श्रियेऽस्तु नः ॥
१७॥
रासनृत्य के दिव्य रस के प्रवर्तक श्री श्रील गोपीनाथ वंशीवट के तट पर खड़े हैं और अपनी प्रसिद्ध बाँसुरी की ध्वनि से गोपियों के ध्यान को आकृष्ट कर रहे हैं। वे हम सबको अपना आशीर्वाद प्रदान करें।
जय जय श्री-चैतन्य जय नित्यानन्द । जयाद्वैत-चन्द्र जय गौर-भक्त-वृन्द ॥
१८॥
श्री चैतन्य तथा नित्यानन्द की जय हो, अद्वैतचन्द्र की जय हो और श्री गौर (चैतन्य महाप्रभु) के समस्त भक्तों की जय हो! एइ तिन ठाकुर गौड़ीयाके करियाछेन आत्मसात् । ए तिनेर चरण वन्दों, तिने मोर नाथ ॥
१९॥
वृन्दावन के इन तीन विग्रहों ( मदनमोहन, गोविन्द तथा गोपीनाथ) ने गौड़ीय वैष्णवों (चैतन्य महाप्रभु के अनुयायियों) के हृदय एवं आत्मा को निमग्न कर दिया है। मैं उनके चरणकमलों की पूजा करता हूँ, क्योंकि वे मेरे हृदय के स्वामी हैं।
ग्रन्थेर आरम्भे करि' मङ्गलाचरण' ।। गुरु, वैष्णव, भगवान्, तिनेर स्मरण ॥
२०॥
इस कथा के आरम्भ में मैंने गुरु, भगवद्भक्तों तथा भगवान् का स्मरण करने मात्र से उनके आशीर्वाद की कामना की है।
तिनेर स्मरणे हय विघ्न-विनाशन । अनायासे हय निज वाञ्छित-पूरण ॥
२१॥
ऐसा स्मरण समस्त कठिनाइयों का विनाश करता है और मनुष्य की अपनी इच्छाओं को अत्यन्त सरलतापूर्वक पूरा करने में सहायक सिद्ध होता है।
से मङ्गलाचरण हय त्रि-विध प्रकार ।वस्तु-निर्देश, आशीर्वाद, नमस्कार ॥
२२॥
मंगलाचरण ( आवाहन) में तीन विधियाँ निहित हैं-लक्ष्य-वस्तु को परिभाषित करना, आशीर्वाद देना तथा नमस्कार करना।
प्रथम दुइ श्लोके इष्ट-देव-नमस्कार ।सामान्य-विशेष-रूपे दुइ त' प्रकार ॥
२३॥
प्रथम दो श्लोक सामान्य तथा विशेष रूप से उन भगवान् को सादर नमस्कार करते हैं, जो पूजा के लक्ष्य ( आराध्य ) हैं।
तृतीय श्लोकेते करि वस्तुर निर्देश ।।ग्राहा हइते जानि पर-तत्त्वेर उद्देश ॥
२४॥
। तीसरे श्लोक में मैं उन परम सत्य का संकेत कर रहा हूँ, जो परम तत्त्व हैं। ऐसे वर्णन से मनुष्य परम सत्य का दर्शन कर सकता है।
चतुर्थ श्लोकेते करि जगते आशीर्वाद ।।सर्वत्र मागिये कृष्ण-चैतन्य-प्रसाद ॥
२५ ॥
चतुर्थ श्लोक में मैंने चैतन्य महाप्रभु से सब पर कृपा करने के लिए प्रार्थना करते हुए भगवान् से सम्पूर्ण जगत् को आशीर्वाद देने का आवाहन किया है।
सेइ श्लोके कहि बाह्यावतार-कारण ।पञ्च षष्ठ श्लोके कहि मूल-प्रयोजन ॥
२६॥
उस श्लोक में मैंने चैतन्य महाप्रभु के अवतार के बाह्य कारण की व्याख्या की है, किन्तु पाँचवे तथा छठे श्लोकों में मैंने उनके अवतार के मुख्य कारण की व्याख्या की है।
एइ छय श्लोके कहि चैतन्येर तत्त्व ।। आर पञ्च श्लोके नित्यानन्देर महत्त्व ॥
२७॥
। इन छः श्लोकों में मैंने चैतन्य महाप्रभु के तत्त्व के सम्बन्ध में वर्णन किया है, जबकि अगले पाँच श्लोकों में मैंने नित्यानन्द प्रभु की महिमा का वर्णन किया है।
आर दुइ श्लोके अद्वैत-तत्त्वाख्यान । आर एक श्लोके पञ्च-तत्त्वेर व्याख्यान ॥
२८॥
इससे अगले दो श्लोकों में अद्वैत प्रभु के तत्त्व का वर्णन है और उसके बाद के श्लोक में पंचतत्त्व ( भगवान्, उनके स्वांश, उनके अवतार, उनकी शक्तियाँ तथा उनके भक्तों) का वर्णन हुआ है।
एइ चौद्द श्लोके करि मङ्गलाचरण ।।हँहि मध्ये कहि सब वस्तु-निरूपण ॥
२९ ॥
इस तरह ये चौदह श्लोक मंगलाचरण के रूप में हैं और ये परम सत्य का वर्णन करते हैं।
सब श्रोता-वैष्णवेरे करि' नमस्कार ।एइ सब श्लोकेर करि अर्थ-विचार ॥
३० ॥
इन सारे श्लोकों की जटिलताओं की व्याख्या आरम्भ करने के पूर्व मैं अपने समस्त वैष्णव पाठकों को नमस्कार करता हूँ।
सकल वैष्णव, शुन करि' एक-मन ।। चैतन्य-कृष्णेर शास्त्र-मत-निरूपण ॥
३१॥
मैं अपने समस्त वैष्णव पाठकों से प्रार्थना करता हूँ कि वे प्रामाणिक शास्त्रों में निरूपित श्रीकृष्ण चैतन्य की इस कथा को ध्यान से पढ़ें और सुनें।
कृष्ण, गुरु, भक्त, शक्ति, अवतार, प्रकाश ।।कृष्ण एइ छय-रूपे करेन विलास ॥
३२॥
भगवान् कृष्ण अपने आपको गुरु, भक्त, विभिन्न शक्तियों, अवतारों तथा परिपूर्ण प्रकाशों में प्रकट करके विलास करते हैं। ये छहों रूप एक ही में समाहित हैं।
एइ छय तत्त्वेर करि चरण वन्दन ।प्रथमे सामान्ये करि मङ्गलाचरण ॥
३३॥
इसीलिए मैंने एक सत्य के इन छ: विविध रूपों के चरणकमलों की वन्दना मंगलाचरण द्वारा की है।
वन्दे गुरूनीश-भक्तानीशमीशावतारकान् ।।तत्प्रकाशांश्च तच्छक्तीः कृष्ण-चैतन्य-संज्ञकम् ॥
३४॥
मैं गुरुओं, भगवद्भक्तों, ईश्वर के अवतारों, उनके पूर्ण अंशों (प्रकाशों), उनकी शक्तियों तथा स्वयं आदि भगवान् श्रीकृष्ण चैतन्य को सादर नमस्कार करता हूँ।
मन्त्र-गुरु आर व्रत शिक्षा-गुरु-गण ।। ताँहार चरण आगे करिये वन्दन ॥
३५ ॥
मैं सर्वप्रथम अपने दीक्षा गुरु तथा अपने समस्त शिक्षा गुरुओं के चरणकमलों में सादर नमस्कार करता हूँ।
श्री-रूप, सनातन, भट्ट-रघुनाथ ।श्री-जीव, गोपाल-भट्ट, दास-रघुनाथ ॥
३६॥
श्रील रूप गोस्वामी, श्री सनातन गोस्वामी, श्री भट्ट रघुनाथ, श्री जीव गोस्वामी, श्री गोपाल भट्ट गोस्वामी तथा श्रील रघुनाथ दास गोस्वामी मेरे शिक्षा-गुरु हैं।
एइ छय गुरु–शिक्षा-गुरु ग्ने आमार ।।ताँ'-सबार पाद-पद्ये कोटि नमस्कार ॥
३७॥
ये छहों मेरे शिक्षा-गुरु हैं, अतएव उनके चरणकमलों में मेरा कोटिकोटि नमस्कार है।
भगवानेर भक्त व्रत श्रीवास प्रधान । ताँ'-सभार पाद-पद्ये सहस्र प्रणाम ॥
३८॥
भगवान् के असंख्य भक्तों में श्रीवास ठाकुर अग्रणी हैं। मैं उनके चरणकमलों में हजारों बार सादर नमस्कार करता हूँ।
अद्वैत आचार्य प्रभुर अंश-अवतार । ताँर पाद-पझे कोटि प्रणति आमार ॥
३९।। अद्वैत आचार्य भगवान् के अंशावतार हैं, अतएव मैं उनके चरणकमलों में करोड़ों बार नमस्कार करता हूँ।
नित्यानन्द-राय—प्रभुर स्वरूप-प्रकाश । ताँर पाद-पद्म वन्दो याँर मुञि दास ॥
४०॥
श्रील नित्यानन्द राम भगवान् के पूर्ण विस्तार हैं और मैंने उनसे दीक्षा प्राप्त की है। अतएव मैं उनके चरणकमलों में सादर नमस्कार करता हूँ।
गदाधर-पण्डितादि प्रभुर निज-शक्ति ।।ताँ'-सबार चरणे मोर सहस्र प्रणति ॥
४१॥
मैं भगवान् की अन्तरंगा शक्तियों को सादर नमस्कार करता हैं, जिनमें भी गदाधर प्रभु प्रमुख हैं।
श्री-कृष्ण-चैतन्य प्रभु स्वयं-भगवान् ।ताँहार पदारविन्दै अनन्त प्रणाम ॥
४२॥
श्रीकृष्ण चैतन्य महाप्रभु साक्षात् भगवान् हैं, अतएव मैं उनके चरणकमलों में असंख्य बार दण्डवत् प्रणाम करता हूँ।
सावरणे प्रभुरे करिया नमस्कार ।।एइ छय तेंहो त्रैछे-करिये विचार ॥
४३॥
भगवान् ( चैतन्य महाप्रभु) तथा उनके समस्त पार्षदों को नमस्कार करने के बाद अब मैं उन छह विविधताओं की एकता की व्याख्या करने का प्रयत्न करूंगा।"
यद्यपि आमार गुरु-चैतन्येर दास ।तथापि जानिये आमि ताँहार प्रकाश ॥
४४॥
यद्यपि मैं जानता हूँ कि मेरे गुरु श्री चैतन्य के दास हैं, तथापि मैं उन्हें भगवान् के स्वयं प्रकाश के रूप में जानता हूँ।
गुरु कृष्ण-रूप हन शास्त्रेर प्रमाणे ।। गुरु-रूपे कृष्ण कृपा करेन भक्त-गणे ॥
४५ ॥
। समस्त प्रामाणिक शास्त्रों के सुविचारित मत के अनुसार गुरु कृष्ण से अभिन्न होता है। भगवान् कृष्ण गुरु के रूप में भक्तों का उद्धार करते है।
आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कहिंचित् ।। न मर्त्य-बुद्ध्यासूयेत सर्व-देव-मयो गुरुः ॥
४६ ।। आचार्य को मेरा ही स्वरूप समझना चाहिए और किसी भी तरह से उसका अपमान नहीं करना चाहिए। उसे सामान्य व्यक्ति मानकर उससे ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए, क्योंकि वे समस्त देवताओं के प्रतिनिधि होते हैं।
शिक्षा-गुरुके त' जानि कृष्णेर स्वरूप । अन्तर्यामी, भक्त-श्रेष्ठ,—एई दुइ रूप ।। ४७॥
मनुष्य को शिक्षा-गुरु को कृष्ण का स्वरूप समझना चाहिए। भगवान् कृष्ण स्वयं को परमात्मा रूप में तथा भगवान् के सर्वश्रेष्ठ भक्त के रूप में प्रकट करते हैं।
नैवोपयन्त्यपचितिं कवयस्तवेश । ब्रह्मायुषापि कृतमृद्ध-मुदः स्मरन्तः । ग्रोऽन्तर्बहिस्तनु-भृतामशुभं विधुन्वन् ।आचार्य-चैत्य वपुषा स्व-गतिं व्यक्ति ॥
४८ ॥
हे प्रभु! दिव्य कविगण एवं आध्यात्मिक विज्ञान में दक्ष व्यक्ति, ब्रह्मा के समान दीर्घायु प्राप्त करके भी आपके प्रति अपनी कृतज्ञता को पूरी तरह व्यक्त नहीं कर सके, क्योंकि आप दो रूपों में, बाहर से आचार्य के रूप में और भीतर से परमात्मा के रूप में, देहधारी जीव को अपने पास आने का निर्देश देकर मुक्ति प्रदान करने के लिए प्रकट होते हैं।
तेषां सतत-युक्तानां भजतां प्रीति–पूर्वकम् ।।ददामि बुद्धि-योगं तं ग्रेन मामुपयान्ति ते ॥
४९॥
जो लोग निरन्तर मेरी भक्ति में संलग्न रहते हुए प्रेमपूर्वक मेरी सेवा करते हैं, उन्हें मैं ऐसा ज्ञान प्रदान करता हूँ जिससे वे मेरे पास आ सकें।
प्रथा ब्रह्मणे भगवान्स्वयमुपदिश्यानुभावितवान् ॥
५०॥
पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् ने ब्रह्मा को शिक्षा दी और उन्हें स्वरूपसिद्ध बनाया।
ज्ञानं परम-गुह्यं मे ग्रद्विज्ञान-समन्वितम् ।।स-रहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥
५१॥
। मैं जो तुमसे कहूँगा उसे ध्यानपूर्वक सुनो, क्योंकि मेरे विषय में जो दिव्य ज्ञान है, वह न केवल वैज्ञानिक है, अपितु रहस्यों से पूर्ण भी है।
ग्रावानहं यथा-भावो ग्रदूप-गुण-कर्मकः ।। तथैव तत्त्व-विज्ञानमस्तु ते मदनुग्रहात् ।। ५२ ।। मेरी अहैतुकी कृपा से तुम्हें मेरे व्यक्तित्व, स्वरूप, गुण तथा लीला सम्बन्धी सत्य के बारे में सारा ज्ञान प्राप्त हो जाये।।
अहमेवासमेवाग्रे नान्यद् ग्रसदसत्परम् ।। पश्चादहं यदेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥
५३॥
सृष्टि के पूर्व केवल मैं ही विद्यमान रहता हूँ और किसी भी स्थूल, सूक्ष्म या प्रारम्भिक घटना का अस्तित्व नहीं होता। सृष्टि के बाद मैं ही हर वस्तु में विद्यमान रहता हूँ और प्रलय के बाद मैं ही शाश्वत रूप से विद्यमान रहता हूँ।
ऋतेऽर्थं ग्रत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।।तद्विद्यादात्मनो मायां ग्रथाभासो ग्रथा तमः ॥
५४॥
जो कुछ मेरे बिना सत्य प्रतीत होता है, वह निश्चित रूप से मेरी मक शक्ति माया है, क्योंकि मेरे बिना किसी वस्तु का अस्तित्व नहीं हो सकता है। यह छाया में असली प्रकाश के प्रतिबिम्ब जैसा है, क्योंकि प्रकाश में न तो छाया होती है, न प्रतिबिम्ब।
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेष्वनु ।।प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥
५५॥
जिस प्रकार भौतिक तत्त्व सारे जीवों के शरीरों में प्रवेश करते हैं, फिर भी उनके बाहर रहते हैं, उसी तरह मैं सारी भौतिक सृष्टियों के भीतर विद्यमान रहता हूँ, फिर भी मैं उनके भीतर नहीं रहता।
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्त्व-जिज्ञासुनात्मनः ।अन्वय-व्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥
५६॥
अतएव दिव्य ज्ञान में रुचि रखने वाले व्यक्ति को सर्वव्यापी सत्य को जानने के लिए इसके विषय में सदैव प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष रीति से जिज्ञासा करनी चाहिए।
चिन्तामणिर्जयति सोमगिरिगुरुर्ने ।शिक्षा-गुरुश्च भगवान्शिखि-पिञ्छ-मौलिः । यत्पाद-कल्पतरु-पल्लव-शेखरेषुलीला-स्वयंवर-रसं लभते जयश्रीः ॥
५७।। । चिन्तामणि तथा मेरे दीक्षा-गुरु सोमगिरि की जय हो। मेरे शिक्षागुरु पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् की जय हो, जो अपने मुकुट में मोरपंख धारण करते हैं। कल्पवृक्ष तुल्य उनके चरणकमलों की छाया में जयश्री ( राधारानी ) नित्य संगिनी के रूप में दिव्य रस का आस्वादन करती हैं।
जीवे साक्षात्नाहि ताते गुरु चैत्य-रूपे ।। शिक्षा-गुरु हय कृष्ण-महान्त-स्वरूपे ।। ५८ ॥
परमात्मा की उपस्थिति को प्रत्यक्ष अनुभव नहीं किया जा सकता, अतएव वे हमारे समक्ष मुक्त भक्त के रूप में प्रकट होते हैं। ऐसा गुरु साक्षात् कृष्ण के अतिरिक्त कोई अन्य नहीं होता।
ततो दुःसङ्गमुत्सृज्य सत्सु सज्जेत बुद्धिमान् ।।सन्त एवास्य छिन्दन्ति मनो-व्यासङ्गमुक्तिभिः ॥
५९॥
अतएव बुरी संगति से दूर रहकर केवल भक्तों का संग करना चाहिए। अपने अनुभूत उपदेशों से ऐसे सन्तजन उस ग्रंथि को काट सकते हैं, जो व्यक्ति को भक्ति के प्रतिकूल कार्यों से जोड़ती है।
सतां प्रसङ्गान्मम वीर्य-संविदोभवन्ति हृत्कर्ण-रसायनाः कथाः । तज्जोषणादाश्वपवर्ग-वर्मनि ।श्रद्धा रतिर्भक्तिरनुक्रमिष्यति ॥
६० ॥
केवल भक्तों की संगति में ही भगवान् के आध्यात्मिक शक्तिशाली सन्देश की ठीक से चर्चा की जा सकती है और इस संगति में उसका श्रवण अत्यन्त आनन्ददायक होता है। भक्तों से श्रवण करने पर दिव्य अनुभव का यह मार्ग तुरन्त खुल जाता है और धीरे-धीरे उस ज्ञान में मनुष्य की दृढ़ श्रद्धा उत्पन्न हो जाती है, जो क्रमशः आकर्षण एवं भक्ति में परिणत हो जाती है।
ईश्वर-स्वरूप भक्त ताँर अधिष्ठान ।।भक्तेर हृदये कृष्णेर सतत विश्राम ॥
६१ ॥
भगवान् की प्रेमाभक्ति में निरन्तर संलग्न रहने वाला शुद्ध भक्त भगवान् के समान ही होता है, जो सदैव उसके हृदय में आसीन रहते हैं।
साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयं त्वहम् ।। मदन्यत्ते न जानन्ति नाही तेभ्यो मनागपि ।। ६२ ।। सन्त तो मेरे हृदय हैं और एकमात्र मैं ही उनका हृदय हूँ। वे मेरे अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं जानते, इसलिए मैं उनके अतिरिक्त अन्य किसी को अपना नहीं मानता।
भवद्विधा भागवतास्तीर्थ-भूताः स्वयं विभो ।तीर्थी-कुर्वन्ति तीर्थानि स्वान्तः-स्थेन गदा-भृता ॥
६३॥
आपके समान सन्त स्वयं तीर्थस्थान होते हैं। अपनी पवित्रता के कारण, वे भगवान् के नित्य संगी होते हैं; अतः वे तीर्थस्थानों को भी पावन बना सकते हैं।
सेइ भक्त-गण हय द्वि-विध प्रकार । पारिषद्गण एक, साधक-गेण आर ॥
६४॥
ऐसे शुद्ध भक्त दो प्रकार के होते हैं–निजी संगी ( पारिषत् ) तथा नवदीक्षित भक्त ( साधकगण)।"
ईश्वरेर अवतार ए-तिन प्रकार ।। अंश-अवतार, आरे गुण-अवतार ॥
६५॥
शक्त्यावेश-अवतार तृतीय ए-मत ।अश-अवतार–पुरुष-मत्स्यादिक व्रत ॥
६६॥
ईश्वर के अवतारों के तीन वर्ग हैं-अंशावतार, गुणावतार तथा शक्त्यावेश अवतार पुरुष तथा मत्स्य अवतार अंशावतारों के उदाहरण हैं ।
ब्रह्मा विष्णु शिव–तिन गुणावतारे गणि।शक्त्यावेश—सनकादि, पृथु, व्यास-मुनि ।। ६७॥
ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव गुणावतार हैं। शक्त्यावेश अवतार हैंकुमारगण, राजा पृथु तथा महामुनि व्यास (जिन्होंने वेदों का संकलन किया )। दुइ-रूपे हय भगवानेर प्रकाश ।एके त' प्रकाश हय, आरे त' विलास ॥
६८॥
। भगवान् अपने आपको दो रूपों में प्रकट करते हैं-प्रकाश तथा विलास।
एकइ विग्रह यदि हय बहु-रूप ।। आकारे त' भेद नाहि, एक स्वरूप ॥
६९॥
महिषी-विवाहे, ग्रैछे ग्रैछे कैल रास ।। इहाके कहिये कृष्णेर मुख्य 'प्रकाश' ॥
७० ॥
जब भगवान् स्वयं को अनेक रूपों में विस्तारित करते हैं, जो अपने अपने स्वरूपों में अभिन्न होते हैं, जैसाकि भगवान् कृष्ण ने सोलह हजार रानियों के साथ विवाह करते समय तथा रासनृत्य करते समय किया था, तब भगवान् के ऐसे रूप मुख्य प्रकाश ( प्रकाश-विग्रह) कहलाते हैं।
चित्रं बतैतदेकेन वपुषा झुगपत्पृथक् ।। गृहेषु यष्ट-साहस्रं स्त्रिय एक उदावहत् ॥
७१॥
यह अद्भुत लगता है कि अद्वय श्रीकृष्ण ने सोलह हजार रानियों से उनके अपने अपने घरों में विवाह करने के लिए अपने आपको सोलह जार एकसमान रूपों में विस्तारित कर लिया।
रासोत्सवः सम्प्रवृत्तो गोपी-मण्डल-मण्डितः ।योगेश्वरेण कृष्णेन तासां मध्ये द्वयोर्द्वयोः ॥
७२॥
। जब गोपियों के समूहों से घिरकर भगवान् कृष्ण ने रासनृत्य का उत्सव प्रारम्भ किया, तो समस्त योग शक्तियों के स्वामी ने अपने आपको प्रत्येक दो-दो गोपियों के बीच में स्थापित किया।
प्रविष्टेन गृहीतानां कण्ठे स्व-निकटं स्त्रियः ।। ग्यं मन्येरन्नभस्तावद्विमान-शत-सङ्कलम् ॥
७३॥
दिवौकसां स-दाराणामत्यौत्सुक्य-भृतात्मनाम् ।ततो दुन्दुभयो नेदुर्निपेतुः पुष्प-वृष्टयः ॥
७४॥
इस प्रकार जब गोपियाँ तथा कृष्ण परस्पर मिल गये, तो हर गोपी ने यही सोचा कि कृष्ण केवल उसका ही प्रगाढ़ आलिंगन कर रहे हैं। भगवान् की इस अद्भुत लीला को देखने के लिए स्वर्ग के देवता तथा उनकी पत्नियाँ, जो कि रासनृत्य देखने के लिए अत्यन्त उत्सुक थे, अपने सैंकड़ों विमानों में आकाश में उड़ने लगे। उन्होंने फूलों की वर्षा की और वे मधुर ताल से दुन्दुभियाँ बजाने लगे।
अनेकत्र प्रकटता रूपस्यैकस्य शैकदा ।।सर्वथा तत्स्वरूपैव स प्रकाश इतीर्यते ॥
७५॥
यदि समान लक्षण वाले अनेक रूप एकसाथ प्रदर्शित हों, तो ऐसे रूप भगवान् के प्रकाश-विग्रह कहलाते हैं।
एकइ विग्रह किन्तु आकारे हय आन ।अनेक प्रकाश हय, ‘विलास' तार नाम ॥
७६ ॥
किन्तु जब अनेक रूप एक-दूसरे से कुछ-कुछ भिन्न होते हैं, तो वे विलास-विग्रह कहलाते हैं।
स्वरूपमन्याकारं यत्तस्य भाति विलासतः । प्रायेणात्म-समं शक्त्या स विलासो निगद्यते ॥
७७॥
जब भगवान् अपनी अचिन्त्य शक्ति से विभिन्न आकारों में अपने अनेक रूप दिखलाते हैं, तो ऐसे रूपों को विलास-विग्रह कहते हैं।
ग्रैछे बलदेव, परव्योमे नारायण ।।ग्रैछे वासुदेव प्रद्युम्नादि सङ्कर्षण ॥
७८ ॥
ऐसे विलास-विग्रहों के उदाहरण हैं बलदेव, वैकुण्ठधाम में नारायण तथा चतुयूंह अर्थात् वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध।
ईश्वरेर शक्ति हय ए-तिन प्रकार ।। एक लक्ष्मी-गण, पुरे महिषी-गण आर ॥
७९॥
व्रजे गोपी-गण आर सभाते प्रधान । व्रजेन्द्र-नन्दन ग्रा'ते स्वयं भगवान् ॥
८० ॥
भगवान् की शक्तियाँ ( लीला संगिनियाँ) तीन प्रकार की हैंवैकुण्ठ में लक्ष्मियाँ, द्वारका में रानियाँ तथा वृन्दावन में गोपियाँ। इन सबमें गोपियाँ सर्वश्रेष्ठ हैं, क्योंकि उन सबको व्रजराज के पुत्र, आदि भगवान् श्रीकृष्ण की सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त है।
स्वयं-रूप कृष्णेर काय-व्यूह–ताँर सम ।। भक्त सहिते हय ताँहार आवरण ॥
८१॥
आदि भगवान् श्रीकृष्ण के निजी संगी उनके भक्तगण हैं, जो उनसे एकरूप हैं। वे अपने भक्तों के समूह (परिकर) के साथ पूर्ण हैं।
भक्त आदि क्रमे कैले सबार वन्दन । ए-सबार वन्दन सर्व-शुभेर कारण ॥
८२॥
अब मैंने विविध स्तरों के सभी भक्तों की पूजा कर ली है। इनकी पूजा समस्त सौभाग्य का स्रोत है।
प्रथम श्लोके कहि सामान्य मङ्गलाचरण । द्वितीय श्लोकेते करि विशेष वन्दन ॥
८३॥
पहले श्लोक में मैंने सामान्य आशीर्वाद का आवाहन किया है, किन्तु दूसरे श्लोक में मैंने भगवान् से एक विशेष रूप में प्रार्थना की है।
वन्दे श्री-कृष्ण-चैतन्य-नित्यानन्दौ सहोदितौ ।। गौड़ोदये पुष्पवन्तौ चित्रौ शन्दौ तमो-नुदौ ॥
८४॥
मैं श्रीकृष्ण चैतन्य तथा नित्यानन्द प्रभु को सादर नमस्कार करता हूँ, जो सूर्य तथा चन्द्रमा के समान हैं। वे एक ही साथ गौड़ के क्षितिज पर अज्ञान का अन्धकार दूर करने तथा सबको अद्भुत आशीर्वाद प्रदान करने के लिए उदित हुए हैं।
व्रजे ये विहरे पूर्वे कृष्ण-बलराम । कोटी-सूर्य-चन्द्र जिनि दोंहार निज-धाम ।। ८५ ॥
सेइ दुइ जगतेरे हइया सदय ।। गौड़देशे पूर्व-शैले करिला उदय ॥
८६॥
श्रीकृष्ण तथा बलराम, जो भगवान् हैं और पहले वृन्दावन में प्रकट हुए थे तथा सूर्य और चन्द्रमा से करोड़ों गुना अधिक तेजवान थे, अब विश्व की पतित अवस्था देखकर अनुकम्पावश गौड़देश (पश्चिमी बंगाल) के पूर्वी क्षितिज पर उदित हुए हैं।
श्री कृष्ण-चैतन्य आर प्रभु नित्यानन्द ।याँहार प्रकाशे सर्व जगतानन्द ॥
८७॥
श्रीकृष्ण चैतन्य तथा प्रभु नित्यानन्द के आविर्भाव ने विश्व को आनन्द से परिपूरित कर दिया है।
सूर्य-चन्द्र हरे ग्रैछे सब अन्धकार । वस्तु प्रकाशिया करे धर्मेर प्रचार ।। ८८ ॥
एइ मत दुइ भाइ जीवेर अज्ञान- ।। तमो-नाश करि' कैल तत्त्व-वस्तु-दान ॥
८९॥
जिस प्रकार सूर्य तथा चन्द्रमा उदय होकर अंधकार को दूर कर देते हैं और हर वस्तु की प्रकृति को प्रकट कर देते हैं, उसी तरह ये दोनों भाई जीवों के अज्ञान के अन्धकार को दूर करते हैं और उन्हें परम सत्य के ज्ञान से प्रकाशित करते हैं।
अज्ञान-तमेर नाम कहिये 'कैतव' ।।धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-वाञ्छा आदि सब ॥
९०॥
अज्ञान का अंधकार कैतव अर्थात् छल कहलाता है, जो धार्मिकता, आर्थिक विकास, इन्द्रियतृप्ति तथा मुक्ति के साथ प्रारम्भ होता है।
धर्मः प्रोज्झित-कैतवोऽत्र परमो निर्मत्सराणां सतांवेद्यं वास्तवमत्र वस्तु शिव-दं ताप-त्रयोन्मूलनम् । श्रीमद्भागवते महा-मुनि-कृते किं वा परैरीश्वरःसद्यो हृद्यवरुध्यतेऽत्र कृतिभिः शुश्रूषुभिस्तत्क्षणात् ॥
९१॥
महामुनि व्यासदेव द्वारा चार मूल श्लोकों से संकलित महान् शास्त्र श्रीमद्भागवत अत्यन्त उन्नत एवं दयालु भक्तों का वर्णन करता है और भौतिकता से प्रेरित धार्मिकता की प्रवंचना की विधियों को पूरी तरह बहिष्कृत करता है। यह शाश्वत धर्म के सर्वोच्च सिद्धान्त को प्रतिपादित करता है, जो जीव के तीन प्रकार के तापों को वास्तव में कम करने वाला और पूर्ण सम्पन्नता तथा ज्ञान का सर्वोच्च आशीष प्रदान करने वाला है। जो लोग विनीत सेवाभाव से इस शास्त्र के सन्देश को सुनने के इच्छुक हैं, वे तुरन्त ही भगवान् को अपने हृदयों में बन्दी बना सकते हैं। अतएव भीमद्भागवत के अतिरिक्त अन्य किसी शास्त्र की आवश्यकता नहीं रह जाती।
तार मध्ये मोक्ष-वाञ्छा कैतव-प्रधान ।ग्राहा हैते कृष्ण-भक्ति हय अन्तर्धान ॥
९२ ।। सर्वोपरि में तदाकार होकर मुक्ति प्राप्त करने की इच्छा करना प्रधान कैतव धर्म है, क्योंकि इससे कृष्ण की प्रेममयी सेवा का स्थायी तौर पर लोप हो जाता है।
प्र-शब्देन मोक्षाभिसन्धिरपि निरस्तः इति ॥
९३॥
उपसर्ग ‘प्र' ( श्रीमद्भागवत के श्लोक में) सूचित करता है कि मुक्ति की इच्छा को पूरी तरह से बहिष्कार कर दिया जाता है।
कृष्ण-भक्तिर बाधक-व्रत शुभाशुभ कर्म । सेह एक जीवेर अज्ञान-तमो-धर्म ॥
९४॥
सभी प्रकार के शुभ तथा अशुभ कार्यकलाप, जो भगवान् श्रीकृष्ण की दिव्य प्रेममयी सेवा में बाधक होते हैं, वे तमोगुण से उत्पन्न कर्म हैं।
याँहार प्रसादे एइ तमो हय नाश । तमो नाश करि' करे तत्त्वेर प्रकाश ॥
९५ ॥
भगवान् श्री चैतन्य तथा भगवान् नित्यानन्द की कृपा से अज्ञान का यह अन्धकार दूर होता है और सत्य प्रकाशित होता है।
तत्त्व-वस्तु—कृष्ण, कृष्ण-भक्ति, प्रेम-रूप । नाम-सङ्कीर्तन सब आनन्द-स्वरूप ॥
१६॥
परम सत्य तो श्रीकृष्ण हैं और शुद्ध प्रेम में प्रकट होने वाली कृष्ण के प्रति प्रेममयी भक्ति पवित्र नाम के सामूहिक कीर्तन द्वारा प्राप्त की जाती है, जो सारे आनन्द की सार है।
सूर्य चन्द्र बाहिरेर तमः से विनाशे ।। बहिर्वस्तु घट-पट-आदि से प्रकाशे ॥
९७॥
सूर्य तथा चन्द्रमा बाह्य जगत् के अन्धकार को विनष्ट करते हैं और इस तरह घड़ों तथा भोजन पात्रों जैसी बाह्य भौतिक वस्तुओं को प्रकाशित करते हैं।
दुइ भाइ हृदयेर क्षालि' अन्धकार ।दुइ भागवत-सङ्गे कराने साक्षात्कार ॥
९८॥
किन्तु ये दोनों भाई ( भगवान् चैतन्य तथा भगवान् नित्यानन्द) हृदय के भीतर के अन्धकार को विनष्ट करते हैं और इस तरह ये दो प्रकार के भागवतों ( भगवान् से सम्बन्धित व्यक्तियों या वस्तुओं) से मिलाने में मनुष्य की सहायता करते हैं।
एक भागवत बड़-भागवत-शास्त्र ।आर भागवत-भक्त भक्ति-रस-पात्र ॥
९९॥
एक भागवत है महान् शास्त्र श्रीमद्भागवत और दूसरा है भक्ति-रस में निमग्न शुद्ध भक्त।
दुइ भागवत द्वारा दिया भक्ति-रस । ताँहार हृदये ताँर प्रेमे हय वश ॥
१०० ॥
इन दो भागवतों के कार्यों के माध्यम से भगवान् जीव के हृदय में दिव्य प्रेममयी सेवा के रस का संचार करते हैं और इस तरह भक्त के हृदय में स्थित भगवान् भक्त के प्रेम से वशीभूत हो जाते हैं।
एक अद्भुत—सम-काले दोंहार प्रकाश ।। आर अद्भुत चित्त-गुहार तमः करे नाश ॥
१०१॥
। पहला आश्चर्य यह है कि दोनों भाई एकसाथ प्रकट होते हैं और दूसरा यह कि वे हृदय की गहराई (अन्तर्मन) को प्रकाशित करते हैं।
एइ चन्द्र सूर्य दुइ परम सदय । जगतेर भाग्ये गौड़े करिला उदय ॥
१०२॥
। ये दोनों, सूर्य तथा चन्द्रमा, संसार के लोगों के प्रति अत्यन्त दयालु हैं। इस तरह समस्त लोगों के सौभाग्य हेतु वे बंगाल के क्षितिज पर उदित हुए हैं।
सेइ दुइ प्रभुर करि चरण वन्दन ।।याँहा हइते विघ्न-नाश अभीष्ट-पूरण ॥
१०३॥
। अतएव आइये हम इन दोनों प्रभुओं के पवित्र चरणों की पूजा करें। इस प्रकार आत्म-साक्षात्कार के मार्ग की सारी कठिनाइयों से छुटकारा मिल सकता है।
एइ दुइ श्लोके कैल मङ्गल-वन्दन ।।तृतीय श्लोकेर अर्थ शुन सर्व-जन ॥
१०४॥
मैंने इन दोनों श्लोकों के माध्यम से भगवान् से आशीष प्राप्त करने की कामना की है (इस अध्याय के श्लोक १ और २)। अब कृपा करके तृतीय श्लोक के तात्पर्य को ध्यानपूर्वक सुनें।
वक्तव्य-बाहुल्य, ग्रन्थ-विस्तारेर डरे ।विस्तारे ना वणि, सारार्थ कहि अल्पाक्षरे ॥
१०५॥
इस ग्रंथ के विस्तार-भय से मैं जान-बूझकर विस्तृत वर्णन से बच रहा हूँ। मैं यथासम्भव संक्षेप में सार-वर्णन करूंगा।"
मितं च सारं च वचो हि वाग्मिता इति ॥
१०६॥
संक्षेप में कहा गया साररूपी सत्य ही सच्ची वाक्पटुता है।
शुनिले खण्डिबे चित्तेर अज्ञानादि दोष ।।कृष्णे गाढ़ प्रेम हबे, पाइबे सन्तोष ॥
१०७॥
विनीत भाव से इसका श्रवण करने मात्र से ही मनुष्य को हृदय अज्ञान के सारे दोषों से मुक्त हो जायेगा और उसे कृष्ण का प्रगाढ़ प्रेम प्राप्त होगा। यही शान्ति का मार्ग है।
श्री-चैतन्य-नित्यानन्द-अद्वैत-महत्त्व। ताँर भक्त-भक्ति-नाम-प्रेम-रस-तत्त्व ॥
१०८॥
भिन्न भिन्न लिखियाछि करिया विचार ।शुनिले जानिबे सब वस्तु-तत्त्व-सार ॥
१०९॥
यदि कोई धैर्यपूर्वक श्री चैतन्य महाप्रभु, श्री नित्यानन्द प्रभु तथा श्री अद्वैत प्रभु एवं उनके भक्तों, भक्ति-कार्यो, नाम, यश तथा उनके दिव्य प्रेममय आदान-प्रदानों के रसों की महिमा का श्रवण करेगा, तो वह परम सत्य के सार को जान सकेगा। इसलिए मैंने इनका वर्णन ( चैतन्यचरितामृत में ) तर्क तथा विवेक के साथ किया है।
श्री-रूप-रघुनाथ-पदे यार आश ।।चैतन्य-चरितामृत कहे कृष्णदास ॥
११०॥
श्री रूप तथा श्री रघुनाथ के चरणकमलों की स्तुति करते हुए, सदैव उनकी कृपा की कामना करते हुए और उनके चरणों का अनुसरण करते हुए मैं, कृष्णदास, श्री चैतन्य-चरितामृत का वर्णन कर रहा हूँ।
