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अध्याय 9 - परम गुह्य ज्ञान

9श्रीभगवानुवाच

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यसूयवे |

ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेSश्रुभात् || १ ||

श्रीभगवान् उवाच – श्रीभगवान् ने कहा; इदम् – इस; तु – लेकिन; ते – तुम्हारे लिए; गुह्य-तमम् – अत्यन्त गुह्य; प्रवक्ष्यामि – कह रहा हूँ; अनसूयवे – ईर्ष्या न करने वाले को; ज्ञानम् – ज्ञान को; विज्ञान – अनुभूत ज्ञान; सहितम् – सहित; यत् – जिसे; ज्ञात्वा – जानकर; मोक्ष्यसे – मुक्त हो सकोगे; अशुभात् – इस कष्टमय संसार से |

श्रीभगवान् ने कहा – हे अर्जुन! चूँकि तुम मुझसे कभी ईर्ष्या नहीं करते, इसीलिए मैं तुम्हें यह परम गुह्यज्ञान तथा अनुभूति बतलाऊँगा, जिसे जानकर तुम संसार के सारे क्लेशों से मुक्त हो जाओगे |

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9राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् |

प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् || २ ||

राज-विद्या – विद्याओं का राजा; राज-गुह्यम् – गोपनीय ज्ञान का राजा; पवित्रम् – शुद्धतम; इदम् – यह; उत्तमम् – दिव्य; प्रत्यक्ष – प्रत्यक्ष अनुभव से; अवगमम् – समझा गया; धर्म्यम् – धर्म; सु-सुखम् – अत्यन्त सुखी; कर्तुम् – सम्पन्न करने में; अव्ययम् – अविनाशी |

यह ज्ञान सब विद्याओं का राजा है, जो समस्त रहस्यों में सर्वाधिक गोपनीय है | यह परम शुद्ध है और चूँकि यह आत्मा की प्रत्यक्ष अनुभूति कराने वाला है, अतः यह धर्म का सिद्धान्त है | यह अविनाशी है और अत्यन्त सुखपूर्वक सम्पन्न किया जाता है |

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अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप |

अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि || ३ ||

अश्रद्यधानाः – श्रद्धाविहीन; पुरुषाः – पुरुष; धर्मस्य – धर्म के प्रति; अस्य – इस; परन्तप – हे शत्रुहन्ता; अप्राप्य – बिना प्राप्त किये; माम् – मुझको; निवर्तन्ते – लौटते हैं; मृत्युः – मृत्यु के; संसार – संसार में; वर्त्मनि – पथ में |

हे परन्तप! जो लोग भक्ति में श्रद्धा नहीं रखते, वे मुझे प्राप्त नहीं कर पाते | अतः वे इस भौतिक जगत् में जन्म-मृत्यु के मार्ग पर वापस आते रहते हैं |

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मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमुर्तिना |

मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः || ४ ||

मया – मेरे द्वारा; ततम् – व्याप्त है; इदम् – यह; सर्वम् – समस्त; जगत् – दृश्य जगत; अव्यक्त-मूर्तिना – अव्यक्त रूप द्वारा; मत्-स्थानि – मुझमें; सर्व-भूतानि – समस्त जीव; न – नहीं; च – भी; अहम् – मैं; तेषु – उनमें; अवस्थितः – स्थित |

यह सम्पूर्ण जगत् मेरे अव्यक्त रूप द्वारा व्याप्त है | समस्त जीव मुझमें हैं, किन्तु मैं उनमें नहीं हूँ |

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न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्र्वरम् |

भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः || ५ ||

न – कभी नहीं; च – भी; मत्-स्थानि – मुझमें स्थित; भूतानि – सारी सृष्टि; पश्य – देखो; में – मेरा; योगम् ऐश्र्वरम् – अचिन्त्य योगशक्ति; भूत-भृत् – समस्त जीवों का पालक; न – नहीं; च – भी; भुतास्थः – विराट अभिव्यक्ति में; मम – मेरा; आत्मा – स्व, आत्म; भूत-भावनः – समस्त अभिव्यक्तियों का स्त्रोत |

तथापि मेरे द्वारा उत्पन्न सारी वस्तुएँ मुझमें स्थित नहीं रहतीं | जरा, मेरे योग-ऐश्र्वर्य को देखो! यद्यपि मैं समस्त जीवों का पालक (भर्ता) हूँ और सर्वत्र व्याप्त हूँ, लेकिन मैं इस विराट अभिव्यक्ति का अंश नहीं हूँ, मैं सृष्टि का कारणस्वरूप हूँ |

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यथाकाशस्थितो नित्यं वायु: सर्वत्रगो महान् |

तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय || ६ ||

यथा – जिस प्रकार; आकाश-स्थितः – आकाश में स्थित; नित्यम् – सदैव; वायुः- हवा; सर्वत्र-गः – सभी जगह बहने वाली; महान – महान; तथा – उसी प्रकार; सर्वाणि भूतानि – सारे प्राणी; मत्-स्थानि – मुझमें स्थित; इति – इस प्रकार; उपधारय – समझो |

जिस प्रकार सर्वत्र प्रवहमान प्रबल वायु सदैव आकाश में स्थित रहती है, उसी प्रकार समस्त उत्पन्न प्राणियों को मुझमें स्थित जानो |

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9सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् |

कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् || ७ ||

सर्वभूतानि – सारे प्राणी; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; प्रकृतिम् – प्रकृति में; यान्ति – प्रवेश करते हैं; मामिकाम् – मेरी; कल्प-क्षये – कल्पान्त में; पुनः – फिर से; तानि – उन सबों को; कल्प-आदौ – कल्प के प्रारम्भ में; विसृजामि – उत्पन्न करता हूँ; अहम् – मैं |

हे कुन्तीपुत्र! कल्प का अन्त होने पर सारे प्राणी मेरी प्रकृति में प्रवेश करते हैं और अन्य कल्प के आरम्भ होने पर मैं उन्हें अपनी शक्ति से पुनः उत्पन्न करता हूँ |

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प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः |

भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् || ८ ||

प्रकृतिम् – प्रकृति में; स्वाम् – मेरी निजी; अवष्टभ्य – प्रवेश करके; विसृजामि – उत्पन्न करता हूँ; पुनः पुनः – बारम्बार; भूत-ग्रामम् – समस्त विराट अभिव्यक्ति को; इमम् – इस; कृत्स्नम् – पूर्णतः; अवशम् – स्वतः; प्रकृतेः – प्रकृति की शक्ति के; वशात् – वश में |

सम्पूर्ण विराट जगत मेरे अधीन है | यह मेरी इच्छा से बारम्बार स्वतः प्रकट होता रहता है और मेरी ही इच्छा से अन्त में विनष्ट होता है |

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न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय |

उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु || ९ ||

न – कभी नहीं; च – भी; माम् – मुझको; कर्माणि – कर्म; निबध्नन्ति – बाँधते हैं; धनञ्जय – हे धन के विजेता; उदासीन-वत् – निरपेक्ष या तटस्थ की तरह; आसीनम् – स्थित हुआ; असक्तम् – आसक्तिरहित; तेषु – उन; कर्मसु – कार्यों में |

हे धनञ्जय! ये सारे कर्म मुझे नहीं बाँध पाते हैं | मैं उदासीन की भाँति इन सारे भौतिक कर्मों से सदैव विरक्त रहता हूँ |

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मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् |

हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते || १० ||

मया – मेरे द्वारा; अध्यक्षेण – अध्यक्षता के कारण; प्रकृतिः – प्रकृति; सूयते – प्रकट होती है; स – सहित; चर-अचरम् – जड़ तथा जंगम; हेतुना – कारण से; अनेन – इस; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; जगत् – दृश्य जगत; विपरिवर्तते – क्रियाशील है |

हे कुन्तीपुत्र! यह भौतिक प्रकृति मेरी शक्तियों में से एक है और मेरी अध्यक्षता में कार्य करती है, जिससे सारे चार तथा अचर प्राणी उत्पन्न होते हैं | इसके शासन में यह जगत् बारम्बार सृजित और विनष्ट होता रहता है |

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अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् |

परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्र्वरम् || ११ ||

अवजानन्ति – उपहास करते हैं; माम् – मुझको; मूढाः – मुर्ख व्यक्ति; मानुषीम् – मनुष्य रूप में; तनुम् – शरीर; अश्रितम् – मानते हुए; परम् – दिव्य; भावम् – स्वभाव को; अजानन्तः – न जानते हुए; मम – मेरा; भूत – प्रत्येक वस्तु का; महा-ईश्र्वरम् – परम स्वामी |

जब मैं मनुष्य रूप में अवतरित होता हूँ, तो मूर्ख मेरा उपहास करते हैं | वे मुझ परमेश्र्वर के दिव्य स्वभाव को नहीं जानते |

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मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः |

राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः || १२ ||

मोघ-आशाः – निष्फल आशा; मोघ-कर्माणः – निष्फल सकाम कर्म; मोघ-ज्ञानाः – विफल ज्ञान; विचेतसः – मोहग्रस्त; राक्षसीम् – राक्षसी; आसुरीम् – आसुरी; च – तथा; एव – निश्चय ही; प्रकृतिम् – स्वभाव को; मोहिनीम् – मोहने वाली; श्रिताः – शरण ग्रहण किये हुए |

जो लोग इस प्रकार मोहग्रस्त होते हैं, वे आसुरी तथा नास्तिक विचारों के प्रति आकृष्ट रहते हैं | इस मोहग्रस्त अवस्था में उनकी मुक्ति-आशा, उनके सकाम कर्म तथा ज्ञान का अनुशीलन सभी निष्फल हो जाते हैं |

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महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः |

भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम् || १३ ||

महा-आत्मनः – महापुरुष; तु – लेकिन; माम् – मुझको; पार्थ – हे पृथापुत्र; देवीम् – दैवी; प्रकृतिम् – प्रकृति के; आश्रिताः – शरणागत; भजन्ति – सेवा करते हैं; अनन्य-मनसः – अविचलित मन से; ज्ञात्वा – जानकर; भूत – सृष्टि का; आदिम् – उद्गम; अव्ययम् – अविनाशी |

हे पार्थ! मोहमुक्त महात्माजन दैवी प्रकृति के संरक्षण में रहते हैं | वे पूर्णतः भक्ति में निमग्न रहते हैं क्योंकि वे मुझे आदि तथा अविनाशी भगवान् के रूप में जानते हैं |

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सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्र्च दृढव्रताः |

नमस्यन्तश्र्च मां भक्तया नित्ययुक्ता उपासते || १४ ||

सततम् – निरन्तर; कीर्तयन्तः – कीर्तन करते हुए; माम् – मेरे विषयमें; यतन्तः – प्रयास करते हुए; च – भी; दृढ़-व्रताः – संकल्पपूर्वक; नमस्यन्तः –नमस्कार करते हुए; च – तथा; माम् – मुझको; भक्त्या – भक्ति में; नित्य-युक्ताः –सदैव रत रहकर; उपासते – पूजा करते हैं |

ये महात्मा मेरी महिमा का नित्य कीर्तन करते हुए दृढसंकल्प के साथप्रयास करते हुए, मुझे नमस्कार करते हुए, भक्तिभाव से निरन्तर मेरी पूजा करते हैं|

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ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ते यजन्तो मामुपासते |

एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्र्वतोमुखम् || १५ ||

ज्ञान-यज्ञेन – ज्ञान के अनुशीलन द्वारा; च – भी; अपि – निश्चय ही; अन्य – अन्य लोग; यजन्तः – यज्ञ करते हुए; माम् – मुझको; उपासते – पूजते हैं; एकत्वेन – एकान्त भव से ; पृथक्त्वेन – द्वैतभाव से; बहुधा – अनेक प्रकार से; विश्र्वतः मुखम् – विश्र्व रूप में |

अन्य लोग जो ज्ञान के अनुशीलन द्वारा यज्ञ में लगे रहते हैं, वे भगवान् की पूजा उनके अद्वय रूप में, विविध रूपों में तथा विश्र्व रूप में करते हैं |

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अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् |

मन्त्रोSहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम् || १६ ||

अहम् – मैं; क्रतुः – वैदिक अनुष्ठान, कर्मकाण्ड; अहम् – मैं; यज्ञः – स्मार्त यज्ञ; स्वधा – तर्पण; अहम् – मैं; अहम् – मैं; औषधम् – जड़ीबूटी; मन्त्रः – दिव्य ध्वनि; अहम् – मैं; एव – निश्चय ही; आज्यम् – घृत; अहम् – मैं; अग्निः – अग्नि; अहम् – मैं; हुतम् – आहुति, भेंट |

किन्तु मैं ही कर्मकाण्ड, मैं ही यज्ञ, पितरों को दिया जाने वाला अर्पण, औषधि, दिव्य ध्वनि (मन्त्र), घी, अग्नि तथा आहुति हूँ |

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पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः |

वेद्यं पवित्रम् ॐकार ऋक् साम यजुरेव च || १७ ||

पिता – पिता; अहम् – मैं; अस्य – इस; जगतः – ब्रह्माण्ड का; माता – माता; धाता – आश्रयदाता; पितामहः – बाबा; वेद्यम् – जानने योग्य; पवित्रम् – शुद्ध करने वाला; ॐकारः – ॐ अक्षर; ऋक् – ऋग्वेद; साम – सामवेद; यजुः – यजुर्वेद; एव – निश्चय ही; च – तथा |

मैं इस ब्रह्माण्ड का पिता, माता, आश्रय तथा पितामह हूँ | मैं ज्ञेय (जानने योग्य), शुद्धिकर्ता तथा ओंकार हूँ | मैं ऋग्वेद, सामवेद तथा यजुर्वेद भी हूँ |

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गतिर्भर्ता प्रभु: साक्षी निवासः शरणं सुहृत् |

प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् || १८ ||

गतिः – लक्ष्य; भर्ता – पालक; प्रभुः – भगवान्; साक्षी – गवाह; निवासः– धाम; शरणम् – शरण; सुहृत् – घनिष्ठ मित्र; प्रभवः – सृष्टि; प्रलयः – संहार;स्थानम् – भूमि, स्थिति; निधानम् – आश्रय, विश्राम स्थल; बीजम् – बीज, कारण;अव्ययम् – अविनाशी |

मैं ही लक्ष्य, पालनकर्ता, स्वामी, साक्षी, धाम, शरणस्थली तथा अत्यन्तप्रिय मित्र हूँ | मैं सृष्टि तथा प्रलय, सबका आधार, आश्रय तथा अविनाशी बीज भी हूँ|

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तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च |

अमृतं चैव मृत्युश्र्च सदसच्चाहमर्जुन || १९ ||

तपामि – ताप देता हूँ, गर्मी पहुँचाता हूँ; अहम् – मैं; अहम् – मैं; वर्षम् – वर्षा; निगृह्णामि – रोके रहता हूँ; उत्सृजामि – भेजता हूँ; च – तथा; अमृतम् – अमरत्व; च – तथा; एव – निश्चय ही; मृत्युः – मृत्यु; च – तथा; सत् – आत्मा; असत् – पदार्थ; च – तथा; अहम् – मैं; अर्जुन – हे अर्जुन |

हे अर्जुन! मैं ही ताप प्रदान करता हूँ और वर्षा को रोकता तथा लाता हूँ | मैं अमरत्व हूँ और साक्षात् मृत्यु भी हूँ | आत्मा तथा पदार्थ (सत् तथा असत्) दोनों मुझ ही में हैं |

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त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा

यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते |

ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोक-

मश्र्नन्ति दिव्यान्दिवि देवभोगान् || २० ||

त्रै-विद्याः – तीन वेदों के ज्ञाता; माम् – मुझको; सोम-पाः – सोम रसपान करने वाले; पूत – पवित्र; पापाः – पापों का; यज्ञैः – यज्ञों के साथ; इष्ट्वा – पूजा करके; स्वः-गतिम् – स्वर्ग की प्राप्ति के लिए; पार्थयन्ते – प्रार्थना करते हैं; ते – वे; पुण्यम् – पवित्र; आसाद्य – प्राप्त करके; सुर-इन्द्र – इन्द्र के; लोकम् – लोक को; अश्नन्ति – भोग करते हैं; दिव्यान् – दैवी; दिवि – स्वर्ग में; देव-भोगान् – देवताओं के आनन्द को |

जो वेदों का अध्ययन करते तथा सोमरस का पान करते हैं, वे स्वर्ग प्राप्ति की गवेषणा करते हुए अप्रत्यक्ष रूप से मेरी पूजा करते हैं | वे पापकर्मों से शुद्ध होकर, इन्द्र के पवित्र स्वर्गिक धाम में जन्म लेते हैं, जहाँ वे देवताओं का सा आनन्द भोगते हैं |

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ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं

विशालंक्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति |

एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना

गतागतं कामकामा लभन्ते || २१ ||

ते – वे; तम् – उसको; भुक्त्वा – भोग करके; स्वर्ग-लोकम् – स्वर्ग को; विशालम् – विस्तृत; क्षीणे – समाप्त हो जाने पर; पुण्ये – पुण्यकर्मों के फल; मर्त्य-लोकम् – मृत्युलोक में; विशन्ति – नीचे गिरते हैं; एवम् – इस प्रकार; त्रयी – तीनों वेदों में; धर्मम् – सिद्धान्तों के; अनुप्रपन्नाः – पालन करने वाले; गत-आगतम् – मृत्यु तथा जन्म को; काम-कामाः – इन्द्रियसुख चाहने वाले; लभन्ते – प्राप्त करते हैं |

इस प्रकार जब वे (उपासक) विस्तृत स्वर्गिक इन्द्रियसुख को भोग लेते हैं और उनके पुण्यकर्मों के फल क्षीण हो जाते हैं तो वे मृत्युलोक में पुनः लौट आते हैं | इस प्रकार जो तीनों वेदों के सिद्धान्तों में दृढ रहकर इन्द्रियसुख की गवेषणा करते हैं, उन्हें जन्म-मृत्यु का चक्र ही मिल पाता है |

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अनन्याश्र्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते

तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम् || २२ ||

अनन्याः – जिसका कोई अन्य लक्ष्य न हो, अनन्य भाव से; चिन्तयन्तः – चिन्तन करते हुए; माम् – मुझको; ये – जो; जनाः – व्यक्ति; पर्युपासते – ठीक से पूजते हैं; तेषाम् – उन; नित्य – सदा; अभियुक्तानाम् – भक्ति में लीन मनुष्यों की; योग – आवश्यकताएँ; क्षेमम् – सुरक्षा, आश्रय; वहामि – वहन करता हूँ; अहम् – मैं |

किन्तु जो लोग अनन्यभाव से मेरे दिव्यस्वरूप का ध्यान करते हुए निरन्तर मेरी पूजा करते हैं, उनकी जो आवश्यकताएँ होती हैं, उन्हें मैं पूरा करता हूँ और जो कुछ उनके पास है, उसकी रक्षा करता हूँ |

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येSप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः |

तेSपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम् || २३ ||

ये – जो; अपि – भी; अन्य – दूसरे; देवता – देवताओं के; भक्ताः – भक्तगण; यजन्ते – पूजते हैं; श्रद्धया अन्विताः - श्रद्धापूर्वक; ते – वे; अपि – भी; माम् – मुझको; एव – केवल; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; यजन्ति – पूजा करते हैं; अविधि-पूर्वकम् – त्रुटिपूर्ण ढंग से |

हे कुन्तीपुत्र! जो लोग अन्य देवताओं के भक्त हैं और उनकी श्रद्धापूर्वक पूजा कटे हैं, वास्तव में वे भी मेरी पूजा करते हैं, किन्तु वे यह त्रुटिपूर्ण ढंग से करते हैं |

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अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च |

न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते || २४ ||

अहम् – मैं; हि – निश्चित रूप से; सर्व – समस्त; यज्ञानाम् – यज्ञों का; भोक्ता – भोग करने वाला; च – तथा; प्रभुः – स्वामी; एव – भी; च – तथा; न – नहीं; तु – लेकिन; माम् – मुझको; अभिजानन्ति – जानते हैं; तत्त्वेन – वास्तव में; अतः – अतएव; च्यवन्ति – नीचे गिरते हैं; ते – वे |

मैं ही समस्त यज्ञों का एकमात्र भोक्ता तथा स्वामी हूँ | अतः जो लोग मेरे वास्तविक दिव्य स्वभाव को नहीं पहचान पाते, वे नीचे गिर जाते हैं |

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यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः |

भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोSपि माम् || २५ ||

यान्ति – जाते हैं; देव-व्रताः – देवताओं के उपासक; देवान् – देवताओं के पास; पितृृन् – पितरों के पास; यान्ति – जाते हैं; पितृ-व्रताः – पितरों के उपासक; भूतानि – भूत-प्रेतों के पास; यान्ति – जाते हैं; भूत-इज्याः – भूत-प्रेतों के उपासक; यान्ति – जाते हैं; मत् – मेरे; याजिनः – भक्तगण; अपि – लेकिन; माम् – मेरे पास |

जो देवताओं की पूजा करते हैं, वे देवताओं के बीच जन्म लेंगे, जो पितरों को पूजते हैं, वे पितरों के पास जाते हैं, जो भूत-प्रेतों की उपासना करते हैं, वे उन्हीं के बीच जन्म लेते हैं और जो मेरी पूजा करते हैं वे मेरे साथ निवास करते हैं |

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पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति |

तदहं भक्तयुपहृतमश्र्नामि प्रयतात्मनः || २६ ||

पत्रम् – पत्ती; पुष्पम् – फूल; फलम् - फल; तोयम् – जल; यः – जो कोई; मे – मुझको; भक्त्या – भक्तिपूर्वक; प्रयच्छति – भेंट करता है; तत् – वह; अहम् – मैं; भक्ति-उपहृतम् – भक्तिभाव से अर्पित; अश्नामि – स्वीकार करता हूँ; प्रयत-आत्मनः – शुद्धचेतना वाले से |

यदि कोई प्रेम तथा भक्ति के साथ मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल प्रदान करता है, तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ |

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यत्करोषि यदश्र्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् |

यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् || २७ ||

यत् – जो कुछ; करोषि – करते हो; यत् – जो भी; अश्नासि – खाते हो; यत् – जो कुछ; जुहोषि – अर्पित करते हो; ददासि – दान देते हो; यत् – जो; यत् – जो भी; तपस्यसि – तप करते हो; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; तत् – वह; कुरुष्व – करो; अर्पणम् – भेंट रूप में |

हे कुन्तीपुत्र! तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ अर्पित करते हो या दान देते हो और जो भी तपस्या करते हो, उसे मुझे अर्पित करते हुए करो |

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श्रुभाश्रुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनै: |

सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि || २८ ||

शुभ – शुभ; अशुभ – अशुभ; फलैः – फलों के द्वारा; एवम् – इस प्रकार; मोक्ष्यसे – मुक्त हो जाओगे; कर्म – कर्म के; बन्धनैः – बन्धन से; संन्यास – संन्यास के; योग – योग से; युक्त-आत्मा – मन को स्थिर करके; विमुक्तः – मुक्त हुआ; माम् – मुझे; उपैष्यसी – प्राप्त होगे |

इस तरह तुम कर्म के बन्धन तथा इसके शुभाशुभ फलों से मुक्त हो सकोगे | इस संन्यासयोग में अपने चित्त को स्थिर करके तुम मुक्त होकर मेरे पास आ सकोगे |

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समोSहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योSस्ति न प्रियः |

ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् || २९ ||

समः – समभाव; अहम् – मैं; सर्व-भूतेषु – समस्त जीवों में; न – कोई नहीं; मे – मुझको; द्वेष्यः – द्वेषपूर्ण; अस्ति – है; न – न तो; प्रियः – प्रिय; ये – जो; भजन्ति – दिव्यसेवा करते हैं; तु – लेकिन; माम् – मुझको; भक्त्या – भक्ति से; मयि – मुझमें हैं; ते – वे व्यक्ति; तेषु – उनमें; च – भी; अपि – निश्चय ही; अहम् – मैं |

मैं न तो किसी से द्वेष करता हूँ, न ही किसी के साथ पक्षपात करता हूँ | मैं सबों के लिए समभाव हूँ | किन्तु जो भी भक्तिपूर्वक मेरी सेवा करता है, वह मेरा मित्र है, मुझमें स्थित रहता है और मैं भी उसका मित्र हूँ |

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अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् |

साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः || ३० ||

अपि – भी; चेत् – यदि; सु-दुराचारः – अत्यन्त गर्हित कर्म करने वाला; भजते – सेवा करता है; माम् – मेरी; अनन्य-भाक् – बिना विचलित हुए; साधुः – साधु पुरुष; एव – निश्चय ही; सः – वह; मन्तव्यः – मानने योग्य; सम्यक् – पूर्णतया; व्यवसितः – संकल्प करना; हि – निश्चय ही; सः – वह |

यदि कोई जघन्य से जघन्य कर्म करता है, किन्तु यदि वह भक्ति में रत रहता है तो उसे साधु मानना चाहिए, क्योंकि वह अपने संकल्प में अडिग रहता है |

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क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्र्वच्छान्तिं निगच्छति |

कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति || ३१ ||

क्षिप्रम् – शीघ्र; भवति – बन जाता है; धर्म-आत्मा – धर्मपरायण; शश्र्वत-शान्तिम् – स्थायी शान्ति को; निगच्छति – प्राप्त करता है; कौन्तेय – हे कुन्तीपुत्र; प्रतिजानीहि – घोषित कर दो; न – कभी नहीं; मे – मेरा; भक्तः – भक्त; प्रणश्यति – नष्ट होता है |

वह तुरन्त धर्मात्मा बन जाता है और स्थायी शान्ति को प्राप्त होता है | हे कुन्तीपुत्र! निडर होकर घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता है |

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मांहिपार्थव्यपाश्रित्ययेSपिस्यु: पापयोनयः |

स्त्रियोवैश्यास्तथा शुद्रास्तेSपियान्तिपरांगतिम् || ३२ ||

माम् – मेरी; हि – निश्चय ही; पार्थ – हे पृथापुत्र; व्यपाश्रित्य – शरण ग्रहण करके; ये – जो; अपि – भी; स्युः – हैं; पाप-योनयः – निम्नकुल में उत्पन्न; स्त्रियः – स्त्रियाँ; वैश्याः – वणिक लोग; तथा – भी; शूद्राः – निम्न श्रेणी के व्यक्ति; ते अपि – वे भी; यान्ति – जाते हैं; पराम् – परम; गतिम् – गन्तव्य को |

हे पार्थ! जो लोग मेरी शरण ग्रहण करते हैं, वे भले ही निम्नजन्मा स्त्री, वैश्य (व्यापारी) तथा शुद्र (श्रमिक) क्यों न हों, वे परमधाम को प्राप्त करते हैं |

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किंपुनर्ब्राह्मणाःपुण्याभक्ताराजर्षयस्तथा |

अनित्यमसुखंलोकमिमंप्राप्यभजस्वमाम् || ३३ ||

किम् – क्या, कितना; पुनः – फिर; ब्राह्मणाः – ब्राह्मण; पुण्याः – धर्मात्मा; भक्ताः – भक्तगण; राज-ऋषयः – साधु राजे; तथा – भी; अनित्यम् – नाशवान; असुखम् – दुखमय; लोकम् – लोक को; इमम् – इस; प्राप्य – प्राप्त करके; भजस्व – प्रेमाभक्ति में लगो; माम् – मेरी |

फिर धर्मात्मा ब्राह्मणों, भक्तों तथा राजर्षियों के लिए तो कहना ही क्या है! अतः इस क्षणिक दुखमय संसार में आ जाने पर मेरी प्रेमाभक्ति में अपने आपको लगाओ |

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मन्मनाभवमद्भक्तोमद्याजीमांनमस्कुरु |

मामेवैष्यसियुक्त्वैवमात्मनंमत्परायणः || ३४ ||

मत्–मनाः - सदैव मेरा चिन्तन करने वाला; भव – होओ; मत् – मेरा; भक्तः – भक्त; मत् – मेरा; याजी – उपासक; माम् – मुझको; नमस्कुरु – नमस्कार करो; माम् – मुझको; एव – निश्चय ही; एष्यसि – पाओगे; युक्त्वा – लीन होकर; एवम् – इस प्रकार; आत्मानम् – अपनी आत्मा को; मत्-परायणः – मेरी भक्ति में अनुरक्त |

अपने मन को मेरे नित्य चिन्तन में लगाओ, मेरे भक्त बनो, मुझे नमस्कार करो और मेरी ही पूजा करो | इस प्रकार मुझमें पूर्णतया तल्लीन होने पर तुम निश्चित रूप से मुझको प्राप्त होगे |

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