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अध्याय 18 - उपसंहार - संन्यास की सिद्धि

अर्जुन उवाच

सन्न्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम्‌ ।

त्यागस्यथ च हषीकेश पृथक्रेशिनिषूदन ॥ १॥

अर्जुन: उवाच--अर्जुन ने कहा; सन्न्यासस्य--संन्यास ( त्याग ) का; महा-बाहो--हे

बलशाली भुजाओं वाले; तत्त्वमू--सत्य को; इच्छामि--चाहता हूँ; वेदितुम्‌ू--जानना;

त्यागस्थ-त्याग ( संन्यास ) का; च-- भी; हषीकेश--हे इन्द्रियों के स्वामी; पृथक्‌--

भिन्न रूप से; केशी-निषूदन--हे केशी असुर के संहर्ता |

अर्जुन ने कहा--हे महाबाहु! मैं त्याग का उद्देश्य जानने

का इच्छुक हूँ और हे केशिनिषूदन, हे हषीकेश! मैं त्यागमय

जीवन ( संन्यास आश्रम ) का भी उद्देश्य जानना चाहता हूँ।

*

रीभगवानुवाच

काम्यानां कर्मणां न्यासं सन््यासं कवयो विदुः ।

सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणा: ॥ २॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; काम्यानामू-काम्यकर्मों का; कर्मणाम्‌--

कर्मो का; न्यासम्‌-त्याग; सन््यासम्‌--संन्यास; कवय: --विद्वान जन; विदु: --जानते

हैं; सर्व--समस्त; कर्म--कर्मो का; फल--फल; त्यागम्‌--्याग को; प्राहु:--कहते

हैं; त्यागम्‌-त्याग; विचक्षणा:-- अनुभवी |.

भगवान्‌ ने कहा--भौतिक इच्छा पर आधारित कर्मों के

परित्याग को विद्वान लोग संन्यास कहते हैं और समस्त कर्मों

के फल-त्याग को बुद्धिमान लोग त्याग कहते हैं।

*

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिण: ।

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ॥ ३॥

त्याज्यमू--त्याजनीय; दोष-वत्‌--दोष के समान; इति--इस प्रकार; एके --एक समूह

के; कर्म--कर्म; प्राहु:--कहते हैं; मनीषिण: --महान चिन्तक; यज्ञ-यज्ञ; दान--

दान; तपः--तथा तपस्या का; कर्म--कर्म; न--कभी नहीं; त्याज्यम्‌ू--त्यागने चाहिए;

इति--इस प्रकार; च--तथा; अपरे--अन्य

कुछ विद्वान घोषित करते हैं कि समस्त प्रकार के सकाम

कर्मों को दोषपूर्ण समझ कर त्याग देना चाहिए। किन्तु अन्य

विद्वान्‌ मानते हैं कि यज्ञ, दान तथा तपस्या के कर्मो को कभी

नहीं त्यागना चाहिए।

*

निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम ।

त्यागो हि पुरुषव्याप्र त्रिविध: सम्प्रकीर्तितः ॥ ४॥

निश्चयम्‌--निश्चय को; श्रुणु--सुनो; मे--मेरे; तत्र--वहाँ; त्यागे--त्याग के विषय में;

भरत-सतू-तम--हे भरतश्रेष्ठ; त्याग:--त्याग; हि--निश्चय ही; पुरुष-व्याप्र--हे मनुष्यों

में बाघ; त्रि-विध:--तीन प्रकार का; सम्प्रकीर्तित:--घोषित किया जाता है।.

हे भरतश्रेष्ठ) अब त्याग के विषय में मेरा निर्णय सुनो। हे

नरशार्दूल! शास्त्रों में वाग तीन तरह का बताया गया है।

*

यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यं कार्यमेव तत्‌ ।

यज्ञो दानं तपश्चेव पावनानि मनीषिणाम्‌ ॥ ५॥

यज्ञ--यज्ञ; दान--दान; तप:ः--तथा तप का; कर्म--कर्म; न--कभी नहीं;

त्याज्यमू-त्यागने के योग्य; कार्यमू--करना चाहिए; एव--निश्चय ही; तत्‌--उसे;

यज्ञ:--यज्ञ; दानम्‌--दान; तपः--तप; च-- भी; एव--निश्चय ही; पावनानि--शुद्ध

करने वाले; मनीषिणाम्‌--महात्माओं के लिए भी |.

यज्ञ, दान तथा तपस्या के कर्मों का कभी परित्याग नहीं

करना चाहिए, उन्हें अवश्य सम्पन्न करना चाहिए। निस्सन्देह

यज्ञ, दान तथा तपस्या महात्माओं को भी शुद्ध बनाते हैं।

*

एतान्यपि तु कर्माणि सड़ूं त्यक्वा फलानिच ।

कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्‌ ॥ ६॥

एतानि--ये सब; अपि--निश्चय ही; तु--लेकिन; कर्माणि--कार्य; सड्रम्‌ू--संगति

को; त्वक्त्वा--त्यागकर; फलानि-- फलों को; च--भी; कर्तव्यानि--कर्तव्य समझ

कर करने चाहिए; इति--इस प्रकार; मे--मेरा; पार्थ--हे पृथापुत्र; निश्चितम्‌--निश्चित;

मतमू--मत; उत्तममू- श्रेष्ठ |

इन सारे कार्यों को किसी प्रकार की आसक्ति या फल की

आशा के बिना सम्पन्न करना चाहिए हे पृथापुत्र! इन्हें कर्तव्य

मानकर सम्पन्न किया जाना चाहिए। यही मेरा अन्तिम मत है।

*

नियतस्य तु सन्न्यास: कर्मणो नोपपद्यते ।

मोहात्तस्य परित्यागस्तामसः परिकीर्तित: ॥ ७॥

नियतस्थ--नियत, निर्दिष्ट ( कार्य ) का; तु--लेकिन; सन्न्यास:--संन्यास, त्याग;

कर्मण:--कर्मों का; न--कभी नहीं; उपपद्यते--योग्य होता है; मोहात्‌ू--मोहवश;

तस्य--उसका; परित्याग:--त्याग देना; तामस:--तमोगुणी; परिकीर्तित:--घोषित

किया जाता है

निर्दिष्ट कर्तव्यों को कभी नहीं त्यागना चाहिए। यदि कोई

मोहवश अपने नियत कर्मों का परित्याग कर देता है, तो ऐसे

त्याग को तामसी कहा जाता है।

*

दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेतू ।

स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्‌ ॥ ८॥

दुःखम्‌--दुःखी; इति--इस प्रकार; एब--निश्चय ही; यत्‌--जो; कर्म--कार्य;

काय--शरीर के लिए; क्लेश--कष्ट के; भयात्‌-- भय से; त्यजेत्‌-त्याग देता है;

सः--वह; कृत्वा--करके; राजसम्‌--रजोगुण में; त्यागम्‌--त्याग; न--नहीं; एब--

निश्चय ही; त्याग--त्याग; फलमू--फल को; लभेत्‌--प्राप्त करता है

जो व्यक्ति नियत कर्मों को कष्टप्रद समझ कर या

शारीरिक क्लेश के भय से त्याग देता है, उसके लिए कहा

जाता है कि उसने यह त्याग रजोगुण में किया है। ऐसा करने

से कभी त्याग का उच्चफल प्राप्त नहीं होता।

*

कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेर्जुन ।

सड़ूं त्यक्त्वा फलं चैव स त्याग: सात्त्विको मत: ॥ ९॥

कार्यमू--करणीय; इति--इस प्रकार; एब--निस्सन्देह; यत्‌--जो; कर्म--कर्म;

नियतम्‌--निर्दिष्ट; क्रियते--किया जाता है; अर्जुन--हे अर्जुन; सड्रमू--संगति, संग;

त्यक्त्वा--त्याग कर; फलमू--फल; च-- भी; एव--निश्चय ही; सः--वह; त्याग:

त्याग; सात्त्विक:--सात्त्विक, सतोगुणी; मत:--मेरे मत से ॥

हे अर्जुन! जब मनुष्य नियत कर्तव्य को करणीय मान कर

करता है और समस्त भौतिक संगति तथा फल की आसक्ति

को त्याग देता है, तो उसका त्याग सात्त्विक कहलाता है।

*

न द्वेष्ग्कुशलं कर्म कुशले नानुषज्जते ।

त्यागी सत्त्वसमाविष्टो मेधावी छिन्नसंशय: ॥ १०॥

न--नहीं; द्वेष्टि--घृणा करता है; अकुशलम्‌--अशुभ; कर्म--कर्म; कुशले--शुभ में;

न--न तो; अनुषजते--आसक्त होता है; त्यागी--त्यागी; सत्त्व--सतोगुण में;

समाविष्ट:--लीन; मेधावी--बुद्धिमान; छिन्न--छिन्न हुए; संशयः--समस्त संशय या

संदेह,

सतोगुण में स्थित बुद्धिमान त्यागी, जो न तो अशुभ कर्म

से घृणा करता है, न शुभकर्म से लिप्त होता है, वह कर्म के

विषय में कोई संशय नहीं रखता।

*

न हि देहभूता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः ।

यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते ॥ ११॥

न--कभी नहीं; हि--निश्चय ही; देह-भृता--देहधारी द्वारा; शक्यम्‌--सम्भव है;

त्यक्तुमू--त्यागने के लिए; कर्माणि--कर्म; अशेषत:--पूर्णतया; यः--जो; तु--

लेकिन; कर्म--कर्म के; फल--फल का; त्यागी--त्याग करने वाला; सः--वह;

त्यागी--त्यागी; इति--इस प्रकार; अभिधीयते--कहलाता है|.

निस्सन्देह किसी भी देहधारी प्राणी के लिए समस्त कर्मों

का परित्याग कर पाना असम्भव है। लेकिन जो कर्मफल का

परित्याग करता है, वह वास्तव में त्यागी कहलाता है।

*

अनिष्टठमिष्टे मिश्र॑ च त्रिविधं कर्मण: फलम्‌ ।

भवत्यत्यागिनां प्रेत्य न तु सन््यासिनां क्वचित्‌ ॥ १२॥

अनिष्टमू--नरक ले जाने वाले; इष्टम्‌-स्वर्ग ले जाने वाले; मिश्रमू--मिश्रित; च--

तथा; त्रि-विधम्‌--तीन प्रकार; कर्मण: --कर्म का; फलम्‌--फल; भवति--होता है;

अत्यागिनाम्‌-त्याग न करने वालों को; प्रेत्य--मरने के बाद; न--नहीं; तु--लेकिन;

सन्न्यासिनामू--संन्यासी के लिए; क्वचित्‌--किसी समय, कभी,

जो त्यागी नहीं है, उसके लिए इच्छित ( इष्ट ), अनिच्छित

( अनिष्ट ) तथा मिश्रित--ये तीन प्रकार के कर्मफल मृत्यु के

बाद मिलते हैं। लेकिन जो संन्यासी हैं, उन्हें ऐसे फल का

सुख-दुख नहीं भोगना पड़ता।

*

पञ्जैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।

साड्ख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम्‌ ॥ १३॥

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्‌ ।

विविधाश्च पृथक्रेष्टा दैवं चैवात्र पञ्ञमम्‌ ॥ १४॥

पश्ञ--पाँच; एतानि--ये; महा-बाहो--हे महाबाहु; कारणानि--कारण; निबोध--

जानो; मे--मुझसे; साड्ख्ये--वेदान्त में; कृत-अन्ते--निष्कर्ष रूप में; प्रोक्तानि--कहा

गया; सिद्धये--सिद्धि के लिए; सर्व--समस्त; कर्मणाम्‌--कर्मो का।

अधिष्ठानम्‌--स्थान; तथा-- और; कर्ता--करने वाला; करणम्‌--उपकरण यन्त्र

( इन्द्रियाँ) ; च--तथा; पृथक्‌-विधम्‌--विभिन्न प्रकार के; विविधा:--नाना प्रकार

के; च--तथा; पृथक्‌--पृथक पृथक; चेष्टा:--प्रयास; दैवम्‌--परमात्मा; च-- भी;

एव--निश्चय ही; अत्र--यहाँ; पशञ्ममम्‌--पाँचवा |

हे महाबाहु अर्जुन! वेदान्त के अनुसार समस्त कर्म की

पूर्ति के लिए पाँच कारण हैं। अब तुम इन्हें मुझसे सुनो।

कर्म का स्थान ( शरीर ), कर्ता, विभिन्न इन्द्रियाँ, अनेक

प्रकार की चेष्टाएँ तथा परमात्मा--ये पाँच कर्म के कारण हैं।

*

शरीरवाड्मनोभिर्य त्कर्म प्रारभते नर: ।

न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्ञेते तस्थ हेतवः ॥ १५॥

शरीर--शरीर से; वाक्‌--वाणी से; मनोभि: --तथा मन से; यत्‌--जो; कर्म --कर्म;

प्रारभते-- प्रारम्भ करता है; नरः--व्यक्ति; न्याय्यमू--उचित, न्यायपूर्ण; वा--अथवा;

विपरीतम्‌--( न्याय ) विरुद्ध; वा--अथवा; पशञ्ञ-- पाँच; एते--ये सब; तस्य--उसके;

हेतव:ः--कारण |

मनुष्य अपने शरीर, मन या वाणी से जो भी उचित या

अनुचित कर्म करता है, वह इन पाँच कारणों के फलस्वरूप

होता है।

*

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।

पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मति: ॥ १६॥

तत्र--वहाँ; एवम्‌--इस प्रकार; सति--होकर; कर्तारम्‌--कर्ता; आत्मानम्‌ू--स्वयं

का; केवलम्‌--केवल; तु-- लेकिन; यः--जो; पश्यति--देखता है; अकृत-

बुद्धित्वात्‌-कुबुद्धि के कारण; न--कभी नहीं; सः--वह; पश्यति--देखता है;

दुर्मतिः-मूर्ख |.

अतएव जो इन पाँचों कारणों को न मान कर अपने

आपको ही एकमात्र कर्ता मानता है, वह निश्चय ही बहुत

बुद्धिमान नहीं होता और वस्तुओं को सही रूप में नहीं देख

सकता।

*

यस्य नाहड्डूतो भावो बुद्धिदर्यस्थ न लिप्यते ।

हत्वापि स इमाँल्लोकान्न हन्ति न निबध्यते ॥ १७॥

यस्य--जिसके; न--नहीं; अहड्डू तः --मिथ्या अहंकार का; भाव: --स्वभाव;

बुद्धिः--बुद्धि; यस्थ--जिसकी; न--कभी नहीं; लिप्यते--आसक्त होता है; हत्वा--

मारकर; अपि-- भी; सः--वह; इमान्‌ू--इस; लोकान्‌--संसार को; न--कभी नहीं;

हन्ति--मारता है; न--कभी नहीं; निबध्यते--बद्ध होता है।.

जो मिथ्या अहंकार से प्रेरित नहीं है, जिसकी बुद्धि बँधी

नहीं है, वह इस संसार में मनुष्यों को मारता हुआ भी नहीं

मारता। न ही वह अपने कर्मों से बँधा होता है।

*

ञान ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना ।

करणं कर्म कर्तेति त्रिविध: कर्मसड्ग्रहः ॥ १८॥

ज्ञानमू--ज्ञान; ज्ञेयम्‌--ज्ञान का लक्ष्य ( जानने योग्य ) ; परिज्ञाता--जानने वाला; त्रि-

विधा--तीन प्रकार के; कर्म--कर्म की; चोदना--प्रेरणा ( अनुप्रेरणा ) ; करणम्‌--

इन्द्रियाँ; कर्म--कर्म ; कर्ता--कर्ता; इति--इस प्रकार; त्रि-विध:--तीन प्रकार के;

कर्म--कर्म के; सड्ग्रह:--संग्रह, संचय।

ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञाता-- ये तीनों कर्म को प्रेरणा देने

वाले कारण हैं। इन्द्रियाँ (करण ), कर्म तथा कर्ता-- ये

तीन कर्म के संघटक हैं।

*

ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधेव गुणभेदतः ।

प्रोच्यते गुणसड्ख्याने यथावच्छुणु तान्यपि ॥ १९॥

ज्ञानमू--ज्ञान; कर्म--कर्म; च--भी; कर्ता--कर्ता; च-- भी; त्रिधा--तीन प्रकार का;

एव--निश्चय ही; गुण-भेदतः--प्रकृति के विभिन्न गुणों के अनुसार; प्रोच्यते--कहे

जाते हैं; गुण-सड्ख्याने--विभिन्न गुणों के रूप में; यथा-वत्‌--जिस रूप में हैं उसी में;

श्रुणु--सुनो; तानि--उन सबों को; अपि--भी |

प्रकृति के तीन गुणों के अनुसार ही ज्ञान, कर्म तथा कर्ता

के तीन-तीन भेद हैं। अब तुम मुझसे इन्हें सुनो।

*

सर्वभूतेषु येनेके भावमव्ययमीक्षते ।

अविभक्तं विभक्तेषु तज्ज्ञानं विद्धि सात्त्तिकम्‌ ॥ २०॥

सर्व-भूतेषु--समस्त जीवों में; येन--जिससे; एकम्‌--एक; भावम्‌--स्थिति;

अव्ययमू--अविनाशी; ईक्षते--देखता है; अविभक्तमू-- अविभाजित; विभक्तेषु --

अनन्त विभागों में बँटे हुए में; तत्‌--उस; ज्ञानम्‌--ज्ञान को; विर्द्धि--जानो;

सात्त्विकमू--सतोगुणी |

जिस ज्ञान से अनन्त रूपों में विभक्त सारे जीवों में एक ही

अविभक्त आध्यात्मिक प्रकृति देखी जाती है, उसे ही तुम सात्त्विक जानो।

*

पृथक्त्वेन तु यज्ज्ञानं नानाभावान्पूथग्विधान्‌ ।

वेत्ति सर्वेषु भूतेषु तज्ज्ञानं विद्धि राजसम्‌ ॥ २१॥

पृथक्त्वेन--विभाजन के कारण; तु--लेकिन; यत्‌--जो; ज्ञानम्‌--ज्ञान; नाना-

भावान्‌--अनेक प्रकार की अवस्थाओं को; पृथक्‌-विधान्‌ू--विभिन्न; वेत्ति--जानता

है; सर्वेषु--समस्त; भूतेषु--जीवों में; तत्‌--उस; ज्ञानम्‌--ज्ञान को; विदर्द्धि-- जानो;

राजसम्‌--राजसी |.

जिस ज्ञान से कोई मनुष्य विभिन्न शरीरों में भिन्न-भिन्न

प्रकार का जीव देखता है, उसे तुम राजसी जानो।

*

यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्‌ ।

अतत्त्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्‌ ॥ २२॥

यत्‌--जो; तु--लेकिन; कृत्स्न-वत्‌--पूर्ण रूप से; एकस्मिन्‌ू--एक; कार्ये--कार्यय में;

सक्तम्‌--आसक्त; अहैतुकम्‌--बिना हेतु के; अतत्त्व-अर्थ-वत्‌--वास्तविकता के ज्ञान

से रहित; अल्पम्‌--अति तुच्छ; च--तथा; तत्‌--वह; तामसम्‌--तमोगुणी;

उदाहतम्‌--कहा जाता है।

और वह ज्ञान, जिससे मनुष्य किसी एक प्रकार के कार्य

को, जो अति तुच्छ है, सब कुछ मान कर, सत्य को जाने

बिना उसमें लिप्त रहता है, तामसी कहा जाता है।

*

नियतं सड्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्‌ ।

अफलतलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते ॥ २३॥

नियतम्‌--नियमित; सड़-रहितम्‌--आसक्ति रहित; अराग-द्वेषत:ः--राग-द्वेष से रहित;

कृतमू--किया गया; अफल-प्रेप्सुना--फल की इच्छा से रहित वाले के द्वारा; कर्म--

कर्म; यत्‌--जो; तत्‌--वह; सात्त्विकम्‌--सतोगुणी; उच्यते--कहा जाता है.

जो कर्म नियमित है और जो आसक्ति, राग या द्वेष से

रहित कर्मफल की चाह के बिना किया जाता है, वह

सात्त्विक कहलाता है।

*

यत्तु कामेप्सुना कर्म साहड्डारेण वा पुनः ।

क्रियते बहुलायासं तद्राजसमुदाहतम्‌ ॥ २४॥

यत्‌--जो; तु--लेकिन; काम-ईप्सुना--फल की इच्छा रखने वाले के द्वारा; कर्म--

कर्म; स-अहड्ढडारेण--अहंकार सहित; वा--अथवा; पुन:--फिर; क्रियते--किया

जाता है; बहुल-आयासम्‌--कठिन परिश्रम से; तत्‌--वह; राजसम्‌--राजसी;

उदाहतम्‌--कहा जाता है।.

लेकिन जो कार्य अपनी इच्छा पूर्ति के निमित्त

प्रयासपूर्वक एवं मिथ्या अहंकार के भाव से किया जाता है,

वह रजोगुणी कहा जाता है।

*

अनुबन्ध॑ क्षयं हिंसामनपेक्ष्य च पौरुषम्‌ ।

मोहादारभ्यते कर्म यत्तत्तामसमुच्यते ॥ २५॥

अनुबन्धम्‌-- भावी बन्धन का; क्षयम्‌--विनाश; हिंसाम्‌ू--तथा अन्यों को कष्ट;

अनपेक्ष्य--परिणाम पर विचार किये बिना; च-- भी; पौरुषम्‌--सामर्थ्य को;

मोहात्‌--मोह से; आरभ्यते--प्रारम्भ किया जाता है; कर्म--कर्म; यत्‌--जो; तत्‌--

वह; तामसम्‌--तामसी; उच्चते--कहा जाता है,

जो कर्म मोहवश शास्त्रीय आदेशों की अवहेलना करके

तथा भावी बन्धन की परवाह किये बिना या हिंसा अथवा

अन्यों को दुख पहुँचाने के लिए किया जाता है, वह तामसी

कहलाता है।

*

रीभगवानुवाच

काम्यानां कर्मणां न्यासं सन््यासं कवयो विदुः ।

सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणा: ॥ २६॥

असिद्धबो:--तथा विफलता में; निर्विकार:--बिना परिवर्तन के; कर्ता--कर्ता;

सात्त्विक:--सतोगुणी; उच्यते--कहा जाता है।.

जो व्यक्ति भौतिक गुणों के संसर्ग के बिना अहंकाररहित,

संकल्प तथा उत्साहपूर्वक अपना कर्म करता है और सफलता

अथवा असफलता में अविचलित रहता है, वह सात्त्विक कर्ता

कहलाता है।

*

रागी कर्मफलप्रेप्सु्लुब्धो हिंसात्मकोइशुचि: ।

हर्षशोकान्वितः कर्ता राजस: परिकीर्तित: ॥ २७॥

रागी--अत्यधिक आसक्त; कर्म-फल--कर्म के फल की; प्रेप्स:--इच्छा करते हुए;

लुब्ध:--लालची; हिंसा-आत्मक:--सदैव ईर्ष्यालु; अशुचि: --अपवित्र; हर्ष-शोक-

अन्वितः--हर्ष तथा शोक से युक्त; कर्ता--ऐसा कर्ता; राजस:--रजोगुणी;

परिकीर्तित:ः--घोषित किया जाता है।.

जो कर्ता कर्म तथा कर्म-फल के प्रति आसक्त होकर

फलों का भोग करना चाहता है तथा जो लोभी, सदैव

ईर्ष्यालु, अपवित्र और सुख-दुख से विचलित होने वाला है,

वह राजसी कहा जाता है।

*

1अयुक्त: प्राकृतः स्तब्ध: शठो नैष्कृतिकोडलस: ।

विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते ॥ २८॥

अयुक्त:--शास्त्रों के आदेशों को न मानने वाला; प्राकृतः--भौतिकवादी; स्तब्ध:--

हठी; शठ:--कपटी; नैष्कृतिक:--अन्यों का अपमान करने में पठु; अलस:--

आलसी; विषादी--खिन्न; दीर्घ-सूत्री--ऊँघ-ऊँघ कर काम करने वाला, देर लगाने

वाला; च--भी; कर्ता--कर्ता; तामस:--तमोगुणी; उच्यते--कहलाता है |

जो कर्ता सदा शास्त्रों के आदेशों के विरुद्ध कार्य करता

रहता है, जो भौतिकवादी, हठी, कपटी तथा अन्यों का

अपमान करने में पटु है तथा जो आलसी, सदैव खिन्न तथा

काम करेने में दीर्घसूत्री है, वह तमोगुणी कहलाता है।

*

बुद्धेर्भदं धृतेश्वेव गुणतर्त्रिविधं श्रुणु ।

प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनञझय ॥ २९॥

बुद्धेः--बुद्धि का; भेदम्‌ू-- अन्तर; धृतेः--धैर्य का; च-- भी; एव--निश्चय ही;

गुणतः-यगुणों के द्वारा; त्रि-विधम्‌--तीन प्रकार के; श्रूणु--सुनो; प्रोच्यमानम्‌--जैसा

मेरे द्वारा कहा गया; अशेषेण--विस्तार से; पृथक्त्वेन--भिन्न प्रकार से; धनञ़्य--हे

सम्पत्ति के विजेता।

हे धनझ्जय! अब मैं प्रकृति के तीनों गुणों के अनुसार तुम्हें

विभिन्न प्रकार की बुद्धि तथा धृति के विषय में विस्तार से

बताऊँगा। तुम इसे सुनो।

*

प्रवृत्ति च निवृत्ति च कार्याकार्ये भयाभये ।

बन्ध॑ मोक्ष च या वेत्ति बुद्धि: सा पार्थ साक्त्तिकी ॥ ३०॥

प्रवृत्तिमू--कर्म को; च--भी; निवृत्तिमू--अकर्म को; च--तथा; कार्य--करणीय;

अकार्ये--तथा अकरणीय में; भय-- भय; अभये--तथा निडरता में; बन्धम्‌--बन्धन;

मोक्षम्‌-मोक्ष; च--तथा; या--जो; वेत्ति--जानता है; बुद्धि: --बुद्धि; सा--वह;

पार्थ--हे पृथापुत्र; सात्त्विकी--सतोगुणी |

हे पृथापुत्र! वह बुद्धि सतोगुणी है, जिसके द्वारा मनुष्य

यह जानता है कि क्या करणीय है और क्‍या नहीं है, किससे

डरना चाहिए और किससे नहीं, क्‍या बाँधने वाला है और क्‍या

मुक्ति देने वाला है।

*

यया धर्ममधर्म च कार्य चाकार्यमेव च ।

अयथावत्प्रजानाति बुर्द्धि: सा पार्थ राजसी ॥ ३१॥

यया--जिसके द्वारा; धर्मम्‌-धर्म को; अधर्मम्‌--अधर्म को; च--तथा; कार्यम्‌--

करणीय; च--भी; अकार्यम्‌--अकरणीय को; एव--निश्चय ही; च-- भी; अयथा-

वत्‌--अधूरे ढंग से; प्रजानाति--जानती है; बुर्द्धिः:--बुद्धि; सा--वह; पार्थ--हे

पृथापुत्र; राजसी--रजोगुणी |

हे पृथापुत्र! जो बुद्धि धर्म तथा अधर्म, करणीय तथा

अकरणीय कर्म में भेद नहीं कर पाती, वह राजसी है।

*

अधर्म धर्ममिति या मन्यते तमसावृता ।

सर्वार्थान्विपरीतां श्र बुद्धि: सा पार्थ तामसी ॥ ३२॥

अधर्मम्‌--अधर्म को; धर्मम्‌--धधर्म; इति--इस प्रकार; या--जो; मन्यते--सोचती है;

तमसा-- भ्रम से; आवृता--आच्छादित, ग्रस्त; सर्व-अर्थान्‌--सारी वस्तुओं को;

विपरीतान्‌--उल्टी दिशा में; च-- भी; बुर्दधिः--बुद्धि; सा--वह; पार्थ--हे पृथापुत्र;

तामसी--तमोगुण से युक्त |

जो बुद्धि मोह तथा अंधकार के वशीभूत होकर अधर्म को

धर्म और धर्म को अधर्म मानती है और सदैव विपरीत दिशा में

प्रयत्न करती है, हे पार्थ! वह तामसी है।

*

धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रिया: ।

योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्त्विकी ॥ ३३॥

धृत्या--संकल्प, धृति द्वारा; यया--जिससे; धारयते-- धारण करता है; मनः--मन

को; प्राण-- प्राण; इन्द्रिय--तथा इन्द्रियों के; क्रिया:--कार्यकलापों को; योगेन--

योगाभ्यास द्वारा; अव्यभिचारिण्या--तोड़े बिना, निरन्तर; धृति:--धृति; सा--वह;

पार्थ--हे पृथापुत्र; सात्त्विकी--सात्त्विक |.

हे पृथापुत्र! जो अटूट है, जिसे योगाभ्यास द्वारा अचल

रहकर धारण किया जाता है और जो इस प्रकार मन, प्राण

तथा इन्द्रियों के कार्यकलापों को वश में रखती है, वह धृति

सात्त्विक है।

*

यया तु धर्मकामारर्थान्धृत्या धारयतेडर्जुन ।

प्रसड़ेन फलाकाडक्षी धृति: सा पार्थ राजसी ॥ ३४॥

यया--जिससे; तु--लेकिन; धर्म--धार्मिकता; काम--इन्द्रियतृप्ति; अर्थानू--तथा

आर्थिक विकास को; धृत्या--संकल्प या धृति से; धारयते-- धारण करता है;

अर्जुन-हे अर्जुन; प्रसड़ेन--आसक्ति के कारण; फल-आकाइक्षी--कर्मफल की

इच्छा करने वाला; धृतिः:--संकल्प या धृति; सा--वह; पार्थ--हे पृथापुत्र; राजसी--

रजोगुणी |

लेकिन हे अर्जुन! जिस धृति से मनुष्य धर्म, अर्थ तथा

काम के फलों में लिप्त बना रहता है, वह राजसी है।

*

यया स्वप्नं भयं शोकं विषादं मदमेव च ।

न विमुज्ञति दुर्मेधा धृति: सा पार्थ तामसी ॥ ३५॥

यया--जिससे; स्वजम्‌--स्वप्त; भयम्‌-- भय; शोकम्‌--शोक; विषादम्‌--विषाद,

खिन्नता; मदम्‌--मोह को; एब--निश्चय ही; च-- भी; न--कभी नहीं; विमुज्ञति--

त्यागती है; दुर्मेधा--दुर्बुर्द्धि धृतिः-- धृति; सा--वह; पार्थ--हे पृथापुत्र; तामसी--

तमोगुणी |

हे पार्थ! जो धृति स्वप्न, भय, शोक, विषाद तथा मोह के

परे नहीं जाती, ऐसी दुर्बुद्ध्धिपूर्ण धृति तामसी है।

*

सुखं त्विदानीं त्रिविधं श्रुणु मे भरतर्षभ ।

अभ्यासाद्रमते यत्र दुःखान्तं च निगच्छति ॥ ३६॥

यत्तदग्रे विषमिव परिणामेमृतोपमम्‌ ।

तत्सुखं सात्त्विकं प्रोक्तमात्मबुर्द्धिप्रसादजम्‌ ॥ ३७॥

सुखम्‌--सुख; तु--लेकिन; इदानीमू--अब; त्रि-विधम्‌--तीन प्रकार का; श्रणु--

सुनो; मे--मुझसे; भरत-ऋषभ--हे भरतश्रेष्ठ; अभ्यासात्‌--अभ्यास से; रमते--

भोगता है; यत्र--जहाँ; दुःख--दुःख का; अन्तमू-- अन्त; च-- भी; निगच्छति-- प्राप्त

करता है।

यतू--जो; तत्‌--वह; अग्रे-- आरम्भ में; विषम्‌ इब--विष के समान; परिणामे-- अन्त

में; अमृत-- अमृत; उपमम्‌--सहृश; तत्‌--वह; सुखम्‌--सुख; सात्त्विकम्‌--

सतोगुणी; प्रोक्तमू--कहलाता है; आत्म--अपनी; बुद्धि--बुद्धि की; प्रसाद-जम्‌--

तुष्टि से उत्पन्न |

हे भरतश्रेष्ट)! अब मुझसे तीन प्रकार के सुखों के विषय में

सुनो, जिनके द्वारा बद्धजीव भोग करता है और जिसके द्वारा

कभी-कभी दुखों का अन्त हो जाता है।

जो प्रारम्भ में विष जैसा लगता है, लेकिन अन्त में अमृत

के समान है और जो मनुष्य में आत्म-साक्षात्कार जगाता है,

वह सात्त्विक सुख कहलाता है।

*

विषयेन्द्रियसंयोगाद्यत्तदग्रेडम्तोपमम्‌ ।

'परिणामे विषमिव तत्सुखं राजसं स्मृतम्‌ ॥ ३८ ॥

विषय--इन्द्रिय विषयों; इन्द्रिय--तथा इन्द्रियों के; संयोगात्‌--संयोग से; यत्‌--जो;

तत्‌--वह; अग्रे--प्रारम्भ में; अमृत-उपमम्‌--अमृत के समान; परिणामे--अन्त में;

विषम्‌ इब--विष के समान; तत्‌--वह; सुखम्‌--सुख; राजसम्‌--राजसी; स्मृतम्‌--

माना जाता है।

जो सुख इन्द्रियों द्वारा उनके विषयों के संसर्ग से प्राप्त

होता है और जो प्रारम्भ में अमृततुल्य तथा अन्त में विषतुल्य

लगता है, वह रजोगुणी कहलाता है।

*

यदग्रे चानुबन्धे च सुखं मोहनमात्मन: ।

निद्रालस्यप्रमादोत्थं तत्तामसमुदाहृतम्‌ ॥ ३९॥

यतू--जो; अग्रे--प्रारम्भ में; च-- भी; अनुबन्धे-- अन्त में; च-- भी; सुखम्‌--सुख;

मोहनम्‌--मोहमय; आत्मन: -- अपना; निद्रा--नींद; आलस्य--आलस्य; प्रमाद--तथा

मोह से; उत्थम्‌--उत्पन्न; तत्‌ू--वह; तामसम्‌--तामसी; उदाहतम्‌--कहलाता है,

तथा जो सुख आत्म-साक्षात्कार के प्रति अन्धा है, जो

प्रारम्भ से लेकर अन्त तक मोहकारक है और जो निद्रा,

आलस्य तथा मोह से उत्पन्न होता है, वह तामसी कहलाता है।

*

न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः ।

सच्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्ते यदेभि: स्यात्रतिभिर्गुणै: ॥ ४०॥

न--नहीं; तत्‌ू--वह; अस्ति-- है; पृथिव्याम्‌--पृथ्वी पर; वा--अथवा; दिवि--उच्चतर

लोकों में; देवेषु--देवताओं में; वा--अथवा; पुन:ः--फिर; सत्त्वम्‌--अस्तित्व; प्रकृति-

जै:ः--प्रकृति से उत्पन्न; मुक्तम्‌-मुक्त; यत्‌--जो; एभि:--इनके प्रभाव से; स्थात्‌--

हो; त्रिभिः--तीन; गुणैः--गुणों से |

इस लोक में, स्वर्ग लोकों में या देवताओं के मध्य में कोई

भी ऐसा व्यक्ति विद्यमान नहीं है, जो प्रकृति के तीन गुणों से

मुक्त हो।

*

राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप ।

कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणै:; ॥ ४१॥

ब्राह्मण--ब्राह्मण; क्षत्रिय--क्षत्रिय; विशामू--तथा वैश्यों का; शूद्राणाम्‌--शूद्रों का;

च--तथा; परन्तप--हे शत्रुओं के विजेता; कर्माणि--कार्यकलाप; प्रविभक्तानि--

विभाजित हैं; स्वभाव--अपने स्वभाव से; प्रभवै:--उत्पन्न; गुणैः--गुणों के द्वारा.

हे परन्तप! ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों में प्रकृति

के गुणों के अनुसार उनके स्वभाव द्वारा उत्पन्न गुणों के द्वारा

भेद किया जाता है।

*

शमो दमस्तपः शौच क्षान्तिरार्जवमेव च ।

ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम्‌ ॥ ४२॥

शमः--शान्तिप्रियता; दम:--आत्मसंयम; तप: -- तपस्या; शौचम्‌--पतवित्रता;

क्षान्ति:--सहिष्णुता; आर्जवम्‌--सत्यनिष्ठा; एब--निश्चय ही; च--तथा; ज्ञानम्‌--

ज्ञान; विज्ञानम्‌-विज्ञान; आस्तिक्यम्‌-- धार्मिकता; ब्रह्म --ब्राह्मण का; कर्म --

कर्तव्य; स्वभाव-जम्‌--स्वभाव से उत्पन्न, स्वाभाविक ..

शान्तिप्रियता, आत्मसंयम, तपस्या, पवित्रता, सहिष्णुता,

सत्यनिष्ठा, ज्ञान, विज्ञान तथा धार्मिकता--ये सारे स्वाभाविक

गुण हैं, जिनके द्वारा ब्राह्मण कर्म करते हैं।

*

शौर्य तेजो धृतिरद्द॑क्ष्यं युद्धे चाप्पपलायनम्‌ ।

दानमी ध्वरभावश्ष क्षात्रं कर्म स्वभावजम्‌ ॥ ४३॥

शौर्यम्‌--वीरता; तेज:--शक्ति; धृति:--संकल्प, थैर्य; दाक्ष्यम्‌-दक्षता; युद्धे--युद्ध

में; च--तथा; अपि-- भी; अपलायनम्‌--विमुख न होना; दानम्‌--उदारता; ई श्वर--

नेतृत्व का; भाव:--स्वभाव; च--तथा; क्षात्रमू-- क्षत्रिय का; कर्म--कर्तव्य; स्वभाव-

जम्‌--स्वभाव से उत्पन्न, स्वाभाविक ).

वीरता, शक्ति, संकल्प, दक्षता, युद्ध में धेर्य, उदारता तथा

नेतृत्व--ये क्षत्रियों के स्वाभाविक गुण हैं।

*

कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम्‌ ।

परिचर्यात्मकं कर्म शूद्रस्थापि स्वभावजम्‌ ॥ ४४॥

श्री-भगवान्‌ उवाच-- भगवान्‌ ने कहा; काम्यानामू-काम्यकर्मों का; कर्मणाम्‌--

कर्मो का; न्यासम्‌-त्याग; सन््यासम्‌--संन्यास; कवय: --विद्वान जन; विदु: --जानते

हैं; सर्व--समस्त; कर्म--कर्मो का; फल--फल; त्यागम्‌--्याग को; प्राहु:--कहते

हैं; त्यागम्‌-त्याग; विचक्षणा:-- अनुभवी |.

भगवान्‌ ने कहा--भौतिक इच्छा पर आधारित कर्मों के

परित्याग को विद्वान लोग संन्यास कहते हैं और समस्त कर्मों

के फल-त्याग को बुद्धिमान लोग त्याग कहते हैं।

*

स्वे स्वे कर्मण्यभिरत: संसिद्धि लभते नर: ।

स्वकर्मनिरतः सिद्धिदरि यथा विन्दति तच्छुणु ॥ ४५॥

स्वे स्वे--अपने अपने; कर्मणि--कर्म में; अभिरत:--संलग्न; संसिद्ध्धिमू--सिद्धि को;

लभते--प्राप्त करता है; नर:--मनुष्य; स्व-कर्म--अपने कर्म में; निरत:--लगा हुआ;

सिद्धिम्‌ू--सिद्धि को; यथा--जिस प्रकार; विन्दति--प्राप्त करता है; ततू--वह;

श्रूणु--सुनो

अपने अपने कर्म के गुणों का पालन करते हुए प्रत्येक

व्यक्ति सिद्ध हो सकता है। अब तुम मुझसे सुनो कि यह किस

प्रकार किया जा सकता है।

*

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्‌ ।

स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धि विन्दति मानवः ॥ ४६॥

यतः--जिससे; प्रवृत्ति:--उद्धव; भूतानाम्‌--समस्त जीवों का; येन--जिससे;

सर्वम्‌--समस्त; इृदम्‌--यह; ततम्‌--व्याप्त है; स्व-कर्मणा--अपने कर्म से; तम्‌--

उसको; अभ्यर्च्य--पूजा करके; सिद्धिम्‌--सिद्धि को; विन्दति--प्राप्त करता है;

मानवः--मनुष्य |.

जो सभी प्राणियों का उद्गम है और सर्वव्यापी है, उस

भगवान्‌ की उपासना करके मनुष्य अपना कर्म करते हुए

पूर्णता प्राप्त कर सकता है।

*

रेयान्स्वधर्मों विगुण: परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌ ।

स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नापयोति किल्बिषम्‌ ॥ ४७॥

श्रेयान्‌-- श्रेष्ठ; स्व-धर्म:--अपना वृत्तिपरक कार्य; विगुण:--भली भाँति सम्पन्न न

होकर; पर-धर्मात्‌--दूसरे के वृत्तिपरक कार्य से; सु-अनुष्ठितात्‌-- भलीभाँति किया

गया; स्वभाव-नियतम्‌--स्वभाव के अनुसार संस्तुत; कर्म--कर्म; कुर्वनू--करने से;

न--कभी नहीं; आष्नोति--प्राप्त करता है; किल्बिषम्‌-पापों को

अपने वृत्तिपरक कार्य को करना, चाहे वह कितना ही

त्रुटिपूर्ण ढंग से क्यों न किया जाय, अन्य किसी के कार्य को

स्वीकार करने और अच्छी प्रकार करने की अपेक्षा अधिक

श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव के अनुसार निर्दिष्ट कर्म कभी भी पाप

से प्रभावित नहीं होते।

*

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत्‌ ।

सर्वारम्भा हि दोषेण धूमेनाग्निरिवावृता: ॥ ४८॥

सह-जम्‌--एकसाथ उत्पन्न; कर्म--कर्म; कौन्तेय--हे कुन्तीपुत्र; स-दोषम्‌--दोषयुक्त;

अपि--यद्यपि; न--कभी नहीं; त्यजेत्‌--त्यागना चाहिए; सर्व-आरम्भा:--सारे उद्योग;

हि--निश्चय ही; दोषेण--दोष से; धूमेन-- धुएँ से; अग्नि:-- अग्नि; इब--सदृश;

आवृता:--ढके हुए

प्रत्येक उद्योग ( प्रयास ) किसी न किसी दोष से आवृत

होता है, जिस प्रकार अग्नि धुएँ से आवृत रहती है। अतएव हे

कुन्तीपुत्र! मनुष्य को चाहिए कि स्वभाव से उत्पन्न कर्म को,

भले ही बह दोषपूर्ण क्यों न हो, कभी त्यागे नहीं।

*

असक्तबुद्धिः सर्वत्र जितात्मा विगतस्पृहः ।

नैष्कर्म्यसिद्धि परमां सन््यासेनाधिगच्छति ॥ ४९॥

असक्त-बुद्धधिः--आसक्ति रहित बुद्धि वाला; सर्वत्र--सभी जगह; जित-आत्मा--मन

के ऊपर संयम रखने वाला; विगत-स्पृहः -- भौतिक इच्छाओं से रहित; नैष्कर्म्य-

सिद्धिम्‌--निष्कर्म की सिद्धि; परमाम्‌--परम; सन्न्यासेन--संन्यास के द्वारा;

अधिगच्छति-प्राप्त करता है।.

जो आत्मसंयमी तथा अनासक्त है एवं जो समस्त भौतिक

भोगों की परवाह नहीं करता, वह संन्यास के अभ्यास द्वारा

कर्मफल से मुक्ति की सर्वोच्च सिद्ध-अवस्था प्राप्त कर

सकता है।

*

सिद्धि प्राप्तो यथा ब्रह्म तथाप्नोति निबोध मे ।

समासेनेव कौन्तेय निष्ठा ज्ञानस्थ या परा ॥ ५०॥

सिद्धिम्‌--सिद्धि को; प्राप्त:--प्राप्त किया हुआ; यथा--जिस तरह; ब्रह्म--पर मे श्वर;

तथा--उसी प्रकार; आप्नोति--प्राप्त करता है; निबोध--समझने का यत्न करो; मे--

मुझसे; समासेन--संक्षेप में; एब--निश्चय ही; कौन्तेय--हे कुन्तीपुत्र; निष्ठा-- अवस्था;

ज्ञानस्य--ज्ञान की; या--जो; परा--दिव्य

हे कुन्तीपुत्र! जिस तरह इस सिद्धि को प्राप्त हुआ व्यक्ति

परम सिद्धावस्था अर्थात्‌ ब्रह्म को, जो सर्वोच्च ज्ञान की

अवस्था है, प्राप्त करता है, उसका मैं संक्षेप में तुमसे वर्णन

करूँगा, उसे तुम जानो।

*

बुद्धया विशुद्धया युक्तो धृत्यात्मानं नियम्य च ।

शब्दादीन्विषयांस्त्यक्त्वा रागद्वेषो व्युदस्य च ॥ ५१॥

विविक्तसेवी लघ्वाशी यतवाक्कायमानस: ।

ध्यानयोगपरो नित्य॑ वैराग्यं समुपाभ्रित: ॥ ५२॥

अहड्डारं बल॑ दर्प काम क्रोधं परिग्रहम्‌ ।

विमुच्य निर्मम: शान्तो ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ ५३॥

बुद्धया--बुद्धि से; विशुद्धबा--नितान्त शुद्ध; युक्त:--रत; धृत्या--धैर्य से;

आत्मानम्‌--स्व को; नियम्य--वश में करके; च--भी; शब्द-आदीन्‌--शब्द आदि;

विषयान्‌--.इन्द्रियविषयों को; त्यक्त्वा--त्यागकर; राग--आसक्ति; द्वेषौ--तथा घृणा

को; व्युदस्य--एक तरफ रख कर; च--भी; विविक्त-सेवी--एकान्त स्थान में रहते

हुए; लघु-आशी--अल्प भोजन करने वाला; यत--वश में करके; वाक्‌--वाणी;

काय--शरीर; मानस: --तथा मन को; ध्यान-योग-परः --समाधि में लीन; नित्यम्‌--

चौबीसों घण्टे; वैराग्यम्‌ू--वैराग्य का; समुपाभ्रित:--आश्रय लेकर; अहड्लारम्‌--

मिथ्या अहंकार को; बलम्‌--झूठे बल को; दर्पम्‌--झूठे घमंड को; कामम्‌--काम

को; क्रोधम्‌-क्रोध को; परिग्रहम्‌--तथा भौतिक वस्तुओं के संग्रह को; विमुच्य--

त्याग कर; निर्मम: --स्वामित्व की भावना से रहित; शान्तः --शान्त; ब्रह्म-भूयाय--

आत्म-साक्षात्कार के लिए; कल्पते--योग्य हो जाता है।.

अपनी बुद्धि से शुद्ध होकर तथा थैर्यपूर्वक मन को वश

में करते हुए, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का त्याग कर, राग तथा

द्वेष से मुक्त होकर जो व्यक्ति एकान्त स्थान में वास करता है,

जो थोड़ा खाता है, जो अपने शरीर मन तथा वाणी को वश में

रखता है, जो सदैव समाधि में रहता है तथा पूर्णतया विरक्त,

मिथ्या अहंकार, मिथ्या शक्ति, मिथ्या गर्व, काम, क्रोध तथा

भौतिक वस्तुओं के संग्रह से मुक्त है, जो मिथ्या स्वामित्व की

भावना से रहित तथा शान्त है वह निश्चय ही आत्म-

साक्षात्कार के पद को प्राप्त होता है।

*

ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काड्झ्षति ।

सम: सर्वेषु भूतेषु मद्धक्ति लभते पराम्‌ ॥ ५४॥

ब्रह्म-भूतः--ब्रह्म से तदाकार होकर; प्रसन्न-आत्मा--पूर्णतया प्रमुदित; न--कभी नहीं;

शोचति--खेद करता है; न--कभी नहीं; काइ्क्षति--इच्छा करता है; सम:--समान

भाव से; सर्वेषु--समस्त; भूतेषु--जीवों पर; मत्‌-भक्तिमू--मेरी भक्ति को; लभते--

प्राप्त करता है; पराम्‌--दिव्य |

इस प्रकार जो दिव्य पद पर स्थित है, वह तुरन्त परब्रह्म

का अनुभव करता है और पूर्णतया प्रसन्न हो जाता है। वह न

तो कभी शोक करता है, न किसी वस्तु की कामना करता है।

वह प्रत्येक जीव पर समभाव रखता है। उस अवस्था में वह

मेरी शुद्ध भक्ति को प्राप्त करता है।

*

भक्‍त्या मामभिजानाति यावान्यश्वास्मि तत्त्वतः ।

ततो मां तत्त्वतो ज्ञात्वा विशते तदनन्तरम्‌ ॥ ५५॥

भक्त्या--शुद्ध भक्ति से; मामू--मुझको; अभिजानाति--जान सकता है; यावान्‌--

जितना; यः च अस्मि--जैसा मैं हूँ; तत्त्वत:ः--सत्यत: ; ततः--तत्पश्चात्‌; माम्‌ू--

मुझको; तत्त्वतः--सत्यत:; ज्ञात्वा--जानकर; विशते--प्रवेश करता है; तत्‌-

अनन्तरम्‌-तत्पश्चात्‌

केवल भक्ति से मुझ भगवान्‌ को यथारूप में जाना जा

सकता है। जब मनुष्य ऐसी भक्ति से मेरे पूर्ण भावनामृत में

होता है, तो वह वैकुण्ठ जगत्‌ में प्रवेश कर सकता है।

*

सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रय: ।

मत्प्रसादादवाष्नोति शाश्वतं पदमव्ययम्‌ ॥ ५६॥

सर्व--समस्त; कर्माणि--कार्यकलाप को; अपि--यद्यपि; सदा--सदैव; कुर्वाण:--

करते हुए; मत्‌-व्यपाश्रय:--मेरे संरक्षण में; मत्‌-प्रसादात्‌-मेरी कृपा से;

अवाणोति--प्राप्त करता है; शाश्वतम्‌ू--नित्य; पदम्‌ू-- धाम को; अव्ययम्‌--

अविनाशी

मेरा शुद्ध भक्त मेरे संरक्षण में, समस्त प्रकार के कार्यो में

संलग्न रह कर भी मेरी कृपा से नित्य तथा अविनाशी धाम को

प्राप्त होता है।

*

चेतसा सर्वकर्माणि मयि सन्न्यस्य मत्पर: ।

बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्त: सततं भव ॥ ५७॥

चेतसा--बुद्धि से; सर्व-कर्माणि--समस्त प्रकार के कार्य; मयि--मुझ में; सन्ष्यस्थ--

त्यागकर; मतू-पर:--मेरे संरक्षण में; बुद्धि-योगम्‌--भक्ति के कार्यों की; उपाश्रित्य--

शरण लेकर; मत्‌-चित्त:--मेरी चेतना में; सततम्‌--चौबीसों घंटे; भव--होओ ।

सारे कार्यो के लिए मुझ पर निर्भर रहो और मेरे संरक्षण में

सदा कर्म करो। ऐसी भक्ति में मेरे प्रति पूर्णतया सचेत रहो।

*

मच्चित्त: सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।

अथ चेच्त्वमहड्डारान्न श्रोष्यसि विनड्छ्यसि ॥ ५८॥

मत्‌--मेरी; चित्त:--चेतना में; सर्व--सारी; दुर्गाणि--बाधाओं को; मत्‌-प्रसादात्‌ू--

मेरी कृपा से; तरिष्यसि--तुम पार कर सकोगे; अथ--लेकिन; चेत्‌ू--यदि; त्वम्‌--

तुम; अहड्डारात्‌ू-मिथ्या अहंकार से; न श्रोष्यसि--नहीं सुनते हो; विनड्क््यसि--नष्ट

हो जाओगे।.

यदि तुम मुझसे भावनाभावित होगे, तो मेरी कृपा से तुम

बद्ध जीवन के सारे अवरोधों को लाँघध जाओगे। लेकिन यदि

तुम मिथ्या अहंकारवश ऐसी चेतना में कर्म नहीं करोगे और

मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम विनष्ट हो जाओगे।

*

यदहड्डारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।

मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥ ५९॥

यत्‌--यदि; अहड्ढडारम्‌-मिथ्या अहंकार की; आश्नित्य--शरण लेकर; न योत्स्ये--मैं

नहीं लड़ूँगा; इति--इस प्रकार; मन्‍्यसे--तुम सोचते हो; मिथ्या एष:--तो यह सब झूठ

है; व्यवसाय:--संकल्प; ते-- तुम्हारा; प्रकृतिः-- भौतिक प्रकृति; त्वामू--तुमको;

नियोक्ष्यति--लगा लेगी.

यदि तुम मेरे निर्देशानुसार कर्म नहीं करते और युद्ध में

प्रवृत्त नहीं होते हो, तो तुम कुमार्ग पर जाओगे। तुम्हें अपने

स्वभाववश युद्ध में लगना होगा।

*

स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।

कर्तु नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्थवशोपि तत्‌ ॥६०॥

स्वभाव-जेन--अपने स्वभाव से उत्पन्न; कौन्तेय--हे कुन्तीपुत्र; निबद्धः--बद्ध;

स्वेन--तुम अपने; कर्मणा--कार्यकलापों से; कर्तुमू-करने के लिए; न--नहीं;

इच्छसि--इच्छा करते हो; यत्‌--जो; मोहात्‌--मोह से; करिष्यसि--करोगे; अवश:--

अनिच्छा से; अपि-- भी; तत्‌--वह ।

इस समय तुम मोहवश मेरे निर्देशानुसार कर्म करने से

मना कर रहे हो। लेकिन हे कुन्तीपुत्र! तुम अपने ही स्वभाव से

उत्पन्न कर्म द्वारा बाध्य होकर वही सब करोगे।

*

ईश्वरः सर्वभूतानां हद्देशेईर्जुन तिष्ठति ।

भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥ ६१॥

ईश्वर:-- भगवान्‌; सर्व-भूतानाम्‌--समस्त जीवों के; हत्‌-देशे--हृदय में; अर्जुन--हे

अर्जुन; तिष्ठति--वास करता है; भ्रामयन्‌ू-- भ्रमण करने के लिए बाध्य करता हुआ;

सर्व-भूतानि--समस्त जीवों को; यन्त्र--यन्त्र में; आरूढानि--सवार, चढ़े हुए;

मायया--भौतिक शक्ति के वशीभूत होकर

हे अर्जुन! परमेश्वर प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं और

भौतिक शक्ति से निर्मित यन्त्र में सवार की भाँति बैठे समस्त

जीवों को अपनी माया से घुमा ( भरमा ) रहे हैं।

*

तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।

तत्प्रसादात्परां शान्ति स्थान प्राप्स्यसि शाश्रतम्‌ ॥ ६२॥

तम्‌--उसकी; एव--निश्चय ही; शरणम्‌ गच्छ--शरण में जाओ; सर्व-भावेन--सभी

प्रकार से; भारत--हे भरतपुत्र; ततू-प्रसादात्‌--उसकी कृपा से; पराम्‌ू-दिव्य;

शान्तिमू--शान्ति को; स्थानम्‌-- धाम को; प्राप्स्यसि--प्राप्त करोगे; शाश्रवतम्‌--

शाश्वत).

है भारत! सब प्रकार से उसी की शरण में जाओ। उसकी

कृपा से तुम परम शान्ति को तथा परम नित्यधाम को प्राप्त

करोगे।

*

इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्मतरं मया ।

विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरू ॥ ६३॥

इति--इस प्रकार; ते--तुमको; ज्ञानम्‌--ज्ञान; आख्यातम्‌--वर्णन किया गया;

गुह्यात्‌-गुहय से; गुह्म-तरम्‌--अधिक गुहा; मया--मेरे द्वारा; विमृश्य--मनन करके;

एतत्‌--इस; अशेषेण--पूर्णतया; यथा-- जैसी; इच्छेसि--इच्छा हो; तथा--वैसा ही;

कुरु--करो

इस प्रकार मैंने तुम्हें गुह्झातर ज्ञान बतला दिया। इस पर पूरी

तरह से मनन करो और तब जो चाहो सो करो।

*

सर्वगुह्मतमं भूयः श्रुणु मे परमं बच: ।

इष्टोडसि मे हृढमिति ततो वशक्ष्यामि ते हितम्‌ ॥ ६४॥

सर्व-गुह्म-तमम्‌--सबों में अत्यन्त गुहय; भूय:--पुनः; श्रुणु--सुनो; मे--मुझसे;

परमम्‌--परम; बच:--आदेश; इष्ट: असि--तुम प्रिय हो; मे--मेरे, मुझको; हृढम्‌--

अत्यन्त; इति--इस प्रकार; तत:--अतएव; वक्ष्यामि--कह रहा हूँ; ते--तुम्हारे;

हितमू-लाभ के लिए.

चूँकि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र हो, अतएव मैं तुम्हें

अपना परम आदेश, जो सर्वाधिक गुह्ज्ञान है, बता रहा हूँ।

इसे अपने हित के लिए सुनो।

*

मन्मना भव मद्धक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।

मामेवैष्यसि सत्य ते प्रतिजाने प्रियोडसि मे ॥ ६५॥

मत्‌-मना:--मेरे विषय में सोचते हुए; भव--होओ; मत्‌-भक्त:--मेरा भक्त; मतू-

याजी--मेरा पूजक; माम्‌ू--मुझको; नमस्कुरु-- नमस्कार करो; माम्‌--मेरे पास;

एव--ही; एष्यसि--आओगे; सत्यम्‌ू--सच-सच; ते--तुमसे; प्रतिजाने--वायदा या

प्रतिज्ञा करता हूँ; प्रियः--प्रिय; असि--हो; मे--मुझको

सदैव मेरा चिन्तन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो

और मुझे नमस्कार करो। इस प्रकार तुम निश्चित रूप से मेरे

पास आओगे। मैं तुम्हें वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मेरे परम

प्रिय मित्र हो।

*

सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेक॑ शरणं ब्रज ।

अहं त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच्: ॥ ६६॥

सर्व-धर्मान्‌--समस्त प्रकार के धर्म; परित्यज्य--त्यागकर; माम्‌--मेरी; एकम्‌--

एकमात्र; शरणम्‌--शरण में; ब्रज--जाओ; अहम्‌-मैं; त्वाम्‌--तुमको; सर्व

समस्त; पापेभ्य:--पापों से; मोक्षयिष्यामि--उद्धार करूँगा; मा--मत; शुच्चः--चिन्ता

करो

समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और मेरी शरण

में आओ। मैं समस्त पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूँगा। डरो

मत।

*

इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।

नचाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योभ्यसूयति ॥ ६७॥

इदम्‌--यह; ते--तुम्हारे द्वारा; न--कभी नहीं; अतपस्काय--असंयमी के लिए; न--

कभी नहीं; अभक्ताय--अभक्त के लिए; कदाचन--किसी समय; न--कभी नहीं;

च--भी; अशुश्रूषवे--जो भक्ति में रत नहीं है; वाच्यमू--कहने के लिए; न--कभी

नहीं; च-- भी; माम्‌-- मेरे प्रति; य:--जो; अभ्यसूयति--द्वेष करता है

यह गुह्मज्ञान उनको कभी भी न बताया जाय जो न तो

संयमी हैं, न एकनिष्ठ, न भक्ति में रत हैं, न ही उसे जो मुझसे

द्वेष करता हो।

*

य इदं परम गुह्ंं मद्धक्तेष्वभिधास्यति ।

भक्ति मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशय: ॥ ६८ ॥

यः--जो; इृदम्‌--इस; परमम्‌-- अत्यन्त; गुह्ममू--रहस्य को; मत्‌--मेरे; भक्तेषु --

भक्तों में से; अभिधास्यति--कहता है; भक्तिम्‌ू-- भक्ति को; मयि--मुझको; पराम्‌--

दिव्य; कृत्वा--करके; माम्‌--मुझको; एव--निश्चय ही; एष्यति--प्राप्त होता है;

असंशय:--इसमें कोई सन्देह नहीं।.

जो व्यक्ति भक्तों को यह परम रहस्य बताता है, वह

शुद्धभक्ति को प्राप्त करेगा और अन्त में वह मेरे पास वापस

आएगा।

*

नच तस्मान्मनुष्येषु कश्निन्मे प्रियकृत्तम: ।

भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥ ६९॥

न--कभी नहीं; च--तथा; तस्मात्‌--उसकी अपेक्षा; मनुष्येषु--मनुष्यों में; कश्चित्‌--

कोई; मे--मुझको; प्रिय-कृत्‌-तमः --अत्यन्त प्रिय; भविता--होगा; न--न तो; च--

तथा; मे--मुझको; तस्मात्‌--उसकी अपेक्षा, उससे; अन्य: --कोई दूसरा; प्रिय-तर:--

अधिक प्रिय; भुवि--इस संसार में |

इस संसार में उसकी अपेक्षा कोई अन्य सेवक न तो मुझे

अधिक प्रिय है और न कभी होगा।

*

अध्येष्यते च य इमं धर्म्य संवादमावयो: ।

ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्ट: स्थामिति मे मति: ॥ ७०॥

अध्येष्यते--अध्ययन या पाठ करेगा; च-- भी; य:-- जो; इमम्‌--इस; धर्म्यम्‌--

पवित्र; संवादम्‌--वार्तालाप या संवाद को; आवयो:--हम दोनों के; ज्ञान--ज्ञान रूपी;

यज्ञेन--यज्ञ से; तेन--उसके द्वारा; अहम्‌--मैं; इष्ट:--पूजित; स्थाम्‌--होऊँगा; इति--

इस प्रकार; मे--मेरा; मतिः--मत।.

और मैं घोषित करता हूँ कि जो हमारे इस पवित्र संवाद

का अध्ययन करता है, वह अपनी बुद्धि से मेरी पूजा करता

है।

*

श्रद्धावाननसूयश्च श्रुणुयादपि यो नरः ।

सोउपि मुक्त: शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम्‌ ॥ ७१॥

श्रद्धा-वान्‌-- श्रद्धालु; अनसूय: --ट्वेषरहित; च--तथा; श्रुणुयात्‌--सुनता है; अपि--

निश्चय ही; यः--जो; नर:--मनुष्य; सः--वह; अपि-- भी; मुक्त:--मुक्त होकर;

शुभान्‌ू--शुभ; लोकान्‌--लोकों को; प्राप्नुयात्‌--प्राप्त करता है; पुण्य-कर्मणाम्‌--

पुण्यात्माओं का

और जो श्रद्धा समेत तथा द्वेषहित होकर इसे सुनता है,

वह सारे पापों से मुक्त हो जाता है और उन शुभ लोकों को

प्राप्त होता है, जहाँ पुण्यात्माएँ निवास करती हैं।

*

कच्चिदेतच्छतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।

कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रणष्टस्ते धनझय ॥ ७२॥

कच्चित्‌ू--क्या; एतत्‌--यह; श्रुतम्‌--सुना गया; पार्थ--हे पृथापुत्र; त्वया--तुम्हारे

द्वारा; एक-अग्रेण--एकाग्र; चेतसा--मन से; कच्चित्‌--क्या; अज्ञान--अज्ञान का;

सम्मोह:--मोह, भ्रम; प्रणष्ट:--दूर हो गया; ते--तुम्हारा; धनञ्य--हे सम्पत्ति के

विजेता ( अर्जुन )

हे पृथापुत्र! हे धनझ्जय! क्‍या तुमने इसे ( इस शास्त्र को )

एकाग्र चित्त होकर सुना ? और क्‍या अब तुम्हारा अज्ञान तथा

मोह दूर हो गया है ?

*

अर्जुन उवाच

नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।

स्थितोस्मि गतसन्देह: करिष्ये बचनं तव ॥ ७३॥

अर्जुन: उवाच--अर्जुन ने कहा; नष्ट: --दूर हुआ; मोह:--मोह; स्मृति: --स्मरण शक्ति;

लब्धा--पुनः प्राप्त हुई; त्वत्‌-प्रसादातू--आपकी कृपा से; मया--मेरे द्वारा; अच्युत--

हे अच्युत कृष्ण; स्थित:--स्थित; अस्मि--हूँ; गत--दूर हुए; सन्देह:--सारे संशय;

'करिष्ये--पूरा करूँगा; वचनम्‌--आदेश को; तब--तुम्हारे |

अर्जुन ने कहा--हे कृष्ण, हे अच्युत! अब मेरा मोह दूर

हो गया। आपके अनुग्रह से मुझे मेरी स्मरण शक्ति वापस मिल

गईं। अब मैं संशयरहित तथा दृढ़ हूँ और आपके आदेशानुसार

कर्म करने के लिए उद्यत हूँ।

*

सजञ्ञय उवाच

इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मन: ।

संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम्‌ ॥ ७४॥

सञ्ञय: उबाच--संजय ने कहा; इति--इस प्रकार; अहम्‌--मैं; वासुदेवस्थ--कृष्ण

का; पार्थस्य--तथा अर्जुन का; च-- भी; महा-आत्मन:--महात्माओं का; संवादम्‌--

वार्ता; इमम्‌ू--यह; अश्रौषम्‌--सुनी है; अद्भुतम्‌--अद्भुत; रोम-हर्षणम्‌--रोंगटे खड़े

करने वाली |

संजय ने कहा--इस प्रकार मैंने कृष्ण तथा अर्जुन इन

दोनों महापुरुषों की वार्ता सुनी। और यह सन्देश इतना अद्भुत

है कि मेरे शरीर में रोमाञ्ञ हो रहा है।

*

यासप्रसादाच्छुतवानेतद्गुह्ममहं परम्‌ ।

योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम्‌ ॥ ७५॥

व्यास-प्रसादातू-व्यासदेव की कृपा से; श्रुतवानू--सुना है; एतत्‌--इस; गुहाम्‌--

गोपनीय; अहम्‌--मैंने; परमू--परम; योगम्‌--योग को; योग-ई श्वरात्‌ू--योग के

स्वामी; कृष्णात्‌-कृष्ण से; साक्षात्‌--साक्षात्‌: कथयत:--कहते हुए; स्वयम्‌--

स्वय।

व्यास की कृपा से मैंने ये परम गु्य बातें साक्षात्‌ योगेश्वर

कृष्ण के मुख से अर्जुन के प्रति कही जाती हुई सुनीं।

*

राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम्‌ ।

केशवार्जुनयो: पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहु: ॥ ७६॥

राजन्‌--हे राजा; संस्मृत्य--स्मरण करके; संस्मृत्य--स्मरण करके; संवादम्‌--वार्ता

को; इमम्‌ू--इस; अद्भुतम्‌ू-आश्चर्यजनक; केशव-- भगवान्‌ कृष्ण; अर्जुनयो:--तथा

अर्जुन की; पुण्यम्‌--पवित्र; हृष्यामि--हर्षित होता हूँ; च-- भी; मुहुः मुहुः--बारम्बार |

हे राजन्‌! जब मैं कृष्ण तथा अर्जुन के मध्य हुई इस

आश्चर्यजनक तथा पवित्र वार्ता का बारम्बार स्मरण करता हूँ,

तो प्रति क्षण आह्वाद से गदगद्‌ हो उठता हूँ।

*

तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरे: ।

विस्मयो मे महान्राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥ ७७॥

तत्‌--उस; च--भी; संस्मृत्य--स्मरण करके; संस्मृत्य--स्मरण करके; रूपम्‌--

स्वरूप को; अति--अत्यधिक; अद्भुतम्‌--अद्भुत; हरे: -- भगवान्‌ कृष्ण के;

विस्मय:-- आश्चर्य; मे--मेरा; महान्‌ू--महान; राजन्‌--हे राजा; हृष्यामि--हर्षित हो

रहा हूँ; च-- भी; पुनः पुनः--फिर-फिर, बारम्बार।.

हे राजन्‌! भगवान्‌ कृष्ण के अद्भुत रूप का स्मरण करते

ही मैं अधिकाधिक आश्चर्यचकित होता हूँ और पुनःपुनः हर्षित

होता हूँ।

*

यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थों धनुर्धरः ।

तत्र श्रीरविजयो भूतिर्श्ुवा नीतिर्मतिर्मम ॥ ७८॥

यत्र--जहाँ; योग-ईश्वरः--योग के स्वामी; कृष्ण:-- भगवान्‌ कृष्ण; यत्र--जहाँ;

पार्थ:--पृथापुत्र; धनु:-धर:--धनुषधारी; तत्र--वहाँ; श्री:--ऐश्वर्य; विजय:ः--जीत;

भूतिः--विलक्षण शक्ति; ध्रुवा--निश्चित; नीति:--नीति; मतिः मम--मेरा मत।.

जहाँ योगेश्वर कृष्ण हैं और जहाँ परम धनुर्धर अर्जुन है,

वहीं ऐश्वर्य, विजय, अलौकिक शक्ति तथा नीति भी निश्चित

रूप से रहती है। ऐसा मेरा मत है।

*

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