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अध्याय 11 - विराट रूप

अर्जुन उवाच

मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् |

यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोSयं विगतो मम || १ ||

अर्जुनःउवाच – अर्जुन ने कहा; मत्-अनुग्रहाय – मुझपर कृपा करने के लिए; परमम् – परम; गुह्यम् – गोपनीय; अध्यात्म – आध्यात्मिक; संज्ञितम् – नाम से जाना जाने वाला, विषयक; यत् – जो; त्वया – आपके द्वारा; उक्तम् – कहे गये; वचः – शब्द; तेन – उससे; मोहः – मोह; अयम् – यह; विगतः – हट गया; मम – मेरा |

अर्जुन ने कहा – आपने जिन अत्यन्त गुह्य आध्यात्मिक विषयों का मुझे उपदेश दिया है, उसे सुनकर अब मेरा मोह दूर हो गया है |

*

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया |

त्वत्तः कमलपत्राक्ष महात्म्यमपि चाव्ययम् || २ ||

भव - उत्पत्ति; अप्ययौ - लय (प्रलय); हि - निश्चय ही; भूतनाम् - समस्त जीवों का; श्रुतौ - सुना गया है ; विस्तरशः - विस्तारपूर्वक; मया - मेरे द्वारा; त्वत्तः - आपसे; कमल-पत्र-अक्ष - हे कमल नयन; माहात्म्यम् - महिमा; अपि - भी; च - तथा; अव्ययम् - अक्षय,अविनाशी ।

हे कमलनयन! मैंने आपसे प्रत्येक जीव की उत्पत्ति तथा लय के विषय में विस्तार आपकी अक्षय महिमा का अनुभव किया है ।

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एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्र्वर |

दृष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्र्वरं पुरुषोत्तम || ३ ||

एवम् - इस प्रकार;एतत् - यह; यथा- जिस प्रकार; आत्थ- कहा है; त्वम्- आपने; आत्मानम् - अपने आपको;परम-ईश्र्वर - हे परमेश्र्वर; द्रष्टुम् - देखने केलिए; इच्छामि - इच्छा करता हूँ; ते- आपका; रूपम् - रूप; ऐश्र्वरम्- दैवी; पुरुष-उत्तम - हेपुरुषों में उत्तम।

हे पुरुषोत्तम, हे परमेश्र्वर!यद्यपि आपको मैं अपने समक्ष आपके द्वारा वर्णित आपके वास्तविक रूप में देख रहा हूँ, किन्तु मैं यह देखने का इच्छुक हूँ कि आप इस दृश्य जगत में किस प्रकार प्रविष्ट हुए हैं ।मैं आप के उसी रूप का दर्शन करना चाहता हूँ ।

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मन्यसे यदि तच्छक्यं मया द्रष्टुमिति प्रभो |

योगेश्र्वर ततो मे त्वं दर्शयात्मानमव्ययम् || ४ ||

मन्यसे- तुम सोचते हो; यदि- यदि; तत् - वह; शक्यम्- समर्थ; मया - मेरे द्वारा;द्रष्टुम् - देखे जाने के लिए; इति- प्रकार;प्रभो - स्वामी; योग-ईश्र्वर- हे योगेश्र्वर; ततः- तब; मे - मुझे;त्वम् - आप; दर्शय- दिखलाइये; आत्मानम् - अपने स्वरूप को; अव्ययम् - शाश्र्वत।

हे प्रभु! हे योगेश्र्वर!यदि आप सोचतेहैं कि मैं आपके विश्र्वरूप को देखने में समर्थ हो सकता हूँ, तो कृपा करके मुझे अपना असीम विश्र्वरूप दिखलाइये।

*

श्री भगवानुवाच

पश्य मे पार्थ रूपाणि शतशोSथ सहस्त्रशः |

नानाविधानि दिव्यानि नानावर्णाकृतीनि च || ५ ||

श्रीभगवान् उवाच -भगवान् ने कहा; पश्य - देखो; मे - मेरा; पार्थ - पृथा पुत्र; रूपाणि- रूप;शतशः- सैकड़ों;अथ- भी;सहस्त्रशः- हजारों;नाना-विधानि- नाना रूप वाले; दिव्यानि - दिव्य; नाना - नाना प्रकार के; वर्ण - रंग; आकृतीनि - रूप; च - भी ।

भगवान् ने कहा - अर्जुन, हे पार्थ! अब तुम मेरे ऐश्र्वर्य को, सैकड़ों-हजारों प्रकार के दैवी तथा विविध रंगों वाले रूपों को देखो ।

*

पश्यादित्यान्वसून्रुद्रानश्र्विनौ मरुतस्तथा |

बहून्यदृष्टपूर्वाणि पश्याश्र्चर्याणि भारत || ६ ||

पश्य - देखो; आदित्यान् - अदिति के बारहों पुत्रों को; वसून्- आठों वसुओं को; रुद्रान् - रूद्र के ग्यारह रूपों को; अश्र्विनौ- दो अश्र्विनी कुमारों को; मरुतः- उञ्चासों मरुतों को; तथा - भी;बहूनि- अनेक;अदृष्ट- देखे हुए; पुर्वाणि - पहले, इसके पूर्व, पश्य -देखो,आश्र्चर्याणि- समस्त आश्चर्यों को; भारत - हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ ।

हे भारत! लो, तुम आदित्यों, वसुओं, रुद्रों, अश्र्विनीकुमारों तथा अन्य देवताओं के विभिन्न रूपों को यहाँ देखो । तुम ऐसे अनेक आश्चर्यमय रूपों को देखो, जिन्हें पहले किसी ने न तो कभी देखा है, न सुना है ।

*

इहैकस्थं जगत्कृत्स्नं पश्याद्य सचराचरम् |

मम देहे गुडाकेश यच्चान्यद्द्रष्टुमिच्छसि || ७ ||

इह - इसमें; एक-स्थम् - एक स्थान में; जगत् - ब्रह्माण्ड; कृत्स्नम् - पूर्णतया; पश्य - देखो; अद्य - तुरन्त; स - सहित; चर - जंगम; अचरम् - तथा अचर, जड़; मम - मेरे; देहे - शरीर में; गुडाकेश - हे अर्जुन; यत् - जो; च - भी; अन्यत् - अन्य, और; द्रष्टुम् - देखना; इच्छसि - चाहते हो ।

हे अर्जुन! तुम जो भी देखना चाहो, उसेतत्क्षण मेरे इस शरीर में देखो । तुम इस समय तथा भविष्य में भी जो भी देखना चाहते हो, उसको यह विश्र्व रूप दिखाने वाला है । यहाँ एक ही स्थान पर चर-अचर सब कुछ है ।

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न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा |

दिव्यं ददामि ते चक्षु: पश्य मे योगमैश्र्वरम् || ८ ||

न - कभी नहीं; तु - लेकिन; माम् - मुझको; शक्यसे - तुम समर्थ होगे; द्रष्टुम् - देखने में; अनेन - इन; एव - निश्चय ही; स्व-चक्षुषा - अपनी आँखों से; दिव्यम् - दिव्य; ददामि - देता हूँ; ते - तुमको; चक्षुः - आँखें; पश्य - देखो; मे - मेरी; योगम् ऐश्र्वरम् - अचिन्त्य योगशक्ति ।

किन्तु तुम मुझे अपनी इन आँखों से नहीं देख सकते । अतः मैं तुम्हें दिव्य आँखें दे रहा हूँ । अब मेरे योग ऐश्र्वर्य को देखो ।

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सञ्जय उवाच

एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्र्वरो हरिः |

दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्र्वरम् || १ ||

सञ्जयःउवाच –संजय ने कहा; एवम् – इस प्रकार; उक्त्वा –कहकर; ततः –तत्पश्चात्; राजन् – हे राजा; महा-योग-ईश्र्वरः – परा शक्तिशाली योगी; हरिः – भगवान् कृष्ण ने; दर्शयाम् आस – दिखलाया; पार्थाय – अर्जुन को; परमम् – दिव्य; रूपम् ऐश्र्वरम् – विश्र्वरूप |

संजय ने कहा – हे राजा! इस प्रकार कहकर महायोगेश्र्वर भगवान् ने अर्जुन को अपना विश्र्वरूप दिखलाया |

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अनेकवक्त्रनयनमनेकाअद्भुतदर्शनम् |

अनेकदिव्याभरणं दिव्यानेकोद्यतायुधम् || १० ||

दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम् |

सर्वाश्र्चर्यमयं देवमनन्तं विश्र्वतोमुखम् || ११ ||

अनेक – कई; वक्त्र – मुख; नवनम् – नेत्र; अनेक – अनेक; अद्भुत – विचित्र; दर्शनम् – दिशी; अनेक – अनेक; दिव्य – दिव्य,अलौकिक; आभरणम् – आभूषण; दिव्य – दैवी; अनेक – विविध; उद्यत – उठाये हुए; आयुधम् – हथियार; दिव्य – दिव्य; माल्य – मालाएँ; अम्बर – वस्त्र; धरम् – धारण किये; दिव्य – दिव्य; गन्ध – सुगन्धियाँ; अनुलेपनम् – लगी थीं; सर्व – समस्त; आश्र्चर्य-मयम् – आश्चर्यपूर्ण; देवम् – प्रकाशयुक्त; अनन्तम् – असीम; विश्र्वतः-मुखम् – सर्वव्यापी |

अर्जुन ने इस विश्र्वरूप में असंख्य मुख, असंख्य नेत्र तथा असंख्य आश्चर्यमय दृश्य देखे | यह रूप अनेक दैवी आभुषणों से अलंकृत था और अनेक दैवी हथियार उठाये हुए था | यह दैवी मालाएँ तथा वस्त्र धारण किये थे और उस पर अनके दिव्य सुगन्धियाँ लगी थीं | सब कुछ आश्चर्यमय, तेजमय, असीम तथा सर्वत्र व्याप्त था |

*

दिवि सूर्यसहस्त्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता |

यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः || १२ ||

दिवि – आकाश में; सूर्य – सूर्य का; सहस्त्रस्य – हजारों; भवेत् – थे; युगपत् – एकसाथ; उत्थिता – उपस्थित; यदि – यदि; भाः – प्रकाश; सदृशी – के समान; सा – वह; स्यात् – हो; भासः – तेज; तस्य – उस; महात्मनः – परम स्वामी का |

यदि आकाश में हजारों सूर्य एकसाथ उदय हों, तो उनका प्रकाश शायद परमपुरुष के इस विश्र्वरूप के तेज की समता कर सके |

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तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा |

अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदा || १३ ||

तत्र – वहाँ; एक-स्थम् – एकत्र, एक स्थान में; जगत् – ब्रह्माण्ड;कृत्स्नम् – सम्पूर्ण; प्रविभक्तम् – विभाजित; अनेकधा – अनेक में; अपश्यत् – देखा;देव-देवस्य – भगवान् के; शरीरे – विश्र्वरूप में; पाण्डवः – अर्जुन ने; तदा – तब |

उस समय अर्जुन भगवान् के विश्र्वरूप में एक ही स्थान पर स्थित हजारोंभागों में विभक्त ब्रह्माण्ड के अनन्त अंशों को देख सका |

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ततः स विस्मयाविष्टो हृष्टरोमा धनञ्जयः |

प्रणम्य शिरसा देवं कृताञ्जलिरभाषत || १४ ||

ततः – तत्पश्चात्; सः – वह; विस्मय-आविष्टः – आश्चर्यचकित होकर; हृष्ट-रोमा – हर्ष से रोमांचित; धनञ्जयः – अर्जुन; प्रणम्य – प्रणाम करके; शिरसा – शिर के बल; देवम् – भगवान् को; कृत-अञ्जलिः – हाथ जोड़कर; अभाषत – कहने लगा |

तब मोहग्रस्त एवं आश्चर्यचकित रोमांचित हुए अर्जुन ने प्रणाम करने के लिए मस्तक झुकाया और वह हाथ जोड़कर भगवान् से प्रार्थना करने लगा |

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अर्जुन उवाच

पश्यामि देवांस्तव देव देहे

सर्वांस्तथा भूतविशेषसङ्घान् |

ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थ-

मृषींश्र्च सर्वानुरगांश्र्च दिव्यान् || १५ ||

अर्जुनः उवाच – अर्जुन ने कहा; पश्यामि – देखता हूँ; देवान् – समस्त देवताओं को; तव – आपके; देव- हे प्रभु; देहे – शरीर में; सर्वान् – समस्त; तथा – भी; भूत – जिव; विशेष-सङघान् – विशेष रूप से एकत्रित; ब्रह्माणम् – ब्रह्मा को; ईशम् – शिव को; कमल-आसन-स्थम् – कमल के ऊपर आसीन; ऋषीन् – ऋषियों को; च – भी; सर्वान् – समस्त; उरगान् – सर्पों को; च – भी; दिव्यान् – दिव्य |

अर्जुन ने कहा – हे भगवान् कृष्ण! मैं आपके शरीर में सारे देवताओं तथा अन्य विविध जीवों को एकत्र देख रहा हूँ | मैं कमल पर आसीन ब्रह्मा, शिवजी तथा समस्त ऋषियों एवं दिव्य सर्पों को देख रहा हूँ |

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अनेकबाहूदरवक्त्रनेत्रं

पश्यामि त्वां सर्वतोSनन्तरूपम् |

नान्तं न मध्यं न पुनस्तवादिं

पश्यामि विश्र्वेश्र्वर विश्र्वरूप || १६ ||

अनेक – कई; बाहु – भुजाएँ; उदार – पेट; वक्त्र – मुख; नेत्रम् –आँखें; पश्यामि – देख रहा हूँ; त्वाम् – आपको; सर्वतः – चारों ओर; अनन्त-रूपम् – असंख्य रूप; न अन्तम् – अन्तहीन, कोई अन्त नहीं है; न मध्यम् – मध्य रहित; न पुनः – न फिर; तव – आपका; आदिम् – प्रारम्भ; पश्यामि – देखता हूँ; विश्र्व-ईश्र्वर – हे ब्रह्माण्ड के स्वामी; विश्र्वरूप – ब्रह्माण्ड के रूप में |

हे विश्र्वेश्र्वर, हे विश्र्वरूप! मैं आपके शरीर में अनेकानेक हाथ, पेट, मुँह तथा आँखें देख रहा हूँ, जो सर्वत्र फैले हैं और जिनका अन्त नहीं है | आपमें न अन्त दीखता है, न मध्य और न आदि |

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किरीटिनं गदिनं चक्रिणं च

तेजोराशिं सर्वतो दीप्तिमन्तम् |

पश्यामि त्वां दुर्निरीक्ष्यं समन्ता-

द्दीप्तानलार्कद्युतिमप्रमेयम् || १७ ||

किरीटिनम् – मुकुट युक्त; गदिनम् – गदा धारण किये; चक्रिणम् – चक्र समेत; च – तथा; तेजःराशिम् – तेज; सर्वतः – चारों ओर; दीप्ति-मन्तम् – प्रकाश युक्त; पश्यामि – देखता हूँ; त्वाम् – आपको; दुर्निरीक्ष्यम् – देखने में कठिन; समन्तात् – सर्वत्र; दीप्त-अनल – प्रज्जवलित अग्नि; अर्क – सूर्य की; द्युतिम् – धूप; अप्रमेयम् – अनन्त |

आपके रूप को उसके चकाचौंध के कारण देख पाना कठिन है, क्योंकि वह प्रज्जवलित अग्नि कि भाँति अथवा सूर्य के अपार प्रकाश की भाँति चारों ओर फैल रहा है | तो भी मैं इस तेजोमय रूप को सर्वत्र देख रहा हूँ, जो अनेक मुकुटों, गदाओं तथा चक्रों से विभूषित है |

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त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं

त्वमस्य विश्र्वस्य परं निधानम् |

त्वमव्ययः शाश्र्वतधर्मगोप्ता

सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे || १८ ||

त्वम् – आप; अक्षरम् – अच्युत; परमम् – परम; वेदितव्यम् – जानने योग्य; त्वम् – आप; अस्य – इस; विश्र्वस्य – विश्र्व के; परम् – परम; निधानम् – आधार; त्वम् – आप; अव्ययः – अविनाशी; शाश्र्वत-धर्म-गोप्ता – शाश्र्वत धर्म के पालक; सनातनः – शाश्र्वत; त्वम् – आप; पुरुषः – परमपुरुष; मतः मे – मेरा मत है |

आप परम आद्य ज्ञेय वास्तु हैं | आप इस ब्रह्माण्ड के परम आधार (आश्रय) हैं | आप अव्यय तथा पुराण पुरुष हैं | आप सनातन धर्म के पालक भगवान् हैं | यही मेरा मत है |

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अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य-

मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम् |

पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रं

स्वतेजसा विश्र्वमिदं तपन्तम् || १९ ||

अनादि – आदिरहित; मध्य – मध्य; अन्तम् – या अन्त; अनन्त – असीम;वीर्यम् – महिमा; अनन्त – असंख्य; बाहुम् – भुजाएँ; शशि – चन्द्रमा; सूर्य – तथासूर्य; नेत्रम् – आँखें; पश्यामि – देखता हूँ; त्वाम् – आपको; दीप्त – प्रज्जवलित;हुताश-वक्त्रम् – आपके मुख से निकलती अग्नि को; स्व-तेजसा – अपने तेज से;विश्र्वम् – विश्र्व को; इदम् – इस; तपन्तम् – तपाते हुए |

आप आदि, मध्य तथा अन्त से रहित हैं | आपका यश अनन्त है | आपकी असंख्यभुजाएँ हैं और सूर्य चन्द्रमा आपकी आँखें हैं | मैं आपके मुख से प्रज्जवलित अग्निनिकलते और आपके तेज से इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को जलाते हुए देख रहा हूँ |

*

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि

याप्तं त्वयैकेन दिशश्र्च सर्वाः |

दृष्ट्वाद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं

लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन् || २० ||

द्यौ – बाह्य आकाश से लेकर; आ-पृथिव्योः – पृथ्वी तक; इदम् – इस; अन्तरम् – मध्य में; हि – निश्चय ही; व्याप्तम् – व्याप्त; त्वया – आपके द्वारा; एकेन – अकेला; दिशः – दिशाएँ; च – तथा; सर्वाः – सभी; दृष्ट्वा – देखकर; अद्भुतम् – अद्भुत; रूपम् – रूप को; उग्रम् – भयानक; तव – आपके; इदम् – इस; लोक – लोक; त्रयम् – तीन; प्रव्यथितम् – भयभीत, विचलित; महा-आत्मन् – हे महापुरुष |

यद्यपि आप एक हैं, किन्तु आप आकाश तथा सारे लोकों एवं उनके बीच के समस्त अवकाश में व्याप्त हैं | हे महापुरुष! आपके इस अद्भुत तथा भयानक रूप को देखके सारे लोक भयभीत हैं |

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अमी हि त्वां सुरसङ्घा विशन्ति

केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति |

स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः

स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिः || २१ ||

अमी – वे सब; हि – निश्चय ही; त्वाम् – आपको; सुर-सङघाः – देव समूह;विशन्ति – प्रवेश कर रहे हैं; केचित् – उनमें से कुछ; भीताः – भयवश; प्राञ्जलयः –हाथ जोड़े; गृणन्ति – स्तुति कर रहे हैं; स्वस्ति – कल्याण हो; इति – इस प्रकार;महा-ऋषि – महर्षिगण; सिद्ध-सङ्घाः – सिद्ध लोग; स्तुवन्ति – स्तुति कर रहे हैं;त्वाम् – आपकी; स्तुतिभिः – प्रार्थनाओं से; पुष्कलाभिः – वैदिक स्तोत्रों से |

देवों का सारा समूह आपकी शरण ले रहा है और आपमें प्रवेश कर रहा है |उनमें से कुछ अत्यन्त भयभीत होकर हाथ जोड़े आपकी प्रार्थना कर रहें हैं | महर्षियोंतथा सिद्धों के समूह “कल्याण हो” कहकर वैदिक स्तोत्रों का पाठ करते हुए आपकीस्तुति कर रहे हैं |

*

रुद्रादित्या वसवो ये च साध्या

विश्र्वSश्र्विनौ मरुतश्र्चोष्मपाश्र्च |

गन्धर्वयक्षासुरसिद्धसङ्घा

वीक्षन्ते त्वां विस्मिताश्र्चैव सर्वे || २२ |

रूद्र – शिव का रूप; आदित्याः – आदित्यगण; वसवः – सारेवासु; ये – जो; च – तथा; साध्याः – साध्य; विश्र्वे – विश्र्वेदेवता; अश्र्विनौ –अश्र्विनीकुमार; मरुतः – मरुद्गण; च – तथा; उष्ण-पाः – पितर; च – तथा; गन्धर्व –गन्धर्व; यक्ष – यक्ष; असुर – असुर; सिद्ध – तथा सिद्ध देवताओं के; सङ्घाः – समूह;वीक्षन्ते – देख रहे हैं; त्वाम् – आपको; विस्मिताः – आश्चर्यचकित होकर; च – भी;एव – निश्चय ही; सर्वे – सब |

शिव के विविध रूप, आदित्यगण, वासु, साध्य, विश्र्वेदेव, दोनों अश्र्विनीकुमार, मरुद्गण, पितृगण, गन्धर्व, यक्ष, असुर तथा सिद्धदेव सभी आपकोआश्चर्यपूर्वक देख रहे हैं |

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रूपं महत्ते बहुवक्त्रनेत्रं

महाबाहो बहुबाहूरूपादम् |

बहूदरं बहुदंष्ट्राकरालं

दृष्ट्वा लोकाः प्रव्यथितास्तथाहम् || २३ ||

रूपम् – रूप; महत् – विशाल; ते – आपका; बहु – अनेक; वक्त्र – मुख; नेत्रम् – तथा आँखें; महा-बाहों – हे बलिष्ट भुजाओं वाले; बहु – अनेक; बाहु – भुजाएँ; उरु – जाँघें; पादम् – तथा पाँव; बहु-उदरम् – अनेक पेट; बहु-दंष्ट्रा – अनेक दाँत; करालम् – भयानक ; दृष्ट्वा – देखकर; लोकाः – सारे लोक; प्रव्यथिताः – विचलित; तथा – उसी प्रकार; अहम् – मैं |

हे महाबाहु! आपके इस अनेक मुख, नेत्र, बाहु,जांघ, पाँव, पेट तथा भयानक दाँतों वाले विराट रूप को देखकर देवतागण सहित सभी लोक अत्यन्तविचलित हैं और उन्हीं कि तरह मैं भी हूँ |

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नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं

व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम् |

दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा

धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णो || २४ ||

नभः-स्पृशम् – आकाश छूता हुआ; दीप्तम् – ज्योर्तिमय; अनेक – कई; वर्णम् – रंग; व्याक्त – खुले हुए; आननम् – मुख; दीप्त – प्रदीप्त; विशाल – बड़ी-बड़ी; नेत्रम् – आँखें; दृष्ट्वा – देखकर; हि – निश्चय ही; त्वाम् – आपको; प्रव्यथितः – विचलित, भयभीत; अन्तः – भीतर; आत्मा – आत्मा; धृतिम् – दृढ़ता या धैर्य को; न – नहीं; विन्दामि – प्राप्त हूँ; शमम् – मानसिक शान्ति को; च – भी; विष्णो – हे विष्णु |

हे सर्वव्यापी विष्णु!नाना ज्योर्तिमय रंगोंसे युक्त आपको आकाश का स्पर्श करते, मुख फैलाये तथा बड़ी-बड़ी चमकती आँखें निकालेदेखकर भय से मेरा मन विचलित है | मैं न तो धैर्य धारण कर पा रहा हूँ, ण मानसिकसंतुलन ही पा रहा हूँ |

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दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि

दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि |

दिशो न जाने न लभे च शर्म

प्रसीद देवेश जगन्निवास || २५ ||

दंष्ट्रा – दाँत; करालानि – विकराल; च – भी; ते - आपके; मुखानि – मुखों को; दृष्ट्वा – देखकर; एव – इस प्रकार; काल-अनल – प्रलय की; सन्नि-भानि – मानो; दिशः – दिशाएँ; न – नहीं; जाने – जानता हूँ; न – नहीं; लभे – प्राप्त करता हूँ; च – तथा; शर्म – आनन्द; प्रसीद – प्रसन्न हों; देव-ईश – हे देवताओं के स्वामी; जगत्-निवास – हे समस्त जगतों के आश्रय |

भावार्थ

हे देवेश! हे जगन्निवास! आप मुझ पर प्रसन्नहों ! मैं इस प्रकार से आपके प्रल्याग्नि स्वरूप मुखों को तथा विकराल दाँतों कोदेखकर अपना सन्तुलन नहीं रख पा रहा | मैं सब ओर से मोहग्रस्त हो रहा हूँ |

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अमी च त्वां धृतराष्ट्रस्य पुत्राः सर्वे सहैवावनिपालसङ्घै |

भीष्मो द्रोणः सूतपुत्रस्तथासौ सहास्मदियैरपि योधमुख्यै: || २६ ||

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति दंष्ट्राकरालानि भयानकानि |

केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु सन्दृश्यन्ते चूर्णितैरूत्तमाङ्गै: || २७ ||

अमी – ये; च – भी; त्वाम् – आपको; धृतराष्ट्रस्य – धृतराष्ट्र के;पुत्राः – पुत्र; सर्वे – सभी; सह – सहित; एव – निस्सन्देह; अवनि-पाल – वीर राजाओंके; सङ्घै – समूह; भीष्मः – भीष्मदेव; द्रोणः – द्रोणाचार्य; सूत-पुत्रः – कर्ण;तथा – भी; असौ – यह; सह – साथ; अस्मदीयैः – हमारे; अपि – भी; योध-मुख्यैः – मुख्ययोद्धा; वक्त्राणि – मुखों में; ते – आपके; त्वरमाणाः – तेजीसे; विशन्ति – प्रवेश कर रहे हैं; दंष्ट्रा – दाँत; करालानि – विकराल; भयानकानि –भयानक; केचित् – उनमें से कुछ; विलाग्नाः – लगे रहकर; दशन-अन्तरेषु – दाँतों केबीच में; सन्दृश्यन्ते – दिख रहे हैं; चूर्णितैः – चूर्ण हुए; उत्तम-अङगैः – शिरोंसे |

धृतराष्ट्र के सारे पुत्र अपने समस्त सहायकराओं सहित तथा भीष्म, द्रोण, कर्ण एवं हमारे प्रमुख योद्धा भी आपके विकराल मुखमें प्रवेश कर रहे हैं | उनमें से कुछ के शिरों को तो मैं आपके दाँतों के बीचचूर्णित हुआ देख रहा हूँ |

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यथा नदीनां बहवोSम्बुवेगाः समुद्रमेवाभिमुखा द्रवन्ति |

तथा तवामी नरलोकवीरा विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति || २८ ||

यथा – जिस प्रकार; नदीनाम् – नदियों की; बहवः – अनेक; अम्बु-वेगाः –जल की तरंगें; समुद्रम् – समुद्र; एव – निश्चय ही; अभिमुखाः – की ओर; द्रवन्ति –दौड़ती हैं; तथा – उसी प्रकार से; तव – आपके; अभी – ये सब; नर-लोक-वीराः – मानवसमाज के राजा; विशन्ति – प्रवेश कर रहे हैं; वक्त्राणि – मुखों में; अभिविज्वलन्ति– प्रज्जवलित हो रहे हैं |

जिस प्रकार नदियों की अनेक तरंगें समुद्र में प्रवेश करती हैं, उसीप्रकार ये समस्त महान योद्धा भी आपके प्रज्जवलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं |

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यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः |

तथैव नाशाय विशन्ति लोका-स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाः || २९ ||

यथा – जिस प्रकार; प्रदीप्तम् – जलती हुई; ज्वलनम् – अग्नि में; पतङगाः – पतिंगे, कीड़े मकोड़े; विशन्ति – प्रवेश करते हैं; नाशाय – विनाश के लिए; समृद्ध – पूर्ण; वेगाः – वेग; तथा एव – उसी प्रकार से; नाशाय – विनाश के लिए; विशन्ति – प्रवेश कर रहे हैं; लोकाः – सारे लोग; एव – आपके; अपि – भी; वक्त्राणि – मुखों में; समृद्ध-वेगाः – पुरे वेग से |

मैं समस्त लोगों को पूर्ण वेग से आपके मुख में उसी प्रकार प्रविष्टहोते देख रहा हूँ, जिस प्रकार पतिंगे अपने विनाश के लिए प्रज्जवलित अग्नि में कूदपड़ते हैं |

*

लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता- ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः |

तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णो || ३० ||

लेलिह्यसे – चाट रहे हैं; ग्रसमानः – निगलते हुए; समन्तात् – समस्त दिशाओं से; लोकान् – लोगों को; समग्रान् – सभी; वदनैः – मुखों से; ज्वलब्धिः – जलते हुए; तेजोभिः – तेज से; आपूर्य – आच्छादित करके; जगत् – ब्रह्माण्ड को; समग्रम् – समस्त; भासः – किरणें; तव – आपकी; उग्राः – भयंकर; प्रतपन्ति – झुलसा रही हैं; विष्णो – हे विश्र्वव्यापी भगवान् |

हे विष्णु! मैं देखता हूँ कि आप अपने प्रज्जवलित मुखों से सभी दिशाओं के लोगों को निगल रहे हैं | आप सारे ब्रह्माण्ड को अपने तेज से आपूरित करके अपनीविकराल झुलसाती किरणों सहित प्रकट हो रहे हैं |

*

आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोSस्तु ते देववर प्रसीद |

विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम् || ३१ ||

आख्याहि – कृपया बताएं; मे – मुझको; कः – कौन; भवान् – आप; उग्र-रूपः – भयानक रूप; नमः-अस्तु – नमस्कार को; ते – आपको; देव-वर – हे देवताओं में श्रेष्ठ; प्रसीद – प्रसन्न हों; विज्ञातुम् – जानने के लिए; इच्छामि – इच्छुक हूँ; भवन्तम् – आपको; आद्यम् – आदि; न – नहीं; हि – निश्चय ही; प्रजानामि – जानता हूँ; तव – आपका; प्रवृत्तिम् – प्रयोजन |

हे देवेश! कृपा करके मुझे बतलाइये कि इतने उग्ररूप में आप कौन हैं? मैं आपको नमस्कार करता हूँ, कृपा करके मुझ पर प्रसन्न हों | आप आदि-भगवान् हैं | मैं आपको जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं नहीं जान पा रहा हूँ कि आपका प्रयोजन क्या है |

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श्रीभगवानुवाच |

कालोSस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः |

ऋतेSपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे येSवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः || ३२ ||

श्रीभगवान् उवाच - भगवान् ने कहा; कालः - काल; अस्मि - हूँ; लोक - लोकों का; क्षय-कृत - नाश करने वाला; प्रवृद्धः - महान; लोकान् - समस्त लोगों को; समाहर्तुम् - नष्ट करने वाला; प्रवृत्तः - लगा हुआ; ऋते - बिना; अपि - भी; त्वाम् - आपको; न - कभी नहीं; भविष्यन्ति - होंगे; सर्वे - सभी; ये - जो; अवस्थिताः - स्थित; प्रति-अनीकेषु - विपक्ष में; योधाः - सैनिक ।

भगवान् ने कहा - समस्त जगतों को विनष्ट करने वाला काल मैं हूँ और मैं यहाँ समस्त लोगों का विनाश करने के लिए आया हूँ । तुम्हारे (पाण्डवों के) सिवा दोनों पक्षों के सारे योद्धा मारे जाएँगे ।

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तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वा शत्रुन्भुंक्ष्व राज्यं समृद्धम् |

मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भाव सव्यसाचिन् || ३३ ||

तस्मात् – अतएव; त्वम् –तुम; उत्तिष्ट – उठो; यशः – यश; लभस्व – प्राप्त करो; जित्वा – जीतकर; शत्रून् –शत्रुओं को; भुङ्क्ष्व – भोग करो; राज्यम् – राज्य का; समृद्धम् – सम्पन्न; मया –मेरे द्वारा; एव – निश्चय ही; एते – ये सब; निहताः – मारे गये; पूर्वम् एव – पहलेही; निमित्त-मात्रम् – केवल कारण मात्र; भव – बनो; सव्य-साचिन् – हे सव्यसाची |

अतः उठो! लड़ने के लिएतैयार होओ और यश अर्जित करो | अपने शत्रुओं को जीतकर सम्पन्न राज्य का भोग करो |ये सब मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं और हे सव्यसाची! तुम तो युद्ध मेंकेवल निमित्तमात्र हो सकते हो |

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द्रोणं च भीष्मं च जयद्रथं च कर्णं तथान्यानपि योधवीरान् |

मया हतांस्तवं जहि माव्यथिष्ठा युध्यस्व जेतासि रणे सपत्नान् || ३४ ||

द्रोणम् च – तथा द्रोण; भीष्मम् – भीष्म भी; जयद्रथम् च – तथा जयद्रथ;कर्णम् – कर्ण; तथा – और; अन्यान् – अन्य; अपि – निश्चय ही; योध-वीरान् – महानयोद्धा; मया – मेरे द्वारा; हतान् – पहले ही मारे गये; त्वम् – तुम; जहि – मारो;मा – मत; व्यथिष्ठाः – विचलित होओ; युध्यस्व – लड़ो; जेता असि – जीतोगे; रणे –युद्ध में; सपत्नान् – शत्रुओं को |

द्रोण, भीष्म, जयद्रथ, कर्ण तथा अन्य महान योद्धा पहले ही मेरे द्वारामारे जा चुके हैं | अतः उनका वध करो और तनिक भी विचलित न होओ | तुम केवल युद्ध करो| युद्ध में तुम अपने शत्रुओं को परास्त करोगे |

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सञ्जय उवाच |

एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीती |

नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य || ३५ ||

सञ्जयः उवाच – संजय ने कहा; एतत् – इस प्रकार; श्रुत्वा – सुनकर;वचनम् – वाणी; केशवस्य – कृष्ण की; कृत-अञ्जलिः – हाथ जोड़कर; वेपमानः – काँपतेहुए; किरीटी – अर्जुन ने; नमस्कृत्वा – नमस्कार करके; भूयः – फिर; एव – भी; आह –बोला; कृष्णम् – कृष्ण से; स-गद्गदम् – अवरुद्ध स्वर से; भीत-भीतः – डरा-डरा सा;प्रणम्य – प्रणाम करके |

संजय ने धृतराष्ट्र से कहा- हे राजा! भगवान् के मुख से इन वचनों कोसुनकर काँपते हुए अर्जुन ने हाथ जोड़कर उन्हें बारम्बार नमस्कार किया | फिर उसनेभयभीत होकर अवरुद्ध स्वर में कृष्ण से इस प्रकार कहा |

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अर्जुन उवाच |

स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च |

रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः || ३६ ||

अर्जुनः उवाच – अर्जुन ने कहा; स्थाने – यह ठीक है; हृषीक-ईश – हेइन्द्रियों के स्वामी; तव – आपके; प्रकीर्त्या – कीर्ति से; जगत् – सारा संसार;प्रहृष्यति – हर्षित हो रहा है; अनुरज्यते – अनुरक्त हो रहा है; च – तथा; रक्षांसि– असुरगण; भीतानि – डर से; दिशः – सारी दिशाओं में; द्रवन्ति – भाग रहे हैं; सर्वे– सभी; नमस्यन्ति – नमस्कार करते हैं; च – भी; सिद्ध-सङ्घाः – सिद्धपुरुष |

अर्जुन ने कहा – हे हृषिकेश! आपके नाम के श्रवण से संसार हर्षित होताहै और सभी लोग आपके प्रति अनुरक्त होते हैं | यद्यपि सिद्धपुरुष आपको नमस्कार करतेहैं, किन्तु असुरगण भयभीत हैं और इधर-उधर भाग रहे हैं | यह ठीक ही हुआ है |

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कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोंSप्यादिकर्त्रे |

अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् || ३७ ||

कस्मात् – क्यों; च – भी; ते – आपको; न – नहीं; नमेरन् – नमस्कारकरें; महा-आत्मन् – हे महापुरुष; गरीयसे – श्रेष्ठतर लोग; ब्रह्मणः – ब्रह्मा कीअपेक्षा; अपि – यद्यपि; आदि-कर्त्रे – परम स्त्रष्टा को; अनन्त – हे अनन्त; देव-ईश– हे इशों के ईश; जगत्-निवास – हे जगत के आश्रय; त्वम् – आप हैं; अक्षरम् –अविनाशी; सत्-असत् – कार्य तथा कारण; तत्-परम् – दिव्य; यत् – क्योंकि |

हे महात्मा! आप ब्रह्मा से भी बढ़कर हैं, आप आदि स्त्रष्टा हैं | तोफिर आपको सादर नमस्कार क्यों न करें? हे अनन्त, हे देवेश, हे जगन्निवास! आप परमस्त्रोत, अक्षर, कारणों के कारण तथा इस भौतिक जगत् के परे हैं |

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त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण- स्त्वमस्य विश्र्वस्य परं निधानम् |

वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्र्वमनन्तरूप || ३८ ||

त्वम् – आप; आदि-देवः – आदि परमेश्र्वर; पुरुषः – पुरुष; पुराणः –प्राचीन, सनातन; त्वम् – आप; अस्य – इस; विश्र्वस्य – विश्र्व का; परम् – दिव्य;निधानम् – आश्रय; वैत्ता – जानने वाला; असि – हओ; वेद्यम् – जानने योग्य, ज्ञेय; च– तथा; परम् – दिव्य; च – और; धाम – वास, आश्रय; त्वया – आपके द्वारा; ततम् –व्याप्त; विश्र्वम् – विश्र्व; अनन्त-रूप – हे अनन्त रूप वाले |

आप आदि देव, सनातन पुरुष तथा इस दृश्यजगत के परम आश्रय हैं | आप सबकुछ जानने वाले हैं और आप ही सब कुछ हैं, जो जानने योग्य है | आप भौतिक गुणों सेपरे परम आश्रय हैं | हे अनन्त रूप! यह सम्पूर्ण दृश्यजगत आपसे व्याप्त है |

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वायुर्यमोSग्निर्वरुणः शशाङ्कः प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्र्च |

नमो नमस्तेSस्तु सहस्रकृत्वः पुनश्र्च भूयोSपि नमो नमस्ते || ३९ ||

वायुः - वायु; यमः - नियन्ता; अग्निः - अग्नि; वरुणः - जल; शश-अङ्कः - चन्द्रमा; प्रजापतिः - ब्रह्मा; त्वम्- आप; प्र-पितामहः - परबाबा; च - तथा; नमः - मेरा नमस्कार; नमः - पुनः नमस्कार; ते - आपको; अस्तु - हो; सहस्त्र-कृत्वः- हजार बार; पुनः-च - तथा फिर; भूयः - फिर; अपि - भी; नमः - नमस्कार; नमः-ते - आपको मेरा नमस्कार है ।

आप वायु हैं तथा परम नियन्ता हैं । आप अग्नि हैं, जल हैं तथा चन्द्रमा हैं । आप आदि ब्रह्मा हैं और आप प्रपितामह हैं । अतः आपको हजार बार नमस्कार है और पुनः नमस्कार है ।

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नमः पुरस्तादथ पृष्ठस्ते नमोSस्तु ते सर्वत एव सर्व |

अनन्तवीर्यामीतविक्रमस्त्वं सर्वं समाप्नोषि ततोSसि सर्वः || ४० ||

नमः – नमस्कार; पुरस्तात् – सामने से; अथ – भी; पृष्ठतः – पीछे से; ते– आपको; नमः-अस्तु – मैं नमस्कार करता हूँ; ते – आपको; सर्वतः – सभी दिशाओं से; एव– निस्सन्देह; सर्व – क्योंकि आप सब कुछ हैं; अनन्त-वीर्य – असीम पौरुष;अमित-विक्रमः – तथा असीम बल; त्वम् – आप; सर्वम् – सब कुछ; समाप्नोषि – आच्छादितकरते हओ; ततः – अतएव; असि – हो; सर्वः – सब कुछ |

आपको आगे, पीछे, तथा चारों ओर से नमस्कार है | हे असीम शक्ति! आपअनन्त पराक्रम के स्वामी हैं | आप सर्वव्यापी हैं, अतः आप सब कुछ हैं |

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सखेति मत्वा प्रसभं यदुक्तं हे कृष्ण हे यादव हे सखेति |

अजानता महिमानं तवेदं मया प्रमादात्प्रणयेन वापि || ४१ ||

यच्चावहासार्थमसत्कृतोSसि विहारशय्यासनभोजनेषु |

एकोSथवाप्यच्युत तत्समक्षं तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम् || ४२ ||

सखा – मित्र; इति – इस प्रकार; मत्वा – मानकर; प्रसभम् – हठपूर्वक; यत्– जो भी; उत्तम् – कहा गया; हे कृष्ण – हे कृष्ण; हे यादव – हे यादव; हे सखा – हेमित्र; इति – इस प्रकार; अजानता – बिना जाने; महिमानम् – महिमा को; तव – आपकी;इदम् – यह; मया – मेरे द्वारा; प्रमादात् – मूर्खतावश; प्रणयेन – प्यार वश; वा अपि– या तो; यत् – जो; च – भी; अह्वास-अर्थम् – हँसी के लिए; असत्-कृतः – अनादर कियागया; असि – हो; विहार – आराम में; शय्या – लेटे रहने पर; आसन – बैठे रहने पर;भोजनेषु – या भोजन करते समय; एकः – अकेले; अथवा – या; अपि – भी; अच्युत – हेअच्युत; तत्-समक्षम् – साथियों के बीच; तत् – उन सभी; क्षामये – क्षमाप्रार्थीहूँ; त्वाम् – आपसे; अहम् – मैं; अप्रमेयम् – अचिन्त्य |

आपको अपना मित्र मानते हुए मैंने हठपूर्वक आपको हे कृष्ण, हे यादव, हेसखा जैसे सम्बोधनों से पुकारा है, क्योंकि मैं आपकी महिमा को नहीं जानता था |मैंने मूर्खतावश या प्रेमवश जो कुछ भी किया है, कृपया उसके लिए मुझे क्षमा कर दें| यही नहीं, मैंने कई बार आराम करते समय, एकसाथ लेटे हुए या साथ-साथ खाते या बैठेहुए, कभी अकेले तो कभी अनेक मित्रों के समक्ष आपका अनादर किया है | हे अच्युत!मेरे इन समस्त अपराधों को क्षमा करें |

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पितासि लोकस्य चराचरस्य त्वमस्य पूज्यश्र्च गुरुर्गरीयान् |

न त्वत्समोSस्त्यभ्यधिकः कुतोSन्यो लोकत्रयेSप्यप्रतिमप्रभाव || ४३ ||

पिता - पिता; असि - हो; लोकस्य - पूरे जगत के; चर - सचल; अचरस्थ - तथा अचलों के; त्वम् - आप हैं ; अस्य - इसके; पूज्यः - पूज्य; च - भी; गुरुः - गुरु; गरीयान् - यशस्वी, महिमामय; न - कभी नहीं; त्वत्-समः - आपके तुल्य; अस्ति - है; अभ्यधिकः - बढ़ कर; कुतः - किस तरह संभव है; अन्यः - दूसरा; लोक-त्रये - तीनों लोकों में; अपि - भी; अप्रतिम-प्रभाव - हे अचिन्त्य शक्ति वाले ।

आप इस चर तथा अचर सम्पूर्ण दृश्यजगत के जनक हैं । आप परम पूज्य महान आध्यात्मिक गुरु हैं । न तो कोई आपके तुल्य है, न ही कोई आपके समान हो सकता है । हे अतुल शक्ति वाले प्रभु! भला तीनों लोकों में आपसे बढ़कर कोई कैसे हो सकता है?

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तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम् |

पितेव पुत्रस्य सखेव सख्यु: प्रियः प्रिययार्हसि देव सोढुम् || ४४ ||

तस्मात् - अतः; प्रणम्य - प्रणाम् करके; प्रणिधाय - प्रणत करके; कायम् - शरीर को; प्रसादये - कृपा की याचना करता हूँ; त्वाम् - आपसे; अहम् - मैं; ईशम् - भगवान् से; ईड्यम् - पूज्य; पिता इव - पिता तुल्य; सखा इव - मित्रवत्; सख्युः - मित्र का; प्रियः - प्रेमी; प्रियायाः - प्रिया का; अर्हसि - आपको चाहिए; देव - मेरे प्रभु; सोढुम् - सहन करना ।

आप प्रत्येक जीव द्वारा पूजनीय भगवान् हैं । अतः मैं गीरकर सादर प्रणाम करता हूँ और आपकी कृपा की याचना करता हूँ । जिस प्रकार पिता अपने पुत्र की ढिठाई सहन करता है, या मित्र अपने मित्र की घृष्टता सह लेता है, या प्रिय अपनी प्रिया का अपराध सहन कर लेता है, उसी प्रकार आप कृपा करके मेरी त्रुटियों को सहन कर लें ।

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अदृष्टपूर्वं हृषितोSस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे |

तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवास || ४५ ||

अदृष्ट-पूर्वम् - पहले कभी न देखा गया; हृषितः - हर्षित; अस्मि - हूँ;दृष्ट्वा - देखकर; भयेन - भय के कारण; च - भी; प्रव्यथितम् - विचलित, भयभीत; मनः - मन; मे - मेरा; तत् - वह; एव - निश्चय ही; मे - मुझको; दर्शय - दिखलाइये; देव - हे प्रभु; रूपम् - रूप; प्रसीद - प्रसन्न होइये; देव-ईश - ईशों के ईश; जगत्-निवास - हे जगत के आश्रय ।

पहले कभी न देखे गये आपके विराट रूप का दर्शन करके मैं पुलकित हो रहा हूँ, किन्तु साथ ही मेरा मन भयभीत हो रहा है । अतः आप मुझ पर कृपा करें और हे देवेश, हे जगन्निवास! अपना पुरुषोत्तम भगवत् स्वरूप पुनः दिखाएँ ।

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किरीटिनं गदिनं चक्रहस्त- मिच्छामि त्वां द्रष्टुमहं तथैव |

तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन सहस्रबाहो भव विश्र्वमूर्ते || ४६ ||

किरीटिनम् - मुकुट धारण किये; गदिनम् - गदाधारी; चक्रहस्तम् - चक्रधारण किये; इच्छामि - इच्छुक हूँ; त्वाम् - आपको; द्रष्टुम् - देखना; अहम् - मैं; तथा एव - उसी स्थिति में; तेन-एव - उसी; रूपेण - रूप में; चतुःभुजेन - चार हताहों वाले; सहस्त्र-बाहों - हे हजार भुजाओं वाले; भव - हो जाइये; विश्र्व-मूर्ते - हे विराट रूप |

हे विराट रूप! हे सहस्त्रभुज भगवान्! मैं आपके मुकुटधारी चतुर्भुज रूप का दर्शन करना चाहता हूँ, जिसमें आप अपने चारों हाथों में शंख, चक्र, गदा तथा पद्म धारण किये हुए हों | मैं उसी रूप को देखने की इच्छा करता हूँ |

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श्रीभगवानुवाच |

मया प्रसन्नेन तवार्जुनेदं रूपं परं दर्शितमात्मयोगात् |

तेजोमयं विश्र्वमनन्तमाद्यं यन्मे त्वदन्येन न दृष्टपूर्वम् || ४७ ||

श्रीभगवान् उवाच - श्रीभगवान् ने कहा; मया - मेरे द्वारा; प्रसन्नेन - प्रसन्न; तव - तुमको; अर्जुन - हे अर्जुन; इदम् - इस; रूपम् - रूप को; परम् - दिव्य; दर्शितम् - दिखाया गया; आत्म-योगात् - अपनी अन्तरंगा शक्ति से; तेजःमयम् - तेज से पूर्ण; विश्र्वम् - समग्र ब्रह्माण्ड को; अनन्तम् - असीम; आद्याम् - आदि; यत् - जो; मे - मेरा; त्वत् अन्येन - तुम्हारे अतिरिक्त अन्य के द्वारा; न दृष्ट पूर्वम् - किसी ने पहले नहीं देखा |

भगवान् ने कहा - हे अर्जुन! मैंने प्रसन्न होकर अपनी अन्तरंगा शक्ति के बल पर तुम्हें इस संसार में अपने इस परम विश्र्वरूप का दर्शन कराया है | इसके पूर्ण अन्य किसी ने इस असीम तथा तेजोमय आदि-रूप को कभी नहीं देखा था |

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न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै- र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रै: |

एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीर || ४८ ||

न - कभी नहीं; वेद- यज्ञ - यज्ञ द्वारा; अध्ययनैः - या वेदों के अध्ययन से; न - कभी नहीं; दानैः - दान के द्वारा; न - कभी नहीं; च - भी; क्रियाभिः - पुण्य कर्मों से; न - कभी नहीं; तपोभिः - तपस्या के द्वारा; उग्रैः - कठोर; एवम्-रूपः - इस रूप में; शक्यः - समर्थ; अहम् - मैं; नृ-लोके - इस भौतिक जगत में; द्रष्टुम् - देखे जाने में; त्वत् - तुम्हारे अतिरिक्त; अन्येन - अन्य के द्वारा; कुरु-प्रवीर - कुरु योद्धाओं में श्रेष्ठ |

हे कुरुश्रेष्ठ! तुमसे पूर्व मेरे इस विश्र्वरूप को किसी ने नहीं देखा, क्योंकि मैं न तो वेदाध्ययन के द्वारा, न यज्ञ, दान, पुण्य या कठिन तपस्या के द्वारा इस रूप में, इस संसार में देखा जा सकता हूँ |

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मा ते व्यथा मा च विमूढ़भावो दृष्ट्वा रूपं घोरमीदृङ्ममेदम् |

व्यपेतभी: प्रीतमनाः पुनस्त्वं तदेव मे रूपमिदं प्रपश्य || ४९ ||

मा - न हो; ते - तुम्हें; व्यथा - पीड़ा, कष्ट; मा - न हो; च - भी; विमूढ-भावः - मोह; दृष्ट्वा - देखकर; रूपम् - रूप को; घोरम् - भयानक; ईदृक् - इस; व्यपेत-भीः - सभी प्रकार के भय से मुक्त; प्रीत-मनाः - प्रसन्न चित्त; पुनः - फिर; त्वम् - तुम; तत् - उस; एव - इस प्रकार; मे - मेरे; रूपम् - रूप को; इदम् - इस; प्रपश्य - देखो |

तुम मेरे भयानक रूप को देखकर अत्यन्त विचलित एवं मोहित हो गये हो | अब इसे समाप्त करता हूँ | हे मेरे भक्त! तुम समस्त चिन्ताओं से पुनः मुक्त हो जाओ | तुम शान्त चित्त से अब अपना इच्छित रूप देख सकते हो |

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सञ्जय उवाच |

इत्यर्जुनं वासुदेवस्तथोक्त्वा स्वकं रूपं दर्शयामास भूयः |

आश्र्वासयामास च भीतमेनं भूत्वा पुनः सौम्यवपुर्महात्मा || ५० ||

सञ्जयःउवाच - संजय ने कहा; इति - इस प्रकार; अर्जुनम् - अर्जुन को; वासुदेवः - कृष्ण ने; तथा - उस प्रकार से; उक्त्वा - कहकर; स्वकम् - अपना, स्वीय; रूपम् - रूप को; दर्शयाम् आस- दिखलाया; भूयः - फिर; आश्र्वासयाम् आस- धीरज धराया; च - भी; भीतम् - भयभीत; एनम् - उसको; भूत्वा - होकर; पुनः - फिर; सौम्य वपुः - सुन्दर रूप; महा-आत्मा - महापुरुष |

संजय ने धृतराष्ट्र से कहा - अर्जुन से इस प्रकार कहने के बाद भगवान् कृष्ण ने अपना असली चतुर्भुज रूप प्रकट किया और अन्त में दो भुजाओं वाला रूप प्रदर्शित करके भयभीत अर्जुन को धैर्य बँधाया |

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अर्जुन उवाच |

दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन |

इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः || ५१ ||

अर्जुनःउवाच - अर्जुन ने कहा; दृष्ट्वा - देखकर; इदम् - इस; मानुषम् - मानवी; रूपम् - रूप को; तव - आपके; सौम्यम् - अत्यन्त सुन्दर; जनार्दन - हे शत्रुओं को दण्डित करने वाले; इदानीम् - अब; अस्मि - हूँ; संवृत्तः - स्थिर; स-चेताः - अपनी चेतना में; प्रकृतिम् - अपनी प्रकृति को; गतः - पुनः प्राप्त हूँ |

जब अर्जुन ने कृष्ण को उनके आदि रूप में देखा तो कहा - हे जनार्दन! आपके इस अतीव सुन्दर मानवी रूप को देखकर मैं अब स्थिरचित्त हूँ और मैंने अपनी प्राकृत अवस्था प्राप्त कर ली है |

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श्रीभगवानुवाच |

सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम |

देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणः || ५२ ||

श्रीभगवान् उवाच - श्रीभगवान् ने कहा; सु-दुर्दर्शम् - देख पाने में अत्यन्त कठिन; इदम् - इस; रूपम् - रूप को; दृष्टवान् असि - जैसा तुमने देखा; यत् - जो; मम - मेरे; देवाः - देवता; अपि - भी; अस्य - इस; रूपस्य - रूप का; नित्यम् - शाश्र्वत; दर्शन-काङ्क्षिणः - दर्शनाभिलाषी |

श्रीभगवान् ने कहा - हे अर्जुन! तुम मेरे जिस रूप को इस समय देख रहे हो, उसे देख पाना अत्यन्त दुष्कर है | यहाँ तक कि देवता भी इस अत्यन्त प्रिय रूप को देखने की ताक में रहते हैं |

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नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया |

शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा || ५३ ||

न - कभी नहीं; अहम् - मैं; वेदैः - वेदाध्ययन से; न - कभी नहीं; तपसा - कठिन तपस्या द्वारा; न - कभी नहीं; दानेन - दान से; च - भी; इज्यया - पूजा से; शक्यः - संभव है; एवम् -विधः - इस प्रकार से; द्रष्टुम् - देख पाना; दृष्टवान् - देख रहे; असि - तुम हो; माम् - मुझको; यथा - जिस प्रकार |

तुम अपने दिव्य नेत्रों से जिस रूप का दर्शन कर रहे हो, उसे न तो वेदाध्ययन से, न कठिन तपस्या से, न दान से, न पूजा से ही जाना जा सकता है | कोई इन साधनों के द्वारा मुझे मेरे रूप में नहीं देख सकता |

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भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोSर्जुन |

ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप || ५४ ||

भक्त्या - भक्ति से; तु - लेकिन; अनन्यया - सकामकर्म तथा ज्ञान के रहित; शक्यः - सम्भव; अहम् - मैं; एवम्-विधः - इस प्रकार; अर्जुन - हे अर्जुन; ज्ञातुम् - जानने; द्रष्टुम् - देखने; च - तथा; तत्त्वेन - वास्तव में; प्रवेष्टुम् - प्रवेश करने; च - भी; परन्तप - हे बलिष्ठ भुजाओं वाले |

हे अर्जुन! केवल अनन्य भक्ति द्वारा मुझे उस रूप में समझा जा सकता है, जिस रूप में मैं तुम्हारे समक्ष खड़ा हूँ और इसी प्रकार मेरा साक्षात् दर्शन भी किया जा सकता है | केवल इसी विधि से तुम मेरे ज्ञान के रहस्य को पा सकते हो |

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मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः |

निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव || ५५ ||

मत्-कर्म-कृत - मेरा कर्म करने में रत; मत्-परमः - मुझको परम मानते हुए; मत्-भक्तः - मेरी भक्ति में रत; सङग-वर्जितः - सकाम कर्म तथा मनोधर्म के कल्मष से मुक्त; निर्वैरः - किसी से शत्रुरहित; सर्व-भूतेषु - समस्त जीवों में; यः - जो; माम् - मुझको; एति - प्राप्त करता है; पाण्डव - हे पाण्डु के पुत्र |

हे अर्जुन! जो व्यक्ति सकाम कर्मों तथा मनोधर्म के कल्मष से मुक्त होकर, मेरी शुद्ध भक्ति में तत्पर रहता है, जो मेरे लिए ही कर्म करता है, जो मुझे ही जीवन-लक्ष्य समझता है और जो प्रत्येक जीव से मैत्रीभाव रखता है, वह निश्चय ही मुझे प्राप्त करता है |

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