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अध्याय 10 - श्रीभगवान् का ऐश्वर्य

श्रीभगवानुवाच

भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः |

यत्तेSहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया || १ ||

श्रीभगवान् उवाच – भगवान् ने कहा; भूयः – फिर; एव – निश्चय ही; महा-बाहो – हे बलिष्ट भुजाओं वाले; शृणु – सुनो; मे – मेरा; परमम् – परं; वचः – उपदेश; यत् – जो; ते – तुमको; अहम् – मैं; प्रीयमाणाय – अपना प्रिय मानकर; वक्ष्यामि – कहता हूँ; हित-काम्यया – तुम्हारे हित (लाभ) के लिए |

श्रीभगवान् ने कहा – हे महाबाहु अर्जुन! और आगे सुनो | चूँकि तुम मेरे प्रिय सखा हो, अतः मैं तुम्हारे लाभ के लिए ऐसा ज्ञान प्रदान करूँगा, जो अभि तक मेरे द्वारा बताये गये ज्ञान से श्रेष्ठ होगा |

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न मे विदु: सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः |

अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः || २ ||

न – कभी नहीं; मे – मेरे; विदुः- जानते हैं; सुर-‍गणाः – देवता; प्रभवम् – उत्पत्ति या ऐश्र्वर्य को; न – कभी नहीं; महा-ऋषयः – बड़े-बड़े ऋषि; अहम् – मैं हूँ; आदिः – उत्पत्ति; हि – निश्चय ही; देवानाम् – देवताओं का; महा-ऋषीणाम् – महर्षियों का; च – भी; सर्वशः – सभी तरह से |

न तो देवतागण मेरी उत्पत्ति या ऐश्र्वर्य को जानते हैं और न महर्षिगण ही जानते हैं, क्योंकि मैं सभी प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी कारणस्वरूप (उद्गम) हूँ |

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यो मामजमनादिं च वेत्ति लोक महेश्र्वरम् |

असम्मूढ़ः स मर्त्येषु सर्वपापै: प्रमुच्यते || ३ ||

यः – जो; माम् – मुझको; अजम् – अजन्मा; अनादिम् – अदिरहित; च – भी; वेत्ति – जानता है; लोक – लोकों का; महा-ईश्र्वरम् – परम स्वामी; असम्मूढः – मोहरहित; सः – वह; मर्त्येषु – मरणशील लोगों में; सर्व-पापैः – सारे पापकर्मों से; प्रमुच्यते – मुक्त हो जाता है |

जो मुझे अजन्मा, अनादि, समस्त लोकों के स्वामी के रूप में जानता है, मनुष्यों में केवल वही मोहरहित और समस्त पापों से मुक्त होता है |

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बुद्धिर्ज्ञानसम्मोहः क्षमा सत्यं दमः शमः |

सुखं दु:खं भवोSभावो भयं चाभयमेव च || ४ ||

अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोSयशः |

भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाः || ५ ||

बुद्धिः – बुद्धि; ज्ञानम् – ज्ञान; असम्मोहः – संशय से रहित; क्षमा – क्षमा; सत्यम् – सत्यता; दमः – इन्द्रियनिग्रह; शमः – मन का निग्रह; सुखम् – सुख; दुःखम् – दुख; भवः – जन्म; अभवः – मृत्यु; भयम् – डर; च – भी; अभयम् – निर्भीकता; एव – भी; च – तथा; अहिंसा – अहिंसा; समता – समभाव; तुष्टिः – संतोष; तपः – तपस्या; दानम् – दान; यशः – यश; अयशः – अपयश, अपकीर्ति; भवन्ति – होते हैं; भावाः – प्रकृतियाँ; भूतानाम् – जीवों की; मत्तः – मुझसे; एव – निश्चय ही; पृथक्-विधाः – भिन्न-भिन्न प्रकार से व्यवस्थित |

बुद्धि, ज्ञान, संशय तथा मोह से मुक्ति, क्षमाभाव, सत्यता, इन्द्रियनिग्रह, मननिग्रह, सुख तथा दुख, जन्म, मृत्यु, भय, अभय, अहिंसा, समता, तुष्टि, तप, दान, यश तथा अपयश – जीवों के ये विविध गुण मेरे ही द्वारा उत्पन्न हैं |

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महर्षयः सप्त पूर्वे चत्वारो मनवस्तथा |

मद्भावा मानसा जाता येषां लोक इमाः प्रजाः || ६ ||

महा-ऋषयः – महर्षिगण; सप्त – सात; पूर्वे – पूर्वकाल में; चत्वारः – चार; मनवः – मनुगण; तथा – भी; मत्-भावाः – मुझसे उत्पन्न; मानसाः – मन से; जाताः – उत्पन्न; येषाम् – जिनकी; लोके – संसार में; इमाः – ये सब; प्रजाः – सन्तानें, जीव |

सप्तर्षिगण तथा उनसे भी पूर्व चार अन्य महर्षि एवं सारे मनु (मानवजाति के पूर्वज) सब मेरे मन से उत्पन्न हैं और विभिन्न लोकों में निवास करने वाले सारे जीव उनसे अवतरित होते हैं |

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एतां विभूतिं योगं च मम यो वेत्ति तत्त्वतः |

सोSविकल्पेन योगेन युज्यते नात्र संशयः || ७ ||

एताम् – इस सारे; विभूतिम् – ऐश्र्वर्य को; योगम् – योग को; च – भी; मम – मेरा; यः – जो कोई; वेत्ति – जानता है; तत्त्वतः – सही-सही; सः – वह; अविकल्पेन – निश्चित रूप से; योग्येन – भक्ति से; युज्यते – लगा रहता है; न – कभी नहीं; अत्र – यहाँ; संशयः – सन्देह, शंका |

जो मेरे इस ऐश्र्वर्य तथा योग से पूर्णतया आश्र्वस्त है, वह मेरी अनन्य भक्ति में तत्पर होता है | इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है |

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अहं सर्वस्य प्रभवो मत्तः सर्वं प्रवर्तते |

इति मत्वा भजन्ते मां बुधा भावसमन्विताः || ८ ||

अहम् – मैं; सर्वस्य – सबका; प्रभवः – उत्पत्ति का कारण; मत्तः – मुझसे; सर्वम् – सारी वस्तुएँ; प्रवर्तते – उद्भूत होती हैं; इति – इस प्रकार; मत्वा – जानकर; भजन्ते – भक्ति करते हैं; माम् – मेरी; बुधाः – विद्वानजन; भाव-समन्विताः – अत्यन्त मनोयोग से |

मैं समस्त आध्यात्मिक तथा भौतिक जगतों का कारण हूँ, प्रत्येक वस्तु मुझ ही से उद्भूत है | जो बुद्धिमान यह भलीभाँति जानते हैं, वे मेरी प्रेमाभक्ति में लगते हैं तथा हृदय से पूरी तरह मेरी पूजा में तत्पर होते हैं |

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मच्चित्ता मद्गतप्राणा बोधयन्तः परस्परम् |

कथयन्तश्र्च मां नित्यं तुष्यन्ति च रमन्ति च || ९ ||

मत्-चित्ताः – जिनके मन मुझमें रमे हैं; मत्-गत-प्राणाः – जिनके जीवन मुझ में अर्पित हैं; बोधयन्तः – उपदेश देते हुए; परस्परम् – एक दूसरे से, आपस में; च – भी; कथयन्तः – बातें करते हुए; च – भी; माम् – मेरे विषय में; नित्यम् – निरन्तर; तुष्यन्ति – प्रसन्न होते हैं; च – भी; रमन्ति – दिव्य आनन्द भोगते हैं; च – भी |

मेरे शुद्ध भक्तों के विचार मुझमें वास करते हैं, उनके जीवन मेरी सेवा में अर्पित रहते हैं और वे एक दूसरे को ज्ञान प्रदान करते तथा मेरे विषय में बातें करते हुए परं संतोष तथा आनन्द का अनुभव करते हैं |

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तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम् |

ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति ते || १० ||

तेषाम् – उन; सतत-युक्तानाम् – सदैव लीन रहने वालों को; भजताम् – भक्ति करने वालों को; प्रीति-पूर्वकम् – प्रेमभावसहित; ददामि – देता हूँ; बुद्धि-योगम् – असली बुद्धि; तम् – वह; येन – जिससे; माम् – मुझको; उपयान्ति – प्राप्त होते हैं; ते – वे |

जो प्रेमपूर्वक मेरी सेवा करने में निरन्तर लगे रहते हैं, उन्हें मैं ज्ञान प्रदान करता हूँ, जिसके द्वारा वे मुझ तक आ सकते हैं |

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तेषामेवानुकम्पार्थमहमज्ञानजं तमः |

नाशयाम्यात्मभावस्थो ज्ञानदीपेन भास्वता || ११ ||

तेषाम् – उन पर; एव – निश्चय ही; अनुकम्पा-अर्थम् – विशेष कृपा करने के लिए; अहम् – मैं; अज्ञान-जम् – अज्ञान के कारण; तमः – अंधकार; नाशयामि – दूर करता हूँ; आत्म-भाव – उनके हृदयों में; स्थः – स्थित; ज्ञान – ज्ञान के; दीपेन – दीपक द्वारा; भास्वता – प्रकाशमान हुए |

मैं उन पर विशेष कृपा करने के हेतु उनके हृदयों में वास करते हुए ज्ञान के प्रकाशमान दीपक के द्वारा अज्ञानजन्य अंधकार को दूर करता हूँ |

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अर्जुन उवाच

परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान् |

पुरुषं शाश्र्वतं दिव्यमादिदेवमजं विभुम् || १२ ||

आहुस्त्वामृषयः सर्वे देवर्षिर्नारदस्तथा |

असितो देवलो व्यासः स्वयं चैव ब्रवीषि मे || १३ ||

अर्जुन उवाच – अर्जुन ने कहा; परम् – परम; ब्रह्म – सत्य; परम् – परम; धाम – आधार; पवित्रम् – शुद्ध; परमम् – परम; भवान् – आप; पुरुषम् – पुरुष; शाश्र्वतम् – नित्य; दिव्यम् – दिव्य; आदि-देवम् – आदि स्वामी; अजम् – अजन्मा; विभुम् –सर्वोच्च; आहुः- कहते हैं; त्वाम् – आपको; ऋषयः – साधुगण; सर्वे – सभी; देव-ऋषि – देवताओं के ऋषि; नारदः – नारद; तथा – भी; असितः – असित; देवलः – देवल; व्यासः – व्यास; स्वयम् – स्वयं; च – भी; एव – निश्चय ही; ब्रवीषि – आप बता रहे हैं; मे – मुझको |

अर्जुन ने कहा- आप परम भगवान्, परमधाम, परमपवित्र, परमसत्य हैं | आप नित्य, दिव्य, आदि पुरुष, अजन्मा तथा महानतम हैं | नारद, असित, देवल तथा व्यास जैसे ऋषि आपके इस सत्य की पुष्टि करते हैं और अब आप स्वयं भी मुझसे प्रकट कह रहे हैं |

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सर्वमेतदृतं मन्ये यन्मां वदसि केशव |

न हि ते भगवन्व्यक्तिं विदुर्देवा न दानवाः || १४ ||

सर्वम् – सब; एतत् – इस; ऋतम् – सत्य को; मन्ये – स्वीकार करता हूँ; यत् – जो; माम् – मुझको; वदसि – कहते हो; केशव – हे कृष्ण; न – कभी नहीं; हि – निश्चय ही; ते – आपके; भगवान् – हे भगवान्; व्यक्तिम् – स्वरूप को; विदुः – जान सकते हैं; देवाः – देवतागण; न – न तो; दानवाः – असुरगण |

हे कृष्ण! आपने मुझसे जो कुछ कहा है, उसे मैं पूर्णतया सत्य मानता हूँ | हे प्रभु! न तो देवतागण, न असुरगण ही आपके स्वरूप को समझ सकते हैं |

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स्वयमेवात्मनात्मानं वेत्थ त्वं पुरुषोत्तम |

भूतभावन भूतेश देवदेव जगत्पते || १५ ||

स्वयम् – स्वयं; एव – निश्चय ही; आत्मना – अपने आप; आत्मानम् – अपने को; वेत्थ – जानते हो; त्वम् – आप; पुरुष-उत्तम – हे पुरुषोत्तम; भूत-भावन – हे सबके उद्गम; भूत-ईश – सभी जीवों के स्वामी; देव-देव – हे समस्त देवताओं के स्वामी; जगत्-पते – हे सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी |

हे परमपुरुष, हे सबके उद्गम, हे समस्त प्राणियों के स्वामी, हे देवों के देव, हे ब्रह्माण्ड के प्रभु! निस्सन्देह एकमात्र आप ही अपने को अपनी अन्तरंगाशक्ति से जानने वाले हैं |

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वक्तुमर्हस्यशेषेण दिव्या ह्यात्मविभूतयः |

याभिर्विभूतिभिर्लोकानिमांस्त्वं व्याप्य तिष्ठसि || १६ ||

वक्तुम् – कहने के लिए; अर्हसि – योग्य हैं; अशेषेण – विस्तार से; दिव्याः – दैवी, अलौकिक; हि – निश्चय ही; आत्मा – अपना; विभूतयः – ऐश्र्वर्य; याभिः – जिन; विभूतिभिः – ऐश्र्वर्यों से; लोकान् – समस्त लोकों को; इमान् – इन; त्वम् – आप; व्याप्य – व्याप्त होकर; तिष्ठसि – स्थित हैं |

कृपा करके विस्तारपूर्वक मुझे अपने उन दैवी ऐश्र्वर्यों को बतायें, जिनके द्वारा आप इन समस्त लोकों में व्याप्त हैं |

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कथं विद्यामहं योगिंस्त्वां सदा परिचिन्तयन् |

केषु केषु च भावेषु चिन्त्योSसि भगवन्मया || १७ ||

कथम् – किस तरह, कैसे; विद्याम् अहम् – मैं जान सकूँ; योगिन् – हे परम योगी; त्वाम् – आपको; सदा – सदैव; परिचिन्तयन् – चिन्तन करता हुआ; केषु – किस; केषु – किस; च – भी; भावेषु – रूपों में; चिन्त्यः-असि – आपका स्मरण किया जाता है; भगवन् – हे भगवान्; मया – मेरे द्वारा |

हे कृष्ण, हे परम योगी! मैं किस तरह आपका निरन्तर चिन्तन करूँ और आपको कैसे जानूँ? हे भगवान्! आपका स्मरण किन-किन रूपों में किया जाय?

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विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन |

भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेSमृतम् || १८ ||

विस्तरेण – विस्तार से; आत्मनः – अपनी; योगम् – योगशक्ति; विभूतिम् – ऐश्र्वर्य को; च – भी; जन-अर्दन – हे नास्तिकों का वध करने वाले; भूयः – फिर; कथय – कहें; तृप्तिः – तुष्टि; हि – निश्चय ही; शृण्वतः – सुनते हुए; न अस्ति – नहीं है; मे – मेरी; अमृतम् – अमृत को |

हे जनार्दन! आप पुनः विस्तार से अपने ऐश्र्वर्य तथा योगशक्ति का वर्णन करें | मैं आपके विषय में सुनकर कभी तृप्त नहीं होता हूँ, क्योंकि जितना ही आपके विषय में सुनता हूँ, उतना ही आपके शब्द-अमृत को चखना चाहता हूँ |

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श्री भगवानुवाच

हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः |

प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे || १९ ||

श्रीभगवान् उवाच – भगवान् ने कहा; हन्त – हाँ; ते – तुमसे; कथयिष्यामि – कहूँगा; दिव्याः – दैवी; हि – निश्चय ही; आत्म-विभूतयः – अपने ऐश्र्वर्यों को; प्राधान्यतः - प्रमुख रूप से; कुरुश्रेष्ठ – हे कुरुश्रेष्ठ; न आस्ति – नहीं है; अन्तः – सीमा; विस्तरस्य – विस्तार की; मे – मेरे |

श्रीभगवान् ने कहा – हाँ, अब मैं तुमसे अपने मुख्य-मुख्य वैभवयुक्त रूपों का वर्णन करूँगा, क्योंकि हे अर्जुन! मेरा ऐश्र्वर्य असीम है |

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अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः |

अहमादिश्र्च मध्यं च भूतानामन्त एव च || २० ||

अहम् – मैं; आत्मा- आत्मा; गुडाकेश – हे अर्जुन; सर्व-भूत – समस्त जीव; आशय-स्थितः – हृदय में स्थित; अहम् – मैं; आदि – उद्गम; मध्यम् – मध्य; च – भी; भूतानाम् – समस्त जीवों का; अन्तः – अन्त; एव – निश्चय ही; च – तथा |

हे अर्जुन! मैं समस्त जीवों के हृदयों में स्थित परमात्मा हूँ | मैं ही समस्त जीवों का आदि, मध्य तथा अन्त हूँ |

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आदित्यानामहं विष्णुर्ज्योतिषां रविरंश्रुमान् |

मरीचिर्मरुतामस्मि नक्षत्राणामहं शशी || २१ ||

आदित्यानाम् – आदित्यों में; अहम् – मैं हूँ; विष्णुः – परमेश्र्वर; ज्योतिषाम् – समस्त ज्योतियों में; रविः – सूर्य; अंशुमान् – किरणमाली, प्रकाशमान; मरीचिः – मरीचि; मरुताम् – मरुतों में; अस्मि – हूँ; नक्षत्राणाम् – तारों में; अहम् – मैं हूँ; शशि – चन्द्रमा |

मैं आदित्यों में विष्णु, प्रकाशों में तेजस्वी सूर्य, मरुतों में मरीचि तथा नक्षत्रों में चन्द्रमा हूँ |

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वेदानां सामवेदोSस्मि देवानामस्मि वासवः |

इन्द्रियाणां मनश्र्चास्मि भूतानामस्मि चेतना || २२ ||

वेदानाम् – वेदों में; साम-वेदः – सामवेद; अस्मि – हूँ; देवानाम् – देवताओं में; अस्मि – हूँ; वासवः – स्वर्ग का राजा; इन्द्रियाणाम् – इन्द्रियों में; मनः – मन; च – भी; अस्मि – हूँ; भूतानाम् – जीवों में; अस्मि – हूँ; चेतना – प्राण, जीवन शक्ति |

मैं वेदों में सामवेद हूँ, देवों में स्वर्ग का राजा इन्द्र हूँ, इन्द्रियों में मन हूँ, तथा समस्त जीवों में जीवनशक्ति (चेतना) हूँ |

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रुद्राणां शङ्करश्र्चास्मि वित्तेशो यक्षरक्षसाम् |

वसूनां पावकश्र्चास्मि मेरू: शिखरिणामहम् || २३ ||

रुद्राणाम् – समस्त रुद्रों में; शङकरः – शिवजी; च – भी; अस्मि – हूँ; वित्त-ईशः – देवताओं का कोषाध्यक्ष; यक्ष-रक्षसाम् – यक्षों तथा राक्षसों में; वसूनाम् – वसुओं में; पावकः – अग्नि; च – भी; अस्मि – हूँ; मेरुः – मेरु; शिखरिणाम् – समस्त पर्वतों में; अहम् – मैं हूँ |

मैं समस्त रुद्रों में शिव हूँ, यक्षों तथा राक्षसों में सम्पत्ति का देवता (कुबेर) हूँ, वसुओं में अग्नि हूँ और समस्त पर्वतों में मेरु हूँ |

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1पुरोधसां च मुख्यं मां विद्धि पार्थ बृहस्पतिम् |

सेनानीनामहं स्कन्दः सरसामस्मि सागरः || २४ ||

पुरोधसाम् – समस्त पुरोहितों में; च – भी; मुख्यम् – प्रमुख; माम् – मुझको; विद्धि – जानो; पार्थ – हे पृथापुत्र; ब्रहस्पतिम् – ब्रहस्पति; सेनानीनाम् – समस्त सेनानायकों में से; अहम् – मैं हूँ; स्कन्दः – कार्तिकेय; सरसाम् – समस्त जलाशयों में; अस्मि – मैं हूँ; सागरः – समुद्र |

हे अर्जुन! मुझे समस्त पुरोहितों में मुख्य पुरोहित ब्रहस्पति जानो | मैं ही समस्त सेनानायकों में कार्तिकेय हूँ और समस्त जलाशयों में समुद्र हूँ |

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महर्षीणां भृगुरहं गिरामस्म्येकमक्षरम् |

यज्ञानां जपयज्ञोSस्मि स्थावराणां हिमालयः || २५ ||

महा-ऋषीणाम् – महर्षियों में; भृगुः – भृगु; अहम् – मैं हूँ; गिराम् – वाणी में; अस्मि – हूँ; एकम्-अक्षरम् – प्रणव; यज्ञानाम् – समस्त यज्ञों में; जप-यज्ञः – कीर्तन, जप; अस्मि – हूँ; स्थावराणाम् – जड़ पदार्थों में; हिमालयः – हिमालय पर्वत |

मैं महर्षियों में भृगु हूँ, वाणी में दिव्य ओंकार हूँ, समस्त यज्ञों में पवित्र नाम का कीर्तन (जप) तथा समस्त अचलों में हिमालय हूँ |

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अश्र्वत्थः सर्ववृक्षाणां देवर्षीणां च नारदः |

गन्धर्वाणां चित्ररथः सिद्धानां कपिलो मुनिः || २६ ||

अश्र्वत्थः – अश्र्वत्थ वृक्ष; सर्व-वृक्षाणाम् – सारे वृक्षों में; देव-ऋषिणाम् – समस्त देवर्षियों में; च – तथा; नारदः – नारद; गन्धर्वाणाम् – गन्धर्वलोक के वासियों में; चित्ररथः – चित्ररथ; सिद्धानाम् – समस्त सिद्धि प्राप्त हुओं में; कपिलः-मुनिः – कपिल मुनि |

मैं समस्त वृक्षों में अश्र्वत्थ हूँ और देवर्षियों में नारद हूँ | मैं गन्धर्वों में चित्ररथ हूँ और सिद्ध पुरुषों में कपिल मुनि हूँ |

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उच्चै:श्रवसमश्रवानां विद्धि माममृतोद्भवम् |

ऐरावतं गजेन्द्राणां नराणां च नराधिपम् || २७ ||

उच्चैःश्रवसम् – उच्चैःश्रवा; अश्र्वानाम् – घोड़ो में; विद्धि – जानो; माम् – मुझको; अमृत-उद्भवम् – समुद्र मन्थन से उत्पन्न; ऐरावतम् – ऐरावत; गज-इन्द्राणाम् – मुख्य हाथियों में; नाराणाम् – मनुष्यों में; च – तथा; नर-अधिपम् – राजा |

घोड़ो में मुझे उच्चैःश्रवा जानो, जो अमृत के लिए समुद्र मन्थन के समय उत्पन्न हुआ था | गजराजों में मैं ऐरावत हूँ तथा मनुष्यों में राजा हूँ |

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आयुधानामहं वज्रं धेनुनामस्मि कामधुक् |

प्रजनश्र्चास्मि कन्दर्पः सर्पाणामस्मि वासुकिः || २८ ||

आयुधानाम् – हथियारों में; अहम् – मैं हूँ; वज्रम् – वज्र; धेनूनाम् – गायों में; अस्मि – मैं हूँ; काम-धुक् – सुरभि गाय; प्रजनः – संतान, उत्पत्ति का कारण; च – तथा; कन्दर्पः – कामदेव; सर्पाणाम् – सर्पों में; अस्मि – हूँ; वासुकिः – वासुकि |

मैं हथियारों में वज्र हूँ, गायों में सुरभि, सन्तति उत्पत्ति के कारणों में प्रेम के देवता कामदेव तथा सर्पों में वासुकि हूँ |

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अनन्तश्र्चास्मि नागानां वरुणो यादसामहम् |

पितृणामर्यमा चास्मि यमः संयमतामहम् || २९ ||

अनन्तः – अनन्त; च – भी; अस्मि – हूँ; नागानाम् – फणों वाले सापों में; वरुणः – जल के अधिष्ठाता देवता; यादसाम् – समस्त जलचरों में; अहम् – मैं हूँ; पितृृणाम् – पितरों में; अर्यमा – अर्यमा; च – भी; अस्मि – हूँ; यमः – मृत्यु का नियामक; संयमताम् – समस्त नियमनकर्ताओं में; अहम् – मैं हूँ |

अनेक फणों वाले नागों में मैं अनन्त हूँ और जलचरों में वरुणदेव हूँ | मैं पितरों में अर्यमा हूँ तथा नियमों के निर्वाहकों में मैं मृत्युराज यम हूँ |

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प्रह्लादश्र्चास्मि दैत्यानां कालः कलयतामहम् |

मृगाणां च मृगेन्द्रोSहं वैनतेयश्र्च पक्षिणाम् || ३० ||

प्रह्लादः – प्रह्लाद; च – भी; अस्मि – हूँ; दैत्यानाम् – असुरों में; कालः – काल; कलयताम् – दमन करने वालों में; अहम् – मैं हूँ; मृगाणाम् – पशुओं में; च – तथा; मृग-इन्द्रः – सिंह; अहम् – मैं हूँ; वैनतेयः – गरुड़; च – भी; पक्षिणाम् – पक्षियों में |

दैत्यों में मैं भक्तराज प्रह्लाद हूँ, दमन करने वालों में काल हूँ, पशुओं में सिंह हूँ, तथा पक्षियों में गरुड़ हूँ |

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पवनः पवतामस्मि रामः शस्त्रभृतामहम् |

झषाणां मकरश्र्चास्मि स्त्रोतसामस्मि जाह्नवी || ३१ ||

पवनः – वायु; पवताम् – पवित्र करने वालों में; अस्मि – मैं हूँ; रामः – राम; शस्त्र-भृताम् – शस्त्रधारियों में; अहम् – मैं; झषणाम् – मछलियों में; मकरः – मगर; च – भी; अस्मि – हूँ; स्त्रोतसाम् – प्रवहमान नदियों में; अस्मि – हूँ; जाह्नवी – गंगा नदी |

समस्त पवित्र करने वालों में मैं वायु हूँ, शस्त्रधारियों में राम, मछलियों में मगर तथा नदियों में गंगा हूँ |

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सर्गाणामादिरन्तश्र्च मध्यं चैवाहमर्जुन |

अध्यात्मविद्या विद्यानां वादः प्रवदतामहम् || ३२ ||

सर्गाणाम् – सम्पूर्ण सृष्टियों का; आदिः – प्रारम्भ; अन्तः – अन्त; च – तथा; मध्यम् – मध्य; च – भी; एव – निश्चय ही; अहम् – मैं हूँ; अर्जुन – हे अर्जुन; अध्यात्म-विद्या – अध्यात्मज्ञान; विद्यानाम् – विद्याओं में; वादः – स्वाभाविक निर्णय; प्रवदताम् – तर्कों में; अहम् – मैं हूँ |

हे अर्जुन! मैं समस्त सृष्टियों का आदि, मध्य और अन्त हूँ | मैं समस्त विद्याओं में अध्यात्म विद्या हूँ और तर्कशास्त्रियों में मैं निर्णायक सत्य हूँ |

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अक्षराणामकारोSस्मि द्वन्द्वः सामासिकस्य च |

अहमेवाक्षयः कालो धाताहं विश्र्वतोमुखः || ३३ ||

अक्षराणाम् – अक्षरों में; अ-कारः – अकार अर्थात् पहला अक्षर; अस्मि – हूँ; द्वन्द्वः – द्वन्द्व समास; सामासिकस्य – सामसिक शब्दों में; च – तथा; अहम् – मैं हूँ; एव – निश्चय ही; अक्षयः – शाश्र्वत; कालः – काल, समय; धाता – स्त्रष्टा; अहम् – मैं; विश्र्वतः-मुखः – ब्रह्मा |

अक्षरों में मैं अकार हूँ और समासों में द्वन्द्व समास हूँ | मैं शाश्र्वत काल भी हूँ और स्त्रष्टाओं में ब्रह्मा हूँ |

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मृत्यु: सर्वहरश्र्चाहमुद्भवश्र्च भविष्यताम् |

कीर्तिः श्रीर्वाक्च नारीणां स्मृतिर्मेधा धृतिः क्षमा || ३४ ||

मृत्युः – मृत्यु; सर्व-हरः – सर्वभक्षी; च – भी; अहम् – मैं हूँ; उद्भवः – सृष्टि; च – भी; भविष्यताम् – भावी जगतों में; कीर्तिः – यश; श्रीः – ऐश्र्वर्य या सुन्दरता; वाक् – वाणी; च – भी; नारीणाम् – स्त्रियों में; स्मृतिः – स्मृति, स्मरणशक्ति; मेधा – बुद्धि; धृतिः – दृढ़ता; क्षमा – क्षमा, धैर्य |

मैं सर्वभक्षी मृत्यु हूँ और मैं ही आगे होने वालों को उत्पन्न करने वाला हूँ | स्त्रियों में मैं कीर्ति, श्री, वाक्, स्मृति, मेधा, धृति तथा क्षमा हूँ |

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बृहत्साम तथा साम्नां गायत्री छन्दसामहम् |

मासानां मार्गशीर्षोSहमृतूनां कुसुमाकरः || ३५ ||

बृहत्-साम – बृहत्साम; तथा – भी; साम्नाम् – सामवेद के गीतों में; गायत्री – गायत्री मंत्र; छन्दसाम् – समस्त छन्दों में; अहम् – मैं हूँ; मासानाम् – महीनों में; मार्ग-शीर्षः – नवम्बर-दिसम्बर (अगहन) का महीना; अहम् – मैं हूँ; ऋतूनाम् – समस्त ऋतुओं में; कुसुम-आकरः – वसन्त |

मैं सामवेद के गीतों में बृहत्साम हूँ और छन्दों में गायत्री हूँ | समस्त महीनों में मैं मार्गशीर्ष (अगहन) तथा समस्त ऋतुओं में फूल खिलने वाली वसन्त रितु हूँ |

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द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम् |

जयोSस्मि व्यवसायोSस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम् || ३६ ||

द्यूतम् – जुआ; छलयताम् – समस्त छलियों या धूतों में; अस्मि – हूँ; तेजः – तेज, चमकदमक; तेजस्विनाम् – तेजस्वियों में; अहम् – मैं हूँ; जयः – विजय; अस्मि – हूँ; व्यवसायः – जोखिम या साहस; अस्मि – हूँ; सत्त्वम् – बल; सत्त्व-वताम् – बलवानों का; अहम् – मैं हूँ |

मैं छलियों में जुआ हूँ और तेजस्वियों में तेज हूँ | मैं विजय हूँ, साहस हूँ और बलवानों का बल हूँ |

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वृष्णीनां वासुदेवोSस्मि पाण्डवानां धनञ्जयः |

मुनीनामप्यहं व्यासः कवीनामुशना कविः || ३७ ||

वृष्णीनाम् – वृष्णि कुल में; वासुदेवः – द्वारकावासी कृष्ण; अस्मि – हूँ; पाण्डवानाम् – पाण्डवों में; धनञ्जय – अर्जुन; मुनीनाम् – मुनियों में; अपि – भी; अहम् – मैं हूँ; व्यासः – व्यासदेव, समस्त वेदों के संकलकर्ता; कवीनाम् – महान विचारकों में; उशना – उशना, शुक्राचार्य; कविः – विचारक |

मैं वृष्णिवंशियों में वासुदेव और पाण्डवों में अर्जुन हूँ | मैं समस्त मुनियों में व्यास तथा महान विचारकों में उशना हूँ |

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दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम् |

मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम् || ३८ ||

दण्डः – दण्ड; दमयताम् – दमन के समस्त साधनों में से; अस्मि – हूँ; नीतिः – सदाचार; अस्मि – हूँ; जिगीषताम् – विजय की आकांशा करने वालों में; मौनम् – चुप्पी, मौन; च – तथा; एव – भी ; अस्मि – हूँ; गुह्यानाम् - रहस्यों में; ज्ञानम् – ज्ञान; ज्ञान-वताम् – ज्ञानियों में; अहम् – मैं हूँ |

अराजकता को दमन करने वाले समस्त साधनों में मैं दण्ड हूँ और जो विजय के आकांक्षी हैं उनकी मैं नीति हूँ | रहस्यों में मैं मौन हूँ और बुद्धिमानों में ज्ञान हूँ |

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यच्चापि सर्वभूतानां बीजं तदहमर्जुन |

न तदस्ति विना यत्स्यान्मया भूतं चराचरम् || ३९ ||

यत् – जो; च – भी; अपि – हो सकता है; सर्व-भूतानाम् – समस्त सृष्टियों में; बीजम् – बीज; तत् – वह; अहम् – मैं हूँ; अर्जुन – हे अर्जुन; न – नहीं; तत् – वह; अस्ति – है; विना – रहित; यत् – जो; स्यात् – हो; मया – मुझसे; भूतम् – जीव; चर-अचरम् – जंगम तथा जड़ |

यही नहीं, हे अर्जुन! मैं समस्त सृष्टि का जनक बीज हूँ | ऐसा चार तथा अचर कोई भी प्राणी नहीं है, जो मेरे बिना रह सके |

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नान्तोSस्ति मम दिव्यानां विभूतीनां परन्तप |

एष तूद्देशतः प्रोक्तो विभूतेर्विस्तरो मया || ४० ||

न – न तो; अन्तः – सीमा; अस्ति – है; मम – मेरे; दिव्यानाम् – दिव्य; विभूतीनाम् – ऐश्र्वर्यों की; परन्तप – हे शत्रुओं के विजेता; एषः – यह सब; तु – लेकिन; उद्देशतः – उदाहरणस्वरूप; प्रोक्तः – कहे गये; विभूतेः – ऐश्र्वर्यों के; विस्तरः – विशद दर्शन; मया – मेरे द्वारा |

हे परन्तप! मेरी दैवी विभूतियों का अन्त नहीं है | मैंने तुमसे जो कुछ कहा, वह तो मेरी अनन्त विभूतियों का संकेत मात्र है |

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यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा |

तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोंSशसम्भवम् || ४१ ||

यत् – यत् – जो जो; विभूति – ऐश्र्वर्य ; मत् – युक्त; सत्त्वम् – अस्तित्व; श्री-मत् – सुन्दर; उर्जिवम् – तेजस्वी; एव – निश्चय ही; वा – अथवा; तत्-तत् – वे वे; एव – निश्चय ही; अवगच्छ – जानो; तवम् – तुम; मम – मेरे; तेजः – तेज का; अंश – भाग, अंश से; सम्भवम् – उत्पन्न |

तुम जान लो कि सारा ऐश्र्वर्य, सौन्दर्य तथा तेजस्वी सृष्टियाँ मेरे तेज के एक स्फुलिंग मात्र से उद्भूत हैं |

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अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन |

विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत् || ४२ ||

अथवा – या; बहुना – अनेक; एतेन – इस प्रकार से; किम् – क्या; ज्ञातेन – जानने से; तव – तुम्हारा; अर्जुन – हे अर्जुन; विष्टभ्य – व्याप्त होकर; अहम् – मैं; इदम् – इस; कृत्स्नम् – सम्पूर्ण; एक – एक; अंशेन – अंश के द्वारा; स्थितः – स्थित हूँ; जगत् – ब्रह्माण्ड में |

किन्तु हे अर्जुन! इस सारे विशद ज्ञान की आवश्यकता क्या है? मैं तो अपने एक अंश मात्र से सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में व्याप्त होकर इसको धारण करता हूँ |

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