अध्याय 8
8.1 प्राण, अपान आदि का संवाद और ब्रह्मा जी का सबकी श्रेष्ठता बतलाना---
ब्राह्मण ने कहा- प्रिये! अब पंचहोताओं के यज्ञ का जैसा विधान है, उसके विषय में एक प्राचीन दृष्टान्त बतलाया जाता है। प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान- ये पाँचों प्राण पाँच होता है। विद्वान पुरुष इन्हें सबसे श्रेष्ठ मानते हैं।"
8.2 ब्राह्मणी बोली- नाथ! पहले तो मैं समझती थी कि स्वाभावत: सात होता है, किंतु अब आपके मुँह से पाँच होताओं की बात मालूम हुई। अत: ये पाँचों होता किस प्रकार हैं? आप इनकी श्रेष्ठता का वर्णन कीजिये।"
8.3 ब्राह्मण ने कहा- प्रिये! वायु प्राण के द्वारा पुष्ट होकर अपान रूप, अपान के द्वारा पुष्ट होकर व्यान रूप, व्यान से पुष्ट होकर उदान रूप, उदान से परिपुष्ट होकर समान रूप होता है। एक बार इन पाँचों वायुओं ने सबके पूर्वज पितामह ब्रह्मा जी से प्रश्न किया- ‘भगवन! हममें जो श्रेष्ठ हो उसका नाम बता दीजिये, वही हम लोगों में प्रधान होगा।' ब्रह्मा जी ने कहा- 'प्राणधारियों के शरीर में स्थित हुए तुम लोगों में से जिसका लय हो जाने पर सभी प्राण लीन हो जायँ और जिसके संचरित होने पर सब के सब संचार करने लगें, वही श्रेष्ठ है। अब तुम्हारी जहाँ इच्छा हो, जाओ।' यह सुनकर प्राणवायु ने अपान आदि से कहा- 'मेरे लीन होने पर प्राणियों के शरीर में स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होने पर सब के सब संचार करने लगते हैं, इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखा, अब मैं लीन हो रहा हूँ (फिर तुम्हारा भी लय हो जायगा)।'"
8.4 ब्राह्मण कहते हैं- शुभे! यों कहकर प्राणवायु थोड़ी देर के लिये छिप गया और उसके बाद फिर चलने लगा। तब समान और उदानवायु उससे पुन: बोले- ‘प्राण! जैसे हम लोग इस शरीर में व्याप्त हैं, उस तरह तुम इस शरीर में व्याप्त होकर नहीं रहते। इसलिये तुम हम लोगों से श्रेष्ठ नहीं हो। केवल अपान तुम्हारे वश में है (अत: तुम्हारे लय होने से हमारी कोई हानि नहीं हो सकती)। तब प्राण पुन: पूर्ववत चलने लगा। तदनन्तर अपान बोला। अपान ने कहा- 'मेरे लीन होने पर प्राणियों के शरीर में स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होने पर सब के सब संचार करने लगते हैं। इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ (फिर तुम्हारा भी लय हो जायग)।'"
8.5 ब्राह्मण कहते हैं- तब व्यान, और उदान ने पूर्वोक्त बात कहने वाले अपान से कहा- ‘अपान! केवल प्राण तुम्हारे अधीन है, इसलिये तुम हमसे श्रेष्ठ नहीं हो सकते।’ यह सुनकर अपान भी पूर्ववत चलने लगा। तब व्यान ने उससे फिर कहा- ‘मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। मेरी श्रेष्ठता का कारण क्या है। वह सुनो। मेरे लीन होने पर प्राणियों के शरीर में स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होने पर सब के सब संचार करने लगते हैं। "
8.6 इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा हूँ (फिर तुम्हारा भी लय हो जायगा)।' ब्राह्मण कहते हैं- तब व्यान कुछ देर के लिये लीन हो गया, फिर चलने लगा। उस समय प्राण, अपान, उदान और समान ने उससे कहा- ‘व्यान! तुम हमसे श्रेष्ठ नहीं हो, केवल समान वायु तुम्हारे वश में है।’"
8.7 ह सुनकर व्यान पूर्ववत चलने लगा। तब समान ने पुन: कहा- ‘मैं जिस कारण से सबमें श्रेष्ठ हूँ, वह बताता हूँ सुनो। मेरे लीन होने पर प्राणियों के शरीर में स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होने पर सब के सब संचार करने लगते हैं। इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा ह (फिर तुम्हारा भी लय हो जाएगा)।'"
8.8 ब्राह्मण कहते हैं- यह कहकर समान कुछ देर के लिये लीन हो गया और पुन: पूर्ववत् चलने लगा। उस समय प्राण, अपान, व्यान और उदान ने उससे कहा- ‘समान! तुम हम लोगों से श्रेष्ठ नहीं हो, केवल व्यान ही तुम्हारे वश में है।’ यह सुनकर समान पूवर्वत चलने लगा। तब उदान ने उससे कहा- ‘मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ, इसका क्या कारण है? यह सुनो। मेरे लीन होने पर प्राणियों के शरीर में स्थित सभी प्राण लीन हो जाते हैं तथा मेरे संचरित होने पर सब के सब संचार करने लगते हैं। इसलिये मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ। देखो, अब मैं लीन हो रहा ह (फिर तुम्हारा भी लय हो जाएगा)।' यह सुनकर उदान कुछ देर के लिये लीन हो गया और पुन: चलने लगा। तब प्राण, अपान, समान और व्यान ने उससे कहा- ‘उदान! तुम हम लोगों से श्रेष्ठ नहीं हो। केवल व्यान ही तुम्हारे वश में है।’"
8.9 ब्राह्मण कहते हैं- तदनन्तर वे सभी प्राण ब्रह्मा जी के पास एकत्र हुए। उस समय उन सबसे प्रजापति ब्रह्मा ने कहा- ‘वायुगण! तुम सभी श्रेष्ठ हो। अथवा तुम में से कोई भी श्रेष्ठ नहीं है। तुम सबका धारण रूप धर्म एक दूसरे पर अवलम्बित है। सभी अपने अपने स्थान पर श्रेष्ठ हो और सबका धर्म एक दूसरे पर अवलम्बित है।’ "
8.10 इस प्रकार वहाँ एकत्र हुए सब प्राणों से प्रजापति ने फिर कहा- ‘एक ही वायु स्थिर और अस्थिर रूप से विराजमान है। उसी के विशेष भेद से पाँच वायु होते हैं। इस तरह एक ही मेरा आत्मा अनेक रूपों में वृद्धि को प्राप्त होता है।"
8.11 तुम्हारा कल्याण हो। तुम कुशलपूर्वक जाओ और एक दूसरे के हितैषी रहकर परस्पर की उन्नती में सहायता पहुँचाते हुए एक दूसरे को धारण किये रहो।’"
