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अध्याय 36

36.1 तपस्या प्रभाव, आत्मा का स्वरूप और उनके ज्ञान की महिमा तथा अनुगीता का उपसंहार---

ब्रह्मा जी बोले- श्रेष्ठ महर्षियो! जिस प्रकार इन पाँचों महाभूतों की उत्पत्ति और नियमन करने में मन समर्थ है, उसी प्रकार स्थिति काल में भी मन ही भूतों का आत्मा है। उन पंचमहाभूतों का नित्य आधार भी मन ही है। बुद्धि जिसके ऐश्वर्य को प्रकाशित करती है, वह क्षेत्रज्ञ कहा जाता है। जैसे सारथि अच्छे घोड़ों को अपने काबू में रखता है, उसी प्रकार मन सम्पूर्ण इन्द्रियों पर शासन करता है। इन्द्रियाँ, मन और बुद्धि- ये सदा क्षेत्रज्ञ के साथ संयुक्त रहते हैं। जिसमें इन्द्रियरूपी घोड़े जुते हुए हैं, जिसका बुद्धिरूपी सारथि द्वारा नियंत्रण हो रहा है, उस देहरूपी रथ पर सवार होकर वह भूतात्मा (क्षेत्रज्ञ) चारों ओर दौड़ लगाता रहता है।

36.2 ब्रह्ममय रथ सदा रहने वाला और महान है, इन्द्रियाँ उसके घोड़े, मन सारथी और बुद्धि चाबुक हैं। इस प्रकार जो विद्वान इस ब्रह्ममय रथ की सदा जानकारी रखता है, वह समस्त प्राणियों में धीर है और कभी मोह में नहीं पड़ता है। यह जगत एक ब्रह्मवन है। अव्यक्त प्रकृति इसका आदि है। पाँच महाभूत, दस इन्द्रियाँ और एक मन- इन सौलह विशेषों तक इसका विस्तार है। यह चराचर प्राणियों से भरा हुआ है। सूर्य और चन्द्रमा आदि के प्रकाश से प्रकाशित है। ग्रह और नक्षत्रों से सुशोभित है। नदियों और पर्वत के समूह से सब ओर विभूषित हैं। नाना प्रकार के जल से सदा ही अलंकृत है। यहीं सम्पूर्ण भूतों का जीवन और सम्पूर्ण प्राणियों की गति है। इस ब्रह्मवन में क्षेत्रज्ञ विचरण करता है। इस लोक में जो स्थावर जंगम प्राणी हैं, वे ही पहले प्रकृति में विलीन होते हैं, उसके बाद पाँच भूतों के कार्य लीन होते हैं और कार्यरूपी गुणों के बाद पाँच भूत लीन होते हैं। इस प्रकार यह भूतसमुदाय प्रकृति में लीन होता है।

36.3 देवता, मनुष्य, गन्धर्व, पिशाच, असुर, राक्षस सभी स्वभाव से रचे गए हैं; किसी क्रिया से या कारण से इनकी रचना नहीं हुई है। विश्व की सृष्टि करने वाले ये मरीचि आदि ब्राह्मण समुद्र की लहरों के समान बारंबार पंचमहाभूतों से उत्पन्न होते हैं और उत्पन्न हुए, वे फिर समयानुसार उन्हीं में लीन हो जाते हैं। इस विश्व की रचना करने वाले प्राणियों से पंच महाभूत सब प्रकार पर है। जो इन पंच महाभूतों से छूट जाता है, वह परम गति को प्राप्त होता है। शक्ति सम्पन्न प्रजापति ने अपने मन के ही द्वारा सम्पूर्ण जगत की सृष्टि की है तथा ऋषि भी तपस्या से ही देवत्व को प्राप्त हुए हैं। फल-मूल का भोजन करने वाले सिद्ध महात्मा यहाँ तपस्या के प्रभाव से ही चित्त को एकाग्र करके तीनों लोकों की बातों को क्रमश: प्रत्यक्ष अनुभव करते हैं। आरोग्य की साधनभूत औषधियाँ और नाना प्रकार की विद्याएँ तप से ही सिद्ध होती हैं। सारे साधनों की जड़ तपस्या ही है। जिसको पाना, जिसका अभ्यास करना, जिसे दबाना और जिसकी संगति लगाना नितान्त कठिन है, वह तपस्या के द्वारा ही साध्य हो जाता है; क्योंकि तप का प्रभाव दुर्लंघ्य है। शराबी, ब्रह्महत्यारा, चोर, गर्भ नष्ट करने वाला और गुरुपत्नी की शय्या पर सोने वाला महापापी भी भलीभाँति तपस्या करके उस महान पाप से छुटकारा पा सकता है।

36.4 मनुष्य, पितर, देवता, पशु, मृग, पक्षी तथा अन्य जितने चराचर प्राणी हैं, वे सब नित्य तपस्या में संलग्न होकर ही सदा सिद्धि प्राप्त करते हैं। तपस्या के बल से ही महामायावी देवता स्वर्ग में निवास करते हैं। जो लोग आलस्य त्यागकर अहंकार से युक्त हो सकाम कर्म का अनुष्ठान करते हैं, वे प्रजापति के लोक में जाते हैं। जो अहंता-ममता से रहित हैं, वे महात्मा विशुद्ध ध्यान योग के द्वारा महान उत्तम लोक को प्राप्त करते हैं। जो ध्यान योग का आश्रय लेकर सदा प्रसन्नचित्त रहते हैं, वे आत्मवेत्ताओं में श्रेष्ठ पुरुष सुख की राशिभूत अव्यक्त परमात्मा में प्रवेश करते हैं। किन्तु जो ध्यानयोग से पीछे लौटकर अर्थात ध्यान में असफल होकर ममता और अहंकार से रहित जीवन व्यतीत करता है, वह निष्काम पुरुष भी महापुरुषों के उत्तम अव्यक्त लोक में लीन होता है। फिर स्वयं भी उसकी समता को प्राप्त होकर अव्यक्त से ही प्रकट होता है और केवल सत्त्व का आश्रय लेकर तमोगुण एवं रजोगुण के बन्धन से छुटकारा पा जाता है। जो सब पापों से मुक्त रहकर सबकी सृष्टि करता है, उस अखण्ड आत्मा को क्षेत्रज्ञ समझना चाहिए। जो मनुष्य उसका ज्ञान प्राप्त कर लेता है, वही वेदवत्ता है।

36.5 मुनि को उचित है कि चिंतन के द्वारा चेतना (सम्यग्यान) पाकर मन और इंद्रियों को एकाग्र करके परमात्मा के ध्यान में स्थित हो जाय; क्योंकि जिसका चित्त जिसमें लगा होता है, वह निश्चय ही उसका स्वरूप हो जाता है- यह सनातन गोपनीय रहस्य है। मुनि को उचित है कि चिन्तन के द्वारा चेतना (सम्यग्ज्ञान) पाकर मन और इन्द्रियों को एकाग्र करके परमात्मा के ध्यान में स्थित हो जाय, क्योंकि जिसका चित्त जिसमें लगा होता है, वह निश्चय ही उसका स्वरूप हो जाता है- यह सनातन गोपनीय रहस्य है। व्यक्त लेकर सोलह विशेषों तक सभी अविद्या के लक्षण बताये गये हैं। ऐसा समझना चाहिए कि यह गुणों का ही विस्तार है। दो अक्षर का पद ‘मम’ (यह मेरा है-ऐसा भाव) मृत्यु रूप है और तीन अक्षर का पद ‘न मम’ (यह मेरा नहीं है- ऐसा भाव) सनातन ब्रह्मा की प्राप्ति कराने वाला है। कुछ मन्द-बुद्धि युक्त पुरुष (स्वर्गादि फल प्रदान करने वाले) काम्य-कर्मों की प्रशंसा करते हैं, किंतु वृद्ध महात्माजन उन कर्मों को उत्तम नहीं बतलाते। क्योंकि सकाम कर्म के अनुष्ठान से जीव को सोलह विकारों से निर्मित स्थूल शरीर धारण करके जन्म लेना पड़ता है और वह सदा अविद्या का ग्रास बना रहता है।

36.6 इतना ही नहीं, कर्मठ पुरुष देवताओं के भी उपभोग का विषय होता है। इसलिये जो कोई पारदर्शी विद्वान होते हैं, वे कर्मों में आसक्त नहीं होते, क्योंकि यह पुरुष (आत्मा) ज्ञानमय है, कर्ममय नहीं। जो इस प्रकार चेतन आत्मा को अमृतस्वरूप, नित्य, इन्द्रियातीत, सनातन, अक्षर, जितात्मा एवं असंग समझता है, वह कभी मृत्यु के बन्धन में नहीं पड़ता। जिसकी दृष्टि में आत्मा अपूर्व (अनादि), अकृत (अजन्मा), नित्य, अचल, अग्राह्य और अमृताशी है, वह इन गुणों का चिन्तन करने से स्वयं भी अग्राह्य (इन्द्रियातीत) निश्चल एवं अमृत स्वरूप हो जाता है, जो चित्त को शुद्ध करने वाले सम्पूर्ण संस्कारों का सम्पादन करके मन को आत्मा के ध्यान में लगा देता है, वही इस कल्याणमय ब्रह्मा को प्राप्त करता है, जिससे बड़ा कोई नहीं है। सम्पूर्ण अन्त:करण के स्वच्छ हो जाने पर साधक को शुद्ध प्रसन्नता प्राप्त होती है। जैसे स्वप्न से जगे हुए मनुष्य के लिये स्वप्न शान्त हो जाता है, उसी प्रकार चित्त शुद्धि का लक्षण है।

36.7 ज्ञाननिष्ठ जीवनमुक्त महात्माओं की यही परम गति है, क्योंकि वे उन समस्त प्रवृत्तियों को शुभाशुभ फल देने वाला समझते हैं। यही विरक्त पुरुषों की गति है, यही सनातन धर्म है, यही ज्ञानियों का प्राप्तव्य स्थान है और यही अनिन्दित सदाचार है। जो सम्पूर्ण भूतों में समान भाव रखता है, लोभ और कामना से रहित है तथा जिसकी सर्वत्र समान दृष्टि रहती है, वह ज्ञानी पुरुष ही इस परम गति को प्राप्त कर सकता है। ब्रह्मर्षियो! यह सब विषय मैंने विस्तार के साथ तुम लोगों को बता दिया। इसी के अनुसार आचरण करो, इससे तुम्हें शीघ्र ही परम सिद्धि प्राप्त होगी।

36.8 गुरु ने कहा- बेटा! ब्रह्मा जी के इस प्रकार उपदेश देने पर उन महात्मा मुनियों ने इसी के अनुसार आचरण किया। इससे उन्हें उत्तम लोक की प्राप्ति हुई। महाभाग! तुम्हारा चित्त शुद्ध है, इसीलिये तुम भी मेरे बताए हुए ब्रह्मा जी के उत्तम उपदेश का भलीभाँति पालन करो। इससे तुम्हें भी सिद्धि प्राप्त होगी।

36.9 श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! गुरुदेव के ऐसा कहने पर उस शिष्य ने समस्त उत्तम धर्मों का पालन किया। इससे वह संसार-बन्धन से मुक्त हो गया। कुरुकुलनन्दन! उस समय कृतार्थ होकर उस शिष्य ने वह ब्रह्मपद प्राप्त किया, जहाँ जाकर शोक नहीं करना पड़ता। अर्जुन ने पूछा- जनार्दन श्रीकृष्ण! वे ब्रह्मनिष्ठ गुरु कौन थे और शिष्य कौन थे? प्रभो! यदि मेरे सुनने योग्य हो तो ठीक-ठाक बताने की कृपा कीजिये।

36.10 श्रीकृष्ण ने कहा- महाबाहो! मैं ही गुरु हूँ और मेरे मन को ही शिष्य समझो। धनंजय! तुम्हारे स्नेहवश मैंने इस गोपनीय रहस्य का वर्णन किया है। उत्तम व्रत का पालन करने वाले कुरुकुलनन्दन यदि मुझ पर तुम्हारा प्रेम हो तो इस अध्यात्मज्ञान को सुनकर तुम नित्य इसका यथावत पालन करो। शत्रुसूदन! इस धर्म का पालन पूर्णतया आचरण करने पर तुम समस्त पापों से छुटकर विशुद्ध मोक्ष को प्राप्त कर लोगे। महाबाहो! पहले भी मैंने युद्धकाल उपस्थित होने पर यही उपदेश तुमको सुनाया था। इसलिये तुम इसमें मन लगाओ। भरतश्रेष्ठ! अर्जुन! अब मैं पिता जी का दर्शन करना चाहता हूँ। उन्हें देखे बहुत दिन हो गये। यदि तुम्हारी राय हो तो मैं उनके दर्शन के लिये द्वारका जाऊँ।

36.11 वैशम्पायन जी कहते हैं- राजन! भगवान श्रीकृष्ण की बात सुनकर अर्जुन से कहा- ‘श्रीकृष्ण! अब हम लोग यहाँ से हस्तिनापुर को चलें। वहाँ धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर से मिलकर उनकी आज्ञा लेकर आप अपनी पुरी को पधारे।’

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