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अध्याय 27

27.1 अहंकार से पंच महाभूतों और इन्द्रियों की सृष्टि, अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवत का वर्णन तथा निवृत्ति मार्ग का उपदेश---

ब्रह्मा जी ने कहा- महर्षिगण! अहंकार से पृथ्वी, वायु, आकाश, जल और पाँचवाँ तेज- ये पंच महाभूत उत्पन्न हुए हैं। इन्हीं पंच महाभूतों में अर्थात इनके शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध नामक विषयों में समस्त प्राणी मोहित रहते हैं। धैर्यशाली महर्षियों! महाभूतों का नाश होते समय जब प्रलय का अवसर आता है, उस समय समस्त प्राणियों को महान भय प्राप्त होता है। जो भूत जिससे उत्पन्न होता है, उसका उसी में लय हो जाता है। ये भूत अनुलोम क्रम से एक के बाद एक प्रकट होते हैं और विलोम क्रम से इनका अपने-अपने कारण में लय होता है। इस प्रकार सम्पूर्ण चराचर भूतों का लय हो जाने पर भी स्मरणशक्ति से सम्पन्न धीर-हृदय योगी पुरुश कभी नहीं लीन होते। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध तथा इनको ग्रहण करने की क्रियाएँ- ये कारण रूप से (अर्थात सूक्ष्म मन: स्वरूप होने के कारण) नित्य हैं, अत: इनका भी प्रलयकाल में लय नहीं होता। जो (स्थूल पदार्थ) अनित्य हैं उनको मोह के नाम से पुकारा जाता है। लोभ, लोभपूर्वक किये जाने वाले कर्म और उन कर्मों से उत्पन्न समस्त फल समान भाव से वास्तव में कुछ भी नहीं है। शरीर के बाह्य अंग रक्त मांस के संघात आदि एक दूसरे के सहारे रखने वाले हैं। इसीलिये ये दीन और कृपण माने गये हैं। प्राण, अपान, उदान, समान और व्यान- ये पाँच वायु नियत रूप से शरीर के भीतर निवास करते हैं, अत: ये सूक्ष्म हैं। मान, वाणी और बुद्धि के साथ गिनने से इनकी संख्या आठ होती है। ये आठ इस जगत के उपादान कारण हैं।

27.2 जिसकी त्वचा, नासिका, कान, आँख, रसना और वाक्- ये इन्द्रियाँ वश में हों, मन शुद्ध हो और बुद्धि एक निश्चय पर स्थिर रहने वाली हो तथा जिसके मन को उपर्युक्त इन्द्रियादि रूप आठ अग्नियाँ संतप्त न करती हों, वह पुरुष उस कल्याणमय ब्रह्म को प्राप्त होता है, जिससे बढ़कर दूसरा कोई नहीं है। द्विजवरो! अहंकार से उत्पन्न हुई जो मन सहित ग्यारह इन्द्रियाँ बतलायी जाती हैं, उनका अब विशेष रूप से वर्णन करूँगा, सुनो। कान, त्वचा, आँख, रसना, पाँचवीं नासिका तथा हाथ, पैर, गुदा, उपस्थ और वाक्- यह दस इन्द्रियों का समूह है। मन ग्यारहवाँ है। मनुष्य को पहले इस समुदाय पर विजय प्राप्त करना चाहिये। तत्पश्चात उसे ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। इन इन्द्रियों में पाँच ज्ञानेन्द्रिय हैं और पाँच कर्मेन्द्रिय वस्तुत: कान आदि पाँच इन्द्रियों को ज्ञानेन्द्रिय कहते हैं और उनसे भिन्न शेष जो पांच इन्द्रियाँ हैं, वे कर्मेन्द्रिय कहलाती है। मन का सम्बन्ध ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय दोनों से है और बुद्धि बारहवीं हैं। इस प्रकार क्रमश: ग्यारह इन्द्रियों का वर्णन किया गया। इनके तत्त्व को अच्छी तरह जानने वाले विद्वान अपने को कृतार्थ मानते हैं। अब समस्त ज्ञानेन्द्रियों के भूत, अधिभूत आदि विविध विषयों का वर्णन किया जाता है। आकाश पहला भूत है। कान उसका अध्यात्म (इन्द्रिय), शब्द उसका अधिभूत (विषय) और दिशाएँ उसकी अधिदैवत (अधिष्ठातृ देवता) हैं। वायु दूसरा भूत है। त्वचा उसका अध्यात्म तथा स्पर्श उसका अधिभूत सुना गया है और विद्युत् उसका अधिदैवत है।

27.3 तीसरे भूत का नाम है तेज। नेत्र उसका अध्यात्म, रूप उसका अधिभूत और सूर्य उसका अधिदैवत कहा जाता है। जल को चौथा भूत समझना चाहिये। रसना उसका अध्यात्म, रस उसका अधिभूत और चन्द्रमा उसका अधिदैवत कहा जाता है। पृथ्वी पाँचवाँ भूत है। नासिका उसका अध्यात्म, गन्ध उसका अधिभूत और वायु उसका अधिदैवत कहा जाता है। इन पाँच भूतों में अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवत रूप तीन भेद माने गये हैं। अब कर्मेन्द्रियों से सम्बन्ध रखने वाले विविध विषयों का निरूपण किया जाता है। तत्त्वदर्शी ब्राह्मण दोनों पैरों को अध्यात्म कहते हैं और गन्तव्य स्थान को उनके अधिभूत तथा विष्णु को उनके अधिदैवत बतलाते हैं।

27.4 निम्न गति वाला अपान एवं गुदा अध्यात्म कहा गया है और मलत्याग उसका अधिभूत तथा मित्र उसके अधिदेवता हैं। सम्पूर्ण प्राणियों को उत्पन्न करने वाला उपस्थ अध्यात्म है और वीर्य उसका अधिभूत तथा प्रजापति उसके अधिष्ठाता देवता कहे गये हैं। अध्यात्म तत्त्व को जानने वाले पुरुष दोनों हाथों को अध्यात्म बतलाते हैं। कर्म उनके अधिभूत और इन्द्र उनके अधिदेवता हैं। विश्व की देवी पहली वाणी यहाँ अध्यात्म कही गयी है। वक्तव्य उसका अधिभूत तथा अग्नि उसका अधिदैवत है। पंचभूतों का संचालन करने वाला मन अध्यात्म कहा गया है। संकल्प उसका अधिभूत है और चन्द्रमा उसके अधिष्ठाता देवता माने गये हैं। सम्पूर्ण संसार को जन्म देने वाला अहंकार अध्यात्म है और अभिमान उसका अधिभूत तथा रुद्र उसके अधिष्ठाता देवता हैं। पांच इन्द्रियों और छठे मन को जानने वाली बुद्धि को अध्यात्म कहते हैं। मन्तव्य उसका अधिभूत और ब्रह्मा उसके अधिदेवता हैं। प्राणियों के रहने के तीन ही स्थान हैं- जल, थल और आकाश। चौथा स्थान सम्भव नहीं है।

27.5 देहधारियों का जन्म चार प्रकार का होता है- अण्डज, उद्भिज्ज, स्वेदज और जरायुज। समस्त भूत समुदाय का चार प्रकार का ही जन्म देखा जाता है। इनके अतिरिक्त जो दूसरे आकाशचारी प्राणी हैं तथा जो पेट से चलने वाले सर्प आदि हैं, उन सबको भी अण्डज जानना चाहिये। पसीने से उत्पन्न होने वाले जू आदि कीट और जन्तु स्वेदज कहे जाते हैं। यह क्रमश: दूसरा जन्म पहले की अपेक्षा निम्न स्तर का कहा जाता है। द्विजवरो! जो पृथ्वी को फोड़कर समय पर उत्पन्न होते हैं, उन प्राणियों को उद्भिज्ज कहते हैं। श्रेष्ठ ब्राह्मणो! दो पैर वाले, बहुत पैर वाले एवं टेढ़े मेढ़े चलने वाले तथा विकृत रूप वाले प्राणी जरायुज हैं। ब्राह्मणत्व का सनातन हेतु दो प्रकार का जानना चाहिये- तपस्या ओर पुण्यकर्म का अनुष्ठान, यही विद्वानों का निश्चय है। कर्म के अनेक भेद हैं, उनमें पूजा, दान और यज्ञ में हवन करना- ये प्रधान हैं। वृद्ध पुरुषों का कथन है कि द्विजों के कुल में उत्पन्न हुए पुरुष के लिये वेदों का अध्ययन करना भी पुण्य का कार्य है। द्विजवरो! जो मनुष्य इस विषय को विधिपूर्वक जानता है, वह योगी होता है तथा उसे सब पापों से छुटकारा मिल जाता है। इसे भली-भाँति समझो। इस प्रकार मैंने तुम लोगों से अध्यात्म विधि का यथावत वर्णन किया। धर्मज्ञजन! ज्ञानी पुरुषों को इस विषय का सम्यक ज्ञान होता है।

27.6 इन्द्रियों, उनके विषयों और पंच महाभूतों की एकता का विचार करके उसे मन में अच्छी तरह धारण कर लेना चाहिये। मन के क्षीण होने के साथ ही सब वस्तुओं का क्षय हो जाने पर मनुष्य को जन्म के सुख (लौकिक सुख भोग आदि) की इच्छा नहीं होती। जिनका अन्त:करण ज्ञान से सम्पन्न होता है, उन विद्वानों को उसी में सुख का अनुभव होता है। महर्षिगण! अब मैं मन की सूक्ष्म भावना को जाग्रत करने वाली कल्याणमयी निवृत्ति के विषय में उपदेश देता हूँ, जो कोमल और कठोर भाव से समस्त प्राणियों में रहती है। जहाँ गुण होते हुए भी नहीं के बराबर हैं, जो अभिमान से रहित और एकान्तचर्या से युक्त हैं तथा जिसमें भेद दृष्टि का सर्वथा अभाव हैं, वही ब्रह्ममय बर्ताव बतलाया गया है, वही समस्त सुखों का एकमात्र आधार है।

27.7 जैसे कछुआ अपने अंगों को सब ओर से समेट लेता है, उसी प्रकार जो विद्वान मनुष्य अपनी सम्पूर्ण कामनाओं का सब ओर से संकुचित करके रजोगुण से रहित हो जाता है, वह सब प्रकार के बन्धनों से मुक्त एवं सदा के लिये सुखी हो जाता है। जो कामनाओं को अपने भीतर लीन करके तृष्णा से रहित, एकाग्रचित्त तथा सम्पूर्ण प्राणियों का सुहृद और मित्र होता है, वह ब्रह्म प्राप्ति का पात्र हो जाता है। विषयों की अभिलाषा रखने वाली समस्त इन्द्रियों को रोककर जन समुदाय के स्थान का परित्याग करने से मुनि का अध्यात्म ज्ञानरूपी तेज अधिक प्रकाशित होता है। जैसे ईंधन डालने से आग प्रज्वलित होकर अत्यन्त उद्दीप्त दिखायी देती है, उसी प्रकार इन्द्रियों का निरोध करने से परमात्मा के प्रकाश का विशेष अनुभव होने लगता है। जिस समय योगी प्रसन्नचित होकर सम्पूर्ण प्राणियों को अपने अन्त:करण में स्थित देखने लगता है, उस समय वह स्वयंज्योति स्वरूप होकर सूक्ष्म से भी सूक्ष्म सर्वोत्तम परमात्मा को प्राप्त होता है।

27.8 अग्नि जिसका रूप है, रुधिर जिसका प्रवाह है, पवन जिसका स्पर्श है, पृथ्वी जिसमें हाड़-मांस आदि कठोर रूप में प्रकट है, आकाश जिसका कान है, जो रोग और शोक से चारों ओर से घिरा हुआ है, जो पाँच प्रवाहों से आवृत है, जो पाँच भूतों से भली-भाँति युक्त है, जिसके नौ द्वार हैं, जिसके दो (जीव और ईश्वर) देवता हैं, जो रजोगुणमय, अदृश्य (नाशवान्), (सुख दु:ख और मोहरूप) तीन गुणों से तथा वात, पित्त और कफ इन तीन धातुओं से युक्त है, जो संसर्ग में रत और जड़ है, उसको शरीर समझना चाहिये। जिसका सम्पूर्ण लोक में विचरण करना दु:खद है, जो बुद्धि के आश्रित है, वही इस लोक में कालचक्र है। यह कालचक्र और अगाध और मोह नाम से कहा जाने वाला बड़ा भारी समुद्र रूप है। यह देवताओं के सहित समस्त जागत का संक्षेप और विस्तार करता है तथा सबको जगाता है। सदा इन्द्रियों के निरोध से मनुष्य काम, क्रोध, भय, लोभ, द्रोह और असत्य- इन सब दुस्त्यज अवगुणों को त्याग देता है। जिसने इस लोक में तीन गुणों वाले पांचभौतिक देह का अभिमान त्याग दिया है, उसे अपने हृदयाकाश में पर ब्रह्मरूप उत्तम पद की उपलब्धि होती है- वह मोक्ष को प्राप्त हो जाता है।

27.9 जिसमें पाँच इन्द्रिय रूपी बड़े कगारे हैं, जो मनोवेग रूपी महान जलराशि से भरी हुई है और जिसके भीतर मोहमय कुण्ड है, उस देहरूपी नदी को लाँघकर जो काम और क्रोध- दोनों को जीत लेता है, वही सब दोषों से युक्त होकर परब्रह्म परमात्मा का साक्षात्कार करता है। जो मन को हृदय कमल में स्थापित करके अपने भीतर ही ध्यान के द्वारा आत्मदर्शन का प्रयत्न करता है, वह सम्पूर्ण भूतों में सर्वज्ञ होता है और उसे अन्त:करण में परमात्मतत्त्व का अनुभव हो जाता है।

27.10 जैसे एक दीप से सैकड़ों दीप जला लिये जाते हैं, उसी प्रकार एक ही परमात्मा यत्र-तत्र अनेक रूपों में उपलब्ध होता है। ऐसा निश्चय करके ज्ञानी पुरुष नि:सन्देह सब रूपों को एक से ही उत्पन्न देखता है। वास्तव में वही परमात्मा विष्णु, मित्र, वरुण, अग्नि, प्रजापति, धाता, विधाता, प्रभु, सर्वव्यापी, सम्पूर्ण प्राणियों का हृदय तथा महान आत्मा के रूप में प्रकाशित है। ब्राह्मण समुदाय, देवता, असुर, यक्ष, पिशाच, पितर, पक्षी, राक्षस, भूत और सम्पूर्ण महर्षि भी सदा उस परमात्मा की स्तुति करते हैं।

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